Monday, 3 November 2014

चालीस के बाद प्रेम / रघुवीर सहाय

श्‍यामलाल एक क्षण ठिठके, फिर नाले में उतर पड़े। नाले में कीचड़ नहीं था; उसमें सूखी पत्तियाँ, अद्धे, गुम्‍मे, चीथड़े और एक खास तरह की धूल थी जो मोहल्‍ले के लोगों ने अपने-अपने घरों से बुहार कर सरकारी नाली में धकेल दी थी। पायँचे चढ़ा कर, दामन समेट कर वह उठकुरवाँ बैठ गए और पुलिया के नीचे झाँकने के लिए अपना सिर नाले की उसी अज्ञात गन्‍दगी के इतने करीब ले आए कि विनम्रता का एक बिल्‍कुल नया उनुभव उन्‍हें हुआ। पुलिया का मोखा जितना चौड़ा नगरपालिका ने बनवाया था उतना नहीं रह गया था - कचरे ने स्‍वाभाविक रूप से उसमें घर कर लिया था और सिर्फ एक छोटा-सा छेद रह गया था जिसके भीतर श्‍यामलालजी को अँधेरा ही दिखाई दिया, क्‍योंकि पुलिया का दूसरा छोर तो कचरे से बिल्‍कुल ही ताया हुआ था।

वह अपनी बिल्‍ली को खोज रहे थे। इतवार का दिन था। जरा देर में पटरी पर चार-छह लड़के जमा हो गए। श्‍यामलाल के दो लड़के जो अपने बाप को देखते खड़े थे, इसी भीड़ में मिल गए था। गए थे। एक-एक कर कई चकित सम्‍भ्रान्‍त अधेड़ लोग तरकारी का झोला लिए चकित-से उनके पास से गुजर गए : एक नौजवान, जिसका स्‍वास्‍थ्‍य आतंककारी और चेहरा विज्ञापनों जैसा था, अधिकारपूर्वक पास आ कर खड़ा हो गया। श्‍यामलाल को रँगे हाथों पकड़ने की नीयत जैसा कुछ दिखा कर उसने पूछा, ''क्‍या है?''

श्‍यामलालजी ने कहा, "बिल्‍ली है।"

"आप की बिल्‍ली है?" नौजवान ने पूछा। उत्तर प्रदेश के निवासी श्‍यामलाल को पंजाबी लहजे में सवाल सुन कर लगा कि 'आपकी' पर इतना जोर दिया गया है कि जैसे बिल्‍ली का किसी-न-किसी का होना तय हो और सवाल इतना ही रह गया हो कि वाकई आप की है या किसी और की? सच पूछिए तो सवाल का इतना बारीक अर्थ न था। पंजाब में पूछा ही ऐसे जाता है और उसमें भ्रम भी ऐसा ही होता है। जैसे पूछा जाए कि "सात बजे हैं?" तो सुनाई पड़ेगा कि क्‍या कहते हो। अभी सात कहाँ से बज गए?

श्‍यामलाल ने कहा, "जी हाँ, मेरी बिल्‍ली है।"

"पुलिया के नीचे चली गई है?"

श्‍यामलाल ने कोई जवाब न दिया। वह पंजाब के धाकड़पन से ही नहीं, विज्ञापनी चेहरेवाली कुल नई पीढ़ी के ठसपने से भी एक साथ जूझने की हिम्‍मत न कर सके। उन्‍होंने और भी झुक कर मानो नाक रगड़ते हुए कोशिश की कि पुलिया के भीतर अँधेरे में बिल्‍ली की चमकती आँखें दिख जाएँ और आवाज दी, "मुनमुन, मुनमुन !"

नौजवान ने सोचा होगा, मुझे यकीन दिलाने के लिए बिल्‍ली का नाम ले कर पुकार रहे हैं। परन्‍तु यह सोचना भी एक निर्दय व्‍यंग्‍य होता। मुनमुन श्‍यामलाल से ऐसे डरती थी जैसे कुत्ते से भी न डरती होगी। वह उन्‍हें देखते ही भागती। मगर इस वक्‍त श्‍यामलाल ने न जाने क्‍यों मान लिया था कि यह रिश्‍ता टूट गया है। वह एक संकट में थे और उन्‍हें विश्‍वास था कि बिल्‍ली भी एक संकट में है।

नौजवान ने एक दोस्‍त और बुला लिया था। अबकी उसने पूछा, "यह बाहर क्‍यों नहीं निकल रही?"

श्‍यामलाल को अचानक दो चमकती हरी बिंदियाँ दिखाई दे गईं। मुनमुन की आँखों के अलावा वे और क्‍या हो सकती थीं? मुनमुन ऐसे देखती थी जैसे कोई बहुत गम्‍भीर व्‍यक्ति हो जबकि थी वह अपनी उम्र के हिसाब से भी अधिक गावदू। वही उजबक आँखें थीं। जरा देर में उसका सफेद थूथन भी नजर आने लगा। पर उस चेहरे पर इस वक्‍त वह भय न था जिसे देखने के श्‍यामलाल आदी थे। उस पर भरोसा था कि मैं जब तक यहाँ से न निकलूँ, सुरक्षित हूँ। जानवर इससे आगे सोच नहीं पा रहा था - कि जब कभी निकलेगी तो क्‍या होगा!

एकाएक श्‍यामलाल को इतना गुस्‍सा आया कि उन्‍होंने जवाब दिया, "जब बाहर निकलेगी तो पूछ कर आपको बताऊँगा।" यह कहते ही उन्‍हें चेत हुआ कि उन्‍होंने अपने आपको उस लड़के के बराबर गिरा लिया है। इस बेवकूफ अमीर का तिरस्‍कार करने के लिए मुझे यह भी मंजूर है, उन्‍होंने सोचा। लड़के का दोस्‍त मामूली हैसियत का आदमी था। खुशामदाना तौर पर अपने दोस्‍त की आड़ करते हुए उसने पूछा, "बताती है?"

श्‍यामलाल इतने उम्‍दा आदमी थे कि उन्‍हें तुर्की-बतुर्की नागवार न गुजरी। मगर वह इतने उथले न थे कि हर ऐसे मजाक को पसन्‍द करें जिसमें कोई हमदर्दी न हो। ज्‍यादातर मजाक आजकल इसी किस्‍म के होते हैं, उन्‍होंने अपने मन में कहा, और यह भी मेरे जैसे आदमियों के लिए आसान नहीं रह गया है कि मैं हँस सकूँ।

यह खयाल आते ही वह चौकन्‍ने हो गए। वह अपने पर तरस खा रहे थे जो कि उन्‍होंने जवानी से ले कर अब तक सचेत रह कर अपने को नहीं करने दिया था। कुछ दिनों से वह देखते आ रहे थे कि वह बदल रहे हैं; चालीस पार करते-करते आदमी का गैर-मामूलीपन खत्‍म होने लगता है, यह उन्‍होंने सुन रखा था। वह अपने अन्‍दर ऐसा न होने देंगे। यह उनका दृढ़ निश्‍चय था। मगर कुछ ऐसा तो हो ही रहा था। जैसे उन्‍हें जानवर से प्‍यार हो चला था जो इस उम्र में बहुतों को अक्‍सर होता है। वह जानते थे कि यह उनके और उनकी पत्‍नी के जिन्‍दगी से थक चले होने का एक नतीजा है। मगर वह यह सोच कर खुश होते थे कि उनके बच्‍चे जो कि वास्‍तव में जानवर को पालने के लिए घर लाए थे, औरों से अच्‍छे इंसान बनेंगे। सिर्फ उस वक्‍त जब उन्‍हें खबरों से राजनीति की निर्दयता का क्षणिक अनुभव होता वह यह सोच कर सहम जाते कि उनके बच्‍चे अपने प्‍यार-भरे दिल से, जो उन्‍हें जानवर की बदौलत मिलेगा, कैसे आनेवाले हकिमों का सामना करेंगे? स्‍वार्थ के कारण जवानी के प्रेम-व्‍यापारों में उन्‍होंने गच्‍चा खाया था। वही स्‍वार्थभाव वह अब अपने जानवर पर थोप रहे हों तो क्‍या अजब है! पर उनके मन को तो इसका पता भी न था - और जानवर को पता चला भी हो तो वह कर ही क्‍या सकता था। हाँ, बिल्‍ली की बात थोड़ी-सी और थी। वह आदमी को उतने ही पास आने देती है जितनी उसे जरूरत हो और कुत्ते की तरह आदमी की खुदगर्जी का शिकार बनने के लिए अपने को समर्पित नहीं करती।

मुनमुन की माँ ने जब छह महीने हुए तीन बच्‍चे दिए थे तो घर के मानवों को एक नई परिस्थिति का अनुभव हुआ था। टीना अपने बच्‍चों की सुरक्षा का अपना जंगली तरीका अपनाना चाहती थी जिसे सात घर दिखाने का नाम मनुष्‍यों ने दिया है, मगर वह भी इतनी आश्रित हो चुकी थी कि उसके लिए सात घर का मतलब हो गया था श्‍यामलाल के ही घर में सात जगह। और इसका मतलब था कि बच्‍चों को बिलौटे से बचाने में हर आदमी को बिल्‍ली की मदद करनी थी। श्‍यामलाल के बच्‍चे और उनकी माँ बिल्‍ली के बच्‍चों को अलमारी में, बंद कमरे में, गोद में, बिस्‍तर में रह कर अपनी समझ से बिल्‍ली के पक्ष में अपना काम करते रहे, मगर बिल्‍ली के तरीकों और उनके तरीकों में लगातार एक मतभेद चलता रहा। जिसे वे सुरक्षित समझते, टीना उसे सूँघ कर नामंजूर कर देती और जिस जगह को वे बिलौटे के लिए सबसे अधिक सुगम समझते टीना उसे पसन्‍द करके, खँखोड़ कर उसकी शक्‍ल इस तरह बदलने की जिद पकड़ लेती कि जिससे वह उसे काफी प्राकृतिक मालूम हो सके। यह किस्‍सा चलता रहा। गर्मियों की रात में जब सारा घर बाहर सो रहा था, बिलौटे ने रोशनदान से घुस कर एक बच्‍चे को खत्‍म कर दिया। टीना की हिंसक फुँफकार से जग कर जब सारा घर भीतर आया तो लाश जमीन पर पड़ी थी और कमरा टीना और बिलौटे के पेशाब की बदबू से भरा हुआ था जो क्रोध के क्षणों में हो गया था। कुछ दिन बाद एक और बच्‍चे को बिलौटे ने गुसलखाने की ठंड में आराम करती माँ को लड़ने का मौका दिए बिना बिल्‍कुल उसके सामने खत्‍म किया। इस बार बच्‍चे को वे लोग उठा कर लाए तो उसमें जान थी। श्‍यामलाल की बड़ी लड़की उसे अस्‍पताल ले गई। शरीर पर कहीं खून न था। मगर उसकी नट्टी बिलौटे ने भीतर-ही-भीतर कुरमुरा दी थी। अस्‍पताल में उसने वह सब दूध और ब्रांडी उगल दी जो घर पर बच्‍चों ने उसे बचाने की कोशिश में पिलाई थी और मर गया।

तब सारी गर्मियाँ श्‍यामलाल मुनमुन को बन्‍द टोकरी में सिरहाने रख कर सोए और सारा घर टीना से एक नई किस्‍म का संवाद सीखने में लगा रहा, क्‍योंकि टीना जब उसकी अक्‍ल में आता मुनमुन की टोकरी में घुस जाना चाहती और जब मन होता उसमें से निकल आना चाहती - उसको चुपचाप बैठने का हुक्‍म देना बेकार था - रात में कई बार उसके लिए जागना हर एक को बिलौटे के खिलाफ कार्रवाई की खातिर इतना जरूरी मालूम होने लगा कि जैसे वे सब बिल्लियाँ हों।

श्‍यामलाल ने छेद में हाथ डाल कर मुनमुन को पकड़ने का इरादा किया। भीतर कोई कनखजूरा या बिच्‍छू हो सकता था, उन्‍होंने डर और इंसानियत के विरोधी भावों का यह अजब मिला-जुला अनुभव किया। फिर उन्‍होंने ऊपर देखा। वह ठस दिमाग आदमी मय अपने खुशामदी साहब के जा चुका था - छोकरे भी। सिर्फ उनके अपने दो लड़के थे। उनका तनाव जाता रहा। यदि उन पर कुछ बुरी गुजरे तो वह तमाशा तो न बनेंगे। उन्‍होंने निर्मल मन से हाथ भीतर कर दिया। भीतर की ठंडी नम जमीन, जो छूने से ही साफ मालूम होती थी, उनकी हथेली से लगी। तत्‍काल उस मिट्टी की खुशबू उन्‍हें आने लगी। "मुनमुन, मुनमुन," उन्‍होंने आवाज दी। वह अब इस तरह बैठे थे कि भीतर झाँक नहीं सकते थे, मगर समझ सकते थे कि मुनमुन उनके हाथ की पहुँच से काफी दूर है।

एकाएक उन्‍हें गोगी की महीन आवाज सुनाई दी। वह टीना के तीन नए बच्‍चों में से एक और सबसे दलिद्दर थी। आवाज के सहारे उनके हाथ ने गोगी को दबोच लिया और वह लटके हुए चारों पंजों को फैलाए और उनके नाखून निकाले गर्दन से टँगी हुई बाहर आ गई।

लड़कों ने चिन्‍ता से कुछ कहा, मगर वह आवाज उस सड़क के यातायात की तरह स्‍वाभाविक थी जो कि श्‍यामलाल से कुछ दूर थी और ज्‍यादा चल नहीं रही थी। वह मुड़े और उन्‍होंने लड़कों से एक वाक्‍य कहा जो कि न उपदेश था, न आदेश, वह बराबर के लोगों से बोला गया एक वाक्‍य था : "मुश्‍तू और टीमा और टीना भी इसी सुरंग में होंगे," जो कि लड़के उनसे पहले ही समझ चुके थे।

मुनमुन के होने के पाँच महीने बाद टीना ने तीन बच्‍चे और पैदा किए थे। इस बार ये तीनों आजादी से पले और बढ़े। बिलौटा कहीं दिखाई न देता था। एक मत यह था कि वह पालतू था और अपने मालिक के मद्रास तबादले के साथ वहीं चला गया है। टीना बच्‍चों को बहुत थोड़ी देर के लिए अकेला छोड़ती, जबकि उन्‍हें इतनी पहरेदारी की जरूरत न रह गई थी। वह सोती भी बहुत, और अपनी पहलौठी की मुनमुन को जो कि कद में लगभग उसके जितनी हो चली थी, अपना दूध बाकी तीनों के साथ पीने देती। मुनमुन टीना की गैरहाजिरी में चुपचाप आ कर बच्‍चों को इस तरह सूँघती जैसे वे कोई नई और विचित्र चीजें हों। एक दिन उसने उन्‍हें चाटना भी शुरू कर दिया और जब वह कूदने-फाँदनेवाले हुए तो उन्‍हें अपनी दुम भी खेलने को देने लगी। ये तीनों माँ की तरह काले और सफेद थे, मुनमुन की तरह भूरेमायल नहीं। वे इतने सुन्‍दर और मुलायम भी नहीं थे। मुनमुन दिन-ब-दिन खिलौने की तरह खूबसूरत और साथ ही जाहिल बनती जा रही थी। उसने एक मरतबा एक ही दिन में तीन बार घर के तीन कोनों में गंदगी करके रख दी।

श्‍यामलाल ने सोचा, इसे सजा की जरूरत है। उन्‍होंने कहीं पढ़ रखा था कि बिल्‍ली कितने ऊँचे से भी क्‍यों न गिरे जमीन पर आते-आते अपनी मांसपेशियों को इस तरह ढील दे देती है कि पंजों के बल सुरक्षित ही गिरे। उन्‍होंने अपना गुस्‍सा तौला और ठंडे दिमाग से मुनमुन को उठा कर उसी के हगे के सामने पटक दिया। वह पंजों के ही बल गिरी : श्‍यामलाल आश्‍वस्‍त हुए कि यह सजा सफल होगी। मुनमुन सीधे घर से बाहर भागी और रात-भर नहीं आई। सवेरे वह लौटी तो पिछली दाहिनी टाँग जमीन पर रख नहीं पा रही थी। श्‍यामलाल के बच्‍चे फिर अस्‍पताल गए। टाँग की हड्डी बच गई थी, मगर वे तन्‍तु जिनके बारे में श्‍यामलाल ने पढ़ रखा था टूट गए थे। लम्‍बे इलाज के बाद वह जिस दिन पहली बार फिर से पेड़ पर चढ़ी, श्‍यामलाल ने उसे फिर प्‍यार करना चाहा। वह पकड़ में तो आ गई क्‍योंकि उसकी टाँग हमेशा के लिए कमजोर हो गई थी, मगर उसने प्‍यार ऐसे कबूल किया जैसे वह बनी ही इसलिए है और कोई एहसान नहीं मान रही है। इसके बाद वह और भी प्‍यारपसन्‍द और आरामतलब हो गई। उसने कभी न कोई चिड़िया पकड़ी, न चूहा। अधिक-से-अधिक तितली को देख कर वह उठ बैठती और कान खड़े करके अपनी नजर से उसका पीछा करती रहती। एक ही और काम था जिसमें वह फुर्ती दिखलाती थी। जैसे ही तीनों बच्‍चे टीना का दूध पीने जुटते, वह भी दौड़ी हुई आती और ठेलठाल कर अपने मुँह के लिए उनके बीच में जगह बना लेती। उस वक्‍त घर के सब लोगों को उसकी चाल पर राय देने का मौका मिलता - "मैंने देखा कि टाँग चला रही है," कोई कहता। कोई कहता, "नहीं, अभी थोड़ा-सा-बस थोड़ा सा जमीन पर छुआती है।"

न जाने किस तरह वह बहस अपनी शक्‍ल बदलने लगी और विषय यह हो गया कि आखिर कब तक टीना और उसके बच्‍चे घर में पलते रहेंगे? कोई साफ-साफ यह नहीं कहता था कि इन्‍हें हम नहीं रखना चाहते। यह कहना कि इनके खाने पर बहुत खर्च हो रहा है, और भी अप्रिय सत्‍य था। टीना रहेगी, यह भी बिल्‍कुल निर्विवाद था। प्रश्‍न इतना ही था कि इन बच्‍चों को कोई पालने के लिए माँग क्‍यों नहीं ले जा रहा है। एक अजब इंसानी तर्क से श्‍यामलाल सोच रहे थे कि अगर ये इतने बड़े न होने पाएँ कि टीना के लिए इनसे बिछ़ड़ना बहुत दुखद हो जाए तो इन्‍हें किसी को दे दिया जा सकता है। इतने बड़े वह किस वक्‍त तक होंगे, यह जानने का कोई वैज्ञानिक आधार उनके पास न था। बस उन्‍होंने मान लिया था कि ऐसा कोई वक्‍त होता होगा। जहाँ तक टीना का सवाल था वह इतना ही जानती थी कि तीनों बच्‍चे इस बार बिलौटे से बच गए हैं और जिस घर में वह रहती है उसमें ये भी रह रहे हैं। एक दिन श्‍यामलाल ने अपने बच्‍चों को समझाया कि जानवर बहुत समय तक अपने बच्‍चों को आदमियों की तरह माँ पर निर्भर नहीं रखते, वे उन्‍हें आत्‍मनिर्भर बनने को छोड़ दिया करते हैं। बच्‍चों ने पूछा, "मगर मुनमुन क्‍यों अब तक माँ का दूध पीती है?" और यह प्रसंग वहीं समाप्‍त हो गया।

पिछले तीन दिन से श्‍यामलाल के दिमाग में कई तर्क उपज रहे थे जैसे यह कि प्रकृति जानवरों की संख्‍या का नियन्‍त्रण करती है… वह नवजात शिशुओं की मृत्‍यु का प्रबन्‍ध कर देती है नहीं तो दुनिया साँपों और घड़ियालों से भर जाए… जानवर को पल कर उसे पराधीन बना देना कितना निर्दय है… उसे अपनी आजादी का कुछ हिस्‍सा अपने पास रखने देना चाहिए… इसके पहले कि वह बिल्‍कुल असहाय हो जाए उसे स्‍वतन्‍त्र कर देना चाहिए। अन्‍त में वह किसी नतीजे पर न आते। किसी ने जब यह सुझाव दिया कि जानवर पालने के तरीकों के अनुसार बिल्‍ली के फालतू बच्‍चों को पैदा होते ही बाल्‍टी में डुबो कर खत्‍म कर दिया जाता है तो सारे घर ने इसका घोर विरोध किया और श्‍यामलाल सोचने लगे कि क्‍या इंसान के दिमाग ने बस इतनी ही तरक्‍की की है जो इतना सीधा और ठोस तरीका निकाला?

उन्‍हें एकाएक सूझा कि तीनों बच्‍चों को सिखाना चाहिए कि आदमी से वे सिर्फ एक हद तक रिश्‍ता रखें। जैसे वे रहें बाहर और घर में जितनी बार चाहें आ जाया करें। क्षण-भर के लिए इस खयाल में छिपी हुई चालाकी भी उन्‍हें दिखाई दे गई। यह प्रमाण था कि वह चालीस पार करने पर भी अपने को ईमानदारी से समझना भूले नहीं हैं। मगर मूलत: यह एक सही विचार है, उन्‍होंने सोचा और सीधे इस नतीजे पर आ गए कि अगर इससे मेरा जाती फायदा हो भी जाए तो भी मूलत: यह जानवर के हित में होगा। वह दरअसल चालीस के हो चुके थे। उस रात को वह मुनमुन को गोद में ले कर घर से सौ गज दूर गए। इससे ज्‍यादा उनकी हिम्‍मत न पड़ी।

लँगड़ी बिल्‍ली को उन्‍होंने वहीं छोड़ दिया और वह दुम दबा कर सर्र से सबसे नजदीक की झाड़ी में गायब हो गई।

आधी रात को काँपती हुई वह खिड़की से घर में दाखिल हुई। उसकी आलसी आदतों को जो जानते थे उन्‍हें खिड़की के जँगले से गुजरने की उसकी कोशिश देख कर इस मुसीबत में भी हँसी आती।

वह घर तो आ गई थी मगर हक्‍की-बक्‍की रह गई थी। जैसे यह भाव उसके चेहरे पर छप गया और फिर जब कभी वह सामने आ पड़ती उसका हक्‍का-बक्‍कापन ही दिखाई देता। धीरे-धीरे वह अच्‍छा लगने लगा और घर-भर ने उसे उसकी सुन्‍दरता की पहचान बना लिया।

अपने प्रयोग की प्रौढ़ बुद्धि से संतुष्‍ट होक दूसरे दिन शाम होने पर श्‍यामलाल अपने बच्‍चों से बोले, "इन तीनों को हम ले चलें और घर के सामनेवाले मैदान में छोड़ दें। यह अपने आप वापस आ जाएँगे।"

बच्‍चे उन्‍हें मैदान में खेलते हुए देखने की कल्‍पना कर खुश हुए - उन्‍हें घर में ही देखते-देखते वे ऊबे जा रहे थे। वे बिलौटे को भूल चुके थे। "मगर चिट्टी के घर के सामने मत छोड़िएगा, उससे हमारी बोलचाल बन्‍द है," उन्‍होंने कहा।

श्‍यामलालजी ने और रात होने का इंतजार किया। उन्‍होंने अपने को भरोसा दिलाया कि चाँदनी है, इससे जो वह करने जा रहे हैं उसमें जानवर के लिए खतरा कुछ कम हो जाता है। वह तीनों को उठा कर ले गए और सूने मैदान में उन्‍हें गोद से उतार दिया। मुनमुन को उन्‍होंने जहाँ अकेले रहने की शिक्षा दी थी, वहाँ से यह जगह उनके घर के और नजदीक थी। तब वह वहाँ से ले कर अपने घर तक चहलकदमी करने लगे। दो-तीन फेरियों तक तो उन्‍हें बच्‍चों की चीं-चीं सुनाई देती रही, उसके बाद आवाजें बन्‍द हो गईं। वह अगली फेरी में बच्‍चों के और नजदीक तक गए। दो बच्‍चे एक घर के बरामदे की सीढ़ियों पर गुमसुम बैठे थे, एक का पता न था।

सवेरे आएगा वह भी, उन्‍होंने कहा और घर लौट आए। हस्‍बमामूल सब के सो जाने का इंतजार करते रहे, क्‍योंकि उनको कुछ देर अकेले जाग कर सोने की आदत थी।

पर जब नींद के ठीक पहले का शून्‍य उनको हँस-हँस कर डुबोने लगा तो वह चौंक कर उठ बैठे और उन्‍होंने बच्‍चों को एक बार फिर देख आने का निश्‍चय किया।

उन्‍होंने हर मकान के बरामदे में झाँकना शुरू किया। जाड़ा पड़ने लगा था, लोग अन्‍दर सो रहे थे। कोई भी जाग पड़ता तो जवाबतलब करता। वह दबे पाँव हर बरामदे में एक कदम रख कर निगाहें चारों और दौड़ाते और वही एक कदम दबे पाँव वापस ला कर अगले मकान को चल देते। आखिरकार एक बरामदे में दो बच्‍चे मिल गए। दोनों गहरी नींद में सिकुड़े एक-दूसरे से पैबस्‍त पड़े थे। उन्‍होंने चार कदम और बढ़ कर उन्‍हें उठा लिया - चाहे कोई जाग ही जाए। लौटते हुए उन्‍हें कहीं से तीसरे की डरी हुई धीमी-धीमी चीं-चीं सुनाई दी। इस बार सहज भाव से वह दूसरी मंजिल के एक मकान की सीढ़ियाँ चढ़ते चले गए और पहले बरामदे में उन्‍हें तीसरा बच्‍चा भी मिल गया।

घर वापस आ कर वह लेटे और फौरन सो गए। अगले दिन इतवार था। उठते ही श्‍यामलाल के बच्‍चों ने टीना के पास जा कर उसके बच्‍चों को देखा। जब उन्‍हें बताया गया कि ये तीनों अपने आप नहीं आए, इन्‍हें लाया गया था तो उन्‍होंने कहा तो कुछ नहीं, मगर श्‍यामलाल को मालूम हो गया कि उन पर सब का विश्‍वास कुछ कम हो गया है।

उनको कुछ बहुत दुख न हुआ। वह जानते थे कि उन्‍हें अपने स्‍वभाव की यह कीमत चुकानी ही पड़ती है। वह कोई गलत काम नहीं कर रहे थे, कोई निर्दयता, कोई क्षुद्रता नहीं कर रहे थे - वह सिर्फ एक निर्भीक प्रयोग कर रहे थे जिसमें जोखिम था तो, पर नपा-तुला। वह चाहते थे कि उन्‍हें बस एक और मौका दिया जाए जैसा जिन्‍दगी में हर बार वह उनसे माँगते आए थे जिन्‍होंने उन्‍हें प्‍यार दिया था।

उन्‍होंने कहा, अगर हम टीना और मुनमुन को भी साथ ले जाएँ और पाँचों को घर से कुछ और दूर छोड़ें तो टीना इनको अपने साथ वापस ले आएगी। यह भी हो सकता है कि एक-दो बच्‍चे रास्‍ते में किसी घर में रह ही जाएँ - रह जाएँ तो अच्‍छा ही है, वहीं पल जाएँगे। यह भी हो सकता है कि कोई रास्‍ते से खुद इन्‍हें उठा कर अपने घर ले जाए…

और फिर सबकी सहमति ले कर जो किसी ने उन्‍हें खुलेआम नहीं दी, उन्‍होंने बिल्‍ली के परिवार को एक-एक करके अपनी खचड़ा मोटरकार में भर लिया। यह निहायत मुश्किल काम था। टीना ने और उसके हर बच्‍चे ने विरोध किया। श्‍यामलाल के बच्‍चे पहले तो सकपकाए खड़े देखते रहे, फिर उन्‍होंने बिल्लियों की गिरफ्तारी में मदद की जिससे बिल्लियों को तकलीफ न हो और एक ने कहा कि आप वहाँ किसी को पटक मत दीजिएगा।

जब कार चली तो टीना घबरा कर इस गद्दी से उस पर टहलने और अपने बच्‍चों को उसी तरह बुलाने लगी जैसे दूध पिलाने के लिए बुलाती थी। शायद वह कोई और आवाज थी जिसकी ममता में दूध पिलाने को बुलानेवाली पुकार से सूक्ष्‍म भेद था। श्‍यामलाल बाजार को मुड़नेवाली सड़क छोड़ कर सीधे बढ़ते गए। इतना घर से बहुत दूर होगा, उन्‍होंने सोचा और लौट पड़े। एक जगह और रुके, पर वह भी उन्‍हें घर से बहुत दूर जान पड़ी। सब निर्णय उन्‍हीं के थे और उन्‍हें संतोष न मिल रहा था। आखिर बाजारवाले मोड़ पर आ कर उन्‍होंने सड़क के एक किनारे एक भलेमानस आदमी को पेड़ के नीचे सुस्‍ताते देखा। यहीं ठीक है। आदमी ने गाड़ी रुकते और बिल्लियों को दरवाजे से कूद कर बाहर आते देखा और वैसे ही बैठा रहा। मगर श्‍यामलाल जो कर रहे थे उसमें उसे चुपचाप अपना साझी मान चुके थे। टीना सड़क पर आते ही चारों ओर देख कर चौकन्‍नी हुई। फिर कान खड़े करके और दुम दबा कर सीधे सड़क के उस पार भागी। मुनमुन उसके पीछे-पीछे दौड़ गई और दोनों सड़क के पार की पटरी पर बैठ कर एक बार इधर और एक बार उधर देखने लगीं। वे सर साथ-साथ घुमातीं। उनके कान खड़े थे और मुँह खिंच कर आगे को निकल आया था। टीना के सफेद पैरों और सफेद सीनेवाला जिस्‍म तना हुआ था। यह देख कर श्‍यामलाल को धक्‍का-सा लगा। "टीना-टीना!" उन्‍होंने पुकारा। मगर टीना वापस आना नहीं अपने बाकी बच्‍चों को इस पार ले जाना चाहती थी। श्‍यामलाल ने उन्‍हें उठाया और टीना की तरफ ले चले। वह तेजी से आगे बढ़ी और बच्‍चों को पुकार कर वापस मुड़ कर वहीं जा बैठी जहाँ पहले थी।

शायद यह जगह भी घर से ज्‍यादा दूर है। मगर नहीं। मुझे पूरी उम्‍मीद है कि इन्‍हें वह घुमा-फिरा कर यहाँ से घर की तरफ ले जाएगी… और फिर जो होगा वह स्‍वाभाविक तौर पर होगा। जो भी हो, हो। मैं इन्‍हें मारने के लिए नहीं छोड़ रहा हूँ। उनकी माँ उनके साथ है। उन्‍होंने कई बार हल्‍के से और एक बार जोर से अपने मन में कहा और वापस आ गए।

किसी ने उनसे कुछ नहीं पूछा। थोड़ी देर बाद जब घर का काम खत्‍म हो चुका तो उनकी पत्‍नी आ कर कमरे में बैठीं। धीरे से बोलीं, "कहाँ छोड़ा है उनको?"

श्‍यामलाल ने बताया कि बाजारवाले मोड़ पर। वह चुप रहीं। श्‍यामलाल ने कहा, "दूर नहीं है। टीना आ जाएगी।" उन्‍होंने बच्‍चों का नाम नहीं लिया।

"टीना पिछवाड़े के स्‍कूल से आगे आज तक नहीं गई है," वह कहकर चुप हो गईं। फिर काफी देर बाद बोलीं, "टीना दो-तीन दिन के पहले नहीं आ सकती।" वह आँखें मूँदें बैठी हुई थीं। उनके चेहरे पर थकान तनी हुई थी। वह बिल्‍ली के साथ किए गए प्रयोग की बेदर्दी और अपना पुराना सिर-दर्द साथ-साथ सह रही थीं।

थोड़ी देर बाद श्‍यामलाल ने पूछा, "दो-तीन दिन कहाँ रहेगी?"

पत्‍नी ने कहा, "यह तो मैं नहीं कह सकती, परंतु वह बच्‍चों को अकेला छोड़ेगी नहीं, जहाँ वे रहेंगे वहीं वह रहेगी।"

श्‍यामलाल बोले, "तो क्‍या यह भी हो सकता है कि वह लौट कर न आए?"

पत्‍नी ने कहा, "यह तो मैं नहीं कह सकती। मगर वह आएगी तो दो-तीन दिन बाद ही आएगी। हफ्ते-भर बाद भी आ सकती है।"

श्‍यामलाल ने कहा, "नहीं, इतने दिन तो बहुत होते हैं।"

अपने हाथ से अपना सिर दबाते हुए पत्‍नी ने कहा, "तुम बाजार से खाना ले आओ। मैंने पकाया नहीं है।"

श्‍यामलाला के साथ बाजार जाने के लिए उनके दो बच्‍चे फौरन तैयार हो गए। वे घर से निकले तो श्‍यामलाल ने कहा, "हम गली-गली जाएँगे।"

एक बच्‍चे ने कहा, "सड़क-सड़क चलिए क्‍योंकि वह सीधे रास्‍ते से घर आ रही होगी।" श्‍यामलाल ने कहा, "नहीं, हो सकता है वे लोग किसी घर में दुबक गए हों, हम गलियों से हो कर जाएँगे और सड़क से हो कर आएँगे।"

गलियों में उन्‍हें कई बिल्लियाँ मिलीं - छोटी, बड़ी, चोरों की तरह दुम दबा कर सरकती हुई और बेखबर घूरे को देख कर कुरेदती हुई। वे सब दूसरी बिल्लियाँ थीं। वे पास आते ही कितनी अजनबी लगती थीं और कितनी पराई भी।

गोगी को पकड़ कर खींच निकालने के बाद श्‍यामलाल को विश्‍वास हो गया था कि टीना और उसके सब बच्‍चे इसी सुरंग में हैं। वह इतनी सँकरी और नीची थी कि यह विश्‍वास सिर्फ वही कर सकता था जो बिल्लियों की सिकुड़ सकने की क्षमता जानता हो। श्‍यामलाल ने वहीं जा कर पूछताछ की थी जहाँ वह सवेरे उन्‍हें त्‍याग गए थे। वह नहीं जानते थे कि जब वह अकेले घर वापस जा रहे थे तो इतवार को छज्‍जों पर खामख्‍वाह खड़े बहुत-से लोगों ने उन्‍हें देखा था। हर छज्‍जे पर बातचीत हुई थी कि यह आदमी कर क्‍या रहा है। निश्‍चय ही कुछ लोग बिल्‍कुल बोदे रहे होंगे। उनमें से कुछ ने श्‍यामलाल का बहुत राजदाँ बनते हुए कहा कि उन्‍होंने समझा था कि श्‍यामलाल अपनी बिल्लियों को छोड़ने नहीं अपनी बिल्लियों को पकड़ने आए हैं। "क्‍या अभी तक मिली नहीं?" उन्‍होंने पूछा। यह पर्दादारी लोग बिना माँगे कर रहे थे जिससे वह श्‍यामलाल को भय की तरह रहस्‍यमय लगी। उन लोगों के सामने जो उन्‍हें इतना गलत समझ रहे थे सच बोलना कितना निराशाजनक होता। "हाँ, मगर आप ने उन्‍हें जाते किधर देखा था?" उन्‍होंने जैसे डकैतों के सामने मीठी बोली से काम निकालना चाहा।

एक बड़ी सींक-सी औरत बोली, "इधर तो वे आ ही नहीं सकतीं, हाँ। मेरा कुत्ता बिल्लियों को फाड़के रख देता है। डरिए नहीं, मैंने इसलिए उसे बाँध दिया है। वे वहीं नाले में कहीं होंगीं।"

सुरंग का दरवाजा उन्‍होंने एक गुस्‍से से ढाँक दिया। गोगी को गोद में ले कर वह घर की तरफ दौड़े। वह अपनी बड़ी लड़की को बुलाने जा रहे थे जिसकी आवाज सुन कर मुनमुन बोला करती थी और वह अपनी पत्‍नी को भी बुलाने जा रहे थे जो रोज उनके घर लौटने पर उन्‍हें बताया करती थी कि आज टीना ने क्‍या किया।

सब कोई आए। लड़की ने मुनमुन को दो बार बुलकारा तो उसने सिर बाहर किया और पकड़ ली गई। मुश्‍तू आदतन मुनमुन के पीछे-पीछे निकल आया। मगर टीना अपनी सुरंग के दरवाजे तक आ कर फिर भीतर चली गई। उसके पास अभी शीमा थी।

भीड़ लग गई थी। जैसे वे दोनों दर्शकों के लिए संवाद बोल रहे हों, श्‍यामलाल ने पत्‍नी से कहा, "तुम बुलाओ।"

स्‍त्री ने आवाज दी, "टीना, टीना!"

तब भीड़ में से एक सूखा-सा आदमी जोर से बोला, "इसके बच्‍चे को दिखाओ तो बाहर आएगी।" कह कर उसने गोगी को श्‍यामलाल के हाथ से ले लिया। श्‍यामलाल और उनकी पत्‍नी दो सिलबिल आदमियों की तरह खड़े देखते रह गए। उसने गोगी को जोर से दबाया। और वह चीख कर रोई। श्‍यामलाल के बच्‍चों ने एक स्‍वर से कहा, "नहीं, नहीं, क्‍या करते हो !" तभी टीना परेशान बाहर आ गई। बड़ी लड़की ने उसे फौरन उठा कर गोद में दबा लिया।

वह भौंचक थी और उसका बदन नम हो रहा था। उसने गरदन उठा कर चारों तरफ देखा और निश्चिंत हो गई। अपने ऊपर थोपी हुई मुसीबत से उसने जो संघर्ष किया था उसका कोई घमंड उसकी आँखों में नहीं था। वह न तो कुरकुराने लगी, न उसने अपनी दुम फुलाई, न उसने ऐसी और कोई हरकत की जिनसे आदमी बिल्लियों को पहचानते हैं। बस, उसने एक बार आँखें मींच कर खोल दीं।

श्‍यामलाल ने उसे गौर से देखा। वह समझ रहे थे कि उन्‍होंने उसके साथ क्‍या किया है और यह भी जान रहे थे कि वह नहीं समझ सकती कि खुद उनके साथ क्‍या हुआ है ! एकाएक वह अपनी असहायता से छटपटा उठे। हालाँकि उनके दिल में प्‍यार-ही-प्‍यार था, मगर बिल्‍ली को किसी तरह यह बताने का तरीका वह नहीं जानते थे। चालीस बरस तक वह हर बार एक मौका और माँग चुके हैं, मगर आज फिर माँग रहे हैं।

आईएस का मज़बूत हथियार है पेशेवर मीडिया / मीना अल-लामी

खुद को इस्लामिक स्टेट (पहले आईएसआईएस या आईएसआईएल) कहने वाला कट्टरपंथी जिहादी समूह अन्य जिहादी गुटों से न सिर्फ़ ज़्यादा क्रूर है बल्कि इसका मीडिया संचालन भी ज़्यादा पेशेवराना है. आईएस मीडिया पर व्यवस्थित ढंग से अच्छा ख़ासा निवेश करता है. इसमें काम करने वाले प्रचारक तो हैं ही बिना थके जुटे रहने वाले समर्थकों की ऑनलाइन सेना भी है. इसके साथ ही मीडिया समूह भी हैं जो इसके संदेशों का तगड़ा प्रचार करते हैं.
वह संदेश, जिसमें क्रूर हिंसा के साथ इस्लामिक स्टेट का प्रचार प्रसार नज़र आता हैं, उसे चतुराई से जारी किया जाता है. इसका मीडिया प्रोडक्शन उच्च गुणवत्ता वाला और पूरी तरह दर्शक को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है. इनके देखने वालों में अरबी भाषी लोग भी हैं और पश्चिमी देशों के भी.
आईएस की ऑनलाइन मीडिया रणनीति के केंद्र में एक अनुशासित, चुस्त और कई परत वाला संगठन है जिसने अन्य जिहादी गुटों को बहुत पीछे छोड़ दिया है. सबसे ऊपर आईएस की मीडिया शाखा है जो वीडियो, बयान और ताज़ा ख़बरें तैयार करती है. फिर इसे ऑनलाइन टीम की मदद से फैला दिया जाता है. संगठन के मुख्य मीडिया प्रोडक्शन हाउस अल-आई'टिज़्म, अल-फ़ुरकान और अल-हयात मीडिया सेंटर (एचएमसी) हैं. इसके अलावा आईएस के कई प्रादेशिक 'मीडिया कार्यालय' भी हैं जो इराक़ और सीरिया को कवर करते हैं. इनका गठन 2014 में किया गया ताकि आईएस के 'इलाकों' के विस्तृत ख़बरें आ सकें और आईएस का मीडिया आउटपुट बढ़ सके.
साफ़ है कि इसका लक्ष्य न सिर्फ़ संभावित लड़ाकों की भर्ती है बल्कि पश्चिम के दुश्मनों और उनकी जनता को डराना भी है. एचएमसी जल्द ही आईएस के प्रचार तंत्र में मुख्य भूमिका में आ सकता है और अंग्रेज़ी भाषा में रोमांचित करने वाले भर्ती के वीडियो के साथ ही बहुभाषीय पत्रिकाएं और सूचनापत्र प्रकाशित कर सकता है. आईएस अपने संदेश को फैलाने के लिए ऑनलाइन समर्थकों पर काफ़ी निर्भर रहा है. लेकिन पिछले कुछ महीनों में कई सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर या तो इसे बंद कर दिया गया है या फिर वे भूमिगत हो गए हैं. इस साल जुलाई तक अन्य जिहादी गुटों की तरह आईएस की भी ट्विटर पर अच्छी खासी मौजूदगी थी और इसके सभी मीडिया केंद्र इसमें आधिकारिक रूप से सक्रिय थे.
हालांकि सीरिया और इराक़ में सैन्य सफलता के बाद संगठन के इन अकाउंट्स को लेकर सख्ती दिखाई जाने लगी. आईएस ने पहले तो जल्दी-जल्दी इन अकाउंट्स को बदल दिया, जो ट्विटर एडमिनिस्ट्रेशन और संगठन के बीच चूहा-बिल्ली के खेल जैसा लग रहा था. लेकिन जुलाई तक संगठन को ट्विटर पर आधिकारिक रूप से कोई अकाउंट रखने की कोशिशों को छोड़ना पड़ा. इसके बजाय आईएस ने कम लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करना शुरू किया. इनमें ट्विटर के मुकाबले ज़्यादा निजता और डाटा-सुरक्षा देने वाले ऑब्सक्योर फ़्रेन्डिका, क्विटर और डायसपोरा के साथ ही लोकप्रिय रूसी कॉन्टाटे शामिल हैं. जहां फ़्रेंडिका और क्विटर पर आईएस के अकाउंट्स कुछ ही दिन में बंद हो गए वहीं डायसपोरा और कॉन्टाटे में यह कई हफ़्ते तक चलते रहे. लेकिन सिर कलम करने के वीडियो में शामिल होने और उन्हें प्रसारित करने के चलते वह भी बंद हो गए.
ऐसा लगता है कि सितंबर में जब तक कॉन्टाटे का अकाउंट बंद हुआ आईएस ने सोशल मीडिया में आधिकारिक उपस्थिति के बिना अपनी चीज़ों को बाहर लाने का ज़रिया तैयार कर लिया था. एक बार ऐसे माध्यमों से इसका संदेश बाहर आ जाए, जिन्हें ढूंढना अभी तक संभव नहीं हुआ है, फिर यह इससे जुड़े मीडिया समूहों के ज़रिए फैला दिया जाता है जिनके पास सोशल मीडिया में निजी समर्थकों का बड़ा जाल है जो आईएस के दर्शकों तक यह संदेश पहुंचा देते हैं. हैशटैग का इस्तेमाल कर ऐसे वीडियो अन्य ज़रियों से फिर उपलब्ध करवा दिए जाते हैं जो यूट्यूब से हटा दिए गए हैं. हालांकि आईएस समर्थकों और मीडिया समर्थक समूहों को नियमित रूप से ट्विटर से निलंबित किया जाता है लेकिन उन्होंने वहां मौजूद रहने के कई तरीके ईजाद कर लिया हैं, जिनमें से लगातार अपने नाम और हैंडल बदलना और बैक-अप अकाउंट्स की श्रृंखला तैयार रखना शामिल है. आईएस की सफलता का दूसरा मुख्य कारण है अच्छी क्वॉलिटी और कई भाषाओं में तैयार इसके वीडियो. इन्होंने इसके हिंसा और सामाजिक न्याय के संदेश का अधिकतम असर सुनिश्चित किया है. इसके वीडियो के सिनेमाई प्रभाव और चमकीली पत्रिकाएं मुख्य धारा की फ़िल्म निर्माण कंपनियों और समाचार संगठनों से कम नही है. इससे पता लगता है कि आईएस में मीडिया प्रोडक्शन और तकनीक विशेषज्ञता वाले लोग हैं. संगठन की सैन्य सफलता और उसके साथ इस तरह का प्रचार आईएस के नए सदस्यों और समर्थकों को इसकी विचारधारा और रणनीति को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब देने के लिए तैयार कर देते हैं.
(बीबीसी से साभार)

चल गईलू नू बड़की माई / रवीश कुमार


सुबह सुबह ही दफ्तर पहुंच गया। कहीं से कोई धुन सवार हो गया था कि इस स्टोरी को आज ही करनी है। दिल्ली फरीदाबाद सीमा पर मज़दूरों की विशालकाय बस्तियां बसी हैं। हम जल्दी पहुंचना चाहते थे ताकि हम उन्हें कैमरे से अचेत अवस्था में पकड़ सके। अखबारों में कोई विशेष खबरें नहीं थीं कि आज वृद्धोंं के लिए कोई दिन तय है। टाइम्स आफ इंडिया में एक खबर दिखी जिसे कार में जल्दी जल्दी पढ़ने लगा। इतने प्रतिशत वृद्ध हैं। उतने प्रतिशत अकेले रहते हैं तो फलाने प्रतिशत गांव में रहते हैं तो चिलाने प्रतिशत शहर में। अपोलो अस्पताल से आगे धूल धूसरित मोहल्ले की तरफ कार मुड़ गई। वृद्ध आश्रम का बोर्ड दिखने लगा। शूटिंग ठीक से हो इसलिए पहले ही मोबाइल फोन बंद कर दिया। कभी करता नहीं पर पता नहीं आज क्यों बंद कर दिया।
सड़े गले शौचालय के पीछे का वृद्ध आश्रम। निम्नतम मध्यमवर्गीय इलाका। नियो मिडल क्लास नामकरण गरीबों के साथ धोखा है। जिसके पास किसी तरह से स्कूटर या कूलर आ जाए और उसके पास कच्चा पक्का सा मकान हो हमने उसे गरीब कहना छोड़ दिया है। नियो मिडिल क्लास कहते हैं ताकि लगे कि गरीबी खत्म हो गई है। मगर इनकी गरीबी उन पैमानों से भी खूब झांकती है। खैर मैं आश्रम के  बड़े से दरवाज़े को ठेलते हुए अंदर आता हूं। जो देखा ठिठक गया। बहुत सारे वृद्ध। बेहतरीन साफ सफाई। डिमेंशिया और अलज़ाइमर के शिकार वृद्धों को नहलाया जा रहा था। फर्श की चमाचम सफाई हो चुकी थी। सबको कुर्सी पर बिठाया गया था। इज्जत और प्यार के साथ। कैमरा लगातार रिकार्ड किये जा रहा था।
इस संस्था के संस्थापक जी पी भगत कुछ दिन पहले दफ्तर आए थे। कहा कि आपको सम्मानित करना चाहते हैं। मैंने यूं ही पूछ लिया कि काम क्या करते हैं। सुना तो कहा सम्मान छोड़िये। बहुत मिल चुका सम्मान, अब उस तरफ देखने का मन भी नहीं करता। आपका काम अच्छा है तो कभी आऊंगा मगर बताकर आऊंगा। मैं गया बिना बताये। शायद यही वजह है कि उस जगह की कुछ गहरी छाप पड़ गई। तिरासी के साल में जे एन यू से कंप्यूटर साइंस में एम फिल करने वाले जी पी भगत ने अपनी जिंदगी बुजुर्गों के लिए लगा दी है। वो उनका पखाना और पेशाब अपने हाथों से साफ करते हैं। उनके साथ काम करने वाले भी हाथ से साफ करते हैं। भगत ने बताया कि कई बुजुर्ग तो ऐसी अवस्था में दिल्ली की सड़कों से मिले कि उनमें कीड़े पड़े हुए थे। उन्हें उठाकर लाना, नहाना, साफकर दवायें लगाना ये सब करते करते एक बुजुर्ग के पीछे साल गुज़र जाते हैं तब वे कुछ सम्मान जनक स्थिति में पहुंच पाते हैं। फिर तो उसके बाद अनुभवों का जो पन्ना खुलते गया मैं सुन सुनकर नया होने लगा। जो कुछ भी भीतर बना था वो सब धाराशाही हो गया।
भगत बताये जा रहे थे। जितिन भुटानी का कैमरा रोल था। हमारे सहयोगी सुशील महापात्रा की आंखें भर आ रही थीं। मैं खुद हिल गया। फर्श की सफाई किसी अच्छे अस्पताल से भी बेहतर की गई थी। सबको प्यार से डायपर पहनाकर कुर्सी पर बिठा दिया गया था।  दो चार लोग दिल्ली के घरों से फेंक दिये गए, कुछ बुजुर्ग भटक कर लापता हो गए।  मैंने त्याग और करुणा का सर्वोच्च रूप देखा। भगत ने कहा कि लोगों को घिन आती है। पखाना पेशाब साफ करने में। इसलिए सड़कों पर छोड़ देते हैं। अस्पताल के बाहर छोड़ देते हैं। कई बुजुर्ग तो इस अवस्था में भी मिले कि उनके अंगूठों पर नीली स्याही के निशान ताज़े थे। ऐसा कई केस आ चुका है। संपत्ति के दस्तावेज़ पर अंगूठा लगवाकर इन बुजुर्गों को लोग फेंक देते हैं। स्याही सूखने का इंतज़ार भी नहीं किया।  कई लोग तो फोन कर छोड़ देते हैं कि दस बारह हज़ार का महीना ले लो लेकिन अपने पास रख लो। भगत ने कहा कि मैं काफी समझाता हूं कि अपने पास रखिये फिर उनके सामने कड़ी शर्तें रखता हूं कि मिलने नहीं दूंगा मगर कोई यह नहीं कहता कि दूर से भी देख लेने देना। मां बाप को छोड़ कर जाते हैं तो दोबारा नहीं आते। एक बेटी से कहा कि फिर नहीं आओगी तो उसने कहा मंज़ूर है। फिर कहा कि देखो अगर तुम्हारी मां गुज़र गईं तो अंतिम संस्कार भी नहीं करने दूंगा तो उस पर भी वो मान गई। ऐसे तमाम बेटों की कहानी है कि पता चल गया कि मां बाप यहां हैं। कोई लंदन है कोई लुधियाना तो कोई अफसर मगर कोई लेने नहीं आता।
भगत के पास समाज की जो हकीकत है वो न तो ओबामा के पास है न मोदी के पास न किसी पत्रकार के पास। उनका अनुभव बोले जा रहा था। बुजुर्ग औरतें और पुरुष भगत और उनके सहयोगियों को बहुत प्यार करते हैं। सोहन सिंह को हिन्दू महिला सोहन कहती है तो मुस्लिम हैदर। सोहन ने बताया कि जो नाम याद आता है इन्हें बुला लेती हैं। भगत ने कुर्सी पर कोने में दुबके पांडे जी से कहा कि ये सिर्फ केला खाते हैं। मैंने कहा कि ये कैसे पता चला। तो कहने लगे कि महीनों तजुर्बा करते करते समझ आ गया। जो डिमेंशिया या अलज़ाइमर  के मरीज होते हैं  उन्हें अपने बच्चों के नाम याद रह जाते हैं। पोते पोतियों के नाम याद रह जाते हैं। जाति याद नहीं रहती मगर धर्म याद रहता है और हां स्वाद याद रहता है। इसलिए बाकी लोग स्वादिष्ट दलिया और हार्लिक्स पी रहे हैं मगर पांडे जी केला खा रहे हैं। आश्रम के सेवक कुछ औरतों को खैनी खिला रहे थे। कहा कि इसकी आदत है नहीं दो तो रोने लगती हैं।
भगत ने अमीरी गरीबी का भी भेद खोल दिया। कहा कि कई अमीर हैं जो अपने मां बाप की खूब सेवा करते हैं। तब पता चलता है जब वे उनके गुजरने के बाद महंगी मशीने और डायपर लेकर आते हैं। दान देने के लिए। मगर अमीर ही अपने मां बाप को सड़कों पर छोड़ देते हैं। हां लेकिन गरीब अपने मां बाप को नहीं फेंकता है। वो सेवा कर लेता है। कहा कि दान मांग कर और खुलकर मांग कर इनकी सेवा करता हूं। ऐसा हिसाब लगा रखा है कि पैसा बचेगा ही नहीं। बचने से समस्या पैदा होती है। मैंने खुद देखा। बेहतरीन साफ सफाई के साथ खाना बन रहा था। सबको अच्छे कपड़े दिये गए थे। हैदर ने बताया कि एक बार  घिन आ गई तो किसी बुजुर्ग के पखाने को ब्रश से साफ कर दिया। भगत जी तो भगाने लगे कि भागो यहां से। ब्रश से जख्म हो जाएगा। हाथ से साफ करो। अब सामान्य ही लगता है सबकुछ।
उस आश्रम में अनगिनत किस्से हैं। हर किस्सा आपको गिरा कर नए सिरे से खड़ा कर देता है। भगत जी ने कहा कि हम सबका धर्म के हिसाब से संस्कार करते हैं। हज़ार लोगों का अंतिम संस्कार कर चुका हूं। अब तो मेरे पास चार आदमी हैं मगर जब यह काम शुरू किया था तब अपने हाथ से उठाकर मृत शरीर को गली के बाहर तक ले जाता था। मुझे तो हिन्दू मां भी बेटा कहती है तो मैं हिन्दू हो गया, मुस्लिम मां भी बेटा कहती है तो मुसलमान हुआ जब मां मुसलमान है तो बेटा भी मुसलमान हुआ, ईसाई मां ने बेटा कहा तो ईसाई हो गया। उनकी इस बात ने छलका दिया मुझे। हम किन वहशी लोगों के गिरफ्त में आ जाते हैं। धर्म पहचान कर अलग कर देते हैं। आश्रम की तख्ती पर कुरान की आयतें, गुरु नानक देवजी, ईसा मसीह के बगल में दुर्गी जी, कबीर,रविदास जी।  सब एक साथ। ये होती है इंसानियत की इबादत। इंसानों को भगवान मानकर सेवा की तब भगवान एक से लगने लगे।
जो देखा खुद को काफी भरोसा देने वाला था। भगत ने कर के दिखाया है। उनके नब्बे साल के पिता ने कहा कि मैं नहीं भी रहा तो भगत के मां बाप हमेशा दुनिया में रहेंगे। इतने लोग  इसे बेटा बेटा कहते हैं तो कभी होगा ही नहीं कि इसकी कोई मां नहीं होगी, इसका कोई पिता नहीं होगा। मैं नहीं रहूंगा तो क्या हुआ। इस कहानी ने भीतर तक तर कर दिया। सहयोगी सुशील बहुगुणा ने कहा कि फुटेज देखकर रोना आ गया। मैं यही सोचता हुआ दफ्तर से निकला कि इसे कहते हैं आदमी होने की सर्वोच्च अवस्था जब आप पखाने में उतरकर उसकी सेवा कर दें। कार में बैठा ही था कि कई मिस्ड काल नज़र आने लगे तो सुबह आए होंगे। सूचना मिली कि मेरी अपनी बड़की माई गुज़र गईं हैं। दो बुजुर्गों की दुनिया में बंट गया। हमारे बाबूजी को बहुत प्यार करती थी, कहती थीं मेरा देवर होता तो ये कर देता वो कर देता। छठ के समय बड़किया का बनाया रसियाव आज तक याद है। बचपन की स्मृतियों का आधार है। कसार अब नहीं खा सकेंगे। वो चली गई। इस वक्त जब मैं यह लिख रहा हूं मेरे बड़े भैया उन्हें अग्नि दे चुके हैं। बता रहे थे कि हम सब घाट पर हैं। अगर भगत से नहीं मिला होता तो इस खबर से मैं टूट जाता । मगर भगत के माता-पिता की कहानी सुनकर लगता है कि मेरी बड़किया किस्मत वाली है। उसकी बहू ने खूब सेवा की, बेटे ने भी की।  संपन्न बेटी- दामादों ने की या नहीं मालूम नहीं। किया ही होगा। बिना जाने कुछ नहीं कहना चाहिए मगर भगत की बातें सुनकर बिना जाने यकीन भी नहीं होता। अपने रिश्तेदारों से न के बराबर संपर्क रखता हू। भगत का स्केल देखकर ऐसा लग रहा था कि हमने भी अपने बाबूजी की कम सेवा की। मां की कम सेवा करता हूं। मुझे लगता है कि बहुत ख्याल रखता हूं मगर कोई भगत के भाव की बराबरी नहीं कर सकता है।
बड़का बाबूजी भी कमज़ोर हो गए हैं। दोनों एक दूसरे को खूब प्यार करते हैं। चंद दिनों पहले पटना के अस्पताल में बड़किया भरती थीं। उन्होंने मेरी भाभी से कहा कि तुम लोग हमको जिया दोगे आ बेतिया में हमार बुढऊ के कुछ हो जाई त। ले चलो वहां। बेतिया में बड़का बाबूजी ने खाना बंद कर दिया था कि मेरी बुढ़िया को पटना ले गए हैं। नहीं बच पाई तो। क्या लव स्टोरी है। आज बड़किया का देवर बहुत याद आ रहा है।
(रवीश के ब्लॉग 'कस्बा' से साभार)

कमाल की आंखे थीं अमरापुरकर की / प्रभात पांडेय


हिंदी और मराठी फ़िल्मों के जाने-माने अदाकार सदाशिव अमरापुरकर के निधन से फ़िल्म इंडस्ट्री स्तब्ध 

अमरापुरकर का 64 साल की उम्र में मुंबई के एक अस्पताल में निधन हो गया. उन्हें फेफड़ों की बीमारी थी. फ़िल्म 'अर्धसत्य' में खलनायक रामा शेट्टी के किरदार से वो हिंदी फ़िल्मों की दुनिया में सामने आए. 'अर्धसत्य' के निर्देशक गोविंद निहलाणी ने अमरापुरकर से जुड़ी यादें साझा कीं. सदाशिव अमरापुरकर अस्पताल में जब भर्ती थे तब मैंने उनके परिवार से बात की थी. मुझे लग रहा था कि वो इस बीमारी से बाहर आ जाएंगे. लेकिन बड़े दुख की बात है कि ऐसा नहीं हुआ. 'अर्धसत्य' के लिए उनके नाम की सिफ़ारिश मशहूर नाटककार विजय तेंदुलकर ने की थी. मैं इस रोल के लिए बिलकुल नए चेहरे की तलाश कर रहा था. 
जब मैं उनसे मिला तो उनका चेहरा बड़ा दिलचस्प लगा. ख़ासतौर से उनकी आंखे बड़ी प्रभावी थीं. महेश भट्ट की फ़िल्म 'सड़क' में सदाशिव अमरापुरकर का किरदार ख़ासा मशहूर हुआ था मैंने जब उनका मराठी प्ले 'हैंड्स अप' देखा तो अभिभूत हो गया. इस नाटक में उन्होंने एक मसख़रे पुलिसवाले का रोल किया था, जो अर्धसत्य के रोल से बिलकुल अलग था. लेकिन मुझे लगा ये बंदा कमाल का है. मुझे लग रहा था कि वो अच्छा काम करेंगे लेकिन उन्होंने तो ऐतिहासिक काम कर दिया. और मज़े की बात देखिए कि फिर विशुद्ध मसाला फ़िल्मों में भी अपनी विशेष जगह बनाई और दिखा दिया कि उनकी रेंज कितनी विशाल है. दिबाकर बनर्जी की फ़िल्म 'बाम्बे टॉकीज़', सदाशिव अमरापुरकर की आख़िरी फ़िल्म थी. मेरी फ़िल्म 'बाम्बे टॉकीज़' बतौर अभिनेता सदाशिव अमरापुरकर की आख़िरी फ़िल्म थी. ये ख़बर सुनकर मैं हिल गया हूं. जैसे अच्छा खाना खाकर उसका स्वाद मुंह को लग जाता है वैसे ही उनके जैसे बेहतरीन अभिनेता के साथ थोड़ा काम करके मैं उनके साथ कुछ बड़ा करने की योजना बना रहा था. हालांकि उस दौरान भी उनकी सेहत अच्छी नहीं थी लेकिन इतनी ख़राब भी नहीं थी.
फ़िल्म 'अर्धसत्य' में उन्होंने रामा शेट्टी का जो किरदार निभाया उसने हिंदी फ़िल्मों में खलनायकी को नया चेहरा दिया. वो हिंदी ही नहीं बल्कि मराठी फ़िल्मों के भी ज़बरदस्त अदाकार थे. पिछले कुछ सालों से वो फ़िल्मों में सक्रिय नहीं थे क्योंकि उन्हें मन माफ़िक़ रोल नहीं मिल रहे थे. उन्होंने मुझसे ख़ुद कहा था कि मैं बेवजह के रोल क्यों करूं, मैं थिएटर करके ही ख़ुश हूं. (बीबीसी हिंदी से साभार)

Saturday, 1 November 2014

चुनावी वायदे भूलकर हवा-हवाई बातें

नरेंद्र मोदी दो नवंबर (रविवार) को एक बार फिर रेडियो पर (चुनावी वायदे भूलकर) 'मन की बात' सुनाएंगे! इससे पहले चार अक्तूबर को उन्होंने अपने मन की जो बातें सुनाई थीं, उसे जान लिया जाये तो पता चल जायेगा कि रविवार की कथनी भी कमोबेश उसी रंग-ढंग की होगी.... हवा-हवाई।

चार अक्तूबर को मोदी ने कहा था - 'यह सरल माध्यम है और इसके जरिये वह दूर दराज और गरीब लोगों के घरों तक पहुंच सकते हैं। देश की शक्ति गरीबों की झोपड़ी में है, मेरे देश की ताकत गांवों में बसती है, मेरे देश की ताकत मां, बहन, युवा और किसानों में है।' .... ये तो सबको मालूम है। जरूरत लोगों को गरीब बनाने वाली ताकतों के खिलाफ उठ खड़े होने की है। अडानी, अंबानी के साथ गलबहियां और गरीबों को मुफ्त का 'रेडियो-राग'।

चार अक्तूबर को मोदी ने एक राहगीर की कहानी सुनाते हुए कहा था - 'सवा सौ करोड़ देशवासियों में अपार सामर्थ्य है।'..... ये बात भी सवा सौ करोड़ देशवासियों को मालूम है। उन सवा सौ करोड़ लोगों में से सिर्फ पचीस-तीस फीसदी अमीर-उमराव के लिए हुक्मरान हांफते रहते हैं, बाकी के लिए भाषण की घुट्टी।

प्रधानमंत्री ने चार अक्तूबर को ‘स्वच्छ भारत अभियान’ में हिस्सा लेने के लिए नौ लोगों को आमंत्रित करने, उन सभी से नौ और लोगों को जोड़ने तथा इस तरह से इस श्रृंखला को आगे बढ़ाने का आग्रह किया था। काश इसी तरह की श्रृंखला देश की राजनीतिक गंदगी साफ करने के लिए बन जाये तो देश का कायाकल्प हो जाये और देश-विदेश का कालाधन मुल्क के पचास फीसदी लोगों की कंगाली मिटा दे।

उस दिन प्रधानमंत्री ने कहा था - 'हम अपनी शक्तियों को भूल चुके हैं, हमें अपनी ताकत पहचाननी होगी।' ..... वो तो सबको मालूम है। पूंजीपतियों के पैसे से चुनाव लड़कर जनता को ठेंगा दिखाने वालो ने जनता की ये गत की है। लगता नहीं कि कांग्रेसी राज से इतर कुछ हो रहा है।

प्रधानमंत्री ने कहा था - 'हम विश्व के अजोड़ लोग हैं। हम मंगल पर कितने कम खर्च में पहुंचे।' ..... अंतरिक्ष में पहली बार पहुंचने के बाद से आज तक गरीबों और अमीरो के बीच की खाईं  कितने गुना चौड़ी होती गयी है, इसकी भी नाप-जोख हो जाये तो मंगल ग्रह पर जाने के निहितार्थ स्पष्ट हो जाएंगे।

मोदी ने कहा था - 'बच्चे केवल मां-बाप की जिम्मेदारी नहीं होते बल्कि पूरे समाज का दायित्व होते हैं। पूरे समाज का दायित्व है कि वह विशेष रूप से अशक्त बच्चों से खुद को जोड़े।' ....... हमारे शहर के गरीब बच्चे तो आज भी वैसे ही बिलबिला रहे हैं। नेहरू को भी गुलाब जैसे खिले खिले बच्चे ही प्यारे लगते थे।

मोदी ने कहा था - 'यह देश सभी लोगों का है, केवल सरकार का नहीं है। बच्चों के लिए स्कूलों में पांचवी कक्षा से कौशल विकास का कार्यक्रम होना चाहिए ताकि जब वे पढ़ाई खत्म करके निकलें तब अपने हुनर की बदौलत रोजगार प्राप्त कर सकें।' ...... पढ़ाई और रोजगार का दर्द तो वे करोड़ो युवा ही अच्छी तरह जानते हैं, जिन्हें मुल्क की आजादी का आज तक कोई मतलब समझ में नहीं आ रहा है।

Friday, 31 October 2014

अमानवीयता की सेवा में जुटे हुए हैं तमाम समाचार चैनल/जगदीश्वर चतुर्वेदी

समाचार चैनलों में इन दिनों अपराध की खबरों के नाम पर अपराधियों का महिमा-मंडन चल रहा है और निरपराध लोगों पर चैनल अपनी तरफ से खबरों के जरिए मुकदमा चला रहे हैं। स्थिति यह है कि दैनन्दिन अदालती सुनवाई को भी चैनल कवरेज दे रहे हैं। इस तरह की खबरों में खबर की बजाय उत्पीड़न और सामाजिक कष्ट देने का भाव ज्यादा है। इससे मीडिया और व्यक्ति के अन्तस्संबंध से जुड़े अनेक सवाल उठ खड़े हुए हैं। क्या मीडिया को किसी अपराध के बारे में समानान्तर प्रचार अभियान के माध्यम के रुप में हस्तक्षेप करने का हक है ?
किसी भी व्यक्ति के लिए यह संभव नहीं है कि वह मीडिया में जारी प्रचार अभियान का रोज प्रत्युत्तर दे। साथ ही यह भी देखना होगा कि अपराध खबरों की प्रस्तुति के बारे में मीडिया की क्या भूमिका होनी चाहिए।
इन दिनों विभिन्न चैनलों से अपराध खबरों का ज्यादा से ज्यादा प्रसारण हो रहा है। यह प्रवृत्ति अभी तक दैनिक अखबारों में थी। किंतु अब टेलीविजन चैनलों ने इसे अपना लिया है। सामान्य तौर पर प्रेस अपराधी तत्वों के महिमामंडन से दूर रहा है। किंतु राजनीतिक और आर्थिक अपराधियों के महिमा-मंडन में लिप्त रहा है।इसके विपरीत समाचार चैनलों की खबरों में वस्तुगत प्रस्तुति के बहानेअपराधियों और अपराध कर्म का महिमा मंडन चल रह है।
चैनलों में दो तरह की प्रवृत्तियां दिखाई दे रही हैं। पहली प्रवृत्ति है तथ्यपरक रिपोर्टिंग की। दूसरी प्रवृत्ति है अपराधकर्म को सस्पेंस और रसीला बनाकर पेश करने की। दूसरी प्रवृत्ति के तहत चैनलों में पुरानी किसी घटना का जीवंत या नाटकीय रूपायन दिखाया जाता है। इस तरह की प्रस्तुतियों में अपराध को व्यापकता प्रदान की जाती है।  पुलिस की सजगता,चुस्ती,मुस्तैदी,निकम्मेपन पर जोर
रहता है।
इसके विपरीत अपराध की तथ्यपरक रिपोर्टिंग के नाम पर आजतक,सहारा समय,एनडीटीवी आदि चैनलों में अपराध खबरें सामाजिक प्रभाव के बारे में सोचे बगैर दिखाई जा रही हैं। इन चैनलों से अपराध खबरें इस तरह पेश की जा रही हैं जिससे यह लगे कि अपराध आम जीवन का सामान्य अंग है। खबरों में साधारण और असाधारण अपराध में फ़र्क नहीं किया जा रहा। इन्हें आम खबर के रूप में पेश किया जा रहा है। जबकि अपराधकी खबरें आम खबर की कोटि में नहीं आतीं। सभी अपराध और अपराधी समान नहीं होते। ध्यान रहे किसी अपराधी का महिमा-मंडन उसकी छवि को सुधार देता है। साथ ही अपराध के प्रति आम जनता में अपराध विरोधी चेतना को कुंद कर देता है।
डब्ल्यू.आई.थॉमस ने 'पीत पत्रकारिता का मनोविज्ञान' नामक पुस्तक में अपराध खबर के बारे में लिखा ये पाप और अपराध के सकारात्मक एजेण्ट हैं। नैतिकता की अवस्था,मानसिकता आदि के संदर्भ में समाज इनके अनुकरण पर निर्भर करता है। जनता इनसे खूब प्रभावित होती है।अपराधी का नाम यदि किसी ग्रुप से जुड़ा हो और मीडिया उसका प्रचार कर दे तो उससे अपराधी को मदद मिलती है। इसी तरह किसी अपराधी
गिरोह का सरगना मारा गया और उसकी जगह नए मुखिया की नियुक्ति की खबर से भी अपराधी को बल मिलता है। अपराध खबरों के प्रसारण या प्रकाशन के बारे में मीडिया का तर्क है कि अपराध खबरों को छापकर वह जनता और कानून को सचेत करता है। इस संदर्भ में पहली बात यह है कि शांत और नियमित माहौल में ही अपराध खबरें सचेत करती हैं। अशांत माहौल में असुरक्षा पैदा करती हैं।
आम तौर पर टेलीविजन में जो अपराध खबरें आ रही हैं उनमें अपराधी के व्यवहार को रोमांटिक रूप में पेश किया जा रहा है। इनमें अपराधी ने जो मैथड अपनाया उस पर जोर रहता है। अपराध को नियंत्रित करने वाली मशीनरी की तीखी आलोचना रहती है अथवा उसके निकम्मेपन पर जोर रहता है। मजेदार बात यह है कि अपराध के बारे में बताया जाता है,गिरफ्तारी के बारे में बताया जाता है किंतु दण्ड के बारे में नहीं
बताया जाता।
अपराध खबरों में जब सरकारी मशीनरी पर हमला किया जाएगा तो इससे अपराधी को बल मिलेगा।अपराधी ताकतवर नजर आएगा।अपराध के मैथड बताने से अनुकरण को बल मिलता है। अपराध खबरों के प्रसारण के पीछे यह दर्शन संप्रेषित किया जाता है कि अपराध से कोई लाभ नहीं। इस परिप्रेक्ष्य में पेश की गई खबरों में यह भाव निहित होता है कि 'यह सामान्य बात है और दण्ड मिलेगा ही।' अपराध खबरों के बारे में यह ध्यान रखें कि आनंद या भूलवश किए गए अपराध का प्रसारण नहीं किया जाना चाहिए।साथ ही 'इफेक्ट' और 'इफेक्टिवनेस' के बीच अंतर किया जाना चाहिए। हिंसा और अपराध की खबरों के बारे में सभी एकमत हैं कि इसका तीव्रगति से असर होता है। अपराध खबरों का असर व्यक्तिगत न होकर सामाजिक होता है। इससे आक्रामकता और प्रतिस्पर्धा में वृध्दि होती है।
टेलीविजन समाचारों के आने के बाद से समाचार के क्षेत्र में क्रांति आई है।जल्दी और ताजा खबरों की मांग बढ़ी है।फोटो का महत्व बढ़ा है। स्वयं को देखने,सजने,संवरने और ज्यादा से ज्यादा मुखर होने की प्रवृत्ति में इजाफा हुआ है। व्यक्तिवाद में वृध्दि हुई है।व्यक्ति की हिस्सेदारी बढ़ी है। किंतु इसके साथ-साथ खबरों को छिपाने या गलत खबर देने की प्रवृत्ति में भी वृध्दि हुई है। खासकर मानवाधिकारों के हनन की खबरों को छिपाने के मामले में टेलीविजन सबसे आगे है।
टेलीविजन खबरों का जिस तरह स्वरूप उभरकर सामने आया है उससे यह बात सिध्द होती है कि टेलीविजन खबरों का प्रेस की तुलना में खबरों को छिपाने के लिए ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है।टेलीविजन को नियंत्रित करना ज्यादा सहज और संभव है।खबरों में निरंतरता जरूरी है।प्रेस आम तौर पर निरंतरता के तत्व का ख्याल रखता है किंतु टेलीविजन ऐसा नहीं करता।बल्कि निरंतरता के तत्व का वह चुनिंदा मामलों में ही ख्याल रखता है। समाचार चैनलों में इन दिनों सनसनीखेज खबर बनाने या फिर खबर छिपाने का चक्र चल रहा है। इसके कारण सबसे ज्यादा उन्हें क्षति पहुँच रही है जो अपने अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। अपने जायज अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं।समाचार चैनलों में गैर जरूरी सवालों पर ज्यादा ध्यान देने से ऑडिएंस के अ-राजनीतिकरण की प्रक्रिया को बल मिलता है। चैनल खबरों के इतिहास में नहीं जाते और न सही खबरों का चयन करते हैं। नया दौर खबर का नहीं मनोरंजक खबरों का है।

TV समाचारः मीडिया रिपोर्टिंग बनाम मीडिया ट्रायल/कुमार कौस्तुभ

टेलीविजन पर समाचारों के प्रसारण के सिलसिले में निष्पक्षता से जुड़े कई सवाल उठते रहे हैं। सुलझी हुई रिपोर्टिंग बनाम मीडिया ट्रायल से जुड़ी बहस भी उसी का हिस्सा है। अक्सर अपराध से जुड़े मामलों की खबरों की कवरेज के दौरान टेलीविजन पत्रकारों पर मीडिया ट्रायल का आरोप लगता है, जब किसी खास मामले की ज्यादा से ज्यादा कवरेज होती है, उसकी तह में, गहराई में जाने की हद से ज्यादा कोशिश होती है। सच्चाई का खुलासा करने की होड़ में आरोपियों और मामले से जुड़े लोगों की सरेआम कैमरे पर इस तरह जिरह होने लगती है जैसे अदालत में कोई मुकदमा चल रहा हो। ऐसी स्थिति में रिपोर्टर जैसे जज बन जाते हैं और खुद ही फैसला भी सुनाने लगते हैं। ये किसी भी मामले की असंयमित रिपोर्टिंग का नमूना है, जिसके तहत जिस तरह मामले से जुड़े मुद्दों की पड़ताल होती है, उसकी अदालती सुनवाई से तुलना होने लगती है और उसे ‘मीडिया ट्रायल’ की संज्ञा दे दी जाती है। ‘मीडिया ट्रायल’ का जुमला चाहे जहां से भी ईजाद हुआ हो, लेकिन इसका सीधा सा मतलब यही होता है कि मीडिया किसी मामले की इतनी पड़ताल कर रहा है और किसी को दोषी और किसी को निर्दोष साबित कर रहा है, जो पुलिस-प्रशासन और अदालतों को करना चाहिए। ऐसे में सवाल ये है कि क्या पुलिस-प्रशासन के निकम्मेपन का ये नतीजा है या फिर अदालतों की कार्रवाई सवालों के घेरे में है। एक तरह से देखें तो ऐसा नहीं कहा जा सकता। पुलिस-प्रशासन, अदालत- सभी अपने दायरे में अपने तरीके से किसी भी मामले पर कार्रवाई करते हैं- यहां सवाल पक्षपात या निष्पक्षता का नहीं है, ये एक प्रक्रिया है, जिसका पालन तमाम जांच एजेंसियां और कानूनी पक्ष करते हैं और इसमें जो भी समय लगे, उसके बाद नतीजा निकलकर सामने आता है, जो किसी के पक्ष में होता है और किसी के खिलाफ। अब नतीजा सही होता है या गलत- ये अलग चर्चा और बहस का विषय है। लेकिन किसी मामले में मीडिया, खासकर टेलीविजन की दिलचस्पी और अति-सक्रियता क्यों होती है और क्यों स्थिति ‘मीडिया ट्रायल’ के स्तर तक पहुंचती है, ये पहलू विचारणीय है। टेलीविजन समाचारों में आजकल उन जानकारियों को खबरिया नजरिए से तरजीह दी जाती है, जो आम आदमी से जुड़े हों, उसे किसी न किसी तरह प्रभावित कर रहे हों। जघन्य बलात्कार की घटनाओं या नृशंस हत्या के मामले ऐसी खबरों में सबसे पहले शुमार होते हैं, जो आम दर्शकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। लिहाजा ऐसी खबरों को प्रमुखता देना टेलीविजन समाचार चैनलों का धर्म बन गया है। रही बात किसी खास खबर पर मंथन की, उसे लगातार जिंदा रखने की, उस पर बहस ख़ड़ी करने की- तो ये सारी बातें खबर की अपनी मेरिट पर निर्भर करती हैं, न कि किसी विद्वेषपूर्ण नजरिए से उन्हें उठाया जाता है- इसके लिए कोई उदाहरण देने की जरूरत नहीं- रोजाना टेलीविजन पर समाचार देखते हुए ये बड़ी आसानी से समझा जा सकता है। अपराध के मामलों में पुलिस-प्रशासन की लापरवाही, उस पर लोगों का गुस्सा और उनकी प्रतिक्रिया और उसके बाद कथित आरोपी के पकड़े जाने या नहीं पकड़े जाने पर जनभावनाओं का सामने आना- ये सब प्रसारित होनेवाली खबरों के प्रमुख पहलू हैं। जाहिर है, किसी भी ऐसे बड़े अपराध का मामला अदालत तक पहुंचता है, तो आम दर्शकों की उसमें दिलचस्पी वाजिब है और आम लोगों की प्रतिक्रिया को दिखाना भी खबर के प्रसारण का एक हिस्सा है। खबर के प्रसारण का दूसरा हिस्सा है – पुलिस और प्रशासन की प्रतिक्रिया। सवाल ये है कि क्या खबरों की रिपोर्टिंग तथ्यों की और उन पर पुलिस और पब्लिक की प्रतिक्रिया तक सीमित रहे? और सीमित रहे भी तो कैसे रहे? जब कोई जानकारी खबर बनती है और उस पर प्रतिक्रियाएं आना चालू होती हैं, तो जैसे एक तरीके से बहस छिड़ जाती है और मुद्दे के हर पक्ष की पड़ताल होती है। ऐसे में अगर मीडिया अपराध के तथ्यों, जो आमतौर पर पुलिस की प्रेस कांफ्रेंस में पेश किए जाते हैं, की कवरेज तक सीमित रहे, तो क्या उसकी निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठेंगे। सवाल उठते भी रहे हैं और टेलीविजन पर मरणासन्न खोजी पत्रकारिता की स्थिति के लिए इसी बात को जिम्मेदार भी माना जाता रहा है कि टेलीविजन के पत्रकार थानेदारों और पुलिस अफसरों के बयानों तक क्यों घूमते पाए जाते हैं। ऐसे में जब बात पुलिस से पब्लिक तक आती है तो और भी कई बातें निकलती हैं और खबर की कड़ियां आगे बढ़ती चली जाती है, जिसमें दर्शकों की दिलचस्पी स्वाभाविक है और दर्शकों की दिलचस्पी को भुनाना तो टेलीविजन समाचार के कारोबारी पहलू का अहम पक्ष है ही- यानी ये एक ऐसा चक्र है, जिसमें खबर से पब्लिक और कारोबार तक का हर पहलू जुड़ा हुआ है। तो जाहिर है, इस स्थिति में खबरों की खबर लेने की कोई सीमा नहीं होती और कवरेज और प्रसारण का दायरा इतना बढ़ता हुआ नजर आता है कि उसे रिपोर्टिंग से हटकर ‘मीडिया ट्रायल’ का दर्जा दे दिया जाता है। ये काफी हद तक ऐसी मुहिम की स्थिति है, जिसे कई टेलीविजन समाचार चैनल बाकायदा घोषित रूप से चलाते रहे हैं। भारत में प्रियदर्शिनी मट्टू, जेसिका लाल, नीतीश कटारा, बीजल जोशी, रुचिका गिरहोत्रा, आरुषि तलवार हत्याकांड जैसे आपराधिक मुद्दे हों, या भ्रष्टाचार से जुड़ी खबरों के मुद्दे- जिन पर टेलीविजन समाचारों की सबसे ज्यादा कवरेज हुई है और इनकी कवरेज बहस और विवादों का भी मुद्दा रही है। ये कहना सही नहीं होगा कि ऐसे तमाम मामलों को टेलीविजन पर उठाए जाने की वजह से ही इनके दोषियों को सजा हुई। आरुषि तलवार का मामला अब तक सुलझा नहीं और प्रियदर्शिनी मट्टू, जेसिका लाल, रुचिका गिरहोत्रा के मामले मीडिया में गर्म रहने के बावजूद दोषियों को सजा मिलने में हद से ज्यादा देर हुई, 84 दंगा मामलों में मीडिया की तमाम हाय-तौबा के बावजूद कड़कड़डूमा कोर्ट से सज्जन कुमार बरी हो गए- तो भला कैसे कह सकते हैं कि मीडिया के जोर के चलते, समाचार चैनलों की मुहिम के चलते पीड़ितो को इंसाफ मिला? ये सिर्फ एक सोच भर है और इंसाफ की जंग लड़नेवालों को भी लगता है कि मीडिया का उन्हें साथ मिला है, मीडिया उनका सहारा बना रहा है। गालिबन, ये दिल को बहलाने को एक अच्छा ख्याल  हो सकता है, लेकिन खबरों के प्रसारण का कोई ज्यादा दबाव मामलों के फैसलों पर पड़ता हो, ऐसा कम ही लगता है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, और टेलीविजन उसका सबसे सशक्त माध्यम है। ऐसे में पब्लिक से जुड़ी खबरें दिखाना तो उसका दायित्व है ही, उन खबरों पर पब्लिक की सोच सामने लाना भी उसकी जिम्मेदारी है। अब पब्लिक की सोच के बारे में तो क्या कहें- जितने मुंह उतनी बातें, हर तरह की सोच सामने आ सकती है, लेकिन कोई मुद्दा गरम हो, तो उसके खिलाफ बोलनेवाले भी कम ही मिलेंगे, क्य़ोंकि कैमरे पर दिखने से पहचान जाहिर होती है और उसके बाद ऐसे लोगों का निशाना बनने का खतरा रहता है, जो मुद्दे पर उससे अलग राय रखते हों। लेकिन मीडिय़ा की आजादी ने देश के टेलीविजन समाचार चैनलों को लोगों को सार्वजनिक महत्व के मामलों पर सूचित करने औऱ अपनी राय बनाने और पेश करने का मौका जरूर दिया है और यही वजह मानी जा सकती है कि किसी खबर की कवरेज इतनी बढ़ जाती है कि उसे ‘मीडिया ट्रायल’ मान लिया जाता है। एक तरह से देखें तो ‘मीडिया ट्रायल’ एक कानूनी जुमला है, जिसका मतलब प्रसारण के जरिए न्याय दिलाने की प्रक्रिया से है। व्यावहारिक तौर पर और वैधानिक तौर पर पीड़ित को न्याय दिलाना तो मीडिय़ा पर खबर दिखाकर असंभव है, क्योंकि मुकदमे का ‘ट्रायल’ कानूनी प्रक्रिया है और किसी को दोषी ठहराना, उसे सजा देना और किसी को बरी करना अदालतों का ही काम है। लेकिन ‘मीडिया ट्रायल’ के जुमले का इस्तेमाल ‘Fair trial’ के रास्ते में बाधा मानकर किसी भी खबर के मामले में कवरेज को सीमित करने के लिए किया जा सकता है। जिन मामलों को बेहद संवेदनशील माना जाता है, उनकी कवरेज पर मीडिया को संयमित रहने की सलाह दी जाती है। अदालतों में भी कई बार मीडिय़ा के प्रवेश पर पाबंदी लग जाती है क्य़ोंकि वहां से निकलनेवाली खबरों के सीधे प्रसारण से पब्लिक या पब्लिक की नुमाइंदगी करने का दावा करनेवाले संगठनों, पार्टियों गैरसरकारी संगठनों के कार्यकर्ताओं या किसी समुदाय विशेष की भावनाएं भड़कने का अंदेशा रहता है जिसकी प्रतिक्रिया हिंसा में तब्दील होने का खतरा बना होता है। इस दौरान आरोपियों, दोषियों, गवाहों और न्यायाधीशों पर भी खतरे का अंदेशा होता है, लिहाजा समाचारों के प्रसारण में संयम की अपील की जाती है और कई बार पाबंदियां भी अदालतों की ओर से लगा दी जाती है। ‘मीडिया ट्रायल’ के दायरे में अक्सर टेलीविजन पर प्रसारित होनेवाले ऐसे इंटरव्यू भी आते हैं, जिनमें पत्रकार या एंकर मामले से संबंधित पक्षों से सवाल-जवाब करते नजर आते हैं और कई बार ऐसे कठिन सवाल होते हैं, जिनका जवाब देना सामनेवालों के लिए मुमकिन नहीं होता, या जिनका कुछ जवाब उसके पास होता ही नहीं। ऐसे में मीडिया पर परेशान करने के आरोप लगते हैं। लेकिन, ये भी समझना चाहिए कि मीडिया, खासकर टेलीविजन ऐसे इंटरव्यूज़ के जरिए आरोपी पक्ष और बचाव पक्ष को अपनी बात कहने, अपने तर्क रखने का मौका भी तो देता है, जिसके जरिए आप अदालत में न सही, एक बड़े दर्शक वर्ग के सामने अपनी सफाई पेश कर सकें, अपनी बेगुनाही के सबूत एक पैसा खर्च किए बिना पेश कर सकें। चुंकि, टेलीविजन चैनल न्यायालय नहीं हैं, ना ही टेलीविजन के इंटरव्यू में कही गई बातों का मुकदमे की सुनवाई पर कोई असर पड़ता है, लिहाजा अपनी बात रखने के अलावा इसका कोई मतलब तो है नहीं, हां एक पक्ष को आत्मसंतुष्टि जरूर मिल सकती है। दिल्ली में दिसंबर 2012 में हुए वसंत विहार गैंग रेप केस के पीड़ित लड़के का इंटरव्यू जी न्यूज़ ने प्रसारित किया, जिस पर दिल्ली पुलिस ने सवाल भी उठाए। अदालत ने उसे सबूत के तौर पर पेश करने की इजाजत भी नहीं दी। ऐसे में निकला क्या- एक बात तो ये है कि पीड़ित को खुलकर अपनी बात पब्लिक के सामने रखने का मौका मिला; दूसरी बात, पब्लिक को ऐसे जघन्य मामले के पीड़ित से रू-ब-रू होने, उसका दर्द सुनने का मौका मिला, और तीसरी बात, इंटरव्यू प्रसारित करनेवाले चैनल को टीआरपी में जो फायदा हुआ हो सो अलग। सवाल है कि अगर उस इंटरव्यू के प्रसारण को ‘मीडिया ट्रायल’ के दायरे में रखें भी तो उसका असर क्या हुआ- सिफर! मामला अदालत में है, लंबा चलेगा, फिर बड़ी अदालतों में जाएगा और फिर जो भी नतीजा हो, उसमें जो वक्त लगना है, वो लगेगा, अदालत या अभियोजन पक्ष पर किसी तरह के दबाव की कोई बात नहीं। पीड़ित का दर्द सुनकर क्या लोगों की सोच बदली- ऐसा नहीं लगता। दिल्ली में रोजाना मासूमों से बलात्कार की घटनाएं हो ही रही हैं। एक जघन्य मामले की ज्यादा कवरेज से समाज के घृणित तत्वों की सोच तो बदली नहीं। रही बात पब्लिक की प्रतिक्रिया की, तो आंदोलन का जो जोश, जज्बा शुरुआती हफ्ते-10 दिन दिखा, वो वक्त के साथ ठंडा पड़ गया। बलात्कार मामलों की विशाल कवरेज से हालात में तो कोई बदलाव नहीं आया। हां थोड़े वक्त के लिए मामले से जुड़े चंद लोगों ने खुद पर दबाव महसूस किया होगा, लेकिन वो भी अगर अनुभवी होंगे, तो उन्हें पता होगा कि मीडिया कवरेज ये एक ऐसा बुलबुला है, जिसका फूटना तो तय ही है। यही वजह है कि टेलीविजन पर किसी मुद्दे की हद से ज्यादा चर्चा होने पर भी आजकल मामले से जुड़े अधिकारी और नेता इस्तीफा नहीं देते, बल्कि ठसक के साथ मना कर देते हैं। ऐसे में ‘मीडिया ट्रायल’ का क्या मतलब? देश में मीडिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन संविधान की धारा 19 की उपधारा 2 के तहत प्रेस की आजादी खतरे में भी पड़ती दिखी है। सितंबर 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवई के दौरान मीडिया की अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई रोक तो नहीं लगाई, लेकिन एक उपधारा के तहत इस पर कुछ सख्ती के संकेत जरूर दे दिए। इससे पहले भारतीय विधि आयोग ने भी मीडिया में खबरें दिखाए जाने और ‘मीडिया ट्रायल’ से जुड़ी 2006 की अपनी एक रिपोर्ट में प्रसारण और उसके असर से जुड़ी कई चिंताओं का जिक्र किया था-
“With the coming into being of the television and cable-channels, the amount of publicity which any crime or suspect or accused gets in the media has reached alarming proportions. Innocents may be condemned for no reason or those who are guilty may not get a fair trial or may get a higher sentence after trial than they deserved. There appears to be very little restraint in the media in so far as the administration of criminal justice is concerned. We are aware that in a democratic country like ours, freedom of expression is an important right but such aright is not absolute in as much as the Constitution itself, while it grants the freedom under Article 19(1)(a), permitted the legislature to impose reasonable restriction on the right, in the interests of various matters, one of which is the fair administration of justice as protected by the Contempt of Courts Act, 1971. …..If media exercises an unrestricted or rather unregulated freedom in publishing information about a criminal case and prejudices the mind of the public and those who are to adjudicate on the guilt of the accused and if it projects a suspect or an accused as if he has already been adjudged guilty well before the trial in court, there can be serious prejudice to the accused. In fact, even if ultimately the person is acquitted after the due process in courts, such an acquittal may not help the accused to rebuild his lost image in society. If excessive publicity in the media about a suspect or an accused before trial prejudices a fair trial or results in characterizing him as a person who had indeed committed the crime, it amounts to undue interference with the “administration of justice”, calling for proceedings for contempt of court against the media. Other issues about the privacy rights of individuals or defendants may also arise. “[1]
विधि आयोग की रिपोर्ट में जाहिर चिंताएं जायज हैं, लेकिन एक बात तो तय है कि अदालत का फैसला सर्वोपरि होता है, आप भले ही उससे असहमत हों, आपको ऊपरी अदालत में अपील का हक है, लेकिन बोलने की आजादी का ये मतलब नहीं कि आप अदालत की अवमानना करें। अदालत की अवमानना अक्सर तब मानी जाती है, जब किसी घटना की खबर को स्कैंडल के तौर पर दिखाया जाए, या फिर उसकी सुनवाई और इंसाफ की प्रक्रिया में बाधा पैदा की जाए या फिर किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त कवरेज बार-बार हो। मामले की किस तरह की कवरेज हो रही है और होनी चाहिए, ये तो कानूनी धाराओं के तहत तय करना अदालत का ही काम है। लेकिन जहां तक समाचार चैनलों की बात है, तो वो तो यही कहेंगे कि वो खबर दिखा रहे हैं और अदालत की अवमानना नहीं कर रहे। वास्तव में मामला जटिल है और बड़ा कठिन है ये तय करना कि कहां अदालत की अवमानना हो रही है और कहां नहीं हो रही है- सवाल तो ऐसे फैसलों पर भी उठ सकते हैं। ऐसे तमाम मामले सामने आए हैं, जब टेलीविजन पर अदालत का फैसला आने से पहले ही मामले की अति-करवेज और आरोपियों को दोषी करार देने की कोशिश के आरोप लगे हैं। ये भी आरोप लगे हैं कि कवरेज के जरिए मीडिय़ा अदालती सुनवाई को प्रभावित करता है। लेकिन ये आरोप सिर्फ आरोप ही है, क्योंकि व्यावहारिक तौर पर आधुनिक समाज में ये संभव नहीं लगता है कि कोई संगठन या प्रसारण अदालती कार्रवाई पर दबाव बनाए या उसे प्रभावित करे। ये बात और है कि मीडिया में किसी मुद्दे की चर्चा होती है तो आम जनता और समाज के तमाम पक्ष किसी मुद्दे पर क्या सोचते हैं, ये बात सामने आती है, लेकिन इसका मामले की जांच और अदालतों के फैसले पर कोई दबाव पड़े, ये जरूरी नहीं और पड़ना भी नहीं चाहिए। लेकिन मीडिया पर मुद्दे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने और तथ्यों से परे जाकर रिपोर्टिंग करने के आरोप लगते हैं और ये भी कहा जाता है कि इससे अभियोजन और न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। विधि आयोग ने अपनी 2006 की रिपोर्ट में जो कुछ तर्क दिए थे, वो काफी मजबूत हैं, लेकिन साथ ही पुलिस, अभियोजन और प्रशासनिक प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े करते हैं।
“The pressure on the police from media day by day builds up and reaches a stage where police feel compelled to say something or the other in public to protect their reputation. Sometimes when, under such pressure, police come forward with a story that they have nabbed a suspect and that he has confessed, the ‘Breaking News’ items start and few in the media appear to know that under the law, confession to police is not admissible in a criminal trial. Once the confession is published by both the police and the media, the suspect’s future is finished. When he retracts from the confession before the Magistrate, the public imagine that the person is a liar. The whole procedure of due process is thus getting distorted and confused. The media also creates other problems for witnesses. If the identity of witnesses is published, there is danger of the witnesses coming under pressure both from the accused or his associates as well as from the police. At the earliest stage, the witnesses want to retract and get out of the muddle.”[2]
मीडिया की कवरेज में खामियां हो सकती हैं, ये बात समझ में आती है, लेकिन, क्या पुलिस को उससे प्रभावित होना चाहिए, क्य़ा अदालतों पर उसका कोई असर पड़ना चाहिए? लोगों की सुरक्षा के लिए तैनात पुलिस और इंसाफ दिलाने के लिए बने न्याय के मंदिर क्या किसी ऐसे शख्स की छवि फिर से समाज में बना पाने में नाकाम रहेंगे, जिसका चरित्र हनन कथित तौर पर मीडिया ने किया हो? सरकार और प्रशासन और न्याय व्यवस्था यदि दोषी को सजा देने के लिए बने हैं, तो पीड़ित को उसका खोई हुई प्रतिष्ठा दिलाने में भी उनकी भूमिका होनी चाहिए। दरअसल आज के दौर में स्थिति बदलती नजर आ रही है और आम आदमी को मदद के लिए मीडिया का मुंह देखना पड रहा है, जिससे न तो पुलिस खुश रहती है, ना ही प्रशासन क्योंकि टेलीविजन में खबर आने पर उनकी नाकामियां ही उजागर होती हैं, तारीफ नहीं मिलती। इस मामले पर मशहूर टीवी पत्रकार आशुतोष ने अपने ब्लॉग में कुछ गलत नहीं लिखा है कि-
“मीडिया के कूदने के पहले आम नागरिक मुंह की खा चुका था। मीडिया ने उसे ताकत दी है। आम आदमी को एहसास हुआ कि अगर कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका में उसकी गुहार नहीं सुनी जाती है, तब वह मीडिया के पास जा सकता है और इंसाफ पा सकता है। अब आम आदमी को इंसाफ कैसे मिलेगा? मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं कि मीडिया की ताकत से घबराकर ताकतवर तबकों ने मीडिया के खिलाफ मुहिम चला रखी है। आरोप यह है कि मीडिया ट्रायल अदालतों की कार्यवाही को प्रभावित कर रही है और इससे जजों पर दबाव पड़ता है। मेरा कहना है कि यह आरोप ही जजों की प्रतिबद्धता और उनकी गरिमा पर चोट करने वाला है, लेकिन क्या यह नहीं होना चाहिए कि इंसाफ के लिए किसी भी मामले की सुनवाई के समय एक ही मेधा और क्षमता के वकील हों?”[3]
ये कहना कतई सही नहीं होगा कि किसी मामले से जुड़ी खबरें दिखाने पर उस मामले से जुड़ी शख्सियतों की जरूरत से ज्यादा चर्चा होती है और उसका चरित्र हनन होता है, या उसे दोषी के रूप में पेश किया जाता है या फिर खबरों में होने की वजह से उसके मामले की सुनवाई पर असर पड़ता है, जिससे उसके मानवाधिकारों का हनन होता है। लोकतंत्र में न्यायपालिका इंसाफ करने और फैसले देने के लिए स्वतंत्र है।  लिहाजा उस पर विधायिका या मीडिया के किसी दबाव या किसी तरह के असर की तो बात ही बेमानी है।
आज के दौर में ये कहना भी गलत होगा कि टेलीविजन या मीडिया ने खुद को ‘जनता की अदालत’ के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है, क्योंकि व्यावहारिक तौर पर इसका कोई मतलब नहीं, क्योंकि इसकी कोई वैधानिकता है ही नहीं, ना ही किसी को टेलीविजन प्रसारण से डरने की जरूरत होती है, लिहाजा ये नक्सलियों, माओवादियों या खाप-पंचायतों की ‘कंगारू अदालत’ भी तो नहीं है। तो सवाल है कि ‘मीडिय़ा ट्रायल’ का जुमला क्यों बार-बार इस्तेमाल होता है , खबरों को जोर-शोर से दिखाए जाने पर किसी एक पक्ष को डर क्यों लगता है? यहां ये तो जरूर मानना होगा कि टेलीविजन के जरिए जब कोई मामला खबर के रूप में चर्चा में आता है, तो उस पर न्यूटन के गति के तीसरे नियम के समान ‘प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है’। यानी खबर सनसनीखेज है, तो समाज के लोग, या कोई वर्ग सक्रिय होता है, हल्ला-हंगामा होता है, आरोपियों पर कुछ कार्रवाई होती है, वो कानून के शिकंजे में आ जाते हैं। टेलीविजन पर जिन मामलों की खबरें नहीं आती हैं, उन्हें दबाने और रफा-दफा करने की कोशिश भी होती है- ऐसा अक्सर देखने को मिलता है क्योंकि जब तक किसी विपरीत प्रतिक्रिया का डर नहीं होता, तब तक पुलिस प्रशासन अपनी मनमानी पर चलता है। दिल्ली में वसंत विहार रेप केस के बाद हुए प्रदर्शनों के दौरान संसद मार्ग थाने में एक प्रदर्शनकारी लड़की से SHO की बदसलूकी और फिर गांधीनगर रेप केस के बाद थाने में एक प्रदर्शनकारी लड़की को ACP के थप्पड़ मारने के मामलों को लें, तो खबर दिखाए जाने और बार-बार दिखाए जाने पर आरोपियों के खिलाफ कुछ तो कार्रवाई हुई। अगर ये खबरें मीडिया में न आतीं, तो शायद पुलिस और निरंकुश बर्ताव करने पर आमादा हो जाती। टेलिविजन समाचारों में जो कुछ दिखाया जाता है उसकी पुष्टि कुछ मामलों को छोड़ दें, तो हमेशा तस्वीरों, वीडियो और साउंड बाइट्स से होती है, लिहाजा, सच हमेशा पब्लिक के सामने पर्दे पर होता है और ये गुंजाइश नहीं होती कि किसी को गलत तरीके से दोषी ठहराया जा रहा है। ऐसे में लंबी सुनवाई के बाद दोषी को दोषी ठहराने की प्रक्रिया की तो कोई जरूरत ही नहीं रह जाती, जब जो कुछ घटित हुआ उसमें किसका दोष है, ये सामने दिख रहा हो। हां, ऐसे मामलों में जहां अपराध साबित करने की प्रक्रिया जटिल हो, वहां जरूर किसी पर लगे आरोपों के बारे में खबर दिखाने पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन ये तो परम सत्य है कि चिंगारी के बगैर आग नहीं लगती, तो अगर किसी शख्स का नाम किसी मामले में सामने आ रहा है तो वो कितना पाक-साफ है, ये साबित होने का इंतजार करना ही पड़ेगा और उस प्रक्रिया के पूरा होने तक आरोपी को इल्जामात के वार झेलने ही पड़ेंगे। ऐसे मामले भी सामने आते हैं जब किसी को गलत तरीके से फंसाया गया और उसे अंत तक इंसाफ नहीं मिला, तो उसे क्यों इंसाफ नहीं मिला और कानून की तराजू पर वो क्यों दोषी साबित किया गया, इसके पीछे तो खामियां कानूनी और जांच के स्तर पर हो सकती हैं, उसके मुद्दे को उठाने में टेलीविजन समाचार चैनलों की क्या गलती?
सवाल तो मीडिया या टेलीविजन समाचार चैनलों की ओऱ से खबरों की पड़ताल पर भी उठते हैं। ये सच है कि कोई टेलीविजन पत्रकार किसी डिटेक्टिव की तरह मौके पर जाकर छानबीन और पड़ताल तो करता नहीं, ज्यादा से ज्यादा मौका ए वारदात के चश्मदीदों की बाइट जुटा लेता है या फिर पुलिस और जांच एजेंसियों के अपने सूत्रों से कुछ ऐसे दस्तावेज जुटा लेता है जिससे खबर पर कुछ और रोशनी पड़ती है और किसी पक्ष के खिलाफ या किसी के हक में सबूत सामने आने लगते हैं। ऐसे में ये सवाल उठाना कि मीडिया की ओर से मामले की पड़ताल क्यों होती है, मेरी समझ से बिल्कुल गलत है क्योंकि वास्तव में आजकल मीडिया तो खुद छानबीन करता नहीं, वो तो पहले से निकाली गई चीजों और तथ्यों को किसी न किसी तरीके से सामने लाने का काम करता है। लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका ‘Watch Dog’ की तरह मानी गई है और टेलीविजन समाचार चैनल तो आज के दौर में इस भूमिका को बिलकुल सही तरीके से निभाते दिख रहे हैं, क्योंकि कैमरे से समाज की कोई बात छिपती नहीं और सच हर रोज सामने दिखता है। लिहाजा समाज में क्या चल रहा है वो सब दिखाना तो टेलीविजन समाचार चैनलों की जिम्मेदारी है। पब्लिक के विचारों और उनकी आवाज को सामने लाना भी इसका हिस्सा है, जो कई खबरों के मामलों में इतना तेज होकर उभरता है कि उससे प्रभावित होने वाले कई पक्षों को उसके विपरीत असर का भय सताने लगता है औऱ मुझे लगता है कि यही स्थिति ‘मीडिया ट्रायल’ का एक ऐसा आवरण खड़ा करती है, जिसका हव्वा खड़ा करके मुद्दे की ज्यादा चर्चा को रोका जा सके।
बहरहाल लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर क्षेत्र के रेगुलेशन, उसके कामकाज के तौर-तरीके और उसे कानूनी दायरे में रखने की प्रक्रिया है, चाहे वो कार्यपालिका हो, विधायिका हो, न्यायपालिका या मीडिया ही क्यों न हो। ऐसे में अगर ‘मीडिया ट्रायल’ जैसा कोई संकट व्यवस्था को लगता है, तो उस पर नियंत्रण, उसकी दिशा तय करने के लिए उपाय किए जा सकते हैं, उस पर भी बहस हो सकती है और अदालत या अदालत से बाहर ये बातें हो सकती हैं और होती भी हैं कि किस तरह की खबर को दिखाने और उस पर चर्चा का क्या तरीका होना चाहिए। कभी सरकार और सूचना और प्रसारण मंत्रालय, तो कभी खुद समाचार चैनलों के प्रसारकों की संस्थाएं IBF, NBSA, BEA तो कभी खुद अदालतों की ओर से ऐसे मुद्दों पर चर्चा होती रहती है। भारतीय़ विधि आयोग ने अगस्त 2006 में अपनी 200वीं रिपोर्ट में ‘मीडिया ट्रायल’ के मुद्दे पर चर्चा करते हुए पत्रकारों को खास ट्रेनिंग दिए जाने की जरूरत भी जताई थी-
“We have also recommended that journalists need to be trained in certain aspects of law relating to freedom of speech in Art. 9(1)(a) and the restrictions which are permissible under Art. 19(2) of the Constitution, human rights, law of defamation and contempt. We have also suggested that these subjects be included in the syllabus for journalism and special diploma or degree courses on journalism and law be started.”[4]

     ये बात सही है कि टेलीविजन पत्रकारों को अपराध और ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग के लिए सही तरीके से प्रशिक्षित करने की जरूरत है और और उन्हें इससे जुड़े कानूनी पहलुओं की जानकारी होनी चाहिए। संयमित रिपोर्टिंग और संयमित प्रसारण के लिए हरेक समाचार चैनल को अपने अंदरूनी नियम कायदे तय करने होंगे या फिर प्रसारक संस्थाओं से जुड़े संगठनों की ओर से इस सिलसिले में की गई पहल को कड़ाई से लागू करना होगा। लेकिन जहां तक खबरों को लंबे समय तक जिंदा रखने, उन पर पब्लिक की प्रतिक्रिया जाहिर करने जैसे मुद्दों की बात है, वहां रिपोर्टिंग को ‘मीडिया ट्रायल’  के दायरे में समेटना सही नहीं लगता। 20वीं सदी में चलन में आया ये जुमला अब काफी विस्तार ले चुका है और आम तौर पर किसी भी खबर के प्रसारण का असर दिखाने के रूप में इसे समझा जा रहा है, लेकिन इससे कोई अदालती फैसला प्रभावित हो, ऐसा नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे खुद न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े होने लगते हैं। ऐक बात और है, वो ये कि हमारा समाज भी परिपक्व हो रहा है और टेलीविजन समाचार प्रसारण के अलावा मीडिया भी विस्तार ले रहा है। अब खबरों की ज्यादा चर्चा टेलीविजन के मुकाबले सोशल मीडिय़ा, सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर हो रही है, और वहां पब्लिक ओपिनियन बनाने या उसे जोड़ने का काम ज्यादा आसानी से हो रहा है। ऐसे में टेलीविजन समाचार चैनलों पर मीडिया ट्रायल का दोष मढ़नेवालों को ये सोचना चाहिए कि आखिर कहां-कहां वो लोगों को खबरों से जुड़ने से रोक सकेंगे, कहां-कहां अभिव्यक्ति पर रोक लगेगी और कहां कहां इंसाफ के लिए सुनवाई नहीं होगी?