Monday, 13 April 2015

ओम थानवी को 'बिहारी पुरस्कार'

 ‘जनसत्ता’ के संपादक एवं लेखक ओम थानवी को वर्ष 2014 का 24वां बिहारी पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। के.के. बिड़ला फाउंडेशन के निदेशक सुरेश ऋतुपर्ण ने थानवी को उनकी यात्रा वृत्तांतपरक चर्चित पुस्तक ‘मुअनजोदड़ो’ के लिए यह पुरस्कार देने की घोषणा की है। इस पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 2011 में हुआ था। थानवी को पुरस्कार के रूप में 1 लाख रुपए, प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिह्न प्रदान किया जाएगा। इससे पूर्व उन्हें शमशेर सम्मान, सार्क सम्मान, केंद्रीय हिंदी संस्थान सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। वह निरंतर लेखनरत रहते हुए वर्तमान में साहित्य, समाज, राजनीति, शिक्षा, पत्रकारिता आदि विषयों पर त्वरित टिप्पणियों के लिए हिंदी क्षेत्र में सुप्रसिद्ध हैं।
केके बिरला फाउंडेशन द्वारा स्थापित बिहारी पुरस्कार राजस्थान के हिन्दी या राजस्थानी भाषा के लेखकों को प्रदान किया जाता है। पिछले 10 वर्षों में प्रकाशित राजस्थानी लेखकों की कृतियों में से विजेता का चयन किया जाता है।  वर्ष 1991 में स्थापित पहला बिहारी पुरस्कार डॉ. जयसिंह नीरज को उनके काव्य संकलन ‘ढाणी का आदमी’ के लिए दिया गया था। ओम थानवी की एक अन्य चर्चित कृति है- 'अपने अपने अज्ञेय'।
ओम थानवी का जन्म 1 अगस्त 1957 को फलोदी, जोधपुर (राजस्थान) में हुआ था। वह नौ वर्षों (1980 से 1989) तक 'राजस्थान पत्रिका' में रहे। इसके बाद चंडीगढ़, फिर दिल्ली में संपादक बने। उन्होंने हिंदी की साहित्यिक तथा सांस्कृतिक इतवारी पत्रिका का भी सम्पादन किया है। ओम थानवी की साहित्य, कला, सिनेमा, पर्यावरण, पुरातत्त्व, स्थापत्य और यात्राओं में गहन रुचि है।
वह मेक्सिको, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, स्विटजरलैंड, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड, फिनलैंड, स्वीडन, बेल्जियम, रोमानिया, थाईलैंड, आर्मेनिया, बेलारूस, चीन, ब्राजील, मलेशिया, सिंगापुर, गयाना, त्रिनिदाद एवं टोबेगो, सूरीनाम, श्रीलंका, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, ग्रीस और क्यूबा आदि अनेक देशों की यात्राएं कर चुके हैं। 

एक 'आदर्श मां' की लाइव रिपोर्टिंग

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में यह एक नए तरह की चर्चा सरगर्म हुई है। चर्चा है मिस्र की टीवी पत्रकार लामिया हामदीन का अपने बच्चे को लेकर रिपोर्टिंग करना। उनकी रिपोर्टिंग की तस्वीरें वायरल होने से ऑनलाइन सूचना माध्यमों पर इसे लेकर समर्थन और विरोध के रूप में तरह तरह की चर्चाएं बहस की शक्ल में सार्वजनिक रही हैं।
लामिया हामदीन के अपने बच्चे को लेकर रिपोर्टिंग करने का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि ये तरीका ठीक नहीं है। वे उनको नौकरी से निकालने तक की मांग कर रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि लामिया आदर्श मां हैं। एक माँ का दर्द समझने के लिये दिल चाहिए, दिमाग नहीं। उन्होनें वही किया जो वक्त की जरूरत थी, "माँ तुझे सलाम"। उन्होंने उनकी तुलना इटली की नेता लीसिया रॉनज़्यूली से की है। लीसिया 2010 में अपनी बेटी को काम पर लेकर जाती थीं।
लामिया का कहना है कि एक कामकाजी मां होने के नाते उन्होंने वहीं किया जो उन्हें करना चाहिए था। उन्होंने कहा, 'मेरा बेटा बीमार था और मुझे कुछ ज्यादा देर काम करना था। ऐसे में वह उसे नर्सरी से अपने साथ लेकर आ गईं क्योंकि उसे और कहीं छोड़ना ठीक नहीं था।

Sunday, 12 April 2015

दूरदर्शन में महिला कर्मियों का यौन शोषण

अब तो दूरदर्शन भी महिला कर्मियों के लिए सुरक्षित नहीं रहा। दूरदर्शन में सेवारत कई महिला कर्मियों का यौन उत्पीड़न किया जा चुका है। हाल ही में दूरदर्शन की उत्पीड़ित महिला कर्मियों की लिखित शिकायतों के बावजूद उन पर न तो महिला आयोग गंभीर है, न अन्य कोई वह जांच एजेंसी, जहां वे अपनी शिकायतें कर रही हैं। महिला बाल विकास मंत्रालय का इस मामले पर खामोशी साध लेना तो और भी आश्चर्यजनक है। ये हाल तो तब है, जबकि उन पीड़ित महिलाओं में से एक उसी आरएसएस के दूरदर्शन में प्रसार भारती मजदूर संगठन बीएमस की नेता हैं, जिसकी इस समय केंद्र में सरकार है। एक पीड़ित महिला कर्मी ने न्याय की गुहार लगाते हुए शिकायती पत्र में लिखा है कि क्या बलात्कार हो जाने के बाद ही कोई कार्रवाई होगी?
एक वरिष्ठ अधिकारी ने तो अपने अधीनस्थ महिला कर्मी से कहा कि तुम मेट्रो में रहने वाली तीस वर्ष की जवान हो, तुम ये भी नहीं जानती कि वरिष्ठ अफसर से कैसे पेश आया जाता है। दिल्ली की लड़कियां तो सब कुछ जानती हैं। महिला कर्मी की शिकायत है कि सिर्फ उसके साथ ही ऐसा नहीं, दूरदर्शन की कई महिलाओं के साथ इस तरह की हरकतें हो चुकी हैं।
दूरदर्शन में कार्यरत कई महिलाएं अपने अफसरों से डरी हुई हैं। एक पीड़िता महिला कर्मी ने साहस बटोर कर पुलिस में शिकायत भी कर दी है। एक अन्य महिला दूरदर्शन कर्मी को अपने विभागीय उच्चाधिकारियों से जब न्याय नहीं मिला तो उसने केंद्रीय महिला बाल विकास मंत्री मेनका गांधी और महिला आयोग को लिखित में बताया है कि उसके अफसर अपर महानिदेशक ने ऐसी शर्मनाक हरकत उससे की है कि उसे कहने में भी शर्म महसूस हो रही है। इसके बाद उस पीड़िता पर दबाव डालने के साथ ही परिजनों को शिकायत वापस लेने के लिए धमकाया गया। बताया जाता है कि उसका यौन उत्पीड़न किया गया है।
पता चला है कि इसी तरह आकाशवाणी भवन स्थित दूरदर्शन अभिलेखागार में कार्यरत एक अन्य महिला कर्मी ने प्रोग्राम एक्जिक्यूटिव पर यौन हरकतों का आरोप लगाया है। उसने इसकी लिखित शिकायत अपने विभाग के उच्चाधिकारियों के अलावा राष्ट्रीय महिला आयोग और महिला बाल विकास मंत्री से की है। आरोप है कि संबंध न बनाने पर प्रोग्राम एक्जिक्यूटिव ने उसे कई बार धमकियां भी दीं। उसकी फरियाद पर कोई कार्रवाई तो नहीं हुई। उल्टे उसे ही मंडी हाउस स्थित दूरदर्शन मुख्यालय में स्थानांतरित कर दिया गया। वहां भी उसे एक अफसर तंग करने लगा। इस दफ्तर में तैनात रहे एक अपर महानिदेशक पर भी एक महिला कर्मी ने पिछले वर्ष यौन शोषण का आरोप लगाया था। उस मामले में भी कोई कार्रवाई करने की बजाय अफसर को स्थानांतरित कर दिया गया था।
इन घटनाओं से पूर्व विशाखा गाइडलाइंस के आने के बाद भी दूरदर्शन की एक महिला पत्रकार द्वारा एक वरिष्ठ पद पर कार्यरत सहकर्मी पर यौन शोषण का आरोप लगाया जाना और उस पर दूरदर्शन के सर्वोच्च पद (डीजी-डीडी) पर एक महिला के आसीन होते हुए भी उसके द्वारा पीड़ित के आरोपों पर कार्रवाई न किया जाना एक खतरनाक कदम की ओर संकेत करता है। इसी तरह की अक्टूबर 2013 की एक घटना भी दूरदर्शन से ही संबंधित है। उस समय तो प्रसार भारती प्रबंधन ने यौन उत्पीडऩ के आरोपी दूरदर्शन के वरिष्ठ अधिकारी को निलंबित कर दिया था। अधिकारी की सहकर्मी ने उसके खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इसी तरह इंडिया टीवी की एंकर तनु शर्मा ने अपने अधिकारियों द्वारा उत्पीड़ित किए जाने, दफ्तर की गुटबाजी और फिर बिना कारण बताए बर्खास्त कर दिए जाने पर दफ्तर के सामने ही जहर खाकर खुदकुशी करने की कोशिश की थी।
डा. रीना मुखर्जी, तनु शर्मा प्रकरणों ने भी मीडिया कुपात्रों का भेद खोला था : प्रिंट मीडिया में भी हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। ‘द स्टेटसमैन’ की एक सीनियर रिपोर्टर रहीं डा. रीना मुखर्जी ने अखबार के ही तत्कालीन न्यूज कोआर्डिनेटर ईशान जोशी पर यौन शोषण का आरोप लगाया था, जिसके बाद इस मामले की निष्पक्ष जाँच कराए जाने के बजाय उन्हीं को नौकरी से निकाल दिया गया था।

Thursday, 9 April 2015

घुमक्कड़ केदारनाथ पांडेय से राहुल सांकृत्यायन तक / जयप्रकाश त्रिपाठी

आज दिन राहुल सांकृत्यायन को याद करने का रहा। सुबह से अब फुर्सत। तो सोचा अपने ही जिला आजमगढ़ के, और अपने ही बगल के गांव के कनैला के थे बहुभाषाविद् त्रिपिटिकाचार्य तो कुछ ऐसी अपनी भी बता डालूं जो बहुतों को मालूम नहीं। हां, उन सहपाठियों को जरूर याद होंगी, जो उस दिन क्लास में मेरे सहित मौजूद थे। राहुल जी के गांव के ही थे पारसनाथ पांडेय, जो बारहवीं में हमारे क्लास टीचर थे। उनके पास कालेज ही नहीं, अपने पूरे गांव-जवार के बारे में एक-से-एक धांसू, पंचकूलाई, सुघर-सुघरी कहानियां थीं। घुमक्कड़ जिज्ञासु बचपन के नामधारी केदारनाथ पांडेय उर्फ राहुल सांकृत्यायन के बारे में ये सब भी उन्हीं का बताया-कहा है.....
तो गुरुवर पारसनाथ पांडेय ने केदारनाथ पांडेय के एक किशोर-घटनाक्रम को खूब रस ले-लेकर उस दिन हमे क्लास में कह सुनाया था -
....राहुल जी किशोरवय में ही गांव से परा (भाग) लिए थे। बड़ी खोज-ढूंढ मची महीनो। कहीं कोई अता-पता नहीं। वर्षों बाद लौटे तो पिता गोवर्धन पाण्डेय आगबबूला। हमारे बाबू (पारसनाथ के पिता) ने छेंकाछेंकी कर मामला बरजा (शांत कर) दिया। कई दिन तक बाप-बेटे में मुंहफुलौवल (नाराजगी) रही। तब तक केदारनाथ बाहर के मजे-सजे के साथ सब सीख-पढ़ आए थे, गांव में सयाने-सयाने बने डोल रहे थे लेकिन नया वाल नाम 'राहुल सांकृत्यायन' धारण नहीं किया था। ऊ सब बाद में हुआ।
.... एक दिन केदारनाथ का मन गांव से फिर उचटा (जैसे उस दिन क्लास में हम लोगों का उचट रहा था, तब वे बातें फालतू लगती थीं क्योंकि हमे कहां पता था कि हम किस बाणभट्ट की कथा सुन रहे हैं! अब गर्व होता है वे दिन याद कर)। सुबह-सुबह मुंह अंधेरे गोवर्धन चाचा (पारसनाथ चाचा कहते थे राहुल जी के पिता को) और केदारनाथ में जम के मुंहफचरी हुई। गोवर्धन चाचा ने कहा- जरा गांव से बाहर निकल के तो दिखा, टांगें तोड़ के हाथ में न दे दूं तो तेरी की। शादी-बियाह कर के उस दफा परा लिए ससुर, फिर अब कहां जा रहे हो, ऐं! ई जो घर में तोहार माई (केदारनाथ उर्फ राहुल की पत्नी) बइठलि हईं, इनके के खियायी-पहनाई (अर्थात घर में ये जो तुम्हारी मां (पत्नीको) बैठी है, उसको कौन खाना-कपड़ा देगा)। युवा केदारनाथ ने तपाक से छूटते ही पिता गोवर्धन से कहा - माई (मां) है तो पिता ही न खिलाए-पहनाएगा। खियावा-पहनावा माई के, हम तो चले अयोध्या....। बताते हैं, उस दिन के बाद बौद्धनामधारी केदारनाथ पांडेय उर्फ राहुल सांकृत्यायन फिर कभी अपने गांव कनैला (आजमगढ़) नहीं लौटे। हां, बताते हैं, श्रीलंका-प्रवास के दिनो में आजमगढ़ जरूर लौटे थे बूढ़े बरगद के नीचे पुरातात्विक खुदाई कराने के लिए।

Wednesday, 8 April 2015

काम के घंटे हो अब चार, न्यूनतम मजदूरी हो अब चालीस हजार / अखिलेश चंद्र प्रभाकर


400 वर्षों के पूंजीवादी अनुभव बताते हैं कि उन्नत किस्म के तकनीकी और आधुनिक औद्योगिक विकास के बाबजूद; पूंजीवादी विश्व में तकरीबन रोजाना 80 करोड़ लोग भूखें पेट सोते हैं. तकरीबन 1 अरब लोग अब तक अनपढ़ हैं, लगभग 4 अरब लोग गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रहे है. 25 करोड़ बच्चे स्कूल जाने की बजाय रोजाना मजदूरी करते हैं. 10 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके सर पर छत नहीं है और पांच वर्ष से कम के 10 लाख बच्चे ऐसे हैं, जो प्रतिवर्ष कुपोषण, गरीबी या बिमारियों से मर जाते हैं. देश के भीतर और देशों के मध्य भी गरीबी और अमीरी में अन्तर में जबरदस्त बढ़ोतरी होती ही जा रही है. पिछली सदी के दौरान 1 अरब हेक्टयर से ज्यादा संरक्षित जंगलों को नष्ट किया गया और लगभग इतना ही क्षेत्र रेगिस्तान या बंजर भूमि में बदल गया है.
स्वाभाविक रूप से इन समस्यायों का निदान करने में पूंजीवादी-व्यवस्था नाकाम साबित रहा है. यह शासन करने वालों की जिम्मेदारी है क़ि वह जरूरत मंद हर व्यक्ति को भोजन, स्वास्थय, छत, कपडे, और शिक्षा मुहैया कराये. भरे- पूरे, तर्कसंगत, टिकाऊ और सुरक्षित जीवन का मतलब है, सांस्कृतिक सृजन, विकल्पों की विशाल संख्या और कई अन्य चीजें मानव की पहुँच में हों… यह सब हो सकता है, लेकिन नहीं है, क्योंकि किसी निजी विमान पर 9.5 अरब डॉलर खर्च होते हैं. तो कहीं आलीशान महल (अम्बानी का अट्टालिका) बनाने में 250 करोड़ रूपये खर्च किये जा रहे है.
मैं आदमी और औरत के लिए 4 घंटे कार्य दिवस होने के बारे में सोचता हूँ…यदि हमको तकनीक इतनी सुविधा देती है, तो हम 8 घंटे काम क्यों करें? इसके लिए तर्क यह है की जैसे जैसे उत्पादकता बढ़ती है; वैसे वैसे कम से कम शारीरिक व् मानसिक श्रम करने की आवश्यकता होती है; इससे बेरोजगारी कम से कम हो पायेगी और व्यक्ति को अधिक से अधिक समय प्राप्त हो सकेगा अपने निजी जीवन में मस्ती करने के लिए…
पूंजीवादी साहूकार आज विश्व् को एक बहुत बड़े मुक्त व्यापार क्षेत्र में तब्दील करना चाहते हैं. मुक्त व्यापार क्षेत्र में स्थापित किसी कारखाने के श्रमिकों को शायद ही कहीं निर्धारित वेतन दिया जाता है, बल्कि जो वेतन कारखाना मालिक अपने देश में स्थापित कारखानों के श्रमिकों को देते, उस वेतन का 5,6 या 7 प्रतिशत ही बाहर के देशों में स्थापित कारखाने में काम करने वाले श्रमिकों को भुगतान करते हैं.
संकट का लक्षण स्पष्ट है कि बाजार ईश्वर हो गया है और इसके कानून और सिद्धान्त ही संकट की जड़ हैं. USA की सबसे प्रतिष्ठित कंपनी का कुल फण्ड 4.5 अरब डॉलर है जब कि यह कंपनी 120 अरब डॉलर की सट्टेबाजी में लिप्त है.
एक छोटी सी पिन, एक छोटा सा छेद से बड़े से बड़ा गुब्बारा फुट जायेगा. यही खतरा नवउदारवादी वैश्विकरण के ऊपर मंडरा रहा है. इस परमाणु युग में भी विचार और चेतना हमारे सबसे अच्छे अस्त्र हैं और रहेंगे. हमें अच्छी तरह से सूचना संपन्न रहना चाहिए … बल्कि जरुरी है की घटनाओं को गहराई से जानें अन्यथा हम आत्म विस्मृति के शिकार हो जायेंगे.
वामपंथी यह सिद्ध करना चाहते हैं कि यह व्यवस्था नष्ट हो जायेगी, जब तक यह सच न हो तब तक यह केवल एक दलील है और इसे सच साबित करना हम सब का कर्तव्य है. हाँ, एक छोटे दायरे में दुर्लभ सम्पदा का वितरण करने- जिसमें मुठीभर लोग तो सब कुछ पाते हैं, लेकिन भारी आबादी वंचित रहती है – की अपेक्षा ‘समाजवादी गरीबी’ बेहतर है. क्रांति तब तक चलती रहेगी, जब तक इस दुनिया में अन्याय मौजूद है.

मॉल और शोरूम के जरिये महिलाओं की अस्मिता का कारोबार / डॉ. अनिल पुष्कर


इस समय मेट्रोपोलिटन से लेकर महानगर तक और राज्यों के बड़े शहरों तक मॉल और बड़ी ब्रांड्स के शोरूम देशभर में खुले हैं। इनमें ऐसा क्या ख़ास है? जिसके लिए एयरकंडीशंड सहूलियत के साथ हर आधुनिक साजोसामान की व्यवस्था की गई है। कई चीजों की ब्रांड्स तो ऐसी हैं जिन्हें एक बहुस्तरीय ब्रांड के शोरूम में भी जगह मिली है और शापिंग सेंटर में सेम ब्रांड का अलग से एक शोरूम भी खोला गया है। माल और विदेशी ब्रांड्स के लिए सरकार ने जमीन, बिजली, और सुरक्षा तक मुफ्त में उपलब्ध की हैं। जो शोरूम्स बने हैं इनमें पहनने ओढ़ने वाले लिबास की नामालूम रंगीन डिजाइन, ज्वेलरी, जूते, महंगा सिनेमा, रेस्तरां मनोरंजन के अनेकों साधन दिए गये हैं। और ये सब कुछ फैले हुए जमीन के बड़े भू-भाग याकि विशाल दायरे में वातानुकूलित तरीके से उपलब्ध है। इसके अलावा और क्या है जिसे बेचा जा सकता है?
वैश्विक बाज़ार आज इस ख्याल से हर चीज़, हर गुंजाइश पर अपनी नजरें जमाए हुए है। इंसान के इस्तेमाल में आने वाली कितनी चीजें हैं जिन्हें व्यापार के नजरिये से बिक्री कर बेशुमार मुनाफा कमाया जा सकता है। कम से कम समय में क्या नया लांच किया जाय? हर ब्रांड इसे लेकर चिंतित है, तमाम तरह की प्रयोगात्मक कार्यशालाएं काम कर रही हैं जिन्हें हम प्रचार माध्यमों से उपभोक्ता के बीच ले जाते हैं। जरूरत और नये उपयोगी चीजों पर रिसर्च चल रही है। नये उत्पादों के लिए नए आइडियाज तलाशे जा रहे हैं। सभी ब्रांड्स हर तरह से मुनाफा कमाने के लिए उत्पाद की खोजबीन करने में लगी हुई हैं और बाज़ार में पर्याप्त समय और पैसा झोंका जा रहा है। इसी मुनाफे से जुड़ा है औरतों के सौन्दय का सबसे बेहतरीन जरिया बनाया गया सुडौल और तराशा हुआ जिस्म और अस्मिता का बाज़ार।
औरत को एक उत्पाद के तौर पर बनाए रखने की कोशिशें तेजी से बाज़ार का हिस्सा बन रही हैं और नये-नये साइबर सोशल क्राइम को पनाह देते इन आधुनिक बाज़ारों में हर तरह की अथाह संभावनाएं मौजूद हैं। इसी का एक ताजा उदाहरण है हाल ही में हुआ, फैब इण्डिया, गोवा के चेंजिंग रूम में ख़ुफ़िया कैमरे का पाया जाना। वह भी मंत्रालय की प्रतिष्ठित महिला पदाधिकारी के साथ यह घिनौना प्रयास करने का दुस्साहस किया गया। ऐसा अपराध होने देने की स्थितियाँ न ही केवल शर्मनाक हैं, न ही केवल निंदनीय है बल्कि अपराधियों के मजबूत हौसले की तरफ साफ़ संकेत है। जिससे पता चलता है कि गुनहगारों के इरादे कितने पक्के हैं और मकसद कितना टार्गेटेड।
जाहिर है इन अपराधियों के लिए एक केन्द्रीय मंत्री भी केवल महिला है। एक सुंदर जिस्म जिसे बाज़ार में तौला जा सकता है। एक सशक्त महिला का चरित्र यहाँ गौण है। स्मृति ईरानी जो कि केन्द्रीय शिक्षा मंत्री हैं। गुनहगारों के लिए किसी सामान्य महिला की तरह ही है। जिसकी तस्वीरें ली जा सकती हैं, जिसे बाज़ार में अच्छी कीमत पर बेचा जा सकता है याकि इरादतन उसे ब्लैकमेल करके मानसिक रूप से परेशान किया जा सकता है। स्मृति ईरानि कोई रातों रात मशहूर नहीं हुईं। अपनी कला और कैरियर के लिए काम ने इस महिला को ख़ास पहचान दिलाई। फिर वो राजनीति में किस्मत आजमाने आईं और सफल रहीं। स्मृति ने दुनिया के हर तरह के तजुर्बे और इल्म को हासिल किया। अभिनय के क्षेत्र में कई वर्षों तक लगी रहीं। यह महिला इन तमाम मायनों में किसी सामान्य महिला से किसी तरह तुलना करने के लिए कतई उपयुक्त नहीं है। बावजूद इसके औरतों के जिस्म को सुंदर बेचने का माल समझने वाले अपराधियों ने इस महिला को भी अपने गंदे मकसद को पूरा करने का माध्यम बनाने का प्रयास किया। जिस पर गोवा के मुख्यमंत्री ने भी इस मुद्दे पर केवल कर्मचारियों को ही गुनहगार करार देते हुए मसले की गंभीरता और जिस्म के बड़े कारोबारियों का ही साथ दिया है। इस लिहाज से मुख्यमंत्री का बयान प्रभुत्वशाली और राजनीतिक घुसपैठ रखने वाले अपराधियों को कहीं न कहीं एक स्तर का समर्थन भी देता है।
ऐसा नहीं है कि महिलाओं के खिलाफ यह षड्यंत्र कर्मचारियों की बदमाशी मात्र है। सोचकर देखिये औरत की देह में ऐसी क्या ख़ासियत है? जिसके कारण उसे सरेबाजार बेचा जाना चाहिए। जिसे बेचने के लिए लाइसेंस की भी जरूरत नहीं है। जिसे बेख़ौफ़ और बेहिचक बेचा जा सकता है। जिसे बेचकर अकूत संपत्ति इकट्ठी की जा सकती है। अथाह मुनाफा कमाया जा सकता है। यह ध्येय और धारणा कहाँ से पैदा होती है? ये विचार कहाँ से आया कि किसी भी वुमेन चेंजिंग रूम में किसी महिला के कपड़े बदलने का वीडियो भी बाज़ार में बेचकर अच्छी कीमत वसूल की जा सकती है।
महिलाओं की आज़ादी को मुद्दा बनाकर धन कमाने वाले कारोबारी महंगे स्त्री माडल्स के जरिये ऐश्वर्यभोगी तबके के बीच अधनंगे जिस्मों का प्रदर्शन करते हैं। महंगे से महंगे कैटवाक शो आयोजित करते हैं। आधुनिक वस्त्रों को बाज़ार के बड़े कारोबारियों के बीच इस तरह पेश किया जाता है जिसमें इन कपड़ों के बहाने मॉडल्स अपना जिस्म प्रदर्शित करती हैं। बाद में इन्हें कैलेंडर के लिए भी नंगे जिस्म को बलिक एंड व्हाईट या रंगीन कैमरों में शूट किया जाता है। फिर इन भडकाऊ तस्वीरों को आलिशान बंगलों, महलों, स्वीट, होटलों की शान में दीवारों पर टाँगे जाते हैं। आखिर इस तबके को नंगे जिस्मों को देखने का चस्का कितना अजीब और आपराधिक है। मगर सरकार और कानून इस पर कोई पाबंदी नहीं लगाता। ये लोग औरतों की देह को आज़ादी और मुक्ति के नाम पर मुनाफे के लिए इस्तेमाल करते हैं। अपने कद और प्रतिष्ठा के लिए औरतों के जिस्म को अपने फायदे में उपयोग करते हैं। अधिक रकम अदा करके सुंदर स्त्रियों के जिस्म का एक अन-एथिकल बाज़ार खड़ा किया जा रहा है। साधारण लोगों को बिना किसी बुनियादी सामाजिक इल्म और सरोकार के ऐसे हर मामले में खूब बहकाया भटकाया जा रहा है। एक सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक अनिश्चिता लगातार जारी है।
इन आधुनिक बाज़ारों में क्या ख़ास है जिसे बेचा जाता है? ऐसा क्या है जो कि पुराने बाज़ार में नहीं बिकता? जिसे आधार बनाकर हर बड़े शहर और जिले में मॉल, शॉपिंग सेन्टर खुल रहे हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियों के शोरूम बाज़ार के बीचोबीच रौनक पैदा करने का काम कर रहे हैं। रौशनी से एकदम चकाचौंध और आधुनिक मानदंडों से लैस एक नये कल्चर को बड़े पैमाने पर फैलाया जा रहा है। आधुनिक होने का व्यूह रचने वाली तमाम इबारतें तीसरी दुनिया के देशों में रची जा चुकी हैं।
गोवा मामले में प्रशासन समेत कई जानकारों का मानना है कि यह कर्मचारियों की बेहूदा हरकत हो सकती है। मगर इसका एक पहलू यह भी है आप किसी भी मॉल या शापिंग सेन्टर, शोरूम में जाएँ। वहां के कर्मचारियों को गौर से देखें तो आपको पता लग जाएगा कि वे मुंह में न तो किसी तरह का च्विंग करने वाला खाद्य पदार्थ रख सकते हैं। न ही उन्हें स्वाभाविक तरीके से मिलने वाली सुविधाएं ही दी जा रही हैं। कर्मचारियों को तो ट्वायलेट जाने के लिए अपने समय का ब्यौरा तक देना पड़ता है। खाना खाने के लिए वक्त की पाबन्दी है। ऐसे में फैब इण्डिया के ये तीन कर्मचारी पकड कर जेल में अगर डाल भी दिए गये तो क्या इससे मसले का सही हल निकाला जा सकेगा?
सोचकर देखिये, क्या कोई कर्मचारी बिना मालिक की मर्जी और बगैर आदेश के खुद ऐसे संगीन अपराध को करने का जोखिम लेगा। किसी बड़े जुर्म से सीधे तौर पर जुड़ा होगा। चूंकि यह मामला हाई प्रोफाइल है, और हालात इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि कई चरणों में होने वाले इस आपराधिक धंधे में बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ और उनके रसूखदारों के तार कहीं न कहीं बड़े पैमाने पर जुड़े हुए हैं। वरना आप देखें कि इन्हीं शोरूम्स में कर्मचारियों के आने के समय उन्हें पूरी तरह से खंगालकर चेक किया जाता है, दिन भर कड़ी निगरानी और मुस्तैद कैमरों की नजर में रहना पड़ता है। वापसी के समय पूरी तरह से जांच के बाद ही निकासी होती है। ऐसे में क्या यह घटना कर्मचारियों के मातहत संभव है? भला इन कर्मचारियों को इतने संसाधन और टेक्निकल जानकारी कौन उपलब्ध कराएगा? कि वे अपराध करने की हिम्मत दिखा सकें और खरीददार उपभोक्ता महिलाओं की तस्वीरें ट्रायल रूम से कैद करके उन्हें साइबर दुनिया के खुले बाज़ार में बेच सकें। कतई यह मुमकिन तो नहीं लगता।।
एक और बात, आप मेट्रोपोलिटन, महानगर और आम शहरों के बीच मॉल में काम कर रही महिला कर्मचारियों को देखें। जहां मेट्रो शहर में हर प्रोडक्ट के केबिन पर अधिकांशतः एक ऐसा युवा चेहरा आपको देखने को मिलेगा जो कारोबारी की नजर में इस बात की पूरी संभावना को पूरा करने के लिए बाध्य है कि बाज़ार में बिकने वाले सौन्दर्य प्रसाधनों के बीच वह भी एक सुंदर उत्पाद की तरह है। आप इन खूबसूरत चेहरों को देखकर आकर्षित और आनंदित हो सकते हैं। इन्हें सामान बेचने के लिए खुद को मोम की गुड़िया बनना पड़ता है। अपनी देह की सुन्दरता को बनाये रखने के लिए हर तरह से तैयार रहना होता है।
दूसरी तरफ आप ट्रायल रूम्स में खड़ी महिला सुरक्षा गार्ड को देखकर अंदाजा लगा सकते हैं कि वे सिर्फ एक निश्चित भूमिका में हैं। इनके ड्रेस कोड और पहनावे के साइज और डिजाइन से आप इन्हें सामान या प्रोडक्ट की सिक्योरिटी गार्ड के बतौर आसानी से पहचान सकते हैं। इनकी उम्र अमूमन 18 से लेकर 30 के बीच होती है। और काम के दौरान असुविधाओं का सामना करना पड़ता है इनके लिए बैठने की सुविधा ड्यूटी के दौरान नहीं दी जाती है। ये महिलायें 12 घंटे तक खड़े रहकर नौकरी करने को मजबूर हैं। इन स्थितियों के बारे में बात करना इसलिए जरूरी है क्योंकि अपराध करने के लिए जिस तरह की स्थितियां, सुविधाएं और माहोल चाहिए। इन स्थितियों से आपको अंदाजा हो जाएगा कि ये महिला कर्मचारी किसी भी अपराध में शामिल होने के लिए कितने सक्षम और उपयुक्त हैं?
यकीनन ऐसे में जो भी अपराध हो रहे हैं उनके पीछे कर्मचारियों से अपराध करवाने वाले, इन्हें इस्तेमाल करने वाले रईस और ताकतवर लोग हैं। असल में औरतों की देह को हर तरह से बेचने वाले सौदागर सुरक्षा घेरों में हैं। और गुनाह को अंजाम देने वाले ये बड़े कारोबारी है। जिनकी शह पाकर या इनके इशारे पर गुलामों की तरह आदेश का पालन करते हुए चंद प्रलोभनों में फंसे कर्मचारी मजबूरी और दबाव के तहत आपराधिक काम में शरीक होते हैं। बावजूद इसके हर तरह के खतरे इनके हिस्से में हमेशा मौजूद हैं। मगर इनके मालिकों के लिए कोई खतरा न तो गुनाह करवाने में है और न ही औरतों की देह को बाज़ार में बेचने पर है। कानून की लचर दफाओं के कारण और व्यवस्था की खामियों की वजह से ये शातिर और प्रभुत्वशाली लोग हर गुनाह से बचकर साफ़ निकल जाते हैं और भविष्य में बड़े से बड़े अपराध की अनेक संभावनाओं से भरे हैं। सरकार ऐसे तमाम गुनहगारों को खुद इसी व्यवस्था में सुरक्षित जगह देती आई है।

मीडिया गाइड लाइन : लैंगिक अल्पसंख्यकों पर 'छिछोरे समाचार' लिखने की मनाही

हमसफर ट्रस्ट के अध्यक्ष अशोक राव कवि के मुताबिक प्रसार माध्यमों में, जो लैंगिक अल्पसंख्यकों का सनसनीखेज, अवैज्ञानिक एवं एकतरफा चित्र प्रस्तुत किया जाता है, उसमें बदलाव जरूरी है। इसी उद्देश्य से अपने सामाजिक अस्तित्व के लिए संघर्षरत एलजीबीटी (समलैंगिक लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर) समुदाय की ओर से संचार मीडिया गाइड (प्रसार माध्यम मार्गदर्शिका) जारी की गई है। इसकी लेखिका अल्पना डांगे हैं और हिंदी में इसका अनुवाद विवेक पाटिल ने किया है। इंडिया एच.आई.वी. / एड्स अलायंस ने इनोवेशन फंड के तहत हमसफर ट्रस्ट के इस प्रकल्प को आर्थिक सहायता प्रदान की है। 
अल्पना डांगे लिखती हैं कि 'प्रसार माध्यम मार्गदर्शिका' भारत में लैंगिक अल्पसंख्यकों की बेहतर रिपोर्टिंग की बेहतर पत्रकारिता के लिए सुझावित भाषा मार्गदर्शिका है। हमसफर ट्रस्ट बोर्ड पिछले कई वर्षों से संचार प्रसार माध्यम मार्गदर्शिका तैयार करने पर विचार-विमर्श करता रहा है। Glaad Media के सेन एडम ने उनके कुछ हिस्सों को अपनाने की अनुमति दी। संचार प्रकल्प के दौरान कार्यशालाओं में शामिल होकर पत्रकारों ने भी इसके विमर्श में मदद की। इस प्रकल्प पर काम करते समय कुछ चुनिंदा गाने महीनों तक बार बार सुने।
प्रस्तावना सहित इसके कुल आठ अध्यायों में से अंतिम आठवें अध्याय 'संचार एवं पत्रकारिता के नीति-मूल्य' में लिखा गया है कि अगर किसी व्यक्ति का साक्षात्कार, राय, छायाचित्र लेने हैं तो पत्रकारों को उस व्यक्ति की सहमति लेनी चाहिए। साथ ही, छापने के बाद उसकी जानकारी उस व्यक्ति को देनी चाहिए। एलजीबीटी (समलैंगिक) समाज के ऐसे किसी व्यक्ति की तो पहचान भी गोपनीय रखनी चाहिए। एलजीबीटी समाज के बारे में 'छिछोरे समाचार' पेश किए जाते हैं। ऐसा नहीं लिखा जाना चाहिए। स्टिंग के बाद तो ऐसे समाचार आचार संहिता के दायरे में आते हैं या नहीं, विवाद का मुद्दा है। समलैंगिक समुदाय के लोग अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं चाहते हैं। संकेतों के माध्यम से इनकी आपस में मुलाकातें होती हैं। इसलिए स्टिंग से इनके रोजीरोटी पर खतरा पैदा हो जाता है। वे बेघर किए जा सकते हैं। समाज उन्हें धिक्कार सकता है। इसीलिए इस पुस्‍तक में देशव्यापी इस समुदाय के प्रवक्‍ताओं के संपर्क नंबर जारी किए गए हैं।