Saturday, 25 January 2014

अली सरदार जाफरी


कौन आज़ाद हुआ ?
किसके माथे से सियाही छुटी ?
मेरे सीने मे दर्द है महकुमी का
मादरे हिंद के चेहरे पे उदासी है वही
कौन आज़ाद हुआ ?

खंजर आज़ाद है सीने मे उतरने के लिए
वर्दी आज़ाद है वेगुनाहो पर जुल्मो सितम के लिए
मौत आज़ाद है लाशो पर गुजरने के लिए
कौन आज़ाद हुआ ?

काले बाज़ार मे बदशक्ल चुदैलों की तरह
कीमते काली दुकानों पर खड़ी रहती है
हर खरीदार की जेबो को कतरने के लिए
कौन आज़ाद हुआ ?

कारखानों मे लगा रहता है,
साँस लेती हुयी लाशो का हुजूम,
बीच मे उनके फिरा करती है बेकारी भी
अपने खूंखार दहन खोले हुए
कौन आज़ाद हुआ ?

रोटियाँ चकलो की कहवाये है
जिनको सरमाये के द्ल्लालो ने
नफाखोरी के झरोखों मे सजा रखा है
बालियाँ धान की गेंहूँ के सुनहरे गोशे
मिस्रो यूनान के मजबूर गुलामो की तरह
अजबनी देश के बाजारों मे बिक जाते है
और बदबख्त किसानो की तडपती हुयी रूह
अपने अल्फाज मे मुंह ढांप के सो जाती है
कौन आजाद हुआ ?

बलिदान से पहले 22 मार्च 1931 को लिखा गया देशवासियों को अंतिम पत्र के मुख्य अंश
" स्वाभाविक है ..जीने की इक्षा मुझमे भी होनी चाहिए , मै इसे छुपाना नहीं चाहता ..लेकिन मै एक शर्त पर जिदा रह सकता हूँ ..मै कैद और पाबंद बन कर जीना नहीं चाहता ..दिलेराना ढंग से हसते - हसते मेरे फांसी पर चढ़ने की सूरत में ' हिन्दुस्तानी माताएं अपने बच्चो को भगत सिंह बनाने की आरजू किया करेंगी और देश के लिए कुर्बानी देने वालों की तादात इतनी बढ़ जाएगी की क्रांति और आजादी को रोकना हुकूमतों और नापाक शैतानी ताकतों के लिए असंभव हो जायेगा ...हां एक विचार आज भी मेरे मन में आता है ..की देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी उसका हजारवा भाग भी पूरा न कर सका अगर मै आजाद और जिदा रहता तो इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता . मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन है .अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इन्तजार है .कामना है यह और नजदीक आये .आप सभी देश भाइयों का साथी ,
भगत सिंह

Friday, 24 January 2014

सांप

एक मालदार जाट मर गया तो उसकी घरवाली कई दिन तक रोती रही। जात-बिरादरी वालों ने समझाया तो वह रोते-रोते ही कहने लगी, 'पति के पीछे मरने से तो रही! यह दुःख तो मरूँगी तब तक मिटेगा नहीं। रोना तो इस बात का है कि घर में कोई मरद नहीं। मेरी छः सौ बीघा जमीन कौन जोतेगा, कौन बोएगा?' हाथ में लाठी लिए और कंधे पर खेस रखे एक जाट पास ही खड़ा था वह जोर से बोला, 'मैं री मैं'। जाटनी फिर रोते-रोते बोली, 'मेरी तीन सौ गायों और पाँच सौ भेड़ों की देखभाल कौन करेगा? उसी जाट ने फिर कहा, 'मैं री मैं'। जाटनी फिर रोते रोते बोली, 'मेरे चारे के चार पचावे और तीन ढूँगरियाँ हैं और पाँच बाड़े हैं उसकी देखभाल कौन करेगा?' उस जाट ने किसी दूसरे को बोलने ही नहीं दिया तुरंत बोला, 'मैं री मैं' जाटनी का रोना तब भी बंद नहीं हुआ। सुबकते हुए कहने लगी, 'मेरा पति बीस हजार का कर्जा छोड़ गया है, उसे कौन चुकाएगा?' अबके वह जाट कुछ नहीं बोला पर जब किसी को बोलते नहीं देखा तो जोश से कहने लगा, 'भले आदमियों, इतनी बातों की मैंने अकेले जिम्मेदारी ली, तुम इतने जन खड़े हो, कोई तो इसका जिम्मा लो! यों मुँह क्या चुराते हो!'
- विजयदान देथा


अँधेरी रात में एक अंधा सड़क पर जा रहा था। उसके हाथ में एक लालटेन थी और सिर पर एक मिट्टी का घड़ा। किसी रास्ता चलने वाले ने उससे पूछा, 'अरे मूर्ख, तेरे लिए क्या दिन और क्या रात। दोनों एक से हैं। फिर, यह लालटेन तुझे किसलिए चाहिए?' अंधे ने उसे उत्तर दिया, 'यह लालटेन मेरे लिए नहीं, तेरे लिए जरूरी है कि रात के अँधेरे में मुझसे टकरा कर कहीं तू मेरा मिट्टी का यह घड़ा न गिरा दे।'
- टालस्टॉय


साँप! तुम सभ्य तो हुए नहीं-
नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया।
एक बात पूछूँ- (उत्तर दोगे?)
तब कैसे सीखा डँसना-विष कहाँ पाया।
 अज्ञेय

चोर
सड़के जिन पर मैं चला, चप्पलें जो मैंने पहनीं
रोटियाँ जो मैंने खाईं, सब थीं दूसरों की बनाईं ।
झंडे जो मैंने उठाए, नारे जो मैंने लगाए
गीत जो मैंने गाए, सब थे दूसरों के बनाए।
किताबें जौ मैंने पढ़ीं, थी सब दूसरों की गढ़ी।
मैं तो बस चोर की तरह, चुराता रहा दूसरों का किया
मैंने किया क्या, जीवन जिया क्या ?
- बोधिसत्व

एक चाय की चुस्की, एक कहकहा,
अपना तो इतना सामान ही रहा।
- उमाकांत मालवीय

सोच रहा हूँ
सोचना बंद कर दूँ
और सुखी रहूँ !
-रामकुमार कृषक

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‘क‘ से काम कर, ‘ख‘ से खा मत, ‘ग‘ से गीत सुना
‘घ‘ से घर की बात न करना, ङ खाली।
सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !
‘च‘ को सौंप चटाई, ‘छ‘ ने छल छाया
‘ज‘ जंगल ने ‘झ‘ का झण्डा फहराया
झगड़े ने ञ बीचोबीच दबा डाली,
सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली!
‘ट‘ टूटे, ‘ठ‘ ठिटके, यूँ ‘ड‘ डरा गया
‘ढ‘ की ढपली हम, जो आया बजा गया।
आगे कभी न आई ‘ण‘ पीछे वाली,
सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली!
-रामकुमार कृषक

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हम नहीं खाते, हमें बाज़ार खाता है
आजकल अपना यही चीज़ों से नाता है।
है ख़रीददारी हमारी सब उधारी पर
बेचनेवाला हमें बिकना सिखाता है।
-रामकुमार कृषक

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मोदी मोदी मच रहा, भारत भर में शोर
मोदी के संग हो लिए ठग, ठाकुर औ चोर।
- सांड़ बनारसी

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'दिल के दरिया में उतरा था पहली दफा
ना तो कश्ती मिली, ना किनारा मिला।
- डा.ईश्वरचंद त्रिपाठी

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हम फोकटिया मतदाता

जयप्रकाश त्रिपाठी

आज मतदाताओं के जागरूक होने का दिन है। जागरूक होते होते हम कहां से कहां पहुंच गये। जो हमे जागरूक करने आते हैं, हमारे लिए और कुछ नहीं करते फिर कभी नहीं दिखते हैं। हमे जागरूक करने के बाद अपने ऊपर वालों की टोली शामिल होकर चंपत, लापता हो जाते हैं। मतदाताओं को जागरूक करने की जितनी चिंता है, काश उतनी देश के करोड़ो बेरोजगारों, गरीबों, फटेहालों, जातिवाद और सांप्रदायिकता से हाशिये पर जा पड़े लोगों को मुख्यधारा में ले आने की चिंता होती। कल्याणकारी राज्य होने की नौटंकी करते करते 1954 से 2014 में पहुंच गये, जो लूटपाट-हत्यायें करते थे, एमएलए, मिनिस्टर तक बन गये, सरकारी खजाने लूट लूट कर न जाने कितने ऐश कर रहे हैं, जनता के पैसे से प्लेन में देश विदेश घूम रहे हैं, हम रह गये फोकटिया मतदाता के मतदाता। मतदाता बनने से पूर्व हर मतदाता को अपने अधिकार को सिर्फ वोट डालने के रूप में नहीं देखना चाहिए बल्कि उन प्रश्नों से आंख मिलाना भी सीख लेना चाहिए, जो भारतीय लोकतंत्र का खून पीने वाले जरायम तत्वों को राह चलते सलाम ठोंकते हैं.....जान लेना चाहिए कि हम पांच साल में सिर्फ वोट डाल आने के लिए नहीं हैं, हम जान गये हैं कि चोर, जातिवादी, उचक्के, सांप्रदायिक, जनद्रोही कौन हैं, हम मतदाता हैं तो अब समय हमारा होगा, देश हमारा है लोकतंत्र हमारे लिए होगा, हम हैं देश के अस्सी फीसदी लोग।   

Tuesday, 21 January 2014

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना


उठ मेरी बेटी सुबह हो गई
पेड़ों के झुनझुने बजने लगे;
लुढ़कती आ रही है सूरज की लाल गेंद।
उठ मेरी बेटी सुबह हो गई।
तूने जो छोड़े थे, गैस के गुब्बारे,
तारे अब दिखाई नहीं देते,
(जाने कितने ऊपर चले गए)
चाँद देख, अब गिरा, अब गिरा,
उठ मेरी बेटी सुबह हो गई।
तूने थपकियाँ देकर,
जिन गुड्डे-गुड्डियों को सुला दिया था,
टीले, मुँहरँगे आँख मलते हुए बैठे हैं,
गुड्डे की जरवारी टोपी
उलटी नीचे पड़ी है, छोटी तलैया
वह देखो उड़ी जा रही है चूनर
तेरी गुड़िया की, झिलमिल नदी
उठ मेरी बेटी सुबह हो गई।
तेरे साथ थककर सोई थी जो तेरी सहेली हवा,
जाने किस झरने में नहा के आ गई है,
गीले हाथों से छू रही है तेरी तस्वीरों की किताब,
देख तो, कितना रंग फैल गया
उठ, घंटियों की आवाज धीमी होती जा रही है
दूसरी गली में मुड़ने लग गया है बूढ़ा आसमान,
अभी भी दिखाई दे रहे हैं उसकी लाठी में बँधे
रंग बिरंगे गुब्बारे, कागज पन्नी की हवा चर्खियाँ,
लाल हरी ऐनकें, दफ्ती के रंगीन भोंपू,
उठ मेरी बेटी, आवाज दे, सुबह हो गई।
उठ देख, बंदर तेरे बिस्कुट का डिब्बा लिए,
छत की मुँडेर पर बैठा है, धूप आ गई।

ओंकार


चिड़िया, जब तुम आसमान में उड़ती हो, तुम्हारे मन में क्या चल रहा होता है? तुम मस्ती में उड़ी चली जाती हो, या कि सोचती हो, कहीं बादलों में फंस न जाओ, कि सूरज के ताप से झुलस न जाओ, कि कहीं तुम्हारे पंख जवाब न दे दें? तुम्हें उन चूज़ों की चिंता तो नहीं सताती, जो घोंसले में तुम्हारा इंतज़ार कर रहे होते हैं, कि उनके लिए दानों का इंतज़ाम होगा या नहीं, कि कहीं तूफ़ान में घोंसला गिर तो नहीं जाएगा? उड़ते समय तुम्हारे मन में डर तो नहीं होता कि लौटने पर तुम्हारे बच्चे सलामत मिलेंगे या नहीं, कि तुम खुद किसी बहेलिए के निशाने पर तो नहीं, जो तुम्हारी ताक में कहीं छिपा बैठा हो? उड़ते समय तुम्हारे मन में क्या चल रहा होता है, चिड़िया, मौत से पहले भी क्या तुम मरती हो?

रमेश खत्री
आँगन की अरगनी पर चिड़िया.....चिड़िया के कलरव ने जीवन में एक नई सिम्फनी रच दी और हमें पता ही नहीं चला। वह नहीं करती किसी से किसी प्रकार का कोई भेद, निर्विध्न घुमती है एक घर से दूसरे में, कोई धर्म, कोई वर्ग, कोई समुदाय हो उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, बेलौस चली जाती है बगैर किसी हिचक के, हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई, या फिर हो कोई बौद्ध, जैनी या अन्य, अमीर हो, गरीब हो या हो मध्यमवर्गीय, गृहस्थि हो या हो वितरागी वैरागी, सबके घर के दरवाज़ों तक फुदक फुदक कर जाती है, भौर की बेला को वह अपने पंखों में भर लाती है, दाने चुगती अपनत्व से हँसती और इठलाती है नहीं भेद है उसके मन में सुख में, दुःख में....जीवन के उतार चड़ाव में वह खड़ी है साथ हमारे हौसलों की फुहार लिये....

मुकेश कुमार तिवारी
आंगन में आ बैठी चिड़िया, फुदकती, चहचहाती दाना चुगती, और फुर्र हो जाती, यह मेरे लिये नया कौतुक था। एक दिन चिड़िया ने मुझे सौगात में सौंपी एक फुद्‍दी (पंख)। जैसे मेरे दिन हवा हो गये। मुझे अच्छा लगने लगा। दिन भर दौड़ लगाना पंख के पीछे। पत्थर के साथ उछालना और फिर पकड़ने कि लिये दूर तक दौड़ना, गर्दन ऊपर किये हुये, मैंने सीखा घर से निकलना बाहर अकेले। चिड़िया अब मुझे पहचानने लगी थी, मेरे आंगन से निकलकर, आने लगी कमरें के भीतर, कभी रोशनदान से या कभी मुंड़ेर पर चहलकदमी करते, फिर नापती मेरे कमरे का जुगराफ़िया उड़ते हुये बिखेर जाती कुछ तिनकें/ कुछ पंख, मैंने जमा किये उसके बिखेरे हुये तिनकें, जैसे मैं चाहता था एक कोना, अपने कमरे में उसके लिये, और सीखा एक अदद घर बनाना, अब, कोई चिड़िया नहीं आती मेरे घर, ना कोई गाता है गीत आंगन में किसी के आने पर, अरसा हो गया उसे देखे, मेरे बच्चों ने शायद ही कभी देखी हो, कोई चिड़िया लाइव, चहचहाती हुई / दाना चुगती हुई / पंख भिगोकर नहाती हुई, हाँ उनका डेस्कटॉप जरूर सजा रहता है, किसी वर्चुअल अजनबी सी चिड़िया से। मैं, अब भी जाता हूँ दूर जंगलों में, जब वक्‍त मिलता है, जहाँ कोई गाता है गीत दोपहर में, बिखेर आता हूँ दाने, अपने साथ लिये आता हूँ, कुछ तिनकें और कुछ पंख और सहेज लेता हूँ कि दिखा सकूँगा अपने पोतों को कि चिड़िया होती है, कभी हमारे घर भी आती थी।