Monday, 15 July 2013

चोरीचोरा (चौरीचौरा) चोरोवाली ट्रेन.. ये शहर चमड़े के लिए मशहूर है..कानपुर




जयप्रकाश त्रिपाठी

सब ताजा सा है यहां आप सबके साथ.....15 जुलाई

ट्रेन के अंदर सीन 1.
दिल्ली रेलवे स्टेशन से शुरू हुआ एक ट्रेन का अपराह्न। मुसाफिरों में मैं भी। लंबे-लंबे कंपार्टमेंट चेयरकार वाले। मेरी सामने की सीट पर कालिख से ज्यादा काले बालों वाले एक
थुलथुल सज्जन जल्दी-जल्दी (अपराह्न बाद वाला) नाश्ता भकोस रहे हैं। उनके भकोसने के अंदाज पर टुकर-टुकर एक बच्ची निगाह टिकाए हुए। उसके पापा बार-बार उधर से बच्ची का चेहरा दूसरी तरफ फेर देने की कोशिश में। थुलथुलजी रह-रहकर मुंब बिचका लेते हैं बाप-बेटी के दृश्य पर। बच्ची का पिता अंदर-ही-अंदर खुन्नस सा खाता हुआ। थुलथुलजी उसे सफर की दुश्वारी सी लगने लगते हैं। वह घूरता है थुलथुलजी को। थुलथुलजी भी उसे कस-कस कर घूरने लगते हैं। ट्रेन धड़धड़ाती भागती जा रही है अलीगढ़ की ओर। दादरी से आगे। बच्ची के चेहरे पर अचानक पिता की तेज चपत। वह चीख उठती है। थुलथुलजी सज्जनता का परिचय देते हुए स्वामी भाव से बच्ची के पिता को सीख देते हैं- इतना बेरहम न बनो, लो बेटा बिस्कुट खाओ। पिता बिस्कुट झपट कर फेंक देता है। थुलथुलजी को बड़ी शर्मींदगी महसूस हुई। उठ खड़े हुए (किसी तरह)। बच्ची का पिता उनसे ज्यादा फुर्ती में......
कहता हूं बैठ जाओ, बैठ जाओ वरना
वरना क्या कर लोगे, ऐं?
क्या कर लूंगा?
हांह-हांह क्या कर लोगे?
हांह-हांह?....ये जो तून नकली रंगी-रंगाई लुटकी सिर पर टांग रखी है न, अभी नोच कर तेरे हाथ पर धर दूंगा, समझे...रंगे सियार
देख तो कर के, बत्तीसी बाहर आ जायेगी
बच्ची जोर-जोर से रो रही है
अगल-बगल भरपूर रोमांच, एक महिला बड़े वजन से मुस्कराती हुई, कुछ लोग अत्यंत गंभीर। टीटी आता है। रोज का माजरा समझ बिना किसी से टिकट मांगे आगे के कोच की ओर कूच कर जाता है।
स्यार-संवाद जारी है....
देखो मुझसे जुबान मत लड़ाओ कहे देता हूं
तुम भी बात मत बढ़ाओ, क्या समझ कर मेरी बेटी को बिस्कुट दे रहा था, ऐं? टिकट भी खरीद कर दे देते न मुझे
अगल-बगल के लोग बीच-बचाव कर देते हैं
नाश्ता आ गया है
दोनो बैठ जाते हैं अपनी-अपनी सीट पर,

सीन 2.
एक हाथ टूटा नौजवान मेरे पीछे वाली सीट पर लगातार कुछ-न-कुछ बके जा रहा है
''... यार दिल्ली के पुलिस वाले बड़े चोर हैं। मैं सात साल से हूं यहां। एक दिन क्या हुआ कि अपने साथी को पीछे बाइक पर बैठाए मिंटो ब्रिज रहा था। रास्ते में पुलिस वाले ने रोक लिया। बोला-कागज दिखाओ,
कैसा कागज?
गाड़ी का।
गाड़ी कहां, ये तो बाइक है।
अरे वही।
''....मैं बोला- वकील साहब के साथ पान खाने जा रहा हूं तो कागज लेकर थोड़े जाऊंगा, कोई जाता है क्या?
''....कोई नहीं, पैसे देने पड़ेंगे, दो।
''....कैसे पैसे
''.....कागज साथ में न होने के
''.....अच्छा! और पैसे न दूं तो
''.....तो गाड़ी छोड़ जाओ यहां
''.....वाह भाई वाह, ये तो खूब लूट मची है। गाड़ी छोड़ जाऊं।'' मैं भी बाइक स्टैंड कर लिया हम दोनो तन लिये। पुलिस वाला सकपकाया। बोला जो जेब में पड़े हों, वही दे दो। जाओ। मैं बोला- जेब में चिल्लर हैं, पान खाने के लि। वह बोला वही दे दो। दे दिया सारा चिल्लर...13 रुपये। फिर बोला- मुझे भी पान खिला दो। मैं बोला जा नहीं तो.....स्साला, गरियाते हुए फुर्र हो लिये हम दोनो। बड़ा बुला हाल है दिल्ली का। उफ्।

तो ये ऐसे-ऐसे रोमांच सफर के......

सीन 3.
मेरे आगे वाली तीन सीट छोड़ कर चाचाजी ऊंघ रहे हैं। चाची भी। बनी-ठनी। चाचा अब तक छप्पन के, चाची अट्ठावन की। चाचा के कंधे पर बार-बार चाची का सिर जानबूझ कर (नये जमाने के हिसाब से) झूल जा रहा है। चाचा बार-बार चौंक कर अगल बगल से घूर रही आंखों में झांक लेते हैं। झेंप जाते हैं। चाची बेशर्म। मन मसोसते हुए कि कुछ तो शर्म करो दादी अम्मा अट्ठावन की हो गई हो। चाची कनखियां भांप लेती हैं पूरा माजरा। चाचा खुन्नस में। सिर झटक देते हैं। जैसे बाहर की बरसात से घर में घुसते हुए छाता फेंक दिया जाता है या स्कूल से लौट कर बच्चे बस्ता फेंक देते हैं।

सीन 4.
एक बच्ची तेरह चौदह साल की। अपने बाबा के साथ। बाबा कुरुप-से। गमछे में मुंह छिपाकर दमदार खांसियों का दौरा। बच्ची मुंह बिचका लेती है। अपने कुरुप बाबा के साथ सफर अनइजी फील करती हुई। कंधे से उन्हें इंडीकेट करती रहती है, ज्यादा मत खांसो न, इस तरह क्यों मेरी बेइज्जती करा रहे बाबा..... ना बाबा ना ... जरा कम खांसो,
खांसना ही है तो जरा अदा से खांसो ना बाबा.....

और, लो आ गए....
ट्रेन कानपुर सेंट्रल के आउटर पर पहुंच चुकी है। एनाउंसर की आवाज गूंजती है...अब आप उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर पहुंचने वाले हैं। ये शहर चमड़े के लिए मशहूर है...अपनी अपनी प्लास्टिक बोतल साथ ले जाइगा.....धन्यवाद

एक दिन के कुछ घंटे और.... बाद में

Saturday, 13 July 2013

मीडिया और मोदी

जयप्रकाश त्रिपाठी

बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा!

जानते सब हैं लेकिन क्या करें, जी नहीं मानता है। सो मन हल्काने के लिए शब्द छलकाने का जोश दिन दो दिन बाद फेस बुक पर बरप दिया जाता है।

मोदी...मोदी...मोदी...मोदी... आह मोदी, वाह मोदी....ये मोदी, वो मोदी...जो मोदी, सो मोदी...

(उद्यमी राजेश जैन (वेब पोर्टल इंडियावर्ल्ड) और तकनीकी उद्यमी बी.जी.महेश ( संस्थापक ग्रेनियम इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड) नरेन्द्र मोदी के मीडिया मैनेजर कहे जाते हैं)

....तो मोदी.....

गुजरात में मीडिया मैनेजमेंट का हुनर दिखा चुके नरेंद्र मोदी के सिपहसालार और बीजेपी के उत्तर प्रदेश मामलों के प्रभारी अमित शाह ने अब यूपी में भी मोदी के इशारे पर अखबारों के दफ्तरों का चक्कर काटना शुरू कर दिया है. पार्टी प्रभारी होने के नाते शाह चाहे जो करें, लेकिन अखबारों के दफ्तरों का चक्कर लगाने के बजाय संगठन पर ध्यान देते तो ज्यादा बेहतर होता. बीजेपी के एक नेता ने कहा, 'अखबारों के दफ्तरों में जाकर संपादकों से मिलना, अच्छी परंपरा की शुरुआत नहीं है. इससे आम जनता के बीच गलत संदेश जाएगा. अखबारों के दफ्तर के चक्कर लगाने से पार्टी को कुछ नहीं मिलेगा. (आजतक )

नरेन्द्र मोदी भारत के ध्रुवीकारी नेताओं में सबसे आगे हैं, इसे मान लिया जाना चाहिए. उनका समर्थन और विरोध लगभग समान आक्रामक अंदाज़ में होता है. इस वजह से उन्हें ख़बरों में बने रहने के लिए अब कुछ नहीं करना पड़ता. (बीबीसी/प्रमोद जोशी)

अखबारों में इन दिनों नरेन्द्र मोदी के भारत के अगले प्रधानमंत्री बनने के कयास सम्बन्धी खबरें खूब छप रही हैं। यह सिलसिला कहाँ से शुरू हुआ यह कहना तो आसान नहीं है, मगर यह अनुमान लगा लेना मुश्किल नहीं है कि इसके पीछे नीयत क्या होगी। एकाएक मनमोहन सिंह मीडिया की नजरों से उतर गये और 2002 के गुजरात दंगों के बाद जिन नरेन्द्र मोदी की थू-थू होती रही है, वे देश के तारणहार बन गये। इसके पीछे कॉरपोरेट जगत की प्राथमिकता के अलावा कुछ नहीं हो सकता। कम्पनियों को लगता होगा कि कांग्रेस को शायद तीसरा कार्यकाल नहीं मिलेगा तो ऐसे किसी घोड़े पर दाँव लगाओ जो उनके हितों का पोषण बेहतर ढंग से कर सके। दरअसल यह कम्पनियाँ ही हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर एजेंडा तय करती हैं और फिर उनके पैसे से चल रहा मीडिया लोगों को उठाता और गिराता है। नीरा राडिया के टेपों तथा जयपाल रेड्डी को तेल और प्राकृतिक गैस से हटा कर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय में डाले जाने की घटना ने सिद्ध किया था कि मंत्रिमंडल भी अम्बानी जैसे उद्योगपतियों की सहूलियत के लिये बनाया जाता है। जिस रोज अरविन्द केजरीवाल ने अम्बानी की गड़बडि़यों के बारे में खुलासा किया था, उसी रोज तय हो गया था कि अब वे मीडिया के लाड़ले नहीं रहेंगे। कौन सा बड़ा अखबार या चैनल है, जिसमें अम्बानी का पैसा न लगा हो या वह अम्बानी के विज्ञापनों पर निर्भर न हो। इसीलिये केजरीवाल का दो सप्ताह का उपवास इस बार सुर्खियाँ नहीं बना। जबकि इस घटना से पहले तक मीडिया ने ऐसा माहौल बनाया था, मानो अण्णा हजारे और अरविन्द केजरीवाल ही देश के नायक हैं। देश के कोने-कोने में चल रहे जनान्दोलनों में अपना जीवन खपा देने वाले हजारों कार्यकर्ताओं को ऐसा सौभाग्य कभी नहीं मिला। जब ‘इंडिया बुल्स’ जैसी एक मझोली कम्पनी उत्तराखंड जैसे एक प्रदेश का मुख्यमंत्री तय कर सकती है, तो बड़ी कम्पनियों की सम्मिलित ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। (nainitalsamachar.in)

जून के तीसरे हफ्ते में उत्तराखण्ड की भयावह त्रासदीकी खबर के आने के साथ इंसानियत दहल उठी थी, जिसने जहाँ सुना, वहीं सन्नाटे में आ गया। चारधाम यात्रा का सीज़न था तो पूरे भारत से लोग उत्तराखण्डके गढ़वाल इलाके में पहुँचे हुये थे। जब भारी बारिश की खबर आयी तो तबाही इस हिमालयी इलाके के हर कण में आ चुकी थी। तीर्थयात्रा पर आये लोग और पर्यटक सभी मुसीबत से आमने सामने थे। भारतीय आपदा प्रबन्धन तन्त्र हरकत में आ गया था, सेना बुला ली गयी थी, भारत तिब्बत सीमा पुलिसऔर आपदा प्रबन्ध के लिये तैयार की गयी फोर्स सब जुटे हुये थे। उत्तराखण्ड की सरकार समेत सभी सरकारें जिनके लोग यहाँ फंसे थे, चिन्तित थीं। बचाव और राहत का कार्य युद्धस्तर पर चल रहा था। राज्य सरकारें भी सक्रिय हो गयी थीं। जिन यात्रियों को सेना के लोग बचाकर देहरादून तक ला रहे थे उनको उनके घर तक पहुँचाने में राज्य सरकारें जुटी हुयी थीं और अपना काम कर रही थी। इस बीच खबर आयी कि 21 जून की शाम को गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेंद्र मोदी देहरादून पहुँच गये हैं। उनके वफादार टी वी चैनलों में हाहाकार मच गया और इस तरह से ख़बरें आने लगीं कि बस अब मोदी जी पहुँच गये हैं सब कुछ ठीक हो जायेगा। 23 जून की सुबह खबर चलना शुरू हो गयी कि उन्होंने उत्तराखंड की दुर्गम पहाड़ियों में फँसे हुये 15000 गुजरातियों को तलाश लिया और उनको वापस गुजरात भेज दिया। मोदीत्व के प्रभाव वाले चैनलों की यह मुख्य खबर थी। किसी ने एक सेकण्ड के लिये भी नहीं सोचा कि इस कारनामे को अंजाम देने के बारे में मोदी की पी आर एजेन्सी से आयी हुयी खबर को जाँच परख कर चलाया जाये। लेकिन किसी ने कोई जाँच पड़ताल नहीं की , कहीं कुछ नहीं हुआ और खबर धड़ाधड़ चलने लगी। नरेंद्र मोदी को एक बार फिर मीडिया ने हीरो के रूप में पेश कर दिया था। उनके समर्थकों ने फेसबुक पर तूफ़ान मचा दिया कि जो काम सेना की सारी ताक़त लगी होने के बावजूद नहीं हो सका वह मोदी की उपस्थिति मात्र से हो गया। खबरों में बताया गया कि मोदी के साथ 80 इनोवा कारें थीं। मीडिया में शुरू के दो दिन तो यह भी ख़बरें चलायी गयीं कि मोदी जी के साथ कई विमान भी थे, 25 वातानुकूल बसें थीं और कुछ बहुत ही काबिल अफसर थे। (शेष नारायण सिंह)

न्यूज मीडिया जिस तरह से २००२ के सांप्रदायिक जनसंहार के मुद्दे को भाजपा/आर.एस.एस की उग्र हिंदुत्व की राजनीति, उसमें मोदी सरकार की भूमिका, पीड़ितों को अब तक न्याय न मिलने और न्याय के रास्ते में लगातार रुकावटें पैदा करने, गुजरात में अल्पसंख्यकों को हाशिए पर ढकेल दिए जाने और सबसे बढ़कर मोदी की हिंदुत्व-कारपोरेट विकास के मिश्रण से तैयार दक्षिणपंथी सांप्रदायिक राजनीति के एजेंडे के तहत महीन-द्विअर्थी-आक्रामक प्रचार शैली से काटकर पेश करता है, उसके कारण ऐसा आभास होता है कि मोदी को अनावश्यक रूप से निशाना बनाया जा रहा है. इसी का फायदा उठाकर मोदी की पी.आर मशीनरी यह प्रचार करती रही है कि न्यूज मीडिया खासकर राष्ट्रीय (दिल्ली) का मीडिया और अंग्रेजी प्रेस २००२ के दंगों के बहाने मोदी का ‘खलनायकीकरण’ करता रहा है जबकि उसके बाद से गुजरात में ‘शांति है और तेज विकास’ है. (आनंद प्रधान)

लिखते-लिखते जग मुआ, मोदी भया न कोय,
जो कोई मोदी भया गया धुंध में खोय................आह मोदी, ऊह मोदी...

Friday, 12 July 2013

बीसवीं सदी के मशहूर लेखक व्लादीमिर सोलोऊखिन


योगेन्द्र नागपाल

मशहूर रूसी लेखक व्लादीमिर सोलोऊखिन का जन्म 1924 में एक किसान परिवार में हुआ। इस पीढ़ी के प्रायः सभी लोगों की ही भांति वह भी द्वितीय विश्वयुद्ध से अछूते नहीं रहे। हां, इस बात में सौभाग्यशाली रहे कि उन्हें मोर्चे पर नहीं भेजा गया, मास्को में क्रेमलिन गार्ड रेजिमेंट में उनको भरती किया गया| अपना साहित्यिक जीवन उन्होंने कविता से ही शुरू किया। सैनिक सेवा के बाद उन्होंने साहित्यिक संस्थान में शिक्षा पाई और फिर गद्य की ओर ही अधिक ध्यान दिया। 1956 में रूस की महान नदी वोल्गा के तटों पर फैले मध्यरूसी मैदानी इलाके का उन्होंने पैदल भ्रमण किया| जीवन के इस अनुभव के आधार पर लिखी काव्यमय रचनाओं ने उन्हें शोहरत दिलाई| ‘ओस की बूंद’ लघु-उपन्यास इनमें से एक था| यह उनके अपने गांव का “छविचित्र” था| सोलोऊखिन यह मानते थे कि जिस प्रकार ओस की एक बूंद में सारा संसार प्रतिबिंबित होता है, वैसे ही एक गांव के जीवन में समस्त विशाल रूस के अपने विशेष लक्षण पाए जा सकते हैं।
इन काव्यमय कहानियों के पश्चात सोलोऊखिन के लेखन में लेखों-निबन्धों का विशेष स्थान रहा है| ‘रूसी संग्रहालय से पत्र’ शीर्षक से तो उनका एक पूरा लेख संग्रह छपा और फिर प्राचीन रूसी कला पर उन्होंने अनेक विचारोत्तेजक लेख लिखे| इनमें लेखक ने ये सवाल उठाए कि पुराने स्मारकों की रक्षा करना और उनका जीर्णोद्धार करना कितना आवश्यक है| इसके अलावा उनकी एक कथा-माला भी निकली, जिसका प्रमुख विषय यह था कि कैसे एक आम देहाती आदमी अपने को शहरी ज़िंदगी में ढालता है| आज के समाज में मानव जीवन में कैसी नैतिक समस्याएं उठती हैं, मनुष्य इस समाज में कैसे नाते-रिश्ते पिरोता है – ये सभी सवाल इन कहानियों में उभर कर सामने आते हैं|
कहानी ‘छड़ी’
सूत्रधार: एक ज़माना था, जब अलेक्सेई को छड़ी लेकर चलने का शौक था| शुरू में तो किसी ने इसकी ओर कोई खास धयन ही नहीं दिया| बस, दोस्त लोग कभी पूछ लेते थे: टांग दुख रही है क्या? या फिर बस में, मेट्रो में लोग उठकर उसे अपनी सीट देते थे, तब वह इनकार करता और उन्हें समझाता कि उसे कोई तकलीफ नहीं है|
उसकी पहली छड़ी सादी–सी ही थी, पर बड़ी आरामदेह, उसका हत्था सींग का बना हुआ था| काफी समय तक वह यही छड़ी लिए रहा| फिर एक दिन एक दूसरी, खासी भारी और देखने में ज़बरदस्त छड़ी पर उसकी नज़र पड़ गई| उसकी मूठ एक गोले की शक्ल की थी, जिस पर नक्काशी से सात कछुए बने हुए थे|
पर अलेक्सेई को सबसे अधिक पसंद थी वह छड़ी, जिसकी मूठ (हाथीदांत की ही) बाज के पंजे की शक्ल की थी और उस पंजे मे कसा हुआ था चिकना गोला| यह छड़ी लेकर ही वह एक बार लेनिनग्राद पहुँच गया| और यहां उसे एक युवा नारी के घर पर बुलाया गया, जहाँ कवि, कलाकार, पत्रकार और चित्रकार जमा होने वाले थे|
उद्घोषक:यह अलेक्सेई की ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना से पहली मुलाकात नहीं थी| पहली बार तो वह उससे कोई एक साल पहले किसी काव्य-गोष्ठी में मिला था|
दूसरी बार शहर में अचानक उनकी मुलाकात हो गई थी और वह उसे घर तक छोड़ने गया था| विदा लेते समय ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना ने उसे अपना फोन नंबर दिया और कह दिया कि किस्मत अगर फिर से लेनिनग्राद खींच लाई, तो फोन कर लीजिएगा|
बस, यही सुहाना अहसास लिए वह जी रहा था कि जब चाहे फोन कर सकता है और ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना से मिलने जा सकता है, कि कभी न कभी ऐसा ज़रूर होगा| पर लेनिनग्राद तो रोज़-रोज़ जाना होता नहीं| मगर एक बार मन बुरी तरह उदास हो उठा, एक गुबार–सा उठा और बहा ले चला| मानो मन ने किसी की पुकार सुनी हो| दूसरे मन की कशिश से उठी पुकार ही यों खींच सकती थी| बस, वह स्टेशन जा पहुँचा| गाडी छूटने से घंटा भर पहले अचानक उसे टिकट मिल गया| सुबह जब नींद खुली, तो नवंबर की धुंधली सुबह में लेनिनग्राद के मकान पीछे छूट रहे थे|
ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना: कितना मन था कि आप आ जाएं, बस किसी तरह आ जाएं, आ जाएं! और आप आ गए| कैसा सुखद संयोग है| तो शाम को आ जाना| आज कुछ लोग मेरे यहां आ रहे हैं| बड़े दिलचस्प लोग हैं...पर आप तो एक दिन के लिए नहीं आए हैं न? सोमवार तक आप मेरे बंदी हैं! तीन दिन तक| मना नहीं करना|
सूत्रधार: बस इस तरह वह ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना के घर पहुँच गया| पहली बार जब वे मिले थे, तो अलेक्सेई छड़ी लिए बिना चलता था, बाद में छड़ी लेकर चलने लगा| इस बार वह अपनी सबसे मनपसंद छड़ी लेकर आया था, वही, जिसकी हाथीदांत की मूठ बाज के पंजे की शक्ल की थी और उस पंजे मे कसा हुआ था चिकना गोला| छोटी सी ड्योढ़ी में कितने ही ओवरकोट टंगे हुए थे|उसका स्वागत करने बैठक से निकली मालकिन ने छड़ी की ओर कोई ध्यान नहीं दिया| अलेक्सेई ने भी उसे एक कोने में रख दिया|
बैठक में ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना ही महफ़िल चला रही थी| किसी से वह कविता पढ़वाती, किसी को गिटार बजाते हुए कोई गीत सुनाने को कहती, और किसी से जाम उठाकर कुछ बोलने को कहती|
उद्घोषक:उन दोनों के बीच सब कुछ तय हो चुका था, सो ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना मानो अलेक्सेई की ओर कोई ध्यान ही नहीं दे रही थी| वह दूसरों की ओर ही ज्यादा देखती थी, उनसे ही हंसी-मजाक करती थी, मुस्कराती थी| पर उसकी ओर गई सरसरी नज़र भी उसे कह जाती थी: “तुम्हें पता है, ये सब लोग जल्दी ही चले जाएंगे| नवंबर की इस ठंड में इन्हें ही बाहर जाना है, तुम्हें नहीं|” कुछ समय बाद, अचानक सब एक साथ उठ खड़े हुए, चलने को हो गए|
ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना: छोड़ आते हैं इन्हें|
अलेक्सेई: “हे भगवान! क्या सचमुच ऐसे ही होगा? जल्दी ही...”
सूत्रधार:मेहमानों का झुण्ड शोर मचाता हुआ सूनी सड़कों पर बढ़ चला, नीवा नदी का पुल उन्होंने पार किया, क्योंकि दूसरी तरफ से बस मिलना आसान था| अलेक्सेई से किसी ने विदा नहीं ली, शायद यही सोचते रहे कि वह भी बस में बैठ जाएगा| और जब बस के दरवाज़े बंद हो गए तो फिर यह अटकलें लगाने का वक्त गुज़र गया था कि अकेला वही क्यों मालकिन के साथ रह गया| आखिर किसी को तो उसे भी घर तक पहुंचाना था, आधी रात के बाद इस चौड़ी नदी के पार, जहाँ चारों ओर से हवाएं बह रही थीं, वह अकेली कैसे लौट सकती थी|
उसने अलेक्सेई की बाईं बांह पकड़ ली| दाएं हाथ में अलेक्सेई ने छड़ी ले रखी थी – वही “प्राचीन” छड़ी, जिसकी हाथीदांत की मूठ बाज के पंजे की शक्ल की थी और उस पंजे मे कसा हुआ था चिकना गोला| वह छड़ी को घुमा रहा था, बड़े अलबेले ढंग से, जैसे सदियों से लाखों-करोड़ों मर्द घुमाते आए हैं| ऐसे ही वे शायद घर तक पहुँच जाते, अगर इस कमबख्त हवा का रुख न बदला होता| ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना ने उसका दूसरा हाथ पकड़ना चाहा, ताकि हवा से ज़रा छिप सके, सो अलेक्सेई को छड़ी दूसरे हाथ में लेनी पड़ी| उसके ऐसा करते ही ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना का ध्यान छड़ी की ओर चला गया|
ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना: यह क्या है? लंगडाते हो क्या?
अलेक्सेई: नहीं तो| बस यों ही छड़ी ले रखी है|
ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना: छैला बन रहे हो?
अलेक्सेई: मर्दों के मतलब की खूबसूरत चीज़ है| सदियों से लेकर चलते आए हैं...
ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना: हो सकता है| महँगी भी है न?
अलेक्सेई:नहीं, वह... वैसे तो.. आबनूस की लकड़ी, हाथी दांत की मूठ, पुराना, बारीकी का काम...
ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना: फेंक दो नदी में|
सूत्रधार: दो कदम चल कर औरत रुक गई, यह देख कर कि मर्द के कान पर जूं तक नहीं रेंगी, उसने फिर से स्पष्ट और ऊंची आवाज़ में कहा:
ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना: फेंक दो इसे नदी में!
अलेक्सेई: क्या ख्याल आया है, सच में...
ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना: जब तक तुम इसे नदी में फेंक नहीं देते, हम यहाँ से हिलेंगे नहीं| नहीं, हम अलग अलग रास्ता पकड़ेंगे, मैं घर जाउंगी और आप बस स्टाप को|
अलेक्सेई:प्यारी ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना! क्या नखरा कर रही हैं आप!
ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना: ठीक है, नखरा ही सही| औरत को हक है नखरा करने का| तीन दिन जो तुम्हें मिल रहे हैं, उनकी खातिर एक छोटा सा नखरा भी नहीं सह सकते? आखिर मैं यह तो नहीं कह रही कि तुम नदी में कूद जाओ|
सूत्रधार:वे पुल के बीचोंबीच रुक गए और मर्द समझ गया कि फैसला करने के लिए उसके पास कुछ पल का ही समय है| ये पल बीत गए, उसने फिर से आगे चलने की कोशिश की| पर कहाँ!
ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना: नहीं, नहीं! अगर मेरी बात नहीं माननी, तो हमारे रास्ते अलग-अलग| हे भगवान, कहाँ गया वह आत्मत्याग, वह शूरवीरता, ह्रदय की वह विराटता? कहाँ है वह युवक, जो प्रिया के प्याले के पीछे उफनते समुद्र में कूद गया? कहाँ हैं वे पुरुष, जो भालों की नोंक पर प्राणों की बाजी लगाए कूद पड़ते थे अखाड़े में? प्राणों की बाजी लगाते थे अपने दिल की रानी के एक चुम्बन की खातिर, चुम्बन तो दूर, एक स्नेहभरी नज़र की खातिर|..
सूत्रधार: ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना के स्वर में अब आदेश नहीं, अनुनय-विनय का पुट था| शायद वह खुद भी एक छोटी सी बात के लिए उनके संबंधों को तोड़ना नहीं चाहती थी| मगर अपने स्वभाव से विवश, वह अपनी बात से पीछे भी नहीं हट सकती थी| शब्द कुछ भी रहे हों, लेकिन उनके पीछे उसकी आवाज़ में अब वह बिलकुल दूसरी ही बात सुन रहा था: “मान भी जाओ, न| क्या जाता है तुम्हारा| हां, ऐसी सिरफिरी हूँ मैं| निकल गई बात मुंह से, अब कुछ कर नहीं सकती| स्वभाव ऐसा है| तुम तो मर्द हो| औरत की बात मानना मर्द की हार नहीं, इससे वह कभी छोटा नहीं होता| मान भी जाओ, न...”
लेकिन शब्द बिलकुल दूसरे थे:
ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना: हे भगवान! क्या नौबत आ गई है| ज़मीन-जायदाद, घरबार, बाल-बच्चों की तो बात छोड़ो, एक नाचीज़ छड़ी की कुर्बानी नहीं दी जा रही| एक औरत की बात का इतना भी मान नहीं रख सकते!
सूत्रधार:अलेक्सेई के सिर पर भी एक अनजाना हठ सवार हो गया| पर शायद, हठ तो था ही, पर उससे भी बढ़ कर था अफ़सोस| हां उसे अफ़सोस हो रहा था यह छड़ी फेंकते हुए| इसलिए नहीं कि वह मंहगी थी, अगर उतने ही नोट निकलकर फेंकने होते तो वह पल भर को भी नहीं हिचकता| अफ़सोस इस बात का था कि यह वाकई बड़ी सुंदर, विरली छड़ी थी, शायद इसके जैसी और दूसरी कभी बनी ही न हो| हां, उसे अफ़सोस हो रहा है, आखिर क्या नखरा है यह! ऐसे हर नखरा सहने लगे तो... आखिर उसका भी अपना मान है| यह सिरफिरी औरत बेमतलब कुर्बानी मांग रही है और वह इसकी बात मानता फिरे|..
ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना: चलो, करो फैसला! यहां ठंडी हवा में और खड़ा नहीं हुआ जाता| हां या ना? मेरे साथ चलोगे या फिर वापिस लौटोगे?
अलेक्सेई: घर तक तो छोड़ आने दो|.. इतनी रात गए, यहां अकेली थोड़े ही छोड़ सकता हूँ| चलिए, आपको घर छोड़ आता हूँ|
ल्युबोव व्लादीमिरोव्ना: कोई ज़रूरत नहीं| मैं जवाब चाहती हूँ: हां या ना?
सूत्रधार: अलेक्सेई तेज़ी से घूमा और बस स्टॉप की ओर चल दिया|
अलेक्सेई: “हद होती हर बात की! इतनी पुरानी, बेजोड़ चीज़ को नदी में फेंक दो! पूछो भला?! दिमाग खराब है| भाड़ में जाए! बस, होटल पहुंच के गरम-गरम बिस्तर मे लेटकर नींद पूरी की जाए और कल तुरंत लौटा जाए वापिस मास्को! आगे से कोई फ़ोन-वोन नहीं, कोई मुलाकत-वुलाकात नहीं| आखिर मेरा भी अपना मान है|..”
सूत्रधार:कई साल बीत गए| अलेक्सेई को एक दिन किसी किताब की ज़रूरत पड़ी, तो सोफे पर और सोफे तले लगे किताबों के ढेर में उसे ढूँढने लगा और अचानक उनके के पीछे उसे वह चीज़ मिल गई, जिसके अस्तित्व को ही पिछले कम से कम तीन-चार साल से भुला बैठा था – आबनूस की काली लकड़ी की, हाथीदांत की मूठवाली छड़ी|
न जाने कब से उसने छड़ी लेकर चलना छोड़ दिया था| एक छड़ी अचानक हाथ से गिर पड़ी और टूट गई, दूसरी चोरी हो गई, तीसरी वह ट्रेन में भूल आया| पर छड़ी लेकर चलना उसने इसलिए नहीं छोड़ा था कि उसकी सबसे अच्छी छड़ियां नहीं बची थीं| बस अपने आप ही वह चाव जाता रहा था, वह दौर गुजार गया था| वह तो भूल ही गया था कि उन छड़ियों में से उसकी सबसे मनपसंद छड़ी सही-सलामत है|
अब वह छड़ी उसे मिल गई थी| क्या बेकार की, नाकाम चीज़ है! काश वह उस ठंडी रात को लौटा सकता...एक नहीं सौ छडियां, दुनिया में जितनी भी हो सकती हैं वे सभी की सभी छडियां, ये सारी बेजान, बेमतलब चीजें देकर वह रात लौटा सकता|..पर कौन कह सकता है अब कि कहाँ है वह पानी, जो तब पुल तले बह रहा था, उस पुल तले, जिस पर वे दोनों खड़े थे और ऐसी बेतुकी दिखा कर अलग-अलग दिशा को चल दिए थे?

चेखव की ‘दुखद’ प्रेम कहानी


योगेंद्र नागपाल

एक बार चेखोव ने एक उपन्यास लिखने की सोची, विषय चुना “प्रेम”| महीनों तक लिखते रहे कितने ही पन्ने रंगे और फाड़े| अंततः सारा उपन्यास एक वाक्य में सिमट कर रह गया: “वे एक-दूसरे पर फ़िदा हुए, विवाह किया और अंत तक दुखी रहे!” चेखोव के मित्रों का कहना था कि चेखोव ने अपनी पत्नी – प्रसिद्ध अभिनेत्री ओल्गा क्निप्पेर के साथ अपने संबंधों का सारा मर्म इस वाक्य में उंडेल दिया|
एक बार चेखोव के एक मित्र, भावी नोबल पुरस्कार विजेता लेखक इवान बूनिन उनसे मिलने आए| चेखोव की तबियत ठीक नहीं थी, तपेदिक का कोप बढ़ गया था| उन्हें आराम करना चाहिए था| परन्तु दोनों लेखक साहित्य चर्चा में इतने मग्न थे कि उन्हें समय की कोई सुध-बुध ही नहीं थी| बात यह चल रही थी कि अच्छी रचना के लिए कथानक ढूँढ पाना कितना मुश्किल है| वे दोनों इस सिलसिले में अखबारों के पन्ने पलटने लगे, उनमें छपे विज्ञापनों पर चुटकियाँ लेते हुए ठहाके लगा रहे थे| तभी ओल्गा घर लौट आईं| सारा हंसी-मज़ाक छू-मंतर हो गया| “अच्छा, चलता हूँ,” बूनिन बोले और मित्र की पत्नी
को हाथ जोड़कर तुरंत चले गए| उन्हें वह बिलकुल नहीं सुहाती थीं| चेखोव के सगे-संबंधी, मित्र-परिचित, सहयोगी और पाठक – किसी को भी वह नहीं भाती थीं|
चेखोव स्वभाव से बड़े संयमी और शांत थे, हल्की मुस्कान के साथ ही वह सामान्यतः चुटकियाँ लेते थे| उधर ओल्गा थीं स्वभाव से खुशदिल, सदा खुले दिल से सबसे मिलती-जुलती थीं| एक ओर तपेदिक से पीड़ित चेखोव और दूसरी ओर सदा खिलखिलाती उनकी पत्नी – यह विरोधाभास लोगों को बहुत अटपटा लगता था| उनका उलाहना था कि इस सुन्दरी को अपने रोगी पति से अधिक नाटकों में अपनी भूमिकाओं को चिंता है| पति को अकेले सागर तट पर याल्टा में छोड़कर खुद मास्को में बैठी रहती है| जब जर्मनी में चेखोव चल बसे और पत्नी उनकी देह रेफ्रिजरेटर वाले रेलडिब्बे में मास्को लाई तो सारी दुनिया ने ही उन्हें दुत्कारा : छी-छी! कोई नेक इंसान भला ऐसे करेगा? ऑयस्टर और मछलियों भरे रेल-डिब्बे में पति का, रूस के महान लेखक का शव ले आई!
नहीं-नहीं कोई मछलियाँ या ऑयस्टर वगैरा उस रेलडिब्बे में नहीं थे| हां, यह सच है कि रेफ्रिजरेटर वाले ऐसे रेलडिब्बों में ही यूरोप में मछलियाँ आदि एक स्थान पर दूसरे स्थान तक भेजी जाती थीं| यही था इस स्त्री का भाग्य – कहीं ज़रा सी कोई चूक हुई, सोचे समझे बिना एक शब्द भी मुंह से निकल गया, बस तुरंत चारों ओर वह बात खूब बढ़ा-चढाकर फैलाई जाती थी, और मिलता था उसे धिक्कार ही धिक्कार! हां, थियेटर में जहां वह काम करती थीं, सभी जानते थे कि ओल्गा का बस चले तो वह एक दिन के लिए भी चेखोव को अकेले न छोड़े, क्योंकि इस धरती पर ओल्गा की नज़रों में चेखोव से अच्छा कोई इंसान नहीं था|
उसके पिता जर्मन थे जो रूस में आ बसे थे| यहाँ तरक्की करते हुए वह एक बड़ी मिल के मैनेजर बन गए थे| माता सधी हुई पियानोवादक थीं और उनका कंठ सुरीला था| उनके घर पर अक्सर संगीत-संध्याएं होती थीं| घर पर एक शौकिया थियेटर भी था और नन्ही ओल्गा उसकी दीवानी थी| रंगमंच का, थियेटर का सपना बचपन से ही उसके मन में बस गया था| परन्तु पि़ता को यह कतई मंजूर नहीं था कि बेटी अभिनेत्री बने| इसे तो वह परिवार पर कलंक ही मानते थे| ओल्गा अभी किशोरावस्था में ही थी कि अचानक पिता का देहांत हो गया| पता चला कि पिता का खाता तो खाली है| घर के गुज़ारे के लिए मां को संगीत विद्यालय में नौकरी करनी पड़ी| कुछ समय बाद मां की सिफारिश पर बेटी को इसी विद्यालय के अभिनय विभाग में दाखिला मिला|
ओल्गा सौभाग्यशाली थी – उसे जाने-माने रंगमंच-निर्देशक व्लादीमिर नेमिरोविच-दानचेंको के कोर्स में दाखिला मिल गया| विद्वान और प्रतिभावान शिक्षक ने ओल्गा को विमुग्ध कर लिया| जिन दिनों यह कोर्स चल रहा था, उन्हीं दिनों नेमिरोविच- दानचेंको अपने युवा अभिनेता मित्र कोंस्तान्तीन स्तानीस्लावस्की के साथ एक नया थियेटर खोलने की योजना बना रहे थे| तीन साल की पढ़ाई खत्म होते-होते ओल्गा समझ गई थी कि उसे अवश्य ही इस नए खुलने जा रहे “मास्को कला थियेटर” की मंडली में शामिल होना है| सन् 1898 की गर्मियों में मंडली पहली बार रिहर्सल के लिए जमा हुई, ओल्गा भी उसमें आमंत्रित थी| शुरू में तो मास्को के बाहर एक ग्रामीण घर के कोठारे में ही रिहर्सलें हुईं और फिर वे थियेटर के मंच पर जारी रहीं|
कुछ ही समय बाद नाटककार और अभिनेत्री की पहली भेंट भी हो गई| अपने नाटक “जलपंछी” (सी-गल) की रिहर्सल देखने चेखोव खास तौर पर इस नए थियेटर में आए थे| वह थे एक नामी लेखक, जिसकी कहानियां दस वर्षों से पाठकों को आनन्दित कर रही थीं| व्यक्तित्व उनका आकर्षक था, शरीर सुघड़ और चुस्त-दुरुस्त| हर बात में हास्य-व्यंग्य का पुट देखते थे, साथ ही शांत नज़रों में विवेक छलकता था| उन्हें देखकर कोई यह नहीं सोच सकता था कि वह तपेदिक के गंभीर रोग से ग्रस्त हैं| ओल्गा का नारी-हृदय तुरंत ही बोल उठा: यही है इस धरती का सर्वोत्तम पुरुष – इसी के साथ होगा जीवन सफल!
ओल्गा ने सुन रखा था कि वह डाक्टर हैं, यदि किसी के पास इलाज के लिए पैसे नहीं होते तो उसका इलाज मुफ्त में करते हैं, कि उन्होंने कई अस्पताल और स्कूल बनवाए हैं| इस सब के बीच में कुछ “लिखते-विखते” भी रहते हैं, कि वह चालीस बरस के होने वाले हैं, शादी उनकी कभी नहीं हुई, कहते हैं एकाकी हैं|...
चेखोव के अनेक समसामयिकों ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि न जाने कितनी महिलाएं उन पर फ़िदा हुई थीं, किंतु महिला-मन में उठते तूफ़ानों की उनके मन में प्रायः कोई प्रतिध्वनि नहीं होती थी| महिलाओं के प्रति उनके रुख में उदासीनता ही अधिक होती थी| यों तो रोमांस भी उनके बहुतेरे हुए, किंतु हर बार बड़ी जल्दी ही दिल उचाट हो जाता था और निराशा ही हाथ लगती थी|
ऐसा भी नहीं है कि शादी का ख्याल मन में कभी आया ही न हो| कई बार अपने सगों से उन्होंने यहाँ तक कहा कि बस जल्दी ही विवाह करने वाले हैं| परन्तु विवाह की उनकी अपनी कुछ शर्तें थीं| अपने एक मित्र को उन्होंने अपने मज़ाकिया अंदाज़ में लिखा था: “देखो भई, शादी मैं सिर्फ इस शर्त पर करूँगा कि शादी के बाद कुछ बदलेगा नहीं| वह मास्को में रहेगी और मैं गाँव में| मैं उसके पास जाया करूँगा| रोज़-रोज़, सुबह-शाम मिलने वाला सुख मैं नहीं झेल सकता|.. मुझे तो ऐसी बीवी चाहिए जो चाँद की तरह मेरे आसमान पर रोज़ाना नहीं दिखा करेगी|” ऐसी शर्त सुनते ही स्त्रियों का सारा प्यार तुरंत धुंए की तरह उड़ जाता था|
ओल्गा के साथ चेखोव के संबंध शुरू से ही दूसरी सभी स्त्रियों के साथ संबंधों से भिन्न रहे| वह सुंदरी नहीं थी, बहुत जवान भी नहीं थी – उनतीस वर्ष की हो चुकी थी| किंतु उसमें जो उल्लास और उत्साह था, वह मानो चेखोव के जीवन में भी नई स्फूर्ति भरता था| वह सुशिक्षित थी, तीन विदेशी भाषाएँ जानती थी, विश्व साहित्य और इतिहास का उसे अच्छा ज्ञान था, साहित्यिक अनुवाद भी करती थी| सदा हंसमुख नज़र आती थी, और उसकी हर बात में नफासत थी| वह जहां आती वहां खुशी फ़ैल जाती| एक और बात थी जिसने चेखोव को उसकी ओर आकर्षित किया – वह प्रतिभावान अभिनेत्री थी| नाटक कला की सारी परम्पराओं को तोड़ते हुए चेखव ने एकदम नए नाटक रचे थे, इन नए नाटकों के लिए अभिनय कला भी नई चाहिए थी| ओल्गा में उन्हें इसी के बीज पनपते दिखे|
यहां यह भी बता दें कि शुरू में तो चेखोव के ये नए नाटक एकदम विफल रहे थे, हालांकि मास्को और पीटर्सबर्ग के उस ज़माने के अव्वल रंगमंचों पर उन्हें पेश किया गया और अपने समय के सबसे जाने-माने कलाकारों ने उनमें भाग लिया| सौभाग्यवश निर्देशक कोंस्तान्तीन स्तानीस्लावस्की ने चेखोव को इस बात के लिए मना लिया कि वह उन्हें अपने नाटक के मंचन का एक अवसर दें| जी हां, ये वही स्तानीस्लावस्की थे, जिनकी प्रणाली से आज संसार भर में अभिनय कला की शिक्षा दी जाती है| प्रीमियर शो आरम्भ हुआ – हाल आधा खाली था| जब तक नाटक चलता रहा, हाल में सन्नाटा छाया रहा| आखिर पर्दा गिरा, एक क्षण को वही सन्नाटा बना रहा, परन्तु फिर मानो बादल गरजा – हाल तालियों की गूंज से कांप उठा| कुछ लोग तो कुर्सियों पर चढ़ गए – यह देखने कि लिए कि कौन है यह ओल्गा क्निप्पर, जिसका पहले कभी नाम नहीं सुना| इस शाम के बाद चेखोव का ओल्गा से रोमांस शुरू हुआ|.. उनकी सेहत उन्हें ज्यादा दिन मास्को की ठंडी, सीलन भरी जलवायु में रहने की इजाज़त नहीं देती थी, समुद्री जलवायु में रहना ही उनके लिए उपयुक्त था| वह याल्टा चले गए और वहां से चला पत्रों में रोमांस।
अपने मनोभाव खुलकर व्यक्त करना चेखोव को पसंद नहीं था, तो भी विवाह से कुछ महीने पहले, सितम्बर 1900 में उन्होंने ओल्गा को लिखा: “... नहीं जानता तुम्हें और क्या कहूं, सिवाय उसके जो लाख बार कह चुका हूं और सदा कहता रहूंगा, कि मैं तुमसे प्यार करता हूं, बस और कुछ नहीं”|
अंततः वे विवाह-सूत्र में बंध गए, किंतु अपने विवाह की बात दोनों ने गोपनीय रखी| यह चेखोव की शर्त थी| “पता नहीं क्यों इन सारी रस्मों से मुझे डर लगता है, शैम्पेन का जाम उठाए लगातार मुस्कराते रहो, सबकी बधाइयां सुनते रहो”| विवाह से एक घंटे पहले अपने सगे भाई से अचानक उनकी मुलाकात हो गई थी, उसे भी उन्होंने नहीं बताया कि विवाह करने जा रहे हैं| अपनी बहन को कुछ दिन बात उन्होंने लिखा: “मैंने शादी कर ली है| लेकिन मेरे इस कदम से मेरी जिंदगी में कुछ बदलने वाला नहीं है|”
मई 1901 में विवाह हुआ, अगस्त तक पति-पत्नी साथ रहे और फिर शुरू हो गया जुदाई और मिलन का सिलसिला| आए दिन वे एक दूसरे को पत्र लिखते थे| भाग्य ने उन्हें केवल छह वर्ष दिए थे एक दूसरे के लिए| इस बीच चेखोव ने ओल्गा को साढ़े चार सौ पत्र लिखे और ओल्गा ने भी चार सौ से अधिक|
ओल्गा ने अनेक बार कोशिश की कि लंबे समय तक चेखोव के साथ तक याल्टा में रहे, पर वह इसके लिए तैयार नहीं होते थे, ओल्गा को बस यही समझाते थे कि थियेटर के हित में उनके लिए मास्को में रहना ही ठीक है| कहना न होगा कि अपने मन की इस भावना को वह प्रकट नहीं होने देते थे कि “रोज़-रोज़, सुबह-शाम मिलने वाला सुख मैं नहीं झेल सकता|..”
कभी-कभी ओल्गा विद्रोह कर देती थी “यह भी कोई ज़िंदगी हैं भला!” पर चेखोव का उत्तर होता था: “ सुनो, जान, पहले दिन से ही मुझे पता था कि मैं ऐक्ट्रेस से शादी कर रहा हूँ| विवाह से पहले ही मैं अच्छी तरह समझता था कि सारा जाड़ा तुम्हें मास्को में बिताना होगा| पर मैं रत्ती भर भी यह नहीं मानता कि मैं कोई अभागा हूं, बदकिस्मत हूं, नहीं, मुझे तो यही लगता है कि सब ठीक चल रहा है|”
ऐसे विचित्र हालात मे रहते हुए भी पति-पत्नी दोनों संतान के लिए लालायित थे| सन् 1902 के वसंत में ओल्गा समझ गई कि उसका पांव फिर से भारी हो गया है| इससे पहले एक बार गर्भ गंवा चुकी थी| इस बार वह अपना बहुत ख्याल रख रही थीं| उसने थियेटर से छुट्टी भी मांग ली| पर थियेटर वालों ने कहा, छुट्टी पर जाने से पहले बस एक बार पीटर्सबर्ग में नाटक दिखा दें| यहां जब नाटक चल रहा था तो मंच पर एक मैनहोल खुला रह गया... ऑपरेशन के बाद डाक्टरों ने कह दिया कि अब वह कभी मां नहीं बन पाएंगी|
ओल्गा उन व्यक्तियों में से नहीं थीं जो किस्मत की मार खाकर हार मान लेते हैं| जीवन में खुशी पाने को वह अभी भी आतुर थीं| लगता था बस वह क्षण भी आ गया| पहले तो मास्को में जब किसी नए नाटक का पहला मंचन होता था उन्हीं दिनों उनके पति उनके साथ होते थे, मगर इस बार उन्होंने लंबे समय तक पत्नी के साथ रहने का निश्चय किया| किंतु सुख ने एक बार फिर दगा दे दिया| जिस दिन चेखोव मास्को पहुंचे उसी दिन उन्हें ज़बरदस्त सर्दी लग गई और उससे तपेदिक का रोग इतना उग्र हो गया कि डाक्टरों ने तुरंत उन्हें दक्षिण जर्मनी में श्वास रोगियों के लिए बने विशेष स्वास्थ्य-विहार में ले जाने को कहा| ओल्गा ने थियेटर से लंबी छुट्टी हासिल कर ली| अब अंततः वह पति के साथ थीं, परंतु उनके भाग्य में यह सुख लिखा होता तब न!
शुरू में तो लगा चेखोव स्वास्थ्य लाभ पा रहे हैं| वह ओल्गा के साथ टहलने निकलते थे या फिर वह उन्हें पहिया-कुर्सी में बिठाकर घुमाती थीं| फिर अचानक चेखोव की हालत बहुत बिगड़ गई| वह बुरी तरह दुबला गए, चेहरे पर मानो खून का एक कतरा तक न बचा था| सारा-सारा दिन वह सोफे पर लेटे रहते थे - अगल-बगल तकिए लगे हुए, कम्बल में लिपटे| 14 जुलाई 1904 की रात को चेखोव ने डाक्टर को बुलाने को कहा| उसे जर्मन भाषा में कहा: “Ich sterbe” – “मर रहा हूँ”| डाक्टर ने रोगी को देखा, शैम्पेन पिलाने को कहा| चेखोव ने शैम्पेन का गिलास लिया, ओल्गा की ओर देखकर मुस्कराए और बोले : “बड़े दिनों से शैम्पेन नहीं पी”| ओल्गा भी उन्हें देखकर मुस्करा रही थी, उसे सहसा यह याद हो आया था कि शादी से पहले कैसे चेखोव शैम्पेन पीने से घबराते थे| उस रात को भी उसे यह विश्वास नहीं था कि उसके 44 वर्षीय पति दम तोड़ रहे हैं| उसे पता ही नहीं चला कब उनके सांस रुक गए – वह न जाने कहाँ से कमरे में आ पहुँचे बड़े-से काले पतंगे को भगाने में लगी हुई थी, जो बिजली के बल्ब पर मंडराता हुआ अपने पंख झुलसा रहा था| चेखोव ने शैम्पेन का गिलास खाली किया, करवट बदली और चिर-निद्रा में सो गए|..
पति की मृत्यु के बाद ओल्गा कई महीनों तक थियेटर नहीं गईं, बस घर में बंद बैठी रहती थीं| परन्तु उनकी प्रकृति तो खाली बैठने वालों की नहीं थी| फिर से थियेटर में उन्हें नई-नई भूमिकाएं मिलीं, उनकी कला के दीवानों की कोई कमी नहीं थे| अब वह स्वयं भी अभिनय-कला के पाठ देने लगी थीं| 91वर्ष का लंबा जीवन रहा उनका| अंतिम वर्ष में तो उनके लिए बिस्तर से उठ पाना भी मुश्किल हो गया था| बहुत मोटे, बड़े लैन्स की मदद से ही वह कुछ पढ़ पाती थीं| सांस लेने में भी उन्हें कठिनाई होती थी| अकेली रह गई थीं वह – एकदम एकाकी| पर सदा सजीली और नफीस नज़र आती थीं| आखिरी दिन तक जब कोई उनसे मिलने आता तो उनके घर में घुसते ही उसे उनकी खनकती आवाज़ सुनाई देती : “अरे, वाह! यह कौन आ गया! जी खुश कर दिया!”
चेखोव के जाने के बाद 55 वर्ष तक वह जीवित रहीं| एक महान लेखक-नाटककार की पत्नी के नाते ही नहीं, बल्कि चेखोव के नूतन थियेटर की सबसे अच्छी, सबसे अनोखी अभिनेत्री के रूप में भी उन्होंने इतिहास में अपना स्थान बनाया| “तीन बहनें” नाटक की माशा और “चैरी की बगिया” की रनेवस्कया की भूमिका ओल्गा के लिए ही चेखोव ने लिखी थीं| ओल्गा उन्हें ऐसे निभाती थीं कि दर्शक स्तब्ध रह जाते थे, अवाक हो जाते थे| उनका अभिनय अभिनय नहीं होता था – वह पूरी तरह अपने पात्र में ढल जाती थीं।

मिशन मून - पल्लव बागला/सुभद्रा मेनन


डा. रीता सिंह

एक समय वह था जब मां अपने बच्चों को बहलाने के लिए पानी भरे किसी पात्र में चांद उतार देती और बच्चा यह सोचकर खुश हो जाता कि चंदा मामा उसके पास आ गए हैं। कई सौ वर्षों की इस परम्परा में चांद तो अंतरिक्ष में वहीं है लेकिन अब मानव ने अपनी कल्पना को साकार करते हुए उस पर कदम रख दिए हैं। "मिशन मून" में उसी परिकल्पना से प्रक्षेपण तक के चंद्र मिशन की जानकारी दी गई है। अंग्रेजी की "बेस्ट सेलर" पुस्तक रही "डेस्टीनेशन मून" के लेखकद्वय पल्लव बागला और सुभद्रा मेनन को पुस्तक का हिंदी भाषा में अनुवाद अरुण आनंद ने किया है।
लगभग एक दशक पहले जब कुछ वैज्ञानिकों ने इस तरह का प्रस्ताव किया था तो उसे अति आशावादी करार दिया गया था। लेकिन मात्र एक दशक में भारतीय वैज्ञानिकों ने इस परिकल्पना को साकार कर दिया। इस पुस्तक में उसी उपलब्धि की गाथा को वर्णित किया गया है। पुस्तक में प्रारम्भ में ही डा. कस्तूरीरंगन और डा. जी. माधवन नायर की सारगर्भित भूमिकाएं इसे और भी महत्वपूर्ण बनाती हैं। यह पुस्तक भारत या दूसरे देशों के अंतरिक्ष कार्यक्रमों और उनकी उपलब्धियों की जानकारी ही उपलब्ध नहीं कराती है और न केवल इसमें अंतरिक्ष कार्यक्रमों से संबंधित अब तक की सफलताओं और असफलताओं का विश्लेषण किया गया है। बल्कि इसमें भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियों का सहज शैली में वर्णन किया गया है। यह पुस्तक अंतरिक्ष अन्वेषण के मार्ग में उपलब्ध हुए रोमांचक अनुभवों का संकलन है।
पुस्तक के प्रथम अध्याय "अज्ञात की खोज में: चंद्रमा का उद्गम और पानी की तलाश" में चंद्रमा के संबंध में प्राचीन और पौराणिक मान्यताओं के विषय में बताया गया है। साथ ही चंद्रमा के निर्माण और उसके अस्तित्व संबंधित परिकल्पनाओं पर भी मिथकीय और वैज्ञानिक धारणाएं दी गई हैं।
पुस्तक के दूसरे अध्याय "भारतीय मानस में चंद्रमा" में पृथ्वी के इस इकलौते उप ग्रह से संबंधित धार्मिक मान्यताओं के विषय में संक्षिप्त प्रकाश डाला गया है। विदेशों में भी चांद को लेकर किस तरह की अवधारणाएं प्रचलित रही हैं, इसको भी संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है। चंद्रमा पर आधारित कैलेंडर, उससे संबंधित पर्व और उत्सवों के बारे में भी बताया गया है।
पुस्तक के तीसरे अध्याय "विश्व के अभियान: वर्तमान से भूतकाल में" को इस लिहाज से महत्वपूर्ण कहा जा सकता है क्योंकि इसमें विभिन्न देशों (मुख्यत: सोवियत संघ और अमरीका) के द्वारा चलाए गए चंद्र अभियानों की विस्तृत जानकारी दी गई है। इसी क्रम में पुस्तक के अगले अध्याय "समताप मंडल से आगे: भारत का अतंरिक्ष कार्यक्रम" में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के व्यावसायिक और जनकल्याण से जुड़ी उपलब्धियों का वर्णन किया गया है। इसके साथ ही इस अध्याय में डा. विक्रम साराभाई के अमूल्य योगदान और अंतरिक्ष कार्यक्रमों में भारतीय उपलब्धियों पर भी विस्तार से चर्चा की गई है। पुस्तक के पांचवें अध्याय "चंद्रयान: भारत का चंद्रमा पर निशाना" को सबसे महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। इसमें चंद्रयान की योजना बनाने से लेकर उसके प्रक्षेपण तक की प्रक्रिया को बड़े ही रोचक अंदाज में लिखा गया है। पुस्तक के अंतिम अध्याय में उन आगामी संभावनाओं और उपलब्धियों की विस्तृत चर्चा की गई है, जो आने वाले वर्षों में सच्चाई के रूप में हम सबके सामने होंगी। इन अभूतपूर्व उपलब्धियों के साथ ही उपसंहार में यह भी कहा गया है कि चंद्रमा और अंतरिक्ष को प्रदूषित होने से रोकने के उपाय पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। पुस्तक के अंतिम खण्ड में संकलित तीन परिशिष्ट इसे और भी महत्वपूर्ण बनाते हैं। इसरो अध्यक्ष डा. जी. माधवन नायर, नासा प्रशासक डा. माइकल ग्रिफिन और सेंटर ऑफ स्पेस साइंस, चीन के निदेशक डा. वू.जी. के साक्षात्कार, चंद्रमा और अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को स्पष्ट करते हैं। कहा जाना चाहिए कि यह पुस्तक चंद्रमा ही नहीं बल्कि अतंरिक्ष से संबंधित भारतीय अभियानों को कल, आज और आने वाले कल के बारे में विस्तृत जनकारी उपलब्ध कराती है।

एक कुंवारी लड़की का आत्म-संवाद



पूनम सिंह

गहरी थकान और हताशा लिये
लौट आये हैं पिता
झुके कंधे गर्द भरे चेहरे पर
आहत उम्मीदों की लहूलुहान खरोंचे
आँखों के कोये में
समुद्री नमक का भहराता टीला
होठों पर मुर्दा चुप्पी लिये
सपनों की शव यात्रा से
राख की गंध में लिथड़े
पिता के चेहरे की ओर कैसी कातर
कितनी असहाय आँखों से देखती है माँ
किस अतल से निकला है
यह निःश्वास
जिसमें मौत सी ठंडक है
ओ माँ! मैं कहाँ जाऊँ
किस पाताल कुँए में डूब मरूँ-बोलो?
क्यों नहीं आती मुझे मौत
जब बेमौत मरते हैं इतने लोग
आता है भूचाल
दरक जाती है धरती
औंधा गिर जाता है आसमान
नमक पानी के पारावार में
तिनके सी बह जाती है जिन्दगी
तब ऐसा कोई सुनामी
मुझे क्यों नहीं बहा ले जाता माँ
क्यों? क्यों?
मैं हरगिज नहीं चाहती पिता की साँस में
फाँस बनकर जीना
तुम्हारी छाती पर अडिग पहाड़ बनकर रहना
भाभी की आँखों में शूल की तरह चुभना
भाई की अनकही पीड़ा में
पतझड़ के उदास रंग की तरह दिखना
लेकिन मैं क्या करूँ माँ
मेरे बस में नहीं है
यह सब न होना
कभी कभी
इस घर की ढहती दीवारों से लगकर
खड़ी मैं सोचती हूँ
क्या मुझे अपनी लड़ाई लड़े बिना
हार मान लेनी चाहिए?
अपनी इच्छाओं
अपने सपनों की पहरेदारी पर
कोई सवाल नहीं करना चाहिए?
माँ! मैं जानना चाहती हूँ तुमसे
इस आँगन के उस पार
वह जो एक बहुत बड़ी दुनिया है
जीवन के समानान्तर
क्या उसे देखने का मुझे कोई हक नहीं?
मुझे बताओ माँ क्यों चढ़ी है आज भी
इस घर की ड्योढ़ी पर
इतनी मजबूत सॉकल
जिसे हिलाते हुए
कटी डाल की तरह झूल जाती हैं मेरी बाँहें
थक जाता है मेरा हौसला
माँ मैं तुम्हारी तरह
किसी जर्जर हवेली की बदरंग दीवारों पर
लतरबेल बनकर नहीं पसरना चाहती
मैं पीपल बरगद आम कटहल की तरह
पूरा का पूरा एक पेड़ बनना चाहती हूँ
इच्छाधारी अस्तित्वधारी एक पेड़
तुम देख रही हो किस तरह
ठूँठ हो गये हैं आज
पुरखों के लगाये सब पेड़
कब तक इनकी सूखी जड़ों में पानी देती तुम
अपने लगाये पेड़ों को
निपात होते देखती रहोगी
बोलो मां बोलो ??

हाऊ प्रूस्त कैन चेंज योर लाइफ - मार्शल प्रूस्त



अनुराग वत्स

ऐसी कई किताबें हैं जिसे आप मनोरंजन के लिए या खाली समय काटने के लिए पढ़ते हैं। लेकिन, ऐसी किताबें भी हैं जो पढ़ते-पढ़ते आपके जीवन में चुपचाप जगह बना लेती हैं। फ्रेंच उपन्यासकार मार्शल प्रूस्त का सात खंडों में लिखा गया उपन्यास इन सर्च ऑफ लॉस्ट टाइम इसी कैटिगरी की किताब है। प्रकाशन के लगभग सौ साल बाद भी पढ़ने वालों की जिंदगी में इसकी खास जगह है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इसमें प्रूस्त ने हमारी जिंदगी के हर उस पहलू को छुआ है जिससे व्यावहारिक जिंदगी में हमारा बहुत गहरा रिश्ता है।
एलन डी बोटॉं ने अपनी किताब -हाऊ प्रूस्त कैन चेंज योर लाइफ- में प्रूस्त के उस उपन्यास और जीवन प्रसंगों से एक ऐसा ताना-बाना बुना है जो पढ़ने वालों के लिए प्रेरक हो सकती हैं। आज के दौर में अपनी जिंदगी से कैसे प्रेम करें, अपने को कैसे परखें, अपना समय कैसे बिताएं, अपने दुखों को कैसे सफलतापूर्वक झेलें, अपनी भावनाओं को कैसे प्रकट करें, कैसे अच्छे दोस्त बनें और कैसे प्रेम में खुश रहें सरीखे शीर्षकों से बोटॉं ने एक ऐसी पठनीय किताब तैयार की है जिसे साहित्य में दिलचस्पी रखने वाले पाठक से लेकर सेल्फ हेल्प सीरीज पढ़ने के शौकीन समान रूप से पसंद करेंगे।
किताब की सबसे अच्छी बात यह है कि बोटॉं ने हर चैप्टर में अपनी बातों की पुष्टि के लिए अनेक प्रासंगिक उदाहरणों को जगह दी है। बोटॉं का यह काम इस लिहाज से भी अपने तरह का अनूठा काम है क्योंकि आज के दौर में साहित्य या लेखक को सीधे-सीधे हमारे दैनिक जीवन को बदलने या बेहतर बनाने वाले कारकों के रूप में कतई देखा-समझा नहीं जाता है। यह किताब इस बात की पुरजोर ताईद करती है कि साहित्य की जगह चाहे हाशिए की क्यों न हो, अगर उसे हिसाब में लिया जाए तो वह हमारी जिंदगी को बदलने में सक्षम है।

चुनिंदा अंश 

- जिंदगी जीने का एक नजरिया यह भी हो सकता है कि हम मानें कि अंतत: हम नश्वर मनुष्य ही हैं और मौत हमारे द्वार पर कभी भी दस्तक दे सकती है।
- जब हम किसी किताब को पढ़ते हैं तो हमारे भीतर आत्मा के कुछ पन्ने भी फड़फड़ाते हैं।
- जब दो लोगों के बीच कोई संबंध टूट जाता है तो सबसे ज्यादा भावुक बातें वह व्यक्ति करता है जिसे इसकी परवाह तक नहीं होती।
- अपने जीवन प्रसंगों को आप जितना खींचते हैं, वह उतना ही वह आपके लिए फैलता जाता है। किसी प्रसंग को उसका वाजिब समय और जगह देकर समाप्त कर देना चाहिए।
- हम दुखों पर जब विचार करते हैं तो उनकी हमारे दिलों को ठेस पहुंचाने की क्षमता घटने लगती है।
- आपसे जो भिन्न है उसमें आपकी तरह का इंटलेक्ट होना महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है उसकी सचाई, उसकी सहृदयता।
- किसी किताब को पढ़ते हुए आप दोस्ती के मायने आसानी से जान सकते हैं, क्योंकि किताब के साथ आपका संबंध बहुत अनिवार्य किस्म का होता है, उसमें कोई झूठा दिखावा नहीं होता। किसी के कहने पर आप किसी किताब को नहीं पढ़ते, वह आपकी इच्छाओं से प्रेरित होता है।
- किसी के प्रेम में पढ़ने की वजह यह नहीं होती कि सामने वाला बेहद सुंदर है, बल्कि प्रेम मामूली वजहों से शुरू हो सकता है। मसलन आप किसी से यह पूछें कि क्या तुम आज शाम फ्री हो और उसका जवाब, फिर वह चाहे हां या ना में हो, आपके मन में उसके लिए जगह बनाता जाए।
- हमारे मन में उन चीजों की चाहत बराबर बनी रहती है जिसे पाने का स्वप्न हम देखते हैं, लेकिन वही चीजें जब आसानी से मिल रही होती हैं तो हममें कुछ अचीव करने का बोध तक नष्ट हो जाता है।