Wednesday, 24 July 2013

'साहब बीवी गुलाम' के जादूगर विमल मित्र


संजय

विमल मित्र हिन्दी साहित्य के सुधी पाठकों के मध्य चिर-परिचित नाम है।  बंकिमचंद्र, शरदचंद्र के पश्चात् बंग्ला के सबसे जनप्रिय लेखक जो हिन्दीभाषी क्षेत्र में बड़ी आत्मीयता के स्वीकार किये गये हैं।  आज कल साहित्य क्षेत्र में चलने वाली गुटबाजी, अवसरवादिता के मध्य हमारे पुराने साहित्यकारों की विनम्रता बरबस याद आ जाती है। अमृत लाल नागर ने जब अपनी कालजयी कृति खंजन नयन पूर्ण की तो बड़ी विनम्रता के साथ अपनी यह कृति बंग्ला के यशस्वी लेखक विमल मित्र को समर्पित किया। डॉ. धर्मवीर भारती विमल मित्र के मित्र भी थे और उनकी कथा कहने की अद्भूत कला के प्रशंसक भी थे।  विमल मित्र की पत्नि आभा मित्र के अनुसार ‘‘जब भी भारती जी कलकत्ता आते,  विमल मित्र से लंबी साहित्य चर्चा होती।’’  महान् निर्देशक गुरूदत्त ने जब विमल मित्र की कालजयी कृति ‘ साहब बीबी गुलाम’ पढ़ी तो पुनः पढ़ी और उनके अनुसार कुल ग्यारह बार। गुरूदत्त के अन्तर मन में छोटी बहू का चरित्र समा गया। उसकी पीड़ा  यथा उनके संवेदनशील मन को मथती रही और जो नवनीत निकलकर आया वो था उनकी कालजयी हिन्दी फिल्म  ‘साहब बीबी गुलाम’।  गुरूदत्त बने भूतनाथ और मीना कुमारी ने निभाया छोटी बहू का अविस्मरणीय चरित्र। ये था विमल मित्र की लेखनी का बंगाल का जादू। विमल मित्र के शब्दों में ‘‘बंग्ला पत्र देश ने मेरे उपन्यास ‘साहब बीबी गुलाम’ को धारावाहिक रूप में छापना शुरू किया तो बंग्ला में जमे हुए कुछ साहित्यालोचकों,  लेखकों ने मेरी खूब खिल्ली उड़ायी।  तभी दिल्ली से एक प्रकाशक का पत्र आया कि वह हिन्दी में उसे अनूदित कर छापना चाहता है मैंने सोचा बंग्ला में ही मुझे जूते पड़ रहे हैं हिन्दी वाले पता नहीं क्या करेंगे?  इस भय से मैंने उसको कोई जवाब नहीं भेजे। तीन साल बाद मालूम पड़ा कि उसने मेरी अनुमति के बिना ही वह उपन्यास छाप दिया और मैं रातों-रात हिन्दी पाठकों का प्रसिद्ध लेखक बन गया। मैंने पाया कि हिन्दी भाषा-भाषी दूसरों की अपेक्षा अन्य भाषा-भाषियों को अपनाने में अधिक उदार और सहृदय होते हैं।‘‘
विमल मित्र के परिवार से मेरे घनिष्ठ आत्मीय संबंध रहे हैं। उनकी पत्नि आभा मित्र को मैं मां कहकर संबोधित करता था। उनकी बेटी शकुंतला मित्र (बसु) व उनके पति ने अब तक संबधों को आत्मियता से निभाया है। सन् 1993 में चेतला सेन्ट्रल रोड कोलकाता स्थित विमल मित्र के निवास स्थान में  उनकी  पत्नि  आभा  मित्र  का इंटरव्यू रिकार्ड किया था जो भी मेरे पास सुरक्षित है।  उन्होंने अपने पति के संस्मरणों को लिखा है जो बांग्ला में प्रकाशित हुआ है।  डॉ. धर्मवीर भारती, विमल मित्र के घनिष्ठ मित्र सुप्रसिद्ध गायक हेमंत कुमार, गुरूदत्त से जुड़ी अनेक स्मृतियां और मेरे गृह नगर बिलासपुर जहां विमल मित्र ने रेलवे में नौकरी करते हुए अनेक वर्ष व्यतीत किये सबकुछ का उल्लेख आभा मित्र ने मुझे दिये हुये अपने अंतिम इंटरव्यू में किया है। उस पुरानी रिकार्डिंग को सुनना मानो बीते सुनहरे समय की यात्रा। छत्तीसगढ़ का लोक जीवन विमल मित्र को बहुत प्रभावित किया था।  उनकी अनेक उपन्यास,  लघुकथाओं में छत्तीसगढ़ के लोक जीवन का सजीव चित्रण है। उनकी बहुचर्चित उपन्यास सुरसतियां छत्तीसगढ़ के लोक जीवन का प्रतिबिम्ब है विमल मित्र ने आजीवन लिखा। साहित्य के लिए सर्वस्व न्यौछावर किया। जब रेलवे की नौकरी छोड़ी तो उनके समक्ष अपने परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी निभाने का यक्ष प्रश्न था किन्तु उनके लिए सब कुछ साहित्य ही था।  इस कथा पुरूष के जन्म शती वर्ष में उनका स्मरण सृजन कर्ताओं में आत्मबल पैदा करेगा, क्योंकि विमल मित्र की तरह साहित्य के लिए सब कुछ छोड़ने का साहस विरले ही कर पाते हैं। साहित्य साधना उनके लिए निष्काम कर्म था। उनके अनुसार पाठक ही सर्वोपरि है।  पुरस्कार या सम्मान का फैसला करने वाले मठाधीश नहीं है। अंग्रेजी अखबार द स्टेट मेन को दिए अपने साक्षात्कार में वे कहते हैं -  “Chekhov died in 1904 and Tolstoy in 1910 without being considered for the Nobel Prize. But one Sully Prudhomme recevied the first Nobel Prize for the literature in 1901. Who remembers  सचमुच टॉलस्टाय को नोबल पुरष्कार नहीं मिला किन्तु विश्व साहित्य में उनका स्थान अमर है। इतने वर्ष पश्चात् भी उनको पढ़ा जाता है।
शायद भारत वर्ष के पिछले 400 वर्षों के इतिहास,  समाज,  राजनैतिक व्यवस्था में आये बदलाव को समझना हो तो विमल मित्र से बेहतर कोई नहीं।  ‘बेगम मेरी विश्वास’ कथा है उस काल की जब अंग्रेज भारत में अपने पैर जमाने का अथक प्रयास कर रहे थे।  ‘साहब बीबी गुलाम’ कथा है, छोटे जमीदारों के ऐशो-आराम की, स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रारंभिक प्रयासों की, सांस्कृतिक पुर्नजागरण और कलकत्ता जैसे महानगरों के सांस्कृतिक व आर्थिक केन्द्र बनने की। ‘खरीदी कौड़ियों के मोल’ कथा है स्वतंत्रता पूर्व से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् के भारत की। सब कुछ बदला किन्तु मानव  चरित्र तो वैसा ही है,  केवल नाम का अंतर है। विमल मित्र के अनुसार जनसाधारण के चरित्र गुण से राज्य की स्थापना होती है,  जनसाधारण के चरित्र दोष से राज्य नष्ट होता है शासक तो निमित्त् मात्र है। विमल मित्र सच्चे अर्थों में जन लेखक थे।  उनकी उपन्यास ‘इकाई दहाई सैकड़ा’ को पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रॉय ने प्रतिबंधित किया था। सच कहने की विमल मित्र ने बड़ी कीमत चुकायी। उन्हें बंगाल सरकार द्वारा काली सूची में डाला गया तथा सरकारी सम्मान पुरस्कार आदि से वंचित किया गया। बंग्ला साहित्य कथा कहने की जो कला बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय से प्रारंभ होती है शरदचंद्र,  आशापूर्णा देवी से होती हुई विमल मित्र तक पहुंच कर पूर्ण परिपक्वता प्राप्त कर लेती है।  ‘बेगम मेरी विश्वास’ में बंग्ला साहित्य में उपन्यास लेखन की पूर्ण परिपक्वता झलकती है। प्रारंभिक बंग्ला साहित्य में कथा नायक अथवा नायिका की कथा होती थी। विमल मित्र केवल पात्रों की कथा नहीं कहते, उनकी कथायें उस कालखण्ड की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक पृष्ठभूमि का प्रतिबिम्ब भी है। पात्रों का चुनाव और उनसे जुड़े घटनाचक्र को सविस्तार कहने की विलक्षण कला विमल मित्र के पास थी। वे जितने महान लेखक थे उतने ही अच्छे पाठक भी थे। कलकत्ता के नेशनल लाइब्रेरी में वे घंटों अध्ययन करते तथा अपनी उपन्यास के लिए शोध आलेख तैयार करते। उनके पाठक उनके पात्रों के विषय में एैसे चर्चा करते हैं मानों वे उन्हें वर्षों से जानते हो, उनसे परिचित हो। विमल मित्र के जन्म शती वर्ष में उनका स्मरण युवा लेखकों को प्रेरणा देगा यही हमारी मान्यता है। साहित्य के लिए सर्वस्व समर्पण और निष्काम साधना उन्हें अमरता प्रदान कर गई।

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