Thursday, 1 December 2016

कवि-विश्व की नई दस्तक 'कविकुंभ'

'गंगा-जमुनी शब्द आओ मेरे पास, जो बुलाएं, जाओ उनके पास भी',.........आज के घिरे-बिखरे शब्द-समय में सृजन-विश्व के लिए यह है, मासिक हिंदी पत्रिका 'कविकुंभ' का प्रथम भावाचमन। सविनय आवाहन। आप सुधी, सुरुचि के रचनाधर्मी हैं। आशा है, ये शब्द आपके लिए भी विश्वसनीय और स्वीकार्य होंगे। अपने नवोदित शब्द-प्रवाह में हिंदी कवियों, साहित्यकारों की यह पहली ऐसी मासिक पत्रिका है। लेखनी और मंच का पहला विश्व समागम। एक सुखद साझा महाभियान। तो आइए, आप भी, 'कविकुंभ' के इस महान अभियान में अपने शब्दों के साथ। देश के हिंदी-उर्दू बहुल बारह राज्यों में अपने शब्दों के एक साथ पढ़े जाने पर आप को भी अपने रचनाकर्म पर गर्व, प्रसन्नता होगी। हमारी आकांक्षा है कि इस नये शब्द-विश्व में देश-विदेश के लोकप्रिय कवयित्री-कवियों, शायरा-शायरों साहित्यकारों के साथ आपका भी शब्द-सहकार 'कविकुंभ' परिवार का संबल बने। भिन्न सामग्री-संचयन और विशिष्ट पहचान लिए 'कविकुंभ' शब्दों का नया जनज्वार है। अपनी अनवरत, अबाध उपस्थिति के लिए इसकी पृथक-पृथक ऐच्छिक, आजीवन, वार्षिक सहयोग राशि अपेक्षित है। आपकी सहर्ष सहमति 'कविकुंभ' परिवार की प्रेरणास्रोत होगी। [RNI REFERENCE NO.: 1297933  DM NO.: 456]    
ई-मेल संपर्कः kavikumbh@gmail.com
संपादक, 'कविकुंभ'

Monday, 21 November 2016

यह किताब जरूर पढ़िए- सुब्बाराव

पिछले दिनो दिल्ली में अलख घुमक्कड़ एवं देश-विदेश के लाखों युवाओं के प्रेरणा स्त्रोत एस एन सुब्बराव (सेलम नानजुदैया सुब्बराव) से मुलाकात हुई। मेरी पुस्तक 'मीडिया हूं मैं' के पन्ने उलटने-पलटने के बाद उनकी टिप्पणी थी- 'अपने समय की सच्चाई जानने के लिए मीडिया के बारे में निर्भीकता से लिखी यह किताब आज के युवाओं को एक बार जरूर पढ़ लेनी चाहिए।' सुब्बाराव अपनी शिविर-यात्राओं के दौरान होटलों या गेस्ट हाउस में नहीं, युवा साथियों के घर में ठहरते हैं। वह बताते हैं कि पिछले दिनो तिब्बत-नेपाल आदि के साढ़े चार सौ बच्चों को उन्होंने शिक्षकों एवं परिजनों के दबाव से कुछ दिन मुक्त रखने के लिए छत्तीसगढ़ बुलाया, उन्हें साढ़े चार सौ घरों में अलग-अलग ठहराया ताकि वह हमारे देश की सांस्कृतिक समरसता में घुल मिल सकें। वे बच्चों विभिन्न समुदायों के थे। एक जमाने में सुब्बाराव की चंबल घाटी के डाकुओं के आत्मसमर्पण कराने में भी उल्लेखनीय भूमिका रही है। उन्होंने अपने भजन सुनाकर, परिजनों को रोजगार दिलाकर माधो सिंह, मोहर सिंह जैसे डाकुओं का दिल जीता था। सीमित संसाधनों में जीने वाले सुब्बाराव ने विवाह नहीं किया।, न अपना घर बनाया, बसाया। वह एक साथ 25 हजार नौजवानों तक के शिविर लगा चुके हैं। वह अमेरिका, जर्मनी, जापान, स्वीटजरलैंड आदि के अप्रवासी भारतीय परिवारों के युवाओं के बीच भी सक्रिय रहते हैं। वह किसी भी तरह के पुरस्कार एवं सम्मान से दूर रहते हैं। वह अपने लिए जिंदाबाद का नारा लगाने का सख्त विरोध करते हैं। कहते हैं कि जो जिंदा है, उसका क्यों जिंदाबाद।

हिंदुस्तानी भाषा अकादमी सम्मान

हिंदुस्तानी भाषा अकादमी की ओर से पिछले दिनो 19 नवंबर 2016 को दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान सभागार में देश के कवियों, पत्रकारों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पद्मश्री कवि सुरेंद्र शर्मा से समादृत होने की एक झलक।

Friday, 11 November 2016

कालाधन के खेल पर प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक का यह लेख जरूर पढ़ें

काला धन वह नहीं है, जिसे हम बक्सों में, या तकिए के कवर में या जमीन के अंदर गाडक़र रखते हैं. काला धन कमाने वाले लोग भी इसे बढ़ाना चाहते हैं और इस पैसे को बाजार में या प्रचलन में लाया जाता है. मोदी सरकार ने जो किया है, वह आधुनिक भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ. यहां तक कि अंग्रेजों के शासनकाल में भी कोई बड़ा फैसला करने के पहले आम लोगों को होने वाली दिक्कतों का ध्यान रखा जाता था. काली कमाई को रोकने की दलील देकर लिए गए मोदी सरकार के इस फैसले से आम आदमी को बहुत ज्यादा परेशानी से जूझना पड़ रहा है. जाली नोटों को प्रचलन से बाहर करने की दलील भी छपाई तकनीक से जुड़ी है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार रात 8 बजे राष्ट्रीय टेलीविजन पर घोषणा की कि 8 नवंबर को आधी रात के बाद से 500 और 1000 के नोट अवैध हो जाएंगे. उस वक्त सरकार की समय सीमा खत्म होने में सिर्फ 4 घंटे बाकी बचे थे. इसे न्यायोचित ठहराने के लिए दलील दी गई कि यह काले धन के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक है. इसके अलावा यह भी कहा गया कि इससे आतंकवादियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे नकली नोटों को भी प्रचलन से बाहर करने में मदद मिलेगी. सरकार के कुछ उत्साही समर्थक तो इसे आतंकवाद के खिलाफ मोदी सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक कहने से भी नहीं चूके.
नकली नोटों के मुद्दे पर हम कुछ देर बाद आएंगे. पहले बात करेंगे काले धन के बारे में सरकार के दावे की, जिसका राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी तक ने समर्थन कर दिया. सरकार ने अपनी इस दलील में यह बताने की कोशिश की थी कि 500 और 1000 रुपए के नोटों को अवैध करार दिए जाने से काले धन को रोकने में काफी मदद मिलेगी. यह बात थोड़ी बचकानी लगती है, क्योंकि तरह की दलील देने के पहले हम को यह समझना होगा कि काला धन होता क्या है? काला धन वह नहीं है, जिसे हम बक्सों में, या तकिए के कवर में या जमीन के अंदर गाडक़र रखते हैं. कुछ लोगों का यही मानना है कि और 500, 1000 के नोटों को अवैध घोषित कर दिए जाने के बाद लोग भारी मात्रा में ऐसे पुराने नोट लेकर बैंक और डाकघरों में बदलवाने के लिए पहुंचेंगे. और इस तरह की किसी संदिग्ध गतिविधि को देखते ही बैंक आयकर या दूसरी ऐसे विभागों को सूचना दे देंगे, जो टैक्स चोरी के मामलों को देखते हैं. कर अधिकारी ऐसे अपराधियों को गिरफ्तार कर पाएंगे, जो कालेधन लेकर आ रहे हैं. इससे काली कमाई हमें आई और भविष्य में इसे रोकने में भी मदद मिलेगी.
हम बात करेंगे सरकार की दलील के दूसरे हिस्से की. अगर हम इस बात को मान भी लें कि काली कमाई ढेर सारे नोटों की शक्ल में है, तो भी इससे बहुत ज्यादा लाभ होने की उम्मीद नहीं है. उदाहरण के लिए अगर हम मान लें कि किसी व्यक्ति के पास 20 करोड़ रुपए काला धन के रूप में है, जो कि 500 और 1000 रुपए के नोटों की शक्ल में है. ऐसी सूरत में भी यह बात तो तय है कि वह 20 करोड़ रुपए एक साथ लेकर किसी बैंक में बदलवाने तो नहीं जाएगा. पुराने नोटों को नए नोटों से इस तरह बदलने की अनुमति भी नहीं मिलेगी. इन हालात में वह अपने करीबी या पहचान के लोगों को थोड़ी सी रकम लेकर बैंक भेजेगा. वैसे भी सरकार ने पुराने नोटों को बदलने के लिए 30 दिसंबर तक का वक्त दिया है. शायद इतनी सारी कवायद की जरूरत ही नहीं पड़े, क्योंकि तब तक ऐसा कोई न कोई सिस्टम तलाश लिया जाएगा, जिसमें पुराने नोटों के बदले नए नोट हासिल करने का रास्ता बना लिया जाएगा. कई टीवी चैनलों में इस तरह की बातें विशेषज्ञों ने करना भी चालू कर दिया है. अगर ऐसा होता है, तो पांच और हजार रुपए के पुराने नोटों को रद्द करके कालेधन को सामने लाने की केंद्र सरकार की मंशा शायद पूरी नहीं होगी.
काली कमाई को लेकर हमारी धारणा भी गलत है. आमतौर पर हम यह मानते हैं कि काली कमाई नोटों के ढेर की शक्ल में होती है. जिसे हम सरकार या टैक्स एजेंसी की नजरों से छिपाकर बैंक की जगह कहीं और रखते हैं. वास्तव में जब हम काले धन की बात करते हैं, तो इसमें वह सारी गतिविधियां आती हैं, जिनको हम कानूनी तौर पर गलत मानते हैं. इसमें तस्करी, ड्रग का कारोबार और आतंकियों को हथियारों की सप्लाई भी शामिल है. यही नहीं कानूनी सीमा से ज्यादा किसी चीज को रखना भी ब्लैक एक्टिविटी में शामिल होता है. उदाहरण के लिए अगर हम किसी खदान से 100 टन खनिज निकालते हैं, पर 80 टन को ही घोषित करते हैं, तो हमारे पास काली कमाई आ जाती है. इसी तरह अगर हम सौ डॉलर कि किसी चीज का आयात करते हैं और सिर्फ 80 डॉलर की दस्तावेजों में घोषणा करने के बाद 20 डॉलर को स्विस बैंक में जमा करते देते हैं, तो वह एक तरह से काली कमाई का स्वरूप है. इसके अलावा हवाला के माध्यम से रुपए को विदेशी करंसी में बदल कर उसे विदेश में रखना भी एक तरह से काली कमाई जुटाना है. संक्षेप में काली कमाई का मतलब वह सारी गतिविधियां हैं, जिसे हम अघोषित रूप से करते हैं.
काली कमाई का मतलब रुपए का संग्रहण नहीं बल्कि उस को गति देना है. इसे हमें समझना होगा कि वाइट एक्टिविटीज की तरह ब्लैक एक्टिविटी भी ज्यादा से ज्यादा कमाई करने के लिए होती है. साफ है कि इसमें पैसों को जमा करके रखने से कोई लाभ नहीं होता. जानेमाने चिंतक कार्ल मार्क्स ने भी इस बात का जिक्र किया था कि लाभ पैसे को जमा करने से नहीं बल्कि उसे प्रचलन में या सरकुलेशन में लाने से होता है. यह बात हम को समझनी होगी कि ब्लैक एक्टिविटीज में शामिल लोग पूंजीवादी हैं. किसी भी कारोबारी गतिविधि में रणनीति या सोच के तहत पैसा कम और ज्यादा अवधि लिए रुका जाता है. यह धारणा भी गलत है कि काली कमाई को रोककर केवल वाइट मनी सर्कुलेशन में लाई जाती है. यही वजह है कि काली कमाई का पता लगाने के लिए बहुत ईमानदार और गंभीर कोशिशों की जरूरत होती है.
कंप्यूटर आने से काफी पहले यह माना जाता था कि ब्रिटिश इंटरनल रवेन्यू सर्विस के अधिकारी केवल अपनी जांच के आधार पर टैक्स चोरों को पकड़ लेते हैं. यह बात सही है कि भारत की तुलना में ब्रिटेन एक छोटा देश है, लेकिन अगर हम देश के आकार और आबादी के हिसाब से कर प्रबंधन देखने वाले लोगों की टीम को बढ़ाएं, तो कम से कम घरेलू अर्थव्यवस्था में हो रही टैक्स चोरी को कहीं बेहतर तरीके से पकड़ा जा सकता है. कुछ लोग मानते हैं कि काले धन का एक बड़ा हिस्सा स्विस बैंक या विदेशी बैंकों में है. चुनाव के पहले खुद नरेंद्र मोदी ने विदेशी बैंकों में जमा काली कमाई को भारत लाने की बात की थी. उनका कहना था कि बहुत बड़ी मात्रा में काला धन विदेशों में जमा है. अगर इसे मान भी लिया जाए, तो सवाल यह है कि इससे 500 और 1000 रुपए के पुराने नोटों को रद्द करने के सरकार के फैसले से क्या असर पड़ेगा, जिसने आम आदमी को परेशान किया.
यह पहली बार नहीं है जब भारत की अर्थव्यवस्था में प्रचलित नोटों को वापस लेने का फैसला हुआ है. जनवरी 1946 में भी 1,000 और 10,000 के नोटों को अवैध घोषित किया गया था. उसके बाद 1978 में मोरारजी देसाई की सरकार में भी 1000, 5000 और 10,000 के नोटों को 16 जनवरी की मध्यरात्रि से रद्द करने का निर्णय लिया था. 1946 के फैसले को छोड़ दे दिया जाए, तो 1978 में भी पुराने नोटों को रद्द करने के सरकार के फैसले से आम लोगों को कोई परेशानी नहीं हुई थी. 1978 की बात की जाए, तो उन दिनों 1000 रुपए बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी. आम लोग तो कई बार इस नोट की शकल ही नहीं देख पाते थे. देसाई सरकार के कदम से आम आदमी को परेशानी नहीं हुई, लेकिन इसके बावजूद काले धन इससे नहीं रुका. इससे ठीक उलट काली कमाई को रोकने की दलील देकर लिए गए मोदी सरकार के इस फैसले से आम आदमी को बहुत ज्यादा परेशानी से जूझना पड़ रहा है.
कुछ लोग इसे कैशलेस इकानॉमी से जोड़ सकते हैं. पर फिलहाल यह दूर की कौड़ी लगती है. यह सोच ऐसे लोगों की है, जिनको क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड हासिल करने या बैंक खाता खोलने में आम आदमी को होने वाली दिक्कतों के बारे में पता ही नहीं है. सरकार यह दलील भी दे रही है कि इससे आतंकियों के पास मौजूद जाली नोटों को रोकने में मदद मिलेगी. यह तर्क छपाई की तकनीक से जुड़ा हुआ है. यह दावा इस बात पर आधारित है कि नोटों की छपाई की नई टेक्नालॉजी की नकल नहीं की जा सकती. सरकार के इस तर्क को हम मान लेते हैं, तो ऐसा नहीं है कि इस तथ्य का पता अचानक सरकार को लगा. 8 नवंबर को जिस तरह के हालात बनें, उसे संभाला जा सकता था.

Monday, 24 October 2016

सत्ता संघर्ष और मुलायम सिंह की प्रेम कहानी : एक मीडिया रिपोर्ट

इस घरेलू जंग की जड़ें कहीं और हैं, जिससे मुलायम और अखिलेश के बीच दरार पड़ी है। अमर सिंह और शिवपाल गुप्त परिवार के रास्ते गुप्त सुरंग अर्से से बिछा रहे थे। मुलायम अपनी इच्छा से यह सब नहीं कर रहे हैं, बल्कि उनसे यह सब करवाया जा रहा है। मुलायम जैसी शख़्सियत से यह सब कराने की क्षमता किसके पास है। यह भी समझने की बात है। एक जमाने में जब जब मुलायम उत्तर प्रदेश की शक्तिशाली नेता के रूप में उभरे थे तो उनके जीवन में अचानक उनकी दूसरी पत्नी साधना गुप्ता की एंट्री हुई। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक मुलायम सिंह और साधना गुप्ता की प्रेम कहानी कब शुरू हुई इस बारे में अधिकृत ब्यौरा किसी के पास नहीं है। कहा जाता है कि 1982 में जब मुलायम लोकदल के अध्यक्ष बने तब एक दिन उनकी नज़र अचानक पार्टी की गई युवा पदाधिकारी साधना पर पड़ी। तरुणी साधना बला की ख़ूबसूरत थीं, इतनी ख़ूबसूरत कि जो भी उन्हें देखता, सुध-बुध खोकर बस उन्हें देखता ही रह जाता था। मुलायम भी अपवाद नहीं थे। पहली मुलाक़ात में वह उम्र में 20 साल छोटी अद्भुत फिज़िकल फीचर वाली साधना गुप्ता को दिल दे बैठे। खास बात यह थी कि मुलायम की तरह खुद साधना भी शादीशुदा थी और उनकी शादी फर्रुखाबाद जिले के छोटे से व्‍यापारी चुंद्रप्रकाश गुप्‍ता से हुई थी। बाद में वह उनसे अलग हो गई और उसके बाद यहीं से मुलायम-साधना की अनोखी प्रेम कहानी शुरू हुई, जो तीस-बत्तीस साल बाद अंततः देश के सबसे ताक़तवर राजनीतिक परिवार में विभाजन की वजह बन रही है। अस्सी के दशक में साधना गुप्ता और मुलायम सिंह के बीच क्या चल रहा है, इसकी भनक लंबे समय तक किसी को नहीं लगी। इसी दौरान 1988 में साधना ने एक पुत्र प्रतीक गुप्ता (अब प्रतीक यादव) को जन्म दिया। कहते हैं कि साधना गुप्ता के साथ प्रेम संबंध की भनक मुलायम की पहली पत्नी और अखिलेश की मां मालती देवी को लग गई। वह बहुत ही आकर्षक और दान-धर्म में यक़ीन करने वाली महिला थीं। यहां यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि मुलायम का पूरा परिवार अगर एकजुट बना रहा है, तो इसका सारा श्रेय मालती देवी को ही जाता है। मुलायम राजनीति में सक्रिय थे। उस दौरान वे एक दूसरे को शायद ही कभी-भार देख पाते थे, लेकिन मालती देवी अपने परिवार और 1973 में जन्मे बेटे अखिलेश यादव का पूरा ख़्याल रख रही थीं। नब्बे के दशक (दिसंबर 1989) में जब मुलायम मुख्यमंत्री बने तो धीरे-धीरे बात फैलने लगी कि उनकी दो पत्नियां हैं, लेकिन वह इतने ताक़तवर नेता थे कि किसी की मुंह खोलने की हिम्मत ही नहीं पड़ती थी। बहरहाल, नब्बे के दशक के अंतिम दौर में अखिलेश को साधना गुप्ता और प्रतीक गुप्ता के बारे में पता चला। उन्हें यकीन नहीं हुआ, लेकिन बात सच थी। उस समय मुलायम साधना गुप्ता की कमोबेश हर बात मानने लगे थे, इसीलिए मुलायम के शासन (1993-2007) में साधना गुप्ता ने अकूत संपत्ति बनाई। आय से अधिक संपत्ति का उनका केस आयकर विभाग के पास लंबित है।

बहरहाल, 2003 में अखिलेश की मां मालती देवी की बीमारी से निधन हो गया और मुलायम का सारा ध्यान साधना गुप्ता पर आ गया। हालांकि वह इस रिश्ते को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं थे।
मुलायम और साधना के संबंध की जानकारी मुलायम परिवार के अलावा अमर सिंह को थी। मालती देवी के निधन के बाद साधना चाहने लगी कि मुलायम उन्हें अपना आधिकारिक पत्नी मान लें, लेकिन पारिवारिक दबाव, ख़ासकर अखिलेश यादव के चलते मुलायम इस रिश्ते को कोई नाम नहीं देना चहते थे।
इस बीच साधना 2006 में गुप्ता अमर सिंह से मिलने लगीं और उनसे आग्रह करने लगीं कि वह नेताजी को मनाए। लिहाज़ा, अमर सिंह नेताजी को साधना गुप्ता और प्रतीक गुप्ता को अपनाने के लिए मनाने लगे। 2007 में अमर सिंह ने सार्वजनिक मंच से मुलायम से साधना को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने का आग्रह किया और इस बार मुलायम उनकी बात मानने के लिए तैयार हो गए। जो भी हो, अमर सिंह के बयान से मुलायम परिवार में फिर खलबली मच गई। लोग साधना को अपनाने के लिए तैयार ही नहीं थे। इधर, अखिलेश के विरोध को नज़रअंदाज़ करते हुए मुलायम ने अपने ख़िलाफ़ चल रहे आय से अधिक संपत्ति से संबंधित मुक़दमे में सुप्रीम कोर्ट में एक शपथपत्र दिया, जिसमें उन्होंने साधना गुप्ता को पत्नी और प्रतीक के रूप में स्वीकार कर लिया। उसके बाद साधना गुप्ता, साधना यादव और प्रतीक गुप्ता प्रतीक यादव हो गए। अखिलेश ने साधना गुप्ता के अपने परिवार में एंट्री के लिए अमर सिंह को ज़िम्मेदार माना। तब से वह अमर सिंह से चिढ़ने लगे थे। वह मानते हैं कि साधना गुप्ता और अमर सिंह के चलते उनके पिताजी उनकी मां के साथ न्याय नहीं किया।
बहरहाल, मार्च सन् 2012 में मुख्यमंत्री बनने पर अखिलेश यादव शुरू में साधना गुप्ता को कतई घास नहीं डालते थे। इससे मुलायम नाराज़ हो गए और अखिलेश को झुकना पड़ा। इस तरह साधना गुप्ता ने मुलायम के ज़रिए मुख्यमंत्री पर शिकंजा कस दिया और अपने चहेते अफ़सरों को मन पसंद पोस्टिंग दिलाने लगीं। ‘द संडे गार्डियन’ ने सितंबर 2012 में साधना गुप्ता की सिफारिश पर मलाईदार पोस्टिंग पाने वाले अधिकारियों की पूरी फेहरिस्त छाप दी, तब साधना गुप्ता पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आईं। अब यह साफ़ हो गया है कि मुलायम की विरासत को लेकर चल रहे मौजूदा संघर्ष में अखिलेश की लड़ाई सीधे लीड्स यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने वाले अपने सौतेले भाई प्रतीक यादव से है। लखनऊ में रियल इस्टेट के बेताज बादशाह बन चुके प्रतीक को अपनी माता साधना गुप्ता का समर्थन मिल रहा है। चूंकि साधना नेताजी के साथ रहती हैं और उनकी बात मुलायम टाल ही नहीं सकते। यानी कह सकते हैं कि बाहरवाली से घरवाली बनी साधना गुप्ता की बात टालना फ़िलहाल मुलायम सिंह के वश में नहीं है।
लखनऊ के गलियारे में साधना गुप्ता को कैकेयी कहा जा रहा है। आमतौर पर परदे के पीछे रहने वाली साधना अखिलेश से तब से बहुत ज़्यादा नाराज़ चल रही हैं, जब अखिलेश ने उनके आदमी गायत्री प्रजापति को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया। दरअसल, प्रतीक के बहुत ख़ासमख़ास गायत्री प्रजापति को मुलायम के कहने पर खनन जैसा मलाईदार महकमा दिया गया था। यह विभाग हुक्मरानों को हर महीने दो सौ करोड़ की अवैध उगाही करवाता है।
इधर, जब इसकी भनक अखिलेश को लगी तो वह प्रतीक के रसूख और कमाई के स्रोतों पर हथौड़ा चलाने लगे। यह बात साधना को बहुत बुरी लगी। नाराज़ साधना गुप्ता को मनाने के लिए ही मुलायम ने पार्टी प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी अखिलेश से छीनकर साधना खेमे के शिवपाल यादव को दे दी। अब उसी के चलते अब बाप-बेटे यानी अखिलेश और मुलायम आमने-सामने आ गए हैं। इटावा जिले के सैफई में 22 नवंबर, 1939 को स्व. सुधर सिंह यादव और स्व. मूर्ति देवी के यहां जन्मे और पांच भाइयों में तीसरे नंबर के मुलायम सिंह यादव तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन उत्तर प्रदेश के लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने कुछ किया तो केवल और केवल अपने परिवार के लिए किया। परिवार को उन्होंने राजनीतिक और आर्थिक रूप से इतना ताक़तवर बना दिया है कि आने वाले साल में उनके कुटुंब के सैकड़ों लोग सांसद या विधायक होंगे।
फ़िलहाल मुलायम समेत उनके परिवार में छह सांसद और तीन विधायक समेत 21 लोग महत्वपूर्ण पदों पर क़ाबिज़ हैं। भारतीय राजनीति में वंशवाद की तोहमत कांग्रेस पर लगती है, लेकिन यूपी में मुलायम परिवार ने कांग्रेस को मीलों पीछे छोड़ दिया है।
बहरहाल, इस मुद्दे पर मुलायम सिंह को समर्थन नहीं मिलने वाला, क्योंकि उन्होंने मुलसमानों को ख़ुश करने और अपने परिवार के ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को राजनीति में प्रमोट करने के अलावा कुछ नहीं किया। समाजवादी पार्टी के संस्थापक भी वह भले हों, लेकिन इस पार्टी का भविष्य अखिलेश यादव ही हैं।
यकीनन, 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को जो जनादेश मिला था, वह मायावती की स्टैट्यू पॉलिटिक्स के नाराज़गी और अखिलेश की ज़मीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में जान फूंकने से हुई। राजनीतिक टीकाकार मानते हैं कि मुलायम सिंह के लिए बेतहर होगा कि वह अखिलेश खेमे में रहे, क्योंकि शिवपाल-साधना की इमैज राज्य में अच्छे नेता की नहीं है। आम धारणा भी यही है, कि लूट-खसोट करने के आदी हो चुके शिवपाल-साधना के नैक्सस ने अखिलेश को स्वतंत्र रूप से काम ही नहीं करने दिया।

यश भारती सम्मान के लिए नाम घोषित

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से यश भारती सम्मान के लिए नाम घोषित कर दिए गए हैं। साहित्यिक क्षेत्र में बशीर बद्र, महेश्वर तिवारी, सर्वेश अस्थाना, ओमा दिपक, मणेंद्र कुमार मिश्र, राजकृष्ण मिश्र, गीतकार मनोज मुंतसिर, स्वरुप कुमार बख्शी, संतोष आनंद को 11 लाख रुपए पुरस्कार एवं आजीवन 50 हजार रुपए पेंशन से नवाजा जाएगा। पत्रकारिता के लिए योगेश मिश्रा और अशोक निगम को यश भारती से सम्मानित किया जाएगा।

Thursday, 22 September 2016

बंद करो तकरार/जयप्रकाश त्रिपाठी

ठगा विश्व-बंधुत्व है, अदभुत युद्धम-युद्ध।
बड़े-बड़ों में फिर कलह, बच्चा-बच्चा क्रुद्ध।
किसके दिल में प्यार है, किसके दिल में खोट,
सच सबको मालूम है, मत कर खुद पर चोट।
छिपकर सीमा पार से क्यों करते हो वार,
तहस-नहस हो जाओगे, बंद करो तकरार ।
घर की भूंजी भांग का लगा रहे हो रेट,
बम, गोला, बारूद से भरता किसका पेट।
अपने घर का हाल भी रहा नहीं अनुकूल,
कृपया ऐसे वक्त में बकें न ऊल-जुलूल।
मानवता के दुश्मनों ! भरो न यूं हुंकार,
खून-खून हो जाएगा यह सुंदर संसार।