Wednesday, 29 October 2014

भूख / जावेद अख़्तर

आँख खुल मेरी गई हो गया मैं फिर ज़िन्दा
पेट के अन्धेरो से ज़हन के धुन्धलको तक
एक साँप के जैसा रेंगता खयाल आया
आज तीसरा दिन है
आज तीसरा दिन है
एक अजीब खामोशी से भरा हुआ कमरा कैसा खाली-खाली है
मेज़ जगह पर रखी है कुर्सी जगह पर रखी है फर्श जगह पर रखी है
अपनी जगह पर ये छत अपनी जगह दीवारे
मुझसे बेताल्लुक सब, सब मेरे तमाशाई है
सामने की खिड़्की से तीज़ धूप की किरने आ रही है बिस्तर पर
चुभ रही है चेहरे में इस कदर नुकीली है
जैसे रिश्तेदारो के तंज़ मेरी गुर्बत पर
आँख खुल गई मेरी आज खोखला हूँ मै
सिर्फ खोल बाकी है
आज मेरे बिस्तर पर लेटा है मेरा ढाँचा
अपनी मुर्दा आँखो से देखता है कमरे को एक सर्द सन्नाटा
आज तीसरा दिन है
आज तीसरा दिन है
दोपहर की गर्मी में बेरादा कदमों से एक सड़क पर चलता हूँ
तंग सी सड़क पर है दौनो सिम पर दुकाने
खाली-खाली आँखो से हर दुकान का तख्ता
सिर्फ देख सकता हूँ अब पढ़ नहीं जाता
लोग आते-जाते है पास से गुज़रते है
सब है जैसे बेचेहरा
दूर की सदाए है आ रही है दूर 

अए शैख़-ओ-ब्रह्मन सुनते हो क्या अह्ल-ए-बसीरत कहते हैं गर्दों ने कितनी बुलंदी से उन क़ौमों को दे पटका है


सूची में राजनेताओं और बड़े उद्योगपतियों के नाम नहीं

सूत्रों के मुताबिक कालाधन संबंधी सौंपी गई 627 विदेशी खाताधारकों की सूची में राजनेताओं और बड़े उद्योगपतियों के नाम नहीं है। इन 627 में से पचास फीसद भारतीय और पचास फीसद एनआरआई हैं। इनमें से केवल 350 खातों की ही जांच होगी। लिस्ट में दिए गए ज्यादातर खाते वर्ष 2006 से पहले के हैं और इन्हें 1999-2004-05 के दौरान रिकॉर्ड किया गया था। इन खातों में पांच से लेकर 10 करोड़ तक की राशि जमा है। यदि सरकार इन खातों को फ्रीज कर देती है तो भी इनमें लगभग न के बराबर पैसा बचेगा, क्योंकि खाताधारकों को पहले ही ऐसी कार्रवाई की जानकारी थी।
एसआईटी आम जनता से संपर्क करेगी। इसके तहत वह ईमेल के जरिए लोगों से कालेधन की जानकारी मांगेगी। एसआईटी सूत्रों के मुताबिक कई लोग इस मामले में जानकारी देना चाहते हैं लेकिन वे अपनी पहचान नहीं बताना चाहते। इसी वजह से एसआईटी यह कदम उठाएगी। जानकारी लेने के लिए एसआईटी ईमेल आईडी जारी करेगा। एसआईटी की गुरूवार को होने वाली बैठक में यह फैसला लिया जा सकता है।

मोदी पुराणों की धूम / अरविंद मोहन

अब यह समझना कुछ मुश्किल है कि नरेन्द्र मोदी व्यक्ति भर हैं या कोई परिघटना हैं. उनकी राजनीति, उनकी कार्यशैली, उनकी सोच और इन सबके बीच उनकी सफलताएं जरूर उन्हें सामान्यजन से ऊपर पहुंचाती हैं. और उनकी ही भाषा में कहें तो उन्हें इसका एहसास है कि उन्हें प्रधानमंत्री बनने के लिए ही बनाया गया है. चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कमल के निशान पर पड़े वोट सीधे उनको मिलने (उम्मीदवार, पार्टी और ग्ठबन्धन नहीं) और ईश्वर द्वारा इस काम अर्थात प्रधानमंत्री बनने के लिए चुने जाने की बात खुले तौर पर कही. कहना न होगा काफी कुछ उनकी इच्छा के अनुरूप ही हुआ. अब हम आप इसके अनेक कारण और उनके विरोधियों की कमजोरी या सीधापन को जिम्मेवार मानते रहें पर मोदी ने अपनी बड़ी इच्छा पूरी कर ली. हमें देवता के आशीर्वाद और आदेश की जगह उनकी तैयारियां, उनको उपलब्ध साधन, उनका अपूर्व प्रचार वगैरह-वगैरह नजर आता हो तो इसमें भी कोई हर्ज नहीं है. पर यह तो मानना ही पड़ेगा कि मोदी को चन्दा देने वालों ने चन्दे से ज्यादा हासिल किया होगा, उनका प्रचार करने वालों ने खर्च से ज्यादा पैसे निकाल लिए होंगे, उनका गुणगान करने वालों ने अपने-अपने यहां काफी कुछ हासिल कर लिया होगा- और यह सब इसी दरिद्रता के, इसी कमजोरी-बीमारी के, इसी पिछड़ेपन वाले भारत से निकाल लिया गया है. पर असली हिसाब यही है कि सबने छोटे-छोटे धन्धे करते हुए मोदी का मुख्य काम आसान कर दिया.

अगर इस परिघटना को ज्यादा अच्छी तरह समझना है तो हाल में मोदी पर और उनकी प्रकाशित किताबों के विशाल भंडार पर नजर डाल लीजिए तो आपको प्रकाशन जगत की दरिद्रता, पुस्तकों की उपलब्धता और लेखकों, शोधकर्ता, अनुवादक की कमी की जगह हर कहीं उफान, मारामारी और होड़ दिखाई देगी. और इस होड में कौन नहीं नजर आएगा. खुद मोदी बड़े लेखक, विचारक, कवि और इतिहासकार हैं, यह नया रूप आपको बोनस के तौर पर दिख जाएगा. यह सही है कि जब एक अबूझ पहेली की तरह के व्यक्तित्व का आदमी सीधे अपने दम पर बहुमत हासिल करके प्रधानमंत्री बन जाए तो उसके जीवन, सोच और काम को समझने-समझाने वाले अध्ययन होने ही चाहिए. पर जो किताबें छपी हैं उनमें शायद ही कोई इस पैमाने पर खरा उतरेगा. अधिकतर किताबें एक दूसरे की नकल, सरकारी (गुजरात सरकार की) जनसम्पर्क विभाग की सामग्री, मोदी के करीबी होने का दावा करने वालों के विवरण और चापलूसी के लिए लिखे लगते हैं. और अगर आप यह समझते हों कि यह धन्धा सिर्फ चटुकारिता और मुनाफे की होड के लिए है तो मोदी को ठीक से न समझ पाने की तरह यहाँ फिर से भूल न कीजिए. इस पूरे उफान से लेखक, प्रकाशक, पुस्तक विक्रेता और किताबों के और भी किस्म के धन्धेबाज (विभागीय रौब बढाने से लेकर प्रोमोशन और सामाजिक रुतबा बढाने की झूठी कोशिश करने वाले) जितना लाभ पाएंगे उससे कही ज्यादा फायदा मोदी को होने जा रहा है. अब तक किसी भी प्रधानमंत्री और नेता पर इतनी किताबें उसके कार्यकाल या सक्रिय जीवन में नहीं आई हैं.

अब जरा हिन्दी और अंगरेजी में छपी कुछ मुख्य किताबों की सूची पर गौर कीजिए तो यह बात और साफ होगी. पर इस सूची की भी बहुत साफ सीमा है. रोज नई किताब आ रही है या एक भाषा की किताब दूसरी भाषा में अनुदित होकर आ रही है. कई कई किताबों के कवर बदलकर कई बार विमोचन हो रहा है तो बाजार में भी दनादन एडिशन आ रहे है. सबसे पहली बडी किताब ‘नरेन्द्र मोदी: द आर्किटेक्ट आफ माडर्न स्टेत’ एम. वी. कामथ और कालिन्दी राणाडे की है जो 2009 मेँ आई थी तब से इसके न सिर्फ कई संस्करण आए हैं बल्कि लगभग आधी दर्जन भाषाओं में अनुवाद भी आ चुके हैं.

नीलांजन मुखोपाध्याय की किताब सबसे मेहनत से तैयार हुई और आम चुनाव से ठीक पहले आने के चलते खूब चर्चित भी हुई और उसके भी कई भाषाओं के संस्करण आ गए हैं. कामथ और राणाडे की जोडी ने नई किताब ‘द मैन आफ द मोमेंट: नरेन्द्र मोदी’ (मूल्य-399 रु.) ला दी है. वरिष्ठ पत्रकार और टाइम्स आफ इंडिया के अहमदाबाद संस्करन के सम्पादक किंग्शुक नाग की किताब ‘द नमो स्टोरी: ए पोलिटिकल लाइफ’ (मूल्य-225 रु.) भी चुनाव के पूर्व गई थी. कई आने की पूर्व सूचना प्रकाशन जगत में तैर रही है.

अभी आई अन्य किताबें हैं- नरेन्द्र मोदी; द गेमचेंजर, लेखक- सुदेश वर्मा, (मूल्य 399 रु.), नरेन्द्र मोदी; ए पोलिटिकल बायोग्रफी, लेखक- एंडी मारियो (मूल्य-299 रु.), नरेन्द्र मोदी; ए विजनरी प्राइममिनिस्टर, लेखक- आशु पटेल ( मूल्य-2495), सेंटर स्टेज, इंसाइड नरेन्द्र मोदी माडल आफ गवर्नेंस, उदय माहूरकर ( मूल्य- 499 रु.), प्राइम मिनिस्टर नरेन्द्र मोदी; ए लाइफ विथ फुल आफ स्ट्रेंग्थ, मीनाक्षी सिन्ह (मूल्य- 500 रु.), सेफ्रन माडर्निटी इन इंडिया, लेखक- रोबिन जेफ्राले ( मूल्य-2690 रु.), सीएम टू पीएम, लेखक- विवेक गर्ग और नरेन्द्र देव, दिस इज नरेन्द्र मोदी, लेखक- उर्विश कंठारिया (मूल्य-399 रु.), नमो मंत्रा आफ नरेन्द्र मोदी, लेखक-पी. कुमार (मूल्य-125), नरेन्द्र मोदी; यस ही कैन, लेखक- डी. पी. सिन्ह ( मूल्य- 295 रु.), नरेन्द्र मोदी; द न्यू पीएम, लेखक- विप्लव (मूल्य- 1195 रु.), इंडिया नीड्स नरेन्द्र मोदी, लेखक- डा. एस.आर. शर्मा ( मूल्य-595 रु.),  इमेजेज आफ ट्रांस्फार्मेशन-गुजरात एन्ड नरेन्द्र मोदी, लेखक- प्रो. प्रवीण शेठ ( मूल्य-300 रु.), नरेन्द्र मोदी और फासीवादी प्रचारक, लेखक- प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी (मूल्य-700 ऋ.), मोदी; मेकिंग आफ ए प्राइममिनिस्टर, लेखक- विवियन फर्नांडिस ( मूल्य-250 रु.), मोदी मंत्रा, लेखक- हरीश वर्णवाल, ( मूल्य-120 रु.), मोदीज आइडिया आफ इंडिया, लेखक- एल्गर चो और सरवानम थंगादुरै ( मूल्य-300 रु.), मोदीनोमिक्स; ए इंक्लुसिव इकोनामिक्स, इंक्लुसिव गवर्नेंस, लेखक- समीर कोचर, (मूल्य- 769 रु.), लीडिंग ए बिलियन; नरेन्द्र मोदी, लेखक- चैंटल एंड्रियो ( मूल्य- 417 रु.), मोदीत्व; द आइडिया बिहाइंड द मैन, लेखक- सिद्ध्स्स्र्थ मजूमदार ( मूल्य- 134 रु.), कामनमैन नरेन्द्र मोदी, लेखक- किशोर मकवाना ( मूल्य-400 रु.), द किंग आफ बिलियन हर्ट्स, लेखक- डा. रक्षित ( मूल्य- 160 रु.), नरेन्द्र मोदी- चेंज वि कैन बिलीव, लेखक-संजय गौर (मूल्य-295 रु.), मोदी, मुस्लिम्स एंड मीडिया; वायसेज फ्राम नरेद्र मोदीज गुजरात, सम्पादक- मधु किश्वर.

इनमें से कई किताबों के हिन्दी सस्करण और अन्य भाषाओं के संस्करण आ चुके हैं. कई किताबेँ और मोदी का अपना लेखन हिन्दी और अंगरेजी में ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं में भी आ चुका है. हम सबकी चर्चा नहीं कर सकते, पर गुजराती में सबसे ज्यादा किताबें आई हैं. हिन्दी में भी महानायक नरेन्द्र मोदी, लेखक- कुमार पंकज (मूल्य-125 रु.), एक भारत, श्रेष्ठ भारत, लेखक- प्रदीप पंडित (मूल्य-250 रु.), निशाने पर नरेन्द्र मोदी, लेखक- सन्दीप देव (मूल्य- 225 रु.), भविष्य की आशा, नरेन्द्र मोदी और कहानी नरेन्द्र मोदी की, दोनों के लेखक- किशोर मकवाना, नरेन्द्र मोदी का राजनैतिक सफर, लेखक- तेजपाल सिन्ह धामा (मूल्य-150 रु.), नरेन्द्र मोदी, लेखक- संगीता शुक्ल (मूल्य-75 रु.) और, क्यों आखिर मोदी, लेखक- डीपी सिन्ह (मूल्य-295 रु.). जाहिर तौर पर अभी भी हिन्दी के प्रकाशक और लेखक अभी दरबारी संस्कृति और धन्धे के मामले में अंगरेजी वालों से पीछे हैं. ये अधिकांश किताबें जहां-तहां से सामग्री मार कर लिखी गई हैं और किसी में कुछ भी नया न होने का दावा मजे से किया जा सकता है. इसके लिए आवश्यक शोध, साक्षात्कार और यात्रा करने का न तो कष्ट किया गया है, न हिन्दीवालों को इसके लिए साधन ही उपलब्ध हो पाते हैं. जो अनुवाद भी हैं वे हड़बड़ी के मारे हुए हैं और उनसे अंगरेजी या गुजराती वाला आनन्द आना सम्भव नहीं लगता है.

किताबों की एक तीसरी श्रेणी भी बहुत बड़ी है. यह है कथित तौर पर खुद नरेन्द्र मोदी द्वारा लिखी किताबों की. यह हो भी सकता है कि उन्होंने कुछ लिखा हो. आपातकाल पर गुजराती में किताब लिखने का जिक्र बार-बार जीवनियों में आया है. पर आपातकाल के गुजरने के लगभग 37-38 साल बाद अगर किताब को हिन्दी या अंगरेजी में लाने की जरूरत लग रही हो तो इसे सामान्य नहीं मानना चाहिए. इसका सीधा रिश्ता मोदी के प्रधानमंत्री बनने के चलते इस किताब का व्यावसायिक लाभ लेना ही है. सम्भव है कुछ किताबें भाषणों से बनाई गई होंगी. यह भी लगता है कि उनकी कविताओं और उसके वाचन की सीडी भी अभी उनके व्यावसायिक लाभ के मद्देनजर ही आई है.

जिन किताबों की चर्चा है और अच्छी बिक्री है वे हैं; साक्षी मन ( सीडी समेत मूल्य-750 रु.), सामाजिक समरसता ( मूल्य- 300 रु.), आइडिया आफ वन रिलीजन (मूल्य-199 रु.), कंवेनिएंट एक्शन: गुजरात रेस्पांस टू क्लाइमेट चेंज (मूल्य-695 रु.), प्रेम तीर्थ ( मूल्य-165 रु.), भविष्य की आशा (मूल्य-50 रु.), एनर्जी; पोएम्स बाइ नरेन्द्र मोदी (मूल्य- 295 रु.), नरेन्द्र मोदी के सपनोँ का भारत ( मूल्य- 50 रु.), आपातकाल मेँ गुजरात (मूल्य-250 रु.), ज्योतिपुंज ( मूल्य-400रु.), क्रिप्लिंग इमेजिनेशन टू कैन डू एटिच्युड ( मूल्य-195 रु.), वक्त की मांग ( मूल्य-300 रु.), सेतुबन्ध (मूल्य-145 रु. ). अगर सीडी के कारोबार को स्टिकर और 3डी लेजर इंग्रेव्ड क्रिस्टल क्यूब वाली तस्वीर या मूरत को भी जोडा जा सकता है तो यह सूचना भी है कि यह 1049 रुपए में उपलब्ध है- खास जोर उपहार के रूप में इसे देने-लेने का है. जाहिर है कि मोदी की रचनात्मक ऊर्जा और प्रतिभा का पता अगर उनके प्रधान मंत्री बनने के बाद ही चले तो यह चिह्नित करने वाली बात तो है ही. खैर.

इतनी सारी किताबोँ और प्रचार सामग्री मेँ से इस समीक्षक ने तीन बडे पत्रकारोँ की किताबोँ- नरेन्द्र मोदी; द मैन, द टाइम्स, नरेन्द्र मोदी; द गेमचेंजर और द नमो स्टोरी पर ही ध्यान केन्द्रित किया है. पहली किताब नीलांजन भट्टाचर्य की है जो गम्भीर और समझदार पत्रकार माने जाते हैँ. उन्होने काफी लम्बा शोध करके यह किताब लिखी है और चुनाव के ठीक पहले आकर यही किताब सबसे ज्यादा चर्चित हुई. चुनाव के समय मोदी को लेकर जो कई किस्से चले और बढे उनकी शुरुआत इसी किताब से हुई थी. नीलांजन कभी शुद्ध वामपंथी विचारोँ के हुआ करते थे पर मन्दिर आन्दोलन और अयोध्या की घटनाओँ को कवर करने एक दौरान उनके विचारोँ मेँ बदलाव आया. 1992 मेम हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस पर भी उनकी एक किताब है और वह भी पर्याप्त चर्चित हुई है. किंग्शुक नाग की किताब मुख्यत: उनके गुजरात दंगे के कवरेज के अनुभवोँ और मोदी के उभरने के मौके पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के खयाल से लिखी लगती है. दंगोँ वाले मामले मेँ वे इन तीनोँ किताबोँ मेँ बेहतर ब्यौरा दे पाए हैँ. सुदेश वर्मा की किताब नरेन्द्र मोदी; द गेमचेंजर कई बार कवर बदलकर विमोचन कराने के लिए पढे जाने से पहले ही चर्चित हो चुकी है और इसका शुद्ध उद्देश्य मोदी की हवा मेँ अपनी कमाई करना और अपनी गुड्डी चढाना लगता है क्योंकि ज्यादातर मामलोँ मेँ यह तथ्य रखने की जगर मोदी की वकालत और उनके हर काम को सही बताने का प्रयास करती है. किताब का आखिरी अध्याय जितनी तारीफ तो भाजपा और मोदी का कोई घोषित सिपाही भी नहीँ कर सकता. सुदेश इस किताब को लिखने के पहले आप पार्टी मेँ भी थे और उसका संस्थापक सदस्य होने का दावा फ्लैप पर भी करते हैँ. उन्होने लम्बे समय तक, खासकर मोदी के उभार वाले दौर मेँ भाजपा कवर किया है सो मोदी के उभार और तारीफ वाले विवरणोँ मेँ भी कई बार उन घटनाओँ की याद दिला देते हैँ जो मोदी के दांवपेंच और चालाकियोँ को बताती हैँ. उस हिसाब से किताब का शुरुआती आधा हिस्सा ज्यादा दिलचस्प है, बाद मेम गुजरात और मोदी एक विकास की गाथा सीधे राज्य सरकार के प्रचार विभाग से ली गई लगती है.

मोदी पर लिखी अधिकांश किताबोँ की तरह ये तीनोँ भी उनके गुणगान मेँ ही जुटी लगती है. अब किसी एक जगदीश्वर चतुर्वेदी या गुजरात दंगोँ पर लिखी मनोज मिट्टा की किताब जैसे अपवादोँ को छोद देँ तो यह बात प्रय: सब पर लागू होती हैँ. सामान्य ढंग से यह स्वाभाविक भी है- जो व्यक्ति चाय बेचने और संघ दफ्तर मेँ झाडू लगाने से शुरुआत करके न सिर्फ प्रधानमंत्री बने बल्कि पूरी राजनीति की धारा को पलटे ( गठबन्धन राजनीति का अंत, भाजपा को अपूर्व ऊंचाइयोँ पर ले जाना और संघ की तरफ से पिछडा प्रधान मंत्री बनना) उसके लिए ऐसा लोखा जा सकता है. पर हम जानते हैँ कि मोदी सामान्यजन नहीँ हैँ. गुजरात दंगोँ का दाग उन पर है ही, इस चक्कर मेँ उनके अठरह आईएएस और आईपीएस अधिकारी जेल की हवा खा रहे हैँ, उनकी साथी मंत्री जेल मेँ पडी है, उनके सबसे विश्वस्त  सहयोगी अमित शाह हत्या के चार-चार मामलोँ मेँ अभियुक्त हैँ और सुप्रीम कोर्ट को मामलोँ की सुनवाइइ गुजरात से बाहर करने का निर्देश देना पडा पर मोदी का बाल बांका नहीँ हुआ. हर चीज इस शक को पुष्ट करती है कि सब कुछ उनके इशारोँ पर हुआ लेकिन वे इस चीज को भी अपने आगे बढने का उपकरण बना लेते है. वे अपने किसी विरोधी को नहीँ बख्शते ( नीलांजन बताते हैँ कि एकमात्र अपवाद स्मृति इरानी हैँ) और कई की हत्या कराने के आरोप भी उन पर लगते रहे हैँ, पर मोदी शान से मूंछ फहराते अपना छप्पन इंच का सीना दिखाते ( यहाँ भी नीलांजन दरजी से जानकारी लेकर बताते हैँ कि उनके सीने का माप छप्पन इंच नहीँ है) लोकतत्र के रक्षक और दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र का एकमात्र प्रतिनिधि बने घूम रहे हैँ. किताबोँ का उद्देश्य अगर मोदी के विकास या सफलताओँ को बताने-समझने, उनकी कार्यशैली को समझना-समझाना और उनकी सोच को पकडना होता तो किताबेँ इतना एकतरफा नहीँ होतीँ. मोदी अलग हैँ, उन्होने ने अलग तरह से सफलता पाई है इस बुनियादी बात को कोई भी किताब रेखांकित नहीँ करती. इस अलग होने के चलते उनपर मीडिया और लेखकोँ का ज्यादा ध्यान जाए, ज्यादा किताबेँ आए यह तो स्वाभाविक है पर वे उनके इसी अभियान मेँ सहायक बन जाएँ यह तो बहुत अजीब बात है.

सिर्फ धनात्मक बातेँ करने और ऋणात्मक बातोँ की चर्चा न करना, या सुदेश वर्मा की तरह हर आरोप को सीधे खारिज करते चलने भर का मामला इन किताबोँ को गुनाहगार नहीँ बनाता. बहुत साफ लगता है कि मोदी की बढी ताकत और सत्ता का खौफ भी लेखकोँ पर गहराता गया है. शायद दंगोँ के समय और उसके बाद भी ज्यादा खुलकर बातेँ अखबारोँ-पत्रिकाओँ या मनोज मिट्टा जैसोँ की किताब मेँ आई हैँ. लेखकोँ ने न सिर्फ मोदी को प्रोजेक्ट करने का जिम्मा उठाया है बल्कि एक किस्म का सेल्फ- सेंसरशिप भी लगा लिया है. किसी भी मोदी विरोधी से बात करके उनके काम, व्यक्तित्व और सोच के किसी अज्ञात पक्ष को सामने लाने की कोशिश नहीँ की गई है. मोदी से मिलने और इंटर्व्यू करने न करने की चर्चा तो सबने की है पर जाकिया जाफरी या दूसरे पीडितोँ, तीस्ता और अन्य संघर्ष करने वालोँ से मिलने का प्रयास भी नहीँ किया गया है. हद तो तब हो गई है जब मोदी या उनके किसी प्रशंसक को जरा भी अप्रिय लगने वाली बात या तथ्य आए हैँ तो नाग और नीलांजन समेत सभी लेखकोँ ने स्रोत का नाम छुपा लिया है. कई बार पत्रकार अपना झूठ चलाने या अपुष्ट बातोँ का उल्लेख करते हुए ये सब हथकंडे अपनाते हैँ. पर इन किताबोँ के मामले मेँ साफ लगता है कि मोदी के खौफ से लेखकोँ ने सेल्फ सेंसरशिप लागू कर लिया है.

यह चीज सबसे ज्यादा नीलांजन की किताब मेँ अखरी क्योंकि उन्होने शायद सबसे ज्यादा तैयारी से किताब लिखी है. खुद नरेन्द्र मोदी ने उन्हे लम्बा वक्त दिया जिसमेँ वे सारे सवाल पूछ सकेँ और पुस्तक से जुडी सामग्री सम्बन्धी तथ्योँ की पुष्टि या खंडन करा लेँ. पर नीलंजन ने दंगोँ को लेकर एक भी सवाल नहीम किया और ना ही यह बताया है कि ऐसी किसी पूर्व शर्त पर ही मोदी उनसे मिलने को तैयार हुए थे. इसका मतलब यह है कि मोदी खुद तैयार होकर बैठे थे और लेखक ने अपने मन से वे सवाल नहीँ पूछे जो मोदी को अप्रिय लग सकते थे. इस बात का एक और प्रमाण है मोदी से उनकी शादी और इस तथ्य को संघ समेत सबसे छुपाए रखने के बारे मेँ कुछ भी न पूछना. इस किताब के लिखे जाने तक उनकी शादी और पत्नी के काफी ब्यौरे आ चुके थे. खुद इस किताब मेँ भी काफी बातोँ का जिक्र है पर जब मोदी सामने बैठे तो प्रेम से या सख्ती से, किसी भी तरह का सवाल न पूछना सेल्फ सेंसरशिप नहीँ तो और क्या है. और हद तब हो गई है जब पुस्तक मेँ हर बात विस्तार से और पूरे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य मेँ देने के बावजूद लेखक ने गुजरात के कत्लेआम का कोई भी जिक्र नहीँ किया है. वे न तो दंगा पीडितोँ से मिले हैँ और उनका पक्ष लिया है न दंगे से प्रभावित बस्तियोँ और राहत शिविरोँ मेँ गए हैँ. इतना ही नहीँ है वे गुजरात दंगोँ को पोस्ट गोधरा इंसिडेंट्स या रायट्स कहते हैँ. संघ वाले बाबरी मस्जिद गिराने को जिस तरह विवादास्पद ढांचा गिराना कहते हैँ, यह चीज कुछ उसी तरह की लगती है.

नीलांजन की किताब कई मायनोँ मेँ अच्छी भी है. मोदी के व्यक्तित्व के ऊपरी तत्वोँ को वे ठीक से पकडते हैँ.  उनका कुर्ता, उनके रंगोँ का चुनाव, उनका भोजन या खाने-पीने की पसन्द, उनकी यारी-दोस्ती के किस्से काफी हैँ. गुजरात के विकास माडल पर भी उन्होने अच्छे आंकडोँ के साथ बात रखी है. इतिहास की बुनियादी पढाई करने वाले नीलांजन ने घटनाओँ को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य मेँ भी रखा है- जब मोदी आगे बढ रहे थे तो देश-राजनीति मेँ और क्या कुछ हो रहा था. पर वे कई चीजोँ को जडकर नहीँ देखते या एक ही पक्ष बताते हैँ. जैसे यह विवरण तो काफी है कि संघ के तपे-तपाए वकील साहब, देशमुख जी, झांगडा साहब, एकनाथ रानाडे और दत्तोपंत ठेंगडी ने मोदी के प्रशिक्षण और उनको आगे बढाने मेँ सबसे बडी भूमिका निभाई. पर क्या संघ के सबसे तपस्वी जैसे स्वयंसेवक रानाडे और ठेगडी से मोदी ने कोई भी गुण सीखा या इनकी संगति का लाभ अपने स्वार्थ के लिए किया. जैसे ठेगडी स्वदेशी के सबसे बडे वकील थे. उन्होने ही भारतीय मजदूर संघ को देश का सबसे बडा मजदूर संगठन बनाया. और स्वदेशी के सवाल पर जब वे अटल सरकार से लडने के मूड मेँ आए तो सारा संघ परिवार उन्हे कुंठित बताने लगा कि वे वाजपेयी से सीनीयर हैँ यही कुंठा स्वदेशी के नाम पर निकाल रहे हैँ. अब अगर मोदी ने ठेंगडी जी से कुछ भी सीखा होता तो गुजरात और देश की वही आर्थिक नीतियाँ नहीँ चलाते जो हमेँ दिख रही है. सीधा मतलब है कि उन्होने ठेंगडी और रानाडे जैसे तपस्वी लोगोँ की तप का, नाम का और कामोँ का फायदा अपनी महत्वाकान्क्षा पूरी करने के लिए उठाया. नीलांजन को संजय जोशी के खिलाफ सीडी जारी करना, तहलका कांड के बाद तरुण तेजपाल के खिलाफ झूठे आरोपोँ की पुस्तिका बांटना और महामंत्री रहते हुए गुजरात के भाजपाई मुख्यमंत्रियोँ के खिलाफ चले उन अभियानोँ वगैरह की याद भी नहीँ आई जिनके साथ मोदी का ना जुडा होने की चर्चा आम थी. बल्कि उसके बाद तो मोदी को गजरात से बाहर कर दिया गया था. पर इस किताब मेँ अपने पक्ष मेम न लिखने वाले पत्रकार दर्शन देसाई समेत कई को परेशान करने, तबाह करने समेत कई ब्यौरे ऐसे भी हैँ जो मोदी के व्यक्तित्व के काले पक्ष को उजागर करते हैँ.

नीलांजन से उलट किंगशुक नाग की किताब की दिक्कत यह है कि वह गुजरात दंगोँ पर ही सारा जोर देती है जिसे नाग ने टाइम्स मेँ रहते हुए ठीक से देखा और कवर किया कराया था. इसके चलते वे मोदी के निशाने पर भी आए. उन्होने मोदी की तरफ से आए दबाव और टाइम्स प्रबन्धन द्वारा उसके आगे न झुकने का हवाला भी दिया है. शायद इसी चलते मोदी ने उनको किताब के सिलसिले मेँ इंटरव्यू का वक्त नहीँ दिया होगा. यह भी सम्भव है कि जल्दी किताब लाने के चक्कर मेँ उन्होने ज्यादा इंतजार नहीँ किया. पर यह कहने मेँ हर्ज नहीँ है कि उन्होने दंगोँ वाला हिस्सा सबसे अच्छा लिखा है और पूरी किताब भी ज्यादा चुस्त-चौकस ढंग से लिखी गई है. पर वे भी अनअम स्रोत्ओँ के सहारे ही मुख्य कथा आगे बढाते हैँ जो बताता है कि दंगोँ के बाद अब वे भी मोदी से पंगा लेने के मूड मेँ नहीँ हैँ. उनको कैरियर मेँ कोई नुकसान हुआ हो या मोदी का दबाव और ज्यादा हो यह बात कहीँ लिखी नहीँ गई है. पर वे गुजरात मेँ गैस का बहुत बडा भंडार मिलने के झूठे प्रचार या नैनो कार कारखाना लाने मेँ नीरा राडिया की सेवाओँ की चर्चा करके मोदी की कार्यपद्धत्ति और कथित सफलताओँ की पोल भी खोलते हैँ. वे मोदी के राजेश खन्ना स्टाइल बाल बनाने या कुर्ता समेत कपडे पहनने का जिक्र भी करते हैँ और उनकी जीवन शैली भी बताते हैँ. अब मोदी से न मिल पाना या नए सिरे से फील्ड मेँ  जाकर शोध न करने जैसे मसलोँ को कोई भुला दे तो यह एक पढनीय किताब लगेगी. यह भाजपा या नरेन्द्र मोदी या संघ विरोधी स्वर की किताब तो नहीँ ही है पर उनके पक्ष मेँ भी नहीँ है. यह एक खास लाभ वाले अवसर पर आने वाली किताब जरूर है.

सुदेश वर्मा की किताब के बारे मेँ ये दोनोँ आखिरी बातेँ सही लगती हैँ-यह मौके को भुनाने की तैयारी से आई किताब भी है और मोदी के पक्ष की भी. लेखक खुद भी कोई भ्रम नही रहने देना चाहते क्योंकि वे भूमिका से ही मोदी के खिलाफ कही हर बात को धूल मेँ मिलाने के दावे के साथ ही शुरुआत करते हैँ. उन्हे लगता है कि मोदी के खिलाफ कही किसी बात मेँ कोई दम नहीँ है और कम स एकम उनके मुन्ह पर तो कोई मोदी के आलोचना करके जीत नहीँ सका है-तर्क और तथ्य के आधार पर ये आरोप कहीँ ठहरते ही नहीँ. और अंतिम अध्याय तक आते आते सुदेश मोर लायल दैन किंग बन जाते हैँ जिसका हल्का जिक्र पहले किया जा चुका है. पर एक लम्बे समय तक भाजपा बीट पर काम करने के चलते सुदेश को मोदी के दौर मेँ घटी अनेक घटनाओँ की याद काफी अच्छी है. और उनके विवरण देते हुए वे मोदी और उनकी कार्यपध्दति के बारे मेँ जाने –अनजाने कई चीजेँ बता देते हैँ. जैसे दंगोँ के बाद हुए गुजरात मेँ मोदी की कथित गौरव यात्रा की गौरव कथा कहते हुए वे मोदी की पूरी साम्प्रदायिक राजनीति को सामने रख देते हैँ. इसी यात्रा मेँ मोदी ने मुख्य चुनाव आयुक्त लिंगदोह को खालिस इसाई और सोनिया गान्धी के इशारे पर चलने वाला बताने से लेकर सोनिया को विदेशी, मुसलमानोँ को पांच हम, हमारे पचीस अर्थात जंसंख्या बढाने की मशीन और मियाँ मुशर्रफ को दुश्मन बताने जैसी न जाने कितनी बातेँ की थी. मोदी जब दिल्ली मेम भाजपा मुख्यालय मेँ रहते थे तब की दोस्ती के सहारे भी कई ब्यौरे दिए गए हैँ. कहने को तो किताब मेँ 50000 हाइपरलिकोँ को खंगालने का दावा किया गया है पर असल मेँ वही व्यौरे रोचक और जानकारी वाले हैँ ( भले वे पक्षपाती होँ) जो सुदेश ने अपनी ओर से दिए हैँ. जैसे गुडगांव से सुधा यादव के चुनाव संचालन का जो ब्यौरा उन्होने दिया है, या सुखराम को पटाने का वह सब मोदी की कार्यशैली का सही रूप बताते हैँ. ऐसे व्यौरे किसी अन्य जगह नहीँ हैँ और सम्भवत: सुदेश ने भी बहुत विचार कर यह नहीँ लिखा है.

असल मेँ सुदेश की किताब अभी वाले दौर की प्रतिनिधि किताब है और हर बडे अवसर पर ऐसी किताबेँ आती ही हैँ. इन सनसे मोदी को क्या घाटा होगा यह कहना मुश्किल है-अगर कुछ होगा भी तो फायदा ही. पर सुदेश के लिए तो कहना बहुत जरूरी नहीँ है लेकिन नीलांजन जैसोँ के लिए कहा जा सकता है कि उन्होने बडा मौका हाथ गंवा दिया है. अगर थोडी सी हिम्मत और चालाकी से वे सभी मसलोँ को सम्भालते तो मोदी तो मोटे ग्रंथ लायक विषय हैँ ही.
1.नरेन्द्र मोदी; द मैन द टाइम्स
लेखक; नीलांजन मुखोपाध्याय
मूल्य-495 रु. (हार्डबाउंड), पृष्ठ संख्या-410
प्रकाशक: ट्रंक्यूबार, नई दिल्ली
2. द नमो स्टोरी; ए पोलिटिकल लाइफ
लेखक; किंग्शुक नाग
मूल्य- 295 रु., पृष्ठ्संख्या- 184
प्रकाशक- रोली बुक्स, नई दिल्ली
3. नरेन्द्र मोदी; द गेमचेंजर
लेखक; सुदेश वर्मा
प्रकाशक- वितास्ता पब्लीशिंग, नई दिल्ली

( भड़ास4मीडिया से साभार. लेखक अरविंद मोहन वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक हैं. उनका यह लेख थोड़ा कटकर 'समयांतर' में प्रकाशित हो चुका है. भड़ास पर अविकल प्रस्तुत किया गया है. अरविंद मोहन पच्चीस साल से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. जनसत्ता, हिंदुस्तान, इंडिया टुडे, अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े रहे. फिलहाल न्‍यूज चैनलों में सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों के रेगुलर पैनलिस्‍ट हैं और कई अखबारों में स्‍तंभ लेखन कर रहे हैं.)

चोर चोर चोर चोर ...महाचोर

देश के भीतर और बाहर कालाधन छिपाने वाले महाचोर भारत में गरीबी-कुपोषण और बीमारियों के शिकार लाखों बच्चों और स्त्रियों, आत्महत्या के लिए मजबूर कर्ज से लदे किसानों, एक एक रुपये के मोहताज करोड़ो-करोड़ बेरोजगार नौजवानों, फुटपाथों पर दिन बसर कर रहे अनगिनत भिखारियों, कुल आबादी के दो तिहाई वंचित जनों के मुश्किल हालात के अपराधी हैं। इन्हें कभी माफ नहीं किया जाना चाहिए। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा गंभीरतम मसला है, जिस पर उच्चतम न्यायालय की भूमिका को पूरा देश बड़े गौर से देख-सुन रहा है। सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि भारत में छिपाया गया कालाधन क्यों नहीं पकड़ा जा रहा है, क्योंकि यहां पर तो सरकार की अपनी पुलिस और न्याय व्यवस्था है..??????

विदेशों में जमा काला धन सिर्फ़ कर चोरी से संबंधित नहीं, इससे ड्रग, हवाला, अवैध हथियार आदि के आरोपियों, चुनावबाज कई बड़ी पार्टियों, बड़े नेताओं और अधिकारियों के हाथ रंगे हैं। इसमें मीडिया की दुनिया से लेकर खेल,  बॉलीवुड तक के महाचोर शामिल हैं। ये काला धन शेयर, बान्ड्स के अलावा सोना, क़ीमती पत्थर, हीरा, ज़ेवरात आदि के रूप में लॉकरों में छिपाया गया हैं। सूत्रों के अनुसार हर साल लगभग एक ख़रब डॉलर के बराबर काला धन भारत में बन रहा है।

एक जानकार के अनुमान के मुताबिक़ ये धन 500 अरब डॉलर के बराबर हो सकता है और इसे वापस लाने में पांच से दस साल तक लग सकते हैं, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव में वादा किया था कि वे सत्तासीन होने के सौ दिन के भीतर काला धन वापस लाएंगे और हर भारतीय को उस धन में से तीन-तीन लाख रुपये मिलेंगे। लगभग तीन दशक पहले बोफ़ोर्स मामले में शोर मचा था लेकिन एक कौड़ी भी वापस नहीं लाई जा सकी। अर्थशास्त्री कहते हैं कि भारत में मौजूद काला धन विदेशों से ज़्यादा है। अब यूपीए सरकार के लिए खोदे गये गड्ढे में ख़ुद गिरते नज़र आ रहे हैं नये सरकार......

वित्त मंत्री अरुण जेटली की टिप्पणी की देश भर में कड़ी निंदा हो रही है। पांच महीने पुरानी सरकार पहली बार इतने कड़े विरोध का सामना कर रही है। भाजपा ने चुनावी मुहिम के दौरान एक विशेष समिति बनाई थी जिसने विदेशों में रखे भारतीयों के काले धन का एक अंदाज़ा लगाया था कि वह एक खरब डॉलर के करीब है।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में 627 लोगों के नामों की सूची बंद लिफाफे में सौंप दी है।

Tuesday, 28 October 2014

राजेंद्र यादव का वो बोल्ड इंटरव्यू जिसे जयंती रंगनाथन ने लिखा था...

(जयंती पर विशेष)

पहली बार कब पढ़ा था राजेंद्र यादव को.. ..? लगभग तीस साल पहले। उस समय की दूसरी किशोरियों की तरह साहित्य पढ़ने की शुरुआत में ही दो महत्वपूर्ण उपन्यास से रूबरू हुई धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’ और राजेंद्र यादव का ‘सारा आकाश’। ‘गुनाहों का देवता’ ने मुझे उतना प्रभावित नहीं किया, जितना ‘सारा आकाश’ ने किया था। सुधा और चंदर खासकर सुधा का चरित्र जरूरत से ज्यादा कमजोर लगा। बीच में चंदर और नर्स का प्रसंग भी मुझे अरुचिकर लगा। लेकिन ‘सारा आकाश’ की नायिका के संघर्ष से मैं अपने को जोड़ पाई। भाषा, शैली, सब कुछ सहज और सरल। इसके कुछ सालों बाद जब धर्मयुग से जुड़ी, तो सारा आकाश और राजेंद्र यादव के जिक्र पर एक सीनियर कलीग ने टिप्पणी की, “ उपन्यास अच्छा लगा, तो वहीं तक रखो। कभी लेखक से मिलने की इच्छा मत करना। यादव जी भारती जी नहीं हैं।”
भारती जी मेरे बॉस थे, संपादक थे। हालांकि जिस समय मैं धर्मयुग से जुड़ी (1985 में), वे दूसरों के हिसाब से काफी बदल चुके थे। हंसते भी थे और अपने स्टाफ को ब्रीदिंग स्पेस भी देते थे। लेकिन कभी मुझे उनके साथ यह नहीं लगा कि मैं सहज हो कर गपियाऊं या उनसे चर्चा करूं। दूरियां थीं, काफी थीं। (मैं कुछ ज्यादा अपरिपक्व थी और वे उम्र और पद के हिसाब से ज्यादा परिपक्व)।
सालों बाद मुंबई से दिल्ली आना और बसना हुआ। राजेंद्र यादव के जिक्र पर कई लोगों से सुनने को मिला, “रसिया आदमी हैं। अगर आप अपने को बचा सकें, तो जरूर जाइए और मिलिए।”

हंस की गोष्ठियों में दूर से उन्हें देखा, हमेशा युवा स्त्रियों से घिरे, हंसते-ठहाके लगाते हुए यादव जी। कभी हिम्मत नहीं हुई पास जाने की, बात करने की।

इस बीच उनसे बिना मिले ही हंस में दो कहानियां छपीं। उसी दौरान धीरेंद्र अस्थाना और उनकी पत्नी ललिता भाभी के साथ पहली बार राजेंद्र यादव से मिलना हुआ। धीरेंद्र जी ने परिचय कराया, तो राजेंद्र जी ने सहजता से कहा, “तो तुम हो जयंती! ”

उस दिन एक दीवार टूट गई। मेरे सामने जो था वो एक पारदर्शी व्यक्ति था। सहज और सरल। मेरी कल्पना से परे। लगा कि एक्ट कर रहे हैं। लेकिन सबके साथ वे ऐसे ही थे।

फिर भी एक संकोच था। जो टूटा कुछ सालों बाद, जब मैं गीताश्री, अमृता, कमलेश और असीमा के साथ उनसे मिलने लगी, अकसर उनके घर पर हम सब धमाल मचाने पहुंचने लगे। राजेंद्र जी खुश होते थे, हंसते थे, तमाम विषयों पर खुल कर जिक्र करते थे। हमें वे कहते गुंडियां- बड़ी गुंडी, मंझली गुंडी और छोटी गुंडी। अपनी असुरक्षाओं का जिक्र करते, जिंदगी में अकेलेपन को लेकर अपना पक्ष बताते। लेकिन अधिकतर वे खुश रहते, ठहाके लगाते।

इन सबके बीच वो राजेंद्र यादव कहां है, जिनके बारे में सालों पहले मुझे सावधान किया गया था? ये तो एक ऐसा शख्स था, जिसके सामने हम अपनी तरह से रह सकते थे, वो कह सकते थे, जो ना जाने कब से हमारे अंदर था और बाहर निकल नहीं पा रहा था।

क्या हम स्त्रियां ऐसे पुरुष को नहीं जानना चाहतीं, जो उनका चेहरा पढ़ ले, जिनके सामने वे अपना स्त्री होना भूल जाए और सिर्फ यह याद रखे कि वो एक जीती-जागती मनुष्य भी है आकांक्षाओं और इच्छाओं से लबालब।

हमारे गैंग के कुछ सदस्यों को राजेंद्र यादव के नॉनवेज जोक्स पर एतराज है। लेकिन एंजाय सभी करते हैं। एसएमएस सभी शेअर करते हैं। हर साल राजेंद्र यादव के जन्मदिन की पार्टी में कई दिलचस्प किरदारों से मुलाकातें, बहस, शेअरिंग, गैंग में शामिल होते नए सदस्य-कड़ी से कड़ी जुड़ रही है।

मैं हर बार जान रही हूं राजेंद्र यादव के व्यक्तित्व के नए पहलुओं को। वाकई यह व्यक्ति औरों से अलग है। अपने ऊपर उम्र को हावी होने नहीं देता। कभी यह अहसास नहीं होने देता कि वह ‘ द राजेंद्र यादव’ है। हां, इसका नुकसान भी है। जब कोई नया व्यक्ति उनसे मिलता है और उनके आसपास एक खास किस्म के ‘ऑरा’ की अपेक्षा करता है, तो उसे निराश होना पड़ता है।

उनसे कई बार कई विषयों पर बात हुई। गंभीर और अगंभीर बातें। फिजूल की बहसें भी हुईं। उनकी टिप्पणियां हर बार आपको अच्छी लगें, यह भी जरूरी नहीं। लेकिन मित्रवत बातचीत के अलावा एक औपचारिक इंटरव्यू लेने की बात जब आई, तो तय हुआ कि हम साहित्य से इतर ही बात करेंगे। ऐसे राजेंद्र यादव के बारे में बात करेंगे, जो अभी भी कुछ स्त्रियों को ‘डराता’ है, एक बौध्दिक वर्ग को ‘छिछोरा’ लगता है और हंस के पाठकों और एक बड़े प्रशंसक वर्ग को ‘अभिभूत’ करता है।

आप कितने अ-साहित्यक व्यक्ति हैं?
जब मैं पढ़ता या लिखता हूं तो पूरी तरह एक साहित्यिक आदमी होता हूं, लेकिन इसके बाद मैं कोशिश करता हूं कि एक आम आदमी की तरह हंसू, बर्ताव करूं। आइ वांट टू बी लाइक ए कॉमन मैन। इसके लिए मुझे किसी तरह की कोशिश नहीं करनी पड़ती। मुझे यह नेचुरल लगता है। शाम को घर लौटने के बाद या तो दोस्तों से मिलना-जुलना होता है, अकेला होता हूं तो कोई फिल्म देख लेता हूं।

आपका मन नहीं होता कि अलग क्षेत्र के लोगों से मिले-जुलें?
मिलना चाहता हूं.. . दिक्कत क्या है कि हमारे सर्किल में ऐसे लोग नहीं हैं, सारे पढ़ने-लिखने वाले हैं। कभी-कभी इच्छा होती है कि ऐसे लोगों से मिला जाए जिनका साहित्य से कोई लेना देना नहीं है।

अगर सफर में ऐसे व्यक्ति का साथ मिल जाए, जो आपको नहीं जानता, तब आपकी क्या प्रतिक्रिया होती है?
मैं अपनी तरफ से कभी नहीं बताता। अगर पूछे तो सिर्फ इतना बताता हूं कि लिखने-पढ़ने का काम करता हूं। ज्यादा पूछे तो कहता हूं कि मैगजीन निकालता हूं। मैं उनके और अपने बीच डिस्टंस पैदा नहीं करना चाहता। मुझे यह भी अच्छा नहीं लगता कि कोई मेरे पैर छुए या मुझसे दूरी बना कर चले। हमेशा से यही लगता रहा कि मैं लोगों के करीब रहूं। पैर छुआना, ओरा बना कर चलना--यह सब ड्रामा लगता है। अच्छा लगता है जहां बेतकल्लुफ-सी बातचीत हो, दुराव-छिपाव ना हो, खुल कर हो, गंदी बातें भी कर सकें और अच्छी बातें भी।

एक आम आदमी का जीवन कितना मिस करते हैं आप? उम्र के इस मोड़ पर पहुंच कर आप एक एक्टिव जिंदगी जी रहे हैं, कभी लगता है कि कहीं प्रोफेसर होते या कोई और काम किया होता?
कभी नहीं..

लेकिन यादव जी पैसा तो नहीं है ना इस फील्ड में .. ..
हां, लेकिन ना मुझे इसका अफसोस है ना कभी इच्छा रही। मेरी इच्छाएं, खासकर अपने लिए बहुत कम हैं, शुरू से।

हाल ही में गीताश्री की पुस्तक के विमोचन समारोह में आप पर खूब फब्तियां कसी गईं, आपने दो लाइन क्या लिखा करीना कपूर के बारे में कंट्रोवर्सी बन गई.. कहा गया कि बुढ़ापे में जवां लड़कियों का ‘ शौक ’ हो जाता है, मनीषा ने भी यह बात कही और मैत्रेयी ने भी।
अच्छा यह बताओ, क्या मुझे एक सुंदर लड़की देख कर एप्रीशिएट कहने का हक नहीं? इस तरह के विवादों का मुझ पर कोई असर नहीं पड़ता। मैं समझता हूं कि जो कह रहा है, वो बेवकूफ है। अगर इनमें से किसी को मैं इस निगाह से देखता तो शायद उनको खुशी होती।

 अब तो आपकी हर बात कंट्रोवर्सी बन जाती है। पहली कंट्रोवर्सी कौन सी बनी?
ठीक से याद नहीं। पर मेरे उपन्यास ‘सारा आकाश’ में एक शिरीष नाम का किरदार था, जो धर्म-कर्म किसी पर यकीं नहीं करता था, इसको ले कर विवाद छिड़ा। बाद में होता ही रहा। उस समय मुझे लगा कि जो मैं कह रहा हूं, सही है और मन से कह रहा हूं और इसे ऐसा ही होना चाहिए। मुझे याद है, बहुत पहले पैंसठ-सत्तर की बात है, मैंने एक लीड लिखा कुछ शास्त्रीय निषेधों के बारे में-प्राध्यापकों के खिलाफ, जो जड़ होते हैं, जो अपनी दुनिया से बाहर निकलना नहीं चाहते और यह समझते हैं कि साहित्य सिर्फ उतना ही है जितना हम जानते हैं, आधुनिक साहित्य को आने ही नहीं देंगे। मैंने एक लंबा लेख लिखा था, डॉ नरेंद्र और उन जैसे लोगों के खिलाफ बाकायदा खुल कर लिखा था। उसे ले कर बहुत कंट्रोवर्सी हुई। उस समय वह अजंता में छपा था।

आपकी कितनी उम्र रही होगी उस समय ?
मैं तीस के ऊपर का था। शुरू से ही मैं जो एस्टाब्लिश- स्थापित और स्वीकृत है, उनको विकर्षक्रित करना चाहता हूं। मुझे लगता है कि चीजों को जैसे का तैसा स्वीकार करना गलत है।

स्त्री को जान पाने की पहल सबसे पहले कब हुई?
बड़ा मुश्किल है कहना। जाइंट परिवार था। 18 बहनें थीं, कुछ बड़ी कुछ छोटी। किसी के प्रति ज्यादा अटैचमैंट था। कहना चाहिए कि इमोशनल टाइज वहीं से शुरू हुए। धीरे-धीरे लगा कि हम जिस स्त्री को जानना चाहते हैं वह कम से कम मेरी बहन नहीं है, बेटी नहीं है, मां नहीं है।
बेटी, मां,बहन आपका चॉइस नहीं, आपको दे दी गई हैं। हमारी चाइस वो स्त्री है जिसे हमने चुना, हम उस स्त्री की बात कर रहे हैं। मां, बहन, बेटी के बारे में बात करनी भी नहीं चाहिए। ये महिलाएं किसी और के लिए औरत होंगी, हमारे लिए नहीं हैं।
मैंने हमेशा स्पष्ट कहा है कि स्त्री विमर्श पर बात करनी है तो मां, बेटी और बहन इन तीन संबंधों पर बात नहीं करूंगा। घर के अंदर भी स्त्री को जितनी आजादी चाहिए, बहन-बेटी को जो फ्रीडम चाहिए, एजुकेशन चाहिए, मैंने दी है। बेटी को जिंदगी में एक बार थप्पड़ मारा, आज तक उसका अफसोस है। बाद में जिंदगी के सारे निर्णय उसने खुद ही लिए। यह फ्रीडम तो देनी ही पड़ेगी।

‘ अपनी दुनिया की स्त्री’ से आपका साबका कब हुआ?
मेरे फादर डॉक्टर थे। छोटे कस्बों में उनका ट्रांसफर होता था। जहां कंपाउंडर, नौकर, कुक, चौकीदार और उनका परिवार होता था। कंपाउंडर की बेटियों से हमारी दोस्ती थी। उनसे छेड़छाड़ चलता रहता था। स्त्री को वहीं से जानना शुरू किया, उनके शरीर को भी। समझते थे कि हम प्यार कर रहे हैं। वह लस्ट था, आकर्षण था। उस समय बहुत आगे जाने के बारे में मालूम नहीं था।
सच में जिसके साथ अटैचमेंट हुआ वो उन्नीस-बीस साल में हुआ, जो आज तक चला आ रहा है। सेक्स बहुत बाद में आया। शुरू में यह मानना भी मुश्किल था कि वी लव इच अदर। हमारे बीच प्लेटोनिक लव था। चिट्टियां लिख रहे हैं। दक्षिण भारत गए घूमने, रामविलास शर्मा, मैं अमृतलाल नागर वगैरह, वहां से चिट्ठियां लिख रहे है कि तुम भी होती तो कितना अच्छा था, वगैरह वगैरह। तब तक हमने आपस में आइ लव यू नहीं कहा था। यह बात हम लोगों ने पांच साल बाद मानी। जब शादी की बात आई, तो वह कलकत्ते आई, बाकायदा मेरे पास तीन-चार दिन रही। शादी की बात पर उसने कहा- मैं प्यार कर सकती हूं, शादी की योजना मेरे दिमाग में नहीं है।

उस लिबरेटेड वूमन को आप पचा पाए? सम्मान के साथ उसे जाने दिया कि मन में खलिश रह गई?
जिसे मैंने प्यार किया था वो घर में सबसे छोटी थी। उसकी जिम्मेदारियां थीं। फादर उसके बीमार रहते थे या संत हो गए थे। जैन लोग थे। सारे घर का इंतजाम, भाइयों के बच्चों को पढ़ाने-लिखाने का काम वही करती थी। बाद में फॉरच्युनेटली या अनफॉरच्युनेटली उसने डबल एम ए किया, पीएचडी किया और प्रोफेसर हो गई। अधिकार की जो चेतना शुरू में थी, वो बाद में बाकायदा एक ऑफिसर की या प्रिंसेस जैसी हो गई। मुझे हमेशा लगता था कि इसे मैं प्यार तो बहुत करता हूं, मैं जहां कहूं और अच्छी जगहों पर हम मिलें, हम मिलते भी थे, पर शादी के लिहाज से उसकी पर्सनालिटी बहुत स्ट्राँग थी।

क्या आप उसके साथ एक नार्मल जिंदगी जी पाते?
आज उसे शिकायत है कि तुमने मुझे एक बच्चा भी नहीं दिया।

उसकी शिकायत को जेनुइन मानते हैं आप?
नहीं, वह गजब की इगोइस्ट थी। जब पहली बार सेक्स संबंध बने, हम दोनों 10-12 दिन पहाड़ पर रहे थे, उसकी तबीयत खराब हो गयी। महीने भर तक। मुझे शक है कि उसने एबार्ट करवाया। हालांकि उसने बताया नहीं।

इतनी इगोइस्ट महिला से आपको प्यार कैसे हो गया?
हो गया, क्या करें? बल्कि आज भी लड़ती है मुझसे, सत्तर साल की हो गई है, बल्कि अबव सेवंटी, कहीं एक अख़बार में कुछ आ गया होगा उसके बारे में, कहती है कि मैं बिलकुल नहीं चाहती कि कहीं मेरा नाम आए। शी इज पर्सन ऑफ ए स्ट्रांग कैरेक्टर।

क्या वो आपको मिल जाती तो आप दोनों के बीच प्यार रहता? औरत का यह तेज रूप बर्दाश्त कर पाते आप?
मेरे ख्याल से नहीं कर पाता। नई कहानी का सारा दर्द यही है। खास कर मोहन राकेश का-अंधेरे बंद कमरे, आषाढ़ का एक दिन सबकी थीम यही है। हमने स्त्री को पर्सनालिटी दी, आत्मनिर्भरता दी, स्वतंत्रता दी, लेकिन हमारी मानसिकता उसे बर्दाश्त नहीं कर पायी। हमारे संस्कारों में है कि हम रात कहें तो वो रात कहे, दिन कहें तो दिन। ये स्त्रियां अलग थीं। शायद इसलिए हमारी जनरेशन के पुरुष स्ट्रांग स्त्री के साथ निबाह नहीं कर पाए।

आप आज भी अपने भूले बिसरे प्यार को इसीलिए तो याद नहीं कर रहे कि बहुत सारी बातें अनकही रह गईं?
शायद।

क्या आज भी आप अपने आपको रोमांटिक महसूस करते हैं?
आज से दस साल पहले करता था। अब तो खाली एक नोस्टालजिया है। पिछले दिनों मेरी मुलाकात हुई थी उससे, दो-तीन घंटे साथ थे-पर अब नया कुछ नहीं बन सकता।

आप सत्तर प्लस के जॉनर को बिलांग नहीं करते। क्या कहीं यह तो नहीं लगता है कि वो तो बुढ़ा गई है, लेकिन मैं अभी भी यंग हूं...
हां, लगता है। कम्युनिकेशन का लेवल बदल गया है। चूंकि उसे लगता है कि हमने उसे संरक्षण या साथ नहीं दिया, इसलिए उसे अपने परिवार में अपने भाभियों के साथ ही रहना है। कहती है कि जब मुझे सुविधा होगी, तो आऊंगी। नहीं आई तो बुरा मानने की जरूरत नहीं है।

आज जबकि आप दोनों अकेले हैं, वो आपके साथ रहने का निर्णय क्यों नहीं ले पातीं?
उस पर बुढ़ापा आ गया है, असुरक्षा महसूस करती है, कि मुझे वहीं रहना है, अपने भाई-भाभी के बच्चों के बीच। वो ही बुढ़ापे में मेरी देखरेख करेंगे।

वाज शी ब्यूटिफुल?
करीना कपूर नहीं थी, हां प्रंजेटेबल तो थी। कहीं कमरे में जाती थी, तो लोग मुड़ कर देखते थे, एक पर्सनालिटी थी। एक तो कॉन्फिडेंस और दूसरे आधिकारिक लेवल पर काम करने से जो बात आ जाती है, वो ये था कि मुझे उसे साथ ले जाने में शर्म नहीं आती थी।

जिन लोगों के साथ आपके नाम जुड़े, मन्नू भंडारी, मैत्रेयी पुष्पा इनमें असाधारण क्या नजर आया ? क्या ये सब टिपिकल औरतें नहीं थीं?
इनकी जो मानसिक बनावट है, जो गुण हैं, उनसे मैं प्रभावित हुआ। प्रभा खेतान मेरी बहुत इंटीमेट फ्रेंड रही हैं।

मन्नू को आप प्रेमिका क्यों नहीं बना पाए?
बाद में हमने डिस्कवर किया कि जिंदगी सिर्फ लेखन नहीं है। मन्नू का पालन पोषण जिन लोगों के साथ हुआ, वे बहुत भले लोग थे। सुबह नौ बजे दफ्तर जाना, शाम समय पर घर लौट कर बच्चों के साथ समय बिताना। सब उतने ही आत्मीय थे। हमारी लाइफ स्टाइल बिलकुल अलग थी। वो पांच बजे घर आ जाएं और चार बजे हमारे निकलने का टाइम था। ऐसा नहीं है, कई बार वे मेरे साथ आईं, कोलकता में जब तक रहे उसने मेरा साथ दिया। काफी हाउस में देर तक रहना, दोस्तों से मिलना आदि। दिक्कत थी एक पति की जिम्मेदारियां-जो मैं नहीं निभा पाया।

साथ रहना और पति-पत्नी बन कर रहना दो अलग बातें हैं। बीस साल एक आदमी-औरत साथ रहे। एक दिन उनके मन में आया कि क्यों ना हम शादी कर लें। अगले दिन पुरुष ने कहा, सुबह उठ कर कि तुम चाय बनाओ। पत्नी ने जवाब दिया, मैं क्यों बनाऊं, तुम बनाओ जैसा पहले बनाते थे। बात यह है कि शादी दो चीजें मांगता है स्वतंत्रता, नैतिक और दैहिक आचरण। उससे बाहर जाते ही खटखट होनी शुरू हो गई।

बाहर आप खुदा होंगे, घर में आप औरत और आदमी हैं। मन्नू को ऐसा पति चाहिए था, जो उसकी शिकायतें सुनता। उसने अपनी शिकायतें एक्साजिरेट करना शुरू कर दिया। हमारे बाहर भी संबंध थे। शारीरिक नहीं, पर हां अच्छे संबंध तो थे ही। जैसे मृदुला गर्ग से। उसकी पहली कहानी ‘हंस’ में रीराइट करके छापा। उसकी पहली कहानी ‘केअर ऑफ’ अक्षर प्रकाशन छपी थी। उसके उपन्यास को भी रीराइट करना, ठीक करना-हमने ही करवाया। मृदुला के साथ बहुत अच्छे संबंध थे। मन्नू को यह बात पसंद नहीं थी कि बाहर लड़कियों से संबंध रखूं, मिलूं, फोन पर बात करूं।

 पीछे मुड़ कर देखते हैं तो क्या अफसोस होता है कि आप टिपिकल हसबैंड नहीं बन पाए?
मुझे शिकायत नहीं। पर मन्नू की तरफ से सोचता हूं तो लगता है कि मैं असमर्थ था। मुझे अपनी इंडीपेंडेंस के लिए दो रास्तों में एक को चुनना था। या तो विवाह को चुनना था या अपनी आजादी को।

विवाहित जीवन में सुविधाएं भी तो थीं? फिर अलग होने की क्या सोची?
हां.. जब खटखट बढ़ी तो सोचा कि अलग रह कर देखा जाए। महीनों बाहर रहा। कई दिनों तक गाजियाबाद मित्र के घर रहा, कि दोनों एक दूसरे की कमी महसूस कर सकें। छह महीने मैं आईआईटी कानपुर में रहा, यूनिवर्सिटी का गेस्ट बन कर। मन्नू दो साल के लिए चली गई। हमने ये प्रयोग किये कि डे टू डे की क्लेश खत्म हो।

क्या आप विवाह संस्था में यकीन करते हैं?
मैं नहीं करता, लेकिन मन्नू करती है। शादी एक बंधन हो, वहां तक तो ठीक है। लेकिन उसके साथ एक आचरण की जो आचार संहिता है, उसमें मेरा दम घुटता है, मैं वहां एडजस्ट नहीं कर पाता।

मन्नू से अलग होने के बाद में कभी सेटल होने का मन नहीं आया?
नहीं। लेकिन मेरा परिचय कई खूबसूरत महिलाओं से रहा। एक थी शोभना भुटानी, एनएसडी से थी, एक्टर थी। मेरे बहुत क्लोज थी। एक संयुक्ता थी, बहुत खूबसूरत। उन दिनों ‘सारा आकाश’ पर फिल्म बन रही थी आगरा में। मेरे बुलाने पर वह मेरे साथ आगरा आई। स्टेशन पर जैसे ही वह उतरी, सबने कहा कि हीरोइन आ गई। बाद में उसके मन्नू से बहुत अच्छे संबंध बन गए। पता नहीं वो मन्नू को घुमाने कहां-कहां ले गई। लेह-लद्दाख। पहले तो बहुत ईष्या थी मन्नू को उससे लेकिन बाद में वह मन्नू की आलमोस्ट बेटी बन गई।

 क्या देख कर आप स्त्री की तरफ आकर्षित होते हैं?
पहले तो रंग रूप आता है। उसके बाद एक कॉमन कैमिस्ट्री बनती है। मुझे ऐसी महिलाएं पसंद आती हैं जिनसे संवाद बना सकूं, बाकायदा बात कर सकूं, किसी भी विषय पर। हमारे कुछ मित्र रहे हैं, स्त्री के नाम पर जो मिले झाडू लगाने वाली हो या चौका बरतन करने वाली हो, मौका मिला तो दबोच लिया। दिस, आई कांट डू। जिस स्त्री के साथ मैं मन से एक इंटीमेट संबंध ना बना सकूं, उनसे मेरा रिश्ता नहीं बन सकता।

ऐसी कोई महिला आई है, जिसके साथ आपके अच्छे संबंध रहे हों, आपने उनसे संबंध बनाना चाहा हो, लेकिन उन्होंने मना कर दिया?
हां। एक्चुअली सेक्स के स्तर पर मेरा रिश्ता तीन ही महिलाओं के साथ रहा है। मन्नू, दूसरी जिस प्रेमिका का मैंने जिक्र किया और एक और के साथ। बाकि स्त्रियों के साथ सेक्स नहीं हुआ। ऐसा नहीं है कि मैं सेक्सुअली कमजोर हूं, पर उस स्टेज तक आई नहीं बात। आने भी नहीं दिया। हरेक से सेक्स नहीं कर सकता।

लेकिन आप जो ‘ऑरा’ बना कर चलते हैं, उससे तो यही बात सामने आती है कि आपके कई स्त्रियों के साथ दैहिक संबंध रहे हैं। पिछले दिनों अजय नावरिया आपके ही सामने जिक्र करे थे सोनी का, जिसे दीवाली की सुबह उसने आपके घर में नाइट सूट में देखा था। इससे बाहर यही संदेश जाता है कि वो रात को सोई हैं?
नहीं। मेरे उससे इंटीमेट संबंध हैं। मैं चाहता हूं कि मेरे पास जो भी रहे, वो फ्रीली अपना घर समझ कर रहे। मैं यहां आदमी-औरत की बात नहीं करता। अगर वो यहां रहती है, तो उसे पूरी स्वतंत्रता के साथ रहना चाहिए। सोनी जब मुझसे पहली बार मिली थी, तो इक्कीस या बाईस साल की थी और दूसरे साल ही मेरी जान को लग गई कि मैं आपका इंटरव्यू करूंगी और आपसे सेक्स संबंधों के बारे में सवाल करूंगी। इक्कीस साल की लड़की मेरे सामने खुल कर पूछ रही है मेरे संबंधों के बारे में बिंदास। मुझे ऐसी लड़कियां पसंद हैं।

जितनी भी महिलाएं आती हैं, आपसे मिलने, उन सबके साथ आपका नाम जुड़ता है। माना जाता है कि आपके साथ सोती हैं ?
सोनी जब मुझसे आई तो काफी समय बात उसने मुझे बताया कि उसे कहा गया था यादव जी के यहां मत जाओ, खतरनाक आदमी हैं, उनके चंगुल से बच नहीं पाओगी। जो भी है.. .. साल भर हो गया, आपने तो ऐसा कुछ नहीं किया। मैंने हंस कर पूछा कि क्या तुम चाहती हो कि मैं ऐसा कुछ करूं? छूना-छाना, लपक-झपक मौका मिले तो किस करना यह सब तो चलता है, इससे किसी को आपत्ति भी नहीं होती। मुझे कई स्त्रियों ने बताया है कि उन्हें यह बता कर भेजा जाता था कि यादव जी से मिलने जा रही हो तो पर्स में एक छुरा रखना मत भूलना।

सेक्स की जरूरत महसूस नहीं होती आपको?
होती है. . लेकिन मैं अपने को जब्त करता हूं. मैं नहीं चाहता कि जो स्त्रियां मुझसे मिलने आती हैं, जो मुझे ऊर्जा देती हैं, वो मुझसे मिलना छोड़ दें। अब तो तस्वीरों में करीना कपूर को देख कर संतुष्ट हो जाता हूं।

करीना का कौन सा रूप आकर्षित कर गया आपको? ‘टशन’ में स्विम सूट वाला या..?
‘जब वी मेट’ में मुझे वो अच्छी लगी, हम ब्यूटी के साथ एक इनोसेंस, एक डिविनिटी लगा कर देखते हैं। इसलिए ‘टशन’ देखने का मेरा मन नहीं है। एक जमाने में मुझे स्मिता पाटिल बहुत अच्छी लगती थी, बहुत सेक्सी रमोला भी।

कुछ समय पहले जब मैंने आपसे कहा था कि मैं मुंबई जा रही हूं लेस्बियंस पर एक स्टोरी करने तो आपने हँस कर यह कह कर बात उड़ा दी कि दो औरतें कैसे करती हैं सेक्स? आप गे रिश्तों के बारे में क्या सोचते हैं?
हालांकि सन साठ में मैंने ‘प्रतीक्षा’ नाम से कहानी लिखी थी गे सबंधों के बारे में। पता नहीं कितने ट्रांसलेशन हुए, एक अमरीकी आदमी ने अंग्रेजी में ट्रांसलेट किया और इंप्रिंट मैगजीन में छपा। लेस्बियन महिलाओं की बात तो दूर, मुझे सोडोमी एस्थेटिकली नहीं जंचता। संस्कार कहिए या जो भी, मैं इन रिश्तों को समर्थ नहीं देता।vमुझे चालीस साल नॉन वेज खाते हो गए। पिछले पांच-छह सालों से शोरबा खा पाता हूं, पीस नहीं। अब इसे चाहे जो कहो, मुझे एस्थेटिकली ये संबंध गंदे लगते हैं।

लेकिन आंकड़े तो कहते हैं कि हर दस में से एक पुरुष गे संबंधों के प्रति आकृष्ट होता है...
अधिकांश लड़के बचपन में शिकार बनते हैं। इन बॉर्न का नहीं पता। जब हम स्कूल में थे, तो हमसे बड़ी उम्र का एक लड़का स्साला हमें बैठा देता था कि मास्टरबेशन करो। इस तरह के संबंध होते हैं। टीचर लोग पढ़ाने के लिए बच्चों को बुलाते हैं और फिर करवाते हैं। हां.. मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ, लेकिन मैंने देखा है।

औरतों की एक जमात जो आपको सठिया और बुढ़ऊ कहती है, आप कैसे रिएक्ट करते हैं?
मुझे सच में महसूस नहीं होता कि मैं बूढ़ा हूं। यह बात भीतर से ही नहीं आती कि मैं उम्र दराज हो गया हूं।

क्या आप सेवंटी में पहुंची महिला से इसी तरह बेतकल्लुफी से बात कर पाते हैं?
जहां बीच में संस्कार, सीमाएं वगैरह हों, वहां बराबरी की दोस्ती नहीं बन सकती। मैं चाहता हूं जिन स्त्रियों से मेरी दोस्ती हो एक पुरुष की तरह दोस्ती हो। उतनी ही बेतकल्लुफ, संकोचहीन।

ये जो महिलाएं आपके साथ चली आती हैं, दोस्ती करती हैं यह बात सिर्फ वहीं तक नहीं रहती। उन्हें अपने परिवार को जवाब देना पड़ता है?
मान लीजिए मैं किसी लड़की से प्यार करता हूं, उसका नाम ले कर लिख देता हूं। आज वो कहीं किसी की मां है, पत्नी है, वो क्या जवाब देगी? मेरे प्यार का तकाजा यह है कि मैं उसे ऐसी स्थिति में ना डालूं, जहां वो अपने आपको छोटा महसूस कर सके।

अगर कोई महिला ऑटोबायोग्राफी लिखे, आपका जिक्र करे तो आपको फर्क पड़ेगा कि नहीं?
नहीं.. .. मेरे बारे में बहुत कुछ लिखा जाता है। औरतें लिखती रही हैं। एक आई थी, मुझे याद भी नहीं कि वह मुझसे मिली था या नहीं, लेकिन उसने जो मेरे बारे में लिखा वो कोरी बातें थीं, बिलकुल काल्पनिक कि उन्होंने ऐसे देखा जैसे मुझे खा जाएंगे.. वगैरह वगैरह।
मेरे और मेरे लेखन के ऊपर एक बहुत बड़ा सेंसर है वीना का। वीना मेरे क्लोज है, मुझसे बहुत फ्री है। लेकिन वह कहती रहती है कि ‘हंस’ में यह छपेगा और यह नहीं छपेगा। जब मैंने ‘हासिल’ नाम की कहानी लिखी, तो उसने कहा- नहीं छापेंगे, मैं अड़ गया। मोस्ट मशहूर लेख ‘होना सोना’ पर अड़ गई कि नहीं छापेंगे, ‘हंस’ के लायक नहीं, उससे लड़ कर मुझे अपना लेख छापना पड़ा।

जो स्त्रियां नारी मुक्ति का झंडा उठा कर चलती हैं, जो गाहे बगाहे आपके खिलाफ बोलती हैं, उनके बारे में कुछ सुनहरे शब्द हो जाएं?
वे महिलाएं मानसिकता से या उम्र से साठ के ऊपर की हैं, जो नारी मुक्ति को नहीं मानती। जो गोलमोल वक्तव्य में विश्वास रखती हैं कि मनुष्य तो सब एक ही है। अच्छा, जो पुरुष की मानसिकता से लिखा गया है और जो स्त्री की मानसिकता से लिखा गया है, बेसिक अंतर है। दो अलग अप्रोच हैं। उस चीज को तो हमें मानना होगा। क्योंकि उनकी शिक्षा-दीक्षा जिन परंपराओं में हुई, वहां तो लेखक पुरुष ही थे, जो लिखते थे, एकाध थीं, महादेवी वगैरह, जो गोल-गोल बातें लिखती थीं मधुर-मधुर मेरे दीपक जल, उसमें किसको आपत्ति हो सकती थी?

फिर महिलाओं ने जो लिखना शुरू किया, इतनी वेरायटी के साथ आईं, निर्मला जैन, मृदुला, मृणाल- वे फेमिनिस्ट विरोधी हैं। झंडा बुलंद करके चलने वाली स्त्रियां हमें गालियां देती हैं कि हमने उन लेखिकाओं को बिगाड़ दिया। यहां मैं कोट करना चाहूंगा, पिछले साल किसी भी चैनल या न्यूज पेपर ने उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले मायावती के आने की घोषणा नहीं की। वे बस गोल-गोल घूमते रहे। लेकिन जब रिजल्ट आए तो सब चौंक गए। मायावती जीत गईं। कोई तो सचाई थी, जो उसके साथ थी, जिससे बिना शोर मचाए, बिना कहे लोग उसके साथ जुड़े हुए थे।

तो स्त्री विमर्श और दलित विमर्श में कोई तो बात, चीज थी कि आज कोई संवाद, कोई बहस इसके बिना पूरी नहीं होती। यूनिवरसिटी में दलितों का अलग सेक्शन है। यह जो उनके अनचाहे बढ़ रही है, यह बौखलाहट है उनके मन में (झंडा उठा कर चलने वालों के)। इनमें सिर्फ मैत्रेयी है, जो मानती है कि वो स्त्री वादी है। प्रभा तो बकायदा इतनी पढ़ी लिखी है कि अपने तर्कों से वह सबका मुंह बंद कर देती है। यह श्रेय तो हमें मिलना चाहिए कि पिछले बीस सालों में हमने इसे साहित्य का एक सेंटर और करेंट बना दिया।

आप पर जो अश्लीलता का आरोप लगता है, कितना जेनुइन है, कैसी प्रतिक्रिया करते हैं?
बहुत पहले हम शक्ति नगर में रहते थे, तो बस से आते-जाते थे। बस में एक औरत सफर किया करती थी, मेरा ख्याल है वही तीस-पैंतीस की होगी। जब कभी वो किसी पुरुष की बगल में बैठती, तो झगड़ा मोल लेती कि मुझे क्यों छेड़ रहा है? लड़ती हुई जाती थी। सब हंसते हुए जाते थे। यह एक किस्म की कुंठा है कि सब मुझे छेड़ते हैं।
तीस पैंतीस साल की स्त्री मैच्योर होती हैं। उनसे बात करने में यह भी होता है कि आप कोई नई चीज जान लें। वो उनके अंतरमन में झांकने का एक मौका देती हैं।

क्या आपको अफसोस होता है कि आपको तीन चार जनरेशन बाद पैदा होना था? इस जनरेशन के पास जो है पहले नहीं था, इतनी आजादी, विचारों में इतना खुलापन..
ठीक है, हां यह तो सही है कि आज के जनरेशन के पास आजादी है। पर जो है सो है। अब होता है कि बेकार में अपनी जिंदगी खराब की। रोंमाटिसिस्म में और इन सबमें कई खूबसूरत चीजें अनदेखी कर दी। अफसोस तो होता है।

 किसी चीज की शिकायत रह गई? पावर, पैसा या और कुछ?
उस मामले में जो मैंने चाहा मुझे मिला। इस तरह की कोई शिकायत नहीं है। हां, अकेलापन कभी-कभी खलता है।

 जो भी औरत आपके पास, आपसे मिलने आती है, आपसे क्या चाहती है?
शुरू में जो भी आती है एक दूरी बना कर आती है। जब इंटीमेट हो जाती है तो फिर आदमी-औरत वाली बात नहीं रहती। उससे ऐसा रिश्ता बन जाता है जिसमें वो लड़ भी सकती है गाली भी दे सकती है।

ऐसे संबंध आपको ज्यादा प्रिय हैं?
बिलकुल। इंटीमेट, बेतकल्लुफी भरे संबंध मुझे अच्छे लगते हैं।

आप अपनी फेंटेसीज किसके साथ शेअर करते हैं?
किसी से नहीं। कभी डायरी में लिख दिया, तो लिख दिया। हां मिस तो करता हूं कि किसी से कह नहीं पाता।यहां मैं चीनी कम फिल्म का जिक्र करूंगा। यह फिल्म मुझे बहुत अच्छी लगी। उसमें नायक-नायिका (अमिताभ बच्चन-तब्बू) के बीच जो एज डिफरेंस और अंडरस्टैडिंग है, बहुत सही है.
मैं मानता हूं अपने से यंग छोटी उम्र की स्त्रियों के साथ दोस्तियां बनी रहे, यह आपको युवा रखता है।

(samachar4media.com से साभार)

भास्कर चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल पर शादी का झांसा देकर देश-विदेश में रेप करने का आरोप


(यशवंत सिंह, एडिटर, भड़ास4मीडिया )


डीबी कार्प यानि भास्कर समूह के चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल के खिलाफ एक महिला ने शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने का आरोप लगाया है. इस बाबत उसने पहले पुलिस केस करने के लिए आवेदन दिया पर जब पुलिस वालों ने इतने बड़े व्यावसायिक शख्स रमेश चंद्र अग्रवाल के खिलाफ मुकदमा लिखने से मना कर दिया तो पीड़िता को कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. कोर्ट में पीड़िता ने रमेश चंद्र अग्रवाल पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं. पीड़िता का कहना है कि रमेश चंद्र अग्रवाल ने उसे पहले शादी का झांसा दिया. कई जगहों पर शादी रचाने का स्वांग किया. इसके बाद वह लगातार संभोग, सहवास, बलात्कार करता रहा.
बाद में रमेश चंद्र अग्रवाल ने पीड़िता का उसके पति से तलाक करवाया. आखिरकार जब रमेश चंद्र अग्रवाल का पीड़िता से मन उब गया तो उसने उसे किनारे कर दिया और कोई भी संपर्क रखने से बचने लगा. इससे मजबूर होकर पीड़िता को कोर्ट का रास्ता अपनाना पड़ा.

पीड़िता ने कोर्ट में लिखित शिकायत  में जो कुछ कहा है, वह न सिर्फ चौंकाने वाला है बल्कि एक बड़े मीडिया हाउस के मालिक की महिलाओं के प्रति नजरिए को भी उजागर करता है. बेटियों, महिलाओं को बचाने, सम्मान देने, बराबरी देने के ढेर सारे नारे देने वाला भास्कर समूह का चेयरमैन खुद महिला उत्पीड़न के एक बड़े मामले में आरोपी बन गया है.
देश के बाकी सारे मीडिया हाउस, अखबार, न्यूज चैनल इस खबर पर कतई एक लाइन न तो लिखेंगे, न दिखाएंगे क्योंकि उनके बिरादरी, फ्रैटनर्टी का मामला है. अगर यही मसला किसी और का होता तो मीडिया हाउस न जाने कबका इतना शोर मचा चुके होते कि पुलिस आरोपी को गिरफ्तार कर जेल में डाल चुका होता. ये खबर उन पत्रकारों, संपादकों के लिए है जो दिन भर पत्रकारिता के पतन पर आंसू बहाते रहते हैं लेकिन मीडिया के मालिकों की घिनौनी करतूत पर चुप्पी साधे रहते हैं.

अब पूरा दारोमदार सोशल मीडिया, न्यू मीडिया, वेब, ब्लाग, ह्वाट्सएप आदि पर है जहां इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर कर पूरे मामले को जनता के बीच ले जाया जा सकता है और बड़े लोगों की काली करतूत को उजागर किया जा सकता है. ये पूरा प्रकरण भड़ास के पास ह्वाट्सएप के जरिए पहुंचा है. सोचिए, अगर ये न्यू मीडिया माध्यम न होते तो बड़े लोगों से जुड़ी काली खबरें हमारे आप तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ जातीं क्योंकि बिकाऊ और बाजारू कार्पोरेट मीडिया का काम बड़े लोगों से जुड़ी भ्रष्टाचार और अत्याचार की खबरों को छापना नहीं बल्कि छुपाने का हो गया है.