Friday, 24 October 2014

धन-मीडिया का जंगल में मंगल

(रायपुर में कंजरवेशन कोर फिल्म फेस्टिवल में सुदीप ठाकुर का व्याख्यान)

जंगलों को निवेश का जरिया बनाने में मीडिया की भी बड़ा भूमिका है. कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो मीडिया को भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से निवेश का फैसलिटेटर बना दिया गया है. इसकी सबसे बड़ी वजह है मीडिया समूहों में आने वाली पूंजी. पता ही नहीं चलता है कि यह कहां कहां से और कैसे आ रही है. न जाने कितने औद्योगिक समूहों के हित मीडिया से जुड़ गए हैं. नतीजतन मीडिया में जंगल की जमीन सिमटती जा रही है. 

देश का कोई सर्वाधिक उपेक्षित और वंचित तबका है, तो वह आदिवासी हैं. मैं न तो यह कोई नई बात कह रहा हूं और न ही कोई रहस्योद्घाटन कर रहा हूं. यह सवाल भी न जाने कितनी बार दोहराया जा चुका है कि आखिर ऐसा क्यों है कि जिस तबके ने प्राकृतिक संसाधनों के साथ साहचर्य स्थापित किया था, उसे उनके जंगलों से ही बेदखल किया जा रहा है?
जंगल में आदिवासी : विकास की हमारी अवधारणा में हम उसे बराबरी का दर्जा क्यों नहीं देना चाहते? या फिर ऐसा क्यों हुआ है कि जितनी भी बड़ी परियोजनाएं हैं फिर वह बांध हो, बिजली संयंत्र, लोहे या कोयले की खदानें, उसका सर्वाधिक खामियाजा आदिवासियों, वनवासियों के साथ ही वन्यजीवों को भुगतना पड़ता है? ये सवाल न तो पहली बार पूछे जा रहे हैं और न आखिरी बार.
हर तीसरा छत्तीसगढ़िया : असल में यह मुद्दा इस बात से जुड़ा है कि आखिर जंगलों और आदिवासियों के साथ हमारा बर्ताव किस तरह का है. हम छत्तीसगढ़ के उदाहरणों से ही समझ सकते हैं. यहां 44 फीसदी वन क्षेत्र हैं, जिसमें से बड़ा हिस्सा रिजवर्ड और प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट के तहत आता है. यहां लोहा, बॉक्साइट जैसे महंगे खनिज दबे हुए हैं, हीरे तक की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं. साल, सागौन, बीजा, महुआ, तेंदू जैसे पेड़ों के घने जंगल हैं. बाघ, तेंदुआ, चीतल, वनभैंसा जैसे जीव हैं और यहां की कुल आबादी का 30 फीसदी हिस्सा आदिवासी हैं. यानी हर तीन में से एक छत्तीसगढ़िया आदिवासी है!
मगर इस आदिवासी की छत्तीसगढ़ में क्या भूमिका है? नीतियां बनाने से लेकर निर्णय लेने में उसकी भूमिका कहीं दिखती नहीं है. हैरत की बात है कि जिस क्षेत्र को आदिवासी बहुल और उपेक्षित होने के कारण अलग राज्य बनाया गया, उसे अब दुनियाभर में खदानों, पावर प्लांट और इस्पात संयंत्रों और माओवादी हिंसा की वजह से जाना जाता है. माओवादियों का प्रभाव क्षेत्र बढ़ गया. मुझे ठीक-ठीक जानकारी नहीं है कि यहां पिछले 14 वर्षों में राज्य बनने के बाद कितना निवेश हो चुका है, लेकिन मेरी जानकारी में अभी 31 अगस्त 2014 से 30 सितंबर 2014 के बीच छत्तीसगढ़ से छह खदानों में 1416.4 हेक्टेयर क्षेत्र के फारेस्ट क्लियरेंस से संबंधित प्रस्ताव केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय को दिए गए हैं. इनमें बैलाडीला की खदान नंबर 13 का प्रस्ताव भी है, जहां से महज 75 किमी दूर इंद्रावती टाइगर रिजर्व है.
सरकार ने खुद माना है कि उस क्षेत्र में तेंदुआ, वनभैंसा, सांभर,भालू जैसे वन्यजीव देखे जाते हैं. सर्वोच्च अदालत तक ने टाइगर रिजर्व के आसपास खनन पर रोक लगाई है. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के मुताबिक हर राज्य के लिए अपने हर वन्यजीव क्षेत्र में कोर और बफर जोन को अधिसूचित करना अनिवार्य है. इस अधिनियम के मुताबिक 800 से 1000 वर्ग किमी के क्षेत्र को कोर एरिया के रूप में और बाकी के क्षेत्र को बफर क्षेत्र के रूप में नोटीफाई किया जाना चाहिए.
1990 के दशक में मैंने रिपोर्टिंग के दौरान देखा था कि किस तरह केंद्र और राज्य की सरकारें बैलाडीला की 11 बी खदान एक निजी कंपनी को देने को उतावली थीं. 11 बी एशिया की सबसे उम्दा लौह अयस्क खदान है. यहां 68 फीसदी तक आयरन ओर है. तत्कालीन प्रदेश सरकार ने सिर्फ 16 करोड़ रुपये में इसकी लीज के हस्तांतरण का फैसला कर लिया था.
इस दौड़ में जो कंपनियां लगी हुई थीं उनमें तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव के बेटे की कंपनी तक शामिल थी. खैर बड़े आंदोलन और अदालती कार्रवाइयों के बाद उसका निजीकरण नहीं हो सका. बात सिर्फ निजी क्षेत्र की नहीं है, सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों ने भी खदानों का दोहन तो खूब किया है, लेकिन जंगलों और आदिवासियों को होने वाले नुक्सान की भरपाई नहीं की है. बेशक, बैलाडीला और रावघाट में सबसे उम्दा लौह अयस्क मिलता है. मगर यह किस कीमत पर और किसकी कीमत पर चाहिए?
किसका कानून : ऐसा नहीं है कि आदिवासियों के हितों को संरक्षित करने के लिए कुछ नहीं किया गया. संविधान में दर्ज पांचवी और छठी अनुसचियां, 1996 का पेसा और 2006 का वन अधिकार अधिनियम जैसे कई उपाय हैं. इसके बावजूद हालात नहीं बदले हैं. मैं दो महत्वपूर्ण कानूनों का जिक्र करना चाहूंगा. एक है 1927 का वन अधिकार कानून और दूसरा है 1894 का जमीन अधिग्रहण कानून जिन्हें बदलने में अस्सी से सौ बरस तक लग गए. अब इन दोनों कानूनों को भी बदलने की बात होने लगी है, क्योंकि इन्हें निवेश और विकास की राह में रोड़ा माना जा रहा है!
आप कहीं भी देख लीजिए विकास संबंधी जितनी भी परियोजनाएं हैं, उसके लिए आदिवासियों को ही बेदखल किया जाता है.
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कल्याण से संबंधित संसद की स्थायी समिति ने 23 अक्टूबर, 2008 को लोकसभा में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि विकास के नाम पर आदिवासियों को और भुगतना न पड़े. आदिवासी मामलों से संबंधित मंत्रालय को उन जगहों का संज्ञान लेना चाहिए जहां आदिवासी विस्थापन और अपने अस्तित्व को लेकर संघर्ष कर रहे हैं.
टाइम्स ऑफ इंडिया, 15 अक्टूबर, 2012 की एक रिपोर्ट बताती है कि मध्य प्रदेश के सिंगरौली क्षेत्र में कोयला खदान के विस्तार के कारण 500 सौ आदिवासियों को विस्थापित होना पड़ा है, जिनकी पहुंच वनोपज से दूर होती जा रही है. ये लोग पीढ़ियों से वहां रहते आए हैं. वहां जंगलों में बाउंड्री बना दी गई है जिससे आदिवासी वनोपज एकत्र करने नहीं जा सकते. ऐसा हर उस जगह हो रहा है, जहां नए संयंत्रों या खदानों के लिए जमीन अधिग्रहित की जा रही हैं. यानी उन जगहों पर जंगल कंपनी का हो गया है! यह नया कंपनी राज है! इस कंपनी राज के लिए किसी लाइसेंस की जरूरत नहीं है, क्योंकि लाइसेंस राज को तो खत्म कर दिया गया है. अब तो सिंगल विंडो का जमाना है. सरकारें कॉरपोरेट को खुद आमंत्रित कर रही हैं. उनके लिए लाल कालीनें बिछाई जा रही हैं.
इन्वेस्टर्स समिट की जाती हैं और उनके साथ हर वर्ष वर्ष विभिन्न राज्यों में लाखों करोड़ के एमओयू पर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं. हैरत की बात है कि सरकारें अब खुद को इन कंपनियों का फैसलिटेटर बताने से गुरेज नहीं कर रही हैं.अब तो डिमांड, डेमोग्राफी, डिविडेंट और डेवलपमेंट की बात की जा रही है और उसे इन्वेस्टमेंट से जोड़ा जा रहा है, लेकिन कोई डिवाइड और गैप की बात नहीं कर रहा है. जंगल में यह डिवाइड बढ़ती जा रही है.
मीडिया भी फैसलिटेटर : जंगलों को निवेश का जरिया बनाने में मीडिया की भी बड़ा भूमिका है. कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो मीडिया को भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से निवेश का फैसलिटेटर बना दिया गया है. इसकी सबसे बड़ी वजह है मीडिया समूहों में आने वाली पूंजी. पता ही नहीं चलता है कि यह कहां कहां से और कैसे आ रही है. न जाने कितने औद्योगिक समूहों के हित मीडिया से जुड़ गए हैं. नतीजतन मीडिया में जंगल की जमीन सिमटती जा रही है.
सबसे ताजा उदाहरण के तौर पर हम कोयला घोटाले से संबंधित मामले को देख सकते हैं. सर्वोच्च न्यायालय के 1993 के बाद से आवंटित किए गए 218 में से चार को छोड़कर बाकी सारे कोल ब्लाकों के आवंटन को अवैध करार देकर रद्द कर दिए जाने के फैसले से औद्योगिक जगत में हड़कंप मच गया. मीडिया ने इस खबर को इस तरह परोसा मानो कोयला ब्लाकों का आवंटन रद्द होने से अर्थव्यस्था रसातल में चली जाएगी.
विकास का पहिया थम जाएगा और न जाने क्या क्या..... कई प्रतिष्ठित पत्रों ने इसे अफसोसनाक फैसला तक करार दिया. मगर क्या वाकई मामला ऐसा ही है. हकीकत यह है कि इन 218 में से सिर्फ 42 पर ही काम शुरू हो सका है. सर्वोच्च न्यायालय ने जिन ब्लाकों को छोड़ा वे आधारभूत संरचना से जुड़ी परियोजनाएं हैं. यानी 172 कोल ब्लाकों में तो काम शुरू भी नहीं हुआ है!
इनमें कैप्टिव पॉवर प्लांट भी शामिल हैं. जाहिर है, कैप्टिव प्लांट में पैदा होने वाली बिजली इस्पात और सीमेंट जैसे संयंत्रों के लिए थी. इसका आम उपभोक्ता से कोई सीधा लेना देना नहीं है.
इस फैसले के बाद मीडिया के बड़े वर्ग की चिंता इन ब्लाकों में औद्योगिक घरानों और बैंकों के फंसे कोई छह लाख करोड़ रुपयों को लेकर दिखाई देती है. इनमें कहीं भी इन कोल ब्लाक को रद्द किए जाने से प्रभावित होने वाले कर्मचारियों और श्रमिकों की चिंता नहीं झलकती. कोई यह बताने वाला नहीं है कि आखिर कितने घरों में इन कोल ब्लाकों के रद्द होने से चूल्हे ठंडे हो गए या हो सकते हैं.
विकास और विस्थापन : विकास की यह कैसी समझ है? हम किसके विकास की और किस तरह के विकास की बात कर रहे हैं. उन लोगों की चिंता किसी को क्यों नहीं है कि इन कोल ब्लाकों के कारण कितनों का अस्तित्व ही दफन हो गया. कितने लोगों को इनके कारण विस्थापित होना पड़ रहा है.
हैरानी नहीं होनी चाहिए कि मध्य भारत के सिंगरौली के13 कोल क्षेत्रों में 11 लाख हेक्टेयर जंगल कोयला कंपनियों और सरकार के निशाने पर है. सिंगरौली को ही उदाहरण की तरह देखें तो 1952 में यहां के लोगों को रिंहद बांध से जुड़ी बिजली परियोजना के कारण विस्थापित होना पड़ा था. तब उन्हें बांध के उत्तरी हिस्से में बसाया गया. इसके बाद 1965 में उन्हें तब दोबारा विस्थापित किया गया जब नादर्न कोलफील्ड लिमिटेड ने वहां खनन शुरू किया गया. उसके बाद 1980 में उन्हें तीसरी बार तब बेदखल कर दिया गया जब नेशनल थर्म पावर कॉरपोरेशन ने वहां बिजली परियोजना पर काम शुरू किया.
इस क्षेत्र में 1980 के वन संरक्षण अधिनिमय के लागू होने के बाद वर्ष 2011 तक इस क्षेत्र में 5872 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि को आधिकारिक रूप से गैर वन संबंधी कामों की ओर मोड़ दिया गया. इसमें से 5760 हेक्टेयर तो संरक्षित वन क्षेत्र की जमीन थी.
सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट के एक अध्ययन के मुताबिक 2007 के बाद से 157 कोल ब्लाकों के लिए 45000 हेक्टेयर वनों का सफाया कर दिया गया.
जंगलों कटाई : सिर्फ खदानों के कारण ही जंगलों का नुक्सान नहीं हुआ है. हाल के दशकों में जंगलों की अवैध कटाई का सबसे बड़ा मामला मालिक मकबूजा प्रकरण के रूप में सामने आया था. आप सब वाकिफ होंगे कि किस तरह नेताओं, अधिकारियों और ठेकेदारों के गठजोड़ ने बस्तर में 50,000 से अधिक पेड़ काट डाले. जंगलों के नष्ट होने का चौतरफा नुकसान होता है. इसका पारिस्थितिकी और कुल मिलाकर वन्यजनजीवन पर असर पड़ता है. जंगलों में हलचल बढ़ने से आदिवासियों के साथ ही वन्यजीवों के लिए भी परेशानी खड़ी होती है. आजादी के समय 40,000 से अधिक बाघ थे जो अब डेढ़ हजार के करीब रह गई है.
आदिवासियों के कारण जंगलों का नुक्सान नहीं होता. आदिवासी तो अपनी जरूरत के मुताबिक लकड़ी और वनोपज लेता है. उसके घर में तो आप साल और सागौन के फर्नीचर नहीं पाएंगे. उसके जीवन में तो कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता. लोहा, कोयला के अलावा लघु वनोपज के आधार पर देखें तो इस देश में सर्वाधिक संपन्न तबका तो आदिवासियों को होना चाहिए, लेकिन उनके पास आज बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं. छत्तीसगढ़ में तो हर साल तकरीबन 50,000 करोड़ रुपये का तो तेंदूपत्ता ही हो जाता है. लेकिन इसमें 45000 करोड़ के करीब निजी कंपनियों के हाथ चला जाता है.
जंगल को लेकर हमारी समझ : जंगल और वन्यजीवों को लेकर हमारी समझ किस तरह की है यह इस किस्से से पता चलता है. दुर्लभ किस्म की पहाड़ी मैना के संरक्षण का खयाल आने पर वन अधिकारियों ने कुछ पहाड़ी मैना को मेटिंग के लिए तैयार किया. कई साल हो गए कुछ नहीं हुआ. इस पर करोड़ों रुपये खर्च कर दिये गये. लेकिन आज तक अधिकारियों को यह पता ही नहीं है कि इनमें से नर कौन सी है और मादा कौन सी है.
यह बात सिर्फ सरकारी अमले तक सीमित नहीं है. तेंदुआ, सिंह और बाघ के मामले में हमारे पत्रकार साथी तक फर्क नहीं कर पाते हैं. खबरों में कभी इन्हें चीता तक बता दिया जाता है. जबकि देश में चीता को लुप्त हुए दशकों बीत चुके हैं. एक प्रतिष्ठित पत्रिका ने उत्तराखंड में एक हथिनी के उग्र हो जाने और कुछ लोगों को कुचल देने पर उसे आदमखोर तक लिख दिया था.
माओवादी हिंसा : छत्तीसगढ़, झारखंड या ओडिशा जैसे राज्यों में आदिवासी माओवादियों और कॉरपोरेट के बीच पिसकर रह गए हैं. बीते दो ढाई दशकों में आर्थिक उदारीकरण और नई आर्थिक नीतियों के आने के बाद से उनकी हालत और खराब हुई है. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माओवादियों को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था. याद नहीं पड़ता कि कभी माओवादियों ने किसी वन्यजीव का शिकार रोकने के लिए कोई फरमान जारी किया हुआ.
जंगलों, वन्यजीवों और आदिवासियों के प्रति जिस संवेदना की जरूरत है वह दिखाई नहीं देती. चाहे सरकार की बात हो, मीडिया हो या फिर आम जन. फॉरेस्ट्री का कोर्स प्राथमिक स्कूलों से क्यों नहीं शुरू किया जा सकता ताकि बच्चे प्राकृतिक संसाधनों और जंगलों की कीमत समझ सकें और जब कोई पेड़ कटे तो उन्हें खुद को दर्द महसूस हो. यह कोई बहुत मुश्किल काम भी नहीं है.

‘उल्लू’ बना रहे टीवी विज्ञापन / कुलदीप भावसार

नीचे दिए गए चार उदाहरण बानगी हैं, टीवी पर दिखाए जा रहे भ्रामक विज्ञापनों और उनसे होने वाले दुष्प्रभावों के। सूचना प्रसारण मंत्रालय ने हाल ही में गोरे करने वाले क्रीम और पावडर के विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाया है, लेकिन प्रतिबंध की जरूरत दूसरे विज्ञापनों पर भी है। कोई कंपनी धार्मिक आस्थाओं का गलत फायदा उठाकर हनुमान यंत्र बेच रही है तो कोई रातों-रात करोड़पति बनाने का झांसा देकर महालक्ष्मी यंत्र।
केस 1: कानपुर रोड निवासी राहुल पाठक चार साल से आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। टीवी पर पंचमुखी हनुमान कवच का विज्ञापन देखा तो उन्हें लगा कि उनकी परेशानियों का हल मिल गया। उन्होंने रिश्तेदारों से आर्थिक मदद लेकर हजारों रुपए कीमत का हनुमान कवच बुलवाया। कवच धारण किए हुए तीन माह बीच चुके हैं। आर्थिक स्थिति सुधरना तो दूर खाने के लाले हैं। कवच के साथ मिली गोल्ड प्लेटेड चेन की चमक कभी की उतर गई।
केस 2: 8वीं कक्षा में पढ़ने वाली सोनाली घर से स्कूल ट्रिप का बहाना बनाकर सहेलियों के साथ घुमने चली गई। शाम तक वह नहीं लौटी तो परिजन ने उसकी तलाश शुरू की। स्कूल प्रबंधन ने बताया कि कोई ट्रिप रखी ही नहीं गई थी। परेशान परिजन ने कोतवाली पुलिस से शिकायत करने जा रहे थे की शाम को सोनाली घर लौटी। पूछताछ में उसने बताया कि घर से बगैर बताए ट्रिप पर जाने का आइडिया उसे टीवी पर दिखाए जाने वाले एक विज्ञापन से मिला था, जिसमें युवती सिर पर एक विशेष कंपनी का तेल लगाकर मां को ये झूठ बोलकर घर से बाहर जाती है कि उसे आज कॉलेज की ओर से ऐतिहासिक जगहों पर घुमाने ले जाया जाएगा।
केस 3: इंदौर के बंगाली चौराहा निवासी राजेश जैन टीवी पर चेहरा पहचानो प्रतियोगिता में भाग लेकर हजारों का घाटा उठा चुके हैं। टीवी पर दिखाए जा रहे चेहरे को पहचानकर उन्होंने बताए गए नंबर पर फोन लगाया। मोबाइल किसी महिला ने उठाया, जिसने नाम-पता पूछने के बाद उन्हें होल्ड करने को कहा। लगभग 20 मिनट तक संगीत बजने के बाद कंपनी ने उन्हें बाद में कॉल करने को कहा। मोबाइल का बिल आने पर राजेश को पता चला कि कॉल इंटरनेशनल थी। चेहरा पहचानने के चक्कर में उन्हें हजारों की चपत लग चुकी थी।
केस 4: 13-14 साल की दो किशोरियां इंदौर के राजबाड़ा क्षेत्र स्थित एक साड़ी की दुकान पर चोरी का प्रयास करते रंगे हाथों धरी गईं। पुलिस ने उनका नाम-पता पूछकर परिजन को सूचना दी तो पता चला कि दोनों सभ्रांत परिवार से है। किशोरियों द्वारा चोरी के प्रयास पर परिजन भी हैरान थे।
किशोरियों ने उन्हें बताया कि दुकान में चोरी की प्रेरणा उन्हें टीवी पर दिखाए जा रहे एक विज्ञापन से मिली थी, जिसमें एक किशोरी चोरी की वस्तु में से कुछ हिस्सा भगवान को देकर अपने गुनाह का प्रायश्चित कर लेती है। उन्होंने सोचा था कि वे भी चोरी की रकम में से कुछ हिस्सा भगवान के मंदिर में चढ़ा देगी, तो उन्हें चोरी का पाप नहीं लगेगा।
हजारों लोग हो रहे ठगी का शिकार
सिर्फ धार्मिक भावना ही नहीं, लोगों की अमीर बनने की चाह को भी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। जिस हीरो-हीरोइन को बच्चे भी आसानी से पहचान लें, उसे टीवी पर दिखाकर, पहचानने वाले को लाखों के इनाम का झांसा दिया जा रहा है। हजारों लोग इस तरह की ठगी का शिकार हो चुके हैं। इन दिनों टीवी विज्ञापन सिर्फ भ्रम नहीं फैला रहे, बल्कि लोगों को जमकर ‘उल्लू’बना रहे हैं।
इस तरह की ठगी के 99 प्रतिशत मामले सामने नहीं आ पाते। ठगी का शिकार ज्यादातर लोग कहीं शिकायत दर्ज नहीं कराते। पुलिस के मुताबिक 3 महीने में इस तरह की एक भी शिकायत दर्ज नहीं हुई। डॉक्टरों के मुताबिक आमतौर पर इस तरह की ठगी का शिकार होने के बाद जग-हंसाई का डर रहता है। लोगों को लगता है कि उन्होंने वारदात सार्वजनिक कर दी तो समाज के लोग उनकी हंसी उड़ाएंगे। यही वजह है कि ठगी की यह श्रृंखला निर्बाध रूप से चलती रहती है। ठगी करने वाली कंपनियां इसी मानसिकता का फायदा उठा रही हैं।
दो तरह के होते हैं ठगाने वाले
चिकित्सकों के मुताबिक ठगी का शिकार होने वालों में दो तरह के लोग शामिल होते हैं। एक वे जो आदतन जुआरी होते हैं। दूसरे वे जो दूसरों के मुकाबले खुद को ज्यादा समझदार समझते हैं। दोनों ही किस्म के लोगों को इलाज की जरूरत है। आदतन जुआरियों के लिए तो अब बाजार में मेडिसीन तक उपलब्ध है। इन लोगों में बीमारी होती है कि ये जरा-सा फायदा देखते ही दांव लगाने से नहीं चूकते। वहीं मूर्ख लोगों को उपभोक्ता शिक्षा की जरूरत है।
किशोर और युवाओं पर तुरंत असर
मनोरोग चिकित्सकों के मुताबिक भ्रामक विज्ञापनों के झांसे में आने वालों में किशोर और युवावर्ग की संख्या सबसे ज्यादा है। इस आयु वर्ग के लोगों में जल्दी से जल्दी सफलता पाने की इच्छा होती है। जिस स्कीम में कम प्रयास में ज्यादा फायदा दिखाई दे, ये लोग तुरंत उसमें शामिल हो जाते हैं।
कई बार अवसाद में आ जाते हैं
इस तरह की योजनाओं के तहत कोई कवच या यंत्र खरीदने वाले कई बार अवसाद का शिकार भी हो जाते हैं। डॉक्टरों के अनुसार टीवी पर दिखाए जाने वाला यंत्र या कवच खरीदने के बाद भी जब परिस्थितियां नहीं सुधरती तो व्यक्ति को लगता है कि उसकी किस्मत में ही कोई खोट है। वह स्थिति सुधारने का प्रयास भी छोड़ देता है। परिस्थितियां ज्यादा बिगड़ने पर कई बार उसके दिमाग में आत्महत्या का विचार भी आ सकता है।
ठगाने वालों की ज्यादा, लौटाने वालों की संख्या नगण्य
ठगी के कारोबार में लगी कंपनियां कई बार यह झांसा भी देती हैं कि लाभ नहीं होने की स्थिति में आप सामान कंपनी को लौटाकर अपनी रकम वापस ले सकते हैं। यह लोगों को झांसे में लेने का ही एक तरीका है। इस तकनीक का इस्तेमाल कर कंपनी लोगों में विश्वास पैदा करने का प्रयास करती है। लोगों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि कंपनी फर्जी होती तो वह पैसा लौटाने का दावा नहीं करती। मगर वास्तविकता यह है कि फायदा नहीं होने के बावजूद 99 प्रतिशत लोग खरीदे गए साधन को कंपनी को नहीं लौटाते। कंपनी उनमें यह डर पैदा कर देती है कि उन्होंने कवच या यंत्र लौटाया तो उन्हें नुकसान हो सकता है।
ये कहता है ज्योतिष शास्त्र
टीवी पर विज्ञापन देखकर कोई यंत्र खरीदा है तो वह धारक के लिए काम ही नहीं करेगा। टीवी पर दिखाए जा रहे भ्रामक विज्ञापनों से लोगों की धर्म के प्रति आस्थाएं कम होती हैं। यंत्र बेचने वाली कंपनियों का दृृष्टिकोण व्यवसायिक होता है। लोगों को जब लाभ नहीं होता है तो उनकी आस्थाएं प्रभावित होने लगती हैं। शास्त्रों के मुताबिक वास्तविक यंत्र भोजपत्रों पर अनार की कलम से लिखे जाते हैं। इसके बाद 21 दिन या 51 दिन साधना की जाती है। यज्ञ हवन आदि भी कराना होते हैं। इसके बाद संकल्प लेना होता है कि लोक कल्याण के लिए निष्काम भाव से यह कार्य किया जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह कि इस तरह की यंत्र साधना में कोई दक्षिणा नहीं ली जाती। अगर कोई व्यक्ति, कंपनी आपको पैसे के बदले कोई यंत्र दे रही है तो वह खरीदने वाले के लिए काम ही नहीं करेगा।
लोगों की मानसिकता का लाभ उठाते हैं
एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मनोरोग चिकित्सक डॉ. उज्जवल सरदेसाई कहते हैं कि इस तरह की ठगी करने वाली कंपनियां लोगों की मानसिकता का फायदा उठाती हैं। यह मानवीय स्वभाव है कि ज्यादातर लोग कम प्रयास में अधिक फायदा चाहते हैं। टीवी पर चेहरा पहचानो प्रतियोगिता हो या किसी भगवान का कवच खरीदने की बात, इसी मानसिकता की वजह से लोग ठगाते हैं। टीवी पर दिखाए जा रहे इस तरह के विज्ञापनों में उपभोक्ता को सही और पूरी जानकारी नहीं दी जाती। कंपनी यह तो बताती है कि 10 इनाम दिए जाएंगे, लेकिन यह नहीं बताती कि कितने लाख दर्शकों में से विजेता चुने जाएंगे। ज्यादातर लोग इस तरह के विज्ञापनों के झांसे में फंस जाते हैं।
(नई दुनिया से साभार)

Wednesday, 22 October 2014

दो शहीदों की याद

(क्रान्तिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी और अशफाक उल्ला खान का जन्मदिन (22 और 26 अक्टूबर)

गणेश शंकर विद्यार्थी : देश की स्वाधीनता के लिए जो उद्योग किया जा रहा था, उसका वह दिन निस्सन्देह, अत्यन्त बुरा था, जिस दिन स्वाधीनता के क्षेत्र में खि़लाफ़त, मुल्ला, मौलवियों और धर्माचार्यों को स्थान देना आवश्यक समझा गया। एक प्रकार से उस दिन हमने स्वाधीनता के क्षेत्र में एक कदम पीछे हटकर रखा था। हमें अपने उसी पाप का फल भोगना पड़ रहा है। देश की स्वाधीनता के संग्राम ही ने मौलाना अब्दुल बारी और शंकराचार्य को देश के सामने दूसरे रूप में पेश कर उन्हें अधिक शक्तिशाली बना दिया और हमारे इस काम का फल यह हुआ कि इस समय हमारे हाथों ही से बढ़ायी इनकी और इनके जैसे लोगों की शक्तियाँ हमारी जड़ उखाड़ने और देश में मजहबी पागलपन, प्रपंच और उत्पात का राज्य स्थापित कर रही हैं। हमारे देश में धर्म के नाम पर कुछ इने-गिने आदमी अपने हीन स्वार्थों की सिद्धि के लिए लोगों को लड़ाते-भिड़ाते हैं। धर्म और ईमान के नाम पर किये जाने वाले इस भीषण व्यापार को रोकने के लिए साहस और दृढ़ता के साथ उद्योग होना चाहिए। एक तरफ जहाँ जन आन्दोलन और राष्ट्रीय आन्दोलन हुए, वहीं, उनके साथ-साथ जातिगत और साम्प्रदायिक आन्दोलनों को भी जान-बूझकर शुरू किया गया क्योंकि ये आन्दोलन न तो अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ थे, न किसी वर्ग के, बल्कि ये दूसरी जातियों के खि़लाफ़ थे। लेनिन के अधूरे ग्रन्थ के पन्ने रूस में ही नहीं, सर्वत्र लिखे जा रहे हैं। विप्लव होंगे, परिवर्तन की धाराएँ घूमेंगी, पुराने आतताईपन पर गाज गिरेगी। 

अशफाक उल्ला खान : देश की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए हंसते−हंसते फांसी का फंदा चूमने वाले अशफाक उल्ला खान जंग−ए−आजादी के महानायक थे। अंग्रेजों ने उन्हें अपने पाले में मिलाने के लिए तरह−तरह की चालें चलीं लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। स्वतंत्रता संग्राम पर कई पुस्तकें लिख चुके इतिहासकार सर्वदानंदन के अनुसार काकोरी कांड के बाद जब अशफाक को गिरफ्तार कर लिया गया तो अंग्रेजों ने उन्हें सरकारी गवाह बनाने की कोशिश की और कहा कि यदि हिन्दुस्तान आजाद हो भी गया तो उस पर हिन्दुओं का राज होगा तथा मुसलमानों को कुछ नहीं मिलेगा। इसके जवाब में अशफाक ने ब्रितानिया हुकूमत के कारिन्दों से कहा कि फूट डालकर शासन करने की अंग्रेजों की चाल का उन पर कोई असर नहीं होगा और हिन्दुस्तान आजाद होकर रहेगा। अशफाक ने अंग्रेजों से कहा था− तुम लोग हिन्दू−मुसलमानों में फूट डालकर आजादी की लड़ाई को नहीं दबा सकते। हिन्दुस्तान में क्रांति की ज्वाला भड़क चुकी है जो अंग्रेजी साम्राज्य को जलाकर राख कर देगी। अपने दोस्तों के खिलाफ मैं सरकारी गवाह बिल्कुल नहीं बनूंगा। 22 अक्तूबर 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जन्मे अशफाक उल्ला खान अपने छह भाई बहनों में सबसे छोटे थे। अशफाक पर महात्मा गांधी का काफी प्रभाव था लेकिन जब चौरी चौरा की घटना के बाद गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो वह प्रसिद्ध क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल से जा मिले। बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में क्रांतिकारियों की आठ अगस्त 1925 को शाहजहांपुर में एक बैठक हुई और हथियारों के लिए रकम जुटाने के उद्देश्य से ट्रेन में ले जाए जाने वाले सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई गई। क्रांतिकारी जिस खजाने को हासिल करना चाहते थे, दरअसल वह अंग्रेजों ने भारतीयों से ही लूटा था। 9 अगस्त 1925 को रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिडी, ठाकुर रोशन सिंह, सचिंद्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल मुकुंद और मन्मथ लाल गुप्त ने लखनऊ के नजदीक काकोरी में ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया। इस घटना से ब्रितानिया हुकूमत तिलमिला उठी। क्रांतिकारियों की तलाश में जगह−जगह छापे मारे जाने लगे। एक−एक कर काकोरी कांड में शामिल सभी क्रांतिकारी पकड़े गए लेकिन चंद्रशेखर आजाद और अशफाक उल्ला खान हाथ नहीं आए। इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के रूप में दर्ज हुई। अशफाक शाहजहांपुर छोड़कर बनारस चले गए और वहां एक इंजीनियरिंग कंपनी में 10 महीने तक काम किया। इसके बाद उन्होंने विदेश जाने की योजना बनाई ताकि क्रांति को जारी रखने के लिए बाहर से मदद करते रहें। इसके लिए वह दिल्ली आकर अपने एक मित्र के संपर्क में आए लेकिन इस मित्र ने अंग्रेजों द्वारा घोषित इनाम के लालच में आकर पुलिस को सूचना दे दी। यार की गद्दारी से अशफाक पकड़े गए। अशफाक को फैजाबाद जेल भेज दिया गया। उनके वकील भाई रियासत उल्ला ने बड़ी मजबूती से अशफाक का मुकदमा लड़ा लेकिन अंग्रेज उन्हें फांसी पर चढ़ाने पर आमादा थे और आखिरकार अंग्रेज जज ने डकैती जैसे मामले में अशफाक को फांसी की सजा सुना दी। 19 दिसंबर 1927 को अशफाक को फांसी दे दी गई जिसे उन्होंने हंसते−हंसते चूम लिया। इसी मामले में राम प्रसाद बिस्मिल को भी 19 दिसंबर 1927 को फांसी पर लटका दिया गया।


क्रान्तिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के जन्मदिवस (26 अक्टूबर) के अवसर पर


देश की स्वाधीनता के लिए जो उद्योग किया जा रहा था, उसका वह दिन निस्सन्देह, अत्यन्त बुरा था, जिस दिन स्वाधीनता के क्षेत्र में खि़लाफ़त, मुल्ला, मौलवियों और धर्माचार्यों को स्थान देना आवश्यक समझा गया। एक प्रकार से उस दिन हमने स्वाधीनता के क्षेत्र में एक कदम पीछे हटकर रखा था। हमें अपने उसी पाप का फल भोगना पड़ रहा है। देश की स्वाधीनता के संग्राम ही ने मौलाना अब्दुल बारी और शंकराचार्य को देश के सामने दूसरे रूप में पेश कर उन्हें अधिक शक्तिशाली बना दिया और हमारे इस काम का फल यह हुआ कि इस समय हमारे हाथों ही से बढ़ायी इनकी और इनके जैसे लोगों की शक्तियाँ हमारी जड़ उखाड़ने और देश में मजहबी पागलपन, प्रपंच और उत्पात का राज्य स्थापित कर रही हैं।
- हमारे देश में धर्म के नाम पर कुछ इने-गिने आदमी अपने हीन स्वार्थों की सिद्धि के लिए लोगों को लड़ाते-भिड़ाते हैं। धर्म और ईमान के नाम पर किये जाने वाले इस भीषण व्यापार को रोकने के लिए साहस और दृढ़ता के साथ उद्योग होना चाहिए।
- एक तरफ जहाँ जन आन्दोलन और राष्ट्रीय आन्दोलन हुए, वहीं, उनके साथ-साथ जातिगत और साम्प्रदायिक आन्दोलनों को भी जान-बूझकर शुरू किया गया क्योंकि ये आन्दोलन न तो अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ थे, न किसी वर्ग के, बल्कि ये दूसरी जातियों के खि़लाफ़ थे।
- लेनिन के अधूरे ग्रन्थ के पन्ने रूस में ही नहीं, सर्वत्र लिखे जा रहे हैं। विप्लव होंगे, परिवर्तन की धाराएँ घूमेंगी, पुराने आतताईपन पर गाज गिरेगी।

Tuesday, 21 October 2014

कटघरे में कैलाश सत्यार्थी / अजय प्रकाश

वर्ष 2006 में कैलाश सत्यार्थी पहली बार नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामित हुए थे. उस वक्त हिंदी साप्ताहिक अख़बार द संडे पोस्ट ने उनके काम, व्यक्तित्व, विवाद और जीवन के आयामों का जायजा लेते हुए एक स्पेशल रिपोर्ट प्रकाशित की थी. यह रिपोर्ट इस वर्ष के नोबल शांति पुरस्कार के विजेता कैलाश सत्यार्थी के काम की जांच करते हुए उनके जिस रूप को सामने लाती है वह इस पुरस्कार के विजेता को कठघरे में खड़ा करने के साथ पुरस्कार की चयन प्रक्रिया को ही विवादित बना देता है. ऐसा शायद पहली ही बार हुआ है कि इतने बड़े सम्मान से एक भारतीय के सम्मानित होने पर भी प्रशंसा से अधिक सवाल उठाए जा रहे हैं. ऐसा क्यों हो रहा है इसे जानने के लिए पढ़िए वर्ष 2006 में द संडे पोस्ट में प्रकाशित अजय प्रकाश की स्पेशल रिपोर्ट- विष्णु शर्मा


कैलाश सत्यार्थी का नाम आते ही जेहन में उन बेहाल बच्चों की तस्वीर उभरती है जिन्हें असमय श्रम की भट्टी से मुक्ति दिलायी गयी थी. यह मुक्ति कैलाश सत्यार्थी और उनकी संस्था 'बचपन बचाओ' के कार्यकर्ताओं ने दिलायी. 'बचपन बचाओ' के कार्यकर्ता इन बच्चों को उद्योग मालिकों के यहां से आजाद कराते हैं जहां वे मामूली पैसों पर मजदूरी करने को विवश होते हैं. इसी नेक मुहिम के चलते इस वर्ष कैलाश सत्यार्थी नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामित किये गये हैं. लेकिन कैलाश सत्यार्थी के पुराने सहयोगी उन्हें सवालों—संदेह के घेरे में खड़ा करते हैं जो उनके दूसरे रूप को सामने लाता है. उनका यह दूसरा पहलू लोगों के बीच निर्मित उनकी धवल छवि को धूमिल करता है.

kailash-satyarthiफैक्ट्रियों में दम तोड़ रहे बचपन को आजाद करने के नाम पर दुनियाभर की दानदाता एजेंसियों से 'दक्षिणा' लेने वाले कैलाश सत्यार्थी पर करोड़ों रुपये का घपला करने तथा ट्रस्ट कागजातों के साथ हेराफेरी करने का आरोप है. इन्होंने न सिर्फ मुक्ति प्रतिष्ठान से संचालित 'मुक्ति आश्रम' पर कब्जा कर लिया है, बल्कि स्वामी अग्निवेश के पावर आॅफ अटॉर्नी वाले शेख सराय की बिल्डिंग को भी हथिया लिया है. फंडिंग का रास्ता खुलते देख सत्यार्थी ने दिल्ली के इब्राहिम पुर स्थित 'मुक्ति आश्रम' को संपत्ति उगाहने के केंद्र के रूप में विकसित किया और एक के बाद एक कई ट्रस्ट खोले. महत्वपूर्ण बात तो ये रही कि 'मुक्ति आश्रम' में ही सत्यार्थी ने तमाम दूसरे ट्रस्टों के पंजीकृत कार्यालय खोले, मगर अन्य ट्रस्टियों को इसकी मौखिक जानकारी तक नहीं दी. हद तो तब हो गयी जब ट्रस्टी शेओताज सिंह, राजेश त्यागी, प्रभात पंत और खूबीराम की सहमति के बगैर 'आवा' नाम का एक नया ट्रस्ट अस्तित्व में आया और उसके भी ट्रस्टी कैलाश सत्यार्थी और उनकी पत्नी सुमेधा सत्यार्थी ही थे. तकनीकी तौर पर बचने के लिए सत्यार्थी ने एक नई स्कीम पेश की और सालभर में 25 रुपये दान में देने वालों को भी ट्रस्टी बनाया. इसका सिर्फ एक मकसद रहा कि आगे चलकर कोई यह न कहे कि उनके ज्यादातर ट्रस्ट सत्यार्थी दंपत्ति के प्रबंधकीय और मालिकाना हक में चलते हैं.

आंखिन देखी सच

दिल्ली के सुदूर गांव इब्राहिमपुर में 'मुक्ति आश्रम' परिसर में 'बचपन बचाओ आंदोलन' के नारे लिखे हैं. लगभग 3.5 एकड़ में स्थित यह आश्रम फार्म हाउस मार्का है. अंदर बचपन की किलकारियां नहीं कुत्तों की आवाज है. यहां अनाथ बच्चे नहीं बल्कि विदेशी ब्रांड के कुत्ते रहते हैं. इन कुत्तों की देखरेख के लिए दरबान लगे हैं. आगंतुक कक्ष में लालटेन में भी बल्ब लगा हुआ है. एक—दो कट्ठे में बनी सामने एक ईमारत खड़ी है. कर्मचारी बताते हैं कि यहीं साठ बच्चे छह महीने के लिए आते हैं. यानी प्रत्येक साल यहां 120 बच्चों को शिक्षा—दीक्षा दी जाती है. परंतु बाल मजदूरी से पचासों हजार बच्चों को सत्यार्थी का संगठन मुक्त कराता है. बहरहाल, इस समय वाले साठ बच्चे कहां हैं? पूछने पर जवाब मिलता है अभी नहीं हैं. यहां हर आदमी का अपना एक ग्रेड है. दरबान और पानी लाने वाली दाई को छोड़ सब सभ्रांत दिखते हैं. सवाल जवाब कर रहा कर्मचारी भी नौकरी छोड़ जाने वाला है. वह सुमन जी (मुक्ति आश्रम की निवर्तमान निदेशक) का हर एक वाक्य के बाद जिक्र करता है. यहां जो कुछ भी हो रहा है वह इससे संतुष्ट नही है. अपनी भावनायें व्यक्त करते हुए कहता है—'आपके पास तो कहने का औजार है हमारे पास क्या है.' चाय खत्म कर बाहर निकलने पर सूख रही फूल—पत्तियों से घिरा 'बालिका मुक्ति आश्रम' दिख जाता है. यहां एक भी लड़की नहीं है जबकि दावा चालीस का किया जाता है. वहां की महिला कर्मचारी बताती है कि दस—बारह थीं, दो—चार दिन पहले चली गयीं.

देश ही नहीं दुनियाभर के 'कॉर्पोरेट बुद्धिजीवियों' के बीच सुर्खियों में रहने वाले सत्या​र्थी आज अपने जुगाड़ की बदौलत 'नोबल शांति पुरस्कार' के लिए नामित हो गये हैं. एक के बाद एक आधा दर्जन से अधिक ट्रस्ट खोलने वाले सत्यार्थी वही हैं, जिन्होंने झूठी प्रतिष्ठा पाने के लिए पानीपन की एक फैक्टरी पर फर्जी इल्जाम लगाये थे और आपराधिक मुकदमे पर जेल गये. बचपन बचाने से लेकर सूचना के अधिकार की पैरोकारी करने वाले सत्यार्थी किसी तरह की सूचना मांगने पर मामले को दबा जाने में माहिर हैं और हेराफेरी करने में उनका कोई जवाब ही नहीं है. महीने का पखवाड़ा विदेश में बिताने वाले सत्यार्थी के खिलाफ उनके कर्मचारी भी खड़े हो गये हैं. कुछ कर्मचारियों ने उनके खिलाफ अदालत मे मामला दायर किया है.

kailash-satyarthi-1सत्यार्थी ने पैक्स नाम की विदेशी दानदाता एजेंसी की शर्तों के मातहत मुक्ति आश्रम को कर दिया. फंडिंग का रास्ता खुलता देख मध्य प्रदेश के विदिशा वासी सत्यार्थी ने साक्स (SACCS) नाम की भी एक संस्था खोल दी. इस प्रकार सत्यार्थी साउथ एशियन कॉलिशन आॅन चाइल्डहुड सर्विस के स्वनामधन्य चेयरमैन और 'मुक्ति आश्रम' के सेक्रेटरी हो गये. जिसके बाद 1994 में बनाये गये एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन (आव) को इब्राहिमपुर स्थित 'मुक्ति आश्रम' की 14 बीघा 8 बिस्वा जमीन लीज पर दे दी गयी. आगे चलकर बचपन बचाओ फाउंडेशन का निर्माण किया और इस फाउंडेशन का रजिस्टर्ड आॅफिस भी मुक्ति आश्रम को ही रखा. इतना ही नहीं शेख सराय में जनता पार्टी के पूर्व सांसद बापू कालदांते द्वारा सांसद कोटे से दिये गये 24—सी एमआईजी फ्लैट को भी सत्यार्थी ने हथिया लिया. आजकल सुनने में आ रहा है कि शेख सराय का वह फ्लैट सत्यार्थी ने किसी तीसरे को बेच दिया है, ज​बकि उसकी पावर आॅफ अटॉर्नी स्वामी अग्निवेश के पास है. उल्लेखनीय है कि 1982 से 1992 तक बाल शोषण के खिलाफ संगठित तौर पर सत्यार्थी और अग्निवेश ने साथ काम किया.

जनकल्याण का लबादा ओढ़े, जनता और ट्रस्ट की संपत्ति को व्यक्तिगत हितों में इस्तेमाल करने वाले सत्यार्थी का यह विदू्प चेहरा स्वामी अग्निवेश से हुयी एक बातचीत में सामने आया. विदेशी दान के करोड़ों रुपये डकारने वाले शांतिदूत कैलाश सत्यार्थी पर उंगली मुक्ति आश्रम के कर्मचारियों की शिकायत के बाद उठी थी. चारों ट्रस्टियों शेओताज सिंह, खूबीराम, प्रभात पंत, राजेश त्यागी से 'मुक्ति आश्रम' के कर्मचारियों ने सत्यार्थी की मनमानी किये जाने, ट्रस्ट के धन को व्यक्तिगत हितों में इस्तेमाल करने तथा हेरा—फेरी करने के गंभीर आरोप लगाये. इन तमाम आरोपों के मद्देनजर कैलाश सत्यार्थी, सुमेधा सत्यार्थी और एकाउंटेंट विट्ठल राव से जब ट्रस्टी शेओताज सिंह ने सफाई चाही तो सत्यार्थी दंपत्ति ने कोई जवाब नहीं दिया, मगर बिट्ठल राव ने शुरुआत में सहयोग किया. ऐसी स्थिति में उक्त चारों ट्रस्टियों की तरह से एक जांच अधिकारी नियुक्त किया गया. जांच के दौरान सत्यार्थी पर लगाये गये कर्मचारियों के आरोपों की सिलसिलेवार और तथ्यगत पुष्टि हुयी. जांच अधिकारी ने अक्टूबर 1995 में अलीपुर थाने में सत्यार्थी के खिलाफ मामला भी दर्ज कराया.

इसलिए सहयोगियों ने छोड़ा साथ

'कैलाश सत्यार्थी के काम का चरित्र वैसा ही है जैसा कि स्वयंसेवी संगठनों का है. ये संगठन मूलत: इस तरह के सामाजिक काम पैसा कमाने के लिए कर रहे हैं. 'बचपन बचाओ आंदोलन' के मुखिया बाल बंधुआ मजदूरों को मुक्त तो कराते है, परंतु वे बच्चे पुन: उस नर्क में वापस न जायें, इसका कोई विकल्प खड़ा नहीं करते. उनकी आर्थिक समृद्धि का विकल्प खड़ा किये बिना इस तरह के सारे प्रयास बेमानी हैं. कैलाश सत्यार्थी को दूसरे देश के संगठनों से तो समर्थन मिलता है, परंतु संकट की घड़ी में उन्हें अपने ही देश भारत में कोई समर्थक नजर नहीं आता.

आनंदस्वरूप वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता

बात दशकों पहले की है इसलिए मुझे ठीक—ठाक याद नहीे कि मैंने पावर आॅफ अटार्नी बदली थी या नहीं. हां, इतना मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूं कि मैंने पावर आॅफ अटार्नी स्वामी अग्निवेश को दी थी. बाद में कैलाश सत्यार्थी और स्वामी अग्निवेश का आपस में झगड़ा हो गया और उस बीच मेरे पास सत्यार्थी और अग्निवेश दोनों आये थे. मैंने झगड़े में न पड़ते हुए अग्निवेश से कहा था कि 24—सी, शेख सराय वाला मकान दे दें, क्योंकि उस समय मेरे पास रहने के लिए घर नहीं था. लेकिन अग्निवेश ने कहा था कि यह फ्लैट अब विवादों में है जिसका मामला कोर्ट में चल रहा है.

बापू कालदांते, पूर्व सांसद जनता पार्टी

सत्यार्थी कहते हैं कि उन्होंने शिकायतकर्ता चारों ट्रस्टियों को ट्रस्ट से निष्कासित कर दिया है. यह जवाब वे तब देते हैं जब उनकी मनमानी और अनियमितताओं पर सवाल खड़ा होता है. सफाई के लिए 'मुक्ति प्रतिष्ठान' से जुड़े लोगों की बैठक करायी जाती है. उस फैसलाकून बैठक में साजिशन तरीके से फर्जी फोटोस्टेट के दस्तखत वाले नये ट्रस्टियों की बहाली की प्रतियां सत्यार्थी द्वारा दिखायी जाती हैं, जिसमें फर्जी हस्ताक्षर रामशरण जोशी और मधु जोशी के हैं, जबकि उन्होंने बहुत पहले ही ट्रस्ट छोड़ दिया था. हमने इस कागजात की कॉपी कोर्ट में भी लगायी है. अदालत द्वारा सुझाये गये ट्रस्ट कानूनों को ताक पर रखकर सत्यार्थी ने जो मनमानी की है, वह पूर्णतया आपराधिक मामला है. सत्यार्थी दंपत्ति जिन ट्रस्टों में भागीदार रहे हैं उनकी तहकीकात की जाये तो ज्यादातर ट्रस्टों की मैनेजिंग कमेटी में सत्यार्थी पाये जायेंगे.

राजेश त्यागी, वकील सुप्रीम कोर्ट एवं ट्रस्टी 'मुक्ति प्रतिष्ठान'

बहुत पुरानी बात हो गयी है अब तो मैं ट्रस्टी भी नहीं हूं. हां, मुझे इतना याद है कि सत्यार्थी द्वारा किये गये हेर—फेर के खिलाफ शेओताज सिंह ने अदालत में याचिका दायर की थी. यह पूरा मामला सत्यार्थी बनाम अग्निवेश का है. उन्हीं से इस बारे में पूछिये.

प्रभात पंत, मुक्ति प्रतिष्ठान ट्रस्टी

ट्रस्ट का मामला ट्रस्ट में ही निपटा लेने के मकसद से 1994 में स्वामी अग्निवेश के नेतृत्व में आर्य समाज और ट्रस्ट से जुड़े लोगों की आसफ अली रोड पर मीटिंग बुलायी गयी. लेकिन आर्य समाज के कार्यालय में घंटों तक चली इस बैठक का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला. अंतत: सदस्यों ने सर्वसम्मति से सत्यार्थी दंपत्ति को 'मुक्ति प्रतिष्ठान' से निष्कासित कर दिया. चूंकि इब्राहिमपुर का 'मुक्ति आश्रम' जंतर मंतर स्थित 'मुक्ति प्रतिष्ठान' कार्यालय से संबद्ध था लिहाजा सत्यार्थी को 'मुक्ति आश्रम' से सारे रिश्ते स्वत: खत्म हो जाने चाहिए थे. बावजूद इसके स्वामी अग्निवेश के शब्दों में 'सत्यार्थी की बदमाशियां जारी रहीं.'

'मुक्ति आश्रम' की नियमावलियों के मुताबिक यह स्थान गरीब, बीमार एवं विकलांग बच्चों के आर्थिक, सामा​जिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक विकास के लिए बनाया गया था. परंतु ऐसा न होते देख जांच अधिकारी शेओताज सिंह एवं अन्य तीन ने मिलकर जनवरी 1997 में दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में उक्त भ्रष्टाचार के आरोपी ट्रस्टियों के खिलाफ याचिका दायर की.

सत्यार्थी के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा देख अप्रैल 1997 में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश बीएस चौधरी ने कोर्ट की तरफ से राना प्रवीन सिद्दीकी को जांच अधिकारी नियुक्त किया. सिद्दीकी ने भी जांच के बाद पेश की गयी रिपोर्ट में 'मुक्ति आश्रम' में हो रही अनियमितताओं को रेखांकित किया और पाया कि बेहद सुनियोजित तरीके से आर्थिक मामलों में हेर—फेर की गयी है. रिपोर्ट में उल्लेख किया कि कैश बुक को देखने से ऐसा लगता है कि मानो एक ही आदमी ने कई जगह अगूंठे लगा रखे हैं. उन्होंने रिपोर्ट में आगे उल्लेख किया है कि 81 से 84 तक की जो कैशबुक है उनका कोई वाउचर नहीं है तथा संस्था को अनुदान किन स्रोतों से कितना प्राप्त हो रहा है इसका भी कोई उल्लेख नहीं है. 1980 से 89 तक का मुक्ति आश्रम में कोई रजिस्टर नहीं है. यहां तक कि मीटिंगों के दौरान लिए जाने वाले नोट्स भी उपलब्ध नहीं हैं. राना प्रवीन सिद्दीकी ने अपनी रिपोर्ट में स्वामी अग्निवेश तथा शेओताज सिंह पर जांच में सहयोग न करने तथा असंवैधानिक व्यवहार करने का भी जिक्र किया है.

एक के बाद एक तीन स्तरों से एक ही ढंग से लगाये गये आरोप उजागर भी हुए, परंतु सत्यार्थी 'नोबल शांति पुरस्कार' तक पहुंच गये. सत्यार्थी के विरोधियों और सहयोगियों दोनों का कहना है कि उनका यहां तक पहुंचना मीडिया मैनेज की कुशल कारीगरी का ही नतीजा है.

सत्यार्थी पर लगाये गये आरोपों के मद्देनजर जब उनका पक्ष जानने के लिए 'दि संडे पोस्ट' ने संपर्क किया तो कालकाजी स्थित उनके कार्यालय से जवाब आया कि 'सत्यार्थी जी इस पर बातचीत नहीं करना चाहते हैं.' फोन पर हुयी बातचीत में उनके मीडिया प्रभारी राकेश सेंगर ने न्यायिक सलाहकार का हवाला देते हुए कहा कि 'न्यायालय में चल रहे इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं करेंगे.' ट्रस्ट बनाम सत्यार्थी का मामला कोर्ट में गये नौ साल हो गये हैं, लेकिन अब तक कोई फैसला नहीं हो पाया है. न्यायालय पर टिप्पणी किये बिना इतना जरूर कहा जा सकता है कि याचिकाकर्ता बेहद सुस्त हो चुके हैं. इसी सुस्ती का परिणाम हुआ कि याचिकाकर्ता सुनवाई की तारीख में नहीं पहुंचे और कोर्ट ने केस ही खत्म करने का आदेश दे दिया, लेकिन केस देख रहे वकील आरके गौड़ की सक्रियता का परिणाम रहा कि केस की पुनर्वहाली के लिए अर्जी दे दी गयी.

(जनज्वार http://www.janjwar.com से साभार)

दिवाली का अंधेरा / जयप्रकाश त्रिपाठी

प्रकाशपर्व से सजेधजे बाजार, विज्ञापनों से अघाये अखबार और चैनल, छोटे-बड़े पर्दे पर धारावाहिकों और फिल्मों के धूम-धड़ाके, महानगरों में सितारों, नेताओं, अधिकारियों, ठेकेदारों, मंत्रियों, दलालों, सफेदपोश लुटेरों, ऊपर की कमाई-धमाई वालों की रंगारंग महफिलें, अमीरी का गर्दभगान, पूंजी और बाजार की महामारी से त्रस्त गरीब-गुरबा की लुटती-पिटती आस्था -
जो ठनठन गोपाल, जिनकी जेब खाली,
उनकी खिल्ली उड़ाएं धनतेरस-दिवाली....

Monday, 20 October 2014

दीपावली और मेरी 'नानी मां' / जयप्रकाश त्रिपाठी

दिवाली का दिन। जैसे आंखों के दो दीये तेल-घी नहीं, आंसुओं से डबडबाये हुए। हर साल, हर बार। जब भी आता है ये त्योहार। मेरे अभावग्रस्त बचपन के वे दिन कचोटने लगते हैं।
साढ़े चार माह का था, तभी मां ने ननिहाल पठा दिया था। 'नानी मां' की गोद में। नाना के घर प्यार-दुलार इतना मिला कि दुनिया से मां के विदा होने पर उतना नहीं रोया था, जितना कि 'नानी मां' के देहावसान पर। दिवाली के दिनों में आजमगढ़ जिले का गांव टिसौरा, जो आज भी मेरी स्मृतियों में मीठी-नुकीली टीस की तरह अटका हुआ है। कुरेदने पर यादों की बारात सी आ जाती है।
गांव के पश्चिमी किनारे पर चार-पांच कुम्हार परिवार बसते थे। और उधर के ही सीवान में डिह बाबा का थान। गांव के दक्षिणी छोर पर शिवालय, पूरब में काली। घर-घर कुम्हार परिवार महीने भर पहले से जोर-शोर से मिट्टी के नन्हे-नन्हे दीये-हाथी-घोड़े-जांता-घरिया और छोटे-बड़े , बर्तन बनाने में जुट जाते। साल भर में एक बार ये त्योहार उनके लिए घर-गृहस्थी की गाड़ी खींचने के लिए आय के एक बड़े अवसर की तरह आता था।
दिवाली के कई दिन पहले से मिट्टी के पूरे मकान की लिपाई-पुताई। अगवारे-पिछवारे के घास-कूड़े, झाड़-झंखाड़ की कटाई-सफाई। दिवाली से ठीक एक दिन पहले आंगन से दरवाजे के सामने दूर तक गोबर से जमीन की धुलाई। नानी मां का घर दो मोहल्लों के बीच था। घर से पूरब-उत्तर दूर तक पसरे खेत। दिवाली के दिनो में जुताई के बाद हवा के साथ मिट्टी की सोंधी-सोंधी गंध। वातावरण धवल-धवल सा। और बच्चों के लिए त्योहार अपार खुशियों से सराबोर करते हुए।
दिवाली की सुबह नानी मिट्टी के दीये, बर्तन आदि के लिए मुझे बड़ी बहन के साथ भेज देती थी कुम्हार काका संचू-पंचू के घर। संचू-पंचू सगे भाई थे। संचू कलकत्ता में पत्ते वाली तंबाकू बेचते थे। संचू गांव में मिट्टी के बर्तन बेच कर गुजारा करते थे। दोपहर बाद छुटकी काकी (संचू की पत्नी) सिर पर मिट्टी के दीये आदि से भरा टोकरा लेकर जैसे ही दरवाजे पर पहुंचती थीं, खुशियों का पारावार नहीं।
सूर्यास्त होने से पहले नानी आंगन में दीयों की कतार सजाने लगती थीं। साथ में बहन के साथ मैं भी रुई की नन्ही नन्ही बातियां पूरने में जुट जाते। उधर सूरज डूबा, इधर घी-तेल से लबालब दीये जगमगा उठे। दीप पूजन के बाद नानी एक थाली में पांच जलते दीये, अंजुरी भर खील-बताशा, रोली रखकर देवस्थानों के लिए हमे भेज देती थीं। इन सब से बेपरवाह नाना चुपचाप नीम के नीचे चारपाई पर कुछ गाते-गुनगुनाते या तंबाकू रगड़ते हुए मंद मंद मुसकाते याद आते हैं। सस्ते किस्म के नये-नये कपड़ों में हम भाई बहन सबसे पहले डिह के थान जाते, वहां से एक फर्लांग दूर शिवालय में दीप, खील-बताशे रखते और अंत में उतने ही फासले पर गांव के पूरब में काली माई के थान पर। उछल उछल कर तेजी से जाते दौड़ते भी तब तक रात एक पहर पीछे छूट चुकी होती थी।
लेकिन भरपूर उजाले से नहाया हुआ पूरा गांव, चारो ओर हंसी-ठहाके का आलम, घर-घर बच्चों का उल्लास, एक पहर रात गये भी कहीं कोई डर-भय नहीं। घर लौटते ही नानी हमें टीका लगाती, हलवा-पूड़ी का प्रसाद देती। उन दिनो आज की तरह पटाखा-मिठाइयों का जमाना नहीं था। इसके बाद नाना एक पैसा मुझे, एक बहन को देते थे....और रात के कुछ पहर तब तक और खिसक चुके होते। सुबह से थकान, न जाने कब घर सो जाता, पता नहीं चलता था। गांव से संपन्न घरों के दरवाजों पर देर रात तक चहल पहल रहती। सुबह सारे गांव के बच्चे मुंहअंधेरे से ही बुझे दीये बटोरने और उसी दोपहर गांव के मध्य बूढ़े बरगद के नीचे होने वाली 'गोधन बाबा' की पूजा की मस्ती में डूब जाते थे। वह दिन भी शाम तक प्रसाद और चीनी की मिठाई खाने-खेलने में बीत जाता था.....