Thursday, 16 October 2014

'यो पिकासो'

तस्वीर में बाईं तरफ पाब्लो पिकासो का सेल्फ़ पोट्रेट है तो दाईं तरफ़ फ्रांसिस बैकन ने ख़ुद को कैनवास पर उतारा हुआ है। इस हफ़्ते लंदन में पिकासो का सेल्फ-पोट्रेट एक प्रदर्शनी में पेश किया जा रहा है। उनके बनाए इस चित्र को अब तक सार्वजनिक रूप से नहीं देखा गया है। पिकासो ने अपना ये पोर्टेट 1901 में बनाया था जिसका नाम है 'यो पिकासो'।
(बीबीसी हिंदी से साभार)

भूख ने फिर तड़प के एक नथ उतारी है...

जो भी है, बहुत आसान नहीं है, जीवन में, जगत में,
झूठ के दुलराये हुए, भ्रम से बौराये हुए, सिर के फिरे,
पत्तलों के जूठन से पंचतारा पनालों तक......
...और कुछ ऐसा ही सच निहाल सिंह के शब्दों में
'भूख ने फिर तड़प के एक नथ उतारी है...
और वो कह गये, संसद में बहस जारी है...
भूख आँखों से सरक कर पलक पे बैठी है...
सुना रही है माँ चंदा की फिर कहानी है...
भूख चूल्‍हे की सर्दियों में ठिठुरती है मगर
ये बस्तियों के आग सेंकने की बारी है...
भूख से बुझ चुकी आँखों पे रोटियाँ रख दी...
है लग रहा कि फिर चुनाव की तैयारी है...'

Wednesday, 15 October 2014

खुदकुशी

खादी चेहरे, खाकी चेहरे, इस चेहरे में कैसा चेहरा,
सूती चेहरे, ऊनी चेहरे, उस चेहरे में कैसा चेहरा,
खुद को बुनने की, चुनने, झुठलाने की कोशिश, 
उसके चेहरे की आहट से, इसके चेहरे की आहट से
डर लगता है, खुदकुशी...खुदकुशी...खुदकुशी !

वर्षों बाद मैं घर लौटा हूं, देख रहा हूं, ये आंगन कितना छोटा है - जावेद अख्तर के तरकस के तीर

https://www.youtube.com/watch?v=ikd51BsQKeI&list=PLBD412B9E164AD76E&index=6

Monday, 13 October 2014

रंग / जयप्रकाश त्रिपाठी

शब्द का रंग एक / खून का रंग एक
पानी का रंग एक / रोटी का रंग एक....
सुबह का रंग एक / शाम का रंग एक
दिन का रंग एक / रोटी का रंग एक....

हंसी के रंग अनेक / खुशी के रंग अनेक
जाति-धर्म रंग-विरंगे / आदमी के रंग अनेक....
चीख और आह-कराह से गूंजते
जंगल के रंग अनेक / जानवरों के रंग अनेक.....

भूख और बन्दूक / ओत्तो रेनी कास्तिलो

तुम्हारे पास बन्दूक है और मैं भूखा हूँ,
तुम्हारे पास बन्दूक है क्योंकि मैं भूखा हूँ,
तुम्हारे पास बन्दूक है इसलिए मैं भूखा हूँ।
तुम एक बन्दूक रख सकते हो,
तुम्हारे पास एक हज़ार गोलियां हो सकती हैं,
और एक हज़ार और हो सकती हैं,
तुम उन सब को मेरे नाचीज शरीर पर आजमा सकते हो,
तुम मुझे एक, दो, तीन, दो हज़ार, सात हज़ार बार मार सकते हो,
लेकिन अंततः मैं हमेशा तुमसे ज्यादा हथियारबंद रहूँगा,
यदि तुम्हारे पास एक बन्दूक है
और मेरे पास केवल भूख....

नरेश सक्सेना

बह रहे पसीने में जो पानी है वह सूख जाएगा
लेकिन उसमें कुछ नमक भी है जो बच रहेगा
टपक रहे ख़ून में जो पानी है वह सूख जाएगा
लेकिन उसमें कुछ लोहा भी है जो बच रहेगा
एक दिन नमक और लोहे की कमी का शिकार
तुम पाओगे ख़ुद को और ढेर सारा ख़रीद भी लाओगे
लेकिन तब पाओगे कि अरे हमें तो अब पानी भी रास नहीं आता
तब याद आएगा वह पानी जो देखते-देखते नमक और लोहे का साथ छोड़ गया था
दुनिया के नमक और लोहे में हमारा भी हिस्सा है
तो फिर दुनिया भर में बहते हुए ख़ून और पसीने में हमारा भी हिस्सा होना चाहिए।