Saturday, 23 August 2014

लूट इंडिया लूट / शशिकांत सिंह शशि

दोस्तों! 'लूट इंडिया लूट', रियलिटी शो के इतिहास में मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। आज तक हम टीवी पर केवल मनोरंजन प्रधान कार्यक्रम ही देखते थे। ज्ञान प्रधान प्रोग्राम नहीं। प्रश्नोत्तरी पर आधारित एक दो टुच्चे प्रोग्रामों को ज्ञान प्रधान नहीं कहा जा सकता। ज्ञान वह जो व्यावहारिक जीवन में हमारी सहायता करे। 'लूट इंडिया लूट' में आपको जानकारी मिलेगी कि देश को कितने सुंदर तरीकों से लूटा जा सकता है? कितने प्रकार से लूटा जा सकता है? कौन-कौन मिलकर लूट सकते हैं? जनता को मूर्ख बनाने विभिन्न तरीकों पर भी हम प्रकाश डालेंगे। तो आइए शुरू करते है... लूट इंडिया लूट।
सबसे पहले हम स्वागत करते है, अपने जजों का। अपने दर्शकों को बता दें कि हमारे इस प्रोग्राम के तीन जज हैं। हमारे पहले जज हैं, श्रीमान घपलानंद गोस्वामी। आप बुद्धिजीवी वर्ग के प्रतिनिधि हैं। उनके पास देश को लूटने के इतने तरीके हैं कि श्रोता दंग रह जाएँगे। घपला-कला पर आपकी किताबें पूरी दुनिया में इज्जत प्राप्त कर चुकी हैं। बेस्ट सेलर रह चुके हैं। आजकल इन्होंने अपना विद्यालय खोल रखा है जिसमें घपले के विभिन्न तरीकों से अपने विद्यार्थियों को अवगत कराते हैं। दूसरे जज हैं श्रीमान घपलेश्वर 'नौनिहाल'। घपले के क्षेत्र में आपका नाम बड़ी इज्जत से लिया जाता है। 'घपलेश्वर' की उपाधि मिलने के बाद भी आप इस क्षेत्र में अपने आपको नौनिहाल ही मानते हैं। राजनीति की बड़ी-बड़ी हस्तियाँ भी, किसी घोटाले के पहले इनका नाम लेना नहीं भूलतीं। जुए के क्षेत्र में जो प्रतिष्ठा युद्धिष्ठिर को हासिल है वही इज्जत नौनिहाल जी को घपले के क्षेत्र में है। तीसरे जज हैं श्रीमान घपलेंदु भूषण। इन्होंने प्रशासन के बड़े-बड़े पदों पर रहते हुए इतने घपले किए कि इनका नाम गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में आना चाहिए था। मगर बुक वालों के आलस्य के कारण देश इससे वंचित रह रहा है। बुद्धिजीवी, राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी तीन अलग-अलग क्षेत्रों के कोहेनूर हमारे पास हैं।
आइए, आपको 'लूट इंडिया लूट' के नियमों से परिचित करा दें। हमारे पास अलग-अलग क्षेत्रों के प्रतिभागी हैं। सब अपने-अपने अनुभव बताएँगे और हमारे जज इस बात का निर्णय लेंगे कि सबसे सुंदर तरीके से देश को कौन लूट रहा है। एक प्रतिभागी के लिए एक जज की टिप्पणी ली जाएगी। बाकी दो केवल अंक देंगे। अंतिम तीन प्रतिभागियों का निर्णय जनता के वोटों से होगा। तो आइए शुरू करते हैं। आज तक का सबसे बड़ा शो - 'लूट इंडिया लूट'। हम सबसे पहले मंच पर आमंत्रित करते हैं शिक्षा से जुड़े एक ऐसे व्यक्ति को जो पेशे से शिक्षक हैं। हम देखते हैं कि उनके पास इंडिया को लूटने के कौन-कौन से तरीके हैं। आप अपना अनुभव बताएँ।
- 'मैं सबसे पहले इस बात का खंडन करना चाहता हूँ कि मैं शिक्षा से जुड़ा हुआ हूँ। नौकरी मिलने के बाद से आज तक मैने कोई किताब नहीं खोली और न ही किसी प्रकार से अपने मस्तिष्क को नई सोच से जोड़ने का प्रयत्न किया। हाँ, मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मैं शिक्षक हूँ। यह नौकरी मैने अपनी मर्जी से नहीं की। बेरोजगारी में यही मिली तो मैं क्या कर सकता हूँ? मैं हर संभव कोशिश करता हूँ कि इंडिया की लूट में मेरा भी एक छोटा सा हिस्सा हो जिस प्रकार सागर सेतु बनाने में गिलहरी का था। मैं कभी समय पर कक्षा में नहीं जाता। चालीस मिनट की कक्षा में, मैं पाँच मिनट विलंब से जाता हूँ और पाँच मिनट पहले निकल आता हूँ। इस प्रकार प्रतिदिन दस मिनट का समय लूट कर मैं अपने मन को संतुष्ट करता हूँ। बालक मेरी कक्षा में ऐसे बैठता हैं मानो वह सोया हुआ हो। चाहे तो सो भी सकता है। हाँ मेरी अपनी संस्था है जो संकटापन्न बालकों की हर संभव सहायता करती है। नोट्स से लेकर गाइड तक हमारी संस्था मुहैया कराती है। इससे भी आगे बढ़कर हम बालकों को परीक्षा में चिट तक मुहैया कराते हैं ताकि उनकी नाव न डूबे। इसके बाद भी यदि कोई कुलनाशक बच्चा नौका डुबोने पर आतुर हो ही जाता है तो हम उसकी सिफारिश परीक्षक तक भी पहुँचाते हैं। सार संक्षेप यह कि हमारी संस्था में आया हुआ बालक किसी भी 'कीमत' पर सफल हो ही जाता है। कीमत तो ऊँची होती है मगर बालक देश की सेवा के लिए तैयार हो जाता है। बस एक मास्टर इससे ज्यादा क्या कर सकता है। हमारे पास कौन-सा देश का खजाना है कि हम लूटेंगे। एक टुच्ची सी कोशिश है।'
एक जोरदार तालियाँ हो जाए हमारे गुरु जी के लिए। सचमुच, आपकी कोशिश लाजवाब है। मानना पड़ेगा कि आप अपने अत्यल्प संसाधनों से ही देश को लूटने का हर संभव प्रयत्न करते हैं। कहते हैं 'कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती' देखते हैं आप की हार होती है या जीत। हमारे जज क्या कहते हैं? मैं पूछना चाहता हूँ श्रीमान घपलानंद गोस्वामी जी से -
- 'माट साब की कोशिश को हम सलाम करते हैं। हम वाकिफ हैं इन तरीकों से आखिर हम पढ़-लिखकर ही यहाँ तक पहुँचे हैं। हम आज जो भी हैं अपने गुरुजनों के कारण ही हैं। हमारा उन सबको प्रणाम जो इन सभी तरीकों को आजमाते रहे हैं। विद्यालयों में आज भी ऐसे बोरिंग शिक्षक मौजूद हैं जो बालकों पर अनावश्यक रूप से पढ़ने-लिखने के लिए दबाव डालते हैं। शिक्षण को एक आंदोलन के रूप में लेते हैं। उनसे देश का नुकसान हो रहा है। बालक यदि सारी ऊर्जा महज दो चार क्लास पास करने में ही लगा देगा तो आगे चलकर देश के लिए क्या करेगा? उन्हें तो केवल परीक्षा में एपीयर होने के आधार पर ही पासिंग सर्टीफिकेट दे देना चाहिए। इस पर बुद्धिजीवियों का एक सम्मेलन हम बुलाने वाले हैं। मास्टरों की नाक में और नकेल लगनी चाहिए ताकि वे बच्चों को परेशान करना छोड़ें। इस मास्टर साहब के लिए मैं स्टैंड हो जाता हूँ। मेरी ओर से दस में दस।'
हमारे अगले प्रतिभागी हैं व्यापार जगत से जुड़े बड़े भाई बकरीवाला। आप हर चीज बेचते हैं। आटा-दाल से लेकर नकली ड्राइविंग लाइसेंस तक। हमारा मंच आपका जोरदार स्वागत करता है। आप अपने अनुभव बताएँ।
- 'मैं क्या बताऊँ। मेरी दुकान का नाम है 'सुविधा'। हर प्रकार की सुविधा हम अपने ग्राहकों को देते हैं और जीवन को असान बनाते हैं। हम 'जीओ और जीने दो' के सिद्धांत पर चलते हैं। चावल में कंकड़ और दाल में भूसी मिलाकर हम देख चुके हैं। इसमें अब पहले की तरह कमाई नहीं रही। रिटेलर के पास आढ़तिए ही मिलाकर भेजते हैं। मिलावट भी एक सीमा से आगे नहीं बढ़ सकती। हमने दामों के ऊपर नकली दाम की पर्ची चिपका कर भी देखा है। ग्राहक इतने जाग गए हैं कि परेशानी होने लगी है। हमने कम तौलने के कई तरीके अपनाए। तराजू में ही इतनी वैज्ञानिक विधियाँ हम फिट कर देते हैं कि सामने वाला देख नहीं पाता। हम इनाम और लॉटरी का तरीका भी अपनाते हैं। भाँति-भाँति के ऑफर देते हैं। फटी और पुरानी साड़ियों को इन्हीं ऑफर में निकाल देते हैं। नाना प्रकार के विज्ञापनों के माध्यम से हम ग्राहकों के दिमाग का दरवाजा बंद करते हैं। यदि एक विज्ञापन में हमने एक लाख खर्च भी कर दिए तो क्या? उससे पाँच लाख लोग बेवकूफ बन जाते हैं। चार लाख का फायदा, यदि एक रुपये का ही लाभ लें। मेरा दावा है कि कोई बेवकूफ होता नहीं बनाया जाता है, यदि संचार माध्यमों का उचित उपयोग किया जाए तो। एक ही ब्रांड हम छह महीने बाद आउट डेटेड घोषित कर देते हैं। ताकि फिर से एक बार उसी आदमी को मूर्ख बनाया जा सके जिसे पिछली बार बनाया गया था। हम मूली से लेकर मोबाइल तक बेचते हैं। चाहें तो ताड़ी से लेकर ताजमहल तक बेच दें। इन सब बातों का यह अर्थ यह नहीं कि हमारी देश भक्ति किसी से कमजोर है। हम स्थानीय थाने से लेकर केंद्र के नेताओं तक को उचित लाभ देते हैं। पार्टियों को चंदा देते हैं। नेता से लेकर अभिनेता तक की सेवा करते हैं। बस इतना ही और क्या कर सकते हैं? हम गरीब आदमी हैं। सौ दो सौ करोड़ का घोटाला करने की हमारी हैसियत नहीं है। धन्यवाद।'
एक जोरदार तालियाँ हो जाएँ हमारे महान बड़े भाई बकरीवाला के लिए। अब हम मंच पर आमंत्रित करते हैं मीडिया से जुड़े प्रतिभागी को जो सदैव जनता के लिए लड़ते हैं लेकिन 'लूट इंडिया लूट' में उनका भी एक मजबूत हिस्सा है। आइए, सुनते हैं उनकी कहानी उन्हीं की जुबानी। स्वागत है आइए। हमारे अगले प्रतिभागी मंच पर आएँ इसके पूर्व नियमों के मुताबिक हम अपने जज श्री घपलेंदु जी से कॉमेंट चाहेंगे।
- 'पूँजीपति वर्ग के तो हम सदा से ही कायल हैं। हम उनके हैं और वे हमारे हैं। हम चंदन हैं, वे पानी हैं। उनके द्वारा प्रदत्त राशि ही रिटायरमेंट के बाद हमारे काम आती है नहीं तो सरकार हमारे पास छोड़ती ही क्या है। आयकर के नाम पर जो आए रहते हैं उसे ले जाती है। उन्होंने अपने ज्ञान का जो एक छोटा सा हिस्सा जनहित में जारी किया है। वह सराहनीय है। अब हम अगले प्रतिभागी को सुनें।'
- 'मैं 'सनसनी' चैनल का संवाददाता हूँ। हमारा काम है जनता को सदैव सनसनाए रखना और खुद को टीआरपी की खजूर पर चढ़ाना। जनता को सनसनाने के लिए कई बार तो हमें घटनाओं को जन्म तक देना पड़ता है। एक बार एक आदमी ने आत्मदाह की घोशणा की हम समय से पहले जाकर कैमरा वगैरह लगाकर लैस हो गए। सही समय पर वह आदमी आया। उसने हमारी आँखों के सामने अपने बदन पर घासलेट डाली। हाथ में माचिस ली और जलाई। हम एक-एक घटना को कैमरे में कैद कर रहे थे। उसने आग लगा ली और चिल्लाने लगा। हम लाइव टेलिकास्ट करने लगे। हम चाहते तो उसे आत्मदाह करने से रोक सकते थे। उसके हाथ से घासलेट लेकर उसे पुलिस के हवाले कर सकते थे लेकिन उससे न्यूज तो नहीं बनता न। हमारा भुगतान तो टीआरपी के आधार पर ही होता है। उस संवाददाता की बड़ी इज्जत होती है जो सबसे ज्यादा उत्तेजना पैदा करता है। यह तो परदे की बात हो गई। कई बार तो लक्ष्मी पर्दे के पीछे भी खूब मिलती है। कभी-कभी, किसी-किसी, भाग्यशाली संवाददाता को किसी नेता या उद्योगपति या दूसरे किसी बड़े आदमी का कोई राज मालूम हो जाता है। सबूत भी हाथ लग जाते हैं। हम आसानी से ब्लैकमेल करके माल बनाते हैं। ऐसा अक्सर नहीं होता। अक्सर हमें भूतनी, साँपनी, सूअरी, से लेकर बाबा भूतनाथ तक के समाचार प्रस्तुत करने होते हैं। जनता जब तक मुँह बाए हमारे समाचार को नहीं देखती तब तक हमें मजा ही नहीं आता। आपने सुना ही होगा कि सरेआम एक औरत के कपड़े उतारने का समाचार दिया गया था। बाद में पता नहीं कैसे यह बात सामने आ गई कि वह औरत और कपड़े उतारने वाले दोनों ही हमारे ही लोग थे। क्या करें करना पड़ता है। इतनी कड़ी प्रतियोगिता है कि आदमी को टीआरपी बढ़ाने के लिए सारे हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। चैनल को उसी के मुताबिक विज्ञापन मिलते हैं। अब इससे ज्यादा हम क्या योगदान दे सकते हैं? हम राष्ट्रीय स्तर का घोटाला तो कर नहीं सकते। आशा है जजेज हमारी मजबूरी समझेंगे। धन्यवाद, जयहिंद।'
दर्शकों, जोरदार तालियाँ हो जाएँ हमारे संवाददाता प्रतिभागी के लिए। आखिर जनता के लिए ही इतनी जोखिम उठाते हैं। अब एक कमेंट हो जाए श्री घपलेश्वर जी का आखिर मीडिया और राजनीति का चोली दामन का साथ है।
- 'हाँ चोली दामन वाली बात आपने ठीक कही। मीडिया हमारी ताकत है। जनता की आँख है। इनकी एक खासियत और है जो शायद संकोचवश इन्होंने नहीं कहा। ये लोग सरकार सापेक्ष होते हैं। जिस दल की सरकार होती है उसी के अनुरूप ढल जाते हैं। नहीं तो केवल सनसनी पैदा करने के लिए तिल को खींच कर ताड़ बना देंगे। रस्सी को साँप सिद्ध करने में जितनी महारत इन्हें हासिल है उतनी किसी भी वर्ग को नहीं। सोने में सुगंध यह कि इनकी दुनिया में सभी पढ़े-लिखे ही होते है मगर लूटने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते। हम इन्हें सलाम करते हैं।'
आइए, हम जोरदार तालियों से स्वागत करें अपने अगले प्रतिभागी का जो एक 'बाबा' हैं। प्रवचन वगैरह करके समाज को उत्थान के मार्ग पर लिए जा रहे हैं। मैं तो समझता हूँ कि आजतक यदि प्रलय नहीं हुआ तो इन बाबाओं के कारण ही। कौन भगवान चाहेगा कि इतनी संपत्ति एक बार में बरबाद हो जाए। आइए, बाबा आपका स्वागत हैं। 'लूट इंडिया लूट' में अपने योगदान का बखान करें।
- 'बच्चो!'
बाबा, यहाँ बच्चा कोई नहीं है।
- 'हमारे लिए तो सभी बच्चे हैं। केवल हमीं सयाने हैं। तो बच्चो! यह संसार पाप का घर है। इसे स्वच्छ करने में हमारी भूमिका तो ईश्वर ने उसी दिन तय कर दी जिस दिन हमने संन्यास ग्रहण किया। क्यों किया? यह कहने का यह मंच नहीं है। नाना प्रकार के पापों और पपियों से समाज को बचाने के लिए हम प्रवचन करते हैं। उसे सुनकर लोग खूब लाभ उठाते हैं। थोड़ा सा लाभ हम भी उठा लेते हैं। आप देख ही रहे हैं, हमारे बदन पर यह रेशमी कुर्ता और हजार रुपये की धोती। यह अंगरखा हमने खास तौर पर दुबई से मंगाया है। मनुष्य के शरीर में आत्मा रूपी भगवान रहते हैं इसलिए इसे सजाना पड़ता है। हम छप्पन भोग जरूर खाते हैं लेकिन अपने लिए नहीं, उसी भगवान के लिए जो शरीर में निवास कर रहे हैं। हम मखमली गद्दे पर जरूर सोते हैं लेकिन उसी गॉड के लिए। आदरणीय न्यायधीश मंडली से आग्रह है कि हमारी तकनीक पर ध्यान दें। हम ऐश करते हैं तो सिर्फ इसलिए कि आत्मा रूपी परमात्मा खुश रहें। हमारे दर्शनों के लिए पाँच हजार रुपये दानपेटी में डालने पड़ते हैं। मंदिर जो हमेशा निर्माणाधीन ही रहते हैं, के लिए दान स्वरूप एक दो हजार रुपये डालना तो आम बात है। हमारे प्रभु सोने के सिंहासन पर विराजते हैं। सोने के मुकुट पहनते हैं। चाँदी का चँवर डोलाना पड़ता है। यही कारण है कि हमारे भक्त हमें सोने, चाँदी की भेंट दिया करते हैं। हम अपने भक्तों को निराश नहीं करते। उन्हें हर वह खुशी देते हैं जो इस भौतिक शरीर को चाहिए। हम उन्हें परमशांति और आनंद देते हैं। हम दो भक्तों का संगम भी करा देते हैं ताकि वे परम आनंद को प्राप्त कर सकें। हमारा तो एक ही उद्येश्य है - सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया। हरिओम तत्सत् हरिओम तत्सत्। जय हो समाज और संसार की।'
जय हो बाबा जय हो। आप महान ही नहीं अद्भुत भी हैं। मैं प्रार्थना करता हूँ, अपने जज श्री घपलेश्वर नौनिहाल से कि बाबा के परफार्मेंस पर दो शब्द कहें -
- 'हम तो बाबा के चेले हैं। इसी बाबा के नहीं जितने भी बाबा और बापू हो रहे हैं, हम सबके चेले हैं। ज्ञान की जो गंगा इन लोगों ने बहाई है। उसमें पता नहीं कितने गाँव और शहर बह गए। इनकी तकनीक अनोखी है। एक हजार लोगों को एक ही टोटका बताते हैं। उसमें से दस पर भी यदि लग गया तो अगली बार उसे मीडिया के सामने कर देंगे। कभी-कभी तो इनके भक्त प्रायोजित भी होते हैं। वे मीडिया के सामने कहते हैं कि कैंसर ठीक हो गया। डायबिटिज ठीक हो गया। सुनने वाले अगली बार मिलने आ जाएँगे। यह जो मैनेजमेंट का कमाल है वह अनुकरणीय है। इनको आयकर नहीं देना पड़ता। जितने प्रकार के सुख भगवान ने बनाए हैं सब इन लोगों के लिए ही हैं। जनता भी जान देती है। मजे तो हम भी करते हैं लेकिन हमारी छवि खराब हो जाती है। इनकी सदा जय हो। अब तो बाबा लोग राजनीति में भी आ रहे हैं। खुद के पास करोड़ों की संपत्ति है लेकिन कालाधन के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। जय हो प्रभु। जय हो।'
हमारे आखिरी प्रतिभागी हैं एक एनजीओ के डायरेक्टर जो आज लाखों से खेल रहे हैं जबकि कल तक उनके पास मात्र एक साइकिल थी और वह भी पुरानी। आखिर उन्होंने समाज की सेवा करके कैसे इतना माल बना लिया। उन्हीं से सुनते हैं। 'लूट इंडिया लूट' के इस आखिरी प्रतिभागी के लिए जोरदार तालियाँ।
- 'मैं एनजीओ चलाता हूँ। दस साल पहले हमने एक एनजीओ बनाई - 'सेवक'। समाज सेवा के लिए नहीं दरअसल मेरा नाम ही सेवक है। सेवक राम। तो साहब, सेवा का भी एक भी मौका हम छोड़ते नहीं है। चाहे वह बाढ़ के समय हो या सूखे के समय। आग लगे या भूकंप आए। हम तत्पर रहते हैं सेवा के लिए। हमारे साँठ-गाँठ काफी ऊपर तक हैं। राहत बाँटने का ठेका हमें ही मिलता है। राहत हम बाँटते भी हैं। नीचे से लेकर ऊपर तक सभी को राहत पहुँचाते हैं। लगे हाथ आम आदमी को भी राहत मिल जाती है। फटे-पुराने कंबल और रजाइयाँ हम नियमित रूप से राहत शिविरों में देते है। यह बात अलग है कि जितनी एंपोर्टेड सामग्री है वह बड़े लोगों की सेवा में जाती है। आखिर उन्हीं की कृपा से हमें चेक मिलते हैं। यह एक सिस्टम हैं, सबको सबका ख्याल रखना पड़ता है। तो जनाब भारत में न तो बाढ़ की कमी है न सूखे की। सरकार तो जनहित के लिए सदैव तत्पर रहती ही है। हमने इन हालातों में यदि दो पैसे जोड़ लिए तो कौन सी बड़ी कला हो गई? हम जितना दस साल में जोड़ पाए उतना तो जज साहब एक साल में जोड़ लेते हैं। उन्हें मौका अधिक मिलता है। वरना, कला और कौशल में हम उनसे कम नहीं है।'
खैर, आप जजों पर कॉमेंट नहीं कर सकते। यह नियमों के विपरीत है। हम जानते है कि हमारे माननीय जज आपके बारे में क्या राय रखते हैं। हम टिप्पणी लेते हैं श्रीमान घपलेश्वर जी से। आप राजनीति से जुड़े हैं। नाना प्रकार के घोटालों के जनक भी हैं और निर्णायक भी। तो घपलेश्वर जी...।
- 'यह गर्व की बात है कि आपके इस कार्यक्रम में समाज के सभी क्षेत्रों से जुड़े लोग आए सबने अपनी कला और कौशल का बखान किया। जहाँ तक बात है डायरेक्टर साहब का तो हम इनकी कला और समर्पण के कायल हैं। एनजीओ खोलते ही घपलों के चांस नहीं मिलने लगते। उसके लिए निरंतर प्रयास करना पड़ता है। अर्जुन की तरह केवल जो अपने लक्ष्य अर्थात धन पर ही निगाह लगाकर रखेगा उसे ही कालांतर में इस प्रकार के चांस मिलते हैं। हो सकता है कि एकलव्य की तरह कोई आपको गुरु न मिले और यदि मिले भी तो आपका ही अँगूठा काटने के लिए तैयार मिले। आपको अपने प्रयासों से ही घोटालों के स्वर्ग तक सदेह पहुँचना पड़ता है। हम डायरेक्टर साहब की इज्जत करते हैं और आग्रह करते हैं कि हमसे एकांत में मिलें।'
दर्शकों, शो का समय समाप्त हो रहा है। आपको हम अगले सप्ताह के एपीसोड में बताएँगे कि कौन है 'लूट इंडिया लूट' का विजेता। आखिर हमें भी तो ये रियल्टिी शो चलानी है जिनमें रियल्टिी नाम की चीज कुछ होती नहीं है। लिखे हुए स्क्रीप्ट पर सारे नाटक होते है। चाहे वह दो जजों के बीच की लड़ाई हो या अचानक किसी हस्ती का पहुँचना। किसी प्रतिभागी के माँ-बाप को लाना या उनके पसंदीदा कलाकार को सेट तक लाना। यह पहले से ही तय होता है ताकि अधिक से अधिक विज्ञापन मिल सकें। सारा खेल विज्ञापनों का ही है। सारा देश विज्ञापनों पर ही चल रहा है। सरकार अपने पक्ष में विज्ञापन दे रही है। विपक्ष उसके खिलाफ विज्ञापन दे रहा है। समाज सेवा का डंका पीटने वाले अपने पक्ष में विज्ञापन दे रहे हैं। जो जितना बड़ा प्रबंधक होगा, वह उतना अधिक चमकेगा। आप चाहें तो हमारे इस प्रोग्राम में हिस्सा ले सकते है। ले सकते क्या हैं? लेते ही हैं। हर आदमी इस प्रोग्राम का प्रतिभागी है। चाहे वह थोड़ा लूटता हो या ज्यादा। बेशक आपकी प्रसिद्धि नहीं हुई। खैर, आप चाहें तो हमारे प्रतिभागियों के लिए मैसेज कर सकते हैं। हमारी लाइन हमेशा खुली ही रहती है।

Friday, 22 August 2014

किसे लिखूं मैं; जो जीवन को टूट-टूटकर जीते हैंया उनको, जो जीवन को भांति-भांति से भोग रहे हैं ?किसे पढ़ूं मैं; जो जीवन भर टूट-टूटकर लिखते हैंया उनको, जो जीवन भर झूठ-मूठ का लिखते हैं ?



धारा के विरुद्ध तैरो : अनंतमूर्ति

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात कन्नड़ लेखक डॉ. उडुपी राजगोपालाचार्य
अनंतमूर्ति ने कहा था कि यदि गुजरात के मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री बने तो लोगों में भय का संचार होगा। भारत में अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा बढ़ जाएगा । देश में असहिष्णुता बढ़ेगी। भारत को एक मजबूत और शक्तिशाली राष्ट्र बनाने का ईमानदार प्रयास भी खतरे से भरा है। शक्तिशाली को सैन्य शक्ति, तकनीकी शक्ति, आर्थिक शक्ति आदि के रूप में ही परिभाषित किया जाता है लेकिन भारत को शक्तिशाली नहीं, लचीला राष्ट्र बनने की जरूरत है। भारत एक अलग किस्म की सभ्यता है। इसी तरह जब विकास की बात की जाती है तो उसका मतलब होता है कि बाघों के लिए कोई जगह नहीं होगी, अनगिनत भाषाओं के लिए कोई जगह नहीं होगी, अलग-अलग तरह के खान-पान के लिए कोई जगह नहीं होगी क्योंकि विभिन्न तरह के भोजन को मार्केट नहीं किया जा सकेगा। भारत विविधता वाला देश है। नरेंद्र मोदी के साथ समस्या यह है कि उनके पास आंतरिक जीवन नहीं है। यह भी एक तरह का खतरा है। मैं ऐसे देश में नहीं रहना चाहता, जहां मोदी प्रधानमंत्री हों।
उन्होंने कहा था कि हमारी क्षेत्रीय भाषाओं में रचा जाने वाला साहित्य अंग्रेजी में रचे जाने वाले साहित्य से बहुत भिन्न है। हम लोग लगातार समाज और संस्कृति के सवालों से जुड़े रहते हैं और जूझते रहते हैं। सिर्फ भारतीय भाषाओं में ही दलित साहित्य का या महिला लेखन का आंदोलन है। मेरा मानना है कि प्रत्येक संस्कृति का एक फ्रंटयार्ड और एक बैकयार्ड होता है। क्षेत्रीय भाषाएं हमारा बैकयार्ड हैं और वह बहुत समृद्ध है। जवाहरलाल नेहरू ने साहित्य अकादमी की स्थापना इसीलिए की थी ताकि सभी भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय भाषाओं का दर्जा प्राप्त हो। जब मैं अकादमी का अध्यक्ष था, तो कई आदिवासी भाषाएं भी साहित्य अकादमी की सूची में शामिल की गई थीं। हमारे देश में अंग्रेजी में कुछ बहुत अच्छी चीजें लिखी गई हैं लेकिन हमारी अपनी भारतीय भाषाओं में भी बहुत ही अच्छा साहित्य रचा जा रहा है। इसलिए अंग्रेजी का ऐसा कोई खास असर नहीं है। इतना जरूर है कि अब हर लेखक चाहता है कि उसका अंग्रेजी में अनुवाद हो।
उन्होंने कहा था कि धारा के विरुद्ध तैरो। सभी महान लेखकों ने यह किया है। काफ्का, कामू....किसी को भी ले लीजिये। वे सभी धारा के विरुद्ध तैरे. अंग्रेजी के रोमांटिक कवियों को देखिये। ब्लैक औद्योगिक क्रांति के बहुत बड़े आलोचक थे हालांकि यह क्रांति पश्चिमी सभ्यता के लिए सभी कुछ ला रही थी लेकिन ब्लैक इसके खिलाफ थे। वह इसके साथ जुड़ी क्रूरता और हिंसा के साक्षी थे और उन्होंने अपने विरोध को अभिव्यक्ति दी वर्ना औद्योगिक क्रांति तो बहुत बड़ी चीज थी।

अंधियारे बिल से झाँक रहे सर्पों की आँखें तेज़ हुईं : गजानन माधव मुक्तिबोध

अंधियारे मैदान के इन सुनसानों में
बिल्ली की, बाघों की आँखों-सी चमक रहीं
ये राग-द्वेष, ईर्ष्या, भय, मत्सर की आँखें,
हरियातूता की ज़हरीली-नीली-नीली
ज्वाला, कुत्सा की आँखों में ।
ईर्ष्या-रूपी औरत की मूँछ निकल आयी ।
इस द्वेष-पुरुष के दो हाथों के
चार और पंजे निकले ।
मत्सर को ठस्सेदार तेज़ दो बौद्धिक सींग निकल आये ।
स्वार्थी भावों की लाल
विक्षुब्ध चींटियों को सहसा
अब उजले पर कितने निकले ।
अंधियारे बिल से झाँक रहे
सर्पों की आँखें तेज़ हुईं ।
अब अहंकार उद्विग्न हुआ,
मानव के सब कपड़े उतार
वह रीछ एकदम नग्न हुआ ।
ठूँठों पर बैठे घुग्घू-दल
के नेत्र-चक्र घूमने लगे
इस बियाबान के नभ में सब
नक्षत्र वक्र घूमने लगे ।
कुछ ऐसी चलने लगी हवा,
अपनी अपराधी कन्या की चिन्ता में माता-सी बेकल
उद्विग्न रात
के हाथों से
अंधियारे नभ की राहों पर
है गिरी छूटकर
गर्भपात की तेज़ दवा
बीमार समाजों की जो थी ।
दुर्घटना से ज्वाला काँपी कन्दीलों में
अंधियारे कमरों की मद्धिम पीली लौ में,
जब नाच रही भीतों पर भुतही छायाएँ
आशंका की--
गहरे कराहते गर्भों से
मृत बालक ये कितने जन्मे,
बीमार समाजों के घर में !
बीमार समाजों के घर में
जितने भी हल है प्रश्नों के
वे हल, जीने के पूर्व मरे । उनके प्रेतों के आस-पास
दार्शनिक दुखों की गिद्ध-सभा
आँखों में काले प्रश्न-भरे बैठी गुम-सुम ।
शोषण के वीर्य-बीज से अब जनमे दुर्दम
दो सिर के, चार पैर वाले राक्षस-बालक ।
विद्रूप सभ्यताओं के लोभी संचालक ।
मानव की आत्मा से सहसा कुछ दानव और निकल आये !

मानव मस्तक में से निकले
कुछ ब्रह्म-राक्षसों ने पहनी
गान्धीजी की टूटी चप्पल
हरहरा उठा यह पीपल तब
हँस पड़ा ठठाकर, गर्जन कर, गाँव का कुआँ ।
तब दूर, सुनाई दिया शब्द, 'हुआँ' 'हुआँ' !
त्यागे मन्दिर के अध-टूटे गुम्बद पर स्थित
वीरान प्रदेशों का घुग्घू
चुपचाप, तेज़, देखता रहा--
झरने के पथरीले तट पर
रात के अंधेरे में धीरे
चुपचाप, कौन वह आता है, या आती है,
उसके पीछे--
पीला-पीला मद्धिम कोई कन्दील
छिपाये धोती में (डर किरणों से)
चुपचाप कौन वह आता है या आती है--
मानो सपने के भीतर सपना आता हो,
सपने में कोई जैसे पीछे से टोंके,
फिर, कहे कि ऐसा कर डालो !
फिर, स्वयं देखता खड़ा रहे
औ' सुना करे वीराने की आहटें, स्वयं ही सन्नाकर
रह जाये अपने को खो के !

त्यागे मन्दिर के अध-टूटे गुम्बद पर स्थित
घुग्घू को आँखों को अब तक
कोई भी धोखा नहीं हुआ,
उसने देखा--
झरने के तट पर रोता है कोई बालक,
अंधियारे में काले सियार-से घूम रहे
मैदान सूँघते हुए हवाओं के झोंके ।
झरने के पथरीले तट पर
सो चुका, अरे, किन-किन करके, कुछ रो-रो के
चिथड़ों में सद्योजात एक बालक सुन्दर ।
आत्मा-रूपी माता ने जाने कब त्यागा
जीवन का आत्मज सत्य न जाने किसके डर ?
माँ की आँखों में भय का कितना बीहड़पन
जब वन्य तेंदुओं की आँखों से दमक उठे
गुरु शुक्र और तारे नभ में
जब लाल बबर फ़ौजी-जैसा
जो ख़ूनी चेहरा चमक उठा
वह चांद कि जिसकी नज़रों से
यों बचा-बचा,
यदि आत्मज सत्य यहाँ रक्खे झरने के तट,
अनुभव शिशु की रक्षा होगी ।
ले इसी तरह के भाव अनगिनत लोगों ने
अपने ज़िन्दा सत्यों का गला बचाने को
अपना सब अनुभव छिपा लिया,
हाँ में हाँ, नहीं नहीं में भर
अपने को जग में खपा लिया !

चुपचाप सो रहा था मैं अपने घर में जब,
सहसा जगकर, चट क़दम बढ़ा,
अंधियारे के सुनसान पथों पर निकल पड़ा,
बहते झरने के तट आया
देखा--बालक ! अनुभव-बालक !!
चट, उठा लिया अपनी गोदी में,
वापस ख़ुश-ख़ुश घर आया !
अपने अंधियारे कमरे में
आँखें फाड़े मैने देखा मन के मन में
जाने कितने कारावासी वसुदेव
स्वयं अपने कर में, शिशु-आत्मज ले,
बरसाती रातों में निकले,
धँस रहे अंधेरे जंगल में
विक्षुब्ध पूर में यमुना के
अति-दूर, अरे, उस नन्द-ग्राम की ओर चले ।
जाने किसके डर स्थानान्तरित कर रहे वे
जीवन के आत्मज सत्यों को,
किस महाकस से भय खाकर गहरा-गहरा :
भय से अभ्यस्त कि वे उतनी
लेकिन परवाह नहीं करते !!
इसलिए, कंस के घण्टाघर
में ठीक रात के बारह पर
बन्दूक़ थमा दानव-हाथों,
अब दुर्जन ने बदला पहरा !
पर इस नगरी के मरे हुए
जीवन के काले जल की तह
के नीचे सतहों में चुप
जो दबे पाँव चलती रहतीं
जल-धाराएँ ताज़ी-ताज़ी निर्भय, उद्धत
तल में झींरे वे अप्रतिहत !

कानाफूसी से व्याप्त बहुत हो जाती है,
इन धाराओं में बात बहुत हो जाती है ।
आते-जाते, पथ में, दो शब्द फुसफुसाते
इनको, घर आते, रात बहुत हो जाती है ।
एक ने कहा--
अम्बर के पलने से उतार रवि--राजपुत्र
ढाँककर साँवले कपड़ों में
रख दिशा-टोकरी में उसको
रजनी-रूपी पन्ना दाई
अपने से जन्मा पुत्र-चन्द्र फिर सुला गगन के पलने में
चुपचाप टोकरी सिर पर रख
रवि-राजपुत्र ले खिसक गयी
पुर के बाहर पन्ना दाई ।
यह रात-मात्र उसकी छाया ।
घबराहट जो कि हवा में है
इसलिए कि अब
शशि की हत्या का क्षण आया ।

अन्य ने कहा--
घन तम में लाल अलावों की
नाचती हुई ज्वालाओं में
मृद चमक रहे जन-जन मुख पर
आलोकित ये विचार है अब,
ऐसे कुछ समाचार है अब
यह घटना बार-बार होगी,
शोषण के बन्दी-गृह-जन में
जीवन की तीव्र धार होगी !
और ने कहा--
कारा के चौकीदार कुशल
चुपचाप फलों के बक्से में
युगवीर शिवाजी को भरते
जो वेश बदल, जाता दक्षिण को ओर निकल !
एक ने कहा--
बन्दूक़ों के कुन्दों पर स्याह अंगूठों ने
लोहे के घोड़े खड़े किये,
पिस्तौलों ने अपने-अपने मुँह बड़े किये,
अस्त्रों को पकड़े कलाइयों
की मोटी नस हाँफने लगी
एकाग्र निशाना बने ध्यान के माथे पर
फिर मोटी नसें कसी, उभरीं
पर पैरों में काँपने लगी ।
लोहे की नालों की टापें गूँजने लगी ।
अम्बर के हाथ-पैर फूले,
काल की जड़ें सूजने लगीं ।
झाड़ों की दाढ़ी में फन्दे झूलने लगे,
डालों से मानव-देह बंधे झूलने लगे ।
गलियों-गलियों हो गयी मौत की गस्त शुरु,
पागल-आँखों, सपने सियाह बदमस्त शुरु !
अपने ही कृत्यों-डरी
रीढ़ हड्डी
पिचपिची हुई,
वह मरे साँप के तन-सी ही लुचलुची हुई ।
अन्य ने कहा--
दुर्दान्त ऐतिहासिक स्पन्दन
के लाल रक्त से लिखते तुलसीदास आज
अपनी पीड़ा की रामायण,
उस रामायण की पीड़ा के आलोक-वलय
में मुख-मण्डल माँ का झुर्रियों-भरा
उभरा-निखरा,
उर-कष्ट-भरी स्मित-हँसी
कि ज्यों आहत पक्षी
रक्तांकित पंख फड़फड़ाती
मेरे उर की शाखाओं पर आ बैठी है
कराह दाबे गहरी
(जिससे कि न मैं जाऊँ घबरा)
माँ की जीवन-भर की ठिठुरन,
मेरे भीतर
गहरी आँखोंवाला सचेत
बन गयी दर्द ।
उसकी जर्जर बदरंग साड़ी का रंग
मेरे जीवन में पूरा फैल गया ।
मुझको, तुमको
उसकी आस्था का विक्षोभी
गहरी धक्का
विक्षुब्ध ज़िन्दगी की सड़कों पर ठेल गया ।
भोली पुकारती आँखें वे
मुझको निहारती बैठी हैं ।

और ने कहा--
वह चादर ओढ़, दबा ठिठुरन, मेरे साथी !
वह दूर-दूर बीहड़ में भी,
बीहड़ के अन्धकार में भी,
जब नहीं सूझ कुछ पड़ता है,
जब अंधियारा समेट बरगद
तम की पहाड़ियों-से दिखते,
जब भाव-विचार स्वयं के भी
तम-भरी झाड़ियों-से दिखते ।
जब तारे सिर्फ़ साथ देते
पर नहीं हाथ देते पल-भर
तब, कण्ठ मुक्त कर, मित्र-स्वजन
नित नभ-चुम्बी गीतों द्वारा
अपना सक्रिय अस्तित्व जताते एक-दूसरे को
वे भूल और फिर से सुधार के रास्ते से
अपना व्यक्तित्व बनाते हैं।
तब हम भी अपने अनुभव के सारांशों को
उन तक पहुँचाते हैं, जिसमें
जिस पहुँचाने के द्वारा, हम सब साथी मिल
दण्डक वन में से लंका का
पथ खोज निकाल सकें प्रतिपल
धीरे-धीरे ही सही, बढ़ उत्थानों में अभियानों में

अंधियारे मैदानों के इन सुनसानों में
रात की शून्यताओं का गहरापन ओढ़े
ज़्यादा मोटे, ज़्यादा ऊँचे, ज़्यादा ऐंठे
भारी-भरकम लगने वाले
इन क़िले-कंगूरों-छज्जों-गुम्बद-मीनारों
पर, क्षितिज-गुहा-मांद में से निकल
तिरछा झपटा,
जो गंजी साफ़-सफ़ेद खोपड़ीवाला चांद
कुतर्की वह
सिर-फिरे किसी ज्यामिति-शाली-सा है।
नीले-पीले में घुले सफ़ेद उजाले की
आड़ी-तिरछी लम्बी-चौड़ी
रेखाओं से
इन अन्धकार-नगरी की बढ़ी हुई
आकृति के खींच खड़े नक्षे
वह नये नमूने बना रहा
उस वक़्त हवाओं में अजीब थर्राहट-सी
मैं उसको सुनता हुआ,
बढ़ रहा हूँ आगे
चौराहे पर
प्राचीन किसी योद्धा की ऊँची स्फटिक मूर्ति,
जिस पर असंग चमचमा रही है
राख चांदनी की अजीब
उस हिमीभूत सौन्दर्य-दीप्ती
में पुण्य कीर्ति
की वह पाषाणी अभिव्यक्ति
कुछ हिली।
उस स्फटिक मूर्ति के पास
देखता हूँ कि चल रही साँस
मेरी उसकी।
वे होंठ हिले
वे होंठ हँसे
फिर देखा बहुत ध्यान से तब
भभके अक्षर!!
वे लाल-लाल नीले-से स्वर
बाँके टेढ़े जो लटक रहे
उसके चबूतरे पर, धधके!!

मेरी आँखों में धूमकेतु नाचे,
उल्काओं की पंक्तियाँ काव्य बन गयीं
घोषणा बनी!!
चांदनी निखर हो उठी
उस स्फटिक मूर्ति पर, उल्काओं पर
मेरे चेहरे पर!!
पाषाण मूर्ति के स्फटिक अधर
पर वक्र-स्मित
कि रेखाएँ उसकी निहारती हैं
उन रेखाओं में सहसा मैं बंध जाता हूँ
मेरे चेहरे पर नभोगन्धमय एक भव्यता-सी।
धीरे-धीरे मैं क़दम बढ़ा
गलियों की ओर मुड़ा
जाता हूँ ज्वलत् शब्द-रेखा
दीवारों पर, चांदनी-धुंधलके में भभकी
वह कल होनेवाली घटनाओं की कविता
जी में उमगी!!
तब अन्धकार-गलियों की
गहरी मुस्कराहट
के लम्बे-लम्बे गर्त-टीले
मेरे पीले चेहरे पर सहसा उभर उठे!!
यों हर्षोत्फुल्ल ताज़गी ले
मैं घर में घुसता हूँ कि तभी
सामने खड़ी स्त्री कहती है--
"अपनी छायाएँ सभी तरफ़
हिल-डोल-रहीं,
ममता मायाएँ सभी तरफ़
मिल बोल रहीं,
हम कहाँ नहीं, हम जगह-जगह
हम यहाँ-वहाँ,
माना कि हवा में थर्राता गाना भुतहा,
हम सक्रिय हैं।"

मेरे मुख पर
मुसकानों के आन्दोलन में
बोलती नहीं, पर डोल रही
शब्दों की तीखी तड़ित्
नाच उठती, केवल प्रकाश-रेखा बनकर!
अपनी खिड़की से देख रहे हैं हम दोनों
डूबता चांद, कब डूबेगा!!

Thursday, 21 August 2014


हम गोरी बुराई की जगह काली बुराई को लाकर कष्‍ट नहीं उठाना चाहते। बुराइयां, एक स्‍वार्थी समूह की तरह, एक-दूसरे का स्‍थान लेने के लिए तैयार हैं।
प्यासे-प्यासे ओस चाटते रहे फलाने,
बिना सजा के जेल काटते रहे फलाने,
समय कटे कैसे अब एक-एक दिन भारी,
जीवन भर आदर्श बांटते रहे फलाने ।

Wednesday, 20 August 2014

मीडिया हूं मैं / जयप्रकाश त्रिपाठी

मीडिया में अपना भविष्य देख रहे जर्नलिज्म के छात्रों के लिए अपरिहार्य-सी मेरी सद्यःप्रकाशित पुस्तक 'मीडिया हूं मैं' 'पत्रकारिता का श्वेतपत्र' शीर्षक से इस आत्मकथ्य के साथ प्रारंभ होती है -  मुझे पत्रकारिता, प्रोपेगंडा, चुप्पी और उस चुप्पी को तोड़ने के बारे में बात करनी चाहिए : जॉन पिल्जर
'' चौथा स्तंभ । मीडिया हूं मैं । सदियों के आर-पार । संजय ने देखी थी महाभारत । सुना था धृतराष्ट्र ने । सुनना होगा उन्हें भी, जो कौरव हैं मेरे समय के । पांडु मेरा पक्ष है । प्रत्यक्षदर्शी हूं मैं सूचना-समग्र का, ... 'चौथा खंभा' कहा जाता है मुझे आज । आखेटक हांफ रहे हैं, हंस रहे हैं मुझ पर, 'चौथा धंधा' हो गया हूं मैं।' उजले दांत की हंसी नहीं हूं मैं अपने समय के आरपार । पढ़ना होगा मुझे बार-बार , अपनी कलम, अपने सपनों के साथ, मेरे साथ । श्रमजीवी पत्रकार हैं, सोशल मीडिया, जन-मीडिया, ग्रामीण पत्रकारिता आप का पक्ष है, गांव, खेत-खलिहान के हैं, अभिव्यक्ति की आजादी के पक्षधर साहित्यकार हैं अथवा महिला पत्रकार; तो पढ़ लीजिए, पहचान लीजिए, ...मुझ में गूंज रहे हैं शहीद भगत सिंह, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, बाबूराव विष्णु पराड़कर, डॉ. भीमराव अंबेडकर, मौलाना अबुल कलाम आजाद के स्वर ।''
विश्व-मीडिया की दुर्लभ सूचनाओं एवं आद्योपांत सुपठनीयता से परिपूर्ण अपने कुल 608 पृष्ठों, तेरह अध्यायों में विभाजित इस पुस्तक का मुखपृष्ठ रघुवीर सहाय की इन पंक्तियों से उद्धृत होता है- 'कुछ तो होगा, कुछ तो होगा, अगर मैं बोलूंगा, न टूटे, न टूटे तिलिस्म सत्ता का,  मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा ।' मीडिया का इतिहास, न्यू मीडिया, मीडिया का अर्थशास्त्र, मीडिया-राज्य-कानून और समाज, मीडिया में गांव और स्री, मीडिया में भाषा-साहित्य और मनोरंजन आदि विषय-केंद्रित विविध पक्षों को सविस्तार रेखांकित करने के साथ ही, पुस्तक में सुपरिचित पत्रकार ओम थानवी, साहित्यकार अशोक वाजपेयी, प्रसिद्ध टिप्पणीकार आनंदस्वरूप वर्मा आदि बारह मीडिया चिंतकों के बहुचर्चित लेख और एक महिला पत्रकार का त्रासद सफरनामा संकलनीय है । पुस्तक के ऐतिहासिक प्रेरणास्रोत हैं - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, महात्मा गांधी, माधवराव सप्रे, रामकृष्ण रघुनाथ खाडिलकर, इंद्रविद्या वाचस्पति, बनारसी दास चतुर्वेदी, बारींद्रनाथ घोष, लोकमान्य तिलक, सखाराम गणेश देउस्कर, मदनमोहन मालवीय, रामरख सिंह सहगल, दुलारे लाल भार्गव, पं.लक्ष्मण नारायण गर्दे आदि। मीडिया और स्त्री समस्या पर सीमोन द बोउवार, हेमंतकुमारी चौधरी, रामेश्वरी नेहरू, हुम्मा देवी, गुलाब देवी चतुर्वेदी, उषा प्रियंवदा आदि, मीडिया और मुसलमान विषय पर एडवर्ड सईद,  इकबाल अहमद, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, अबुल कलाम आज़ाद, डॉ.असगर अली इंजीनियर, डॉ. खुर्शीद अनवर, अख्तर हुसैन आदि पलाश विश्वास आदि के विचार रेखांकित हैं। पश्चिमी विचारकों, मीडिया चिंतकों और उद्यमियों में मुख्यतः जोजेफ पुलित्ज़र, नोम चोमस्की, सार्त्र, एडवर्ड हरमन, बौद्रिलार्द, हर्बर्ट शिलर, लिओ बोगर्ट, जान बर्ट, सीजी मूलर, विखेम स्टीड, जेम्स मैकडोनल्ड, लिप मैन, जॉन पिल्जर, मैकलुहान, चीफ जुलियन असान्जे आदि को उद्धृत किया गया हैं। (अमेजॉन, ई-बे, ऑलक्स आदि पर पुस्तक ऑनलाइन भी उपलब्ध है।)

जयप्रकाश त्रिपाठी

'मीडिया हूं मैं' : पृष्ठ- 612, मूल्य- 550 रुपये / संपर्क:120/41,LajpatNagar, Kanpur (UP)-208005/E-mail : jan.media.manch@gmail.com, Phone : 08009831375