Monday, 12 September 2016

14 सितंबर हिंदी दिवस : हिंदी-चिंतक रामविलास शर्मा

शीर्ष आलोचक रामविलास शर्मा ने भारतीय संस्कृति, भारत में अँग्रेजी, हिन्दी नवजागरण, हिन्दी जाति, भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिन्दी जैसी कालजयी विषयों को रेखांकित किया। हिंदी के प्रश्न पर वह भाषा, साहित्य और समाज को एक साथ रखकर मूल्यांकन करते हैं। वह लिखते हैं- आर्य पश्चिम एशिया या किसी दूसरे स्थान से भारत में नहीं आए हैं, बल्कि सच यह है कि वे भारत से पश्चिम एशिया की ओर गए हैं। रामविलास शर्मा का कहना है - दूसरी सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व बड़े-बड़े जन अभियानों की सहस्त्राब्दी है। इसी दौरान भारतीय आर्यों के दल इराक से लेकर तुर्की तक फैल जाते हैं। वे अपनी भाषा और संस्कृति की छाप सर्वत्र छोड़ते जाते हैं। पूँजीवादी इतिहासकारों ने उल्टी गंगा बहाई है। जो युग आर्यों के बहिर्गमन का है, उसे वे भारत में उनके प्रवेश का युग कहते हैं। इसके साथ ही वे यह प्रयास करते हैं कि पश्चिम एशिया के वर्तमान निवासियों की आँखों से उनकी प्राचीन संस्कृति का वह पक्ष ओझल रहे, जिसका संबंध भारत से है। सबसे पहले स्वयं भारतवासियों को यह संबंध समझना है, फिर उसे अपने पड़ोसियों को समझाना है।
हिंदी जाति की अवधारणा रामविलास शर्मा के जातीय चिंतन का केंद्रीय बिंदु है। भारतीय साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन तथा वैश्विक साहित्य से अन्तर्क्रिया के द्वारा रामविलास जी ने साहित्य के जातीय तत्वों की प्रगतिशील भूमिका की पहचान की है। वे लिखते हैं - ‘‘सन्‌ 1786 में ग्रीक, लैटिन और संस्कृत के विद्वान विलियम जोंस ने कहा था, ‘ग्रीक की अपेक्षा संस्कृत अधिक पूर्ण है। लेटिन की अपेक्षा अधिक समृद्ध है और दोनों में किसी की भी अपेक्षा अधिक सुचारू रूप से परिष्कृत है।’ पर दोनों से क्रियामूलों और व्याकरण रूपों में उसका इतना गहरा संबंध है, जितना अकस्मात उत्पन्न नहीं हो सकता। यह संबंध सचमुच ही इतना सुस्पष्ट है कि कोई भी भाषाशास्त्री इन तीनों की परीक्षा करने पर यह विश्‍वास किए बिना नहीं रह सकता कि वे एक ही स्त्रोत से जन्मे हैं। जो स्रोत शायद अब विद्यमान नहीं है। इसके बाद एक स्रोत भाषा की शाखाओं के रूप में जर्मन, स्लाव, केल्त आदि भाषा मुद्राओं को मिलाकर एक विशाल इंडो यूरोपियन परिवार की धारणा प्रस्तुत की गई। 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषा विज्ञान ने भारी प्रगति की है। अनेक नई-पुरानी भाषाओं के अपने विकास तथा पारस्परिक संबंधों की जानकारी के अलावा बहुत से देशों के प्राचीन इतिहास के बारे में जो धारणाएँ प्रचलित हैं, वे इसी ऐतिहासिक भाषा विज्ञान की देन हैं। आरंभ में यूरोप के विद्वान मानते थे कि उनकी भाषाओं को जन्म देने वाली स्रोत भाषा का गहरा संबंध भारत से है। यह मान्यता मार्क्स के एक भारत संबंधी लेख में भी है।
अँग्रेजों के प्रभुत्व से भारतीय जनता की मुक्ति की कामना करते हुए उन्होंने 1833 में लिखा था, ‘‘हम निश्‍चयपूर्वक, न्यूनाधिक सुदूर अवधि में उस महान और दिलचस्प देश को पुनर्जीवित होते देखने की आशा कर सकते हैं, जहाँ के सज्जन निवासी राजकुमार साल्तिकोव (रूसी लेखक) के शब्दों में इटैलियन लोगों से अधिक चतुर और कुशल हैं, जिनकी अधीनता भी एक शांत गरिमा से संतुलित रहती है, जिन्होंने अपने सहज आलस्य के बावजूद अँग्रेज अफसरों को अपनी वीरता से चकित कर दिया है, जिनका देश हमारी भाषाओं, हमारे धर्मों का उद्गम है और जहाँ प्राचीन जर्मन का स्वरूप जाति में, प्राचीन यूनान का स्वरूप ब्राह्यण में प्रतिबिंबित है।
रामविलास जी अंग्रेजों की प्रगतिशील भूमिका का मूल्यांकन तथ्यों की कसौटी पर करते हैं, इसीलिए वे उन्हें उतने प्रगतिशील नहीं लगते जितने अन्य विद्वानों को लगते हैं । शायद इसी कारण से डॉ रामविलास शर्मा अंगेजों की प्रगतिशील भूमिका का समर्थन करने के बजाय अपने लेखन में उन भारतीय तत्वों को उभारने का प्रयास करते हैं जो अंगेजों से भिन्न और कहीं अधिक प्रगतिशील थे ।
अंग्रेजों ने भारतीयों के इतिहास और साहित्य को पूरी तरह से खारिज करने के बाद, अपने औपनिवेशिक हितों के लिए जब इतिहास की व्याख्या करना प्रारंभ किया तो सबसे पहले हमारी ही भूमि पर हमें विदेशी साबित किया। उन्होंने कहा, `आर्य विदेशी थे।` यह कह कर वे अपने शासन को औचित्यपूर्ण आधार दे रहे थे। उन्होंने इतिहास की व्याख्या करते हुए बताया, आर्य विदेशी थे, वे जिस समय आए उनकी संस्कृति द्रविणों से अधिक समुन्नत थी और उन्होंने द्रविणों पर शासन कर उन्हें सभ्य बनाया। आज उन आर्यों की तुलना में हमारी संस्कृति अधिक समुन्नत है और हम उन पर शासन कर उन्हें वैज्ञानिक सीख दे रहे हैं। प्रश्न उठता है कि अंग्रेजों को ऐसे आधार तलाशने की जरूरत क्यों पड़ी? हमें याद रखना चाहिए कि ब्रिटेन सहित यूरोप में एक ऐसा बौद्धिक वर्ग था, जो लगातार भारत तथा अन्य उपनिवेशों में अनौचित्यपूर्ण शासन की निंदा कर रहा था। उन्हें संतुष्ट करने के लिए उपनिवेशवादियों ने ऐसी थोथी व्याख्याएँ  प्रस्तुत कीं।
आर्यों के संबंध में उन्होंने भाषा विज्ञान के आधार पर सिद्ध किया कि आर्य यहाँ से बाहर गए और आर्यों के साथ द्रविण भी। ये लिखते हैं,  “दूसरी सस्राब्दी ई.पू. में जब बहुत-से भारतीय जन पश्चिमी एशिया में फैल गए, तब ऐसा लगता है, उनमें द्रविण जन भी थे। इस कारण ग्रीक आदि यूरोप की भाषाओं में द्रविण भाषा तत्व मिलते हैं यथा तमिल परि (जलना), ग्रीक पुर (अग्नि), तमिल अत्तन (पीड़ित होना), ग्रीक अल्गोस (पीड़ा), तमिल अन (पिता), ग्रीक अत्त (पिता)। यूरोप की भाषाओं में 12  से 19 तक संख्यासूचक शब्द कहीं आर्य पद्धति से बनते हैं, कहीं द्रविण पद्धति से।" (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश, भाग २, पृ. 673) रामविलास जी पुस्तक के इसी अध्याय में जॉन हॉफमैन का उल्लेख करते हैं, जिन्होंने मुंडा परिवार की मुंडारी भाषा पर एक बड़ा ग्रन्थ `इनसाइकिलोपीडिया मुंडारिका` तैयार किया था। इसकी भूमिका में हॉफमैन आश्चर्य प्रकट करते हैं कि "मुंडा भाषा परिवार के जो शब्द आर्य भाषाओं में नहीं हैं, वे भी यूरोप की भाषाओं में मिल जाते हैं।
वास्तव में दूसरी सहस्राब्दी ई. पूर्व. में जब बहुत-से भारतीय गण और जन पश्चिम एशिया में फैले, तब उनके घुल-मिल जाने से स्लाव, ग्रीक, लैटिन, जर्मन आदि समुदायों की भाषाओं का निर्माण हुआ।" (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश, पृ. 673) इसी विवेचन में वे आगे लिखते हैं,  "अवश्य ही इन प्रवासी जनों पर पीछे से बराबर दबाव पड़ता रहा होगा, जिससे ये यूरोप के उत्तर की ओर बढ़ते गए और इंडो-यूरोपियन परिवार की भाषाएँ बोलनेवाले यूरोप की अधिक उपजाऊ प्रशस्त भूमि पर बस गए। फिनोउग्रियन परिवार की भाषाएँ बोलनेवाले और भी उत्तर में ठेल दिए गए।"
उन्होंने हिंदी नवजागरण को 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से अभिन्न रूप से संबद्ध मानते हुए लिखा –“हिंदी प्रदेश में नवजागरण 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से शुरू होता है ।” (महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण, भूमिका) इसे हिंदी प्रदेश का राष्ट्रीय व जातीय संग्राम मानते हुए रामविलास जी ने इसके प्रभाव का सविस्तार विश्लेषण किया और यह दिखाया कि किस तरह इस राष्ट्रीय संग्राम का असर सारे देश पर हुआ, किंतु हिंदी भाषी प्रदेश पर सबसे अधिक हुआ। डॉ. सत्यप्रकाश मिश्र इस संदर्भ में लिखते हैं, "हिंदी जाति के नवजागरण के अंतर को अन्य जातियों के नवजागरण से भिन्न रूप में रेखांकित करके निश्चय ही उसकी प्रकृति को समझने में मदद की है।" (आलोचक और समीक्षाएँ, पृ. 24) रामविलास शर्मा का मानना है कि हिंदी नवजागरण सामंतवाद व साम्राज्यवाद का विरोध करके आगे बढ़ा, इसीलिए इसकी एक पुरानी परंपरा है । 1857 के पहले के नवजागरण को जन-जागरण का नाम देते हुए वे लिखते हैं, “भारतेंदु युग उत्तर भारत में जन-जागरण का पहला या प्रारंभिक दौर नहीं है; वह जन जागरण की पुरानी परंपरा का खास दौर है। जन-जागरण की शुरुआत तब होती है, जब यहाँ बोल-चाल की भाषाओं में साहित्य रचा जाने लगता है, जब यहाँ के प्रदेशों में आधुनिक जातियों का गठन होता है। यह सामंत विरोधी जागरण है।" (भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिंदी नवजागरण की समस्याएँ, पृ. 13) रामविलास जी भक्ति काल मे फैलाए गए इस जन-जागरण को `लोक-जागरण` कहते हैं। प्लासी की लड़ाई से 1857 के स्वाधीनता संग्राम तक जो युद्ध हुए, उन्हें `जन-जागरण` का नाम देते हैं। पहले दौर के लोक जागरण को दूसरे दौर के जन-जागरण से अलग करते हुए बताते हैं कि पहले दौर में विरोध सामंतवाद से है जबकि दूसरे दौर में साम्राज्यवाद से है।
डॉ. रामविलास शर्मा हिंदी नवजागरण की व्याख्या करते हुए कई चरणों का उल्लेख करते हैं। पहला चरण गदर या 1857 का स्वाधीनता संग्राम और दूसरा भारतेंदु युग है। हिंदी नवजागरण का तीसरा चरण महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनके सहयोगियों का कार्यकाल है। सन 1990 में `सरस्वती` का प्रकाशन आरंभ हुआ और 1920  में द्विवेदी जी उससे अलग हुए। इन दो दशकों की अवधि को `द्विवेदी युग` कहा जा सकता है। निराला साहित्य को रामविलास जी इसी नवजागरण की अगली कड़ी मानते हैं। ये लिखते हैं, “इस तरह नवजागरण जो 1857 के स्वाधीनता संग्राम से आरंभ हुआ, वह भारतेंदु युग में और व्यापक बना, उसकी साम्राज्य विरोधी और सामंत, साम्राज्य विरोधी प्रवृत्तियाँ द्विवेदी युग में पुष्ट हुईं। फिर निराला के साहित्य में कलात्मक स्तर पर तथा उसकी विचारधारा में ये प्रवृत्तियाँ क्रांतिकारी रूप में व्यक्त हुईं।"            (महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नव जागरण, पृ. 18) उन्होंने माना है कि नवजागरण की प्रक्रिया यहीं समाप्त नहीं हो जाती बल्कि अब भी जारी है । आज नवजागरण का संबंध पूँजीवाद से है।
डॉ. रामविलास शर्मा के हिंदी नवजागरण संबंधी मान्यताओं की कुछ अपनी विशेषताएँ हैं, जिनकी ओर डॉ. शम्भुनाथ ने अपने लेख `हिंदी नवजागरण की अवधारणा : संदेह के बावजूद` (अलोचना, सहस्राब्दी अंक पाँच, अप्रैल-जून 2001) में लिखा है। पहली विशिष्टता है कि उन्होंने इसे तेरहवीं शताब्दी से ही विस्तृत निरंतरता में देखा। दूसरी बड़ी विशिष्टता है कि इसका संबंध हिंदी जाति के निर्माण और आत्मपहचान से स्थापित किया। तीसरी विशिष्टता यह है कि आधुनिक नाटककार शेक्सपीयर के काल का उदाहरण रख कर वे स्पष्ट करते हैं कि आधुनिकता का संबंध मशीनी उत्पादन से नहीं होता। सामंती व्यवस्था के भीतर व्यापारिक हस्त-शिल्प, कृषि, वाणिज्य, बाजार और नगर ही व्यापारिक पूँजीवाद की आधारशिला के लिए पर्याप्त हैं। चौथी बड़ी विशिष्टता यह है कि रामविलास शर्मा नवजागरण के हिंदी जातीय संदर्भ का उद्घाटन करने की प्रक्रिया के संदर्भ में वस्तुतः `रिनेसाँ` से लगातार एक दूरी बनाते चले गए। उन्होंने प्राच्यविद्यावाद को चुनौती देते हुए, लगभग हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में घोषित किया कि "भारत में अंग्रेज न आए होते तो भी सांस्कृतिक नवजागरण संभव था।" इस नवजागरण की पाँचवी सबसे बड़ी विशेषता है कि इसे पहले चरण में सामंत विरोधी और दूसरे चरण में सामंतवाद, साम्राज्यवाद विरोधी कहा गया। छठवीं सबसे बड़ी और अंतिम  विशेषता है कि हिंदी नवजागरण के पहले चरण में सामंतवाद, साम्राज्यवाद, पृथकतावाद, रीतिवाद, नस्लवाद और संकीर्ण जातीयतावाद का विरोध करते हुए भारतीय राष्ट्रीयता और संस्कृति के भीतर ही हिंदी जाति की परिकल्पना की गई। इसमें हिंदी और उर्दू दोनों को समान जगह दी गई।
यह सत्य है कि डॉ. रामविलास शर्मा का नवजागरण संबंधी विवेचन पूर्ण नही कहा जा सकता, क्योंकि इसमें अनेक बातों का स्पष्टीकरण नहीं है। सबसे पहली बात तो यही है कि भारतीय नवजागरण का हिंदी नवजागरण से स्पष्ट भेद नहीं है। दूसरी बात भारतीय नवजागरण के संदर्भ में हिंदी नवजागरण की दिशा और स्वरूप का स्पष्टीकरण नहीं किया गया। इसी प्रकार अन्य अनेक प्रश्न उठाए जा सकते हैं। इसके बावजूद, कर्मेंदु शिशिर ठीक ही लिखते हैं, “सवाल और भी उठाए जा सकते हैं और उठाए जाने चाहिए भी। मगर नवजागरण की मूल स्थापना को उलट कर अंग्रेजों की भूमिका को प्रगतिशील सिद्ध करना अथवा हिंदी नवजागरण के अस्तित्व को ही विवादग्रस्त करना उचित नहीं, लेकिन निहित उद्देश्योंवाले संदिग्ध मार्क्सवादियों का एक अच्छा-खासा वर्ग है जो भारत की सभ्यता, विकास, यहाँ तक कि आजादी का श्रेय भी अंग्रेजों को देने में शर्म मह्सूस नहीं करता।" (रामविलास शर्मा का हिंदी नवजागरण, कल के लिए,  जनवरी-मार्च, 2002) आज आवश्यकता है रामविलास शर्मा की इस मौलिक स्थापना को पूर्णता की ओर बढ़ाने की न कि इसे विवादग्रस्त बना कर खारिज करने या इसकी मौलिकता नष्ट करने की।
`हिंदी जाति की अवधारणा` भी डॉ. रामविलास शर्मा की एक मौलिक अवधारणा है। उनकी सभी स्थापनाओं में से यह स्थापना सर्वाधिक विवादग्रस्त रही है। अपनी इस स्थापना में वे जाति शब्द का प्रयोग  `नेशन` के अर्थ में करते हैं। इस अर्थ में जाति शब्द का प्रयोग सबसे पहले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने किया। उसके बाद कार्तिक प्रसाद व महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भी किया, जिसकी चर्चा करते हुए रामविलास जी लिखते हैं, “हिंदी में तथा भारत की अन्य भाषाओं में जाति शब्द का पेशेवर बिरादरी (caste), नस्ल (race) और कौम (nationality) के लिए प्रयुक्त होता रहा है। कौम के लिए उसका प्रयोग अपक्षाकृत नया नहीं है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने `जातीय संगीत' नाम के निबंध में प्रदेशगत जाति के संगीत की चर्चा की थी, किसी पेशेवर बिरादरी के संगीत की नहीं। श्यामसुंदर दास द्वारा संपादित जनवरी 1902 की 'सरस्वती' में कार्तिक प्रसाद के लेख का शीर्षक था - `महाराष्ट्रीय जाति का अभ्युदय`। जाति और साहित्य के संबंध में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1923 में हिंदी साहित्य सम्मेलन के कानपुर अधिवेशन में कहा था, `जिस जाति विशेष में साहित्य का अभाव या उसकी न्यूनता आपको दिखाई पड़े, आप यह निःसंदेह निश्चित समझिए कि वह जाति असभ्य किंवा अपूर्ण सभ्य है। जिस जाति की सामाजिक अवस्था जैसी होती है उसका साहित्य भी ठीक वैसा ही होता है।" (हिंदी जाति का साहित्य, पृ. 15-16)
हिंदी को जाति के रूप में चर्चित करने का श्रेय डॉ. रामविलास शर्मा को ही जाता है। उनकी दृष्टि में मराठी, बँग्ला, उड़िया आदि जैसे जातियाँ हैं, वैसे ही `हिंदी जाति` है। हिंदी जाति उन सभी बोलियों को मिला कर निर्मित होती है, जिसे `हिंदी भाषी क्षेत्र` कहते हैं। रामविलास शर्मा अंग्रेजी के अध्यापक होते हुए भी अपना संपूर्ण जीवन इसी `हिंदी जाति` के उत्थान और इसकी सांस्कृतिक परंपरा को निर्मित करने के लिए लगा दिया। ये चाहते तो आज के अंग्रेजीदाँ लोगों की तरह अंग्रेजी में लेखन कार्य कर सकते थे, किंतु इन्होंने ऐसा नही किया।
आज धर्म, संप्रदाय, जाति आदि के नाम पर सर्वाधिक बँटा हुआ हिंदी भाषी क्षेत्र ही है। रामविलास जी ने इसे `हिंदी जाति` के रूप में संगठित करने के लिए जो प्रयास किया, निश्चय ही वह आधुनिक भारत की मजबूती के लिए कारगर साबित हो सकती है। यद्यपि अनेक विद्वान इस पर शंका प्रकट करते हैं, जैसा कि रामचंद्र तिवारी लिखते हैं, “जैसे बाँग्ला जाति की भावना को ऊपर करने से धर्म, संप्रदाय आदि के भेद बंगाल में दब गए हैं, वैसे ही `हिंदी जाति` की भावना को ऊपर करने से हिंदी प्रदेश में भी धर्म और संप्रदाय का भेद दब जाएगा। हिंदी जाति के भीतर वे `उर्दू` को भी समाविष्ट करते हैं। उनकी यह स्थापना आज के माहौल को देखते हुए कम से कम हिंदी प्रदेश में व्यावहारिक प्रतीत नही होती । उर्दू भाषी अपने को `हिंदी जाति` के अंतर्गत स्वीकार नहीं करते। स्वयं मार्क्सवादियों में इस प्रश्न पर मतैक्य नहीं था। इसलिए चिंतन के स्तर पर `हिंदी जाति` की अवधारणा चाहे जितनी उपयोगी लगे, व्यवहार में इसकी चरितार्थता संदिग्ध है।" (कल के लिए, अप्रैल-जून,2002, पृ.28)।” ऐसी शंका करनेवाले विचारक शायद 1857 के पहले की स्थिति को भूल जाते हैं, जब न तो हिंदी और उर्दू का कोई सांप्रदायिक लगाव था और न ही हिंदी-उर्दू का विवाद। यह तो इस क्षेत्र को विभाजित करने की अंगेजों की रणनीति थी, ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता का षड्यंत्र था, क्योंकि इसी क्षेत्र से 1857 में उन्हें सर्वाधिक चुनौती मिली थी। इस क्षेत्र का दुर्भाग्य रहा की आजादी के बाद इस अलगाव को दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया गया।
डॉ. रामविलास शर्मा के जातीयता संबंधी चिंतन में कहीं भी संकीर्णता दिखाई नहीं पड़ती है। जातीय संवेदना को उभार कर समाज को कितना गुमराह किया जा सकता है, रामविलास जी इसके प्रति सचे़त दिखाई पड़ते हैं। इसीलिए वे हिंदी और उर्दू को बोल-चाल के स्तर पर एक भाषा मानते हुए भी उर्दू लिपि की रक्षा की आवश्यकता पर पूरा बल देते हैं। वे हिंदी को हिंदुत्व और उर्दू को इस्लाम से जोड़े जाने का लगातार विरोध करते रहे। इस संदर्भ में भगवान सिंह का कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे लिखते हैं, “उर्दू अपने साहित्य के कारण भारतीय समाज में एक ऐसा स्थान बना चुकी है कि इसके साहित्य की उपेक्षा संभव नहीं। हिंदी कवि स्वयं उर्दू के लोकप्रिय छंदों में लिखने की लालसा रखते हैं और जिन्हें किंचित सफलता मिलती है, वे इसे अपने लिए गौरव की बात मानते हैं। पर साहित्यिक भाषा के रूप में भी इसका हिंदी से उतना अंतर नहीं है; जितना हिंदी क्षेत्र की बोलियों का स्वयं हिंदी से।" (कल के लिए,  जनवरी-मार्च, 2002, पृ. 53) हिंदी का अस्तित्व ही उर्दू सहित उसकी विभिन्न बोलियों से बनता है, इसलिए हमें उसकी विभिन्न बोलियों तथा उर्दू के विकास के साथ-साथ एक मानक हिंदी तथा हिंदी जाति को बढावा देना चाहिए।
डॉ. रामविलास शर्मा जिस हिंदी संस्कृति की चर्चा करते हैं उसका निर्माण केवल हिंदुओं ने नहीं किया है। इस संस्कृति के निर्माण में हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध, सिख आदि अनेक धर्मावलंबियों का, समाज के अनेक वर्गों का योगदान रहा है। रामविलास जी की हिंदी जाति की अवधारणा के पीछे उनका गहन अध्ययन है। अजय तिवारी के शब्दों में, “हिंदी समाज व्यापक दरिद्रता का गढ़ है। जैसे-जैसे यह समाज शिक्षित होगा, जैसे-जैसे यह समाज अपना भाग्य बदलने के लिए संघर्ष करेगा, वैस-वैसे रामविलास जी का महत्व बढ़ता जायेगा। उस संघर्ष का आधार अपनी सांस्कृतिक अहचान और अपनी वर्गीय एकता होगी। रामविलास इसी बात के लिए लड़े थे।" (कल के लिए,  अप्रैल-जून, 2002, पृ. 28)
डॉ. रामविलास शर्मा ने कोई परंपरागत `हिंदी साहित्य का इतिहास` नही लिखा और न ही वे मूलतः हिंदी साहित्य के इतिहास लेखक थे। लेकिन अपनी अलग-अलग पुस्तकों में उन्होंने हिंदी साहित्य के बारे में जो भी लिखा है, उससे उनकी मौलिक स्थापनाओं का साफ पता चलता है। इस दिशा में इनका महत्वपूर्ण योगदान यह है कि ये हिंदी साहित्य के इतिहास की परंपरा की तलाश करते हुए वेदों तक गए और जो साहित्य उपनिवेशवादी अवधारणा का शिकार था, हर तरह से पश्चिम का ऋणी माना जाता था, उसे उसके मूल से जोड़ने का प्रयास किया। इसके केंद्र में भारतीय दृष्टिकोण को विकसित व स्थापित करने तथा हिंदी साहित्य एवं संस्कृति की एक परंपरा को निर्मित करने की चिंता है।

14 सितंबर दिवस : रंजिता प्रकाश

रंजिता प्रकाश लिखती हैं- सम्पूर्ण विश्व में भाषा बोलने में हिन्दी का चौथा स्थान है। हिन्दी दिवस प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को मनाया जाता है। राजभाषा सप्ताह या हिन्दी सप्ताह 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस से एक सप्ताह के लिए मनाया जाता है। अल्मोड़ा (उत्तराखण्ड) के बाड़ेछीना के रहने वाले वरिष्ठ कथाकार स्वर्गीय शैलेश मटियानी ने हिन्दी के प्रति सरकारों और नौकरशाहों के रवैये से बेहद दुखी होकर 'हिंदी दिवस' को भाषा के नाम पर शर्मनाक पाखंड करार दिया था। इस मुद्दे पर वह आजीवन सवालों की झड़ी लगाते रहे। हिन्दी को आज तक संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा नहीं बनाया जा सका है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि योग को 177 देशों का समर्थन मिला, लेकिन क्या हिन्दी के लिए 129 देशों का समर्थन नहीं जुटाया जा सकता?
सम्पूर्ण विश्व में भाषा बोलने में हिन्दी का चौथा स्थान है। हिन्दी दिवस प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को मनाया जाता है। राजभाषा सप्ताह या हिन्दी सप्ताह 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस से एक सप्ताह के लिए मनाया जाता है। इस पूरे सप्ताह अलग अलग प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। 14 सितंबर को ही संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर सन् 1953 से 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 1918 में महात्मा गांधी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने की पहल की थी। गांधीजी ने हिंदी को जनमानस की भाषा कहा था।
स्वतन्त्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर 14 सितंबर 1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जो भारतीय संविधान के भाग 17  के अध्याय की धारा 343 (1) में इस प्रकार वर्णित है- संघ की राज भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा। चूंकि यह निर्णय 14 सितंबर को लिया गया था। इस कारण हिन्दी दिवस के लिए इस दिन को श्रेष्ठ माना गया था। जब राजभाषा के रूप में इसे चुना गया और लागू किया गया तो गैर-हिन्दी भाषी राज्य के लोग इसका विरोध करने लगे और अंग्रेज़ी को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा। इस कारण हिन्दी में भी अंग्रेज़ी भाषा का प्रभाव पड़ने लगा।
हिन्दी को आज तक संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा नहीं बनाया जा सका है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि योग को 177 देशों का समर्थन मिला, लेकिन क्या हिन्दी के लिए 129 देशों का समर्थन नहीं जुटाया जा सकता? और तो और, हिंदी अपने देश में ही बेगानी होकर रह गई है। उसे आज तक राष्ट्रभाषा दर्जा नहीं मिल सका है। आजादी के बाद से इसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव मुख्य कारण रहा है। पाकिस्तान में भी पहली बार एक छात्रा को हिंदी की उच्च डिग्री प्रदान की गई। पर अपने देश में हिंदी के लिए हम क्या कर रहे हैं? असल में हिंदी भाषी ही हिंदी का गला घोंट रहे हैं। हिंदी बोलने वालों को अंग्रेजी बोलने वालों के मुकाबले कमतर आंका जाता है। ‘छाप तिलक सब छीनी रे, मोसे नयना लड़ाई के’- 12वीं सदी में हिंदी के सर्वोच्च शिल्पी अमीर खुसरो का यह सूफियाना कलाम उनके पीर निजामुद्दीन औलिया ही नहीं, बल्कि हिंदी पर भी बलिहारी होने की निशानी है।
देश के बाहर जापान, मिस्र, अरब, रूस, कनाडा, मारिशस आदि में तो हिन्दी को लेकर काफी सक्रियता देखी जाती है, मगर भारत में 14 सितंबर हिंदी दिवस भी रस्मी तौर पर निभाया जाने लगा है। अंग्रेजी बोलने में हमें गर्व होता है। हिन्दी बोलने में हीनता और जब तक इस भाव को हम पूरी तरह से नहीं निकाल देंगे, हिन्दी को सम्मान और सर्वमान्य भाषा के रूप में कैसे देख पाएंगे? डॉ. मारिया नेज्येशी हंगरी में हिन्दी की प्रोफेसर हैं। मुंशी प्रेमचंद पर पीएचडी की है। वह असगर वजाहत के हिन्दी पढ़ाने के लहजे से प्रभावित हुईं और हिन्दी सीख गईं। जर्मनी में हिन्दी शिक्षक प्रो. हाइंस वरनाल वेस्लर हिन्दी को समृद्ध भाषा मानते हैं, जर्मनी की युवा पीढ़ी को भारतीय वेदों, ग्रंथों, चौपाइयों, दोहों इत्यादि के जरिये इसका विस्तृत परिचय देते हैं। उनका मानना है कि हिंदी के एक-एक शब्द का उच्चारण जुबान के लिए योग जैसा है। प्रसिद्ध कथाकार शैलेश मटियानी ने 25 साल पहले लिखी अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रभाषा का सवाल’ में सवाल उठाया था कि 14 सितंबर को ही हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है? उन्होंने 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाने को शर्मनाक पाखंड करार दिया था।
वैज्ञानिक और सॉफ्टवेयर कंपनियों के कई मुखिया भी इस बात को बेहिचक मानते हैं कि डिजिटल भारत का सपना तभी पूरा हो पाएगा, जब हिंदी को सूचना और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनिवार्य किया जाएगा। एक आंकड़ा बताता है कि केंद्र और राज्य सरकारों की 9 हजार के लगभग वेबसाइट्स हैं जो पहले अंग्रेजी में खुलती हैं। यही हाल हिंदी में कंप्यूटर टाइपिंग का है। चीन, रूस, जापान, फ्रांस सहित दूसरे देश कंप्यूटर पर अपनी भाषा में काम करते हैं, लेकिन भारत में हिंदी मुद्रण के ही कई फॉन्ट्स प्रचलित हैं। इनसे परेशानी यह कि अगर वही फॉन्ट दूसरे कंप्यूटर में नहीं हों तो खुलते नहीं हैं, विवशत: हिंदी मुद्रण के कई फॉन्ट्स कंप्यूटर पर सहेजने पड़ते हैं।

14 सितंबर, हिंदी दिवस : क्या कहते हैं प्रो. रविन्द्रनाथ श्रीवास्तव

राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया के संदर्भ में भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका की बात को आज समाजशास्त्री और भाषा वैज्ञानिक समान रूप से स्वीकार करने लगे हैं। यह बात इसलिए भी महत्व की है कि भाषा अगर एक ओर राष्ट्रीय एकीकरण का महत्वपूर्ण उपादान बन सकती है तो वहीं दूसरी ओर वह समाज में तनाव द्वंद, विद्वेष और विघटन की प्रवृत्ति को भी जन्म दे सकती है। अतः यह आवश्यक है कि भाषा की इस दुहरी संभावना को हम सजग भाव से समझें और एक ऐसी भाषा नीति को अपनाएं जो देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में सहायक हो, हमारी बहुभाषिक यर्थाथता के अनुकूल हो और जो राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया में साधक हो। इधर हाल में अंग्रेजी में प्रकाशित दो लेख सामने आए हैं जिनमें इस समस्या को उठाने का प्रयास किया गया है पर भारत की भाषायी समस्या की पकड़ ढीली होने के कारण जो निष्कर्ष उनमें निकाले गये हैं वे न केवल भ्रांतिपूर्ण हैं बल्कि घातक भी हैं।। इनमें पहला लेख सुनंदा सान्याल का ‘इज़ लेंग्वेज युनाइट पीपुल?’ (1981) है और दूसरा कुलदीप नैयर का है ‘ए गवर्नमेंट शुड नाॅट ग्लोरीफाइ ए लैंग्वेज’ (1982)। इन दानों लेखों की पृष्ठ भूमि में राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया के संदर्भ में हिन्दी अंग्रेजी की भूमिका का प्रश्न रहा है। दोनों ही लेखों की ध्वनि यह रही है कि आज हम हिन्दी को जरूरत से ज्यादा महत्व दे रहे हैं और सरकार द्वारा हिन्दी को दिया जाने वाला समर्थन देश के हित में नहीं है। अपने पक्ष में इन दोनों सिद्धांतों ने कुछ निराले तर्क दिये हैं, जिसकी छानबीन आज आवश्यक है क्योंकि ये ही तर्क प्रायः हमें अन्य व्यक्तियों द्वारा भी सुनने को मिलते रहते हैं।
 सुनंदा सान्याल का यह मत है कि हिन्दी की अपेक्षा अंग्रेजी भाषा सामाजिक नियंत्रण के कहीं अधिक अवसर प्रदान कर सकती है। और यही कारण है कि आज कोई भी व्यक्ति आने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ानें के लिए बेहिसाब खर्च करने में संकोच नहीं करता। उनके मत में अंग्रेजी भी भारत के लिए उसी प्रकार स्वभाषा है जिस प्रकार हिन्दी, अहिन्दी-भाषिओं के लिए। मिसाल के तौर किसी तेलुगु या तमिल भाषी के लिए अगर अंग्रेज़ी परायी भाषा है तो हिन्दी भी उसकी अपनी भाषा नहीं है। यह एक साफ और सीधी बात है। यह कहना केवल एक वाक्छल ही है कि भारतीय भाषा होने के नाते हिन्दी पर अधिकार प्राप्त कर लेना अंग्रेजी के मुकाबले अधिक आसान होना चाहिए। इस तर्क में कोई बल नहीं है। कुलदीप नैयर यह तो स्वीकार करते हैं कि भारत में हिन्दी बोलने और समझने वालों की संख्या अन्य भाषाभाषियों की तुलना में सबसे अधिक है और लोकतन्त्र में संख्या को महत्व देना ही चाहिए। अतः हिन्दी को अन्ततः राजभाषा बनना ही है। लेकिन उनके अनुसार तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन को सफल बनाने की योजना वस्तुतः आग से खेलने जैसा है क्योंकि इससे भाषायी द्वेष बढ़ने की संभावना है। उनके अनुसार न तो हिन्दी के प्रगामी प्रयोग की दृष्टि से सरकार को कोई कदम उठाना चाहिए और न ही भाषा को नियोजित करने के लिए प्रयत्न। हमें तो उस दिन की मात्र प्रतीक्षा करनी चाहिए जब दक्षिण के अहिन्दी भाषी प्रदेश स्वतः हिन्दी की स्वीकृति की घोषणा कर दें।
 ऐसा लगता है कि कुलदीप नैयर ‘भाषा नियोजन’ की संकल्पना एवं प्रक्रिया से पूरी तरह अपरिचित हैं और सुनंदा सान्याल उनसे परिचित हैं लेकिन भारत की भाषायी यर्थाथता को जानबूझकर नकारना चाहती हैं उनकी चिंता उस भाषा की खोज और स्थापना की तरफ सिमटी है जो या तो विशाल सभा पर प्रभुत्व रख सके या जो सामाजिक नियंत्रण का साधन और शस्त्र बन सके। संप्रेष्णीयता, संचार और एकीकरण की प्रक्रिया आदि को भाषा नियोजन का लक्ष्य बनाने की अपेक्षा वे राज्यों के लिए प्रभुता संपन्न भाषा की बात उठाते हैं और अंग्रेजी को उसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं।
अंग्रेजी बनाम हिन्दी और हिन्दी बनाम अन्य क्षेत्रीय भाषाओं पर विचार करते समय हम प्रायः यह बात भूल जाते हैं कि अंग्रेजी को मात्रभाषा के रूप में ग्रहण करने वालों की संख्या नहीं के बराबर है। 1971 की जनगणना के अनुसार भारत की पूरी आबादी 548,195,652 है पर अंग्रेजी को मातृभाषा के रूप में घोषित करने वालों की संख्या मात्र 191,595 है। इसके अतिरिक्त हिन्दी को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करने वालों की संख्या 208,514005 है। हिन्दी कम से कम 6 राज्यों और 2 संघीय प्रदेशों की प्रमुख भाषा है, यथा राजस्थान (91.73 प्रतिशत), हरियाणा (89.42 प्रतिशत), उत्तर प्रदेश (88.54 प्रतिशत), बिहार (79.77), दिल्ली (75.97 प्रतिशत) और चंडीगढ़ (55.96 प्रतिशत)। हिन्दी भाषी प्रदेशों मुख्यमंत्री अगर अपने क्षेत्रों में भाषा और संप्रषण की समस्या, उसके मानकीकरण और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया तथा अन्य भाषाओं के साथ उसके सम्बंध के बारे में विचार करने के लिए किसी समय मिलते हैं तब कुलदीप नैयर ऐसे विद्वान चिंतित क्यों हो उठते हैं ? क्या उन्हें यह भय है कि बहुसंख्यक होने के बावजूद हिन्दी, जो अब तक प्रभुता-संपन्न अंग्रेजी के नीचे दबी सिसक रही थी, अपना नया व्यक्तित्व ग्रहण कर लेगी ?
इस तथ्य की ओर भी ध्यान देना होगा किसी भाषा का अपना अखिल भारतीय रूप क्या है? संख्या की दृष्टि से हिन्दी पंजाब (20.01 प्रतिशत), पश्चिम बंगाल (6.13 प्रतिशत), अंडमान निकोबार (16.07 प्रतिशत) में दूसरी प्रमुख भाषा के रूप में है और कम से कम पांच प्रदेशों में तीसरे स्थान पर है, यथा जम्मू-कश्मीर (15.07 प्रतिशत), असम (5.34 प्रतिशत), महाराष्ट्र (5.02 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (2.28 प्रतिशत) एवं त्रिपुरा (1.48 प्रतिशत)। अंग्रेजी की शक्ति भारत में द्वितीय भाषा के रूप में है, यद्यपि उसके मात्रभाषियों की संख्या नगण्य है। पर भारत के द्विभाषिक समुदाय के 25.7 प्रतिशत लोग अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं। इस दृष्टि से हिन्दी पिछड़ी भाषा नहीं है क्योंकि द्वितीय भाषा के रूप में इसको अपनाने वालों की संख्या 26.8 प्रतिशत है। इस संदर्भ में हमें अंग्रेजी और हिन्दी के आधार पर जन्मी द्विभाषिकता की प्रकृति पर भी ध्यान देना चाहिए जिसकी ओर सुनंदा सान्याल पूरी तरह बेखबर हैं (भले ही वह समाजभाषा वैज्ञानिकों के मत से अपनी बात को पुष्ट करना चाहते हैं) हिन्दी, प्रमुखतः आधारभूत द्विभाषिकता, सामाजिक संप्रेषण व्यवस्था के उस स्तर से संबंध रखती है जो जन जीवन की अपनी दैनिक आवश्यकताओं का परिणाम होता है। इस टाइप की द्विभाषिकता की जननी सामाजिक आवश्यकताओं का वह स्तर है जो न किसी औपचारिक भाषा शिक्षण की अपेक्षा रखता है और न ही किसी लिखित भाषा या साहित्यिक मानदंड का। हम इस अन्तर्राज्यीय बस अड्डों, रेलवे प्लेटफार्मों, विभिन्न धार्मिक स्थलो आदि पर समान व्यवहार की भाषा के रूप में फलते फूलते देख सकते हैं। इसके विपरीत अंग्रेजी जिस संभ्रात टाइप की द्विभाषिकता को जन्म देती है, वह दो भाषाओं के मानक रूप की अपेक्षा रखती है। यह बहुत कुछ औपचारिक परिस्थितियों के बीच दूसरी भाषा के सीखने का परिणाम होती है। स्पष्ट है हिन्दी की शक्ति, भारतीय जनजीवन की अपनी आवश्यकता और सामान्य जीवन की संप्रेषण संबंधी अनिवार्यता के साथ है जब कि अंग्रेजी की शक्ति (?) बौद्धिक चिंतन और संभ्रांत व्यक्तियों के लिए ‘प्रभुता’ स्थापन में निहित है।
यह भी ध्यान देने की बात है कि भारत एक बहुभाषीय देश है। इसीलिए राजभाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में इसकी भाषायी समस्या जटिल रूप में हमारे सामने उभरती है। प्रायः हम इन दोनों भाषा प्रकार्यों के अंतर को पकड़ नहीं पाते इसलिए यह आवश्यक है कि हम संक्षेप में बहुभाषी देशों के संदर्भ में राजभाषा बनाम राष्ट्रभाषा के प्रश्न पर विचार कर लें।
बहुभाषी देश की संप्रेषण व्यवस्था अनिवार्यतः संपर्क भाषा अर्थात बृहत्तर परिणाम पर ‘लिंगुआ फ्रैंका’ को जन्म देती है। राष्ट्रीय संदर्भ में कभी इसका रूप राजभाषा को जन्म देता है और कभी राष्ट्रभाषा को। राजभाषा का संबंध राष्ट्रवादिता (नेशनेलिज़्म) से रहता है, वह राष्ट्र को राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से एक सूत्रता में बांधने के काम में आने वाली प्रशासनिक प्रयोजनों की भाषा होती है। इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि वह भाषा अपने देश की ही हो। राष्ट्रभाषा का संबंध राष्ट्रीयता (नेशनेलिज़म) से रहता है, उसके पीछे जातीय प्रमाणिकता और ‘ग्रेट ट्रेडिशन’ की शक्ति काम करती है और उसके सहारे समाज राष्ट्र के स्तर पर समाज और संस्कृति के संदर्भ में तादातम्य स्थापित करता है और अपनी सामाजिक अस्मिता सिद्ध करता है।[1] प्रत्येक देश राष्ट्रीयता और राष्ट्रवादिता के द्वंद का समधान अपने ढंग से करता है। उदाहरण के लिए, घाना और गौंबिया ने राष्ट्रवादिता की प्रवृत्ति से प्रेरित होकर उस भाषा को देश की लिंगुआ फ्रैंका का स्तर दिया जो स्वतंत्रतापूर्वक शासकों (विदेशियों) की भाषा थी। इज़रायल, थाइलैंड, सोमालिया, इथोपिया आदि देशों ने राष्ट्रीयता से अनुप्राणित होकर अंतरक्षेत्रीय स्तर पर फैली अपनी देश की लिंगुआ फ्रैंका को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया। पर भारत, श्रीलंका, मलेशिया आदि ऐसे देशों के सामने सामस्या जटिल थी क्योंकि परंपरा अर्जित और संस्कृति-समर्थित इसमें कई समुन्नत भाषाएं राष्ट्रभाषा की दावेदार बनकर आईं। इन देशों ने अपना दूसरा ही रास्ता अपनाया।
यह ध्यान देने की बात है कि यद्यपि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार ‘संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी’ होगी’ पर उसी अनुच्छेद के खंड 2 के अनुसार संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की कालावधि के लिए उन सब राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए वह पहले से ही प्रयोग की जाती थी। ऐसा बताया जाता है कि अंग्रेजी के स्थान पर प्रशासनिक व्यवहार क्षेत्र में तत्काल प्रयोग में लाने के लिए हिन्दी भाषा को न तो समर्थ माना गया और न ही उतनी विकसित। दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि इस एकाएक परिवर्तन से अहिन्दी भाषिओं को काफ़ी असुविधा होगी जिससे प्रशासन तंत्र मे काफ़ी लंबी दरार पड़ जाएगी। इन सब बातों को ध्यान में रखकर यह व्यवस्था की गई कि 1965 तक स्थिति यथावत् बनी रहे ताकि एक तरफ हिन्दी को समृद्ध कर उसे प्रशासनिक प्रयोजनों की समर्थ भाषा भी बना लिया जाए और अहिन्दी भाषिओं को इतना समय भी मिल जाए कि वे अन्य भाषा के रूप में हिन्दी में व्यवहारिक दक्षता प्राप्त कर लें।
संविधान के अनुच्छेद 344 (2) के अनुसार राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त है कि ‘संघ के राजकीय प्रयोजनो के लिए हिन्दी भाषा के उत्तरोत्तर अधिक प्रयोग’ और ‘संघ के राजकीय प्रयोजनों में से सब या किसी एक के लिए अंग्रेजी भाषा के प्रयोग पर निर्वंधन (रिस्ट्रिकश्न)’ के लिए आयोग संसदीय समिति का गठन करे। इस आधार पर सन 1955 में एक राजभाषा आयोग और उसकी सिफारिश पर विचार करने के लिए सन 1957 में एक संसदीय समिति का गठन किया गया। पूरी वस्तुस्थिति और सामाजिक वातावरण को ध्यान में रखते हुए सन 1965 में आयोग और संसदीय समिति ने यह सिफारिश की कि अंग्रेजी का प्रयोग अभी भी यथावत् बना रहे और हिन्दी की समृद्धि और विकास में और गति लाने के लिए सरकार प्रयत्न करे। इन सिफारिशों को व्यवहारिक रूप से लागू करने के लिए संसद ने 1963 में एक राजभाषा अधिनियम पारित किया। इस राजभाषा अधिनियम की धारा 3 के अनुसार उन सभी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी के प्रयोग की बात कही गई जिनमें वह प्रयुक्त होती आई थी। चार वर्ष बाद सन 1967 में राजभाषा (संशोधन) अधिनियम पारित हुआ। इस संशोधित अधिनियम के अनुसार यह छूट दी गई कि सरकारी कर्मचारी हिन्दी या अंग्रेजी में काम कर सकता है। जो क्षेत्र द्विभाषिकता के लिए अनिवार्य माने गये (जिनमें हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के प्रयोग को अनिवार्य माना गया है) वे हैं - 
(क) संकल्प, सामान्य आदेश, नियम, अधिसूचना, तथा प्रेम विज्ञप्ति 
(ख) संसदीय रिपोर्ट तथा सरकारी कागज पत्र और
(ग) संविदा, करारनामा, लाइसेंस, परमिट, टेंडर, नोटिस, और सरकारी फार्म।
राजभाषा संशोधन अधिनियम ने हिन्दी-अंग्रेजी द्विभाषिक स्थिति की ही पुष्टि की है। इस अधिनियम ने यह भी निर्धारित किया है कि केंद्र सरकार के जितने भी कार्यालय व मंत्रालय हैं वे आपस में हिन्दी भाषा में पत्राचार कर सकते हैं लेकिन उनके अंग्रेजी का अनुवाद तब तक संलग्न कर भेजा जाए जब तक संबद्ध मंत्रालय या कार्यालय के अधिकारी हिन्दी की व्यवहारिक दक्षता प्राप्त नहीं कर लेते। संविधान के अनुच्छेद 347 के अनुसार एक राज्य तथा दूसरे राज्य तथा किसी राज्य और भारत संघ के बीच संप्रषण माध्यम के लिए वह भाषा, राजभाषा के रूप में व्यवहार में लाई जाएगी जो संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए उस समय प्राधिकृत भाषा होगी। लेकिन इसके साथ उसी अनुच्छेद में यह भी कहा गया है कि यदि दो या अधिक राज्य इस बात का करार करते हैं कि ऐसे राज्यों के बीच परस्पर संप्रेषण व्यवस्था के लिए भाषा हिन्दी होगी तो संप्रेषण में लिए हिन्दी भाषा का प्रयोग किया जा सकेगा। सन 1967 के राजभाषा संशोधन अधिनियम में यह व्यवस्था की गई कि केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकारों के बीच पत्र व्यवहार अंग्रेजी में तब चलता रहेगा जब तक अहिन्दी भाषी राज्य हिन्दी में पत्र व्यवहार करने के लिए स्वयं निर्णय नहीं ले लेते। ऐसी स्थिति में अगर एक राज्य दूसरे राज्य के साथ हिन्दी में पत्राचार करता है तो उसके साथ अंग्रेजी अनुवाद की प्रति भेजना आवश्यक है।
राजभाषा संशोधन अधिनियम नें द्विभाषिक प्रक्रिया को बढ़ावा ही दिया। यह गौर करने की बात है कि स्वाधीनता संग्राम के अग्रणी तथा मान्य कांग्रेसी नेता (महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, मदनमोहन मालवीय आदि) सभी यह मानते रहे कि भारतवर्ष की राजभाषा के लिए यदि कोई भाष सर्वाधिक उपयुक्त है तो वह एकमात्र हिन्दी ही है। महात्मा गांधी ने तो दूसरे गुजरात शिक्षा सम्मेलन के सभापति पद से बोलते हुए 1917 में यह कहा था कि राष्ट्रीय भाषा वही हो सकती है जो सरकारी कर्मचारियों के लिए सहज और सुगम हो, जो धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र मे माध्यम भाषा बनने की शक्ति रखती हो जिसको बोलने वाले बहुसंख्यक हों और जो पूरे देश के लिए सहज रूप से उपलब्ध हो अंग्रेजी किसी भी तरह इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती। उनके अनुसार हिन्दी ही एकमात्र वह भाषा थी जो उनके द्वारा निर्धारित आवश्यकताओं को पूरा करती थी जहां तक हिन्दी भाषा की व्यापकता और व्यवहार शक्ति की क्षमता का सवाल है गांधी जी के 1917 के भारत की स्थिति यह थी ‘हिन्दी बोलने वाला जहां भी जाता है हिन्दी का प्रयोग करता है और कोई व्यक्ति इस पर आश्चर्य व्यक्त नहीं करता। हिन्दी बोलने वाले हिन्दू धर्मोपदेश और उर्दू बोलने वाले मौलवी संपूर्ण भारतवर्ष में धर्म और आचरण संबंधी अपने भाषण हिन्दी या उर्दू में देते पाये जाते हैं। औरों की बात तो दूर यहां तक कि अशिक्षित बहुसमाज भी उन्हें समझ लेता है। यह भी स्थिति है कि जब एक अशिक्षित गुजराती उत्तर भारत में आता है तो वह टूठी फूटी हिन्दी बोलने की कोशिश करता पाया जाता है पर जब उत्तर भारत का कोई भइया बंबई में दरबान का काम करता है, वह बंबई के सेठों से गुजराती में बात करने से इंकार कर देता है और ये उनके मालिक गुजराती सेठ हैं जो टूटी फूटी हिन्दी भाषा में उनसे बात करते पाए जाते हैं। गांधी जी के अनुसार यह कहना गलत है कि मद्रास में भी बिना अंग्रेजी के काम नहीं चलाया जा सकता। उन्होंने हिन्दी के सहारे मद्रास में भी सफलतापूर्वक अपना काम चलाया।
गांधी जी या अन्य कांग्रेसी नेताओं ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दिलाए जाने की कोेशिश की। राष्ट्रभाषा यदि राष्ट्रीयता की भावना के सूचक रूप में सिद्ध होती है तब उसके दो लक्षण आपस में गुँधे रूप में मिलते हैं भीतरी तौर पर देश को एकताबद्ध करने की प्रवृत्ति और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बाह्य रूप में देश को विशिष्ट सिद्ध करने की प्रवृत्ति। हाॅगन (1966) किसी भी अन्य इकाई की तरह राष्ट्रभाषा का भी काम आभ्यंतर अंतर और और विभेद को कम करना ओर बाह्य अंतर और विभेद को उभारना होता है। इसका आदर्श होता है अभ्यांतर एकता और बाह्य विशिष्टता। आभ्यंतर एकता के लिए अगर बहुभाषी देशों में यह आवश्यक हो जाता है कि मातृभाषा के साथ ही एक अन्य भाषा ‘लिंगुआ फ्रैंका’ के रूप में उभरे तो बाह्य विशिष्टता के लिए यह भी जरूरी है कि ‘लिंगुआ फ्रैंका’ के रूप में राजभाषा का दर्जा पाने वाली भाषा स्वदेशी हो।
अभ्यांतर एकता और बाह्य विशिष्टता के रूप में हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने का प्रयत्न स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले भी होता रहा और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का यह कहना था कि ‘यह सच है कि कोई भी देश अपनी मातृभाषा के द्वारा ही आगे बढ़ सकता है। हम दूसरी भाषा सीख सकते हैं, बोल सकते हैं, लेकिन नये विचार उससे पैदा नहीं होेते। नए विचार केवल अपनी मातृभाषा के द्वारा ही निकल सकते हैं। इसलिए हमें भारत की सभी भाषाओं को आगे बढ़ाना है, प्रोत्साहन देना है और हिन्दी का तो एक विशेष स्थान है ही। हम चाहते हैं कि जल्दी से जल्दी भारत के सभी लोग अगर हिन्दी न बोल सके तो कम से कम समझ तो सके मैं समझतीं हूं, यह काम आगे बढ़ रहा है। इतने बढ़े देश में, जहां इतनी भाषाएं हैं वहां देश की एकता के लिए आवश्यक है कि कोई भाषा ऐसी हो, जिसे सब बोल सके, जो एक कड़ी की तरह सबको मिला जुला कर रख सके। इसीलिए हिन्दी को बढ़ाना हम सब का काम है’।
यह गौर करने की बात है कि स्वतंत्रता पूर्व के सभी प्रयत्न राष्ट्रभाषा के लिए थे जो भाषा (हिन्दी) के माध्यम से देश को एकताबद्ध कर उसे अंतर्राष्ट्रीय नक्शे पर एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित करे के लिए थे। इसके भीतर अखिल भारतीय प्रशासनिक प्रयोजनों के लिए सिद्ध भाषा प्राकार्य भी थे और संपूर्ण भूभाग की सांस्कृतिक एकता को एक ही सूत्र में आबद्ध करने वाले तत्व भी समाहित थे। पर भारतीय संविधान ने भाषा के संदर्भ में एकसूत्रता की कल्पना को केवल प्रशासनिक प्रयोजनों तक सीमित कर राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के विकास को संघ की राजभाषा मात्र तक सीमित कर दिया। भारतीय संविधान में जहां भी अखिल अखिल भारतीय स्तर पर संघ की भाषा के रूप में हिन्दी की बात की गई है उसे राजभाषा ही घोषित किया गया है। सच तो यह है कि हिन्दी के रूप में सिद्ध आभ्यांतर एकता और बाह्य विशिष्टता की राष्ट्रीय चेतना पर स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही दुहरा दबाव पड़ा जिसके प्रभाव से भारतीय संविधान के भाषा संबंधी अधिकनियम भी सर्वथा मुक्त नहीं कहे जा सकते।
यह तथ्य भाषा की अन्तर्निहित संकल्पना के भीतर है कि भाषा अपने भाषायी समाज के सदस्यों के भीतर सामाजिक अस्मिता की भावना को प्रश्रय देती है। हर भाषा न केवल विभिन्न बोलियों को अपने भीतर समेट कर एक समग्र इकाई के रूप में उभरती है वरन् मात्रभाषा के रूप में बोलियों को स्वीकृति देते हुए भी सामाजिक धरातल पर उनके बोलने वालों के बीच न केवल संपर्क साधन का काम करती है वरन् उनके भीतर तादात्म्य भाव पैदा कर एक समाज के सदस्य होने की धारणा को चेतनाबद्ध करती है। सामाजिक स्तर पर एक होने की यह चेतनाबद्ध धारणा भी ‘आभ्यंतर एकता अर्थात विभिन्न बोली भेद (अवधी, ब्रज, भोजपुरी, राजस्थानी आदि) के बावजूद भी एकभाषी (हिन्दी) होने की धारणा और बाह्य विशिष्टता अर्थात एक ही भूभाग की अन्य भाषाओं (तमिल, बंगला, गुजराती आदि) से भिन्न सिद्ध करने की प्रवृत्ति। बाह्य विशिष्टता जनपदीय उन समूहगत लक्षणों को उभारने का प्रयत्न करती है जो स्थानीय संस्कृति और साहित्य के धरोहर होते हैं और जो उस भाषायी समाज की सुख समृद्धि की संकल्पना को साकर करने में सहायक होते हैं। इसीलिए जब प्रशासन की सुविधा के लिए भारत को विभिन्न जनपदीय प्रदेशों के रूप में पुनर्गठित कने का प्रयास हुआ तब उसके इस भाषायी आधार की उपेक्षा न की जा सकी। प्रदेशों का भाषायी आधार क्या रहा है उसके बारे में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं। हां, यह तथ्य अवश्य हमारे सामने है कि वे सभी प्रदेश बहुभाषी हैं। पर प्रदेशों के गठन और सीमा निर्धारण के समय ‘डामिनेंट’ भाषा की संकल्पना से हम कभी अपने को मुक्त नहीं कर सके हैं। यही कारण है कि जब किसी विकसित चेतना वाले भाषायी समाज को गौण स्थान मिला है और डामिनेंट भाषा का भाषायी समाज उसके प्रगति मे बाधक हुआ है। भाषायी दंगे का वीभत्स रूप भी सामने उभरा है।
संविधान की अष्टम अनुसूची में इस प्रकार आज 15 मान्य प्रादेशिक भाषाएं हैं। जिनमें से अधिकांश भाषायी समाज की अस्मिता की साधक हैं और बाह्य विशिष्टता के रूप में अपने स्वतंत्र अस्तित्व की आकांक्षी हैं। इतिहास की जनपदीय सह-अनुभूतियां ओर साहित्य की भाषाबद्ध चेतना उनकी आकांक्षाओं में अपना रंग भरती है। स्थानीय सुख समृद्धि की लालसा और क्षेत्रीय स्तर पर आर्थिक सुरक्षा की भावना उनकी अपन अस्मिता में प्राण फूंकती है। इसलिए जब कभी भी अखिल भारतीय स्तर पर राष्ट्रीय भाषा के रूप में किसी एक भाषा (भले ही बृहत्तर भागों में समझी जाने वाली और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के समय सर्वाधिक प्रयोग में आने वाली हिन्दी भाषा ही क्यों न हो) को मान्यता देने की बात उठी है, अन्य भाषायी समाज ने इस शंकालुभाव से देखा है। कहीं इससे उनके भाषायी समाज की विशिष्टता खंडित तो नही हो रही ? कहीं इसके परिणाम स्वरूप उनके समाज से आर्थिक विकास का रास्ता अवरुद्ध तो नही हो रहा ? कहीं कोई और भाषायी समाज बढ़कर उनकी जातीय चेतना की हीन सिद्ध तो नहीं कर रहा है ? दूसरी भावना यह भी सामने उभरी है कि भारत अगर एक राष्ट्र है तो जिस प्रकार ‘हिन्दी भाषायी समाज’ उसका एक अंग है, उसी प्रकार हम भी उसके एक अंग हैं, फिर एक अंग की भाषा पूरे राष्ट्र का प्रतीक बन ‘राष्ट्रभाषा’ कैसे और क्यों न बने ? यह भी तर्क उभारा गया है कि जिस प्रकार किसी राष्ट्र के लिए यह आवश्यक नही है कि उसके सभी सदस्य एक धर्म के मानने वाले हों, उनके खान पान, रीति-रिवाज और आचरण विचार रूढि़यां एक हों, इसी प्रकार उसके लिए यह भी जरूरी नहीं कि उसके लिए एक ही राष्ट्रभाषा (भाषा नहीं ?) हो। पर यह भी सच है कि भाषाओं की इस भिन्नता और सामाजिक अस्मिताओं के भेद के बावजूद यह हमेशा अनुभव किया जाता रहा है कि अलग अलग भाषाओं के बीच कड़ी के रूप में कोई भाषा अवश्य होनी चाहिए। प्रशासन की सुविधा और अखिल भारतीय स्तर पर संप्रेषण व्यवस्था के लिए एक संपर्क भाषा देश की नियति है। इसलिए हिन्दी को एकनिष्ठ ‘राष्ट्रभाषा’ के रूप में मान्यता देने के पक्ष के समर्थक भी अधिकांशतः उसे प्रशासनिक प्रयोजनों के लिए सिद्ध ‘राजभाषा’ का दर्जा देने के लिए सहमत हो गये।
लेकिन इसके साथ पाश्चात्य शिक्षा के वातावरण में पला और स्वतंत्रता पूर्व की विदेशी प्रशासन व्यवस्था का संस्कारग्रस्त व्यक्तियों का एक ऐसा वर्ग भी है जो राष्ट्रभाषा या राजभाषा की समस्या को हिन्दी और प्रादेशिक भाषाओं के संबंधों में न ढूंढकर हिन्दी और अंग्रेजी की प्रतिद्वद्विता के रूप में उभारना चाहता है। उनके तरकश के तीर रहे है अंतर्राष्ट्रीय संबंध, वैज्ञानिक उपलब्धियां, आर्थिक विकास, विकसित भाषा रूप आदि। इनके साथ उनका यह भी कहना है कि राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से राष्ट्र को एक होने के लिए यह जरूरी नहीं कि उसकी राजभाषा, उस देश की ही कोई भाषा है। आखिर स्विट्जरलैंड में तीन राजभाषाएं हैं और उनमें से कोई भी उस देश की नहीं है। इसी प्रकार बेल्जियम की स्वीकृत दानों राजभाषाओं में से दोनों ही तो उस देश की अपनी भाषाएं नहीं हैं और मान भी लें कि राजभाषा, उसी देश के बोलने वालों की कोई भाषा हो, तो अंग्रेजी भाषा को अब भारत की एक भाषा के रूप में ही मान लेना चाहिए क्योंकि एक ओर तो अखिल भारतीय स्तर पर प्रशासन के लिए यह पहले से ही सिद्ध भाषा है और दूसरी ओर यह भारतवर्ष के पूरे बुद्धिजीवी वर्ग की वह भाषा है जिसके माध्यम से वह आधुनिकतम ज्ञान ग्रहण और अभिव्यक्त करती है (ये सभी तर्क समस्या के एक आंशिक पक्ष को उभारते हैं और सोंचने समझने की एक भ्रामक दिशा के परिणाम है।) यह अन्यत्र[3] दिखलाया जा चुका है। यहां इतना कहना ही अलग होगा कि ये सभी तर्क उच्च शिक्षा प्राप्त कर एक बहुत ही सीमित वर्ग की अधिकार रक्षा और प्रभुता शक्ति को अपने स्वार्थ हितों तक बांध रखने की भावना से मूलतः प्रेरित हैं। शासन तंत्र का प्रसार कर अगर उसमें जनता के अधिक से अधिक सहयोग लेने और उससे संबंध स्थापित करने की बात लोकतन्त्र की ध्वनि में है तो किसी ऐसी ही भाषा को राजभाषा के पद पर उठाना होगा जिसके बोलन समझने वाले सबसे अधिक हों और जिसका प्रचार और प्रसार बहुआयामी हो। आज की स्थिति में वह हिन्दी भाषा ही है। पर इसके साथ यह भी सच है कि उच्च शिक्षा प्राप्त यह अधिकारी वर्ग ही भारतीय प्रशासन की धुरी बना बैठा है और मात्र हिन्दी को राजभाषा का माध्यम बनाने से अगर किसी के हितों पर सबसे करारी चोट पड़ेगी तो वह यही वर्ग होगा। शासनतंत्र की व्यवहारिक सुविधा के लिए ही मूूलतः हिन्दी अंग्रेजी की द्विभाषिक स्थिति संवैधानिक आवाज की विडंबना के रूप में सुनी जा रही है।
राजभाषा (प्रशासनिक प्रयोजनों की भाषा) और राष्ट्रभाषा (सांस्कृतिक अस्मिता की भाषा) के बीच के यर्थाथ साधनों के रूप में हिंडोलें लेती हिन्दी की नियति की यही आवाज संविधान के अनुच्छेद 351 में मिलती है जहां उसकी भारत की सामासिक संस्कृति के सब तत्वों की अभिव्यक्ति के माध्यम बनाने की बात की गई पर जिसको औपचारिक दृष्टि से केवल राजभाषा के दायित्व और सूचक तत्व के रूप में मान्यता दी गईं हैं।
जैसा पहले संकेत दिया जा चुका है, फिशमैन (1971) ने इस नीति निर्णय के आधार पर कि किस भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया जाए राष्ट्रों को तीन वर्गों में विभाजित किया है। उनके अनुसार क-टाइप के निर्णय लेने वाले राष्ट्रों का वर्ग है जो जातीय प्रमाणिकता और ‘ग्रेट ट्रेडिशन’ की शक्ति के दबाव से मुक्त होकर अपने देश को एक सूत्रता में बांधने की ओर प्रवृत्ति हैं। इस वर्ग में उनके बुद्धजीवियों की आवाज़ सुनी जाती है जो ‘आधुनिकता’ से प्रभावित होकर अपने देश को समुन्नत करना चाहते हैं। इसके विपरीत ख-टाइप के निर्णय लेने वाले राष्ट्रों का वर्ग अपने चिंतन के पीछे हमेशा जातीय प्रामाणिकता और ‘ग्रेट ट्रेडिशन’ का दबाव महसूस करता है। यह वर्ग इस विचार से प्रेरित रहता है कि सामाजिक एकता और जातीय सामांजस्य की भावना को जाग्रत करने के लिए कोई एक स्वदेशी भाषा ही राष्ट्रभाषा की दावेदार बना सकती है। ग-टाइप के निर्णय लेने वाले राष्ट्रों की चिंतन प्रक्रिया जटिल होती है। ऐसे राष्ट्र यह मान कर चलते है कि क्षेत्रीयता की स्थानिक प्रवृत्ति से प्रेरित सामाजिक वर्ग का युग बीत गया और उससे ऊपर उठने का अर्थ ही होता है द्विभाषिक बनना। इस दृष्टि से द्विभाषिकता की स्थिति आज सामान्य व्यक्ति की ही नियति नहीं है अपितु यह स्थिति पूरे राष्ट्र की है। केवल राष्ट्र के धरातल पर सिद्ध प्रादेशिक (क्षेत्रीय) भाषाओं और अंतर क्षेत्रीय संपर्क सूत्र स्थापित करने वाली भाषा के बीच की द्विभाषिकता जरूरी नहीं अपितु देश को आधुनिक बनाने और दुनिया के अन्य देशों से संबंध स्थापित करने के लिए भी यह जरूरी है कि किसी एक विदेशी पाश्चात्य भाषा को स्वीकार कर दुहरी द्विभाषिकता को हम बढ़ावा दें।
निश्चय ही भारतवर्ष अगर किसी वर्ग में रखा जा सकता है, तो वह ‘ग-टाइप’ के निर्णय लेने वाले देशों का वर्ग। पर यहां की स्थिति उतनी सरल नहीं जितनी कि फिशमैंन समझते हैं। राष्ट्रभाषा के चुनाव के पीछे यहां अनेक ऐसी प्रवृत्तियां काम करती रहीं है जिनका आपस में तालमेल बैठाना बहुत सरल न था। कम से कम चार निश्चित धाराएं तो सामने उभर कर आतीं हैं:
(1) राष्ट्रीयतावादी धारा यह मानकर चलती है कि संस्कृत भाषा संस्कृति सभ्यता की ही नहीं वरन् अनेक भारतीय भाषाओं की जननी है जिन भाषाओं इसका पारिवारिक संबंध नहीं भी रहा उसको भी यह प्रभावित करती रही है। जातीय प्रामाणिकता के ऐतिहासिक गौरव स्तंभ के रूप में यह भाषा आधुनिक सभी भारतीय भाषाओं का हृतकंपन है इसलिए एक राष्ट्र और उसके हृतकंपन को मूर्तमान करने वाली राष्ट्रभाषा संस्कृत भाषा के रूप में ही सिद्ध हो सकती है।
(2) अंतर्राष्ट्रीयतावादी धारा यह मानकर चलती है कि राष्ट्र को प्रशासनिक और राजनीतिक दृष्टि से एक तो होना ही है। इसके साथ उसे आर्थिक दृष्टि से समृन्नत और शैक्षिक दृष्टि से सुदृढ़ होने के लिए यह जरूरी है कि वह आधुनिक ज्ञान विज्ञान की उपलब्धियो से परिचित हो। ऐसा तभी संभव है जब हम अधिक विकसित और वैज्ञानिक चिंतन प्रणाली को अधिक क्षमता से व्यक्त करने वाली अंग्रेजी भाषा को स्वीकार करें जो अब तक उच्च शिक्षा की माध्यम भाषा होने के कारण शिक्षित वर्ग के लिए सहज ही उपलब्ध है। इस विचारधारा के अनुसार आज कोरी राष्ट्रीय भावुकता से काम नहीं चल सकता। संपर्क और सहयोग के कारण अब तक विभिन्न राष्ट्रों से समूह के रूप में फैला संसार अब सिमटता जा रहा है और अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों के बिना आज किसी भी राष्ट्र के विकास की संभावना दुःस्वप्न मात्र है। इसके लिए हमें जो राष्ट्रभाषा चुननी है उसको एक आयाम पर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर को भी छूने की शक्ति रखनी चाहिए।
(3) क्षेत्रीय धारा वाले राष्ट्र का राजनीतिक इकाई मानते हैं और उसे इकाई मानते हुए भी अपनी प्रादेशिकता सत्ता और क्षेत्रीय अधिकारों के प्रति सजग और सतर्क हैं, उनके अनुसार जिस प्रकार भारतवर्ष अनेक धर्मों और अनेेक प्रजातियों का देश है उसी प्रकार वह ऐसा बहुभाषायी देश भी जहां अनेक भाषाएं अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक संपदा के साथ फल फूल रहीं हैं। इन सभी को अपनी सार्थकता है, अपने संदर्भ हैं और ये सभी राष्ट्रीय चेतना के सिद्ध रूप हैं। इनमें से किसी एक को राष्ट्रपद पर बैठाने पर अन्य सभी भाषायी समाजों के अपने विकास का रास्ता सापेक्षतया कठिन हो जाएगा। भारतवर्ष ऐसे लोकतांत्रिक देश में ऊपर उठने के लिए सबको समान सुविधा मिलनी चाहिए। इसलिए निष्कर्षतः इस धारा के समर्थक यह मानते पाए जाते हैं कि सभी प्रादेशिक भाषाएं भारत की राष्ट्रीय भाषाएं हैं।
(4) लोकवादी जनतांत्रिक धारा यह मानती है कि भारतवर्ष अनेक प्रदेशों का एक समुच्चय है पर इस समुच्चय की सिद्धि एक संघ के रूप में है। यह संघ ही है जो एक ओर भारत को राजनीतिक इकाई का रूप देता है और दूसरी ओर राज्यों के अंतससंबंधों के बीच कड़ी का काम भी करता है। इसी प्रकार प्रादेशिक भाषाओं की सता और सार्थकता को स्वीकार करती हुई वह उसके बीच कड़ी के रूप में सिद्ध होने वाली एक भाषा की धारणा को बढ़ावा देता है। उसके अनुसार भारत लोकतंत्र के सिद्धांत का प्रबल समर्थक भी है, अतः अखिल भारतीय स्तर पर संपर्क सूत्र के रूप में स्वीकृत वही भाषा हो सकती है जिसके सामाजिक आयाम बहुमुखी और बहुस्तरीय हों, जिसको अन्य भाषा के रूप में बोलने और समझने वालों की संख्या सबसे अधिक हो और जो भारतीय संस्कृति की लोकवादी चिंतन धारा को मूर्तमान करने में सक्षम हो। ऐसी भाषा संप्रति हिन्दी ही है।
भारतीय संविधान में भाषा संबंधी अनुच्छेदों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि संविधान निर्माता इन चारों प्रवृत्तियों से अपरिचित न थे और उनका प्रयास यही रहा है कि जहां तक हो सके, इन चारों धाराओं के बीच एक सामंजस्य पैदा कर कम से कम भाषायी तनाव की स्थिति पैदा की जाए। लोकवादी और अन्तर्राष्ट्रीयवादी धारा को एक साथ समेटने को कोशिश का यह परिणाम है कि प्राथमिक राजभाषा के रूप में ‘हिन्दी’ और सहयोगी राजभाषा के रूप में अंग्रेजी को संविधान में स्वीकृत पाते हैं। इसी प्रकार क्षेत्रीय धारा के साथ समझौता करने के प्रयत्न को हम इस रूप में पाते हैं कि किसी भाषा को यहां तक कि हिन्दी को भी, राष्ट्रभाषा के नाम से संबोधित या परिभाषित नही किया गया है, और अष्टम अनुसूची में स्वीकृत भाषाओं के रूप में संस्कृत, उर्दू और सिंधी के साथ प्रादशिक (राज्य भाषाओं) भाषाओं का नाम लिखा पाते हैं। इस प्रकार राष्ट्रीयतावादी धारा को इसके साथ मिलाकर रखने की प्रवृत्ति को हम अनुच्छेद 351 में पाते हैं जो हिन्दी भाषा के विकास के लिए निर्देश रूप में यह विचार व्यक्त करता है कि हिन्दी को अष्टम अनुसूची में उल्लिखित अन्य भारतीय भाषाओं के रूप, शैली और पदावली को आत्मसात करते हुए तथा जहां आवश्यक या वांछनीय हो, वहां उसके शब्द भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से तथा गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए विकसित किया जाए।

Thursday, 8 September 2016

शाबाश ताशी-नुंग्शी

‘एवरेस्ट ट्विन’ के नाम से मशहूर ये हैं हरियाणा-उत्तराखंड की जुड़वा बहनें ताशी और नुंग्शी।  

गिनीज बुक समेत  तमाम रिकार्ड अपने नाम दर्ज करा चुकी हैं। 
अब न्यूजीलैंड की सर्वोच्च चोटी माउंट कुक पर फतह करने की तैयारी में हैं। 
इन दिनो दोनो बहनें ब्रिटेन में ‘बेटी बचाओ’ जागरूकता अभियान में शिरकत कर रही हैं।

Wednesday, 31 August 2016

यशपाल की अमर कहानी...... 'फूलो का कुर्ता'

हमारे यहां गांव बहुत छोटे-छोटे हैं. कहीं-कहीं तो बहुत ही छोटे. दस-बीस घर से लेकर पांच-छह घर तक और बहुत पास-पास. एक गांव पहाड़ की तलछटी में है तो दूसरा उसकी ढलान पर. बंकू साह की छप्पर से छाई दुकान गांव की सभी आवश्कताएं पूरी कर देती है. उनकी दुकान का बरामदा ही गांव की चौपाल या क्लब है. बरामदे के सामने दालान में पीपल के नीचे बच्चे खेलते हैं और ढोर बैठकर जुगाली भी करते रहते हैं. उस दिन सुबह से जारी बारिश थमकर कुछ धूप निकल आई थी. घर में दवाई के लिए कुछ अजवायन की जरूरत थी. घर से निकल पड़ा कि बंकू साह के यहां से ले आऊं. बंकू साह की दुकान के बरामदे में पांच-सात भले आदमी बैठे थे. हुक्का चल रहा था. सामने गांव के बच्चे कीड़ा-कीड़ी का खेल खेल रहे थे. साह की पांच बरस की लड़की फूलो भी उन्हीं में थी.
पांच बरस की लड़की का पहनना क्या और ओढ़ना क्या. एक कुर्ता कंधे से लटका था. फूलो की सगाई गांव से फर्लांग भर दूर चूला गांव में संतू से हो गई थी. संतू की उम्र रही होगी, यही कोई सात बरस. सात बरस का लड़का क्या करेगा. घर में दो भैंसें, एक गाय और दो बैल थे. ढोर चरने जाते तो संतू छड़ी लेकर उन्हें देखता और खेलता भी रहता. ढोर काहे को किसी के खेत में जाएं. सांझ को उन्हें घर हांक लाता. बारिश थमने पर संतू अपने ढोरों को ढलवान की हरियाली में हांक कर ले जा रहा था. बंकू साह की दुकान के सामने पीपल के नीचे बच्चों को खेलते देखा, तो उधर ही आ गया. संतू को खेल में आया देखकर सुनार का छह बरस का लड़का हरिया चिल्ला उठा. आहा! फूलो का दूल्हा आया है. दूसरे बच्चे भी उसी तरह चिल्लाने लगे.
बच्चे बड़े-बूढ़ों को देखकर बिना बताए-समझाए भी सब कुछ सीख और जान जाते हैं. फूलो पांच बरस की बच्ची थी तो क्या, वह जानती थी,दूल्हे से लज्जा करनी चाहिए. उसने अपनी मां को, गांव की सभी भली स्त्रियों को लज्जा से घूंघट और पर्दा करते देखा था. उसके संस्कारों ने उसे समझा दिया, लज्जा से मुंह ढक लेना उचित है. बच्चों के चिल्लाने से फूलो लजा गई थी, परंतु वह करती तो क्या. एक कुरता ही तो उसके कंधों से लटक रहा था. उसने दोनों हाथों से कुरते का आंचल उठाकर अपना मुख छिपा लिया. छप्पर के सामने हुक्के को घेरकर बैठे प्रौढ़ आदमी फूलो की इस लज्जा को देखकर कहकहा लगाकर हंस पड़े. काका रामसिंह ने फूलो को प्यार से धमकाकर कुरता नीचे करने के लिए समझाया. शरारती लड़के मजाक समझकर हो-हो करने लगे. बंकू साह के यहां दवाई के लिए थोड़ी अजवायन लेने आया था, परंतु फूलो की सरलता से मन चुटिया गया. यों ही लौट चला. बदली परिस्थिति में भी परंपरागत संस्कार से ही नैतिकता और लज्जा की रक्षा करने के प्रयत्न में क्या से क्या हो जाता है.

Saturday, 23 July 2016

नहीं रहे नीलाभ अश्क

प्रसिद्ध साहित्यकार उपेंद्रनाथ अश्क के पुत्र एवं जाने माने लेखक-रंगकर्मी नीलाभ अश्क (70) नहीं रहे। जीवन के आखिरी दिनो में उन्हें असहनीय घरेलू संताप से दो-चार होना पड़ा था, यद्यपि बाद में सब सामान्य हो चुका था।
पढ़ाई के बाद सबसे पहले नीलाभ अश्क प्रकाशन के पेशे से जुड़े और बाद में उन्होंने पत्रकारिता को अपनाया। वह जनवादी आंदोलन से आखिरी वक्त तक जुड़े रहे। उन्होंने चार साल तक लंदन में बीबीसी (ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग सर्विस) की हिन्दी सेवा में बतौर प्रोड्यूसर कार्य किया। 1984 में स्वदेश वापसी के बाद वो पुनः लेखन और प्रकाशन कार्य से जुड़ गए।
उन्होंने हिंदी पाठकों को संस्मरणारंभ, 'अपने आप से लम्बी बातचीत', 'जंगल ख़ामोश है', 'चीजें उपस्थित हैं', 'शब्दों से नाता अटूट है', 'शोक का सुख', 'ख़तरा अगले मोड़ के उस तरफ है' और 'ईश्वर को मोक्ष' जैसे कविता संग्रह दिए।
संप्रति वो राष्ट्रीय नाट्यविद्यालय की पत्रिका रंग प्रसंग के संपादक के तौर पर कार्यरत थे। नीलाभ हिन्दी ब्लॉगिंग और सोशल मीडिया पर भी काफी सक्रिय थे। अपने ब्लॉग 'नीलाभ का मोर्चा' पर वो आत्मसंस्मरण भी लिख रहे थे। अपने लेखन एवं जीवन में जुझारूपन के लिए वह हमेशा याद किए जाएंगे।