Friday, 2 March 2018

डोले बयरिया से अमवा की डरिया, चुनरिया पिउ की डगर बनि जाय..

मेरा एक मित्र था दीवाना। ये उसका उपनाम था। घर का नाम और। सचमुच दीवानगी के लहजों में लिपटा उपनाम उसके हावभाव पर खूब फबता था। एक बड़े महाकवि ने उसके रंग-ढंग देखकर उपनाम दिया था। फिर तो वह दीवाना नाम से ही जाना-पहचाना जाने लगा। वह भी कवि। जरा फिल्मी-विल्मी सा। वैसे भी उसे अपनी जिंदगी फिल्मी लगती थी। उसके जीवन और सृजन का दर्शन एक। कभी छेड़ने-कोंचने पर उल्टे पूछ बैठता, जब जग सारा फिल्मी है तो कविता क्यों न हो! वह सही कहता था क्या? उससे मेरी पहली मुलाकात 'दीवाना' नामकरण के वर्षों बाद हुई थी। गीत-गौनई जैसा बोलचाल में भी सुरीला, अत्यंत मधुर, मीठा-मीठा। मंच पर अपनी हल्की-फुल्की (वही फिल्मी टाइप) मोहब्बताना कविताएं गा-गाकर छा जाया करता। बात 1989 की है। एक दिन हम दोनो को एक साथ गोरखपुर आकाशवाणी से बुलावा आ गया, जुगानी भाई का (उनका भी नाम कुछ और)। कविता पढ़ने के लिए। कई दिन बाद जिस शाम उसका प्रसारण हो रहा था, एक ही ट्रांजिस्टर पर हम दोनो साथ अपने कविता पाठ सुनने के लिए काने साधे बैठ लिए। घर-पड़ोस के भी दो चार जन। दीवाना ने कूद-कूद कर सबको बता दिया था। पहले दीवाना की कविता प्रसारित हुई। मंच की तरह यहां भी वह छा गया। लेकिन, मेरी कविता प्रसारित होने से पहले उद्घोषक ने ऐसी टिप्पणी कर दी कि दीवाना का दिल बैठ गया। उसी दिन से मित्रता में ईर्ष्या का विष घुल गया। उद्घोषक की टिप्पणी उस वक्त तो मेरे मन को बड़ी सुखद सी लगी थी लेकिन मित्र बुझा बुझा सा रहने लगा। मेरी कविता भी कोई ऐसी नहीं थी कि उसे उतना सराहा जाता, वह भी मेरे मित्र की कविता से तुलना करते हुए। और, उस दिन के बाद से मेरा वह अत्यंत आत्मीय मित्र दूर-दूर रहने लगा छिटक-विदक कर। मेरे एकांत कोलाहल से फिसलता हुआ।... मुझसे खो गया।
संयोग वशदस-ग्यारह वर्षों बाद वह एक दिन वाराणसी में 'आज' अखबार के मुख्यालय के बाहर मिल गया। दोनो दौड़कर मिले। जैसे पहले कुछ हुआ ही न हो। बगल की दुकान पर बैठ लिए। चाय पी, कहां थे, कैसे रहे, एक दूसरे से पूछते, बतियाते रहे। भरी-भरी आंखों से एक दूसरे का सम्मान किया। घंटों अतीत में खोये। अब हम वो फांकामस्त दोस्त नहीं रह गए थे, अब अपनी-अपनी तरह के दुनियादार, अपने-अपने घर-परिवार वाले। कविताओं की वह अल्हड़, साझा दुनिया कहीं पीछे छूटी रह गई थी। आगे-पीछे, दाएं-बाएं सिर्फ रोजी-रोटी के शोर-शराबा, भागमभाग। दीवाना बहुत दुखी था उस दिन। आवाज का वह सुरीलापन भी अनसुना सा, खुरदरे शब्दों से बोझिल, परेशान, माथे पर कई-कई दोहरी सिलवटें। मन के किसी कोने में शायद मुझसे कुछ उम्मीद भी। उस दिन उसे लगा होगा कि मैं उसकी कुछ मदद कर सकता हूं। उसे नहीं मालूम था कि मैं स्वयं उससे अधिक परेशान था। मैं मन से चाह कर भी उसका कोई सहयोग उस दिन नहीं कर सका। इस तरह मुद्दत बाद बरामद हुई मित्रता फिर धरी रह गयी थी। लेकिन उसके लगभग दो साल बाद एक वक्त ऐसा आया, जब एक अखबार में उसे अपने साथ काम पर बुला लेने के लिए मैंने उसे जाने कैसे-कैसे, कहां-कहां तलाशा लेकिन वह अपने सभी पुराने ठिकानों के लिए भी अपरिचित हो चुका था। कहीं नहीं मिला। आज तक नहीं। जब भी उसकी याद आती है, लगता है, मित्रों की इस छोटी सी दुनिया में अपने खोये दोस्त का दुख साझा न कर पाना भी कृतघ्ना हो सकती है। लगभग चार दशक पहले आकाशवाणी गोरखपुर से प्रसारित हुई 'सावन की विरहिणी' पर उसकी भोजपुरी कविता की पहली पंक्ति थी - 'डोले बयरिया से अमवा की डरिया, चुनरिया पिउ की डगर बनि जाय...।'

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