Wednesday, 6 July 2016

आसान नहीं है कमलाराम नौटियाल हो जाना / रंजिता प्रकाश


देहरादून में पिछले दिनो कामरेड कमलाराम नौटियाल स्मृति सम्मान समारोह में विभिन्न क्षेत्रों में अपने काम से उत्प्रेरित करने वाली हस्तियों का सम्मान किया गया। इस अवसर पर वक्ताओं ने नौटियाल के विचारों को जीवन में उतारने का आह्वान किया। वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखण्ड आन्दोलन के वे अगुवा नेताओं में से एक थे। उनकी लोकप्रियता पहाड़ों के दूरदराज गांवों तक थी। उन्होंने एक पर्यावरणवादी की भूमिका निभाते हुए हिमालय पर पेड़ों की कटान के खिलाफ व्यापक आन्दोलन किया जो बाद में चिपको आन्दोलन के नाम से विख्यात हुआ।
प्रगतिशील मंच, देहरादून की ओर से नगर निगम टाउन हॉल में आयोजित सम्मान समारोह को मुख्य अतिथि कामरेड अतुल अंजान ने सम्बोधित करते हुए कहा कि भारत-चीन युद्ध के दौरान जब पहाड़ के रास्ते बंद कर दिए गए तो कमलाराम नौटियाल ने संघर्ष कर योद्धा की तरह लोगों को देशभक्ति का पाठ पढ़ाया। इस अवसर पर सीपीआई के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड अतुल कुमार अंजान, चीफ इनफॉर्मेशन कमिश्नर राजेंद्र कोटियाल, नेटवर्क-10 न्यूज चैनल के डीएस नेगी, पत्रकार रमेश कोटियाल, उत्तरकाशी के प्रथम आईएएस विवेक नौटियाल, इंडियन एयर फोर्स की फर्स्ट बिंग कमांडर अनुपमा जोशी को प्रगतिशील मंच की ओर से सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि डॉ.एस फारुख, पूर्व खेलमंत्री एनएस राना, पूर्व उपकुलपति डॉ.सुधारानी पांडेय, प्रख्यात गायक नरेंद्र सिंह नेगी, कवि चारुचंद्र भूषण, सुबोध उनियाल, उत्तरकाशी के विधायक विजयपाल सिंह सजवान, कवि नीरज डंगवाल, महावीर रानावत, खुशीराम उनियाल  आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। आयोजन के प्रथम सत्र का संचालन सुनीता चौहान ने किया। कार्यक्रम के कुशल संयोजन में प्रगतिशील मंच के अध्यक्ष केसी कुरियाल, कमलाराम नौटियाल की सुपुत्री मधु थपलियाल एवं उनके पति आशीष थपलियाल, नवीन पैन्योली, वंदना गोयल, मंजरी बदोनी, शिवमोहन सिंह रावत, कर्नल एसएस पैन्योली, राजेश नौटियाल, तृप्ति गैरोला, जेपी राना का विशेष सहयोग प्रशंसनीय रहा।

पहाड़ के आम आदमी की आवाज थे कामरेड कमलाराम

विद्यासागर नौटियाल और शैलेश मटियानी के निधन के बाद उत्तराखंड के साहित्यिक सांस्कृतिक जगत में जो शून्यता पैदा हुई, गिरदा के चले जाने के बाद पहाड़ में प्रतिरोध के स्वर ने जैसे धार खो दी, उसी तरह कामरेड नौटियाल के अवसान के बाद बहाड़ में बढ़ते भूमाफिया और​ ​ कारपोरेट राज के खिलाफ बेहद जरूरी लड़ाई का नेतृत्व ही विकलांग हो गया। जब सत्ता के गलियारे में आजीवन रहे कृष्णचंद्र पंत जैसे को पहाड़ इतनी आसानी से भूल गया, तो कामरेड नौटियाल को गैरसैन राजधानी की भावुकता में सारे बुनियादी मुद्दे और सामाजिक औगोलिक यथार्थ भुला देने वाली नय़ी उत्तराखंडी भूमंडलीय उपभोक्तावादी चेतना से कामरेड नौटियाल की स्मृति के प्रति न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
प्रसिद्ध पत्रकार पलाश विश्वास लिखते हैं- 'उत्तरकाशी में आम आदमी की आवाज को मुखरित करने वाले प्रख्यात पर्वतारोही एवं पर्यावरणवादी कामरेड कमला राम नौटियाल इलाहाबाद में अपने विद्यार्थी जीवन के दौरान आल इंडिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन के साथ जुड़ गये थे और छात्र राजनीति में सक्रिय रहे। उन्होंने एक पर्वतारोही की भूमिका निभाते हुए हिमालय के तमाम ग्लेशियरों को खोजा और उनका नामकरण किया। वे चौदह वर्षों तक उत्तरकाशी नगर पालिका के चेयरमैन चुने जाते रहे और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के वर्षों तक सदस्य रहे।'
पलाश विश्वास लिखते हैं, 'अब तो पहाड़ मीडिया के अंतर्जाल में पूरी तरह गिरफ्तार है और बाकी देश की तरह इस मीडिया ​​को कामरेड नौटियाल जैसे लोग सेलिब्रिटी तो नजर नहीं आयेंगे! भागीरथी के उत्स पर भूस्खलन हो जाने से अवरुद्ध हिमालयी जलधारा ने 1978 में गंगासागर तक को प्लावित कर जो कड़ी चेतावनी दी थी, कामरेड नौटियाल के निधन से वह फिर दीवार पर लिखी इबारत की तरह जिंदा हो गयी। आज पहाड़ को ही नहीं, बल्कि देश को ऐसे कम्युनिस्ट नेतृत्व की बेहद जरुरत है, जिसका प्रतिनिधित्व करते थे कामरेड नौटियाल।​कामरेड नौटियाल को क्षेत्र के विभिन्न जन आंदोलनों का नेतृत्व करने के साथ ही उत्तरकाशी के आधुनिक स्वरूप की नींव रखने का श्रेय भी जाता है। वर्ष 2002 और फिर 2007 में कामरेड नौटियाल ने विधानसभा का चुनाव भी लड़ा। 2002 में वे कांग्रेस प्रत्याशी विजयपाल सजवाण से मामूली अंतर से पराजित हो गए लेकिन उनसे जननेता का ताज कोई नहीं छीन सका।'

किताबों की दुनिया


Wednesday, 29 June 2016

कोई क्यों नहीं चल रहा साथ मेरे / जयप्रकाश त्रिपाठी

हुई शाम मेरी सवेरे-सवेरे, कोई क्यों नहीं चल रहा साथ मेरे ।
चला था जहां से, वहीं का वहीं हूं,
अकेले-अकेले मैं हूं भी, नहीं हूं,
स्वयं इस तरह क्यों कहीं-का-कहीं हूं
मैं कितना गलत हूं, मैं कितना सही हूं
रुलाते बहुत हैं सफर के अंधेरे, कोई क्यों नहीं चल रहा साथ मेरे ......
किया जिंदगी भर धुनाई-बुनाई,
कटाई-छंटाई, सिलाई-कढ़ाई,
फटे-चीथड़ों से सुई की सगाई,
मरम्मत कोई भी नहीं काम आई,
लगाता रहा निर्वसन वक्त फेरे, कोई क्यों नहीं चल रहा साथ मेरे ......
उगाएं जो जंगल हमारे वतन में,
सगे हैं वे सबसे सियासी चलन में,
जगाते रहे खौफ जन-गण के मन में
चमकदार मणि नागराजों के फन में
थिरकती रहीं नागिनें मरघटों पर,
बजाते रहे बीन बूढ़े संपेरे, कोई क्यों नहीं चल रहा साथ मेरे ......

Sunday, 1 May 2016

मेरा समय / जयप्रकाश

मेरा समय चरमरा रहा है। अंदर खामोशी से टूट-फूट रहा है....चरर-मरर, चट्ट-चट्ट। जैसे श्मशान पर पसलियां चटकती हैं। हवाओं में असहनीय चिरायंध है। उलट-पुलट कर नया आकार लेता हुआ कोई अपार संभावनाओं वाला विराट निर्माण अपनी ताजा संरचना से पहले ढह रहा है। फिलवक्त ऊबड़-खाबड़, अदम्य जीजिविषा के युद्ध स्थल पर, भुतहा, भयावह, चिथड़ा-चिथड़ा सच रू-ब-रू है।
मेरे समय में हर दिन यादगार होता है। उस दिन खाली जेब खंगालते, झुझलाते हुए जब घर लौट रहा था, दिनभर का खून सोखकर शाम खिल रही थी। सड़क से सटे नाले के पार नंग-धड़ंग ढेर सारे बच्चे कनस्तर बजा रहे थे। झप्प से आसपास की सारी बत्तियां एक साथ जल उठी थीं। अंधेरा लादे रात उतर रही थी। धीरे-धीरे सारा ताप बुझ रहा था। मुखौटों वाले सुर्ख चेहरे देखकर बेवजह खुश हो लेने के इंतजार में अपने आखिरी दिन गिनते हुए एक और दिसंबर बूढ़ा हो रहा था।
मेरे समय में जहां तक पृथ्वी, आकाश, आग-पानी, हवा है, अंधेरे को चीरते हुए जहां तक रोज सुबह होती है, सूरज उगता है, दिन खिलखिला उठते हैं, थिर-स्थिर होकर भी दिशाएं बतियाती-चहचहाती हैं, पक्षी उड़ान भरते हैं, जीवन जोर-जोर से चल पड़ता है, रंग-विरंगे सुर गूंजते हैं, जहां तक विविध भाषा-बोलियों में, हंसते-विहसते शामें थक जाती हैं, रातें थपकियाती हैं, आदमी जहां तक सुनहरे सपने देखता है, सब ओर-छोर तक शब्द हैं वहां। तृण-तृण, बूंद-बूंद में।
मेरा समय, मेरे शब्दों का समय है। मेरे समय में हत्यारा निःशब्द हंसी हंस रहा है। उसकी हंसी में बड़ी ताजगी है।  स्वाद है। पूरी मिठास और असह शीतोष्णता भी है। उसे एक-एक मानुस-वन-मानुस की चिंता है। हत्यारे के सिर पर न सींग है, न पूंछ। मुंह पर मूंछ हो भी सकती है, नहीं भी। वह शव-साधना में अत्यंत निष्णात है। हत्यारा अपनी जान और उड़ान के लिए जिंदा पंछियों के पंख पर सोता है। वह सबके लिए परम 'सम्माननीय-श्रद्धेय' होता है।
मेरे समय में प्रायः वह मंच-प्रपंच, राज्याभिषेक से, पुस्तक प्रकाशनोत्सवों तक विराजता है। उसके चौखट पखारती दूध की नदी, दरोदीवार पर उसके खुदी खूनी इबारतें, पढ़-पढ़ कर एक पूरी-की-पूरी पीढ़ी अब अपनी सांसें गिनने भर रह गई है किंतु आज तक हत्यारे की हंसी नहीं थमी है। उस हंसी में हर सुर-लय-ताल और समस्त प्रकार के बेताल हैं। अपने बच्चों से उसे अनकह प्यार है, जो पौ फटते ही न आदमी होने, न होने देने की किताब के अक्षर-अक्षर रटने लगते हैं। जन्म से पिता की आदतों पर गये बच्चे भी वैसी ही लाल-लाल होठों वाली कुलीन हंसी हंसते हैं और सुनहली ड्यौढ़ियों के पार से उस पर मुग्ध-मोहित स्त्रियां बार-बार बलैया लेती हैं। मुनादी है कि भूल से भी, हत्यारे की हंसी की शान में गुस्ताखी न हो। जो ऐसा करेगा, बेमौत मरेगा। आज तक हत्यारे को किसी ने रोते नहीं देखा है। फिर भी न जाने क्यों अक्सर, उसे अपनी हंसी से, बड़ा डर लगता है! मेरे समय का हत्यारा अपने पुरखों से ज्यादा डरपोक है।
मेरे समय में आज तक हत्यारे को किसी ने रोते हुए नहीं देखा। फिर भी उसे अपनी हंसी से बहुत डर लगता है। नुमायशें हत्यारे का पेशा हैं। उसके मुर्दा होठो पर शोहदे-'शब्द' अ-श्लील सरोकारों और नशीले इशारों से तर रहते हैं। एक दिन हत्यारे ने लिखा - रूह में डूब चुके हो, तो एक काम करो, लफ्ज बदनाम करो। शर्म से ऊब चुके हो, तो एक काम करो,  जिस्म आबाद करो। शब्द नीलाम करो। रोटियां सेंक चुके हो, तो एक काम करो, रेत पी रहीं घुच्ची आंखों की बात करो। निर्वसन रोटियां लूट चुके हो, तो एक काम करो, काई-जलाशयों में उतरो, रक्त-स्नान करो। और आखिरी दिन हत्यारे ने लिखा - प्यार एक जिंदा शब्द है, मैं भोगते-भोगते उसे मार डालूंगा।
मेरे समय के पेट में आग लगी है। हमारे मुंह में गोलियां नहीं, गालियां भरी हैं। आखिर कब तक उनसब पर हम यकीन करें और अपने हाथों की लकीरें, पांवों के छाले गिनते रहें, गिनते रहें। अपने-अपने अभयारण्य के लिए हमारे बच्चों को वे फुसलाते-टहलाते रहें, और उदास-उदास, निहत्थे हमारे घर-गांवों को उनकी नख-दंतुल वाहिनियां नोचती रहें। हम थानो-कचहरियों के चक्कर लगाते रहें और वे कुर्सियों के। देश, सम्प्रदाय, जातियों की मथानी से वे हमे मथते रहें, कबीलों में बांटते रहें, रोज रोज हम अखबारों में दाल, सब्जी, पेट्रोल के भाव पढ़ते रहें और वे पत्रकारों, कलमकारों को नशाते-नचाते  रहें। वे वोट और और हम दिन गिनते रहें। हम अपने बच्चों को फीस, औरतों को दवा और वे झूठ की गठरी जुटाते रहें। आखिर कब तक। अब वे ही हमे ऐसे आखिरी दिन अपनी अंतिम इच्छा बता दें। समय आने पर हमे उनकी अंतिम इच्छा भी नहीं जानना।

जयप्रकाश

आंख क्यों फिर से छलक आई है, 
सूख जाती क्यों रोशनाई है,
कोई मेरा लिखा पढ़े-न-पढ़े, 
मैंने लिखने की कसम खाई है।

Thursday, 10 March 2016

शब्द हैं वहां तक / जयप्रकाश

जहां तक पृथ्वी, आकाश, आग-पानी, हवा है,
अंधेरे को चीरते हुए जहां तक रोज सुबह होती है,
सूरज उगता है, दिन खिलखिला उठते हैं,
थिर-स्थिर होकर भी दिशाएं बतियाती-चहचहाती हैं,
पक्षी उड़ान भरते हैं, जीवन जोर-जोर से चल पड़ता है,
रंग-विरंगे सुर गूंजते हैं जहां तक विविध भाषा-बोलियों में, हंसते-विहसते थक जाती है शाम, रात थपकियाती है, सुनहरे सपने देखता है आदमी जहां तक, सब ओर-छोर तक शब्द हैं वहां, तृण-तृण, बूंद-बूंद में.....