Wednesday, 22 April 2015

राजधानी में एक किसान की मौत पर कई बड़े सवाल / जयप्रकाश त्रिपाठी


आज दिल्ली में जंतर मंतर पर केंद्र सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान दौसा (राजस्थान) का किसान गजेंद्र सिंह पेड़ पर फांसी से झूल गया। अपने पीछे छोड़े एक सुसाइड नोट में वह लिख गया कि 'दोस्तों, मैं किसान का बेटा हूं। मेरे पिताजी ने मुझे घर से निकाल दिया क्योंकि मेरी फसल बर्बाद हो गई। मेरे पास तीन बच्चे हैं....जय जवान, जय किसान, जय राजस्थान।' घटना के समय मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, आप के नेता संजय सिंह, कुमार विश्‍वास मौके पर मौजूद थे। राममनोहर लोहिया अस्पताल के मुताबिक उसको मृत अवस्था में अस्पताल ले जाया गया था। 


मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि आप के कार्यकर्ता दिल्ली पुलिस से किसान को बचाने के लिए अपील करते रहे लेकिन दिल्ली पुलिस के जवानों ने इस दिशा में कुछ नहीं किया। उसे पेड़ पर चढ़ने दिया। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि किसान और मजदूर घबराएं नहीं, हम उनके साथ खड़े हैं।
देश की राजधानी में सरेआम एक रैली के दौरान गजेंद्र सिंह की मौत अपने पीछे कई बड़े सवाल छोड़ गई है। यह सवाल केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस, भाजपा, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस, इन सबको कठघरे में खड़ा करता है। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश से शुरू होकर यह सवाल हमारी पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था तक जाता है। यह सवाल उस पूरे सिस्टम से है, जो एक तरफ मौसम की मार से निढाल किसानों की लाशें गिन रहा है, दूसरी तरफ किसी भी कीमत पर वह भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पारित कराने पर आमादा है, जो किसान से उसकी जमीन भी छीन सके।
जंतर मंतर की मौत उस गहरे षड्यंत्र के दुष्परिणाम के रूप में देखी जानी चाहिए, जो देश आजाद होने के बाद से लगातार इस देश के करोड़ो-करोड़ किसान-मजदूरों के साथ खेत-खलिहानों से कल-कारखानों तक हो रहा है। उस षड्यंत्र में सबसे बड़ी साझीदार कांग्रेस है, जिसने आज देश को इस मोकाम तक पहुंचा दिया है। उस षड्यंत्र में दूसरी सबसे बड़ी भागीदार मजदूर-किसान विरोधी भाजपा है, जिसकी इस समय केंद्र में सरकार है। इन दोनो की आर्थिक नीतियां एक हैं। देश का आम बजट हो या एफडीआई जैसे मुद्दे, दोनो एक सिक्के के दो पहलू हैं। इन दोनो की प्राथमिकताएं कारपोरेट पूंजी की हिफाजत है।
उस षड्यंत्र के लिए उन्हें भी गैरजिम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए जो पिछले साठ साल से इस देश में किसानों-मजदूरों की सियासत के नाम पर खूब मुस्टंड और हरे-भरे हो रहे हैं। इस षड्यंत्र से उस मीडिया को भी असंपृक्त नहीं माना जा सकता, जो स्वयं को भारतीय लोकतंत्र का चौथा सबसे बड़ा खैरख्वाह मानता है लेकिन खबरें छापते-छापते, अब पूरी बेशर्मी से सिर्फ खबरें बेचने लगा है।
कथित हरितक्रांतिवादी देश में ये सब-के-सब इसलिए जिम्मेदार हैं, क्योंकि इन सभी को बहुत अच्छी तरह से मालूम है कि भारत में विदर्भ, तेलंगाना से बुंदेलखंड तक क्यों हजारों किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। उस प्रदेश में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, जिसके शासन की बागडोर धरतीपुत्र के पुत्र के हाथ में है। ये कैसा मजाक है कि 2014 में किसानों की आत्महत्या का ब्यौरा नैशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो जून महीने तक देगा। 31 मार्च 2013 तक के आंकड़े बताते हैं कि 1995 से अब तक 2,96 438 किसानों ने आत्महत्या की है हालांकि जानकार इस सरकारी आकंड़े को काफी कम बताते हैं। क़रीब पांच साल पहले कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने पंजाब में कुछ केस स्टडी के आधार पर किसान आत्महत्याओं की वजह जानने की कोशिश की थी। इसमें सबसे बड़ी वजह किसानों पर बढ़ता कर्ज़ और उनकी छोटी होती जोत बताई गई। इसके साथ ही मंडियों में बैठे साहूकारों द्वारा वसूली जाने वाली ब्याज की ऊंची दरें बताई गई थीं लेकिन वह रिपोर्ट भी सरकारी दफ़्तरों में दबकर रह गई। असल में खेती की बढ़ती लागत और कृषि उत्पादों की गिरती क़ीमत किसानों की निराशा की सबसे बड़ी वजह है, जिससे सरकारें बेखबर रहना चाहती हैं।
यह सच है कि इस व्यवस्था की जनद्रोही क्रूरताओं के चलते इससे पहले हजारों किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं लेकिन अपने हालात से विक्षुब्ध एक युवा किसान का देश की राजधानी में इस तरह हुई मौत कोई यूं ही भुला दिया जाने वाला मामूली हादसा नहीं। घटना के समय वहां उस पार्टी के हजारों कार्यकर्ता मौजूद थे, जिसकी दिल्ली में सरकार है। उस मीडिया के दर्जनों रिपोर्टर मौजद थे, जो चौथा खंभा कहा जाता है। घटना उस स्थान पर हुई, जिससे कुछ कदम दूर देश की संसद है, जिसमें देश भर के जनप्रतिनिधियों का जमघट लगता है और जिसमें इस समय भाजपा सरकार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पारित कराने पर पूरी तरह से आमादा है। कैसी बेशर्मी है कि वही पार्टी आज इस मौत पर बयान देती है कि जंतर मंतर पर मानवता की हत्या हुई। भाजपा प्रवक्ता संबित कहते हैं कि रैली क्या किसी आदमी की जान से ज्यादा जरूरी थी? तो क्या यही सवाल केंद्र की भाजपा सरकार से नहीं बनता कि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश फिर तो किसान की जान से ज्यादा जरूरी है!

Saturday, 18 April 2015

आर्थिक आत्‍मनिर्भरता के लिए दिल्‍ली में जुटे पत्रकार और कंटेंट जनरेटर

अंग्रेजी के सेंटीमेंटल कवि लार्ड टेनिसन की एक कविता है-
Wherefore bees of Ingland forge.
Many a weepans chain and scorge.-----
यह कविता उद्योगपतियों की ओर से की जा रही श्रमिकों की प्रताड़ना और मजदूरों की कर्मनिष्‍ठा पर आधारित है। कवि मजदूरों से कहता है-हे इंग्‍लैंड की मधुमक्खियों, उनके लिए शहद क्‍यों बनाती हो, जो तुम्‍हें कुचलने से गुरेज नहीं करते हैं। हे मजदूरों, आप उन कोड़ों और जंजीरों का निर्माण क्‍यों करते हो, जो कोड़े आप पर बरसाए जाते हैं और जिन जंजीरों में आपको जकड़ा जाता है।
इन्‍हीं कोड़ों और जंजीरों से छुटकारा पाने के लिए देश भर से पत्रकार और कंटेंट जनरेटर लोकप्रिय सोशल साइट भड़ास 4 मीडिया डॉट कॉम के मालिक यशवंत सिंह के बुलावे पर दिल्‍ली में जमा हुए और उर्दू घर में लोगों को बहुत कुछ सीखने को मिला। इस आयोजन से लोग अभिभूत थे और कुछ लोग तो यह भी कह रहे थे कि हमने अभी तक केवल सुना भर था कि इंटरनेट के जरिये ईमानदारी और सुकून की कमाई की जा सकती है, लेकिन उसे व्‍यावहारिक तौर पर देख भी लिया, वह भी मात्र 1100 रुपये के खर्च पर।
आयोजन की खास बात यह रही कि दीन दुनिया की फिक्र में लगे पत्रकार कभी अपने भविष्‍य के बारे में जहां सोच नहीं पाते थे और वर्षों से संपर्क से कटे हुए थे, वहीं एक दूसरे से मिल कर सकारात्‍मक ऊर्जा से भर गए। संपूर्ण कार्यक्रम से यह संदेश जरूर निकल कर आया-कुछ भी नहीं है मुश्किल अगर ठान लीजिए।
श्रीकांत सिंह के वॉल से

Monday, 13 April 2015

ओम थानवी को 'बिहारी पुरस्कार'

 ‘जनसत्ता’ के संपादक एवं लेखक ओम थानवी को वर्ष 2014 का 24वां बिहारी पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। के.के. बिड़ला फाउंडेशन के निदेशक सुरेश ऋतुपर्ण ने थानवी को उनकी यात्रा वृत्तांतपरक चर्चित पुस्तक ‘मुअनजोदड़ो’ के लिए यह पुरस्कार देने की घोषणा की है। इस पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 2011 में हुआ था। थानवी को पुरस्कार के रूप में 1 लाख रुपए, प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिह्न प्रदान किया जाएगा। इससे पूर्व उन्हें शमशेर सम्मान, सार्क सम्मान, केंद्रीय हिंदी संस्थान सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। वह निरंतर लेखनरत रहते हुए वर्तमान में साहित्य, समाज, राजनीति, शिक्षा, पत्रकारिता आदि विषयों पर त्वरित टिप्पणियों के लिए हिंदी क्षेत्र में सुप्रसिद्ध हैं।
केके बिरला फाउंडेशन द्वारा स्थापित बिहारी पुरस्कार राजस्थान के हिन्दी या राजस्थानी भाषा के लेखकों को प्रदान किया जाता है। पिछले 10 वर्षों में प्रकाशित राजस्थानी लेखकों की कृतियों में से विजेता का चयन किया जाता है।  वर्ष 1991 में स्थापित पहला बिहारी पुरस्कार डॉ. जयसिंह नीरज को उनके काव्य संकलन ‘ढाणी का आदमी’ के लिए दिया गया था। ओम थानवी की एक अन्य चर्चित कृति है- 'अपने अपने अज्ञेय'।
ओम थानवी का जन्म 1 अगस्त 1957 को फलोदी, जोधपुर (राजस्थान) में हुआ था। वह नौ वर्षों (1980 से 1989) तक 'राजस्थान पत्रिका' में रहे। इसके बाद चंडीगढ़, फिर दिल्ली में संपादक बने। उन्होंने हिंदी की साहित्यिक तथा सांस्कृतिक इतवारी पत्रिका का भी सम्पादन किया है। ओम थानवी की साहित्य, कला, सिनेमा, पर्यावरण, पुरातत्त्व, स्थापत्य और यात्राओं में गहन रुचि है।
वह मेक्सिको, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, स्विटजरलैंड, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड, फिनलैंड, स्वीडन, बेल्जियम, रोमानिया, थाईलैंड, आर्मेनिया, बेलारूस, चीन, ब्राजील, मलेशिया, सिंगापुर, गयाना, त्रिनिदाद एवं टोबेगो, सूरीनाम, श्रीलंका, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, ग्रीस और क्यूबा आदि अनेक देशों की यात्राएं कर चुके हैं। 

एक 'आदर्श मां' की लाइव रिपोर्टिंग

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में यह एक नए तरह की चर्चा सरगर्म हुई है। चर्चा है मिस्र की टीवी पत्रकार लामिया हामदीन का अपने बच्चे को लेकर रिपोर्टिंग करना। उनकी रिपोर्टिंग की तस्वीरें वायरल होने से ऑनलाइन सूचना माध्यमों पर इसे लेकर समर्थन और विरोध के रूप में तरह तरह की चर्चाएं बहस की शक्ल में सार्वजनिक रही हैं।
लामिया हामदीन के अपने बच्चे को लेकर रिपोर्टिंग करने का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि ये तरीका ठीक नहीं है। वे उनको नौकरी से निकालने तक की मांग कर रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि लामिया आदर्श मां हैं। एक माँ का दर्द समझने के लिये दिल चाहिए, दिमाग नहीं। उन्होनें वही किया जो वक्त की जरूरत थी, "माँ तुझे सलाम"। उन्होंने उनकी तुलना इटली की नेता लीसिया रॉनज़्यूली से की है। लीसिया 2010 में अपनी बेटी को काम पर लेकर जाती थीं।
लामिया का कहना है कि एक कामकाजी मां होने के नाते उन्होंने वहीं किया जो उन्हें करना चाहिए था। उन्होंने कहा, 'मेरा बेटा बीमार था और मुझे कुछ ज्यादा देर काम करना था। ऐसे में वह उसे नर्सरी से अपने साथ लेकर आ गईं क्योंकि उसे और कहीं छोड़ना ठीक नहीं था।

Sunday, 12 April 2015

दूरदर्शन में महिला कर्मियों का यौन शोषण

अब तो दूरदर्शन भी महिला कर्मियों के लिए सुरक्षित नहीं रहा। दूरदर्शन में सेवारत कई महिला कर्मियों का यौन उत्पीड़न किया जा चुका है। हाल ही में दूरदर्शन की उत्पीड़ित महिला कर्मियों की लिखित शिकायतों के बावजूद उन पर न तो महिला आयोग गंभीर है, न अन्य कोई वह जांच एजेंसी, जहां वे अपनी शिकायतें कर रही हैं। महिला बाल विकास मंत्रालय का इस मामले पर खामोशी साध लेना तो और भी आश्चर्यजनक है। ये हाल तो तब है, जबकि उन पीड़ित महिलाओं में से एक उसी आरएसएस के दूरदर्शन में प्रसार भारती मजदूर संगठन बीएमस की नेता हैं, जिसकी इस समय केंद्र में सरकार है। एक पीड़ित महिला कर्मी ने न्याय की गुहार लगाते हुए शिकायती पत्र में लिखा है कि क्या बलात्कार हो जाने के बाद ही कोई कार्रवाई होगी?
एक वरिष्ठ अधिकारी ने तो अपने अधीनस्थ महिला कर्मी से कहा कि तुम मेट्रो में रहने वाली तीस वर्ष की जवान हो, तुम ये भी नहीं जानती कि वरिष्ठ अफसर से कैसे पेश आया जाता है। दिल्ली की लड़कियां तो सब कुछ जानती हैं। महिला कर्मी की शिकायत है कि सिर्फ उसके साथ ही ऐसा नहीं, दूरदर्शन की कई महिलाओं के साथ इस तरह की हरकतें हो चुकी हैं।
दूरदर्शन में कार्यरत कई महिलाएं अपने अफसरों से डरी हुई हैं। एक पीड़िता महिला कर्मी ने साहस बटोर कर पुलिस में शिकायत भी कर दी है। एक अन्य महिला दूरदर्शन कर्मी को अपने विभागीय उच्चाधिकारियों से जब न्याय नहीं मिला तो उसने केंद्रीय महिला बाल विकास मंत्री मेनका गांधी और महिला आयोग को लिखित में बताया है कि उसके अफसर अपर महानिदेशक ने ऐसी शर्मनाक हरकत उससे की है कि उसे कहने में भी शर्म महसूस हो रही है। इसके बाद उस पीड़िता पर दबाव डालने के साथ ही परिजनों को शिकायत वापस लेने के लिए धमकाया गया। बताया जाता है कि उसका यौन उत्पीड़न किया गया है।
पता चला है कि इसी तरह आकाशवाणी भवन स्थित दूरदर्शन अभिलेखागार में कार्यरत एक अन्य महिला कर्मी ने प्रोग्राम एक्जिक्यूटिव पर यौन हरकतों का आरोप लगाया है। उसने इसकी लिखित शिकायत अपने विभाग के उच्चाधिकारियों के अलावा राष्ट्रीय महिला आयोग और महिला बाल विकास मंत्री से की है। आरोप है कि संबंध न बनाने पर प्रोग्राम एक्जिक्यूटिव ने उसे कई बार धमकियां भी दीं। उसकी फरियाद पर कोई कार्रवाई तो नहीं हुई। उल्टे उसे ही मंडी हाउस स्थित दूरदर्शन मुख्यालय में स्थानांतरित कर दिया गया। वहां भी उसे एक अफसर तंग करने लगा। इस दफ्तर में तैनात रहे एक अपर महानिदेशक पर भी एक महिला कर्मी ने पिछले वर्ष यौन शोषण का आरोप लगाया था। उस मामले में भी कोई कार्रवाई करने की बजाय अफसर को स्थानांतरित कर दिया गया था।
इन घटनाओं से पूर्व विशाखा गाइडलाइंस के आने के बाद भी दूरदर्शन की एक महिला पत्रकार द्वारा एक वरिष्ठ पद पर कार्यरत सहकर्मी पर यौन शोषण का आरोप लगाया जाना और उस पर दूरदर्शन के सर्वोच्च पद (डीजी-डीडी) पर एक महिला के आसीन होते हुए भी उसके द्वारा पीड़ित के आरोपों पर कार्रवाई न किया जाना एक खतरनाक कदम की ओर संकेत करता है। इसी तरह की अक्टूबर 2013 की एक घटना भी दूरदर्शन से ही संबंधित है। उस समय तो प्रसार भारती प्रबंधन ने यौन उत्पीडऩ के आरोपी दूरदर्शन के वरिष्ठ अधिकारी को निलंबित कर दिया था। अधिकारी की सहकर्मी ने उसके खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इसी तरह इंडिया टीवी की एंकर तनु शर्मा ने अपने अधिकारियों द्वारा उत्पीड़ित किए जाने, दफ्तर की गुटबाजी और फिर बिना कारण बताए बर्खास्त कर दिए जाने पर दफ्तर के सामने ही जहर खाकर खुदकुशी करने की कोशिश की थी।
डा. रीना मुखर्जी, तनु शर्मा प्रकरणों ने भी मीडिया कुपात्रों का भेद खोला था : प्रिंट मीडिया में भी हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। ‘द स्टेटसमैन’ की एक सीनियर रिपोर्टर रहीं डा. रीना मुखर्जी ने अखबार के ही तत्कालीन न्यूज कोआर्डिनेटर ईशान जोशी पर यौन शोषण का आरोप लगाया था, जिसके बाद इस मामले की निष्पक्ष जाँच कराए जाने के बजाय उन्हीं को नौकरी से निकाल दिया गया था।

Thursday, 9 April 2015

घुमक्कड़ केदारनाथ पांडेय से राहुल सांकृत्यायन तक / जयप्रकाश त्रिपाठी

आज दिन राहुल सांकृत्यायन को याद करने का रहा। सुबह से अब फुर्सत। तो सोचा अपने ही जिला आजमगढ़ के, और अपने ही बगल के गांव के कनैला के थे बहुभाषाविद् त्रिपिटिकाचार्य तो कुछ ऐसी अपनी भी बता डालूं जो बहुतों को मालूम नहीं। हां, उन सहपाठियों को जरूर याद होंगी, जो उस दिन क्लास में मेरे सहित मौजूद थे। राहुल जी के गांव के ही थे पारसनाथ पांडेय, जो बारहवीं में हमारे क्लास टीचर थे। उनके पास कालेज ही नहीं, अपने पूरे गांव-जवार के बारे में एक-से-एक धांसू, पंचकूलाई, सुघर-सुघरी कहानियां थीं। घुमक्कड़ जिज्ञासु बचपन के नामधारी केदारनाथ पांडेय उर्फ राहुल सांकृत्यायन के बारे में ये सब भी उन्हीं का बताया-कहा है.....
तो गुरुवर पारसनाथ पांडेय ने केदारनाथ पांडेय के एक किशोर-घटनाक्रम को खूब रस ले-लेकर उस दिन हमे क्लास में कह सुनाया था -
....राहुल जी किशोरवय में ही गांव से परा (भाग) लिए थे। बड़ी खोज-ढूंढ मची महीनो। कहीं कोई अता-पता नहीं। वर्षों बाद लौटे तो पिता गोवर्धन पाण्डेय आगबबूला। हमारे बाबू (पारसनाथ के पिता) ने छेंकाछेंकी कर मामला बरजा (शांत कर) दिया। कई दिन तक बाप-बेटे में मुंहफुलौवल (नाराजगी) रही। तब तक केदारनाथ बाहर के मजे-सजे के साथ सब सीख-पढ़ आए थे, गांव में सयाने-सयाने बने डोल रहे थे लेकिन नया वाल नाम 'राहुल सांकृत्यायन' धारण नहीं किया था। ऊ सब बाद में हुआ।
.... एक दिन केदारनाथ का मन गांव से फिर उचटा (जैसे उस दिन क्लास में हम लोगों का उचट रहा था, तब वे बातें फालतू लगती थीं क्योंकि हमे कहां पता था कि हम किस बाणभट्ट की कथा सुन रहे हैं! अब गर्व होता है वे दिन याद कर)। सुबह-सुबह मुंह अंधेरे गोवर्धन चाचा (पारसनाथ चाचा कहते थे राहुल जी के पिता को) और केदारनाथ में जम के मुंहफचरी हुई। गोवर्धन चाचा ने कहा- जरा गांव से बाहर निकल के तो दिखा, टांगें तोड़ के हाथ में न दे दूं तो तेरी की। शादी-बियाह कर के उस दफा परा लिए ससुर, फिर अब कहां जा रहे हो, ऐं! ई जो घर में तोहार माई (केदारनाथ उर्फ राहुल की पत्नी) बइठलि हईं, इनके के खियायी-पहनाई (अर्थात घर में ये जो तुम्हारी मां (पत्नीको) बैठी है, उसको कौन खाना-कपड़ा देगा)। युवा केदारनाथ ने तपाक से छूटते ही पिता गोवर्धन से कहा - माई (मां) है तो पिता ही न खिलाए-पहनाएगा। खियावा-पहनावा माई के, हम तो चले अयोध्या....। बताते हैं, उस दिन के बाद बौद्धनामधारी केदारनाथ पांडेय उर्फ राहुल सांकृत्यायन फिर कभी अपने गांव कनैला (आजमगढ़) नहीं लौटे। हां, बताते हैं, श्रीलंका-प्रवास के दिनो में आजमगढ़ जरूर लौटे थे बूढ़े बरगद के नीचे पुरातात्विक खुदाई कराने के लिए।

Wednesday, 8 April 2015

काम के घंटे हो अब चार, न्यूनतम मजदूरी हो अब चालीस हजार / अखिलेश चंद्र प्रभाकर


400 वर्षों के पूंजीवादी अनुभव बताते हैं कि उन्नत किस्म के तकनीकी और आधुनिक औद्योगिक विकास के बाबजूद; पूंजीवादी विश्व में तकरीबन रोजाना 80 करोड़ लोग भूखें पेट सोते हैं. तकरीबन 1 अरब लोग अब तक अनपढ़ हैं, लगभग 4 अरब लोग गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रहे है. 25 करोड़ बच्चे स्कूल जाने की बजाय रोजाना मजदूरी करते हैं. 10 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके सर पर छत नहीं है और पांच वर्ष से कम के 10 लाख बच्चे ऐसे हैं, जो प्रतिवर्ष कुपोषण, गरीबी या बिमारियों से मर जाते हैं. देश के भीतर और देशों के मध्य भी गरीबी और अमीरी में अन्तर में जबरदस्त बढ़ोतरी होती ही जा रही है. पिछली सदी के दौरान 1 अरब हेक्टयर से ज्यादा संरक्षित जंगलों को नष्ट किया गया और लगभग इतना ही क्षेत्र रेगिस्तान या बंजर भूमि में बदल गया है.
स्वाभाविक रूप से इन समस्यायों का निदान करने में पूंजीवादी-व्यवस्था नाकाम साबित रहा है. यह शासन करने वालों की जिम्मेदारी है क़ि वह जरूरत मंद हर व्यक्ति को भोजन, स्वास्थय, छत, कपडे, और शिक्षा मुहैया कराये. भरे- पूरे, तर्कसंगत, टिकाऊ और सुरक्षित जीवन का मतलब है, सांस्कृतिक सृजन, विकल्पों की विशाल संख्या और कई अन्य चीजें मानव की पहुँच में हों… यह सब हो सकता है, लेकिन नहीं है, क्योंकि किसी निजी विमान पर 9.5 अरब डॉलर खर्च होते हैं. तो कहीं आलीशान महल (अम्बानी का अट्टालिका) बनाने में 250 करोड़ रूपये खर्च किये जा रहे है.
मैं आदमी और औरत के लिए 4 घंटे कार्य दिवस होने के बारे में सोचता हूँ…यदि हमको तकनीक इतनी सुविधा देती है, तो हम 8 घंटे काम क्यों करें? इसके लिए तर्क यह है की जैसे जैसे उत्पादकता बढ़ती है; वैसे वैसे कम से कम शारीरिक व् मानसिक श्रम करने की आवश्यकता होती है; इससे बेरोजगारी कम से कम हो पायेगी और व्यक्ति को अधिक से अधिक समय प्राप्त हो सकेगा अपने निजी जीवन में मस्ती करने के लिए…
पूंजीवादी साहूकार आज विश्व् को एक बहुत बड़े मुक्त व्यापार क्षेत्र में तब्दील करना चाहते हैं. मुक्त व्यापार क्षेत्र में स्थापित किसी कारखाने के श्रमिकों को शायद ही कहीं निर्धारित वेतन दिया जाता है, बल्कि जो वेतन कारखाना मालिक अपने देश में स्थापित कारखानों के श्रमिकों को देते, उस वेतन का 5,6 या 7 प्रतिशत ही बाहर के देशों में स्थापित कारखाने में काम करने वाले श्रमिकों को भुगतान करते हैं.
संकट का लक्षण स्पष्ट है कि बाजार ईश्वर हो गया है और इसके कानून और सिद्धान्त ही संकट की जड़ हैं. USA की सबसे प्रतिष्ठित कंपनी का कुल फण्ड 4.5 अरब डॉलर है जब कि यह कंपनी 120 अरब डॉलर की सट्टेबाजी में लिप्त है.
एक छोटी सी पिन, एक छोटा सा छेद से बड़े से बड़ा गुब्बारा फुट जायेगा. यही खतरा नवउदारवादी वैश्विकरण के ऊपर मंडरा रहा है. इस परमाणु युग में भी विचार और चेतना हमारे सबसे अच्छे अस्त्र हैं और रहेंगे. हमें अच्छी तरह से सूचना संपन्न रहना चाहिए … बल्कि जरुरी है की घटनाओं को गहराई से जानें अन्यथा हम आत्म विस्मृति के शिकार हो जायेंगे.
वामपंथी यह सिद्ध करना चाहते हैं कि यह व्यवस्था नष्ट हो जायेगी, जब तक यह सच न हो तब तक यह केवल एक दलील है और इसे सच साबित करना हम सब का कर्तव्य है. हाँ, एक छोटे दायरे में दुर्लभ सम्पदा का वितरण करने- जिसमें मुठीभर लोग तो सब कुछ पाते हैं, लेकिन भारी आबादी वंचित रहती है – की अपेक्षा ‘समाजवादी गरीबी’ बेहतर है. क्रांति तब तक चलती रहेगी, जब तक इस दुनिया में अन्याय मौजूद है.