Monday, 9 March 2015

नेशनल बुक ट्रस्ट के चैयरमेन बने बल्देव भाई शर्मा

मानव संसाधन मंत्री स्मृति इरानी से बल्देव भाई शर्मा को नेशनल बुक ट्रस्ट (राष्ट्रीय पुस्तक न्यास) का नया चेयरमैन नियुक्त किया है। उन्होंने राष्ट्रीय और सामाजिक महत्व के मुद्दों पर सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेखन किया है। वे विभिन्न हिंदी समाचार चैनलों पर राजनीतिक व सामाजिक विषयों पर होने वाले विमर्शों के चर्चित चेहरे हैं। वे आकाशवाणी से विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से लंबे समय से जुड़े रहे हैं। वह कई एक सामाजिक संस्थाओं से भी जुड़े हैं। पहली बार आधुनिक मीडिया में शीर्ष पदों पर रहे पत्रकारिता के लंबे अनुभवों से संपन्न किसी व्यक्ति को न्यास का सबसे प्रमुख पदभार सौंपा गया है।
उल्लेखनीय है कि बल्देव शर्मा के कार्यशील अतीत का बड़ा हिस्सा मीडिया की मुख्यधारा में शीर्ष पदों पर संपादक के रूप में व्यतीत हुआ है। संपादक के रूप में उन्होंने सबसे पहले मध्यप्रदेश के हिंदी दैनिक स्वदेश (ग्वालियर) में वर्ष 1981 से पत्रकारिता की शुरुआत की। इसके बाद वर्ष 1989 से 1995 (सात वर्ष) तक स्वदेश, रायपुर संस्करण के संपादक रहे। वर्ष 1999 से वर्ष 2000 (दो वर्ष) तक हिंदी दैनिक भास्कर , वर्ष 2001 से वर्ष 2009 (नौ वर्ष) तक अमर उजाला वाराणसी, नोएडा आदि के, कई वर्षों तक 'पांचजन्य' के, उसके बाद नेशनल बुक ट्रस्ट के शीर्ष पद पर नवनियुक्ति-पूर्व तक दिल्ली में हिंदी दैनिक नेशनल दुनिया के संपादक रहे हैं।    
अब पहली बार हिंदी का कोई संपादक नेशनल बुक ट्रस्ट जैसे विशाल संगठन का अध्यक्ष बने तो पत्रकारिता ही नहीं, पूरे हिंदी जगत के लिए ये गर्व की बात मानी जा रही है। यह एक स्वागत योग्य कदम है। इससे पहले अंग्रेजी के कई लेखक इस प्रख्यात ट्रस्ट के अध्यक्ष रहे हैं। मीडिया में शीर्ष पदों पर रहते हुए अपने व्यापक अनुभवों के नाते बल्देव भाई शर्मा के अध्यक्ष बनने से हिंदी ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं को भी मजबूती मिलने की संभावना है।
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत (एनबीटी), सन् 1957 में भारत सरकार (उच्चतर शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय) द्वारा स्थापित एक शीर्ष निकाय है। एनबीटी का उद्देश्य हिंदी, अँग्रेजी तथा अन्य कई भारतीय भाषाओं में उच्च कोटि के साहित्य का प्रकाशन और पुस्तकों के प्रोन्नयन को प्रोत्साहित करना, ऐसा साहित्य लोगों को उचित मूल्यों पर उपलब्ध करवाना है; साथ ही, पुस्तक सूची का प्रकाशन करना, पुस्तक मेलों/प्रदर्शनियों तथा संगोष्ठियों की व्यवस्था करना और लोगों में पुस्तक पढ़ने की आदत को बढ़ावा देने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाना है। पिछले पाँच दशकों से पुस्तकों के प्रोनन्यन एवं पुस्तक पढ़ने की आदत को बढ़ावा देने के लिए एनबीटी देश भर में पुस्तक मेलों तथा प्रदर्शनियों का आयोजन कर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। देश में पुस्तकों के प्रोन्नयन हेतु एनबीटी एक केंद्रीय अभिकरण के रूप में कार्य कर रहा है। प्रतिवर्ष प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मेलों में भाग लेकर भारत की ओर से पुस्तकों का प्रदर्शन कर भारत का प्रतिनिधित्व करता है। यह न्यास सचल पुस्तक प्रदर्शनियों तथा अपनी वेबसाइट पर ऑनलाइन बिक्री के माध्यम से जन-जन के दरवाजे तक पुस्तकें उपलब्ध करवाता है। देशभर में इसके 80 हजार से अधिक पुस्तक क्लब के सदस्य नामांकित हैं। यह न्यास लेखकों तथा प्रकाशकों को वित्तीय सहायता भी प्रदान करता है।

Sunday, 8 March 2015

वर्तिका नंदा ने लिखी पीएम के नाम चिट्ठी

मोदी जी,            
अपने हिस्से के महिला दिवस का अंतिम संस्कार करने जा रही हूं। सोचा कि आपसे साझा करूं कि सालों से जिस महिला दिवस को लाद कर हम मुस्कुराते रहे हैं, उसका औचित्य है क्या।
 यह सही है कि आप प्रधानमंत्री कुछ महीने पहले ही बने हैं। इसलिए यह खत अकेले आपके नाम नहीं है। यह खत उन सभी प्रधानमंत्रियों के नाम हैं जिन्होंने इस देश की महिलाओं के नाम नारे गढ़े, कसीदे पढ़े और जरूरत पड़ने पर आंसू भी ढुलकाए।
 बात की शुरुआत निर्भया से। कब, कहां, क्या हुआ – यह सभी जानते हैं लेकिन कितनों ने यह सोचने की कोशिश भी कि जिस निर्भया के नाम पर रोटियां पका ली गईं, आज अगर वो जिंदा होती तो क्या होता। मुकेश कुमार ने इंटरव्यू में जो कहा, क्या उसने इस देश की औरत को फिर से उसी चौराहे पर लाकर खड़ा नहीं कर दिया जहां से यात्रा शुरू की गई थी। आज अगर वो जिंदा होती तो वो कैसे जूझती। अदालती कार्यवाहियों से शायद हर बार कुछ और टूटकर लौटती। अपमान के कड़वे घूंट पीती। किसी की जिरह को सिर झुकाकर सुनती और किसी तरह से यह कहती कि हां, मेरे साथ हुआ था एक घिनौना बलात्कार। तब यही समाज कुछ दिनों बाद यह भी कह लेता शायद कि वह झूठ ही बोल रही होगी या खुद ही सारे किस्से के लिए जिम्मेदार रही होगी क्योंकि शरीफ घर की लड़कियां रात को फिल्म देख कर बस में नहीं लौटतीं। ( जिस समाज के हिस्से के पास लाल और नीले रंग की बत्ती की कारें हैं, उनकी बेटियों 12 बजे का शो देख लेती हैं तो भी कुछ नहीं होता)।
 इन सालों में हमारी नकारा सरकारों ने औरतों के नाम पर मुट्ठी भर के कानून बनाए। दहेज उन्मूलन संशोधन और घरेलू हिंसा का कानून। बलात्कार और एसिड के हमले को लेकर बने कानून। क्या इस देश की महिलाओं की कथित ठेकेदारी कर रहे महिला आयोग ने कभी सलीके से यह जानने की कोशिश की कि जिन औरतों को मजबूरी में इन कानूनों का सहारा लेना पड़ता है, उनकी कहानी का अंत होता कैसे हैं। उन्हें कड़वी कानूनी उलझी पहेलियों में उलझने के अलावा अपनी इज्जत को कई बार खोना पड़ता है क्योंकि अपराधी यह प्रचारित करता है कि कानून का दुरूपयोग ही हुआ होगा। इस देश में किसी भी अपराध की शिकार औरत को बार-बार पर अपनी गवाही देनी पड़ती है।
 और किस मामले में क्या हुआ। वो चली गई – दिल्ली के एक होटल में मरी पाई गई। बाद में पुलिस ने माना कि वो मारी गई थी। मरने से पहले जिनसे मदद मांगी, वे किसी बड़े आदमी से उसके जुड़ाव के चलते मदद करने नहीं आए। एक और हाई-प्रोफाइल महिला करीब दो साल पहले चंडीगढ़ में मरी हुई पाई गई। यह वे औरतें थीं जो समाज के उस वर्ग से थीं जिसे एक ड्रामे के तहत सशक्त माना जाता है। क्या कभी इस देश के महिला और बाल विकास मंत्रालय ने सोचा कि सशक्त दिखने वाली महिलाएं इस देश में अशक्त कब, क्यों और कैसे होती हैं। क्या कोई ठोस कानून बना कि महिलाओं के खिलाफ किसी भी अपराध में संलिप्त व्यक्ति को कहीं कोई जगह नहीं दी जाएगी। नहीं, क्योंकि अपराधी कहां नहीं हैं और यह देश अपराधियों को सम्मान देने में महारत रखता है।
 और हां, हमारे यहां महिला अपराध शाखाएं भी हैं जिनमें अक्सर उन अधिकारियों को भेज दिया जाता है जिनका महिलाओं के मुद्दे में रत्ती भर की दिलचस्पी नहीं होती। वे वहां इसलिए होते हैं ताकि स्टडी लीव पर जाए बिना काम होता रहे या फिर तबादले पर शहर से बाहर न जाना पड़े।
 खैर। आज आपसे एक ही निवेदन है। आप सब कुछ ले लीजिए वापिस। जो ये ढीले-ढाले ब्लड प्रेशर के शिकार कानून सरकारों ने बनवाए हैं औरतों के नाम पर, वे भी। बस में आरक्षित सीट की तख्ती भी। बंद कर दीजिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय जैसे झूठ और कागजी दिलासा देने का काम करते आयोग। बिना दांत के इन विभागों का औरतें क्या करेंगी। कुछ नहीं चाहिए। हम भीख पर जिंदा नहीं रहेंगी और जब यह भीख नहीं होगी तो यह भी पक्का भरोसा रहेगा कि न कानून हमारे साथ है, न पुलिस। बिना उम्मीद के जीना ज्यादा आसान होता है।
 इस देश में अपराधी लंबे समय तक मजे की जिंदगी जीता है। भारतीय फिल्म की तरह विलेन की शुरूआती ढाई घंटे की कहानी ऐशो-आराम से अंगूर खाते हुए ही गुजरती है। पिटता है वह आखिर में। कुछ मिनटों के लिए लेकिन शराफत जहर पीती है फिल्म के आखिरी सिरे तक। अपराधी कचहरियों में कलफ लगे कपड़े पहन कर रूआब से जाता है। पीड़ित की आंखें झुकी होती हैं। आज जब देश दो वकीलों को 6 महीने के लिए वकालत से बाहर कर रहा है, काश हम सोच और कह पाते कि इस देश को कानून के अंदर की बंद गलियों में झांकने की कितनी जरूरत है। काश, कोई यह भी देख पाता कि अदालतों के बेंचों के सच हैं क्या। काश, कोई यह दिखा पाता कि इस देश में न्याय की गुहार लगाना भर अपने हाथों अपना बलात्कार कराने जैसा ही है।
 सच बहुत से हैं और बहुत ही कड़वे हैं। ऐसे में क्या बेटी बचाओ, क्या बेटी पढ़ाओ। आपसे प्रार्थना है कि जब सत्ताओं को अपराधियों को ही तरजीह देनी है तो नारे भी उन्हीं के लिए गढ़िए।
 लेकिन प्रधानमंत्री जी, एक बात और है और यही मेरे इस खत का निचोड़ भी। आपको भी यह बात मालूम होनी चाहिए कि अपमान – अपराध – प्रार्थना - चुप्पी...के बीच इस देश की हर पीड़ित औरत के पास कोई सच है। अफसोस सिर्फ यही है कि या तो सच को बोलने से पहले उसे दीवार पर चिनवा दिया जाता है या फिर सच की चाबी किसी राजा के पास छिपी रहती है। इस देश की मर चुकी या आने वाले समय में मारी जाने वाली हर बेबस रानी की चाबी को किसी राजा ने छिपा दिया है। यकीन न हो तो जिन औरतों पर एसिड फेंका जाता है, उन्हीं से पूछ लीजिए।
 वैसे जमाने को यह नहीं भूलना चाहिए कि इस देश की कागजी इमारतों में न्याय भले ही दुबक कर बैठता हो लेकिन दैविक न्याय तो अपना दायरा पूरा करता ही है। राजा भूल जाते हैं – जब भी कोई विनाश आता है, उसकी तह में होती है – किसी रानी की आह!
 महिला दिवस की अस्थियां भी विसर्जित करूंगी ताकि अपने हिस्से का यह दिवस हमेशा के लिए स्वाहा कर सकूं। आप चाहें तो साथ चल सकते हैं।
 वर्तिका नन्दा

Saturday, 7 March 2015

वह जादू की झप्पी-सी मुस्कान / जयप्रकाश त्रिपाठी

वह लड़ाई जारी रखे हुए थे। अपनी तरह से लड़ रहे थे। अनवरत लड़ रहे थे रंगकर्म के बहाने। आगरा प्रवास के दौरान वह मुझसे अक्सर कहते थे- 'क्या हम लोग कभी एक नहीं हो सकते। आपस में याराना नहीं, न सही, कम- से-कम दुश्मनी करने से बाज आ जाएं, तब भी बात बहुत कुछ बन सकती है। हम बहुत ज्यादा हैं और उतने ही जिद्दी। क्या किसी मामूली से मुद्दे पर भी हम एक मंच पर नहीं आ सकते!' उनका इशारा वैचारिक कट्टरता के बहाने आपसी टकराव, वाम बिखराव, भटकाव, दुराव (छिपाव भी) की तरफ होता था।
आगरा में वर्ष 1986 से 2010 तक (अमर उजाला, आज में रहते हुए) अनगिनत दिन उनके आवास से आगरा विश्वविद्यालय तक साझा करने के दौरान मैंने बहुत निकट से उनके स्वभाव की कई परतें देखी थीं, जो विरलों में ही मिलती हैं। इप्टा के साथ हर समय पूर्णतः सक्रिय रहते हुए घर-परिवार, दोस्त-मित्रों के लिए भी उनके पास पर्याप्त समय होता था। दो-एक मुलाकातों में भी दुश्मन को दोस्त बना लेने का उनमें अद्भुत हुनर था। स्वभाव से अत्यंत विनम्र, विचारों में कत्तई सख्त। मुझे कभी-कभी उनकी मिलनसारिता से बड़ी झुझलाहट भी होती थी, आज उस पर फक्र हो रहा है। हां, मैंने उसे कभी न उनसे, न अन्य किसी साथी से आज तक साझा किया है। यह सब उन्हें अपने यशस्वी पिता राजेंद्र रघुवंशी (रंगकर्मी-पत्रकार) से विरासत में मिला था।
जब मैं एक बार मेरठ में दैनिक जागरण में कार्यरत था, उन्होंने एक दिन सुबह तड़के फोन किया। मैं देर रात कार्यालय से लौटा था, कच्ची नींद में भन्नाते हुए फोन उठाया, बिना जाने की कॉल की किसकी है, उधर से निर्देश भरा स्वर जीतेंद्र रघुवंशी का - 'ऐसा है, आज मेरठ आ रहा हूं। आज का समय बचाकर रखना, हंगल साहब से मिलवाना चाहता हूं।' अब नींद कहां। मैं एक घंटा पहले कार्यालय पहुंचा। एडिटर को सूचित करते हुए ठीक 11 बजे शास्त्रीनगर उस ठिकाने पर पहुंच गया, जहां ए. के. हंगल आ चुके थे। मुलाकातियों से घिरे हुए। उन्होंने किसी तरह बच-बचाकर अलग कमरे में मेरी हंगल साहब से मुलाकात करवाई। उस दिन हंगल साहब किसी बात से बहुत उखड़े हुए थे, फिर भी रंगकर्म, फिल्म, जन-आंदोलनों से जुड़े सवालों पर खूब बेबाकी से बोले। कमरे से बाहर निकलते समय मेरे कानों में हंगल साहब का जीतेंद्र रघुवंशी से कहा गया वह वाक्य आज तक गूंजता है - 'आपने अखबार वालों को क्यों बुला लिया। मेरे पास इतना समय नहीं है।' मुड़कर मेरी दृष्टि जीतेंद्र भाई के चेहरे पर जा टिकी। वह अप्रत्याशित फटकार पर स्थिर भाव से यथावत मुस्कराते दिखे थे। जैसेकि वह हर समय सहज रह लेते थे।
अपने वैचारिक जुझारूपन का वह कभी प्रदर्शन नहीं करते थे। पार्टी से अंतिम सांस तक जुड़े रहने के बावजूद जन-मोर्चों पर भाकपा के (माकपा भी) नीतिगत दोरंगेपन से वह अंदर से प्रायः असहमत जान पड़ते थे। मैं पहली बार बड़े नाटकीय ढंग से उनके घर तक पहुंचा था। आगरा में नया-नया था, अपरिचित। न शहर के बारे में कुछ मालूम था, न वहां की बौद्धिक गतिविधियों और उनसे जुड़े लोगों के बारे में। उन दिनो पत्र-पत्रिकाएं पढ़ने का नशा-सा था। एक पत्रकार मित्र ने बताया कि रघुवंशीजी सभी अच्छी पत्र-पत्रिकाएं मंगाते हैं। उनसे मिल लीजिए, समस्या हल हो जाएगी। सेंटजांस चौराहे के निकट एक तरफ उनका आवास था, दूसरी तरफ 'आज' अखबार का कार्यालय। रविवार के दिन तेजी से काम निपटाकर मैं उनसे मिलने पहुंच गया। पहले परिचय में ही लगा कि, चलो ठिकाना मिल गया। वह मुझे अक्सर आगाह करने से चूकते नहीं थे - 'अखबार की नौकरी में इतनी प्रतिबद्धता खतरनाक होगी। वैचारिक मुखरता से जरा परहेज रखा करिए। चारो ओर चुगलखोर हैं, आप की नौकरी चली जाएगी।' कुछ भी कह कर वह हल्के से मुस्कराना नहीं भूलते थे। वह जादू की झप्पी जैसी मुस्कान....।      
इप्टा के लिए तो वह बारहो महीने लगे ही रहते थे, नाटकों, नुक्कड़ नाटकों के मंचन से लेकर गर्मी की छुट्टियों में लिटिल इप्टा के शिविर तक, उनके नेतृत्व में अक्सर आगरा में राष्ट्रीय स्तर के प्रोग्राम हो जाया करते थे। नजीर उनके सबसे प्रिय कवि थे। वसंत पंचमी पर हर वर्ष वह दोस्त-मित्रों के साथ नजीर की मजार पर विशेष आयोजन किया करते थे। तिथि निकट आते ही पेशे से अधिवक्ता जनाब अमीर अहमद उनके साथ साये की तरह लग जाते थे। कल रात फोन पर बात करते समय अमीर साहब की आवाज रुंधी-रुंधी सी रही। इतने रुंआसे कि बीच में ही फोन काट दिया। मैंने रघुवंशी भाई को भी इसी तरह उस दिन अंदर से हिला हुआ देखा था, जब अत्यंत सक्रिय रंगकर्मी गिरीश अवतानी की अकाल मौत हुई थी। गिरीश को वह कितना प्यार करते थे, फटेहाली में कैसे उनकी न जानकारी में उनकी मदद किया करते थे, मुझसे वह प्रायः चर्चा कर दिया करते थे।
नब्बे के दशक में उनके और राजेंद्र यादव के संयोजन में तीन दिन का राष्ट्रीय कथाकार सम्मेलन आगरा के यूथ क्लब में आयोजित हुआ था। देश भर के साहित्यकारों का जमावड़ा रहा। तीनो दिन उनका साहित्य से कोई लेना-देना नहीं रहा। उनकी चिंता थी कि कोई अपेक्षित आतिथ्य न मिलने से दुखी न हो जाए। उनमें गजब की दक्षता थी कि कब, कहां, कैसे विचार को साधना है, कैसे व्यवहार को और कैसे दोनों को एक साथ। इसे निभाने के लिए वह अपने पूरे परिवार और साथियों के साथ जुटे रहते थे।
मीडिया की गलाजत से वह अंदर से बहुत क्षुब्ध रहते थे। आधुनिक पत्रकारिता के मौजूदा परिदृश्य पर उन्होंने मुझे सविस्तार पुस्तक लिखने के लिए प्रोत्साहित किया था। लिखने-छपने के बाद मैं पिछले साल अप्रैल में उन्हें अपनी पुस्तक 'मीडिया हूं मैं' देने गया था। उस समय वह अस्वस्थ थे और व्यस्त भी। उस दिन वह डॉयबिटीज के साथ किसी और बीमारी से थके-थके से और इकलौते बेटे की पढ़ाई और रोजगार को लेकर अंदर से कुछ विचलित-चिंतित लगे। उस दिन मैं शीघ्र ही दोबारा मुलाकात का वायदा कर पुनः आगरा लौट न सका, और वह हमेशा के लिए गहरी कसक दे गए।
उन्होंने बहुत मुश्किल समय में बृज क्षेत्र में थिएटर की विरासत को हर दिन परवान चढ़ाया। बंगाल में अकाल के दौरान वह अरुणा आसिफ अली के साथ रेलगाड़ी से अनाज लेकर गए थे। कल रात भारी मन से याद करते हुए मैं उनकी लिखी 'जब सो गयी थी इप्टा' शीर्षक से लिखी एक टिप्पणी पढ़ रहा था - ''इप्टा के पुनर्जागरण का दौर आगरा में 1985 में राष्ट्रीय परिसम्मेलन से हुआ। इसकी अध्यक्षता कैफी आज़मी ने की। 1986 में उन्हीं की सदारत में हैदराबाद में इप्टा का 9वां राष्ट्रीय सम्मेलन किया गया, जिसका अब रजत जयंती वर्ष है। कैफी साहब की दसवीं पुण्यतिथि भी इसी साल है। आगरा में कैफी साहब ने कहा था, इप्टा मरी नहीं थी, थोड़ी देर के लिये सो गयी थी। कुछ लोग जागते रहे हैं लेकिन उनकी आँखें मुंदी रही हैं....खून के रिश्ते से बड़ा है जजबात का रिश्ता, और ये भी कि इप्टा से बड़ा कोई तीर्थ नहीं, जहाँ सब लोग मिल सकें। हैदराबाद सम्मेलन के समापन पर वे बोले थे - साथियो, मैं तुम्हें नयी मुहिम के लिये विदा करता हूं। जाओ और अपने हुनर से अवाम व मुल्क की बेहतरी के लिये काम करो!'' अंदेशा है, अब शायद ही कोई उनकी तरह से इप्टा को अपनी चिंताओं में शामिल कर सके। वह फक्कड़ रंगकर्मी, यारों का यार, धुन का पक्का बटोही अब कहां मिलेगा! उनका असामयिक निधन जनसांस्कृतिक आंदोलन की अपूरणीय क्षति है। लाल सलाम दोस्त।

मेरे शहर की स्त्रियां

(8 मार्च को अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस)

मेरे शहर की स्त्रियां......
न फेमिनिस्ट, न कॉरपोरेट
न ये करती हैं बड़े-बड़े दावे-प्रतिदावे,
धर्मशास्त्रों, रूढ़ियों ने इन्हें
नहीं सिखायीं आदिम वर्जनाएं.
गली-कूंचों,
सौंदर्य प्रतियोगिताओं
और किटी पार्टियों से न रहा कभी
इनका कभी कोई सरोकार,
कर्मकाण्डों के शहर में ढहाए हैं इन्होंने
पितृसता-पुरोहिती के पाखंड,
दिए अर्थियों को कंधे,
चिता को मुखाग्नि,
किए माता-पिताओं के अंतिम संस्कार
तर्पण और पितरों के श्राद्ध.
मेरे शहर की स्त्रियां........
तनिक भी शर्मातीं-सकुचातीं नहीं हैं
साफ-साफ कर देती हैं
शराबी दूल्हेसंग शादी से इन्कार
घोड़ी पर होकर सवार
खुद गाजे-बाजे के साथ पहुंच जाती हैं
दूल्हे के दरवाजे,
पिता करते हैं बहुओं की आगवानी,
पूजते हैं इनके पाँव,
कभी नहीं हुआ
यहां की शादियों में
मंत्रोच्चार, न ली इन्होंने सात फेरों की शपथ,
सिर्फ जयमाल,
सिन्दूरदान,
स्वयंवर भी रचा लेती हैं कभी-कभार
पूछती हैं सवाल
और खुद चुन लेती हैं जीवनसाथी
यहां की विधवाएं
खूब करती हैं साज श्रृंगार
हाथों में मेंहदी, कलाइयों में रंग-बिरंगी चूड़ियाँ,
माथे पर बिंदिया
और खूबसूरत परिधान.
और-तो-और
इस शहर की काजी हैं शबनम
अपने लकवाग्रस्त पिता की सातवीं संतान
शरीयत का है इन्हें अच्छी तरह ज्ञान.
मेरे शहर की स्त्रियां.....
बात-बात पर करती हैं जिरह,
क्यों बांधे जाते हैं कलावे
लड़कों के दाएं, लड़कियों के बाएं हाथ में?
जनेऊ क्यों नहीं पहन सकतीं हम स्त्रियां?
अंतर और मायने बताइए
स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस
और महिला दिवस के?
इन्हें मालूम हैं
गांव-शहर के फर्क भी,
दोनों जगह की औरतों की
आजादियों के मतलब,
दोनों को चाहिए अपनी-अपनी स्वतंत्रताएं
और तुरंत चाहिए,
कल या परसों नहीं.
दोनों के मुद्दे हैं एक-से
आर्थिक सुरक्षा.
इन्हें भी चाहिए
खुद कमाने, खुद खर्चने का
पूरा अधिकार.
इस शहर की स्त्रियां
हर बार
महिला दिवस पर पूछती हैं
एक ही सवाल...
इस दिन हमारे नारी संगठन
क्यों नहीं जाते वेश्या टोलियों में?
उनसे ज्यादा किसका होता है
शोषण और दमन?
ये अक्सर पूछती हैं
कि हमारे देश में और कहां-कहां हैं
पाटन जैसे टीचर्स ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूट?
वे छह अध्यापक और वे किशोरियां थीं
किस माता पिता की बेटियां?
और किन-किन विद्यालयों में हो रही है
वैसी पढ़ाई-लिखाई?
और कहां-कहां बच्चियों के आदमखोर
पहुंचे जेल की सलाखों के पीछे?
ये स्त्रियां कहती हैं
कि हत्यारे से ज्यादा भयानक
होता है बलात्कारी.
ये अपनी बच्चियों को रोजाना पढ़ाती हैं
उनसे मुकाबले का पाठ.
मेरे शहर की स्त्रियां.....
सिर्फ घरों के भीतर नहीं होतीं
शासन और समर में रखती हैं
ज्यादा विश्वास,
यहां के लोग कहते हैं इन्हें
वीरांगना,
और ये रही इनकी नामावली
बेगम हजरत महल
रहीमी, हैदरीबाई, ऊदा देवी,
आशा देवी, रनवीरी,
शोभा, महावीरी,
सहेजा, नामकौर, राजकौर, हबीबा गुर्जरी,
भगवानी, भगवती, इन्द्रकौर
और कुशल देवी,
जमानी बेगम, लक्ष्मीबाई,
झलकारीबाई, मोतीबाई, काशीबाई
जूही, दुर्गाबाई
रानी चेनम्मा
और लाजो,
रानी राजेश्वरी और बेगम आलिया
रानी तलमुंद कोइर
ठकुराइन सन्नाथ कोइर
सोगरा बीबी और अजीजनबाई
मस्तानीबाई
मैनावती
और अवन्तीबाई
महावीरी, चौहान रानी, वेद कुमारी और आज्ञावती
सत्यवती, अरुणा आसफ अली
देवमनियां और ‘माकी’
रानी गुइंदाल्यू, प्रीतिलता, कल्पनादत्त
शान्ति घोष और सुनीति चौधरी
सुहासिनी अली और रेणुसेन
‘दुर्गा भाभी’, सुशीला दीदी
बेगम हसरत मोहानी
सरोजिनी नायडू
कमला देवी चट्टोपाध्याय
बाई अमन
अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी
मातंगिनी हाजरा और कस्तूरबा गाँधी
डा0 सुशीला नैयर, विजयलक्ष्मी
लक्ष्मी सहगल, मानवती आर्या
एनीबेसेन्ट, मैडम भीकाजी कामा
भगिनी निवेदिता
मीरा बहन आदि-आदि.
मेरे शहर की स्त्रियां.....
चिट्ठों और गोष्ठियों में करती हैं
शब्दबेधी टिप्पणियां
उनके पायतने खड़े पुरुष पूछते हैं उनसे आएदिन
कि हम धर्म के रास्ते चलें,
कोई समस्या तो नहीं?
उफ्!
इस कदर अन्धविशवास!
तब उन्हें समझाती हैं ये
सृष्टि विकास का परिणाम है
न किसी खुदा, न ईश्वर का,
पुरुष के नियम ईश्वर के नहीं,
सेवा नहीं कोई स्त्री-धर्म,
अब नहीं होना चाहतीं ये
वाचिक मानसिक, शारीरिक हिंसा का शिकार
इसीलिए ये कभी नहीं मनातीं
रक्षाबन्धन, करवा चौथ, अहोई
चिंदी-चिंदी खोद डालीं हैं इन्होंने
अपने-अपने
अंधविश्वासों की जड़ें
तोड़ डाली हैं अपने पैरों की बेड़ियाँ
चाहे इन्हें कोई
कुलक्षिणी कहे या नयनतारा।
('जग के सब दुखियारे रस्ते मेरे हैं' से उद्धृत....)

Thursday, 5 March 2015

जीवन जीने की कला / जयप्रकाश त्रिपाठी

महानता का उच्च आत्मालाप,
जहँ-तहँ अवसरवादी श्रद्धाभिभूति,
नामवर 'बड़ों' की चाटुकारिता
और अ-पठित, अ-घोर, अ-मनुष्यता 
है उसके जीवन जीने की कला ।

मैं उन्हें भला क्या जवाब देता

उन दिनो लखनऊ से 'सुकवि विनोद' पत्रिका प्रकाशित होती थी। संपादक थे डा. लक्ष्‍मीशंकर मिश्र 'निशंक'। उस पत्रिका के माध्यम से वह नये कवियों को प्रोत्साहित करते रहते थे। ज्यादातर रचनाएं ब्रजभाषा में होती थीं। रचनाएं कहिए या तुकबंदी। मैंने एक साथ भाषा और कविता, दोनो का तुक्का मारा और निशाने पर जा बैठा। सिर्फ चार पंक्तियां थीं ब्रजभाषा में। भावार्थ, होली में बरसात का रूपक......
पुन्य कौ पावस ऐसो भयो, बरसाने के अंबर भावन ह्वैगे
घेरिगे मेघ अबीर-गुलाल, झांझ-मजीरे सुहावन ह्वैगे
दामिनि की छवि अंग लिए वृषभानुजा के मन पावन ह्वैगे
फागुन की रसवंती फुहार में नंद के सांवरे सावन ह्वैगे...
कालेज में पढ़ाई के दौरान रचना सुकवि विनोद में प्रकाशित होने के काफी समय बाद जब एक दिन मंच से इसका पाठ कर मैं अपने घर लौट रहा था, पीछे-पीछे तेजी से आ रहे मेरे कक्षाध्यापक ने आवाज दी। मैं रुक गया। वह हांफ रहे थे। मैंने सोचा कुछ अप्रिय तो नहीं हो गया। वो छूटते ही पूछ बैठे- आप कहां के रहने वाले हो, मथुरा के.....अब मैं उन्हें भला क्या जवाब देता...