Thursday, 5 February 2015

मेरी पाठशाला (12) : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

'नसीब सिंह, नसीब सिंह कहाँ जा रिये हो, जरा दम तो ले लो, जहाँ जा रिये हो...' अजित वडनेरकर 'राग भोपाली' और ‘शब्दों का सफर’ नाम से फेसबुक पर हैं। उनका ब्लॉग भी है- shabdavali.blogspot.in वह कहते हैं- ‘ शब्दों के जन्मसूत्रों को तलाशने की मुझे धुन है। ज़िद की हद तक मैं रोज़ इनके पीछे भागता हूँ। इसे जुनून समझ सकते हैं। यह शौक बीते क़रीब तीस साल से है। मैंने १९८५ से आजीविका कमानी शुरू की। इस शौक से जुड़ी सामग्री, ज़ाहिर है वह किताबों की शक्ल में ही थी, जुटानी शुरू की। संवाद माध्यम के रूप में भाषा का इस्तेमाल करने के बावजूद भाषा को अध्ययन के स्तर पर, कठिन विषय समझा जाता है। २००५ में दैनिक भास्कर में साप्ताहिक कॉलम के रूप से शब्दों का सफ़र शुरू हुआ। २००६ तक मुझे लगने लगा था कि लोगों को यह अंदाज़ पसंद आ रहा है और मैंने उसी वर्ष इसी नाम से ब्लॉग शुरू कर दिया।’

अजित वाडनेकर को हिंदी ब्लॉग लेखन जगत का पाणिनी भी कहा जाता है। अत्यंत श्रमसाध्य उनके शब्दों के सफर से हिंदी साहित्य जगत ही नहीं, विशाल पाठक वर्ग भी सुपरिचत है। कैसा है उनका, शब्दों का सफर, जरा एक ताजा बानगी देखिए---

बराक साहब तो लौट गए और भारत सरकार में अब 'मुबारकाँ-मुबारकाँ' का दौर है। दरअसल बराक नाम में ही 'मुबारक' छुपा हुआ है। बराक शब्द मूल रूप से स्वाहिली का नहीं बल्कि अरबी का है। अरबी में यह हिब्रू से आया या नहीं इस विवाद में न पड़ते हुए यही कहा जा सकता है कि स्वाहिली में यह ज़रूर अरबी से गया है। अरबी al-baraka (या al-barack) बना है सेमिटिक धातु b-r-k (बा-रा-काफ) से जिसका अर्थ होता है आशीर्वाद देना, प्रशंसा करना, उपकृत करना, धन्य करना आदि। अरबी के अलावा हिब्रू में भी यह धातु है। समृद्धि, वृद्धि या खुशहाली के अर्थ में हिन्दी में इसी मूल से बना 'बरक्कत' शब्द प्रचलित है। मांगलिक अवसरों पर शुभकामना देने के लिए अक्सर मुबारकबाद दी जाती है। यह 'मुबारक' भी इसी मूल से आ रहा है और बराक में 'मु' उपसर्ग लगने से बना है। जाहिर है 'बराक' का अर्थ हुआ शक्तिशाली, विशिष्ट, मांगलिक, समृद्ध आदि। इस नाम के महत्व को विश्व में इस महाशक्ति की विशिष्ट भूमिका के संदर्भ में देखें तो 'अल-बराक' का सजातीय 'ब्रोकर' और भी अर्थवान नज़र आता है। दुनियाभर के इस स्वयंभू पंच की सौदागरी को ध्यान में रख कर आप मध्यस्थ, दलाल, ब्रोकर या डीलर क्या कहना चाहेंगे?

उपन्यास, कहानी, शब्द-व्युत्पत्ति-विवेचना, आलोचना आदि विविध विधाओं में रचनारत अजित वाडनेकर पेशे से पत्रकार हैं। उनकी मुख्य कृतियों में एक है, दो खंडों में शब्दों का सफर। उन्होंने शानी के साहित्य पर शोध-प्रबंध लिखा है। वह कृति पाण्डुलिपि पुरस्कार, विद्यानिवास मिश्र-हिंदी की शब्द-संपदा सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं।

उनकी खोजपरक शब्द-यात्रा की एक और बानगी / ‘हवा, पानी और टंकण’
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इनसान ने अब तक ज्यादातर ज्ञान प्रकृति से ही सीखा है। भाषाविज्ञान के नजरिए से इसे आसानी से समझा जा सकता है। इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार के साथ-साथ द्रविड़ भाषा परिवार के कई शब्दों से यह बात साफ हो जाती है। गति और प्रवाह संबंधी ज्यादातर शब्दों में अंतर्संबंध है और इनका उद्गम भी एक ही है और वे हैं हवा और पानी। प्रकृति की इन दोनों शक्तियों के गति और प्रवाह जैसे लक्षणों ने मानव स्मृति पर ऐसा असर डाला कि भाषा का जन्म होने के बाद इनके कई अर्थ प्रकट हुए।
इंडो-यूरोपीय भाषाओं में वः वायु और जल दोनों से संबंधित है और इससे कई शब्द बने हैं जिनसे प्रवाह, गति जैसे अर्थ उजागर होते हैं। संस्कृत मेंवः का अर्थ होता है वायु। हिन्दी का हवा शब्द इससे ही जन्मा है। (अलबत्ता वः यानी वह केहवा बनने में वर्णविपर्यय का सिद्धांत लागू हो रहा है।) संस्कृत का एक अन्य शब्द है वह् जिसका मतलब हुआ प्रवाह । बहाव, बहना, बहकना जैसे शब्दों का मूल भी यही है। वह् से ही बना संस्कृत का वात् जिसका अर्थ भी हवा ही होता है। वात् से बना वार्, जिसका एक रूप अंग्रेजी के एअर में नजर आता है। मराठी में भी हवा को वारं ही कहा जाता है। हिन्दी में मंद हवा के झोंके को बयार कहते हैं। संस्कृत वात् से रूसी भाषा के वेतेरयानी (हवा) की समानता पर गौर करें। वह् के प्रवाही अर्थ से ही जलसूचक शब्द वार जन्मा है। वरुण भी इससे ही बना है जिसका अर्थ समुद्र देव है। अब जरा गौर करें जर्मन के व्हासर , ग्रीक के हुदौर और अंग्रेजी के वाटर पर। इन सभी का मतलब होता है पानी। रूसी में पानी के लिए वोद शब्द है। विश्वप्रसिद्ध रूसी शराब वोदका का नामकरण इससे ही हुआ है। यही नहीं, अंग्रेजी के वेट यानी गीला, नम या भीगा शब्द में भी यही वह् मौजूद है। पसीने के लिए अंग्रेजी के स्वेट, हिन्दी शब्द स्वेद और नमी, गीलेपन के लिए आर्द्र जैसे शब्दों की समानता सहज ही स्पष्ट है।
ट का-सा जवाब देना, टाँग खींचना या टाँग अड़ाना जैसे मुहावरे आम तौर पर बोलचाल की हिन्दी में प्रचलित हैं। इन मुहावरों में टका और टाँग जैसे शब्द संस्कृत के मूल शब्द टङ्कः (टंक:) से बने हैं। संस्कृत में टङ्कः का अर्थ है बाँधना, छीलना, जोड़ना, कुरेदना या तराशना। हिन्दी के टंकण या टाँकना जैसे शब्द भी इससे ही निकले है। दरअसल, टका या टंका शब्द का मतलब है चार माशे का एक तौल या इसी वजन का चाँदी का सिक्का। अंग्रेजों के जमाने में भारत में दो पैसे के सिक्के को टका कहते थे। आधा छँटाक की तौल भी टका ही कहलाती थी। पुराने जमाने में मुद्रा को ढालने की तरकीब ईजाद नहीं हुई थी तब धातु के टुकड़ों पर सरकारी चिह्न की खुदाई यानी टंकण किया जाता था। गौरतलब है कि दुनिया भर में ढलाई के जरिए सिक्के बनाने की ईजाद लीडिया के मशहूर शासक (ई.पू. करीब छह सदी) क्रोशस उर्फ कारूँ (खजानेवाला) ने की थी। टका या टंका किसी जमाने में भारत में प्रचलित था मगर अब मुद्रा के रूप में इसका प्रयोग नहीं होता। कहावतों-मुहावरों में यह जरूर मिल जाता है। किसी बात के जवाब में दो टूक यानी सिर्फ दो लफ्जों में साफ इन्कार करने के लिए यह कहावत चल पड़ी - टका-सा जवाब। टके की दो पैसों की कीमत को लेकर और भी कई कहावतों ने जन्म लिया। मसलन टका-सा मुँह लेकर रह जाना, टके को भी न पूछना, टके-टके को मोहताज होना, टके-टके के लिए तरसना, टका पास न होना, वगैरह-वगैरह। भारत में चाहे टके को अब कोई टके सेर भी नहीं पूछता, मगर बाँग्लादेश की सरकारी मुद्रा के रूप में टका आज भी डटा हुआ है। बाँग्लादेश के अलावा कई देशों में यह लफ्ज तमगा, तंका, तेंगे या तंगा के नाम से चल रहा है जैसे ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान और मंगोलिया। इन सभी देशों में यह मुद्रा के रूप में ही है, हालाँकि वहाँ इस शब्द की उत्पत्ति चीनी शब्द तेंगसे से मानी जाती है जिसका अर्थ होता है मुद्रित सिक्का और एक तरह की माप या संतुलन। अर्थ की समानता से जाहिर है कि तेंगसे शब्द भी टङ्कः का ही रूप है। टंका से ही चला टकसाल शब्द अर्थात टंकणशाला यानी जहाँ सिक्कों की ढलाई होती है।
अब आते हैं टङ्कः के दूसरे अर्थों पर । इसका एक मतलब होता है लात या पैर। संस्कृत में इसके लिए टङ्गा शब्द भी है। हिन्दी का टाँग शब्द इसी से बना है। गौर करें, टङ्कः के जोड़वाले अर्थ पर। चूँकि टाँग में घुटना और एड़ी जैसे जोड़ होते हैं, इसलिए इसे कहा गया टाँग।
इसी अर्थ से जुड़ता है इससे बना शब्द टखना । जोड़ या संधि की वजह से ही इसे यह अर्थ मिला होगा। इसी तरह, वस्त्र फट जाने पर, गहना टूट जाने पर, बरतन में छेद हो जाने पर उसे टाँका लगा कर फिर कामचलाऊ बनाने का प्रचलन रहा है। यह जो टाँका है वह भी इस टङ्कः से आ रहा है अर्थात इसमें जोड़ का भाव निहित है। टङ्कः का एक और अर्थ है बाँधना। गौर करें कि धनुष की कमान से जो डोरी बँधी होती है उसे खींचने पर एक खास ध्वनि होती है जिसेटंकार कहते हैं। यह टंकार बना है संस्कृत के टङ्कारिन् से जिसका मूल भी टङ्कः है यानी बाँधने के अर्थ में। तुर्की भाषा का एक शब्द है तमग़ा जो हिन्दी-उर्दू-फारसी में खूब प्रचलित है यानी ईनाम में दिया जानेवाला पदक या शील्ड। प्राचीन समय में चूँकि यह राजा या सुल्तान की तरफ से दिया जाता था, इसलिए इस पर शाही मुहर अंकित की जाती थी। इस तरह तमगा का अर्थ हुआ शाही मुहर या राजचिह्न। अब इस शब्द के असली अर्थ पर विचार करें तो साफ होता है कि यह शब्द भी टंकण से जुड़ा हुआ है।

मेरी पाठशाला (11) : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

हिंदी के जाने-माने व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय की ज्यादातर रचनाएं 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिंदुस्तान' के जमाने से पढ़ी-सराही जा रही हैं। उनके प्रमुख व्यंग्य संकलन हैं-  राजधानी में गँवार, बेर्शममेव जयते, पुलिस! पुलिस!, मैं नहिं माखन खायो, आत्मा महाठगिनी, मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ, शर्म मुझको मगर क्यों आती, डूबते सूरज का इश्क, कौन कुटिल खल कामी, ज्यों ज्यों बूड़ें श्याम रंग, हुड़क, मोबाइल देवता। उन्होंने आलोचनात्मक पुस्तकें भी लिखी हैं- जैसे, प्रसाद के नाटकों में हास्य-व्यंग्य, हिंदी व्यंग्य का समकालीन परिदृश्य, श्रीलाल शुक्ल : विचार, विश्लेषण और जीवन । एक नाट्यकृति भी है- सीता अपहरण केस । बाल साहित्य पर उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं - शहद की चोरी, अगर ऐसा होता, नल्लुराम। उन्होंने, व्यंग्य यात्रा, बींसवीं शताब्दी उत्कृष्ट साहित्य : व्यंग्य रचनाएँ, हिंदी हास्य-व्यंग्य संकलन आदि का संपादन भी किया है।
प्रेम जनमेजय को व्यंग्यश्री सम्मान, कमला गोइन्का व्यंग्यभूषण सम्मान, संपादक रत्न सम्मान, साहित्यकार सम्मान, इंडो-रशियन लिटरेरी क्लब सम्मान, अवंतिका सहस्त्राब्दी सम्मान, हरिशंकर परसाई स्मृति पुरस्कार, प्रकाशवीर शास्त्री सम्मान, अट्टहास सम्मान से समादृत किया जा चुका है।  प्रेम जनमेजय प्रायः फेसबुक पर भी सक्रिय रहते हैं।
(फोटो : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में सम्मान)

प्रेम जनमेजय का एक बहुपठित व्यंग्य / 'राम वनवास का सीधा प्रसारण'

आम चुनाव आने को हैं, सबसे बड़ा मुद्दा है - चुनावी मुद्दे की खोज। इधर राम पर भी खोज जारी है। जैसे चुनाव आते ही कुछ दलों का ध्यान आम आदमी की ओर ध्यान आकर्षित होता है, वैसे ही कुछ दलों का राम की ओर भी आकर्षित होता है। इस बार राम मुद्दा दे रहे हैं कि राम सेतु था कि नहीं। था और नहीं था की बहस जारी है। मैं भी एक मुद्दा दे रहा हूँ - राम के समय दूरदर्शन था कि नहीं । मैं कहता हूँ, था। आप यह तो मानेंगे ही कि उस युग में हमारे प्रभु अक्सर आकाशवाणी का प्रयोग किया करते थे । अब जहाँ आकाशवाणी होगी वहाँ दूरदर्शन न होगा? इस था और नही था पर आप चाहें तो मुझे एसएमएस द्वारा भी बता सकते हैं। वैसे भी कल्पना करने में क्या जाता है। जब आप बरसों से देश से गरीबी हटने की कल्पना को सच माने बैठे हैं तो मुझ शेखचिल्ली के साथ यह कल्पना भी कर डालिए कि जैसे द्वापर में संजय ने धृतराष्ट्र को महाभारत का आँखों देखा हाल सुनाया था वैसे ही त्रेता में भी दूरदर्शन था । मानिए और राम वनवास के कुछ दृश्य भी देख डालिए।
दृश्य 1
कल राम का राजतिलक है। सभी चैनल, सरकारी चैनल का प्रसारण रिले कर रहे है। कर नहीं रहे हैं, उन्हें करना पड़ रहा है। सीधे प्रसारण का अधिकार और किसी के पास नहीं है। सुबह से शहनाई बज रही है, राम के बचपन से आज तक की बार-बार फुटेज दिखाई जा चुकी है। कार्यक्रमों में कोई सनसनी नहीं है, व्यूअरशिप कम है, इसलिए विज्ञापन भी नहीं है। अचानक रात बारह बजे सभी चैनल जाग जाते हैं। हर चैनल पर एक ही ब्रेकिंग न्यूज है - राम को चौदह बरस का वनवास। सारी अयोध्या सोते से जाग गई है। पान और चाय की दुकानें खुल गई हैं। ढाबे सज गए है। सुनसान गलियाँ ऐसे ही जीवंत हो गई हैं जैसे प्रभु से वरदान पाया कोई भक्त।
कुछ चैनल सनसनीखेज खुलासा कर, सनसनी वैसे ही फैला रहे हैं जैसे असुर अपनी संसकृति फैलाते है। देखिए सनसनीखेज खुलासा, कैसे एक सौतेली माँ ने किया अत्याचार। जो बेटा उसे अपनी माँ से बढ़कर मानता था उसी माँ ने दिया उसे चौदह बरस का वनवास। आप जाइएगा नहीं, देखते रहिएगा। अयोध्या के इतिहास में ऐसा न कभी घटा और न कभी घटेगा। अपने पुत्र भरत के लिए ऐशो-आराम और वे राम जो कल राजा बनने जा रहे थे, उनके लिए चौदह बरस का वनवास। हम आपको दिखाने जा रहे हैं सनसनीखेज खुलासा कि कैसे हुआ राम को यह वनवास। जाइएगा नहीं, ब्रेक के बाद हम आपको दिखाएँगे कैकेयी की वो चाल जिसने पलट कर रख दी दशरथ की बाजी।'
इसके बाद ब्रेक इतना लंबा होता है कि सनसनी का ब्ल्ड प्रेशर लो होने लगता है। इस ब्रेक में राम छाप दूध् से लेकर कैकेयी छाप सुरा तक के विज्ञापन अपना कमाल दिखाते हैं।
दृश्य 2
कुछ चैनल्स ने विशेषज्ञों को बुला लिया है। विशेषज्ञों का मुकाबला चल रहा है जो किसी डब्ल्यूडब्ल्यू एपफ के दंगल से कम नही है। ऐसे मुकाबले आनंद देते हैं, इसलिए आप भी इस मुकाबले का आनंद लें।
एक - हमारा दल मानता है कि ऐसा अयोध्या के इतिहास में पहले कभी घटा नहीं है।
विशेषज्ञ दो - हमारा दल मानता है कि ऐसा अयोध्या में घटा है पर उसके प्रमाण नहीं मिलते हैं।
विशेषज्ञ तीन - कब घटा है? आपके पास क्या प्रमाण हैं?
विशेषज्ञ दो - जब भी घटा है, घटा है। प्रमाण समय आने पर देंगे।
विशेषज्ञ एक - मैं कहता हूँ नहीं घटा है...
विशेषज्ञ दो - मैं कहता हूँ घटा है।
और इसके बाद खूब मैं मैं चलती है तो संचालक तीसरे की ओर रुख कर के कहता है - आपका दल इस बारे में क्या कहता है?
- हमारा दल इंतजार करेगा कि कौन सत्ता में आता है, राम या भरत, जिसे हमारे दल की आवश्यकता होगी। अपनी आत्मा की आवाज हम तब ही सुनेंगे और उचित समय पर उचित फैसला लेंगे।
दृश्य 3
इस बीच एक और ब्रेकिंग न्यूज आती है - अभी-अभी हमें समाचार मिला है कि सीता के लिए वनवास के वस्त्र रात को एक दुकान खुलवा कर लिए गए हैं। हमारे संवाददाता इस समय दुकान के बाहर मौजूद हैं, चलिए हम उस दुकानदार से बात करते हैं जिसके यहाँ से यह वस्त्र लिए गए हैं।
- आपका नाम?
- मेरा नाम हरीशचंदर है जी
- आप क्या करते हैं
- जी, मैं रिषी-मुनियों को कपड़े बेचता हूँ।
- आपकी दुकान पर केवल रिषी-मुनि ही कपड़े लेने आते हैं?
- हाँ जी।
- और कोई नहीं आता?
- न जी।
- और कोई क्यों नहीं आता?
- पता नहीं जी।
- आप झूठ बोल रहे हैं, आपको सब पता है।
- पता नहीं जी।
- आपको पता है, आपके यहाँ से ही कपड़े गए हैं किसी महिला के लिए । हमारे पास इसकी वीडियो है, हमें सब पता है,
- जब आपको सब पता है तो मुझसे क्यों पूछ रहे हो?
तो आपने देखा महलों का आतंक। हम अभी कुछ देर में आपको वह वीडियो दिखाने जा रहे हैं जो खुलासा कर देगी कि वो कपड़े सीता के लिए ही गए हैं। हमारी टीम उस डिजाइनर की खोज कर रही हैं और उस प्रसाधन केंद्र का भी पता कर रही है जहाँ सीता जी वनवास के लिए सजने गई थीं।
आप हमें एसएमएस करें कि क्या राम अकेले वनवास जाएँगे ? यदि आपका जवाब हाँ है तो हाँ लिखें, न है तो न लिखें और कुछ भी जवाब न हो तो भी आप लिखें 'कुछ नहीं' । हमारे चैनल ने पहली बार ऐसे लोगों को भी मौका दिया है जिनका जवाब 'कुछ नहीं' हो सकता है।
दृश्य 4
एक धर्मिक चैनल ने गुरु वसिष्ठ के विशिष्ट चेले, उनके विशिष्ट विरोधी तथा कुछ पंडितों का पैनल बनाया हुआ है। पोथियाँ खुली हुई हैं, ग्रहों की स्थिति बाँची जा रही है, गणनाएँ जारी हैं तथा अनिश्चित वातावरण में कुछ भी निश्चित कहने से बचा जा रहा है। अलग-अलग चेहरे अलग-अलग अंदाज में दिख रहे हैं। कुछ इस अंदाज में दिखाई दे रहे हैं कि अरे, ये क्या हो गया, कुछ इस अंदाज में हैं कि हमने तो पहले ही कहा था और ये तो होना ही था तथा कुछ इस अंदाज में हैं कि देखें भाग्य में और क्या-क्या होना है। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि गुरु वसिष्ठ ने मुहूर्त निकालते समय ग्रहों की गणना कैसे गलत कर दी। कुछ गुरु की मीन-मेख निकाल रहे हैं, कुछ करम गति टारे नहीं टरे के सिद्धांत की व्याख्या कर रहे हैं और कुछ कोई नृप होय हमें का हानी से निस्पृह हैं और कुछ जुगाड़ यंत्र को साध आगामी शासन में अपनी घुसपैठ बनाने के वचन बोल रहे हैं।
क्या चल रहा है, इसे देखने को अभिशप्त जनता आप भी देखें।
प्रश्नकर्ता - सुना है राम का राजतिलक रुक गया है और वे वनवास जा रहे हैं।
ज्योतिषचार्य - ये सब ग्रहों का खेल है, समय बहुत बलवान है।
- कौन-से ग्रह क्या खेल खेल रहे हैं?
- राम और दशरथ के ग्रह टकरा गए हैं। राहु-केतु प्रबल हो गए हैं। समय शुभ नहीं है।
- पर कल तो आपने राजतिलक के लिए समय को शुभ बताया था, अति शुभ बताया था।
- ग्रहों की चाल बदलती रहती है। समय बहुत बलवान होता है। करम गति टारे नहीं टरती है।
- अब भविष्य में क्या होगा?
- समय शुभ नहीं है।
- यदि कैकेयी ने अपने वचन वापस ले लिए या फिर दशरथ वचन से मुकर गए?
- भविष्य के गर्भ में बहुत कुछ छिपा रहता है। समय शुभ हो सकता है। माता कौशल्या यज्ञ करवा रही हैं, मंत्रोच्चार हो रहे हैं। तांत्रिक व्यस्त हैं। समय बदल सकता है।
- नहीं भी बदल सकता है क्या?
- नहीं भी बदल सकता है। पता नहीं कैकेयी क्या करवा रही हैं।
धर्मिक चैनल की इस चर्चा में सभी गुणी और ज्ञानी जन अपने-अपने धर्म की व्याख्या कर रहे हैं। ऐसे महत्वपूर्ण क्षण में प्रजा के प्रति धर्म की चिंता कहाँ? प्रजा तो वैसे ही सन्नाटे में है।
दृश्य 5
कुछ कैमरामैन कैकेयी के कोपभवन के बाहर तक पहुँच गए हैं। बाहर सुरक्षाकर्मी खड़े हैं। दशरथ तक पहुँचना नामुमकिन है। चलिए हम सरकारी प्रवक्ता सुमंत जी से पूछते हैं - सुमंत जी, आप तो राजा दशरथ के करीबी हैं, आप बताएँ इस समय राजा दशरथ को क्या लग रहा है?
सुमंत सोच की मुद्रा बनाते हुए और आवाज को गंभीर करते हुए - यह बहुत असमंजस का काल है... सभी असंमजस में हैं... असमंजस के इस काल में, मेरे विचार से इस समय महाराज को यह लग रहा है कि वे दशरथ क्यों हैं।
-और उनके पास बैठी रानी कैकेयी को क्या लग रहा है?
- वे भी असंमजस में हैं और रानी कैकेयी को लग रहा है, कि वे कैकेयी क्यों हैं?
- और आपको सुमंत जी?
- मुझे, मैं तो बहुत असंमजस में हूँ... मैं राजा दशरथ और रानी कैकेयी का नजदीकी हूँ, इसलिए मुझे भी लगना ही चाहिए कि मैं सुमंत क्यों हूँ?
देखा आपने यह सनसनीखेज खुलासा, सुमंत तक को पता नहीं है कि वे सुमंत क्यों हैं। राम वनवास की अचानक खबर ने अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। सभी असंमजस में हैं। कहीं आपातकाल...इस बीच कुछ कैमरे राजा जनक के महल तक भी पहुँच गए हैं। महल के द्वार बंद हैं। कोई प्रवक्ता तक नहीं है कुछ कहने के लिए। चारों ओर असंमंजस ही असंमजस है।
कुछ चैनल भरत की पहली बाइट लेने के लिए उन्हें ढूँढ़ रहे हैं, पर भरत पर तो सुरक्षा घेरा कस चुका है। उनका कुछ भी कहना अयोध्या में...
मित्रो, ऐसे ही दृश्य संख्या 6, 7, 8 आदि आदि अनादि हैं - हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह। मैं उनका वर्णन अभी नहीं कर रहा हूँ क्योंकि मुझे पूरा विश्वास है कि उन्हें देखने और सुनने के बाद आप भी असमंजस में पड़ जाएँगे और पगला कर कहेंगे - मुझे लग रहा है कि मैं, मैं क्यों हूँ। बोल वनवासी राम की जय!

आ रहा है दिल्ली का विश्व पुस्तक मेला 2015


Wednesday, 4 February 2015

मेरी पाठशाला (दस) : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

कोई ऐसा कहे कि 'मैं इस दुनिया को चिड़िया की आँख से देखना चाहती हूँ...' या कुछ यूं कि - 'जाने क्यों महँगी चप्पलें गिरतीं नहीं कभी सड़क पर, वे छूटती भी नहीं हैं और किसी दूसरे के पाँव में आती भी नहीं आसानी से, सस्ती चप्पलें सस्तेपन को साथ लिए यहाँ-वहाँ छूटती हैं और उनका मिलना अशुभ भी नहीं होता ।'....और फिर इन प्रश्नों से रू-ब-रू कराते हुए कि- 'घृणा आततायी को जन्म देती है, आततायी निरंकुशता को, प्रेम किसको जन्म देता है...?'
तो ऐसे रचनाकार को पढ़ते हुए, कई एक बार लगता है कि दुनिया कितनी तरह से दिखायी देती है अपने आसपास की, दूर-सुदूर तक.... और ऐसी दुनिया तक ले जाती हैं कविता, उपन्यास, नाटक, पटकथा विधाओं में रचनारत नीलेश रघुवंशी की पंक्तियां। उनकी प्रमुख कृतियों में, कविता संग्रह हैं- घर-निकासी, पानी का स्वाद, अंतिम पंक्ति में । उपन्यास है- एक कस्बे के नोट्स । उनके नाट्य आलेख हैं- छूटी हुई जगह (स्त्री कविता पर नाट्य आलेख), अभी ना होगा मेरा अंत, ए क्रिएटिव लीजेंड आदि। उन्होंने कई एक बाल नाटक भी लिखे हैं- एलिस इन वंडरलैंड,  डॉन क्विगजोट,  झाँसी की रानी आदि।
नीलेश रघुवंशी को भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, आर्य स्मृति साहित्य सम्मान, दुष्यंत कुमार स्मृति सम्मान, केदार सम्मान, शीला स्मृति पुरस्कार, युवा लेखन पुरस्कार, डी. डी. अवार्ड 2003, डी. डी. अवार्ड 2004,  शैलप्रिया स्मृति सम्मान आदि से समादृत किया जा चुका है।

उनकी कुछ यादगार पंक्तियां -

जब भी बहनें आतीं ससुराल से
वे दो चार दिनों तक सोती रहतीं
उलाँकते हुए उनके कान में जोर की कूँक मारते
एक बार तो लँगड़ी भी खेली हमने उन पर
वे हमें मारने दौड़ीं
हम भागकर पिता से चिपक गए
नींद से भरी वे फिर सो गईं वहीं पिता के पास...!
पिता के न होने पर
नहीं सोईं एक भी भरी दोपहरी में
क्या उनकी नींद जाग गई पिता के सोते ही...?
सब घेरकर बैठी रहीं उसी जगह को
जहाँ अक्सर बैठते थे पिता और लेटे थे अपने अंतिम दिनों में...!
पिता का तकिया जिस पर सर रखने को लेकर
पूरे तेरह दिन रुआँसे हुए हम सब कई बार
बाँटते भी कैसे
एक दो तीन नहीं हम तो पूरे नौ हैं...!
इसी बीच सबकी आँख बचाकर
मैंने पिता की छड़ी पार कर दी
उन्होंने देख लिया शायद मुझे
मारे डर के वैसे ही लिपटी छड़ी से
लिपटी थी जैसे पहली बार
पिता की सुपारी चुराने पर पिता से...!

Tuesday, 3 February 2015

मेरी पाठशाला (नौ) : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

बहुत चुपचाप पांवों से चला आता है कोई दुख पलकें छूने के लिए,
सीने के भीतर आने वाले कुछ अकेले दिनों तक पैठ जाने के लिए,
मैं अकेला थका-हारा कवि कुछ भी नहीं हूं अकेला,
मेरी छोड़ी गयीं अधूरी लड़ाइयां मुझे और थका देंगी...।
हिंदी साहित्य की कहानी, कविता, निबंध, पटकथा आदि विधाओं में सिद्धहस्त उदय प्रकाश का एक संकलन है- सुनो कारीगर, जिनकी कविताएं मैं प्रायः पढ़ लिया करता हूं। साक्षात्कार के लिए उनसे दो-एक व्यक्तिगत मुलाकातें भी हो चुकी हैं। बातचीत में भी अपनी रचाओं की तरह इकहरे, लेकिन जनवादी कवि गोरख पांडेय और सांसद आदित्यनाथ को लेकर वह विवादों में भी रहे हैं। 'मोहनदास' पर भी उनसे एक बड़ी बहस को हवा मिली थी।
उनके प्रमुख कविता संग्रह हैं - सुनो कारीगर, अबूतर-कबूतर, रात में हारमोनियम, एक भाषा हुआ करती है, कवि ने कहा । उनके चर्चित कहानी संग्रह हैं - दरियायी घोड़ा, तिरिछ, और अंत में प्रार्थना, पॉल गोमरा का स्कूटर, पीली छतरी वाली लड़की, मेंगोसिल, दिल्ली की दीवार, अरेबा परेबा, दत्तात्रेय के दुःख, मोहनदास। उनके दो निबंध - ईश्वर की आँख, नई सदी का पंचतंत्र चर्चाओं में रहा है। उन्होंने - इंदिरा गांधी की आखिरी लड़ाई, कला अनुभव, लाल घास पर नीले घोड़े, रोम्यां रोलां का भारत, इतालो काल्विनो, नेरूदा, येहुदा अमिचाई, फर्नांदो पसोवा, कवाफ़ी, लोर्का, ताद्युश रोज़ेविच, ज़ेग्जेव्येस्की, अलेक्सांद्र ब्लाक आदि अनेक रचनाकारों के साहित्य के अनुवाद भी किये हैं।
उदय प्रकाश को भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार, ओमप्रकाश सम्मान, श्रीकांत वर्मा पुरस्कार, मुक्तिबोध सम्मान, वनमाली पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार,  साहित्यकार सम्मान, द्विजदेव सम्मान, पहल सम्मान,  अंतरराष्ट्रीय पुश्किन सम्मान, सार्क राइटर्स अवार्ड, कृष्ण बलदेव वैद सम्मान, महाराष्ट्र फाउंडेशन पुरस्कार आदि से सम्मानित किया जा चुका है।
उदय प्रकाश की ये बहुचर्चित पंक्तियां, जो दुष्यंत कुमार की गजल 'पीर पर्वत..' की तरह प्रायः दुहरायी जाती हैं -
आदमी मरने के बाद कुछ नहीं सोचता
आदमी मरने के बाद कुछ नहीं बोलता
कुछ नहीं सोचने और कुछ नहीं बोलने से
आदमी मर जाता है। ('सुनो कारीगर' से )


मेरी पाठशाला (आठ) : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

''वैसे तो यह संसार ही एक बहुत बड़ी चूहेदानी है। इसमें मनुष्य रूपी चूहा यदि एक बार फँस जाए तो परमपिता परमात्मा की इच्छा के बिना इससे बाहर नहीं निकल सकता। किंतु वास्तविक चूहेदानी में जब कोई चूहा फँसता है तो वह असहाय अवस्था में भी दाँत पीसता हुआ यह सोचता है कि बुरा हो इस पापी पेट की अग्नि का...! इस पातकी मनुष्य ने आज छल से मुझे फँसा दिया।'' झिलंगी खटिया पर पड़े-पड़े पंडित जी की व्याख्यानमाला चल रही थी। वह अर्धनिद्रा में निमग्न अपने नंगे पेट पर हाथ फेरते हुए बड़बड़ा रहे थे और इधर चटाई पर चावल बीनती हुई उनकी पंडिताइन मन ही मन कुढ़ रही थीं। पंडित जी कथा बाँचने की शैली में कहे जा रहे थे - ''मनुष्य चूहेदानी में फँसे चूहे को तीली कोंचकर छेड़ता है कि आज फँसे हैं बच्चू चूहेदानी में...! अरे, देखो तो... ससुरा कितना मोटा हो गया है मेरे ही घर का अन्न खा-खाकर। फिर सोचता है कि चलो अब इसको बिल्लो रानी को खिला दें...। किंतु अगले ही क्षण पुनः यह सोचने पर बाध्य होता है कि राम-राम! ... इस बेचारे को नाहक क्यों मारूँ? चूहा ही तो है। हल्दी की गाँठ-भर से संतुष्ट हो जाने वाला एक क्षुद्र प्राणी।.. अतः इसे किसी दूसरे के घर में छोड़ आता हूँ। बस...! इतना सुनते ही मूषकराज मस्त... टना-टन।''
ये हैं सुधाकर अदीब की कृति 'अथ मूषक उवाच' का अंश। मैंने सुधाकर अदीब को जितना भी पढ़ा है, पूरे अतीत-वर्तमान (आस्थापूर्वक यथार्थ और मिथक) पर गहरी दृष्टि रखते हुए लिखा जान पड़ता है। वह बड़ी कुशलता से अपने आसपास के वास्तविक चरित्रों को कल्पित पात्रों में ढालते हुए अपने सृजन को विस्तार देते हैं। मुझे खासतौर से 'मम अरण्य' को आद्योपांत पढ़ते हुए ऐसा लगा। उनकी औपन्यासिक कृतियां हैं - अथ मूषक उवाच, चींटे के पर, हमारा क्षितिज, मम अरण्य, शाने तारीख । उनका नया कहानी संग्रह है- पगडंडी। उनके अन्य चर्चित कहानी संग्रह हैं - मृगतृष्णा, देहयात्रा, उजाले अँधेरे और चर्चित कहानियां हैं नदी, नर वानर, परदा, पिल्ले। वह कविताएं भी लिखते हैं। उनके चार कविता संग्रह अब तक आ चुके हैं- अनुभूति, संवेदना, जानी जग की पीर, हथेली पर जान। 'हिंदी उपन्यासों में प्रशासन' पर उनका एक शोधग्रंथ भी है। फुर्सत के क्षणों में सुधाकर अदीब फेसबुक पर भी यदा-कदा सक्रिय रहते हैं।
सुधाकर अदीब को अमृतलाल नागर सर्जना पुरस्‍कार, पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्‍मान, शारदा सम्‍मान, साहित्यिक संघ-वाराणसी सम्मान, माटी रतन सम्मान, विशिष्ट साहित्य सम्मान, साहित्य शिरोमणि सारस्वत सम्मान आदि से सम्मानित किया जा चुका है।
(पहले चित्र में सपरिवार, दूसरा चित्र नये कहानी संग्रह 'पगडंडी' का)

मेरी पाठशाला-सात : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

कवि एवं पत्रकार मंगलेश डबराल की ये पंक्तियां बार बार पढ़ने का मन करता है -
'' मुझे अपनी कविताओं से भय होता है, जैसे मुझे घर जाते हुए भय होता है।
''अच्छे आदमी बनो - रोज मैं सोचता हूँ। क्या सोच कर अच्छा आदमी हुआ जा सकता है? अच्छा आदमी क्या होता है? कैसा होता है? किसकी तरह?
''यथार्थ! यह संसार का सबसे कठिन शब्द है। करोड़ों जीवन यथार्थ को समझते-समझाते बीत गए। यह तब भी सबसे विकट, गूढ़ और रहस्यमय शब्द है। अतियथार्थ और अयथार्थ भी दरअसल यथार्थ हैं। मानसिक यथार्थ भी भौतिक यथार्थ है। भाषा इसके सामने अपर्याप्त है। क्या 'पेड़' शब्द लिख कर हम पेड़ को पूरी तरह, उसके समूचेपन में व्यक्त कर सकते हैं? इसलिए हर अभिव्यक्ति, हर वर्णन, हर कविता हद से हद यथार्थ को कहने का एक तरीका, एक प्रयत्न है। एक संभव प्रयत्न। इसलिए मेरी कविता अपरिवर्तनशील, अकाट्य, अनश्वर और अंतिम-नहीं है।
''पहले मैं हर चीज की, हर व्यक्ति की प्रशंसा करता था। सोचता था शमशेर की तरह मैं भी चीजों का उजला पहलू ही पहले देखूँगा। पर अब मैं ज्यादातर चीजों की आलोचना और भर्त्सना करने लगा हूँ। मुझे उनका खोट ही सबसे पहले दिखता है।
''यह सभी की समस्या रहती होगी कि हम मनुष्य के रूप में कैसे हैं। मेरा व्यक्तित्व कैसा है? मुझे कैसा होना चाहिए? क्या मुझे खामोश रहना चाहिए या वाचाल? खामोश होता हूँ तो वैसी कविता नहीं लिख सकता जैसी लिखना चाहता हूँ और बातूनी होने पर खराब आदमी होने का भय है। क्या मुझे मुस्कराते रहना चाहिए या उदास बने रहना चाहिए? इसी द्वंद्व में मैं खुश होता हूँ तो उदास दिखता हूँ और उदास होता हूँ तो हास्यास्पद लगता हूँ।
''आप अचानक किसी संकट में फँस गए हैं। आपकी चोट साफ दिखाई दे रही है। काफी खून बहा होगा। कुछ खून अब भी बह रहा है। पीड़ा भी हम समझ सकते हैं। यह चोट इस बात का प्रमाण है कि आदमी अगर समझदार न हो तो उसके साथ इस समाज में क्या होता है। लेकिन चोट आपको लगी क्यों? इसकी कोई वजह साफ नहीं दिखाई देती। बस चोट ही दिखाई देती है। क्या कोई गलती आप से हुई है? आपके जीवन में कोई गड़बड़ है? विचारों में कोई दोष है? कृपया हमें बताएँ? अरे, आप तो चोट ही दिखलाए चले जा रहे हैं। क्या आप उसकी वजह नहीं जानना चाहते? बार-बार चोट दिखाते हैं पर नहीं बताते कारण; अब इस संकट का हम कैसे करें निवारण!
''मैं ऐसे छोटे-छोटे झूठ बोलता हूँ जिनसे दूसरों को कोई नुकसान नहीं होता। लेकिन उनसे मेरा नुकसान जरूर होता है। मसलन, झूठ बोलना ही एक अपने आप में बड़ा नुकसान है।
''जाने क्या है कि धोखा खाने, ठगे जाने में मुझे एक अजब-सा संतोष मिलता है। शायद थोड़ी खुशी भी होती है। कोई चीज खो जाए तो कुछ देर को अच्छा लगता है। बाजार से कोई चीज खरीदता हूँ - मसलन कमीज, जूता, बैग या माचिस - और वह खराब या नकली निकलती है तो एक राहत महसूस होती है। अमेरिका में मैंने एक बड़ा-सा महँगा-सा बैग लिया था जिसका कंधे पर लटकनेवाला फीता घर लौटते-लौटते टूट गया तो मुझे प्रसन्नता हुई कि अमेरिका की चीजें हमारी निगाह में बहुत टिकाऊ मानी जाती हैं पर वे भी जल्दी टूटती हैं। कहीं रास्ता भटक जाता हूँ तो घबराहट जरूर होती है लेकिन यह भी लगता है कि अच्छा है इस रास्ते ने मुझे ठग लिया। यानी यह एहसास कि यह वह नहीं है या था जो वह सचमुच होता या होना चाहिए था। यह 'वह' भी नहीं हैं जो 'वह' की शक्ल में प्राप्त हुआ। वह कुछ और है और उसे पाने की कोशिश में ठगा जाता हूँ। यह ठीक भी है। कोई उधार लिए पैसा लौटाता है तो अचानक लगता है कि मैंने कुछ ठगी कर ली है।''

'पहाड़ पर लालटेन', 'घर का रास्ता', 'हम जो देखते हैं', 'आवाज़ भी एक जगह है', 'रेतघड़ी', 'कवि ने कहा' आदि मंगलेशजी के चर्चित कविता संग्रह हैं। 'लेखक की रोटी', 'कवि का अकेलापन', 'एक बार आयोवा' उनके प्रमुख गद्य संग्रह हैं। उन्हें ओमप्रकाश स्मृति सम्मान, श्रीकान्त वर्मा पुरस्कार, शमशेर सम्मान, पहल सम्मान, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार सम्मान, कुमार विकल स्मृति सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। छठे-छमाही फेसबुक पर भी।

वह कहते हैं - '' इस तरह जोड़कर रख पाता हूं कि सोचता रहता हूं अक्सर पहाड़ के बारे में। मैं खुद को इस तरह देखता हूं कि जैसे पहाड़ से एक पत्थर फिसलता है और जहां तक बहाव होता है वह वहां तक पहुंच जाता है। मैं भी पहाड़ से फिसल कर इसी तरह आ गया मैदान में। मैं भी वही पत्थर हूं जो कि निकला है पहाड़ से और आज भी पहाड़ का ही है। जहां से मैं निकला हूं जरूर आज भी वहां पहाड़ में एक खाली जगह होगी...। मेरे जीवन में काफी संघर्ष रहा है खासकर आजीविका के लिए। मेरी शिक्षा भी अधूरी ही छूट गई थी। यह जो विचारधाराओं के फ्रेम टूटने की बात है, तो हां बाजार के बढ़ते प्रभाव के कारण ऐसा हुआ है और पिछले कई वर्षों से कुछ अमेरिकी चिंतक ये ‘एंड ऑफ आइडियोलॉजी’ वाली बात रट रहे हैं। दरअसल वे लोग सिर्फ आइडियोलॉजी ही नहीं इसे ‘एंड ऑफ हिस्ट्री’ और ‘एंड ऑफ सिविलाइजेशन’ भी कह रहे हैं। उनका कहना है कि आने वाले समय में सिर्फ एक ही सभ्यता बची रहेगी। खासकर सोवियत संघ के पतन के बाद से यह बात और जोर-शोर से कही जाने लगी कि अमेरिका ही सब कुछ है और वही बचा रहेगा। लेकिन अमेरिकी विचारधारा क्या है यह सब जानते हैं कि वह बाजार है।''

मन पर छायी रहने वाली उस कविता 'बची हुई जगहें' की पंक्तियां.......

रोज़ कुछ भूलता कुछ खोता रहता हूँ
चश्मा कहाँ रख दिया है क़लम कहाँ खो गया है
अभी-अभी कहीं पर नीला रंग देखा था वह पता नहीं कहाँ चला गया
चिट्ठियों के जवाब देना क़र्ज़ की किस्तें चुकाना भूल जाता हूँ
दोस्तों को सलाम और विदा कहना याद नहीं रहता
अफ़सोस प्रकट करता हूँ कि मेरे हाथ ऐसे कामों में उलझे रहे
जिनका मेरे दिमाग़ से कोई मेल नहीं था
कभी ऐसा भी हुआ जो कुछ भूला था उसका याद न रहना भूल गया ।

माँ कहती थी उस जगह जाओ
जहाँ आख़िरी बार तुमने उन्हें देखा उतारा या रखा था
अमूमन मुझे वे चीज़ें फिर से मिल जाती थीं और मैं खुश हो उठता
माँ कहती थी चीज़ें जहाँ होती हैं
अपनी एक जगह बना लेती हैं और वह आसानी से मिटती नहीं
माँ अब नही है सिर्फ़ उसकी जगह बची हुई है ।

चीज़ें खो जाती हैं लेकिन जगहें बनी रहती हैं
जीवन भर साथ चलती रहती हैं
हम कहीं और चले जाते हैं अपने घरों लोगों अपने पानी और पेड़ों से दूर
मैं जहाँ से एक पत्थर की तरह खिसक कर चला आया
उस पहाड़ में भी एक छोटी सी जगह बची होगी
इस बीच मेरा शहर एक विशालकाय बांध के पानी में डूब गया
उसके बदले वैसा ही एक और शहर उठा दिया गया
लेकिन मैंने कहा यह वह नहीं है मेरा शहर एक खालीपन है ।

घटनाएँ विलीन हो जाती हैं
लेकिन जहां वे जगहें बनी रहती हैं जहां वे घटित हुई थीं
वे जमा होती जाती हैं साथ-साथ चलतीं हैं
याद दिलाती हुईं कि हम क्या भूल गया हैं और हमने क्या खो दिया है।