Sunday, 18 January 2015

हमेशा रहेगी किताबों की जरूरत/प्रेमचंद गांधी

उस दुनिया की कल्‍पना करना कितना भयावह है, जिसे किताबों के बिना जीना पडता है। लेकिन सच्‍चाई यही है, आज भी विश्‍व की करीब पचास फीसद जनता पुस्‍तकविहीन अंधकारमय जीवन जीने के लिए विवश है। लेकिन यह भी इतना ही बडा सच है कि ऐसे अज्ञान और अंधकार भरे समाज के लिए किताब पहुंचाने की कोशिशें भी वैश्विक स्‍तर पर जारी हैं। देश में चल रहे ‘सर्वशिक्षा अभियान’ जैसे प्रयास दुनिया के तमाम निर्धन देशों में चल रहे हैं। हालांकि ऐसा मानने वाले लोगों की भी कमी नहीं है कि बिना किताबों के भी ज्ञान प्राप्‍त किया जा सकता है और यह एक हद तक सच भी है। हमारे पुरखों ने ज्ञान के नाम पर अपने समय में जो कुछ प्राप्‍त किया वह जीवनानुभवों का ही सार है, जिसके बिना किताब भी संभव नहीं होती, क्‍योंकि किताब भी आखिरकार एक व्‍यक्ति के अनुभूत ज्ञान और संचित जीवनानुभवों का ही तो समुच्‍चय है।
इस दुनिया को आज हम जिस रूप में देख रहे हैं, उसके पीछे किताबों की बहुत बडी भूमिका है। दुनिया के तमाम धर्मों में एक या अधिक किताबों की जरूरत हमेशा से रही है, जिनसे उनके अनुयायियों को धर्म की राह पर चलने के लिए एक रास्‍ता मिलता है। आज भी लोगों के लिए किताब अगर एक पवित्र किस्‍म की चीज है तो वह इसीलिए कि प्रारंभ में किताब का अर्थ धार्मिक किताब ही होता था, जिसके पैर से छू जाने या गिर जाने से अनर्थ की आशंका होती थी और धर्म का अपमान लगता था। मजहबी किताबें दुनिया में सबसे ज्‍यादा बिकने वाली किताबें हैं और शायद हमेशा रहेंगी। वजह यह कि पढना आये या ना आये अपने धर्म की किताब हर व्‍यक्ति घर में जरूर रखना चाहता है। सुख-दुख के अवसरों पर इनकी महत्‍ता रहती है, घर को ये एक किस्‍म की पवित्रता प्रदान करती हैं। व्‍यक्ति को ऐसी किताबों के अध्‍ययन और श्रवण से आत्मिक संतोष मिलता है। इसीलिए सभी धर्मों में आप देखेंगे कि धार्मिक किताबों के समय-समय पर पाठ आयोजित करने की परंपरा है, फिर वह चाहे गुरूग्रंथ साहिब का पाठ हो या रामायण का, कुरानख्‍वानी हो या बाइबिल का पाठ।
धार्मिक किताबों का महत्‍व इस मायने में स्‍वीकार किया जाना चाहिए कि इन्‍हीं की वजह से शिक्षा का प्रसार भी हुआ। आज भी बहुत से लोग अगर लडकियों को पढने स्‍कूल भेजते हैं तो यही समझकर कि चलो कम से कम वह कुरान, रामायण या गुरूग्रंथ साहिब का पाठ तो कर लेगी और अपने बच्‍चों को ठीक-ठाक संस्‍कार दे सकेगी। लेकिन किताबों की दुनिया का यह एक बहुत बडा सच है कि यह एक प्रकार से मनुष्‍य में संक्रामक रोग भी पैदा करती है, अर्थात जिसे पढना आ गया वह एक के बाद दूसरी किताब पढने की ओर आगे बढता है। और पढने की इस चाहत ने ही किताबों की दुनिया को परवान चढाया है। जिन लडकियों को धार्मिक किताबें पढने के लिए पाठशाला भेजा गया, वे आगे चलकर दूसरी किताबें पढकर खुद लेखिकाएं बन गईं, ऐसे हमारे समाज में सैंकडों उदाहरण हैं।
आज के तेजी से बदलते संचार क्रांति के युग में बहुत से लोग कहते हैं कि अब किताबें अप्रासंगिक हो जाएंगी, वजह यह कि किताबों की जगह लेने के लिए बाजार में बहुत सी चीजें आ गई हैं और किताबों का स्‍वरूप भी बदल गया है। सीडी, डीवीडी, ई-बुक, और इसी किस्‍म की बहुत सी ईजादों ने किताब का स्‍थान लेने की कोशि की है, लेकिन पश्चिम के अघाये हुए समाज की मानें तो आज भी पन्‍ने पलटकर, कहीं भी बैठकर, लेटकर, यात्रा करते हुए यानी किसी भी तरह किताब पढने से बेहतर कुछ नहीं है। आधुनिक संसाधनों ने जो सबसे बडा काम किया वो यह कि किताबों की उम्र और पढने का दायरा बढा दिया। आज दुनिया के लाखों पुस्‍तकालय डिजिटलाइज्‍ड हो रहे हैं, आनलाइन हो रहे हैं, हजारों की तादाद में ऐसी वेबसाइटें मौजूद हैं जिन पर दुनिया भर की असंख्‍य किताबों के बारे में जानकारी ही हासिल नहीं की जा सकती, बल्कि डाउनलोड कर किताबें पढी भी जा सकती हैं। अभी तक अप्राप्‍य और दुर्लभ समझी जाने वाली असंख्‍य किताबें आज इंटरनेट की दुनिया में या तो उपलब्‍ध हैं या ऐसा करने के प्रयास वैश्विक स्‍तर पर चल रहे हैं। इस तरह संचार क्रांति किताबों की दुनिया के लिए वरदान सिद्ध हो रही है।
दुनिया बदल रही है और इस बदलती हुई दुनिया की यह एक बहुत बडी सच्‍चाई है कि दुनिया में आज मौजूद अनेक समस्‍याएं अज्ञान और अशिक्षा के कारण हैं। फिर वो चाहे आतंकवाद हो या मजहबी कटटरता के कारण पनपने वाला सांप्रदायिक विद्वेष, इन सबकी जड में अशिक्षा और अज्ञान ही है। किताबों की दुनिया ही हमारे समाज को बताती है कि सब धर्म एक परमात्‍मा तक पहुंचने के अलग-अलग रास्‍तों के सिवा कुछ नहीं हैं, मनुष्‍य का एकमात्र धर्म है मानवता की सेवा और सब धर्मों का मूल मकसद है इस धरती को सुंदर बनाना, मानव मात्र को सुखी बनाना। प्रत्‍येक धर्म की किताब यही सिखाती है, लेकिन कुछ लोग हैं जो उनका अलग अर्थ निकालकर लोगों को एक दूसरे खिलाफ भडकाते हैं और व्‍यर्थ में खून बहाते हैं। इस प्रक्रिया में ना जाने कितनी सभ्‍यताएं नष्‍ट हो चुकी हैं और नष्‍ट होंगी, फिर किताबें ही बताएंगी कि क्‍यों वे सभ्‍यताएं नष्‍ट हुईं।
एक फ्रांसिसी दार्शनिक ने म्रत्‍यु शैया पर कहा था, ‘जो कुछ हम जानते हैं वह बहुत थोडा है, जो नहीं जानते वह बहुत अधिक है।‘ किताबों की दुनिया हमारे लिए उस अजाने संसार के दरवाजे खोलती है, जिसे हम एक जीवन में प्राप्‍त नहीं कर सकते। प्रत्‍येक विद्धान, मनीषी यही कहता है कि मैं तो एक विद्यार्थी मात्र हूं। किताबें ही यह विनम्रता का बोध पैदा करती हैं और मनुष्‍य को महामानव बनाती हैं। मनुष्‍य जीवन में किताबों का महत्‍व सदा से किसी ना किसी रूप में मौजूद रहा है और धरती के नष्‍ट होने तक रहेगा। इस दुनिया में किताब की ताकत का अंदाज आप इसी से लगा सकते हैं कि बहुत से आततायी और हिंसक लोगों ने सिर्फ डर की वजह से न केवल किताबें, बल्कि पूरी की पूरी लाइब्रेरियां जला डालीं।

Thursday, 15 January 2015

जंगल-मंगल/जयप्रकाश त्रिपाठी

                                ()
जो कुछ है, इतना बस है, लगता है, ये भी बरबस है
सब झूठे-झूठे शब्दों-सा अब भी वो क्यों जस-का-तस है
जैसे हर कोई घिरा हुआ, जो बचा हुआ, क्यों गिरा हुआ
जंगल-जंगल जन दुखियारे, बस मंगल-मंगल सर्कस है
                            ()

Wednesday, 14 January 2015

हमारे समाज में 'लड़की' समझ से परे की चीज/फहमीदा रियाज

पाकिस्तान के सिंध राज्य में रहने वाली तरक्की पसंद अदीबा, शायरा फहमीदा रियाज 'गुफ्तगू' से बातचीत में बताती हैं- 'जो मन में आता है लिख देती हूं. बाद में कई बार लोग बुरा-भला भी कहते हैं जिससे तकलीफ़ होती है. एक लड़की होना हमारे समाज में एक ऐसी चीज़ है जो समझ से परे है. लड़कियों को इंजॉय करने की समाज इजाज़त नहीं देता. हिन्दोस्तान में जितनी आज़ादी औरतों को हासिल है, पाकिस्तान में नहीं है.
मैं तो कुछ लिख भी देती हूं, लेकिन समाज अभी भी दकियानूसी दौर में जी रहा है. ... मैं हिन्दोस्तान इसलिए आयी थी कि यह एक सेक्युलर मुल्क है, लेकिन यह सब ख्वाब था. मैंने यहां के सांप्रदायिक माहौल पर एक नज़्म ‘नया भारत’  लिखा. इस पर इतना बड़ा हंगामा हुआ कि पूछिये मत. दो दिन बाद मेरी फ्लाइट थी. मैं सोच नहीं पा रही थी कि क्या करूं. फिर मैं पाकिस्तान वापस चली गयी. वह नज़्म हमें कुछ कुछ याद आ रहा है.....नया भारत
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले/अब तक कहां छुपे थे भाई।
वह मुरखता वह घामड़पन,/जिसमें हमने सदियां गंवायी।
आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे,/अरे बधाई, बहुत बधाई।
प्रेत धर्म का नाच रहा है, कायम हिन्दू राज करोगे।
सारे उलटे काज करोगे, अपना चमन ताराज़ करोगे।
तुम भी बैठे राज करोगे,/सोचा कौन है हिन्दू कौन नहीं है।
तुम भी करोगे फतवा जारी,/अरे बधाई बहुत बधाई।
एक जाप सा करते जाओ,/बारम-बार यही दुहराओ।
कितना वीर महान था भारत/कैसा आलीशान था भारत।
प्रेत धर्म का नाच रहा है/अरे बधाई बहुत बधाई
'कुछ लोग है जिन्हें असल मज़हब के मायने नहीं पता है. इन लोगों को कौन बताये कि मज़हब लोगों को अलम करने के लिए नहीं है, बल्कि लोगों को जोड़ने के लिए आया है. यही सोच मार्क्स का भी है सांप्रदायिक सदभाव और मार्क्सवाद असल में एक ही चीज़ है. दोनों इन्सान को इन्सान बनाना सिखाता है और समाजी बराबरी की सीख देता है.
'अफगानिस्तान में तालिबान की ज़ालिमाना हरक़त को पूरी दुनिया जानती है. उन्होंने वहां के तारीख को मिटाना चाहा. ‘बुद्ध’ जो शान्ति की अलामह है, उनकी मूर्ति को खाक में मिला दिया. इस पर मैंने एक नज़्म लिखी थी. मोजस्सेमा गिरा  मगर ये दास्तां अभी तमाम तो नहीं हुयी दिया कई बरस तैय हुये. लिखेगा दिन को आदमी/बरंगे आबो जुस्तजू/ वह हुस्न की तलाश में/वह मुन्सफ़ी की आस में/खुली है सड़क खुल गयी दुकां में कितना माल है/दुकां में दिलबरी नहीं/मकां में मुन्सिफ़ी नहीं/ अभी तो हर बला नयी/अभी है काफ़ले रवां/गुलों मे नस्ब है निशा।/मुजस्सेमा गिरा मगर/जमीं पे ज़िन्दगी दुकां के नाम पर नहीं हुयी/हमारी दास्तान अभी तमाम पर नहीं हुयी.'

Monday, 12 January 2015

थोथे मुद्दे छोड़े समाज/प्रीतीश नंदी

आप ऐसे कितने हिंदुओं से रोज मिलते हैं, जो बाहर जाकर मुस्लिमों और ईसाइयों का धर्मांतरण करना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ये लोग भारत को लेकर उनके मन जो तस्वीर है उसके लिए खतरा हैं? आप ऐसे कितने मुस्लिमों को जानते हैं, जो पाकिस्तान के प्रति वफादारी का दावा करते हैं और आतंकी हमलों का समर्थन करते हैं? मैं मोहमेडन स्पोर्टिंग फुटबॉल टीम को समर्थन देने या पाकिस्तानी पॉप गायक व अभिनेता आतिफ असलम का प्रशंसक होने की बात नहीं कर रहा हूं.

धर्म परिवर्तन : आप ऐसे कितने सिखों को जानते हैं, जो 1984 के दंगों को लेकर अब भी इतने नाराज हैं कि वे अलग होकर नया खालिस्तान बनाना चाहते हैं, भारत से खूनी बदला लेना चाहते हैं? हां, वे न्याय जरूर चाहते हैं. वे दोषियों को दंडित होते देखना चाहते हैं, लेकिन ये दोनों समान बातें नहीं हैं. आप विदेशी मिशनरियों सहित ऐसे कितने ईसाइयों से मिले हैं, जिन्होंने पैसे या अन्य किसी चीज का लालच देकर आपको ईसाई बनाना चाहा? हां, यदि आप किसी ईसाई स्कूल में पढ़ें हों तो आपको नैतिक शिक्षा की कक्षा में हाजिर रहना पड़ता है, जिसमें बाइबल की कहानियां सुनाई जाती हैं. हालांकि, आपके सामने ऐसे स्कूल में न जाने का विकल्प हमेशा खुला होता है. ठीक वैसे जैसे मुस्लिमों के सामने मदरसे में न पढ़ने का विकल्प मौजूद होता है.
भारत में धर्म हमेशा से व्यक्तिगत चुनाव का विषय रहा है. इस देश में रहने की सर्वश्रेष्ठ खासियतों में से एक यह है. यदि आप किसी चीज का चुनाव नहीं करते तो किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह आपको उन चीजों में भरोसा करने पर मजबूर करे. जिन लोगों को मैं या आप जानते हैं अथवा रोज की जिंदगी में मिलते हैं, अपने चुनने के अधिकार का उपयोग करते हैं. जहां तक आस्था की बात है और ऐसा वे बहुत नामालूम तरीके से, सरलता और पूरी गरिमा के साथ करते हैं. उन्होंने हमेशा से ऐसा ही किया है. मेरे जैसे कुछ लोगों ने आस्था से मुक्त रहने का चुनाव किया, क्योंकि धर्म कोई ऐसी चीज नहीं है कि जिससे हम अपने आप को परिभाषित करते हैं.
हम तो अपने विचारों, अपने सपनों या अपनी उम्मीदों से परिभाषित होते हैं. हम जो होना चाहते हैं, उसी से परिभाषित होते हैं. मैं कोलकाता में पला-बढ़ा हूं, जहां क्रिसमस की शाम को हर कोई सेंट पॉल कैथेड्रल में जाता था. हिंदू, मुस्लिम, सिख, यहूदी, कभी-कभार कोई पारसी या आर्मेनियाई. चीनी लोग भी सर्विस में शामिल होते थे, इसलिए नहीं कि उन्हें कोई लालच दिया जाता था बल्कि वे इसलिए जाते थे, क्योंकि वहां दिए जाने वाले शांति और सद्‌भावना के संदेश का अनुभव उन्हें आनंदित करता था. ठीक वैसे जैसे पश्चिम बंगाल में हर कोई दुर्गा पूजा मनाता है और फिर धर्म कोई भी क्यों न हो माता के पैरो में गिर जाता है. कुछ महान शास्त्रीय संगीतकारों व गायकों को निकट से जानने का सौभाग्य मुझे मिला है. वे काली माता के भक्त थे, फिर चाहे वे धर्म से निष्ठावान मुस्लिम ही क्यों न हों. यह उस समय का जादू था. आपने चाहे किसी भी धर्म में जन्म लिया हो या आप किसी भी धर्म के क्यों न हो, लेकिन आप जिस चीज में विश्वास करते थे, वह आपका अपना चुनाव होता था. अपनी पसंद होती थी.
कोलकाता में सांप्रदायिक दंगे दुर्लभ ही थे. एक बार ऐसे ही दंगों के दौरान डागर बंधु (यदि मुझे सही याद  रहा है) ठुमरी गाने के लिए जा रहे थे. जैसा कि उन दिनों प्रचलन था, संगीतकार (चाहे कितने ही प्रसिद्ध, कितने ही खास क्यों न हो) अपने वाद्य साथ ले जाते थे, तो वे भी ले जा रहे थे. जल्दी ही उन्होंने खुद को दो हिंसक गुटों के बीच पाया. दोनों पक्षों ने जैसे ही उन्हें वाद्य-यंत्रों के साथ देखा वे थम गए व अलग हो गए और उन्हें संगीत सम्मेलन में जाने के लिए रास्ता दे दिया. कलाकारों के प्रति लोग ऐसा सम्मान व्यक्त करते थे. धर्म तो टकराव का कोई फौरी कारण हुआ करता था, जो यह देखते हुए असामान्य भी नहीं कहा जा सकता कि विभाजन में बंगाल के दो टुकड़े हुए थे पर धर्म आधारित विभाजन से गुजरने के बाद भी दोनों समुदायों में धर्म के मामले में शायद ही कभी संघर्ष हुआ हो.
बांग्लादेश, पाकिस्तान से अलग हो गया. धार्मिक समानता उन्हें जोड़कर नहीं रख सकी. नए राज्य को जिस चीज ने एकजुट रखा, वह था बांग्ला भाषा से उनका प्रेम. इसी प्रेम ने हिंदू और मुस्लिमों को एक रखा. यदि आप उथल-पुथलभरे उन दिनों का काव्य पढ़ें, आप इस्लाम को वहां नदारद पाएंगे. केवल आज़ादी के लिए अभिभूत कर देने वाला प्रेम वहां मौजूद था. आज़ादी की इसी तलाश ने पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बांटकर बांग्लादेश का निर्माण किया. धर्म, जिसके आधार पर पाकिस्तान बना था, हाशिये पर रह गया. मेरे माता-पिता विभाजन के भयावह दंगों के साक्षी बने थे, लेकिन मैंने कभी अपने बचपन में उन पर उन्हें चर्चा करते नहीं सुना. वे इसे लब्जों पर न लाई जा सकने वाली ऐसी त्रासदी समझते थे, जिसमें न तो कोई हीरो था न कोई विलैन. उस जमाने के सारे बंगाली साहित्य का यही रुख था.
न तो हिंदुओं ने और न मुस्लिमों ने ऐसा कुछ लिखा, जिसमें हिंसा के लिए दूसरे समुदाय को जिम्मेदार ठहराया हों. दोष दिया हों. उन्होंने त्रासदी को त्रासदी की तरह देखा. धर्म की इसमें कोई भूमिका नहीं थी. यही वजह रही कि जब बांग्लादेश जन्म ले रहा था तो सीमा के इस तरफ हर बंगाली ने फिर चाहे हिंदू हो या मुस्लिम, संघर्ष को समर्थन दिया. आज़ादी बड़ा उद्‌देश्य था. ठीक वैसे जैसे आज हममें उम्मीद होनी चाहिए जब आज हम भारत को उस भ्रष्टाचार व अपराध से मुक्त करने के निर्माण-पथ पर आगे बढ़ रहे हैं, जिसका कांग्रेस प्रतीक बन गई थी. क्या वाकई इसका कोई महत्व है कि निर्माण कौन कर रहा है?
क्या हमें मूर्खतापूर्ण, अप्रासंगिक मुद्‌दों को लेकर रास्ते से भटकने की बजाय इस व्यापक बहस पर केंद्रित नहीं होना चाहिए कि भारत के लिए वास्तविक बदलाव किस चीज से आएगा? ये निरर्थक मुद्‌दे हमारा भविष्य परिभाषित करने में कोई भूमिका निभाने से तो रहे. किसे परवाह है कि हमारे स्कूलों में संस्कृत पढ़ाई जाती है या नहीं. कोई मूर्ख यदि आईएसआईएस के साथ संघर्ष में शामिल होने विदेश जाता है तो कैसी चिंता? इसकी बजाय आइए, हम यहां आतंकवाद से लड़ने पर ध्यान केंद्रित करें.
इससे भी महत्वपूर्ण बात तो यह है कि हम महिलाओं के साथ सद‌व्यवहार करना सीखें. आइए, हम अपने बच्चों की तस्करी होने से रोकें. घोर भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए संघर्ष करें. आइए, हमारे सपनों के ऐसे भारत का निर्माण करें, जहां लोग गरीबी और पिछड़ेपन से मुक्त हों, जहां पर्यावरण का सम्मान किया जाता हो और उसी तरह प्रतिभाओं का भी, फिर वह कहीं से भी क्यों न आती हों. तो आइए, अधिक वृहद विचार-विमर्श पर ध्यान केंद्रित रखें. सच्चा बदलाव तो वही है. धर्म अपनी परवाह खुद कर लेगा.
('रविवार' से साभार)

Sunday, 11 January 2015

एक दिन अपनी डायरी में अन्ना कामीएन्सका ने लिखा

वह पूरी सम्पूर्णता में ग़रीब थी. वह फ़क़त अपनी तस्बीह के साथ गयी. वह अपने पीछे काली लाख और जर्जर मिसल वाले बेंत के छप्पर की एक जायदाद छोड़ गयी जिसमें पुराने तरीके से पापों का हिसाब किताब करने के तरीके थे मिसाल के तौर पर नौकरों और गुलामों से कैसा सुलूक किया जाए....
इतना तो है हमें इस बाबत चिंता करने की ज़रुरत ज़रा कम है.
लड़खड़ाती चलती हूँ कविताओं के सहारे.
कवितायेँ समय के पदार्थ से क्रिस्टलों में बदलती हैं. क्षणों का एक गुच्छा, टंगा हुआ झूलता मधुमक्खी के  छत्ते के मुंह से.
तली तक बैठने में लम्बा वक़्त लेता है कविता का नमक.
हम सब के पास अपना अध्यात्म होता है, चाहे हमें इसका भान हो ही नहीं या हम ज़रा भी शंका न करें उसकी बाबत.
'' मेरे सपनों में एक बार फिर से पानी.साफ़, शफ्फाफ़, बालू पर बहता, इतना पारदर्शी कि आप तल पर तैर रही सर्पिल मछलियों तक को देख सकते हैं.
कविताओं की कतरनों और इस्तेमाल न किये गए विचारों से भरा एक घर. विचारों का एक घोंसला, शब्द के मेहनतकश बढ़ई की छीलनें. झाग की तरह उनकी प्रचुरता, मेरे अस्तित्व के चारों तरफ, ज़रुरत से ज़्यादा खौलता पानी. मुझे नहीं मालूम क्यों इस या उस कविता को मैंने सज़ा दे दी खामोश हो रहने, कुछ न होने की; मैंने इसे क्यों लिखा, उस विचार को क्यों नहीं. सब झाग है.
जब सब शांत हो जाता है
अनंत भी आराम करता है
और चीज़ें हमारे लिए और नहीं रोतीं
मैंने चांदी के मुखौटे पहने देखा अपने मृतकों को.
हम “इस संसार” और “अगले संसार” की बातें करते हैं. “आस्तिक” वे होते हैं जो कथित रूप से“अगले संसार” पर, उसकी वास्तविकता पर भरोसा करते हैं.    
मैं “अगले संसार” पर यकीन नहीं करती. संसार एक है. एक सच्चाई. मृत्यु अगले संसार में जाने का रास्ता नहीं है कोई, हो सकता है वह हो अंधी आँखों का खुल जाना.''
(कबाड़खाना से साभार उद्धृत)

महिला का अपने शरीर पर कितना अधिकार/उमा चक्रवर्ती

इस साल की शुरुआत में कुछ लोगों ने एक महिला के उस अधिकार पर कुछ देर के लिए सोचा जो विरोध जताने के लिए खाना नहीं खा रही हैं.
जीवन के हक़ के लिए लड़ रही मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता शर्मिला इरोम पिछले 14 साल से भूख हड़ताल पर हैं.
लेकिन खाने से इनकार कर एक महिला अपने समाज, देश और राज्य को क्या संदेश देना चाहती हैं?
इरोम शर्मिला ने पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में सशस्त्र सेनाओं के विशेषाधिकारों से संबंधित विवादास्पद क़ानून के ख़िलाफ़ वर्ष 2000 में भूख हड़ताल शुरू की थी.
इन अधिकारों के तहत सैन्यबल बग़ैर किसी वारंट के किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार कर सकते हैं और कुछ विशेष हालात में तो उन्हें गोली मारने का भी अधिकार है.
मणिपुर लंबे समय से चरमपंथी हिंसा और अलगाववादियों से प्रभावित रहा है. अलगाववादी निश्चित तौर पर मौत के लिए ज़िम्मेदार हैं, लेकिन यह क़ानून भारत के एक हिस्से को युद्ध प्रभावित क्षेत्र की तरह दिखाता है.
भूख हड़ताल शुरू करने के साथ ही उन्हें गिरफ़्तार कर अस्पताल में ले जाया गया और पिछले 14 सालों से हिरासत में रखते हुए उन्हें नाक में पाइप के रास्ते तरल भोजन दिया जा रहा है.
पिछले साल अदालत ने उन पर लगे ‘ख़ुदकुशी की कोशिश के आरोपों’ को ख़ारिज़ कर दिया और उनकी रिहाई के आदेश दिए. लेकिन उन्हें कुछ ही देर बाद फिर से गिरफ़्तार कर लिया गया.
हर साल जनवरी में उनकी रिहाई और फिर गिरफ़्तारी का खेल खेला जाता है. इसी हफ़्ते एक बार फिर यही रस्म दोहराई गई.
ख़बरों में इसका ज़िक्र हुआ और फिर बहुत जल्द ही भुला भी दिया गया. लेकिन मैं इसे नहीं भूली, ख़ासकर नवंबर 2010 में शर्मिला की मां से मुलाक़ात के बाद.
शर्मिला की मां का दुख समझने के लिए उनके मुझसे कहे ये शब्द काफ़ी हैं, ‘‘एक दिन मैं बैठकर ख़बरें सुन रही थी और एक अधिकारी ने कहा कि वे सैन्यबल विशेषाधिकार क़ानून को कभी नहीं हटाएंगे. उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा और मैं बहुत निराश हुई. मैंने ख़ुद से कहा कि इसका मतलब हुआ कि मेरी बेटी कभी नहीं खा पाएगी.’’
मेरे लिए वो विशेष महिला हैं, जो अपनी बेटी से इसलिए नहीं मिलतीं, क्योंकि वो जानती हैं ऐसा करने पर शर्मिला रोएगी. और वो नहीं चाहतीं कि उनकी बेटी किसी तरह से कमज़ोर हो.
इरोम शर्मिला का विरोध उनके साहस का अविश्वसनीय नमूना है. उन्हें जीवन की मूलभूत चीजों से वंचित किया जा रहा है, लेकिन सरकार का मानना है कि कोई संकट नहीं है, क्योंकि वे उन्हें ज़बरन खाना दे रहे हैं और उन्हें ज़िंदा रखे हुए हैं.
लेकिन शर्मिला के शरीर को तरल भोजन के इंजेक्शनों के सहारे चलाया जा रहा है और हर कोई जानता है कि ज़िंदा रहने का ये कोई तरीक़ा नहीं है.
शर्मिला उन सिद्धांतों की प्रतिमूर्ति बन गई हैं जिनके लिए वह संघर्ष कर रही हैं. शर्मिला का कहना है कि लोगों को सैन्य विशेषाधिकार क़ानून के तहत जीवन जीने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए.
सरकारों का ध्यान आकर्षित करने के लिए वह अपने शरीर का इस्तेमाल कर रही हैं. अगर आप इस तरह की व्यवस्था में रह रहे हैं तो आप वास्तव में अपने मानव होने का आधार खो देते हैं, अपने देश में स्वतंत्रता और सुरक्षा का अधिकार.
मीडिया में महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक़ दिए जाने पर ज़ोरदार बहस होती है. कहा जाता है कि सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के साथ पुरुषों जैसा ही बर्ताव किया जाना चाहिए, उनके अधिकार एक जैसे होने चाहिए.
लेकिन अगर महिलाओं को एक जैसी तवज्जो दी जाएगी तब किसी भी तरह की हिंसा बर्दाश्त नहीं होगी और बहस तक की ज़रूरत नहीं होगी.
महिला सुरक्षा में सरकार की भी अहम भूमिका है. सरकार का मतलब सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय समझौते और राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग करना ही नहीं है.
उसका उत्तरदायित्व घर के अंदर, बाहर, दफ़्तरों, फैक्ट्रियों, स्कूल और कॉलेज में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी होना चाहिए.
हाल ही में नसबंदी शिविरों में महिलाओं की मौत की घटना को ही लीजिए. बड़े पैमाने पर हुए नसबंदी ऑपरेशनों में कई महिलाओं की जान चली गई. वहाँ क्या ग़लत हुआ?
सरकार कह रही है कि दवाएं नकली थी या सवाल उठाए जा रहे हैं इतने ऑपरेशन एक दिन में कैसे किए गए.
लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं पर कोई बात नहीं कर रहा? कोई नहीं पूछ रहा कि आबादी नियंत्रण का एकमात्र हल नसबंदी ही क्यों है और वह भी सिर्फ़ महिलाओं के शरीर पर ही क्यों?
फिर से बहस शर्मिला के तर्क़ पर आकर ठहर गई. महिला का अपने शरीर पर अधिकार है या नहीं और क्या वह इसे विरोध प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल कर सकती है.
(बीबीसी से साभार)

Thursday, 8 January 2015

नई सरकार, अच्छे दिन और मुगालते / कुलदीप कुमार

जिन लोगों को यह मुगालता था कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े अनेक संगठन हाशिये पर चले जाएंगे क्योंकि मोदी को पता है कि आर्थिक विकास तभी संभव है जब समाज में शांति हो, अब उनका यह मुगालता दूर हो जाना चाहिए। अरुण शौरी और मधु किश्वार जैसे मोदी के प्रशंसकों का कुछ अन्य कारणों से मोहभंग हो रहा है और ‘मोदीनामा’ लिखकर और मोदी के पक्ष में धुआंधार प्रचार करके (कु)ख्याति अर्जित करने वाली मधु किश्वार को अब यह संदेह होने लगा है कि मोदी पर काला जादू कर दिया गया है। जब विकासशील समाज अध्ययन केंद्र जैसे प्रतिष्ठित शोध संस्थान में प्रोफेसर के पद पर आसीन व्यक्ति काले जादू की बात करे तो स्वाभाविक तौर पर आश्चर्य तो होता ही है।
इस समय मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी में ज़िम्मेदारी के पदों पर बैठे लोग रोज जिस तरह के बयान दे रहे हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं कि ‘सामाजिक समरसता’ और ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ की बातें करने वाले इन लोगों के असली उद्देश्य इनसे ठीक उल्टे हैं। अगर देश की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ‘गीता’ को ‘राष्ट्रीय ग्रंथ’ घोषित कराना चाहती हैं और कह रही हैं कि इस बारे में केवल औपचारिक घोषणा होना ही बाकी है, तो इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि आज भी देश में संविधान का शासन है और संविधान भारत को एक “प्रभुसत्तासंपन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक गणतन्त्र” के रूप में परिभाषित करता है। भले ही आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद का लक्ष्य भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना है, लेकिन अभी वह बना नहीं है। संविधान का पालन करने की शपथ लेकर मंत्री बनने वालों को इस बुनियादी सचाई को भूलना नहीं चाहिए। लेकिन हकीकत यह है कि पिछली मई में सत्ता में आने के बाद से भारतीय जनता पार्टी के नेता और समर्थक कुछ इस तरह का बर्ताव कर रहे हैं जैसे इतिहास में पहली बार किसी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत मिला हो। इन दिनों नरेंद्र मोदी की आलोचना करने को प्रधानमंत्री पद का अपमान बताया जाता है। ये लोग भूल जाते हैं कि भारतीय संसदीय लोकतन्त्र के इतिहास में जैसा जनादेश राजीव गांधी को मिला था, वैसा आज तक किसी को नहीं मिला। लेकिन जब भाजपा नेता संसद में और संसद के बाहर ‘गली-गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है’ के नारे लगाते थे, तब किसी को यह ख्याल नहीं आया कि यह प्रधानमंत्री पद का अपमान है। न तब जब लालकृष्ण आडवाणी मनमोहन सिंह को देश का सबसे ‘निकम्मा प्रधानमंत्री’ बताया करते थे।
बहरहाल, संविधान के अनुसार देश के सभी नागरिक समान हैं चाहे उनके धर्म, जाति, क्षेत्र, लिंग और समुदाय कुछ भी क्यों न हों। अस्पृश्यता कानूनन अपराध है क्योंकि उसका आधार जन्म के आधार पर किसी जातिविशेष को नीच और अछूत मानना है। इसी तरह लिंग के आधार पर भी किसी को श्रेष्ठ या हीन नहीं माना जा सकता। लेकिन ‘गीता’ में कृष्ण अर्जुन से क्या कहते हैं? “मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्‌।।” (हे अर्जुन, मेरा आश्रय करके स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र अथवा अंत्यज आदि जो पापयोनि वाले हैं, वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं।) यह कहने से पहले वे अर्जुन को यह बता चुके होते हैं:  "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः" (गुण कर्म के विभाग से मैंने ही चारों वर्णों को उत्पन्न  किया है). तो क्या हम अब मान लें कि  वर्णव्यवस्था ईश्वरीय विधान है और स्त्रियां, वैश्य एवं शूद्र पापयोनि में जन्मे हीन  लोग हैं?
भारत का राष्ट्रीय ग्रन्थ उसका संविधान है, किसी अन्य ग्रन्थ को उसकी जगह लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती। शब्दछल का सहारा लेने में माहिर भाजपा के नेता अब यह दावा भी कर रहे हैं कि ‘गीता’ किसी एक धर्म से जुड़ी पुस्तक नहीं है। वह तो सार्वजनीन है और दर्शन एवं कर्मयोग का ग्रंथ है। सुषमा स्वराज तो उसके जरिये अनेक मानसिक परेशानियों का इलाज करने की वकालत भी करती हैं। लेकिन क्या कोई बताएगा कि यदि ‘गीता’ हिन्दू धर्म से जुड़ा ग्रंथ नहीं है तो फिर अदालतों में सिर्फ हिन्दू ही उस पर हाथ रख कर कसम क्यों खाते हैं, किसी और धर्म के अनुयायी क्यों नहीं?
शब्दछल के सहारे का एक और उदाहरण है धर्मपरिवर्तन को ‘पुरखों के घर वापसी’ का नाम देना। एक समय था जब विश्व हिन्दू परिषद इसे ‘परावर्तन’ कहा करती थी। आरएसएस के इस संगठन की भारत के अलावा लगभग नब्बे देशों में शाखाएँ हैं। संघ की तरह ही इसका अंतिम लक्ष्य भी भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ में तब्दील करना है। आगरा में जिस तरह से स्लम में रहने वाले गरीब मुसलमानों को लोभ-लालच देकर उनकी ‘घर वापसी’ का नाटक किया गया, वह उन सभी नाटकों की एक कड़ी भर है जो पिछले दो साल से उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, मेरठ, हापुड़ और अलीगढ़ जैसे अनेक जिलों में खेले जा रहे हैं। इन सबका उद्देश्य विधानसभा चुनाव के पहले राज्य में सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण है। वरना ईसाइयों के पवित्र त्यौहार क्रिसमस के दिन अलीगढ़ जैसे सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील शहर में बड़े पैमाने पर मुसलमानों के सामूहिक धर्मपरिवर्तन का कार्यक्रम बनाने का मतलब क्या है?
यहाँ यह याद दिलाना अप्रासंगिक न होगा कि जनवरी 1989 में हुए धर्म संसद के अधिवेशन में पारित प्रस्ताव में विस्तार से उन कदमों की चर्चा की गई थी जो भारत में ‘हिन्दू राष्ट्र’ की ‘पुनर्स्थापना’के लिए उठाए जाने आवश्यक हैं। इस प्रस्ताव का अंतिम बिन्दु था: “राष्ट्रीय शिक्षा नीति में नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा के साथ-साथ संस्कृत और योग की अनिवार्य शिक्षा और प्रशिक्षण शामिल किए जाएँ।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुझाव पर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया है। इस  पर किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन यह संयोगवश नहीं है कि इसी के साथ-साथ केन्द्रीय विद्यालयों से जर्मन हटाकर संस्कृत को ले आया गया है।
यह भी अकारण नहीं है कि मोदी सरकार की एक मंत्री  उन लोगों के लिए गाली का प्रयोग करती हैं जो ‘रामजादों’ के श्रेणी में नहीं आते। यह भी अकारण नहीं है कि भाजपा के सांसद साक्षी महाराज अपने दिल की बात जुबान पर ले आते हैं और महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को ‘राष्ट्रभक्त’ बताते हैं। आज संघ कुछ भी कहे, वह अपने उस इतिहास को मिटा नहीं सकता जो महात्मा गांधी के प्रति घृणा से भरा हुआ है। यह भी अकारण नहीं है कि भाजपा की उत्तर प्रदेश राज्य इकाई के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन लक्ष्मीकांत वाजपेयी ताजमहल को हिन्दू राजा का महल बताते हैं और वही (कु)तर्क दुहराते हैं जो लगभग छह दशक पहले पुरुषोत्तम नागेश ओक ने दिये थे और जिन्हें हिंदुत्ववादियों के अलावा दुनिया में कोई नहीं मानता। ओक अपने नाम के साथ प्रोफेसर लगाया करते थे और अपना परिचय विश्व इतिहास पुनर्लेखन संस्थान के अध्यक्ष के रूप में देते थे। उनके अनुसार कुतुब मीनार विष्णुध्वज है और लालकिला एवं जामा मस्जिद जैसी सभी इमारतें हिंदुओं द्वारा बनवाई हुई हैं।
इन ‘अच्छे दिनों’ में जब देश का प्रधानमंत्री स्वयं प्राचीन भारत में आज से भी अधिक उन्नत विज्ञान और चिकित्सा होने का दावा कर रहा है, जब भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का अध्यक्ष कह रहा है कि रामायण एवं महाभारत जैसे महाकाव्यों में वर्णित सभी घटनाएँ वास्तव में ठीक वैसे ही घटी थीं, तब यदि ओक की मान्यताओं को एक वरिष्ठ राजनीतिक नेता साम्प्रादायिक राजनीति करने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है तो इसमें आश्चर्य कैसा?
(जनपक्ष से साभार)