Wednesday, 14 January 2015

हमारे समाज में 'लड़की' समझ से परे की चीज/फहमीदा रियाज

पाकिस्तान के सिंध राज्य में रहने वाली तरक्की पसंद अदीबा, शायरा फहमीदा रियाज 'गुफ्तगू' से बातचीत में बताती हैं- 'जो मन में आता है लिख देती हूं. बाद में कई बार लोग बुरा-भला भी कहते हैं जिससे तकलीफ़ होती है. एक लड़की होना हमारे समाज में एक ऐसी चीज़ है जो समझ से परे है. लड़कियों को इंजॉय करने की समाज इजाज़त नहीं देता. हिन्दोस्तान में जितनी आज़ादी औरतों को हासिल है, पाकिस्तान में नहीं है.
मैं तो कुछ लिख भी देती हूं, लेकिन समाज अभी भी दकियानूसी दौर में जी रहा है. ... मैं हिन्दोस्तान इसलिए आयी थी कि यह एक सेक्युलर मुल्क है, लेकिन यह सब ख्वाब था. मैंने यहां के सांप्रदायिक माहौल पर एक नज़्म ‘नया भारत’  लिखा. इस पर इतना बड़ा हंगामा हुआ कि पूछिये मत. दो दिन बाद मेरी फ्लाइट थी. मैं सोच नहीं पा रही थी कि क्या करूं. फिर मैं पाकिस्तान वापस चली गयी. वह नज़्म हमें कुछ कुछ याद आ रहा है.....नया भारत
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले/अब तक कहां छुपे थे भाई।
वह मुरखता वह घामड़पन,/जिसमें हमने सदियां गंवायी।
आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे,/अरे बधाई, बहुत बधाई।
प्रेत धर्म का नाच रहा है, कायम हिन्दू राज करोगे।
सारे उलटे काज करोगे, अपना चमन ताराज़ करोगे।
तुम भी बैठे राज करोगे,/सोचा कौन है हिन्दू कौन नहीं है।
तुम भी करोगे फतवा जारी,/अरे बधाई बहुत बधाई।
एक जाप सा करते जाओ,/बारम-बार यही दुहराओ।
कितना वीर महान था भारत/कैसा आलीशान था भारत।
प्रेत धर्म का नाच रहा है/अरे बधाई बहुत बधाई
'कुछ लोग है जिन्हें असल मज़हब के मायने नहीं पता है. इन लोगों को कौन बताये कि मज़हब लोगों को अलम करने के लिए नहीं है, बल्कि लोगों को जोड़ने के लिए आया है. यही सोच मार्क्स का भी है सांप्रदायिक सदभाव और मार्क्सवाद असल में एक ही चीज़ है. दोनों इन्सान को इन्सान बनाना सिखाता है और समाजी बराबरी की सीख देता है.
'अफगानिस्तान में तालिबान की ज़ालिमाना हरक़त को पूरी दुनिया जानती है. उन्होंने वहां के तारीख को मिटाना चाहा. ‘बुद्ध’ जो शान्ति की अलामह है, उनकी मूर्ति को खाक में मिला दिया. इस पर मैंने एक नज़्म लिखी थी. मोजस्सेमा गिरा  मगर ये दास्तां अभी तमाम तो नहीं हुयी दिया कई बरस तैय हुये. लिखेगा दिन को आदमी/बरंगे आबो जुस्तजू/ वह हुस्न की तलाश में/वह मुन्सफ़ी की आस में/खुली है सड़क खुल गयी दुकां में कितना माल है/दुकां में दिलबरी नहीं/मकां में मुन्सिफ़ी नहीं/ अभी तो हर बला नयी/अभी है काफ़ले रवां/गुलों मे नस्ब है निशा।/मुजस्सेमा गिरा मगर/जमीं पे ज़िन्दगी दुकां के नाम पर नहीं हुयी/हमारी दास्तान अभी तमाम पर नहीं हुयी.'

Monday, 12 January 2015

थोथे मुद्दे छोड़े समाज/प्रीतीश नंदी

आप ऐसे कितने हिंदुओं से रोज मिलते हैं, जो बाहर जाकर मुस्लिमों और ईसाइयों का धर्मांतरण करना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ये लोग भारत को लेकर उनके मन जो तस्वीर है उसके लिए खतरा हैं? आप ऐसे कितने मुस्लिमों को जानते हैं, जो पाकिस्तान के प्रति वफादारी का दावा करते हैं और आतंकी हमलों का समर्थन करते हैं? मैं मोहमेडन स्पोर्टिंग फुटबॉल टीम को समर्थन देने या पाकिस्तानी पॉप गायक व अभिनेता आतिफ असलम का प्रशंसक होने की बात नहीं कर रहा हूं.

धर्म परिवर्तन : आप ऐसे कितने सिखों को जानते हैं, जो 1984 के दंगों को लेकर अब भी इतने नाराज हैं कि वे अलग होकर नया खालिस्तान बनाना चाहते हैं, भारत से खूनी बदला लेना चाहते हैं? हां, वे न्याय जरूर चाहते हैं. वे दोषियों को दंडित होते देखना चाहते हैं, लेकिन ये दोनों समान बातें नहीं हैं. आप विदेशी मिशनरियों सहित ऐसे कितने ईसाइयों से मिले हैं, जिन्होंने पैसे या अन्य किसी चीज का लालच देकर आपको ईसाई बनाना चाहा? हां, यदि आप किसी ईसाई स्कूल में पढ़ें हों तो आपको नैतिक शिक्षा की कक्षा में हाजिर रहना पड़ता है, जिसमें बाइबल की कहानियां सुनाई जाती हैं. हालांकि, आपके सामने ऐसे स्कूल में न जाने का विकल्प हमेशा खुला होता है. ठीक वैसे जैसे मुस्लिमों के सामने मदरसे में न पढ़ने का विकल्प मौजूद होता है.
भारत में धर्म हमेशा से व्यक्तिगत चुनाव का विषय रहा है. इस देश में रहने की सर्वश्रेष्ठ खासियतों में से एक यह है. यदि आप किसी चीज का चुनाव नहीं करते तो किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह आपको उन चीजों में भरोसा करने पर मजबूर करे. जिन लोगों को मैं या आप जानते हैं अथवा रोज की जिंदगी में मिलते हैं, अपने चुनने के अधिकार का उपयोग करते हैं. जहां तक आस्था की बात है और ऐसा वे बहुत नामालूम तरीके से, सरलता और पूरी गरिमा के साथ करते हैं. उन्होंने हमेशा से ऐसा ही किया है. मेरे जैसे कुछ लोगों ने आस्था से मुक्त रहने का चुनाव किया, क्योंकि धर्म कोई ऐसी चीज नहीं है कि जिससे हम अपने आप को परिभाषित करते हैं.
हम तो अपने विचारों, अपने सपनों या अपनी उम्मीदों से परिभाषित होते हैं. हम जो होना चाहते हैं, उसी से परिभाषित होते हैं. मैं कोलकाता में पला-बढ़ा हूं, जहां क्रिसमस की शाम को हर कोई सेंट पॉल कैथेड्रल में जाता था. हिंदू, मुस्लिम, सिख, यहूदी, कभी-कभार कोई पारसी या आर्मेनियाई. चीनी लोग भी सर्विस में शामिल होते थे, इसलिए नहीं कि उन्हें कोई लालच दिया जाता था बल्कि वे इसलिए जाते थे, क्योंकि वहां दिए जाने वाले शांति और सद्‌भावना के संदेश का अनुभव उन्हें आनंदित करता था. ठीक वैसे जैसे पश्चिम बंगाल में हर कोई दुर्गा पूजा मनाता है और फिर धर्म कोई भी क्यों न हो माता के पैरो में गिर जाता है. कुछ महान शास्त्रीय संगीतकारों व गायकों को निकट से जानने का सौभाग्य मुझे मिला है. वे काली माता के भक्त थे, फिर चाहे वे धर्म से निष्ठावान मुस्लिम ही क्यों न हों. यह उस समय का जादू था. आपने चाहे किसी भी धर्म में जन्म लिया हो या आप किसी भी धर्म के क्यों न हो, लेकिन आप जिस चीज में विश्वास करते थे, वह आपका अपना चुनाव होता था. अपनी पसंद होती थी.
कोलकाता में सांप्रदायिक दंगे दुर्लभ ही थे. एक बार ऐसे ही दंगों के दौरान डागर बंधु (यदि मुझे सही याद  रहा है) ठुमरी गाने के लिए जा रहे थे. जैसा कि उन दिनों प्रचलन था, संगीतकार (चाहे कितने ही प्रसिद्ध, कितने ही खास क्यों न हो) अपने वाद्य साथ ले जाते थे, तो वे भी ले जा रहे थे. जल्दी ही उन्होंने खुद को दो हिंसक गुटों के बीच पाया. दोनों पक्षों ने जैसे ही उन्हें वाद्य-यंत्रों के साथ देखा वे थम गए व अलग हो गए और उन्हें संगीत सम्मेलन में जाने के लिए रास्ता दे दिया. कलाकारों के प्रति लोग ऐसा सम्मान व्यक्त करते थे. धर्म तो टकराव का कोई फौरी कारण हुआ करता था, जो यह देखते हुए असामान्य भी नहीं कहा जा सकता कि विभाजन में बंगाल के दो टुकड़े हुए थे पर धर्म आधारित विभाजन से गुजरने के बाद भी दोनों समुदायों में धर्म के मामले में शायद ही कभी संघर्ष हुआ हो.
बांग्लादेश, पाकिस्तान से अलग हो गया. धार्मिक समानता उन्हें जोड़कर नहीं रख सकी. नए राज्य को जिस चीज ने एकजुट रखा, वह था बांग्ला भाषा से उनका प्रेम. इसी प्रेम ने हिंदू और मुस्लिमों को एक रखा. यदि आप उथल-पुथलभरे उन दिनों का काव्य पढ़ें, आप इस्लाम को वहां नदारद पाएंगे. केवल आज़ादी के लिए अभिभूत कर देने वाला प्रेम वहां मौजूद था. आज़ादी की इसी तलाश ने पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बांटकर बांग्लादेश का निर्माण किया. धर्म, जिसके आधार पर पाकिस्तान बना था, हाशिये पर रह गया. मेरे माता-पिता विभाजन के भयावह दंगों के साक्षी बने थे, लेकिन मैंने कभी अपने बचपन में उन पर उन्हें चर्चा करते नहीं सुना. वे इसे लब्जों पर न लाई जा सकने वाली ऐसी त्रासदी समझते थे, जिसमें न तो कोई हीरो था न कोई विलैन. उस जमाने के सारे बंगाली साहित्य का यही रुख था.
न तो हिंदुओं ने और न मुस्लिमों ने ऐसा कुछ लिखा, जिसमें हिंसा के लिए दूसरे समुदाय को जिम्मेदार ठहराया हों. दोष दिया हों. उन्होंने त्रासदी को त्रासदी की तरह देखा. धर्म की इसमें कोई भूमिका नहीं थी. यही वजह रही कि जब बांग्लादेश जन्म ले रहा था तो सीमा के इस तरफ हर बंगाली ने फिर चाहे हिंदू हो या मुस्लिम, संघर्ष को समर्थन दिया. आज़ादी बड़ा उद्‌देश्य था. ठीक वैसे जैसे आज हममें उम्मीद होनी चाहिए जब आज हम भारत को उस भ्रष्टाचार व अपराध से मुक्त करने के निर्माण-पथ पर आगे बढ़ रहे हैं, जिसका कांग्रेस प्रतीक बन गई थी. क्या वाकई इसका कोई महत्व है कि निर्माण कौन कर रहा है?
क्या हमें मूर्खतापूर्ण, अप्रासंगिक मुद्‌दों को लेकर रास्ते से भटकने की बजाय इस व्यापक बहस पर केंद्रित नहीं होना चाहिए कि भारत के लिए वास्तविक बदलाव किस चीज से आएगा? ये निरर्थक मुद्‌दे हमारा भविष्य परिभाषित करने में कोई भूमिका निभाने से तो रहे. किसे परवाह है कि हमारे स्कूलों में संस्कृत पढ़ाई जाती है या नहीं. कोई मूर्ख यदि आईएसआईएस के साथ संघर्ष में शामिल होने विदेश जाता है तो कैसी चिंता? इसकी बजाय आइए, हम यहां आतंकवाद से लड़ने पर ध्यान केंद्रित करें.
इससे भी महत्वपूर्ण बात तो यह है कि हम महिलाओं के साथ सद‌व्यवहार करना सीखें. आइए, हम अपने बच्चों की तस्करी होने से रोकें. घोर भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए संघर्ष करें. आइए, हमारे सपनों के ऐसे भारत का निर्माण करें, जहां लोग गरीबी और पिछड़ेपन से मुक्त हों, जहां पर्यावरण का सम्मान किया जाता हो और उसी तरह प्रतिभाओं का भी, फिर वह कहीं से भी क्यों न आती हों. तो आइए, अधिक वृहद विचार-विमर्श पर ध्यान केंद्रित रखें. सच्चा बदलाव तो वही है. धर्म अपनी परवाह खुद कर लेगा.
('रविवार' से साभार)

Sunday, 11 January 2015

एक दिन अपनी डायरी में अन्ना कामीएन्सका ने लिखा

वह पूरी सम्पूर्णता में ग़रीब थी. वह फ़क़त अपनी तस्बीह के साथ गयी. वह अपने पीछे काली लाख और जर्जर मिसल वाले बेंत के छप्पर की एक जायदाद छोड़ गयी जिसमें पुराने तरीके से पापों का हिसाब किताब करने के तरीके थे मिसाल के तौर पर नौकरों और गुलामों से कैसा सुलूक किया जाए....
इतना तो है हमें इस बाबत चिंता करने की ज़रुरत ज़रा कम है.
लड़खड़ाती चलती हूँ कविताओं के सहारे.
कवितायेँ समय के पदार्थ से क्रिस्टलों में बदलती हैं. क्षणों का एक गुच्छा, टंगा हुआ झूलता मधुमक्खी के  छत्ते के मुंह से.
तली तक बैठने में लम्बा वक़्त लेता है कविता का नमक.
हम सब के पास अपना अध्यात्म होता है, चाहे हमें इसका भान हो ही नहीं या हम ज़रा भी शंका न करें उसकी बाबत.
'' मेरे सपनों में एक बार फिर से पानी.साफ़, शफ्फाफ़, बालू पर बहता, इतना पारदर्शी कि आप तल पर तैर रही सर्पिल मछलियों तक को देख सकते हैं.
कविताओं की कतरनों और इस्तेमाल न किये गए विचारों से भरा एक घर. विचारों का एक घोंसला, शब्द के मेहनतकश बढ़ई की छीलनें. झाग की तरह उनकी प्रचुरता, मेरे अस्तित्व के चारों तरफ, ज़रुरत से ज़्यादा खौलता पानी. मुझे नहीं मालूम क्यों इस या उस कविता को मैंने सज़ा दे दी खामोश हो रहने, कुछ न होने की; मैंने इसे क्यों लिखा, उस विचार को क्यों नहीं. सब झाग है.
जब सब शांत हो जाता है
अनंत भी आराम करता है
और चीज़ें हमारे लिए और नहीं रोतीं
मैंने चांदी के मुखौटे पहने देखा अपने मृतकों को.
हम “इस संसार” और “अगले संसार” की बातें करते हैं. “आस्तिक” वे होते हैं जो कथित रूप से“अगले संसार” पर, उसकी वास्तविकता पर भरोसा करते हैं.    
मैं “अगले संसार” पर यकीन नहीं करती. संसार एक है. एक सच्चाई. मृत्यु अगले संसार में जाने का रास्ता नहीं है कोई, हो सकता है वह हो अंधी आँखों का खुल जाना.''
(कबाड़खाना से साभार उद्धृत)

महिला का अपने शरीर पर कितना अधिकार/उमा चक्रवर्ती

इस साल की शुरुआत में कुछ लोगों ने एक महिला के उस अधिकार पर कुछ देर के लिए सोचा जो विरोध जताने के लिए खाना नहीं खा रही हैं.
जीवन के हक़ के लिए लड़ रही मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता शर्मिला इरोम पिछले 14 साल से भूख हड़ताल पर हैं.
लेकिन खाने से इनकार कर एक महिला अपने समाज, देश और राज्य को क्या संदेश देना चाहती हैं?
इरोम शर्मिला ने पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में सशस्त्र सेनाओं के विशेषाधिकारों से संबंधित विवादास्पद क़ानून के ख़िलाफ़ वर्ष 2000 में भूख हड़ताल शुरू की थी.
इन अधिकारों के तहत सैन्यबल बग़ैर किसी वारंट के किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार कर सकते हैं और कुछ विशेष हालात में तो उन्हें गोली मारने का भी अधिकार है.
मणिपुर लंबे समय से चरमपंथी हिंसा और अलगाववादियों से प्रभावित रहा है. अलगाववादी निश्चित तौर पर मौत के लिए ज़िम्मेदार हैं, लेकिन यह क़ानून भारत के एक हिस्से को युद्ध प्रभावित क्षेत्र की तरह दिखाता है.
भूख हड़ताल शुरू करने के साथ ही उन्हें गिरफ़्तार कर अस्पताल में ले जाया गया और पिछले 14 सालों से हिरासत में रखते हुए उन्हें नाक में पाइप के रास्ते तरल भोजन दिया जा रहा है.
पिछले साल अदालत ने उन पर लगे ‘ख़ुदकुशी की कोशिश के आरोपों’ को ख़ारिज़ कर दिया और उनकी रिहाई के आदेश दिए. लेकिन उन्हें कुछ ही देर बाद फिर से गिरफ़्तार कर लिया गया.
हर साल जनवरी में उनकी रिहाई और फिर गिरफ़्तारी का खेल खेला जाता है. इसी हफ़्ते एक बार फिर यही रस्म दोहराई गई.
ख़बरों में इसका ज़िक्र हुआ और फिर बहुत जल्द ही भुला भी दिया गया. लेकिन मैं इसे नहीं भूली, ख़ासकर नवंबर 2010 में शर्मिला की मां से मुलाक़ात के बाद.
शर्मिला की मां का दुख समझने के लिए उनके मुझसे कहे ये शब्द काफ़ी हैं, ‘‘एक दिन मैं बैठकर ख़बरें सुन रही थी और एक अधिकारी ने कहा कि वे सैन्यबल विशेषाधिकार क़ानून को कभी नहीं हटाएंगे. उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा और मैं बहुत निराश हुई. मैंने ख़ुद से कहा कि इसका मतलब हुआ कि मेरी बेटी कभी नहीं खा पाएगी.’’
मेरे लिए वो विशेष महिला हैं, जो अपनी बेटी से इसलिए नहीं मिलतीं, क्योंकि वो जानती हैं ऐसा करने पर शर्मिला रोएगी. और वो नहीं चाहतीं कि उनकी बेटी किसी तरह से कमज़ोर हो.
इरोम शर्मिला का विरोध उनके साहस का अविश्वसनीय नमूना है. उन्हें जीवन की मूलभूत चीजों से वंचित किया जा रहा है, लेकिन सरकार का मानना है कि कोई संकट नहीं है, क्योंकि वे उन्हें ज़बरन खाना दे रहे हैं और उन्हें ज़िंदा रखे हुए हैं.
लेकिन शर्मिला के शरीर को तरल भोजन के इंजेक्शनों के सहारे चलाया जा रहा है और हर कोई जानता है कि ज़िंदा रहने का ये कोई तरीक़ा नहीं है.
शर्मिला उन सिद्धांतों की प्रतिमूर्ति बन गई हैं जिनके लिए वह संघर्ष कर रही हैं. शर्मिला का कहना है कि लोगों को सैन्य विशेषाधिकार क़ानून के तहत जीवन जीने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए.
सरकारों का ध्यान आकर्षित करने के लिए वह अपने शरीर का इस्तेमाल कर रही हैं. अगर आप इस तरह की व्यवस्था में रह रहे हैं तो आप वास्तव में अपने मानव होने का आधार खो देते हैं, अपने देश में स्वतंत्रता और सुरक्षा का अधिकार.
मीडिया में महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक़ दिए जाने पर ज़ोरदार बहस होती है. कहा जाता है कि सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के साथ पुरुषों जैसा ही बर्ताव किया जाना चाहिए, उनके अधिकार एक जैसे होने चाहिए.
लेकिन अगर महिलाओं को एक जैसी तवज्जो दी जाएगी तब किसी भी तरह की हिंसा बर्दाश्त नहीं होगी और बहस तक की ज़रूरत नहीं होगी.
महिला सुरक्षा में सरकार की भी अहम भूमिका है. सरकार का मतलब सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय समझौते और राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग करना ही नहीं है.
उसका उत्तरदायित्व घर के अंदर, बाहर, दफ़्तरों, फैक्ट्रियों, स्कूल और कॉलेज में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी होना चाहिए.
हाल ही में नसबंदी शिविरों में महिलाओं की मौत की घटना को ही लीजिए. बड़े पैमाने पर हुए नसबंदी ऑपरेशनों में कई महिलाओं की जान चली गई. वहाँ क्या ग़लत हुआ?
सरकार कह रही है कि दवाएं नकली थी या सवाल उठाए जा रहे हैं इतने ऑपरेशन एक दिन में कैसे किए गए.
लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं पर कोई बात नहीं कर रहा? कोई नहीं पूछ रहा कि आबादी नियंत्रण का एकमात्र हल नसबंदी ही क्यों है और वह भी सिर्फ़ महिलाओं के शरीर पर ही क्यों?
फिर से बहस शर्मिला के तर्क़ पर आकर ठहर गई. महिला का अपने शरीर पर अधिकार है या नहीं और क्या वह इसे विरोध प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल कर सकती है.
(बीबीसी से साभार)

Thursday, 8 January 2015

नई सरकार, अच्छे दिन और मुगालते / कुलदीप कुमार

जिन लोगों को यह मुगालता था कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े अनेक संगठन हाशिये पर चले जाएंगे क्योंकि मोदी को पता है कि आर्थिक विकास तभी संभव है जब समाज में शांति हो, अब उनका यह मुगालता दूर हो जाना चाहिए। अरुण शौरी और मधु किश्वार जैसे मोदी के प्रशंसकों का कुछ अन्य कारणों से मोहभंग हो रहा है और ‘मोदीनामा’ लिखकर और मोदी के पक्ष में धुआंधार प्रचार करके (कु)ख्याति अर्जित करने वाली मधु किश्वार को अब यह संदेह होने लगा है कि मोदी पर काला जादू कर दिया गया है। जब विकासशील समाज अध्ययन केंद्र जैसे प्रतिष्ठित शोध संस्थान में प्रोफेसर के पद पर आसीन व्यक्ति काले जादू की बात करे तो स्वाभाविक तौर पर आश्चर्य तो होता ही है।
इस समय मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी में ज़िम्मेदारी के पदों पर बैठे लोग रोज जिस तरह के बयान दे रहे हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं कि ‘सामाजिक समरसता’ और ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ की बातें करने वाले इन लोगों के असली उद्देश्य इनसे ठीक उल्टे हैं। अगर देश की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ‘गीता’ को ‘राष्ट्रीय ग्रंथ’ घोषित कराना चाहती हैं और कह रही हैं कि इस बारे में केवल औपचारिक घोषणा होना ही बाकी है, तो इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि आज भी देश में संविधान का शासन है और संविधान भारत को एक “प्रभुसत्तासंपन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक गणतन्त्र” के रूप में परिभाषित करता है। भले ही आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद का लक्ष्य भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना है, लेकिन अभी वह बना नहीं है। संविधान का पालन करने की शपथ लेकर मंत्री बनने वालों को इस बुनियादी सचाई को भूलना नहीं चाहिए। लेकिन हकीकत यह है कि पिछली मई में सत्ता में आने के बाद से भारतीय जनता पार्टी के नेता और समर्थक कुछ इस तरह का बर्ताव कर रहे हैं जैसे इतिहास में पहली बार किसी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत मिला हो। इन दिनों नरेंद्र मोदी की आलोचना करने को प्रधानमंत्री पद का अपमान बताया जाता है। ये लोग भूल जाते हैं कि भारतीय संसदीय लोकतन्त्र के इतिहास में जैसा जनादेश राजीव गांधी को मिला था, वैसा आज तक किसी को नहीं मिला। लेकिन जब भाजपा नेता संसद में और संसद के बाहर ‘गली-गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है’ के नारे लगाते थे, तब किसी को यह ख्याल नहीं आया कि यह प्रधानमंत्री पद का अपमान है। न तब जब लालकृष्ण आडवाणी मनमोहन सिंह को देश का सबसे ‘निकम्मा प्रधानमंत्री’ बताया करते थे।
बहरहाल, संविधान के अनुसार देश के सभी नागरिक समान हैं चाहे उनके धर्म, जाति, क्षेत्र, लिंग और समुदाय कुछ भी क्यों न हों। अस्पृश्यता कानूनन अपराध है क्योंकि उसका आधार जन्म के आधार पर किसी जातिविशेष को नीच और अछूत मानना है। इसी तरह लिंग के आधार पर भी किसी को श्रेष्ठ या हीन नहीं माना जा सकता। लेकिन ‘गीता’ में कृष्ण अर्जुन से क्या कहते हैं? “मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्‌।।” (हे अर्जुन, मेरा आश्रय करके स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र अथवा अंत्यज आदि जो पापयोनि वाले हैं, वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं।) यह कहने से पहले वे अर्जुन को यह बता चुके होते हैं:  "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः" (गुण कर्म के विभाग से मैंने ही चारों वर्णों को उत्पन्न  किया है). तो क्या हम अब मान लें कि  वर्णव्यवस्था ईश्वरीय विधान है और स्त्रियां, वैश्य एवं शूद्र पापयोनि में जन्मे हीन  लोग हैं?
भारत का राष्ट्रीय ग्रन्थ उसका संविधान है, किसी अन्य ग्रन्थ को उसकी जगह लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती। शब्दछल का सहारा लेने में माहिर भाजपा के नेता अब यह दावा भी कर रहे हैं कि ‘गीता’ किसी एक धर्म से जुड़ी पुस्तक नहीं है। वह तो सार्वजनीन है और दर्शन एवं कर्मयोग का ग्रंथ है। सुषमा स्वराज तो उसके जरिये अनेक मानसिक परेशानियों का इलाज करने की वकालत भी करती हैं। लेकिन क्या कोई बताएगा कि यदि ‘गीता’ हिन्दू धर्म से जुड़ा ग्रंथ नहीं है तो फिर अदालतों में सिर्फ हिन्दू ही उस पर हाथ रख कर कसम क्यों खाते हैं, किसी और धर्म के अनुयायी क्यों नहीं?
शब्दछल के सहारे का एक और उदाहरण है धर्मपरिवर्तन को ‘पुरखों के घर वापसी’ का नाम देना। एक समय था जब विश्व हिन्दू परिषद इसे ‘परावर्तन’ कहा करती थी। आरएसएस के इस संगठन की भारत के अलावा लगभग नब्बे देशों में शाखाएँ हैं। संघ की तरह ही इसका अंतिम लक्ष्य भी भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ में तब्दील करना है। आगरा में जिस तरह से स्लम में रहने वाले गरीब मुसलमानों को लोभ-लालच देकर उनकी ‘घर वापसी’ का नाटक किया गया, वह उन सभी नाटकों की एक कड़ी भर है जो पिछले दो साल से उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, मेरठ, हापुड़ और अलीगढ़ जैसे अनेक जिलों में खेले जा रहे हैं। इन सबका उद्देश्य विधानसभा चुनाव के पहले राज्य में सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण है। वरना ईसाइयों के पवित्र त्यौहार क्रिसमस के दिन अलीगढ़ जैसे सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील शहर में बड़े पैमाने पर मुसलमानों के सामूहिक धर्मपरिवर्तन का कार्यक्रम बनाने का मतलब क्या है?
यहाँ यह याद दिलाना अप्रासंगिक न होगा कि जनवरी 1989 में हुए धर्म संसद के अधिवेशन में पारित प्रस्ताव में विस्तार से उन कदमों की चर्चा की गई थी जो भारत में ‘हिन्दू राष्ट्र’ की ‘पुनर्स्थापना’के लिए उठाए जाने आवश्यक हैं। इस प्रस्ताव का अंतिम बिन्दु था: “राष्ट्रीय शिक्षा नीति में नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा के साथ-साथ संस्कृत और योग की अनिवार्य शिक्षा और प्रशिक्षण शामिल किए जाएँ।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुझाव पर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया है। इस  पर किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन यह संयोगवश नहीं है कि इसी के साथ-साथ केन्द्रीय विद्यालयों से जर्मन हटाकर संस्कृत को ले आया गया है।
यह भी अकारण नहीं है कि मोदी सरकार की एक मंत्री  उन लोगों के लिए गाली का प्रयोग करती हैं जो ‘रामजादों’ के श्रेणी में नहीं आते। यह भी अकारण नहीं है कि भाजपा के सांसद साक्षी महाराज अपने दिल की बात जुबान पर ले आते हैं और महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को ‘राष्ट्रभक्त’ बताते हैं। आज संघ कुछ भी कहे, वह अपने उस इतिहास को मिटा नहीं सकता जो महात्मा गांधी के प्रति घृणा से भरा हुआ है। यह भी अकारण नहीं है कि भाजपा की उत्तर प्रदेश राज्य इकाई के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन लक्ष्मीकांत वाजपेयी ताजमहल को हिन्दू राजा का महल बताते हैं और वही (कु)तर्क दुहराते हैं जो लगभग छह दशक पहले पुरुषोत्तम नागेश ओक ने दिये थे और जिन्हें हिंदुत्ववादियों के अलावा दुनिया में कोई नहीं मानता। ओक अपने नाम के साथ प्रोफेसर लगाया करते थे और अपना परिचय विश्व इतिहास पुनर्लेखन संस्थान के अध्यक्ष के रूप में देते थे। उनके अनुसार कुतुब मीनार विष्णुध्वज है और लालकिला एवं जामा मस्जिद जैसी सभी इमारतें हिंदुओं द्वारा बनवाई हुई हैं।
इन ‘अच्छे दिनों’ में जब देश का प्रधानमंत्री स्वयं प्राचीन भारत में आज से भी अधिक उन्नत विज्ञान और चिकित्सा होने का दावा कर रहा है, जब भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का अध्यक्ष कह रहा है कि रामायण एवं महाभारत जैसे महाकाव्यों में वर्णित सभी घटनाएँ वास्तव में ठीक वैसे ही घटी थीं, तब यदि ओक की मान्यताओं को एक वरिष्ठ राजनीतिक नेता साम्प्रादायिक राजनीति करने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है तो इसमें आश्चर्य कैसा?
(जनपक्ष से साभार)

Sunday, 28 December 2014

युद्ध और प्रेम की कविताई

तुम्हारी हँसी मुझे आज़ाद करती है, मुझे पंख देती है, मुझसे मेरा अकेलापन छीन लेती है, नोच देती है मेरी सलाखों को...... (युद्ध और प्रेम की कविताओं के महागायक मिगेल एरनानदेस की पंक्तियां)
मुस्कुराओ मेरी तरफ़, कि मैं जा रहा हूँ
वहाँ, जहाँ हमेशा से हो तुम सब,
जो धान की बालियों और पुलियों से ढँक देते हो हम पर थूकने वालों के मुँह,
जो मेरे साथ खेतों, मचानों, लुहारखाने, भट्ठी में
दिन-ब-दिन नोंच फेंकते हो पसीने के मुकुट।
मैं अपने-आपको मुक्त करता हूँ मन्दिरों से:
मुस्कुराओ मेरी तरफ़
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जैतून चुनने वाले ख़येन के आन्दालूसियो, अभिमानी जैतून चुनने वालो
आत्मा की गहराई से मुझे बताओ
किसने बड़ा किया इन जैतून के पेड़ों को
ख़येन के आन्दालूसियो, न पैसे ने, न मालिक ने और न ही निरा शून्य ने
बल्कि मौन मिट्टी, मेहनत और पसीने ने
शुद्ध पानी और ग्रहों के साथ मिलकर
तुम तीनों ने दी है ख़ूबसूरती इसके घुमावदार तनों को
ख़येन के आन्दालूसियो, अभिमानी जैतून चुनने वालो
आत्मा की गहराई से मुझे बताओे
किसने दूध पिलाया जैतून के पेड़ों को।
न जाने जैतून की कितनी सदियाँ, बँधे हुए हाथ-पाँव
दिन-ब-दिन, रात-दर-रात अपने बोझ तले दबाती हैं तुम्हारी हड्डियों को!
ख़येन के आन्दालूसियो, अभिमानी जैतून चुनने वालो,
मेरी आत्मा पूछती है: किसके, किसके हैं ये जैतून के पेड़?
ख़येन, अपने चन्द्रिका पत्थरों से पूरे आक्रोश में उठो
कि कोई भी गुलाम नहीं रहेगा, न तुम न तुम्हारे जैतून के बागीचे
तेल की पारदर्शिता और उसकी महक के बीच
तुम्हारी मुक्ति है पर्वतों की मुक्ति में ।
(ख़येन स्पेन के आन्दालूसिया क्षेत्र का एक शहर, जैतून के तेल का वैश्विक केन्द्र : रचना 'आह्वान' से साभार)

भारत में एण्टीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल में 62 प्रतिशत बढ़ोतरी

एक ताज़ा अध्ययन के मुताबिक़ भारत दुनिया में रोगाणु-रोधी (एण्टीबायोटिक) दवाओं का सबसे अधिक इस्तेमाल करने वाले देशों में से एक के रूप में उभरकर सामने आया है। 2000-2010 के दशक में भारत में इन दवाओं के इस्तेमाल में 62 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है जबकि इसी अरसे में संसार के लिए यह दर 36 प्रतिशत रही है। भारत में हर व्यक्ति एक साल में रोगाणु-रोधी दवाओं की औसत 11 गोलियाँ खा रहा है; मगर ज़मीनी स्तर पर जो हालात हैं, उन्हें देखकर यह आँकड़ा काफ़ी कम लग रहा है। रोगाणु-रोधी दवाएँ खाने में चीन का नम्बर भी भारत के पीछे आता है। वैसे एक अमेरिकी नागरिक एक साल में रोगाणु-रोधी दवाओं की 22 गोलियाँ खाता है, परन्तु वहाँ कुल आबादी कम होने के कारण कुल खपत भारत और चीन से कम है।
रोगाणु-रोधी दवाओं की खपत में बढ़ोत्तरी मुख्य रूप से इस कारण नहीं हो रही कि लोगों की सेहत-सुविधाओं तक पहुँच पहले से ज़्यादा हो गयी है। अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि इस बढ़ोत्तरी का मुख्य कारण दवाओं का बिना-ज़रूरत तथा ग़ैर-वैज्ञानिक इस्तेमाल है। दरअसल, ये दवाएँ एक ख़ास किस्म के रोगाणुओं – बैक्टीरिया के कारण होने वाली बीमारियों (जैसेकि पेचिश, दस्त के कई मामले, टाइफ़ाइड, चमड़ी, फेफड़ों तथा ख़ून के कई इंफ़ैक्शन आदि) में ही ज़रूरी तथा कारगर होती हैं। मगर सारे इंफ़ैक्शन बैक्टीरिया के कारण नहीं होते, बल्कि आधे से ज़्यादा इंफ़ैक्शन (जैसे आम सर्दी-जुकाम, दस्त के आधे से ज़्यादा मामले, बहुत से बुखार जैसे डेंगू, चिकनगुनिया तथा अन्य अनेक वायरल बुखार आदि) एक अलग किस्म के रोगाणु – वायरस की वजह से होते हैं जिनके ऊपर न तो रोगाणु-रोधी दवाओं का कोई असर ही होता है और न ही इन इंफ़ैक्शन में इन दवाओं की कोई ज़रूरत ही होती है। मगर आमतौर पर यही देखा जाता है कि इन सब बीमारियों में, बिना यह देखे कि कारण बैक्टीरिया है या वायरस, एण्टीबायोटिक्स का इस्तेमाल हो रहा है। इससे एक तरफ़ तो आर्थिक नुक़सान होता है, तो दूसरी तरफ़ इन दवाओं के बेकार हो जाने का ख़तरा खड़ा हो गया है, क्योंकि इन दवाओं के अन्धाधुँध इस्तेमाल के चलते बैक्टीरिया की बड़ी संख्या ने इन दवाओं को प्रभावहीन करने के तरीक़े विकसित कर लिये हैं।
मसले के आर्थिक पक्ष की बात करें। भारत जैसे देश में यहाँ दो-तिहाई आबादी को समय पर दवाई नहीं मिलती, बड़ी संख्या में लोगों को सेहत ठीक रखने के लिए ज़रूरी भोजन तक नहीं मिलता, किसी मरीज़ को मेडिकल सुविधा मिल सकेगी या नहीं, इस बात पर निर्भर करता है कि वह दवाई ख़रीद पायेगा या नहीं। ऐसे में बिना ज़रूरत के दवाएँ देना, ख़ासकर मेडिकल विज्ञान के दृष्टिकोण से इतनी अहम तथा जीवन-रक्षक दवाएँ, वैज्ञानिक पक्ष से तो ग़लत हैं ही, साथ ही मानवता के प्रति अपराध भी है। यह सीधा-सीधा आम इंसान की जेब पर झपटमारी है, ऊपर से दवाओं के बुरे प्रभावों के कारण मरीज़ को जो नुक़सान झेलना पड़ सकता है, वह अलग है। इसके अलावा बिना ज़रूरत के इस्तेमाल होने से मानवीय श्रम तथा प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी होती है, वह अलग है। लेकिन आम इंसान की लूट और मानवीय श्रम तथा प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी में ही दवा-कम्पनियों से लेकर डॉक्टरों तक के लम्बे मुनाफ़ाखोरी के नेटवर्क की मोटी कमाई सम्भव है।
दवा-कम्पनी के लिए दवाओं का उत्पादन मुनाफ़े के लिए है, वह हर साल बिक्री के पहले से ज़्यादा “ऊँचे टारगेट” तय करके चलती है और अपने “टारगेट” को पूरा करने के लिए अपने उत्पादों के प्रचार हेतु “विज्ञापनबाज़ों” (जिनको कम्पनियाँ ‘मेडिकल रिप्रेजेण्टेटिव’ के अंग्रेज़ी नाम के पीछे छुपाती हैं) की बड़ी फ़ौज भर्ती करती है। थोक व्यापारी तथा कैमिस्ट अपने ऐजण्ट अलग से रखते हैं जिनका काम “फ़ील्ड” में जाकर हिस्सेदारियाँ तय करते हुए बिक्री श्रृंखला बनाना होता है। इस चेन की अन्तिम कड़ी हैं डॉक्टर, जिनके बारे में जितना कम लिखा जाये, अच्छा है। आम निजी क्लीनिकों, अस्पतालों, नर्सिंग होमों आदि की बात ही क्या करनी, मेडिकल कॉलेजों तक में रोगाणु-रोधी दवाओं के इस्तेमाल के लिए लाजिमी दिशा-निर्देशों की जिस तरह से धज्जियाँ उड़ायी जाती हैं, आम इंसान सोच भी नहीं सकता। मरीज़ों को रोगाणु-रोधी दवाओं के महँगे-महँगे टीके इसलिए नहीं लगते कि मरीज़ को उनकी हमेशा ज़रूरत ही होती है, बल्कि इसलिए भी लगते हैं कि वार्ड के “डॉक्टरों” को अपना “टारगेट” पूरा करना होता है। ग़ैर-ज़रूरी होना एक बात है, ग़ैर-वैज्ञानिक होना दूसरी बात है अर्थात “टारगेट” पूरा करने के चक्कर में यह भी नहीं देखा जाता कि मरीज़ को दी जा रही दवा बीमारी का कारण बन रहे बैक्टीरिया को कण्ट्रोल करने के लिए सही चुनाव है भी या नहीं, क्योंकि चुनाव का आधार बैक्टीरिया की किस्म, मरीज़ का हित है ही नहीं। ऐसे सीनियर डॉक्टर भी देखने को मिलते हैं जो टीकों की शीशियाँ तक सँभालकर रखते हैं ताकि कैमिस्ट तथा कम्पनी हिसाब-किताब में ‘गड़बड़ी’ न कर सके। अकेले डॉक्टर ही नहीं है जो ग़ैर-ज़रूरी इस्तेमाल के कारण हैं, झोला-छाप डॉक्टर, कैमिस्ट इसका बड़ा कारण हैं। कई रोगाणु-रोधी दवाओं की औक़ात तो अब टाफ़ियों जितनी भी नहीं रही, हर गली-मुहल्ले के नुक्कड़ में बैठा कैमिस्ट या झोला-छाप डॉक्टर इन दवाओं की मुट्ठी भर-भर आम लोगों को खिला रहा है जिसको नज़रसानी के नीचे लाना मौजूदा प्रबन्ध में असम्भव है।
आर्थिक नुक़सान के अलावा जो दीर्घकालिक और बड़ा नुक़सान समूची मानवता को झेलना पड़ सकता है और कुछ हद तक पहले ही झेलना पड़ रहा है, वह है रोगाणु-रोधी दवाइयों का बेअसर सिद्ध होना। कई रोगाणु-रोधी दवाएँ तो पहले ही नकारा हो चुकी हैं, कइयों की क्षमता कम हो गयी है और कइयों का दायरा सिमट गया है। दवा-रोधी टीबी (क्षयरोग) का सामने आना इसका एक उदाहरण है। टाइफ़ाइड के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कई दवाएँ अब इस काम के लायक नहीं रहीं। भारत में अगर सबसे ज़्यादा ग़ैर-ज़रूरी रोगाणु-रोधी दवाएँ लिखी जाती हैं तो यह हर बुखार को टाइफ़ाइड घोषित करके लिखी जाती हैं। टाइफ़ाइड के लिए आम इस्तेमाल होने वाली दवा ‘सिप्रोफ्लोक्सासिन’ तथा इसी श्रेणी की अन्य दवाओं (जो संयोग से सबसे ज़्यादा लिखी जाने वाली रोगाणु-रोधी दवाओं में से एक है) की कारगर-क्षमता अब इसी वजह से कम होती जा रही है। टाइफ़ाइड के लिए कुछ और दवाएँ जैसे ‘सिफ़िगजम (जीफ़ी), सैफ्फ़ट्रेगजोन’ आदि जो टाइफ़ाइड के कुछ ख़ास मामलों के लिए जैसे बच्चों में, गर्भवती औरतों में, ‘सिप्रोफ्लोक्सासिन-रोधी टाइफ़ाइड के इलाज में इस्तेमाल के लिए रिजर्व हैं, अब हर किस्म के बुखार के लिए यहाँ तक कि सिफ़िगजम तो सर्दी-जुकाम के लिए भी लिखी जा रही हैं। यहाँ तक कि झोला-छाप डॉक्टर, कैमिस्ट जिनको रोगाणु-रोधी दवाओं की हरेक श्रेणी तथा हरेक दवा के विशेष इस्तेमाल के पीछे वैज्ञानिक कारण बिलकुल भी पता नहीं होते, वे भी बेहद ऊँचे दर्जे की रोगाणु-रोधी दवाएँ भण्डारे की जलेबियों जैसे बाँटते हैं। नतीजा जो सामने आ रहा है, बहुत डरावना है क्योंकि मानवता को एक बार फिर बिना रोगाणु-रोधी दवाओं के युग में जाना पड़ सकता है।
इस नतीजे को वैज्ञानिक पहचानते भी हैं और देख भी रहे हैं, चेतावनियाँ भी दे रहे हैं। सरकारें भी इसे कण्ट्रोल में लाने का ख़ूब हल्ला-गुल्ला करती हैं, मगर असलियत यह है कि निजी मुनाफ़े पर आधारित मौजूदा पूँजीवादी प्रबन्ध के रहते इसे कण्ट्रोल करना सम्भव नहीं है। सबसे पहले तो दवा-कम्पनियों के मुनाफ़े को क़ाबू में करने की औक़ात किसी सरकार की नहीं है और सरकारों की मंशा भी नहीं है क्योंकि ख़ुद सरकारें पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी ही तो होती हैं और उसका वजूद ही पूँजीपतियों के मुनाफ़े को बनाये रखने, और बढ़ाने के लिए है। किसी भी सरकार या चुनावी राजनीतिक दल का इस प्रक्रिया को रोकने में कोई हित भी नहीं है। अगर सरकारों को मानवता का ज़रा भी ख़याल होता तो वह दवाओं के समूचे उत्पादन को निजी हाथों से छीनकर अपने हाथों में लेती तथा दवाइयों की बिक्री में से हर तरह के व्यापारी-एजेण्टों को बाहर कर सीधा लोगों तक सप्लाई चेन बनातीं, मगर यहाँ तो गंगा ही उल्टी बहती है। भारत की सरकारों ने रोगाणु-रोधी दवाएँ बनाने वाली सरकारी फ़ैक्टरियों को कब का बन्द करवा दिया है, मोदी सरकार ने दवाओं की क़ीमतों को भी हर तरह के सरकारी कण्ट्रोल से “आज़ाद” कर दिया है। जब कम्पनियों के मुनाफ़े को कण्ट्रोल करना सम्भव ही नहीं है तो बाक़ी सारी बयानबाज़ी खोखली है। किसी मन्त्री, नेता, नौकरशाह का ऐसा बयान कि कम्पनी के विज्ञापनकर्ता अब डॉक्टरों को ड्यूटी के समय नहीं मिलेंगे, अक्सर ही पढ़ने को मिल जायेगा, मगर इनसे कोई पूछे कि डॉक्टर के घर पर कौन सी मिलिट्री प्लाटून बैठी रहती है कि कम्पनी का एजेण्ट डॉक्टर को उसके घर जाकर नहीं मिल सकता। अगर घर में सीसीटीवी कैमरे भी लगा दिये जायेंगे तो ऐसी “बिज़नेस मीटिंगों” के लिए यह दुनिया छोटी नहीं पड़ जाती। रही बात आम लोगों को शिक्षित करने की, यह काम सरकार तथा डॉक्टर ही कर सकते हैं। सरकार करेगी ही नहीं और डॉक्टरों के पास “समय” कहाँ है। मरीज़ देखने के वक़्त कोई डॉक्टर ऐसा करेगा नहीं क्योंकि इससे तय समय में देखे जाने वाले मरीज़ों की संख्या कम हो जायेगी। लिहाज़ा इससे ओपीडी से होने वाली कमाई भी कम होगी, फिर क्यों कोई ऐसा करेगा, आखि़र कमाई के लिए है वह “सख़्त मेहनत करके” डॉक्टर बना है! अपने काम के बाद लोगों में प्रचार करना, इसकी बहुसंख्या डॉक्टरों से उम्मीद करना चिड़ी का दूध लेके आने के बराबर है। रोगाणु-रोधी दवाओं का ग़ैर-ज़रूरी इस्तेमाल कम करने में आधुनिक टेस्ट, स्कैन अहम भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन एक काम के टेस्टों का उपलब्धता का दायरा बहुत सीमित है, अगर टेस्ट उपलब्ध है तो टेस्टों के लिए होती मोटी वसूली भी एक रुकावट बन जाती है। ऊपर से टेस्टों/स्कैनों का अपना एक “बिज़नेस” है, जिसकी कहानी दवाओं की कहानी से ज़्यादा अलग नहीं है। कुल मिलाकर नतीजा यह निकलता है कि आप कोई भी रास्ता पकड़ेंगे, वह आपको मौजूदा पूँजीवादी प्रबन्ध के द्वार छोड़ जायेगा। इसलिए अगर विज्ञान को मानवता की सेवा में सच्चे अर्थों में लगाना है तो इस पूँजीवादी प्रबन्ध को नष्ट करना ही होगा। निजी सम्पति के ऊपर टिके इस सामाजिक-आर्थिक ढाँचे को किनारे लगाना होगा; यह बात किये बिना किसी भी और ढंग-तरीक़े की बात करना या तो एक बच्चे की बेसमझ इच्छा हो सकती है, या फिर आम लोगों से छल-कपट।