Tuesday, 2 December 2014
मनमोहन
इन शब्दों में, वह समय है, जिसमें मैं रहता हूँ
ग़ौर करने पर उस समय का संकेत भी यहीं मिल जाता है।
जो न हो लेकिन मेरा अपना है
यहाँ कुछ जगहें दिखाई देंगी, जो हाल ही में ख़ाली हो गई हैं
और वे भी, जो कब से ख़ाली पड़ी हैं
यहीं मेरा यक़ीन है, जो बाकी बचा रहा,
यानी जो ख़र्च हो गया, वह भी यहीं पाया जाएगा
इन शब्दों में मेरी बचीखुची याददाश्त है
और जो भूल गया है, वह भी इन्हीं में है
कला का पहला क्षण, कई बार आप
अपनी कनपटी के दर्द में अकेले छूट जाते हैं
और कलम के बजाय तकिये के नीचे या मेज़ की दराज़ में
दर्द की कोई गोली ढूँढते हैं
बेशक जो दर्द सिर्फ़ आपका नहीं है
लेकिन आप उसे गुज़र न जाने दें, यह भी हमेशा मुमक़िन नहीं
कई बार एक उत्कट शब्द, जो कविता के लिए नहीं
किसी से कहने के लिए होता है
आपके तालू से चिपका होता है और कोई नहीं होता आसपास
कई बार शब्द नहीं, कोई चेहरा याद आता है या कोई पुरानी शाम
और आप कुछ देर
कहीं और चले जाते हैं रहने के लिए
भाई, हर बार रुपक ढूँढ़ना या गढ़ना मुमक़िन नहीं होता
कई बार सिर्फ़ इतना हो पाता है
कि दिल ज़हर में डूबा रहे और आँखें बस कड़वी हो जायें
ग़ौर करने पर उस समय का संकेत भी यहीं मिल जाता है।
जो न हो लेकिन मेरा अपना है
यहाँ कुछ जगहें दिखाई देंगी, जो हाल ही में ख़ाली हो गई हैं
और वे भी, जो कब से ख़ाली पड़ी हैं
यहीं मेरा यक़ीन है, जो बाकी बचा रहा,
यानी जो ख़र्च हो गया, वह भी यहीं पाया जाएगा
इन शब्दों में मेरी बचीखुची याददाश्त है
और जो भूल गया है, वह भी इन्हीं में है
कला का पहला क्षण, कई बार आप
अपनी कनपटी के दर्द में अकेले छूट जाते हैं
और कलम के बजाय तकिये के नीचे या मेज़ की दराज़ में
दर्द की कोई गोली ढूँढते हैं
बेशक जो दर्द सिर्फ़ आपका नहीं है
लेकिन आप उसे गुज़र न जाने दें, यह भी हमेशा मुमक़िन नहीं
कई बार एक उत्कट शब्द, जो कविता के लिए नहीं
किसी से कहने के लिए होता है
आपके तालू से चिपका होता है और कोई नहीं होता आसपास
कई बार शब्द नहीं, कोई चेहरा याद आता है या कोई पुरानी शाम
और आप कुछ देर
कहीं और चले जाते हैं रहने के लिए
भाई, हर बार रुपक ढूँढ़ना या गढ़ना मुमक़िन नहीं होता
कई बार सिर्फ़ इतना हो पाता है
कि दिल ज़हर में डूबा रहे और आँखें बस कड़वी हो जायें
Monday, 1 December 2014
खोजी पत्रकारिता की मिसाल / आनंद जोशी
आई.सी.आई.जे. की रिपोर्ट के अनुसार विदेशों में कंपनियों और ट्रस्टों के जरिए निवेश तथा गोपनीय वित्तीय लेन-देन करने वाले 170 देशों की सूची उसके पास हैं। आंकड़ा सुनकर चौंकिएगा नहीं, 1 लाख 20 हजार कंपनियां उन देशों में खुली हुई हैं, जिन्हें 'टैक्स हैवन' देश कहा जाता है। काला धन छिपाने या उसे सफेद करने के लिए दुनिया भर के अमीरों में यह चलन किस कदर आम है, यह खोजी पत्रकारों के इस समूह की रिपोर्ट में बताया गया है। ब्रिटिश वर्जिन आइलैण्ड्स में अमरीका, कनाडा, चीन, भारत, पाकिस्तान, ईरान, थाईलैण्ड, मंगोलिया, इंडोनेशिया आदि दुनिया भर के अनेक देशों की कंपनियों और लोगों ने निवेश कर रखे हैं। आई.सी.आई.जे. का दावा है कि उसके पास लाखों दस्तावेज हैं, जिनसे मालूम चलता है कि ऐसी कंपनियों और लोगों के बीच क्या गठजोड़ है तथा कब कितना नकद धन कहां, किसे हस्तान्तरित किया गया।
आई.सी.आई.जे. 160 खोजी पत्रकारों का अन्तरराष्ट्रीय संगठन है। ये पत्रकार 60 से अधिक देशों के बाशिन्दे हैं। वर्ष 1997 में स्थापित किए गए इस संगठन का मुख्यालय वाशिंगटन यानी उसी अमरीका में है, जो जूलियन असांजे को किसी भी कीमत पर हासिल करना चाहता है। फर्क इतना है कि असांजे अकेले थे और उनकी कार्य-प्रणाली का केन्द्र-बिन्दु अमरीका था। आपको याद होगा, अमरीका जैसा शक्तिशाली देश एक खोजी पत्रकार जूलियन असांजे का जानी-दुश्मन बन गया था। विकीलीक्स के संस्थापक इस पत्रकार ने कई गोपनीय दस्तावेज उजागर किए थे। पूरी दुनिया में अमरीकी सरकार की कथनी व करनी की पोल खुल गई थी। पोल इतनी प्रामाणिक थी कि अमरीका से कोई जवाब देते नहीं बना। अमरीका ही नहीं, कई देशों की सरकारों, राजनेताओं, नौकरशाहों और अमीरों की पोल खोलने में जूलियन असांजे अग्रणी रहे। वे आज भी कई देशों की सरकारों की आंख की किरकिरी बने हुए हैं। विकीलीक्स का ताजा रहस्योद्घाटन राजीव गांधी और जॉर्ज फर्नांडीज को लेकर किया गया है। हालांकि कई लोग जूलियन असांजे को परम्परागत पत्रकार नहीं मानते, लेकिन असांजे ने जो काम किया, वह खोजी पत्रकारिता-जगत में मील का पत्थर बन गया।
पत्रकारिता-जगत में ऐसा ही कार्य फिर हुआ है। इस बार यह कार्य एक अकेले पत्रकार की बजाय खोजी पत्रकारों के एक अन्तरराष्ट्रीय समूह ने किया है। अगर आप आई.सी.आई.जे. (इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टीगेटिव जर्नलिस्ट्स) के दावे को माने तो यह सचमुच पत्रकारिता-जगत की अद्भुत घटना है। इस समूह ने काला धन विदेश में छिपाने वाले देशों और लोगों के बारे में जो दस्तावेजी सबूत एकत्र किए हैं, वे आंख खोल देने वाले हैं। हजारों स्वयंसेवी संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आन्दोलनकारियों के प्रयासों के बावजूद सरकारों के कानों में जूं तक नहीं रेंगती। ज्यादातर देशों की सरकारें और अमीरों की मिलीभगत के चलते काले धन की समस्या का आज तक कोई समाधान नहीं हो पाया। माना जाता है कि अगर काला धन नहीं छिपाया जाए और टैक्स चोरी नहीं की जाए, तो दुनिया में गरीबी और भुखमरी खत्म हो सकती है। लेकिन इस मामले में क्या पूंजीवादी और क्या कम्युनिस्ट, सभी देशों में एक-सा हाल है। आई.सी.आई.जे. की रिपोर्ट के अनुसार विदेशों में कंपनियों और ट्रस्टों के जरिए निवेश तथा गोपनीय वित्तीय लेन-देन करने वाले 170 देशों की सूची उसके पास हैं। आंकड़ा सुनकर चौंकिएगा नहीं, 1 लाख 20 हजार कंपनियां उन देशों में खुली हुई हैं, जिन्हें 'टैक्स हैवन' देश कहा जाता है। काला धन छिपाने या उसे सफेद करने के लिए दुनिया भर के अमीरों में यह चलन किस कदर आम है, यह खोजी पत्रकारों के इस समूह की रिपोर्ट में बताया गया है। ब्रिटिश वर्जिन आइलैण्ड्स में अमरीका, कनाडा, चीन, भारत, पाकिस्तान, ईरान, थाईलैण्ड, मंगोलिया, इंडोनेशिया आदि दुनिया भर के अनेक देशों की कंपनियों और लोगों ने निवेश कर रखे हैं।
आई.सी.आई.जे. का दावा है कि उसके पास लाखों दस्तावेज हैं, जिनसे मालूम चलता है कि ऐसी कंपनियों और लोगों के बीच क्या गठजोड़ है तथा कब कितना नकद धन कहां, किसे हस्तान्तरित किया गया। समूह ने दुनिया भर के लोगों सहित ६१२ भारतीयों के नाम भी उजागर किए हैं, जिनमें ज्यादातर उद्योग-जगत के लोग हैं। इनमें सीबीआई और आयकर विभाग की जांच के दायरे में आए कई उद्यमी हैं। विदेशों में भारतीय नागरिकों के काले धन को लेकर बहुत कुछ लिखा-कहा जा चुका है। केन्द्र सरकार को सब मालूम है। वह काले धन के खिलाफ कुछ भी क्यों नहीं करना चाहती, यह भी सब जानते हैं। कमोबेश यही हालात बाकी देशों के हैं। हालांकि कुछ देशों की सरकारों ने पहल की है, लेकिन ठोस परिणाम सामने नहीं आए। कारण साफ है, काले धन का कारोबार करने वालों की ऊंची पहुंच, सत्ता में दखल, कानूनी पेचीदगियां और सरकारों के संरक्षण के चलते उनकी चोरी पकडऩा मुश्किल और चुनौती भरा काम रहा है, लेकिन सबूतों के साथ जिस व्यापक स्तर पर (25 लाख फाइलें) आई.सी.आई.जे. ने दस्तावेज एकत्र किए हैं, उन्हें झाुठलाना किसी के लिए भी आसान नहीं है। आई.सी.आई.जे.160 खोजी पत्रकारों का अन्तरराष्ट्रीय संगठन है। ये पत्रकार 60 से अधिक देशों के बाशिन्दे हैं। वर्ष 1997 में स्थापित किए गए इस संगठन का मुख्यालय वाशिंगटन यानी उसी अमरीका में है, जो जूलियन असांजे को किसी भी कीमत पर हासिल करना चाहता है। फर्क इतना है कि असांजे अकेले थे और उनकी कार्य-प्रणाली का केन्द्र-बिन्दु अमरीका था। इसके उलट आई.सी.आई.जे. एक अन्तरराष्ट्रीय समूह है, जिसमें दुनिया के कई जाने-माने खोजी पत्रकार शामिल हैं। साथ ही इस समूह की कार्यप्रणाली का केन्द्र कोई एक राष्ट्र न होकर समूची दुनिया है। यही वजह है कि इस समूह का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। वैश्विक स्तर पर भी इसने अपनी साख कायम की है। आई.सी.आई.जे. के सलाहकार मंडल में बिल कोवाश, रोजनल कैमन एल्वीस, फिलिप नाइटले, ग्वेन लिस्टर, ब्रांट हस्टन जैसे पत्रकार हैं। आस्ट्रेलियन पत्रकार गेराल्ड रील समूह के डायरेक्टर तथा अर्जेन्टाइना की मरिना वाकर ग्वारा डिप्टी डायरेक्टर हैं। रील को खोजी पत्रकारिता करते हुए रिपोर्टर और सम्पादक के तौर पर २६ वर्षों का अनुभव है। उन्होंने 'सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड' तथा 'द एज' जैसे अखबारों में काम किया। आई.सी.आई.जे. का उद्देश्य खोजी पत्रकारिता के जरिए बेहतर दुनिया के निर्माण में योगदान करना है। समूह राष्ट्रीय सीमाओं में बंधकर कार्य करने की बजाय वैश्विक दृष्टिकोण अपनाता है। उसका कार्य क्षेत्र सीमा पार की आपराधिक गतिविधियों, भ्रष्टाचार और सत्ता-शक्ति को उत्तरदायित्वपूर्ण बनाने पर केन्द्रित है। समूह का मानना है कि विकास और अंतरराष्ट्रीयकरण से मानव समाज पर कई तरह के दबाव बढ़ गए हैं। शक्ति-सम्पन्न लोग सत्ता और बाजार पर काबिज होकर जन हित की अनदेखी कर रहे हैं। ऐसे हालात में जब पत्रकारिता को अपनी आंख और कान खुले रखने हैं और खोजी पत्रकारिता की दुनिया को सबसे अधिक जरूरत है, तब आई.सी.आई.जे. जैसे समूह संगठन की भूमिका और अधिक बढ़ जाती है। इस समूह में पत्रकारों के अलावा अनेक देशों के मीडिया संस्थान भी सम्बद्ध हैं। इनमें प्रमुख हैं— बीबीसी वल्र्ड सर्विस, द इंटरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून, ला मोन्डे (फ्रांस), अल मुन्डो (स्पैन), 'त्राऊ' (नीदरलैण्ड्स), फोहा दे साओ पालो (ब्राजील), ला सोइन (बैल्जियम), नोवाया गजेटा (रूस), द साउथ चाइना मोर्निंग पोस्ट (हांगकांग), द गार्जियन (ब्रिटेन), द संडे टाइम्स (ब्रिटेन), द हफिंग्टन पोस्ट (अमरीका), द एज (आस्ट्रेलिया), द इंडियन एक्सप्रेस (भारत)। आई.सी.आई.जे. हर दो साल बाद खोजी पत्रकारिता के लिए एक अन्तरराष्ट्रीय स्पर्धा प्रायोजित करता है, जिसके तहत चयनित पत्रकार को डेनियल पर्ल अवार्ड से नवाजा जाता है। बहरहाल, इस पत्रकार समूह ने गोपनीय निवेश और काले धन को लेकर जो तथ्य उजागर किए हैं, वह अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर खोजी पत्रकारिता का बेहतरीन उदाहरण है।
(readerseditor.blogspot.in से साभार)
आई.सी.आई.जे. 160 खोजी पत्रकारों का अन्तरराष्ट्रीय संगठन है। ये पत्रकार 60 से अधिक देशों के बाशिन्दे हैं। वर्ष 1997 में स्थापित किए गए इस संगठन का मुख्यालय वाशिंगटन यानी उसी अमरीका में है, जो जूलियन असांजे को किसी भी कीमत पर हासिल करना चाहता है। फर्क इतना है कि असांजे अकेले थे और उनकी कार्य-प्रणाली का केन्द्र-बिन्दु अमरीका था। आपको याद होगा, अमरीका जैसा शक्तिशाली देश एक खोजी पत्रकार जूलियन असांजे का जानी-दुश्मन बन गया था। विकीलीक्स के संस्थापक इस पत्रकार ने कई गोपनीय दस्तावेज उजागर किए थे। पूरी दुनिया में अमरीकी सरकार की कथनी व करनी की पोल खुल गई थी। पोल इतनी प्रामाणिक थी कि अमरीका से कोई जवाब देते नहीं बना। अमरीका ही नहीं, कई देशों की सरकारों, राजनेताओं, नौकरशाहों और अमीरों की पोल खोलने में जूलियन असांजे अग्रणी रहे। वे आज भी कई देशों की सरकारों की आंख की किरकिरी बने हुए हैं। विकीलीक्स का ताजा रहस्योद्घाटन राजीव गांधी और जॉर्ज फर्नांडीज को लेकर किया गया है। हालांकि कई लोग जूलियन असांजे को परम्परागत पत्रकार नहीं मानते, लेकिन असांजे ने जो काम किया, वह खोजी पत्रकारिता-जगत में मील का पत्थर बन गया।
पत्रकारिता-जगत में ऐसा ही कार्य फिर हुआ है। इस बार यह कार्य एक अकेले पत्रकार की बजाय खोजी पत्रकारों के एक अन्तरराष्ट्रीय समूह ने किया है। अगर आप आई.सी.आई.जे. (इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टीगेटिव जर्नलिस्ट्स) के दावे को माने तो यह सचमुच पत्रकारिता-जगत की अद्भुत घटना है। इस समूह ने काला धन विदेश में छिपाने वाले देशों और लोगों के बारे में जो दस्तावेजी सबूत एकत्र किए हैं, वे आंख खोल देने वाले हैं। हजारों स्वयंसेवी संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आन्दोलनकारियों के प्रयासों के बावजूद सरकारों के कानों में जूं तक नहीं रेंगती। ज्यादातर देशों की सरकारें और अमीरों की मिलीभगत के चलते काले धन की समस्या का आज तक कोई समाधान नहीं हो पाया। माना जाता है कि अगर काला धन नहीं छिपाया जाए और टैक्स चोरी नहीं की जाए, तो दुनिया में गरीबी और भुखमरी खत्म हो सकती है। लेकिन इस मामले में क्या पूंजीवादी और क्या कम्युनिस्ट, सभी देशों में एक-सा हाल है। आई.सी.आई.जे. की रिपोर्ट के अनुसार विदेशों में कंपनियों और ट्रस्टों के जरिए निवेश तथा गोपनीय वित्तीय लेन-देन करने वाले 170 देशों की सूची उसके पास हैं। आंकड़ा सुनकर चौंकिएगा नहीं, 1 लाख 20 हजार कंपनियां उन देशों में खुली हुई हैं, जिन्हें 'टैक्स हैवन' देश कहा जाता है। काला धन छिपाने या उसे सफेद करने के लिए दुनिया भर के अमीरों में यह चलन किस कदर आम है, यह खोजी पत्रकारों के इस समूह की रिपोर्ट में बताया गया है। ब्रिटिश वर्जिन आइलैण्ड्स में अमरीका, कनाडा, चीन, भारत, पाकिस्तान, ईरान, थाईलैण्ड, मंगोलिया, इंडोनेशिया आदि दुनिया भर के अनेक देशों की कंपनियों और लोगों ने निवेश कर रखे हैं।
आई.सी.आई.जे. का दावा है कि उसके पास लाखों दस्तावेज हैं, जिनसे मालूम चलता है कि ऐसी कंपनियों और लोगों के बीच क्या गठजोड़ है तथा कब कितना नकद धन कहां, किसे हस्तान्तरित किया गया। समूह ने दुनिया भर के लोगों सहित ६१२ भारतीयों के नाम भी उजागर किए हैं, जिनमें ज्यादातर उद्योग-जगत के लोग हैं। इनमें सीबीआई और आयकर विभाग की जांच के दायरे में आए कई उद्यमी हैं। विदेशों में भारतीय नागरिकों के काले धन को लेकर बहुत कुछ लिखा-कहा जा चुका है। केन्द्र सरकार को सब मालूम है। वह काले धन के खिलाफ कुछ भी क्यों नहीं करना चाहती, यह भी सब जानते हैं। कमोबेश यही हालात बाकी देशों के हैं। हालांकि कुछ देशों की सरकारों ने पहल की है, लेकिन ठोस परिणाम सामने नहीं आए। कारण साफ है, काले धन का कारोबार करने वालों की ऊंची पहुंच, सत्ता में दखल, कानूनी पेचीदगियां और सरकारों के संरक्षण के चलते उनकी चोरी पकडऩा मुश्किल और चुनौती भरा काम रहा है, लेकिन सबूतों के साथ जिस व्यापक स्तर पर (25 लाख फाइलें) आई.सी.आई.जे. ने दस्तावेज एकत्र किए हैं, उन्हें झाुठलाना किसी के लिए भी आसान नहीं है। आई.सी.आई.जे.160 खोजी पत्रकारों का अन्तरराष्ट्रीय संगठन है। ये पत्रकार 60 से अधिक देशों के बाशिन्दे हैं। वर्ष 1997 में स्थापित किए गए इस संगठन का मुख्यालय वाशिंगटन यानी उसी अमरीका में है, जो जूलियन असांजे को किसी भी कीमत पर हासिल करना चाहता है। फर्क इतना है कि असांजे अकेले थे और उनकी कार्य-प्रणाली का केन्द्र-बिन्दु अमरीका था। इसके उलट आई.सी.आई.जे. एक अन्तरराष्ट्रीय समूह है, जिसमें दुनिया के कई जाने-माने खोजी पत्रकार शामिल हैं। साथ ही इस समूह की कार्यप्रणाली का केन्द्र कोई एक राष्ट्र न होकर समूची दुनिया है। यही वजह है कि इस समूह का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। वैश्विक स्तर पर भी इसने अपनी साख कायम की है। आई.सी.आई.जे. के सलाहकार मंडल में बिल कोवाश, रोजनल कैमन एल्वीस, फिलिप नाइटले, ग्वेन लिस्टर, ब्रांट हस्टन जैसे पत्रकार हैं। आस्ट्रेलियन पत्रकार गेराल्ड रील समूह के डायरेक्टर तथा अर्जेन्टाइना की मरिना वाकर ग्वारा डिप्टी डायरेक्टर हैं। रील को खोजी पत्रकारिता करते हुए रिपोर्टर और सम्पादक के तौर पर २६ वर्षों का अनुभव है। उन्होंने 'सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड' तथा 'द एज' जैसे अखबारों में काम किया। आई.सी.आई.जे. का उद्देश्य खोजी पत्रकारिता के जरिए बेहतर दुनिया के निर्माण में योगदान करना है। समूह राष्ट्रीय सीमाओं में बंधकर कार्य करने की बजाय वैश्विक दृष्टिकोण अपनाता है। उसका कार्य क्षेत्र सीमा पार की आपराधिक गतिविधियों, भ्रष्टाचार और सत्ता-शक्ति को उत्तरदायित्वपूर्ण बनाने पर केन्द्रित है। समूह का मानना है कि विकास और अंतरराष्ट्रीयकरण से मानव समाज पर कई तरह के दबाव बढ़ गए हैं। शक्ति-सम्पन्न लोग सत्ता और बाजार पर काबिज होकर जन हित की अनदेखी कर रहे हैं। ऐसे हालात में जब पत्रकारिता को अपनी आंख और कान खुले रखने हैं और खोजी पत्रकारिता की दुनिया को सबसे अधिक जरूरत है, तब आई.सी.आई.जे. जैसे समूह संगठन की भूमिका और अधिक बढ़ जाती है। इस समूह में पत्रकारों के अलावा अनेक देशों के मीडिया संस्थान भी सम्बद्ध हैं। इनमें प्रमुख हैं— बीबीसी वल्र्ड सर्विस, द इंटरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून, ला मोन्डे (फ्रांस), अल मुन्डो (स्पैन), 'त्राऊ' (नीदरलैण्ड्स), फोहा दे साओ पालो (ब्राजील), ला सोइन (बैल्जियम), नोवाया गजेटा (रूस), द साउथ चाइना मोर्निंग पोस्ट (हांगकांग), द गार्जियन (ब्रिटेन), द संडे टाइम्स (ब्रिटेन), द हफिंग्टन पोस्ट (अमरीका), द एज (आस्ट्रेलिया), द इंडियन एक्सप्रेस (भारत)। आई.सी.आई.जे. हर दो साल बाद खोजी पत्रकारिता के लिए एक अन्तरराष्ट्रीय स्पर्धा प्रायोजित करता है, जिसके तहत चयनित पत्रकार को डेनियल पर्ल अवार्ड से नवाजा जाता है। बहरहाल, इस पत्रकार समूह ने गोपनीय निवेश और काले धन को लेकर जो तथ्य उजागर किए हैं, वह अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर खोजी पत्रकारिता का बेहतरीन उदाहरण है।
(readerseditor.blogspot.in से साभार)
Saturday, 29 November 2014
'मीडिया हूं मैं' से उद्धृत गणेश शंकर विद्यार्थी की टिप्पणी
‘आज हमें जिहाद की जरूरत है- इस धर्म के ढोंग के खिलाफ, इस धार्मिक तुनकमिजाजी के खिलाफ। जातिगत झगड़े बढ़ रहे हैं। खून की प्यास लग रही है। एक-दूसरे को फूटी आँखों भी हम देखना नहीं चाहते। अविश्वास, भयातुरता और धर्माडम्बर के कीचड़ में फँसे हुये हम नारकीय जीव, यह समझ रहे हैं कि हमारी सिर फुटौव्वल से धर्म की रक्षा हो रही है। हमें आज शंख उठाना है इस धर्म के विरुद्ध जो तर्क, बुद्धि और अनुभव की कसौटी पर ठीक नहीं उतर सकता। भारतवासियो, एक बात सदा ध्यान में रखो! धार्मिक कट्टरता का युग चला गया। आज से 500 वर्ष पूर्व यूरोप जिस अंधविश्वास, दम्भ और धार्मिक बर्बरता के युग में था, उस युग में भारतवर्ष को घसीटकर मत ले जाओ। जो मूर्खतायें अब तक हमारे व्यक्तिगत जीवन का नाश कर रही थीं, वे अब राष्ट्रीय प्रांगण में फैलकर हमारे बचे-खुचे मानव-भावों का लोप कर रही हैं। जिनके कारण हमारा व्यक्त्तित्व पतित होता गया, अब उन्हीं के कारण हमारा देश तबाह हो रहा है। हिन्दू-मुसलमानों के झगड़ों और हमारी कमजोरियों को दूर करने का केवल एक यही तरीका है कि समाज के कुछ सत्यनिष्ठ और सीधे दृढ़-विश्वासी पुरुष धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध जिहाद कर दें। जब तक यह मूर्खता नष्ट न होगी तब तक देश का कल्याण न होगा। समझौते कर लेने, नौकरियों का बँटवारा कर लेने और अस्थायी सुलहनामों को लिखकर हाथ काले करने से देश को स्वतन्त्रता न मिलेगी। हाथ में खड्ग लेकर तर्क और ज्ञान की प्रखर करताल लेकर आगे बढ़ने की जरूरत है। पाप के गड्ढे राष्ट्र के राजमार्ग पर न खोदना चाहिये, क्योंकि भारत की राष्ट्रीयता का रथ उस पर होकर गुजर रहा है। हम चाहते हैं कि कुछ आदमी ऐसे निकल आयें- जिनमें हिन्दू भी हों और मुसलमान भी- जोकि इन सब मूर्खताओं की, जिनके हिन्दू और मुसलमान दोनों शिकार हो रहे हैं- तीव्र निन्दा करें। यह निश्चय है कि पहले-पहल इनकी कोई न सुनेगा। इन पर पत्थर फेंके जायेंगे। ये प्रताड़ित और निन्दा-भाजन होंगे। पर अपने सिर पर सारी निंदा और सारी कटुता को लेकर जो आगे आना चाहते हैं, उन्हीं को राष्ट्र यह निमंत्रण दे रहा है। सीस उतारे भुईं धरै, ता पर राखे पाँव, ऐसे जो हों, वे ही आवें।'
'मीडिया हूं मैं' से उद्धृत माखनलाल चतुर्वेदी
'मैंने तो जर्नलिज्म में साहित्य को स्थान दिया था। बुद्धि के ऐरावत पर म्यूनिसिपल का कूड़ा ढोने का जो अभ्यास किया जा रहा है अथवा ऐसे प्रयोग से जो सफलता प्राप्त की जा रही है उसे मैं पत्रकारिता नहीं मानता। मुफ्त में पढ़ने की पद्धति हिंदी से अधिक किसी भाषा में नहीं। रोटी, कपड़ा, शराब का मूल्य तो वह देता है पर ज्ञान और ज्ञान प्रसाधन का मूल्य चुकाने को वह तैयार नहीं। हिंदी का सबसे बड़ा शत्रु यही है। हिंदी भाषा का मासिक साहित्य एक बेढंगे और गए बीते जमाने की चाल चल रहा है। यहां बरसाती कीड़ों की तरह पत्र पैदा होते हैं। फिर यह आश्चर्य नहीं कि वे शीघ्र ही क्यों मर जाते हैं। यूरोप में हर एक पत्र अपनी एक निश्चित नीति रखता है। हिंदी वालों को इस मार्ग में नीति की गंध नहीं लगी। यहां वाले जी में आते ही, हमारे समान चार पन्ने निकाल बैठने वाले हुआ करते हैं। उनका न कोई आदर्श और उद्देश्य होता है, न दायित्व। किसी भी देश या समाज की दशा का वर्तमान इतिहास जानना हो तो वहां के किसी सामयिक पत्र को उठाकर पढ़ लीजिए, वह आपसे स्पष्ट कर देगा। राष्ट्र के संगठन में पत्र जो कार्य करते हैं वह अन्य किसी उपकरण से होना कठिन है। समाचारपत्रों की घटती लोकप्रियता के लिए दोषी वे लोग ही नहीं हैं जो पत्र खरीदकर नहीं पढ़ते। अधिक अंशों में वे लोग भी हैं जो पत्र संपादित और प्रकाशित करते हैं। उनमें अपने लोकमत की आत्मा में पहुंचने का सामर्थ्य नहीं। वे अपनी परिस्थिति को इतनी गंदी और निकम्मी बनाए रखते हैं, जिससे उनके आदर करने वालों का समूह नहीं बढ़ता है।'
'मीडिया हूं मैं' से उद्धृत योगेंद्र यादव की टिप्पणी
अधिकांश अख़बार और टीवी चैनल पूंजीपति या कंपनी की मिलकीयत में हैं और मालिक मीडिया का इस्तेमाल अपने व्यावसायिक हितों के लिए करना चाहता है। अनेक मीडिया घरानों के मालिक या तो रियल एस्टेट का धंधा चलाते हैं, या फिर रियल एस्टेट में अनाप-शनाप पैसा कमाने वाले टीवी चैनेल खोल लेते हैं। जो अपने अख़बार या चैनल का प्रसार कर उससे पैसा कमाना चाहे, उसे तो धर्मात्मा मानना चाहिए। असली दिक़्कत यह है कि मीडिया का इस्तेमाल दलाली और ब्लैकमेल के लिए भी होता है। मीडिया और पूँजी के इस नापाक रिश्ते पर कुछ बंदिशें लगनी जरूरी हैं। हर अख़बार या चैनल के लिए यह अनिवार्य होना चाहिए कि वह अपने मालिक के हर अन्य व्यावसायिक हितों की घोषणा करे। मालिक के स्वार्थ से जुड़ी हर ख़बर में इस संबंध का ज़िक्र करना ज़रूरी हो। ख़बरों की ख़रीद फ़रोख्त पर पाबंदी लगे। मीडिया और राजनीति का रिश्ता परोक्ष से प्रत्यक्ष तक पूरी इबारत से बंधा है। देश के कई इलाक़ों में राजनेता या उनके परिवार मीडिया के मालिक हैं और उसका इस्तेमाल खुल्लमखुल्ला अपनी राजनीति के लिए करते हैं। एक मायने में यह प्रत्यक्ष नियंत्रण कम ख़तरनाक़ है क्योंकि हर कोई इसे जानता है। इससे ज़्यादा ख़तरनाक़ है 'स्वतंत्र' मीडिया पर पिछले दरवाज़े से कब्ज़ा। तमाम राज्य सरकारें अख़बारों पर न्यूज़प्रिंट, विज्ञापन और प्रलोभन के ज़रिए दबाव बनाती हैं। मीडियाकर्मियों की सामाजिक पृष्ठभूमि के आंकड़े सार्वजनिक करने की ज़रूरत है। सीएसडीएस के एक शोध ने देश के शीर्ष हिंदी और अंग्रेज़ी अख़बारों की खबरों के विश्लेषण की एक ख़ौफ़नाक तस्वीर पेश की है। इस विश्लेषण के मुताबिक शीर्ष छह अख़बारों में कुल छपी खबरों में महज़ दो फ़ीसद गांव-देहात के बारे में होती हैं। हरियाणा में चौटाला सरकार जैसी सरकार के कार्यकाल के दौरान इन हथकंडों में दादागिरी भी जुड़ जाती है, लेकिन नीतीश कुमार जैसे नफ़ीस और लोकप्रिय मुख्यमंत्री भी मीडिया को "मैनेज" करने के हथकंडे अपनाते पाए जाते हैं। कश्मीर और पूर्वोत्तर में सुरक्षाबल भी कई बार मीडिया पर बंदिश लगाते हैं। मीडिया को इस दबाव से मुक्त करने के लिए चुनाव आयोग को मीडिया और राजनीति के रिश्तों की शिनाख़्त करने का अधिकार मिलाना चाहिए। ----------Adhikānśa aḵẖabāra aura ṭīvī cainala pūn̄jīpati yā kampanī kī milakīyata mēṁ haiṁ aura mālika mīḍiyā kā istēmāla apanē vyāvasāyika hitōṁ kē li'ē karanā cāhatā hai. Anēka mīḍiyā gharānōṁ kē mālika yā tō riyala ēsṭēṭa kā dhandhā calātē haiṁ, yā phira riyala ēsṭēṭa mēṁ anāpa - śanāpa paisā kamānē vālē ṭīvī cainēla khōla lētē haiṁ. Jō apanē aḵẖabāra yā cainala kā prasāra kara usasē paisā kamānā cāhē, usē tō dharmātmā mānanā cāhi'ē. Asalī diqkata yaha hai ki mīḍiyā kā istēmāla dalālī aura blaikamēla kē li'ē bhī hōtā hai. Mīḍiyā aura pūm̐jī kē isa nāpāka riśtē para kucha bandiśēṁ laganī jarūrī haiṁ. Hara aḵẖabāra yā cainala kē li'ē yaha anivārya hōnā cāhi'ē ki vaha apanē mālika kē hara an'ya vyāvasāyika hitōṁ kī ghōṣaṇā karē. Mālika kē svārtha sē juṛī hara ḵẖabara mēṁ isa sambandha kā zikra karanā zarūrī hō. Ḵẖabarōṁ kī ḵẖarīda farōkhta para pābandī lagē. Mīḍiyā aura rājanīti kā riśtā parōkṣa sē pratyakṣa taka pūrī ibārata sē bandhā hai. Dēśa kē ka'ī ilāqōṁ mēṁ rājanētā yā unakē parivāra mīḍiyā kē mālika haiṁ aura usakā istēmāla khullamakhullā apanī rājanīti kē li'ē karatē haiṁ. Ēka māyanē mēṁ yaha pratyakṣa niyantraṇa kyōṅki hara kō'ī isē jānatā hai kama ḵẖataranāqa hai. Isasē zyādā ḵẖataranāqa hai' svatantra' mīḍiyā para pichalē daravāzē sē kabzā. Tamāma rājya sarakārēṁ aḵẖabārōṁ para n'yūzapriṇṭa, vijñāpana aura pralōbhana kē zari'ē dabāva banātī haiṁ. Mīḍiyākarmiyōṁ kī sāmājika pr̥ṣṭhabhūmi kē āṅkaṛē sārvajanika karanē kī zarūrata hai. Sī'ēsaḍī'ēsa kē ēka śōdha nē dēśa kē śīrṣa hindī aura aṅgrēzī aḵẖabārōṁ kī khabarōṁ kē viślēṣaṇa kī ēka ḵẖaufanāka tasvīra pēśa kī hai. Isa viślēṣaṇa kē mutābika śīrṣa chaha aḵẖabārōṁ mēṁ kula chapī khabarōṁ mēṁ mahaza dō fīsada gānva - dēhāta kē bārē mēṁ hōtī haiṁ. Hariyāṇā mēṁ cauṭālā sarakāra jaisī sarakāra kē kāryakāla kē daurāna ina hathakaṇḍōṁ mēṁ dādāgirī bhī juṛa jātī hai, lēkina nītīśa kumāra jaisē nafīsa aura lōkapriya mukhyamantrī bhī mīḍiyā kō" mainēja" karanē kē hathakaṇḍē apanātē pā'ē jātē haiṁ. Kaśmīra aura pūrvōttara mēṁ surakṣābala bhī ka'ī bāra mīḍiyā para bandiśa lagātē haiṁ. Mīḍiyā kō isa dabāva sē mukta karanē kē li'ē cunāva āyōga kō mīḍiyā aura rājanīti kē riśtōṁ kī śināḵẖta karanē kā adhikāra milānā cāhi'ē.
जीवन जगत
आदमी के आंसुओं में हंसी के भी रस्ते हैं,
रोओ किसी एक पर हजार लोग हंसते हैं।
कभी फुटपाथ, कभी पटरी के आसपास,
दिन भर उजड़ते हैं, रात भर बसते हैं।
रोओ किसी एक पर हजार लोग हंसते हैं।
कभी फुटपाथ, कभी पटरी के आसपास,
दिन भर उजड़ते हैं, रात भर बसते हैं।
Ādamī kē ānsu'ōṁ mēṁ hansī kē bhī rastē haiṁ,
rō'ō kisī ēka para hajāra lōga hansatē haiṁ.
Kabhī phuṭapātha, kabhī paṭarī kē āsapāsa,
dina bhara ujaṛatē haiṁ, rāta bhara basatē haiṁ.
rō'ō kisī ēka para hajāra lōga hansatē haiṁ.
Kabhī phuṭapātha, kabhī paṭarī kē āsapāsa,
dina bhara ujaṛatē haiṁ, rāta bhara basatē haiṁ.
Subscribe to:
Posts (Atom)





