Tuesday, 21 October 2014

कटघरे में कैलाश सत्यार्थी / अजय प्रकाश

वर्ष 2006 में कैलाश सत्यार्थी पहली बार नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामित हुए थे. उस वक्त हिंदी साप्ताहिक अख़बार द संडे पोस्ट ने उनके काम, व्यक्तित्व, विवाद और जीवन के आयामों का जायजा लेते हुए एक स्पेशल रिपोर्ट प्रकाशित की थी. यह रिपोर्ट इस वर्ष के नोबल शांति पुरस्कार के विजेता कैलाश सत्यार्थी के काम की जांच करते हुए उनके जिस रूप को सामने लाती है वह इस पुरस्कार के विजेता को कठघरे में खड़ा करने के साथ पुरस्कार की चयन प्रक्रिया को ही विवादित बना देता है. ऐसा शायद पहली ही बार हुआ है कि इतने बड़े सम्मान से एक भारतीय के सम्मानित होने पर भी प्रशंसा से अधिक सवाल उठाए जा रहे हैं. ऐसा क्यों हो रहा है इसे जानने के लिए पढ़िए वर्ष 2006 में द संडे पोस्ट में प्रकाशित अजय प्रकाश की स्पेशल रिपोर्ट- विष्णु शर्मा


कैलाश सत्यार्थी का नाम आते ही जेहन में उन बेहाल बच्चों की तस्वीर उभरती है जिन्हें असमय श्रम की भट्टी से मुक्ति दिलायी गयी थी. यह मुक्ति कैलाश सत्यार्थी और उनकी संस्था 'बचपन बचाओ' के कार्यकर्ताओं ने दिलायी. 'बचपन बचाओ' के कार्यकर्ता इन बच्चों को उद्योग मालिकों के यहां से आजाद कराते हैं जहां वे मामूली पैसों पर मजदूरी करने को विवश होते हैं. इसी नेक मुहिम के चलते इस वर्ष कैलाश सत्यार्थी नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामित किये गये हैं. लेकिन कैलाश सत्यार्थी के पुराने सहयोगी उन्हें सवालों—संदेह के घेरे में खड़ा करते हैं जो उनके दूसरे रूप को सामने लाता है. उनका यह दूसरा पहलू लोगों के बीच निर्मित उनकी धवल छवि को धूमिल करता है.

kailash-satyarthiफैक्ट्रियों में दम तोड़ रहे बचपन को आजाद करने के नाम पर दुनियाभर की दानदाता एजेंसियों से 'दक्षिणा' लेने वाले कैलाश सत्यार्थी पर करोड़ों रुपये का घपला करने तथा ट्रस्ट कागजातों के साथ हेराफेरी करने का आरोप है. इन्होंने न सिर्फ मुक्ति प्रतिष्ठान से संचालित 'मुक्ति आश्रम' पर कब्जा कर लिया है, बल्कि स्वामी अग्निवेश के पावर आॅफ अटॉर्नी वाले शेख सराय की बिल्डिंग को भी हथिया लिया है. फंडिंग का रास्ता खुलते देख सत्यार्थी ने दिल्ली के इब्राहिम पुर स्थित 'मुक्ति आश्रम' को संपत्ति उगाहने के केंद्र के रूप में विकसित किया और एक के बाद एक कई ट्रस्ट खोले. महत्वपूर्ण बात तो ये रही कि 'मुक्ति आश्रम' में ही सत्यार्थी ने तमाम दूसरे ट्रस्टों के पंजीकृत कार्यालय खोले, मगर अन्य ट्रस्टियों को इसकी मौखिक जानकारी तक नहीं दी. हद तो तब हो गयी जब ट्रस्टी शेओताज सिंह, राजेश त्यागी, प्रभात पंत और खूबीराम की सहमति के बगैर 'आवा' नाम का एक नया ट्रस्ट अस्तित्व में आया और उसके भी ट्रस्टी कैलाश सत्यार्थी और उनकी पत्नी सुमेधा सत्यार्थी ही थे. तकनीकी तौर पर बचने के लिए सत्यार्थी ने एक नई स्कीम पेश की और सालभर में 25 रुपये दान में देने वालों को भी ट्रस्टी बनाया. इसका सिर्फ एक मकसद रहा कि आगे चलकर कोई यह न कहे कि उनके ज्यादातर ट्रस्ट सत्यार्थी दंपत्ति के प्रबंधकीय और मालिकाना हक में चलते हैं.

आंखिन देखी सच

दिल्ली के सुदूर गांव इब्राहिमपुर में 'मुक्ति आश्रम' परिसर में 'बचपन बचाओ आंदोलन' के नारे लिखे हैं. लगभग 3.5 एकड़ में स्थित यह आश्रम फार्म हाउस मार्का है. अंदर बचपन की किलकारियां नहीं कुत्तों की आवाज है. यहां अनाथ बच्चे नहीं बल्कि विदेशी ब्रांड के कुत्ते रहते हैं. इन कुत्तों की देखरेख के लिए दरबान लगे हैं. आगंतुक कक्ष में लालटेन में भी बल्ब लगा हुआ है. एक—दो कट्ठे में बनी सामने एक ईमारत खड़ी है. कर्मचारी बताते हैं कि यहीं साठ बच्चे छह महीने के लिए आते हैं. यानी प्रत्येक साल यहां 120 बच्चों को शिक्षा—दीक्षा दी जाती है. परंतु बाल मजदूरी से पचासों हजार बच्चों को सत्यार्थी का संगठन मुक्त कराता है. बहरहाल, इस समय वाले साठ बच्चे कहां हैं? पूछने पर जवाब मिलता है अभी नहीं हैं. यहां हर आदमी का अपना एक ग्रेड है. दरबान और पानी लाने वाली दाई को छोड़ सब सभ्रांत दिखते हैं. सवाल जवाब कर रहा कर्मचारी भी नौकरी छोड़ जाने वाला है. वह सुमन जी (मुक्ति आश्रम की निवर्तमान निदेशक) का हर एक वाक्य के बाद जिक्र करता है. यहां जो कुछ भी हो रहा है वह इससे संतुष्ट नही है. अपनी भावनायें व्यक्त करते हुए कहता है—'आपके पास तो कहने का औजार है हमारे पास क्या है.' चाय खत्म कर बाहर निकलने पर सूख रही फूल—पत्तियों से घिरा 'बालिका मुक्ति आश्रम' दिख जाता है. यहां एक भी लड़की नहीं है जबकि दावा चालीस का किया जाता है. वहां की महिला कर्मचारी बताती है कि दस—बारह थीं, दो—चार दिन पहले चली गयीं.

देश ही नहीं दुनियाभर के 'कॉर्पोरेट बुद्धिजीवियों' के बीच सुर्खियों में रहने वाले सत्या​र्थी आज अपने जुगाड़ की बदौलत 'नोबल शांति पुरस्कार' के लिए नामित हो गये हैं. एक के बाद एक आधा दर्जन से अधिक ट्रस्ट खोलने वाले सत्यार्थी वही हैं, जिन्होंने झूठी प्रतिष्ठा पाने के लिए पानीपन की एक फैक्टरी पर फर्जी इल्जाम लगाये थे और आपराधिक मुकदमे पर जेल गये. बचपन बचाने से लेकर सूचना के अधिकार की पैरोकारी करने वाले सत्यार्थी किसी तरह की सूचना मांगने पर मामले को दबा जाने में माहिर हैं और हेराफेरी करने में उनका कोई जवाब ही नहीं है. महीने का पखवाड़ा विदेश में बिताने वाले सत्यार्थी के खिलाफ उनके कर्मचारी भी खड़े हो गये हैं. कुछ कर्मचारियों ने उनके खिलाफ अदालत मे मामला दायर किया है.

kailash-satyarthi-1सत्यार्थी ने पैक्स नाम की विदेशी दानदाता एजेंसी की शर्तों के मातहत मुक्ति आश्रम को कर दिया. फंडिंग का रास्ता खुलता देख मध्य प्रदेश के विदिशा वासी सत्यार्थी ने साक्स (SACCS) नाम की भी एक संस्था खोल दी. इस प्रकार सत्यार्थी साउथ एशियन कॉलिशन आॅन चाइल्डहुड सर्विस के स्वनामधन्य चेयरमैन और 'मुक्ति आश्रम' के सेक्रेटरी हो गये. जिसके बाद 1994 में बनाये गये एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन (आव) को इब्राहिमपुर स्थित 'मुक्ति आश्रम' की 14 बीघा 8 बिस्वा जमीन लीज पर दे दी गयी. आगे चलकर बचपन बचाओ फाउंडेशन का निर्माण किया और इस फाउंडेशन का रजिस्टर्ड आॅफिस भी मुक्ति आश्रम को ही रखा. इतना ही नहीं शेख सराय में जनता पार्टी के पूर्व सांसद बापू कालदांते द्वारा सांसद कोटे से दिये गये 24—सी एमआईजी फ्लैट को भी सत्यार्थी ने हथिया लिया. आजकल सुनने में आ रहा है कि शेख सराय का वह फ्लैट सत्यार्थी ने किसी तीसरे को बेच दिया है, ज​बकि उसकी पावर आॅफ अटॉर्नी स्वामी अग्निवेश के पास है. उल्लेखनीय है कि 1982 से 1992 तक बाल शोषण के खिलाफ संगठित तौर पर सत्यार्थी और अग्निवेश ने साथ काम किया.

जनकल्याण का लबादा ओढ़े, जनता और ट्रस्ट की संपत्ति को व्यक्तिगत हितों में इस्तेमाल करने वाले सत्यार्थी का यह विदू्प चेहरा स्वामी अग्निवेश से हुयी एक बातचीत में सामने आया. विदेशी दान के करोड़ों रुपये डकारने वाले शांतिदूत कैलाश सत्यार्थी पर उंगली मुक्ति आश्रम के कर्मचारियों की शिकायत के बाद उठी थी. चारों ट्रस्टियों शेओताज सिंह, खूबीराम, प्रभात पंत, राजेश त्यागी से 'मुक्ति आश्रम' के कर्मचारियों ने सत्यार्थी की मनमानी किये जाने, ट्रस्ट के धन को व्यक्तिगत हितों में इस्तेमाल करने तथा हेरा—फेरी करने के गंभीर आरोप लगाये. इन तमाम आरोपों के मद्देनजर कैलाश सत्यार्थी, सुमेधा सत्यार्थी और एकाउंटेंट विट्ठल राव से जब ट्रस्टी शेओताज सिंह ने सफाई चाही तो सत्यार्थी दंपत्ति ने कोई जवाब नहीं दिया, मगर बिट्ठल राव ने शुरुआत में सहयोग किया. ऐसी स्थिति में उक्त चारों ट्रस्टियों की तरह से एक जांच अधिकारी नियुक्त किया गया. जांच के दौरान सत्यार्थी पर लगाये गये कर्मचारियों के आरोपों की सिलसिलेवार और तथ्यगत पुष्टि हुयी. जांच अधिकारी ने अक्टूबर 1995 में अलीपुर थाने में सत्यार्थी के खिलाफ मामला भी दर्ज कराया.

इसलिए सहयोगियों ने छोड़ा साथ

'कैलाश सत्यार्थी के काम का चरित्र वैसा ही है जैसा कि स्वयंसेवी संगठनों का है. ये संगठन मूलत: इस तरह के सामाजिक काम पैसा कमाने के लिए कर रहे हैं. 'बचपन बचाओ आंदोलन' के मुखिया बाल बंधुआ मजदूरों को मुक्त तो कराते है, परंतु वे बच्चे पुन: उस नर्क में वापस न जायें, इसका कोई विकल्प खड़ा नहीं करते. उनकी आर्थिक समृद्धि का विकल्प खड़ा किये बिना इस तरह के सारे प्रयास बेमानी हैं. कैलाश सत्यार्थी को दूसरे देश के संगठनों से तो समर्थन मिलता है, परंतु संकट की घड़ी में उन्हें अपने ही देश भारत में कोई समर्थक नजर नहीं आता.

आनंदस्वरूप वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता

बात दशकों पहले की है इसलिए मुझे ठीक—ठाक याद नहीे कि मैंने पावर आॅफ अटार्नी बदली थी या नहीं. हां, इतना मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूं कि मैंने पावर आॅफ अटार्नी स्वामी अग्निवेश को दी थी. बाद में कैलाश सत्यार्थी और स्वामी अग्निवेश का आपस में झगड़ा हो गया और उस बीच मेरे पास सत्यार्थी और अग्निवेश दोनों आये थे. मैंने झगड़े में न पड़ते हुए अग्निवेश से कहा था कि 24—सी, शेख सराय वाला मकान दे दें, क्योंकि उस समय मेरे पास रहने के लिए घर नहीं था. लेकिन अग्निवेश ने कहा था कि यह फ्लैट अब विवादों में है जिसका मामला कोर्ट में चल रहा है.

बापू कालदांते, पूर्व सांसद जनता पार्टी

सत्यार्थी कहते हैं कि उन्होंने शिकायतकर्ता चारों ट्रस्टियों को ट्रस्ट से निष्कासित कर दिया है. यह जवाब वे तब देते हैं जब उनकी मनमानी और अनियमितताओं पर सवाल खड़ा होता है. सफाई के लिए 'मुक्ति प्रतिष्ठान' से जुड़े लोगों की बैठक करायी जाती है. उस फैसलाकून बैठक में साजिशन तरीके से फर्जी फोटोस्टेट के दस्तखत वाले नये ट्रस्टियों की बहाली की प्रतियां सत्यार्थी द्वारा दिखायी जाती हैं, जिसमें फर्जी हस्ताक्षर रामशरण जोशी और मधु जोशी के हैं, जबकि उन्होंने बहुत पहले ही ट्रस्ट छोड़ दिया था. हमने इस कागजात की कॉपी कोर्ट में भी लगायी है. अदालत द्वारा सुझाये गये ट्रस्ट कानूनों को ताक पर रखकर सत्यार्थी ने जो मनमानी की है, वह पूर्णतया आपराधिक मामला है. सत्यार्थी दंपत्ति जिन ट्रस्टों में भागीदार रहे हैं उनकी तहकीकात की जाये तो ज्यादातर ट्रस्टों की मैनेजिंग कमेटी में सत्यार्थी पाये जायेंगे.

राजेश त्यागी, वकील सुप्रीम कोर्ट एवं ट्रस्टी 'मुक्ति प्रतिष्ठान'

बहुत पुरानी बात हो गयी है अब तो मैं ट्रस्टी भी नहीं हूं. हां, मुझे इतना याद है कि सत्यार्थी द्वारा किये गये हेर—फेर के खिलाफ शेओताज सिंह ने अदालत में याचिका दायर की थी. यह पूरा मामला सत्यार्थी बनाम अग्निवेश का है. उन्हीं से इस बारे में पूछिये.

प्रभात पंत, मुक्ति प्रतिष्ठान ट्रस्टी

ट्रस्ट का मामला ट्रस्ट में ही निपटा लेने के मकसद से 1994 में स्वामी अग्निवेश के नेतृत्व में आर्य समाज और ट्रस्ट से जुड़े लोगों की आसफ अली रोड पर मीटिंग बुलायी गयी. लेकिन आर्य समाज के कार्यालय में घंटों तक चली इस बैठक का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला. अंतत: सदस्यों ने सर्वसम्मति से सत्यार्थी दंपत्ति को 'मुक्ति प्रतिष्ठान' से निष्कासित कर दिया. चूंकि इब्राहिमपुर का 'मुक्ति आश्रम' जंतर मंतर स्थित 'मुक्ति प्रतिष्ठान' कार्यालय से संबद्ध था लिहाजा सत्यार्थी को 'मुक्ति आश्रम' से सारे रिश्ते स्वत: खत्म हो जाने चाहिए थे. बावजूद इसके स्वामी अग्निवेश के शब्दों में 'सत्यार्थी की बदमाशियां जारी रहीं.'

'मुक्ति आश्रम' की नियमावलियों के मुताबिक यह स्थान गरीब, बीमार एवं विकलांग बच्चों के आर्थिक, सामा​जिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक विकास के लिए बनाया गया था. परंतु ऐसा न होते देख जांच अधिकारी शेओताज सिंह एवं अन्य तीन ने मिलकर जनवरी 1997 में दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में उक्त भ्रष्टाचार के आरोपी ट्रस्टियों के खिलाफ याचिका दायर की.

सत्यार्थी के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा देख अप्रैल 1997 में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश बीएस चौधरी ने कोर्ट की तरफ से राना प्रवीन सिद्दीकी को जांच अधिकारी नियुक्त किया. सिद्दीकी ने भी जांच के बाद पेश की गयी रिपोर्ट में 'मुक्ति आश्रम' में हो रही अनियमितताओं को रेखांकित किया और पाया कि बेहद सुनियोजित तरीके से आर्थिक मामलों में हेर—फेर की गयी है. रिपोर्ट में उल्लेख किया कि कैश बुक को देखने से ऐसा लगता है कि मानो एक ही आदमी ने कई जगह अगूंठे लगा रखे हैं. उन्होंने रिपोर्ट में आगे उल्लेख किया है कि 81 से 84 तक की जो कैशबुक है उनका कोई वाउचर नहीं है तथा संस्था को अनुदान किन स्रोतों से कितना प्राप्त हो रहा है इसका भी कोई उल्लेख नहीं है. 1980 से 89 तक का मुक्ति आश्रम में कोई रजिस्टर नहीं है. यहां तक कि मीटिंगों के दौरान लिए जाने वाले नोट्स भी उपलब्ध नहीं हैं. राना प्रवीन सिद्दीकी ने अपनी रिपोर्ट में स्वामी अग्निवेश तथा शेओताज सिंह पर जांच में सहयोग न करने तथा असंवैधानिक व्यवहार करने का भी जिक्र किया है.

एक के बाद एक तीन स्तरों से एक ही ढंग से लगाये गये आरोप उजागर भी हुए, परंतु सत्यार्थी 'नोबल शांति पुरस्कार' तक पहुंच गये. सत्यार्थी के विरोधियों और सहयोगियों दोनों का कहना है कि उनका यहां तक पहुंचना मीडिया मैनेज की कुशल कारीगरी का ही नतीजा है.

सत्यार्थी पर लगाये गये आरोपों के मद्देनजर जब उनका पक्ष जानने के लिए 'दि संडे पोस्ट' ने संपर्क किया तो कालकाजी स्थित उनके कार्यालय से जवाब आया कि 'सत्यार्थी जी इस पर बातचीत नहीं करना चाहते हैं.' फोन पर हुयी बातचीत में उनके मीडिया प्रभारी राकेश सेंगर ने न्यायिक सलाहकार का हवाला देते हुए कहा कि 'न्यायालय में चल रहे इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं करेंगे.' ट्रस्ट बनाम सत्यार्थी का मामला कोर्ट में गये नौ साल हो गये हैं, लेकिन अब तक कोई फैसला नहीं हो पाया है. न्यायालय पर टिप्पणी किये बिना इतना जरूर कहा जा सकता है कि याचिकाकर्ता बेहद सुस्त हो चुके हैं. इसी सुस्ती का परिणाम हुआ कि याचिकाकर्ता सुनवाई की तारीख में नहीं पहुंचे और कोर्ट ने केस ही खत्म करने का आदेश दे दिया, लेकिन केस देख रहे वकील आरके गौड़ की सक्रियता का परिणाम रहा कि केस की पुनर्वहाली के लिए अर्जी दे दी गयी.

(जनज्वार http://www.janjwar.com से साभार)

दिवाली का अंधेरा / जयप्रकाश त्रिपाठी

प्रकाशपर्व से सजेधजे बाजार, विज्ञापनों से अघाये अखबार और चैनल, छोटे-बड़े पर्दे पर धारावाहिकों और फिल्मों के धूम-धड़ाके, महानगरों में सितारों, नेताओं, अधिकारियों, ठेकेदारों, मंत्रियों, दलालों, सफेदपोश लुटेरों, ऊपर की कमाई-धमाई वालों की रंगारंग महफिलें, अमीरी का गर्दभगान, पूंजी और बाजार की महामारी से त्रस्त गरीब-गुरबा की लुटती-पिटती आस्था -
जो ठनठन गोपाल, जिनकी जेब खाली,
उनकी खिल्ली उड़ाएं धनतेरस-दिवाली....

Monday, 20 October 2014

दीपावली और मेरी 'नानी मां' / जयप्रकाश त्रिपाठी

दिवाली का दिन। जैसे आंखों के दो दीये तेल-घी नहीं, आंसुओं से डबडबाये हुए। हर साल, हर बार। जब भी आता है ये त्योहार। मेरे अभावग्रस्त बचपन के वे दिन कचोटने लगते हैं।
साढ़े चार माह का था, तभी मां ने ननिहाल पठा दिया था। 'नानी मां' की गोद में। नाना के घर प्यार-दुलार इतना मिला कि दुनिया से मां के विदा होने पर उतना नहीं रोया था, जितना कि 'नानी मां' के देहावसान पर। दिवाली के दिनों में आजमगढ़ जिले का गांव टिसौरा, जो आज भी मेरी स्मृतियों में मीठी-नुकीली टीस की तरह अटका हुआ है। कुरेदने पर यादों की बारात सी आ जाती है।
गांव के पश्चिमी किनारे पर चार-पांच कुम्हार परिवार बसते थे। और उधर के ही सीवान में डिह बाबा का थान। गांव के दक्षिणी छोर पर शिवालय, पूरब में काली। घर-घर कुम्हार परिवार महीने भर पहले से जोर-शोर से मिट्टी के नन्हे-नन्हे दीये-हाथी-घोड़े-जांता-घरिया और छोटे-बड़े , बर्तन बनाने में जुट जाते। साल भर में एक बार ये त्योहार उनके लिए घर-गृहस्थी की गाड़ी खींचने के लिए आय के एक बड़े अवसर की तरह आता था।
दिवाली के कई दिन पहले से मिट्टी के पूरे मकान की लिपाई-पुताई। अगवारे-पिछवारे के घास-कूड़े, झाड़-झंखाड़ की कटाई-सफाई। दिवाली से ठीक एक दिन पहले आंगन से दरवाजे के सामने दूर तक गोबर से जमीन की धुलाई। नानी मां का घर दो मोहल्लों के बीच था। घर से पूरब-उत्तर दूर तक पसरे खेत। दिवाली के दिनो में जुताई के बाद हवा के साथ मिट्टी की सोंधी-सोंधी गंध। वातावरण धवल-धवल सा। और बच्चों के लिए त्योहार अपार खुशियों से सराबोर करते हुए।
दिवाली की सुबह नानी मिट्टी के दीये, बर्तन आदि के लिए मुझे बड़ी बहन के साथ भेज देती थी कुम्हार काका संचू-पंचू के घर। संचू-पंचू सगे भाई थे। संचू कलकत्ता में पत्ते वाली तंबाकू बेचते थे। संचू गांव में मिट्टी के बर्तन बेच कर गुजारा करते थे। दोपहर बाद छुटकी काकी (संचू की पत्नी) सिर पर मिट्टी के दीये आदि से भरा टोकरा लेकर जैसे ही दरवाजे पर पहुंचती थीं, खुशियों का पारावार नहीं।
सूर्यास्त होने से पहले नानी आंगन में दीयों की कतार सजाने लगती थीं। साथ में बहन के साथ मैं भी रुई की नन्ही नन्ही बातियां पूरने में जुट जाते। उधर सूरज डूबा, इधर घी-तेल से लबालब दीये जगमगा उठे। दीप पूजन के बाद नानी एक थाली में पांच जलते दीये, अंजुरी भर खील-बताशा, रोली रखकर देवस्थानों के लिए हमे भेज देती थीं। इन सब से बेपरवाह नाना चुपचाप नीम के नीचे चारपाई पर कुछ गाते-गुनगुनाते या तंबाकू रगड़ते हुए मंद मंद मुसकाते याद आते हैं। सस्ते किस्म के नये-नये कपड़ों में हम भाई बहन सबसे पहले डिह के थान जाते, वहां से एक फर्लांग दूर शिवालय में दीप, खील-बताशे रखते और अंत में उतने ही फासले पर गांव के पूरब में काली माई के थान पर। उछल उछल कर तेजी से जाते दौड़ते भी तब तक रात एक पहर पीछे छूट चुकी होती थी।
लेकिन भरपूर उजाले से नहाया हुआ पूरा गांव, चारो ओर हंसी-ठहाके का आलम, घर-घर बच्चों का उल्लास, एक पहर रात गये भी कहीं कोई डर-भय नहीं। घर लौटते ही नानी हमें टीका लगाती, हलवा-पूड़ी का प्रसाद देती। उन दिनो आज की तरह पटाखा-मिठाइयों का जमाना नहीं था। इसके बाद नाना एक पैसा मुझे, एक बहन को देते थे....और रात के कुछ पहर तब तक और खिसक चुके होते। सुबह से थकान, न जाने कब घर सो जाता, पता नहीं चलता था। गांव से संपन्न घरों के दरवाजों पर देर रात तक चहल पहल रहती। सुबह सारे गांव के बच्चे मुंहअंधेरे से ही बुझे दीये बटोरने और उसी दोपहर गांव के मध्य बूढ़े बरगद के नीचे होने वाली 'गोधन बाबा' की पूजा की मस्ती में डूब जाते थे। वह दिन भी शाम तक प्रसाद और चीनी की मिठाई खाने-खेलने में बीत जाता था.....

जी हाँ, मैं लिखता हूँ... दुख पर काबू पाने के लिए / प्रफुल्ल कोलख्यान

बहुत ही संक्षेप और संकेत में कहना चाहता हूँ कि मैं दुख पर काबू पाने के लिए लिखता हूँ। दुख चारो तरफ पसरा है। मेरा जन्म न तो महानता की किसी चोटी पर हुआ और न विकास ही किसी महर्षि के अशीर्वाद के कोमल, सुरक्षित, हितकारी प्रकाशवलय की दिव्य परिधि में हुआ। पढ़ाई-लिखाई का सुयोग भी बहुत नहीं था और जो था उसका भरपूर इस्तेमाल करने की चेतना भी समय पर विकसित नहीं हो सकी थी। ज्ञान और अनुभव भी तो बहुत ही सीमित हैं, साहित्य साधना के लिहाज से तो बिल्कुल ही अपर्याप्त। लेकिन ये सब मेरे दुख के कारण नहीं हैं।
मेरा जन्म उसी जमीन पर हुआ जिस जमीन पर महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था। महात्मा बुद्ध को मुस्कुराता हुआ दिखलाने की चाहे जितनी भी मसखरी की जाए लेकिन दुनिया जानती है कि उन्होंने दुख का कारण जन्म को बताया और इस जन्म में जीवन का अर्थ भी समाहित है। जीवन को दुखमय बनानेवाले लोग बुद्ध की मुस्कान के लिए नुस्खे का इंतजाम कर रहे हैं। बुद्ध का दुख मुस्कुराते हुए भी कभी कम नहीं हुआ। दुखिया दास कबीर थे जो जागते और रोते थे। दुख ही निराला के जीवन की कथा रही। दुख बाबा नागार्जुन को कटहल के छिलके जैसी जीभ से चाटता रहा। ये कुछ व्यक्तियों के नाम या संदर्भ भर नहीं हैं। बल्कि अपने-अपने प्रकार से मनुष्य और खासकर भारतीय मनुष्य की विकास यात्रा के कई-कई चरणों के नाम और संदर्भ हैं। ये महान लोग दुखी थे इसीलिए मैं भी दुखी हूँ, ऐसी बात नहीं है। असल बात यह है कि अपने दुख के साथ-साथ जिस प्रकार के लोगों के दुख से ये दुखी थे उसी प्रकार के लोगों में से मैं भी हूँ।
समग्र और वास्तविक दुख या सुख कभी भी व्यक्तिगत मामला नहीं हुआ करता है। दुख और सुख हमारे सामाजिक जीवन का ही व्यक्त्विगत सारांश होता है। दुख यह नहीं है कि आज भी जिधर अन्याय है, उधर ही शक्ति है; बल्कि यह है कि जहाँ शक्ति है वहीं अन्याय है। दुख है कि जीवन शक्ति के बिना चल नहीं सकता और अन्याय को झेल नहीं पाता। दुख है कि आज भी अंधेरे में ब्रह्मराक्षस दनदनाता हुआ अपने विकास की सीढ़ियाँ चढ़ रहा है। दुख है कि आज हमारी प्रेरणा किसी की प्रेरणा से इतनी भिन्न नहीं रह गई है कि जो किसी के लिए अन्न है वह हमारे लिए विष हो। दुख है कि मुक्तिबोध भी हमारे लिए ब्रांड बनाकर ही रख लिए गए। दुख है कि आज हर आदमी चौड़ी सड़क और पतली गली में घनी बदली लेकिन सूरज की उपस्थिति में ही रघुवीर सहाय का रामदास बना बेचैन टहल रहा है। दुख है कि जो निहत्थे और निरपराध हैं वे मार दिये जाएँगे नहीं, मार दिए जा रहे हैं - चाहे नरसंहार से त्रस्त हरिजनगाथा के नागरिक हों, सफदर हाशमी हों, चंद्रशेखर हों, फादर स्टेंस हों, उनके बच्चे हों। दुख है कि रोज बनती हुई दुनिया के इस नए इलाके में हम अपना घर नहीं ढूँढ़ पा रहे हैं। दुख है कि आज हमारी रहनी बत्तीस दाँतों के बीच बेचारी जीभ की तरह है। दुख है कि हमारे गोदामों में अनाज भरे पड़े हैं, लाखों टन अनाज रखने की जगह नहीं है और करोड़ों लोग गरीबी रेखा के नीचे भूखे पेट जीने को मजबूर हैं। दुख है कि गल्ले की कचहरी में भूख का मुकद­मा खारिज हो गया। दुख है कि होरी और हीरा ही नहीं, गोबर भी आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं। दुख है कि जिस देश में करोड़ो के भूख से बेहाल होने की ताजा रपट है, उस देश में हाजमोला की इतनी अधिक खपत है। दुख है कि टुकड़ी-टुकड़ी साँस गिरवी रखी जा चुकी है और हम नाक की ऊँचाई नापने में व्यस्त हैं। दुख है कि हमारे लेखकीय जीवन में ही एक ओर सोवियत संघ का पतन हो गया तो दूसरी ओर बाबरी मस्जिद के ढाँचे को उन्मादी शक्तियों ने ढहा दिया। दुख है कि यह उन्माद नाना रूप धर कर जीवन के बड़े आयतन पर दखल जमा रहा है। सोवियत संघ किसी एक देश की राज्य-व्यवस्था ही नहीं था, बहस की गुंजाइश रखते हुए भी हमारे जैसे लोगों के सामाजिक सपनों की सराय भी था। बाबरी मस्जिद सिर्फ इबादत की जगह नहीं थी, बल्कि हम जैसे लोगो के लिए सब कुछ के बावजूद सहअस्तित्व और सहिष्णुता का प्रतीक भी थी। दुख है कि सामाजिक न्याय का नारा भी अंतत: छल ही साबित हुआ। दूसरी आजादी भी पहली आजादी की सहोदरा ही निकली। हमारा सपना लूट लिया गया और हम लड़ नहीं पाए, साथी। न हमारी ओर से कोई और ही कारगर ढंग से लड़ पाया।
दुख है कि समय का पहिया ऐसा चला कि इस देश में जनतंत्र का सपना संसद में ही घायल हो गया। दुख है कि ठेले पर लादकर इस जनतंत्र को बाजार में पहुँचा दिया गया और विरोध में उठनेवाले हाथ प्रसाद पाकर अपनी-अपनी काँख ढँकने के लिए लौट रहे हैं। दुख है कि विकास की वर्णमाला से बाहर मँजी हुई शर्म के जनतंत्र की नीम रोशनी में अपनी ही छाया से भयभीत देश की अस्सी करोड़ जनता के मन में सवाल आकार पा रहा है कि वह कौन लगता है हमारा, आपका, इस देश का? पूछता है कि चिथड़े की बीमारी का कोई शर्तिया इलाज है थान के पास? पूछता है कि गुदड़ी और सूट के बीच बुझारत के लिए रिश्ते की कौन-सी जमीन शेष है?
दुख है कि साहित्य का होने का दावा करता हूँ, लेकिन मेरे पास वह भाषा साबुत नहीं है जिसमें उसे बता सकूँ कि उसे प्यार करना चाहिए, यह उसका देश है। दुख के फैलाव या प्रसार को उसके स्वरूप और कारणों को समझने के प्रयास में मुझे ठाम-कुठाम की यात्रा करनी पड़ती है। कई-कई बार वर्जित प्रदेश की भी यात्रा करनी पड़ती है। वैसे मित्रो, हिंदी के समकालीन समाज का साहित्य और कविता से जिस प्रकार का लगाव दीखता है उससे तो कविता अपने आपमें एक वर्जित प्रदेश बनकर रह गई है। दुख है कि वर्जित प्रदेश की नागरिकता का अवैध प्रार्थनापत्र हाथ में लिए मैं आजीवन भटकता रहा। संतोष की बात यह है कि इस दुख में मैं अकेला नहीं हूँ, और भी बहुत सारे लोग हैं जो अपने-अपने तरीके से हम जैसों का दुख कम करने के उद्यम में अधिक तत्परता से लगे हुए हैं।
दुख पर काबू पाने के लिए मेरे पास जो सबसे विश्वसनीय सहारा है उसका नाम साहित्य है। मँजी हुई शर्म के जनतंत्र के बाजार में वह चाहे अंधे की लकड़ी सरीखी-सी ही क्यों न हो, मगर अपना सहारा तो यही है। जी हाँ, मैं लिखता हूँ... दुख पर काबू पाने के लिए...!!

आध्यात्मिक पागलों का मिशन / हरिशंकर परसाई

भारत के सामने अब एक बड़ा सवाल है - अमेरिका को अब क्या भेजे? कामशास्त्र वे पढ़ चुके, योगी भी देख चुके। संत देख चुके। साधु देख चुके। गाँजा और चरस वहाँ के लड़के पी चुके। भारतीय कोबरा देख लिया। गिर का सिंह देख लिया। जनपथ पर 'प्राचीन' मूर्तियाँ भी खरीद लीं। अध्यात्म का आयात भी अमेरिका काफी कर चुका और बदले में गेहूँ भी दे रहा है। हरे कृष्ण, हरे राम भी बहुत हो गया।
महेश योगी, बाल योगेश्वर, बाल भोगेश्वर आदि के बाद अब क्या हो? मैं देश-भक्त आदमी हूँ। मगर मैं अमेरिकी पीढ़ी को भी जानता हूँ। मैं जानता हूँ, वह 'बोर' समाज का आदमी हैं - याने बड़ा बोर आदमी। शेयर अपने आप डॉलर दे जाते हैं। घर में टेलीविजन है, दारू की बोतलें हैं। शाम को वह दस-पंद्रह आदमियों से 'हाउ डु यू डू' कर लेता है। पर इससे बोरियत नहीं मिटती। हनोई पर कितनी भी बम-वर्षा अमेरिका करे, उत्तेजना नहीं होती। कुछ चाहिए उसे। उसे भारत से ही चाहिए।
मुझे चिंता जितनी बड़ी अमेरिका की है उतनी ही भारतीय भाइयों की। इन्हें भी कुछ चाहिए।
अब हम भारतीय भाई वहाँ डॉलर और यहाँ रुपयों के लिए क्या ले जाएँ? रविशंकर से वे बोर हो चुके। योगी, संत वगैरह भी काफी हो चुके। अब उन्हें कुछ नया चाहिए - बोरियत खत्म करने और उत्तेजना के लिए। डॉलर देने को वे तैयार हैं।
मेरा विनम्र सुझाव है कि इस बार हम भारत से 'डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन' ले जाएँ। ऐसा मिशन आज तक नहीं गया। यह नायाब चीज होगी - भारत से 'डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन' याने आध्यात्मिक पागलों का मिशन।
मैं जानता हूँ। आम अमेरिकी कहेगा - वी हेव सीन वन। हिज नेम इज कृष्ण मेनन। (हमने एक पागल देखा है। उसका नाम कृष्ण मेनन है।) तब हमारे एजेंट कहेंगे - वह 'डिवाइन' (आध्यात्मिक) नहीं था। और पागल भी नहीं था। इस वक्त सच्चे आध्यात्मिक पागल भारत से आ रहे हैं।
मैं जानता हूँ, आध्यात्मिक मिशनें 'स्मगलिंग' करती रहती हैं। पर भारत सरकार और आम भारतीयों को यह नहीं मालूम कि लोगों को 'स्वर्ग' में भी स्मगल किया जाता है।
यह अध्यात्म के डिपार्टमेंट से होता है। जिस महान देश भारत में गुजरात के एक गाँव में एक आदमी ने पवित्र जल बाँटकर गाँव उजाड़ दिया, वह क्या अमेरिकी को स्वर्ग में 'स्मगल' नहीं कर सकता?
तस्करी सामान की भी होती है - और आध्यात्मिक तस्करी भी होती है। कोई आदमी दाढ़ी बढ़ाकर एक चेले को लेकर अमेरिका जाए और कहे, ‘मेरी उम्र एक हजार साल है। मैं हजार सालों से हिमालय में तपस्या कर रहा था। ईश्वर से मेरी तीन बार बातचीत हो चुकी है।’ विश्वासी पर साथ ही शंकालु अमेरिकी चेले से पूछेगा - क्या तुम्हारे गुरु सच बोलते हैं? क्या इनकी उम्र सचमुच हजार साल है? तब चेला कहेगा, ‘मैं निश्चित नहीं कह सकता, क्योंकि मैं तो इनके साथ सिर्फ पाँच सौ सालों से हूँ।’
याने चेले पाँच सौ साल के वैसे ही हो गए और अपनी अलग कंपनी खोल सकते हैं। तो मैं भी सोचता हूँ कि सब भारतीय माल तो अमेरिका जा चुका - कामशास्त्र, अध्यात्म, योगी, साधु वगैरह।
अब एक ही चीज हम अमेरिका भेज सकते हैं - वह है भारतीय आध्यात्मिक पागल - इंडियन डिवाइन ल्यूनेटिक। इसलिए मेरा सुझाव है कि 'इंडियन डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन' की स्थापना जल्दी ही होनी चाहिए। यों मेरे से बड़े-बड़े लोग इस देश में हैं। पर मैं भी भारत की सेवा के लिए और बड़े अमेरिकी भाई की बोरियत कम करने के लिए कुछ सेवा करना चाहता हूँ। यों मैं जानता हूँ कि हजारों सालों से 'हरे राम हरे कृष्ण' का जप करने के बाद भी शक्कर सहकारी दुकान से न मिलकर ब्लैक से मिलती है - तो कुछ दिन इन अमरीकियों को राम-कृष्ण का भजन करने से क्या मिल जाएगा? फिर भी संपन्न और पतनशील समाज के आदमी के अपने शांति और राहत के तरीके होते हैं - और अगर वे भारत से मिलते हैं, तो भारत का गौरव ही बढ़ता है। यों बरट्रेंड रसेल ने कहा है - अमेरिकी समाज वह समाज है जो बर्बरता से एकदम पतन पर पहुँच गया है - वह सभ्यता की स्टेज से गुजरा ही नहीं। एक स्टेप गोल कर गया। मुझे रसेल से भी क्या मतलब? मैं तो नया अंतरराष्ट्रीय धंधा चालू करना चाहता हूँ - 'डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन'। दुनिया के पगले शुद्ध पगले होते हैं - भारत के पगले आध्यात्मिक होते हैं।
मैं 'डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन' बनाना चाहता हूँ। इसके सदस्य वही लोग हो सकते हैं, जो पागलखाने में न रहे हों। हमें पागलखाने के बाहर के पागल चाहिए याने वे जो सही पागल का अभिनय कर सकें। योगी का अभिनय करना आसान है। ईश्वर का अभिनय करना भी आसान है। मगर पागल का अभिनय करना बड़ा ही कठिन है। मैं योग्य लोगों की तलाश में हूँ। दो-एक प्रोफेसर मित्र मेरी नजर में हैं जिनसे मैं मिशन में शामिल होने की अपील कर रहा हूँ।
मिशन बनेगा और जरूर बनेगा। अमेरिका में हमारी एजेंसी प्रचार करेगी - सी रीयल इंडियन डिवाइन ल्यूनेटिक्स (सच्चे भारतीय आध्यात्मिक पागलों को देखो।) हम लोगों के न्यूयार्क हवाई अड्डे पर उतरने की खबर अखबारों में छपेगी। टेलीविजन तैयार रहेगा।
मिसेज राबर्ट, मिसेज सिंपसन से पूछेगी, ‘तुमने क्या सच्चा आध्यात्मिक भारतीय पागल देखा है?’ मिसेज सिंपसन कहेगी, ‘नो, इज देअर वन इन दिस कंट्री, 'अंडर गाड'?’ मिसेज राबर्ट कहेगी, ‘हाँ, कल ही भारतीय आध्यात्मिक पागलों का एक मिशन न्यूयार्क आ रहा है। चलो हम लोग देखेंगे : इट विल बी ए रीअल स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस। (वह एक विरल आध्यात्मिक अनुभव होगा।)’
न्यूयार्क हवाई अड्डे पर हमारे भारतीय पागल आध्यात्मिक मिशन के दर्शन के लिए हजारों स्त्री-पुरुष होंगे - उन्हें जीवन की रोज ही बोरियत से राहत मिलेगी। हमारा स्वागत होगा। मालाएँ पहनाई जाएँगी। हमारे ठहराने का बढ़िया इंतजाम होगा।
और तब हम लोग पागल अध्यात्म का प्रोग्राम देंगे। हर गैरपागल पहले से शिक्षित होगा कि वह सच्चे पागल की तरह कैसे नाटक करे। प्रवेश-फीस 50 डॉलर होगी और हजारों अमेरिकी हजारों डॉलर खर्च करके 'इंडियन डिवाइन ल्यूनेटिक्स' के दर्शन करने आएँगे।
हमारा धंधा खूब चलेगा। मैं मिशन का अध्यक्ष होने के नाते भाषण दूँगा, ‘वी आर रीअल इंडियन डिवाइन ल्यूनेटिक्स। अवर ऋषीज एंड मुनीज थाउज़ेंड ईअर्स एगो सेड दैट दि वे टु रीअल इंटरनल पीस एंड साल्वेजन लाइज थ्रू ल्यूनेसी।’ (हम लोग भारतीय आध्यात्मिक पागल हैं। हमारे ऋषि–मुनियों ने हजारों साल पहले कहा था कि आंतरिक शांति और मुक्ति पागलपन से आती है।)
इसके बाद मेरे साथी तरह-तरह के पागलपन के करतब करेंगे और डॉलर बरसेंगे।
जिन लोगों को इस मिशन में शामिल होना है, वे मुझसे संपर्क करें। शर्त यह है कि वे वास्तविक पागल नहीं होने चाहिए। वास्तविक पागलों को इस मिशन में शामिल नहीं किया जाएगा - जैसे सच्चे साधुओं को साधुओं की जमात में शामिल नहीं किया जाता।
अमेरिका से लौटने पर, दिल्ली में रामलीला ग्राउंड या लाल किले के मैदान में हमारा शानदार स्वागत होगा। मैं कोशिश करूँगा कि प्रधानमंत्री इसका उद्‌घाटन करें।
वे समय न निकाल सकीं तो कई राजनैतिक वनवास में तपस्या करते नेता हमें मिल जाएँगे। दिल्ली के 'स्मगलर' हमारा पूरा साथ देंगे। कस्टम और एनफोर्स महकमे से भी हमारी बातचीत चल रही है। आशा है वे भी अध्यात्म में सहयोग देंगे।
स्वागत समारोह में कहा जाएगा, ‘यह भारतीय अध्यात्म की एक और विजय है, जब हमारे आध्यात्मिक पगले विश्व को शांति और मोक्ष का संदेश देकर आ रहे हैं। आशा है आध्यात्मिक पागलपन की यह परंपरा देश में हमेशा विकसित होती रहेगी।’
'डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन' को जरूर अमेरिका जाना चाहिए। जब हमारे और उनके राजनैतिक संबंध सुधर रहे हैं तो पागलों का मिशन जाना बहुत जरूरी है।

Sunday, 19 October 2014

....और सारू को मिल गई मां

पांच साल का एक भारतीय लड़का 25 साल पहले अपनी मां से बिछड़ गया था। लेकिन उपग्रह से ली गई तस्वीरों के जरिए उसने अपनी मां को खोज लिया। तस्मानिया राज्य में रह रहे सारू की उम्र तब केवल पांच साल थी, जब वो भारत में खो गया था। ट्रेन में सफाई कर्मचारी के तौर पर काम करने वाले बड़े भाई के साथ सफर करने के दौरान ये हादसा हुआ था। सारू बताता है, ‘वो रात का वक्त था। हम ट्रेन से उतरे ही थे और मैं बहुत थका हुआ था। मैं स्टेशन पर एक जगह बैठ गया और मुझे नींद आ गई।’ दुर्भाग्य की उस झपकी ने सारू की आगे की जिंदगी का रुख तय कर दिया। वह कहता है, ‘जब मैं सोकर उठा तो मेरा भाई कहीं नहीं दिखा। मेरे सामने एक ट्रेन खड़ी थी और मैंने सोचा कि वह इसी ट्रेन में होगा। मैं उसकी खोज में ट्रेन में चढ़ गया।’
लेकिन इस सफर ने मुझे एक अनाथालय पहुंचा दिया जहां से मुझे तस्मानिया के एक दंपति ने गोद ले लिया। नए घर में सारू सहज हो गया लेकिन जैसे-जैसे वक्त गुजरता गया, अपने असली परिवार से मिलने की उसकी ख्वाहिश जोर पकड़ने लगी। लेकिन दिक्कत यह थी कि पांच साल की उम्र में निरक्षर रहे सारू को अपने शहर का नाम तक याद नहीं था। फिर भी उसने‘गूगल अर्थ’ पर घर की तलाश शुरू कर दी। ‘गूगल अर्थ’ के बारे में सारू कहता है, ‘मुझे सुपरमैन की तरह लग रहा था। मैं जहां चाहे वहां जा सकता था। हर तस्वीर के बारे में खुद से पूछता कि क्या ये वही है और जैसे ही यह जवाब मिलता कि नहीं, तलाश आगे बढ़ जाती।’ ‘गूगल अर्थ’ में घर खोजने के लिए सारू ने एक प्रभावशाली तरकीब खोजी, ‘मैंने अंदाजा लगाया कि मेरा सफर कोई 14 घंटे का रहा होगा और इस दरमियान मैंने 1200 किलोमीटर का सफर तय किया होगा।’ उसने कोलकाता शहर को सेंटर में रखते हुए एक सर्किल खींचा और जल्द ही उसे एहसास हुआ कि वह खंडवा शहर की तलाश कर रहा है। वह बताता है, ‘जब मुझे ये मिल गया तो मैंने उस झरने के आस-पास की तमाम जगहों को खंगाला, जहां मैं खेला करता था।’ सारू जल्द ही खंडवा पहुंचा, वो शहर जिसे उसने ऑनलाइन खोजा था। बचपन की गलियों से उसे इस शहर का रास्ता मिला था, और आखिरकार उसे अपना घर मिल गया लेकिन वहां ताला लटका हुआ था। उसके पास अपने बचपन की एक तस्वीर थी और घरवालों के नाम याद थे। पूछने पर पड़ोसियों ने बताया कि वे लोग कहीं और चले गए हैं। तभी एक आदमी ने मां से उसकी बात कराई। सारू की कहानी में प्रकाशकों और फिल्मकारों की दिलचस्पी बढ़ी है। वह कहता है, ‘मुझे यकीन नहीं हो रहा था।’
लेकिन मिलने पर उसकी मां उन्हें ठीक से पहचान नहीं पाई। सारू कहता है, ‘आखिरी बार जब मैंने उन्हें देखा था तो वह 34 साल की थीं। लेकिन चेहरे की बनावट वैसी ही थी। मैंने उन्हें पहचान लिया और कहां, हां, तुम मेरी मां हो। सारू का वो भाई जो रेल के सफर में उनके साथ था, उसकी लाश रेल की पटिरयों पर पाई गई थी। सारू को इसका मलाल है। लेकिन मां से मिलने के बाद उसे अब अच्छी नींद आती है। (राष्ट्रीय सहारा से साभार)

Friday, 17 October 2014

शताब्दी का गीत - 'स्ट्रेंज फ्रूट' / अबेल मीरोपाल

बलात्कार और हत्या कर लड़कियों, स्त्रियों की लाशें सार्वजनिक तौर पर चुनौती देती जैसे पेड़ों पर लटकायी जा रही हैं और इनकी रोकथाम के महकमे संभाले राजनेताओं के बीच मृतकों के कपड़े-लत्ते और शील-आचरण को लेकर जैसे शब्दों का आदान-प्रदान हो रहा है, उसके लिए 'शर्मनाक' शब्द छोटा पड़ गया है।
इन्हीं संदर्भों को लेते हुए यहां स्मरण करना प्रासंगिक और उचित होगा। 'स्ट्रेंज फ्रूट' पिछली सदी के तीस के दशक में न्यूयार्क स्टेट के एक स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाने वाले रूस से भागकर अमेरिका में बस गये गोरे यहूदी अबेल मीरोपाल का गीत है। वह यातना देकर मार डालने की संस्कृति के खिलाफ थे। अन्याय और उसको प्रश्रय देने वालों के प्रति अपनी घनघोर नफरत का इजहार करने के लिए ही उन्होंने यह गीत लिखा। शुरू में उन्होंने इस गीत शीर्षक 'कसैला फल' रखा था।
पहली बार यह गीत 1937 में अमेरिकी स्कूल शिक्षकों की पत्रिका में छपा था। सन 1939 में मशहूर अश्वेत गायिका बिली होलीडे ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर गाकर इस गीत को अमर कर दिया था। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में घायल अपने अश्वेत पिता को अस्पताल में (अश्वेत होने के कारण) इलाज न करने पर तिल तिल कर मरते देखा था। गीत गाने पर मां की नाराजगी के विरोध में उन्होंने कहा था- अपनी कब्र में भी मैं इस गीत को अपने साथ रखूंगी। उसके बाद लगभग चालीस अन्य गायकों ने भी इस गीत गाया।
आज अमेरिकी समाज में अश्वेत समुदाय पर होने वाले अत्याचारों के विरोध का यह दस्तावेजी गीत बन गया है। 1999 में टाइम मैग्जीन ने इसको 'शताब्दी का गीत' घोषित किया था। वर्ष 2010 में न्यू स्टेट्स मैन ने इसको दुनिया के बीस सर्वश्रेष्ठ गीतों में शुमार किया था -

दक्खिन के पेड़ों में लगा हुआ है एक अजीबोगरीब/अनोखा सा फल
पत्तियों पर लहू के धब्बे... जड़ें भी लहूलुहान
दक्खिनी हवाओं से हिल रहे हैं काले कलूटे शरीर
यह अजीबोगरीब / अनोखा फल लटक रहा है पोपलर के पेड़ पर...

लड़के दक्खिनी चरवाहों के इलाके का मंजर ऐसा
कि बाहर निकल आयीं आंखें और वीभत्स हो गए मुंह
घर फूलों की गमक उतनी ही मोहक और तरोताजा
पर बीच बीच में घुस आती हैं जलते हुए मांस की सड़ांध

यहां फूल खिला है जिसे नोच ले जायेंगे कौवे
जिन पर गिरेगा बरसात का पानी, जिसको सूंघेगी बहती हुई बया
जिसे सड़ा डालेगी धूप.... और एक दिन जमीन पर गिरा देगा पेड़
यहां उगी हुई है एक अजीबोगरीब / अनोखीकसैली फसल....
('पहल' से साभार)