Sunday, 5 October 2014

वह अकल्पनीय क्षण / जयप्रकाश त्रिपाठी

जब जीवन में कुछ अकल्पनीय होता है, विश्वास कर पाना भी असहज हो जाता है। मुझे पिछले तीन-चार दिनो में अचंभित करने वाले ऐसे कई-एक अनुभव मिले। अचंभा सुखद हो तो लंबे समय के लिए मन पर स्थापित हो जाता है। सामाजिक सरोकारों का अब तो इतना संगठनीकरण, सामुदायीकरण, बाजारीकरण, राजनीतीकरण अथवा सरकारीकरण हो चुका है कि व्यक्तिगत जीवन में आदमीयत का स्वाद अपवाद-सा लगने लगा है। हम प्रायः ऐसा कुछ समूह के साथ साझा करने से बचते हैं, जो हर मनुष्य के निजी हिस्से के लायक हो। असहनीय दुख की घड़ी में ऐसे अनुभव मिलते हैं। मैंने परसो एक ऐसी ही लौ देखी। समाज में ऐसे भी लोग हैं, अब तक विश्वास नहीं कर पा रहा हूं। ऐसी लौ, यानी आदमीयत, जैसाकि सोचा न था कभी। अचानक अभिभूत-सा... (उस सुखद प्रसंग का यहां उल्लेख करना किसी की प्रेरक निजता का असम्मान होगा।)

Saturday, 4 October 2014

हादसा और प्यार

अपनी मुश्किल घड़ी में मित्र परिवार के शब्दों से अपेक्षाधिक संबल मिला, जिनसे इस मंच पर आज तक कभी संवाद न हो सका था, उनसे भी आश्वास्त हो लेने का इस घटना के कारण ही सही, सुअवसर मिला, पूरे मित्र परिवार के लिए एक बार पुनः हार्दिक कृतज्ञता....
पहले दिन घटना की सूचना देने के बाद मुझे लगा था कि पत्नी पूर्ण स्वस्थ हो जाने पर ही पुनः यहां उपस्थित हो सकूंगा लेकिन आप मित्रों, शुभचिंतकों की सहानुभूति, यहां बार बार खींच ले आ रही है। पत्नी की सेवा-सुश्रुषा, देखभाल से कुछ पल का समय चुराकर मित्रों के संग-साथ हो ले रहा हूं। यह सोचते हुए कि दुनिया में कितना गम (दुख) है, अपना तो कितना कम है.....
मेरे घर आते-जाते रहे मित्रगण मेरी पत्नी के स्वभाव से पूर्ण परिचित हैं। वह सब काम छोड़ कर उनके उपस्थित हो जाते ही उनकी अगवानी, आवभगत में डूब जाती रही हैं। दुर्घटना से सबसे ज्यादा कष्ट उन्हें हुआ है। वे घटना के बाद से लगातार फोन संपर्क में है। प्रतिदिन कुशलता की कामना के साथ मेरा संबल संभाले हुए है। इस मंच पर आत्मीय हुए कई-एक वरिष्ठ शुभचिंतक एवं मित्र भी मेरी स्थितियों से अत्यंत दुखी-द्रवित हुए, मेरा असमय यथासंभव साझा किया, उनका पुनः-पुनः आभार.....
उम्मीद है, इस दुखद समय से उबरने में कम से कम डेढ़-दो माह लग जाने हैं, अभी कच्चा प्लास्टर चढ़ा है दोनो पैरों और दायें हाथ में, एक्सरे-सिटी स्कैन में एक पैर के निचले हिस्से की हड्डियां चूर-चूर हो जाने से नौ अक्तूबर को ऑपरेशन, फिर एक पैर और हाथ पर पक्का प्लास्टर होना है, उसके बाद 45 दिन और...
इस हादसे से जो एक सबसे महत्वपूर्ण संदेश मुझे मिला कि फेसबुक का मित्र परिवार सुख में संबल बने-न-बने, दुख में ऐसा कोई नहीं, कहीं नहीं मेरा....आभार 

Monday, 29 September 2014

सौ चूहे खा के बिल्ली चली हज को/यशवंत सिंह

जी न्यूज पर पत्रकारिता की रक्षा के बहाने हाथापाई प्रकरण को मुद्दा बनाकर राजदीप सरदेसाई को घंटे भर तक पाठ पढ़ाते सुधीर चौधरी को देख यही मुंह से निकल गया.. सोचा, फेसबुक पर लिखूंगा. लेकिन जब फेसबुक पर आया तो देखा धरती वीरों से खाली नहीं है. Vineet Kumar ने सुधीर चौधरी की असलियत बताते हुए दे दनादन पोस्टें लिख मारी थीं. विनीत की सारी पोस्ट्स इकट्ठी कर भड़ास पर प्रकाशित कर दिया. ये लिंक http://goo.gl/7i2JRy देखें. ट्विटर पर पहुंचा तो देखा राजदीप ने सुधीर चौधरी पर दो लाइनें लिख मारी हैं. रिश्वत मांगने पर जेल की हवा खाने वाला संपादक और सुपारी पत्रकार जैसे तमगों से सुधीर चौधरी को नवाजा था.. जी न्यूज के सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के समीर अहलूवालिया द्वारा जिंदल समूह के नवीन जिंदल से कोल ब्लाक धांधली प्रकरण की खबर रोकने के एवज में करोड़ों रुपये मांगने से संबंंधित स्टिंग की खबर को सबसे पहले भड़ास ने पब्लिश किया था (देखें http://goo.gl/x5y9Bz ) . उसके बाद इंडियन एक्सप्रेस समेत दूसरे मीडिया हाउसेज ने खबर को तब उठाया जब दिल्ली पुलिस ने नवीन जिंदल की लिखित शिकायत और प्रमाण के रूप में सौंपी गई स्टिंग की सीडी को देखकर एफआईआर दर्ज कर ली. फिर तो ये प्रकरण बड़ा मुद्दा बन गया और चारों तरफ पत्रकारिता के पतन की कहानी पर चर्चा होने लगी. सुधीर और समीर तिहाड़ जेल भेजे गए. इनके आका सुभाष चंद्रा पर गिरफ्तारी की तलवार लटकने लगी, लेकिन वो जेल जाने से बच पाने की एलीट तिकड़म भिड़ाने में कामयाब हो गए. उन दिनों राजदीप सरदेसाई ने भी सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन7 पर सुधीर चौधरी के ब्लैकमेलिंग में जेल जाने के बहाने पत्रकारिता के पतन पर गहरा आंसू बहाया था. अब समय का पहिया जब काफी चल चुका है तब राजदीप सरदेसाई अपनी गालीगलौज व हाथापाई वाली हरकत के कारण सबके निशाने पर हैं और इनकी करतूत के चलते पत्रकारिता की हालत पर दुखी होकर टपाटप आंसू बहा रहे हैं सुधीर चौधरी. सोचिए जरा. इस देश के आम आदमी को मीडिया का संपूर्ण सच भला कैसे समझ में आएगा क्योंकि उसे कभी राजदीप सरदेसाई में सच्चा पत्रकार दिखता होगा तो कभी सुधीर चौधरी पत्रकारिता के हनुमान जी लगते होंगे. इस विचित्र और घनघोर बाजारू दुनिया में दरअसल जनता के लिए सच जैसी पक्षधरता / चीज पर कोई मीडिया वीडिया काम नहीं कर रहा. सब अपने अपने एजेंडे, अपने अपने राग द्वेष, अपने अपने मतलब पर काम कर रहे हैं और इसे जन पत्रकारिता का नाम दे रहे हैं. ब्लैकमेलिंग में फंसे सुधीर चौधरी हों या हाथापाई-गालीगलौज करने वाले राजदीप सरदेसाई. इन जैसों ने असल में केवल खुद की ब्रांडिंग की है और अपनी ब्रांडिंग के जरिेए अपने लालाओं और अपनी तिजोरियां भरी हैं. क्या गलत है, क्या सही है, इस पर हम लोग भले तात्कालिकता / भावुकता के शिकार होकर फेसबुक-ट्विटर पर एक दूसरे का सिर फोड़ रहे हों, एक दूसरे को समझा ले जाने या निपटा देने में जुटे हुए हों लेकिन सच्चाई यही है कि अंततः राजदीप, सुधीर, हम, आप... हर कोई अपनी सुरक्षा, अपने हित, अपने दांव, अपने करियर, अपनी जय-जय में जुटा हुआ है और जो फिसल जा रहा है वह हर हर गंगे कहते हुए खड़ा होने की कोशिश मेें जुट जा रहा है. देखिए इन्हीं मोदी महोदय को. गुजरात के दंगों के दाग से 'मुक्त' होकर विश्व नायक बनने की ओर चल पड़े हैं. इनकी बातें सुन सुन कर अब तो मुझको भी लगने लगा है कि सच में भारत को बहुत दिनों बाद कोई कायदे का नेता मिला है जो देश को एकजुट कर, एक सूत्र में पिरोकर बहुत आगे ले जाएगा... लेकिन जब मोदी की विचारधारा, मोदी के भक्तों, मोदी के अतीत को देखता हूं तो सारा उत्साह ठंढा पड़ जाता है क्योंकि ये लोग अपने हित के लिए कुछ भी, जी हां, कुछ भी, बुरा से बुरा तक कर डालते हैं. पर, समय और हालात, दो ऐसी चीज हैं भाइयों कि इनके कारण बुरे से बुरे को अच्छे से अच्छा में तब्दील होते देखा जा सकता है और अच्छे से अच्छा को बुरे से बुरा बताया जा सकता है. ऐसे ही हालात में मिर्जा ग़ालिब साहब ने कहा होगा...
रहिए अब ऐसी जगह चलकर, जहाँ कोई न हो
हमसुख़न कोई न हो और हमज़बाँ कोई न हो
और अंत में... जाते-जाते...
जी न्यूज के सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के समीर अहलूवालिया के स्टिंग की वो सीडी जरूर देखिए जिसकी खबर भड़ास पर आने के बाद तहलका मचा और बाद में इन दोनों संपादकों को ब्लैकमेलिंग के आरोप में जेल जाना पड़ा... आज यही सुधीर साहब देश को जी न्यूज पर राजदीप सरदेसाई के धतकरम के बहाने सच्ची-अच्छी पत्रकारिता सिखा रहे थे... इस लिंक पर क्लिक करें... http://goo.gl/N96BR8
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बाकी, सुधीर चौधरी और जी न्यूज की संपूर्ण कथा इस लिंक में है... http://goo.gl/6k7p41

सीवर का मोक्षद्वार

बाहर अच्छी-अच्छी बातें बड़ी अच्छी लगती हैं। अंदर बड़ा दुख देती हैं। भाषण सुनकर मन खुश हो जाता है कि सफाई कार्य बड़ा पावन है, मोक्ष का द्वार है। जिसको-जिसको मोक्ष चाहिए, पहले खुद सीवर में उतर कर दिखाये तो सही। गांधी की हरिजन-वचनावली बांच कर जाने कितने तर गये, आज तक तो किसी नेता को सीवर में उतरते नहीं देखा। देखते हैं, दो अक्तूबर को मोक्ष के आकांक्षी कौन-कौन से महापुरुष सीवर में उतर कर देश की जनता के सामने आदर्श प्रस्तुत करते हैं। फोटो खिंचाने के लिए तो कैमरे के सामने चाहे जो पलभर 'झाड़ू पकड़ नौटंकी' दिखा  ले। किसे पता कि बेचारे झाड़ू चुनाव चिह्न वालो के दिल पर क्या बीत रही होगी......

ये है प्रकाश कौर। शहीद ए आजम भगत सिंह की छोटी बहन। जिनका 27-अक्तूबर की रात टोरंटो में अपने भाई का जन्म दिन मनाने के बाद देहांत हो गया। महान वीरांगना को कोटि कोटि नमन।.....

(सुधीर गुप्ता के फेसबुक वॉल से साभार)

Saturday, 27 September 2014

विमल राय की बेटी होने पर गर्व

रिंकी कहती हैं, 'मेरे लिए उनकी बेटी होना बहुत गर्व की बात है. ये ज़रूर है कि लोग मुझे बिमल रॉय की बेटी के तौर पर ही पहचानते हैं जबकि मैं ख़ुद पत्रकार हूं. किताबें संपादित करती रही हूं.'

भारतीय सिनेमा को 'दो बीघा ज़मीन', 'सुजाता', 'मधुमति' और 'बंदिनी' जैसी फ़िल्में देने वाले फ़िल्म निर्देशक बिमल रॉय का करियर छोटा लेकिन बेहतरीन रहा. हालांकि उनकी बेटी रिंकी भट्टाचार्य को इस बात पर अफ़सोस है कि उनके पिता की फ़िल्मों को समझने-पढ़ने की ज़रूरत महसूस नहीं की गई. इसलिए उन्होने ख़ुद ही एक किताब लिख दी अपने पिता की बनाई क्लासिक फ़िल्म मधुमति पर.रिंकी भट्टाचार्य कहती हैं, ''मुझे बहुत ग़ुस्सा आता है ये सोच कर बिमल रॉय जैसे इतने सम्मानित व्यक्ति को कभी समझने और लिखने लायक नहीं समझा गया. फिर मैंने सोचा कि यह मुझे ख़ुद ही करना होगा.''
बिमल रॉय को भारतीय सिनेमा में उनके यथार्थवादी चित्रण के लिए ख़ास माना जाता है. किताब लिखने की प्रक्रिया में रिंकी उन जगहों पर गईं जहां बिमल रॉय ने इसकी शूटिंग की थी. हैरत की बात ये थी कि उनकी मुलाक़ात ऐसे लोगों से भी हुई जिन्होंने बिमल रॉय को मधुमति की शूटिंग करते हुए देखा था. 1958 में प्रदर्शित मधुमति में वैजयंतीमाला और दिलीप कुमार ने मुख्य भूमिका निभाई थी.
मधुमति ही क्यों, मधुमति 1958 में रिलीज़ हुई थी. ये सवाल पूछने पर रिंकी कहती है कि मुझसे बहुत लोग ये पूछ चुके हैं कि आख़िर बिमल रॉय जैसे फ़िल्मकार ने, जो सामाजिक मुद्दों पर फ़िल्में बनाते रहे, मधुमती जैसी फ़िल्म क्यों बनाई. रिंकी कहती हैं कि उनकी नज़र में वो फ़िल्म और ख़ासकर उसमें फ़िल्माए गए दृश्य भारतीय सिनेमा के चंद सबसे बेहतरीन दृश्यों में से एक हैं. अपने पिता के साये से न निकल पाने का मलाल भी उन्हें बिल्कुल नहीं है. रिंकी कहती हैं, ''मेरे लिए उनकी बेटी होना बहुत गर्व की बात है. ये ज़रूर है कि लोग मुझे बिमल रॉय की बेटी के तौर पर ही पहचानते हैं जबकि मैं ख़ुद पत्रकार हूं. किताबें संपादित करती रही हूं. लेकिन इस बात का कोई अफ़सोस नहीं कि मैं सिर्फ़ बिमल रॉय की बेटी के तौर पर ही जानी जाती हूं.''
(बीबीसी हिंदी से साभार)