Sunday, 2 February 2014

एक मिनट का मौन


एम्मानुएल ओर्तीज की विश्व प्रसिद्ध रचना

इससे पहले कि मैं यह कविता पढ़ना शुरू करूँ
मेरी गुज़ारिश है कि हम सब एक मिनट का मौन रखें
ग्यारह सितम्बर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन में मरे लोगों की याद में
और फिर एक मिनट का मौन उन सब के लिए जिन्हें प्रतिशोध में
सताया गया, क़ैद किया गया
जो लापता हो गए जिन्हें यातनाएं दी गईं
जिनके साथ बलात्कार हुए एक मिनट का मौन
अफ़गानिस्तान के मज़लूमों और अमरीकी मज़लूमों के लिए
और अगर आप इज़ाजत दें तो
एक पूरे दिन का मौन
हज़ारों फिलस्तीनियों के लिए जिन्हें उनके वतन पर दशकों से काबिज़
इस्त्राइली फ़ौजों ने अमरीकी सरपरस्ती में मार डाला
छह महीने का मौन उन पन्द्रह लाख इराकियों के लिए, उन इराकी बच्चों के लिए,
जिन्हें मार डाला ग्यारह साल लम्बी घेराबन्दी, भूख और अमरीकी बमबारी ने

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ
दो महीने का मौन दक्षिण अफ़्रीका के अश्वेतों के लिए जिन्हें नस्लवादी शासन ने
अपने ही मुल्क में अजनबी बना दिया। नौ महीने का मौन
हिरोशिमा और नागासाकी के मृतकों के लिए, जहाँ मौत बरसी
चमड़ी, ज़मीन, फ़ौलाद और कंक्रीट की हर पर्त को उधेड़ती हुई,
जहाँ बचे रह गए लोग इस तरह चलते फिरते रहे जैसे कि जिंदा हों।
एक साल का मौन विएतनाम के लाखों मुर्दों के लिए...
कि विएतनाम किसी जंग का नहीं, एक मुल्क का नाम है...
एक साल का मौन कम्बोडिया और लाओस के मृतकों के लिए जो
एक गुप्त युद्ध का शिकार थे... और ज़रा धीरे बोलिए,
हम नहीं चाहते कि उन्हें यह पता चले कि वे मर चुके हैं। दो महीने का मौन
कोलम्बिया के दीर्घकालीन मृतकों के लिए जिनके नाम
उनकी लाशों की तरह जमा होते रहे
फिर गुम हो गए और ज़बान से उतर गए।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ।
एक घंटे का मौन एल सल्वादोर के लिए
एक दोपहर भर का मौन निकारागुआ के लिए
दो दिन का मौन ग्वातेमालावासिओं के लिए
जिन्हें अपनी ज़िन्दगी में चैन की एक घड़ी नसीब नहीं हुई।
45 सेकेंड का मौन आकतिआल, चिआपास में मरे 45 लोगों के लिए,
और पच्चीस साल का मौन उन करोड़ों गुलाम अफ्रीकियों के लिए
जिनकी क़ब्रें समुन्दर में हैं इतनी गहरी कि जितनी ऊंची कोई गगनचुम्बी इमारत भी न होगी।
उनकी पहचान के लिए कोई डीएनए टेस्ट नहीं होगा, दंत चिकित्सा के रिकॉर्ड नहीं खोले जाएंगे।
उन अश्वेतों के लिए जिनकी लाशें गूलर के पेड़ों से झूलती थीं
दक्षिण, उत्तर, पूर्व और पश्चिम

एक सदी का मौन
यहीं इसी अमरीका महाद्वीप के करोड़ों मूल बाशिन्दों के लिए
जिनकी ज़मीनें और ज़िन्दगियाँ उनसे छीन ली गईं
पिक्चर पोस्ट्कार्ड से मनोरम खित्तों में...
जैसे पाइन रिज वूंडेड नी, सैंड क्रीक, फ़ालन टिम्बर्स, या ट्रेल ऑफ टियर्स।
अब ये नाम हमारी चेतना के फ्रिजों पर चिपकी चुम्बकीय काव्य-पंक्तियाँ भर हैं।

तो आप को चाहिए खामोशी का एक लम्हा ?
जबकि हम बेआवाज़ हैं
हमारे मुँहों से खींच ली गई हैं ज़बानें
हमारी आखें सी दी गई हैं
खामोशी का एक लम्हा
जबकि सारे कवि दफनाए जा चुके हैं
मिट्टी हो चुके हैं सारे ढोल।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ
आप चाहते हैं एक लम्हे का मौन
आपको ग़म है कि यह दुनिया अब शायद पहले जैसी नहीं रही रह जाएगी
इधर हम सब चाहते हैं कि यह पहले जैसी हर्गिज़ न रहे।
कम से कम वैसी जैसी यह अब तक चली आई है।

क्योंकि यह कविता 9/11 के बारे में नहीं है
यह 9/10 के बारे में है
यह 9/9 के बारे में है
9/8 और 9/7 के बारे में है
यह कविता 1492 के बारे में है।
यह कविता उन चीज़ों के बारे में है जो ऐसी कविता का कारण बनती हैं।
और अगर यह कविता 9/11 के बारे में है, तो फिर :
यह सितम्बर 9, 1973 के चीले देश के बारे में है,
यह सितम्बर 12, 1977 दक्षिण अफ़्रीका और स्टीवेन बीको के बारे में है,
यह 13 सितम्बर 1971 और एटिका जेल, न्यू यॉर्क में बंद हमारे भाइयों के बारे में है।
यह कविता सोमालिया, सितम्बर 14, 1992 के बारे में है।
यह कविता हर उस तारीख के बारे में है जो धुल-पुँछ रही है कर मिट जाया करती है।
यह कविता उन 110 कहानियो के बारे में है जो कभी कही नहीं गईं, 110 कहानियाँ
इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में जिनका कोई ज़िक्र नहीं पाया जाता,
जिनके लिए सीएनएन, बीबीसी, न्यू यॉर्क टाइम्स और न्यूज़वीक में कोई गुंजाइश नहीं निकलती।
यह कविता इसी कार्यक्रम में रुकावट डालने के लिए है।

आपको फिर भी अपने मृतकों की याद में एक लम्हे का मौन चाहिए ?
हम आपको दे सकते हैं जीवन भर का खालीपन :
बिना निशान की क़ब्रें
हमेशा के लिए खो चुकी भाषाएँ
जड़ों से उखड़े हुए दरख्त, जड़ों से उखड़े हुए इतिहास
अनाम बच्चों के चेहरों से झांकती मुर्दा टकटकी
इस कविता को शुरू करने से पहले हम हमेशा के लिए ख़ामोश हो सकते हैं
या इतना कि हम धूल से ढँक जाएँ
फिर भी आप चाहेंगे कि
हमारी ओर से कुछ और मौन।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रोक दो तेल के पम्प
बन्द कर दो इंजन और टेलिविज़न
डुबा दो समुद्री सैर वाले जहाज़
फोड़ दो अपने स्टॉक मार्केट
बुझा दो ये तमाम रंगीन बत्तियां
डिलीट कर दो सरे इंस्टेंट मैसेज
उतार दो पटरियों से अपनी रेलें और लाइट रेल ट्रांजिट।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन, तो टैको बैल की खिड़की पर ईंट मारो,
और वहां के मज़दूरों का खोया हुआ वेतन वापस दो। ध्वस्त कर दो तमाम शराब की दुकानें,
सारे के सारे टाउन हाउस, व्हाइट हाउस, जेल हाउस, पेंटहाउस और प्लेबॉय।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रहो मौन ''सुपर बॉल'' इतवार के दिन
फ़ोर्थ ऑफ़ जुलाई के रोज़
डेटन की विराट 13-घंटे वाली सेल के दिन
या अगली दफ़े जब कमरे में हमारे हसीं लोग जमा हों
और आपका गोरा अपराधबोध आपको सताने लगे।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो अभी है वह लम्हा
इस कविता के शुरू होने से पहले।

Tuesday, 28 January 2014

स्त्री की आजादी का प्रश्न और यह बर्बर समय


कविता कृष्णन

महिलाएं जब आजादी की बात करती हैं तो कुछ लोग तुरंत उसे उच्छृंखलता क्यों सुन लेते हैं! महिलाओं की आजादी और उच्छृंखलता इन दोनों को एक साथ, एक-दूसरे के पर्याय के रूप में देखने की क्या जरूरत है? हाल के आंदोलन में महिलाओं ने अपनी आजादी और बराबरी की आवाज भी उठाई। न्याय की बात को सिर्फ कुछ बलात्कारियों की सजा तक न सीमित करके उन्होंने हर महिला के लिए आजादी और बराबरी के नारे को बुलंद किया। और जैसे ही उन्होंने ऐसा किया, चारों तरफ से अलग-अलग राजनीतिक तबकों, राजनीतिक नेताओं, यहां तक कि बाबाओं-गुरुओं की ओर से भी उसके खिलाफ प्रतिक्रिया सुनने में आई। उन्होंने कहा कि अगर महिलाएं लक्ष्मण रेखा पार करेंगी तो वहां उनके साथ बलात्कार होना ही है। उन सारे तबकों से ऐसा सुनना शायद आश्र्चय की बात नहीं है लेकिन हाल में एक लेख मैंने ‘प्रगतिशील’ विचारक राजकिशोर जी का भी पढ़ा, जिसमें उनके र्तकों को पढ़ कर आश्र्चय हुआ। उन्हें भी लगता है कि आजादी के नाम पर कोई वैचारिक फैशन चल पड़ा है। जहां उन्हें स्त्री की आजादी में उच्छृंखलता की आहट सुनाई देती है। कहा जा सकता है कि मैं भी उनमें से हूं जिनके बारे में उन्होंने कहा है कि वे यह पूछने पर भड़क उठती हैं और आंखे लाल-लाल करके पूछती हैं कि उच्छृंखलता की परिभाषा क्या है? इस मुद्दे पर मैं आंखे लाल करके नहीं, पर कुछ सवाल जरूर खड़े करना चाहूंगी। उन्होंने अपने लेख में सबसे पहले मेरा नाम लेते हुए मेरे एक भाषण का एक अंश उद्धृत किया है और उसके बाद अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा को उद्धृत किया है और कहा है कि मैं यानी कविता कृष्णन क्रांति की और प्रियंका चोपड़ा प्रतिक्रांति या दक्षिणपंथ की प्रतीक हैं। पहली बात जो मुझे समझ में नहीं आ रही है कि इन सब बातों में जो मूल बात है, उसे राजकिशोर जी को पकड़ने में क्या दिक्कत आ रही है। क्योंकि जो बात हम कहना चाह रहे हैं, वह प्रियंका चोपड़ा हों या मैं हूं, चाहे सड़क पर उतरी वे हजारों लड़कियां, जिन्होंने अपने हाथ से प्लेकार्ड बना-बना कर लिखा कि ‘आप हम कैसे कपड़े पहनें यह मत सिखाओ, अपने बेटों को सिखाओ कि वे बलात्कार न करें।’ मुझे लगता है कि इन सारी बातों में एक मूल बात थी कि महिला के कपड़े, उसका उठना-बैठना, अकेले चलना, उसके चाल-चलन को आधार बना कर बलात्कार को जायज न ठहराया जाये। महिलाएं बलात्कार के लिए भड़काती हैं, उत्तेजित करती हैं, इस समूची तर्क पद्धति के खिलाफ जबर्दस्त आक्रोश उन नारों में था, जो मेरी बातों में और अन्य सारी महिलाओं की बातों में भी झलका। लेकिन इससे बढ़ कर एक बात है, वह यह कि प्रियंका चोपड़ा तो एक अभिनेत्री हैं, वे एक ऐसे बाजार में अपनी जीविका अर्जित करती हैं, तमाम अन्य महिलाओं की तरह, जो बाजार महिलाओं की यौनिकता को, महिलाओं के सबआर्डिनेशन को बेचता है, उसे परोसता है। तो उस बाजार में काम करने वाली किसी महिला को दक्षिणपंथ या कि पूंजीवादी प्रतिक्रांति का प्रतिनिधि बताना, कितनी सही बात है? मैं अगर पूंजीवादी ताकतों के किसी प्रतिनिधि को खोजूंगी तो प्रियंका के बजाए नवीन जिंदल को खोजूंगी, जो दूसरे कई पूंजीपतियों की तरह खाप पंचायत के तमाम फतवों का विरोध करने की जगह उनके पक्ष में बोले। वे हरियाणा से सांसद हैं और वहां खाप पंचायतों को बनाए रखने में उनका और उनकी सरकार का भी हाथ है। हमारे देश में जो पूंजीवादी व्यवस्था है, वह सामंती पितृसत्तात्मक व्यवस्था खत्म करने की चेष्टा बिल्कुल नहीं करती बल्कि उसको और महिलाओं के सामंती शोषण को बनाए रखने में पूरी तरह से उसकी भूमिका और हिस्सेदारी है। राजकिशोर जी ने कहा है कि आजादी और बराबरी का तो सम्मान करना चाहिए लेकिन स्त्रियां कृपा करके पूंजीवादी संस्कृति की चूनर पहन करके तो न घूमें। वे अब तक अज्ञात एक बात बताते हैं कि पूंजीवादी बाजार स्त्रियों को नग्न करता है। मैं पूछना चाहती हूं कि बाजार स्त्रियों को सिर्फ नग्न करता है क्या? क्या आइटम नंबर पेश करने वाला बाजार ही बागबान जैसी फिल्में पेश नहीं करता? जिसमें वह एक पुरानी सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था को और महिलाओं को पितृसत्तात्मक समाज द्वारा तय किए गए कुछ मूल्यों को बनाए रखने के तर्क देता है, उसे बनाए रखने के पक्ष में है? क्या बाजार इस तरह के पितृसत्तात्मक मूल्यों को पेश नहीं करता है? जिस समय बाजार महिलाओं को नग्न न करता हो बल्कि ऐसे विज्ञापन, जो दिखाते हों कि अगर आप लाइफ इंश्योरेंस खरीदते हैं तो यह एक तरह से महिलाओं के माथे में सिंदूर के बराबर है, तो क्या ऐसे विज्ञापन कम महिला विरोधी हैं? वही बाजार जो आइटम नम्बर पेश करता है, क्या ढेर सारे फिल्मों-सीरियलों में महिलाओं के लिए उन्हीं सामंती मूल्यों को बनाए रखने में नहीं लगा रहता? अगर आपको बाजार सुनते सिर्फ नग्नता नजर आए और यह न नजर आए कि हमारे यहां बाजार तमाम तरह के सामंती मूल्यों को बेचता है तो फिर सवाल उठना चाहिए कि आखिर यह कैसी नजर है? राजकिशोर जी महिलाओं की कामुकता को पेश करने की बात उठाते हैं। मैं याद दिलाना चाहूंगी कि कामुकता सिर्फ नग्न महिला में नहीं होती है। बाजार उसी कामुकता के लिए महिलाओं को अलग-अलग वेश और परिधान में पेश करता है। इसलिए उसमें हम सिर्फ और सिर्फ उन आयामों की ही ओर देखें और उन्हीं की आलोचना करें लेकिन जहां पर वह सामंती-पितृसत्तात्मक मूल्यों को पेश करता है वहां पर हम उसकी आलोचना न करें तो यह बेहद नाकाफी है। मुझे इससे भी सख्त आपत्ति होती है। जब हम यह कहते हैं कि स्त्री उत्तेजना और कामुकता पैदा करने की कोशिश करती है। यह नितांत स्त्री-विरोधी बयान है। राजकिशोर जी कहते हैं कि नचैये-गवैयों को अपना धंधा करने दीजिए लेकिन दूसरी स्त्रियां उस कामुकता का पालन- पोषण क्यों कर रही हैं। ‘नचैये-गवैयों’ में जो पुरुष सत्तावादी महिला-विरोधी नजरिया और महिलाओं के प्रति अपमान भरा है, क्या वह ‘डेंटिंग-पेंटिंग’
वाली शब्दावली से अलग है? हमें पूंजीवाद और महिलाओं से उसके रिश्ते को और बेहतर ढंग से समझने की जरूरत है। महिलाओं की आजादी की बात करने का मतलब उन्हें पूंजीवादी आग में झोंक देना नहीं होता। मैं यह भी पूछना चाहती हूं कि पुरुषों के पास तो यह आजादी लंबे समय से है, जो महिलाओं को तो दी नहीं गई कि वे पैंट-शर्ट पहनें और उनको पसंद आए तो वे विदेशी ढंग की किस्म-किस्म की वेश- भूषा अपना सकें। पुरुषों को यह आजादी भी है कि वे खुली सड़क पर कहीं भी अपनी हाजत रफा कर सकते हैं, उन्हें ट्वायलट ढूंढने की भी जरूरत नहीं। उनके पास यह आजादी भी है कि वे कहीं भी खुलेआम सड़क पर अपने कपड़े खोल सकते हैं और सलमान खान जैसे तमाम एक्टर अपना सिक्स पैक वाला शरीर दिखा सकते हैं, उनके बारे में हम पूंजीवादी संस्कृति की बात या उच्छृंखलता की बात कभी नहीं करते। उन्हें देखकर उच्छृंखलता शब्द हमारी जुबान पर शायद ही आता हो तो आखिर महिलाओं की आजादी और बराबरी के मामले में ही यह बात क्यों कही जाएगी? आज के समाज में महिलाएं आजादी से जो कुछ भी चुनती हैं, वह एक बहुत खास दायरे की, बहुत सीमित दायरे की आजादी होती है। क्योंकि हम जो भी चुनते हैं वह तमाम तरह के दबावों को झेलते हुए, जूझते हुए ही चुनते हैं। जैसे हम अगर एक रिसेप्सनिस्ट के बतौर काम करते हैं या अभिनेत्री के बतौर काम करते हैं तो हम पर एक खास तरह का दबाव होता है कि आपको एक खास तरह का ड्रेस पहन कर, खास तरह की लिपस्टिक लगाकर, खास तरह का मेकअप करके आना पड़ेगा। यह मांग हमसे जॉब मार्केट भी करती है और यह दबाव पूंजीवादी संस्कृति भी हम पर डालती है कि हम साइज जीरो बनें इत्यादि। इस दबाव को मैं कतई सही नहीं मानती। लेकिन सिर्फ यही दबाव तो है नहीं। लिपस्टिक न लगाने का, मेकअप न करने का, डेंटिंग-पेंटिंग न करने का दबाव भी तो महिलाओं पर होता है। यह सामंती समाज का, पितृसत्तात्मक समाज का दबाव है, जो महिलाओं को अपनी यौन आजादी या अन्य किस्म की भी जो आजादी है, उसे अभिव्यक्त करने के लिए आजादी नहीं देता। पूंजीवादी समाज भी नहीं देता और हमारे यहां का दकियानूस पिछड़ा समाज भी यह आजादी कतई नहीं देता। तब किसी खास तरह के मॉडर्न कपड़े पहनने को, नाचने-गाने को ही कहा जाए कि महिलाएं यह सब पूंजीवादी दबाव में कर रही हैं और हम यह न समझ पाएं कि महिलाएं ऐसा जब नहीं करती हैं, खुद को राकती हैं नाचने-गाने से, खुद को रोकती हैं जींस पहनने से, खुद को रोकती हैं पुरुष मित्र बनाने से तो यह वही बाजार है जो यह दबाव भी डालता है। क्योंकि यही बाजार है जो पिछड़े पुराने मूल्यों को भी पेश कर रहा है। इसीलिए इन तमाम तरह के दबावों को झेलते, उनसे जूझते हुए महिलाएं अपना निर्णय लेती हैं। राजकिशोर जी अपने इस लेख में गांधी जी को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक महिलाएं सुरक्षित पैदल चल सकें तभी वास्तव में स्त्रियों का सम्मान होगा, लेकिन इसमें वे जोड़ते हैं कि यह स्थिति पैदा हो सके इसके लिए आवश्यक है कि स्त्रियां पैसा कमाने के लिए या फ्रीलांस के बतौर अपने को मिठाई की तरह प्रस्तुत करने का लालच त्यागें। यहां वे उपभोक्तावाद की भी बात करते हैं। अगर हम महिलाओं को सुरक्षित देखना चाहते हैं तो सबसे पहले यह नजरिया हमें त्यागना होगा कि महिलाएं जो पैसा कमाने के लिए नाचती-गाती हैं वे अपने को मिठाई की तरह पेश कर रही हैं। या जो महिलाएं मॉडर्न कपड़े पहनती हैं या लिप्स्टिक लगाती हैं वे मिठाई की तरह खुद को पेश कर रही हैं। यह नजरिया महिलाओं की सुरक्षा को उनके पहनावे, उनके चाल-चलन से जोड़ता है, महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी महिलाओं पर खुद डालता है और कहीं न कहीं बलात्कार और यौन हिंसा को जायज ठहराता है। क्योंकि ऐसा कहने का मतलब यही हुआ कि महिला अगर खुद को मिठाई की तरह पेश कर रही है तो उस पर यौन हिंसा होनी ही है। लक्ष्मण रेखा पार करेगी तो रावण सामने खड़ा ही है। इन तरह-तरह से कहे गये वाक्यों में कोई खास अंतर नहीं है। इसलिए मुझे लगता है कि प्रगतिशील तबकों में भी अगर महिलाओं की आजादी-बराबरी की बात से कुछ दुविधा पैदा हुई है, कुछ परेशानी पैदा हुई है तो अच्छी बात है और महिलाओं को इस परेशानी को आगे और आगे बढ़ाने की जरूरत है। मैं इस परेशानी का पूरा स्वागत करूंगी।

महादेवी वर्मा




मैं नीर भरी दुःख की बदली !
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनो में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झनी मचली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वांसों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

मैं क्षितिज भृकुटी पर घिर धूमिल,
चिंता का भर बनी अविरल,
रज कण पर जल कण हो बरसी,
नव जीवन अंकुर बन निकली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'



उठो लाल अब आँखें खोलो
पानी लायी हूँ, मुँह धोलो

बीती रात कमल -दल फूले
उनके ऊपर भँवरे झूले

चिडिया चहक उठी पेडो पर
बहने लगी हवा अति सुन्दर

भोर हुई सूरज उग आया
नभ में हुई सुनहरी काया

आसमान में छाई लाली
हवा बही सुख देने वाली

नन्ही -नन्ही किरणें आएँ
फूल हँसे कलियाँ मुस्काएँ

इतना सुन्दर समय ना खोओं
मेरे प्यारे अब मत सोओं

कोशिश करने वालों कभी हार नहीं होती : हर‌िवंश राय बच्चन



कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
नन्ही चीटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वाश रगों मे साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
डुबकियां सिन्धु मे गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोंती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में.
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
असफलता एक चुनौती है , इसे स्वीकार करो ,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो .
जब तक ना सफल हो , नींद चैन को त्यागो तुम ,
संघर्ष का मैदान छोड़कर मत भागो तुम.
कुछ किए बिना ही जय जयकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

समय की शिला पर : डॉ.शम्भुनाथ सिंह



समय की शिला पर मधुर चित्र कितने
किसी ने बनाये, किसी ने मिटाये।

किसी ने लिखी आँसुओं से कहानी
किसी ने पढ़ा किन्तु दो बूंद पानी
इसी में गये बीत दिन ज़िन्दगी के
गयी घुल जवानी, गयी मिट निशानी।
विकल सिन्धु के साध के मेघ कितने
धरा ने उठाये, गगन ने गिराये।

शलभ ने शिखा को सदा ध्येय माना,
किसी को लगा यह मरण का बहाना,
शलभ जल न पाया, शलभ मिट न पाया
तिमिर में उसे पर मिला क्या ठिकाना?
प्रणय-पंथ पर प्राण के दीप कितने
मिलन ने जलाये, विरह ने बुझाये।

भटकती हुई राह में वंचना की
रुकी श्रांत हो जब लहर चेतना की
तिमिर-आवरण ज्योति का वर बना तब
कि टूटी तभी श्रृंखला साधना की।
नयन-प्राण में रूप के स्वप्न कितने
निशा ने जगाये, उषा ने सुलाये।

सुरभि की अनिल-पंख पर मौन भाषा
उड़ी, वंदना की जगी सुप्त आशा
तुहिन-बिंदु बनकर बिखर पर गये स्वर
नहीं बुझ सकी अर्चना की पिपासा।
किसी के चरण पर वरण-फूल कितने
लता ने चढ़ाये, लहर ने बहाये।

Saturday, 25 January 2014

अली सरदार जाफरी


कौन आज़ाद हुआ ?
किसके माथे से सियाही छुटी ?
मेरे सीने मे दर्द है महकुमी का
मादरे हिंद के चेहरे पे उदासी है वही
कौन आज़ाद हुआ ?

खंजर आज़ाद है सीने मे उतरने के लिए
वर्दी आज़ाद है वेगुनाहो पर जुल्मो सितम के लिए
मौत आज़ाद है लाशो पर गुजरने के लिए
कौन आज़ाद हुआ ?

काले बाज़ार मे बदशक्ल चुदैलों की तरह
कीमते काली दुकानों पर खड़ी रहती है
हर खरीदार की जेबो को कतरने के लिए
कौन आज़ाद हुआ ?

कारखानों मे लगा रहता है,
साँस लेती हुयी लाशो का हुजूम,
बीच मे उनके फिरा करती है बेकारी भी
अपने खूंखार दहन खोले हुए
कौन आज़ाद हुआ ?

रोटियाँ चकलो की कहवाये है
जिनको सरमाये के द्ल्लालो ने
नफाखोरी के झरोखों मे सजा रखा है
बालियाँ धान की गेंहूँ के सुनहरे गोशे
मिस्रो यूनान के मजबूर गुलामो की तरह
अजबनी देश के बाजारों मे बिक जाते है
और बदबख्त किसानो की तडपती हुयी रूह
अपने अल्फाज मे मुंह ढांप के सो जाती है
कौन आजाद हुआ ?