Wednesday, 18 December 2013

कोई एक घर टूटने के बहाने......

जयप्रकाश त्रिपाठी

बशीर बद्र को सुन रहा था कि 'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में'। बस, ये ही पांच-सात शब्द मन में अटक गए। आगे की 'घर जलाने' वाली पंक्ति भूल कर मन इसी पेंच में कस गया कि कोई कैसे घर बनाता है, घर क्या सिर्फ दो-चार चुनिंदा दीवारों का नाम होता है, जब हम शहर बदलते हैं, नये ठिकाने पर होते हैं, पुराना ठिकाना छोड़ चुके होते हैं, शहर के किस्सी भी हिस्से में घूम-फिर कर मन वहीं क्यों लौट-लौट जाता है, अपने घरौंदे के बाहर का सब कुछ अजनबी या पराया क्यों बना रह जाता है?

जैसेकि हम पहले से इतने टूटे हुए, बिखरे हुए, अपने में सिमटे-दुबके हुए रहने के आदती हो चुके होते हैं कि चौखट के बाहर का कुछ भी चौखट के भीतर जैसा नहीं लग पाता है। हमारे एहसास में तब खलल पड़ता है, जब चौखट के भीतर कुछ टूटता है, जरा-सा भी। बाहर जितना भी ज्यादा टूट-फूट रहा हो, अंदर के तर्क ओढ़ कर हमारा मन उस कोलाहल से आगे भाग लेता है.......

इसलिए मुझे बशीर बद्र की पंक्ति  'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में'...सिर्फ 'मकान' के सेंस में नहीं लगती, उसके ढेर सारे अर्थ खुलने लगते हैं मेरे अंदर। अतीत में कितना-कुछ टूटता-बिखरता गया, वे कौन-कौन थे जिन्होंने मुझे तोड़ा-बिखेरा, बार-बार मैं खुद भी क्यों टूट जाया किया, क्या जाने-अनजाने मुझसे भी कहीं कुछ किसी के हिस्से का टूट-फूट गया.....

और आज भी अक्सर टूट लेता हूं अपने मन की दीवारों के अंदर, क्यों? कैसे-कैसे बिखर लेता हूं अनायास....कि उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया, वह मेरे बारे में वैसा क्यों सोचता है, मेरे मन की दीवारों के अंदर अब कहकहे क्यों नहीं गूंजते, टूट गईं क्या ये दीवारें, उन विचारों के बवंडर क्यों नहीं उमड़ते, जिनमें समाया हुआ कभी हवा के संग संग दूर-दूर तक उड़ता चला जाता था, किताबें होती थीं, अलग-अलग जिंदगियों की मेले होते थे, यात्राओं और शब्दों की जादूगरी में किसी के भी पीछे ये घर अपनी जड़ें पीछे छोड़ कर भागने लगता था !

 ये घर अब इतने सन्नाटे में क्यों है, चौखट के बाहर का सब कुछ फिर से इतना अजनबी क्यों हो लिया, किसने तोड़ दिया है इन दीवारों को, इन जैसे ढेर सारे सवालों के सिरे से जब भी मैं 'घर' को अपनी तरह से परिभाषित करने की कोशिश करता हूं, बाहर का सब टूटा-फूटा नजर आता है, जो छतें सही-सलामत दिख-जान पड़ती है, घूर-खंगाल कर उससे में प्रायः उदास हो लेता हूं.... जब उधर से भी उन्मुक्त हंसी कीबरसातें नहीं हुआ करतीं, न गीतों में कोई निराला या आवारा मसीहा आश्वस्त कर रहा होता है....

शायद टूटने का अर्थ छूटना भी होता होगा.....

Sunday, 15 December 2013

अन्ना, 'आप' और लोकपाल का सच


जयप्रकाश त्रिपाठी

अन्ना के संतुष्ट होने-न-होने से सरकारी लोकपाल की सच्चाई पर कोई फर्क नहीं पड़ता....
याद करिए तीन साल पहले रामलीला मैदान और जंतर-मंतर दिल्ली के दरम्यान लोकपाल-लोकपाल का शंखनाद कर रहा था।
और उसके गर्भ से पैदा हुई आम आदमी पार्टी। दरकार थी, पहले सत्ता, फिर आगे की लड़ाई। जनता के लिए कोई भी लड़ाई सिर्फ सत्ता की मोहताज नहीं होती है, फिर भी आम आदमी पार्टी ने कोई जनविरोधी काम नहीं किया।
'आप' ने अभी तक सिर्फ इतना किया, जनता को सोचने का जोश दिया कि आम आदमी आज भी उतना ही ताकतवर है, 1947 की तरह, 1977 की तरह...
अब अन्ना इस तरह सरकारी लोकपाल पर मुहर लगा रहे हैं, जैसे वही अकेले वो लड़ाई लड़ रहे थे। वह ऐसा क्यों कर रहे हैं, जनता बहुत कुछ समझ रही है। अन्ना जनता से हैं, जनता अन्ना से नहीं है।
वो लड़ाई न अन्ना अकेले लड़ रहे थे, न केजरीवाल, दोनो को इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए। वह लड़ाई जनता लड़ रही थी। दोनो निमित्त थे, माध्यम थे....बस। तो कानाफूसी कर लोकपाल पर मुहर लगाने की ठेकेदारी जनता ने न अन्ना को दी है, न केजरीवाल को। अन्ना के संतुष्ट होने न होने से सरकारी लोकपाल की सच्चाई पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।
क्या अन्ना ने जन अदालत से मंजूरी लेकर सरकारी लोकपाल पर मुहर लगाई है? केजरीवाल जो सवाल उठा रहे हैं, उसका अन्ना के पास क्या जवाब है, साफ-साफ सामने आना चाहिए....
यह समय अन्ना और केजरीवाल में फासला बढ़ने-न-बढ़ने का रागदरबारी अलापने का नहीं है, ये समय उस बहस के सार्वजनिक होने का है, जो तीन साल पहले दिल्ली में उमड़ी 'जनता के लोकपाल' पर केंद्रित हो...
अन्ना ने क्या गजब का तर्क दिया है कि '..अगर किसी को लगता है कि विधेयक में कमियाँ हैं तो इसके पारित हो जाने के बाद उन्हें अनशन करना चाहिए।' यानी हमारी आंखों के सामने पहले सेंधमारी हो जाए, फिर हम थाने में रिपोर्ट लिखाने जाएं....
अन्ना साफ-साफ जन जवाबदेही से बचते हुए सरकारी लोकपाल से स्वयं को संतुष्ट बताते हैं तो मान लिया जाना चाहिए कि वह अब जनता नहीं, कांग्रेस के साथ हैं!
अन्ना जनता के साथ हैं तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ना कि लोकपाल विधेयक संसद में पास हो, न हो। ढेर सारे विधेयक पास होकर पड़े हुए हैं। खूब भ्रष्टाचार हो रहा है, चारो तरफ लूटमार मची हुई है। विधेयक का सच जानना तो देश के सामने सबसे बड़ी नजरी है 'मनरेगा'। सरकारी लूटने के लिए गली-गली में चोर पैदा हो गए हैं।
सरकारी लोकपाल से संतुष्ट हो रहे अन्ना या गैरकांग्रेसी जनता को बताएं न कि सीबीआई की स्वायत्तता का मसला क्या कोई मामूली बात है? सीबीआई की परतंत्रता मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार को सत्तासीन पार्टी की मर्जी के हिसाब से अपराधी साबित करने-न-करने की आजादी देती है।

Tuesday, 10 December 2013

चच्चू की चुन्नी

अब का तुक्का-पुक्का फाड़ो
पढ़ो पहाड़ा भाईजी।
चुनाव चुक्का-मुक्का, लिक्खो
नया पहाड़ा भाईजी।

दिल्ली दांत निपोरे टुकटुक
जो जीते, सबके जी धुकधुक
सुकपुक-सुकपुक पारा डोले
फूंके डाढ़ा भाईजी।

विदुर बिदोरे होंठ, कान से
खोंट खंगालें
इधर जाल, फिर उधर जाल
टप्पे-टप्प डालें
जय हो दिन्नानाथ
हुई ताधिन्ना धिन्ना, बिना बिमारी
छानैं काढ़ा भाईजी।

झनझन्ना सइकिल, हत्थी हत्थे से बाहर
छकछक्का पंजा पर अम्मा की डौंड़ाहर
फुलवा फुसरावै आगे तौ
चिल्ला जाड़ा भाईजी।

ढोड़वा के घर में ढिंढोड़

कोई गद्दी गया छोड़ है,
भीतर-भीतर लगी होड़ है,
जोड़-तोड़ भइ जोड़-तोड़ है।

चित्तू चित्त पड़े पयताने,
हांफ रहे बेवजह फलाने,
दाद-खाज में नया कोढ़ है,
जोड़-तोड़ भइ जोड़-तोड़ है।

कैसे गद्दी पर चढ़ जाऊं
पाऊं, फिर जीभर के खाऊं
बस इतना भर का निचोड़ है,
जोड़-तोड़ भइ जोड़-तोड़ है।

दन्नूजी चढ़ गए अटारी,
सन्नूजी गा रहे लचारी,
मन्नू चाहे तोड़फोड़ है,
जोड़-तोड़ भइ जोड़-तोड़ है।

खुत्थड़ को थुत्थड़ थुथकारे,
बात-बात पर ताने मारे,
आने वाला नया मोड़ है,
जोड़-तोड़ भइ जोड़-तोड़ है।

झाड़ू ने झड़झड़ा दिया है,
ऐसा पिल्लर खड़ा किया है
आगे मकड़ी का जाला है,
सन 14 आने वाला है,
ढोड़वा के घर में ढिंढोड़ है,
जोड़-तोड़ भइ जोड़-तोड़ है।

Sunday, 8 December 2013

आम आदमी की पार्टी का ताजा चैलेंज.......


यह दिल्ली में सिर्फ पारंपरिक सरकार बना लेने भर का नहीं, देश की जनता के लिए नई राजनीतिक संभावनाओं का द्वार खुलने का समय है।

जेपी मूवमेंट के बाद देश की जनता की जो दुर्दशा ये सरकारें करती आ रही हैं, तरह तरह के खोल ओढ़ कर लोकतंत्र के नाम पर नितांत अलोकतांत्रिक तरीके से जनता के राजस्व की बेखौफ व्यक्तिगत हित में, ऐशोआराम के साथ ठिकाने लगाते जा रही हैं, महंगाई, कानून व्यवस्था, विकास के मोरचो पर जिस दंभ और गुरूर के साथ, सांप्रदायिकता और जात-पांत के सहारे, राजनीति में नितांत अयोग्य होने के बावजूद पारिवारिक विरासत और महंतई के बूते देशवासियों की जैसी दुर्दशा करती जा रही हैं, ऐसे में जनहित की दृष्टि से दिल्ली में सरकार बनना उतना जरूरी नहीं, जितना कि 'आम आदमी पार्टी' का उम्मीदों और आशाओं पर खरा उतरना आवश्यक है।

बड़ी मेहनत से कश्ती तूफान से निकाल कर आप टीम ले आई है

समय के इस मोड़ पर अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों पर पहले से ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ी है।

पूरे देश की निगाहें उन पर हैं।

देखना होगा कि वह दलदल में शामिल हो जाते हैं या अन्ना हजारे के लक्ष्य को अंजाम तक पहुंचाने का बीड़ा उठा लेते हैं।  

बीड़ा उठाएं भी तो सिर्फ जेपी मूवमेंट जितना ही नहीं, आज की चुनौतियों और जनता की आकांक्षाओं तथा कहरे विश्वास को ध्यान में रखते हुए। क्योंकि जनता पार्टी का अंतिम अंजाम क्या रहा था, देश अभी भूला नहीं है।

Saturday, 7 December 2013

गीत-फरोश

भवानीप्रसाद मिश्र

जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ !

जी, माल देखिए, दाम बताऊँगा,
बेकाम नहीं है, काम बताऊँगा,
कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने,
कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने,
यह गीत, सख्त सरदर्द भुलाएगा,
यह गीत पिया को पास बुलाएगा !

जी, पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझको;
पर बाद-बाद में अक्ल जगी मुझको,
जी, लोगों ने तो बेच दिये ईमान,
जी, आप न हों सुन कर ज्यादा हैरान -
मैं सोच-समझकर आखिर
अपने गीत बेचता हूँ,
जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ !

यह गीत सुबह का है, गाकर देखें,
यह गीत गजब का है, ढाकर देखे,
यह गीत जरा सूने में लिक्खा था,
यह गीत वहाँ पूने में लिक्खा था,
यह गीत पहाड़ी पर चढ़ जाता है,
यह गीत बढ़ाए से बढ़ जाता है !

यह गीत भूख और प्यास भगाता है,
जी, यह मसान में भूख जगाता है,
यह गीत भुवाली की है हवा हुजूर,
यह गीत तपेदिक की है दवा हुजूर,
जी, और गीत भी हैं, दिखलाता हूँ,
जी, सुनना चाहें आप तो गाता हूँ !

जी, छंद और बे-छंद पसंद करें,
जी, अमर गीत और ये जो तुरत मरें !
ना, बुरा मानने की इसमें क्या बात,
मैं पास रखे हूँ कलम और दावात
इनमें से भाएँ नहीं, नए लिख दूँ,
मैं नए पुराने सभी तरह के
गीत बेचता हूँ,
जी हाँ, हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ !
जी गीत जनम का लिखूँ, मरण का लिखूँ,
जी, गीत जीत का लिखूँ, शरण का लिखूँ,
यह गीत रेशमी है, यह खादी का,
यह गीत पित्त का है, यह बादी का !
कुछ और डिजायन भी हैं, यह इल्मी,
यह लीजे चलती चीज नई, फिल्मी,
यह सोच-सोच कर मर जाने का गीत !
यह दुकान से घर जाने का गीत !
जी नहीं दिल्लगी की इस में क्या बात,
मैं लिखता ही तो रहता हूँ दिन-रात,
तो तरह-तरह के बन जाते हैं गीत,
जी रूठ-रुठ कर मन जाते है गीत,
जी बहुत ढेर लग गया हटाता हूँ,
गाहक की मर्जी, अच्छा, जाता हूँ,
मैं बिलकुल अंतिम और दिखाता हूँ,
या भीतर जा कर पूछ आइए, आप,
है गीत बेचना वैसे बिलकुल पाप
क्या करूँ मगर लाचार हार कर
गीत बेचता हूँ।
जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ !

Friday, 6 December 2013

मैं स्त्री हूं, मुझे संभाल कर रखिए : किरण सिंह

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की लेखिका किरण सिंह की कई रचनाएं पुरस्कृत हो चुकी हैं. कविता संग्रह 'सूर्यांगी' के लिए उनको महादेवी वर्मा पुरस्कार दिया गया था. उनकी इस टिप्पणी से समूची आधी दुनिया का दर्द और स्वाभिमान सार्थक-सशक्त हस्तक्षेप की तरह सामने आता है कि मै स्त्री हूं और हिन्दी में लिखती हूँ. मैं एक लुप्त होती प्रजाति हूँ. मुझे संभाल कर रखिए. इन शब्दों के साथ उन्होंने ताजा-ताजा अपना यह प्रेरक बयान साझा किया है, सविस्तार, कुछ इस तरह.... 'मैंने कहानियाँ लिखना क्यों शुरु किया? इसलिए क्योंकि मैं आत्मकथा नहीं लिखना चाहती थी. आत्मकथा की शर्त है-सत्य और मेरे जीवन के सत्य दुधारी तलवार जैसी है. कहानियाँ लिखने की एक वजह यह भी थी कि मेरी ससुराल में सभी को थोड़ी बहुत कविता लिखनी आती थी. शिवमंगल सिंह सुमन और अदम गोंडवी मेरे ससुर के अच्छे परिचितों में से थे. मैं जो कविताएँ लिखती उसे बारी-बारी से, मेरे ससुराल में सभी सुधारते थे.
' छन्द-लय के अलावा यह भी देखा जाता कि तथाकथित आपत्तिजनक शब्द या भाव तो नहीं है जिससे उनकी बहू को समाज में गलत समझ लिया जाए. जैसे मैने यह दोहा लिखा, "बरसे रस की चाँदनी/भीगे उन्मन अंग/श्याम पिया मैं श्वेत हूँ/रैन दिवस एक संग. दोहा पढ़ने के बाद सासू-माँ दो दिन तक अनमनी रहीं. तीसरे दिन रहा न गया. पूछती हैं, लेकिन मेरा बचवा (उनका बचवा यानी मेरा आदमी)... मेरा बचवा तो झक गोरा है... फिर ये पिया...साँवले? मेरा पहले से तैयार जवाब था, अरे अम्माजी आप भी न! कृष्ण, भगवान कृष्ण! अच्छा आँ...हाँ ! वो अक्सर इत्मीनान की साँस लेती हैं. अम्मा-पिताजी यानी मेरे सास-ससुर मुझे कवि सम्मेलनों ले जाते. सबसे परिचय करवाते, सबसे कहते कि वे अपनी बहू को आगे बढ़ाना चाहते हैं.
'मैं अम्मा-पिताजी से क्षमा माँगते हुए कहना चाहती हूँ. एक बार कुछ बच्चों ने देखा कि एक चिड़िया अपने अंडे से बाहर निकलने के लिए छटपटा रही है. उन्होंने अंडे को तोड़ा. चिड़िया को निकाला. उसके चिपचिपे पंखों को पोंछा और उसके नीचे एक मुलायम कपड़ा बिछा कर पानी-दाना रख दिया. अगले दिन बच्चे दौड़ते हुए चिड़िया के पास गए तो वह चिड़िया मर चुकी थी. अंडे से बाहर निकलती हुई चिड़िया को जो संघर्ष करना पड़ता, उसमें उसके पंख मजबूत होते और वह बाहरी दुनिया के थपेड़ों का सामना कर पाती. रक्षा में हत्या हो गई. मेरी वे जड़ किस्म के भावबोध की कविताएँ कहीं नहीं छपती थीं. कविताएँ घर में पढ़ी जाएँगी यह सोचकर मैं अपने को सेंसर करते हुए डर-डर कर लिखती थी. मैं कोई संतुलित राह निकालने में असफल रही और मेरे भीतर की कवयित्री की अकाल मृत्यु हो गई. मैंने कुछ भी लिखना इसलिए शुरु किया क्योंकि मेरी एक खिड़की थी. जो मुझसे छिन गई. उसके बाद मेरा रहना एक ऐसे कमरे में हुआ जिसमें अँधेरा रहता था. घोर सामंती परिवार में मेरा जन्म हुआ. मेरा नाम पड़ा इतवारी और मुझसे पाँच दिन पहले पैदा हुई बुआ का नाम पड़ा सोमवारी.
'जब पाठशाला में नाम लिखाने की बारी आई तो मास्साब के कहने पर शहराती नाम रखा गया. मेरा नाम हुआ किरन क्योंकि मै इतवार की सुबह की किरन के साथ जन्मी थी और बुआ का तीजा क्योंकि वो तीसरी संतान थीं. साहित्यिक समाज से रिश्ता जुड़ा तो मेरा नाम छपने लगा किरण सिंह. उधर बुआ की शादी ऐसे परिवार में हुई जिनके परिवार के एकाध लोग शौकिया डकैत थे तो बुआ का ससुराल में नामकरण हुआ तिजा सिंह की जगह तेजा सिंह. मेरे पिता पढ़ने के लिए और नौकरी के लिए गाँव से बाहर निकले जरुर लेकिन परिवार से इस वादे के साथ कि वे शहर जाकर बिगड़ेंगे नहीं. इसलिए उन्होंने सांमती संस्कारों को और दृढ़ता से निभाया. पिता की वकालत जमने लगी तो हम गाँव से कस्बे में आए. मेरे कस्बे के उस मकान में मुकदमा लड़ने वालों, जच्चा-बच्चा, पढ़ने और परीक्षा देने वालों की भीड़ लगी रहती. माँ मेरे कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर के अपना काम करती रहती थीं. मेरे कमरे में एक खिड़की थी जिसके बाहर पोखर था. मैं खिड़की के पास बैठी अपनी कोर्स की किताबें पढ़ती और बाहर देखती रहती.
'उस खिड़की पर वह जाली लगी थी जिससे भीतर से बाहर तो देख सकते थे लेकिन बाहर से भीतर नहीं दिखाई देता था. संझा कहानी में यह खिड़की है. मेरे कस्बे का एकमात्र कॉलेज कई दिनों तक छात्रों फिर कर्मचारियो के हड़ताल में या हड़ताल के दौरान तोड़े गए फर्नीचर की मरम्मत में या फिर छात्रसंघ के चुनाव में बन्द ही रहता था. कॉलेज खुलता तो कई दफा चाचा लोग आकर कह देते फलां गुरुजी नहीं आए हैं जाने का कोई काम नहीं है. बारहवीं के बाद कॉलेज जाना कभी-कभी हुआ. वह खिड़की मेरा सहारा थी. एक दिन उस खिडकी की जाली में छेद करके एक प्रेम पत्र खोंस दिया गया था. उस चिट्ठी में लिखा था 'हँसी तो फँसी'. दरअसल एक लड़का हरे रंग की पैंट और लाल बुशर्ट पहनता था. वह अपनी दबंगई के किस्से ऊँची आवाज में लड़कियों के कॅामन रूम के आगे सुनाया करता था. एक दिन मैंने उसकी ओर देख कर सहेलियों कहा, "तोता!" और हँस पड़ी. मेरी माँ जो मेरी सबसे अच्छी सहेली थी, अपनी उस गलती के लिए बहुत दिनों तक पछताती रही. दो-चार और चिट्ठियाँ हुईं तो माँ ने उस लडके के डर से चिट्ठियाँ पिताजी को दे दीं. मेरी कोठरी बदल दी गई.
'अब मुझे बीच वाली कोठरी में रहना था जिसमें अँधेरा और सीलन रहता था जिसकी खिड़की रसोई में खुलती थी. रसोई का धुआँ कमरे में भर जाता था. एकांत और अँधेरे के उन कई सालों में मेरा व्यक्तित्व सामान्य नहीं रह गया. माँ मुझे काम नहीं करने देती और कहती कि तुम बस पढ़ो और निकलो इस जगह से. मेरे पास बहुत सारा खाली समय होता था जिसमें मैं देखे-सुने को सोचती रहती और एक काल्पनिक दुनिया की रचना करती. इस तरह मुझमें विचार की शक्ति आई और मेरी कल्पना शक्ति बहुत बढ़ गई. नुकसान यह हुआ कि उजाला मुझे चुभता है, समायोजन में कठिनाई होती है, सभा-सम्मेलनों मैं अनायास किनारे चली जाती हूँ और लोगों को ऐसे देखती हूँ जैसे वे. बस इतना जान लीजिए कि मेरे लिए कहानी वह आग है जो जंगल की आग को बुझाने के लिए लगा दी जाती है. मैं अपने को और दूसरों को नष्ट करने वाला मानव बम नहीं बनना चाहती. मैंने अपने क्रोध को रचनात्मकता में तब्दील किया है. मेरी कहानियाँ सामंती सोच वाले समाज से मेरा रचनात्मक प्रतिशोध हैं. मेरा व्यक्तिगत मत है कि स्त्री की अधिकांश क्रिया प्रितिक्रिया होती है.
' स्त्री या तो रक्षात्मक रहती है या आक्रामक. वह सहज मनुष्य नहीं रहती. मेरे लिए कहानी, विकटतम स्थितियों में भी जिन्दगी जीने का लालच है. मैं अपनी कहानियों की शुरुआत नहीं जानती लेकिन अंत जानती हूँ. विकटतम स्थितियों में भी मेरी नायिकाएँ न हारेंगी न मरेगी. वह डरेगी लेकिन वह लड़ेगी. न दैन्यं न पलायनम्. मनुष्य से इतर किसी भी शक्ति में मेरा विश्वास नहीं.'