Saturday, 30 November 2013

तरुण तेजपाल क्या, मीडिया में तो भरे पड़े हैं बाबाजी के टिल्लू!

आज कल बाबाजी का टिल्लू खूब चल रहा है। चला रहे हैं कलर्स पर कपिल शर्मा और उनकी मंडली के हंसोड़िए।

मीडिया में तरुण तेजपाल का इससे आशय नहीं हो सकता है।

प्रेस परिषद खामोश है। छाती पीट-पीट कर खूब लिखा जा रहा है। ऐसे-ऐसे कलमकार कि उन पर सौ-सौ गंगापुत्र निछावर जाएं।

पूरे मीडिया का ब्रह्मचर्य 'एकोहम, द्वितीयो नास्ति' वाचन कर रहा है। जबकि मीडिया हाउसों के अंदरखाने की हकीकतें जिन्हें मालूम हैं, बखूबी बच-बचाकर बगले झांकते हुए वे भी सद्चरित्रता के श्लोक पढ़ने से नहीं चूक रहे हैं।

चरित्र की बहती गंगा (फिल्मी) में उनके मुखौटे उतरते हुए यहां भी साक्षात देखा जा सकता है कि वे क्या लिख-पढ़ रहे हैं, क्या-क्या देख-दिखा रहे हैं...

ऐसे कइयों के बारे में पता है, जो चप्पलों से पिटे हैं। ऐसे महान चरित्रवानों में जो नहीं पिटे हैं, उनकी भी जाने-अनजाने भद्द पिटने की कहानियां आम रही हैं।

मीडिया समारोहो में इस तरह के दृश्य आम रहते हैं। बस गौर से देखने की जरूरत है कि कौन किधर टकटकी लगाए है, कौन किससे सुअर-संवाद (स्त्रैणता) में चिपटा हुआ है।

बड़े-बड़े चेहरे हैं, जिनसे नकाब खींच दी जाए तो तरुण तेजपाल के अपयश को हजारो मील पीछे छोड़ जाएंगे। बस उनकी ढंकी-तुपी है। महान हैं।

काश, उन तरुणवानो की भी गाहे-बगाहे कलई उतरती जाए तभी उम्मीद की जा सकेगी कि मीडिया में स्त्रियों का आगत अतीत सकुशल रह सकेगा।

मीडिया-मुखौटों में ऐसे-ऐसे बाबाजी के टिल्लू भरे पड़े हैं कि अपने लिखे के ठीक विपरीत आचरण करने के बावजूद उनके सदाचार की शेखियां सुन सीता-सावित्री भी दांतों तले अंगुली दबा लें। वे आचरण को अपने ढंग से पारिभाषित करते हैं, जीते हैं और पत्रकारिता का आए दिन जनाजा निकालते फिरते हैं।

मीडिया हाउसों के अंदर की अगर कोई ढंग से स्टिंग हो जाए तो बज जाएगा बड़़े-बड़ो का बाजा, यशस्वी टिल्लुओं की शामत आ जाए।

उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसा दिन जरूर आए और मीडिया को रौरव नर्क बनाने वाले शेखीबाजों के चेहरे से भी नकाब खिंचे......

Friday, 29 November 2013

अखबारों से ज्यादा लोग फेसबुक पर-कीर्थिगा

फेसबुक इंडिया की हेड कीर्थिगा रेड्डी  का कहना है कि अखबारों से ज्यादा लोग फेसबुक के प्लेटफार्म पर हैं।
आपने 2010 में पहली एंप्लॉयी के तौर पर फेसबुक इंडिया जॉइन किया। वो क्या चीज थी जिसके चलते आपने अमेरिका से भारत आने और इस पद पर काबिज होने का फैसला किया ?
 तीन बातों ने मुझे इस कंपनी की तरफ आकर्षित किया। पहली – लोगों को एक-दूसरे के साथ बातें साझा करने की ताकत देने का मिशन और  दुनिया को ज्यादा खुला और कनेक्टेड बनाना, जो काफी प्रेरणादायी और बोल्ड बात है। और यही वो बाते हैं जो मुझे और हर फेसबुकर को इस सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट की तरफ खींचती हैं और वे हर दिन यहां अपना बेस्ट काम करते हैं।
 दूसरी – भारत वो जगह है जहां यह सब कुछ हो रहा है। यहां फेसबुक की शुरुआत करना, उसका बिजनेस और ऑर्गनइजेशन खड़ा करना बड़ी बात है। तीसरी – इंटरव्यू के दौरान मेरी जिनसे मुलाकात हुई वे सभी अपने काम में माहिर हैं। वे प्ररेणादायक लोगों के आसपास रहना चाहते हैं। मुझे विश्वास नहीं हुआ कि मेरे पास ऐसे लोगों के साथ काम करने का मौका है। मेरे पास एक फेसबुक ऐल्बम है जो कहती है ‘हर हफ्ता अभी तक का सबसे अच्छा हफ्ता है’ और मैं इस पर यकीन करती हूं।
 फेसबुक जॉइन करने के बाद वो कौन-सी सबसे महत्वपूर्ण चीजें हैं जो आपने सीखी हैं ?
अगर मैं पिछले साढ़े तीन सालों को देखूं तो एक वक्त था जब लोग कहते थे कि ‘वाकई, फेसबुक पर विज्ञापन होते हैं ? कहां हैं वो ?’ आज मैं ईमानदारी से ये कह सकती हूं कि फेसबुक सोशल मीडिया नहीं है, असल में वो मास मीडिया है। उन लोगों का आंकड़ा देखिए जो हमारी वेबसाइट से जुड़ते हैं और फिर प्रमुख अंग्रेजी अखबारों से इसकी तुलना कीजिए। हर दिन लाखों लोग फेसबुक पर होते हैं। यही वे मूलभूत परिवर्तन है जो हम मार्केटिंग और एडवरटाइजिंग के क्षेत्र में लाने की प्रकिया में हैं। साथ ही अभी यह भाव है कि यह बस अभी शुरू ही हुआ है। हम फेसबुक पर बहुत समय जिन पांच बातों पर खर्च करते हैं, व हैं इससे पड़ने वाला प्रभाव, तीवत्रा लाना, बोल्ड बनाना, खुलापन लाना और सोशल वैल्यू का निर्माण करना। हम सही संस्कृति के निर्माण की अहमियत पर जोर देते हैं। हम ग्लोबल कल्चर के साथ तालमेल बैठा सकने वाली टीमों और ऑर्गनाइजेशंस के निर्माण पर समय खर्च करते हैं।
 भारी मात्रा में डेटा इकट्ठा करने के मामले में फेसबुक को मॉडल कहा जा सकता है। आप इसके बारे में क्या सोचती हैं और यह एडवरटाइजर्स के लिए कैसे फायदेमंद हो सकता है ?
 मैं इस बारे में इस तरह सोचती हूं, ‘इनोवेशन फ्रॉम इन्फर्मेशन।’ मैं आपको दो उदाहरण दे सकती हूं। 2003 में फेसबुक का प्रोफाइल पेज रिज्यूमे की तरह दिखता था। यूजर्स बर्थडे जैसे मौकों पर ही पर कभी कभार फोटो अपलोड करते थे। फिर हमने देखा कि वो कैसे एक ही दिन में कई बार फोटो बदलने लगे। हमें एहसास हुआ कि यूजर्स फेसबुक का इस्तेमाल फोटो शेयर करने के लिए करना चाहते हैं और यह उनके खुद को अभिव्यक्त करने का अहम हिस्सा है। इसके बाद ही हमने अपना फोटो इनेबल्ड प्रोडक्ट लॉन्च किया। दूसरा उदाहरणSocialBlood.org नाम का भारतीय संगठन है। ये फेसबुक की मदद से अलग-अलग ब्लड ग्रुप वाले लोगों के समूह बनाता है। कई ऐसे उदाहरण हैं जिनसे यह पता चलता है कि किस तरह ऐसे डेटा बेस का इस्तेमाल अपने कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है।
 विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों के साथ बेहतर तरीके से जुड़ने के लिए क्या अतिरिक्त प्रयास किए जा रहे हैं?
हम देश में सबसे बड़े विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों के साथ मिलने-जुलने पर काफी समय खर्च करते हैं। वे अक्सर ये सवाल करते हैं कि फेसबुक का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने में हम उनकी कैसे मदद कर सकते हैं ? एजेंसियों के लिए हमारे पास बहुस सारे ऑनलाइन टूल्स हैं, जैसे - स्टूडियोएज सर्टिफिकेशन प्रोग्राम। जहां इस बारे में जाना जा सकता है कि वे कैसे इस प्लेटफॉर्म का बेहतर तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं।
 ब्रैंड्स के लाइक्स खरीदने पर आपकी राय क्या है ? उन्हें अपनी सीमा कहां तय करनी चाहिए ?
हम फैंस के बारे में काफी बातचीत सुनते हैं। हम ब्रैंड्स से यही कहते हैं कि किसी और चीज के बजाय पहुंच के बारे में सोचना चाहिए। अक्सर ब्रैंड्स हमारे पास आते हैं और पूछते हैं, ‘हमारे प्रतिद्वंदी के पास 10 लाख फैंस हैं। मैं उनसे आगे कैसे निकल सकता हूं ?’ तब हम उनसे पूछते हैं कि आपका बिजनेस ऑब्जेक्टिव क्या है? इसके बाद हम उन्हें फेसबुक के सही इस्तेमाल के बारे में बताते हैं।
 फेसबुक की क्षमताओं के बारे में आपसे पूछा गया सबसे हास्यास्पद सवाल ?
कुछ लोग हमसे पूछते हैं कि क्या हम किसी खास दिन अपने पेज का रंग बदलकर उनके ब्रैंड का रंग लगा सकते हैं। हम ब्रैंड्स को बताते हैं कि ऐसा करना उनके हित में नहीं है क्योंकि हमें यूजर्स से नकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है। आखिरकार हम उन्हें खुद से दूर तो नहीं कर सकते।
 (कीर्थिगा रेड्डी  से स्नेह उलाल की बातचीत एक्स्चंज4मीडिया से साभार)

Friday, 22 November 2013

दलित साहित्य में स्त्री विमर्श


संजीव खुदशाह

स्त्री विमर्श आज अपनी ऊचाईयां छू रहा है और समाज को एक नारी के प्रति नये दृष्टि कोण से देखने के लिए प्रेरित कर रहा है, साथ ही समाज की जमीनी सच्चाईयों से भी इनकार नही किया जा सकता कि नारी आज भी प्रताड़ित है। दरअसल उसकी इस प्रताड़ना के पीछे की वास्तविक कारणों की पड़ताल की आवश्यकता है। वह किससे प्रताड़ीत है तथा किसकी प्रताड़ना के विरूध लामबंद हुए है यह भी गौर करने योग्य है। यदि कुछ भौतिक असामनताओं को नजर-अंदाज कर दे, तो वास्तव में प्रकृति ने नर-नारी को एक जैसा ही बनाया है। इन असमानताओं को आधुनिक युग के अविष्कारों ने बहुत हद तक कम कर दिया है। एक दिलचस्प तथ्य यह है कि आदिम काल में पुरूष एवं स्त्री में कोई भेद(आश्य ऊंच-नीच से है) नहीं था। बल्कि शिकार के महत्व कम होने एवं कृषि की खोज के पहले तक मानव समाज में स्त्रियों का ही बोल-बाला था। इस बारे में श्री देवी प्रसाद चटोपाध्याय जी अपनी किताब लोकायत में लिखते है-''कृषि के प्रारंभिक चरण में देव स्तर पर स्त्री और पुरूष की प्रधानता उलटी हो गई। स्त्री आगे बढ़ गई और पुरूष को या तो पृष्ठभूमि में पीछे धकेल दिया गया या कम से कम इतना हुआ कि उसे स्त्री की नकल करने के लिए बाध्य होना पड़ा। ये सब बातें तर्क संगत थी। कृषि के प्रारंभिक चरण में स्त्री का सामाजिक महत्व बढ़ गया था क्योकि कृषि की खोज स्त्रियों ने ही की थी।`` वे आगे श्री जे.डी. बरनाला के हवाले से लिखते है -''चूकि खाद्य सामग्री इकट्ठा करना स्त्रियों का काम था इसलिए संभवत: उन्होने ही कृषि की खोज की। जो भी हो यह कृषि कार्य कम से कम तब तक स्त्रियां ही करती रही जब तक बैल व्दारा हल चलाने या जुताई करने की विधि का अविष्कार नही हुआ। जुताई एक प्रकार के हल से की जाती थी जो पाषाण-काल में खुदाई के काम में लाई जाने वाली लकड़ी के आधार पर बना था और जिसका प्रयो स्त्रियां जमीन से कंद-मूल निकालने के लिए करती थी। जहां जहां शिकार से अधिक महत्व खाद्य सामग्री जुटाने के लिए कृषि को मिला वहां स्त्रियों का स्तर उचा उठा और मातृ कुल के अनुसार वंशानुक्रम चलाने की बजाय पितृ कुल के अनुसार वंशानुक्रम चलाने की प्रवृत्ति रूकी और इसे उलट दिया गया। पितृ कुल के अनुसार वंशानुक्रम चलाने की प्रवृत्ति सबसे पहले शिकार वाले चरण में आरंभ हुई थी। केवल उन्ही स्थानों पर जहां पशुपालन ही प्रमुख व्यवसाय था, जैसे कृषि प्रधान बस्तियों के आस-पास के क्षेत्र में पितृ सत्तात्मक समाज व्यवस्था पूर्ण रूप में स्थापित हुई, जैसा कि हम बाइबल में देखते है।(६०.६०-१)`` यदि हम इतिहास में परिवार की आर्थिक व्यवस्था पर गौर करें तो पाते है कि जब-जब आर्थिक व्यवस्था पूरूष के हाथों गई तब-तब पूरूष की सहचरी स्त्री हुई (आशय पितृसत्ता से है)। मातृ सत्ता के मामले में ठीक उल्टा हुआ। यह व्यवस्था भी अर्थशास्त्र के मांग और पूर्ति के नियम का उल्लंघन नहीं करती है। लेकिन इस सत्ता परिवर्तन में कुछ ऐसे भी कारक होते हैं जिन्हें हम अक्सर नजर-अंदाज कर देते है। वह है पहला- राजनैतिक अस्थिरता दूसरा- सामाजिक बंधन, तीसरा- धार्मिक कट्टरता तथा चौथा है- परिवार का स्तर। लगभग प्रत्येक धर्म / समाज ने स्त्री की लज्जा को समाज की लज्जा से जोड़ा है। इसके परिणाम-स्वरूप स्त्री की लज्जा व्यक्तिगत लज्जा न होकर सार्वजनिक लज्जा हो गई । संकुचित अर्थ में कहें तो उसकी लज्जा का तालीबानी-करण हो गया । ज्यादातर सक्रिय महिलाओं का भी ऐसा ही मानना है । बस यही से शुरू होता है स्त्री की स्वतंत्रता का हनन । यानि स्त्री का प्रत्येक कदम सार्वजनिक लज्जा को ठेस पहुचाता है। परोक्ष या अपरोक्ष रूप से इसके परिणाम भी स्त्री को ही भुगतने पड़े । हमारे शास्त्रों-पुराणों में ऐसे हजारों संदर्भ भरे पडे है जिनमें स्त्री को एक वस्तु या सम्पत्ति की तरह पुकारा गया है। धर्म के ठेकेदारों ने भी ईश्वर के पश्चात पूरा ध्यान स्त्री पर ही केन्द्रित किया तथा सारे नियम कायदों से स्त्रियों को लाद दिया गया । मेरा मानना है कि असंयमित वासना प्राप्ति संघर्ष से बचने के लिए पूरूष प्रधान समाज ने ही विवाह जैसी संस्था का निर्माण किया और उसके यौन मामलों को लज्जा की संज्ञा देकर एक बेहद कीमती और नाजुक कांच की दीवार बना दिया। इससे स्त्री जाति को एक बड़ी हानि हुई, वह है- विवाह पश्चात ही स्त्री का सामाजिक मूल्य खत्म हो गया । वह सिर्फ भोग्या बन गई । विवाह संबंध विच्छेद या विधवापन की सूरत में तो वह और भी कष्टप्रद था, क्योंकि टूटी कांच की दीवार को कोई घर में नही सजाता था । हांलाकि वैवाहिक संबंध प्राकृतिक नियमों के अनुरूप है लेकिन उसके पीछे की रूढ़ियॉ एवं कायदे इस नियम को अप्राकृतिक बनाते है । जो स्त्री की स्वतंत्रता का हनन करते है- स्वयंवर विवाह, विधवा विवाह, पुर्नविवाह एवं प्रेम विवाह जैसे कोई अपराध हो । इस पर समाज में पाबंदी जेैसी स्थिति है । हम स्वयं अपनी संस्कृति पर गर्व करते हुए फूले नही समाते है किन्तु हमारी पाणिग्रहण की सारी पद्धतियां स्त्री को स्त्री नही बल्कि किसी समान का दर्जा देती है। जो किसी दान की वस्तु से कम नही है। हिन्दू धर्म में सर्व प्रचलित ब्राम्ह विवाह है जो इस प्रकार है:- ब्राम्ह विवाह- विद्या और आचारऱ्युक्त वर को बुला कर और उत्तम वस्त्रो और अलंकारों से कन्या तथा वर को भूषित कर वर को जो कन्यादान दिया जाता है उसे ब्रम्ह विवाह कहते है। इसी प्रकार इस्लाम में प्रचलित विवाह हिन्दुओं के धर्म ग्रथों में वर्णित असुर विवाह जैसा है:- असुर विवाह- कन्या के पिता आदि को अथवा कन्या को यथा-शक्ति धन देकर जो अपनी इच्छा से कन्या को लेता है, उसको असुर विवाह कहते है। दोनों प्रकार के प्रचलित विवाह में कन्या एक वस्तु के रूप में स्थित है । एक में वह दान की वस्तु है तो दूसरे में विक्रय की । हमारी संस्कृति ने एैसी ही रीतियों को अपना आदर्श बना डाला और हम इसे ही गर्व की अवस्था मान बैठे । यह तथ्य है कि दोनों ही स्थितियों में माता पिता कन्या का विवाह करके अपने बोझ की इतिश्री कर लेते है। हम अपनी संस्कृति पर गर्व करते है तथा विश्व की महान सभ्यता हाने का दावा करते है। ऐसा कहते समय हम भूल जाते है कि कन्या हत्या, सती प्रथा, भू्रण हत्या जैसी घीनौनी प्रथायों भी हमारी संस्कृति की देन है। जो पूरे मानव समाज को कलंकित करती है। ब्रिटीश शासन को इसका श्रेय जाता है कि पहले-पहल उन्होने इन कुप्रथाओं को कानून बन्द करने का आदेश दिया। लेकिन दुखदाई पहलू यह है कि आज भी ऐसी घटनाओ की कमी नही है। कन्या भ्रुण हत्या जैसे एक आम बात हो। उसी प्रकार दहेज समस्या भी अपने पैर पसारा हुआ। जिनके विरूध कडे कानून कनाये गये है तथा महिलाओं को कई कानूनी भरण-पोषण की सुविधाए उपलब्ध कराई गई है। कई बार इन सुविधाओ के लालच में भी परिवार टूटते बिखरते देखे जाते है। स्त्री लेखन ने समाज की आधी आबादी को सच से अवगत कराया। थेरीगाथा की स्त्रियों से लेकर अब तक की स्त्रियो का लेखन समाज को स्त्री चिंतन से सहज ही अवगत कराता है । अब पुरूषों को समाज में स्त्रियों के संग ताल से ताल मिलाते हुए चलने के लिए स्त्री चिंतन को समझना होगा। ज्यादातर लोग यह मानते है कि स्त्री विमर्श वास्तव में पुरूष विरोधी विमर्श है यह उनका पूर्वाग्रह है । इससे भी निजात मिलना जरूरी है वास्तव में स्त्री लेखन में निम्न पॉच बाते प्रमुखता से आती हैं:- १- स्त्रियों की पिड़ायें -२- स्त्रियों की महत्वकांक्षाएंें ३- परिवार तथा समाज का संघर्ष ४- भक्ति रचनायें ५- स्त्रीवादी रचनायें । दलित लेखन की आवश्यकता इसलिए महसूस हुई, क्योंकि सामान्य लेखन ने दलित लेखन की पूरी उपेक्षा की । उसी प्रकार दलित स्त्री लेखन की भी उत्पत्ति होनी आवश्यक थी क्योंकि सामान्य स्त्री लेखन में दलित स्त्री का हित विलोपित था । सामान्य तौर पर ऐसा माना जाता है कि दलित स्त्री लेखन (विमर्श भी) चौतरफा संघर्ष करता है - सवर्ण समाज, परिवार , दलित पुरूष एवं सामान्य स्त्री विमर्श आदि । लेकिन सामान्य स्त्री विमर्श इस विमर्श को लेकर या तो चुप्पी साध ली या विमर्श मानने से ही इंकार कर दिया। इस कारण यह विमर्श और उग्र होता गया । हिन्दी भाषा में कई लेखिकाएं इस विमर्श हेतु अपनी लेखनी से समाज को अवगत करा रही हैं । लेखनी की उग्रता ने प्राकृतिक नियमों तक को चुनौती दे डाली , इसे कुठांये भी कहा जा सकता है । जहॉ एक ओर सामान्य स्त्री विमर्श में तस्लीमा नसरीन जैसी महिलाएं अपने समाज की कुरीति पाखंड से लोगो को अवगत करा रही हैं, वहीं दूसरी ओर दलित स्त्री लेखन भी अपना वजूद बनाने हेतुू प्रयासरत हैं । इस मामले में मैं दलित लेखिकाओं का जिक्र करना आवश्यक समझता हूॅ कि किस प्रकार उन्होनें सामान्य स्त्री विमर्श से अलग दलित स्त्री विमर्श की आवश्यकता के पक्ष में अकाट्य तर्क दिये । वे लिखती हैं कि ''ऊॅची जाति के लोगों द्वारा दलित महिलाओं पर अत्याचार, उनको नंगा घुमाना आदि नारी आदोंलन के व्यापक हिस्से कभी नही बने ।`` वे आगे यह भी लिखती हैं कि '' आज भी नारीवादी विचारको एवं कार्यकर्ताओं को लगता है कि जाति का सवाल उनके आदोंलन को तोड़ देगा जबकि दलित महिलाओं को मानना है कि दलित महिलाओं को जोड़ने से ही नारीवादी आदोंलन और सशक्त बनेगा। आज ३३ प्रतिशत महिला आरक्षण के सवाल पर दलित स्त्रियों को चिंता हैं कि अगर उनको उनका हिस्सा नही मिला तो वे मुख्य धारा से पिछड जायेेगीं। इसलिए उनका उंची जाति की नेता और समूहों के तर्क पर उनका विश्वास नही है । महिला आदोंलनकारियों का कहना है कि पहले विधेयक तो पास होने दो फिर बटवारा बाद में हो जायेगा । पर हमारा क्या ऐसा होना संभव है ।`` यहॉ पर सामान्य स्त्री विमर्श के भीतर बहुत ही सफाई से दलित लेखिकाऐं अपने दलित स्त्री विमर्श के अस्तित्व को रेखांकित करती है । उनकी चिंता लाजमी है क्यों कि सदीयों से ऐसा ही होता आया है । एक सवर्ण स्त्री दलित स्त्री को वैसे ही प्रताडित करती है जैसे एक सवर्ण पूरूष दलित पूरूष को प्रताड़ित करता है । दलित साहित्य में आत्मकथा लेखन के साथ-साथ एक ऐसी कुरीति का जन्म हुआ, जिसमें साहित्यकार का मूल्याकंन उसकी कृति ना होकर उसकी निजी जिन्दगी हो गई इसके साथ- साथ अन्य साहित्यकारों के भी नीजि जिन्दगी की तांक-झाक खुसर-फुसर का सिलसिला चालू हो गया जो वाकयुद्ध के बाद लेखन पत्रिका तथा किताबों की शक्ल में सामने आने लगा । इस प्रक्रिया में ज्यादातर ऐसे लेखक एवं लेखिकायें शामिल थी जिन्होनें लेखन शीर्ष में पहुचने के लिए शार्टकट रास्ता चुना। इस मामले में सवर्ण मीडिया या साहित्यकारों पर सारा दोष मढ़कर दलित साहित्यकारों को निर्दोष कहना गैर वाजिब होगा। दुर्भाग्यवश दलित स्त्री विमर्श का लेखन भी इन्ही पचड़ों में फसता गया। जहॉ निष्पक्ष एवं तटस्थ लेखन की आवश्यकता थी वहीं पर इस लेखन का उपयोग एक दूसरे पर कीचड़ उछालने के तौर पर किया गया । तमाशा देखकर मजा लेने वालों ने बकायदा इसे छापा भी। निश्चित तौर पर एसे लेखन को मौका मिलने पर दलित स्त्री विमर्श की जड़े कमजोर हुई है, जिसकी भरपाई आसान नही है।

Thursday, 21 November 2013

अस्पृश्यता और हिंदी दलित लेखन


 डॉ. शेख अफरोज फातेमा

भारतीय संस्कृति दुनिया के महान संस्कृतियों में से एक मानी जाती है। ऐसी महान संस्कृति में अस्पृश्यता एक कलंक के रूप में हैं। भारतीय वर्ण व्यवस्था में चतुर्थ वर्ण को शूद्र कहा गया है। इस वर्ण पर सदियों से जुल्म ढाए जा रहे हैं। आधुनिक युग में अनेक नेताओं और समाज सेवियों ने इस अस्पृश्यता को मिटाने के लिए एड़ी-चोटी के प्रयत्न किये हैं।महात्मा गांधी अस्पृश्यता मिटाना चाहते थे। उन्होंने भारतीय समाज पर लगे इस कलंक को मिटाने के लिए बहुत से प्रयास किए। म. गांधी के अनुसार, ‘‘हिंदू धर्म में अस्पृश्यता को कोई स्थान नहीं है। अस्पृश्यता हिंदू धर्म पर लगा एक कलंक है। यदि यह अस्पृश्यता प्रथा न गई तो हिंदू समाज और हिंदू धर्म का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा।’’भारत जैसे विशाल देश में जहाँ सदियों से प्रेम, शांति, अमन, मानवता, सद्भावना जैसे शब्द को ठोस गरिमा है। विश्व के महान शांति प्रसारक और महान पृष्ठभूमि वाले देश में दलितों को लेकर यह व्यवहार ? जब कि सभी मानव एक समान हैं। आदमी की पहचान उसके कर्म से, ज्ञान से विद्ववत्ता से होनी चाहिए न की उसकी जाति से। इसलिए कबीर ने कहा है -‘‘जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञानमोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान।’’हम सभी हाड मांस से बने, एक समान हैं। हमें छुआछूत को पीछे छोड़ना चाहिए। अस्पृश्यता समाज में लगा कोढ़ है। छूत-अछूत के भेदभाव ने दलित वर्ग को प्रताड़ित किया है।आज वर्तमान में भी अस्पृश्यता अपना स्थान बरकरार रखी हुई है। आज हम भले ही ग्लोबल होने की बात करते हैं किंतु आज भी जाति व्यवस्था जन्ममूलक बनी हुई है कर्ममूलक नहीं। इस संदर्भ में दिनकर लिखते हैं -‘‘मगर मनुज क्या करें ? जन्म लेना तो उसके हाथ नहीं।चुनना जाति और कुल अपनी वश की तो है बात नहीं।’’जाति व्यवस्था भारतीय समाज की ऐसी चारित्रिकता है जो अन्यत्र नहीं मिलती है। अन्य धार्मिक समुदायों में विभेद पाये जाते हैं, मगर उतने रूढ़ नहीं है जितनी भारतीय समाज की जाति व्यवस्था। जाति व्यवस्था की पकड़ हमारे देश में दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। कहा जाता रहा है कि आर्थिक विकास के परिणामस्वरूप जाति व्यवस्था ढीली होगी और अअंतः मिट जाएगी, मगर असलियत कुछ और ही है। हिंदी भाषा क्षेत्र में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा, बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश से आर्थिक रूप से काफी उन्नत है और वहाँ अधिकतर आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। वे राजधानी दिल्ली से कई प्रकार से जुड़े हुए हैं और उनके काफी सारे लोग विदेश में कार्यरत हैं। फिर भी जाति व्यवस्था का शिकंजा जितना उनके यहाँ मजबूत है उतना पिछड़े हुए बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में नहीं है।आए दिन दलित और गैर दलित के बीच शादी संबंध के परिणामस्वरूप लड़का-लड़की को मारने की बात सामने आती है। हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसी-न-किसी बहाने दलितों को उत्पीड़ित किया जाता है। यह स्थिति लगभग समग्र भारत की है सोचने की बात है कि इसके पीछे क्या कारण हैं ?उत्तर वैदिक काल से ही शूद्रों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया है जिसके कारण वह अज्ञान के गहरी अंधी खाई में लोटे गए हैं। म. फुले कहते हैं -‘‘शिक्षा के अभाव से बुद्धि का र्‍हास हुआ।बुद्धि के अभाव से नैतिकता की अवनती हुई।नैतिकता के अभाव से प्रगति अवरूद्ध हो गयी।प्रगति के अभाव से सम्पति लुप्त हो गयी।सम्पत्ति के अभाव से शूद्रों का पतन हो गया।इन सारी विपत्तियों का अभिभाव अकेले अज्ञान से हुआ।’’जीवन की मूलभूत इकाइयों से वंचित दलित वर्ग सदियों से जीवन जी रहा नहीं, बल्कि जीवन को मानो ढो रहा है। साक्षर न होने के कारण जमीनदारों, साहूकारों, बनियों ने धूर्तता से उनका बेजा लाभ उठाया है। उधार लिए पैसों का ब्याज चुकाते-चुकाते जीवन से वे हार मान बैठे थे। शिक्षा के अभाव में दलितों का बहुत शोषण हुआ है। शिक्षा से समझ बढ़ती है, ज्ञान बढ़ता है। परंतु उन्हें हमेशा शिक्षा से वंचित ही रखा गया है। फिर कैसे वह अपने आप को व्यक्त करेंगे। शिक्षा से वंचित रखना यह दलितों के खिलाफ बहुत बड़ी साजिश थी।शिक्षित समाज में उपरी तौर पर दलितों के प्रति व्यवहार बदल रहा था पर सूक्ष्म रूप से अलगाव जारी था। जैसे खाने-पीने के अलग बर्तनों का प्रयोग आदि। ‘‘समय बदला है लेकिन फिर भी कही कुछ का वही ठहर गया है। आज भी जाति एक विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण घटक है। जब तक पता नहीं चलता लोग सामान्य रहते हैं। जाति का पता चलते ही सन्नाटा खींच लाता है। फुसफुसाहटे उठती हैं। दलित होने की पीड़ा चाकू की तरह नस-नस में उतरती जाती है। पढ़े-लिखे दलितों की अवस्था त्रिशंकू जैसे हो गयी है। उनकी पहचान उनकी अस्मिता का संकट आज पहले से अधिक बिकट है। वे समाज के मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं तो सवर्ण बाहें फैला कर नहीं अपनाते।’’४ जहाँ तक दलित जीवन का सवाल है वह भारतीय समाज में हमेशा तिरस्कृत ही रहा है और वर्तमान में भी तिरस्कृत ही है। इस तिरस्कार भरी जिंदगी से दलित वर्ग उब चुका है उससे वह मुक्ति चाहता है।आधुनिक समय में दलित वर्ग अपनी सदियों की दासता से मुक्ति चाहता है। वह अपनी स्थिति में परिवर्तन लाना चाहता है। उसके बदलते हुए कदम उसमें परिवर्तन की मांग करते हैं। वह भी आज सर उठाकर जीना चाहता है। सभ्य समाज, जो मुख्यधारा कहलाता है। उसके साथ कदम मिलाकर चलना चाहता है। उसे भी एक व्यक्ति के रूप में जाना जाय यही उसकी इच्छा है।वर्तमान समाज में दलितों के उद्धारक महामानव डॉ. आंबेडकर ने उन्हें शिक्षा, संघटन और संघर्ष का रास्ता दिखाकर उनके अंधेरे जीवन में नई रोशनी की किरण दिखलायी है। शिक्षा के कारण दलित युवक आज पढ़-लिखकर अपने हक के प्रति जागृत दिखाई देता है। शिक्षा ने तीसरे नेत्र का काम किया, जिससे सामाजिक प्रवाह में वह अपने अस्तित्व की माँग कर रहा है। शिक्षित दलित समाज ने साहित्य में आगमन कर अपनी वेदना को जो परिधि पर थी उसे केंद्र में लाने का स्वयं कार्य किया है। महात्मा फुले के शब्दों में कहे तो, ‘‘राख ही बता सकती है जलने की पीड़ा क्या है ?’’ यह पीड़ा लिए दलित समाज अपनी स्वानुभूति को समाज के सामने लाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।दलित वर्ग को लेकर साहित्य में चर्चा करना वर्जित माना जाता था। इसी हाशिए के बाहर के समाज का साहित्य में पर्दापन करना इतना आसान काम नहीं था। समकालीन साहित्यकारों ने समय के साथ सरोकार निभाते हुए इन हाशिये के बाहर के समाज को हाशिए के अंदर लाने का कार्य किया है। समाज से सताये गए इस वर्ग को सामाजिक स्तर पर न्याय दिलाने का प्रयास साहित्यकारों ने सफलतापूर्वक किया है।‘दलित पँथर’ की स्थापना के उपरांत देश में अनेक संघटनाओं की स्थापना हुई जिसके द्वारा दलित साहित्य को बढ़ावा मिला या एक मंच प्राप्त हुआ। दलित साहित्य रूढ़िवाद, जातीयवाद और भाग्यवाद ही नहीं मानता, नारी उत्पीड़न और श्रमिक उत्पीड़न के विरूद्ध खुला विद्रोह उसके मूल स्वर में शामिल है।हिंदी दलित साहित्य की देन सिर्फ दो ही दशकों की है। जिसका मूल स्त्रोत महाराष्ट्र का दलित साहित्य है। दलित साहित्य की प्रेरणाओं में डॉ. आंबेडकर, म. फुले, शाहू महाराज आदि रहे हैं। हिंदी पर मराठी दलित साहित्य का प्रभाव दिखाई देता है।समकालीन साहित्यकारों ने दलित उत्पीड़न को लेकर कहानियाँ लिखी हैं। जिनमें प्रमुख रूप से - ‘सुरंग’ (सूरजपाल चौहान), ‘सलाम’ (ओमप्रकाश वाल्मीकि), ‘दृष्टिकोण’ (अरविंद कुमार राही), ‘पुनर्वास’ (विपिन बिहारी), ‘चार इंच की कलम’ (कुसुम वियोगी) आदि कथासंग्रहों का समावेश है। हिंदी दलित सािहत्य का पहला उपन्यास जयप्रकाश कर्दम का ‘छप्पर’ सत्यप्रकाश का ‘जसतसभई सवेर’, मोहनदास नैमिशराय का ‘मुक्तिपर्व’ आदि उपन्यास महत्त्वपूर्ण हैं। उपन्यास साहित्य के साथ-साथ ही दलित आत्मकथा लेखन भी पूरी सशक्तता के साथ उभरकर आया जिसमें - मोहनदास नैमिशराय ‘अपने-अपने पिंजड़े’, ओमप्रकाश वाल्मीकि ‘जूठन’, कौशल्या बैसंत्री ‘दोहरा अभिशाप’, डॉ. श्योराजसिंह बेचैन ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ आदि। जिसके द्वारा दलित विमर्श हमारे सामने आता है।दलित लेखकों के साथ गैरदलित लेखकों ने दलित साहित्य पर लेखनी चलायी है। रमणिका गुप्ता ने दलित कथाओं का संपादन किया है। यह सारी कथाएँ व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह करती हैं।दलित साहित्य को बढ़ावा देने में दलित साहित्य पत्रिकाओं ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। जिसमें ‘‘हिमायती’ (पाक्षिक), ‘नागमय संस्कृति’ (साप्ताहिक), ‘पूर्वदेवा’, ‘अनार्य भारत’ (साप्ताहिक) विशेष उल्लेखनीय हैं।’’समकालीन साहित्यकारों ने यह एहसास दिलाया कि दुनिया में महान संस्कृति के रूप में मानी जानेवाली भारतीय संस्कृति है पर इस महान संस्कृति को शर्म आये ऐसी समाज व्यवस्था दलितों को मानवीयता से वंचित रखती है। जो समाज विश्व को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की शिक्षा देता हो वही समाज अछूतों को समाज व्यवस्था के बाहर रखता है। समाज से बहिष्कृत कर उन्हें जानवरों से बदत्तर जीवन-यापन करने पर मजबूर करता है। ऐसे मानसिक रूप से विकलांग समाज का चित्रण दलित साहित्यकारों ने अपने साहित्य में किया है। साथ ही सवर्णों की सत्ता के विरूद्ध विद्रोह भी दिखलाया है। आज शिक्षा के कारण दलित जागृत हुआ है। वह भी इन्सान है, उसको भी मानवीय संवेदनाएँ हैं। वह भी आज अपने हक के लिए सजग दिखाई दे रहा है। (www.rachanakar.org से साभार)


Tuesday, 19 November 2013

बम्मड़ जी


सबका पानी सोख रहे हैं
कोठी वाले बम्मड़जी,
छप्पर-छप्पर भौंक रहे हैं
कोठी वाले बम्मड़जी।

और कहीं पर लेब-न-देब
कुर्ते में 'स्विस' वाला जेब
गांठ-गांठ में लिये फरेब
कोठी वाले बम्मड़जी।

मुर्ग-मोसल्लम चांप रहे थे
टिकट के लिए कांप रहे थे
बित्ता-बित्ता नाप रहे अब
कोठी वाले बम्मड़जी।

पांच साल तक सीधा रेट
छप्पन छुरी, बहत्तर पेट
फिर करने निकले आखेट
कोठी वाले बम्मड़जी।

Sunday, 17 November 2013

ओमप्रकाश वाल्मीकि भी नहीं रहे

चलते-चलाते इस वर्ष का आखिरी माह हिंदी साहित्य जगत के लिए न जाने कितने आघात लेकर गुजर रहा है। हाल के दिनो में एक-एक कर कई एक दिग्गज साहित्यकार राजेंद्र यादव, केपी सक्सेना, विजयदान देथा, परमानंद श्रीवास्तव, हरिकृष्ण देवसरे और आज 'जूठन' के रचकार ओमप्रकाश वाल्मीकि नहीं रहे । रविवार सुबह 8 बजे देहरादून में उनका निधन हो गया । वह  पिछले कई माह से कैंसर की बीमारी से संघर्ष कर रहे थे। उनका देहावसान हिंदी दलित साहित्य के लिए एक बड़ा आघात है| उनकी आत्मकथा 'जूठन' से हिंदी दलित साहित्य को जो पहचान मिली, उसके लिए वह सदैव याद किए जाएंगे| वास्तव में वह दलित साहित्य के पर्याय थे| वर्तमान दलित साहित्य के प्रतिनिधि रचनाकारों में से एक ओमप्रकाश वाल्मीकि का जन्‍म 30 जून 1950 को मुजफ्फरपुर (उत्तर प्रदेश) जिले के बरला गांव में एक अछूत वाल्‍मीकि परिवार में हुआ। उन्‍होंने अपनी शिक्षा अपने गांव और देहरादून से प्राप्‍त की। उनका बचपन सामाजिक एवं आर्थिक कठिनाइयों में बीता। आरंभिक जीवन में उन्हें जो आर्थिक, सामाजिक और मानसिक कष्ट झेलने पड़े उसकी उनके साहित्य में मुखर अभिव्यक्ति हुई है। वाल्मीकि कुछ समय तक महाराष्ट्र में रहे। वहाँ वे दलित लेखकों के संपर्क में आए और उनकी प्रेरणा से डॉ. भीमराव अंबेडकर की रचनाओं का अध्ययन किया। इससे उनकी रचना-दृष्टि में बुनियादी परिवर्तन हुआ। वे देहरादून स्थित आर्डिनेंस फॅक्टरी में एक अधिकारी के रूप में काम करते हुए अपने पद से सेवानिवृत्‍त हो गए। वाल्मीकि के अनुसार दलितों द्वारा लिखा जाने वाला साहित्य ही दलित साहित्य है। उनकी मान्यतानुसार दलित ही दलित की पीडा़ को बेहतर ढंग से समझ सकता है और वही उस अनुभव की प्रामाणिक अभिव्यक्ति कर सकता है। इस आशय की पुष्टि के तौर पर रचित अपनी आत्मकथा जूठन में उन्होंने वंचित वर्ग की समस्याओं पर ध्यान आकृष्ट किया है। उन्होंने सृजनात्मक साहित्य के साथ-साथ आलोचनात्मक लेखन भी किया है। उनकी भाषा प्राञ्जल, तथ्यपरक और आवेगमयी है। नाटकों के अभिनय और निर्देशन में भी उनका हस्तक्षेप है। अपनी आत्मकथा जूठन के कारण उन्हें हिंदी साहित्य में विशिष्ट पहचान और प्रतिष्ठा मिली। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- सदियों का संताप (1989), बस!बहुत हो चुका (1997), अब और नहीं (2009) (कविता संग्रह}, सलाम (2000), घुसपैठिए (2004) (कहानी संग्रह) तथा जूठन (आत्मकथा, 1997), दलित साहित्‍य का सौंदर्यशास्‍त्र (आलोचना, 2001)। संप्रति प्रतिलिपि अंतर्जाल पत्रिका के संपादक हैं। उन्हें सन् 1993 में डॉ० अंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार, सन् 1995 में परिवेश सम्मान और साहित्यभूषण पुरस्कार (2008-2009) से अलंकृत किया जा चुका है।

दलित साहित्य पर वाल्मीकि की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी

दलित साहित्य के पुरोहित

हिन्दी दलित साहित्य में कुछ ऎसी बहस करते रहने की परम्परा विकसित की जा रही है जिसका कोई औचित्य नहीं रह गया है .ये बहसे मराठी दलित साहित्य में खत्म हो चुकी हैं.लेकिन हिन्दी में इसे फिर नये सिरे से उठाया जा रहा है .वह भी मराठी के उन दलित रचना कारों के सन्दर्भ से, जो मराठी में अप्रासंगिक हो चुके हैं.उनकी मान्यताओं को मराठी दलित साहित्य में स्वीकार नहीं किया गया ,उन्हें हिन्दी में उठाने की जद्दोजहद जारी है.मसलन ‘दलित’ शब्द को लेकर ,’ आत्मकथा ‘ को लेकर .मराठी के ज्यादातर चर्चित आत्मकथाकार,रचना कार ‘दलित ‘ ,शब्द को आन्दोलन से उपजा क्रांति बोधक शब्द मानते हैं. बाबुराव बागूल. दया पवार,नामदेव ढसाल ,शरणकुमार लिम्बाले, लोकनाथ यशवंत, गंगाधर पानतावणे, वामनराव निम्बालकर, अर्जुन डांगले, राजा ढाले,आदि. इसी तरह आत्मकथा के लिए ‘आत्मकथा’ शब्द की ही पैरवी करने वालों में वे सभी हैं जिनकी आत्मकथाओं ने साहित्य में एक स्थान निर्मित किया है.चाहे शरण कुमार लिम्बाले (अक्करमाशी),दयापवार (बलूत),बेबी काम्बले (आमच्या जीवन), लक्ष्मण माने ( उपरा), लक्ष्मण गायकवाड (उचल्या), शांताबाई काम्बले ( माझी जन्माची चित्रकथा),प्र.ई.सोनकाम्बले ( आठवणीचे पक्षी),ये वे आत्मकथायें हैं जिन्होंने दलित आन्दोलन को मजबूत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्मित की. इन आत्मकथाकारों को ‘आत्मकथा’ शब्द से कोई दिक्कत नहीं है. लेखकों को कोई परेशानी नही हैं.यही स्थिति हिन्दी में भी है. लेकिन हिन्दी में ‘अपेक्षा’ पत्रिका के सम्पादक डा. तेज सिंह् को ‘दलित‘ शब्द और ‘आत्मकथा’ दोनों शब्दों से एतराज है. उपरोक्त सम्पादक को दलित आत्मकथाओं में वर्णित प्रसंग भी काल्पनिक लगते हैं.कभी –कभी तो लगता है कि ये सम्पादक महोदय दलित जीवन से परिचित हैं भी या नहीं ?क्योंकि दलित आत्मकथाओं में वर्णित दुख –दर्द ,जीवन की विषमतायें,जातिगत दुराग्रह,उत्पीडन की पराकाष्टा,इन महाशय को कल्पनाजन्य लगती हैं..उनके सुर में सुर मिला कर आलोचक बजरंगबिहारी तिवारी को भी आत्मकथाओं के मूल्यांकन में मुश्किलों का सामना करना पड रहा है.वे कहते हैं कि

’आत्मकथन क्योंकि आपबीती है,जिए हुए अनुभवों का पुनर्लेखन है,इसलिए उनकी प्रामाणिकता का सवाल प्राथमिक हो जाता है..क्या आत्मवृतों (आत्मकथाओं) की प्रमाणिकता जांची जा सकती है? क्या उन्हें जांचा जाना चाहिए? अगर हां तो क्या ये आत्मवृत (आत्मकथा) खुद को जांचे जाने को प्रस्तुत हैं? क्या अभी तक कोई आंतरिक मूल्यांकन प्रणाली विकसित हो पाई है? हम कैसे तय करें कि कोई अनुभव –विशेष ,कोई जीवन –प्रसंग कितना सच है और कितना अतिरंजित? ’ (अपेक्षा,जुलाई-दिसम्बर,2010,पृष्ठ-37)

बजरंग बिहारी तिवारी के ये सवाल कितने जायज हैं कितने नहीं ? इसे पहले तय कर लिया जाये तो ज्यादा बेहतर होगा. क्योंकि यह सिर्फ लेखक की अभिव्यक्ति पर ही आक्षेप नहीं है,बल्कि इस विधा को भी खारिज करने का षडयंत्र दिखाई दे रहा है.साथ ही यहां एक ऎसा सवाल भी उठता है कि क्या एक आलोचक लेखक का नियंता हो सकता है? इस सवाल के सन्दर्भ में कथाकार, सम्पादक महीप सिंह का यह कथन प्रासंगिक लगता है.

डा. महीप सिंह का कहना है कि ‘हिन्दी संसार के दो जातीय गुण हैं- जैसे ही कुछ सफलता और महत्ता प्राप्त करता है,वह एक मठ बनाने लगता है.कानपुर की भाषा में ऎसा व्यक्ति ‘गुरू’ कहलाता है.साहित्य क्षेत्र भी इसका अपवाद नहीं है.थोडी –सी आलोचना शैली ,थोडा –सा वक्तृत्व कौशल ,थोडा सा विदेशी साहित्य का अध्ययन ,थोडी सी अपने पद की आभा और थोडी –सी चतुराई से इस ‘गुरूता’ की ओर बढा जा सकता है.कुछ समय में ऎसा व्यक्ति फतवे जारी करने के योग्य हो जाता है.एक दिन वह किसी के अद्वितीय का ‘अ’ निकाल कर और किसी के नाम के साथ जोड देता है.’ ( हिन्दी कहानी : दर्पण और मरीचिका ‘ ,हिन्दुस्तानी जबान,,अंक –अप्रैल-जून,2011,पृष्ठ- 15)

बजरंग बिहारी तिवारी के सन्दर्भ में यहां बात की जा रही है, वे सिर्फ इतने भर से ही नहीं रुकते वे और भी गम्भीर आरोप लगाने लगते हैं, .आरोपों की इस दौड में वे बेलागाम घोडे की तरह दौडते नजर आते हैं.वे कहते हैं –‘विमर्श को चटकीला बनाने का दबाव,अपनी वेदना को ‘खास’ बनाने की इच्छा किन रूपों में प्रतिफलित होंग़े?’

बजरंग बिहारी तिवारी अपनी अध्ययनशीलता और उद्दरण देने की कला का दबाव बनाते हुए लुडविंग विट्गेंस्टाईन का सन्दर्भ देते हुए अपने तर्क को मजबूत करने की कोशिश करते हैं.अपने ही पूर्व लेखन और स्थापनाओं को खारिज करने का नाटक करते हैं.. दलित साहित्य की महत्त्वपूर्ण विधा को यह आलोचक एक झटके में धाराशायी करने का आखिरी दांव चलता है . दलित आत्मकथाओं की बढती लोकप्रियता और सामाजिक प्रतिबद्धता को किस दबाव के तहत नकार ने की यह् चाल है, यह जानना जरूरी लगने लगता है.वे अपनी ‘गुरूता ‘, जो बडी मेहनत और भाग दौड से हासिल की है,से आखिर फतवा जारी करने की कोशिश करते हैं – ‘एक अर्थ में आत्मकथन अनुर्वर विधा है.वह रचनाकार को खालीपन का एहसास कराती है.अनुभव वस्तुत: रचनात्मकता के कच्चे माल के रूप में होते हैं.....आत्मकथन में रचनात्मक दृष्टि के ,विजन के निर्माण की न्यूनतम गुंजाईश होती है......एक विभ्रम की सृष्टि की आशंका भी इस विधा में मौजूद है.’ (अपेक्षा,जुलाई-दिसम्बर,2010,पृष्ठ-37)

यहां बजरंग बिहारी तिवारी तथ्यों का सामान्यीकरण करने की कोशिश कर रहे हैं.दलित आत्मकथाओं ने समस्त भारतीय भाषाओं में अपनी रचनात्मकता से यह सिद्ध कर दिया है कि आत्मकथा अनुर्वर विधा नहीं है.न ही वह रचनाकार को खालीपन का एहसास ही कराती है .और इस बात को भी ये आत्मकथाएं सिरे से नकारती हैं कि इस विधा में रचनात्मक दृष्टि के विजन की न्यूनतम गुंजाईश है.

आत्मकथाओं के सन्दर्भ में दया पवार कहते हैं,-‘ वर्तमान समय में मराठी की आस्वाद की प्रक्रिया एक जैसी नहीं है .सांस्कृतिक भिन्नता के कारण आस्वाद प्रक्रिया भी भिन्न –भिन्न हो रही है.यह दलित आत्मकथाओं का समय है; जिनकी काफी चर्चा रही है.परंतु इन आत्मकथाओं के मूल में जो सामाजिक विचार है ,उसे सदैव नजर अन्दाज किया जाता है. केवल व्यक्ति और व्यक्तिगत अनुभव – इसी बिन्दु के चारों ओर इसकी चर्चा होती है.’आगे वे कहते हैं,-‘दलितों का सफेदपोश पाठक अपने भूतकाल से बेचैन हो गया है.उसे खुद से शर्म महसूस होने लगी है.कचरे के ढेर में से कचरा ही निकलेगा? इस प्रकार के प्रश्न भी उन्होंने उपस्थित किये.वास्तविकता तो यह है कि यह केवल भूतकाल नहीं है.बल्कि आज भी दलितों का एक बडा समुदाय इसी प्रकार का जीवन जी रहा है.दलितों के सफेद पोश वर्ग को इसी की शर्म क्यों आ रही है?वास्तव में संस्कृति के सन्दर्भ में बडी-बडी बातें करने वाली व्यवस्था को इसकी शर्म आनी चाहिए........कुछ लोगों को ये आत्मकथाएं झूठी लगती हैं.सात समुन्दर पार किसी अजनबी देश की आत्मकथाएं,जिस जीवन को उन्होंने कभी देखा नहीं है,उनकी आत्मकथाएं इन्हें सच्ची लगती हैं.परंतु गांव की सीमाओं के बाहर का विश्व कभी दिखाई नहीं देता.इस दृष्टि भ्रम को क्या कहें.(दलितों के आन्दोअलन जब तीव्र होने लगते हैं,तब जन्म लेता है दलित साहित्य ,अस्मितादर्श लेखक-पाठक सम्मेलन सोलापुर,1983)

अक्सर देखने में आता है कि हिंन्दी आलोचकों की यह कोशिश रहती है कि दलित साहित्य के सामाजिक सरोकारों से इतर मुद्दों को ज्यादा रेखांकित किया जाये ताकि भटकाव की स्थिति उत्पन्न हो .यह भटकाव कभी अपरिपक्वता के रूप में आरोपित होता है ,तो कभी भाषा की अनगढता के रूप में,तो कभी वैचारिक विचलन के रूप में आरोपित किया जाता है. कभी विधागत , तो कभी शैलीगत होता है.

किसी भी आन्दोलन की विकास यात्रा में अनेक पडाव आते हैं.दलित साहित्य के ऎसे आलोचक दलित मुद्दों से हटकर वैश्विकता को ही दलित का सबसे बडा मुद्दा घोषित करने में लग जायें तो इसे क्या कहा जाये? क्या यह असली मुद्दों से बहकाने की साजिश नहीं होगी.क्योंकि ऎसे आलोचक इससे पूर्व भी यह काम बखूबी करने की कोशिश में लगे रहे हैं.लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली.कभी दलित साहित्य में रोमानी रचनाओं की कमी का रोना रोते हैं,तो कभी प्रेम का,तो कभी दलित साहित्य को स्त्री विरोधी कहने में भी पीछे नहीं रहे हैं.उनकी ये घोषणायें नये लेखकों को भरमाने की कोशिश ही कही जायेंगी.क्योंकि हजारों साल का उत्पीडन नये-नये मुखौटे पहन कर साहित्य को भरमाने का काम पहले भी करता रहा है.ये लुभावने और वाक चातुर्य से भरे हुए जरूर लगते हैं,लेकिन इनके दूरगामी परिणाम क्या होंगे इसे जानना जरूरी है.आन्दोलन की इस यात्रा में भी ये पडाव आये हैं.इस लिए यदि नयी पीढी अपनी अस्मिता और संघर्षशील चेतना के साथ दलित चेतना का विस्तार करती है तो दलित साहित्य की एक नई और विशिष्ट निर्मिति होगी.

यहां यह कहना भी आवश्यक हो जाता है कि दलित साहित्य में आत्मकथाओं ने जिस वातावरण का निर्माण किया है.वह् अदभुत है.जिसे चाहे विद्वान आलोचक जो कहें, लेकिन दलित जीवन की विद्रुपताओं को जिस साहस और लेखकीय प्रतिबद्धता के साथ दलित आत्मकथाओं में प्रस्तुत किया है,वह भारतीय साहित्य में अनोखा प्रयोग है.जिसे प्रारम्भ से ही आलोचक अनदेखा करने की कोशिश करते रहे हैं.क्योंकि आत्मकथाओं ने भारतीय समाज –व्यवस्था और संस्कृति की महानता के सारे दावे खोखले सिद्ध कर दिये हैं.साथ ही साहित्य में स्थापित पुरोहितवाद,आचार्यवाद् और वर्णवाद की भी जडें खोखली की हैं.साहित्यिक ही नहीं भारतीय संस्कृति की महानता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाये हैं और जिस गुरू की महानता से हिन्दी साहित्य भरा पडा है उसे कटघरे में खडा करने का साहस सिर्फ दलित लेखकों ने किया है जिसे बजरंग बिहारी तिवारी जैसे आलोचक सिरे से नकार कर अपनी विद्वता का परचम लहराकर आचार्यत्व की ओर बढने की कोशिश कर रहे हैं. आत्मकथाओं की प्रमाणिकता पर भी आक्षेप करके पाठकों को दिग्भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं.क्या उनकी साहित्यिक प्रतिबद्धता बदल गयी हैंया ‘गुरूता’ भाव में लेखक का नियंता बनने की कोशिश की जा रही है?यह शंका जेहन में उभरती है.

यहां मेरा बजरंग जी से सीधा सवाल है, दलित साहित्य स्त्री विरोधी नहीं है.यदि कोई लेखक इस तरह के विचार रखता है तो आप उसे किस बिना पर दलित साहित्य कह रहे हैं ? सिर्फ इस लिए कि वह जन्मना दलित है.मेरे विचार से दलित साहित्य की अंत:चेतना को पुन: देख लें. डा. अम्बेडकर की वैचारिकता में कहीं भी स्त्री विरोध नहीं है. और दलित साहित्य अम्बेडकर विचार से ऊर्जा ग्रहण करता है. जिसे सभी दलित रचनाकारों ने, चाहे वे मराठी के हों या गुजराती ,कन्नड,तेलुगु या अन्य किसी भाषा के .यदि कोई जन्मना दलित स्त्री विरोधी है और जाति –व्यवस्था में भी विश्वास रखता है,तो आप उसे एक दलित लेखक किस आधार पर कह रहे हैं? यह दलित साहित्य की समस्या नहीं है,यहा तो उस मानसिकता की समस्या है जो आप जैसे आचार्य विकसित कर रहे .

समाज में स्थापित भेदभाव की जडें गहरी करने में साहित्य का बहुत बडा योगदान रहा है.जिसे अनदेखा करते रहने की हिन्दी आलोचकों की विवशता है.और उसे महिमा मण्डित करते जाने को अभिशप्त हैं.ऎसी स्थितियों में दलित आत्मकथाओं की प्रमाणिकता पर प्रश्न चिन्ह लगाने की एक सोची समझी चाल है.बल्कि यह साहित्यिक आलोचना में स्थापित पुरोहितवाद है जो साहित्य में कुंडली मारकर बैठा है.हिन्दी साहित्य को यदि लोकतांत्रिक छवि निर्मित करनी है तो इस पुरोहितवाद और गुरूडम से बाहर निकलना ही होगा. यदि वह ऎसा नहीं करता है तो उस पर यह आरोप तो लगते ही रहेंगे कि हिन्दी साहित्य आज भी ब्राह्मणवादी मानसिकता से भरा हुआ है.अपने सामंती स्वरूप को स्थापित करते रहने का मोह पाले हुए है.

Saturday, 16 November 2013

मुंड़ेरों पर गौरैया

देवेंद्र

आदमी का इतिहास जब कभी सही ढंग से लिखा जायेगा तो चाहे उसमें चक्रवर्ती सम्राटों और उनकी लड़ाइयों का जिक्र न हो, गौरैया का जिक्र जरूर होगा! बगैर गौरैया, आदमी और उसकी कलाएँ, कल्पनाएँ, सुख-दुख के किस्से, उसके संगीत, उसकी प्रेम कहानियों के बारे में कुछ जान पाना संभव नही होगा। गौरैया की नन्हीं आँखों में एक दिन जरूर लिखा और पढ़ा जायेगा सभ्यता का क्रूर इतिहास। यह कोई पुरानी बात नही है। अभी कल तक गाँव के हमारे घरों में, हमारे बीच गौरैयों के झुंड रहा करते थे। बैलों के हरे चारे और सूखे पुवाल की गंध में चहचहाती, उड़ती-फुदकती गौरैया सुबह-सबेरे सूरज की किरणों से पहले ही चली आती थीं। काम से फुर्सत पाकर माँ जब कभी देहरी पर बैठतीं, गिलहरी और गौरैयों का झुंड उन्हे घेर लेता था। हमारे चारों तरफ बिखरे अन्न के दानों पर ही वो पलती थीं। माँ को विश्वास था कि हमारे अनाम पुरखे गौरैयों की शक्ल में हमें देखने-सुनने आते हैं। कैंसर से असहनीय दर्द से तड़पती-छटपटाती मेरी माँ का चेहरा गौरैया की तरह हो गया था। अन्न के दानों को अपनी नन्ही चोंच में दबाये वे अपने घोसलों में जाती थीं, जहाँ उनके बच्चे चीं...चीं.. करते बेसब्री से उनकी प्रतीक्षा करते थे। एक आत्मीय उल्लास का मोहक संगीत हर समय हमारे चारों तरफ बजता रहता था। वे हमारे अभावों और संपन्नता के दिन थे। इन्ही चिड़ियों के पंख लेकर माँ के किस्सों और हमारे सपनों में परियाँ आती थीं। देखा जाए तो हमारा बचपन इन्हीं के बीच पला और विकसित हुआ है। विज्ञान ने प्रकृति के सारे रहस्यों को खोलकर आदमी को सौंप दिया है, दर्प और हठधर्मिता में आकंठ डूबी आज की सभ्यता मनुष्य को खतरनाक रास्तों की ओर ले जा रही है। वर्तमान हमेशा सफल और शक्तिशाली लोगों का होता है। इतिहास सार्थक लोगों का। अगर स्वयं द्वारा किया गया मूल्यांकन ही अंतिम सच होता तो सटोरियों और गिरहकटों को भी गलत साबित कर पाना ना-मुमकिन होगा। प्रकृति के सारे संतुलन केंद्रों को रात-दिन लगातार क्षति-ग्रस्त करते हुए चाहे हम खुद को कितना भी श्रेष्ठ कह लें, लेकिन यह तय है, कि हमारे विकास का वर्तमान ढाँचा क्षण-प्रतिक्षण मनुष्यता की बची-खुची संभावनाओं को लीलता जा रहा है। मशीनें मनुष्य को विस्थापित कर रही हैं। तकनीक और बाजार के संयुक्त दुश्चक्र में मनुष्य के भीतर से मनुष्यता का विस्थापन भयावह रूप से जारी है। हमने गौरैया के घोंसले उजाड़ डाले हैं। नोच डाले गये उनके मुलायम पंख, जो हमें गर्मी की दुपहरी में अपने ठंडे स्पर्श से सहलाते थे। न्यूयार्क और वाशिंगटन की तर्ज पर जगह-जगह उगने वाले कंक्रीट के जंगलों में हमारी सभ्यता का भयावह कब्रगाह तैयार हो रहा है। मृत्यु लेख पर अनिवार्य रूप से दर्ज किया जा चुका है - “एक ऐसी प्रजाति, जिसने अपनी संततियों का सारा हिस्सा खाने के बाद अपनी भूख से तड़प कर सामूहिक आत्महत्या कर ली थी।” जीवन के स्रोत सूखते जाएँ और जीवन लहलहाता रहेगा - इस पागल कल्पना की गुंजाइश बहुत दूर तक नहीं रहेगी। प्रकृति के रहस्यों को जान कर उसे बाजार में बेचना और मुनाफा कमाना सभ्यता है? या वह बोध कि, प्रकृति के असीमित संसाधनों पर अंततः हमारा अधिकार सीमित ही है? यह तय करना बेहद जरूरी है, कि तकनीकी दक्षता हासिल कर चुका कोई समाज मृत्यु की हद तक गैर जिम्मेदार रहकर सभ्यता और विकास का मानक बनेगा? या वह प्रकृति पर अपनी निर्भरता को पहचानते हुए, अपनी सीमिति क्षमता और अदम्य जिजीविषा के बल पर उसे बनाये और बचाये रखने के लिए अंतिम दम तक कृत संकल्प है। शिक्षा और विज्ञान अगर आज बाजार की दासता स्वीकार कर चुके हैं, तो चाहे जैसे भी संभव हो, सभ्यता और विकास के वास्तविक मूलभूत अर्थों को थोड़े समय के लिए इससे अपने को बचाते हुए बाजार से लड़ना होगा। यह अनायास ही नहीं है, कि मानवरोधी तमाम बुराइयों और अपराधों का उत्सव तथाकथित शिक्षित, सक्षम, सभ्य और संपन्न लोगों के भीतर है। बौद्धिक समुदाय निर्लज्ज और खतरनाक हद तक इन्हें समर्थन दे रहा है। यह अनायास ही नहीं है, कि सभ्यता और विकास के नाम पर कुछ लोग जंगलों पर आधिपत्य के लिए उतावले हैं, ताकि बाजार में उनकी कीमत लग सके। वहीं कुछ अशिक्षित, अर्ध-शिक्षित गुमराह और व्यवस्था विरोधी नक्सलाइट किस्म के लोग उन्हीं जंगलों और जलाशयों को बचाने के लिए रोज-रोज अपने प्राण गँवा रहे हैं। वे लोग जो अपनी कुल आमदनी का चौथाई बजट दुनिया के बाजारों से हथियार खरीदने में खर्च करते है, वही उन्हें हिंसक बताते हुए अहिंसा का पाठ पढ़ा रहे हैं, बाजार की नजरों में वे खतरनाक किस्म के लोग है। जिन्होंने गौरैया की तरह संचय और जरूरत से ज्यादा संग्रह की वृत्ति को नहीं अपनाया है। वे जानते हैं कि जरूरत भर की सूखी लकड़ियों के लिए दूर-दूर तक फैले जंगल का हरा-भरा होना जरूरी है। शायद इसीलिए सभ्यता और बाजार की नजरों में वे जंगली और बर्बर हैं। वे इसलिए भी असभ्य, विकास विरोधी और खतरनाक है, कि जनतांत्रिक सरकारों के क्रूर दमन की वैधानिक शक्ति को ठेंगा दिखाते हुए परमाणु युग के दौर में अपने परंपरागत हथियारों और विश्वासों के साथ जंगलों, नदियों, और चिड़ियों को बचाने के लिए कृत संकल्प है। बाजार और मुनाफे में उनकी कोई दिलचस्पी नही। वे जानते है, कि विश्वग्राम की मुँड़ेर पर गौरैया और उनके घोंसले उजाड़ डाले जाते हैं। सभ्यताओं के संघर्ष के नाम पर होने वाले सेमिनारों के सारे बौद्धिक विमर्शों में उनकी दिलचस्पी इसलिए नही हैं, क्योंकि वे खुद सभ्यताओं के शिकार हैं। वे जानते हैं, कि आज देश और राजनीति की मुख्य धारा कुछ सटोरियों, विश्व बैंक के पालतू अर्थशास्त्रियों और माफियाओं से होकर बाजार के मल मूत्र में लिथड़ी पड़ी है। गौरैया सिर्फ किसी पक्षी का नाम नही है, वे ढेर सारी चीजों, जो हमारे बीच से एक-एक कर गायब होती जा रही हैं, उनकी शक्ल, सूरत उनकी आदतें गौरैयों से मिलती-जुलती होती हैं। गाँवों की सबसे बड़ी त्रासदी है, चरागाहों और पोखरों के निशान मिट जाना। सिर्फ इसलिए नहीं कि अब वहाँ झुंड के झुंड बकरियाँ, गाय, भैंसे, नहीं दिखतीं। ये सब गाँव के सामुदायिक जीवन की रीढ़ थे। वहीं गौरैया फुदकती थी। उनके सहवास और मैथुन की आदिम गंध से बसंत महकता था। धीरे-धीरे और एक-एक कर वहाँ से वे सारी चीजें, जो पेड़ों और चिड़ियों को आदमी से जोड़ती थीं, विस्थापित होती जा रही हैं। विकास और सभ्यता के इस क्रूर दस्तक से डरी-सहमी गौरैया अब न तो कभी हमारी स्मृतियों में चहचहाती है, न सपनों में फुदकती है। ढेर सारी मरी हुई गौरैयों और परियों के पंख हमारे विकास पथ पर नुचे-खुचे, छितराये पड़े हैं। सभ्यता के तहखाने में बंद हमारी उदासी हमारी साँसों में भरती जा रही है। शायद अब कभी इन मुँड़ेरों पर गौरैया नहीं आयेगी।