Saturday, 12 October 2013

रोबोट करे तुकबंदी – सोलह भाषाओं में


रूसी इंजीनियरों ने एक ऐसा रोबोट बनाया है जो किसी भी शब्द की तुक से तुक मिलाता शब्द खोज सकता है| उन्होंने इसका नाम रखा है “आय-दा-पुश्किन”, जिसका अर्थ है “वाह रे पुश्किन”| बात यह है कि रूसी महाकवि पुश्किन जब कविता लिखते हुए कोई बढ़िया पंक्ति बना लेते थे तो खुद अपने को कहा करते थे: “वाह रे पुश्किन”| यह रोबोट हर शब्द की ताल पर मुंह खोलता है और उसकी तुकबंदी में सोलह भाषाओं के शब्द पेश करता है| इसके अलावा उसे पुश्किन की 200 कविताएं “कंठस्थ” हैं और जब कोई व्यक्ति उसके पास आता है तो वह इनका “पाठ” करने लगता है|
अभी तो यह रोबोट कवि की आवक्ष मूर्ति की शक्ल का बनाया गया है, पर शीघ्र ही इसका चेहरा कवि से बहुत अधिक मिलता-जुलता बना दिया जाएगा और उसका चेहरा हाव-भाव भी व्यक्त करने लगेगा| इस रोबोट के रचयिता-दल ‘Robtronik.ru’ के प्रधान अन्तोन वसीलेवस्की ने बताया:
“दो हफ्ते पहले हमने 3D मॉडल तैयार कर लिया है| अब फैक्टरी में ढाँचे पर ऑप्टिक-फाइबर लगाया जा रहा है| यही रोबोट के “शरीर” की प्रमुख सामग्री है| बाल आदि बनाए जा रहे हैं|”
पुश्किन-रोबोट के निर्माताओं का कहना है कि यह सारा काम मोबाइल फोनों के लिए एक सॉफ्टवेयर बनाने से शुरू हुआ| इस प्रोग्राम के बूते यह साधारण गैजट तुकबंदी ढूँढने में सहायक बन जाता है| यूज़र को बस उस शब्द का उच्चारण करना होता है जिसके लिए वह तुक मिलाना चाहता है, जवाब में फोन अपने डेटा-बेस से सभी विकल्प उसे सुना देता है|
“जब हमने यह तुकबंदी प्रोग्राम बना लिया तो हमने पुश्किन की कविता ‘मुझे याद है वह अद्भुत क्षण’ पर रूसी और अंग्रेज़ी भाषाओँ में एक वीडियो बनाने की सोची| हमारी कंपनी तो रूसी ही है सो हमें यह स्वाभाविक ही लगा कि हम सबसे मशहूर रूसी कवि पुश्किन की ही कविता लें”|
रोबोट-कवि के रचयिताओं का कहना है कि इसका सॉफ्टवेयर बाज़ार में ख़ासा सफल रहा है| संसार भर में इसके एक लाख से अधिक यूज़र हैं और रूस में तो इससे भी कई गुना अधिक हैं क्योंकि रूसी रूपांतर निश्शुल्क उपलब्ध है| अपने मित्रों, स्वजनों के जन्मदिन पर कोई कविता रचने के इच्छुक बड़ी खुशी से इसका फायदा उठाते हैं|
 “पुश्किन की शक्ल में हम इस प्रोग्राम को, सॉफ्टवेयर को ऐसा ठोस रूप दे रहे हैं जिसमें इसे देखा जा सकता है| भले ही इसे एक मज़ाक समझिए, पर हमारे ख्याल में यह देश में रोबोट-तकनीक के विकास में एक और कदम है| दूसरी ओर इससे विदेशों में पुश्किन और उन्नीसवीं सदी के रूसी काव्य की लोकप्रियता बढ़ेगी| यों तो पुश्किन का नाम लोगों ने सुना हुआ है, लेकिन अगर हमारी योजना सफल रही तो उनकी लोकप्रियता कहीं अधिक बढ़ जाएगी|”
यह इलैक्ट्रोनिक कवि बाज़ार में उपलब्ध है – सिर्फ चार हज़ार डालर में|

Thursday, 10 October 2013

कविजी का मोस्ट वांटेड बेटा!


मेरे एक साहित्यिक मित्र थे। वीर रस की कविताएं लिखते थे। पेशे से टीचर थे। अभी हैं लेकिन अब न कवि हैं, न मित्र हैं, न टीचर हैं। जो हैं, सो हैं। बड़ी सांसत में हैं।

मित्रता के दिनो में उन्हे जब रत्ननुमा-पुत्र की प्राप्ति हुई तो उनका पूरा गांव उल्लास में शामिल हो गया था। दूर-दूर से नाते-रिश्ते के लोग जुटे। खूब बधाइयां मिलीं। तब आजकल की तरह गिफ्टबाजी नहीं होती थी। पहुंचना, स्नेहालाप, मित्रालाप ही पर्याप्त रहता था।

पेशे के चक्कर में अपना गांव-पुर, कस्बा-शहर छूटा तो उस जन्मोत्सव के आठ वर्ष बाद लगभग डेढ़ दशक तक उनसे मुलाकात न हो सकी। वह मुझसे उम्र में काफी बड़े थे। बड़े पूजा-पाठ, मन्नतों के बाद वह इकलौता पुत्र पैदा हुआ था। पिता की ही तरह हृष्ट-पुष्ट। अपने शिक्षक पिता की साइकिल पर आगे बैठ कर रोजाना मैंने उसे बड़ा होकर स्कूल जाते देखा था।

सत्रह साल बाद अपने गांव-पुर पहुंचा तो पुराने दोस्तों-मित्रों के संबंध में हाल-चाल लेने लगा। जिनसे अब तक इक्का-दुक्का निभती रही थी, उन्हीं में एक मित्र ने उस सत्तर-अस्सी के दशक वाले साहित्यिक मित्र का दर्दनाक वाकया भी कह सुनाया, आह-उह करते हुए कि अरे उन महोदय की वीर-कविताई की तो ऐसी-तैसी हो चुकी है।

संक्षिप्ततः पूर्व साहित्यिक मित्र का ताजा एक दशक का जिंदगीनामा कुछ इस तरह है।

पूर्व कविमित्र का इकलौता बेटा बड़ा होकर मोस्ट वांटेड हो गया। पुलिस की टॉप टेन लिस्ट में पहले नंबर पर। पूरा इलाका कांपने लगा। थानेदार को गोली से उड़ा दिया। ठेके पर मर्डर करने लगा। गिरफ्तार होकर जेल गया तो एक डिप्टी जेलर को ठिकाने लगा दिया। इस तरह वह जिले का सबसे बड़ा गुंडा बन गया। वीररस के कवि का वीर पुत्र।

उस दिन मित्र ने बताया कि अब तो बेचारे कविजी फिरौती के पैसे ठिकाने लगाते हैं। वीरपुत्र ब्लॉक प्रमुख बन गया है। जेल से ही नेतागीरी करता है। वीरकवि की बहू विधानसभा चुनाव लड़ने वाली है। एक कुख्यात मुस्लिम माफिया उसे टिकट दिलाने वाला है।

शायद ही कभी कोई अचंभे में रो पड़ा हो। उस दिन मैं पूर्व कविमित्र की व्यथा-कथा सुन कर अचंभे से रो पड़ा था। कितनी अच्छी कविताएं लिखते थे वह। वीर रसावतार पंडित श्याम नारायण पांडेय के सबसे प्रिय शिष्यों में गिने जाते थे। अब अपने पुत्र की माफिया-राजनीतिक यश-प्रतिष्ठा से काफी आह्लादित रहते हैं। दूर-दूर तक नयी पीढ़ी के लोग जानते हैं कि वो फलाने सिंह के पिता हैं। जिले के साहित्यकारों को अब कोई आंख नहीं दिखा सकता है। उनके पास सब-कुछ है, बस कविता नहीं है।

उस कविजी की कुछ पंक्तियां मुझे आज भी याद है............

अंड्डसंड उडंड रटि ढाल्लत ब्रांडी ब्रांड,
अक्क-बक्क झक्कत झड़क्क प्रकट्यो पुत्र प्रचंड,
चंड-चंड करि खंड-खंड खुरकस्सि कपट धरि
पग्गअगति गड़गब्ब............

गिरा दिया, मिटा दिया रेरिख़ के देवदार को!


भारत की एक बस्ती नग्गर से बहुत ही चौंकाने वाली और साथ ही दिल को दहला देनेवाली एक ख़बर आई है। हिमालय की गोद में बसी यह बस्ती इस बात के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है कि वहाँ रेरिख़ परिवार की एक स्मारक-हवेली मौजूद है। वहाँ एक बहुत ही पुराने वृक्ष- देवदार को काटकर गिरा दिया गया है। काटे गए देवदार-वृक्ष ने इस अनूठे आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक केन्द्र के स्वामी- रेरिख़ परिवार के सदस्यों की याद अपने दिल में संजोय रखी थी। जब इस वृक्ष को गिराया जा रहा था तो उस समय इस स्मृति स्मारक के पास स्थानीय निवासी ही नहीं बल्कि भारत के अन्य स्थानों और दुनिया के कोने-कोने से आए पर्यटक भी उपस्थित थे जो निकोलय रेरिख़ का जन्मदिन मनाने के लिए वहाँ पहुँचे हुए थे। देवदार का यह वृक्ष श्री ब्रह्मा कुणाल द्वारा ज़ोर देने पर काटा गया था। मज़ेदार बात यह है कि श्री ब्रह्मा कुणाल ही अंतर्राष्ट्रीय रेरिख़ स्मारक केंद्र के मौजूदा संचालक हैं। उनका कहना है कि यह वृक्ष बहुत पुराना था और किसी भी समय गिर सकता था जिससे कि क्षति भी हो सकती थी। लेकिन उनकी इस बात में कोई दम नहीं है। आप गिराए गए इस विशाल देवदार को देखकर ही बता सकते हैं कि यह देवदार आसानी से गिरनेवाला पेड़ नहीं था। देवदार का अर्थ है- दिव्य उपहार, देवी-देवताओं का उपहार। कैसे गिर सकता था यह विराट देवदार? मान लेते हैं कि यह वृक्ष गिर भी सकता था। लेकिन वह इमारतों से काफी दूर खड़ा था और वह इन इमारतों के लिए कोई ख़तरा पैदा नहीं कर सकता था। वह पिछले तीस साल से अपने दूसरे साथी-वृक्षों के साथ ही खड़ा था। वह हिमालय वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान “उरुस्वती” की इमारतों से काफ़ी नीचे वाली जगह पर उगा हुआ था। उल्लेखनीय है कि इस साल “उरुस्वती” की स्थापना की 85-वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह पेड़ अभी एक लंबे समय तक वहाँ ज़िंदा रह सकता था और वह किसी के लिए भी कोई ख़तरा नहीं बन सकता था। रेरिख़ के इस देवदार-वृक्ष को काट-गिराने के बाद नग्गर के क्रोधित निवासियों ने कुल्लू घाटी प्राधिकरण के वानिकी विभाग में इस घटना की एक शिकायत दर्ज कराई जिसके जवाब में बताया गया कि ब्रह्मा कुणाल ने इस पेड़ को काटने की अनुमति लेने के लिए एक निवेदन-पत्र दिया था लेकिन उन्हें स्पष्ट रूप से ऐसा करने से मना कर दिया गया था। परंतु उन्होंने इस मनाही की कोई परवाह नहीं की और देवदार पर आई मुसीबत टाली नहीं जा सकी। श्री ब्रह्मा कुणाल ने अपने दायित्वों का पालन नहीं किया है। उनका प्रत्यक्ष कर्तव्य यह था कि वह रेरिख़ स्मारक से जुड़ी हर वस्तु की संभाल करें, उसकी रक्षा करें। उन्होंने स्थानीय पर्यावरण कानूनों को भी रौंद डाला है। हिमाचल प्रदेश में एक ऐसा कानून लागू है जिसके अंतर्गत किसी के अपने, निजी घर में उगे देवदार को भी संबंधित अधिकारियों की अनुमति के बिना काटा नहीं जा सकता है। इस कानून का उल्लंघन करनेवालों पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है और उन्हें जेल की सलाखों के पीछे बंद भी किया जा सकता है। ऐसा लगता है कि लालच ने ही श्री ब्रह्मा कुणाल को ऐसा अपराध, बल्कि कहना चाहिए कि पाप करने के लिए मज़बूर किया है। काटे गए इस देवदार की लकड़ी का अनुमानित मूल्य 40 लाख रूपए है। इस घटना के संबंध में भारत में रूस के राजदूत अलेक्सांदर कदाकिन ने "रेडियो रूस" की विशेष संवाददाता नतालिया बेन्यूख़ को दिए अपने एक साक्षात्कार में कहा-"हम उन सभी भारतवासियों और दूसरे देशों के उन सभी लोगों की भावनाओं को बहुत अच्छी तरह से समझ सकते हैं जो हमारे महान हमवतनों की विरासत की कद्र करते हैं।" ग़ौरतलब है कि अलेक्सांदर कदाकिन अंतर्राष्ट्रीय रेरिख़ स्मारक केंद्र के एक संस्थापक और इसके वर्तमान उपाध्यक्ष हैं। इस घटना का सबसे दुखद और निंदनीय पहलू यह है कि हिमाचल प्रदेश राज्य के कानून का उल्लंघन एक ऐसे व्यक्ति ने किया है जिसे इस कानून की रक्षा करने के लिए अपना पूरा ज़ोर लगाना चाहिए था। श्री ब्रह्मा कुणाल अंतर्राष्ट्रीय रेरिख़ स्मारक केंद्र के संचालक हैं और इस स्मारक से जुड़ी हर वस्तु की सुरक्षा करनी- उनकी सीधी ज़िम्मेदारी है। इस स्मारक में ही निकोलाय रेरिख़ और उनके बेटे स्वितास्लाव रेरिख़ के अमूल्य चित्रों का संग्रहालय मौजूद है। भारत में रूस का दूतावास स्थानीय अधिकारियों से इस घटना की पूरी जाँच कराने का निवेदन करेगा। दोषी को सज़ा मिलनी ही चाहिए। (रेडियो रूस से साभार)

Tuesday, 8 October 2013

किताबों की दुनिया में ब्राजील


ब्राजील का नाम आते ही कार्निवल की याद आती है, पर इन दिनों जर्मनी में ब्राजील की चर्चा हो रही है किताबों के लिए. फ्रैंकफर्ट बुक फेयर में ब्राजील इस बार अतिथि देश है.
 9 से 13 अक्टूबर तक चलने वाले फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेले में इस बार ब्राजील से 70 लेखक और 164 प्रकाशक हिस्सा ले रहे हैं. लातिन अमेरिका का सबसे बड़ा देश ब्राजील दुनिया को दिखा देना चाहता है कि वह केवल संगीत और मौज मस्ती में ही अव्वल नहीं है, बल्कि व
हां का साहित्य भी अहम है. ब्राजील बुक चेंबर (सीबीएल) की अध्यक्ष कारीन पानसा ने डॉयचे वेले से बातचीत में कहा, "हम दिखाना चाहते हैं कि हम अंतरराष्ट्रीय बाजार की समझ रखते हैं और अपनी किताबें बेचना जानते हैं." उनका कहना है कि जर्मन बाजार पर पूरी दुनिया की नजर रहती है, इसलिए यहां कई अवसर हैं.
किताबों की दुनिया में अब तक ब्राजील की पहचान खरीदार के तौर पर बनी रही है, पर अब देश निर्यात की राह पर निकलना चाहता है. ब्राजील के संस्कृति मंत्रालय ने 2020 तक साढ़े तीन करोड़ डॉलर का निवेश करने की योजना बनाई है, ताकि दुनिया के सामने अपने लेखकों की पहचान पक्की कर सके. यह पैसा एक्सचेंज प्रोग्राम के काम में लगाया जाएगा. युवा लेखकों और अनुवादकों को स्कॉलरशिप भी दी जाएगी.
 ब्राजील के पैविलियन के बाहर ग्रैफिटी
इस साल फ्रैंकफर्ट में ही सरकार साठ लाख यूरो खर्च रही है. लोगों का ध्यान खींचने के लिए यहां कई तरह के सांस्कृतिक और रंगारंग कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं. ब्राजील का पैविलियन 2,500 वर्ग मीटर में फैला होगा, जो पिछले साल के अतिथि पैविलियन का नौ गुना है.
हालांकि यह ब्राजील के लिए पहला मौका नहीं है. इस से पहले 1994 में भी वह फ्रैंकफर्ट बुक फेयर में अतिथि देश के तौर पर शिरकत कर चुका है. उस समय देश की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोई खास पहचान नहीं थी. तब ब्राजील अपने मशहूर लेखकों जॉर्जे अमादो, जो उबाल्दो रिबेरो और मशादो दे असिस के साथ यहां पहुंचा था. करीब बीस साल में ब्राजील काफी तरक्की कर चुका है. इस बार मेले में हिस्सा ले रहे लेखकों की संख्या इस बात का प्रमाण देती है.
फ्रैंकफर्ट में ब्राजील पैविलियन की व्यवस्था संभालने वाले अंटोनियो मार्टिनेली का कहना है, "ब्राजील इस बार अपनी मॉडर्न और ग्लोबल छवि दिखाना चाहता है. हमने बहुत सोच समझ कर खुद को परंपराओं और धारणाओं से दूर रखा है."
मेले में इस बार बीस से ज्यादा लेखक अपनी किताबों के अंश पढ़ कर सुनाएंगे. इस साल के अंत तक 92 लेखक जर्मनी में घूम कर ब्राजील के साहित्य का प्रचार करेंगे और अपनी नई किताबों को पेश करेंगे.
कारीना पानसा को इस साल से बहुत उम्मीदें हैं. पिछले मेले को याद करती हुई वह कहती हैं, "1994 में सरकार ने सबसे बड़ी गलती यह की थी कि अनुवादों की मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया था. किताबों के कोई अनुवाद प्रकाशित ही नहीं हुए थे." उनका मानना है कि किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी जगह बनाने के लिए यह बेहद जरूरी है.
ब्राजील अपनी गलतियों से सीख ले रहा है. पिछले दो साल में अनुवाद में जितना निवेश किया गया है उतना उस से पहले के दो दशकों में भी नहीं देखा गया था. जर्मन बाजार में इस से पहले कभी ब्राजील की इतनी किताबें नहीं देखी गईं

Sunday, 6 October 2013

वो 'मैं' और 'वे'

तब न इतना विश्वास का संकट था, न अपने चारो तरफ धूर्तता और पाखंड की इतनी ऊंची-ऊंची दीवारें कि उसके पार खूब जोर मारकर भी कुछ नजर न आ सके..... 

तब समय इतना जानवर नहीं था, न लोग इतने जटिल, घुमावदार, सिर्फ अपने कल के लिए जीने वाले गिरगिट की तरह क्षण-क्षण रंग बदलते हुए..... 

रात में नाना चारपाई पकड़ने से पहले दरवाजे की नीम की लटकती डाल पर खैनी-चूने से भरी थैली लटकाना नहीं भूलते थे ताकि सुबह दिशा-मैदान के लिए उधर से गुजरने वाले पास-पड़ोसी को एक चुटकी के लिए उदास न होना पड़े...

उस दिन चार साल का था। पिता लाल-लाल डांट पिला गये थे। मैं नींद में था। मुझे क्या पता। सुबह जागने पर रोज की तरह दालान की चौखट पर जा बैठा। आहिस्ते से पीछे से नानी आई और एक हाथ से पीठ, दूसरे से सिर सहलाने लगी। पिता की डांट को मेरे देह का घाव समझ कर.....

दसवीं के बाद नाना, बारहवीं के बाद पिता ने कहा- अब मैं तुम्हें नहीं पढ़ा पाऊंगा। मैंने अपने कालेज के महंत प्रबंधक से आपबीती सुनाई। वह कालेज से सटी कुटिया में रहते थे। बाबा हरिहरनाथ। बाबा ने मेरा दर्द पढ़ते हुए तुरंत कालेज से तीन टीचर बुलवा लिए- क्लास टीचर, लायब्रेरियन और वाइस प्रिंसिपल। उनके जिम्मे मुझे कर दिया कि इसकी आगे की पढ़ाई तुम जानो, कैसे होगी......

एक बार मुरादाबाद में कवि माहेश्वर तिवारी से मुलाकात कर मऊनाथ भंजन लौट रहा था। तब ट्रेन यात्राओं का रत्ती भर अनुभव नहीं था। किधर फर्स्ट, किधर थर्ड क्लास। चढ़ लिया एक भुसे-ठुसे डिब्बे में। खड़ा होने भर को जगह नहीं। ऊनी कपड़े बेचने वाले नेपाली जनो से आह-कराह मची हुई। दो सीटों के बीच में खड़ा हो लिया। एक सीट पर दो सिपाही बैठे थे। बोले कुर्ता-पाजामा से तो कवि लगते हो। मैं चौंका। ये कैसे जान गये! दोनो के बीच बैठ गया। बैठते ही उनमें से एक सिपाही बोला- कविता सुनाओ नहीं तो अभी सीट से उठा दूंगा। मैं ट्रेन अगले स्टेशन पर पहुंचने तक उन्हें कविताएं सुनाता रहा......

Thursday, 3 October 2013

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एसोसिएशन का गठन


गुडगाँवः इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े पत्रकारों ने सर्वसम्मति से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एसोसिएसन नाम से संघटन का गठन कर लिया है। इस सगठन का उदेश्य पत्रकारों के हित में किया गया है। सगंठन का कार्य पत्रकारों के सुख दुःख में शामिल होना उनकी समस्याओं का निवारण करने हेतु सहयोग करना है। सगठंन के पंजीकरण की परिक्रिया हरियाणा सरकार के नियमों के अनुसार पूरी कर रजिस्टेशन प्राप्त कर लिया गया है। जानकारी देते हुए सगंठन के महासचिव मनु मेहता ने बताया की इस तरह के सगंठन की काफी समय से आवश्यकता महसूस की जा रही थी। उन्होने बताया की अक्सर पत्रकारों को सुख दुःख की स्थति में इधर उधर देखना पड़ता था | इस सगंठन का उदेश्य सभी पत्रकार भाईयों को उनके कार्यों में सहयोग करने के साथ साथ सामाजिक बुराइयों को दूर रखकर समाज के हित में काम करना है | मनु मेहता ने बताया इस संगठन की मुख्य कार्यकारणी में दस सदस्यों को शामिल किया गया है। जिसमें प्रवीण शर्मा प्रधान, राजवर्मा उपप्रधान, मनुमेहता महासचिव, सुनील कुमार खजांची, व दीपक शर्मा को सयुक्तसचिव नियुक्त किया गया है। इस के साथ ही मुख्य कार्यकारणी के सदस्यों में धर्मबीर शर्मा, देवेन्द्र भारद्वाज,नवीन राघव,सतीश को शामिल किया गया है। सगठंन के उपप्रधान राज वर्मा ने इस मौके पर बोलते हुए कहा है की संगठन का उदेश्य कुछ लोगो के कारन समाज में पत्रकारों की बिगड़ती छवि को सुधारने के लिए भी प्रयास करना है। जिसके लिए सगंठन लोगो से अपील करता है की वे भी इस कार्य में सगंठन का सहयोग करे |

अपील

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एसोसिएशन (EMA) गुड़गांव (हरियाणा) के उन सभी लोगों खास तौर पर राजनीती से जुड़े लोगों से अपील करता हैँ कि जो कभी कुछ ऐसे पत्रकार या पत्रकारों के समूह के सम्पर्क में आये हो जो अख़बारों व टीवी चैनेल्स पर खबर दिखाने या रूकवाने के बदले में पैसों की मांग करते है । आपसे अनुरोध है कि ऐसे कथित असामाजिक पत्रकारों से आप बचे । क्योंकि ये ठेकेदार पत्रकार न केवल अपने चैनल बल्कि उन चैनल का भी ठेका ले लेते है जो किसी भी तरह से खबर दिखाने व रुकवाने के बदले पैसे नहीं लेते है । सबसे बड़ी बात ये कि ये ठेकेदार जिन जिन पत्रकारों के नाम पर दलाली करते है उन्हें इसकी जरा भी भनक नहीं होती है । ये ठेकेदार ज्यादातर राजनीती से जुड़े लोगों को अपना शिकार बनाते है । इसलिए आप से अनुरोध है कि भविष्य में अगर इस तरह के ठेकेदार पत्रकार आप से किसी अन्य पत्रकार या चैनल/अखबार के नाम पर पैसों की मांग करते है तो आप तुरंत सम्बंधित पत्रकार या चैनल/अख़बार से सम्पर्क जरूर करे।
 जनहित में जारी-
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एसोसिएशन (EMA)

Wednesday, 2 October 2013

ये तो सनातन मीडिया है


श्रीकांत

श्रीकांत देश के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं, जिन्होंने रोजाना की खबरों की दुनिया में रहते हुए भी कई शोधपरक पुस्तकें लिखीं। दैनिक हिन्दुस्तान के पटना संस्करण से कोआर्डिनेटर स्पेशल प्रोजेक्ट के पद से पिछले वर्ष सेवानिवृत्त हुए श्रीकांत का अनुभव संसार व्यापक है। श्रीकांत द्वारा लिखी गई शोधपरक पुस्तकें बिहार में दलित आंदोलन : 1992-2000 और बिहार में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम, 1857 : बिहार-झारखंड में महायुदध, बिहार-झारखंड पर किए जाने वाले किसी भी राजनीतिक-सामाजिक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती हैं। ये पुस्तकें उन्होंने प्रसन्न कुमार चौधरी के साथ बतौर सह लेखक लिखी हैं। बिहार में चुनाव : जाति, बूथ लूट और हिंसा, बिहार का चुनावी भुगोल समेत उनकी और भी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं। वह कहते हैं कि मैंने कभी ऐसा अनुभव नहीं किया, लेकिन अखबारों में काम करते हुए और आज भी देखता हूं कि जैसा समाज रहेगा, उसका जीवन के हर क्षेत्र में वैसा ही प्रभाव पड़ेगा। शिक्षण संस्थानों, सरकारी दफ्तरों, न्यायालयों, विधानमंडलों और अखबार के दफ्तरों का कमोबेश एक जैसा हाल है। चूंकि समाज में ही ऊंच-नीच, जांत-पांत, छोटा-बड़ा का भेदभाव हर पल एहसास कराता रहता है तो संस्थान इससे कैसे मुक्त रह सकते हैं। आज भी सनातनी सिस्टम ही चल रहा है। प्रसिद्ध पत्रकार अरुण सिन्हा ने किसान आंदोलन के संबंध में लिखी गई उक्ति में कहा था कि दृश्य अखबारों में बड़े भूस्वामी, कुलीन वर्ग के लोग काम करते हैं, जिसके कारण वे 70 के दशक के किसान आंदोलन के खिलाफ  हैं। 1883 में रेंट क्वे्शचन नामक किताब में ए मैकेंजी, ब्रिटिश सरकार में मुख्य सचिव ने लिखा है-"अखबार भूस्वामी और धनी वर्ग के मुखपत्र हैं और यहां व उनके देश में उनके प्रभावशाली मित्र हैं। बिहार में बंटाईदारी का आंदोलन जब 1967-68 में चल रहा था तो जेपी ने अखबारों के बारे में क्या कहा था वह देखना भी दिलचस्प होगा। अशांति का जो वातावरण है उसमें कुछ अखबारवालों और राजनीतिक दलों का हाथ है। अभी जो अखबार की हालत है, अमीर-गरीब पर हिंसा करता है तो कोई न्यूज नहीं होती है और अगर गरीब अमीर पर हिंसा कर देता है हल्ला हो जाता है। योगेन्द्र यादव, अनिल चमडिय़ा और प्रमोद रंजन का बुकलेट देख लें, जिसमें उन्होंने मीडिया के सामाजिक चरित्र का सर्वेक्षण किया है और बताया है कि मीडिया संस्थानों में फैसला लेने वाले पदों पर आदिवासी, दलित और ओबीसी की संख्या शून्य है। ये सर्वे क्रमश: वर्ष 2006 और वर्ष 2009 में हुए थे। आप आज भी पटना के हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, टाइम्स आफ  इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स के साथ-साथ टीवी चैनलों का सर्वे कराकर देख लीजिए तो पता चल जाएगा कि इन अखबारों में समाज का बहुसंख्यक हिस्सा आज भी हाशिए पर है। 21वीं सदी में आधुनिक प्रबंधन का यह नया ब्राह्मणवादी अवतार है। रातोंरात कुछ भी नहीं बदलता। जो कुछ भी बदला है वह पिछले सौ सालों की लड़ाई का परिणाम है। जनेऊ आंदोलन, कम्युनिस्ट आंदोलन, नक्सली आंदोलन, गांधी-आम्बेडकर के अस्पृश्यता के खिलाफ  आंदोलन, जाति उन्मूलन आंदोलन और लोहिया के आंदोलन के असर के कारण ही पिछली सदी के 70-80 वर्षों में सामाजिक बदलाव हुए। कर्पूरी ठाकुर ने मैट्रिक की परीक्षा में पास होने की अनिवार्यता से अंग्रेजी को अलग किया। उसे भी इन्हीं आंदोलनों के साथ जोड़कर देखिए। इसके बाद आरक्षण को लागू करने और 90 के बाद लालू के उदय और नीतीश कुमार के अतिपिछड़ों और महिलाओं को पंचायतों में आरक्षण देने का सकारात्मक असर पड़ा। लगातार संघर्ष का परिणाम है कि आज बिहार की राजनीति बदल गई है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि सारी विषमताएं, सारा भेदभाव दूर हो गया। इसके लिए साल दर साल पीढिय़ों को संघर्ष करना पड़ता है और विभिन्न रंगों और रूपों में ये संघर्ष चल रहा है।