Saturday, 27 July 2013

चीलें / भीष्म साहनी



चील ने फिर से झपट्टा मारा है। ऊपर, आकाश में मँडरा रही थी जब सहसा, अर्धवृत्त बनाती हुई तेजी से नीचे उतरी और एक ही झपट्टे में, मांस के लोथड़े को पंजों में दबोच कर फिर से वैसा ही अर्द्धवृत्त बनाती हुई ऊपर चली गई। वह कब्रगाह के ऊँचे मुनारे पर जा बैठी है और अपनी पीली चोंच, मांस के लोथड़े में बार-बार गाड़ने लगी है।

कब्रगाह के इर्द-गिर्द दूर तक फैले पार्क में हल्की हल्की धुंध फैली है। वायुमंडल में अनिश्चय सा डोल रहा है। पुरानी कब्रगाह के खंडहर जगह-जगह बिखरे पड़े हैं। इस धुँधलके में उसका गोल गुंबद और भी ज्यादा वृहदाकार नजर आता है। यह मकबरा किसका है, मैं जानते हुए भी बार-बार भूल जाता हूँ। वातावरण में फैली धुंध के बावजूद, इस गुंबद का साया घास के पूरे मैदान को ढके हुए है जहाँ मैं बैठा हूँ जिससे वायुमंडल में सूनापन और भी ज्यादा बढ़ गया है, और मैं और भी ज्यादा अकेला महसूस करने लगा हूँ।

चील मुनारे पर से उड़ कर फिर से आकाश में मँडराने लगी है, फिर से न जाने किस शिकार पर निकली है। अपनी चोंच नीची किए, अपनी पैनी आँखें धरती पर लगाए, फिर से चक्कर काटने लगी है, मुझे लगने लगा है जैसे उसके डैने लंबे होते जा रहे हैं और उसका आकार किसी भयावह जंतु के आकार की भाँति फूलता जा रहा है। न जाने वह अपना निशाना बाँधती हुई कब उतरे, कहाँ उतरे। उसे देखते हुए मैं त्रस्त सा महसूस करने लगा हूँ।

किसी जानकार ने एक बार मुझसे कहा था कि हम आकाश में मँडराती चीलों को तो देख सकते हैं पर इन्हीं की भाँति वायुमंडल में मँडराती उन अदृश्य 'चीलों' को नहीं देख सकते जो वैसे ही नीचे उतर कर झपट्टा मारती हैं और एक ही झपट्टे में इनसान को लहूलुहान करके या तो वहीं फेंक जाती हैं, या उसके जीवन की दिशा मोड़ देती हैं। उसने यह भी कहा था कि जहाँ चील की आँखें अपने लक्ष्य को देख कर वार करती हैं, वहाँ वे अदृश्य चीलें अंधी होती हैं, और अंधाधुंध हमला करती हैं। उन्हें झपट्टा मारते हम देख नहीं पाते और हमें लगने लगता है कि जो कुछ भी हुआ है, उसमें हम स्वयं कहीं दोषी रहे होंगे। हम जो हर घटना को कारण की कसौटी पर परखते रहे हैं, हम समझने लगते हैं कि अपने सर्वनाश में हम स्वयं कहीं जिम्मेदार रहे होंगे। उसकी बातें सुनते हुए मैं और भी ज्यादा विचलित महसूस करने लगा था। उसने कहा था, 'जिस दिन मेरी पत्नी का देहांत हुआ, मैं अपने मित्रों के साथ, बगल वाले कमरे में बैठा बतिया रहा था। मैं समझे बैठा था कि वह अंदर सो रही है। मैं एक बार उसे बुलाने भी गया था कि आओ, बाहर आ कर हमारे पास बैठो। मुझे क्या मालूम था कि मुझसे पहले ही कोई अदृश्य जंतु अंदर घुस आया है और उसने मेरी पत्नी को अपनी जकड़ में ले रखा है। हम सारा वक्त इन अदृश्य जंतुओं में घिरे रहते है।' अरे, यह क्या! शोभा? शोभा पार्क में आई है! हाँ, हाँ, शोभा ही तो है। झाड़ियों के बीचों-बीच वह धीरे-धीरे एक ओर बढ़ती आ रही है। वह कब यहाँ आई है और किस ओर से इसका मुझे पता ही नहीं चला। मेरे अंदर ज्वार सा उठा। मैं बहुत दिन बाद उसे देख रहा था।

शोभा दुबली हो गई है, तनिक झुक कर चलने लगी है, पर उसकी चाल में अभी भी पहले सी कमनीयता है, वही धीमी चाल, वही बाँकापन, जिसमें उसके समूचे व्यक्तित्व की छवि झलकती है। धीरे-धीरे चलती हुई वह घास का मैदान लाँघ रही है। आज भी बालों में लाल रंग का फूल ढँके हुए है।

शोभा, अब भी तुम्हारे होंठों पर वही स्निग्ध सी मुस्कान खेल रही होगी जिसे देखते मैं थकता नहीं था, होंठों के कोनों में दबी-सिमटी मुस्कान। ऐसी मुस्कान तो तभी होंठों पर खेल सकती है जब तुम्हारे मन में किन्हीं अलौकिक भावनाओं के फूल खिल रहे हों।

मन चाहा, भाग कर तुम्हारे पास पहुँच जाऊँ और पूछूँ, शोभा, अब तुम कैसी हो?

बीते दिन क्यों कभी लौट कर नहीं आते? पूरा कालखंड न भी आए, एक दिन ही आ जाए, एक घड़ी ही, जब मैं तुम्हें अपने निकट पा सकूँ, तुम्हारे समूचे व्यक्तित्व की महक से सराबोर हो सकूँ।

मैं उठ खड़ा हुआ और उसकी ओर जाने लगा। मैं झाड़ियों, पेड़ों के बीच छिप कर आगे बढ़ूँगा ताकि उसकी नजर मुझ पर न पड़े। मुझे डर था कि यदि उसने मुझे देख लिया तो वह जैसे-तैसे कदम बढ़ाती, लंबे-लंबे डग भरती पार्क से बाहर निकल जाएगी।

जीवन की यह विडंबना ही है कि जहाँ स्त्री से बढ़ कर कोई जीव कोमल नहीं होता, वहाँ स्त्री से बढ़ कर कोई जीव निष्ठुर भी नहीं होता। मैं कभी-कभी हमारे संबंधों को ले कर क्षुब्ध भी हो उठता हूँ। कई बार तुम्हारी ओर से मेरे आत्म-सम्मान को धक्का लग चुका है।

हमारे विवाह के कुछ ही समय बाद तुम मुझे इस बात का अहसास कराने लगी थी यह विवाह तुम्हारी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हुआ है और तुम्हारी ओर से हमारे आपसी संबंधों में एक प्रकार का ठंडापन आने लगा था। पर मैं उन दिनों तुम पर निछावर था, मतवाला बना घूमता था। हमारे बीच किसी बात को ले कर मनमुटाव हो जाता, और तुम रूठ जाती, तो मैं तुम्हें मनाने की भरसक चेष्ठा किया करता, तुम्हें हँसाने की। अपने दोनों कान पकड़ लेता, 'कहो तो दंडवत लेट कर जमीन पर नाक से लकीरें भी खींच दूँ, जीभ निकाल कर बार-बार सिर हिलाऊँ?' और तुम, पहले तो मुँह फुलाए मेरी ओर देखती रहती, फिर सहसा खिलखिला कर हँसने लगती, बिल्कुल बच्चों की तरह जैसे तुम हँसा करती थी और कहती, 'चलो, माफ कर दिया।'

और मैं तुम्हें बाँहों में भर लेता था। मैं तुम्हारी टुनटुनाती आवाज सुनते नहीं थकता था, मेरी आँखें तुम्हारे चेहरे पर तुम्हारी खिली पेशानी पर लगी रहती और मैं तुम्हारे मन के भाव पढ़ता रहता। स्त्री-पुरूष संबंधों में कुछ भी तो स्पष्ट नहीं होता, कुछ भी तो तर्क-संगत नहीं होता। भावनाओं के संसार के अपने नियम हैं, या शायद कोई भी नियम नहीं।

हमारे बीच संबंधों की खाई चौड़ी होती गई, फैलती गई। तुम अक्सर कहने लगी थी, 'मुझे इस शादी में क्या मिला?' और मैं जवाब में तुनक कर कहता, 'मैंने कौन से ऐसे अपराध किए हैं कि तुम सारा वक्त मुँह फुलाए रहो और मैं सारा वक्त तुम्हारी दिलजोई करता रहूँ? अगर एक साथ रहना तुम्हें फल नहीं रहा था तो पहले ही मुझे छोड़ जाती। तुम मुझे क्यों नहीं छोड़ कर चली गई? तब न तो हर आए दिन तुम्हें उलाहनें देने पड़ते और न ही मुझे सुनने पड़ते। अगर गृहस्थी में तुम मेरे साथ घिसटती रही हो, तो इसका दोषी मैं नहीं हूँ, स्वयं तुम हो। तुम्हारी बेरुखी मुझे सालती रहती है, फिर भी अपनी जगह अपने को पीड़ित दुखियारी समझती रहती हो।'

मन हुआ, मैं उसके पीछे न जाऊँ। लौट आऊँ, और बेंच पर बैठ कर अपने मन को शांत करूँ। कैसी मेरी मन:स्थिति बन गई है। अपने को कोसता हूँ तो भी व्याकुल, और जो तुम्हें कोसता हूँ तो भी व्याकुल। मेरा साँस फूल रहा था, फिर भी मैं तुम्हारी ओर देखता खड़ा रहा।

सारा वक्त तुम्हारा मुँह ताकते रहना, सारा वक्त लीपा-पोती करते रहना, अपने को हर बात के लिए दोषी ठहराते रहना, मेरी बहुत बड़ी भूल थी।

पटरी पर से उतर जाने के बाद हमारा गृहस्थ जीवन घिसटने लगा था। पर जहाँ शिकवे-शिकायत, खीझ, खिंचाव, असहिष्णुता, नुकीले कंकड़-पत्थरों की तरह हमारी भावनाओं को छीलने-काटने लगे थे, वहीं कभी-कभी विवाहित जीवन के आरंभिक दिनों जैसी सहज-सद्भावना भी हरहराते सागर के बीच किसी झिलमिलाते द्वीप की भाँति हमारे जीवन में सुख के कुछ क्षण भी भर देती।

पर कुल मिला कर हमारे आपसी संबंधों में ठंडापन आ गया था। तुम्हारी मुस्कान अपना जादू खो बैठी थी, तुम्हारी खुली पेशानी कभी-कभी सँकरी लगने लगी थी, और जिस तरह बात सुनते हुए तुम सामने की ओर देखती रहती, लगता तुम्हारे पल्ले कुछ भी नहीं पड़ रहा है। नाक-नक्श वही थे, अदाएँ भी वही थीं, पर उनका जादू गायब हो गया था। जब शोभा आँखें मिचमिचाती है - मैं मन ही मन कहता - तू बड़ी मूर्ख लगती है।

मैंने फिर से नजर उठा कर देखा। शोभा नजर नहीं आई। क्या वह फिर से पेड़ों-झाड़ियों के बीच आँखों से ओझल हो गई है? देर तक उस ओर देखते रहने पर भी जब वह नजर नहीं आई, तो मैं उठ खड़ा हुआ। मुझे लगा जैसे वह वहाँ पर नहीं है। मुझे झटका सा लगा। क्या मैं सपना तो नहीं देख रहा था? क्या शोभा वहाँ पर थी भी या मुझे धोखा हुआ है? मैं देर तक आँखें गाड़े उस ओर देखता रहा जिस ओर वह मुझे नजर आई थी।

सहसा मुझे फिर से उसकी झलक मिली। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा था। पहले भी वह आँखों से ओझल होती रही थी। मुझे फिर से रोमांच सा हो आया। हर बार जब वह आँखों से ओझल हो जाती, तो मेरे अंदर उठने वाली तरह-तरह की भावनाओं के बावजूद, पार्क पर सूनापन सा उतर आता। पर अबकी बार उस पर नजर पड़ते ही मन विचलित सा हो उठा। शोभा पार्क में से निकल जाती तो?

एक आवेग मेरे अंदर फिर से उठा। उसे मिल पाने के लिए दिल में ऐसी छटपटाहट सी उठी कि सभी शिकवे-शिकायत, कचरे की भाँति उस आवेग में बह से गए। सभी मन-मुटाव भूल गए। यह कैसे हुआ कि शोभा फिर से मुझे विवाहित जीवन के पहले दिनों वाली शोभा नजर आने लगी थी। उसके व्यक्तित्व का सारा आकर्षण फिर से लौट आया था। और मेरा दिल फिर से भर-भर आया। मन में बार-बार यही आवाज उठती, 'मैं तुम्हें खो नहीं सकता। मैं तुम्हें कभी खो नहीं सकता।'

यह कैसे हुआ कि पहले वाली भावनाएँ मेरे अंदर पूरे वेग से फिर से उठने लगी थीं।

मैंने फिर से शोभा की ओर कदम बढा दिए।

हाँ, एक बार मेरे मन में सवाल जरूर उठा, कहीं मैं फिर से अपने को धोखा तो नहीं दे रहा हूँ? क्या मालूम वह फिर से मुझे ठुकरा दे?

पर नहीं, मुझे लग रहा था मानो विवाहोपरांत, क्लेश और कलह का सारा कालखंड झूठा था, माना वह कभी था ही नहीं। मैं वर्षो बाद तुम्हें उन्हीं आँखों से देख रहा था जिन आँखों से तुम्हें पहली बार देखा था। मैं फिर से तुम्हें बाँहों में भर पाने के लिए आतुर और अधीर हो उठा था।

तुम धीरे-धीरे झाड़ियों के बीच आगे बढ़ती जा रही थी। तुम पहले की तुलना में दुबला गई थी और मुझे बड़ी निरीह और अकेली सी लग रही थी। अबकी बार तुम पर नजर पड़ते ही मेरे मन का सारा क्षोभ, बालू की भीत की भाँति भुरभुरा कर गिर गया था। तुम इतनी दुबली, इतनी निसहाय सी लग रही थी कि मैं बेचैन हो उठा और अपने को धिक्कराने लगा। तुम्हारी सुनक सी काया कभी एक झाड़ी के पीछे तो कभी दूसरी झाड़ी के पीछे छिप जाती। आज भी तुम बालों में लाल रंग का फूल टाँकना नहीं भूली थी।

स्त्रियाँ मन से छुब्ध और बेचैन रहते हुए भी, बन-सँवर कर रहना नहीं भूलतीं। स्त्री मन से व्याकुल भी होगी तो भी साफ-सुथरे कपड़े पहने, सँवरे-सँभले बाल, नख-शिख से दुरुस्त हो कर बाहर निकलेगी। जबकि पुरूष, भाग्य का एक ही थपेड़ा खाने पर फूहड़ हो जाता है। बाल उलझे हुए, मुँह पर बढ़ती दाढ़ी, कपड़े मुचड़े हुए और आँखो में वीरानी लिए, भिखमंगों की तरह घर से बाहर निकलेगा। जिन दिनों हमारे बीच मनमुटाव होता और तुम अपने भाग्य को कोसती हुई घर से बाहर निकल जाती थी, तब भी ढंग के कपड़े पहनना और चुस्त-दुरुस्त बन कर जाना नहीं भूलती थी। ऐसे दिनो में भी तुम बाहर आँगन में लगे गुलाब के पौधे में से छोटा सा लाल फूल बालों में टाँकना नहीं भूलती थी। जबकि मैं दिन भर हाँफता, किसी जानवर की तरह एक कमरे से दूसरे कमरे में चक्कर काटता रहता था।

तुम्हारी शॉल, तुम्हारे दाएँ कंधे पर से खिसक गई थी और उसका सिरा जमीन पर तुम्हारे पीछे-घिसटने लगा था, पर तुम्हें इसका भास नहीं हुआ क्योंकि तुम पहले की ही भाँति धीरे-धीरे चलती जा रही थी, कंधे तनिक आगे को झुके हुए। कंधे पर से शॉल खिसक जाने से तुम्हारी सुडौल गर्दन और अधिक स्पष्ट नजर आने लगी थी। क्या मालूम तुम किन विचारों में खोई चली जा रही हो। क्या मालूम हमारे बारे में, हमारे संबंध-विच्छेद के बारे में ही सोच रही हो। कौन जाने किसी अंत: प्रेरणावश, मुझे ही पार्क में मिल जाने की आशा ले कर तुम यहाँ चली आई हो। कौन जाने तुम्हारे दिल में भी ऐसी ही कसक ऐसी ही छटपटाहट उठी हो, जैसी मेरे दिल में। क्या मालूम भाग्य हम दोनों पर मेहरबान हो गया हो और नहीं तो मैं तुम्हारी आवाज तो सुन पाऊँगा, तुम्हे आँख भर देख तो पाऊँगा। अगर मैं इतना बेचैन हूँ तो तुम भी तो निपट अकेली हो और न जाने कहाँ भटक रही हो। आखिरी बार, संबंध-विच्छेद से पहले, तुम एकटक मेरी ओर देखती रही थी। तब तुम्हारी आँखें मुझे बड़ी-बड़ी सी लगी थीं, पर मैं उनका भाव नहीं समझ पाया था। तुम क्यों मेरी ओर देख रही थी और क्या सोच रही थी, क्यों नहीं तुमने मुँह से कुछ भी कहा? मुझे लगा था तुम्हारी सभी शिकायतें सिमट कर तुम्हारी आँखों के भाव में आ गए थे। तुम मुझे नि:स्पंद मूर्ति जैसी लगी थी, और उस शाम मानो तुमने मुझे छोड़ जाने का फैसला कर लिया था।

मैं नियमानुसार शाम को घूमने चला गया था। दिल और दिमाग पर भले ही कितना ही बोझ हो, मैं अपना नियम नहीं तोड़ता। लगभग डेढ़ घंटे के बाद जब में घर वापस लौटा तो ड्योढ़ी में कदम रखते ही मुझे अपना घर सूना-सूना लगा था। और अंदर जाने पर पता चलता कि तुम जा चुकी हो। तभी मुझे तुम्हारी वह एकटक नजर याद आई थी? मेरी ओर देखती हुई।

तुम्हें घर में न पा कर पहले तो मेरे आत्म-सम्मान को धक्का-सा लगा था कि तुम जाने से पहले न जाने क्या सोचती रही हो, अपने मन की बात मुँह तक नहीं लाई। पर शीघ्र ही उस वीराने घर में बैठा मैं मानो अपना सिर धुनने लगा था। घर भाँय-भाँय करने लगा था।

अब तुम धीरे-धीरे घास के मैदान को छोड़ कर चौड़ी पगडंडी पर आ गई थी जो मकबरे की प्रदक्षिणा करती हुई-सी पार्क के प्रवेश द्वारा की ओर जाने वाले रास्ते से जा मिलती है। शीघ्र ही तुम चलती हुई पार्क के फाटक तक जा पहुँचोगी और आँखों से ओझल हो जाओगी।

तुम मकबरे का कोना काट कर उस चौकोर मैदान की ओर जाने लगी हो जहाँ बहुत से बेंच रखे रहते हैं और बड़ी उम्र के थके हारे लोग सुस्ताने के लिए बैठ जाते हैं।

कुछ दूर जाने के बाद तुम फिर से ठिठकी थी मोड़ आ गया था और मोड़ काटने से पहले तुमने मुड़ कर देखा था। क्या तुम मेरी ओर देख रही हो? क्या तुम्हें इस बात की आहट मिल गई है कि मैं पार्क में पहुँचा हुआ हूँ और धीरे-धीरे तुम्हारे पीछे चला आ रहा हूँ?

क्या सचमुच इसी कारण ठिठक कर खड़ी हो गई हो, इस अपेक्षा से कि मैं भाग कर तुम से जा मिलूँगा? क्या यह मेरा भ्रम ही है या तुम्हारा स्त्री-सुलभ संकोच कि तुम चाहते हुए भी मेरी ओर कदम नहीं बढ़ाओगी?

पर कुछ क्षण तक ठिठके रहने के बार तुम फिर से पार्क के फाटक की ओर बढ़ने लगी थी।

मैंने तुम्हारी और कदम बढ़ा दिए। मुझे लगा जैसे मेरे पास गिने-चुने कुछ क्षण ही रह गए हैं जब मैं तुमसे मिल सकता हूँ। अब नहीं मिल पाया तो कभी नहीं मिल पाऊँगा। और न जाने क्यों, यह सोच कर मेरा गला रुँधने लगा था।

पर मैं अभी भी कुछ ही कदम आगे की और बढ़ा पाया था कि जमीन पर किसी भागते साए ने मेरा रास्ता काट दिया। लंबा-चौड़ा साया, तैरता हुआ सा, मेरे रास्ते को काट कर निकल गया था। मैंने नजर ऊपर उठाई और मेरा दिल बैठ गया। चील हमारे सिर के ऊपर मँडराए जा रही थी। क्या यह चील ही हैं? पर उसके डैने कितने बड़े हैं और पीली चोंच लंबी, आगे को मुड़ी हुई। और उसकी छोटी-छोटी पैनी आँखों में भयावह सी चमक है।

चील आकाश में हमारे ऊपर चक्कर काटने लगी थी और उसका साया बार-बार मेरा रास्ता काट रहा था।

हाय, यह कहीं तुम पर न झपट पड़े। मैं बदहवास सा तुम्हारी ओर दौड़ने लगा, मन चाहा, चिल्ला कर तुम्हें सावधान कर दूँ, पर डैने फैलाए चील को मँडराता देख कर मैं इतना त्रस्त हो उठा था कि मुँह में से शब्द निकल नहीं पा रहे थे। मेरा गला सूख रहा था और पाँव बोझिल हो रहे थे। मैं जल्दी तुम तक पहुँचना चाहता था मुझे लगा जैसे मैं साए को लाँघ ही नहीं पा रहा हूँ। चील जरूर नीचे आने लगी होगी। जो उसका साया इतना फैलता जा रहा है कि मैं उसे लाँघ ही नहीं सकता।

मेरे मस्तिष्क में एक ही वाक्य बार-बार घूम रहा था, कि तुम्हें उस मँडराती चील के बारे में सावधान कर दूँ और तुमसे कहूँ कि जितनी जल्दी पार्क में से निकल सकती हो, निकल जाओ। मेरी साँस धौंकनी की तरह चलने लगी थी, और मुँह से एक शब्द भी नहीं फूट पा रहा था।

बाहर जाने वाले फाटक से थोड़ा हट कर, दाएँ हाथ एक ऊँचा सा मुनारा है जिस पर कभी मकबरे की रखवाली करनेवाला पहरेदार खड़ा रहता होगा। अब वह मुनार भी टूटी-फूटी हालत में है।

जिस समय मैं साए को लाँघ पाने को भरसक चेष्टा कर रहा था उस समय मुझे लगा था जैसे तुम चलती हुई उस मुनारे के पीछे जा पहुँची हो, क्षण भर के लिए मैं आश्वस्त सा हो गया। तुम्हें अपने सिर के ऊपर मँडराते खतरे का आभास हो गया होगा। न भी हुआ हो तो भी तुमने बाहर निकलने का जो रास्ता अपनाया था, वह अधिक सुरक्षित था।

मैं थक गया था। मेरी साँस बुरी तरह से फूली हुई थी। लाचार, मैं उसी मुनारे के निकट एक पत्थर पर हाँफता हुआ बैठ गया। कुछ भी मेरे बस नहीं रह गया था। पर मैं सोच रहा था कि ज्यों ही तुम मुनारे के पीछे से निकल कर सामने आओगी, मैं चिल्ला कर तुम्हें पार्क में से निकल भागने का आग्रह करूँगा। चील अब भी सिर पर मँडराए जा रही थी।

तभी मुझे लगा तुम मुनारे के पीछे से बाहर आई हो। हवा के झोंके से तुम्हारी साड़ी का पल्लू और हवा में अठखेली सी करती हुई तुम सीधा फाटक की ओर बढ़ने लगी हो।

'शोभा!' मैं चिल्लाया।

पर तुम बहुत आगे बढ़ चुकी थी, लगभग फाटक के पास पहुँच चुकी थी। तुम्हारी साड़ी का पल्लू अभी भी हवा में फरफरा रहा थ। बालों में लाल फूल बड़ा खिला-खिला लग रहा था।

मैं उठ खड़ा हुआ और जैसे तैसे कदम बढ़ता हुआ तुम्हारी ओर जाने लगा। मैं तुमसे कहना चाहता था, 'अच्छा हुआ जो तुम चील के पंजों से बच कर निकल गई हो, शोभा।'

फाटक के पास तुम रुकी थी, और मुझे लगा था जैसे मेरी ओर देख कर मुस्कराई थी और फिर पीठ मोड़ ली थी और आँखों से ओझल हो गई थी।

मैं भागता हुआ फाटक के पास पहुँचा था। फाटक के पास मैदान में हल्की-हल्की धूल उड़ रही थी और पार्क में आने वाले लोगों के लिए चौड़ा, खुला रास्ता भाँय-भाँय कर रहा था।

तुम पार्क में से सही सलामत निकल गई हो, यह सोच कर मैं आश्वस्त सा महसूस करने लगा था। मैंने नजर उठा कर ऊपर की ओर देखा। चील वहाँ पर नहीं था। चील जा चुकी थी। आसमान साफ था और हल्की-हल्की धुंध के बावजूद उसकी नीलिमा जैसे लौट आई थी।


किले में औरत / रघुवीर सहाय

उस शहर में मुझे सिर्फ तीन दिन रहना था। होने को इन्‍हीं तीन में से किसी एक दिन मेरी हत्‍या हो जा सकती थी। पढ़ा था कि इस शहर में रोज हत्‍याएँ होती हैं। लोग हमला बोल कर मार डालते हैं। अखबार में सिर्फ इतना छपता था - आज चार और मरे। इससे जाहिर था कि वे कोई और थे जो मरते थे; अखबार पढ़ सकनेवालों में वे नहीं थे, नहीं तो अखबार उनका नाम-धाम भी छापता। उधर शहर में पहुँच कर मैंने देखा - चौक में तमाम लोग मरे नहीं हैं, चल-फिर रहे हैं। उनको भी यह डर न था कि रोज हत्‍या होती है तो आज भी और उन्‍हीं की हो सकती है। वे आश्‍वस्‍त थे कि और ही लोग होंगे जो मारे जाएँगे।

मैं एक होटल में ठहरा। होटल आत्‍मरक्षा के लिए कि़लेबन्‍दी के तरीके पर बना हुआ था। मगर वह बना तो तब का था जब हत्‍याएँ इस शहर में नहीं, गाँवों में हुआ करती थीं और वहाँ की खबरें छपती ही न थीं - आज तो बिना नाम के छप भी जाती हैं। वे सब स्‍थान होटल से बहुत दूर और ऐसे गरीबों के थे जो इस जन्‍म में इस होटल में आ ही नहीं सकते थे। तब होटल का यह नक्‍शा आत्‍मरक्षा के लिए नहीं, खाली रोआब डालने के लिए बनाया गया होगा। पर आज यह कितने काम आ रहा था! आखिर हत्‍याओं का सिलसिला नीचे से ऊपर की ओर सरकता आ रहा था न। किसी दिन होटल में भी पहुँचता। इतिहास बताता है कि ध्‍वस्‍त नगर में हमेशा एक आलीशान होटल ही शरणालय के रूप में बच रहा करता है।

अपने आप से मैं इस होटल में कभी न ठहरा होता। जिस दुकान का मैं काम कर रहा था, वह काम के सिलसिले में चाहती थी कि मैं इसमें रहूँ। मैं यह जानता था कि अगर मैं इसमें ठहरा तो जब हमला होगा कोई मुझे औरों से अलग न मानेगा। मगर मुझे अपना वेतन कमाने के लिए काम करने के अलावा यह खतरा भी उठाना था।

मैं यहाँ पहुँचा तो सबसे पहले दरबान दिखाई दिया। उसके हाथ में पुराने जमाने की बंदूक थी, जैसी मैंने बचपन में बरातों में छुड़ाई जाती देखी थी। मैंने उसे पहचान लिया, बन्‍दूक को नहीं, दरबान को। वह गोंडा जिले का था। उसने मुझे पहचान लिया। मैं भी वहीं का हूँ। मेरा खर्च कोई और दे रहा था, उसकी वर्दी कोई और दे रहा था। फिर भी उसने मुझे उसी तरह सलाम किया जैसे वह किसी जमाने में कलकत्ते के साहबों को करता होगा। अब गोंडा के लोग भी बाहर निकलकर इस होटल में घुसने लायक हो गए हैं। यह जान कर मारे खुशी के वह फूल नहीं गया। उसे यह शक नहीं था कि शायद मैं बहुत अमीर हूँ। उसे विश्‍वास था कि मैं उससे कुछ अधिक पैसेवाला हूँ और बस इतना अधिक भी होऊँ तो काफी है कि उसे कुछ इनाम दे सकूँ। गरीबी और गिरावट का एक दिन होता है जब आदमी अपने से जरा-से मजबूत आदमी से डरने लगता है। इसी को लोग कर्तव्‍य और संतुलन कहते हैं। वह दिन उसकी जिन्‍दगी में आ चुका था।

शीशे का दरवाजा पार करते ही एक बरोठा मिला जिसमें आदमी के शरीर से बड़े आकार की कुछ कुर्सियों पर लोग बैठे हुए थे। ये न जाने क्‍या समझ कर इतने भड़कीले कपड़े पहन कर आए थे। शायद उनके पास पैसा बहुत था जिसे ये कपड़ों पर खर्च कर डालना चाहते थे। शायद इनके पास अपनी अक्‍ल इतनी कम थी कि ये तय नहीं कर सकते थे कि उन्‍हें क्‍या पहनना चाहिए। वे बैठे इस शान से थे जैसे होटल में रहने के सच्‍चे हकदार वही हैं जिनके पास पैसा ज्‍यादा और अक्‍ल कम है।

जिस कमरे में मुझे जाना था उसकी चाभी मैंने पटरे पर रखी देखी। वह बहुत बड़ी चीज थी जैसे किसी खजाने की चाभी हो। उसका पुछल्‍ला उससे भी बड़ा था। ये दोनों चीजें मिल कर काफी भारी एक चीज बन गई थीं जिससे कमरे में घुसने का अधिकार एक और भारी चीज बन गया था।

कई सूने बरामदे और बरोठे पार करके मैं लिफ्ट के सामने पहुँचा। लिफ्टवाले ने मुझे दाखिल करके एक बड़ा भारी हैंडिल घुमाया। घूँ-घूँ करके लिफ्ट चली। मुझे लग रहा था कि इसमें कोई गड़बड़ है, नहीं तो सिर्फ बटन दबा कर में खुद लिफ्ट को ले जा सकता था। लिफ्टवाला कहाँ का रहनेवाला है, मैं सोचने लगा। वह मेरी ओर देखे तो पहचानूँ। वह दीवाल की ओर मुँह किए खड़ा रहा। जब वह इधर घूमा तो मैंने कहा, बस्‍ती, नहीं बेगूसराय। उसके चेहरे पर एक फुफ्फल मोटापा था जो लगातार असन्‍तुलित आहार से आ जाया करता है। कितना मुश्किल था उसे पहचानना - इस तरह के चेहरेवाले हिन्‍दुस्‍तानियों का प्रदेश इतना बड़ा है। वह भी वर्दी पहने हुए था और बड़ी सख्‍त वर्दी थी वह। जैसे उसकी तनख्‍वाह की सारी कमी पूरी कर देगी। खास तौर से कड़ी गोल टोपी जो किसी विलायती लिफ्टवाले पर सैनिक सजावट का धोखा देती। इसको वह बेबसी की तस्‍वीर बना रही थी। इसके बच्‍चे क्‍या पहने होंगे, मैंने सोचा - छोटी लड़कियाँ अपनी बड़ी बहनों की उतरनें और बड़े, बूचे कुरते जो उनकी मारी गई बाढ़ के साथ ऐसे फि़ट हो गए होंगे कि जन्‍म भर वे धो-धो कर उन्‍हें पहन सकेंगी। लिफ्टवाले ने सलाम किया। जिसका मतलब था कि मैं उसे एक रुपया दूँ जिसका मतलब था कि वह वरदी होटल से पाएगा और गुजारा सलाम करके। मैंने उसे रुपया नहीं दिया। मैं उस गरीबी में शामिल नहीं था जो उसकी थी। होता तो रुपया देना और भी बदसलूक होता। मैं उस अमीरी में शामिल नहीं था जो इस तरह रुपया देनेवालों की होती है। होता तो मैं मैं न होता। पर मैं कितनी चालाकी से छुट्टी पा रहा था - यहाँ हो कर भी और यह जान कर भी कि मुझे यहाँ नहीं होना चाहिए था। लिफ्टवाले ने यह सब कुछ नहीं भाँपा। उसने यही समझा कि फिर कभी देंगे। बख्‍शीश न देने से मेरे और उसके बीच कोई अपनापा उपजा है, यह भी उसने नहीं जताया। जो मैं यह जताता तो यह मेरी चालाकी की हद होती और वह, मैं, उसके गाँव का भी होता तो भी न मानता कि मैं उसकी जमात का हूँ। वह गाँव से अपनी औकात ले कर शहर में आया था और यहाँ वह उससे सम्‍बद्ध हर कागज पर दर्ज कर दी जा चुकी थी।

कमरे में जा कर मैं बैठ गया। ऐसा लगा जैसे अब यहाँ कोई न आ सकेगा। फौरन कमरे से बाहर निकल कर मैंने देखा, दूर-दूर तक कोई न था। इधर-उधर कोई दिखाई भी पड़ता तो वह ऐसा व्‍यक्ति होता जो बात करने के लिए नहीं, खिदमत के लिए रखा गया था। सब खिदमतगार निहत्‍थे थे और धीरे-धीरे इतने पतित हो चुके थे कि कोई आक्रमण न कर सकते थे। ऊपर से बाहर दरबान मौजूद था। खतरे का कहीं नामोनिशान नहीं। मगर मुझे इतना बेखबर होने की जरूरत ही क्‍या थी? कोई जरूरत नहीं थी। सहसा यह अद्भुत विचार मन में आया कि ये सब कमरे एकान्‍त अध्‍ययन के लिए कितने उपयुक्‍त हैं, परंतु इतने महँगे हैं ये कमरे कि इनमें पहुँचते ही यह खयाल दिमाग में घर करने लगता है कि यहाँ अपना एकदम निजी व्‍यभिचार करने के लायक आदर्श एकान्‍त है।

थोड़ी देर में भूख लगने लगी। सन्‍नाटे में बरामदों और बरोठों का दाएँ-बाएँ मुड़ता एक सिलसिला पार करके मुझे खाने के कमरे में जाना था। वहाँ पहुँच कर मैंने दरअसल समझा कि यह इमारत कितनी बड़ी है। इसके हर दो कमरों में जहाँ भीड़ हो सकती है, परस्‍पर बहुत फासला है और वह फासला सूने बरामदों और बरोठों से भरा हुआ है।

खाने की ऊँची छत और झाड़फानूसवाले कमरे में कई लोग थे। जितने ग्राहक थे उनसे ज्‍यादा बैरे थे। वे चुपचाप खड़े मानो आशा कर रहे थे कि जो कोई आएगा, खूब खाएगा। खाना उसकी जिन्‍दगी में एक तरह का फैशन होगा। वरना वह यहाँ आए ही क्‍यों और बैरों को काम ही क्‍यों मिले? वह खाने के लिए न खाएगा। वैसा करे तो बड़ी निराशा होगी। शायद उसको भूख भी न हो। वह खाएगा क्‍योंकि शाम हो गई है और जब तक वह खा न ले शाम खत्‍म न होगी। उसके पास कितना ही वक्‍त क्‍यों न हो, कभी-न-कभी शाम को खत्‍म करना उसकी जिन्‍दगी में व्‍यवस्‍था के लिए जरूरी होगा।

खाना बहुत ही बदमजा था। गोश्‍त से मानो बकरे की जिन्‍दगी की एकरसता महक बन कर उठ रही थी। रोटी में नंगे बदन की-सी वह गरमाई न थी जो तन्‍दूर उसे देता है, वह गिजगिजी और बूढ़ी-सी थी। अचारों और चटनियों से एक खट्टी सड़ाँध उठ रही थी जैसे किसी ने इन्‍हें गंदे हाथों छू लिया हो और ये फफूँदिया रही हों। मैंने जल्‍दी-जल्‍दी खत्‍म किया। जिन परिस्थितियों में मेरे जीवन के इतने वर्ष बीते थे उनमें मुझे हबड़-हबड़ करके खाने की आदत पड़ चुकी थी।

बाकी किसी को जल्‍दी न थी। मानो वे किसी का इंतजार कर रहे हों। एकाएक बत्तियाँ गुल हो गईं। सब नहीं। एक गुलाबी रोशनी जल रही थी। कई आदमी बाजों के सामने खड़े दिखाई दिए। एक क्षण को लगा कि मैं इन्‍हें पहचानता हूँ। शायद ये वही लिफ्टवाले और दरबान हैं। इनको दूसरी वर्दी पहना दी गई है। दूसरी वर्दी तो थी ही। वे लोग भी दूसरे थे। एक ने झाँझ पर चोट मारी और ऐसे मटक कर खड़ा हो गया मानो मस्‍त हो गया हो।

एक व्‍यक्ति उस बड़े कमरे में आया। वह एक औरत थी। वह समझ रही थी कि वह सुन्‍दर है। यह उसकी चाल-ढाल से प्रकट था। मैंने सोचा, गाना गाएगी। मगर उसने पहले एक बाँह उठाई फिर एक टाँग उठाई जैसे इन हरकतों से उसके किसी रहस्‍य का द्वार आधा खुल कर रह जाएगा। बाकी आधा खोलने के लिए लोग व्‍याकुल हो उठेंगे। फिर उसने सीने पर हाथ रखा जैसे उसकी पोशाक वहीं से अटकी हुई है और वह हाथ हटा लेगी तो गिर पड़ेगी। वह नहीं, पोशाक। थोड़ी-सी इधर-उधर की अदाओं के बाद उसने अपने साए में हाथ डाल कर उसे, साए को नहीं हाथ को, ऐसे हिलाना शुरु किया जैसे देखनेवाला अपने हाथ को उसके साए में हिलाना चाहता। मेहरबानी करके कपड़े पहने रहो, मैं उससे कहना चाहता था, ऐसे ही गनीमत है। कपड़े पहने हुए तुम एक भरी-पूरी औरत मालूम होती हो। तुम्‍हारे साथ बातचीत भी की जा सकती है- कोई जरूरी नहीं कि बहुत सूक्ष्‍म अनुभूति की बातचीत हो - कुछ भी हो जिसमें तुम सच्‍चे मन से बोल सको : फोश हो, फैशन की हो, तुम्‍हारे अपने दो टूक फलसफे की हो। मगर तुमने कपड़े उतारे नहीं कि विषय बदला। कपड़े मत उतारो। घटिया और भड़कीले ही सही, उन्‍हें पहने रहो।

औरत ने साए के अन्‍दर से एक जाँघिया निकालकर दोनों हाथों में ले कर उसका आकार सब को दिखाया। उसे हवा में नचा कर उसने फेंक दिया। गिटार बजानेवाला एक आदमी बड़ी अदा से उठा कर उसे ले गया। औरत ने साया समेट कर एक जाँघ दिखाई। मुड़ कर देखा तो एक आदमी जिसे अब तक मैं खानेवालों के इंतजार में खड़ा बैरा समझ रहा था, एक बड़े लैम्‍प को औरत पर बैठा रहा था। ऐसे कई बड़े-बड़े लैंप कमरे में दिखाई दिए। ये सब कहीं दीवालों में लगे खड़े थे। तमाशा शुरु होते ही इन्‍हें कमरे के बीच लाया गया था। तमाशे में किस मौके पर कहाँ से कौन-सी रोशनी डाली जाएगी, यह तय था। इसी के अनुसार लैम्‍पों की जगहें निश्चित थीं। जो लोग इन्‍हें लाए थे वे, मैंने फिर गौर से देखा तो, बैरे ही दिखाई दिए। बैरे ही थे वे। उन सब की वर्दी एक-सी थी। उन्‍हें वेतन खाना खिलाने का मिलता था और औरत पर रोशनी वे बेगार में डालते थे। जरा देर और ठहरूँ तो शायद मुझे खाने की तश्‍तरी मेज पर पटक कर लैम्‍प सँभालने दौड़ता हुआ कोई बैरा दिखाई दे जाए कि रोशनी के इंतजार में औरत को कुछ अधिक कम उघड़े न रहना पड़े। न, वहाँ विनोद तो किसी को छू भी न गया था।

औरत फर्श पर चित लेट कर हिलने लगी। नहीं जानता था कि किस वजह से लोग कुर्सी छोड़ कर खड़े नहीं हो गए क्‍योंकि बिना खड़े हुए उसकी रति देख नहीं सकते थे। वह जरा ही देर हिली, ठीक उतनी देर जितनी देर में आप तय न कर पाएँ कि खड़े हों या न खड़े हों और आपको काफी पीड़ा मिल जाए - इतनी ज्‍यादा नहीं कि आप ठगे जाने का अनुभव करने लगें। पहले पंजों और घुटनों के बल हो कर उसने हसरत-भरी निगाह हवा में डाली जैसे इतने पुरुषों के रहते भी वह अतृप्‍त रह गई है।

मैं सब खानेवालों को तो एक साथ नहीं देख सकता था, एक मेज पर मैंने ध्‍यान लगाया। उस पर तीन आदमी काला सूट पहने बैठे थे और एक धोती-कुरताधारी थे। धोती-कुरते का चेहरा पहली-पहली बार किसी महान सफलता के सुख से पसरा जा रहा था। उसका नौसिखियापन उसकी बाँछों में खिला पड़ रहा था जिससे उसके लिए सहानुभूति पैदा होती थी। हो सकता है, यह शराब का असर रहा हो। बाकी तीन आदमी जो काले कपड़े पहने थे उनमें मैल का कलफ जान पड़ता था। उनके चेहरे हड़ैले और बेलौस थे और उन पर संतुलित खुशी थी जिससे वह हवा में टँगे-से जान पड़ते थे।

औरत इसी मेज पर आई। उसने धोती-कुरता को बख्‍श दिया; वह जानती थी कि सूटवाले धोती-कुरता को खुश कर रहे हैं और उसे सूटवालों को ही खुश करना चाहिए -धोती-कुरता को बदहवास कर देने से क्‍या फायदा, जबकि उसे सिर्फ ललचाने में फायदा है। वह एक काले सूट की गोद में जा बैठी और उसके मुँह से सिगरेट निकाल कर पीने लगी। चारों पुरुष ऐसे हँसने की कोशिश करने लगे जैसे वे मुरली मनोहर हों जबकि वे दौलत कमाने में इतने घिस चुके थे कि उनका चेहरा लालसा की झलक आते ही बूढ़ा दिखाई देता।

अगले दस मिनट में औरत ने एक-एक करके सब कपड़े उतारे। अंतिम कपड़ा - एक लँगोट - उतारने के साथ लाल-पीली रोशनियाँ बुझ गईं। धुँधले उजास में वह नंगी खड़ी थी।

वह कहाँ की रहनेवाली है, मैंने पूछा, गोंडा, बस्‍ती, बेगूसराय, बहराइच, आरा, छपरा, राँची?

असम्‍भव था जानना। वह इतनी नंगी थी।

एक दुशाला ओढ़ कर वह भाग गई। शर्म दिखाने का उसका काम कायदे से तो सही था मगर उसकी उम्र ज्‍यादा दिखी, शर्म कम। मैंने नतीजा निकाला कि जब भी कोई तेजी से जाता है उसकी सही उम्र छिपाए नहीं छिपती चाहे वह साइकिल चलाए, चाहे दौड़े…

जैसा कि मैं बता चुका हूँ, मैं तीन दिन उस होटल में रहा। पहली शाम को जो देखा था ठीक वही दूसरी और तीसरी शाम को देखा। ठीक जब छातियाँ कपड़े से बाहर निकालने का वक्‍त आता, हरी रोशनीवाला खानसामा लपक कर अपने लैम्‍प के पीछे खड़ा हो जाता। उसके ऊपर तनाव साफ दिखता था। पर वह नंगी औरतें देखने का तनाव नहीं था। रोज नंगी औरत देखने से ऊब और रोज ठीक वक्‍त पर लैम्‍प न जला पाने के डर का मेल था वह तनाव। सब बाजा बजानेवाले औरत की तरफ थे और वे उसे मिल कर पीटते।

दूसरी शाम को मैंने बाजा शुरू करनेवालों को भी ठीक कल की तरह झाँझ पर पहली चोट मारते ही मस्‍त हो जाते देखा। तीसरी शाम को मैं यह भी पहचानने लगा कि पूरी धुन में कहाँ-कहाँ, किस-किस बाजेवाले का मस्‍त होना और कौन-सी अदा दिखाना निश्चित है। वे जानते थे कि सुननेवाले मजा लेने की ताकत खो चुके हैं - एक अदना वादक भी यह पहचान लेता है।

खानेवाले - नहीं, मैं दावे से नहीं कह सकता कि वे तीनों दिन वहीं थे या उन्‍होंने तीनों दिन वहीं खाया। देखिए न कि इन सब के बीच वही तो थे जिनके पास कुछ मनोरंजन कर सकने लायक पैसा था। वे उसे तरह-तरह के खाने पर फूँक सकते थे बगैर यह जाने हुए कि वे क्‍या खाना चाहते हैं? वे खाते जाते और होटल चलता रहता।

बाकी सब गरीब लोग थे। वे इस किले में सुरक्षित थे। वे इस शर्त पर सु‍रक्षित थे कि वर्दी पहनेंगे, सलाम करेंगे, बाजा बजाएँगे और औरत पर ठीक जगह, निश्चित समय पर, रोज-रोज रोशनी डालेंगे। और वे चिड़चिड़ाएँगे नहीं। औरत को मैं नहीं जानता, पता ही नहीं चला कि वह कहाँ की रहनेवाली है। अनायास एक बात मेरे दिमाग में आई। शहर में हत्‍याएँ हो रही हैं। कभी इस किले में हत्‍या होगी तो ये लोग नहीं मारे जाएँगे, मैंने कहा, मुझे उम्‍मीद है कि वे लोग औरत को भी नहीं मारेंगे, इससे क्‍या हुआ कि उसके शहर का मुझे पता नही! और अगर यही लोग मारेंगे तो भी औरत को नहीं मारेंगे, इससे क्‍या हुआ कि वह अब कहीं की नहीं रही।

आर्द्रा / मोहन राकेश




बचन को थोड़ी ऊँघ आ गयी थी, पर खटका सुनकर वह चौंक गयी। इरावती ड्योढ़ी का दरवाज़ा खोल रही थी। चपरासी गणेशन आ गया था। इसका मतलब था कि छ: बज चुके थे। बचन के शरीर में ऊब और झुँझलाहट की झुरझुरी भर गयी। बिन्नी न रात को घर आया था, न सुबह से अब तक उसने दर्शन दिये थे। इस लडक़े की वजह से ही वह यहाँ परदेस में पड़ी थी, जहाँ न कोई उसकी ज़बान समझता था, न वह किसी की ज़बान समझती थी। एक इरावती ही थी जिससे वह टूटी-फूटी हिन्दी में बात कर लेती थी, हालाँकि उसकी पंजाबी हिन्दी और इरावती की कोंकणी हिन्दी में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ था। जब इरावती भी उसका सीधे-सादे शब्दों में कही साधारण-सी बात को न समझ पाती, तो वह बुरी तरह अपनी विवशता के खेद से दब जाती। और इस लडक़े को रत्ती चिन्ता नहीं थी कि माँ किस मुश्किल से दिन काटती है और किस बेसब्री से इसका इन्तज़ार करती है। मन में आया, तो घर आ गये, नहीं तो जहाँ हुआ पड़ रहे।

एक मादा सूअर अपने छ: बच्चों के साथ, जो अभी नौ-नौ इंच से बड़े नहीं हुए थे, कुएँ की तरफ़ से आ रही थी। तूत के बुड्ढे पेड़ के पास पहुँचकर उसने हुँफ़्‌हुँफ़्‌करते हुए दो-तीन बार नाली को सूँघा और फिर पेड़ के नीचे कीचड़ में लोटने लगी। उसके नन्हे आत्मज उसके उठने की राह देखते हुए वहीं आसपास मँडराते रहे।

दिन-भर गली में यही सिलसिला चलता था। आसपास के सभी घरों ने सूअर पाल रखे थे। उस बस्ती में लोगों के दो ही धन्धे थे-सूअर पालना और नाजायज़ शराब निकालना। ये दोनों चीज़ें उनके रोज़ के खान-पान में शामिल थीं। बस्ती सान्ताक्रुज़ हवाई अड्डे से कुल आधा मील के फासले पर थी, पर पुलिस की आँख वहाँ नहीं पहुँचती थी। मोनिका का बाप जेकब गली में ही भट्‌ठी लगाता था। वह गली का सबसे बड़ा पियक्कड़ था और अक्सर पीकर गाता हुआ गली में चक्कर लगाया करता था : "ओ दैट आई हैड विंग्ज़ ऑफ़ एंजल्स, हियर टु स्प्रेड एंड हैवनवर्ड फ्लाऽऽई...।"

उस वक़्त भी वह रोज़ की तरह कुएँ के मोड़ के पास से लडख़ड़ाता हुआ आ रहा था। उसके लफ़्ज बचन की समझ से बाहर थे, मगर उसकी आवाज़ ही उसके दिल में दहशत पैदा करने के लिए काफ़ी थी। "ओ दैट आई हैड विंग्ज़ ऑफ़ एंजल्स, हियर टु स्प्रेड एंड हैवनवर्ड फ्लाऽऽई! आई वुड सीक द गेट्‌स ऑफ़ सायन, फ़ार बियांड द स्टाऽऽरी स्काऽऽई! होइ-हो! हो-हो-होऽऽ! ओ दैट आई हैड विंग्ज़ ऑफ़ एंजल्स...!"

उसका चौड़ा चौकोर चेहरा वैसे ही भयानक था-अपने ढीले-ढाले काले सूट में वह और भी भयानक दिखाई देता था। चेचक के दागों और झुर्रियों से भरा उसका चेहरा दीमक खाई लकड़ी की तरह जान पड़ता था। दूर से ही उस आदमी की आवाज़ सुनकर बचन का दिल धडक़ने लगता और वह अपना दरवाज़ा बन्द कर लेती। उसने कितनी ही बार बिन्नी से कहा था कि वह उस बस्ती से मकान बदल ले, मगर वह हर बार यह कहकर टाल देता था कि बम्बई की और किसी बस्ती में बीस रुपये महीने में मकान नहीं मिल सकता। बचन डर के मारे बिन्नी के आने तक लालटेन की लौ भी ज़्यादा ऊँची नहीं करती थी। अँधेरा बहुत बोझिल महसूस होता था, मगर वह मन मारे बैठी रहती थी।

लालटेन की चिमनी नीचे से आधी काली हो गयी थी। बचन को उसे साफ़ करने का उत्साह नहीं हुआ। अँधेरा होने लगा, तो उसने जैसे फ़र्ज़ पूरा करने के लिए उसे जला दिया और एक अज्ञात देवता के सामने हाथ जोडऩे की प्रक्रिया पूरी करके घुटनों पर बाँहें रखे वहीं बैठी रही। सामने मोढ़े के नीचे लाली का कार्ड रखा था। वह अक्षरों की बनावट से परिचित थी, पर हज़ार आँखें गड़ाकर भी उनका अर्थ नहीं जान सकती थी। बिन्नी के सिवा हिन्दी की चिट्‌ठी पढऩे वाला वहाँ कोई नहीं था, हालाँकि बिन्नी से चिट्‌ठी पढ़वाकर भी उसे सुख नहीं मिलता था। वह लाली की चिट्‌ठी इस तरह पढक़र सुनाता था जैसे वह उसके बड़े भाई की चिट्‌ठी न होकर गली के किसी ग़ैर आदमी के नाम आयी किसी नावाकिफ़ आदमी की चिट्‌ठी हो। दो मिनट में ही वह पहली सतर से लेकर आख़िरी सतर तक सारी चिट्‌ठी गुन-गुन करके बाँच देता था, और फिर उसे कोने में फेंककर इधर-उधर की हाँकने लगता था। हर बार उससे चिट्‌ठी सुनकर वह कुढ़ जाती थी। पर बिन्नी उसे नाराज़ देखता, तो तरह-तरह की बातें बनाकर ख़ुश कर लिया करता था।

उसे ख़ुश होते देर नहीं लगती थी। बिन्नी इतना बड़ा होकर भी जब-तब उससे बच्चों की तरह लाड़ करने लगता था। कभी उसकी गोदी में सिर रखकर लेट जाता, और कभी उसके घुटनों से गाल सहलाने लगता। ऐसे क्षणों में उसका दिल पिघल जाता और वह उसके बालों पर हाथ फेरती हुई उसे छाती से लगा लेती।

"माँ, तेरा छोटा लडक़ा कपूत है न?" बिन्नी कहता।

"हा-ह", वह हटकने के स्वर में कहती, "तू कपूत है? तू तो मेरा चन्न है," और वह उसका माथा चूम लेती।

लेकिन अक्सर वह बहुत तंग पड़ जाती थी। बहुत-सी रातें ऐसी गुज़रती थीं जब वह घर आता ही नहीं था। अँधेरे घर की छत उसे दबाने को आती थी और वह सारी-सारी रात करवटें बदलती रहती थी। ज़रा आँख झपक जाती, तो उसे बुरे-बुरे सपने दिखाई देने लगते। इसलिए कई बार कोशिश करके आँखें खुली रखती थी।

और बिन्नी आता, तो अपने में ही उलझा हुआ और व्यस्त-सा। वह समझ नहीं पाती थी कि उस लडक़े को किस चीज़ की व्यस्तता रहती है। जहाँ तक कमाने का सवाल था, वह महीने में मुश्किल से साठ-सत्तर रुपये घर लाता था। कभी दस रुपये ज़्यादा ले आता, तो साथ अपनी माँगें सामने रख देता-'इस बार माँ, दो कमीज़ें सिल जाएँ और एक बढिय़ा-सा जूता ले लिया जाए।' उसकी बातों से बचन के होंठों पर रूखी-सी मुस्कराहट आ जाती थी। दस रुपये में ही उसे दुनिया भर का सामान चाहिए! और जब वह साठ से भी कम रुपये लाता, तो महीने भर की बड़ी आसान-सी योजना उसके सामने पेश कर देता-'दूध-सब्ज़ी का नागा। दाल, प्याज़, ख़ुश्क फुलके और बस!'

वह जानती थी कि ये रुपये भी वह ट्‌यूशन-ऊशन करके ले आता है, वरना सही माने में वह बेकार ही है। उसके दिल में बड़े-बड़े मनसूबे ज़रूर थे और उनका बख़ान करते वक़्त वह छोटा-मोटा भाषण दे डालता था। मगर उन मनसूबों को पूरा करने के लिए जिस दुनिया की ज़रूरत थी, वह दुनिया अभी बनी नहीं थी। वह जोश से उँगलियाँ नचा-नचाकर कहता, "माँ, जब वह दुनिया बन जाएगी, तो तुझे पता चलेगा कि तेरा नालायक बेटा कितना लायक है!"

"चुप कर ख़सम खाना!" वह प्रशंसा की नज़र से उसे देखती हुई कहती, "बड़ा लायक एक तू ही है।"

"माँ, मेरी लियाकत मेरे पेट में बन्द है!" वह हँसता, "जिस तरह हिरन के पेट में कस्तूरी बन्द होती है न, उसी तरह। जिस दिन वह खुलकर सामने आएगी, उस दिन तू अचम्भे से देखती रह जाएगी।"

उसे बिन्नी की बातें सुनकर गर्व होता था। मगर जब वह लडक़ा बहुत गुमसुम और बन्द-बन्द-सा हो रहता, तो उसे उलझन होने लगती थी।

बिन्नी के साथ उसके अजीब-अजीब दोस्त घर आया करते थे। उन लोगों का शायद कोई ठौर-ठिकाना था ही नहीं,क्योंकि वे आते तो दो-दो दिन वहीं पड़े रहते थे, और खाने-पीने में किसी तरह का शरम-लिहाज़ नहीं बरतते थे। तवे से उतरती रोटी के लिए जब वे आपस में छीना-झपटी करने लगते, तो उसे मन में बहुत ख़ुशी का अनुभव होता। मगर अक्सर उसकी दाल की पतीली ख़ाली हो जाती, और यह देखकर कि उन लोगों की भूख अभी बनी है, उसे घर की ग़रीबी अपना अपराध प्रतीत होती। ऐसे समय उसकी आँखों में नमी भर जाती और वह ध्यान बँटाने के लिए दूसरे काम करने लगती। वे लोग रू$खी नमकीन रोटियों की फ़रमाइश करते, तो वह चुपचाप उन्हें बना देती। मगर उन्हें खिलाने का उसका सारा उत्साह तब तक समाप्त हो चुका होता।

और उन लोगों के बहस-मुबाहिसे कभी समाप्त नहीं होते थे। वे सब ज़ोर-ज़ोर से बोलते थे और इस तरह आपस में उलझ जाते थे जैसे उनकी बहस पर ही धरती और ईश्वर का दारोमदार हो। कई बार वे इतने गरम हो जाते थे कि लगता था अभी एक-दूसरे को नोंच लेंगे, मगर सहसा उस उत्तेजना के बीच से एक कहकहा फूट पड़ता और वे उठ-उठकर एक-दूसरे से बगलगीर होने लगते। बिन्नी बचपन में बहुत ख़ामोश लडक़ा था। अब उसे इस तरह हुड़दंग करते देखकर उसे हैरानी होती थी। कई-कई घंटे घर में तूफ़ान मचा रहता था। उसके बाद फिर ख़ामोशी छा जाती जो बहुत ही अस्वाभाविक और दम घोंटनेवाली महसूस होती। जब बिन्नी दो-दो दिन घर न आता, तो उस ख़ामोशी के ओर-छोर गुम हो जाते और वह अपने को सदा से एक गहरे शून्य में घिरी हुई महसूस करती।

अँधेरा गहरा होने लगा और मोनिका का बाप जाकर अपने कमरे में बन्द हो गया तो उसने फिर दरवाज़ा खोल लिया। मादा सूअर और उसके बच्चे अब सामने घर के अहाते में डेरा जमाए थे और एक मोटा सूअर नाली के पास हुँफ़्‌हुँफ़्‌कर रहा था। हवा तेज़ हो गयी थी, और तूत के बुड्ढे पेड़ की डालियाँ बुरी तरह हिल रही थीं। आसमान का जो छोर दिखाई देता था, वहाँ रह-रहकर बिजली चमक जाती थी। दो महीने से प्राय: रोज वर्षा हो रही थी। घर से कुएँ तक गली में कीचड़ ही कीचड़ रहता था। इस कीचड़ के लिए बचन को लडक़े-लड़कियों की उन टोलियों से शिकयत थी जो वर्षा शुरू होने से पहले आधी-आधी रात तक गली में घूमती हुई ऊँचे स्वर में ईश्वर से पानी बरसाने के लिए प्रार्थना किया करती थीं। अब जैसे उन्हीं की वजह से सारा दिन गली में चिपड़-चिपड़ होती रहती थी।

ड्योढ़ी के दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई। इरावती ने दरवाज़ा खोल दिया और बिन्नी मुस्कराता हुआ उधर से अन्दर आ गया।

"आगे की तरफ़ बहुत कीचड़ है भाभी, माफ़ करना," कहता हुआ वह अपने कमरे में आ गया। इरावती ने उस पर एक शिकायत की नज़र डालकर दरवाज़ा बन्द कर लिया। उसके सिर के बाल बुरी तरह उलझे थे और कुरता-पाज़ामा बहुत मुचड़ गया था। ज़ाहिर था कि वह सुबह जिस हाल में सोकर उठा था, अब तक उसी हाल में था, और उसे मुँह-हाथ धोने का भी वक़्त नहीं मिला था।

"माँ, जल्दी से रोटी डाल दे, भूख लगी है!" आते ही चारपाई पर फैलते हुए उसने आदेश दिया। बचन चुपचाप अपनी जगह बैठी रही। न उठी, और न ही उसने मुँह से कुछ कहा। कुछ क्षण प्रतीक्षा करने के बाद बिन्नी ने सिर उठाया और कहा, "माँ, रोटी...।"

"रोटी आज नहीं बनी है," वह बोली, "मुझे क्या पता था कि लाटसाहब आज भी घर आएँगे कि नहीं! रात की रोटी मैंने सवेरे खायी, सवेरे की अब खायी है। मैं क्यों रोज़-रोज़ बासी रोटी खाती रहूँ? जा, किसी तन्दूर पर जाकर खा ले।"

बिन्नी हँसता हुआ चारपाई से उठ बैठा और माँ के मोढ़े के पास चला आया। "यहाँ तन्दूर है कहाँ, जहाँ जाकर खा लूँ?" वह बोला, "मेरे हिस्से की जो बासी रोटी रखी थी, वह तूने क्यों खायी? निकाल मेरी बासी रोटी..." और वह माँ का घुटना पकडक़र बैठ गया।

"मेरे पेट से निकाल ले अपनी बासी रोटी!" बचन ने आरम्भ किया मीठी झिडक़ी के रूप में, पर वाक्य समाप्त करते-करते उसकी आँखें गीली हो गयीं!

बिन्नी ने उसकी गीली आँखें नहीं देखीं। वह उठकर रोटीवाले डिब्बे के पास चला गया और बोला, "डिब्बे के रखी होगी, ज़रूर रखी होगी।"

बचन ने उसकी नज़र बचाकर आँखें पोंछ लीं। बिन्नी रोटीवाला डिब्बा लिये उसके सामने आ बैठा। डिब्बे में कटोरा-भर दाल के साथ चार रोटियाँ कपड़े में लपेटकर रखी थीं। बिन्नी ने जल्दी से एक रोटी का टुकड़ा तोड़ लिया।

"यह तो ताज़ा रोटी है!" वह टुकड़ा मुँह में ठूँसे हुए बोला।

"बासी रोटी खाने को माँ जो है!" कहकर बचन उठ खड़ी हुई। उसने पानी का गिलास भरकर उसके पास रख दिया। बिन्नी ने एक घूँट में गटागट गिलास खाली कर दिया और बोला, "थोड़ा और!"

बचन ने गिलास उठा लिया और सुराही से उसमें पानी डालती हुई बोली, "लाली का कार्ड आया है।"

"अच्छा!" कहकर बिन्नी रोटी खाता रहा। उसने कार्ड के बारे में ज़रा भी जिज्ञासा प्रकट नहीं की। बचन का दिल दुख गया। वह गिलास बिन्नी के आगे रखकर बिना एक शब्द कहे अहाते में चली गयी और चारपाई पर दरी डालकर पड़ गयी। उसका दिल उछलकर आँखों से आने को हो रहा था, पर वह किसी तरह चेहरा सख्त किए अपने को रोके रही। थोड़ी देर में बिन्नी जूठे पानी से हाथ धोकर मुँह पोंछता हुआ अन्दर से आ गया।

"कहाँ है कार्ड?" उसने पूछा।

"कहीं नहीं है," बचन ने रुँधे स्वर में कहा और करवट बदल ली।

"अब बता भी दे न, जल्दी से सब समाचार पढ़ दूँ।"

"सो जा, मुझे कोई समाचार नहीं पढ़वाने हैं।"

"पढ़वाने क्यों नहीं हैं, मैं अभी सब सुनाता हूँ," कहकर बिन्नी अन्दर चला गया और कार्ड ढूँढक़र ले आया। साथ लालटेन भी उठा लाया। आधे मिनट में उसने सरसरी नज़र से सारा कार्ड पढ़ डाला।

"भैया की तबीयत ठीक नहीं है," वह लालटेन ज़मीन पर रखकर माँ की चारपाई के पैताने बैठ गया। बचन सहसा उठकर बैठ गयी। बिन्नी ने गुनगुन करके पहली डेढ़ी पंक्ति पढ़ी और फिर उसे सुनाने लगा। लाली ने लिखा था कि उसका ब्लड प्रेशर फिर बढ़ गया था, डॉक्टर ने उसे आराम करने की सलाह दी है। कुसुम की तबीयत अब ठीक है और उसका रंग भी लाली पर आ रहा है। उन्होंने मकान बदल लिया है क्योंकि पहला मकान हवादार नहीं था और बच्चों को वहाँ से स्कूल जाने में भी दिक्कत होती थी। अब दीवाली पास आ रही है, इसलिए बच्चे दादी माँ को बहुत याद करते हैं। उसे गये छ: महीने से ऊपर हो गये हैं, इसलिए हो सके, तो दीवाली के दिनों में आकर मिल जाए।

"इसे बाद सबकी नमस्ते है," कहकर बिन्नी ने कार्ड रख दिया।

"यह नहीं लिखा कि किस डॉक्टर का इलाज कर रहा है?"

"तू जैसे वहाँ के सब डॉक्टरों को जानती है।"

"बिन्नी ने बात अनायास कह दी थी, पर बचन का मन छिल गया। उसके चेहरे पर फिर कठिनता आ गयी।

"मैं कल वहाँ चली जाती हूँ," उसने कहा।

"तू चली जाएगी तो मैं यहाँ अकेला कैसे रहूँगा? मेरी रोटी...?"

बचन ने वितृष्णा से उसे देखा, जिसका मतलब था कि तेरी रोटी क्या उसकी जान से ज़्यादा प्यारी है?

"तू कौन घर की रोटी पर रहता है," मुँह से उसने इतना ही कहा।

"भैया का ब्लड प्रेशर कोई नयी बीमारी तो है नहीं..." बिन्नी फिर कहने लगा।

"तू ये बातें रहने दे, मैं कल यहाँ से जा रही हूँ।" बचन ने उसकी बात को बीच में ही काट दिया। कुछ क्षण दोनों ख़ामोश रहे। फिर बिन्नी 'अच्छा' कहकर उसके पास से उठ गया।

अगले दिन सुबह वह 'अभी थोड़ी देर में आता हूँ' कहकर घर से चला गया और दोपहर तक लौटकर नहीं आया। बचन का किसी काम में मन नहीं लग रहा था। फिर भी उसने किसी तरह खाना बनाया और घर के सब छोटे-मोटे काम पूरे किये। बिन्नी की चारों-पाँचों कमीज़ें लकर उनके टूटे बटन भी लगा दिये। फिर अपनी दरी और कपड़े एक जगह इकट्‌ठे कर लिये। यह तय नहीं था कि वह उस दिन वहाँ से आ पाएगी या नहीं। बिन्नी सुबह उसे निश्चित कुछ बताकर नहीं गया था। सम्भव था कि वह रात तक घर आये ही नहीं। रात को भी उसके आने का भरोसा नहीं था। यह भी डर था कि बिन्नी के पास किराये लायक पैसे शायद हों ही नहीं। उस दिन महीने की उन्नीस तारीख़ थी। और उन्नीस तारीख़ को बिन्नी के पास पैसे कब रहते थे? उस हालत में उसे तीन-चार तारीख़ तक जाना टालना पड़ेगा। वह यह भी नहीं जानती थी कि दीवाली इस बार किस तारीख़ को पड़ेगी। वह सोचने लगी कि इस बीच लाली की तबीयत और ज़्यादा ख़राब हो गयी, तो? उसे काफ़ी ज़्यादा तकलीफ़ होगी, जो उसने चिट्‌ठी में लिखा है। नहीं वह चिट्‌ठी में कभी न लिखता। ऐसे में वह पन्द्रह-बीस दिन वहाँ से न जा सकी, तो?

तभी बिन्नी आ गया। उसके साथ उसका लम्बे बालोंवाला दोस्त शशि भी था, जिसकी गरदन बात करते हुए तोते की तरह हिलती थी। वह उसकी दाल का सबसे बड़ा प्रशंसक था। आते ही दाल की फ़रमाइश करता था। हमेशा की तरह वे गली से ऊँची आवाज़ में बात करते हुए आये।

"मैं तेरा टिकट ले आया हूँ," बिन्नी ने आते ही कहा, "मंगलवाड़ी से शशि को साथ लिया, और वहीं से टिकट भी ले लिया। पर तू तो अभी तैयार ही नहीं हुई...!"

"तैयार क्या होती? तू मुझसे कहकर गया था...?"

"जब रात को तय हो गया था, तो सुबह कहने की क्या ज़रूरत थी? अच्छा, अब जल्दी से तैयार हो जा। गाड़ी में दो घंटे हैं। तेरे लिए नक़द सवा बीस ख़र्च करके आया हूँ, वे भी उधार के।"

बचन को बुरा लगा कि वह बाहर के आदमी के सामने ऐसी बात क्यों कह रहा है। क्या वह नहीं जानती थी कि टिकट के लिए उसे रुपये उधार लेने पड़े होंगे? वह कब चाहती थी कि उसकी वजह से उस पर उधार चढ़े? वह उससे कह देता, तो वह बारह-चौदह दिन बाद चली जाती।

वह कुछ न कहकर अपने कपड़े दरी में लपेटने लगी।

"हट माँ, मुझे बिस्तर बाँधना आता भी है?" बिन्नी आगे बढ़ आया, "उल्टी-सीधी रस्सी बाँधेगी, और कहीं से बिस्तर को मोटा कर देगी, कहीं से पतला। हट जा; मैं अभी एक मिनट में बाँध देता हूँ। ऐसा बिस्तर बँधेगा कि वहाँ पहुँचकर भी तेरा खोलने को जी नहीं करेगा।"

"तू रोटी खा ले, मैं बिस्तर बाँध लेती हूँ," बचन की आँखें भर आयीं।

"रोटी खानेवाला आदमी मैं साथ लाया हूँ," वह माँ के लपेटे कपड़ों को फिर से फैलाता हुआ बोला, "यह इसीलिए आया है कि तू चली जाएगी, तो तेरे हाथ की दाल फिर इसे कहाँ मिलेगी?"

बचन की गीली आँखों में हल्की मुस्कराहट भर गयी।

"इसे भी खिला दे," वह बोली, "मैं अभी दो फुलके और बना देती हूँ।"

"और बनाने की ज़रूरत नहीं। जो बने हैं, वही खा लेंगे।"

"पहले मैं खा लूँ, फिर जो बचें वे इसे दे देना।" कहकर शशि गरदन उठाकर हँस दिया। बिन्नी बिस्तर बाँधता रहा। वह उन दोनों के लिए रोटी डालकर ले आयी।

"तैयार!" बिन्नी ने हाथ झाड़े और शशि के साथ खाना खाने में जुट गया।

"माँ, अपने लिए रोटी रख लेना और जितनी बचे वह सब हमें ला देना।" शशि दाल सुडक़ता हुआ बोला। वे दोनों खा चुके, तो बचन ने जल्दी से बरतन समेट लिये।

"अब माँ, तू भी जल्दी से खा ले।" बिन्नी ने कुल्ला करके हाथ पोंछते हुए कहा।

"मैंने खा ली है।"

"कब खा ली है?" बिन्नी ने पास जाकर उसके कन्धे पकड़ लिये।

"तेरे आने से पहले।"

"झूठी!"

"सच, मैंने खा ली है।"

"आगे तो कभी इतनी जल्दी नहीं खाती।"

"आज खा ली है।...घर से जाना था न! तुम दोनों तो भूखे नहीं रहे?"

"एक-चौथाई भूखे रह गये!" शशि ने डकार लेकर तौलिये से मुँह पोंछा और उसे खूँटी पर टाँगकर हँसने लगा।

स्टेशन पर उसे गाड़ी में बिठाकर वे दोनों प्लेटफार्म पर टहलते रहे। रात को भी उसने ठीक से नहीं खाया था,इसलिए भूख के मारे उसका सिर चकरा रहा था। वह जानती थी कि बिन्नी को पता है उसने कुछ नहीं खाया। इसीलिए उसके मना करने पर भी आधा दर्जन केले लेकर रख गया था। वह एक बार कह चुकी थी कि उसे भूख नहीं है, इसलिए केले वैसे ही रखे थे। बिन्नी हठ से कहता, तो वह खा लेती। मगर बिन्नी और शशि टहलते हुए दूर चले गये थे। शायद अब भी उनमें बहस चल रही थी। उसकी समझ में नहीं आता था कि ये लोग इतनी बहस क्यों करते हैं। हर वक़्त बहस, बहस, बहस! बहस का कोई अन्त भी होता है! जैसे सारी दुनिया के झगड़े इन्हीं को निपटाने हों! फटे हाल रहेंगे, सेहत का ज़रा ध्यान नहीं रखेंगे, और बातें, जैसे दुनिया की दौलत के यही मालिक हों,और उसे बाँटने की समस्या इन्हीं के सिर पर आ पड़ी हो।

वे दोनों प्लेटफार्म के उस सिरे तक होकर वापस आ रहे थे। वह उनके चेहरे देख रही थी। माथे पर सलवटें डाले वे हाथ हिला-हिलाकर बातें कर रहे थे। फिर भी वे बच्चे-से दीखते थे। उस समय शायद वे यह भी भूल गये थे कि वे उसे गाड़ी पर छोडऩे आये हैं। सहसा गार्ड की सीटी सुनकर वे उसके डिब्बे के पास आ गये। मगर वहाँ आकर भी उनकी बहस चलती रही-करघे का काम रुक जाएगा तो कितने आदमी बेकार हो जाएँगे। इसलिए इच्छा यही है कि मालिकों से बात चलती रहे और कामगार काम जारी रखें। बचन सोचने लगी कि ये लोग कभी अपने काम के बारे में बात क्यों नहीं करते? अपनी बेकारी की चिन्ता इन्हें क्यों नहीं सताती?

गाड़ी चलने लगी, तो बिन्नी को जैसे उसके पास होने का होश हुआ और उसका हाथ पकडक़र उसने कहा, "अच्छा माँ...।"

बचन के होंठों पर रूखी-सी मुसकराहट आ गयी। उसने बारी-बारी से उन दोनों के सिर पर हाथ फेरा।

"तू कब लौटकर आएगी?"

"जब भी तू बुलाएगा।"

गाड़ी ने रफ़्तार पकड़ ली। वह देर तक खिड़की से सिर निकालकर उन्हें देखती रही। दोनों हाथ में हाथ डाल गेट की तरफ़ जा रहे थे। उनकी बहस शायद अब भी चल रही थी।

बचन को घर आये पन्द्रह दिन हो गये थे।

"बिन्नी की चिट्‌ठी नहीं आयी?" उसने लाली के कमरे के बाहर रुककर पूछा। लाली से सवाल पूछने में उसका स्वर थोड़ा दब जाता था। वह बेटा बड़ा होते-होते इतना बड़ा हो गया था कि वह अपने को उससे छोटी महसूस करने लगी थी।

"आ जा, माँ," लाली ने काग़ज़ों से आँखें उठाकर कहा, "चिट्‌ठी उसकी आज भी नहीं आयी। न जाने इस लडक़े को क्या हो गया है!"

"तू काम कर, मैं जा रही हूँ," वह बोली, "सिर्फ़ चिट्‌ठी का ही पूछने आयी थी।"

वह बरामदे से होकर अपने कमरे में आ गयी। जानती थी कि लाली का समय कीमती है। वह आधी-आधी रात तक बैठकर दूसरे दिन के केस तैयार करता है। मुवक्किलों की वजह से उसका खाने-पीने का भी समय निश्चित नहीं रहता। इधर छ: महीने में उसकी व्यस्तता पहले से कहीं बढ़ गयी थी। नये घर में आ जाने से जगह का तो आराम हो गया था, मगर कचहरी पहले से भी दूर हो गयी थी। लाली की व्यस्तता के कारण कई बार वह सारा-सारा दिन उससे बात नहीं कर पाती थी। रात को वह बैठक से उठकर आता, तो सीधा अपने सोने के कमरे में चला जाता। दिन भर की थकान के बाद वह उसके आराम में खलल नहीं डालना चाहती थी। सवेरे वह कुसुम से पूछ लेती कि रात को उसकी तबीयत कैसी रही है। कुसुम संक्षेप में उसे बता देती।

"सोने से पहले उसके सिर में बादाम रोगन डाल दिया कर," वह कुसुम से कहती।

"मैं कई बार कहती हूँ, पर ये डलवाते ही नहीं," कुसुम जैसे रटा-रटाया उत्तर दे देती।

"मुझे बुला लिया कर, मैं आकर डाल दिया करूँगी।"

"डालने को नौकर है,पर ये डलवाते ही नहीं।"

वह जानती थी कि सिर में बादाम रोगन डलवाने के लिए लाली को किस तरह राज़ी किया जा सकता है। मगर कुसुम अपने को लाली की ज़्यादा अन्तरंग समझती थी, और उसके सुझावों से सहमति प्रकट करती हुई भी करती वही थी जो उसके अपने मन में होता था। कुसुम जिस शिष्टता और कोमलता से बात करती थी, उससे बचन को लगता था कि वह उस घर में केवल मेहमान है। दिन-भर उसके करने के लिए वहाँ कोई काम नहीं होता था। खाना बनाने के लिए एक नौकर था, ऊपर का काम करने के लिए दूसरा। उनके काम की देखभाल के लिए कुसुम थी। बचन जब भी कोई काम करने के लिए कहती, तो कुसुम झट उसे मना कर देती-नौकर के रहते अपने हाथ से काम करने की क्या ज़रूरत है? यही बात लाली भी कह देता था-माँ, तू काम करेगी, तो घर में दो-दो नौकर किस लिए हैं?

बचन सोचती कि काम करने के लिए नौकर हैं, और देखभाल के लिए कुसुम है, फिर घर में उसका होना किसलिए है? सवेरे पाँच बजे से रात के दस बजे तक वह क्या करे? पन्द्रह दिन पहले जब वह आयी ही थी, तो बच्चे उसे घेरे रहते थे। उन्हें दादी माँ से हज़ारों बातें कहनी और शिकायतें करनी थीं। मगर चार दिन में ही उनके लिए उसकी नवीनता समाप्त हो गयी थी। उनकी अपनी छोटी-छोटी व्यस्तताएँ थीं, जिनमें उनका समय बँटा हुआ था। अब भी कभी-कभी कुमुम ज़रूर उसके पास आ जाती थी, और उसके कमरे में एक तरफ़ ख़ामोश खेलती रहती थी। उसे शायद दादी माँ इसलिए अच्छी लगती थी कि उसकी माँ दोनों भाइयों को ज़्यादा प्यार करती थी...।

बचन कमरे में आकर चारपाई पर लेट गयी। मन ताने-बाने बुनने लगा। बिन्नी ने अभी तक चिट्‌ठी क्यों नहीं लिखी? वहाँ अँधेरे घर में इस वक़्त वह अकेला सोया होगा। रोटी का जाने उसने क्या प्रबन्ध किया है? उसने चलते वक़्त उससे पूछा भी नहीं कि वह पीछे कैसे रहेगा, कहाँ से रोटी खाएगा? उसके पास रहते वह तन-बदन की होश भूला रहता था, अब जाने उसकी क्या हालत होगी? चिट्‌ठी लिख देता, तो कुछ तो तसल्ली हो जाती। मगर उसे चिट्‌ठी लिखने की याद भी आएगी?

कमरे की खिड़की खुली थी और दूर तक खुला आकाश दिखाई दे रहा था। खिड़की से दिखाई देते उन नक्षत्रों की स्थितियों से वह परिचित थी। उन्हीं नक्षत्रों को वह बम्बई की उस मनहूस बस्ती के ऊपर भी झिलमिलाते देखा करती थी। यहाँ से वे उसे तिरछे कोण से दिखाई देते थे, वहाँ वह अहाते में लेटकर उन्हें ठीक अपने ऊपर देखा करती थी। उसी तरह लेटी हुई वह बिन्नी की आहट की प्रतीक्षा करती थी। हुँफ़्‌हुँफ़्‌की आवाज़ें पास आतीं, और दूर चली जाती थीं। फिर दूर से फटे गले की बेहूदा आवाज़ सुनाई देने लगती थी, "ओ डैडाई है डिंवजो फेंजल...।" उस आवाज़ से वह कितनी नफ़रत करती थी! यहाँ इस एकान्त बँगले में आसपास से कोई आवाज़ नहीं आती थी। नौ-साढ़े नौ बजे बच्चों के सो जाने के बाद बिलकुल ख़ामोशी छा जाती थी। सिर्फ़ रंगीलाल के बरतन मलने या चौका धोने की ही आवाज़ सुनाई देती थी।

उसने करवट बदल ली कि किसी तरह नींद आ जाए। नींद न आना रोज़ की बात हो गयी थी। कहाँ दस बजे से ही उसकी आँखों में नींद भर जाती थी, और कहाँ अब वह ग्यारह, बारह और एक के घंटे गिनती रहती थी। 'जाने क्यों?'वह सोचती और करवटें बदलती रहती।

रात को वह देर से सोई, मगर सुबह जल्दी उठ गयी।

उठने पर उसका दिल रात से ज़्यादा अस्थिर और अशान्त था। इतना बड़ा पहाड़-सा दिन और उसके बाद फिर वैसी ही रात! उस लम्बे खालीपन की कल्पना से एक बड़ा शून्य उसके अन्तर को घेरे था। आकाश में चिडिय़ों के झुंड उड़े जा रहे थे। रसोईघर में रंगी स्टोव में हवा भर रहा था। उसे साहब के लिए बेड-टी ले जानी थी। बम्बई में सुबह जब वह कमरे में बाल्टी रखकर नहा रही होती, तो बिन्नी बाहर से चाय की माँग करने लगता था। इससे उसके भजन में बाधा पड़ती थी और उसे बहुत उलझन होती थी। मगर वह चुपचाप उसके लिए चाय बना देती थी।...लेकिन आज उसे इस बात की उलझन हो रही थी कि उसका भजन में मन क्यों नहीं लगता। अब जबकि भजन के लिए पूरी विद्या, पूरा समय, उसके पास था, तो आसन पर बैठने से ही वह क्यों जी चुराती थी?

कुछ देर बरामदे में खड़ी होकर वह सूर्योदय के सुनहले रंग को देखती रही। क्षितिज के एक कोने से दूसरे कोने तक झिलमिलाती नयी धूप धीरे-धीरे निखार पर आ रही थी। लगता था जैसे मिट्‌टी में बन्द उजाला फूटकर बाहर आने के लिए संघर्ष कर रहा हो। धूप की बढ़ती झलक से हर क्षण ऐसा ही आभास होता था। उसने बरामदे से उतरकर पूजा के लिए कुछ गेंदे के फूल चुन लिये और रसोईघर में चली गयी।

रंगी स्टोव से केतली उतारकर चायदानी में पानी डाल रहा था। उसने अपने आँचल के फूल आले में डाल दिये। रंगी ट्रे उठाकर चलने लगा, तो उसने ट्रे उसके हाथ से ले ली।

"रहने दे, मैं ले जाती हूँ।" और वह ट्रे लिये हुए लाली के कमरे की तरफ़ चल दी।

"माँ जी, आप रहने दीजिए, साहब मुझ पर नाराज़ होंगे," रंगी ने पीछे से संकोच के साथ कहा।

"इसमें उसके नाराज़ होने की क्या बात है? मैं तेरे कहने से थोड़े ही ले जा रही हूँ?" और वह थोड़ा खाँसकर लाली के कमरे में चली गयी।

लाली कम्बल ओढक़र बिस्तर में बैठा था। कुसुम अभी सो रही थी। लाली के हाथ में कुछ काग़ज़ थे जिन्हें वह ध्यान से पढ़ रहा था। उसने यह नहीं देखा कि चाय लेकर माँ आयी है। बचन ने ट्रे मेज़ पर रख प्याली में चाय बनायी और उसके पास ले गयी। लाली ने जब चाय के लिए हाथ बढ़ाया, तो उसने आश्चर्य से देखा कि प्याली लिये माँ खड़ी है।

"माँ, तू?" उसने आश्चर्य के साथ कहा।

बचन ने प्याली उसके हाथ में दे दी। उसने पहली बार ठीक से देखा कि लाली के बाल कनपटियों के पास से कितने सफ़ेद हो गये हैं। चश्मा उतार देने से उसकी आँखों के नीचे गहरे गड्ढे नज़र आ रहे थे। लाली ने काग़ज़ रखकर चश्मा लगा लिया।

"रंगी और नारायण क्या कर रहे हैं?" उसने पूछा।

"नारायण दूध लाने गया है," वह बोली, "रंगी रसोईघर में है।"

"तो उससे नहीं आया जाता था? तू सुबह-सुबह उठकर चाय लाये, वाह! इससे अच्छा है मैं आप ही बनाकर पी लूँ।"

"तू ज़रूर बनाकर पी लेगा-जिसे यह नहीं पता कि दूध कौन-सा है और चीनी कौन-सी है!" वह थोड़ा हँस दी। तभी कुसुम करवट बदलकर उठ बैठी।

"माँ जी, आप..." उसने भी आँखें मलते हुए उसी आश्चर्य के साथ कहा। फिर झट-से कम्बल उतारकर वह बिस्तर से निकल आयी।

"आप रहने दीजिए, मैं बनाती हूँ।"

कुसुम दूसरी प्याली में चाय बनाने लगी। बनाकर प्याली उसने बचन की तरफ़ बढ़ा दी।

"मैं अभी नहाई नहीं। अभी से चाय पी लूँ?"

"पी भी ले माँ," लाली बोला, "कभी तो अपना धरम-करम छोड़ दिया कर।"

"नहीं, मैं ऐसे नहीं पीती। तुम लोग पियो।"

कुसुम प्याली लेकर अपने बिस्तर पर चली गयी। बचन लाली के पैताने बैठ गयी। लाली और कुसुम ख़ामोश चाय पीते रहे।

कमरे में हर चीज़ व्यवस्थित थी। अँगीठी पर नीले रंग का कपड़ा बिछा था जिस पर कुसुम ने सफ़ेद डोरे से कढ़ाई की थी। वहीं एक तरफ़ अखरोट की लकड़ी का बना गौतम बुद्ध का बस्ट रखा था, और दूसरी तरफ़ हाथी-दाँत की हंसों की जोड़ी। सन्दूकों पर गद्दे बिछाकर उन्हें लाल कपड़े से ढक दिया गया था। कोने में कुसुम की सिलाई की मशीन पड़ी थी, और वहाँ पास ही लाली की अधसिली कमीज के टुकड़े बँधे रखे थे। मेज़ पर छोटे-से शेल्फ़ में लाली की कुछ किताबें पड़ी थीं और वहाँ पास ही एक टेबल लैम्प रखा था। दो कमरों के बीच के पर्दे पर भी कुसुम ने अपने हाथ से कढ़ाई कर रखी थी। उधर से करवटें बदलने की आवाज़ें आ रही थीं। बच्चों की भी नींद खुल गयी थी।

लाली ने चाय पीकर प्याली मेज़ पर रख दी। कुसुम एक ख़ास नज़र से उसकी तरफ़ देख रही थी। बचन वहाँ से उठ खड़ी हुई।

"बस चल दी, माँ?" कहते-कहते लाली ने काग़ज़ उठा लिये।

"हाँ, तू अपना काम कर। मैं जाकर नहा-धो लूँ।"

"कोई ख़ास बात तो नहीं थी?"

"नहीं, बात कुछ नहीं थी। नौकर चाय ला रहा था, मैंने कहा, मैं ले जाती हूँ।"

लाली की आँखें काग़ज़ों पर झुक गयीं। कुसुम चाय के हल्के घूँट भर रही थी। बचन चलने के लिए तैयार होकर भी खड़ी रही।

"एक बात सोचती थी," वह कहने लगी।

लाली ने काग़ज़ फिर रख दिये।

"हाँ, हाँ, बता न।"

"इतने दिन हो गये, बिन्नी की चिट्‌ठी नहीं आयी...।"

"मैं अब उससे कोई गिला नहीं करता," लाली कुछ चिढ़े हुए स्वर में बोला, "गफ़लत की भी एक हद होती है। इस लडक़े का घरवालों से जैसे कोई रिश्ता ही नहीं है।"

बचन चुप रही।

"यहाँ रहकर बी.ए. कर लेता तो कुछ बन-बना जाता। मगर हर बात में चलना तो उसे अपनी ही मर्ज़ी से है। अब साहब ज़िन्दगी भर यहाँ-वहाँ रहेंगे और आवारागर्दी किया करेंगे।"

बचन की आँखें भर आयीं। उसने कोशिश की कि आँसू आँखों में ही सूख जाएँ, पर यह नहीं हुआ तो उसने पल्ले से आँखें पोंछ लीं।

"यह लडक़ा न जाने कब अपना होश रखना सीखेगा?...अपने शरीर की भी तो फिक्र नहीं करता। वहाँ रहकर मैं ही जो थोड़ा-बहुत देख लेती थी, सो देख लेती थी। कभी-कभी सोचती हूँ कि वहाँ उसके पास ही रहूँ, तो ठीक है।" और वह निर्णय सुनाने के भाव से लाली की तरफ़ देखने लगी। लाली गम्भीर हो गया। बोला कुछ नहीं।

"मैं कहती हूँ, मेरी आँखों के सामने रहेगा, तो मुझे पता चलता रहेगा कि क्या करता है, क्या नहीं करता...।" बचन के स्वर में थोड़ी याचना भी आ गयी।

"माँ जी का यहाँ दिल नहीं लगता," कुसुम ने प्याली रखते हुए कहा। पल भर लाली की आँखें उससे मिली रहीं।

"अभी तो माँ, तू आयी ही है," वह बोला, "पन्द्रह दिन बाद दीवाली है...।"

"मेरा बच्चों को छोडक़र जाने को मन करता है? मैं तो वैसे ही बात कर रही थी," वह फिर से चलने के लिए तैयार होकर बोली, "पता नहीं रोटी भी ठीक से खाता है या नहीं।"

कुसुम उठकर रंगी को आवाज़ देती हुई बाहर चली गयी।

"तू जाना ही चाहती है तो बात दूसरी है।" लाली के चेहरे पर कुछ उकताहट-सी आ गयी।

"नहीं, जाने की बात नहीं है, मैं तो वैसे ही कह रही थी...।"

वह बाहर की तरफ़ देखने लगी कि फिर से आँसू न टपकने लगें।

"जाने को मन हो रहा है, चली जा। नहीं, ख़ामख़ाह यहाँ चिन्ता से परेशान रहेगी।"

बचन कुछ पल ख़ामोश रही। लाली अपनी उँगलियाँ मसलता रहा।

"किस गाड़ी से चली जाऊँ?"

"रात की गाड़ी ठीक रहती है। उसमें भीड़ कम होती है।"

"तेरी तबीयत की मुझे फिक्र रहेगी...।"

"मेरी तबीयत अब ठीक ही है।"

"तू चिट्‌ठी लिखता रहेगा न?"

"हाँ। मैं नहीं लिख सकूँगा, तो कुसुम लिख देगी।"

"अच्छा...!"

रात को गाड़ी में उसे अच्छी जगह मिल गयी। जनाने डिब्बे में उसके अलावा दो ही और सवारियाँ थीं। कुसुम नारायण को साथ लेकर उसे छोडऩे आयी थी। लाली मुवक्किलों की वजह से नहीं आ पाया था। गाड़ी के चलने तक कुसुम उसके पास बैठकर उससे बातें करती रही। कहती रही कि दादी के पीछे बच्चे उदास हो जाएँगे, तीन-चार दिन घर सूना-सूना लगेगा, और कि वह रास्ते के लिए खाना बनवाकर साथ ले जाती, तो अच्छा था। गाड़ी ने सीटी दी, तो कुसुम प्लेटफ़ार्म पर उतर गयी।

"जाते ही चिट्‌ठी लिखिएगा," उसने कहा।

"तुम लाली की तबीयत का पता देती रहना," बचन ने कहा। सहसा उसे लाली के सफ़ेद बालों का ध्यान हो आया।

"रात को उसे देर-देर तक मत पढऩे देना, और उससे कहना कि दूसरे-तीसरे दिन सिर में बादाम रोगन ज़रूर डलवा लिया करे।"

कुसुम ने सिर हिला दिया। गाड़ी चलने लगी, तो उसने हाथ जोड़ दिये।

प्लेटफ़ार्म पीछे रह गया, तो बचन आकाश की तरफ़ देखने लगी। उसके मन में फिर एक शून्य-सा भरने लगा। आकाश में वही नक्षत्र चमक रहे थे। बचन स्थिर-नज़र से उन्हें देखती रही। वह जहाँ जा रही थी, उस घर का नक़्शा धीरे-धीरे उसकी आँखों के सामने उभरने लगा। नीची छतवाला टूटा-फूटा कमरा, मादा सूअर और उसके बच्चों की हुँफ़्‌हुँफ़्‌और कुएँ की तरफ़ से आती मोटी, भद्दी, फटी-सी आवाज़-ओ डैडाई है है ड्विंलो-फेंज़ल...अँधेरा, एकान्त,बिन्नी, शशि और उसके दोस्त, बहसें और दाल-रोटी के लिए उन लोगों की छीना-झपटी...।

उसकी आँखें भर आयीं। आकाश में चमकते नक्षत्र धुँधले पड़ गये।

आँखें पोंछ लीं। नक्षत्र फिर चमकने लगे।


करवा का व्रत/यशपाल




 कन्हैयालाल अपने दफ्तर के हमजोलियों और मित्रों से दो तीन बरस बड़ा ही था, परन्तु ब्याह उसका उन लोगों के बाद हुआ। उसके बहुत अनुरोध करने पर भी साहब ने उसे ब्याह के लिए सप्ताह-भर से अधिक छुट्टी न दी थी। लौटा तो उसके अन्तरंग मित्रों ने भी उससे वही प्रश्न पूछे जो प्रायः ऐसे अवसर पर दूसरों से पूछे जाते हैं और फिर वही परामर्श उसे दिये गये जो अनुभवी लोग नवविवाहितों को दिया करते हैं।

हेमराज को कन्हैयालाल समझदार मानता था। हेमराज ने समझाया-बहू को प्यार तो करना ही चाहिए, पर प्यार से उसे बिगाड़ देना या सिर चढ़ा लेना भी ठीक नहीं। औरत सरकश हो जाती है, तो आदमी को उम्रभर जोरू का गुलाम ही बना रहना पड़ता है। उसकी जरूरतें पूरी करो, पर रखो अपने काबू में। मार-पीट बुरी बात है, पर यह भी नहीं कि औरत को मर्द का डर ही न रहे। डर उसे ज़रूर रहना चाहिए... मारे नहीं तो कम-से-कम गुर्रा तो ज़रूर दे। तीन बात उसकी मानो तो एक में ना भी कर दो। यह न समझ ले कि जो चाहे कर या करा सकती है। उसे तुम्हारी खुशी-नाराजगी की परवाह रहे। हमारे साहब जैसा हाल न हो जाये। ...मैं तो देखकर हैरान हो गया। एम्पोरियम से कुछ चीजें लेने के लिये जा रहे थे तो घरवाली को पुकारकर पैसे लिये। बीवी ने कह दिया-' कालीन इस महीने रहने दो। अगले महीने सही', तो भीगी बिल्ली की तरह बोले ' अच्छा!' मर्द को रुपया-पैसा तो अपने पास में रखना चाहिये। मालिक तो मर्द है।

कन्हैया के विवाह के समय नक्षत्रों का योग ऐसा था कि ससुराल वाले लड़की की विदाई कराने के लिये किसी तरह तैयार नहीं हुये। अधिक छुट्टी नहीं थी इसलिये गौने की बात ' फिर' पर ही टल गई थी। एक तरह से अच्छा ही हुआ। हेमराज ने कन्हैया को लिखा-पढ़ा दिया कि पहले तुम ऐसा मत करना कि वह समझे कि तुम उसके बिना रह नहीं सकते, या बहुत खुशामद करने लगो।...अपनी मर्जी रखना, समझे। औरत और बिल्ली की जात एक। पहले दिन के व्यवहार का असर उस पर सदा रहता है। तभी तो कहते हैं कि ' गुर्बारा वररोजे अव्वल कुश्तन'- बिल्ली के आते ही पहले दिन हाथ लगा दे तो फिर रास्ता नहीं पकड़ती। ...तुम कहते हो, पढ़ी-लिखी है, तो तुम्हें और भी चौकस रहना चाहिये। पढ़ी-लिखी यों भी मिजाज दिखाती है।

निःश्वार्थ-भाव से हेमराज की दी हुई सीख कन्हैया ने पल्ले बाँध ली थी। सोचा- मुझे बाजार-होटल में खाना पड़े या खुद चौका-बर्तन करना पड़े, तो शादी का लाभ क्या? इसलिए वह लाजो को दिल्ली ले आया था। दिल्ली में सबसे बड़ी दिक्कत मकान की होती है। रेलवे में काम करने वाले, कन्हैया के जिले के बाबू ने उसे अपने क्वार्टर का एक कमरा और रसोई की जगह सस्ते किराये पर दे दी थी। सो सवा साल से मजे में चल रहा था।

लाजवन्ती अलीगढ़ में आठवीं जमात तक पढी थी। बहुत-सी चीजों के शौक थे। कई ऐसी चीजों के भी जिन्हें दूसरे घरों की लड़कियों को या नई ब्याही बहुओं को करते देख मन मारकर रह जाना पड़ता था। उसके पिता और बड़े भाई पुराने ख्याल के थे। सोचती थी, ब्याह के बाद सही। उन चीजों के लिये कन्हैया से कहती। लाजो के कहने का ढंग कुछ ऐसा था कि कन्हैया का दिल इनकार करने को न करता, पर इस ख्याल से कि वह बहुत सरकश न हो जाये, दो बात मानकर तीसरी पर इनकार भी कर देता। लाजो मुँह फुला लेती। लाजो मुँह फुलाती तो सोचती कि मनायेंगे तो मान जाऊँगी, आखिर तो मनायेंगे ही। पर कन्हैया मनाने की अपेक्षा डाँट ही देता। एक-आध बार उसने थप्पड़ भी चला दिया। मनौती की प्रतीक्षा में जब थप्पड़ पड़ जाता तो दिल कटकर रह जाता और लाजो अकेले में फूट-फूटकर रोती। फिर उसने सोच लिया- ' चलो, किस्मत में यही है तो क्या हो सकता है?' वह हार मानकर खुद ही बोल पड़ती।

कन्हैया का हाथ पहली दो बार तो क्रोध की बेबसी में ही चला था, जब चल गया तो उसे अपने अधिकार और शक्ति का अनुभव होने लगा। अपनी शक्ति अनुभव करने के नशे से बड़ा नशा दूसरा कौन होगा ? इस नशे में राजा देश-पर-देश समेटते जाते थे, जमींदार गाँव-पर-गाँव और सेठ मिल और बैंक खरीदते चले जाते हैं। इस नशे की सीमा नहीं। यह चस्का पड़ा तो कन्हैया के हाथ उतना क्रोध आने की प्रतीक्षा किये बिना भी चल जाते।

मार से लाजो को शारीरिक पीड़ा तो होती ही थी, पर उससे अधिक होती थी अपमान की पीड़ा। ऐसा होने पर वह कई दिनों के लिये उदास हो जाती। घर का सब काम करती। बुलाने पर उत्तर भी दे देती। इच्छा न होने पर भी कन्हैया की इच्छा का विरोध न करती, पर मन-ही-मन सोचती रहती,इससे तो अच्छा है मर जाऊँ। और फिर समय पीड़ा को कम कर देता। जीवन था तो हँसने और खुश होने की इच्छा भी फूट ही पड़ती और लाजो हँसने लगती। सोच यह लिया था, ' मेरा पति है, जैसा भी है मेरे लिये तो यही सब कुछ है। जैसे यह चाहता है, वैसे ही मैं चलूँ।' लाजो के सब तरह अधीन हो जाने पर भी कन्हैया की तेजी बढ़ती ही जा रही थी। वह जितनी अधिक बेपरवाही और स्वच्छन्दता लाजो के प्रति दिखा सकता, अपने मन में उसे उतना ही अधिक अपनी समझने और प्यार का संतोष पाता।

क्वार के अन्त में पड़ोस की स्त्रियाँ करवा चौथ के व्रत की बात करने लगीं। एक-दूसरे को बता रही थीं कि उनके मायके से करवे में क्या आया। पहले बरस लाजो का भाई आकर करवा दे गया था। इस बरस भी वह प्रतीक्षा में थी। जिनके मायके शहर से दूर थे, उनके यहाँ मायके से रुपये आ गए थे। कन्हैया अपनी चिठ्ठी-पत्री दफ्तर के पते से ही मँगाता था। दफ्तर से आकर उसने बताया, ' तुम्हारे भाई ने करवे के दो रुपये भेजे हैं।'

करवे के रुपये आ जाने से ही लाजो को संतोष हो गया। सोचा, भैया इतनी दूर कैसे आते? कन्हैया दफ्तर जा रहा था तो उसने अभिमान से गर्दन कन्धे पर टेढ़ी कर और लाड़ के स्वर में याद दिलाया- ' हमारे लिए सरघी में क्या-क्या लाओगे...?'

और लाजो ने ऐसे अवसर पर लाई जाने वाली चीजें याद दिला दीं। लाजो पड़ोस में कह आई कि उसने भी सरघी का सामान मँगाया है। करवा चौथ का व्रत भला कौन हिन्दू स्त्री नहीं करती? जनम-जनम यही पति मिले, इसलिए दूसरे व्रतों की परवाह न करने वाली पढ़ी-लिखी स्त्रियां भी इस व्रत की उपेक्षा नहीं कर सकतीं।

अवसर की बात, उस दिन कन्हैया लंच की छुट्टी में साथियों के साथ कुछ ऐसे काबू में आ गया कि सवा तीन रुपये खर्च हो गये। वह लाजो का बताया सरघी का सामान घर नहीं ला सका। कन्हैया खाली हाथ घर लौटा तो लाजो का मन बुझ गया। उसने गम खाना सीखकर रूठना छोड़ दिया था, परन्तु उस साँझ मुँह लटक ही गया। आँसू पोंछ लिए और बिना बोले चौके-बर्तन के काम में लग गयी। रात के भोजन के समय कन्हैया ने देखा कि लाजो मुँह सुजाये है, बोल नहीं रही है, तो अपनी भूल कबूल कर उसे मनाने या कोई और प्रबंध करने का आश्वासन देने के बजाय उसने उसे डाँट दिया।

लाजो का मन और भी बिंध गया। कुछ ऐसा खयाल आने लगा-इन्ही के लिए तो व्रत कर रही हूँ और यही ऐसी रुखाई दिखा रहे हैं। ... मैं व्रत कर रही हूँ कि अगले जनम में भी 'इन' से ही ब्याह हो और मैं सुहा ही नहीं रही हूँ...। अपनी उपेक्षा और निरादर से भी रोना आ गया। कुछ खाते न बना। ऐसे ही सो गयी।

तड़के पड़ोस में रोज की अपेक्षा जल्दी ही बर्तन भांडे खटकने की आवाज आने लगी। लाजो को याद आने लगा-शान्ति बता रही थी कि उसके बाबू सरघी के लिये फेनियाँ लाये हैं, तार वाले बाबू की घरवाली ने बताया था कि खोए की मिठाई लाये हैं। लाजो ने सोचा, उन मर्दों को खयाल है न कि हमारी बहू हमारे लिये व्रत कर रही है; इन्हें जरा भी खयाल नहीं।

लाजो का मन इतना खिन्न हो गया कि सरघी में उसने कुछ भी न खाया। न खाने पर भी पति के नाम का व्रत कैसे न रखती। सुबह-सुबह पड़ोस की स्त्रियों के साथ उसने भी करवे का व्रत करने वाली रानी और करवे का व्रत करने वाली राजा की प्रेयसी दासी की कथा सुनने और व्रत के दूसरे उपचार निबाहे। खाना बनाकर कन्हैयालाल को दफ्तर जाने के समय खिला दिया। कन्हैया ने दफ्तर जाते समय देखा कि लाजो मुँह सुजाए है। उसने फिर डांटा- ' मालूम होता है कि दो-चार खाये बिना तुम सीधी नहीं होगी।'

लाजो को और भी रुलाई आ गयी। कन्हैया दफ्तर चला गया तो वह अकेली बैठी कुछ देर रोती रही। क्या जुल्म है। इन्ही के लिये व्रत कर रही हूँ और इन्हें गुस्सा ही आ रहा है। ...जनम-जनम ये ही मिलें इसीलिये मैं भूखी मर रही हूँ। ...बड़ा सुख मिल रहा है न!...अगले जनम में और बड़ा सुख देंगे!...ये ही जनम निबाहना मुश्किल हे रहा है। ...इस जनम में तो इस मुसीबत से मर जाना अच्छा लगता है, दूसरे जनम के लिये वही मुसीबत पक्की कर रही हूँ...।

लाजो पिछली रात भूखी थी, बल्कि पिछली दोपहर के पहले का ही खाया हुआ था। भूख के मारे कुड़मुड़ा रही थी और उसपर पति का निर्दयी व्यवहार। जनम-जनम, कितने जनम तक उसे ऐसा ही व्यवहार सहना पड़ेगा! सोचकर लाजो का मन डूबने लगा। सिर में दर्द होने लगा तो वह धोती के आँचल सिर बाँधकर खाट पर लेटने लगी तो झिझक गई-करवे के दिन बान पर नहीं लेटा या बैठा जाता। वह दीवार के साथ फर्श पर ही लेट रही।

लाजो को पड़ोसिनों की पुकार सुनाई दी। वे उसे बुलाने आई थीं। करवा-चौथ का व्रत होने के कारण सभी स्त्रियाँ उपवास करके भी प्रसन्न थीं। आज करवे के कारण नित्य की तरह दोपहर के समय सीने-पिरोने, काढ़ने-बुनने का काम किया नहीं जा सकता था; करवे के दिन सुई, सलाई, और चरखा छुआ नहीं जाता। काज से छुट्टी थी और विनोद के लिए ताश या जुए की बैठक जमाने का उपक्रम हो रहा था। वे लाजो को भी उसी के लिये बुलाने आयी थीं। सिर-दर्द और मन के दुःख के करण लाजो जा नहीं सकी। सिर-दर्द और बदन टूटने की बात कहकर वह टाल गयी और फिर सोचने लगी-ये सब तो सुबह सरघी खाये हुये हैं। जान तो मेरी ही निकव रही है।...फिर अपने दुःखी जीवन के कारण मर जाने का खयाल आयाऔर कल्पना करने लगी कि करवा-चौथ के दिन उपवास किये-किये मर जाये, तो इस पुण्य से जरूर ही यही पति अगले जन्म में मिले...।

लाजो की कल्पना बावली हो उठी। वह सोचने लगी-मैं मर जाऊँ तो इनका क्या है, और ब्याह कर लेंगे। जो आएगी वह भी करवाचौथ का व्रत करेगी। अगले जनम में दोनों का इन्हीं से ब्याह होगा, हम सौतें बनेंगी। सौत का खयाल उसे और भी बुरा लगा। फिर अपने-आप समाधान हो गया-नहीं, पहले मुझसे ब्याह होगा, मैं मर जाऊँगी तो दूसरी से होगा। अपने उपवास के इतने भयंकर परिणाम की चिंता से मन अधीर हो उठा। भूख अलग व्याकुल किये थी। उसने सोचा-क्यों मैं अपना अगला जनम भी बरबाद करूँ? भूख के कारण शरीर निढाल होने पर भी खाने को मन नहीं हो रहा था, परन्तु उपवास के परिणाम की कल्पना से मन मन क्रोध से जल उठा; वह उठ खड़ी हुई।

कन्हैयालाल के लिये उसने सुबह जो खाना बनाया था उसमें से बची दो रोटियाँ कटोरदान में पड़ी थीं। लाजो उठी और उपवास के फल से बचने के लिये उसने मन को वश में कर एक रोटी रूखी ही खा ली और एक गिलास पानी पीकर फिर लेट गई। मन बहुत खिन्न था। कभी सोचती-ठीक ही तो किया, अपना अगला जनम क्यों बरबाद करूँ? ऐसे पड़े-पड़े झपकी आ गई।

कमरे के किवाड़ पर धम-धम सुनकर लाजो ने देखा, रोशनदान से प्रकाश की जगह अन्धकार भीतर आ रहा था। समझ गई, दफ्तर से लौटे हैं। उसने किवाड़ खोले और चुपचाप एक ओर हट गई।

कन्हैयालाल ने क्रोध से उसकी तरफ देखा-' अभी तक पारा नहीं उतरा! मालूम होता है झाड़े बिना नहीं उतरेगा !'

लाजो के दुखे हुये दिल पर और चोट पड़ी और पीड़ा क्रोध में बदल गई। कुछ उत्तर न दे वह घूमकर फिर दीवार के सहारे फर्श पर बैठ गई।

कन्हैयालाल का गुस्सा भी उबल पड़ा- ' यह अकड़ है! ...आज तुझे ठीक कर ही दूँ।' उसने कहा और लाजो को बाँह से पकड़, खींचकर गिराते हुये दो थप्पड़ पूरे हाथ के जोर से ताबड़तोड़ जड़ दिये और हाँफते हुये लात उटाकर कहा, ' और मिजाज दिखा?... खड़ी हो सीधी।'

लाजो का क्रोध भी सीमा पार कर चुका था। खींची जाने पर भी फर्श से उठी नहीं। और मार खाने के लिये तैयार हो उसने चिल्लाकर कहा,' मार ले,मार ले! जान से मार डाल! पीछा छूटे! आज ही तो मारेगा! मैने कौन व्रत रखा है तेरे लिये जो जनम-जनम मार खाऊंगी। मार, मार डाल...!'

कन्हैयालाल का लात मारने के लिये उठा पाँव अधर में ही रुक गया। लाजो का हाथ उसके हाथ से छूट गया। वह स्तब्ध रह गया। मुँह में आई गाली भी मुँह में ही रह गई। ऐसे जान पड़ा कि अँधेरे में कुत्ते के धोखे जिस जानवर को मार बैठा था उसकी गुर्राहट से जाना कि वह शेर था; या लाजो को डाँट और मार सकने का अधिकार एक भ्रम ही था। कुछ क्षण वह हाँफता हुआ खड़ा सोचता रहा और फिर खाट पर बैठकर चिन्ता में डूब गया। लाजो फर्श पर पड़ी रो रही थी। उस ओर देखने का साहस कन्हैयालाल को न हो रहा था। वह उठा और बाहर चला गया।

लाजो पर्श पर पड़ी फूट-फूटकर रोती रही। जब घंटे-भर रो चुकी तो उठी। चूल्हा जलाकर कम-से-कम कन्हैया के लिए खाना तो बनाना ही था। बड़े बेमन उसने खाना बनाया। बना चुकी तब भी कन्हैयालाल लौटा नहीं था। लाजो ने खाना ढँक दिया और कमरे के किवाड़ उड़काकर फिर फर्श पर लेट गई। यही सोच रही थी, क्या मुसीबत है जिन्दगी। यही झेलना था तो पैदा ही क्यों हुई थी?...मैने क्या किया था जो मारने लगे।

किवाड़ों के खुलने का शब्द सुनाई दिया। वह उठने के लिये आँसुओं से भीगे चेहरे को आँचल से पोंछने लगी। कन्हैयालाल ने आते ही एक नजर उसकी ओर डाली। उसे पुकारे बिना ही वह दीवार के साथ बिछी चटाई पर चुपचाप बैट गया।

कन्हैयालाल का ऐसे चुप बैठ जाना नई बात थी, पर लाजो गुस्से में कुछ न बोल रसोई में चली गई। आसन डाल थाली-कटोरी रख खाना परोस दिया और लोटे में पानी लेकर हाथ धुलाने के लिए खड़ी थी। जब पाँच मिनट हो गये और कन्हैयालाल नहीं आया तो उसे पुकारना ही पड़ा, ' खाना परस दिया है।'

कन्हैयालाल आया तो हाथ नल से धोकर झाड़ते हुये भीतर आया। अबतक हाथ धुलाने के लिए लाजो ही उठकर पानी देती थी। कन्हैयालाल दो ही रोटी खाकर उठ गया। लाजो और देने लगी तो उसने कह दिया ' और नहीं चाहिये।' कन्हैयालाल खाकर उठा तो रोज की तरह हाथ धुलाने के लिये न कहकर नल की ओर चला गया।

लाजो मन मारकर स्वयं खाने बैठी तो देखा कि कद्दू की तरकारी बिलकुल कड़वी हो रही थी। मन की अवस्था ठीक न होने से हल्दी-नमक दो बार पड़ गया था। बड़ी लज्जा अनुभव हुई, ' हाय, इन्होंने कुछ कहा भी नहीं। यह तो जरा कम-ज्यादा हो जाने पर डाँट देते थे।'

लाजो से दुःख में खाया नहीं गया। यों ही कुल्ला कर, हाथ धोकर इधर आई कि बिस्तर ठीक कर दे, चौका फिर समेट देगी। देखा तो कन्हैयालाल स्वयं ही बिस्तर झाड़कर बिछा रहा था। लाजो जिस दिन से इस घर में आई थी ऐसा कभी नहीं हुआ था।

लाजो ने शरमाकर कहा, ' मैं आ गई, रहने दो। किये देती हूँ।' और पति के हाथ से दरी चादर पकड़ ली। लाजो बिस्तर ठीक करने लगी तो कन्हैयालाल दूसरी ओर से मदद करता रहा। फिर लाजो को सम्बोधित किया, ' तुमने कुछ खाया नहीं। कद्दू में नमक ज्यादा हो गया है। सुबह और पिछली रात भी तुमने कुछ नहीं खाया था। ठहरो, मैं तुम्हारे लिये दूध ले आता हूँ।'

लाजो के प्रति इतनी चिन्ता कन्हैयालाल ने कभी नहीं दिखाई थी। जरूरत भी नहीं समझी थी। लाजो को उसने 'चीज' समझा था। आज वह ऐसे बात कर रहा था जैसे लाजो भी इन्सान हो; उसका भी खयाल किया जाना चाहिये। लाजो को शर्म तो आ ही रही थी पर अच्छा भी लग रहा था। उसी रात से कन्हैयालाल के व्यवहार में एक नरमी-सी आ गई। कड़े बोल की तो बात क्या, बल्कि एक झिझक-सी हर बात में; जैसे लाजो के किसी बात के बुरा मान जाने की या नाराज हो जाने की आशंका हो। कोई काम अधूरा देखता तो स्वयं करने लगता। लाजो को मलेरिया बुखार आ गया तो उसने उसे चौके के समीप नहीं जाने दिया। बर्तन भी खुद साफ कर लिये। कई दिन तो लाजो को बड़ी उलझन और शर्म महसूस हुई, पर फिर पति पर और अधिक प्यार आने लगा। जहाँ तक बन पड़ता घर का काम उसे नहीं करने देती, 'यह काम करते मर्द अच्छे नहीं लगते...।'

उन लोगों का जीवन कुछ दूसरी ही तरह का हो गया। लाजो खाने के लिये पुकारती तो कन्हैया जिद करता, ' तुम सब बना लो, फिर एक साथ बैठकर खायेंगे।' कन्हैया पहले कोई पत्रिका या पुष्तक लाता था तो अकेला मन-ही-मन पढ़ा करता था। अब लाजो को सुनाकर पढ़ता या खुद सुन लेता। यह भी पूछ लेता, ' तुम्हे नींद तो नहीं आ रही ? '

साल बीतते मालूम न हुआ। फिर करवाचौथ का व्रत आ गया। जाने क्यों लाजो के भाई का मनीआर्डर करवे के लिये न पहुँचा था। करवाचौथ के पहले दिन कन्हैयालाल दफ्तर जा रहा था। लाजो ने खिन्नता और लज्जा से कहा, ' भैया करवा भेजना शायद भूल गये।'

कन्हैयालाल ने सांत्वना के स्वर में कहा,' तो क्या हुआ? उन्होंने जरूर भेजा होगा। डाकखाने वालों का हाल आजकल बुरा है। शायद आज आ जाये या और दो दिन बाद आये। डाकखाने वाले आजकल मनीआर्डर के पन्द्रह-पन्द्रह दिन लगा देते हैं। तुम व्रत-उपवास के झगड़े में मत पड़ना। तबियत खराब हो जाती है। यों कुछ मंगाना ही है तो बता दो, लेते आयेंगे, पर व्रत-उपवास से होता क्या है ? ' सब ढकोसले हैं।'

'वाह, यह कैसे हो सकता है! हम तो जरूर रखेंगे व्रत। भैया ने करवा नहीं भेजा न सही। बात तो व्रत की है, करवे की थोड़े ही।' लाजो ने बेपरवाही से कहा।

सन्ध्या-समय कन्हैयालाल आया तो रूमाल में बँधी छोटी गाँठ लाजो को थमाकर बोला, ' लो, फेनी तो मैं ले आया हूँ, पर ब्रत-व्रत के झगड़े में नहीं पड़ना।' लाजो ने मुस्कुराकर रूमाल लेकर आलमारी में रख दिया।

अगले दिन लाजो ने समय पर खाना तैयार कर कन्हैया को रसोई से पुकारा, ' आओ, खाना परस दिया है।' कन्हैया ने जाकर देखा, खाना एक ही आदमी के लिये परोसा था- ' और तुम?' उसने लाजो की ओर देखा।

' वाह, मेरा तो व्रत है! सुबह सरघी भी खा ली। तुम अभी सो ही रहे थे।' लाजो ने मुस्कराकर प्यार से बताया।

' यह बात...! तो हमारा भी ब्रत रहा।' आसन से उठते हुये कन्हैयालाल ने कहा।

लाजो ने पति का हाथ पकड़कर रोकते हुये समझाया, ' क्या पागल हो, कहीं मर्द भी करवाचौथ का व्रत रखते हैं!...तुमने सरघी कहाँ खाई?'

'नहीं, नहीं, यह कैसे हो सकता है ।' कन्हैया नहीं माना,' तुम्हें अगले जनम में मेरी जरूरत है तो क्या मुझे तुम्हारी नहीं है? या तुम भी व्रत न रखो आज!'

लाजो पति की ओर कातर आँखों से देखती हार मान गई। पति के उपासे दफ्तर जाने पर उसका हृदय गर्व से फूला नहीं समा रहा था।

इस कुत्ता समय में मन



जयप्रकाश त्रिपाठी

मन एक
मन घिन से भर जाता है, आंखें आंसुओं से। कभी-कभी। किसी-किसी समय में अक्सर। गुस्से बगूलों में छा लेते हैं। हंसी ठूंठ हो जाती है। अंदर कुछ तेजी से टूटता है। तिलमिला उठता है। निःस्वर। जैसे अर्थवान कुछ भी न हो। एकदम जाना-पहचाना-सा भी। कविता, मनुष्य, संभावनाएं, सांसें आद‌ि। परिदृश्य में तिलचट्टों, छिपकलियों के झुंड। आर्त कोलाहल। अपनेआप पिस रहा है। समय। गिलहरी, खरगोश, तोते और बिल्लियां खूब रिझाती हैं। गाय-भैंस कुत्ते तो रोज-रोज के। कोई आदमी सोच रहा है, मानो बादल घिर जाने के बाद छिप कर बारिश की तान सुनना सीधा सा काम है। मन का अंधेरा भी पूरब की ओर से घिरा आता है। सुबह-सुबह...

मन दो
मन के किसी सिरे से किलकारियां फूट रही हैं तो शिशुवत होगा अंदर कुछ-न-कुछ। अनबोले आंसुओं की तरह। गुस्साए बगूलों में। गांव-शहर पर लिखी गयीं किताबों के छोटे-छोटे वाक्यों की तरह। फूल हैं। नदी है। ग्लेश्यिरों पर गिरती ताजा-तिरछी किरणें भी। लेक‌िन अपने-अपने अंदर की अजनबीयत का क्या करे कोई। क्या कर सकता है! पीपल की पत्तियों से तेज नाचती हैं मक्खियां और भौकते हैं कुत्ते। देर रातों के सन्नाटें में। मक्खियां अंधेरे में नजर नहीं आती हैं। रोजाना सुबह होने तक। बासी दौड़ को कहते हैं कि मॉ‌र्निंग वॉक से धौकने लगता है मन। आंसू आते भी हैं तो हंसी-खुशी के। लोमड़ी-सुख के ल‌िए। जीवन भर की सलामती मयस्सर होने की इतनी सारी बेचैनियां भोर के सीने पर। बूढ़ी कुतिया उंकड़ू पड़ी है पान वाली दुकान से सटी सड़क के आधे होंठ पर। मैंने भी थूका है वहां कई बार.....

मन तीन
पी लेने के बाद, ओस, पानी, शराब। कुछ भी। उल्थी दिशाओं और रिश्तों के ढूह पर टपकतीं स्मृतियां सुस्ताना चाहती हैं। पीपल की पत्त‌ियों के तने जिस तरह नन्हे-नन्हे झोकों से मुड़-तुड़ लेते हैं। फुनगियां लरज जाती हैं। मन अपना लगने लगता है। और उसी क्षण कोई खंगालने-टकटोरने के ल‌िए उद्धत हो जाता है। सांप भी उतना तेज नहीं फुंफकारता है। फिर अकेला हो जाता हूं। दीवारों के पीछे किसी पड़ोसी का बच्चा टॉफी के ल‌िए जोर-जोर से रो रहा है। श्रीकांत मिस्त्री आज कल उत्तराखंड के दर्द पर कोई क‌िताब लिख रहे हैं। क‌िसी बड़े प्रकाशक से बातचीत हो चुकी है। फिर फरवरी में लग सकता है विश्व पुस्तक मेला। और इसील‌िए मोदी भी। पता है, पता है 2014 का चुनाव। काली-काली फेन-फुत्कारें......

मन चार
अभिज्ञान शाकुंतलम् पढ़ते समय नल-दमयंती की मुद्रा में दो-चार श्लोक अनायास कंठस्थ हो जाते हैं। जैसे गांव का बिरहा, कजरी, धोबीगीत आद‌ि। कव्वाली नहीं। उचाट मन को तद्भव लगता है। गंदी-गंदी डकार आती है। किसी को भी। ऊपर से कुमार संभव बातें शिव के सत्य से घसीट कर फेक देती हैं। फच्च्। अब बरसातों में मेढक पहले की तरह नहीं टर्राते हैं। और झींगुर भी। मछलियां निरछल होती हैं। बाहर जैसी। कपटी बगुले तटों पर तिरते रहते हैं। सांप-बिच्छू पर लिखे गये सत्यम्-शिवम्-सुंदरम् के गीत पढ़ते-पढ़ते मछलियां सो जाती हैं सतह पर और मेघ खाली हो जाते हैं तब तक। आसपास के पेड़ों पर दुबके पंछियों के झुंड अब सुबह होने के बाद ही चहचहाएंगे। तब तक आती रहती है नींद......

मन पांच
नानी की कहावतें और नाना के भजन न सुनते-भजते हुए एक दिन दोपहर को मौसम जिरह करता है चीख-चीख कर कि किसका सत्य, कितना है। यानी कितना-कितना है! कि नहीं है! शून्य-भर भी। ऐसा तो नहीं होना चाह‌िए। न‌िरर्थक शब्दों और चर्चाओं की तरह। गर्हित संबंधों और अविश्वसनीय अंध आस्था की धुन में। ढोया जा सकता है किसी को भी। मन पर नहीं। चित्त प्रसन्न होना चाहिए। नींद आने से पहले आंखों के आसपास कभी-कभी इतने तरह के सपने मंडराने लगते हैं कि बस, पूछिए मत। नानी को सुनते-सुनते नीद आ जाती थी बचपन में। नाना आजाद हिंद फौज में रहे थे तो बुढ़ापे की बिना पर न तब कुछ रहा था उनके पास, न अंतिम समय रहते देखा है उनके साथ। कहते थे, रंगून में जापानी बम बरसते समय एक टांग खाईं के ऊपर उठी रह गयी थी। धुंआ-सुंआ में जैसे कि राम-रावण युद्ध होता रहा होगा कभी। बमबारी खत्म होने के बाद मुर्दों के कपड़े लूट लाये थे। सुभाषचंद बोस को कहां पता रहा होगा। नाना को कभी डर नहीं लगता था। नानी डरती क्यों थी नाना से। मैं भी.......

मन छह
ठेके के सामने दूसरी ओर की फुटपाथ पर उस दिन एटीएम के सामने कतार में मैं भी खड़ा था। अपनी बारी दूर थी आधा घंटा। नजर गयी एक रिक्शे वाले पर। अक्सर चली जाती है उस पर इधर से आते-जाते। उसका एक हाथ पिछले साल हादसे में कंधे से अलग हो गया था। एक हाथ से चलाता है रिक्शा। धीरे-धीरे। कटे कूल्हे पर गमछा डाले रहता है। यहां अक्सर यूं ही नजर नहीं आता। घूंट-घूंट बस होने के लिए। ऐसे में मन करता है क्षण भर के ल‌िए, पलक झपकते कि आइए इलिट क्लास हो लेते हैं, उड़ आते हैं कहीं, एयर बस से, सिर्फ वह वाला मिनरल वाटर पीने के लिए। ये तो पीता रहेगा यहां आए दिन। और इसके जैसे। खरामा-खरामा खींचता होगा रोजाना। रिक्शा। एक-दो गटक में पूरी कमाई उड़ेल लेना अंदर। इतना विषाक्त मन। अब और किस तरह से जिया जा सकता है ऐसे में। सबके हिस्से की घुटन को......

मन सात
पूरा हनुमान चालीसा याद था। एक-एक दोहा-चौपाई आद्योपांत। महुआबारी पड़ती थी रास्ते में। बड़हल बाजार से पहले। डर से उमसने लगता था गुजरते हुए वहां से। जय हनुमान ज्ञान गुन सागर.....उस दिन जोर-जोर से बारिश हो रही थी। हवा भी चल रही थी। सावन था। तीन-चार साल का रहा होऊंगा मैं। नाना दरवाजे के छप्पर में अपनी बूढ़ी खटिया पर गोद में मुझे भी दुबकाये हुए थे। अपने झिनड्डे गमछे के पीछे। पीठ सहला रहे थे धीरे-धीरे मेरी। मैं सिमटा हुआ था उनमें। उनकी दाढ़ी सहलाते हुए। कभी उनके हाथ के काले-सफेद बालों पर हाथ फेर कर। उन्हें भी अच्छा लगता था। पूछा मैंने- हनुमानजी अब कहां रहते हैं। भूतों से डर लगता है। नाना को रामायण की कहानियां सुनाने में खूब आनंद आता था। हंसते हुए बोले- न्यारी महिमा वाले रामजी के संग होंगे। और जाएंगे भी कहां। दास हैं उनके। तो मैंने पूछा- आकर महुबारी के भूतों को मार क्यों नहीं डालते! नानी दालान में सब सुन रही थी। चुपचाप। बाहर निकल आई छप्पर के उधर से भीगती हुई। मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोली- बारिश बंद हो जाती है तो चल मेरे साथ डिह बाबा के थान पर। बुदबुदाती हुई कि कोई सपना देख लिया होगा मैंने डरावना सा। अब रोज देखता हूं। न नानी है, न डीह का थान यहां। अब। इस कुत्ता समय में.........

Friday, 26 July 2013

ताकि बचा रहे लोकतन्त्र / रवीन्द्र प्रभात


छुआछूत पर आधारित एक दलित युवक की कहानी

चित्र:Cover TBRL full.jpg

रवीन्द्र प्रभात के उपन्यास 'ताकि बचा रहे लोकतन्त्र' के कथानक के केंद्र में आधुनिक दलित विमर्श है । इसमें एक ऐसे दलित युवक "झींगना" की कहानी है जो उच्च जाति के लोगों से सताये जाने के बावजूद समाज मे एक सम्मानित स्थान के बावजूद आत्मसम्मान प्राप्त करने में सफल होता है और अपनी बिरादरी को गर्व से जीने की राह दिखाता है। इस उपन्यास को पढ़ते हुए पाठक उस दर्द को महसूस करता है जो सदियों से हाशिये पर रहे लोगों ने जिया है। नैतिकता और आदर्शवाद को आधार बना कर दलित संघर्ष की अनुशंसा करता यह उपन्यास जातिवाद, छुआछूत की समस्या और समाधान के प्रति गंभीर चिंतन है। उपन्यास में लोक रंग की मुग्धकारी छटा कथ्य को बोझिल होने से बचाती है। उपन्यास के तीनों मुख्य पात्र झिंगना, सुरसतिया और ताहिरा दृढ और सुलझे विचारों से युक्त नैतिक मानदंडों पर खरे उतरते हैं और समाज में आदर्शवाद की परिकल्पना में अपनी अहम भूमिका निभाने में सफल होते है।
लेखक हिन्दी के कवि, लेखक,व्यंग्यकार, कथाकार और न्यू मीडिया विशेषज्ञ हैं। ये व्यंग्य के एक नियमित स्तंभकार भी हैं। यह इनका पहला उपन्यास है।
कहानी कुछ इस तरह है.........
उत्तर बिहार के भवदेपुर गाँव का झिंगना नामक दलित युवक इस उपन्यास का मुख्य पात्र है । झिंगना की माँ जनकिया उसे बहुत पढाना चाहती थी . मैट्रिक तक पढने के बाद झिंगना एक स्कूल में सरकारी नौकरी करता है मगर एक दिन काम में चूक होने पर हेडमास्टर का ताना कि तुम कोटे वाले हो , सुनकर नौकरी को छोड़ आता है और उस दिन से ही सामाजिक न्याय के लिए उसकी लडाई आरम्भ हो जाती है । वह मैला ढ़ोने का काम भी कर लेता है मगर उसकी सुसंस्कृत स्वाभिमानी पत्नी सुरसतिया उसे इस काम के लिए मना करती है और उसकी बात मान वह एक मुर्दाघर में काम करने का अपना परंपरागत पेशा अपना लेता है । छूआ छूत , अस्पृश्यता इन दोनों को ही बहुत क्षुब्ध करती है . गाँव के बड़े नेता धरिछन पाण्डेय से उसकी अनबन हो जाती है ।
चमनलाल की नाटक मंडली के कलाकार की असामयिक मृत्यु झिंगना के जीवन में बड़ा परिवर्तन लाती है । चमनलाल झिंगना को दिवंगत कलाकार का रोंल अदा करने के लिए कहता है । सीतामढ़ी के जानकी मंदिर में होने वाले कार्यक्रम में खेले जाने वाले नाटक में झिंगना महाकवि मुंहफट साहब का रोंल निभाता है । सभी उसके अभिनय से प्रभावित होते हैं , मगर झिंगना का दुर्भाग्य कि उसके दूसरे भाग के मंचन से पहले ही पंडाल में जोरदार धमाका होता है। कई लोंग मारे जाते हैं , चीख- पुकार , भागमभाग के बीच दिलावर के पास रोते सकपकाए झिंगना को धमाके और दिलावर की हत्या का आरोपी मानती पुलिस पकड़ कर ले जाती है । वास्तव में यह झिंगना को सबक सिखाने के लिए धरिछन पाण्डेय द्वारा रचा गया षड़यंत्र है . जेल में हैरान, परेशान झिंगना हिन्दू – मुस्लिम दंगों की असलियत जानते हुए कुछ ना कर पाने की विवशता से छटपटाता है। सुरसतिया जेल में खाने के साथ नेताजी का पैगाम लेकर झिंगना से मिलती है । नेताजी का कहना हैं कि यदि झिंगना इस विपदा से उबरना चाहता है तो उसे गाँव छोड़ कर जाना होगा , क्योंकि वे झिंगना के सपने और सामाजिक सरोकार की प्रतिबद्धता से आतंकित है । झिंगना पलायन को कमजोरी मानकर आनाकानी करता है और गाँव में रहकर अपने संघर्ष को जारी रखना चाहता है मगर सुरसतिया पेट में पल रहे अपने बच्चे का वास्ता देकर उसे गाँव छोड़ने के लिए राजी कर लेती है ।
ट्रेन की बेटिकट यात्रा उसके भावी जीवन का सबसे महत्वपूर्ण ट्विस्ट बन जाती है । टी टी द्वारा टिकट मांगने पर झिंगना टिकट नहीं होने की बात करता है ,उसी अरक्षित डब्बे में अपने पिता सिकंदर के साथ सफर कर रही मशहूर शायरा और शास्त्रीय गायिका ताहिरा उसकी मदद करती है । ट्रेन में बैठा झिंगना अपनी लोकधुन में गीत गुनगुनाता है . उसकी मधुर तान से मुग्ध ताहिरा अपने साथ लखनऊ ले जाती है। ताहिरा का परिवार गंगा -जमुनी संस्कृति की पहचान है . ताहिरा के पिता सिकंदर मुस्लिम है तो माँ बनारस के हिन्दू ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखती हैं . हिन्दू माँ के संस्कार और पिता के आदर्श एक साथ ताहिरा में मिल कर उसे एक शानदार व्यक्तित्व बना देते हैं . ताहिरा उर्दू , फारसी , हिंदी और संस्कृत की जानकार है । ” अनुप्रास हुआ मन मंदिर मन हुआ कबीर तन औचक बिंदास हुआ ” गीत गाते हुए ताहिरा और झिंगना की साझा संगीत यात्रा प्रारंभ होती है और झिंगना के जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय प्रारंभ हो जाता है ।
झिंगना के साथ काम करते हुए उसकी मासूमियत और सरल स्वभाव ताहिरा को बहुत प्रभावित करता है और वह मन ही मन उससे प्रेम करने लगती है । झिंगना और ताहिरा की काव्य नाटिका ” बेटिकट सफ़र ” ना सिर्फ आकशवाणी और दूरदर्शन पर धूम मचाती है , बल्कि कई शहरों में इनका सफल मंचीय आयोजन भी किया जाता है और झिंगना एक राष्ट्रीय कलाकार के रूप में प्रसिद्ध हो जाता है । झिंगना अपने कार्यक्रमों और नाटकों में कई प्रयोग करता है । उर्दू और फारसी शब्दों से सजी अनूठी रामलीला उसकी मौलिक प्रतिभा की परिचायक बन जाती है । कामयाबी उसके कदम चूम रही है । लोकगायन के साथ नाट्य निर्देशक के रूप में उसके नाम की देश भर में धूम मच जाती है । नाट्य के प्रति अपने समर्पण के कारण झिंगना फिल्मों में काम करने के प्रस्ताव को भी ठुकरा देता है । ताहिरा के साथ मिल कर वह ” अन्तरंग ” नाट्य मंच की स्थापना करता है जो प्रतिभाशाली नाट्य कलाकारों को तलाशने के साथ उन्हें निखारने का कार्य भी करता है । ताहिरा उसके लिए नाटक लिखती है, वही खलील , रईस , अंगद , कमोलिका आदि कलाकार कार्यक्रमों के सुचारू रूप से सञ्चालन में उनकी मदद करते हैं . झिंगना इस बात को लेकर प्रतिबद्ध है कि उसके नाटकों में कही भी साम्प्रदायिकता की झलक ना आये ।
लखनऊ महोत्सव में दूरदर्शन पर होने वाले कार्यक्रम में वर्ष के सर्वश्रेष्ठ रंगकर्मी के रूप में राष्ट्रपति के हाथों सम्मान ग्रहण करते देख उसके ग्राम वासियों के साथ सुरसतिया भी भावविभोर हो जाती है .पूरे दो वर्षों के बाद वह अपने पति का दूरदर्शन पर ही दर्शन करती है . झिंगना भी अपनी पत्नी सुरसतिया और बच्चे की कमी को महसूस करता है ।
राज्यपाल द्वारा सम्मानित किये जाने के कार्यक्रम में झिंगना “उत्थान संकल्प मठ ” नमक ट्रस्ट की स्थापना तथा उसमे अपनी कमाई का 50 प्रतिशत ट्रस्ट में देने की घोषणा करता है।
ताहिरा का झिंगना के प्रति प्रेम बढ़ता ही जाता है , मगर वह इसका इज़हार नहीं करती ,अपनी डायरी में अपनी भावनाओं को व्यक्त करती है । अचानक एक दिन झिंगना की नजर ताहिरा की डायरी पर पड़ जाती है । वह ताहिरा की स्वयं के प्रति आसक्ति देख परेशान हो जाता है और अपने गाँव लौटने का फैसला करता है ।
झिंगना धर्मग्रंथों से जाति वाले पन्ने निकाल देने और तथाकथित मनुवादियों के पाखंड के खिलाफ हरिजन आन्दोलन के माध्यम से अपनी आवाज़ बुलंद करता है । उधर गाँव में धरिछन पाण्डेय झिगना के लौट कर आने की खबर से परेशान है क्योंकि अब झिंगना पहले जैसा कमजोर नहीं रहा । अब वह कुर्बान पर सुरसतिया के सूअर को मार कर गाँव में झिंगना और उसके परिवार को सांप्रदायिक दंगे भड़काने का कुसूरवार ठहराने का षड़यंत्र रचता है । कुर्बान जब यह बात अपनी पत्नी रुकयिया को बताता है तो वह सुरसतिया को इस षड़यंत्र के प्रति आगाह कर देती है । धरिछन पांडे के गुंडे जब सुरसतिया के सूअर को मारने की कोशिश करते हैं तो वह उन्हें ललकारती है । गुंडे उसकी झोपड़ी को आग लगा कर भागते हैं जिसके भीतर सुरसतिया का बेटा मुन्ना सो रहा है । अपनी जान की परवाह किये बिना ही सुरसतिया आग की लपटों में कूद पड़ती है और गंभीर रूप से घायल हो जाती है ।
दिल्ली में अनुसूचित जाति /जनजाति आयोग के अध्यक्ष का पद सँभालते झिंगना को गाँव में अपनी पत्नी के गंभीर रूप से जल जाने की सूचना मिलती है और वह मीटिंग अधूरी छोड़ कर गाँव आ जाता है । भरसक प्रयासों के बावजूद सुरसतिया बच नहीं पाती । कुर्बान और उसकी पत्नी सरकारी गवाह बन जाते हैं । धरिछन पाण्डेय के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी होता है । सारे समाचार सुन कर ताहिरा भी गाँव आकर झिंगना को ढाढस बंधाती है और मुन्ना को एक बेहतर भविष्य का देने का वादा करते हुए उसे साथ लेकर लखनऊ लौट जाती है।
झिंगना गाँव में अपने संघर्ष को अंतिम सांस तक जारी रखने का प्रण करता है . वह माओवादियों से भी हिंसात्मक संघर्ष छोड़ कर अहिंसा की राह पर चलने का आह्वान करते हुए सामाजिक विकृतियों से लड़ने की अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता की ओर कदम बढ़ाता है….

Thursday, 25 July 2013

सपनों की बाइबिल

 सिल्विया प्लाथ

रोजाना सुबह नौ बजे से शाम पाँच बजे तक मैं अपनी सीट पर बैठी दूसरों के ख्‍वाब टाइप करती रहती रही हूँ। मुझे इसीलिए मुलाजिम रखा गया है। मेरे अफसरों का हुक्‍म है कि मैं तमाम चीजें टाइप करूँ। ख्‍वाब, शिकायतें, माँ से मतभेद, बोतल और बिस्‍तर की समस्‍याएँ, बाप से झगड़ा, सरदर्द जो इतना तेज हो जाता है कि दुनिया की तमाम लज्‍जतें मंद पड़ जाती हैं, हमारे दफ्तर में सिर्फ वही लोग आते हैं जिनके घरों में अजाब भर चुके होते हैं।

मुमकिन है कि चूहा अपने जिस्‍मानी एतबार से बहुत समझ जाता हो कि दूर से आते दिखाई देनेवाले दो बड़े पाँव कायनात का निजाम किस तरह चलाते हैं, लेकिन जहाँ से दुनिया को देखती हूँ वहाँ से यही मालूम होता है कि दुनिया के निगहबान का नाम 'परेशान' है।

परेशानी की भी शक्‍ल हो सकती है। कुत्‍ता, तवायफ, चुड़ैल, शैतान... सो जाए या जागता रहे, वो परेशान ही रहता है।

जब लोग सवाल करते हैं कि मैं कहाँ काम करती हूँ, तो मैं उन्‍हें बताती हूँ कि मेरा काम शहर के अस्‍पताल के एक शोबे का रिकार्ड दुरुस्त रखना है। आमतौर पर ये जवाब काफी साबित होता है। इसके बाद कोई इस तरह की बात नहीं पूछता जिसके जवाब में मुझे बताना पड़े कि मैं पहले से मौजूद रिकार्ड की निगहदाश्‍त के अवाला नया रिकार्ड भी टाइप करती हूँ। दरअसल नया रिकार्ड टाइप करना ही मेरा पेशा है और मैं अपने पेशे से सच्‍चे दिल से जुड़ी हूँ। इसलिए कि मेरी तहवील में ख्‍वाबों के ढेर हैं और मैं किसी को ये नहीं बता सकती। नहीं बता सकती कि मैं अपने घर के कमरे में अस्‍पताल के कानूनों की पाबंद नहीं हूँ। यहाँ मैं फकत 'परेशान' के हुक्‍म पर अमल करती हूँ जो ख्‍वाब जमा करने की हिदायत करता है।

ख्‍वाब-दर-ख्‍वाब मैं बालिग हो रही हूँ और इसी रफ्तार से ख्‍वाबों से मेरी पहचान में इजाफा हो रहा है। ये सिलसिला जारी रहा तो एक दिन मैं दुनिया की सबसे बड़ी ख्‍वाब जाननेवाली बन जाऊँगी। लेकिन ख्‍वाब जानने की इंतिहा पर पहुँच कर भी मैं लोगों के ख्‍वाब रोकने की कोशिश नहीं करूँगी। ख्‍वाबों का नाजायज इस्‍तेमाल नहीं करूँगी। यहाँ तक कि मैं ख्‍वाबों का नतीजा बताने का भी कोई इरादा नहीं रखती। मैं तो सिर्फ ख्‍वाब जमा करना चाहती हूँ। उन्‍हें पहचानना चाहती हूँ। उनसे मुहब्‍बत करना चाहती हूँ। मैं 'परेशान' की कारकुन हूँ और ख्‍वाब जमा करना मेरे फर्ज में शामिल है। यही वजह है कि मैं अपने टाइपशुदा ख्‍वाब इतनी बार पढ़ती हूँ कि वो मुझे जबानी याद हो जाते हैं। फिर मैं घर जा कर उन्‍हें 'परेशान' की पवित्र किताब में दर्ज करती हूँ।

कभी-कभी मैं रात के वक्‍त अपने घर की छत पर चली जाती हूँ। वहाँ से नींद भरे शहर को देखना मुझे अच्‍छा लगता है। छत पर टहलते हुए वायलिन के तार की तरह हर वक्‍त लरजने के लिए तैयार रहती हूँ। सुबह के आसार नमूदार होने पर थकन से चूर अपने बिस्‍तर पर आती हूँ और किसी बुखारजदा शख्‍स की तरह हो जाती हूँ। शहर में मौजूद इंसानी सरों का शुमार और फिर उन सरों में आनेवाले नकली ख्‍वाबों का हिसाब मुझे बेइंतिहा थका देता है।

दूसरे दिन मुझे वही ख्‍वाब टाइप करने होते हैं जिन्‍हें मैं रात अपनी छत से महसूस कर चुकी हूँ। यकीनन शहर भर के ख्‍वाब असीम हैं और मैं शाम तक फकत उनका एक मामूली हिस्‍सा टाइप कर सकती हूँ, लेकिन इसके बावजूद मेरे दफ्तर में फाइलों का अंबार बढ़ता जा रहा है और बहुत जल्‍द वो दिन आने वाला है जब दफ्तर में सिवाय ख्‍वाबों की फाइलों के कोई दूसरी चीज रखने की जगह नहीं बचेगी।

यूँ भी होता है कि मैं लोगों को उनके ख्‍वाबों के हवाले से पहचानने लगती हूँ। बहुत-से मरीज ऐसे होते हैं कि मैं उनके नाम भूल जाती हूँ, लेकिन उनके ख्‍वाब याद रहते हैं। मसलन ये आदमी जो एक फैक्‍ट्री में काम करता है, ख्‍वाब में खुद को किसी मशीन के घूमते पहियों में फँसा हुआ महसूस करता है। ये ख्‍वाब में इतना खौफजदा हो जाता है कि आँख खुलने के बाद भी कुछ देर तक चीखता रहता है। इस तरह के लोग और भी हैं जो ख्‍वाब में देखते हैं कि वो किसी मशीन तले रौंदे जा रहे हैं या कोई ईजाद उन्‍हें निगल रही है। कभी-कभी ख्‍याल आता है कि जब मशीनें नहीं थीं उस वक्‍त लोग किस तरह के ख्‍वाबों से डरते होंगे?

मेरा अपना भी एक ख्‍वाब है। इस ख्‍वाब में एक बहुत बड़ी झील नजर आती हैं। इतनी बड़ी कि इसके किनारे हेलीकॉप्‍टर की शीशेवाली सीट से भी नजर नहीं आते जहाँ से मैं उसकी तह में झाँकती हूँ। झील का पानी खौफनाक बलाओं से भरा हुआ है। ऐसी बलाएँ जो पुराने जमाने में जमीन की सतह पर घूमती थीं। वो जमाना जब इंसान गुफाओं में रहता था। अभी उसने आग नहीं जलाई थी, फसल नहीं उगाई थी।

इस ख्‍वाब में सूरज चाँद सितारे और जमीन-आसमान के दरमियान पाई जानेवाली दूसरी तमाम चीजों की शक्‍लें और खासियत बदली हुई दिखाई देती हैं। अचानक झील की सतह बर्फ से ढक जाती है और मेरे हाथ-पाँव ठंडे पड़ने लगते हैं, यहाँ तक कि मैं जाग जाती हूँ। इस ख्‍वाब से निकलने के बाद कुछ देर तक किसी भी ख्‍वाब में अर्थ तलाश करना बेकार लगता है।

यही वो झील है जहाँ रात के वक्‍त शहर भर के ख्‍वाब बहते हुए आते हैं, यहाँ पहुँच कर तमाम दिमागों का गर्द व गुबार बैठ जाता है। जाहिर है कि ये झील शहर के आसपास पाए जानेवाले पीने के शफ्फाक पानी के उन जखीरों जैसी नहीं हो सकती जिनकी दिन-रात यूँ हिफाजत की जाती है जैसे वो काँटेदार जाली में रखे अनमोल हीरे हों, ये एक मुख्‍तलिफ झील है। सदियों के जमाशुदा गलते-सड़ते ख्‍वाबों से इस झील का पानी मटमैला और बदबूदार हो गया है और इसकी सतह से हर वक्‍त धुआँ उठता रहता है।

एक सर में रात भर में कितने ख्‍वाब आते हैं? और शहरी सरों की कुल तादाद क्‍या है? और दुनिया में इस तरह के कितने शहर पाए जाते हैं? और जमीन पर कितनी रातें गुजर चुकी हैं? मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो गणित में तेज होते हैं और बड़ी-बड़ी संख्‍याओं का पल भर में हिसाब लगा लेते हैं। मैं तो सिर्फ इस एक शहर में रात भर देखे जानेवाले ख्‍वाबों का शुमार करती हूँ, तो मेरा सर चकरा जाता है।

ये अजीब झील हैं। इसमें प्‍यार करनेवालों के चेहरे और फूली हुई लाशें और यादें और धुंध और धुआँ पुर्जे और साइंसी ईजादें और नफा-नुकसान एक-दूसरे से लिपटे तैरते रहते हैं और कभी-कभी मुझे इसमें मुर्दा पैदा होनेवाले बच्‍चे भी नजर आते हैं। मुर्दा पैदा होनेवाले बच्‍चे देख कर ऐसा लगता है जैसे वो झील की दूसरी तरफ बैठे महान रचनाकार के नामुकम्‍मल संदेश हों।

इस झील को कोई भी नाम दे लो। दुनिया के सारे लोग एक बिरादरी की सूरत में सिर्फ यहाँ नजर आते हैं। एक समूह, एक ढेर, एक समझ में न आनेवाला अंबार जो सोते में बिल्‍कुल एक चीज का बना लगता है, लेकिन ज्‍यों ही जागता है जुदा-जुदा हो जाता है। झील की इकाई में सब पाक हो जाते हैं, मगर जागते में उनको दोबारा अपनी-अपनी शख्सियत का लबादा ओढ़ना पड़ता है।

झील का ख्‍वाब मेरा जाती ख्‍वाब है। इसे मैं किसी रिकार्ड में दर्ज नहीं करूँगी। किसी फाइल में दफ्न नहीं होने दूँगी।

अहम बात ये है कि अस्‍पताल के जिस शोबे में मुझे नौकरी मिली है वो दूसरे शोबे में मुझे नौकरी मिली है वो दूसरे शोबों से बहुत मुख्‍तलिफ है। हमारे शोबे में दवाएँ नहीं दी जातीं, मरीज से सिर्फ मुफ्तगू की जाती है, उसकी सुनी जाती है, उसे महसूस किया जाता है। मुझे अपने शोबे का तरीका पसंद है। ये उन जिस्‍मानी बीमारियोंवाले शोबों के तरीके से बेहतर है जहाँ रंगीन घोल और पाउडर के ढेर लगे होते हैं। हमारे अस्‍पताल की इमारत नीम अँधेरी और तंग है जिसके कारण कभी-कभी दूसरे शोबों के मरीज और डॉक्‍टर भी हमारे कमरों में अस्‍थाई तौर पर आ जाते हैं। ऐसे दिनों में हमारे शोबे की अहमियत बढ़ जाती है।

मंगल और बुध के रोज जगह की कमी के सबब ऑपरेशनवाले मरीजों के पलंग हमारे शोबे के हॉल में खड़े कर दिए जाते हैं। टाइपिंग के दौरान मेरी नजर बार-बार उनकी तरफ उठ जाती है। जिस जगह मैं बैठती हूँ वहाँ से मरीजों के पाँव नजर आते हैं। सुर्ख कंबलों और सफेद चादरों से निकले साफ-सुथरे पीले पैरों की लंबी कतार।

किसी-किसी दिन स्‍नायु रोगियों के शोबेवाले भी हमारा कोई कमरा इस्‍तेमाल करते हैं। ये मरीज अजीबोगरीब बोलियाँ बोलते हैं। लैटिन और चीनी जबानों के गाने गाते हैं और सारा वक्‍त शोर मचाते रहते हैं। अगर ऐसे मरीजों की जिस्‍मानी हालत दुरुस्त साबित हो जाए तो स्‍नायु रोगियों के माहिर उन्‍हें हमारे शोबे में भेज देते हैं।

इन दुश्‍वारियों के बावजूद मैं अपने काम से गाफिल नहीं होती। सर झुकाए लगातार दूसरों के ख्‍वाब टाइप करती चली जाती हूँ। अब तो मेरे पास मरीजों के ख्‍वाबों के अलावा अपने भी एक से ज्‍यादा ख्‍वाब जमा हो चुके हैं। ये ख्‍वाब मैंने खुद रचे हैं। लेकिन मैं इन ख्‍वाबों को खुद से भी नहीं दोहराऊँगी। कुछ अर्से तक इन्‍हें उस बुत की तरह वक्‍त गुजारना होगा जो अपनी नकाब की रस्‍म से एक लम्‍हा पहले तक मखमल के सुर्ख कपड़े में सर से पाँव तक ढका रहता है।

मैं जो भी ख्‍वाब हासिल करती हूँ, जिस तरह भी हासिल करती हूँ - उस पर 'परेशान' के दस्‍तखत जरूर होते हैं। 'परेशान' को ड्रामाई अंदाज में जाहिर होना पसंद है। हरचंद कि वो जाहिर होने के लिए मुख्‍तलिफ जगहों और वक्‍तों का चुनाव करता है। मगर कोई जगह कोई वक्‍त हो, वो हमेशा ड्रामाई अंदाज में सामने आता है।

ख्‍वाबों का कारोबार बहुत खतरनाक होता है। अगर 'परेशान' अपनी तरफ से उसमें शायरी शामिल न कर दे तो ये कारोबार नाकाबिले-बरदाश्‍त हो जाए। ख्‍वाबों के कारोबार में शायरी शामिल करने पर मैं 'परेशान' की शुक्रगुजार हूँ।

चमड़े की जैकेट में उस नौजवान ने बताया था कि उसके ख्‍वाब... लेकिन मैं ये कैसे कह सकती हूँ कि ये उस नौजवान का ख्‍वाब है जो उस रोज स्‍याह जैकेट पहने हमारे क्लिनिक में दाखिल हुआ था? मुझे यकीन है कि ये उसका जाती ख्‍वाब है।

दिल में यकीन का जज्‍बा हो तो ताकत और इल्तिजाओं और आँसुओं से ख्‍वाब तहरीर किए जा सकते हैं। दूसरों के ख्‍वाब टाइप करना आसान काम है लेकिन जाती ख्‍वाब लिखने में बहुत ऊर्जा लगती है।

अस्‍पताल के सेंटर में एक और शोबा है जो हमारे शोबे से भी ज्‍यादा अहमियत रखता है, जिसके ख्‍वाब हमारे बस में न आ सकें उसे हम इमारत के सेंटर में भेज देते हैं। मैंने अस्‍पताल का वो शोबा आज तक नहीं देखा। हरचंद कि उसकी सेक्रेटरी मेरी पहचान की है (हम दोनों एक ही हॉल में दोपहर का खाना खाते हैं)। मगर उसका हुलिया और उठने-बैठने का अंदाज मुझे उससे दूर रखता है। उसका नाम भी अजीब-सा है। मैं अक्‍सर उसका नाम भूल जाती हूँ। कुछ इस तरह का नाम जैसे : मिलरवेज या मिलरोज। इस तरह के नाम टेलीफोन डायरेक्‍टरी में नजर नहीं आते।

मैंने एक बार टेलीफोन डायरेक्‍टरी के पन्‍ने पलटे थे और ये देख कर खुश हुई थी कि शहर में बहुत-से लोग ऐसे भी हैं जिनका नाम स्मिथ नहीं है।

बहरहाल ये मिलरवेज या मिलरोज नाम की औरत बड़ी सेहतमंद और ऊँची-लंबी है। इसका लिबास आम लिबास के बजाय किसी संस्‍था की वर्दी मालूम होता है (जरूरी नहीं कि ये संस्‍था कोई कानून लागू करती हो)। मिलरोज के संगीन चेहरे पर चंद गैरमामूली तिल भी हैं। ये तिल देख कर ख्‍याल आता है कि शायद मिलरोज का चेहरा सूरज की रोशनी में बहुत कम रहा है। धूप की तपिश हासिल न हो तो जिल्‍द पर तरह-तरह के दाग पड़ जाते हैं। मुमकिन है मिलरोज ने नकली रोशनियों तले परवरिश पाई हो। अगर इसके चेहरे से इसकी आँखें नोचने की कोशिश की जाए तो महसूस होगा जैसे कोई पत्‍थर खुरच रहा हैं।

मेरे वार्ड की हैड सेक्रेटरी का नाम मिस टेलर है। मिस टेलर पहले दिन से हमारे वार्ड से जुड़ी है। अजब इत्तिफाक है कि जिस दिन मैं पैदा हुई थी उसी रोज वार्ड का उदघाटन हुआ था। मिस टेलर अस्‍पताल के बारे में हर चीज जानती है। वो इसके तमाम डॉक्‍टरों, मरीजों, शोबों और मन्‍सूबों से वाकिफ है। अपने पेशे में इतनी लगन मैंने किसी और में नहीं देखी। वो अस्‍पताल में मौजूद हर जानदार और बेजान शै का हिसाब रखती है। उसे तमाम वक्‍त गणना में घिरा देख कर मुझे हैरत होती है।

दफ्तर में मेरी दिलचस्‍पी सिर्फ ख्‍वाब जमा करने की हद तक है। मुझे यकीन है अगर अस्‍पताल में आग लग जाए तो मिस टेलर खुद को बचाने से पहले आँकड़ों की फाइलें बचाने की कोशिश करेगी। मेरे और मिस टेलर के मशगले मुख्‍तलिफ होने के बावजूद हमारे आपस के तल्‍लुकात खुशगवार हैं। बस, मैं ये नहीं चाहती कि वो मुझे दफ्तर की फाइलों में पुराने ख्‍वाब पढ़ते देख ले। आम तौर पर शोबा बेपनाह मसरूफ रहता है, लेकिन फिर भी मुझे कभी-कभी ख्‍वाबों के पुराने रिकार्डो में झाँकने का मौका मिल ही जाता है। मगर इतनी उतावली में अनोखे और अछूते ख्‍वाबों का चनाव एक मुश्किल काम है। मेरे आर्ट का तकाजा है कि मैं फुर्सत से बैठूँ, ख्‍वाबों की गहराई में उतरूँ, उनके सारे पहलुओं को जाँचूँ, उन्‍हे हर कोण से परखूँ और फिर जिन ख्‍वाबों को हर तरह से मुकम्‍मल पाऊँ, उन्‍हें घर ले जा कर ख्‍वाबों की पवित्र किताब में दर्ज कर दूँ। अगर शराब का स्‍तर बतानेवाले जानकार पहली बूँद चखने से पहले एक घंटे तक शराब की खुशबू सूँघ सकते हैं तो मैं ख्‍वाबों के सिलसिले में इस फुरर्सत और सहूलत से क्‍यों महरूम हूँ?

कभी-कभी मेरा जी चाहता है की मैं एक बड़ा ट्रंक लाऊँ और ख्‍वाबों की सारी फाइलें उसमें भर कर ले जाऊँ। अस्‍पताल के गेट पर गैरमामूली किस्‍म की पोटलियों ओर बंडलों को खुलवा कर देखा जाता है और स्‍टाफ के चंद दूसरे लोग भी सरकारी सामान की निगरानी पर लगे हैं। मगर मैं टाइपराइटर या कोई कीमती दवा वगैरह चुराने का मन्‍सूबा नहीं बना रही। मैं तो बस पुराने ख्‍वाबों की फाइलें एक रात के लिए घर ले जाउँगी और दूसरी सुबह उन्‍हें उसी तरतीब से दोबरा अलमारी में सजा दूँगी। इसमें किसी का क्‍या नुकसान हैं? यूँ तो मैं ख्‍वाबों में फकत झाँकने से भी बहुत कुछ मालूम कर सकती हूँ, लेकिन मिस टेलर के आने-जाने का कोई वक्‍त मुकर्रर नहीं है, जिसके सबब मैं हर आहट और सरगोशी पर चौंक जाती हूँ और इस तरह मैं चंद लम्‍हों के लिए भी अपना शौक पूरी तवज्‍जो से पूरा नहीं कर पाती।

उदास दिनों में जब मेरे पास इतना वक्‍त भी नहीं होता कि पुरानी फाइलों से किसी ख्‍वाब की एक झलक ही देख लूँ, परेशान मेरी तरफ पीठ करके पहाड़ों जितना बुलंद हो जाता है और मुझ पर इतना खौफ तारी होता है कि मैं अपने होश गुम कर बैठती हूँ।

ऐसे मौके पर मेरी हालत उन भेड़ों की-सी होती है जो आँखों के सामने उगी घास चरने में इस कदर मशगूल हो जाती हैं कि चरागाह के आखिरी सिरे पर कुर्बानी के चबूतरे की मौजूदगी के आखिरी लम्‍हे तक बेखबर रहती हैं।

इससे ज्‍यादा खतरनाक बात ये है कि डॉक्‍टर हर रोज परेशान के आदमियों को उनकी पनाहगाहों से बाहर निकाल रहे हैं। डॉक्‍टरों के लिए परेशान के दरबार तक पहुँच रखनेवालों की भी कोई हैसियत नहीं है। हरचंद कि उसके गिरोह में फकत वही नुमायाँ ओहदे पर तैनात होता है जो ख्‍वाबों को याद रखे और ख्‍वाब देखनेवालों को भूल जाए। यूँ भी ख्‍वाबों के मुकाबले में ख्‍वाब देखनेवालों की क्‍या वकत है? मगर डॉक्‍टर ये नहीं मानते। उनके लिए तो परेशान मरीज के बदन में दाखिल होनेवाला काँच का टुकड़ा है जिसे वो रूहानी तरीकों से बाहर निकालने की कोशिश करते हैं।

'हैरी के साथ क्‍या हुआ था?' एतराज करनेवालों को डॉक्‍टर याद दिलाते हैं, 'जब हैरी हमारे शोबे में दाखिल हुआ था तो परेशान उसके कंधे पर हाथ रख चुका था। इसीलिए तो उसे पूरी दुनिया गंदगी का ढेर नजर आने लगी थी। उसने काम पर जाना छोड़ दिया था कि रास्‍ते में इंसानों के थूक और जानवरों की गंदगी पड़ी होती है। पहले ये गंदगी ज्‍यों की त्‍यों लगती है। वो कहता था कि जब घर आकर जूते उतारो तो हाथ नापाक हो जाते हैं। उसके बाद मुँह तक पहुँचने में उसे देर ही कितनी लगती है?

'हैरी को शारीरिक लाचार भी बुरे लगते थे। लाचारों के नाखून और कानों का पिछला हिस्‍सा मैल से अँटा होता है। वो अक्‍सर बातचीत की शुरूआत ही इस जुमले से करता था। लेकिन हमारे मशविरों और हिदायतों पर अमल करने से वो बिल्‍कुल नॉर्मल हो गया था। याद है? इलाज के आखिरी दिन उसने हम सब के साथ कैसी खुशादिली से हाथ मिलाया था और हमारा शुक्रिया अदा करके रुखसत हुआ था।'

मुझे याद है आखिरी दिन उसकी आँखों के शोले बुझे हुए थे और वो अहमकों की तरह मुस्‍कुराता हुआ हमारे क्लिनिक से रवाना हुआ था। अगर सूरतेहाल यही रही तो कितने हैरी आएँगे, स्‍वस्‍थ हो कर चले जाएँगे और मैं अपने ख्‍वाबों के जखीरे में कोई इजाफा नहीं सकूँगी। मुझे बहरहाल अपनी रफ्तार बढ़ानी है और मिस टेलर की मौजूदगी में ये नामुमकिन है।

इस मस्‍अले का सिर्फ यही हल है कि किसी दिन दफ्तर ही में रात गुजारूँ और सुबह तक तमाम फाइलों से अपने मतलब के ख्‍वाब डायरी में तहरीर कर लूँ।

दफ्तर में रात गुजारने का ख्‍याल कई दिनों से (कंबलों से निकले मरीजों के पीले पैरों की कतार की तरह) बार-बार मेरे सामने आ रहा है। एक दिन पाँच बजे शाम मैं खुद को दफ्तर के वाशरूम में छिपते देखती हूँ। गहरे होते अँधेरे के साथ दफ्तर से घर जानेवालों के कदमों की चाप आहिस्‍ता-आहिस्‍ता खो जाती है। मैं वाशरूम से बाहर निकलती हूँ तो दिन भर मसरूफ रहनेवाले अस्‍पताल की इमारत सोमवार के चर्च की तरह खाली और उदास महसूस होती है। मैं फौरन अपने कमरे में दाखिल होती हूँ। टाइपराइर्ट्स अपने खानों में बंद किए जा चुके हैं। टेलीफोनों में ताले पड़े हैं। दुनिया अपनी जगह मौजूद है।

मैं छत पर लगा हल्‍की ताकत का बल्‍ब रोशन करके रिकार्ड में मौजूद ख्‍वाबों की सबसे पुरानी फाइल का पहला पेज खोलती हूँ। फाइल का रंग शुरू में नीला रहा होगा मगर अब उसकी जिल्‍द जर्द हो गई है। मेरी पैदाइश के दिन ये फाइल बिल्‍कुल नई रही होगी। मैं सुबह तक इस फाइल को देखती हूँ। आधी रात के करीब मैं इस फाइल में दर्ज ख्‍वाब पढ़ती हूँ। मई की उन्‍नीस तारीख को एक नर्स अपने मरीज की अलमारी खोल कर लांड्री के थैले से पाँच कटे हुए सिर निकालती है। उनमें से एक सिर नर्स की माँ का है।

सर्द हवा का एक हल्‍का झोंका मेरी गर्दन को छूता गुजर जाता है। मैं ख्‍वाबों की फाइलों के सामने फर्श पर बैठी हूँ और अब टाँगों पर फाइल का बोझ महसूस कर रही हूँ। अचानक मेरी नजर सामनेवाले दरवाजे पर पड़ती है। दरवाजे के किवाड़ फर्श से उठे हुए हैं। दरवाजे की दूसरी तरफ दो मर्दाना जूते नजर आ रहे हैं। जूतों की नोकें मेरी तरफ हैं। भूरे चमड़े के बने हुए ऊँची एड़ियोंवाले ये जूते विदेशी ढंग के हैं। जूते स्थिर हैं, उनके ऊपर काले रंग की वो रेशमी जुराबें भी हैं जिनसे किसी की टाँगों की जर्द रंगत झलक रही है मगर जूते हिल नहीं रहे।

'बेचारी!' कोई बड़ी प्‍यार भरी आवाज में कहता है, 'बेचारी फर्श पर कैसे बैठी है। अब तक तो इसकी टाँगें अकड़ गई होंगी। इसकी मदद करो। सूरज निकलनेवाला है।'

दो हाथ मेरे बाजुओं तले से निकल कर मुझे खींच कर खड़ा कर देते हैं। मेरी टाँगे वाकई सुन्‍न हो चुकी हैं। मैं लड़खड़ाती हूँ। ख्‍वाबों की फाइल फर्श पर जा पड़ती है।

'कुछ देर तक यूँ ही खड़ी रहो। खून की गर्दिश दुरुस्त हो जाएगी।' अस्‍पताल के मालिक की सरगोशी मेरे कान में गूँजती है। मैं अपनी डायरी सीने से लगा लेती हूँ। ये मेरी आखिरी उम्‍मीद है।

'इसे कुछ नहीं मालूम है।'

'इसे कुछ नहीं मालूम।'

'इसे सब कुछ मालूम है!!'

चमकदार जूते की नोक ख्‍वाबों की फाइल को ठोकर मारती है। मेरी पैदाइश की पहली चीख के वक्‍त शहर में देखे जानेवाले तमाम ख्‍वाबों का रिकार्ड अलमारी की तह के अँधेरे में चला जाता है। वो मुझे इमारत के सेंटर की तरफ ले जा रहा है। मैं अपनी रफ्तार तेज कर देती हूँ ताकि कोई ये न समझे कि मुझे घसीटा जा रहा है।

'इससे पहले कि तुम मुझे निकालो,' मैं मजबूत लहजे में कहती हूँ, 'मैं खुद नौकरी छोड़ दूँगी।'

'तुम हमारे काम आती हो,' इस बार मालिक कहीं दूर से बोलता है, 'हमें तुम्‍हारी जरूरत है।'

मैं और मालिक चलते रहते हैं। यहाँ तक कि पेच-दर-पेच राहदारियों में दाखिल हो जाते हैं। उसके बाद सुरंगें आती हैं। आखिरी सुरंग के खात्‍मे पर लोहे का फाटक खुल जाता है। हमारे गुजरने के बाद ही पीठ पीछे फाटक यूँ बंद होता है जैसे मवेशियों को बूचड़खाने ले जानेवाली गाड़ी का दरवाजा बंद होता है।

हम एक अनजाने कमरे में दाखिल हो चुके हैं। कम से कम मेरे लिए ये कमरा बिल्‍कुल अजनबी है। मैं दूसरों के इलाके में आ गई हूँ और मेरा सामान पीछे रह गया है। हैंगर पर लटका कोट... और मेरे डेस्‍क की दराज में मेरा बटुआ पड़ा है। सिर्फ मेरी डायरी मेरे साथ है और परेशान है जिसकी तपिश मुझे बर्फबारी में जमने से बचा रही है। मैं तेज रोशनियों के नीचे खड़ी कर दी गई हूँ - आ गई हूँ।

'चुड़ैल!' मिस मिलरोज फौलादी डेस्‍क के पीछे खड़ी मुझे घूर रही है। कमरे की बनावट ऐसी है जैसे किसी समुद्री जहाज का निचला हिस्‍सा हो। किसी भी दीवार पर कोई खिड़की या रोशनदान नहीं है। सामने से परेशान के नायब नमूदार होते हैं। उनकी आँखें दहकते हुए कोयलों से ज्‍यादा सुर्ख और रोशन हैं। वो मुझे अजीब आवाजों में खुश आमदीद कहते हैं। उन्‍हें मालूम हो चुका है कि मैं परेशान की सफों में शामिल हूँ और वो जानना चाहते हैं कि दुनिया में परेशान के कारकुन किस हाल में हैं?

'शांति, मैं तुम्‍हारे लिए अमन व सलामती का पैगाम ले कर आई हूँ,' मैं अपना डायरीवाला हाथ बुलंद करके उन्‍हें मुखातिब करती हूँ।

'ये पुराना राग है बीबी।' मिलरोज हाथी की तरह झूम उठी है, 'अब हम ऐसी बातों से प्रभावित नहीं होंगे।'

मिस मिलरोज मुझ पर झटपती है। मैं बचने की कोशिश करती हूँ। मगर वो बहुत तेजरफ्तार और ताकतवर है। पहली बार उसका वार खाली जाता है मगर दूसरी बार वो मुझे दबोच लेती है।

'पुराना राग मत अलापो, ये डायरी हमारे हवाले कर दो।'

मिस मिलरोज की साँसों में पागल कर देनेवाली बू है। मैं उसकी गिरफ्त से निकलने की कोशिश में उसकी मर्दों जैसी मजबूत और बेरस छाती को अपने वजूद की पूरी कुव्‍वत से परे धकेलती हूँ। लेकिन मैं उसके मुकाबले में बहुत कमजोर हूँ। उसकी उँगलियाँ दरिंदे के पंजों की तरह मेरे बदन में घुस जाती हैं।

'मेरी बच्‍ची... मेरी बच्‍ची मेरे पास लौट आई है।' मेरे कानों में फुँफकारती है।

'ये लड़की...' अस्‍पताल के मालिक की आवाज से कमरा गूँजता है, 'परेशान के साथ वक्‍त गुजारती रही है।'

'बुरी बात...बुरी बात...'

सफेद लकड़ी का एक तख्‍त ऐन मेरे सामने बिछा दिया गया है। मिलरोज मेरी कलाई से घड़ी उतारती है। उँगलियों से अँगूठी निकालती है। बालों से पिन अलग करती है। फिर वो मेरा लिबास उतार कर मुझे मौसम की पहली बर्फ जैसी बेदाग और सफेद चादरों में लपेट देती है। अचानक कमरे के चारों कोनों से पथराई आँखोंवाले चार वजूद निकल कर मुझे सफेद तख्‍त पर ले जाते हैं। उन्‍होंने ऑपरेशन थिएटरवाले चार कपड़े और नकाब पहन रखे हैं। उनका मकसद परेशान की बादशाहत खत्‍म करना है। वो एक-एक करके मेरी दोनों टाँगों और बाजू को काबू में कर लेते हैं। दरवाजे से आनेवाला मेरे सर के पीछे खड़ा हो जाता है। मैं उसे नहीं देख सकती, मगर उसके हाथों में मौजूद तेज धारवाले औजार की खड़खड़ाहट सुन सकती हूँ।

परेशान के नुमाइंदे मेरी बेबसी पर प्रतिरोध करते हैं, वो गुनगुनाते हैं :

फकत खौफ से मुहब्‍बत की जा सकती है / खौफ से मुहब्‍बत चेतनशील होने की निशानी है / फकत खौफ, हर तरफ मुहब्‍बत खौफ का राज हो / फकत खौफ से मुहब्‍बत की जा सकती है। मिलरोज और अस्‍पताल का मालिक परेशान के नुमाइंदों को खामोश करने में नाकाम रहते हैं।

मेरे सर के पीछे खड़े शख्‍स को इशारा किया जाता है। अचानक मशीन और तेजधार पुर्जों के चलने की आवाज बाकी तमाम आवाजों पर हावी हो जाती है। ज्‍यों ही मैं खुद को ओझल होते महसूस करती हूँ छत पर लगी रोशनियों से परेशान का चेहरा झाँकता है। उसकी आँखों में बिजलियाँ कौंध रही हैं। आवाज की कड़क से कायनात पर साये पड़ रहे हैं।


मैं उम्र भर परेशान से जुड़ी रही हूँ और मुझे पहले दिन ही मालूम हो गया था कि ये जुड़ाव बीसवीं मंजिल से छलाँग है, गले में पड़ी रस्‍सी है, दिल पर रखे खंजर की नोक है। 
(अनुवादक हसन जमाल)