Thursday, 25 July 2013

लेव तोल्सतोय की कहानी कितनी जमीन?



(प्रेमचंद के शब्दों में पूरी तरह देसी पात्रों और हिंदी पठनीयता की शब्दावलियों से पिरोयी गई यह कहानी पाठकों के लिए सुप्रचलित है)

दो बहने थी। बड़ी का कस्बे में एक सौदागर से विवाह हुआ था। छोटी देहात में किसान के घर ब्याह थी।
बड़ी का अपनी छोटी बहन के यहां आना हुआ। निबटकार दोनों जनी बैठीं तो बातों का सूत चल पड़ा। बड़ी अपने शहर के जीवन की तारीफ करने लगी, "देखो, कैसे आराम से हम रहते हैं। फैंसी कपड़े और ठाठ के सामान! स्वाद-स्वाद की खाने-पीने की चीजें, और फिर तमाशे-थियेटर, बाग-बगीचे!"
छोटी बहन को बात लग गई। अपनी बारी पर उसने सौदागर की जिंदगी को हेय बताया और किसान का पक्ष लिया। कहा, "मैं तो अपनी जिंदगी का तुम्हारे साथ अदला-बदला कभी न करुं। हम सीधे-सादे और रुखे-से रहते हैं तो क्या, चिंता-फिकर से तो छूटे हैं। तुम लोग सजी-धजी रहती हो, तुम्हारे यहां आमदनी बहुत है, लेकिन एक रोज वह सब हवा भी हो सकता है, जीजी। कहावत हे ही—'हानि-लाभ दोई जुड़वा भाई।' अक्सर होता है कि आज तो अमीर है कल वही टुकड़े को मोहताज है। पर हमारे गांव के जीवन में यह जोखिम नहीं है। किसानी जिंदगी फूली और चिकनी नहीं दीखती तो क्या, उमर लंबी होती है और मेहनत से तन्दुरुस्ती भी बनी रहती है। हम मालदार न कहलायेगे: लेकिन हमारे पास खाने की कमी भी कभी न होगी।"
बड़ी बहन ने ताने से कहा, "बस-बस, पेट तो बैल और कुत्ते का भी भरता है। पर वह भी कोई जिंदगी है? तुम्हें जीवन के आराम, अदब और आनन्द का क्या पता है? तुम्हारा मर्द जितनी चाहे मेहनत करे, जिस हालत में तुम जीते हो, उसी हालत में मरोगे। वहीं चारों तरफ गोबर, भुस, मिट्टी! और यही तुम्हारे बच्चों की किस्मत में बदा है।"
छोटी ने कहा, "तो इसमें क्या हुआ! हां, हमारा काम चिकना-चुपड़ा नहीं हैं; लेकिन हमें किसी के आगे झुकने की भी जरुरत नहीं है। शहर में तुम हजार लालच से घिरी रहती हो। आज नहीं तो कल की क्या खबर है! कल तुम्हारे आदमी को पाप को लोभ—जुआ, शराब और दूसरी बुराइयां फंसा सकते हैं, तब घड़ी भर में सब बरबाद हो जायगा। क्या ऐसी बातें अक्सर होती नहीं हैं?"
घर का मालिक दीना ओसारे में पड़ा औरतों की यह बात सुन रहा था। उसने सोचा कि बात तो खरी है। बचपन से मां धरती की सेवा में हम इतने लगे रहते हैं कि कोई व्यर्थ की बात हमारे मन में घर नहीं कर पाती है। बस, है तो मुश्किल एक। वह यह कि हमारे पास जमीन काफी नहीं है। जमीन खूब हो तो मुझे किसी का परवा न रहे, चाहे शैतान ही क्यों न हो!
वहीं कोने में शैतान दुबका बैठा था। उसने सबकुछ सुना। वह खुश था किसान की बीवी ने गांव की बड़ाई करके अपने आदमी को डींग पर चढ़ दिया। देखो न, कहता था कि जमीन खूब हो तो फिर चाहे शैतान भी आ जाय, तो परवा नहीं।

शैतान ने मन में कहा कि अच्छा हजरत, यही फैसला सही। मैं तुमको काफी जमीन दूंगा और देखना है कि उसी से तुम मेरे चंगुल में होते हो कि नहीं।

गांव के पास ही जमींदारी की मालकिन की कोठी थी। कोई तीन सौ एकड़ उनकी जमीन थी। उनके अपने आसामियों के साथ बड़े अच्छे सम्बन्ध रहते आये थे; लेकिन उन्होंने एक कारिन्दा रक्खा, जो पहले फौज में रहा था। उसने आकर लोगों पर जुरमाने ठोकरे शुरु कर दिये।

दीना का यह हाल था कि वह बहुतेरा करता, पर कभी तो उसका बैल जमींदारी की चरी में पहुंच जाता, कभी गाय बगिया में चरती पाई जाती। और नहीं तो उनकी रखाई हुई घास में बछिया-बछड़ा ही जा मुंह मारते। हर बार दीना को जुर्माना उठाना पड़ता। जुर्माना तो वह देता, पर बेमन से। वह कुनमुनाता और चिढ़ा हुआ-सा घर पहुंचता और अपनी सारी चिढ़ घर में उतारता। पूरे मौसम कारिंदे की वजह से उसे ऐसा त्रास भुगतना पड़ा।

अगले जाड़ों में गांव में खबर हुई कि मालकिन अपनी जमीन बेच रही हैं और मुंशी इकरामअली से सौदे की बातचीत चल रही है। किसाने सुनकर चौकत्रे हुए। उन्होंने सोचा कि मुंशीजी की जमीन होगी तो वह जमींदार के कारिन्दे से भी ज्यादा सख्ती करेंगे और जुर्माने चढ़ावेंगे और हमारी तो गुजर-बसर इसी जमीन पर है।

यह सोचकर किसान मालकिन के पास गये। कहा कि मुंशीजी को जमीन न दीजिए। हम उससे बढ़ती कीमत पर लेने को तैयार हैं। मालकिन राजी हो गईं।

तब किसानों ने कोशिश की कि मिलकर गांव-पंचायत की तरफ से वह सब जमीन पर जा से ताकि वह सभी की बनी रहे। दो बार इस पर विचार करने को पंचायत जुड़ी पर फैसला न हुआ। असल में शैतान की सब करतूत थी। उसने उनके बीच फूट डाल दी थी। बस, तब वे मिलकर किसी एक मत पर आ ही नहीं से। तय हुआ कि अलग-अलग करके ही वह जमीन ले ली जाय। हर कोई अपने बित्ते के हिसाब से ले। मालकिन पहले की तरह इस बात पर भी राजी हो गई।

इतने में दीना को मालूम हुआ कि एक पड़ोसी इकट्ठी पचास एकड़ जमीन ले रहा है और जमींदारिन राजी हो गई हैं कि आधा रुपया अभी नकद ले लें, बाकी साल भर बाद चुकता हो जायगा।

दीना ने अपनी स्त्री से कहा कि और जने जमीन खरीद रहे है। हमें भी बीस या इतने एकड़ जमीन ले लेनी चाहिए। जीना वैसे भार हो रहा है और वह कारिदा जुर्माने-पर-जुर्माने करके हमें बरबाद ही कर देगा।

उन दोनों ने मिलकर विचार किया कि किस तरकीब से जमीन खरीदी जाय। सौ कलदार तो उनके पास बचे हुए रखे थे। एक उन्होंने उमर पर आया अपना बछड़ा बेच डाला। कुछ माल बंधक रक्खा। अपने बड़े बेटे को मजदूरी पर चढ़ाकर उसकी नौकरी के मद्दे कुछ रुपया पेशगी ले लिया। बाकी बचा अपनी स्त्री के भाई से उधार ले लिया। इस तरह कोई आधी रकम उन्होंने इकट्ठी कर ली।

इतना करे दीना ने एक चालीस एकड़ जमीन का टुकड़ा पसंद किया, जिसमें कुछ हिस्से में दरख्त भी खड़े थे। मालकिन के पास उसका सौदा करने पहुंचा। सौदा पट गया ओर वहीं-के-वहीं नकद उसने साई दे दी। फिर कस्बे में जाकर लिखा-पढ़ी पक्की कर ली।

अब दीना के पास अपनी निजी जमीन थी। उसने बीज खरीदा और इसी अपनी जमीन पर बोया, इस तरह वह अब खुद जमींदार हो गया।

इस तरह दीना काफी खुशहाल था। उसके संन्तोष में कोई कमी न रहती। अगर बस पड़ोसियों की तरफ से उसे पूरा चैन मिल सकता। कभी-कभी उसे खेतों पर पड़ोसियों के मवेशी आ चरते। दीना ने बहुत विनय के साथ समझाया, लेकिन कुछ फर्क नहीं हुआ। उसके बाद और-तो-और, घोसी छोकरे गांव की गायों को दिन-दहाड़े उसकी जमीन में छोड़ देने लगे। रात को बैल खेतों का नुकसान करते। दीना ने उनको बार-बार निकलवाया और बार-बार उसने उनके मालिकों को माफ किया। एक अर्से तक वह धीरज रक्खे रहा और किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। लेकिन कब तक? आखिर उसका धीरज टूट गया और उसने अदालत में दरख्वास्त दी। मन में जानता तो था कि मुसीबत की वजह असली यह है कि और लोगों के पास जमीन की कमी है, जान-बूझकर दीना की सताने की मंशाा किसी की नहीं है। लेकिन उसने सोचा कि इस तरह मैं नरमी दिखाता जाऊंगा, तो वे लोग शह पाते जायंगे और मेरे पास जितना है सब बरबाद कर देंगे। नहीं उनको एक सबक सिखाना चाहिए।

सो उसने ठान ली। एक सबक दिया, दूसरा। नतीजा यह कि दो-तीन किसानों पर अदालत से जुर्माना हो गया। इस पर तो पास-पड़ोस के लोग दीना से कीना रखने लगे। अब कभी-कभी जान-बूझकर भी तंग करने के लिए अपने मवेशी उसके खेतों में छोड़ देते। एक आदमी गया और उसे जरुरत अगर घर में ईंधन की थी, तो उसने रात में जाकर सात पूरे शीशम के दरख्त काट गिराये। दीना ने सवेरे घूमते हुए देखा कि पेड़ कटे हुए पड़े है। वे धरती से सटे हैं और उनकी जगह खड़े ठूंठ मानो दीना को चिढ़ा रहे हैं। देखकर उसको तैश आ गया।

उसने सोचा कि अगर दुष्ट ने एक यहां का तो दूसरा दूर का पेड़ काटा होता तो भी गनीमत थी। लेकिन कम्बख्त ने आसपास के सब पेड़ काटकर बगिया को वीरान करे दिया। पता लगे तो खबर लिये बिना न छोडूं। उसने जानने के लिए सिर खुजलाया कि यह करतूत किसकी हो सकती है। आखिर तय किया कि हो-न-हो, यह धुन्नू होगा। और कोई ऐसा नहीं कर सकता। यह सोच धुन्नू की तरफ गया गया कि शायद कुछ सबूत मिल जाय, लेकिन वहां कुछ चोरी का सबूत मिला नहीं और आपस में कहा-सुनी और तेजा-तेजी के सिवा कुछ नतीजा न निकला। तो भी उसे मने में पक्का विश्वास हो गया कि धुन्नू ने यह किया है और जाकर रपट लिखा दी। धुन्नू की पेशी हुई, मामला चला। एक अदालत से दूसरी अदालत हुई। आखिर में धुन्नू बरी हो गया, क्योंकि कोई सबूत और गवाह ही नहीं थे। दीना इस बात पर और भी झल्ला उठा और अपना गुस्सा मजिस्ट्रेट पर उतारने लगा।

इस तरह दीना का अपने पड़ोसियों और अफसरों से मनमुटाव होने लगा, यहांतक कि उसे घर में भी आग लगाने की बातें सुनी जाने लगीं। हालांकि दीना के पास अब जमीन ज्यादा थी और जमींदारों में उसी गिनती थी, पर गांव में और पेचों में पहला-सा उसका मान न रह गया था।

इसी बीच अफवाह उड़ी कि कुछ लोग गांव छोड़-छोड़कर कहीं जो रहे हैं।

दीना ने सोचा कि मुझे तो अपनी जमीन छोड़ने की जरुरत है ही नहीं। लेकिन और कुछ लोग अगर गांव छोड़ेंगे तो चलो, गांव में भीड़ ही कम होगी। मैं उनकी जमीन खुद ले लूंगा। तब ज्यादा ठीक रहेगा। अब तो जमीन की कुछ तंगी मालूम होती है।

एक दिन दीना घर के ओसारे में बैठा हुआ था कि एक परदेसी-सा किसान उधर से गुजरता हुआ उसके घर उतरा। वह वहां रात-भर ठहरा और खाना भी वहीं खाया। दीना ने उससे बातचीत की कि भाई, कहां से आ रहे हो? उसने कहा दरिया सतलज के पास से आ रहा हूं। वहां बहुत काम है। फिर एक में से दूसरी बात निकली और आदमी ने बताया कि उस तरफ नई बस्ती बस रही है। उसे अपने गांव के कई और लोग वहां पहुंचे हैं। वे सोसायटी में शामिल हो गये हैं और हरेक को बीस एकड़ जमीन मुफ्त मिली है। जमीन ऐसी उम्दा है कि उस पर गेहूं की पहली फसल जो हुई तो आदमी से ऊंची उसी बालें गईं और इतनी घनी कि दरांत के एक काट में एक पूला बन जाय। एक आदमी के पास खाने को दाने न थे। खाली हाथ वहां पहुंचा। अब उसके पास दो गायें, छ: बैल और भरा खलिहान अलग।

दीना के मन में भी अभिलाषा पैदा हुई। उसने सोचा कि मैं यहां तंग संकरी-सी जगह में पड़ा क्या कर रहा हूं, जबकि दूसरी जगह मौका खुला पड़ा है। यहां की जमीन, घर-बार बेच-बाचकर नकदी बना वहीं क्यों न पहुंचूं और नये सिरे से शुरु करके देखूं? यहां लोगों की गिचपित हुई जाती है। उससे दिक्कत होती है और तरक्की रुकती है, लेकिन पहले खुद जाकर मालूम कर आना चाहिए कि क्या बात है, सो बरसात के बाद तैयारी करे वह चल दिया। पहले रेल में गया। फिर सैकड़ों मील बैलगाड़ी पर और पैदल सफर करता हुआ सतलज के पारवाली जगह पर पहुंचा। वहां देखा कि जो उस आदमी ने कहा था, सब सच है। सबके पास खूब जमीन है। हरेक को सरकार की तरफ से बीस-बीस एकड़ जमीन मिली हुई है, या जो चाहे खरीद सकता है। और खूबी यह कि कौड़ियों के मोल जितनी चाहे, जमीन और भी ले सकता है।

सब जरुरी बातें मालूम करे दीना जाड़ों से पहले-पहल घर लौट आया। आकर देश-छोड़ने की बात सोचने लगा। नफे के साथ उसने सब जमीन बेच डाली। घर-मकान, मवेशी-डंगर सबकी नकदी बना ली और पंचायत से इस्तीफा दे दिया और सारे कुनबे को साथ ले सतलज-पार के लिए रवाना हो गया।

दीना परिवार के साथ उस जगह पहुंच गया। जाते ही एक बड़े गांव की पंचायत में शामिल होने की अर्जी दी। पंचों की उसने खूब खातिर की और दावतें दीं। जमीन का पट्टा उसे सहज मिल गया। मिली-जुली जमीन में से उसे और उसके बाल-बच्चों के इस्तेमाल के लिए पांच हिस्से यानी सौ एकड़ जमीन उसको दे दी गई। वह सब इकट्ठी नहीं थी, कई जगह टुकड़े थे। अलावा इसके पंचायती चरागाह भी उसके लिए खुला कर दिया गया। दीना ने जरुरी इमारतें अपने लिए खड़ी कीं और मवेशी खरीद लिये। शामलात जमीन में से ही अब उसको इतना मिल गया था कि पहले से तिगुनी, और जमीन उपजाऊ थी। वह पहले से कई गुना खुशहाल हो गया। उस पास चराई के लिए खुला मैदान-का-मैदान पड़ा था और जितने चाहे वह ढोर रख सकता था।

पहले तो वहां जमने और मकान-वकान बनवाने का उसे रस रहा। वह अपने से खुश था और उसे गर्व मालूम होता था। पर जब वह इस खुशहाली का आदी हो गया तो उसे लगने लगा कि यहां भी जमीन काफी नहीं है; ओर होती तो अच्छा था। पहले साल उसने गेहूं बुवाया और जमीन ने अच्छी फसल दी। वह फिर गेहूं ही बोते जाना चाहता था, पर उसे लिए और पड़ती जमीन काफी न थी। जो एक बार फसल दे चुकती थी, वह उसे तरफ एक साथ दोबारा गेहूं नहीं देती थी। एक या दो साल उससे गेहूं ले सकते थे, फिर जरुरी होता था कि धरती को आराम दिया जाय। बहुत लोग ऐसी जमीन चाहनेवाले थे, लेकिन सबके लिए आती कहां से? इससे बदाबदी और खींचातानी होती थी। जो संपन्न थे, वे गेहूं उगाने के लिए जमीन चाहते थे। जो गरीब थे, वे अपनी जमीन से जैसे-तैसे पैसा वसूल करना चाहते थे, ताकि टैक्स वगैरा अदा कर सकें। दीना और गेहूं बोना चाहता था। इसलिए एक साल के लिए किराये पर उसने और जमीन ले ली। खूब गेहूं बोया और फसल भी खूब हुई। लेकिन जमीन गांव से दूर पड़ती थी और गल्ला मीलों दूर से गाड़ी में भर-भरकर लाना होता था। कुछ दिनों बाद दीना ने देखा कि कुछ बड़े-बड़े लोग अलग फाम्र डाल कर रहते हैं और वह खूब पैसा कमा रहे हैं। उसने सोचा कि आगर मैं इकट्ठी कायमी जमीन ले लूं और वहीं घर बसाकर रहूं तो बात ही दूसरी हो जाय।

इस तरह इकट्ठी और कायमी जमीन खरीदने का सवाल बार-बार उसके मन में उठने लगा।

तीन साल इस तरह निकल गये। दीना जमीन किराये पर लेता और गेहूं बोता। मौसम ठीक गये, काश्त अच्छी हुई और उस पास माल जमा होने लगा। वह इसी तरह संतोष से बढ़ता जा सकता था, लेकिन हर साल और लोगों से जमीन किराये पर लेने और उसके लिए कोशिश और सिरदर्दी करने के काम से वह थक गया था। जहां जमीन अच्छी होती, वहीं लेने वाले दौड़ पड़ते। इससे बहुत चौकस-चौकत्रा और होशियार न रहा जाता तो जमीन मिलना असंभव था। यह एक परेशानी की बात थी। तिसपर तीसरे साल ऐसा हुआ कि दीना ने एक महाजन के साझे में कुछ काश्तकारों से एक जमीन किराये में ली। जमीन गोड़ कर तैयार हो चुकी थी कि कुछ आपस में तनातनी हो गई और किसान लोग झगड़ा लेकर अदालत पहुंचे। अदालते से फिर मामला बिगड़ गया और की-कराई मेहनत बेकार गई।

दीना ने सोचा कि अगर कहीं जमीन मेरी कायमी मिल्कियत की होती तो मैं आजाद होता और क्यों यह पचड़ा बनता और बखेड़ बढ़ता?

उस दिन से वह जमीन के लिए निगाह रखने लगा। आखिर एक किसान मिला, जिसने एक हजार जमीन खरीदी थी, लेकिन पीछे उसकी हालत संभल न सकी। अब मुसीबत में पड़कर वह उसे सस्ती देने को तैयार था। दीना ने बात उससे चलाई और सौदा करना शुरु किया। आदमी मुसीबत में था, इससे दीना भाव-दर में कमी करने लगा। आखिर कीमत एक हजार रुपये तय पाई। कुछ नगद दे दिया जाय, बाकी फिर। सौदा पक्का हो गया था कि एक सौदागर अपने घोड़े के दाने-पानी के लिए उसे घर के आगे ठहरा। उससे दीना की बातचीत जो हुई तो सौदागर ने कहा कि मैं नर्मदा नदी के उस पार से चला आ रहा हूं। वहां १५०० एकड़ उम्दा जमीन कुल पांच सौ रुपये में मैंने खरीदी थी। सुनकर दीना ने उससे और सवाल पूछे। सौदागर ने कहा:

"बात यह है कि अफसर-चौधरी से मेल-मुलाकात करने का हुनर चाहिए। सौ से ज्यादा रुपये तो मैंने रेशमी कपड़े और गलीचे देने में खर्च किये होंगे। फिर शराब, फल-मेवों की डालियां, चाय-सेट वगैरा के उपहार अलग। नतीजा यह कि फी एकड़ मुझे जमीन आनों के भाव पड़ गई।"कहकर सौदागर ने अपने दस्तावेज सब दीना के सामने कर दिये।

फिर कहा, "जमीन ऐन नदी के किनारे है और सारे-का-सारा किता इकट्ठा है। उपजाऊ इतना कि क्या पूछो।"

दीना ने इस पर उत्सुकतापूर्वक सौदागर से सवाल-पर-सवाल किये। उसने बताया:

"वहां इतनी जमीन है, इतनी कि तुम महीनों चलो तो पूरी न हो। वहां के लोग ऐसी सीधे हैं, जैसे भेड़ और जमीन समझो, मुफ्त के भाव ले सकते हो।"

दीना ने सोचा, यह ठीक रहेगा। भला मैं अब हजार एकड़ के लिए हजार रुपया क्यों फंसाऊं?

अगर वहां जाकर इतना रुपया जमीन में लगाऊं, तो यहां से कई गुनी ज्यादा जमीन मुझे पड़ जायगी।

दीना ने पूछताछ की कि उस जगह कैसे जाया जाय? सौदागर ने सब बतला दिया। वह चला गया तो दीना ने भी अपनी तैयारी शुरु की। बीवी को कहा कि घर देखना-भालना और खुद एक आदमी साथ ले, यात्रा को निकल पड़ा। रास्ते में एक शहर में ठहरकर, वहां से चाय के डब्बे, शराब और इसी तरह और उपहार की चीजें, जो सौदागर ने बताई थीं, ले लीं। फिर दोनों बढ़ते गये, बढ़ते गये। चलते-चलते आखिर सातवें रोज वहां पहुंचे, जहां से कोल लोगों की बस्ती शुरु होती थी। उसने देखा कि सौदागर ने जो बात बताई थी, वह सही थी। दरिया के पास जमीन-ही-जमीन थी। सब खाली। ये लोग उससे काम न लेते थे। कपड़े या सिरकी के तम्बू में रहते, शिकार करते, मवेशी पालते और ऐसे ही मौज करते थे। ने रोटी बनाना जानते थे, न अनाज उगाना सीखा था। दूध का छाछ-मठा बनाते, पनीर बनाते और उसी एक तरह की शराब भी तैयार कर लेते थे। ये सब काम औरतें करती। मर्द खाने-पीने और फुर्सत के वक्त चैन की बंसी बजाने में रहते। वे लोग मजबूत और स्वस्थ थे और काम-धाम के नाम बिना कुछ किये मगन रहते थे। अपने से बाहर उन्हें कुछ पता न था। पढ़ना-लिखना जानते नहीं थे और हिन्दी तक नहीं जानते थें पर थे भले-सीधे स्वभाव के। दीना को देखते ही वे अपने तम्बुओं से निकल आये और उसके चारों तरफ जमघट लगाकर खड़े हो गये। उनमें से एक दुभाषिये की मार्फत दीना ने बताया कि मैं जमीन की खातिर आया हूं। वे लोग बड़े खुश मालूम हुए। बड़ी आवभगत के साथ वे उसे अपने अच्छे-स-अच्छे डेरे में ले गये। वहां कालीन पर बिछे गद्दे पर बिठाया ओर खुद नीचे चारों ओर घिसकर बैठ गये। उसे पीने को चाय दी और दारु भी। उसकी मेहमानी में बढ़-बढ़कर दावत हुई। दीना ने भी गाड़ी में से अपने पास से भेंट की चीजें निकाली और सबको थोड़ी-थोड़ी चाय बांटी। कोल लोग बड़े खुश थे। उन्होंने आपस में इए अजनबी की बाबत खूब चर्चा की। फिर दुभाषिये से कहा कि मेहमान को सब समझा दो।

दुभाषिये ने कहा कि ये लोग कहना चाहते हैं कि हम आपके आने से खुश हैं। हमारे यहां का कायदा है कि मेहमान की खातिर जो हमसे बन सके, करें। आपकी कृपा के हम कृतज्ञ हैं। बतलाइए कि हमारे पास कौन-सी चीलज है, जो आपको सबसे पसंद हैं, ताकि हम उसीसे आपकी खातिर कर सकें।

दीना ने जवाब दिया कि जिस चीज को देखकर मैं बहुत खुश हूं, वह आपकी जमीन है। हमारे यहां जमीन की कमी है और वह उपजाऊ भी इतनी नहीं होती, लेकिन यहां उसका कोई पार नहीं है और वह जमीन उपजाऊ भी खूब है। मैंने तो अपनी आंखों से यहां-जैसी धरती दूसरी देखी नहीं।

दुभाषिये ने दीना की बात अपने लोगों को समझा दी। कुछ देर वे आपस में सलाह करते रहे। दीना समझ नहीं सकता कि वे क्या कह रहे हैं। लेकिन उसने देखा कि वे बहुत खुश मालूम होते है, बड़े हंस रहे हैं और जोर-जोर से बोल रहे हैं। अनंतर वे चुप हुए और दीना की तरफ देखने लगे।

फिर आपस में बात करने लगे। मालूम पड़ा कि जैसे उनमें कुछ दुविधा है। दीना ने पूछा कि उन लोगों में अब किस बात की अटक है। दुभाषिये ने बताया कि उनमें कुछ की राय है कि सरदार से जमीन देने के बारे में और पूछ लेना चाहिए, गैर-हाजिरी में कुछ कर डालना ठीक नहीं है। दूसरों का खयाल है कि इस बात में सरदार के लौटने की राह देखने की जरुरत नहीं है, जरा-सी तो बात है।

यह विवाद चल रहा था कि एक आदमी बड़ी-सी बालदार टोपी पहने वहां आ पहुंचा। सब चुप होकर उसके संम्मान में खड़े हो गये। दुभाषिये ने कहा कि यही हमारे सरदार है।

दीना ने फौरन अपने सामान में से एक बढ़िया लबाद निकाला और चाय का एक बड़ा डिब्बा, और अन्य चीजें सरदार को भेंट कीं। सरदार ने भेंट स्वीकार की और अपने आसन पर आ बैठा। बैठते ही कोल लोगों ने उससे कुछ कहना शुरु किया। सरदार कुछ देर सुनता रहा, फिर उसने उन्हें चुप रहने का इशारा किया। उसे बाद दीना की तरफ मुखातिब होकर हिन्दुस्तानी में कहा:

"इन भाइयों ने जो कहा, ठीक है। जितनी जमीन चाहे चुन लो। हमारे यहां उसका घाटा नहीं है।"

दीना ने सोचा कि मैं मनचाहे जितनी जमीन कैसे ले सकता हूं। पक्का करने के लिए दस्तावेज वगैरा भी तो चाहिए, नहीं तो जैसे आज इन्होंने कह दिया कि यह तुम्हारी है, पीछे वैसे ही उसे ले भी सकते हैं।

प्रकट में उसने कहा, "आपकी दया के लिए मैं कृतज्ञ हूं। आपके पास बहुत धरती है और मुझे थोड़ी-सी चाहिए। लेकिन मुझे भरोसा होना चाहिए कि मेरा अपना छोटा टुकड़ा कौन-सा है और यह कि वह मेरा ही है। क्या ऐसा नहीं हो सता कि जमीन को नाप लिया जाय और उतना टुकड़ा फिर मेरे हवाले कर दिया जाय? मरना-जीना ईश्वर के हाथ है और संसार में यही चक्कर चलता है। आप दयावान लोग तो मुझे यह देते हैं, पर हो सता है कि पीछे आपकी औलाद उसीको वापस ले लेना चाहे तब?"

सरदार ने कहा, "तुम्हारी बात ठीक है। जमीन तुम्हारे हवाले ही कर दी जायगी।"

दीना ने कहा, "सुना है, यहां एक सौदागर आया था। उसको भी आपने जमीन दी थी और उस बाबत कागज पक्का कर दिया था। वैसे ही मैं चाहता हूं कि कागज पक्का हो जाय।"

सरदार समझ गया।

बोला, "हां, जरुर। यह तो आसानी से हो सकता है। हमारे यहां एक मुंशी है, कस्बे में चलकर लिखा-पढ़ी पक्की कर ली जायगी और रजिस्ट्री हो जायगी।"

दीना ने पूछा, "कीमत की दर क्या होगी?"

"हमारी दर तो एक ही है। एक दिन के एक हजार रुपये।"

दीना समझा नहीं। बोला, "दिन! दिन का हिसाब यह कैसा है? यह बताइये कितने एकड़?"

सरदार ने कहा, "यह सब गिनना-गिनाना हमसे नही होता। हम तो दिन कि हिसाब से बेचते हैं, जितनी जमीन एक दिन में पैदल चलकर तुम नाप डालो, वही तुम्हारी। और कीमत है ही दिनभर की एक हजार।"

दीना अचरज में पड़ गया। कहा, "एक दिन में तो बहुत-सी जमीन को घेरा जा सकता है।"

सरदार हंसा। बोला, "हां, क्यों नही। बस, वह सब तुम्हारी। लेनि एक शर्त है। अगर तुम उसी दिन, उसी जगह न आ गये, जहां से चले थे, तो कीमत जब्त समझी जायगी।"

"लेकिन मुझे पता कैसे चलेगा कि मैं इस जगह से चला था।"

"क्यों, हम सब साथ चलेंगे और जहां तुम ठहरने को कहोगे, ठहरे रहेंगे। उस जगह से शुरु करना और वहीं लौट आना। साथ फावड़ा ले लेना। जहां जरुरी सूमझा, निशान लगा दिया। हर मोड़ पर एक गड्ढा किया और उस पर घास को जरा ऊंचा चिन दिया। पीछे फिर हमलोग चलेंगे और हल से इस निशान से उस निशान तक हदबन्दी खींच देंगे। अब दिन भर में जितना चाहो, बडे-से-बड़े चक्कर तुम लगा सकते हो। पर सूरज छिपने से पहले जहां से चले थे, वहां आ पहुंचना। जितनी जमीन तुम इस तरह नाप लोगे, वह तुम्हारी हो जायगी।"

दीना खुश हुआ। तय हुआ कि अगले सवेरे ही चलना शुरु कर दिया जायगा। फिर कुछ गपशप हुई, खाना-पीना हुआ। ऐसे ही करते-कराते रात हो गई। दीना के लिए उन्होंने खूब आराम का परों का बिस्तर लगा दिया और वे लोग रातभर के लिए विदा हो गये। कह गये कि पौ फटने से पहले ही वे आ जायंगे, ताकि सूरज निकलने से पहले-पहले मुकाम पर पहुंच जाया जाय।

दीना अपने परों के बिस्तरे पर लेटा तो रहा, पर उसे नींद ने आई। रह-रहकर वह जमीन के बारे में सोचने लगता था:

"चलकर मैं कितनी जमीन नाप डालूं कुछ ठिकाना है! एक दिन में पैंतीस मील तो आसानी से कर ही लूंगा। दिन आजकल लंबे होते हैं और पैंतीस मील!—कितनी जमीन उसमें आ जायगी! उसमें से घटिया वाली तो बेच दूंगा या किराये पर उठा दूंगा, लेकिन जो चुनी हुई बढ़िया होगी वहां अपना फाम्र बनाऊंगा। दो दर्जन तो बैल फिलहाल काफी होंगे। दो आदमी भी रखने होंगे। कोई डेढ़ सौ एकड़ में तो काश्त करुंगा। बाकी चराई के लिए।"

दीना रातभर पड़ा जमीन-आसमान के कुलाबे मिलाता रहा। देर-रात कहीं थोड़ी नींद आई। आंख झपी होगी किसी के बाहर से खिलखिलाकर हंसने की आवाज उसके कानों में आई। अचरज हुआ कि यह कौन हो सकता है? उठकर बाहर आकर देखा कि कोल लोगों का वह सरदार ही बाहर बैठा जोर-जोर से हंस रहा है। हंसी के मारे अपना पेट पकड़ रक्खा है। पास जाकर दीना ने पूछना चाहा, "आप ऐसे हंस क्यों रहे हैं?" लेकिन अभी पूछ पाया नहीं था कि देखता क्या है कि वहां सरदार तो है नहीं, बल्कि वह सौदागर बैठा है, जो अभी कुछ दिन पहले उसे अपने देश में मिला था ओर जिसने इस जमीन की बात बताई थी। तब दीना उससे पूछने को हुआ कि यहां तुम कैसे हो और कब आये? लेकिन देखा तो वह सौदागर भी नहीं, बल्कि वही पुराना किसान है जिसने मुद्दत हुई तब सतलज-पार की जमीन का पता दिया था। लेकिन फिर जो देखता है तो वह किसान भी नहीं है, बल्कि खुद शैतान है, जिसके खुर हैं और सींग है। वही वहां बैठा ठट्टा मारकर हंस रहा है। सामने उसके एक आदमी पड़ा हुआ है—नंगे पैर, बदन पर बस एक कुर्त्ता-धोती। जमीन पर वह आदमी औंधे मुंह बेहाल पड़ा है। दीना ने सपने में ही ध्यान से देखा कि ऐसा पड़ा हुआ आदमी कौन है और कैसा? देखता क्या है कि वह आदमी दूसरा कोई नहीं, खुद दीना ही है और उसकी जान निकल चुकी है। यह देखकर मारे डर के वह घबरा गया। इतने में उसी आंख खुल गई।

उठकर सोचा कि सपने में आदमी जाने क्या-क्या वाहियात बातें देख जाता है। अंह्! यह सोचकर मुंह मोउ़ दरवाजे के बाहर झांककर जो देखा तो सवेरा होनेवाला था। सोचा, समय हो गया। उन्हें अब जगा देना चाहिए। चलने में देर ठीक नहीं।

वह खड़ा हो गया और गाड़ी में सोते हुए अपने आदमी को जगाया। कहा कि गाड़ी तैयार करो। खुद कोल लोगों को बुलाने चल दिया।

जाकर कहा, "सवेरा हो गया है। जमीन नापने चल पड़ना चाहिए।" कोल लोग सब उठे और इकट्ठे हुए। सरदार भी आ गये। चलने से पहले उन्होंने चाय की तैयारी की और दीना को चाय के लिए पूछा। लेकिन चाय में देर होने का खयाल कर उसने कहा, "अगर जाना है तो हमको चल देना चाहिए। वक्त बहुत हो गया।"

कोल तैयार हुए और सब चल पड़े। कुछ घोड़े पर, कुछ गाड़ी में। दीना नौकर के साथ अपनी छोटी बहली में सवार था। फावड़ा उसने साथ रख लिया था। खुले मैदान में जब पहुंचे, तड़का फूट ही रहा था। पास एक ऊंची टेकड़ी थी, पार खुला बिछा मैदान। टेकड़ी पर पहुंचकर गाड़ी-घोड़ों से सब उतर आये और एक जगह जमा हुए। सरदार ने फिर आगे जाने कितनी दूर तक फैले मैदान की तरफ हाथ उठाकर दीना से कहा कि देखते हो, जहांतक यह सब, आंख जाती है वहांतक, हमलोगों की जमीन है। उसमें जितनी तुम चाहों, ले लो।

दीना की आंखें चमक उठीं। धरती एकदम अछूती पड़ी थी। हथेली की तरह हमवार और मुलायम। काली ऐसी कि बिनौला। और जहां कहीं जरा निचान था, वहां छाती-छाती जितनी तरह-तरह की हरियाली छाई थी।

सरदार ने अपने सिर की रोएंदार टोपी उतारी और धरती पर रख दी। कहा "यह निशान रहा। यहां से चलो और यहां आ जाओ। जितनी जमीन चल लोगे, वहीं तुम्हारी।"

दीना ने भी रुपये निकाले और टोपी पर निगकर रख दिये। फिर उसने पहना हुआ अपना कोट उतार डाला और धोती को कस लिया। अंगोछे में रोटी रक्खी, आस्तीनों चढ़ाई, पानी का बन्दोबस्त किया, आदमी से फावड़ा लिया, और चलने को तैयार खड़ा हो गया। कुछ क्षण सोचता रह गया कि किस तरफ को चलना बेहतर होगा। सभी तरफ का लालच था।

उसने तय किया कि आगे देखा जायगा। पहले तो सामने सूरज की तरफ ही चला चलूं। एक बार पूरब की ओर मुंह करके खड़ा हो गया, अंगड़ाई लेकर बदन की सुस्ती हटाई और धरती के किनारे सूरज के मुंह चमकाने का इंतजार करने लगा।

सोचने लगा कि मुझे वक्त नहीं खोना चाहिए और ठंड-ठंड में रास्ता अच्छा पार हो सकता है। सूरज की पहली किरण का उनकी ओर आना था कि दीना, कंधे पर फावड़ा संभाल, खुले मैदान में कदम बढ़ाकर चल दिया।

शुरु में वह न धीमे चला, न तेज। हजार-एक गज चलने पर वह ठहरा। वहां एक गड्ढा किया और घास ऊंची चिन दी कि आसानी से दीख सके। फिर आगे बढ़ा। उसे बदने में फुर्ती आ गई। उसने चाल तेज कर दी। कुछ देर बाद दूसरा गड्ढा खोदा।

अब पीछे मुड़कर देखा। सूरज की धूप में टेकड़ी साफ दीखती थी। उस पर आदमी खड़े थे और गाड़ी के पहियों के आरे तक चमकते दीखते थे। अंदाजन तीन मील तो वह आ गया होगा। धूप में ताप आता जाता था। कुर्ते पर से बास्कट उतारकर उसने कंधे पर डाल ली और फिर चल पड़ा। अब खासी गर्मी होने लगी। उसने सूरज की तरफ देखा। वक्त हो गया था कि कुछ खाने-पीने की भी सोची जाती।

"एक पहर तो बीत गया। लेकिन दिन में चार पहर होते हैं। अंह्, अभी जल्दी है। लेकिन जूते उतार डालूं।" यह सोच उसने जूते उतारकर अपनी धोती में खोंस लिये और बढ़ चला। अब चलना आसान था।

सोचा, "अभी तीन-एक मील तो और भी चला चलूं। तब दूसरी दिशा लूंगा। कैसी उमदा जगह ह। इसे हाथ से जाने देना हिमाकत है; लेकिन क्या अजब बात है कि जितना आगे बढ़ो, उतनी जमीन एक-से-एक बढ़कर मिलती है।"

कुछ देर वह सीधा बढ़ा चला। फिर पीछे मुड़कर देखा तो टेकड़ी मुश्किल से दीख पड़ती थी और उस पर के आदमी रेंगती चींटी-से मालूम होते थे और वहां धूप में जाने क्या कुछ चलता हुआ-सा दीख पड़ता था।

दीना ने सोचा, "ओह, मैं इधर काफी बढ़ आया हूं। अब लौटना चाहिए।" पसीना बेहद आ रहा था और प्यास भी लग आई थी।

यहां ठहरकर उसने गड्ढा किया, ऊपर घास को ढेर चिन दिया। उसके बाद पानी पीकर सीधा बाई। तरफ मुड़ गया। चलता चला गया, चलता चला गया। घास ऊंची थी और गरमी बढ़ रही थी। वह थकने लगा। उसने सूरज की तरफ देखा। सिर पर दोपहर हो आई थी।

सोचा, अब जरा आराम कर लेना चाहिए। वह बैठ गया। रोटी निकालकर खाई और कुछ पानी पिया। लेटा नहीं कि कहीं नींद न आ जाय। इस तरह कुछ देर बैठ, फिर आगे बढ़ चला।

पहले तो चलना आसान हुआ। खाने से उसमें दम आ गया था। लेकिन गरमी तीखी हो चली और आंखों में उसके ऊंघ-सी आने लगी। तो भी वह चलता ही चला गया। सोचा कि तकलीफ घड़ी-दो-घड़ी की है, आराम जिंदगी भर का हो जायगा।

इस तरह भी उसने काफी लम्बी राह नापी। वह बाईं तरफ मुड़ने वाला ही था कि आगे जमीन उपजाऊ दिखाई दी। उसने सोचा कि इस टुकड़े को छोड़ना तो मूर्खता होगी। यहां सनी की बाड़ी ऐसी उगेगी कि क्या कहना! यह सोच उसने उस टुकड़े को भी नाप डाला और पार आकर गड्ढे का निशान बना दिया। फिर दूसरी तरफ मुड़ा। जो टेकड़ी की तरफ देखा तो ताप के मारे हवा कांपती-सी मालूम हुई। उस कंपकंपी के धुंधकारे में से वह टेकड़ी की जगह मुश्किल से चीन्ह पड़ती थी।

दीना ने सोचा कि क्षेत्र की ये दो भुजाएं मैंने ज्यादा मैंने नाप डाली है। अब इधर कुछ कम ही रहने दूं। वह तेज कदमों से तीसरी तरफ बढ़ा। उसने सूरज को देखा। सूरज कोई दो-तिहाई। अपना चक्कर काट चुका था। मुकाम से अभी वह दस मील दूर था। उसने सोचा कि छोड़ा जाने भी दो। मेरी जमीन की एक बाजू छोटी रह जायगी तो छोटी सही। लेकिन अब सीधी लकीर में मुझे वापस चलना चाहिए। जो ऐसे कहीं दूर निकल गया। तो बाजी गई। अरे, इतनी ही जमीन क्या थोड़ी है!

यह सोच दीना ने वहां तीसरे गड्ढे का निशान डाल दिया और टेकड़ी की तरफ मुंह कर ठीक उसी सीध में चल दिया।

नाक की सीध बांधकर सवह टेकड़ी की तरफ चला। लेकिन अब चलते मुश्किल होती थी। धूम उसका सत ले चुकी थी। नंगे पैर जगह-जगह कट और छिल गये थे और टांगें जवाब दे रही थीं। जरा आराम करने का उसका जी हुआ, लेकिन यह कैसे हो सकता था? सूरज छिपने से पहले उसे वहां पहुंच जाना था। सूरज किसी की बाट देखता बैठा नहीं रहता! वह पल-पल नीचे ढल रहा था।

उसके मन में सोच होने लगा कि मुझसे बड़ी भूल हुई। मैंने इतने पैर पसारे क्यों? अगर कहीं वक्त तक न पहुंचा तो?

उसने फिर टेकड़ी की तरफ देखा, फिर सूरज की तरफ। मुकाम से अभी वह दूर था और सूरज धरती के पास झूक रहा था।

दीना जी-तोड चलने लगा। चलने में सांस फूलती और कठिनाई होती थी; लेकिन तेज-पर तेज कदम वह रखता गया। बढ़ा चला, लेकिन जगह अब भी दूर बनी थी। यह देख उसने भागना शुरु किया। कंधे से वास्कट फेंक दी, जूते दूर हटाए, टोपी अलग की, बस साथ में निशान लगाने के लिए वह हल्का फावड़ा रहने दिया।

रह-रहकर सोच होता कि मैं क्या करुं? मैंने बिसात से बाहर चीज हथियानी चाही।

उसमें बना काम बिगड़ा जा रहा है। अब सूरज छिपने से पहले मैं वहां कैसे पहुंचूंगा?

इस सोच और डर के कारण वह और हांफने लगा। वह पसीना-पसीना हो रहा था, धोती गीली होकर चिपकी जा रही थी और मुंह सूख गया था। लेकिन फिर भी वह भागता ही जाता था। छाती उसकी लुहार की धौंकनी की तरह चल उठी, दिल भीतर हथौड़े की चोट-सा धड़कने लगा। उधर टांगे बेबस हुई जा रही थीं। दीना को डर हुआ कि इस थकान के मारे कहीं गिरकर ढेर ही न हो जाय।

हाल यह था, पर रुक वह नहीं सका। इतना भागकर भी अगर मैं जब रूकूंगा तो वे सब लोग मुझ पर हंसेगे और बेवकूफ बनायंगे, इसलिए उसने दौड़ना न छोड़ा दौड़े ही गया। आगे कोल लोगों की आवाज सुन पड़ती थी। वे उसको जोर जोर से कहकर बुला रहे थे। इन आवाजों पर उसका दिल और सुलग उठा। अपनी आखिरी ताकत समेट वह दौड़ा।

सूरज धरती से लगा जा रहा था। तिरछी रोशनी के कारण वह खूब बड़ा और लहू-सा लाल दीख रहा था। वह अब डूबा, अब डूबा। सूरज बहुत नीचे पहुंच गया था। लेकिन दीना भी जगह के बिल्कुल किनारे आ लगा था। टेकड़ी पर हाथ हिला-हिलाकर बढ़ावा देते हुए कोल लोग उसे सामने दिखाई देते थे। अब तो जमीन पर रक्खी वह टोपी भी दीखने लगी, जिस पर उसकी रकम भी रक्खी थी। वहां बैठा सरदार भी दिखाई दिया- वह पेट पकड़े हंस रहा था।

दीना को सपने की याद हो आई।

उसने सोचा कि हाय, जमीन तो काफी नाप डाली है, लेकिन क्या ईश्वर मुझे उसको भोगने के लिए बचने देगा? मेरी जान तो गई दीखती है। मैं मुकाम तक अब नहीं पहुंच सकूंगा। दीना ने हसरत-भरी निगाह से सूरज की तरफ देखा सूरज धरती को छू चुका था। वह बची-खुची अपनी शक्ति से आगे बढ़ा। कमर झुकाकर भागा, जैसे कि टांगें साथ न देती हों। टेकड़ी पर पहुंचते-पहुंचते अंधेरा हो आया था। उसने ऊपर देखा-सूरज छिप चुका था। उसके मुंह से एक चीख–सी निकल गई, "ओह, मेरी सारी मेहनत व्यर्थ गई!"-यह सोचकर वह थमने को हुआ, लेकिन उसे सुन पड़ा कि खड़े हैं और उन्हें सूरज अब भी दीख रहा होगा। सूरज छिपा नहीं है, अगर्चे मुझको नहीं दीखता। यह सोचकर उसने लंबी सांस खींची और टेकड़ी पर आंख मूंदकर दौड़ा। चोटी पर अभी धूप थी। पास पहुंचा और सामने टोपी देखी। बराबर सरदार बैठा वहीं पेट पकड़े हंस रहा था। दीना को फिर अपना सपना याद आया और उसके मुंह से चीख निकल पड़ी। टांगों ने जवाब दे दिया।

वह मुंह के बल आगे को गिरा और उसके हाथ टोपी तक जा पहुंचे।

"खूब! खूब!" सरदार ने कहा, "देखो, उसने कितनी जमीन ले डाली!"

दीना का नौकर दौड़ा आया और उसने मालिक को उठाना चाहा। लेकिन देखता क्या है कि मालिक के मुंह से खून निकल रहा है।

दीना मर चुका था। कोल लोग दया से और व्यंग्य से हंसने लगे। नौकर ने फावड़ा लिया और दीना के लिए कब्र खोदी और उसमें लिटा दिया। सिर से पांव तक कुल छ: फुट जमीन उसे काफी हुई।

मक्सिम गोर्की की कहानी वह लड़का


यह छोटी-सी कहानी सुनाना काफी कठिन होगा-इतनी सीधी-सादी है यह! जब मैं अभी छोटा ही था, तो गरमियों और वसन्त के दिनों में रविवार को, अपनी गली के बच्चों को इकट्ठा कर लेता था और उन्हें खेतों के पार, जंगल में ले जाता था। इन पंछियों की तरह चहकते, छोटे बच्चों के साथ दोस्तों की तरह रहना मुझे अच्छा लगता था।
बच्चों को भी नगर की धूल और भीड़ भरी गलियों से दूर जाना अच्छा लगता था। उनकी माँएँ उन्हें रोटियाँ दे देतीं, मैं कुछ मीठी गोलियाँ खरीद लेता, क्वास की एक बोतल भर लेता और फिर किसी गड़रिये की तरह भेड़ों के बेपरवाह मेमनों के पीछे-पीछे चलता जाता-शहर के बीच, खेतों के पार, हरे-भरे जंगल की ओर, जिसे वसन्त ने अपने सुन्दर वस्त्रों से सजा दिया होता।
आमतौर पर हम सुबह-सुबह ही शहर से बाहर निकल आते, जब कि चर्च की घण्टियाँ बज रही होतीं और बच्चों के कोमल पाँवों के जमीन पर पड़ने से धूल उठ रही होती। दोपहर के वक्त, जब दिन की गरमी अपने शिखर पर होती, तो खेलते-खेलते थककर, मेरे मित्र जंगल के एक कोने में इकट्ठे हो जाते। तब खाना खा लेने के बाद छोटे बच्चे घास पर ही सो जाते-झाड़ियों की छाँव में-जबकि बड़े बच्चे मेरे चारों ओर घिर आते और मुझे कोई कहानी सुनाने के लिए कहते। मैं कहानी सुनाने लगता और उसी तेजी से बतियाता, जिससे मेरे दोस्त और जवानी के काल्पनिक आत्मविश्वास तथा जिन्दगी के मामूली ज्ञान के हास्यास्पद गर्व के बावजूद मैं अक्सर अपने आपको विद्वानों से घिरा हुआ किसी बीस वर्षीय बच्चे-सा महसूस करता।
हमारे ऊपर अनन्त आकाश फैला है, सामने है जंगल की विविधता-एक जबरदस्त खामोशी में लिपटी हुई; हवा का कोई झोंका खड़खड़ाता हुआ पास से निकल जाता है, कोई फुसफुसाहट तेजी से गुजर जाती है, जंगल की सुवासित परछाइयाँ काँपती हैं और एक बार फिर एक अनुपम खामोशी आत्मा में भर जाती है।
आकाश के नील विस्तार में श्वेत बादल धीरे-धीरे तैर रहे हैं, सूरज की रोशनी से तपी धरती से देखने पर आसमान बेहद शीतल दिखता है और पिघलते हुए बादलों को देखकर बड़ा अजीब-सा लगता है।
और मेरे चारों ओर हैं ये छोटे-छोटे, प्यारे बच्चे, जिन्हें जिन्दगी के सभी गम और खुशियाँ जानने के लिए मैं बुला लाया हूँ।
वे थे मेरे अच्छे दिन-वे ही थीं असली दावतें, और जिन्दगी के अँधेरों से ग्रसित मेरी आत्मा, जो बच्चों के खयालों और अनुभूतियों की स्पष्ट विद्वत्ता में नहाकर तरो-ताजा हो उठती थी।
एक दिन जब बच्चों की भीड़ के साथ शहर से निकलकर मैं एक खेत में पहुँचा, तो हमें एक अजनबी मिला - एक छोटा-सा यहूदी - नंगे पाँव, फटी कमीज, काली भृकुटियाँ, दुबला शरीर और मेमने-से घुँघराले बाल। वह किसी वजह से दुखी था और लग रहा था कि वह अब तक रोता रहा है। उसकी बेजान काली आँखें सूजी हुईं और लाल थीं, जो उसके भूख से नीले पड़े चेहरे पर काफी तीखी लग रही थीं। बच्चों की भीड़ के बीच से होता हुआ, वह गली के बीचोंबीच रुक गया, उसने अपने पाँवों को सुबह की ठण्डी धूल में दृढ़ता से जमा दिया और सुघड़ चेहरे पर उसके काले ओठ भय से खुल गये - अगले क्षण, एक ही छलाँग में, वह फुटपाथ पर खड़ा था।
“उसे पकड़ लो!” सभी बच्चे एक साथ खुशी से चिल्ला उठे, “नन्हा यहूदी! नन्हे यहूदी को पकड़ लो!”
मुझे उम्मीद थी कि वह भाग खड़ा होगा। उसके दुबले, बड़ी आँखोंवाले चेहरे पर भय की मुद्रा अंकित थी। उसके ओठ काँप रहे थे। वह हँसी उड़ाने वालों की भीड़ के शोर के बीच खड़ा था। वह पाँव उठा-उठाकर अपने आपको जैसे ऊँचा बनाने को कोशिश कर रहा था। उसने अपने कन्धे राह की बाड़ पर टिका दिये थे और हाथों को पीठ के पीछे बाँध लिया था।
और तब अचानक वह बड़ी शान्त और साफ और तीखी आवाज में बोल उठा - “मैं तुम लोगों को एक खेल दिखाऊँ?”
पहले तो मैंने सोचा कि यह उसका आत्मरक्षा का कोई तरीका रहा होगा - बच्चे उसकी बात में रुचि लेने लगे और उससे दूर हट गये। केवल बड़ी उम्र के और अधिक जंगली किस्म के लड़के ही उसकी ओर शंका और अविश्वास से देखते रहे - हमारी गली के लड़के दूसरी गलियों के लड़कों से झगड़े हुए थे। उनका पक्का विश्वास था कि वे दूसरों से कहीं ज्यादा अच्छे हैं और वे दूसरों की योग्यता की ओर ध्यान देने को भी तैयार नहीं थे।
पर छोटे बच्चों के लिए यह मामला एकदम सीधा-सादा था।
“दिखाओ - जरूर दिखाओ!”
वह खूबसूरत, दुबला-पतला लड़का बाड़ से परे हट गया। उसने अपने छोटे-से शरीर को पीछे की ओर झुकाया। अपनी अँगुलियों से जमीन को छुआ और अपनी टाँगों को ऊपर की ओर उछालकर हाथों के बल खड़ा हो गया।
तब वह घूमने लगा, जैसे कोई लपट उसे झुलसा रही हो - वह अपनी बाँहों और टाँगों से खेल दिखाता रहा। उसकी कमीज और पैण्ट के छेदों में से उसके दुबले-पतले शरीर की भूरी खाल दिखाई दे रही थी - कन्धे, घुटने और कुहनियाँ तो बाहर निकले ही हुए थे। लगता था, अगर एक बार फिर झुका, तो ये पतली हड्डियाँ चटककर टूट जाएँगी। उसका पसीना चूने लगा था। पीठ पर से उसकी कमीज पूरी तरह भीग चुकी थी। हर खेल के बाद वह बच्चों की आँखों में, बनावटी, निर्जीव मुसकराहट लिये हुए, झाँककर देख लेता। उसकी चमक रहित काली आँखों का फैलना अच्छा नहीं लग रहा था - जैसे उनमें से पीड़ा झलक रही थी। वे अजीब ही ढंग से फड़फड़ाती थीं और उसकी नजर में एक ऐसा तनाव था, जो बच्चों की नजर में नहीं होता। बच्चे चिल्ला-चिल्लाकर उसे उत्साहित कर रहे थे। कई-एक तो उसकी नकल करने लगे थे।
लेकिन अचानक ये मनोरंजक क्षण खत्म हो गये। लड़का अपनी कलाबाजी छोड़कर खड़ा हो गया और किसी अनुभवी कलाकार की-सी नजर से बच्चों की ओर देखने लगा। अपना दुबला-सा हाथ आगे फैलाकर वह बोला, “अब मुझे कुछ दो!”
वे सब खामोश थे। किसी ने पूछा, “पैसे?”
“हाँ,” लड़के ने कहा।
“यह अच्छी रही! पैसे के लिए ही करना था, तो हम भी ऐसा कर सकते थे...”
लड़के हँसते हुए और गालियाँ बकते हुए खेतों की ओर दौड़ने लगे। दरअसल उनमें से किसी के पास पैसे थे भी नहीं और मेरे पास केवल सात कोपेक थे। मैंने दो सिक्के उसकी धूल भरी हथेली पर रख दिये। लड़के ने उन्हें अपनी अँगुली से छुआ और मुसकराते हुए बोला, “धन्यवाद!”
वह जाने को मुड़ा, तो मैंने देखा कि उसकी कमीज की पीठ पर काले-काले धब्बे पड़े हुए थे।
“रुको, वह क्या है?”
वह रुका, मुड़ा, उसने मेरी ओर ध्यान से देखा और बड़ी शान्त आवाज में मुस्कराते हुए बोला, “वह, पीठ पर? ईस्टर के मौके पर एक मेले में ट्रपीज करते हुए हम गिर पड़े थे - पिता अभी तक चारपाई पर पड़े हैं, पर मैं बिलकुल ठीक हूँ।”
मैंने कमीज उठाकर देखा - पीठ की खाल पर, बायें कन्धे से लेकर जाँघ तक, एक काला जख़्म का निशान फैला हुआ था, जिस पर मोटी, सख्त पपड़ी जम चुकी थी। अब खेल दिखाते समय पपड़ी फट गयी थी और वहाँ से गहरा लाल खून निकल आया था।
“अब दर्द नहीं होता,” उसने मुस्कराते हुए कहा, “अब दर्द नहीं होता... बस, खुजली होती है...”
और बड़ी बहादुरी से, जैसे कोई हीरो ही कर सकता है, उसने मेरी आँखों में झाँका और किसी बुजुर्ग की-सी गम्भीर आवाज में बोला, “तुम क्या सोचते हो कि अभी मैं अपने लिए काम कर रहा था! कसम से-नहीं! मेरे पिता... हमारे पास एक पैसा तक नहीं है। और मेरे पिता बुरी तरह जख्मी हैं। इसलिए - एक को तो काम करना ही पड़ेगा, साथ ही... हम यहूदी हैं न! हर आदमी हम पर हँसता है... अच्छा अलविदा!”
वह मुस्कराते हुए, काफी खुश-खुश बात कर रहा था। और तब अपने घुँघराले बालोंवाले सिर को झटका देकर अभिवादन करते हुए वह चला गया - उन खुले दरवाजों वाले घरों के पार, जो अपनी काँच की मारक उदासीनता भरी आँखों से उसे घूर रहे थे।
ये बातें कितनी साधारण और सीधी हैं - हैं न? लेकिन अपने कठिनाई के दिनों में मैंने अक्सर उस लड़के के साहस को याद किया है - बड़ी कृतज्ञता से भर कर!

अंतोन चेखव की कहानी कमजोर


आज मैं अपने बच्चों की अध्यापिका यूल्या वसिल्येव्ना का हिसाब चुकता करना चाहता था।
"बैठ जाओ यूल्या वसिल्येव्ना।" मैंने उससे कहा, "तुम्हारा हिसाब चुकता कर दिया जाए। हाँ, तो फ़ैसला हुआ था कि तुम्हें महीने के तीस रूबल मिलेंगे, है न?"
"जी नहीं, चालीस।"
"नहीं, नहीं, तीस में ही बात की थी । तुम हमारे यहाँ दो ही महीने तो रही हो।"
"जी, दो महीने और पाँच दिन।"
"नहीं, पूरे दो महीने। इन दो महीनों में से नौ इतवार निकाल दो। इतवार के दिन तो तुम कोल्या को सिर्फ़ सैर कराने के लिए ही लेकर जाती थी। और फिर तीन छुट्टियाँ भी तो तुमने ली थीं... नौ और तीन, बारह। तो बारह रूबल कम हो गए। कोल्या चार दिन तक बीमार रहा, उन दिनों तुमने उसे नहीं पढ़ाया। सिर्फ़ वान्या को ही पढ़ाया, और फिर तीन दिन तुम्हारे दाँत में भी दर्द रहा। उस समय मेरी पत्नी ने तुम्हें छुट्टी दे दी थी। बारह और सात हुए उन्नीस। साठ में से इन्हें निकाल दिया जाए तो बाक़ी बचे... हाँ, इकतालीस रूबल,क्यों ठीक है न?”
यूल्या की आँखों में आँसू भर आए थे।
"और नए साल के दिन तुमने एक कप-प्लेट तोड़ दिया था । दो रूबल उसके घटाओ। तुम्हारी लापरवाही से कोल्या ने पेड़ पर चढ़कर अपना कोट फाड़ दिया था। दस रूबल उसके और फिर तुम्हारी लापरवाही के कारण ही नौकरानी वान्या के बूट लेकर भाग गई। सो, पाँच रूबल उसके भी कम हुए... दस जनवरी को दस रूबल तुमने उधार लिए थे। इकतालीस में से सत्ताइस निकालो। बाकी रह गए- चौदह।"
यूल्या की आँखों में आँसू उमड़ आए थे, "मैंने एक बार आपकी पत्नी से तीन रूबल लिए थे।"
"अच्छा, यह तो मैंने लिखा ही नहीं। चौदह में से तीन निकालो, अब बचे ग्यारह। सो, यह रही तुम्हारी तनख़्वाह ! तीन, तीन, तीन... एक और एक।"
"धन्यवाद !" उसने बहुत ही हौले से कहा।
"तुमने धन्यवाद क्यों कहा?"
"पैसों के लिए।"
"लानत है ! क्या तुम देखती नहीं कि मैंने तुम्हें धोखा दिया है? मैंने तुम्हारे पैसे मार लिए हैं और तुम इस पर मुझे धन्यवाद कहती हो ! अरे, मैं तो तुम्हें परख रहा था... मैं तुम्हें अस्सी रूबल ही दूंगा। यह रही पूरी रक़म।"
वह धन्यवाद कहकर चली गई। मैं उसे देखता रहा और फिर सोचने लगा कि दुनिया में ताक़तवर बनना कितना आसान है!

दाता और दाता

 इवान तुर्गनेव
मैं सड़क के किनारे-किनारे जा रहा था कि एक बूढ़े मुझे टोका। लाल सुर्ख़ और आँसुओं में डूबी आँखें, नीले होंठ, गंदे हाथ और सड़ते हुए घाव... 'ओह! ग़रीबी ने कितने भयानक रूप से इसे खा डाला है।'
उसने अपना सूजा हुआ गंदा हाथ मेरे सामने फैला दिया।
एक-एक कर मैंने अपनी सारी जेबें टटोलीं, लेकिन मुझे न तो अपना बटुआ मिला और न ही घड़ी हाथ लगी, यहाँ तक कि रूमाल भी नदारद था। मैं अपने साथ कुछ भी नहीं लाया था और भिखारी का फैला हुआ हाथ इंतज़ार करते हुए बुरी तरह काँप रहा था।
लज्जित होकर मैंने उसका वह गंदा, काँपता हुआ हाथ पकड़ लिया, "नाराज़ मत होना मेरे दोस्त, इस समय मेरे पास कुछ भी नहीं है।"

भिखारी अपनी सुर्ख आँखों से मेरी ओर देखता रह गया। उसके नीले होंठ मुस्करा उठे और उसने मेरी ठंडी उंगलियाँ थाम लीं, "तो क्या हुआ भाई।" वह धीरे से बोला, "इसके लिए शुक्रिया, यह भी तो मुझे कुछ मिला ही है न !" और मुझे लगा, मानो मैंने भी अपने उस भाई से कुछ पा लिया है। 

Wednesday, 24 July 2013

अनोखा रोमांस / अन्तोन चेख़व


संगीतकार स्मिसकोव नगर से राजकुमार बिबुलोव के महल को जा रहा था, जहाँ एक सगाई के उपलक्ष्य में शाम को संगीत और नृत्य का कार्यक्रम रखा गया था। चमड़े के केस में अपना भीमकाय डबल बास बाजा बन्द किये और पीठ पर लादे, वह एक नदी के तट से गुजर रहा था। स्मिसकोव ने सोचा - ‘क्यों न एक डुबकी लगा ली जाए?’ विवस्त्र हो वह शीतल जल में कूद पड़ा।
वह बड़ी सुहावनी सन्ध्या थी। स्मिसकोव की कवित्वमय आत्मा वातावरण के साथ एक हो चुकी थी। अभी वह सौ कदम ही तैरकर आगे बढ़ा था कि उसका हृदय पुलकित हो उठा - तट की ढलान पर उसे एक अत्यन्त सुन्दर लड़की बैठी दिखाई दी। वह मछलियाँ पकड़ रही थी। उसने बदलती हुई भावनाओं में डूबी अपनी साँस को रोक लिया।
जब से उसने मानवता में विश्वास खो दिया था (जबसे उसकी प्रिय पत्नी उसके एक मित्र के साथ भाग गयी थी), उसका हृदय खाली पड़ा था और वह लोगों से घृणा करने लगा था।
किन्तु अब उस सो रही सुन्दरी (उसकी आँखें बन्द थीं) के कदमों में उसे अपनी इच्छा के विपरीत, प्रेम जैसी किसी भावना का अनुभव हुआ। वह देर तक उस सुन्दरी के रूप का पान करता रहा।
“अब काफी हो चुका!” उसने एक लम्बी साँस ली, “विदा, रे आकर्षक दृश्य! दावत में जाने का समय हो रहा है।”
और उस ओर अन्तिम बार देखकर वह वहाँ से तैरकर हटना ही चाहता था कि उसे एक विचार सूझा।
“कोई ऐसी वस्तु छोड़ जाओ कि यह सुन्दरी भी याद रखे कि यहाँ कोई आया था। मैं बंसी के गुल्ले में कुछ अटका देता हूँ।”
धीमे से स्मिसकोव तैरकर तट पर पहुँचा, पानी के कुछ फूल इकट्ठा किये, उन्हें एक में बाँधकर बंसी के गुल्ले में बाँध दिया।
फूलों का गुच्छा डूब गया, साथ ही बंसी का गुल्ला भी।
जब वह तट पर पहुँचा, तो उसे बड़ा आघात लगा। उसके वस्त्र कहीं भी दिखलाई नहीं पड़ रहे थे। वे चुरा लिये गये... जब वह उस सुन्दर लड़की के रूप की प्रशंसा कर रहा था, कुछ बदमाश उसके सभी वस्त्र लेकर भाग गये थे। छोड़ गये थे, उसका भीमकाय बाजा और हैटमात्र।
“ये बदमाश जहन्नुम को जाएँगे!” स्मिसकोव चिल्लाया, “मुझे वस्त्र चुरा लिये जाने का दुख नहीं। वस्त्र तो शरीर का ही होता है, किन्तु अब मुझे उस दावत में विवस्त्र होकर ही जाना पड़ेगा।”
वह अपने डबल बास बाजे पर बैठ गया।
“मैं विवस्त्र होकर राजकुमार बिबुलोव की दावत में जा भी तो नहीं सकता। वहाँ महिलाएँ भी तो होंगी। और हाँ, मैं बाजा बजा भी तो नहीं सकता, ‘रोजीन’ तो पैण्ट की जेब में ही थी।”
वह बड़ी देर तक सोचता रहा। आखिरकार उसे याद आया कि तट से जरा हटकर ही झाड़ियों में एक पैदल-पुल है। मैं अँधेरा होने तक वहाँ छिपा बैठा रहूँगा। उसके बाद पहली काटेज तक पहुँच जाऊँगा...
अब बाजा पीठ पर लादकर, हैट सिर पर रखकर पुल की ओर चलने लगा। वह कोई पौराणिक उपदेवता लग रहा था।
अच्छा, मेरे पाठको, अब हम अपने नायक को पुल के नीचे छोड़कर मछली मारने वाली लड़की की ओर ध्यान दें। उसका क्या हुआ? आँखें खुलने पर जब उस सुन्दरी ने बंसी के गुल्ले को पानी पर नहीं देखा, तो उसने बंसी खींची। वह भारी लगी-कँटीला तार और गुल्ला दिखलाई नहीं पड़ रहे थे। स्मिसकोव के पुष्प गुच्छ भारी होकर पानी की सतह के नीचे डूब गये थे।
“लगता है, बड़ी मछली आ फँसी है,” लड़की ने सोचा, “अथवा कँटीला तार कहीं किसी वस्तु में फँस गया है।”
जोर से खींचने पर भी गुल्ला ऊपर नहीं उठ पाया, तो वह दुखी हो गयी। अन्ततः बिना झिझक अपने वस्त्रों को उतारकर अपने सुन्दर शरीर को उसने पानी के हवाले कर दिया। बड़ी कठिनाई से वह पुष्प गुच्छ को गुल्ले से अलग कर पायी और विजय की मुसकान लिये पानी के बाहर निकली।
किन्तु दुर्भाग्य उसकी बाट देख रहा था! बदमाश, जो स्मिसकोव के वस्त्र ले भागे थे, उसके वस्त्र भी चुरा ले गये थे।
“हे भगवान! अब क्या करूँ?” उसकी आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बहने लगी। “क्या मुझे ऐसी दशा में जाना होगा? नहीं, कभी नहीं! ऐसे जाने की अपेक्षा मैं मृत्यु पसन्द करूँगी। शाम होने तक मैं इन्तजार करूँगी। उसके बाद वृद्धा अगाथा के पास जाकर उसे घर से वस्त्र लाने को कहूँगी... इस बीच मैं अपने आपको पुल के पीछे छिपा लूँगी।”
नायिका दौड़कर पुल तक गयी और घास के पीछे छिप गयी।
पुल की नीचे सरकते ही उसे एक रोयेंदार छाती वाला एक नग्न व्यक्ति दिखलाई पड़ा, जिसे देखते ही वह बेहोश हो गयी।
स्मिसकोव भी घबरा गया। उसने उसे कोई जलपरी समझा।
हो सकता है कि यह कोई मायाविनी हो, जो मुझे छलने को आयी है, और उसे इसका विश्वास भी हो गया, क्योंकि वह अपने को काफी आकर्षक मानता था, ‘किन्तु यदि यह कोई मानवी ही हो, तो ऐसी हालत में क्यों है, यहाँ पुल के नीचे?’
और जब वह हतप्रभ-सा खड़ा सोच रहा था, वह उसके करीब आ पहुँची। ‘मुझे मारो नहीं।’ वह बुदबुदायी, ‘मैं राजकुमारी बिबुलोवा हूँ। तुम्हें बड़ा इनाम मिलेगा। मैं नदी में से अपनी बंसी का काँटा छुड़ा रही थी कि कुछ चोर मेरे नये वस्त्र, जूते, सबकुछ उठा ले गये।’
“मादाम” स्मिसकोव ने विनीत भाव से कहा, “वे मेरे वस्त्र भी चुरा ले गये, मेरा ‘रोजीन’ तक उन्होंने नहीं छोड़ा।”
थोड़ी देर के उपरान्त वह पुनः बोला, “मादाम, मेरे कारण आप अजीब स्थिति में पड़ गयी हैं, किन्तु जिस प्रकार ऐसी अवस्था में आप नहीं जा सकतीं, मैं भी नहीं जा सकता। मेरा सुझाव है कि आप मेरे भीमकाय बाजे के केस में लेटकर ढक्कन बन्द कर लें।”
और इन शब्दों के साथ उसने बाजा केस में से निकाल दिया।
सुन्दरी केस में लेटकर उसकी नजरों से ओझल हो गयी। स्मिसकोव ने अपने आपको अपनी बुद्धिमानी पर बधाई दी।
“मादाम, अब आप मेरी दृष्टि से ओझल हैं, घबराने की तनिक भी आवश्यकता नहीं। अँधेरा होते ही मैं आपको आपके पिता के घर पहुँचा दूँगा। उसके बाद मैं बाजा लेने वापस आऊँगा।”
अँधेरा होते ही केस को बन्द कर पीठ पर लादकर स्मिसकोव बिबुलोव के महल की ओर चला। उसकी योजना थी कि वह पहली काटेज में पहुँचकर अपने लिए कोई वस्त्र माँग लेगा।
‘हर बुराई के पीछे एक अच्छाई भी होती है’, उसने सोचा। ‘बिबुलोव अवश्य ही मुझे पुरस्कृत करेंगे।’
“आप आराम से तो हैं न?” उसने शेखी में आकर पूछा।
किन्तु तभी उसे लगा कि उसके सामने से अँधेरे में दो मानव आकृतियाँ चली आ रही हैं। उनके नजदीक आने पर उसने देखा कि वे कुछ पुलिन्दे लिये हुए थे। बिजली की-सी तेजी से उसे विचार आया कि हो न हो, वे उसके वस्त्र चुराने वाले चोर ही हैं।
बास बाजे के केस को जमीन पर रखकर वह उनके पीछे भागा और चिल्लाया, ‘पकड़ो, पकड़ो!’
उन दोनों ने जब देखा कि उनका पीछा किया जा रहा है, तो निकल भागे। राजकुमारी ने कुछ देर तक भागनेवाले कदमों की आवाज सुनी, ‘पकड़ो’ की आवाज सुनी और सब कुछ शान्त हो गया।
स्मिसकोव उनके पीछे भागता ही रहा। सुन्दरी को उस केस में सड़क के पास के खेत में पड़ा रहना होता, किन्तु भाग्य ने उसका साथ दिया। उस समय, उसी सड़क से दो अन्य संगीतकार भी, जो स्मिसकोव के मित्र थे, बिबुलोव की दावत में जा रहे थे। केस से ठोकर लगते ही वे भौचक्के रह गये।
“यह बास बाजा है!” मुखोव बोला, “किन्तु यह तो अपने मित्र स्मिसकोव का है, यहाँ कैसे आया?”
“स्मिसकोव किसी दुर्घटना का शिकार हो गया लगता है। या तो वह अधिक पी गया, अथवा डकैती का शिकार बना। जो भी हो, उसका बाजा हम साथ लेते चलेंगे।” दूसरा मित्र बोला।
उनमें से एक ने उसे पीठ पर लाद लिया। कुछ दूर जाकर वह बोला, “कितना वजनदार है!”
राजकुमार बिबुलोव के महल में पहुँचकर उन्होंने वह केस एक कोने में रख दिया और दावत में शरीक होने चले गये।
हाल में रोशनी जलायी जाने लगी। बीच में खड़ा हुआ एक रूपवान आकर्षक युवक लाकेच, जो दरबार में एक अधिकारी था, और राजकुमारी का भावी पति था, काउण्ट स्कालीकोव से संगीत की चर्चा कर रहा था।
“आप जानते हैं, काउण्ट, मेरी मुलाकात एक ऐसे वायलिन-वादक से हुई थी, जो जादू करता था... आप विश्वास नहीं करेंगे, वह मामूली बास पर ऐसी धुनें बजाता था कि क्या कहने!”
“मुझे तो सन्देह है,” काउण्ट ने कहा।
“यकीन मानिए! उसने उस पर ‘लिज्ट राफ्सोडी’ की ऐसी धुन बजायी कि मैं मन्त्रमुग्ध रह गया। मैं उसके बगलवाले कमरे में रहता था। सो मैंने भी सीख लिया।”
“मजाक कर रहे हो...”
“आप विश्वास नहीं कर रहे?” लाकेच ने हँसकर कहा, “तो चलिए, आपको बजाकर सुनाता हूँ।”
राजकुमारी का भावी पति काउण्ट के साथ उस कोने में जा पहुँचा। और केस का ढक्कन खोलते ही उन्होंने जो देखा... वह लोमहर्षक था।
तो अब पाठकों को संगीत-चर्चा की उनकी कल्पना पर छोड़कर हम स्मिसकोव के पास लौटते हैं। बेचारा संगीतकार चोरों को पकड़ने में असफल होकर वापस उसी स्थान पर पहुँचा, जहाँ उसने केस रखा था, किन्तु उसे वह बहुमूल्य बोझ वहाँ नहीं दीखा। अचरज में डूबा वह सड़क पर कभी आगे जाता, कभी पीछे लौटता। अन्त में उसने सोचा कि वह गलत सड़क पर आ गया है।
‘क्या भयानक दुर्घटना है!’ उसने मस्तक पर से पसीना पोंछते हुए सोचा। उसका रक्त अब तक बर्फ बन चुका था। ‘वह उस केस में घुटकर मर जाएगी। मैं हत्यारा हूँ।’
अर्ध रात्रि तक वह केस की खोज में भटकता रहा। जब एकदम थककर चूर-चूर हो गया, तो पुल की ओर चल पड़ा।
‘अब मैं प्रातः होने पर खोज करूँगा’, उसने निश्चय किया।
किन्तु प्रातःकालीन खोज का परिणाम भी वही निकला। अब स्मिसकोव ने निश्चय किया कि अँधेरा होने पर वह पुल के नीचे खोज करेगा...
‘मैं उसे खोज कर रहूँगा!’ पसीना पोंछते हुए, हैट उतारते हुए वह बुदबुदाया, ‘चाहे एक वर्ष ही लग जाए।’
और आज भी उस क्षेत्र में रहनेवाले किसान बतलाते हैं कि किस तरह रात को पैदल पुल के पास वे हैट पहने हुए, लम्बे बालों वाली एक नंगी आकृति देखते हैं। और कभी-कभी उस पुल के नीचे से बास बाजे की मधुर ध्वनि भी सुनाई पड़ा करती है।

लज्जा और तस्लीमा नसरीन



लज्जा’ बांग्लादेश की बहुचर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन का पाँचवाँ उपन्यास है। इस उपन्यास ने न केवल बांग्लादेश में हलचल मचा दी है, बल्कि भारत में भी व्यापक उत्ताप की सृष्टि की है। यही वह उत्तेजक कृति है, जिसके लिए लेखिका को बांग्लादेश की कट्टरवादी साम्प्रदायिक ताकतों से सजा-ए-मौत की घोषणा की है। दिलचस्प यही है की सीमा के इस पार की साम्प्रादयिक ताकतों ने इसे ही सिर माथे लगाया। कारण ? क्योंकि यह उपन्यास बहुत ही शक्तिशाली ढंग से बांग्लादेश की हिन्दू विरोधी साम्प्रदायिकता पर प्रहार करता है और उस नरक का अत्यन्त मार्मिक चित्रण करता है जो एक लंबे अरसे से बांग्लादेशी हिन्दुओं की नियति बन चुका है। हमारे देश की हिन्दूवादी शक्तियों ने ‘लज्जा’ को मुस्लिम आक्रमकता के प्रमाण के रूप में पेश करना चाहा है, लेकिन वस्तुतः ‘लज्जा’ दुधारी तलवार है। यह मुस्लिम साम्प्रदायिकता पर जितनी तल्खी से आक्रमण करता है, उतनी ही तीव्रता से हिन्दू साम्प्रदायिकता की परतें भी उघाड़ता है। वस्तुतः यह पुस्तक साम्प्रदायिकता मात्र के विरुद्ध है और यही उसकी खूबसूरती है।

‘लज्जा’ की शुरुआत होती है 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद तोड़े जाने पर बांग्लादेश के मुसलमानों की आक्रमक प्रतिक्रिया से। वे अपने हिन्दू भाई-बहनों पर टूट पड़ते हैं और उनके सैकड़ों धर्मस्थलों को नष्ट कर देते हैं। लेकिन इस अत्याचार, लूट, बलात्कार और मन्दिर ध्वंस के लिए वस्तुतः जिम्मेदार कौन है ? कहना न होगा कि भारत के वे हिन्दूवादी संगठन जिन्होंने बाबरी मस्जिद ध्वंस का प्रतिशोध की राजनीति का खूँखार चेहरा दुनिया के सामने रखा। वे भूल गये कि जिस तरह भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, उसी तरह पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं। लेखिका ने ठीक ही पहचाना है कि ‘भारत कोई विच्छिन्न ‘जम्बूद्वीप’ नहीं है। भारत में यदि विष फोड़े का जन्म होता है, तो उसका दर्द सिर्फ भारत को ही नहीं भोगना पड़ेगा, बल्कि वह दर्द समूची दुनिया में, कम-से-कम पड़ोसी देशों में तो सबसे पहले ही फैल जाएगा।’ क्यों ? क्योंकि इस पूरे उपमहादेश की आत्मा एक है, यहाँ के नागरिकों का साझा इतिहास और एक साझा भविष्य है। अतः एक जगह की घटनाओं का असर दूसरी जगह पड़ेगा ही। अतः हम सभी को एक-दूसरे की संवेदनशीलता का खयाल रखना चाहिए और एक प्रेम तथा सौहार्दपूर्ण समाज की रचनी करनी चाहिए। ऐसे समाज में ही हिन्दू, मुसलमान तथा अन्य समुदायों के लोग सुख और शान्ति से रह सकते हैं। प्रेम घृणा से अधिक संक्रामक होता है।

लेकिन बांग्लादेश का यह ताजा उन्माद सिर्फ बाबरी मस्जिद टूटने की प्रतिक्रिया भर थी ? नहीं। तसलीमा की विवेक दृष्टि और दूर तक जाती है। वे यह दिखाने की कोशिश करती हैं कि इसका संबंधमूलतः धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल से है। यद्यपि पाकिस्तान का निर्माण होने के बाद कायदे-आजम मुहम्मद अली जिन्ना ने घोषणा की थी कि धर्म नहीं, जातीयता ही किसी समुदाय को एक रख सकती है, लेकिन पाकिस्तान के दृष्टिहीन शासकों ने इस आदर्श को तिलांजलि दे दी और वे पाकिस्तान को एक मुस्लिम राष्ट्र बनाने पर तुल गये। लेकिन क्या धर्म का बन्धन पाकिस्तान को एक रख सका ? बांग्लादेश का एक मुक्ति संग्राम एक सर्वथा सेकुलर संघर्ष था। किन्तु सेकुलरबाद का यह आदर्श स्वतंत्र बांग्लादेश में भी ज्यादा दिन नहीं टिक सका। वहाँ भी, पाकिस्तान की तरह ही धर्मतांत्रिक राज्य बनाने की अधार्मिक कोशिश की गयी। नतीजा यह हुआ कि बांग्लादेश में वह बदसूरत आग फिर सुलग उठी, जिसके कारण पहले के दशकों में लाखों हिन्दुओं को देश त्याग करना पड़ा था। संकेत स्पष्ट है जब भी धर्म और राजनीति का अनुचित सम्मिश्रण होगा, समाज में तरह-तरह की बर्बताएँ फैलेंगी।
तसलीमा नसरीन मूलतः नारीवादी लेखिका हैं। वे स्त्री की पूर्ण स्वाधीनता की प्रखर पक्षधर हैं। अपने अनुभवों से वे यह अच्छी तरह जानती हैं कि स्त्री के साथ होने वाला अन्याय व्यापक सामाजिक अन्याय का ही एक अंग है। इसलिए वे यह भी देख सकीं कि कट्टरतावाद सिर्फ अल्पसंख्यकों का ही विनाश नहीं करता, बल्कि बहुसंख्यकों का जीवन भी दूषित कर देता है। कठमुल्ले पंडित और मौलवी जीवन के हर क्षेत्र को विकृत करना चाहते हैं। सुरंजन और परवीन एक-दूसरे को प्यार करते हुए भी विवाह के बंधन में नहीं बंध सके, क्योंकि दोनों के बीच धर्म की दीवार थी और माहौल धर्मोन्माद से भरा हुआ था। धर्मोन्माद के माहौल में सबसे ज्यादा कहर स्त्री पर ही टूटता हैः उसे तरह-से-तरह से सीमित और प्रताड़ित किया जाता है। सुरंजन की बहन माया का अपहरण करने वाले क्या किसी धार्मिक आदर्श पर चल रहे थे ? उपन्यास का अन्त एक तरह की हताशा से भरा हुआ है और यह हताशा सिर्फ सुरंजन के आस्थावान पिता सुधामय की नहीं, हम सबकी लज्जा है, क्योंकि हम अब भी उपमहादेश में एक मानवीय समाज नहीं बना पाए हैं। यह एक नये ढंग का उपन्यास है। कथा के साथ रिपोर्ताज और टिप्पणी का सिलसिला भी चलता रहता है। इसलिए यह हमें सिर्फ भिगोता नहीं, सोचने विचारने की पर्याप्त सामग्री भी मुहैया करता है। कहानी और तथ्य उपन्यास में भी उसी तरह घुले-मिले हुए हैं, जिस तरह कल्पना और यथार्थ जीवन में। आशा है, तसलीमा की यह विचारोत्तेजक कृति हिन्दी पाठक को न केवल एक नयी भूमि परिचित कराएगी, बल्कि उसे एक नया विचार संस्कार भी देगी।

इस तरह शुरू होती है 'लज्जा' की व्यथा-कथा
सुरंजन सोया हुआ है। माया बार-बार उससे कह रही है, "भैया उठो, कुछ तो करो देर होने पर कोई दुर्घटना घट सकती है। सुरंजन जानता है, कुछ करने का मतलब है कहीं जाकर छिप जाना। जिस प्रकार चूहा डर कर बिल में घुस जाता है फिर जब उसका डर खत्म होता है तो चारों तरफ देखकर बिल से निकल आता है, उसी तरह उन्हें भी परिस्थिति शांत होने पर छिपी हुई जगह से निकलना होगा। आखिर क्यों उसे घर छोड़कर भागना होगा ? सिर्फ इसलिए कि उसका नाम सुरंजन दत्त, उसके पिता का नाम सुधामय दत्त, माँ का नाम किरणमयी दत्त और बहन का नाम नीलांजना दत्त है ? क्यों उसके माँ-बाप बहन को घर छोड़ना होगा ? कमाल, बेलाल या हैदर के घर में आश्रम लेना होगा ? जैसा कि दो साल पहले लेना पड़ा था। तीस अक्टूबर को कमाल अपने इस्कोटन के घर से कुछ आशंका करके ही दौड़ा आया था, सुरंजन को नींद से जगाकर कहा, "जल्दी चलो, दो चार कपड़े जल्दी से लेकर घर पर ताला लगाकर सभी मेरे साथ चलो।

देर मत करो, जल्दी चलो। कमाल के घर पर उनकी मेहमान नवाजी में कोई कमी नहीं थी, सुबह नाश्ते में अंडा रोटी दोपहर में मछली भात शाम को लॉन में बैठकर अड्डेबाजी, रात में आरामदेह बिस्तर पर सोना, काफी अच्छी बीता था वह समय। लेकिन क्यों उसे कमाल के घर पर आश्रय लेना पड़ता है ? कमाल उसका बहुत पुराना दोस्त है। रिश्तेदारों को लेकर उसे क्यों अपना घर छोड़कर भागना पड़ता है, कमाल को तो भागना नहीं पड़ता ? यह देश जितना कमाल के लिए है उतना ही सुरंजन के लिए भी तो है। नागरिक अधिकार दोनों का समान ही होना चाहिए। लेकिन कमाल की तरह वह क्यों सिर उठाये। खड़ा नहीं हो सकता। वह क्यों इस बात का दावा नहीं कर सकता कि मैं इसी मिट्टी की संतान हूँ, मुझे कोई नुकसान मत पहुँचाओ।

सुरंजन लेटा ही रहता है। माया बेचैन होकर इस कमरे से उस कमरे में टहल रही है। वह यह समझना चाह रही है कि कुछ अघट-घट जाने के बाद दुखी होने से कोई फायदा नहीं होता। सी.एन.एन. टीवी पर बाबरी तोड़े जाने का दृश्य दिखा रहा है। टेलीविजन के सामने सुधामय और किरणमयी स्तंभित बैठे हैं। वे सोचे रहे हैं कि सन् 1990 के अक्टूबर की तरह इस बार भी सुरंजन किसी मुसलमान के घर पर उन्हें छिपाने ले जायेगा। लेकिन आज सुरंजन को कहीं भी जाने की इच्छा नहीं है, उसने निश्चय किया है कि वह सारा दिन सो कर ही बिताएगा। कमाल या अन्य कोई यदि लेने भी आता है तो कहेगा, "घर छोड़कर वह कहीं नहीं जायेगा, जो होगा देखा जायेगा।

आज दिसम्बर महीने की सातवीं तारीख है। कल दोपहर को अयोध्या में सरयू नदी के किनारे घना अंधकार उतर आया। कार सेवकों द्वारा साढ़े चार सौ वर्ष पुरानी एक मस्जिद तोड़ दी गयी। विश्व हिन्दू परिषद द्वारा घोषित कार सेवा शुरू होने के पच्चीस मिनट पहले यह घटना घटी। कार सेवकों ने करीब पाँच घंटे तक लगातार कोशिश करके तीन गुम्बद सहित पूरी इमारत को धूल में मिला दिया। यह सब भारतीय जनता पार्टी विश्व हिन्दू परिषद आर.एस.एस. और बजरंग दल के सर्वोच्च नेताओं के नेतृत्व में हुआ और केन्द्रीय सुरक्षा वाहिनी पी.ए.सी. और उत्तर प्रदेश पुलिस निष्क्रिय खड़ी-खड़ी कार सेवकों का अविश्वसनीय तांडव देखती रही। दोपहर के दो बज कर पैंतालीस मिनट पर एक गुम्बद तोड़ा गया। बारह बजे दूसरा गुम्बद तोड़ा गया, चार बजकर पैतांलिस मिनट पर तीसरे गुम्बद को भी कार सेवकों ने ढहा दिया। इमारत को तोड़ते समय चार कार सेवक मलवे में दबकर मर गये और सौ से अधिक घायल हुए।

सुरंजन बिस्तर पर लेटे-लेटे ही अखबार के पन्नों को उलट रहा था। आज के सभी अखबारों की बैनर हैडिंग है। बाबरी मस्जिद का ध्वंस विध्वस्त। वह कभी अयोध्या नहीं गया, बाबरी मस्जिद नहीं देखी। देखेगा भी कैसे, उसने तो कभी देश से बाहर कदम रखा ही नहीं। राम का जन्म कब हुआ था और मिट्टी को खोदकर कोई मस्जिद बनी या नहीं, यह उसके लिए कोई मतलब नहीं रखता लेकिन सुरंजन यह मानता है कि सोलहवीं शताब्दी के इस स्थापत्य पर आघात करने का मतलब सिर्फ भारतीय मुसलमानों पर ही आघात करना नहीं बल्कि सम्पूर्ण हिन्दुओं पर भी आघात करना है। दरअसल, यह सम्पूर्ण भारत पर, समग्र कल्याणबोध पर, सामूहिक विवेक पर आघात करना है। सुरंजन समझ रहा है कि बांग्ला देश में बाबरी मस्जिद को लेकर तीव्र तांडव शुरू हो जायेगा, सारे मन्दिर धूल में मिल जायेंगे। हिन्दुओं के घर जलेंगे।

दुकानें लूटी जायेंगी। भारतीय जनता पार्टी की प्रेरणा से कार सेवकों ने वहाँ बाबरी मज्जिद को तोड़ कर इस देश के कट्टर कठमुल्लावादी दलों को और भी मजबूत कर दिया है। विश्व हिन्दू परिषद, भारतीय जनता पार्टी और उनके सहयोगी दल क्या यह सोच रहे हैं कि उनके उन्मत्त आचरण का प्रभाव सिर्फ भारत की भौगोलिक सीमा तक ही सीमित रहेगा ? भारत में साम्प्रदायिक हंगामे ने व्यापक आकार धारण कर लिया है। मारे गये लोगों की संख्या पाँच सौ छह सौ, हजार तक पहुँच गयी है। प्रति घंटे की रफ्तार से मृतकों की संख्या बढ़ रही है। हिन्दुओं के स्वार्थ रक्षकों को क्या मालूम नहीं है कि कम-से-कम दो ढाई करोड़ हिन्दू बंगलादेश में हैं ? सिर्फ बंगालदेश में ही क्यों, पश्चिम एशिया के प्रायः सभी देशों में हिन्दू हैं। उनकी क्या दुर्गति होगी, क्या हिन्दू कठमुल्लों ने कभी सोचा भी है ? राजनैतिक दल होने के नाते भारतीय जनता पार्टी को इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि भारत कोई ‘विच्छिन जम्बू द्वीप’ नहीं है। भारत में यदि विष फोड़े का जन्म होता है तो उसका दर्द सिर्फ भारत को ही नहीं भोगना पड़ेगा, बल्कि वह दर्द समूची दुनिया में कम से कम पडोसी देशों में तो सबसे पहले फैल जायेगा।

सुरंजन आँख मूँद कर सोया रहता है। उसे धकेल कर माया बोली, तुम उठोगे कि नहीं, बोलो ! माँ, पिताजी तुम्हारे भरोसे बैठे हैं।"

सुरंजन अँगड़ाई लेते हुए बोला, तुम चाहो तो चली जाओ, मैं इस घर को छोड़कर एक कदम भी नहीं जाऊँगा।"

"और वे ?"

‘मैं नहीं जानता।’

‘यदि कुछ हो गया तो ?’

‘क्या होगा !’

‘मानो घर लूट लिया, जला दिया।’

‘क्या तुम उसके बाद भी बैठे रहोगे ?’

‘बैठा नहीं लेटा रहूँगा।’

खाली पेट सुरंजन ने एक सिगरेट सुलगायी। उसे चाय पीने की इच्छा हो रही थी। किरणमयी रोज सुबह उसे एक कप चाय देती है, पर आज अब तक नहीं दी। इस वक्त उसे कौन देगा एक कप गरमगरम चाय। माया से बोलना बेकार है। यहाँ से भागने के अलावा फिलहाल वह लड़की कुछ भी सोच नहीं पा रही है। इस वक्त चाय बनाने के लिए कहने पर उसका गला फिर से सातवें आसमान पर चढ़ जायेगा। वह खुद ही बना सकता है पर आलस उसे छोड़ ही नहीं रहा है। उस कमरे में टेलीविजन चल रहा है। सी.एन.एन. के सामने आँखें फाड़कर बैठे रहने की उसकी इच्छा नहीं हो रही है। उसे कमरे से माया थोड़ी-थोड़ी देर में चीख रही है, भैया लेटे-लेटे अखबार पढ़ रहा है, उसे कोई होश नहीं।’

सुरंजन को होश नहीं है, यह बात ठीक नहीं। वह जानता है कि किसी भी समय दरवाजा तोड़कर एक झुण्ड आदमी अन्दर आ सकते हैं, उनमें कई जाने, कई अनजाने होंगे। घर के सामान तोड़-फोड़कर लूटपाट करेंगे और जाते-जाते घर में आग भी लगा देंगे। ऐसी हालत में कमाल या हैदर के घर आश्रय लेने पर कोई नहीं कहेगा कि हमारे यहाँ जगह नहीं है, लेकिन उसे जाने में शर्मिदगी महसूस होती है। माया चिल्ला रही है तुम लोग नहीं जाओगे तो मैं अकेली ही चली जा रही हूँ। पारुल के घर चली जाती हूँ। भैया कहीं ले जाने वाले हैं, मुझे नहीं लगता। उसे जीने की जरूरत नहीं होगी मुझे है। माया समझ गई है कि चाहे कारण कुछ भी हो सुरंजन आज उन्हें किसी के घर छिपने के लिए नहीं ले जायेगा। निरुपाय होकर उसने खुद ही अपनी सुरक्षा के बारे में सोचा है। सुरक्षा शब्द ने सुरंजन को काफी सताया है।

सुरक्षा नब्बे के अक्तूबर में भी नहीं थी। प्रसिद्ध ढाकेश्वरी मन्दिर में आग लगा दी गयी। पुलिस निष्क्रिय होकर सामने खड़ी तमाशा देखती रही। कोई रुकावट नहीं डाली गयी। मुख्य मन्दिर जल कर राख हो गया। अन्दर घुस कर उन लोगों ने देवी-देवताओं के आसन को विध्वस्त कर दिया। उन्होंने नटमन्दिर, शिवमन्दिर, अतिथिगृह, उसके बगल में स्थित श्री दामघोष का आदि निवास गौड़ीय मठ का मूल मन्दिर नटमन्दिर, अतिथिशाला आदि का ध्वंस करके मन्दिर की सम्पत्ति लूट ली। उसके बाद फिर माधव गौड़ीय मठ के मूल मन्दिर का भी ध्वंस कर डाला। जयकाली मन्दिर भी चूर-चूर हो गया। ब्रह्म समाज की चारदीवारी के भीतर वाले कमरे को बम से उड़ा दिया गया। राम सीता मन्दिर के भीतर आकर्षक काम किया हुआ सिंहसान तोड़-फोड़ कर उसके मुख्य कमरे को नष्ट कर दिया। शंखारी बाजार के सामने स्थित हिन्दुओं की पाँच दुकानों में लूटपाट व तोड़फोड़ के बाद उन्हें जला दिया गया। शिला वितान, सुर्मा ट्रेडर्स, सैलून और टायर की दुकान, लॉण्ड्री, माता मार्बल, साहा कैबिनेट, रेस्टोरेन्ट-कुछ भी उनके तांडव से बच नहीं पाया।

शंखारी बाजार के मोड़ पर ऐसा ध्वंस यज्ञ हुआ कि दूर-दूर तक जहाँ भी नजर जाती ध्वंस विशेष के सिवाय कुछ भी नजर नहीं आता था। डेमरा शनि अखाड़े का मन्दिर भी लूटा गया। पच्चीस परिवारों का घर-द्वार सब कुछ दो-तीन सौ साम्प्रदायिक संन्यासियों द्वारा लूटा गया। लक्ष्मी बाजार के वीरभद्र मन्दिर की दीवारें तोड़ कर अन्दर का सब कुछ नष्ट कर दिया गया। इस्लामपुर रोड की छाता और सोने की दुकानों को लूट कर उनमें आग लगा दी गयी। नवाबपुर रोड पर स्थित मरणचाँद की मिठाई की दुकान, पुराना पल्टन बाजार की मरणचाँद की दुकान आदि को भी तोड़ दिया गया। राय बाजार के काली मन्दिर को तोड़ कर वहाँ की मूर्ति को रास्ते पर फेंक दिया गया। सुत्रापुर में हिन्दुओं की दुकानों को लूट कर, तोड़कर उनमें मुसलमानों के नाम पट्ट लटका दिये गये। नवाबपुर के घोष एण्ड सन्स की मिठाई की दुकान को लूट कर उसमें नवाबपुर की रामधन पंसारी नामक प्राचीन दुकान को भी लूटा गया।
बाबू बाजार पुलिस चौकी से मात्र कुछ गज की दूरी पर अवस्थित शुक लाल मिष्ठान भंडार को धूल में मिला दिया गया। वाद्ययंत्र की प्रसिद्ध दुकान ‘यतीन एण्ड कम्पनी’ के कारखाना व दुकान को इस तरह तोड़ा गया कि सिलिंग फैन से लेकर सब कुछ भस्मीभूत हो गया। ऐतिहासिक साँप मन्दिर का काफी हिस्सा तोड़ दिया गया। सदरघाट मोड़ में स्थित रतन सरकार मार्केट भी पूरी तरह ध्वस्त हो गयी।
सुरंजन की आँखों के सामने उभर आया नब्बे की लूटपाट का भयावह दृश्य। क्या नब्बे की घटना को दंगा कहा जा सकता है ? दंगा का अर्थ मारपीट एक सम्प्रदाय के साथ दूसरे सम्प्रदाय के संघर्ष का नाम ही दंगा है, लेकिन इसे तो दंगा नहीं कहा जा सकता। यह है एक सम्प्रदाय के ऊपर दूसरे सम्प्रदाय का हमला, अत्याचार। खिड़की से होकर धूल सुरंजन के ललाट पर पड़ रही है। जाड़े की धूल है। इस धूल से बदन नहीं जलता। लेटे-लेटे उसे चाय की तलब महसूस होती है।


ताबूतसाज

अलेक्सान्दर पूश्किन की कहानी

ताबूतसाज आद्रियान प्रोखोरोव के घरेलू सामान की आखिरी चीजें भी गाड़ी पर लद गयीं मे जुते मरियल घोड़ों की जोड़ी ने चौथी बार सस्मान्नाया गली से निकीत्स्काया गली तक का चक्कर लगाया, जहां ताबूतसाज अपने समूचे घरबार के साथ जा बसा था। दुकान में ताला डालकर उसने दरवाजे पर एक तख्ती लगा दी कि यह घर बिक्री या किराये के लिए खाली है और अपने नये निवास-स्थान की ओर पैदल ही चल पड़ा। लेकिन जब वह उस नये पीले घर के निकट पहुंचा, जिसे खरीदने के लिए कितनी मुद्दत से उसके मन में चाह थी, और जिसे अब वह खासी रकम देकर खरीद पाया था, तो वह यह जानकर हैरान रह गया कि अब उसके दिल में कोई उमंग या खुशी नहीं है। अनजानी दहलीज लांघकर नयी जगह में पांव रखते समय जहां अभी तक सबकुछ अतव्यस्त और उल्टा-पलटा था, उसके मुंह से उस जर्जर दरबे के लिए एक आह निकल गयी, जिसे छोड़कर वह आया था। अठारह साल उसने वहां बिताये थे और व्यवस्था इतनी सख्त थी कि एक सींक भी इधर-से-उधर नहीं हो सकती थी। उसने अपनी दोनों लड़कियों और घर की नौकरानी को सुस्त कहकर डाटा और खुद भी उनका हाथ बंटाने में जुट गया। जल्द ही घर करीने से सज गया—देवमूर्ति का स्थान, चीनी के बरतनों की अलमारी, मेज, सोफे और पलंग—ये सब पिछले कमरे के विभिन्न कोनों में अपनी-अपनी जगह पर जमा दिये गए। घर के मालिक का समान, हर रंग और माप के ताबूत, मातमी लबादों-टोपियों और मशालों से भरी अलमारियां, रसोई और बैठक में जंचा दी गईं। बाहर दरवाजे के के ऊपर एक साइन बोर्ड लटका दिया गया, जिस पर उल्टी मशाल हाथ में लिए हृष्ट-पुष्ट आमूर१ की तस्बीर बनी थी और उसके नीचे लिखा था-"सादे और रंगीन ताबूत यहां बेचे और तैयार किये जाते हैं, किराये पर दिये जाते हैं और पुराने ताबूतों की मरम्मत भी की जाती है।" उसकी लड़कियां अपने कमरे में आराम करने चली गयीं और आद्रियान ने अपनी नयी जगह का मुआयना करने के बाद खिड़करी के पास बैठते हुए समोवार गर्म करने का आदेश दिया।

ताबूत साज का स्भाव उसके धंधे के साथ पूर्णतया मेल खाता था। आद्रियान प्रोखोरोव खामोश औ मुहर्रमी सूरत वाला आदमी था। वह बिरले ही अपनी खामोशी तोड़ता था, और सो भी उस समय, जब वह अपनी लड़कियों को निठल्लों की भांति खिड़कर से बाहर झांकते और राह चलतों पर नजर डालते देखता, या उस समय जब वह अपने हाथ की बनी चीजों के लिए उन अभागों से (या भाग्यशालियों से, मौके के अनुसार जैसा भी हो) कसकर दाम मांगता था, जिन्हें उन चीजों की जरूरत आ पड़ती थी। सो आद्रियान चाय का सांतवा खयालों में डूबा हुआ था।

यकाएक किसी ने बाहर के दरवाजे को तीन बार खटखटाया। ताबूतसाज के विचारों का तांता टूट गया। वह चौंककर चिल्लाया, "कौन है? तभी दरवाजा खुला और एक आदमी शक्ल-सूरतह से जिसे तुरन्त पहचाना जा सकता था कि यह कोई जर्मन दस्तकार है, भीतर कमरे मे चला आया और ताबूतसाज के निकट आकर प्रसन्न मुद्रा में खड़ा हो गया।"मुझे माफ करना, पड़ोसी महोदय, " टूटी-फूटी रूसी भाषा में उसने कुछ इतने अटपटे अंदाज से बोलना शुरू किया कि उस पर आज भी हम अपनी हंसी नहीं रोक पाते हैं।"मुझे माफ करना, अगर मेरे आने से आपको काम में कोई बाधा हुई हो, लेकिन आपसे जान-पहचान करने के लिए मैं बड़ा उत्सुक हूं। मैं मोची हूं। गात्तिलब शूल्त्स मेरा नाम है। सड़क के उस पार ठीक सामने वाले उस छोटे-से घर में रहता हूं, जिसे आप अपनी खिड़की से देख सकते हैं। कल मैं अपने विवाह की रजत जयंती मना रहा हूं और मैं आपको तथा आपकी लड़कियों को आमंत्रित करता हूं कि मेरे यहां आयें और प्रीति-भोज में शामिल हों।"

ताबूतसाज ने सिर झुका कर निमंत्रण स्वीकार कर लिया और मोची से बैठने तथा चाय पीने का अनुरोध किया। मोची बैठ गया। वह कुछ इतने खुले दिल का था कि शिघ्र ही दोनों अत्यंत घुल-मिलकर बातें करने लगे।,

"कहिये, आपके धंधे का क्या हाल-चाल है।" आद्रियान ने पूछा।

शूल्त्स ने जवाब दिया, कभी अच्छा, कभी बुरा, सब चलता है। यह बात जरूर है कि मेरा माल आपसे भिन्न है। जो जीवित हैं, वे बिना जूतों के भी रह सकते हैं, लेकिन मरने के बाद तो ताबूत के बिना काम चल नहीं सकता!"

"बिल्कुल ठीक कहते हो, " आद्रियान ने सहमति प्रकट की, "लेकिन एक बात है। माना कि अगर जीवित आदमी के पास पैसा नहीं है, तो वह बिना जूतों के रह जाये और तुम्हें टाल जाये; लेकिन मृत भिखारी के साथ ऐसी बात नहीं। बिना कुछ खर्च किये ही वह ताबूत पा जाता है।"इस तरह बातचीत का यह सिलसिला कुद देर और चलता रहा। आखिर मोची उठा और अपने निमंत्रण को एक बार फिर दोहराते हुए उसने ताबूतसाज से विदा ली।

अगले दिन, ठीक दोपहर के समय, ताबूतसाज और उसकी लड़कियां नये खरीदे हुए घर के दरवाजे से बाहर निकले और अपने पड़ोसी से मिलने चल दिए।

मोची का छोटा-सा कमरा अतिथियों से भरा था। उनमें अधिकाशं जमर्न दस्तकार, उनकी पत्नियां और ऐसे युवक मौजूद थे, जो उनकी शागिर्दी कर रहे थे। रूसी सरकारी कारिन्दों में से केवल एक ही वहां मौजूद था—पुलिस का सिपाही यूर्को। जाति का वह चूखोन था और बावजूद इसके कि उसका पद निम्न स्तर का था, मेजबान उसकी आवभगत में खास तौर से जुटा था। पच्चीस साल से पूरी फरमाबरदारी के साथ वह अपनी नौकरी बजा रहा था। १८१२ के अग्निकाण्ड ने प्राचीन राजधानी को ध्वस्त करने के साथ-साथ उसकी पीली संतरी-चौकी को भी खाक में मिला दिया था। लकिन दुश्मन क दुम दबाकर भागते ही उसकी जगह पर एक नयी संतरी-चौकी का उदय हो गया—सलेटी रंग की और सफेद यूनानी ढंग के पायों से अलंकृत, और सिर से पांव से लैस यूर्को उसके सामने अब फिर, पहले की ही भांति, इधर-से-उधर गश्त लगाने लगा। निकीत्स्की दरवाजे के इर्द-गिर्द बसे सभी जर्मनों से वह परिचित था और उनमें से कुछ तो ऐसे थे, जो इतवार की रात उसकी संतरी-चौकी में ही काट देते थे। आद्रियान भी उससे जान-पहचान करने में पीछे नहीं रहा और जब अतिथियों ने मेज पर बैठना शुरू किया, तो ये दोनों एक-दूसरे के साथ बैठे। शूल्त्स, उसकी पत्नी और उनकी सत्रह-वर्षीय लड़की लोत्खेन अपने अथितियों के साथ भोजन में शामिल होते हुए भी परोसन और रकाबियों में चीजें रखने में बावर्ची की मदद दे रही थीं। बीयर खुलकर बह रही थी। यूर्को अकेले ही चार के बराबर खा-पी रहा था। आद्रियान भी किसी से पीछे नहीं था। उसकी लड़कियां बड़े सलीके से बैठी थीं। बातचीत का सिलसिला, जो जर्मन भाषा में चला रहा था, हर घड़ी जोर पकड़ रहा था। सहसा मेजबान ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा और कोलतार पुती एक बोतल का कार्क खोलते हुए रूसी भाषा में जोरो से चिल्लाकर कहा, "नेकदिल लूईजा की सेहत का जाम?"काग के निकलते ही तरल शैम्पने का फेन उड़ने लगा। मेजबान ने अपनी अधेड़ जीवन-संगिनी का ताजा रंगतदार चेहरा चूमा और अतिथियों ने हल्ले-गुल्ले के साथ नेक लुईजा के स्वसथ्य की जाम पिया। इसके बाद एक दूसरी बोतल का काग खोलते हुए मेजबान चिल्लाया, "प्यारे अतिथियों के स्वास्थ्य का जाम!" और अतिथियों ने बदले में धन्यवाद देते हुए फिर गिलास खाली कर दिये। इसके बाद स्वास्थ्यकामना के लिए गिलास खनकाने और खाली करने का जैसे तांता बंध गया। जितने अतिथि थे, एक-एक करके उन सबकी सेहत के जाम पिये गए, फिर मास्को और करीब एक दर्जन छोटे-मोटे जर्मन नगरों के नाम पर गिलास खनके, फिर सब धंधों के नाम पर एक साथ और उसके उसके बाद अलग-अलग करके, गिलास खाली हुए और इन धंधों में काम करने वालों कारीगरों तथा सभी नये शगिर्दो के स्वास्थ्य के नाम बोतलों के काग खुले। आद्रियान ने इतनी अधिक पी कि उस पर भी ऐसा रंग सवार हुआ कि उसने सचमुच एक अनूठे से जाम का प्रस्ताव किया। अचानक एक हट्टे-कट्टे अतितथि ने, जो डबलरोटी-बिस्कुट बनाने का काम करता था, अपना गिलास उठाते हुए चिल्लाकर कहा, "उन लोगों के स्वास्थ्य केलिए, जिनकी खातिर हम काम करते हैं।" इस कामना का भी पहले की भांति सभी ने खुशी से स्वागत किया। अतिथि एक-दूसरे के सामने झुक-झुककर गिलास खाली करने लगे—दर्जी मोची के सामने, मोची दर्जी के सामने, नानबाई इन दोनों के सामने, और सभी अतिथि एक साथ मिलकर नानबाई के सामने। एक-दूसरे के सामने झुककर पारस्परिक अभिवादन का यह सिलसिला अभी चल ही रहा था कि यूर्को ने ताबूतसाज की ओर मुंह करते हुए चिल्लाकर कहा, "आइये, पड़ोसी, आके मृत आसामियों के स्वास्थ्य का जाम पियें।" इस पर सभी हंस पड़े, केवल ताबूतसाज चुप रहा। उसे यह बुरा लगा और उसकी भौंहें चढ़ गयी। लेकिन इधर किसी का ध्यान नहीं गया, अतिथियों का दौर चलता रहा और जब वे मेज से उठे, तो उस समय रात की आखिरी प्रार्थना के लिए गिरजे की घंटियां बज रही थीं।

काफी रात ढल जाने पर अतिथि विदा हुए। अधिकांश नशे में धुत्त थे। हट्टा-कट्टा नानबाई और जिल्दसाज, पुलिस के सिपाही की दोनों बगलों में अपने हाथ डाले, उसे उसकी चौकी की ओर ले चले। ताबुतसाज भी अपने घर लौट आया था। वह गुस्से से भरा था और उसका दिमाग अस्त व्यस्त-सा हो रहा था।"आखिर, " उसने सस्वर सोचा, "मेरा धंधा क्या अन्य धंधों सो कम सम्मानपूर्ण है? ताबूतसाज और जल्लाद क्या भाई-भाई हैं? क्या उन्हें एक साथ रखा जा सकता है? तो फिर इन विदेशियों के हंसने में क्या तुक थीं? वे क्यों हंसे? क्या वे ताबूतसाज को रंगबिरंगे कपड़ों वाला विदूषकह समझते हैं? फिर मजा यह कि मैं इन सबको गृह-प्रवेश के प्रीतिभोज में बुलाने जा रहा था। ओह नहीं, मैं ऐसी बेवकूफी नहीं करूंगा। मैं उन्हें ही बुलाऊंगा, जिनके लिए मैं काम करता हूं—अपने ईसाई मृतकों को!"

"ओह, मालिक!" नौकरानी ने, जो उस समय ताबूतसाज के पांव से जूते उतार रही थी, कहा, "जरा सोचिये तो सही कि यह आप क्या कर रहे हैं! सलीब का चिह्न बनाइये, कहीं मृतकों को भी गृह प्रवेश के लिए बुलाया जाता है? कितनी भयानक बात है यह!"

"ईश्वर साक्षी है, यह मैं जरूर करूंगा, " आद्रियान ने कहना जारी रखा, "और कल ही। ऐ मेरे आसामियों, मेरे सुभचिंतकों, ककल रात भोज में शामिल होकर मुझे सम्मानित करना। जो कुछ रूखा-सूखा मेरे पास है, सब तुम्हारा ही दिया हुआ तो है।"

इन शब्दों के साथ ताबूतसाज ने बिस्तार ने बिस्तर की शरण ली और कुछ ही देर बाद खर्राटे भरने लगा।

सुबह जब आद्रियान की आंखें खुलीं, तो उस समय काफी अंधेरा था। सौदागर की विधवा त्रूखिना रात में ही मर गयी थी और उसके कारिन्दे द्वारा भेजे गये एक आदमी ने आकर इसकी खबर दी थी। वह घोड़े पर सवार तेजी से उसे दौड़ता आया था। ताबूतसाज ने वोदका के लिए दस कोपेक उसे इनाम में दिये, झटपट कपड़े पहने, एक गाड़ी पकड़ी और उस पर सवार होकर राज्गुल्याई पहुंचा। मृतक के घर के दरवाजे पर पुलिस वाले पहले से तैनात थे और सौदागर इधर-से-उधर इस तरह मंडरा रहे थे, जैसे सड़ी लाश की गंध पाकर कौवे मंडराते हैं। शव मेज पर रखा था, चेहरा मोमियाई मालूम होता था, लेकिन नाक-नक्श अभी बिगड़ा नहीं था। सगे-संबंधी, अड़ोसी-पड़ोसी और नौकर-चाकर उसके चारों ओर खड़े थे। खिड़कियां सभी खुलीं थीं, मोमबत्तियां जल रही थीं और पादरी मृतक स्त्री के भतीजे के पास पहुंचा। वह युवक सौदागर था और फैशनदार कोट पहने था। आद्रियान ने उसे सूचना दी कि ताबूत, मोमबत्तियां, ताबूत ढंकने का कफन और अन्य मातमी साज-सम्मान बहुत ही बढ़िया हालत में तुरत जुटाये जायेंगे। योंही, लापरवाही से, मृतक के उत्तराधिकारी ने उसे धन्यवाद दिया और कहा कि दामों के सवाल पर वह झिकझिक नहीं करेगा और सबकुछ खुद ताबूतसाज के इमान और नेकनीयती पर पूर्णयतया छोड़ देगा। ताबूतसाज ने अपनी आदत के अनुसार शपथ लेकर कहा कि वह एक पाई भी ज्यादा वसूल नहीं करेगा और इसके बाद कारिन्दे ने उसकी ओर और उसने कारिन्दे की भेद-भरी नजर से देखा, और सामान तैयार करने के लिए गाड़ी पर सवार होकर घर लौट आया। दिन-भर वह इसी तरह राज्यगुलाई और निकीत्स्की दरवाजे के बीच भाग-दौड़ करता रहा। कभी जाता, कभी वापस लौटता। शाम तक उसने सभी कुछ ठीक-ठाक कर दिया और गाड़ी को विदा कर पैदल ही घर लौटा। चांदनी चात थी। सही-सलामत वह निकीत्स्की दरवाजे पहुंच गया। गिरजे के पास से गुजाते समय हमारे मित्र यूर्को ने उसे ललकारा, लेकिन जब देखा कि अपना ही ताबूतसाज है, तो उसका अभिवादन किया। देर काफी हो गयी थी। जब वह अपने घर के पहुंचा, तो यकायक उसे ऐसा लगा, मानो कोई दरवाजे के पास रुक गया है, और दरवाजे को खोलकर अन्दर जाकर गायब हो गया है।"यह क्या तमाशा है?"आद्रियान अचरज से भर उठा, "इस समय भला कौन मुझसे मिलने आ सकता है? कहीं कोई चोर तो नहीं है? कहीं ऐसा तो नहीं कि कोई सैलानी युवक है, जो रात को मेरी नन्हीं निठल्ली लड़कियों से साठं-गाठं करने आया हो?" एक बार तो उसने यहां तक सोच कि अपने मित्र यूर्को को मदद के लिए बुला लाये। तभी एक और व्यक्ति दरवाजे के पास पहुंचा और भीतर पांव रख ही रहा था कि ताबूतसाज को घर की ओर तेजी से लपकते हुए देखकर वह निश्चल खड़ा हो गया और अपने तिरछे टोप को उठाकर अभिवादन करने लगा।

आद्रियान को ऐसा लगा, जैसे उसने यह शक्ल कहीं देखी है, लेकिन जल्दी में उसे ध्यान से नहीं देख सका। हांफते हुए बोला, "क्या आप मुझसे मिलने आये हैं? चलिये, भीतर चलिये।"

"तकल्लुफ के फेर में न पड़ें, मित्र, " अनजान ने थोथी आवाज में कहा, "आगे-आगे आप चलिये और अपने हतिथियों का पथ-पदर्शन कीजिये!"

आद्रियान को खुद इतनी उतावली थी कि चाहने पर भी वह तकल्लुफ निभा न पाता। उसने दरवाजा खोला और घर की सीढ़ियों पर पांव रखा। दूसरा भी उसके पीछे-पीछे चला। आद्रियान को ऐसा लगा कि उसके कमरों में लोग टहल रहे हैं।"हे भगवान, यह सब क्या तमाशा है!" उसने सोचा, और लपक कर भीतर पहुंचा। उसके पैर पड़खड़ा गये। कमरा प्रेतों से भरा था। खिड़की में से चांदनी भीतर पहुंच रही थी, जिसमें उनके पीले-नीले चेहरे, लटके हुए मुंह, धुंधली अधखुली आंखें और चपटी नाकें दिखाई दे रही थीं। आद्रियान ने भय से कांपकर पहचाना कि ये सब वही लोग हैं, जिनको दफ़नाने में उसने योग दिया था, और वह, जो उसके साथ भीतर आया था, वही ब्रिगेडियर था, जिसे मूसलाधार वर्षा के बीच दफनाया गया था। वे सब पुरुष और स्त्रियां भी, ताबूतसाज के चारों ओर इकट्ठे हो गये और सिर झुका-झुकाकर अभिवादन करने लगे। भागय का मारा केवल एक ही ऐसा था, जो कुछ दिन पहले मुफ्त दफनाया गया था, वहीं पास नहीं आया। बेबसी की मुद्रा बनाये वह सबसे अलग कमरे के एक कोने में खड़ा था, मानो अपने फटे हुए चिथड़ों को छिपाने का प्रयत्न कर रहा हो। उसके सिवा अन्य सभी बढ़िया कपड़े पहने थे, स्त्रियों के सिरों पर फीतेदार टोजियां थीं, स्वर्गवासी अफसर वर्दियां डाटे थे, लेकिन उनकी हजामतें बढ़ी थीं, सौदागरों ने एक-से-एक बढ़िया कपड़े छांट कर पहने थे।"देखो, प्रोखोरोव!" सबकी ओर से बोलते हुए ब्रिगेडियर ने कहा, "हम सब तुम्हारे निमंत्रण पर अपनी-अपनी कब्रों से उठकर आये हैं। केवल वे, जो एकदम असमर्थ हैं, जो पूरी तरह गल-सड़ चुके हैं, नहीं आ सके। इसके अलावा उन्हें भी मन मसोस कर रह जाना पड़ा, जो केवल हड्डियों का ढेर भर रह गये हैं और जिनका मांस पूरी तरह गल चुका है। लेकिन इनमें से भी एक अपनी आपको नहीं रोक सका। तुमसे मिलने के लिए वह इतना बेचैन था कि कुछ न पूछो।"

उसी समय एक छोटा कंकाल कोहनियों से सबको धकेलता आगे निकल आया और आद्रियान की ओर बढ़ने लगा। उसका मांसहीन चेहरा आद्रियान की ओर बड़े चाव से देख रहा था। तेज हरे और लाल रंग की धज्जियां उसक ढांचे से जहां-तहां लटकी थीं जैसे बांस से लअका दी जाती हैं और उसके घुटने से नीचे की हड्डियां घुड़सवारी के ऊंचे जूतों के भीतर इस तरह खटखटा रही थीं, जैसे खरल में मूसली खटखटाती है।"मुझे पहचाना नहीं, प्रोखोरोव?" कंकाल ने कहा, "गार्द के भूतपूर्व सार्जेंट प्योत्र पेत्रोचिव मुरील्किन को भूल गये, जिसके हाथ तुमने १७९९ में अपना पहला ताबूत बेचा था, वही जिसे सुमने बलूत का बताया था, लेकिन निकला वह चीड़ की खपच्चियों का!"

यह कहते हुए आद्रियान का आलिंगन करने के लिए कंकाली ने अपनी बांहें फैला दीं। अपनी समूची शक्ति बटोर कर आद्रियान चिल्लाया और कंकाल को उसने पीछे धकेल दिया। प्योत्र पेत्रोविच लड़खड़ा कर फर्श पर गिर पड़ा, बिखरी हुई हड्डियों का ढेर मात्र। मृतकों में विक्षोभ की एक लहर दौड़ गयी। अपने साथी के अपमान का बदला लेने के लिए वे आद्रियान की ओर लपके-चीखते-चिल्लाते, कोसते और धमकियां देते।

अभागे मेजबान के होश गुम थे। चीख-चिल्लाहट ने उसके कान बहरे कर दिये थे और वे उसे कुचल देना चहते थे। उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया और लड़खड़ा कर अब वह भी मृत सार्जेंट की हड्डियों के ढेर पर गिर पड़ा। वह बेसुध हो गया था।

सूरज की किरणें उस बिस्तर पर पड़ रही थीं, जिस पर ताबूतसाज सो रहा था। आखिर उसने आंखे खोलीं और देखा कि नौकरानी समोवार में कोयले दहकाने के लिए फूंक मार ही है। रात की घटनाओं की याद आते ही आद्रियान के शरीर में कंपकंपी-सी दौड़ गयी। त्रूखिना, ब्रिगेडियर और सार्जेंट कुरील्किन के धुंधले चेहरे उसके दिमाग पर छाये हुए थें वह चुपचाप प्रतीक्षा करता रहा कि नौकरानी खुद बातचीत शुरु करेगी और रात की घटनाओं का बाकी हाल उसे बतायेगी।

"मालिक, आज आप कितनी देर तक सोये, " सुबह के समय पहनने का चोंगा उसे थमाते हुए आक्सीन्या ने कहा, "हमारा पड़ोसी दर्जी आपसे मिलने आया था और पुलिस का सिपाही भी एक चक्कर लगा गया है। वह यह कहने आया था कि आज पुलिस इन्स्पेक्टर का जन्मदिन है। लेकिन आप सो रहे थे और हमने जगाना ठीक नहीं समझा।"

"अच्छा, स्वर्गवासी विधवा त्रूखिना के यहां से भी कोई आया था?"

"क्यों? क्या त्रूखिना मर गयी, मालिक?"

"तुम भी बस योंही हो! उसका मातमी-साज-सामान तैयार करने में कल तुम्हीं ने तो मेरा हाथ बंटाया था?"

"आप पागल तो नहीं हो गये, मालिक?" आक्सीन्या ने कहा, "या कल का नशा अभी तक दिमाग पर छाया हुआ है? कल किसी की मैयत का सामान तैयार नहीं हुआ। आप दिन-भर जर्मन के यहां दावत उड़ाते रहे। रात को नशे में धुत्त लौटे और अपने इसी बिसतर पर गिर पड़े, जिस पर कि आप अभी तक सोये हुए थे। प्रार्थना के लिए गिरजे की घंटी भी बजते-बजत आखिर थक कर चुप हो गयी।"

"सचमुच?"ताबूतसाज ने संतोष की सांस लेते हुए कहा।"और नहीं तो क्या झूठ?" नौकरानी ने जवाब दिया।"तो फिर जलदी से चाय बनाओ और लड़कियों को यहीं बुला लाओ!"