Sunday, 11 January 2015

एक दिन अपनी डायरी में अन्ना कामीएन्सका ने लिखा

वह पूरी सम्पूर्णता में ग़रीब थी. वह फ़क़त अपनी तस्बीह के साथ गयी. वह अपने पीछे काली लाख और जर्जर मिसल वाले बेंत के छप्पर की एक जायदाद छोड़ गयी जिसमें पुराने तरीके से पापों का हिसाब किताब करने के तरीके थे मिसाल के तौर पर नौकरों और गुलामों से कैसा सुलूक किया जाए....
इतना तो है हमें इस बाबत चिंता करने की ज़रुरत ज़रा कम है.
लड़खड़ाती चलती हूँ कविताओं के सहारे.
कवितायेँ समय के पदार्थ से क्रिस्टलों में बदलती हैं. क्षणों का एक गुच्छा, टंगा हुआ झूलता मधुमक्खी के  छत्ते के मुंह से.
तली तक बैठने में लम्बा वक़्त लेता है कविता का नमक.
हम सब के पास अपना अध्यात्म होता है, चाहे हमें इसका भान हो ही नहीं या हम ज़रा भी शंका न करें उसकी बाबत.
'' मेरे सपनों में एक बार फिर से पानी.साफ़, शफ्फाफ़, बालू पर बहता, इतना पारदर्शी कि आप तल पर तैर रही सर्पिल मछलियों तक को देख सकते हैं.
कविताओं की कतरनों और इस्तेमाल न किये गए विचारों से भरा एक घर. विचारों का एक घोंसला, शब्द के मेहनतकश बढ़ई की छीलनें. झाग की तरह उनकी प्रचुरता, मेरे अस्तित्व के चारों तरफ, ज़रुरत से ज़्यादा खौलता पानी. मुझे नहीं मालूम क्यों इस या उस कविता को मैंने सज़ा दे दी खामोश हो रहने, कुछ न होने की; मैंने इसे क्यों लिखा, उस विचार को क्यों नहीं. सब झाग है.
जब सब शांत हो जाता है
अनंत भी आराम करता है
और चीज़ें हमारे लिए और नहीं रोतीं
मैंने चांदी के मुखौटे पहने देखा अपने मृतकों को.
हम “इस संसार” और “अगले संसार” की बातें करते हैं. “आस्तिक” वे होते हैं जो कथित रूप से“अगले संसार” पर, उसकी वास्तविकता पर भरोसा करते हैं.    
मैं “अगले संसार” पर यकीन नहीं करती. संसार एक है. एक सच्चाई. मृत्यु अगले संसार में जाने का रास्ता नहीं है कोई, हो सकता है वह हो अंधी आँखों का खुल जाना.''
(कबाड़खाना से साभार उद्धृत)

महिला का अपने शरीर पर कितना अधिकार/उमा चक्रवर्ती

इस साल की शुरुआत में कुछ लोगों ने एक महिला के उस अधिकार पर कुछ देर के लिए सोचा जो विरोध जताने के लिए खाना नहीं खा रही हैं.
जीवन के हक़ के लिए लड़ रही मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता शर्मिला इरोम पिछले 14 साल से भूख हड़ताल पर हैं.
लेकिन खाने से इनकार कर एक महिला अपने समाज, देश और राज्य को क्या संदेश देना चाहती हैं?
इरोम शर्मिला ने पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में सशस्त्र सेनाओं के विशेषाधिकारों से संबंधित विवादास्पद क़ानून के ख़िलाफ़ वर्ष 2000 में भूख हड़ताल शुरू की थी.
इन अधिकारों के तहत सैन्यबल बग़ैर किसी वारंट के किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार कर सकते हैं और कुछ विशेष हालात में तो उन्हें गोली मारने का भी अधिकार है.
मणिपुर लंबे समय से चरमपंथी हिंसा और अलगाववादियों से प्रभावित रहा है. अलगाववादी निश्चित तौर पर मौत के लिए ज़िम्मेदार हैं, लेकिन यह क़ानून भारत के एक हिस्से को युद्ध प्रभावित क्षेत्र की तरह दिखाता है.
भूख हड़ताल शुरू करने के साथ ही उन्हें गिरफ़्तार कर अस्पताल में ले जाया गया और पिछले 14 सालों से हिरासत में रखते हुए उन्हें नाक में पाइप के रास्ते तरल भोजन दिया जा रहा है.
पिछले साल अदालत ने उन पर लगे ‘ख़ुदकुशी की कोशिश के आरोपों’ को ख़ारिज़ कर दिया और उनकी रिहाई के आदेश दिए. लेकिन उन्हें कुछ ही देर बाद फिर से गिरफ़्तार कर लिया गया.
हर साल जनवरी में उनकी रिहाई और फिर गिरफ़्तारी का खेल खेला जाता है. इसी हफ़्ते एक बार फिर यही रस्म दोहराई गई.
ख़बरों में इसका ज़िक्र हुआ और फिर बहुत जल्द ही भुला भी दिया गया. लेकिन मैं इसे नहीं भूली, ख़ासकर नवंबर 2010 में शर्मिला की मां से मुलाक़ात के बाद.
शर्मिला की मां का दुख समझने के लिए उनके मुझसे कहे ये शब्द काफ़ी हैं, ‘‘एक दिन मैं बैठकर ख़बरें सुन रही थी और एक अधिकारी ने कहा कि वे सैन्यबल विशेषाधिकार क़ानून को कभी नहीं हटाएंगे. उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा और मैं बहुत निराश हुई. मैंने ख़ुद से कहा कि इसका मतलब हुआ कि मेरी बेटी कभी नहीं खा पाएगी.’’
मेरे लिए वो विशेष महिला हैं, जो अपनी बेटी से इसलिए नहीं मिलतीं, क्योंकि वो जानती हैं ऐसा करने पर शर्मिला रोएगी. और वो नहीं चाहतीं कि उनकी बेटी किसी तरह से कमज़ोर हो.
इरोम शर्मिला का विरोध उनके साहस का अविश्वसनीय नमूना है. उन्हें जीवन की मूलभूत चीजों से वंचित किया जा रहा है, लेकिन सरकार का मानना है कि कोई संकट नहीं है, क्योंकि वे उन्हें ज़बरन खाना दे रहे हैं और उन्हें ज़िंदा रखे हुए हैं.
लेकिन शर्मिला के शरीर को तरल भोजन के इंजेक्शनों के सहारे चलाया जा रहा है और हर कोई जानता है कि ज़िंदा रहने का ये कोई तरीक़ा नहीं है.
शर्मिला उन सिद्धांतों की प्रतिमूर्ति बन गई हैं जिनके लिए वह संघर्ष कर रही हैं. शर्मिला का कहना है कि लोगों को सैन्य विशेषाधिकार क़ानून के तहत जीवन जीने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए.
सरकारों का ध्यान आकर्षित करने के लिए वह अपने शरीर का इस्तेमाल कर रही हैं. अगर आप इस तरह की व्यवस्था में रह रहे हैं तो आप वास्तव में अपने मानव होने का आधार खो देते हैं, अपने देश में स्वतंत्रता और सुरक्षा का अधिकार.
मीडिया में महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक़ दिए जाने पर ज़ोरदार बहस होती है. कहा जाता है कि सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के साथ पुरुषों जैसा ही बर्ताव किया जाना चाहिए, उनके अधिकार एक जैसे होने चाहिए.
लेकिन अगर महिलाओं को एक जैसी तवज्जो दी जाएगी तब किसी भी तरह की हिंसा बर्दाश्त नहीं होगी और बहस तक की ज़रूरत नहीं होगी.
महिला सुरक्षा में सरकार की भी अहम भूमिका है. सरकार का मतलब सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय समझौते और राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग करना ही नहीं है.
उसका उत्तरदायित्व घर के अंदर, बाहर, दफ़्तरों, फैक्ट्रियों, स्कूल और कॉलेज में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी होना चाहिए.
हाल ही में नसबंदी शिविरों में महिलाओं की मौत की घटना को ही लीजिए. बड़े पैमाने पर हुए नसबंदी ऑपरेशनों में कई महिलाओं की जान चली गई. वहाँ क्या ग़लत हुआ?
सरकार कह रही है कि दवाएं नकली थी या सवाल उठाए जा रहे हैं इतने ऑपरेशन एक दिन में कैसे किए गए.
लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं पर कोई बात नहीं कर रहा? कोई नहीं पूछ रहा कि आबादी नियंत्रण का एकमात्र हल नसबंदी ही क्यों है और वह भी सिर्फ़ महिलाओं के शरीर पर ही क्यों?
फिर से बहस शर्मिला के तर्क़ पर आकर ठहर गई. महिला का अपने शरीर पर अधिकार है या नहीं और क्या वह इसे विरोध प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल कर सकती है.
(बीबीसी से साभार)

Thursday, 8 January 2015

नई सरकार, अच्छे दिन और मुगालते / कुलदीप कुमार

जिन लोगों को यह मुगालता था कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े अनेक संगठन हाशिये पर चले जाएंगे क्योंकि मोदी को पता है कि आर्थिक विकास तभी संभव है जब समाज में शांति हो, अब उनका यह मुगालता दूर हो जाना चाहिए। अरुण शौरी और मधु किश्वार जैसे मोदी के प्रशंसकों का कुछ अन्य कारणों से मोहभंग हो रहा है और ‘मोदीनामा’ लिखकर और मोदी के पक्ष में धुआंधार प्रचार करके (कु)ख्याति अर्जित करने वाली मधु किश्वार को अब यह संदेह होने लगा है कि मोदी पर काला जादू कर दिया गया है। जब विकासशील समाज अध्ययन केंद्र जैसे प्रतिष्ठित शोध संस्थान में प्रोफेसर के पद पर आसीन व्यक्ति काले जादू की बात करे तो स्वाभाविक तौर पर आश्चर्य तो होता ही है।
इस समय मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी में ज़िम्मेदारी के पदों पर बैठे लोग रोज जिस तरह के बयान दे रहे हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं कि ‘सामाजिक समरसता’ और ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ की बातें करने वाले इन लोगों के असली उद्देश्य इनसे ठीक उल्टे हैं। अगर देश की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ‘गीता’ को ‘राष्ट्रीय ग्रंथ’ घोषित कराना चाहती हैं और कह रही हैं कि इस बारे में केवल औपचारिक घोषणा होना ही बाकी है, तो इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि आज भी देश में संविधान का शासन है और संविधान भारत को एक “प्रभुसत्तासंपन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक गणतन्त्र” के रूप में परिभाषित करता है। भले ही आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद का लक्ष्य भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना है, लेकिन अभी वह बना नहीं है। संविधान का पालन करने की शपथ लेकर मंत्री बनने वालों को इस बुनियादी सचाई को भूलना नहीं चाहिए। लेकिन हकीकत यह है कि पिछली मई में सत्ता में आने के बाद से भारतीय जनता पार्टी के नेता और समर्थक कुछ इस तरह का बर्ताव कर रहे हैं जैसे इतिहास में पहली बार किसी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत मिला हो। इन दिनों नरेंद्र मोदी की आलोचना करने को प्रधानमंत्री पद का अपमान बताया जाता है। ये लोग भूल जाते हैं कि भारतीय संसदीय लोकतन्त्र के इतिहास में जैसा जनादेश राजीव गांधी को मिला था, वैसा आज तक किसी को नहीं मिला। लेकिन जब भाजपा नेता संसद में और संसद के बाहर ‘गली-गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है’ के नारे लगाते थे, तब किसी को यह ख्याल नहीं आया कि यह प्रधानमंत्री पद का अपमान है। न तब जब लालकृष्ण आडवाणी मनमोहन सिंह को देश का सबसे ‘निकम्मा प्रधानमंत्री’ बताया करते थे।
बहरहाल, संविधान के अनुसार देश के सभी नागरिक समान हैं चाहे उनके धर्म, जाति, क्षेत्र, लिंग और समुदाय कुछ भी क्यों न हों। अस्पृश्यता कानूनन अपराध है क्योंकि उसका आधार जन्म के आधार पर किसी जातिविशेष को नीच और अछूत मानना है। इसी तरह लिंग के आधार पर भी किसी को श्रेष्ठ या हीन नहीं माना जा सकता। लेकिन ‘गीता’ में कृष्ण अर्जुन से क्या कहते हैं? “मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्‌।।” (हे अर्जुन, मेरा आश्रय करके स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र अथवा अंत्यज आदि जो पापयोनि वाले हैं, वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं।) यह कहने से पहले वे अर्जुन को यह बता चुके होते हैं:  "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः" (गुण कर्म के विभाग से मैंने ही चारों वर्णों को उत्पन्न  किया है). तो क्या हम अब मान लें कि  वर्णव्यवस्था ईश्वरीय विधान है और स्त्रियां, वैश्य एवं शूद्र पापयोनि में जन्मे हीन  लोग हैं?
भारत का राष्ट्रीय ग्रन्थ उसका संविधान है, किसी अन्य ग्रन्थ को उसकी जगह लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती। शब्दछल का सहारा लेने में माहिर भाजपा के नेता अब यह दावा भी कर रहे हैं कि ‘गीता’ किसी एक धर्म से जुड़ी पुस्तक नहीं है। वह तो सार्वजनीन है और दर्शन एवं कर्मयोग का ग्रंथ है। सुषमा स्वराज तो उसके जरिये अनेक मानसिक परेशानियों का इलाज करने की वकालत भी करती हैं। लेकिन क्या कोई बताएगा कि यदि ‘गीता’ हिन्दू धर्म से जुड़ा ग्रंथ नहीं है तो फिर अदालतों में सिर्फ हिन्दू ही उस पर हाथ रख कर कसम क्यों खाते हैं, किसी और धर्म के अनुयायी क्यों नहीं?
शब्दछल के सहारे का एक और उदाहरण है धर्मपरिवर्तन को ‘पुरखों के घर वापसी’ का नाम देना। एक समय था जब विश्व हिन्दू परिषद इसे ‘परावर्तन’ कहा करती थी। आरएसएस के इस संगठन की भारत के अलावा लगभग नब्बे देशों में शाखाएँ हैं। संघ की तरह ही इसका अंतिम लक्ष्य भी भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ में तब्दील करना है। आगरा में जिस तरह से स्लम में रहने वाले गरीब मुसलमानों को लोभ-लालच देकर उनकी ‘घर वापसी’ का नाटक किया गया, वह उन सभी नाटकों की एक कड़ी भर है जो पिछले दो साल से उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, मेरठ, हापुड़ और अलीगढ़ जैसे अनेक जिलों में खेले जा रहे हैं। इन सबका उद्देश्य विधानसभा चुनाव के पहले राज्य में सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण है। वरना ईसाइयों के पवित्र त्यौहार क्रिसमस के दिन अलीगढ़ जैसे सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील शहर में बड़े पैमाने पर मुसलमानों के सामूहिक धर्मपरिवर्तन का कार्यक्रम बनाने का मतलब क्या है?
यहाँ यह याद दिलाना अप्रासंगिक न होगा कि जनवरी 1989 में हुए धर्म संसद के अधिवेशन में पारित प्रस्ताव में विस्तार से उन कदमों की चर्चा की गई थी जो भारत में ‘हिन्दू राष्ट्र’ की ‘पुनर्स्थापना’के लिए उठाए जाने आवश्यक हैं। इस प्रस्ताव का अंतिम बिन्दु था: “राष्ट्रीय शिक्षा नीति में नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा के साथ-साथ संस्कृत और योग की अनिवार्य शिक्षा और प्रशिक्षण शामिल किए जाएँ।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुझाव पर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया है। इस  पर किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन यह संयोगवश नहीं है कि इसी के साथ-साथ केन्द्रीय विद्यालयों से जर्मन हटाकर संस्कृत को ले आया गया है।
यह भी अकारण नहीं है कि मोदी सरकार की एक मंत्री  उन लोगों के लिए गाली का प्रयोग करती हैं जो ‘रामजादों’ के श्रेणी में नहीं आते। यह भी अकारण नहीं है कि भाजपा के सांसद साक्षी महाराज अपने दिल की बात जुबान पर ले आते हैं और महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को ‘राष्ट्रभक्त’ बताते हैं। आज संघ कुछ भी कहे, वह अपने उस इतिहास को मिटा नहीं सकता जो महात्मा गांधी के प्रति घृणा से भरा हुआ है। यह भी अकारण नहीं है कि भाजपा की उत्तर प्रदेश राज्य इकाई के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन लक्ष्मीकांत वाजपेयी ताजमहल को हिन्दू राजा का महल बताते हैं और वही (कु)तर्क दुहराते हैं जो लगभग छह दशक पहले पुरुषोत्तम नागेश ओक ने दिये थे और जिन्हें हिंदुत्ववादियों के अलावा दुनिया में कोई नहीं मानता। ओक अपने नाम के साथ प्रोफेसर लगाया करते थे और अपना परिचय विश्व इतिहास पुनर्लेखन संस्थान के अध्यक्ष के रूप में देते थे। उनके अनुसार कुतुब मीनार विष्णुध्वज है और लालकिला एवं जामा मस्जिद जैसी सभी इमारतें हिंदुओं द्वारा बनवाई हुई हैं।
इन ‘अच्छे दिनों’ में जब देश का प्रधानमंत्री स्वयं प्राचीन भारत में आज से भी अधिक उन्नत विज्ञान और चिकित्सा होने का दावा कर रहा है, जब भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का अध्यक्ष कह रहा है कि रामायण एवं महाभारत जैसे महाकाव्यों में वर्णित सभी घटनाएँ वास्तव में ठीक वैसे ही घटी थीं, तब यदि ओक की मान्यताओं को एक वरिष्ठ राजनीतिक नेता साम्प्रादायिक राजनीति करने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है तो इसमें आश्चर्य कैसा?
(जनपक्ष से साभार)

Sunday, 28 December 2014

युद्ध और प्रेम की कविताई

तुम्हारी हँसी मुझे आज़ाद करती है, मुझे पंख देती है, मुझसे मेरा अकेलापन छीन लेती है, नोच देती है मेरी सलाखों को...... (युद्ध और प्रेम की कविताओं के महागायक मिगेल एरनानदेस की पंक्तियां)
मुस्कुराओ मेरी तरफ़, कि मैं जा रहा हूँ
वहाँ, जहाँ हमेशा से हो तुम सब,
जो धान की बालियों और पुलियों से ढँक देते हो हम पर थूकने वालों के मुँह,
जो मेरे साथ खेतों, मचानों, लुहारखाने, भट्ठी में
दिन-ब-दिन नोंच फेंकते हो पसीने के मुकुट।
मैं अपने-आपको मुक्त करता हूँ मन्दिरों से:
मुस्कुराओ मेरी तरफ़
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जैतून चुनने वाले ख़येन के आन्दालूसियो, अभिमानी जैतून चुनने वालो
आत्मा की गहराई से मुझे बताओ
किसने बड़ा किया इन जैतून के पेड़ों को
ख़येन के आन्दालूसियो, न पैसे ने, न मालिक ने और न ही निरा शून्य ने
बल्कि मौन मिट्टी, मेहनत और पसीने ने
शुद्ध पानी और ग्रहों के साथ मिलकर
तुम तीनों ने दी है ख़ूबसूरती इसके घुमावदार तनों को
ख़येन के आन्दालूसियो, अभिमानी जैतून चुनने वालो
आत्मा की गहराई से मुझे बताओे
किसने दूध पिलाया जैतून के पेड़ों को।
न जाने जैतून की कितनी सदियाँ, बँधे हुए हाथ-पाँव
दिन-ब-दिन, रात-दर-रात अपने बोझ तले दबाती हैं तुम्हारी हड्डियों को!
ख़येन के आन्दालूसियो, अभिमानी जैतून चुनने वालो,
मेरी आत्मा पूछती है: किसके, किसके हैं ये जैतून के पेड़?
ख़येन, अपने चन्द्रिका पत्थरों से पूरे आक्रोश में उठो
कि कोई भी गुलाम नहीं रहेगा, न तुम न तुम्हारे जैतून के बागीचे
तेल की पारदर्शिता और उसकी महक के बीच
तुम्हारी मुक्ति है पर्वतों की मुक्ति में ।
(ख़येन स्पेन के आन्दालूसिया क्षेत्र का एक शहर, जैतून के तेल का वैश्विक केन्द्र : रचना 'आह्वान' से साभार)

भारत में एण्टीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल में 62 प्रतिशत बढ़ोतरी

एक ताज़ा अध्ययन के मुताबिक़ भारत दुनिया में रोगाणु-रोधी (एण्टीबायोटिक) दवाओं का सबसे अधिक इस्तेमाल करने वाले देशों में से एक के रूप में उभरकर सामने आया है। 2000-2010 के दशक में भारत में इन दवाओं के इस्तेमाल में 62 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है जबकि इसी अरसे में संसार के लिए यह दर 36 प्रतिशत रही है। भारत में हर व्यक्ति एक साल में रोगाणु-रोधी दवाओं की औसत 11 गोलियाँ खा रहा है; मगर ज़मीनी स्तर पर जो हालात हैं, उन्हें देखकर यह आँकड़ा काफ़ी कम लग रहा है। रोगाणु-रोधी दवाएँ खाने में चीन का नम्बर भी भारत के पीछे आता है। वैसे एक अमेरिकी नागरिक एक साल में रोगाणु-रोधी दवाओं की 22 गोलियाँ खाता है, परन्तु वहाँ कुल आबादी कम होने के कारण कुल खपत भारत और चीन से कम है।
रोगाणु-रोधी दवाओं की खपत में बढ़ोत्तरी मुख्य रूप से इस कारण नहीं हो रही कि लोगों की सेहत-सुविधाओं तक पहुँच पहले से ज़्यादा हो गयी है। अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि इस बढ़ोत्तरी का मुख्य कारण दवाओं का बिना-ज़रूरत तथा ग़ैर-वैज्ञानिक इस्तेमाल है। दरअसल, ये दवाएँ एक ख़ास किस्म के रोगाणुओं – बैक्टीरिया के कारण होने वाली बीमारियों (जैसेकि पेचिश, दस्त के कई मामले, टाइफ़ाइड, चमड़ी, फेफड़ों तथा ख़ून के कई इंफ़ैक्शन आदि) में ही ज़रूरी तथा कारगर होती हैं। मगर सारे इंफ़ैक्शन बैक्टीरिया के कारण नहीं होते, बल्कि आधे से ज़्यादा इंफ़ैक्शन (जैसे आम सर्दी-जुकाम, दस्त के आधे से ज़्यादा मामले, बहुत से बुखार जैसे डेंगू, चिकनगुनिया तथा अन्य अनेक वायरल बुखार आदि) एक अलग किस्म के रोगाणु – वायरस की वजह से होते हैं जिनके ऊपर न तो रोगाणु-रोधी दवाओं का कोई असर ही होता है और न ही इन इंफ़ैक्शन में इन दवाओं की कोई ज़रूरत ही होती है। मगर आमतौर पर यही देखा जाता है कि इन सब बीमारियों में, बिना यह देखे कि कारण बैक्टीरिया है या वायरस, एण्टीबायोटिक्स का इस्तेमाल हो रहा है। इससे एक तरफ़ तो आर्थिक नुक़सान होता है, तो दूसरी तरफ़ इन दवाओं के बेकार हो जाने का ख़तरा खड़ा हो गया है, क्योंकि इन दवाओं के अन्धाधुँध इस्तेमाल के चलते बैक्टीरिया की बड़ी संख्या ने इन दवाओं को प्रभावहीन करने के तरीक़े विकसित कर लिये हैं।
मसले के आर्थिक पक्ष की बात करें। भारत जैसे देश में यहाँ दो-तिहाई आबादी को समय पर दवाई नहीं मिलती, बड़ी संख्या में लोगों को सेहत ठीक रखने के लिए ज़रूरी भोजन तक नहीं मिलता, किसी मरीज़ को मेडिकल सुविधा मिल सकेगी या नहीं, इस बात पर निर्भर करता है कि वह दवाई ख़रीद पायेगा या नहीं। ऐसे में बिना ज़रूरत के दवाएँ देना, ख़ासकर मेडिकल विज्ञान के दृष्टिकोण से इतनी अहम तथा जीवन-रक्षक दवाएँ, वैज्ञानिक पक्ष से तो ग़लत हैं ही, साथ ही मानवता के प्रति अपराध भी है। यह सीधा-सीधा आम इंसान की जेब पर झपटमारी है, ऊपर से दवाओं के बुरे प्रभावों के कारण मरीज़ को जो नुक़सान झेलना पड़ सकता है, वह अलग है। इसके अलावा बिना ज़रूरत के इस्तेमाल होने से मानवीय श्रम तथा प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी होती है, वह अलग है। लेकिन आम इंसान की लूट और मानवीय श्रम तथा प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी में ही दवा-कम्पनियों से लेकर डॉक्टरों तक के लम्बे मुनाफ़ाखोरी के नेटवर्क की मोटी कमाई सम्भव है।
दवा-कम्पनी के लिए दवाओं का उत्पादन मुनाफ़े के लिए है, वह हर साल बिक्री के पहले से ज़्यादा “ऊँचे टारगेट” तय करके चलती है और अपने “टारगेट” को पूरा करने के लिए अपने उत्पादों के प्रचार हेतु “विज्ञापनबाज़ों” (जिनको कम्पनियाँ ‘मेडिकल रिप्रेजेण्टेटिव’ के अंग्रेज़ी नाम के पीछे छुपाती हैं) की बड़ी फ़ौज भर्ती करती है। थोक व्यापारी तथा कैमिस्ट अपने ऐजण्ट अलग से रखते हैं जिनका काम “फ़ील्ड” में जाकर हिस्सेदारियाँ तय करते हुए बिक्री श्रृंखला बनाना होता है। इस चेन की अन्तिम कड़ी हैं डॉक्टर, जिनके बारे में जितना कम लिखा जाये, अच्छा है। आम निजी क्लीनिकों, अस्पतालों, नर्सिंग होमों आदि की बात ही क्या करनी, मेडिकल कॉलेजों तक में रोगाणु-रोधी दवाओं के इस्तेमाल के लिए लाजिमी दिशा-निर्देशों की जिस तरह से धज्जियाँ उड़ायी जाती हैं, आम इंसान सोच भी नहीं सकता। मरीज़ों को रोगाणु-रोधी दवाओं के महँगे-महँगे टीके इसलिए नहीं लगते कि मरीज़ को उनकी हमेशा ज़रूरत ही होती है, बल्कि इसलिए भी लगते हैं कि वार्ड के “डॉक्टरों” को अपना “टारगेट” पूरा करना होता है। ग़ैर-ज़रूरी होना एक बात है, ग़ैर-वैज्ञानिक होना दूसरी बात है अर्थात “टारगेट” पूरा करने के चक्कर में यह भी नहीं देखा जाता कि मरीज़ को दी जा रही दवा बीमारी का कारण बन रहे बैक्टीरिया को कण्ट्रोल करने के लिए सही चुनाव है भी या नहीं, क्योंकि चुनाव का आधार बैक्टीरिया की किस्म, मरीज़ का हित है ही नहीं। ऐसे सीनियर डॉक्टर भी देखने को मिलते हैं जो टीकों की शीशियाँ तक सँभालकर रखते हैं ताकि कैमिस्ट तथा कम्पनी हिसाब-किताब में ‘गड़बड़ी’ न कर सके। अकेले डॉक्टर ही नहीं है जो ग़ैर-ज़रूरी इस्तेमाल के कारण हैं, झोला-छाप डॉक्टर, कैमिस्ट इसका बड़ा कारण हैं। कई रोगाणु-रोधी दवाओं की औक़ात तो अब टाफ़ियों जितनी भी नहीं रही, हर गली-मुहल्ले के नुक्कड़ में बैठा कैमिस्ट या झोला-छाप डॉक्टर इन दवाओं की मुट्ठी भर-भर आम लोगों को खिला रहा है जिसको नज़रसानी के नीचे लाना मौजूदा प्रबन्ध में असम्भव है।
आर्थिक नुक़सान के अलावा जो दीर्घकालिक और बड़ा नुक़सान समूची मानवता को झेलना पड़ सकता है और कुछ हद तक पहले ही झेलना पड़ रहा है, वह है रोगाणु-रोधी दवाइयों का बेअसर सिद्ध होना। कई रोगाणु-रोधी दवाएँ तो पहले ही नकारा हो चुकी हैं, कइयों की क्षमता कम हो गयी है और कइयों का दायरा सिमट गया है। दवा-रोधी टीबी (क्षयरोग) का सामने आना इसका एक उदाहरण है। टाइफ़ाइड के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कई दवाएँ अब इस काम के लायक नहीं रहीं। भारत में अगर सबसे ज़्यादा ग़ैर-ज़रूरी रोगाणु-रोधी दवाएँ लिखी जाती हैं तो यह हर बुखार को टाइफ़ाइड घोषित करके लिखी जाती हैं। टाइफ़ाइड के लिए आम इस्तेमाल होने वाली दवा ‘सिप्रोफ्लोक्सासिन’ तथा इसी श्रेणी की अन्य दवाओं (जो संयोग से सबसे ज़्यादा लिखी जाने वाली रोगाणु-रोधी दवाओं में से एक है) की कारगर-क्षमता अब इसी वजह से कम होती जा रही है। टाइफ़ाइड के लिए कुछ और दवाएँ जैसे ‘सिफ़िगजम (जीफ़ी), सैफ्फ़ट्रेगजोन’ आदि जो टाइफ़ाइड के कुछ ख़ास मामलों के लिए जैसे बच्चों में, गर्भवती औरतों में, ‘सिप्रोफ्लोक्सासिन-रोधी टाइफ़ाइड के इलाज में इस्तेमाल के लिए रिजर्व हैं, अब हर किस्म के बुखार के लिए यहाँ तक कि सिफ़िगजम तो सर्दी-जुकाम के लिए भी लिखी जा रही हैं। यहाँ तक कि झोला-छाप डॉक्टर, कैमिस्ट जिनको रोगाणु-रोधी दवाओं की हरेक श्रेणी तथा हरेक दवा के विशेष इस्तेमाल के पीछे वैज्ञानिक कारण बिलकुल भी पता नहीं होते, वे भी बेहद ऊँचे दर्जे की रोगाणु-रोधी दवाएँ भण्डारे की जलेबियों जैसे बाँटते हैं। नतीजा जो सामने आ रहा है, बहुत डरावना है क्योंकि मानवता को एक बार फिर बिना रोगाणु-रोधी दवाओं के युग में जाना पड़ सकता है।
इस नतीजे को वैज्ञानिक पहचानते भी हैं और देख भी रहे हैं, चेतावनियाँ भी दे रहे हैं। सरकारें भी इसे कण्ट्रोल में लाने का ख़ूब हल्ला-गुल्ला करती हैं, मगर असलियत यह है कि निजी मुनाफ़े पर आधारित मौजूदा पूँजीवादी प्रबन्ध के रहते इसे कण्ट्रोल करना सम्भव नहीं है। सबसे पहले तो दवा-कम्पनियों के मुनाफ़े को क़ाबू में करने की औक़ात किसी सरकार की नहीं है और सरकारों की मंशा भी नहीं है क्योंकि ख़ुद सरकारें पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी ही तो होती हैं और उसका वजूद ही पूँजीपतियों के मुनाफ़े को बनाये रखने, और बढ़ाने के लिए है। किसी भी सरकार या चुनावी राजनीतिक दल का इस प्रक्रिया को रोकने में कोई हित भी नहीं है। अगर सरकारों को मानवता का ज़रा भी ख़याल होता तो वह दवाओं के समूचे उत्पादन को निजी हाथों से छीनकर अपने हाथों में लेती तथा दवाइयों की बिक्री में से हर तरह के व्यापारी-एजेण्टों को बाहर कर सीधा लोगों तक सप्लाई चेन बनातीं, मगर यहाँ तो गंगा ही उल्टी बहती है। भारत की सरकारों ने रोगाणु-रोधी दवाएँ बनाने वाली सरकारी फ़ैक्टरियों को कब का बन्द करवा दिया है, मोदी सरकार ने दवाओं की क़ीमतों को भी हर तरह के सरकारी कण्ट्रोल से “आज़ाद” कर दिया है। जब कम्पनियों के मुनाफ़े को कण्ट्रोल करना सम्भव ही नहीं है तो बाक़ी सारी बयानबाज़ी खोखली है। किसी मन्त्री, नेता, नौकरशाह का ऐसा बयान कि कम्पनी के विज्ञापनकर्ता अब डॉक्टरों को ड्यूटी के समय नहीं मिलेंगे, अक्सर ही पढ़ने को मिल जायेगा, मगर इनसे कोई पूछे कि डॉक्टर के घर पर कौन सी मिलिट्री प्लाटून बैठी रहती है कि कम्पनी का एजेण्ट डॉक्टर को उसके घर जाकर नहीं मिल सकता। अगर घर में सीसीटीवी कैमरे भी लगा दिये जायेंगे तो ऐसी “बिज़नेस मीटिंगों” के लिए यह दुनिया छोटी नहीं पड़ जाती। रही बात आम लोगों को शिक्षित करने की, यह काम सरकार तथा डॉक्टर ही कर सकते हैं। सरकार करेगी ही नहीं और डॉक्टरों के पास “समय” कहाँ है। मरीज़ देखने के वक़्त कोई डॉक्टर ऐसा करेगा नहीं क्योंकि इससे तय समय में देखे जाने वाले मरीज़ों की संख्या कम हो जायेगी। लिहाज़ा इससे ओपीडी से होने वाली कमाई भी कम होगी, फिर क्यों कोई ऐसा करेगा, आखि़र कमाई के लिए है वह “सख़्त मेहनत करके” डॉक्टर बना है! अपने काम के बाद लोगों में प्रचार करना, इसकी बहुसंख्या डॉक्टरों से उम्मीद करना चिड़ी का दूध लेके आने के बराबर है। रोगाणु-रोधी दवाओं का ग़ैर-ज़रूरी इस्तेमाल कम करने में आधुनिक टेस्ट, स्कैन अहम भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन एक काम के टेस्टों का उपलब्धता का दायरा बहुत सीमित है, अगर टेस्ट उपलब्ध है तो टेस्टों के लिए होती मोटी वसूली भी एक रुकावट बन जाती है। ऊपर से टेस्टों/स्कैनों का अपना एक “बिज़नेस” है, जिसकी कहानी दवाओं की कहानी से ज़्यादा अलग नहीं है। कुल मिलाकर नतीजा यह निकलता है कि आप कोई भी रास्ता पकड़ेंगे, वह आपको मौजूदा पूँजीवादी प्रबन्ध के द्वार छोड़ जायेगा। इसलिए अगर विज्ञान को मानवता की सेवा में सच्चे अर्थों में लगाना है तो इस पूँजीवादी प्रबन्ध को नष्ट करना ही होगा। निजी सम्पति के ऊपर टिके इस सामाजिक-आर्थिक ढाँचे को किनारे लगाना होगा; यह बात किये बिना किसी भी और ढंग-तरीक़े की बात करना या तो एक बच्चे की बेसमझ इच्छा हो सकती है, या फिर आम लोगों से छल-कपट।

Saturday, 27 December 2014

बिल ब्राइसन का एक इंटरव्यू / डगलस शुल्ज़


(कबाड़खाना से साभार अशोक पांडेय की प्रस्तुति)

बिल ब्राइसन का मैं फैन हूँ. आज से दो साल पहले उनका एक इंटरव्यू मैंने इस ब्लॉग पर पोस्ट किया था. उसी को दोबारा से पेश कर रहा हूँ - (अशोक पांडेय)

स्टैनफोर्ड के सालाना यात्रा सम्भाषण सत्र 2001 के विशिष्ट मेहमान के तौर पर बिल ब्राइसन अपने लेखन और यात्राओं के बारे में अपने ढाई हज़ार प्रशंसकों से बात करने को लंदन पधारे थे. डगलस शुल्ज़ द्वारा लिए गए इस साक्षात्कार की पूरी ट्रान्सक्रिप्ट प्रस्तुत है –

परिचय
ज़ाहिर है, बात घिसी पिटी है कि हमारे मेहमानों का परिचय दिए जाने की ज़रुरत नहीं पड़ती, लेकिन आप में से जो भी तुरंत किसी और नक्षत्र से यहाँ पहुँच कर इस रात इस हॉल में आ पहुंचे हैं उनकी जानकारी के लिए मैं पुष्टि कर सकता हूँ कि हमारे वक्ता जनाब बिल ब्राइसन इस ग्रह के सबसे पसंदीदा यात्रावृत्त लेखक हैं.
यह न सिर्फ उनकी छः यात्रा-पुस्तकों की स्तब्धकारी बिक्री है जिसने उन्हें यह सम्मान दिया है, तथ्य यह भी है कि उनकी किताबें इतनी सुगम्य, सचेतन और सबसे ऊपर आश्चर्यजनक रूप से मजाकिया हैं. यात्रावृत्तों में उनका वही स्थान है जो पाकविद्या में डेलिया स्मिथ और बच्चों की किताबों में जे. के. राउलिंग का. दूसरे शब्दों में कहूं तो वे सर्वश्रेष्ठ हैं.
आप लोगों में जो चौकस हैं उन्होंने गौर किया होगा कि हालाँकि हमने इस का प्रचार एक यात्रा सम्भाषण के रूप में किया था, बिल किसी स्क्रीन के सामने तीखी नोंक वाली छड़ी लिए नहीं खड़े हैं. इसके बजाय हमारी योजना यह है कि बिल और मैं करीब एक घंटे आपस में गपशप करेंगे और यह दिखाने की कोशिश करेंगे कि दो हज़ार लोग हमारी बातें नहीं सुन रहे हैं, और बीच बीच में मैं बिल से अपनी किताबों से कुछ हिस्से पढ़कर सुनाने का निवेदन भी करूंगा ताकि सिर्फ मुझे ही न बोलना पड़े. और आखिर में हम कुछ समय आपके उन प्रश्नों के लिए रखेंगे जिन्हें पूछने से मैं रह गया होऊं.
बिल ब्राइसन - ... और उस के बाद मैं एक ड्रिंक के लिए जा रहा हूँ!
जब मैंने बिल को इस प्लान के बारे में बताया था कि वे मेरे हर सवाल का जवाब हाँ या न में देंगे ताकि आपको मेरी मदद करनी पड़े, बिल ने मुझ से इस का वायदा किया था.

ठीक है बिल, मैं बिलकुल शुरू से शुरू करने जा रहा हूँ, जैसे पार्किन्संस करती है, देस मोइनेस, आयोवा में आपके बचपन से. क्या आपका बचपन सुखी था?
दर असल हाँ. मेरा बचपन बेहद सुखी था. मेरे ख्याल से इसका बड़ा हिस्सा इस बात पर निर्भर था कि मैं पचास के दशक में बड़ा हुआ. अमेरिका में पचास के दशक में बड़ा होना एक तरह से स्वर्णयुग में जीने जैसा था. अभी एक दिन मैं सोच रह था कि उन दिनों में ऐसा क्या ख़ास था, तो वह महान आशावाद का समय था. युद्ध बीत चुका था,अर्थव्यवस्था चढ़ाव पर थी. स्पष्टतः अमेरिका उस तरह की बहाली नहीं करनी पडी जैसे यूरोप के लोगों को करनी पडी सो जब अमेरिका युद्ध से बाहर आया तो उसकी स्थिति बहुत मज़बूत थी और उसके सारे उद्योग तब भी सुरक्षित थे. बस हमने टैंक बनाने बंद कर दिए और टेलीविजन और फ्रिज बनाना चालू कर दिया. सो यह अमेरिका में एक महान विकास का दौर था.
लेकिन वह उस वक्त भी एक ख़ासा सादगीभरा समय था. दो लेन वाले राजमार्गों का समय. और मेरे ख्याल से तब प्रवृत्तियाँ भी फ़र्क़ थीं. आयोवा, जहां मैं बड़ा हुआ, वहां लोग एक ख़ास अंदाज़ में लातीफागोई करते थे जैसा अब नहीं करते, और वे उसकी कद्र करते थे, जिस तरह मैं समझता हूँ ब्रिटिश लोग अब भी करते हैं. हाज़िरजवाबी और ठठ्ठे और इस तरह की चीज़ें.

अब क्यों नहीं करते?
मेरे ख्याल से लोग अब पैसा कमाने और ज़िन्दगी में आगे बढ़ने में ही संतुष्ट हो चुके हैं, और अमेरिका में हाज़िरजवाबी एक तरह की बाधा बन चुकी है. मिसाल के लिए मैं सचमुच सोचता हूँ कि अगर मैं किसी ब्रिटिश कम्पनी में काम कर रहा होता तो मेरे बारे में इस तरह बातें होतीं – “अरे डग, सही बन्दा है यार. क्या चीज़ है. ऑफिस के बाद उसके साथ एक एक बीयर खींचने का मज़ा अलग है,” लेकिन अमेरिकी कम्पनी में यह इस तरह होगा – “डग का पता नहीं. मुझे नहीं मालूम वो इस प्रोग्राम में हमारे साथ है भी या नहीं. और वो उतना सीरियस भी नहीं है.” और मुझे लगता है यह कितने शर्म की बात है.
जब मैं बच्चा था, खूब हंसी ठठ्ठा हुआ करता था. मेरे पिताजी शब्दों के साथ खेलने में माहिर थे.

तो अब हमें पता लग रहा है कि आप में वो बात आई कहाँ से! क्या आपके बचपन में ऐसे कोई संकेत थे कि आप बड़े होकर यात्रावृत्त लेखक बनने वाले हैं? मिसाल के लिए क्या आप कसम खाकर कहेंगे कि अपनी हाईस्कूल ईयर बुक में आपने लिखा था कि आप दुनिया के सर्वप्रिय यात्रावृत्त लेखक बनने जा रहे हैं?
नहीं, मैंने यात्रावृत्त लेखक बनने की कभी सोची ही नहीं और मैं अपने आप को अब भी यात्रावृत्त लेखक नहीं समझता.
मैं तो एक आदमी हूँ जो किताबें लिखता है. मैंने अपने को हमेशा किराये में ली गयी एक कलम समझा है, जो इस बात पर खुश है कि लोग मुझे लिखने के एवज में पैसा देंगे. बस यह हुआ कि मैं यात्राओं की दिशा में निकल पड़ा. मैंने ‘द लॉस्ट कंटीनेंट’ लिखी जो तकनीकी रूप से एक यात्रावृत्त है पर मैंने उसे एक संस्मरण की तरह अधिक देखा. वह अमेरिका में बड़े होने के बारे में थी. मैंने उसे कभी भी यात्रावृत्तों की श्रृंखला की शुरुआत के तौर पर नहीं देखा,लेकिन हुआ यह कि उस पर अच्छी बातें कही गईं और प्रकाशकों ने मुझे उत्साहित किया कि मैं उसी धारा में चलता जाऊं और यात्रावृत्त लिखूं. शुरू में मैं और तरह की किताबें भी लिख रहा था, जैसे कि भाषा पर. वो हाशिये में चली गईं लेकिन मुझे उम्मीद है मैं उन तक वापस लौटूंगा.

क्या आपको काफी पहले पता चल गया था कि आप लेखक बनने वाले हैं?
मुझे पता था कि संभवतः मैं किसी न किसी तरह से शब्दों के साथ काम करने वाला हूं. अंग्रेज़ी इकलौती चीज़ थी जिसमें मैं ठीकठाक था और हमारा पुश्तैनी अखबार हमारा पुश्तैनी धंधा था. मेरे माता-पिता दोनों स्थानीय अखबार के लिए काम करते थे. मेरा भाए जो मुझसे नौ साल बड़ा और इस लिहाज़ से मेरे जीवन में एक स्थानापन्न वयस्क था, भी स्थानीय अखबारों में काम करता था. सो रात को खाने की मेज़ पर यही बातें होती थीं और मुझे किसी और चीज़ का ख़याल ही नहीं आया. तय था कि मैं कोई न्यूक्लियर साइंटिस्ट या जानवरों का डाक्टर नहीं बनने जा रहा था. मुझे अपने बिलकुल शुरुआती क्षणों से बस पता था कि मैं शब्दों के साथ काम करूंगा.

मेरा दूसरा सवाल यह है कि आप ने देस मोइनेस छोड़ क्यों दिया? ‘द लॉस्ट कंटीनेंट’ की विख्यात शुरुआती पंक्तियों को उद्धृत करें तो –
“जब आप देस मोइनेस के रहनेवाले होते हैं तो आप या तो इस तथ्य को बिना कोई सवाल किये स्वीकार कर लेते हैं और बॉबी नाम की किसी लडकी के साथ शादी कर के फायरस्टोन फैक्ट्री में नौकरी पाकर हमेशा हमेशा के लिए वहीं रहें या आप अपना लड़कपन लम्बे समय तक इस बात का रोना रोते हुए गुजारें कि यह क्या कूड़ा जगह है और आप इस जगह को छोड़ कर जाने तक का इंतज़ार नहीं कर सकते और तब आप बॉबी नाम की किसी लडकी के साथ शादी कर के फायरस्टोन फैक्ट्री में नौकरी पाकर हमेशा हमेशा के लिए वहीं रहें.”

उस नियति से आप कैसे बच सके?
मैं, बस ऐसे ही चला आया. और यह वाक़ई अजीब था क्योंकि सारे हाईस्कूल भर जैसा कि मेरे ख्याल से उस समय हाईस्कूल में सारे ही लोग कहा करते थे “हे भगवान, मैं ग्रेजुएट होकर यहाँ से बाहर जाने का इंतज़ार नहीं कर सकता.” और जब ऐसा हो गया हो मैं निकल पड़ा और मैंने यह तक सोचा कि हर कोई मेरे साथ आ रहा है मगर सारे वहीं रहे और सब ने फायरस्टोन फैक्ट्री में नौकरी पा ली.
मैं बाहर निकलने का इंतज़ार नहीं कर सकता था क्योंकि देस मोइनेस इस कदर हैबतनाक था, लेकिन मुझे हमेशा यह सघन होश रहता था कि मैं बड़ा हो रहा हूँ और असल संसार कहीं और है. अपने बचपन के शुरुआती दिनों से ही मैं ‘नेशनल जियोग्राफ़िक’ की तस्वीरें देखकर बहुत प्रभावित होता था. हर जगह इतनी अच्छी और इतनी दिलचस्प और भरपूर और सुन्दर दिखती थी और ऐसा लगता था कि लोग काफी रोमांचक जीवन जी रहे हैं और मैं भी बाहर निकलकर वैसा थोड़ा कुछ करना चाहता था. सो जैसे ही मुझे मौका मिला मैं निकल आया और संयोगवश यहाँ पहुँच गया. ब्रिटेन में.

आप ने यहाँ ब्रिटेन में पत्रकारिता का काम किया और तब आपके जीवन में वह महत्वपूर्ण क्षण आया था जब आप नौकरी छोड़कर अपने बच्चों के साथ उत्तरी यॉर्कशायर जा बसे थे और वह भी उन तीन हज़ार पाउंड्स की हिम्मत पर जो आपको एक किताब लिखने के लिए मिलने वाले थे, और उसके बाद आप अपने बच्चों की परवरिश के अलावा ‘द लॉस्ट कंटीनेंट’ लिखने को यात्रा पर निकलने वाले थे. यह सुनना ही डरावना लगता है?
मेरे लिए भी वह डरावना ही था और इस का पूरा श्रेय मेरी पत्नी को जाता है कि मैं वैसा कर सका. हुआ ये कि मैं फ्लीट स्ट्रीट में काम कर रहा था और अखबारों में उपसंपादक के तौर पर मेरा करियर खासा सुखद था. एक बार छुट्टियों में हम यॉर्कशायर गए हुए थे और मेरे ख्याल से मैं रोज़ के काम पर आने-जाने के क्रम से सामान्य से कहीं ज्यादा उकताया हुआ था. रोज़ गाड़ी लेकर लंदन में प्रवेश करने और वहां से बाहर निकलने से मैं ऊब चुका था और मैं लिखना भी चाहता था. यह मेरी हमेशा से ख्वाहिश रही थी कि मैं लिख कर अपना पेट पालूँ. यॉर्कशायर से वापस आते समय मैं कुछ ज्यादा ही झींकता रहा होऊँगा क्योंकि वापस काम पर जाने के बाद एक दिन मेरी पत्नी ने मुझे फोन किया, जो वह आम तौर पर नहीं करती और बोली – “मैं तुम्हें यह बताना चाहती हूँ कि मैंने मकान को बिक्री के लिए बाज़ार में लगा दिया है.” और मैंने कहा – “तुम ने क्या ...?” तो वह बोली “और बड़ी बात यह है कि कुछ लोग कल उसे देखने आ रहे हैं.” तो उन लोगों ने  अगले दिन आकर मुंहमांगी कीमत अदा की और मकान खरीद लिया, तो एक तरह से मुझे जबरन ऐसा करने को धकेला गया. मैं भयाक्रांत था क्योंकि वयस्क होने के बाद से कभी भी मैं बगैर तनख्वाह के नहीं रहा था.

आपकी किताब का विचार वापस अमेरिका जाकर वहां की छोटी छोटी जगहों की यात्रा करने का था और नतीजे में जो सामने आया वह ‘द लॉस्ट कंटीनेंट’ था. आप के यात्रा लेखन में बार बार आने वाली इस चीज़ ने मुझे बहुत मुग्ध किया है कि आप एक साथ आउटसाइडर भी हो जाते दीखते हैं और इनसाइडर भी. इस मामले में आप एक अमेरिकी थे जो वापस जाकर अमेरिका के बारे में लिखने जा रहा था. जब आप अपने घर के बारे में लिख रहे थे तब क्या आप को किसी आउटसाइडर जैसा महसूस हुआ था?
मेरे ख्याल से मुझे एक हद तक हमेशा ऐसा लगता रहा. बाकी और लोगों से कहीं ज्यादा मैं असल में आयोवा से बाहर निकला कर कहीं और बस जाना चाहता था. मुझे बस यह लगता था कि मैं दूसरों की तरह उसके भीतर ठीक से फिट नहीं हो पाता था. तब मैं यहाँ आया और मैंने पाया कि एक विदेशी के रूप में ब्रिटेन में रहना कितना आह्लादकारी होता है. यह एक बेहतरीन स्थिति होती है. जब सब कुछ ठीक ठाक चल रहा हो तो आप आगे बढ़कर समारोहों वगैरह में हिस्सेदारी कर सकते हैं और हर चीज़ बहुत अच्छी होती है. और जब सब कुछ ठीक न चल रहा हो, जो यहाँ के मामले में पूरी तरह एक परिकल्पित स्थिति होती है, जैसे कि मान लीजिये आपकी राष्ट्रीय फ़ुटबाल टीम जर्मनी से हार गयी तो आप पीछे खड़े रहते हुए कह सकते हैं कि क्या शर्म की बात है.

तो जब आप ब्रिटेन में बीस साल रहने के बाद ‘नोट्स फ्रॉम अ स्मॉल आइलैंड’ लिखने जा रहे थे क्या ब्रिटेन में तब भी आप अपने को एक आउटसाइडर महसूस करते थे?
मैं यहाँ हमेशा बहुत सुकून से रहा हूँ. यहाँ आकर मुझे बहुत जल्दी ही घर जैसा लगने लगा था और मैं यहाँ वाकई बस गया और खुश था. विदेशी होना मेरी खुसूसियत थी. मैं एक अमेरिकी हूँ. मैं हमेशा था भी और यही मेरा पहचान चिन्ह था और एक तरह से अच्छा था. मैंने उसका बड़ा लुत्फ़ उठाया. इस आप कुछ अलग और ख़ास बन जाते हैं. मेरे लिए यह समस्या तब बनी जब मैं वापस अमेरिका गया और मेरे पास अचानक यह विशिष्टता नहीं रही थी. वहां जो मैं था एक अमेरिकी था जिसकी आवाज़ मजेदार सी थी और लोगों को सही सही पता ही नहीं रहता था कि वे मेरे बारे में किस तरह सोचा करें.

‘नोट्स फ्रॉम अ स्मॉल आइलैंड’ के बाद आप वापस अमेरिका चले गए और मैं जानता हूँ कि ऐसा करना आपके लिए कोई आसान सांस्कृतिक फ़ैसला नहीं रहा था. सच यह है कि आपने एक दफा कहा था कि आप जीवन में तीन काम नहीं कर सकते – पहला, आप टेलीफोन कम्पनी को हरा नहीं सकते, दूसरा आप किसी वेटर की निगाह में तब तक नहीं आ सकते जब तक कि वह आपको देखने को तैयार न हो और तीसरा यह कि आप कभी घर वापस नहीं जा सकते. तो क्या आप वापस घर जा पाए?
बहुत मुश्किल था. मेरी उम्मीदों से कहीं ज्यादा मुश्किल. मैंने सोचा था कि मैं बस वहां जा रहा हूँ जो मेरे लिए बहुत परिचित था, लेकिन दिक्कतें तमाम तरह की थीं. पहली यह कि मैं काफी लम्बे समय से बाहर रह रहा था, और मैं अपनी कई आदतों और सोचने के तरीकों में ‘अँगरेज़’ बन चुका था. सो यह एक बड़ी समस्या थी. और अमेरिका भी बहुत बदल गया था. और आख़िरी यह कि मैं वयस्क होने के बाद अमेरिका में रहा ही नहीं था; मैं हमेशा किसी न किसी का बच्चा रहा था. सो वे सारी चीज़ें जो आप बड़े होने पर ही करते हैं – पेंशन लेना, चीज़ें गिरवी रखना वगैरह, वे सब मैंने ब्रिटेन में की थीं. अमेरिका में मेरे पिताजी ने यह सब किया था. सो मैं अपने ही देश में एक तरह से असहाय था. मुझे किसी हार्डवेयर स्टोर में सामान तक मांगना नहीं आता था. मुझे चीज़ों के नाम याद ही नहीं रह गए थे. मेरे वार्तालाप अक्षरशः इस तरह के हुआ करते थे – “मुझे थोड़ी सी वो अजीब सी चीज़ चाहिए जिनसे दीवारों के छेड़ भरे जाते हैं.” मेरी पत्नी के देश के लोग उसे ‘पौलीफीलिया’ कहते हैं, वहां वे उसे ‘स्पेकल’ कहते थे. बचपन से ही इतनी अंतरंगता से परिचित ऐसी जगह पर अलग-थलग पड़ जाना बेहद अटपटा था.
मुझे इस बात की भी आदत पद गयी थी कि यहाँ ब्रिटेन में आप बात बात पर लतीफे गढ़ सकते हैं पर अमेरिका में ऐसा करना बहुत खतरनाक होता. इस बारे में मैंने अपनी एक किताब में लिखा है. एक बार मैं बोस्टन में कस्टम और इमीग्रेशन से गुज़र रहा था तो वहां पर मौजूद आदमी ने मुझ से पूछा “कोई फल या सब्जियां?” तो मैंने जवाब दिया “ठीक है, चार किलो आलू दे दीजिये.” उस वक्त मुझे ऐसा लगा था कि वह मुझे दबोच कर फर्श से चिपका देने वाला था.
आपने अक्सर अमेरिका में एक अलग तरह के सेन्स ऑफ़ आइरनी की बात की है. मिसाल के लिए मुझे आपके उस पड़ोसी का वो किस्सा बहुत पसंद आया था जो अपने बगीचे में एक पेड़ काट रहा था और उसे अपनी कार की छत पर लाद रहा था ...
हाँ, एक तूफ़ान में उसके बगीचे में एक पेड़ गिर गया था और एक दिन घर के बाहर आकर मैंने देखा कि वह पेड़ को छोटे हिस्सों में काट कर उसे निबटाने की नीयत से अपनी कार की छत पर लाद रहा था. पेड़ खासा झाड़ीदार था और कार के अगल बगल झूल रहा था. मैंने बिना सोचे जल्दीबाजी में कह दिया – ‘अच्छा तो आप कार को छिपाकर ले जा रहे हैं” और उसने मुझे देख कर कहा “नहीं, नहीं. रक रात तूफ़ान में यह पेड़ गिर गया था.” सो यह ऐसे ही चलता रहा. ऐसी घटनाएं होती रहीं. मैं पाता था कि मैं उन सज्जन के साथ खूब लतीफेबाजी कर रहा हूँ. एक दफा मुझे एक हवाई यात्रा का दुस्वप्न सरीखा अनुभव हुआ – फ्लाईट छूट गयी वगैरह वगैरह, तो उन साहब ने मुझ से पूछा “आप किस कम्पनी के साथ यात्रा कर रहे थे?” तो मैंने जवाब दिया “पता नहीं सारी ही कम्पनी अजनबी थी.” इस बात से उसे बहुत असुविधा हुई.

आपको अमेरिका वापस गए हुए पांच साल हो चुके हैं. ब्रिटेन के बारे में आपके आउटसाइडर का नजरिया अब क्या है? क्या आप संपर्क में रहते हैं?
मैं हर साल छः या सात बार वापस आता हूँ. जितना भी परिस्थियां अनुमति दें. अब लन्दन में हमारे पास एक फ़्लैट है, सो हम एक परिवार के तौर पर आया करते हैं और मैं संपर्क बनाए रखता हूँ. मैं अब भी टेलीफोन पर बहुत सारे लोगों के साथ बात करता हूँ और घटनाओं के बारे में जानकारियाँ लेता रहता हूँ. सो ब्रिटेन विदेश नहीं बना है.

वे ब्रिटिश जड़ें कितनी स्थाई हैं? मिसाल के लिए क्या आप यह जान सके कि लोगों देश को गणराज्य बनाने के लिए अच्छा समर्थन देते हैं?
अफ़सोस, देश को गणराज्य बनाने के लिए अच्छा समर्थन तो ख़ास अच्छा नहीं है. मेरा मानना है कि उनकी स्थिति खासी असुविधापूर्ण है, वे लम्बे समय तक ब्रिटेन का उपनिवेश रहे थे और वे जैसे भी हैं पिछले पचास सालों से एक अलग पहचान बनाने में लगे हैं और उसमें समय लगता है. ऐसा करना मुश्किल होता है पर वे लोग धीरे धीरे वहां पहुँच रहे हैं. मेरा ख्याल है ओलिम्पिक्स ने काफी मदद की. वह एक आखिरी कदम था जिसे लिया ही जाना था ताकि एक मुक्त आत्मनिर्भर समाज के रूप में उनकी पहचान बने और उनके भीतर वह आत्मविश्वास आए.
ऑस्ट्रेलिया में बच गई ब्रिटिश विशिष्टताओं में एक क्रिकेट है. ऑस्ट्रेलिया में रेडियो पर क्रिकेट कमेंट्री सुनने पर ‘डाउन अंडर’ में एक बढ़िया टुकड़ा है जिसे हम बिल से पढ़कर सुनाने को कहेंगे.
एक और चीज़ जिसने आपको बाँधा वह भौतिक तौर पर अपने अलग थलग पड़े होने के कारण ऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप की उल्लेखनीय जैव और वन्य विविधता है. आपने किताब में ऐसी ऐसी और इतनी सारी प्रजातियों को दर्ज किया है जिन्हें इस ग्रह पर और कहीं नहीं पाया जाता.
हाँ, और हर वक़्त नई नई प्रजातियाँ खोजी जा रही हैं. वे जानते ही नहीं वहां और क्या क्या है. ऑस्ट्रेलिया के बारे में एक और शानदार बात यह है कि यह अब भी एक न खोजा गया मुल्क है. मुझे संख्या ठीक से याद नहीं लेकिन कोइ एक लाख कीट पतंगों की प्रजातियाँ वहां ऐसी हैं जिनका किसी वैज्ञानिक ने न निरीक्षण किया है, न उन्हें कोई नाम दिया गया है न उनका कोई कैटलोग तैयार हुआ है. यही बात वनस्पतियों के बारे में सच है. इस तरह की करीब पचास हज़ार प्रजातियाँ हैं. ऐसी ऐसी चीज़ें भी हैं जो कैंसर का इलाज कर सकती हैं. संभावनाएं अविश्वसनीय हैं. कोई भी असल में नहीं जानता वहां क्या क्या है.
और वह एक ऐसा देश है जिसके ढंग से नक्शे तक नहीं बनाए गए हैं.
बमुश्किल. ऑस्ट्रेलिया के नक़्शे वैसे तो बनाए जा चुके हैं जैसे हवाई जहाज़ से लैंडस्केप के काफी नज़दीक से गुजरते वक्त दीखते हैं पर वास्तविक ज़मीनी स्तर पर एक विशाल भूखंड के नक़्शे अभी बनने बाकी हैं. आप एक ऐसी जगह के बारे में बात कर रहे हैं जो संयुक्त राज्य अमेरिका महाद्वीप यानी निचले ४८ राज्यों जितना बड़ा है और जिसकी आबादी न्यूयॉर्क जितनी है. उसका इतना सारा हिस्सा अभी खाली पड़ा है. आप ऑस्ट्रेलियामें ऐसी जगहों पर भी अपने को पा सकते हैं जहां आप सड़क किनारे खड़े होकर एक तरफ देखें तो संभवतः अगले फुटपाथ को देखने आपको १५०० किलोमीटर आगे जाना पड़े. मुझे यह सब बहुत अचरजकारी लगता है.

मुझे ऑस्ट्रेलिया के तटीय इलाकों से काफी दूर के इलाकों के शुरुआती खोजियों के किस्से बहुत पसंद हैं. वो कहानी क्या थी अपना खुद का मूत्र पीने के बारे में? या किसी दूसरे का?
नहीं, मेरा अपना नहीं!
होता यह था कि खोजी लोग ऑस्ट्रेलिया जाया करते थे और चूंकि उनमें से ज़्यादातर ब्रिटेन और आयरलैंड जैसे मुलायम और समशीतोष्ण देशों से जाते थे, उन्हें कतई पता नहीं होता था कि वे जा कहाँ रहे हैं, न तो वहां के आकार के बारे में उन्हें बहुत मालूमात होते थे न वहां के पर्यावरण की मुश्किलों के. उनके जीवन की किसी भी चीज़ ने उन्हें इस के लिए तैयार नहीं किया होता था. सो वे समूचे महाद्वीप को आरपार कर लेने के बड़े मंसूबों के साथ सफ़र शुरू करते थे जो आज के मोटरगाड़ियों के ज़माने में भी ख़ासा बड़ा काम होता है.सो उन्नीसवीं शताब्दी में ऐसा करना बेहद मुश्किल होता था और निरपवाद रूप से उन सब का सामना ऐसी परिस्थितियों से होता था जब उनके पास पीने को पानी की एक बूँद तक नहीं होती थी और उन्हें अपना या अपने घोड़े का मूत्र पीने को विवश होना पड़ता था. ऐसा आम तौर पर उल्टा असर करने वाला होता है क्योंकि मूत्र में उपस्थित लवण प्यास को और बढ़ा दिया करते थे. ऐसा मैंने पढ़ा है – कभी जांचकर नहीं देखा.

कुछ समय के लिए आपका एक साथी भी था – आपका दोस्त एलन – जो आपके साथ कुछ समय के लिए आया था और जिसे आप ऑस्ट्रेलिया में उसके साथ घट सकने वाली हैबतनाक बातों की कहानियाँ सुनाकर डराया करते थे. क्या आप एलन के साथ क्वींसलैंड वाला हिस्सा पढ़कर सुनाएंगे?
उस हिस्से की पृष्ठभूमि समझाना चाहूँगा पहले. मैं क्वींसलैंड के उत्तरी विषुवतीय इलाके में हूँ एक बीच पर टहलता हुआ और मेरे साथ मेरे ब्रिटिश दोस्त एलन शेर्विन है जो कुछ दिन मेरे साथ घूमने के लिए पहुंचा है. तब तक मैं इस तथ्य से भली भाँती परिचित हो चुका था कि सैद्धांतिक रूप से हालांकि जानवर बहुत खतरनाक होते हैं, वास्तविकता में वे नहीं होते, लेकिन एलन को यह मालूम नहीं था और यह सब उसके लिए नया था. और मैं स्वीकार करना चाहूँगा कि मैंने उसके इस अज्ञान का फायदा उठाया. आपको यह भी पता होना चाहिए कि वह क्वींसलैंड में बॉक्स जेलीफिश का सीज़न था. बॉक्स जेलीफिश अंडे देने के लिए इन दिनों भीतरी तटों तक आया करती थीं और यह भी कि यह धरती पर सबसे ज़हरीली प्रजातियों में एक होती है.

आपने ऑस्ट्रेलिया को एक भाग्यशाली देश कहा है, लेकिन जो एक हिस्सा इस तस्वीर में फिट नहीं बैठता वह वहां के आदिवासियों का कष्ट है. आधुनिक समाज में इन आदिवासियों की स्थिति को लेकर आपने जो आंकड़े उद्धृत किये हैं वे तबाहकुन हैं और ऐसा लगता ही कि इसके लिए सतही उत्तर यही दिया जाता है कि बीसवीं सदी और आदिवासी आपस में मेल नहीं खाते. आपकी किताब में सबसे दुखी करने वाला हिस्सा वह है जिसमें आप इन दो संसारों के बीच की खाई पाटने के लिए की जा रही सोशल इंजीनियरिंग का वर्णन करते हैं. क्या आप हमें थोड़े से में बता सकेंगे कि वह प्रयोग क्या था और उन तथाकथित “चुरा ली गयी पीढ़ियों” का क्या हुआ?
उसे ही “चुरा ली गयी पीढ़ियाँ” कहा जाता था और यह सारे ऑस्ट्रेलिया में सबको मालूम है और सभी को उस की वजह से बेहद ग्लानि महसूस होती है.
जैसा कि आप कह रहे हैं यह सोशल इंजीनियरिंग की एक प्रक्रिया थी जिसे सदी के शुरू में लागू किया गया और हाल के समय तक यानी साठ के दशक तक चालू थी. आदिवासी बच्चों को उनके माँ-बाप से अलग कर के – हालांकि इसके पीछे भलमनसाहत की भावना होती थी - सरकारी स्कूलों – एक तरह के सरकारी अनाथालयों में ले जाया जाता था – या शहरों में रह रहे शहरी यूरोपियनों को गोद दे दिया जाता था ताकि वे गरीबी और अज्ञान के चक्र से बाहर आ सकें. इस नीति को इन लोगों के मोक्ष की तरह देखा गया जो मूलतः जंगली थे, कि उन्हें उनकी गरीबी से बाहर लाकर एक बेहतर वातावरण में रखा जाए. लेकिन सच यह था कि इस वजह से परिवार तबाह हो रहे थे. परिवार टूटते जा रहे थे. एक माता-पिता के तौर पर आप को कैसा लगेगा अगर एक दिन आपके घर के बाहर आकर एक सरकारी वैन रुके और उसमें से लोग उतर कर आपसे कहें “माफ़ कीजिये, हम आपके चार बच्चों को ले जा रहे हैं. हम उन्हें आपसे दूर ले जा रहे हैं. इसमें आप कोई भी विरोध नहीं कर सकते. किसी बच्चे को जन्म देने वाला आदिवासी अपने बच्चे का कानूनी अभिभावक नहीं था - यह सरकार का काम था. सरकार के पास बच्चे को उठा ले जाने की कानूनी अनुमति थी. इस मामले की सुनवाई के लिए कोर्ट कचहरी जैसा भी कुछ नहीं था. सरकार अपने “बच्चों” की कस्टडी खुद ले सकती थी, जैसा की उस समय का कानून कहता था. वे बच्चों को उठा ले जाते थे. आप कल्पना कीजिये इस से बच्चों पर क्या असर पड़ा होगा. आप कल्पना कीजिये इस से माता-पिताओं पर क्या असर पड़ा होगा. कुछ मामलों में यह कई सालों तक चलता रहा. कभी कभी एक ही परिवार के चार बच्चे देश के चार बिलकुल अलग-अलग हिस्सों में पहुंचा दिए जाते थे. तो आप के देश में छेद दिए गए परिवार थे. आप ने हर तरह की समस्या जैसे अपने बच्चों से बिछड़ गए माता-पिताओं की आत्महत्या और अल्कोहोलिज्म के लिए ज़मीनी काम तो कर ही दिया था. और उन बच्चों के लिए नई जगहों पर खुद को ढालने की समस्या? – किस कदर गहरे ट्रौमा से गुजरना पड़ता था उन्हें. कभी कभी तो वे चार और पांच की आयु में उठा लिए जाते थे.
क्या उन्हें उठाये जाने के बाद किसी तरह का आपसी संपर्क हो पाता था?
नहीं, क्योंकि माना जाता था कि ऐसा करना एक कदम पीछे हटना होगा. इसे परोपकार की भावना से किया गया कार्य कहा जाता था. लेकिन जिस तरह से उसका कार्यान्वयन होता था वह खौफनाक था. मुल्क उस बात की कीमत आज भी चुका रहा है क्योंकि इस सारे तमाशे ने आदिवासियों और सरकार के लिए उनकी भावनाओं के बीच बड़ी खाई बना दी थी. बहुट से परिवार तहस नहस हुए और अल्कोहोलिज्म का एक भयानक चक्र शुरू हो गया
तो वर्तमान एकीकरण नीति को लेकर आप क्या सोचते हैं?
ज़ाहिर है, अब वे जो कर रहे हैं उसमें विवेक का इस्तेमाल ज्यादा होता है. यह अब भी एक बड़ी समस्या है. सामाजिक अभाव के किसी भी इंडैक्स में आदिवासी हमेशा सबसे नीचे आते हैं. अगर आप गिरफ्तारियों, नशीली दवाओं, गरीबी, स्वास्थ्य, शिशु मृत्यु जैसी चीज़ों के आंकड़े देखें तो तो वे सबसे नीचे होते हैं. साफ़ है उन्हें बेहतर जीवन देने के लिए बहुत कुछ और किया जाना है. इस समस्या का सबसे बड़ा हिस्सा यह है कि उनमें से अधिकतर सुदूर इलाकों में रहते हैं. सो उनके पास शिक्षा और रोज़गार के वैसे अवसर नहीं हैं जैसे उन्हें शहरों में रहते हुए मिलते. यह एक्बहुत बड़ी समस्या है और कोई भी आज तक किसी ठोस समाधान के साथ आगे नहीं आया.
ओलिम्पिक्स की बात करते हैं. आप सिडनी मॉर्निंग हैरल्ड और द टाइम्स के लिए रिपोर्टिंग करने ओलिम्पिक्स में मौजूद थे. दर असल मैंने आप का लिखा तलवारबाजी और टेबल टेनिस जैसे कम चर्चित खेलों पर लिखा हुआ एक टुकड़ा पढ़ा था. मुझे बताया गया है कि वहां कुछ लोग थे जो टेबल टेनिस में आप से बेहतर थे?
मैं उन सारे ‘अल्पसंख्यक’ खेलों को देखने गया लेकिन कोई भी मुझे भाया नहीं. जैसे तलवारबाजी - सिर्फ ‘क्लिक क्लिक क्लिक’ और हो गया. फिर वे आराम करते हैं. दोबारा गार्ड लिया और ‘क्लिक क्लिक क्लिक’ और फिर हो गया. आप बस सोचते रह जाते हैं “ये खेल है क्या चीज़ यार?” मुझे वह बेहद उबाऊ लगा और मैंने जूडो पर ध्यान लगाया. वह भी ऐसा ही था. अब ये दो बन्दे हैं लगातार एक दुसरे के गिर्द चक्कर लगा रहे हैं जैसे कि दूसरे के जाने बिना उसकी कमीज़ उतार देने की जुगत में लगे हुए हैं. मैंने सोचा – ‘ये है क्या? मेरी समझ में कुछ नहीं आया.” फिर मैं टेबल टेनिस पर गया जो मेरी समझ में आ गया क्योंकि मैं उसे खेल चुका था – ओलिम्पिक के स्तर पर नहीं – पर मेरी समझ में आता था वह. मेरी समझ में आया कि ये लोग उस सब से कहीं आगे पहुँच चुके लोग हैं जिसका मैं सपना देख सकता हूँ. मुझे बड़ा खराब लग रहा था कि मैं तलवारबाजों की कला की तारीफ करने लायक न था. वे मेरी समझ में इस वजह से नहीं आटे थे कि वे इस कदर शानदार थे, इस कदर फुर्तीले कि मैं देख ही नहीं पा रहा था कि वे कर क्या रहे थे.
तलवारबाजी को लोकप्रिय बनाने के लिए आपके पास कुछ विचार थे ...
हाँ, कुछ सुझाव थे. मुझे लगा कि आप सरप्राइज़ अटैक जैसे दाँवों को प्रोत्साहित कर सकते थे . मुझे लगा कि ऐसा अच्छा रहेगा. मुझे यह विचार भी भाया कि एक खिलाड़ी पारंपरिक तलवार लिए हो और दूसरा बरछी. सबसे प्रिय मुझे यह विचार लगा कि दोनों ही की आँखों पर पट्टी बाँध दी जाए और दोनों को  थोड़ा गोल गोल घुमाकर अचानक एक दूसरे की तरफ धकेल दिया जाए. इस से खेल लम्बा खींचेगा ...
खासी गंभीर खेल पत्रकारिता है जनाब! ... खैर. ‘डाउन अंडर’ में आपके एक वाक्य ने मुझे हैरत में डाला था जब आपने तनिक निराशा के साथ कहा था कि आज के समय में यात्रा का बड़ा हिस्सा चीज़ों को देख लेना होता है, जब तक कि वे बची हुई हैं. कौन सी चीज़ गायब हो रही है?
स्पष्टतः दुनिया में आप जहां भी जाएं हर जगह एक सी में बदल रही है, और यह मुझे हतोत्साहित करने वाला लगता है. अमेरिका के किसी भी शहर में अगर आपने कॉफ़ी पीनी है तो स्टारबक्स कप हर जगह मिलता है. दुनिया का मैक्डोनाल्डीकरण. और ऐसा हर जगह और और ज्यादा होता दीखता है. यह सिर्फ अमेरिकी फिनोमेना नहीं है – बॉडी शॉप और एनी संस्थाएं भी इस में सहयोग कर रही हैं, जैसा कि व्यावसायिक संसार के साथ होना ही होता है, अमेरिका पथप्रदर्शक है. यह भी हतोत्साहित करने वाला है. जब मैं एलिस स्प्रिंग्स पहुंचा तो मुझे बहुत निराशा हुई थी. मैं डार्विन से हज़ार किलोमीटर गाड़ी चलाकर इस खाली रेगिस्तान में पहुंचा था. में होटल के कमरे में घुसा और जैसे ही मैंने परदे खोले सड़क के उस पर के-मार्ट दिख गया. मैं इतनी दूर के-मार्ट देखने नहीं आया था.
आप ने एलिस स्प्रिंग्स को ऐसे समुदाय के तौर पर वर्णित किया है जो एक ज़माने में सुदूर होने की वजह से विख्यात था और अब वहां हज़ारों लोग सिर्फ यह देखने आते हैं कि अब वह कितना सुदूर नहीं रह गया है. यह आधुनिक यात्रा की एक विडम्बना है कि आप किसी ख़ास जगह को ढूंढते हैं, जो इस वजह से भी ख़ास है कि काफी दूर है और वहां पहुँचने के लिए काफी मशक्कत करनी होती है और यह कि आप भी ख़ास होने जा रहे हैं क्योंकि आपने वहां पहुँचने के लिए मशक्कत की है और जब आप वहां पहुँचते हैं आप पाते हैं कि वहां आप ही जैसी सोच वाले असंख्य लोग जमा हैं और यही नहीं वह जगह आपका इंतज़ार कर रही है. यह सब दर असल आपके स्वागत के लिए तैयार किया गया होता है. जब आप एलिस स्प्रिंग्स जैसी जगह पहुँचते हैं जहां बाकी असंख्य लोग भी उसी वजह से पहुंचे हैं तो क्या आपको निराशा होती है?
माफ़ कीजिये, क्या मैं एक बात कह सकता हूँ. क्या हम लोग एक ड्रिंक के लिए अभी जाएंगे या नहीं?
बस पांच मिनट! आप सवाल का जवाब दे दीजिये.
मैं निराश हुआ था. इस से कोई बचाव भी नहीं था. मेरी उम्मीदें काफी ज्यादा थीं. एलिस स्प्रिंग्स टिम्बकटू किस्म की जगह है. बाहर से आने वाले ज़्यादातर लोग इस बारे में जानते ही नहीं सो आप अपने दिमाग में कुछ छवियों का निर्माण करने लगते हैं. मैंने सोचा था कि वह कोई धूलभर गायों वाला शहर होगा जहां पोस्टों से घोड़े बंधे हुए होंगे वगैरह. वहां जाकर मैं पाता हूँ कि वह बिलकुल आधुनिक नगर है जो मेलबर्न या ऐसे ही किसी महानगर से सटा हुआ उपनगर भी हो सकता था. इस लिहाज़ से मैं निराश हुआ था. पर असल में वह अच्छा था. एलिस स्प्रिंग्स में कुछ भी गलत नहीं. बस वह उतना एक्ज़ोटिक नहीं था जैसे मैंने सोच रखा था
यह कह चुकने के बाद भी, यात्रा करने से हतोत्साहित होने के बजाय, ‘डाउन अंडर’ के आखीर में मुझे ऐसा लगा कि आप वापस वहां जाना चाहेंगे. कि अभी वहां बहुत कुछ है जिसे आपने देखना बाकी है. यह कहता हुआ मैं खोटेपन का प्रदर्शन कर रहा हूँ पर क्या आप वाकई निराश हुए थे क्योंकि ‘डाउन अंडर’ खत्म करने के बाद मुझे ऑस्ट्रेलिया जाने की प्रेरणा मिलने लगी थी और मैं उन सब जगहों पर जाना चाहता था जिनके बारे में आपने बताया है. सो मैं तो बेशर्मी से हर किसी को ‘डाउन अंडर’ पढने की सिफारिश करूंगा क्योंकि यह श्रेष्ठतम कोटि का यात्रावृत्त है क्योंकि इस को पढ़कर आप का मनोरंजन होता है, आप बहुत कुछ सीखते हैं, और यह आपको यात्रा करने की प्रेरणा भी देता है.
फिलहाल मैं बिल को मुक्त करता हूँ.

एक स्त्री और एक पुरुष / अदूनिस

“कौन हो तुम?”
“निर्वासित कर दिया गया मसखरा समझ लो,
समय और शैतान के कबीले का एक बेटा.”
“क्या तुम थे जिसने सुलझाया था मेरी देह को?”
“बस यूं ही गुज़रते हुए.”
“तुम्हें क्या हासिल हुआ?”
“मेरी मृत्यु.”
“क्या इसीलिये तुम हड़बड़ी में रहते थे नहाने और तैयार होने को?
जब तुम निर्वस्त्र लेटे रहते थे, मैंने अपना चेहरा पढ़ा था तुम्हारे चेहरे में.
मैं तुम्हारी आँखों में सूरज और छाँव थी,
सूरज और छाँव. मैंने तुम्हें कंठस्थ कर लेने दिया अपने अपने आप को
जैसे एक छिपा हुआ आदमी करता है.”
“तुम जानती थीं मैं तुम्हें देखा करता था?”
“लेकिन तुमने मेरे बारे में क्या जाना?
क्या अब तुम मुझे समझते हो?”
“नहीं.”
“क्या मैं तुम्हें खुश कर सकी, क्या बना सकी तुम्हें कम भयभीत?”
“हाँ.”
“तो क्या मुझे नहीं जानते तुम?”
“नहीं. तुम जानती हो?”