Wednesday, 21 January 2015

पढ़ते-सुनते-देखते हुए

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को पढ़ते-सुनते-देखते हुए कई सवाल जेहन में कौंध रहे हैं। मसलन कि इस कथित साहित्य महोत्सव में कितना साहित्य, कितनी सियासत, कितना मनोरंजन, किसका साहित्य, कैसा साहित्य आदि-आदि!
उत्सव में पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज की बेटी सलीमा हाशमी भी शिरकत कर रही हैं और अभिनेता गिरीश कर्नाड, वहीदा रहमान आदि भी। फेस्टिवल के पहले दिन उद्‌घाटन के दौरान साहित्य के सियासी रंग भी, सीएम वसुंधरा राजे, जावेद अख्तर और शबाना आजमी ।
जावेद-शबाना के हाथ में राजे का हाथ। इस दौरान ऎड गुरू और गीतकार प्रसून जोशी ने बताया कि वह पीएम नरेंद्र मोदी को वह क्यों पसंद करते हैं और उनके कुछ अभियानों से वह क्यों जुडे हैं। उन्होंने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी राजनीति सही दिशा में जा रही है इसलिए वे उनके कुछ अभियानों से जुडे हैं और उनके प्रचार अभियान में काम किया है। जोशी का कहना था कि `गंदी बात` जैसे शब्दों के इस्तेमाल से बनने वाले गानों के पीछे लोगो की पसंद नहीं बल्कि लेखको की गलती है। जावेद अख्तर का कहना था कि "गंदी बात` जैसे शब्दों का प्रयोग इसलिए किया जाने लगा है क्योंकि आज लोग वही सुनना चाहते हैं। भले ही ऎसे गाने ज्यादा दिनों तक लोगों की जुबां पर नहीं रहते, लेकिन फिर भी लेखक उन्हें लिखने के लिए मजबूर हैं।
"सेवन डेडली सिन्स इन अवर टाइम" सेशन में इमिर मैकब्राइड का कहना था कि वर्तमान में धर्म से जुड़े इंस्टीट्यूशंस ज्यादा हिंसक हो गए हैं। 

Tuesday, 20 January 2015

क्रांति-क्रांति कुर्सी

क्या कहें, क्रांति-क्रांति कुदराते सियासी मैराथन में कूद पड़े बूढ़े अन्ना के दोनो पट्ट शिष्य...
तो सीएम बने उनमें जो भी,
क्या मानें कि हजार हाथो वाले हजारे के दोनो हाथ खाली या दोनो हाथ लड्डू!
और तब से आज तक छली जा रही जनता के हाथ बाबा जी का ठुल्लू....



Monday, 19 January 2015

मुरुगन पुनरुज्जीवित होंगे/प्रणय कृष्ण


तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन ने 14 जनवरी को फेसबुक पर लिखा, "लेखक पेरूमल मुरुगन मर गया. वह भगवान नहीं है, लिहाजा वह खुद को पुनरुज्जीवित नहीं कर सकता. वह पुनर्जन्म में भी विश्वास नहीं करता. आगे से, पेरूमल मुरुगन सिर्फ एक अध्यापक के बतौर ज़िंदा रहेगा, जो वह हरदम रहा है." अब तक मुरुगन के खिलाफ धर्म और जाति के स्वयंभू ठेकेदारों से लेकर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हक़ में आवाज़ उठाने वाले लोगों ने लाखों शब्द व्यय किए होंगे, लेकिन लेखक की पीड़ित अंतरात्मा की यह तीन पंक्तियां सब पर भारी हैं. लेखक मर गया, लेकिन 2015 के हिन्दुस्तान के राज और समाज की हिंसक दयनीयता जी रही है. मुरुगन का वक्तव्य ऐसे वक्त पर टिप्पणी है जिसमें जनता की वंचनाओं और हाहाकार को एक सामूहिक पागलपन की ओर मोड़ देने की पुरजोर कोशिशें हो रही हैं. अतीत की रमणीय कपोल-कल्पनाओं और भविष्य के मादक सपनों की गरज के बीच आज के भारत की कराह सुनाई देनी बंद होती जा रही है. वे सारे परदे जिनपर चित्र और चलचित्र दिखाई देते हैं और वे सारे यंत्र-तंत्र जिनसे आवाजें सुनी जाती है, झपट लिए गए हैं. मानव विकास सूचकांक में दुनिया के 135वें पायदान पर खड़े भारत की वर्तमान वास्तविकता, वास्तविक अतीत तथा यथार्थपरक भविष्य के चित्र और स्वर अदृश्य और गूंगे बनाए जा रहे हैं.
आस्था में चार साल की देरी से आए उबाल के तहत मुरुगन के जिस उपन्यास को पिछले दिसंबर महीने से निशाना बनाया गया है, वह 2010 में प्रकाशित हुआ था जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद 'वन पार्ट वुमन' के नाम से 2013 में पेंग्विन से छप कर आया. रोचक यह है कि इस उपन्यास में न तो ईशनिंदा है और न ही किसी धर्म या उसकी प्रथाओं का विरोध. उपन्यासकार ने उनपर व्यंग्य भी नहीं किया है, न कोई भंडाफोड़ किया है. उपन्यास का संवेदनात्मक उद्देश्य ही अलग है. मुरुगन की इतिहास-दृष्टि और सामाजिक चेतना मिथकों और आस्थाओं में लिपटे जीवन की वास्तविक धड़कनों और मर्म को इस उपन्यास में प्रत्यक्ष कर देती है, उनके दुश्मनों की निगाह में यही उनका अपराध है. उन्हें मुरुगन की कथा-सृष्टि भी सच की तरह डराती है. सच से ऐसा डर ही उन्हें सामाजिक सच्चाइयों के हर अनुसंधान या साहित्यिक पुनर्रचना को आस्था की तोपों से मार गिराने का अभ्यस्त बनाता है. सत्य से सत्ता का युद्ध बड़ा पुराना है, लेकिन हम जिस 2015 के भारत में रह रहे हैं, वहां सच के आखेटक पहले से अधिक मूर्ख, किन्तु प्रशिक्षित हैं.
घटनाएं        :  27 दिसंबर, 2014 के 'द हिन्दू' अखबार के अनुसार तिरुचेंगोडे नगर की आर.एस.एस. इकाई के अध्यक्ष महालिंगम ने 26 दिसंबर के दिन 50 से अधिक लोगों का जुलूस निकाला और मुरुगन के इस उपन्यास की प्रतियां जलाई. भाजपा, आर.एस.एस. तथा कुछ अन्य हिंदूवादी संगठनों ने लेखक की गिरफ्तारी की मांग भी की (हालांकि अब जबकि लेखक के समर्थन में भी आवाजें तेज़ हो रही हैं, ये संगठन समूचे घटनाक्रम में अपनी भूमिका नकार रहे हैं). इसी रिपोर्ट के मुताबिक़ बीस दिन पहले से मुरुगन को धमकियां मिल रही थीं. बाद में उपन्यास के विरोधस्वरूप शहर बंद भी कराया गया. 12 जनवरी को नमक्कल के जिला प्रशासन ने लेखक को उनके विरोधियों के साथ शान्ति वार्ता के लिए बुलाया. यहाँ प्रशासन ने मुरुगन को 'बिनाशर्त माफी' माँगने, अगले संस्करण में उपन्यास में वर्णित स्थानों का नाम बदलने और उसके 'आपत्तिजनक अंशों' को हटाने, वर्तमान संस्करण की अनबिकी प्रतियों को बाज़ार से वापस लेने और भविष्य में ऐसी कोई हरकत न करने का वचन देने संबंधी हलफनामे पर दबाव देकर दस्तखत कराया. इस प्रकार सरकारी देख-रेख में संविधान की धारा 19(1) (ए) की धज्जियां उड़ाई गयीं. ध्यान रहे मुरुगन जिस अंचल के लेखक हैं, उसी अंचल के एक सपूत थे 'पेरियार'. जातिप्रथा-विरोधी, अंधश्रद्धा-विरोधी, सेक्युलर और नास्तिक 'पेरियार' की कर्मभूमि पर एक लेखक के साथ यह सब कुछ होना भारी विडम्बना है. द्रविड़ आन्दोलन के साथ पेरियार की विरासत जुडी हुई है, लेकिन उसी आन्दोलन से निकली एक पार्टी तमिलनाडू की सत्ताधारी पार्टी है और दूसरी मुख्य विपक्षी पार्टी. सत्ताधारी पार्टी की भूमिका नमक्कल प्रशासन की हरकतों से ज़ाहिर है और विपक्षी पार्टी की भूमिका इस प्रकरण पर उसकी चुप्पी से. ( मामला तूल पकड़ने पर इस पार्टी ने लेखक के पक्ष में एक-दो बयान जारी करके छुट्टी पा ली है) अनेक लेखकों ने ठीक ही लक्ष्य किया है यह प्रकरण द्रविड़ पार्टियों की पस्ती के दौर में हिंदुत्व की ताकतों द्वारा तमिलनाडू में पाँव पसारने की कवायद का सूचक है. एक जागरूक नागरिक के रूप में मुरुगन अपने इलाके में शिक्षा की दुकानदारी के खिलाफ लिखते रहे हैं और पर्यावरण की धज्जियां उड़ानेवालों के खिलाफ भी. यह सारे निहित स्वार्थ भी उनके खिलाफ परदे के पीछे सक्रिय हैं. 48 वर्षीय मुरुगन नमक्कल में शासकीय कला विद्यालय में तमिल पढ़ाते हैं. उन्होंने अबतक 35 पुस्तकें लिखीं है जिनमें 07 उपन्यास और तमिलनाडु के कोंगू (पश्चिम) क्षेत्र की बोलियों का शब्दकोष भी शामिल है.
उपन्यास का कथानक  : यह उपन्यास कोंगू अंचल के जन-जीवन का अत्यंत संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करता है. इस अंचल के जंगल, पहाड़, वनस्पति, पशु-पक्षी, मेले, नृत्य, संगीत, खेल-तमाशे, हाट-बाज़ार, खान-पान, पहनावा, देवस्थान और उनसे जुडी आस्थाएं, लोकविश्वास और किसान जीवन को कथा में जीवंत इसीलिए किया जा पाया है कि उपन्यासकार उस अंचल का मार्मिक जानकार ही नहीं, गंभीर अध्येता भी है. उपन्यास के इसी आंचलिक परिवेश में निस्संतान किसान दंपत्ति पोन्ना(पत्नी) और काली(पति) की कोमल कथा प्रवाहित है. दोनों एक दूसरे को बेहद प्यार करते हैं. लेकिन उनके paraparpapअकुंठ प्यार पर निस्संतान होने का ग्रहण लग जाता है. रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों के ताने पोन्ना को ज़्यादा सुनने पड़ते है. तीज-त्यौहार और मांगलिक अवसरों पर कर्मकांडों के वक्त 'बाँझ स्त्री' के प्रति अपमानजनक व्यवहार के चलते वह धीरे-धीरे अपने घर की चहारदीवारी में सिमटती चली जाती है. काली को भी समय समय पर किसी न किसे प्रकरण में लज्जित होना पड़ता है. उसका भी सामाजिक जीवन सीमित होता जाता है. उसकी नपुंसकता की चर्चाएँ भी होती हैं. निस्संतान दंपत्ति की संपत्ति पर रिश्ते-नातेदारों ही नहीं, पड़ोसियों की भी निगाह है. काली को उसकी मां और दादी दूसरा विवाह करने की सलाह देती हैं. इस प्रस्ताव पर पोन्ना के मां- बाप को भी कोई ऐतराज़ नहीं है, वे इतने में ही संतुष्ट हैं कि दूसरी स्त्री के साथ उनकी बेटी भी उसी घर में रहे, निकाली न जाए. पोन्ना और काली भी कभी कभी एक दूसरे का मन टोहने या चिढाने के लिए आपस में दूसरे विवाह की बात करते हैं. पोन्ना सदैव ही भारी मन से ही सही, यह कहती है कि काली की खुशी के लिए वह इसके लिए भी तैयार है. वास्तव में दोनो ही एक दूसरे से इतना प्यार करते हैं कि मन बांटने के लिए इस प्रस्ताव पर चाहे जो चर्चा करते हों, उसकी वास्तविक संभावना को कभी मन में स्वीकार नहीं करते. काली की मां और दादी उनके परिवार पर देवी -देवताओं का श्राप मानती हैं. निर्वंश होने के श्राप से मुक्ति के लिए काली और पोन्ना वर्षानुवर्ष न जाने कितने देवी-देवताओं, मंदिरों-मठों का चक्कर लगाकर, न जाने कितनी पूजा-पाठ, व्रत-अनुष्ठान करके थक चुके हैं. काली की मां और दादी के पास परिवार पर श्राप के अलग अलग किस्से हैं. वे हर किस्से के अनुरूप श्रापमुक्ति के उपाय करते हैं. पाठक इन किस्सों में उस अंचल के तमाम सामाजिक संबंधों की भी झांकी पाता है. ये किस्से अलग-अलग जातियों के बीच, अलग अलग तबकों के बीच, आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच, स्त्री और पुरुष के बीच, औपनिवेशिक समय में अंग्रेजों और देशियों के बीच, मनुष्य और देवता के बीच संबंधों की झलक दिखलाते है. ये किस्से उस अंचल के ऐतिहासिक-सामाजिक जीवन की मिथकीय अभिव्यक्तियाँ हैं. ऐसे किस्सों और लोकविश्वासों को पिरोने और अंचल के जीवंत नृवंशीय चलचित्र प्रस्तुत करने का हुनर मुरुगन अपने अनेक उपन्यासों में पहले भी दिखला चुके हैं. अपने अंचल के प्रति गंभीर ऐतिहासिक दायित्व का निर्वाह करते हुए उन्होंने अतीत के लेखकों द्वारा उस अंचल पर लिखी गई चीज़ों की खोज की और उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित किया. उन्होंने टी.ए. मुथूसामी कोनार द्वारा इस अंचल पर लिखे इतिहास-ग्रन्थ जिसे लुप्त मान लिया गया था, उसे खोजकर पुनर्प्रकाशित कराया. (देखें ए.आर. वेंकट चेलापति का लेख, 'द हिंदू', 12 जनवरी)
एक भरा-पूरा, सुन्दर और संतुष्ट वैवाहिक जीवन सामाजिक मान्यताओं के चलते किस तरह अवसादग्रस्त होता है, लेकिन अवसाद के आगे पराजय नहीं मानता, इसे मुरुगन ने बहुत कोमल और संवेदनशील रंग-रेखाओं में अंकित किया है. काली और पोन्ना का निश्छल और उन्मुक्त प्यार समाज की मान्यताओं के टकराकर कैसे कैसे अंतर्द्वंद्वों से गुज़रता है, उसके सूक्ष्म से सूक्ष्म कंपन को उपन्यासकार की लेखनी पकड़ लेती है. वे तत्व जो इन पात्रों के मन की सुन्दर गहराइयों में लेखक की उंगली पकड़ कर उतरने की जगह उन सुन्दर उँगलियों को ही तोड़ देने को पुरुषार्थ समझे बैठे हैं, उनका कलेजा सचमुच काठ का बना है. उपन्यास का अंत ट्रैजिक है. काली के दूसरे विवाह के प्रस्ताव और श्रापमुक्ति के सभी उपाय विफल होने पर पोन्ना और काली दोनों की मांएं एक अलग योजना बनाती हैं. अर्द्धनारीश्वर के स्थानीय मंदिर में हर साल तमिल वैकासी महीने ( मई-जून) में १४ दिन का मेला लगता है. चौथे दिन पहाड़ों से देवता उतरते हैं और उनकी रथ की सवारी अगले दस दिन निकलती रहती है, अंतिम दिन वे वापस चले जाते हैं. अंतिम दिन मेले में भारी भीड़ होती है और माना जाता है कि इस दिन मेले में उपस्थित सभी पुरुष देवता होते हैं. निस्संतान स्त्रियों के लिए यह दिन भाग्यशाली होता है, जहां वे किसी देवता से समागम कर संतान-प्राप्ति कर सकती हैं. ऐसी संतानें देवता का प्रसाद या देव-संतानें मानी जाती हैं. काली की मां इस दिन पोन्ना को मेले में भेजे जाने के लिए काली को सहमत नहीं कर पाती. एक साल बीत जाता है. अगले साल मेला शुरू होने के समय काली का साला मुथु (जो उसका बाल-सखा भी है) बहन-बहनोई को इसके लिए राजी करने उनके घर आता है. मंदिर पोन्ना के घर से नज़दीक है. हर साल मेले के समय काली पोन्ना को लेकर अपने ससुराल जाया करता था और वहीं से वे मेला घूमने जाते थे. ऐसे में मुथु के आग्रह पर काली पोन्ना को तत्काल उसके साथ भेजने को राजी हो जाता है और खुद मेले के १४वे दिन आने का वादा करता है. लेकिन पोन्ना को देव-समागम के लिए भेजे जाने से वह इनकार कर देता है. मुथु बहन से झूठ बोलता है कि बहनोई काली ने इस बात की अनुमति दे दी है. पोन्ना को इसकी तस्दीक खुद काली से करने का वक्त नहीं मिलता, फिर भाई की बात पर अविश्वास का कोई कारण नहीं था क्योंकि काली और मुथु साले-बहनोई ही नहीं बाल-सखा भी थे. एक नाटकीय घटनाक्रम में चौदहवें दिन काली के ससुराल पहुँचाने के बाद मुथु सदा की तरह काली को लेकर खाने-पीने, मौज-मस्ती करने घर से खूब दूर ले जाता है, ताकि अगली सुबह तक दोनों लौट न पाएं. उधर पोन्ना के मां-बाप उसे लेकर बैलगाड़ी में मेले की ओर चल देते है. काली और मुथु दूरस्थ स्थान पर खाने-पीने के बाद सो जाते हैं. लेकिन काली की नींद आधी रात के बाद खुल जाती है. वह वापस ससुराल की ओर चल पड़ता है. भोर में वहां पहुँच कर जब उसे ताला जडा मिलता है, तो उस पर वज्रपात सा होता है. उसकी भावनाएं पछाड़ खाकर गिरती हैं. उसे लगता है कि पोन्ना ने उसके साथ धोखा किया है. यहीं उपन्यास ख़त्म होता है.
ट्रेजेडी का भाव सघन इसलिए होता है कि दरअसल किसी ने किसी को धोखा नहीं दिया. मुथु, काली की माँ, उसके सास-ससुर- सभी काली और पोन्ना का दुःख दूर करना चाहते हैं. मुथु ने इसी खातिर बहन से झूठ बोला. पोन्ना मेले में जाने को खुद तत्पर नहीं है. वह काली को खुश देखना चाहती है, उसके किए बड़ा से बड़ा त्याग करने को तैयार है, ऐसे में उसकी रजामंदी जानकार वह मेले में जाने को तैयार होती है. यह निश्छल भावनाओं की ऐसी दुनिया है जहां हरेक व्यक्ति जो कर रहा है वह दूसरे की खुशी के लिए कर रहा है, लेकिन परिणाम वह निकलता है जो किसी ने न चाहा था. मेले की भीड़ में 'देवता' से उसकी भेंट सुगम हो सके, इसके लिए पोन्ना को अकेला छोड़ जब उसकी माँ गायब हो जाती है, तब के बाद का वर्णन उपन्यासकार की सामर्थ्य का सबसे ताकतवर साक्ष्य है. पोन्ना की मार्फ़त पाठक तमाम स्थानीय सांस्कृतिक कला-रूपों, नाटकों और रिवाजों की दृश्यावली से गुज़रता है, लेकिन सबसे बड़ा नाटक तो पोन्ना के मानसपटल पर अभिनीत हो रहा है. भारी भीड़ में अकेले होने के भय से शुरू करके अपरिचितों के बीच अनाम होने की खुशी तक उसके मन में अनेक भाव आते और जाते हैं. परिचय की दुनिया की हर नज़र उसे छेदती थी, क्योंकि वह निस्संतान थी. मेले में भीड़ का हिस्सा होकर वह ऐसी हर नज़र से आज़ाद थी, जहां न वह किसी को जानती थी और न कोई उसे. लेकिन अवचेतन के सह-सम्बन्ध और संस्कार उसकी निगहबानी बदस्तूर कर रहे थे. जब भी कोई 'देवता' उसकी ओर रुख करता, उसके और अपरिचित देवता के बीच काली का चेहरा परिचिति या स्मृति की छाया सा झिलमिला उठाता, क्योंकि पति से भी ज़्यादा काली वह व्यक्ति है जिससे वह सबसे ज़्यादा प्यार करती है. एक छोटे से स्वप्न-दृश्य में बचपन के प्यार का एक चेहरा भी कौंधता है. यह कोई नैतिक द्वंद्व नहीं है. काली के विपरीत पोन्ना के मन में इस प्रथा पर आस्था का कोई संकट नहीं है. काली की खुशी के लिए और अपने जानते में उसकी 'अनुमति' से ही वह 'देवता' की खोज में आई है, लेकिन क्या एक क्षण को भी काली को भूले बगैर 'देवता' से मिलन संभव हो पाएगा? इस द्वंद्व को उपन्यासकार ने चेतन और अचेतन के बीच, परिचित और अनजाने के बीच, सम्बन्ध-भावना और स्वातंत्र्य-कामना के बीच, मानवीय भाव-यंत्र और देवत्व के तसव्वुर के बीच - एक साथ अनेक स्तरों पर अभूतपूर्व संवेदनशीलता से अंकित किया है. अंततः पोन्ना इस द्वंद्व से पार जाती है, इसका संकेत करके उपन्यासकार आगे बढ़ जाता है. समागम का दृश्य उपस्थित करने और पाठक को गुदगुदाने की उसकी कोई इच्छा ही नहीं है.
कहानी का अंत नहीं हुआ, लौटेगा कहनेवाला   : उपन्यास के अंतिम दृश्य में काली को तड़पता देख पाठक की उत्कंठा बढ़नी स्वाभाविक है, लेकिन उपन्यास ख़त्म हो जाता है. पाठक के ज़ेहन में ढेरों सवाल हैं? क्या पोन्ना और काली का सम्बन्ध-विच्छेद हो जाएगा? क्या काली यह जान कर कि पोन्ना को उसकी 'अनुमति' की झूठी जानकारी थी, उसे अपना लेगा? क्या पोन्ना यह जानकार कि उससे झूठ बोला गया था, अपराधबोध या आत्महंता भाव से ग्रस्त हो जाएगी? ऐसे में अपने माँ-बाप और भाई के प्रति उसका क्या रुख होगा? यदि वह अपने माँ-बाप और भाई को क्षोभ में त्याग दे और काली उसे फिर से न अपनाए, तो वह कहाँ जाएगी? यदि उसे देव-संतान होती है, तो उस संतान का भविष्य क्या है? श्री चेलापति ने अपने लेख में लिखा है कि ढेरों पाठकों ने लेखक को पोन्ना और काली की आगे की कहानी बताने के लिए अनेक पत्र लिखे. जवाब में लेखक ने उपन्यास को आगे के दो खण्डों में जारी रखने का वादा किया है, दोनों खण्डों के शीर्षक भी बताए हैं. मुरुगन को यह वादा निभाना ही पडेगा. लेखक की मृत्यु की घोषणा के बावजूद उसे खुद को पुनरुज्जीवित करना होगा. पाठक ज़रूर उन ताकतों से लड़ेंगे और जीतेंगे जो कि लेखक के पुनरुज्जीवन में बाधा हैं.
मुरुगन के लेखक को मार देनेवाली ताकतों को इस उपन्यास की मूल संवेदना से कुछ लेना लादना नहीं है. उनके लिए निस्संतान स्त्रियों द्वारा एक स्थानविशेष के मंदिर के मेले में आपसी सहमति से विवाह-बाह्य, धर्मानुमोदित और सामाजिक स्वीकृति प्राप्त यौन-सम्बन्ध बनाने की प्रथा का उपन्यास में कथात्मक विनियोग 'आपत्तिजनक' है. इसे वे धर्मविरुद्ध, स्त्रियों की मर्यादा के विरुद्ध और उस इलाके के लिए अपमानजनक मानते हैं. क्या उपन्यासकार ने इस प्रथा की वकालत की है या उसका अनुमोदन किया है? ज़ाहिर है 'नहीं'. कहानी की तर्क-योजना और संवेदनात्मक उद्देश्य में उक्त प्रथा की हिमायत या आलोचना का कोई काम ही नहीं है. लेकिन ज़रा प्राचीन ग्रंथों पर नज़र डालें और देखें कि 'नियोग' की प्रथा को कितने धर्मशास्त्रों की सम्मति प्राप्त थी. भारतरत्न पंडित पांडुरंग वामन काणे ने गौतम, वसिष्ठ, बौधायन, याज्ञवल्क्य, नारद, कौटिल्य आदि धर्मसूत्रकारों की सम्मतियों उद्धृत की है तथा महाभारत के आदिपर्व, अनुशासनपर्व और शांतिपर्व में नियोग के उदाहरणों और संकेतों की चर्चा की है. (धर्मशास्त्र का इतिहास-प्रथम भाग) मुरुगन की पुस्तक जलानेवाले तत्व इन धर्मसूत्रों और महाभारत के बारे में क्या ख्याल रखते हैं? शास्त्र और लोक की बात छोड़ भी दें, तो क्या मानवशास्त्र का अध्ययन यह नहीं बताता कि ऐसी प्रथाएं लगभग सभी प्राक-आधुनिक समाजों में रही आई हैं? यह भी कि आधुनिक समय में भी तमाम प्राक-आधुनिक प्रथाएं रूप बदलकर क्या अपनी निरंतरता नहीं बनाए रखतीं? मुरुगन ने किसी प्रथा पर कोई मूल्य निर्णय नहीं दिया है, अच्छा या बुरा नहीं कहा है, उन्होंने सिर्फ एक कोमल कहानी कही है जो एक समाज में जन्मी है. उस समाज की कुछ प्रथाएं और मान्यताएं हैं जो उस समाज में जी रहे लोगों के जीवन से लिपटी हैं, उन्हें कोई कथाकार, इतिहास-लेखक या नृतत्वशास्त्री कृत्रिम ढंग से काट कर अलग नहीं कर सकता. ऐसा करना खुद को झूठा साबित करना है, कला और समाज दोनों से गद्दारी है. मुरुगन ने ऐसा करने से इनकार किया है, लेखक की मृत्यु की कीमत चुका कर भी. लेकिन पाठकों और जागरूक नागरिकों का प्यार उन्हें वापस लौटा लाएगा. ज़रूर ही लौटा लाएगा. (समकालीन जनमत से साभार)

Sunday, 18 January 2015

हमेशा रहेगी किताबों की जरूरत/प्रेमचंद गांधी

उस दुनिया की कल्‍पना करना कितना भयावह है, जिसे किताबों के बिना जीना पडता है। लेकिन सच्‍चाई यही है, आज भी विश्‍व की करीब पचास फीसद जनता पुस्‍तकविहीन अंधकारमय जीवन जीने के लिए विवश है। लेकिन यह भी इतना ही बडा सच है कि ऐसे अज्ञान और अंधकार भरे समाज के लिए किताब पहुंचाने की कोशिशें भी वैश्विक स्‍तर पर जारी हैं। देश में चल रहे ‘सर्वशिक्षा अभियान’ जैसे प्रयास दुनिया के तमाम निर्धन देशों में चल रहे हैं। हालांकि ऐसा मानने वाले लोगों की भी कमी नहीं है कि बिना किताबों के भी ज्ञान प्राप्‍त किया जा सकता है और यह एक हद तक सच भी है। हमारे पुरखों ने ज्ञान के नाम पर अपने समय में जो कुछ प्राप्‍त किया वह जीवनानुभवों का ही सार है, जिसके बिना किताब भी संभव नहीं होती, क्‍योंकि किताब भी आखिरकार एक व्‍यक्ति के अनुभूत ज्ञान और संचित जीवनानुभवों का ही तो समुच्‍चय है।
इस दुनिया को आज हम जिस रूप में देख रहे हैं, उसके पीछे किताबों की बहुत बडी भूमिका है। दुनिया के तमाम धर्मों में एक या अधिक किताबों की जरूरत हमेशा से रही है, जिनसे उनके अनुयायियों को धर्म की राह पर चलने के लिए एक रास्‍ता मिलता है। आज भी लोगों के लिए किताब अगर एक पवित्र किस्‍म की चीज है तो वह इसीलिए कि प्रारंभ में किताब का अर्थ धार्मिक किताब ही होता था, जिसके पैर से छू जाने या गिर जाने से अनर्थ की आशंका होती थी और धर्म का अपमान लगता था। मजहबी किताबें दुनिया में सबसे ज्‍यादा बिकने वाली किताबें हैं और शायद हमेशा रहेंगी। वजह यह कि पढना आये या ना आये अपने धर्म की किताब हर व्‍यक्ति घर में जरूर रखना चाहता है। सुख-दुख के अवसरों पर इनकी महत्‍ता रहती है, घर को ये एक किस्‍म की पवित्रता प्रदान करती हैं। व्‍यक्ति को ऐसी किताबों के अध्‍ययन और श्रवण से आत्मिक संतोष मिलता है। इसीलिए सभी धर्मों में आप देखेंगे कि धार्मिक किताबों के समय-समय पर पाठ आयोजित करने की परंपरा है, फिर वह चाहे गुरूग्रंथ साहिब का पाठ हो या रामायण का, कुरानख्‍वानी हो या बाइबिल का पाठ।
धार्मिक किताबों का महत्‍व इस मायने में स्‍वीकार किया जाना चाहिए कि इन्‍हीं की वजह से शिक्षा का प्रसार भी हुआ। आज भी बहुत से लोग अगर लडकियों को पढने स्‍कूल भेजते हैं तो यही समझकर कि चलो कम से कम वह कुरान, रामायण या गुरूग्रंथ साहिब का पाठ तो कर लेगी और अपने बच्‍चों को ठीक-ठाक संस्‍कार दे सकेगी। लेकिन किताबों की दुनिया का यह एक बहुत बडा सच है कि यह एक प्रकार से मनुष्‍य में संक्रामक रोग भी पैदा करती है, अर्थात जिसे पढना आ गया वह एक के बाद दूसरी किताब पढने की ओर आगे बढता है। और पढने की इस चाहत ने ही किताबों की दुनिया को परवान चढाया है। जिन लडकियों को धार्मिक किताबें पढने के लिए पाठशाला भेजा गया, वे आगे चलकर दूसरी किताबें पढकर खुद लेखिकाएं बन गईं, ऐसे हमारे समाज में सैंकडों उदाहरण हैं।
आज के तेजी से बदलते संचार क्रांति के युग में बहुत से लोग कहते हैं कि अब किताबें अप्रासंगिक हो जाएंगी, वजह यह कि किताबों की जगह लेने के लिए बाजार में बहुत सी चीजें आ गई हैं और किताबों का स्‍वरूप भी बदल गया है। सीडी, डीवीडी, ई-बुक, और इसी किस्‍म की बहुत सी ईजादों ने किताब का स्‍थान लेने की कोशि की है, लेकिन पश्चिम के अघाये हुए समाज की मानें तो आज भी पन्‍ने पलटकर, कहीं भी बैठकर, लेटकर, यात्रा करते हुए यानी किसी भी तरह किताब पढने से बेहतर कुछ नहीं है। आधुनिक संसाधनों ने जो सबसे बडा काम किया वो यह कि किताबों की उम्र और पढने का दायरा बढा दिया। आज दुनिया के लाखों पुस्‍तकालय डिजिटलाइज्‍ड हो रहे हैं, आनलाइन हो रहे हैं, हजारों की तादाद में ऐसी वेबसाइटें मौजूद हैं जिन पर दुनिया भर की असंख्‍य किताबों के बारे में जानकारी ही हासिल नहीं की जा सकती, बल्कि डाउनलोड कर किताबें पढी भी जा सकती हैं। अभी तक अप्राप्‍य और दुर्लभ समझी जाने वाली असंख्‍य किताबें आज इंटरनेट की दुनिया में या तो उपलब्‍ध हैं या ऐसा करने के प्रयास वैश्विक स्‍तर पर चल रहे हैं। इस तरह संचार क्रांति किताबों की दुनिया के लिए वरदान सिद्ध हो रही है।
दुनिया बदल रही है और इस बदलती हुई दुनिया की यह एक बहुत बडी सच्‍चाई है कि दुनिया में आज मौजूद अनेक समस्‍याएं अज्ञान और अशिक्षा के कारण हैं। फिर वो चाहे आतंकवाद हो या मजहबी कटटरता के कारण पनपने वाला सांप्रदायिक विद्वेष, इन सबकी जड में अशिक्षा और अज्ञान ही है। किताबों की दुनिया ही हमारे समाज को बताती है कि सब धर्म एक परमात्‍मा तक पहुंचने के अलग-अलग रास्‍तों के सिवा कुछ नहीं हैं, मनुष्‍य का एकमात्र धर्म है मानवता की सेवा और सब धर्मों का मूल मकसद है इस धरती को सुंदर बनाना, मानव मात्र को सुखी बनाना। प्रत्‍येक धर्म की किताब यही सिखाती है, लेकिन कुछ लोग हैं जो उनका अलग अर्थ निकालकर लोगों को एक दूसरे खिलाफ भडकाते हैं और व्‍यर्थ में खून बहाते हैं। इस प्रक्रिया में ना जाने कितनी सभ्‍यताएं नष्‍ट हो चुकी हैं और नष्‍ट होंगी, फिर किताबें ही बताएंगी कि क्‍यों वे सभ्‍यताएं नष्‍ट हुईं।
एक फ्रांसिसी दार्शनिक ने म्रत्‍यु शैया पर कहा था, ‘जो कुछ हम जानते हैं वह बहुत थोडा है, जो नहीं जानते वह बहुत अधिक है।‘ किताबों की दुनिया हमारे लिए उस अजाने संसार के दरवाजे खोलती है, जिसे हम एक जीवन में प्राप्‍त नहीं कर सकते। प्रत्‍येक विद्धान, मनीषी यही कहता है कि मैं तो एक विद्यार्थी मात्र हूं। किताबें ही यह विनम्रता का बोध पैदा करती हैं और मनुष्‍य को महामानव बनाती हैं। मनुष्‍य जीवन में किताबों का महत्‍व सदा से किसी ना किसी रूप में मौजूद रहा है और धरती के नष्‍ट होने तक रहेगा। इस दुनिया में किताब की ताकत का अंदाज आप इसी से लगा सकते हैं कि बहुत से आततायी और हिंसक लोगों ने सिर्फ डर की वजह से न केवल किताबें, बल्कि पूरी की पूरी लाइब्रेरियां जला डालीं।

Thursday, 15 January 2015

जंगल-मंगल/जयप्रकाश त्रिपाठी

                                ()
जो कुछ है, इतना बस है, लगता है, ये भी बरबस है
सब झूठे-झूठे शब्दों-सा अब भी वो क्यों जस-का-तस है
जैसे हर कोई घिरा हुआ, जो बचा हुआ, क्यों गिरा हुआ
जंगल-जंगल जन दुखियारे, बस मंगल-मंगल सर्कस है
                            ()

Wednesday, 14 January 2015

हमारे समाज में 'लड़की' समझ से परे की चीज/फहमीदा रियाज

पाकिस्तान के सिंध राज्य में रहने वाली तरक्की पसंद अदीबा, शायरा फहमीदा रियाज 'गुफ्तगू' से बातचीत में बताती हैं- 'जो मन में आता है लिख देती हूं. बाद में कई बार लोग बुरा-भला भी कहते हैं जिससे तकलीफ़ होती है. एक लड़की होना हमारे समाज में एक ऐसी चीज़ है जो समझ से परे है. लड़कियों को इंजॉय करने की समाज इजाज़त नहीं देता. हिन्दोस्तान में जितनी आज़ादी औरतों को हासिल है, पाकिस्तान में नहीं है.
मैं तो कुछ लिख भी देती हूं, लेकिन समाज अभी भी दकियानूसी दौर में जी रहा है. ... मैं हिन्दोस्तान इसलिए आयी थी कि यह एक सेक्युलर मुल्क है, लेकिन यह सब ख्वाब था. मैंने यहां के सांप्रदायिक माहौल पर एक नज़्म ‘नया भारत’  लिखा. इस पर इतना बड़ा हंगामा हुआ कि पूछिये मत. दो दिन बाद मेरी फ्लाइट थी. मैं सोच नहीं पा रही थी कि क्या करूं. फिर मैं पाकिस्तान वापस चली गयी. वह नज़्म हमें कुछ कुछ याद आ रहा है.....नया भारत
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले/अब तक कहां छुपे थे भाई।
वह मुरखता वह घामड़पन,/जिसमें हमने सदियां गंवायी।
आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे,/अरे बधाई, बहुत बधाई।
प्रेत धर्म का नाच रहा है, कायम हिन्दू राज करोगे।
सारे उलटे काज करोगे, अपना चमन ताराज़ करोगे।
तुम भी बैठे राज करोगे,/सोचा कौन है हिन्दू कौन नहीं है।
तुम भी करोगे फतवा जारी,/अरे बधाई बहुत बधाई।
एक जाप सा करते जाओ,/बारम-बार यही दुहराओ।
कितना वीर महान था भारत/कैसा आलीशान था भारत।
प्रेत धर्म का नाच रहा है/अरे बधाई बहुत बधाई
'कुछ लोग है जिन्हें असल मज़हब के मायने नहीं पता है. इन लोगों को कौन बताये कि मज़हब लोगों को अलम करने के लिए नहीं है, बल्कि लोगों को जोड़ने के लिए आया है. यही सोच मार्क्स का भी है सांप्रदायिक सदभाव और मार्क्सवाद असल में एक ही चीज़ है. दोनों इन्सान को इन्सान बनाना सिखाता है और समाजी बराबरी की सीख देता है.
'अफगानिस्तान में तालिबान की ज़ालिमाना हरक़त को पूरी दुनिया जानती है. उन्होंने वहां के तारीख को मिटाना चाहा. ‘बुद्ध’ जो शान्ति की अलामह है, उनकी मूर्ति को खाक में मिला दिया. इस पर मैंने एक नज़्म लिखी थी. मोजस्सेमा गिरा  मगर ये दास्तां अभी तमाम तो नहीं हुयी दिया कई बरस तैय हुये. लिखेगा दिन को आदमी/बरंगे आबो जुस्तजू/ वह हुस्न की तलाश में/वह मुन्सफ़ी की आस में/खुली है सड़क खुल गयी दुकां में कितना माल है/दुकां में दिलबरी नहीं/मकां में मुन्सिफ़ी नहीं/ अभी तो हर बला नयी/अभी है काफ़ले रवां/गुलों मे नस्ब है निशा।/मुजस्सेमा गिरा मगर/जमीं पे ज़िन्दगी दुकां के नाम पर नहीं हुयी/हमारी दास्तान अभी तमाम पर नहीं हुयी.'

Monday, 12 January 2015

थोथे मुद्दे छोड़े समाज/प्रीतीश नंदी

आप ऐसे कितने हिंदुओं से रोज मिलते हैं, जो बाहर जाकर मुस्लिमों और ईसाइयों का धर्मांतरण करना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ये लोग भारत को लेकर उनके मन जो तस्वीर है उसके लिए खतरा हैं? आप ऐसे कितने मुस्लिमों को जानते हैं, जो पाकिस्तान के प्रति वफादारी का दावा करते हैं और आतंकी हमलों का समर्थन करते हैं? मैं मोहमेडन स्पोर्टिंग फुटबॉल टीम को समर्थन देने या पाकिस्तानी पॉप गायक व अभिनेता आतिफ असलम का प्रशंसक होने की बात नहीं कर रहा हूं.

धर्म परिवर्तन : आप ऐसे कितने सिखों को जानते हैं, जो 1984 के दंगों को लेकर अब भी इतने नाराज हैं कि वे अलग होकर नया खालिस्तान बनाना चाहते हैं, भारत से खूनी बदला लेना चाहते हैं? हां, वे न्याय जरूर चाहते हैं. वे दोषियों को दंडित होते देखना चाहते हैं, लेकिन ये दोनों समान बातें नहीं हैं. आप विदेशी मिशनरियों सहित ऐसे कितने ईसाइयों से मिले हैं, जिन्होंने पैसे या अन्य किसी चीज का लालच देकर आपको ईसाई बनाना चाहा? हां, यदि आप किसी ईसाई स्कूल में पढ़ें हों तो आपको नैतिक शिक्षा की कक्षा में हाजिर रहना पड़ता है, जिसमें बाइबल की कहानियां सुनाई जाती हैं. हालांकि, आपके सामने ऐसे स्कूल में न जाने का विकल्प हमेशा खुला होता है. ठीक वैसे जैसे मुस्लिमों के सामने मदरसे में न पढ़ने का विकल्प मौजूद होता है.
भारत में धर्म हमेशा से व्यक्तिगत चुनाव का विषय रहा है. इस देश में रहने की सर्वश्रेष्ठ खासियतों में से एक यह है. यदि आप किसी चीज का चुनाव नहीं करते तो किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह आपको उन चीजों में भरोसा करने पर मजबूर करे. जिन लोगों को मैं या आप जानते हैं अथवा रोज की जिंदगी में मिलते हैं, अपने चुनने के अधिकार का उपयोग करते हैं. जहां तक आस्था की बात है और ऐसा वे बहुत नामालूम तरीके से, सरलता और पूरी गरिमा के साथ करते हैं. उन्होंने हमेशा से ऐसा ही किया है. मेरे जैसे कुछ लोगों ने आस्था से मुक्त रहने का चुनाव किया, क्योंकि धर्म कोई ऐसी चीज नहीं है कि जिससे हम अपने आप को परिभाषित करते हैं.
हम तो अपने विचारों, अपने सपनों या अपनी उम्मीदों से परिभाषित होते हैं. हम जो होना चाहते हैं, उसी से परिभाषित होते हैं. मैं कोलकाता में पला-बढ़ा हूं, जहां क्रिसमस की शाम को हर कोई सेंट पॉल कैथेड्रल में जाता था. हिंदू, मुस्लिम, सिख, यहूदी, कभी-कभार कोई पारसी या आर्मेनियाई. चीनी लोग भी सर्विस में शामिल होते थे, इसलिए नहीं कि उन्हें कोई लालच दिया जाता था बल्कि वे इसलिए जाते थे, क्योंकि वहां दिए जाने वाले शांति और सद्‌भावना के संदेश का अनुभव उन्हें आनंदित करता था. ठीक वैसे जैसे पश्चिम बंगाल में हर कोई दुर्गा पूजा मनाता है और फिर धर्म कोई भी क्यों न हो माता के पैरो में गिर जाता है. कुछ महान शास्त्रीय संगीतकारों व गायकों को निकट से जानने का सौभाग्य मुझे मिला है. वे काली माता के भक्त थे, फिर चाहे वे धर्म से निष्ठावान मुस्लिम ही क्यों न हों. यह उस समय का जादू था. आपने चाहे किसी भी धर्म में जन्म लिया हो या आप किसी भी धर्म के क्यों न हो, लेकिन आप जिस चीज में विश्वास करते थे, वह आपका अपना चुनाव होता था. अपनी पसंद होती थी.
कोलकाता में सांप्रदायिक दंगे दुर्लभ ही थे. एक बार ऐसे ही दंगों के दौरान डागर बंधु (यदि मुझे सही याद  रहा है) ठुमरी गाने के लिए जा रहे थे. जैसा कि उन दिनों प्रचलन था, संगीतकार (चाहे कितने ही प्रसिद्ध, कितने ही खास क्यों न हो) अपने वाद्य साथ ले जाते थे, तो वे भी ले जा रहे थे. जल्दी ही उन्होंने खुद को दो हिंसक गुटों के बीच पाया. दोनों पक्षों ने जैसे ही उन्हें वाद्य-यंत्रों के साथ देखा वे थम गए व अलग हो गए और उन्हें संगीत सम्मेलन में जाने के लिए रास्ता दे दिया. कलाकारों के प्रति लोग ऐसा सम्मान व्यक्त करते थे. धर्म तो टकराव का कोई फौरी कारण हुआ करता था, जो यह देखते हुए असामान्य भी नहीं कहा जा सकता कि विभाजन में बंगाल के दो टुकड़े हुए थे पर धर्म आधारित विभाजन से गुजरने के बाद भी दोनों समुदायों में धर्म के मामले में शायद ही कभी संघर्ष हुआ हो.
बांग्लादेश, पाकिस्तान से अलग हो गया. धार्मिक समानता उन्हें जोड़कर नहीं रख सकी. नए राज्य को जिस चीज ने एकजुट रखा, वह था बांग्ला भाषा से उनका प्रेम. इसी प्रेम ने हिंदू और मुस्लिमों को एक रखा. यदि आप उथल-पुथलभरे उन दिनों का काव्य पढ़ें, आप इस्लाम को वहां नदारद पाएंगे. केवल आज़ादी के लिए अभिभूत कर देने वाला प्रेम वहां मौजूद था. आज़ादी की इसी तलाश ने पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बांटकर बांग्लादेश का निर्माण किया. धर्म, जिसके आधार पर पाकिस्तान बना था, हाशिये पर रह गया. मेरे माता-पिता विभाजन के भयावह दंगों के साक्षी बने थे, लेकिन मैंने कभी अपने बचपन में उन पर उन्हें चर्चा करते नहीं सुना. वे इसे लब्जों पर न लाई जा सकने वाली ऐसी त्रासदी समझते थे, जिसमें न तो कोई हीरो था न कोई विलैन. उस जमाने के सारे बंगाली साहित्य का यही रुख था.
न तो हिंदुओं ने और न मुस्लिमों ने ऐसा कुछ लिखा, जिसमें हिंसा के लिए दूसरे समुदाय को जिम्मेदार ठहराया हों. दोष दिया हों. उन्होंने त्रासदी को त्रासदी की तरह देखा. धर्म की इसमें कोई भूमिका नहीं थी. यही वजह रही कि जब बांग्लादेश जन्म ले रहा था तो सीमा के इस तरफ हर बंगाली ने फिर चाहे हिंदू हो या मुस्लिम, संघर्ष को समर्थन दिया. आज़ादी बड़ा उद्‌देश्य था. ठीक वैसे जैसे आज हममें उम्मीद होनी चाहिए जब आज हम भारत को उस भ्रष्टाचार व अपराध से मुक्त करने के निर्माण-पथ पर आगे बढ़ रहे हैं, जिसका कांग्रेस प्रतीक बन गई थी. क्या वाकई इसका कोई महत्व है कि निर्माण कौन कर रहा है?
क्या हमें मूर्खतापूर्ण, अप्रासंगिक मुद्‌दों को लेकर रास्ते से भटकने की बजाय इस व्यापक बहस पर केंद्रित नहीं होना चाहिए कि भारत के लिए वास्तविक बदलाव किस चीज से आएगा? ये निरर्थक मुद्‌दे हमारा भविष्य परिभाषित करने में कोई भूमिका निभाने से तो रहे. किसे परवाह है कि हमारे स्कूलों में संस्कृत पढ़ाई जाती है या नहीं. कोई मूर्ख यदि आईएसआईएस के साथ संघर्ष में शामिल होने विदेश जाता है तो कैसी चिंता? इसकी बजाय आइए, हम यहां आतंकवाद से लड़ने पर ध्यान केंद्रित करें.
इससे भी महत्वपूर्ण बात तो यह है कि हम महिलाओं के साथ सद‌व्यवहार करना सीखें. आइए, हम अपने बच्चों की तस्करी होने से रोकें. घोर भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए संघर्ष करें. आइए, हमारे सपनों के ऐसे भारत का निर्माण करें, जहां लोग गरीबी और पिछड़ेपन से मुक्त हों, जहां पर्यावरण का सम्मान किया जाता हो और उसी तरह प्रतिभाओं का भी, फिर वह कहीं से भी क्यों न आती हों. तो आइए, अधिक वृहद विचार-विमर्श पर ध्यान केंद्रित रखें. सच्चा बदलाव तो वही है. धर्म अपनी परवाह खुद कर लेगा.
('रविवार' से साभार)