Friday, 12 July 2013

किताबों का बंडल है 'किंडल'


शिवानी शिंदे

अगर आप किताबों और अखबारों को पलटने के झंझट से मुक्ति पाने की सोच रहे हैं तो आपके लिए किंडल एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। अमेजन कंपनी द्वारा तैयार ई-बुक 'किंडल' एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जिसकी मदद से आप कुछ ही सेकंड में किसी किताब या अन्य जानकारी हासिल कर सकते हैं। किंडल की मार्केटिंग करने वाली सर्च इंजन फर्म कम्युनिकेट-2 के मुख्य कार्याधिकारी विवेक भार्गव कहते हैं कि उनके द्वारा खरीदा गया यह अब तक का सर्वश्रेष्ठ इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है। पूरी दुनिया में 280,000 किताबों और 85 अखबारों को किंडल महज 60 सेकंड में डाउनलोड कर सकता है। यह ऐसा सर्वश्रेष्ठ गैजेट हो सकता है जिसे आप पास रखना जरूर पसंद करेंगे। इसके अलावा इसका वजन महज 10.2 औंस या 290 ग्राम है। भार्गव को इस बात का अफसोस था कि उन्होंने अमेरिका में निफ्टी टूल खरीदा था, जो वायर के बगैर किताबों को डाउनलोड नहीं कर सकता था। लेकिन अब भार्गव जैसे उपभोक्ताओं के चेहरे पर मुस्कान देखी जा सकती है। अमेजन ने 100 देशों में किंडल को लॉन्च किया है जिससे भारत में भी इसकी उपलब्धता सुनिश्चित हो गई है। कंपनी ने अंतरराष्ट्रीय कीमतें 279 डॉलर से घटा कर 259 डॉलर कर दी हैं। अगर आप भारत में किंडल रीडर खरीदने की योजना बना रहे हैं तो इसमें 20 डॉलर (लगभग 940 रुपये) का शिपिंग शुल्क और 24 फीसदी का सीमा शुल्क शामिल होगा। इस तरह से इस गैजेट के लिए आपको लगभग 17,000-18,000 रुपये खर्च करने होंगे। हालांकि यह उपकरण अमेजन यूएस द्वारा भेजा जाएगा, इसलिए यह आपके पास 27 दिनों में पहुंचेगा। एक रीडर के लिए पुस्तक की अमेरिकी कीमत चुकानी होगी जिसका मतलब है आपको कुछ और जेब ढीली करनी होगी। किंडल बुक्स की निदेशक लॉरा पोर्को कहती हैं, 'कीमत रेंज श्रेष्ठ विक्रेताओं के लिए 99 सेंट से 5 डॉलर, और 11.99 डॉलर तक कम है। इसके अलावा हम पेंग्विन जैसे भारतीय प्रकाशकों और लेखकों के साथ बातचीत कर रहे हैं ताकि उनके कार्यों को ई-रीडर के लिए अमेजन पर डाला जा सके।'  अमिताभ घोष, अरुंधती रॉय और रस्किन बॉन्ड जैसे लेखक किंडल पर पहले से ही मौजूद हैं। पोर्को ने यह भी कहा कि उनकी कंपनी कुछ भारतीय अखबारों को भी किंडल पर जोड़ना चाहती है। किंडल में फॉन्ट का आकार बढ़ाने, किसी शब्द का मतलब देखने और नोट्स आदि जैसी कई विशेषताएं शामिल हैं।
किंडल 2जीबी मेमोरी के साथ आता है और यह 1500 किताबों को रख सकता है। इसकी बैटरी वायरलेस टर्न्ड ऑफ के साथ दो सप्ताह तक और वायरलेस ऑन के साथ सिंगल चार्ज पर चार दिन तक चलती है। एक अच्छी बात यह भी है कि अमेजन ने सभी वायरलेस सेवाओं को इस पर बिना अतिरिक्त शुल्क के मुहैया कराया है। कंपनी अपने वैश्विक पार्टनर एटीऐंडटी के साथ मिल कर काम करती है। पोर्को कहती हैं, 'ग्राहकों के लिए यह बेहद उपयोगी है, क्योंकि यह कहीं भी कनेक्ट हो जाता है और इसके लिए कोई अतिरिक्त शुल्क भी नहीं चुकाना पड़ता।' हालांकि पोर्को ने भारत या विदेशों में इसकी बिक्री का कोई निश्चित आंकड़ा देने से इनकार कर दिया। वे कहती हैं, 'मैं इसकी जानकारी आपको तभी दे सकती हूं जब पुस्तक किंडल और फिजीकल फॉर्मेट दोनों पर उपलब्ध हो। फिजीकल फॉर्मेट में बेची जाने वाले प्रत्येक 100 पुस्तकों में से 48 किंडल पर बेची जाती हैं। ग्राहकों से मिली प्रतिक्रिया में कहा गया है कि हम इसे तेजी से पढ़ने में सक्षम हैं, क्योंकि इसे कहीं भी ले जाया और पढ़ा जा सकता है।' संयोगवश, जब 2007 में किंडल को लॉन्च किय गया था तो यह पहला ई-बुक रीडर डिवाइस नहीं था, लेकिन इसे ज्यादा प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना पड़ा था। किंडल के लॉन्च से पहले तक बाजार में ई-बुक रीडर की ज्यादा मांग नहीं थी। लेकिन अब बर्नेस ऐंड नोबल जैसी अन्य कंपनियां भी मैदान में हैं। इसने 'नूक' को लॉन्च किया है जो उपयोगकर्ताओं को अपनी इलेक्ट्रॉनिक पुस्तकों को अपने उन मित्रों को भेजने की भी अनुमति देता है जिन्होंने बर्नेस ऐंड नोबल का ई-रीडर एप्लीकेशन अपने मोबाइल डिवाइस या पर्सनल कंप्यूटर पर इंस्टॉल कर रखा हो।

टैबलेट बाजार में दबदबे की जंग



कड़ी प्रतिस्पर्धा और नियमित रूप से बाजार में आते नए नए उपकरणों की वजह से टैबलेट की कीमतें गोता खा रही हैं. उधर एक अमेरिकी अदालत ने एप्पल को ई-बुक की कीमत चढ़ाने के लिए एंटी ट्रस्ट कानून के हनन का दोषी पाया है.

अमेजन ने अपने किंडल एचडी टैबलेट की कीमत अमेरिका में 169 डॉलर और ब्रिटेन में 139 पाउंड कर दी है, जबकि बार्न्स एंड नोबेल ने अपने नूक टैबलेट की कीमत गिराकर 129 डॉलर कर दी है. एंडर्ले ग्रुप के विश्लेषक रॉब एंडर्ले कहते हैं, "जबसे ह्यूलेट पैकर्ड ने अपना टैबलेट लॉन्च किया है कीमतों पर बहुत दबाव है." एचपी अपना सात इंच वाला एंड्रॉयड टैबलेट 139 डॉलर में बेचता है. इसके साथ उसने पेपरबैक साइज वाले टैबलेट को हर किसी के लिए खरीदने लायक बना दिया है.

एक गार्टनर सर्वे के अनुसार इस साल दुनिया भर में टैबलेट की बिक्री में 68 प्रतिशत का इजाफा होगा और वह बढ़कर 20 करोड़ यूनिट हो जाएगा. लेकिन बाजार विश्लेषकों का मानना है कि कुछ सालों के तेज विकास के बाद बाजार ठंडा पड़ रहा है और इन उपकरणों का जीवन लंबा होने के साथ ही उसकी मांग घटेगी. रिपोर्ट के मुताबिक बहुत से उपभोक्ता खर्च बचाने के लिए बेसिक टैबलेट खरीदने पर जोर दे रहे हैं. एंडर्ले कहते हैं, "ऐसा लगता है कि जैसे जैसे निर्माताओं की बेसब्री बढ़ रही है, बाजार थकता दिख रहा है और आप कीमत पर और दबाव देखेंगे."

कुछ रिटेलर तो 100-100 डॉलर का टैबलेट बेचने लगे हैं. किफायती होने के कारण इन पर लोग टूट रहे हैं, लेकिन एंडर्ले का मानना है कि खराब क्वालिटी के उपकरणों की बाढ़ का उलटा असर हो सकता है और उपभोक्ता उससे मुंह मोड़ सकते हैं. रिसर्च फर्म आईडीसी के विश्लेषक जितेश उबरानी का कहना है कि अधिकांश सस्ते टैबलेट छोटी कंपनियां ला रही हैं. "पीसी मार्केट की गिरावट ने इसे ज्यादा अहम बना दिया है कि पीसी बनाने वाली कंपनियां टैबलेट बाजार में भी प्रतिस्पर्धा करें." वे कहते हैं कि टॉप क्लास ब्रांड के किफायती प्रोडक्ट लाने के साथ व्हाइट बॉक्स वेंडर की संख्या घटेगी.

टैबलेट के बाजार में प्रतियोगिता

विश्लेषकों का मानना है कि 2015 तक टैबलेट की कीमतों के और गिरने की उम्मीद है जब उसकी बिक्री पर्सनल कम्प्यूटरों की बिक्री को पार कर लेगी. मार्केट लीडर एप्पल अब तक इस होड़ से दूर है और उसने अपने आईपॉड टैबलेटों की कीमत स्थिर रखी है. हालांकि उसने भी सस्ते बाजार को संतुष्ट करने के लिए 500 डॉलर वाले आईपॉड के साथ साथ 329 डॉलर का आईपॉड मिनी बाजार में उतारा है. एबीआई रिसर्च के जेफ ऑर का कहना है कि एप्पल अपनी रणनीति के लिे बाजार को नहीं देखता बल्कि अपने खरीदारों को देखता है. "मैं समझता हूं कि उनकी कीमत आने वाले दिनों में स्थिर रहेगी."

एंडर्ले का कहना है कि एप्पल प्रीमियम वेंडर बने रहने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसके सामने कीमत कम करने या बाजार में हिस्सा खोने के मुश्किल विकल्प हैं. कीमत कम करने का असर उसके मुनाफे पर होगा और वह उसके शेयरों की गिरती कीमत को और गिरा सकता है. "स्टीव जॉब्स के समय में जब प्रोडक्ट आम होने लगता था, वे बाजार में कुछ नया ले आते थे. अब उसे नया प्रीमियम प्रोडक्ट लाना होगा." माइक्रोसॉफ्ट ने भी 500 डॉलर के अपने सरफेस के साथ हाई एंड बाजार में हिस्से की कोशिश की है, लेकिन शिक्षा क्षेत्र के खरीदारों के लिए इसकी कीमत घटाकर 199 डॉलर कर दी है.

ऑर का कहना है कि यदि निर्माता टैबलेट को अपने मुख्य बिजनेस का हिस्सा नहीं बनाएंगे तो उनमें से कुछ बाजार से बाहर होने को बाध्य हो जाएंगे. अमेजन अपना किंडल करीब करीब उत्पादन खर्च पर बेचता है ताकि लोगों को अपने कंटेंट और ऐप तक ला सके. इसी तरह एप्पल, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट भी अपने ग्राहकों को विज्ञापनों और बिक्री के लिए जोड़ कर रखना चाहते हैं. लेकिन ऑर का कहना है कि लोगों में ब्रांड के प्रति वह वफादारी नहीं दिख रही है, जिसकी इन कंपनियों को अपेक्षा थी. आईपैड के यूजर गूगल इस्तेमाल करते हैं और किंडल के यूजर दूसरों से सामान खरीदते हैं.
इस बीच एक अमेरिकी जज ने बुधवार को एक फैसले में कहा है कि एप्पल ने एंटी ट्रस्ट कानून का हनन किया है. जज ने कहा कि कंपनी ने ई-बुक की कीमत चढ़ाने के लिए प्रकाशकों के साथ साजिश की. जज ने एप्पल को ई-बुक्स की कीमत में प्रतिस्पर्धा को समाप्त करने के प्रकाशकों के सामूहिक प्रयास को संभव बनाने और बढ़ावा देने का दोषी पाया. एप्पल की यह दलील ठुकरा दी गई कि ई-बुक बाजार में उसका प्रवेश प्रतियोगिता को बढ़ाएगा.


ई बुक्स का अड्डा सोशल नेटवर्क


जर्मनी में इन दिनों बुक क्लब्स की संख्या बढ़ रही है लेकिन पारंपरिक नहीं बल्कि थोड़ा फर्क है. ये लोग बुक पोर्टल के कारण कई हजार लोग ऑनलाइन की ओर खिंच रहे हैं. इन पोर्टल्स पर हमेशा कोई न कोई मौजूद होता है.
हम वैसे भी रोज समाचार, समीक्षा, मौसम जानने के लिए काफी समय ऑनलाइन व्यतीत करते हैं. आजकल अकादमिक पेपर भी ऑनलाइन पढ़े जाते हैं. इसी तर्ज पर ऑनलाइन बुक पोर्टल की संख्या लगातार बढ़ रही है. ऐसा नहीं है कि सिर्फ युवा वर्ग इनकी ओर आकर्षित हुआ है बल्कि हर उम्र के लोग ऑनलाइन पोर्टल की ओर आकर्षित हो रहे हैं. ऑनलाइन किताबें पढ़ने वालों की औसत उम्र 40 है. इसका एक उदाहरण है आर्नो सांडर्स. वह रिटायर्ड हैं और हाल ही में कंप्यूटर का इस्तेमाल करना सीखे हैं. उनके बेटे ने उन्हें कहा कि ऑनलाइन आप लोगों से किताबों के बारे में बात कर सकते हैं. उन्होंने ऑनलाइन किताब पढ़ना शुरू किया. और तो और एक लेखक के साथ भी संवाद किया.
क्या चाहते हैं
इसकी शुरुआत उन लोगों से हुई जो जर्मन अखबारों में संस्कृति से जुड़े पेजों से नाराज थे. लोगों की आपत्ति थी कि इनमें बहुत कम पेज हैं और ओल्ड फैशन हैं. पारंपरिक अखबारों की तुलना में इंटरनेट में जगह की कोई समस्या ही नहीं है. आप जितनी चाहे समीक्षा कर सकते हैं. ऐसा भी देखा गया कि लोगों को अपने दोस्तों या अपने जैसा सोचने वाले लोगों की सिफारिश पसंद आती है. एक जैसा सोचने वाले लोगों की इंटरनेट पर तो कोई कमी है ही नहीं. पाठक भी आलोचक बन जाते हैं. यह कई बार प्रोफेशनल आलोचना नहीं होती लेकिन बहुत ही भावनात्मक और निजी समीक्षाएं भी पसंद की जा रही हैं.
बढ़ती संख्या
ई बुक और इन्हें पढ़ने वाले लोग पुराने नहीं हुए हैं लेकिन इलेक्ट्रॉनिक किताबों के बाजार में आने के थोड़े ही समय में इन्हें पढ़ने वालों ने कई तरीके खोज निकाले हैं कि कैसे किताबों के बारे में चर्चा की जाए. वेब डिजाइनर कार्ला पाउल lovely-books.de में काम करती हैं. इस जर्मन बुक पोर्टल पर बहुत पाठक हैं और वे सब सोशल मीडिया यानी फेसबुक, ट्विटर के जरिए, लेखकों, ब्लॉगरों, प्रकाशकों और ऑन लाइन किताब बेचने वाले लोगों से जुड़े हुए हैं. पुस्तकों के कुछ हिस्से और चित्र यहां साझा किए जाते हैं. आप लेखकों के सर्कल में पाठक के तौर पर जुड़ सकते हैं. इस पोर्टल पर सबसे ताजा है बूखफ्रागे याने किताबी सवाल. अगर आप ई रीडर पर कोई किताब पढ़ रहे हैं और कोई पैराग्राफ आपकी समझ में नहीं आता तो उसके बारे में सवाल सीधे लेखक से पूछा जा सकता है. पाउल कहती हैं कि लेखक से सीधे बात करना बहुत ही रोमांचक अनुभव है.
कंप्यूटर प्रोग्रामर सारा शाफ्ट ने कई बुक पोर्टल बनाए हैं जिन्हें काउच नाम के शब्द से लिंक कर दिया गया है. इस पर कुकिंग, बच्चों और इतिहास, सबकी किताबें उपलब्ध हैं.
प्रकाशक बुक पोर्टल्स पर गहरी नजर रखे हैं. बर्लिन प्रकाशन में कार्स्टन समरफेल्ड प्रेस ऑफिसर हैं. वह मानते हैं कि पाठकों से सीधे जुड़ना बहुत अच्छा है. और किताबों के बारे में जानने का यह सबसे अच्छा साधन है. कोई विज्ञापन पाठकों की बातचीत से अच्छा नहीं हो सकता और बुक पोर्टल्स से यही समझ में आता है.
लेकिन हर व्यक्ति इन पोर्टल्स से खुश नहीं है. literatur-cafe.de बनाने वाले वोल्फगांग टिशर कहते हैं कि पोर्टल्स का सादापन खत्म हो गया है. उन्हें इस बात से नाराजगी है कि कई पोर्टल विशेष अभियान के तहत बनाए जाते हैं और इन्हें इस्तेमाल करने वालों को पता नहीं होता कि ये किसी प्रकाशन ने खरीदा हुआ है. टिशर कहते हैं, "अक्सर लोगों को पता नहीं होता कि कुछ किताबें सिर्फ इसलिए ऑनलाइन हैं क्योंकि प्रकाशकों ने इसके लिए पैसे दिए हैं." लेकिन किताब अगर अच्छी नहीं है तो यह कितनी भी खास और महंगी हो इसे पाठक तुरंत खारिज कर देते हैं. किताब के बारे में अच्छी बुरी बातें तेजी से पाठकों में फैलती हैं. सोशल नेटवर्क के कारण जर्मन पाठक सोच समझ कर किताब चुनने लगे हैं लेकिन उनकी आवाज मजबूत हुई है.

पुस्तक प्रकाशन का ई ऑप्शन


बालेंदु शर्मा दाधीच

जस्ट जिंदगी के लेख ऐसे बनें राइटिंग के किंग में हमने बताया कि परंपरागत तरीके से किताब कैसे छपवाई जा सकती है। इसके अलावा आपके पास ई-बुक छपवाने का ऑप्शन भी है, जिसके जरिये आप लाखों रीडर्स तक पहुंच सकते हैं।
क्या आपने ई. एल. जेम्स का नाम सुना है या फिर अशोक बैंकर का? ई. एल. जेम्स ब्रिटिश लेखक हैं, जिनकी 'फिफ्टी शेड्स' किताबों की सीरीज ने इन दिनों दुनिया भर में धूम मचा रखी है। इस सीरीज की पहली दो किताबों की लाखों कॉपी बिक चुकी हैं और वह भी ई-बुक फॉर्मैट में। अशोक बैंकर भारत के ही लेखक हैं, जिन्होंने 12 भाषाओं में 70 किताबें रिलीज की हैं और भारत के बेस्टसेलर ई-बुक लेखक हैं। कैरी विल्किन्सन, ली चाइल्ड, जेम्स पेटरसन, स्टीग लारसन जैसे विदेशी लेखकों से लेकर शशि थरूर, चेतन भगत, रोमिला थापर, सुनील खिलनानी, मार्क टली, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, आर. के. नारायण और सिद्धार्थ देव जैसे लेखक ई-बुक्स को अपना चुके हैं। अगर आप भी लेखक हैं और संभावनाओं से भरी रोमांचक वर्चुअल दुनिया के रीडर्स तक पहुंचना चाहते हैं तो आपकी ई-बुक के लिये यह सही मौका है।

इतनी खास कैसे

जिस रफ्तार से डिजिटल तकनीकों का फैलाव हो रहा है और लोगों की मसरूफियत बढ़ रही है, उसमें ई-बुक्स की लोकप्रियता का बढ़ना तय है। लोगों के पास किताबें खरीदने के लिए बुकस्टोर तक जाने का वक्त नहीं है और न ही इत्मीनान से किताब पढ़ने की फुरसत। ई-बुक्स को इंटरनेट से डाउनलोड करना कुछ क्लिक्स का ही काम है, इसलिए किताब खरीदने की सहूलियत बहुत है। ये छपी किताबों की तुलना में सस्ती भी हैं और कई तरह के सुविधाजनक सबस्क्रिप्शन मॉडल्स उपलब्ध हैं। दुनिया में किताबों के सबसे बड़े ऑनलाइन स्टोर अमेजन डॉट कॉम की अमेरिका और ब्रिटेन शाखाओं ने अप्रैल और अगस्त में जारी अपने सालाना आंकड़ों में बताया है कि उन पर बिकने वाली ई-बुक्स की संख्या छपी किताबों से ज्यादा हो गई है। ई-बुक्स का इतिहास मुश्किल से दस-पंद्रह साल का है और छपी किताबों का सैकड़ों साल का। ऐसे में ई-बुक्स की कामयाबी कोई छोटी चीज़ नहीं है।
डिजिटल पाठक वर्ग को अब कोई अनदेखा नहीं कर सकता। इसीलिए पेंग्विन इंडिया ने हाल ही में 250 ई-बुक्स जारी की हैं। हार्पर कॉलिन्स, पुस्तक महल, डीसी बुक्स वगैरह भी अपनी किताबें ई-बुक फॉर्मैट में रिलीज कर रहे हैं। जब 70 फीसदी भारतीयों के पास मोबाइल फोन या दूसरी डिजिटल डिवाइस हैं तो प्रकाशक भी उन तक पहुंचना चाहेंगे और लेखक भी।

अनूठी दुनिया ई-बुक्स की

अगर आपने हैरी पॉटर की फिल्में देखी हैं तो इन फिल्मों में दिखने वाले खास अखबारों, किताबों में लगी तस्वीरों पर नजर जरूर गई होगी जो स्थिर नहीं बल्कि चलने-फिरने और बोलने वाली तस्वीरें हैं। बड़ी असंभव सी मगर दिलचस्प कल्पना है वह। लेकिन ई-बुक्स उसी कल्पना को सच कर रही हैं। ई-बुक में छपी किताबों जैसी सारी खूबियां (टेक्स्ट, चित्र, ग्राफ, कॉन्टेंट टेबल वगैरह) तो हैं ही, ऐसी भी कई खासियतें हैं जो किताबों के पास हो ही नहीं सकतीं। ये ऐसी किताबें हैं जिन्हें ज्यादा दिलचस्प और दमदार बनाने के लिए ऑडियो और विडियो भी शामिल किए जा सकते हैं। पेजों को आपस में लिंक करने की सुविधा भी है।

ई-बुक्स की खासियतें

- टेक्स्ट और चित्रों के साथ-साथ ऑडियो-विडियो भी शामिल करना मुमकिन।
- तकनीकी अनुवाद सुविधाओं का इस्तेमाल मुमकिन।
- टेक्स्ट टु स्पीच के जरिए किताबों की सामग्री सुनी जा सकती है।
- छपी किताबों की तुलना में सस्ती।
- डाउनलोड के जरिए तुरंत उपलब्ध, डाक से डिलिवरी की जरूरत नहीं।
- एक ही डिवाइस में हजारों ई-बुक रखना संभव।
- दूसरे पाठकों से नोट्स साझा करना संभव।
- पर्यावरण के लिहाज से अनुकूल, कागज-स्याही का इस्तेमाल नहीं।
- टेक्स्ट को छोटा-बड़ा करने की सुविधा।
- भीतर की सामग्री को सर्च करना संभव।
- पारंपरिक किताबों की ही तरह बुकमार्क करना संभव।
- लाखों ई-बुक्स बिल्कुल फ्री उपलब्ध।
- पुरानी किताबों को हमेशा के लिए सहेजना संभव।
- कभी भी आउट ऑफ प्रिंट नहीं होतीं।
- भविष्य में सामग्री को अपडेट या संशोधित करना संभव।
- प्रकाशन पर लागत काफी कम।

ई-बुक के फॉर्मैट

आसान शब्दों में कहा जाए तो ई-बुक एक कंप्यूटर फाइल है, जिसे पढ़ने के लिए किसी डिजिटल डिवाइस की जरूरत पड़ती है। इन्हें पढ़ने के लिए किंडल, सोनी ई-बुक रीडर, बार्न्स ऐंड नोबल का नुक और कोबो ई-बुक रीडर जैसे खास रीडर्स उपलब्ध हैं। लेकिन आसानी से मिलने वाले ई-बुक रीडर ऐप्लिकेशंस का इस्तेमाल करते हुए इन्हें किसी भी तकनीकी डिवाइस पर पढ़ा जा सकता है, घर या दफ्तर के डेस्कटॉप कंप्यूटर और आई-पैड पर भी।
ई-बुक की फाइलों का कोई एक ही फॉर्मैट नहीं है बल्कि कई अलग-अलग डिजिटल डिवाइस और ऑपरेटिंग सिस्टमों के हिसाब से अलग-अलग फॉर्मैट में ई-बुक्स बनानी पड़ती हैं। अगर कोई किताब ई-बुक के रूप में रिलीज होती है तो वह कई फॉर्मैट्स में बनाकर रिलीज करनी होगी ताकि वह हर किस्म की मशीन का इस्तेमाल करने वाले पाठकों तक पहुंच सके। आईपैड, एंड्रॉयड टैब्लेट, माइक्रोसॉफ्ट विंडोज, ब्लैकबेरी स्मार्टफोन, किंडल वगैरह के लिए ई-बुक के अलग-अलग फॉर्मैट तैयार करने होते हैं।

ई-बुक, पीडीएफ और एमएस वर्ड

कुछ लोग समझते हैं कि किताब का पीडीएफ संस्करण बना दिया जाए, तो ई-बुक तैयार हो गई। कुछ और लोग सोचते हैं कि माइक्रोसॉफ्ट वर्ड की फाइल भी ई-बुक के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है। ई-बुक इन दोनों से पूरी तरह अलग है। पीडीएफ फाइल का आकार डिवाइस के आकार के हिसाब से बदलता नहीं है, जबकि ई-बुक लैपटॉप पर अलग, डेस्कटॉप पर अलग, ई-बुक रीडर पर अलग, टैब्लेट पर अलग और स्मार्टफोन पर अलग आकार में दिखाई देगी। इसका मतलब यह नहीं है कि अलग-अलग डिवाइस पर उसके हर पन्ने का आकार खींचकर छोटा, बड़ा या लंबा हो जाएगा। अगर आप उसे स्मार्टफोन पर पढ़ रहे हैं तो एक ही कॉन्टेंट कई पेज में बदल जाएगा जबकि डेस्कटॉप पर पढ़ते वक्त दो-तीन पन्ने मिलकर एक पेज में बदल जाएंगे, हालांकि अक्षरों का आकार पढ़ने लायक बना रहेगा। ई-बुक की सामग्री डिवाइस के मुताबिक फ्लो (लचीलापन) करती है।

डिलिवरी कैसे

ई-बुक की डिलिवरी के लिए डाउनलोड का तरीका भी अपनाया जाता है और सीडी-डीवीडी के जरिये भी वितरण किया जाता है। अपनी डिजिटल डिवाइस पर ई-बुक डाउनलोड करने के लिए पब्लिशर की वेबसाइट या फिर किसी ई-बुक मार्केटिंग वेबसाइट पर जाएं और मांगी गई रकम का क्रेडिट कार्ड से भुगतान कर ई-बुक डाउनलोड कर लें। चूंकि ये डिजिटल फाइलें भर हैं इसलिए अपने पास मौजूद ई-बुक्स को ईमेल, फाइल शेयरिंग, सोशल नेटवर्किंग या दूसरे डिजिटल तरीकों से भी दूसरों को भेज सकते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि एक बार खरीदने के बाद आप उस ई-बुक की कितनी भी कॉपी दूसरों को दे सकते हैं। ई-बुक्स के भीतर डिजिटल राइट्स मैनेजमेंट (डीआरएम) की व्यवस्था होती है इसलिए उन्हें एक बार में एक ही शख्स इस्तेमाल कर सकता है। बिल्कुल उसी तरह, जैसे छपी किताबों के साथ होता है। ऐसा लेखकों के हितों की रक्षा के लिए है।

किसे फायदा

लेखक: ई-बुक्स से लेखकों के लिए इंटरनेट के जरिये बड़ा विश्वव्यापी बाजार खुल जाता है। इकॉनमी ऑफ स्केल (बड़े पैमाने पर बिक्री) का लाभ उठाकर कई ई-बुक लेखक करोड़पति बन गए हैं। पारंपरिक किताबों की तुलना में इंटरनेट पर बिकने वाली ई-बुक्स की संख्या की निगरानी करना भी आसान है क्योंकि इन्हें प्रफेशनल ढंग से बेचने वाली वेबसाइट उपलब्ध हैं, जैसे http://www.amazon.com/। लेखक छपी किताब के साथ-साथ उसका ई-बुक संस्करण भी निकालने लगे हैं, हालांकि लिखने, टाइपिंग आदि का खर्चा एक बार ही होता है। अपडेट करना आसान होने से आपकी ई-बुक हमेशा ताजा और प्रासंगिक बनी रहेगी।
ई-बुक प्रकाशकों के रूप में प्रकाशकों का एक नया वर्ग उभर रहा है, जो बेहद आसान शर्तों पर और फटाफट लेखकों की आकर्षक प्रफेशनल क्वॉलिटी की ई-बुक्स तैयार करके देते हैं। ये पुराने जमाने के प्रकाशकों से उलट है, जहां लेखकों को महीनों और कई बार बरसों चक्कर काटने पड़ते थे।
पाठक: पाठकों को भी ई-बुक्स से बहुत फायदा है क्योंकि ये न सिर्फ सस्ती मिलती हैं बल्कि हमेशा सुलभ भी हैं। जिन किताबों के प्रिंट एडिशन खरीदना महंगा पड़ता है, उनके ई-बुक संस्करण आसानी से खरीदे जा सकते हैं। विदेशों में छपी मशहूर किताबों के छपे संस्करण मंगवाना भले ही मुश्किल हो, उनके ई-बुक संस्करण चुटकियों में खरीदे और पढ़े जा सकते है। सर्च और कॉपी-पेस्ट की सुविधा रिसर्च करने वाले स्टूडेंट्स के बहुत काम की है।
प्रकाशक: प्रकाशक अपनी किताबों के ई-बुक संस्करण जारी कर ऐसे बाजार तक पहुंच सकते हैं, जहां पहले उनकी पहुंच नहीं थी। यह भौगोलिक सीमाओं से परे वर्चुअल बाजार है, जिसके लाभ वर्चुअल नहीं, बल्कि असली हैं। वे ई-बुक प्रकाशकों से व्यावसायिक गठबंधन कर ई-बुक क्रांति को अपने नुकसान की बजाय फायदे में बदल सकते हैं। छपी किताबों के उलट, इस फॉर्मैट में चाहे जितनी कॉपी बनाएं, कीमत में खास फर्क नहीं आता।

कुछ ई-बुक प्रकाशक

http://eprakashak.com/
pothi.com
http://dataoutsourcingindia.com/
http://www.suntecindia.com/
http://dataplusvalue.com/
http://www.ebookit.com/index.php

ई-बुक पर खर्च

सौ पेज की ई-बुक का पूरा पैकेज (पांच फॉर्मैट्स में ई-बुक निर्माण, दस ब्रैंडेड डीवीडी बॉक्स, दस ब्रैंडेड डीवीडी, कवर डिजाइन, ब्रैंडेड वेब पेज, सर्च इंजन सबमिशन और गाइडेंस, होम डिलिवरी) ई-प्रकाशक डॉट कॉम पर 4000 रुपये में उपलब्ध है। दूसरी वेबसाइटों पर यह 5500 रुपये से लेकर 9000 रुपये तक की दर पर मुहैया कराई जाती है।

डिस्ट्रिब्यूशन कैसे करें

ई-बुक्स को गूगल, ऐपल और अमेजन के ऑनलाइन स्टोर्स के जरिये तो बेचा ही जा सकता है, ई-कॉमर्स पोर्टलों, बुक-वेबसाइटों और अपनी निजी वेबसाइट के जरिये भी वितरित किया जा सकता है। ये ठिकाने तय कमिशन लेकर आपकी किताबों की लिस्टिंग करते हैं जहां से इच्छुक लोग तय रकम देकर उन्हें डाउनलोड कर लेते हैं। कुछ ठिकाने हैं:
- Amazon.com
-itunes.apple.com
-ebookstore.sony.com
-barnesandnoble.com
-kobobooks.com
-play.google.com
-ingramcontent.com
-flipkart.com
-ebay.co.in

कितनी हो किताब की कीमत

ई-बुक्स की कीमत छपी किताबों की तुलना में 10 से 50 फीसदी तक होती है। लेखक अगर अपनी ई-बुक की कीमत सौ रुपये से कम रखें तो बेहतर है क्योंकि ई-बुक के कॉन्सेप्ट के पीछे उनकी आसान उपलब्धता के साथ-साथ कम कीमत भी बड़ा पहलू है। हालांकि विदेशों में 100 डॉलर तक की ई-बुक्स दिखना भी कोई असामान्य बात नहीं है लेकिन आमतौर पर वहां भी आम ई-बुक्स की कीमत पांच-छह डॉलर यानी करीब 300 रुपये तक ही रखी जाती है। ज्यादा कीमत रखते हुए कम ई-बुक्स बेचें या फिर कम कीमत रखते हुए ज्यादा, फैसला लेखक को ही करना है। वैसे महंगी ई-बुक्स भी खूब दिखती हैं। अमेजन पर 15 हजार डॉलर (करीब आठ लाख रुपये) तक की कीमत वाली ई-बुक्स भी उपलब्ध है, लेकिन वे बहुत ही ज्यादा विशेषज्ञता वाले विषय पर आधारित किताबें हैं जिन्हें पेशेवर संस्थानों के बीच बेचने के लिए तैयार किया जाता है। (नवभारत टाइम्स से साभार)


ई-बुक क्या है?


ईबुक हूबहू एक मुद्रित किताब के समान है जिसे पढ़ने के लिए किसी न किसी डिजिटल युक्ति (डिवाइस) की ज़रूरत पड़ती है, जैसे- कंप्यूटर और लैपटॉप। आजकल खास तौर पर ई-बुक्स को पढ़ने के लिए ई-बुक रीडर्स बाज़ार में उपलब्ध हैं, जो पुस्तक प्रेमियों, छात्रों और लेखकों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। अमेज़न का किंडल और सोनी का ई-बुक रीडर काफी लोकप्रिय हैं। हालाँकि ई-बुक पढ़ने के लिए खास तौर पर ई-बुक रीडर खरीदने की जरूरत नहीं है और आप अपने कंप्यूटर, लैपटॉप या टैबलेट पर भी इनका आनंद ले सकते हैं।
एपल के आई-पैड सहित दूसरे दर्जनों टैबलेट्स पर ई-बुक पढ़ी जा सकती हैं जिनमें बेहद सस्ते टैबलेट्स भी शामिल हैं। इतना ही नहीं, ज़्यादातर स्मार्टफोन्स में भी ई-बुक डाउनलोड करने और पढ़ने की व्यवस्था होती है। ई-बुक्स अपनी सुलभता के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं और हाल ही में अमेज़न ने कहा था कि उसके बुक स्टोर पर बिक्री के मामले में ई-बुक्स ने मुद्रित किताबों को पीछे छोड़ दिया है। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि ई-बुक्स मुद्रित पुस्तक की तुलना में सस्ती होती हैं।
ई-बुक के सस्ता होने का कारण यह है कि इन पर पहली बार आने वाली लागत के बाद अमूमन कोई लागत नहीं आती। एक बार ई-बुक विकसित और प्रकाशित होने के बाद लेखक उसकी अनंत फाइलें बनाने के लिए स्वतंत्र है। इसलिए लेखक की लागत बहुत कम होती है और इसका लाभ पाठक तक पहुँचता है। भारत में भी ई-बुक्स का ट्रेंड तेजी से जोर पकड़ रहा है और अंग्रेजी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं में भी ई-बुक्स खूब दिखने लगी हैं। दिल्ली में सितंबर 2012 में हुए विश्व प्रसिद्ध दिल्ली पुस्तक मेले में ई-बुक को मुख्य थीम बनाकर भारतीय प्रकाशकों के संगठन ने भी ई-बुक्स में अपनी रुचि प्रकट की है। यह एक नए क्षेत्र में उभरते हुए अवसरों का भी संकेत है।
ईबुक ऐसी तकनीकी किताब है, जो लेखक, प्रकाशक और पाठक सभी के लिए फ़ायदे का सौदा है। हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के लेखक ई-प्रकाशक के माध्यम से अपनी ई-बुक्स प्रकाशित करवा सकते हैं। ई-प्रकाशक की शुरूआत विशेष तौर पर इन्हीं भाषाओं को ध्यान में रखते हुए हुई है क्योंकि इन्डिक यूनिकोड से संबंधित जटिलताओं की वजह से आज भी हिंदी में ई-बुक्स का प्रकाशन चुनौतीपूर्ण है। अलबत्ता, ई-प्रकाशक इन सभी चुनौतियों को तकनीकी रूप से सुलझाने और आकर्षक इंडिक ई-बुक्स के प्रकाशन में सक्षम है।
ईप्रकाशक.कॉम एक अ-लाभ-आधारित (non-profit) परियोजना है जिसका एकमात्र उद्देश्य हिंदी साहित्य को पाठकों तक पहुँचाना और हिंदी ई-पुस्तकें पढ़ने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना है। यहाँ ई-बुक प्रकाशन के लिए ली जाने वाली राशि लागत मात्र पर आधारित है। यही वजह है कि यहाँ प्रकाशित ई-पुस्तकों पर होने वाला खर्च न्यूनतम है।
लागत की गणना कीजिए
सौ या उससे कम पृष्ठों की ई-बुकः 4000 रुपए।
उसके बाद प्रति पृष्ठ 40 रुपए अतिरिक्त (उपरोक्त अनुपात में ही)
चित्रों के लिए प्रति चित्र 50 रुपए अतिरिक्त।
शुरूआती ऑफरः
-मुखपृष्ठ का डिज़ाइन निःशुल्क
-यूनिकोड फॉन्ट कनवर्जनः निःशुल्क किंतु प्रूफिंग की जिम्मेदारी लेखक की।
-निःशुल्क होम डिलीवरी
पैकेज में क्या-क्या शामिल हैः
-पाँच फॉरमैट्स में आपकी ई-बुक
-10 आकर्षक मुद्रित डीवीडी बॉक्स (प्लास्टिक पैक, विमोचन के लिए तैयार)
-10 मुद्रित डीवीडी
-इस साइट पर प्रमोशन के लिए एक वेब पृष्ठ
- आपकी ईबुक को इंटरनेट पर पढ़ने की सुविधा (यदि आप चाहें तो)
-सर्च इंजनों पर निःशुल्क प्रमोशन
अतिरिक्त सेवाएँ:
-अतिरिक्त मुद्रित डीवीडी बॉक्स तथा मुद्रित डीवीडीः
प्रति सेट (एक बॉक्स जिसमें एक डीवीडी) 200 रुपए।
-अतिरिक्त डीवीडी (सामान्य, कवर मुद्रित नहीं)ः प्रति डीवीडी 30 रुपए।

सबसे अधिक चीन में पढ़ी जाती हैं ई-बुक्स


क्या आपको पता है कि ई-बुक सबसे अधिक कहां पढ़ी जाती है? चलिए हम आपको बताते हैं. दरअसल चीनी लोग सबसे अधिक ई-बुक पढ़ते हैं. चीन के लोगों ने वर्ष 2010 में कुल 61.3 करोड़ इलेक्ट्रानिक किताबें पढ़ी हैं. हाल ही में हुए सर्वे में इसका खुलासा हुआ है. सर्वे के मुताबिक कम से कम 23 प्रतिशत चीनी लोगों ने मोबाइल फोन के जरिए इलेक्ट्रानिक किताबें पढ़ी जो कि वर्ष 2009 में ई-किताबें पढ़ने वाले लोगों की संख्या से आठ प्रतिशत ज्यादा है. न्यूज एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक चाइनीज एकेडमी ऑफ प्रेस एण्ड पब्लिकेशन ने इस सर्वे में चीन के 29 स्टेट के 51 सिटी में रहने वाले 19,000 लोगों को शामिल किया. सर्वे के मुताबिक ई-किताबें पढ़ने वाले लोगों में से 16.4 प्रतिशत लोगों ने ये किताबें पढ़ने के बाद कागजी किताबें भी खरीदीं. सर्वे में कहा गया कि इंटरनेट से ई-किताबें डाउनलोड करने के 1.33 युआन खर्च करनी पड़ी. करीब 54 प्रतिशत पाठकों ने कहा कि वह ई-किताब डाउनलोड करने के लिए औसतन 3.45 युआन का भुगतान कर सकते है.

Thursday, 11 July 2013

फिर भी जाति जाएगी नहीं

  •          जाति का जहर बोवो और वोट की फसल काटो


                   जयप्रकाश त्रिपाठी


जाति, धर्म, भाषा, नस्ल और लिंग यह सब लोगों को आपस में बांटते हैं। हमारे देश की विभिन्नता राजनेताओं की हिंसक (भावनात्मक हिंसा) हरकतों से हमारी ताकत बनने की बजाय हमारी कमजोरी बनती जा रही है। वे अलगाव का बीज बोने का कोई भी अवसर चूकना नहीं चाहते हैं। कट्टर जातिवादी सपा, बसपा, रालोद तो हैं ही, भाजपा, कांग्रेस समेत अन्य दल भी टिकट बंटवारे के समय जाति की लहलहाती फसल काटने पर लोमड़ी-दृष्टि रखते हैं। दरअसल, इन सबका उद्देश्य एक है, जाति का जहर बोवो और वोट की फसल काटो। किसी को दलितों का वोट बैंक सहेजना है, किसी को यादवों और मुसलमानों का, किसी को ब्राह्मणों में गणित फिट करना है तो किसी को राजपूतों, पिछड़ों, आदिवासियों का। चुनाव वस्तुतः लोकतंत्र की ताकत नहीं, अपराधियों को राजनेता बनाने का माध्यम हो गये हैं। ये अपराधी संसद और विधानसभाओं में पहुंच कर देश चलाने के लिए कानून बनाने की कैसी मंशा रखते होंगे, पूरे सिस्टम को पता है। हजारों उदाहरण सामने हैं। हर भले मानुस, हर आम आदमी लाचार है और गुंडे गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। सरकारी धन और  बहू-बेटियों ही नहीं पूरे लोकतंत्र की इज्जत लूट रहे हैं। डंके की चोट पर। स्विस बैंक जैसे दुनिया भर के बटमार मुल्क की तिजोरियों में घुसे चले आ रहे हैं। कोई धर्म और आयुर्वेद के नाम पर द्वीपों पर अपनी अलग दुनिया बसाने की जुगत में है, कोई गुजरात में कत्लेआम कराने के बाद देश को उपदेश बांटता डोल रहा है।
सत्तापक्ष और विपक्ष दोनो ही कारपोरेट और औद्योगिक घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मजबूत लाबी की तुष्टिकरण की नीतियों को बढ़ावा देने में लगे हैं, जिससे आम आदमी के हितों की बली चढ़ रही है। राजनीतिक विचारधारा इस कदर राह भटक चुकी है कि अपराधियों को पानी पी-पीकर अपशब्द बोलने और गांधी की सौगंध खाने वाले टिकट वितरण के समय तमाम आदर्श, सिद्धांत और शुचिता भूलकर बाहुबलियों को छांट-छांटकर टिकट देते हैं। इस मामले में कोई भी पार्टी दूध की धुली नहीं है। कथनी और करनी का फर्क चुनाव में दिखाई देता है। सत्ता हासिल करने के लिए राजनीतिक दल साम-दाम-दण्ड और भेद की राजनीति करने से गुरेज नहीं करते हैं। राजनीति का चरित्र केवल सत्ता प्राप्ति हो गया है और सत्ता प्राप्ति की राह में मूल्य बुरी तरह रौंदे जाते हैं। जाने-माने पत्रकार अनिल चमड़िया सही सवाल उठाते हैं कि 'सचेत और अचेत जातिवाद की पहचान कैसे की जाए? हमारे समाज में जातिवादी, सांप्रदायिक होने के कई तौर-तरीके उपलब्ध हैं। कई नेता ऐसे हो सकते हैं, जो नास्तिक हों और हिंदुत्व की राजनीति करते हों। जिन्ना भी नास्तिक थे और वे इस्लाम पर आधारित पाकिस्तान की वकालत करने लगे। गांधी वर्णवादी थे, लेकिन छुआछूत का विरोध करते थे। वे खुद को हिंदू भी कहते थे और धर्मनिरपेक्षता की बात भी करते थे। जातिवादी भी धर्मनिरपेक्षता की वकालत करते दिख सकता है। उसी तरह धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाला भी जातिवादी हो सकता है।' इसके साथ यह सवाल भी लाजिमी हो सकता है कि आजादी के आंदोलन के दौरान ही एक धड़े को अंबेडकर, दूसरे धड़े को गांधी और तीसरे धड़े को जिन्ना की बातें समझ में नहीं आती थी। तभी से बोया जाने लगा था जाति का जहर। अपने-अपने कुटुंब की फसलें बोने-काटने की बिसातें बिछायी जा रही थीं। व्यक्ति के जातिवादी होने और जातीय भावना के बीच एक फर्क करना जरूरी लगता है। आज आरक्षण का पक्ष-विपक्ष क्या है? वह क्यों इतना दुरंगा हो गया है, कोई निरपेक्ष (मनुष्य का) पक्ष नदारद क्यों हो चुका है, इन तरह तरह के प्रश्नों के बीच जातिवादी राजनेताओं की कामयाबियां सिर्फ इतनी हैं कि हमारा सिर शर्म से झुक जाये और मुट्ठियां गुस्से से तन जाएं।
उत्तर प्रदेश की जातिवादी राजनीति को सत्येंद्र रंजन इस तरह कोट करते हैं- 'दलित गोलबंदी के जरिए मजबूत वोट आधार तैयार करने के बाद जब चुनावी राजनीति में इस रणनीति की सीमा साफ होने लगी, तब मायावती ने खुलकर सवर्ण जातियों को लुभाने का तरीका अपनाया। अब चूंकि वे अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी हैं, तो उनकी पार्टी ने एक बार फिर जातीय सम्मेलनों के आयोजन की राह पकड़ी है. खास नजर ब्राह्मणों पर है, पर कोशिश तमाम सवर्ण जातियों को संदेश देने की है।' कुछ यही तरीका सपा का है। आजकल यूपी पुलिस का हर थानाध्यक्ष जाति विशेष का! और निगाहें यादव-मुस्लिम फैक्टर पर। विकास की कहानी ये है कि अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री सिर्फ सैफई (इटावा) ने नहीं, पूरे प्रदेश ने बनाया था। चौबीस घंटे बिजली रायबरेली, इटावा, कन्नौज में दी जाती है तो बाकी जिलो की जनता पूछ कर खामोश हो लेती है कि हम क्या पाकिस्तान और बांग्लादेश के लिए मतदान करने गये थे! बिजली क्या सोनिया गांधी, मुलायम सिंह और मायावती के पैसे से पैदा होती है, जो उनके निर्वाचन क्षेत्रों में चौबीसो घंटे सप्लाई होगी और बाकी प्रदेश तड़पता रहे। सत्ता पर काबिज होने के लिए राजनीतिक दलों ने "सोशल इंजीनियरिंग के बहाने जातिवाद को आधार बनाया, तो रातोरात जातिगत महासभाएं, उनकी सेनाएं आ गईं और उनके रहनुमा खडे हो गए। राजनीतिक दल सत्ता पाने के लिए जातिगत संगठनों से सौदाबाजी में फंस रहे हैं। वोट की राजनीति जातिवाद को बढा रही है, जिससे सामाजिक समरसता, राष्ट्रीयता की भावना व लोकतंत्र की अवधारणा को पलीता लग रहा है। भ्रष्टाचार का बोलबाला होने लगा, तब कहा गया कि यह "कास्ट" और "करप्शन" मुल्क को ले डूबेगा और आज इतनी भयानक स्थिति सबके सामने है कि न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। जातियों के रहनुमा जातियों का भी कितना भला करते हैं और कितना अपने घर-परिवारों का, नंगा नाच कहीं भी देखा जा सकता है। और लालू संसद में ललकारते हैं- ‘अन्ना हजारे और उनकी टीम एक पार्टी बना लें और चुनाव लड़ें, फिर देखें कि चुनाव क्या होता है। देश में मतदान सिर्फ जाति के आधार पर ही होता है न कि किसी विचार, योजना अथवा काम पर। पूरे देश में चुनाव का आधार सिर्फ जातिवाद ही है।’
न्यायपालिका ने आज बिल्कुल सही हस्तक्षेप किया है, लेकिन ये सवाल फिर भी लाजवाब कर जाता है कि क्या बच्चा पैदा होने के बाद अस्पताल में और तीन-चार साल का हो जाने के बाद स्कूलों में उसके नाम के साथ जाति का टाइटल लगाने पर रोक का फरमान भी कभी जारी होगा। प्रवेश पत्रों में एक कॉलम ये भी होता है- आप हिंदू हैं कि मुस्लिम! इसलिए लगता है कि इस तरह भी जाति जाएगी नहीं। क्योंकि किसी को सवर्ण होकर नौकरी में प्रमोशन पाना है और किसी को दलित होकर नौकरी पानी है। इसलिए फिर भी जाति जाएगी नहीं कि जिस देश में गंगा बहती है, उसके महा महान पुरखे भी वर्णाश्रम व्यवस्था का जहर बो गये हैं।