Monday, 1 July 2013

चन्द्रकान्ता सन्तति - देवकीनन्दन खत्री


चंद्रकांता संतति हिन्दी के शुरुआती उपन्यासों में है, जिसके लेखक बाबू देवकीनन्दन खत्री हैं। इसकी रचना 19वीं सदी के अंत में हुई थी। यह उपन्यास अत्यधिक लोकप्रिय हुआ था और कहा जाता है कि इसे पढ़ने के लिए कई लोगों ने देवनागरी सीखी थी। यह तिलिस्म और ऐय्यारी पर आधारित है और इसका नाम नायिका के नाम पर रखा गया है। चंद्रकांता संतति को एक प्रेम कथा कहा जा सकता है। इस शुद्ध लौकिक प्रेम कहानी को, दो दुश्मन राजघरानों, नौगढ़ और विजयगढ़ के बीच, प्रेम और घृणा का विरोधाभास आगे बढ़ाता है। विजयगढ़ की राजकुमारी चंद्रकांता और नौगढ़ के राजकुमार वीरेंद्र सिंह को आपस मे प्रेम है, लेकिन राजपरिवारों में दुश्मनी है। दुश्मनी का कारण है कि विजयगढ़ के महाराज नौगढ़ के राजा को अपने भाई की हत्या का ज़िम्मेदार मानते हैं। हालांकि इसका ज़िम्मेदार विजयगढ़ का महामंत्री क्रूर सिंह है, जो चंद्रकांता से शादी करने और विजयगढ़ का महाराज बनने का सपना देख रहा है। राजकुमारी चंद्रकांता और राजकुमार वीरेंद्र की प्रमुख कथा के साथ-साथ ऐयार तेजसिंह तथा ऐयारा चपला की प्रेम कहानी भी चलती रहती है। कथा का अंत नौगढ़ के राजा सुरेन्द्र सिंह के पुत्र वीरेंद्र तथा विजयगढ़ के राजा जयसिंह की पुत्री चंद्रकांता के परिणय से होता है।

मैला आंचल और परती परिकथा - फणीश्वरनाथ रेणु


परती परिकथा भारत के प्रसिद्ध साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु का प्रसिद्ध उपन्यास है। अपने एक और प्रसिद्ध उपन्यास "मैला आंचल" में रेणु ने जिन नई राजनीतिक ताकतों का उभार दिखाते हुए सत्तांध चरित्रों के नैतिक पतन का खाका खींचा था, वह प्रक्रिया 'परती परिकथा' उपन्यास में पूर्ण होती है। उपन्यास 'परती परिकथा' का नायक 'जित्तन' परती जमीन को खेती लायक बनाने के लिए कुत्सित राजनीति का अनुभव लेकर और साथ ही उसका शिकार होकर परानपुर लौटता है। परानपुर का राजनीतिक परिदृश्य राष्ट्रीय राजनीति का लघु संस्करण है। साहित्य की तकरीबन हर विधा में अपनी लेखनी का लोहा मनवाने वाले उपन्यासकार फणीश्वरनाथ रेणु समकालीन ग्रामीण भारत की आवाज़ को उठाने तथा सामाजिक स्थितियों को कथा के माध्यम से चित्रित करने के लिए पहचाने जाते हैं। 'पद्मश्री' से सम्मानित महान लेखक रेणु जी का जन्म बिहार के तत्कालीन पूर्णिया ज़िले के फारबिसगंज के निकट एक गाँव में 4 मार्च, 1921 को हुआ था। नेपाल से उन्होंने दसवीं की परीक्षा पास की थी। 'बिहार विश्वविद्यालय' के 'लक्ष्मी नारायण दुबे महाविद्यालय' के अंग्रेज़ी विभाग के अवकाश प्राप्त विभागाध्यक्ष और वरिष्ठ लेखक एस.के. प्रसून के अनुसार रेणु ने "मैला आंचल" के माध्यम से न केवल बिहार बल्कि पूरे देश के वंचितों और पिछड़ों की पीड़ा को उकेरा। रेणु ने 1942 के 'स्वतंत्रता संग्राम' में हिस्सा लिया और 1950 के क़रीब उन्होंने नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना के संघर्ष में भी हिस्सा लिया था। "काशी हिंदू विश्विविद्यालय" से शिक्षा ग्रहण करने वाले फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी "मारे गए गुलफ़ाम" पर "तीसरी कसम" नामक एक फ़िल्म भी बन चुकी है, जो ग्रामीण पृष्ठभूमि का अत्यंत बारीकी से किया गया भावनात्मक चित्रण है। फणीश्वरनाथ रेणु प्रेमचंद युग के बाद आधुनिक हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक सफल और प्रभावी लेखकों में से हैं।
कुल 36 साल की अपने लेखनी के शुरुआत में फणीश्वरनाथ रेणु कवि बनना चाहते थे और इन 36 वर्षों में उन्होंने न मात्र साहित्य की हर विधा में मिसाल कायम की वरन् राजनीति में सक्रिय भागेदारी निभायी और चुनाव भी लड़े। रेणु उस समाज की जिंदगी से कटे नहीं थे, जिसको वे काग़ज़ पर अक्षरों में रच रहे थे। यह तथ्य रेणु को अपने समकालीन लेखकों खासकर नयी कहानी के पुरोधाओं से अलग करता है। यह उन्हें उस प्रचलित आधुनिक पद्धति से भी कुछ दूरी पर खड़ा रखता है, जिसमें ज्ञान-अर्जन हेतु असम्पृक्तता पर बल दिया जाता था। रेणु का अपने अंचल की जिंदगी में इस सक्रियता का उनके शिल्प के लिये क्या मायने होगा? लोथार लुत्से ने यही सवाल उनसे पूछा और रेणु नयी कहानी के लेखकों पर बिफर उठे। नयी कहानी के लेखकों के विपरीत फणीश्वरनाथ रेणु शहर के बदले गाँव पर केंद्रित हैं, लेकिन जो रेणु को उनके समकालीन लेखकों से जोड़ता है, वह है अन्तःमन और आतंरिक पैठने की अदम्य चाह। नयी कहानी के लेखक मानवीय चरित्र के भीतर उर्ध्वाधर घुसने की जद्दोजहद में हैं तो रेणु अंचल को मानवीय चरित्र देने की फिराक में। लेकिन रेणु अपने चरित्र को मनोविज्ञानिकों के सामान सामने बैठकर अवलोकन नहीं करते, वे खुद एक पात्र हैं। इस अंचल की जिंदगी में शामिल, फ़सल बोने-काटने में हिस्सेदार। रेणु के चरित्र अपने अंचल के इतिहास को साथ लेकर चलता है, लेकिन ये पात्र जो रेणु की जिंदगी से किसी न किसी रूप में जुड़े, इस अंचल के जीते जागते लोग हुआ करते थे, कभी भी स्वयं को इस अंचल से मुक्त नहीं कर पाते हैं।
फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास 'मैला आंचल' के समान ही 'परती परिकथा' भी एक गाँव के परिवेश के परिवर्तन की कहानी है। यहाँ भी बाँध बनता है, यहाँ भी सपने आकार लेते हैं। नेहरुवादी विकासमूलक सपने। 'परती परिकथा' के अंत की ओर पाठक एक ऐसे ही जश्न से रुबरु होता है। रेणु जी के उपन्यास के गाँव और फ़िल्म 'मदर इंडिया' के गाँव में एक बड़ा फर्क है। रेणु के गाँव को उत्तर भारत में किसी दूसरे क्षेत्र में प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। यह कोशी नदी के पूरब का गाँव है, इसे कोशी के पच्छिम भी नहीं सरका सकते। 'मदर इंडिया' और 'परती परिकथा' दो रूप हैं। सन 1950 के गाँव पर नेहरुवादी आधुनिकता और औपनिवेशिकता। 'मदर इंडिया' जिसमें व्यक्ति की कल्पना को इज़ाज़त है जगह चुनने की, क्योंकि स्थानिकता के विस्तार में जगह की विशिष्टताओं को खुरचकर समतल कर दिया गया है। 'परती परिकथा' पाठक के स्थानजनित कल्पना को जगह के इर्द-गिर्द समेटने की कोशिश है। फणीश्वरनाथ रेणु के 'परती परिकथा' और "मैला आंचल" ये दोनों ही उपन्यास भारत के गाँवों के पिछड़ेपन की कहानी हैं। एक में औरत के जीवन-चरित के तौर पर, दूसरे में धरती के टुकड़े की। यह पिछड़ा टुकड़ा है पूर्णिया ज़िले का एक गाँव।
रेणु जी के उपन्यास 'मैला आंचल' पर जब तरह-तरह के आरोप लगाये जा रहे थे, आलोचना-प्रत्यालोचना का माहौल गर्म था, रेणु 'परती परिकथा' के लेखन में जुटे थे। इलाहाबाद से उपेंद्रनाथ अश्क के संपादन में 'संकेत' नामक वृहद संकलन प्रकाशित हुआ, जिसमें रेणु का रिपोर्ताज 'एकलव्य के नोट्स' छपा। 'एकलव्य के नोट्स' के कई अंश रेणु ने 'परती परिकथा' में शामिल किए। इस उपन्यास का लेखन उन्होंने पटना में शुरू किया, पर वहाँ जब रेणु के विषय में तरह-तरह की अफवाहें उड़ाई जाने लगीं, तो वे गाँव चले गए। पर गाँव में अनेक तरह की समस्याएँ और झंझट! वे वहाँ से हजारीबाग चले आए और 'परती परिकथा' के एक भाग को यहीं पर लिखा। हजारीबाग में रेणु जी कि सुसराल थी। वे यहाँ भी लम्बे समय तक नहीं रह सकते थे। उस वक्त 'राजकमल प्रकाशन' और ओमप्रकाशजी की मुख्य गतिविधियों का केंद्र इलाहाबाद था। ओमप्रकाशजी ने रेणु को इलाहाबाद में बुलवा लिया और रेणु वहाँ लूकरगंज मुहल्ले में एक मकान लेकर रहने लगे। 'परती परिकथा' का तीन चौथाई भाग वहीं लिखा गया। बाद में इलाहाबाद में भी रेणु को परेशान करने वाली शक्तियाँ ज्यादा कारगर होने लगीं, तो वे बनारस चले गए और उपन्यास वहीं पर पूरा किया।
बनारस के ही 'सन्मति मुद्रणालय' में 'परती परिकथा' का मुद्रण हुआ। सितम्बर 1957 में इसका प्रकाशन हुआ। 'राजकमल प्रकाशन' इस उपन्यास का विज्ञापन बहुत पहले से ही कर रहा था और इस कृति की प्रतीक्षा इसके प्रकाशन के पूर्व ही होने लगी थी। 'राजकमल प्रकाशन' ने दिल्ली और पटना में इसका भव्य प्रकाशनोत्सव मनाया। दिल्ली के तीन दैनिक पत्रों 'हिन्दुस्तान टाइम्स', 'हिन्दुस्तान', और 'नवभारत टाइम्स' में यह विज्ञापन छपवाया गया कि 'परती परिकथा' के लेखक श्री रेणु पुस्तक के प्रकाशन के दिन यानी 21 सितम्बर, 1957 को 2 के 5 बजे सांय तक 'राजकमल प्रकाशन' में उपस्थित रहेंगे, तथा जो पाठक इस उपन्यास को खरीदेंगे, उस पर हस्ताक्षर देंगे। पाठकों तथा लेखकों में इस प्रकार सम्पर्क स्थापित करने का यह पहला प्रयास था। अनेक पाठकों ने 'मैला आंचल' लिखकर एकाएक ख्याति पाने वाले अपने प्रिय लेखक से व्यक्तिगत परिचय प्राप्त करने के इस सुअवसर का लाभ उठाया और लेखक को भी अनेक जीवन-स्तरों से आने वाले पाठकों से मिल कर एक नया अनुभव हुआ। यही कार्यक्रम 28 सितम्बर, 1957 को 'राजकमल प्रकाशन' के पटना कार्यालय में भी दुहराया गया।
दिल्ली में 21 सितम्बर, 1957 को शाम के छह बजे वेंगर रेस्टोराँ में 'परती परिकथा' के प्रकाशनोत्सव के उपलक्ष्य में जलपान का आयोजन हुआ। इस अवसर पर हिन्दी के उदीयमान और वयोवृद्ध लेखकों तथा प्रकाशकों का जो सम्मिलन हुआ, वह अभूतपूर्व था। श्री दिनकर, बालकृष्ण शर्मा नवीन, जैनेंद्र, बनारसीदास चतुर्वेदी, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, नगेन्द्र, उदयशंकर भट्ट, बारान्निकोण, रामधन शास्त्री, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय, महावीर अधिकारी, गोपालकृष्ण कौल, लक्ष्मण राव जोशी, सुहैल, अजीमावादी, प्रयागनारायण त्रिपाठी, मन्मथनाथ गुप्त, सत्यवती मल्लिक, सावित्री देवी वर्मा, विष्णु प्रभाकर, क्षेमचंद्र सुमन, शिवदानसिंह चौहान, संतराम, नेमिचंद्र जैन, राधामुकुंद मुखर्जी, शमशेरसिंह नरूला, श्रीराम शर्मा 'राम' तथा नर्मदेश्वर आदि लेखक मौजूद थे। इस अवसर पर शिवदानसिंह चौहान ने 'परती परिकथा' पर अपना लम्बा भाषण दिया। 'परती परिकथा' पर बोलते हुए उन्होंने कहा- "यह हिन्दी का अब तक का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है, इसे सर्वश्रेष्ठ भारतीय उपन्यासों में रखा जा सकता है और पाश्चात्य साहित्य में इस बीच (यानी पिछले पाँच-सात वर्षों में) जो महत्त्वपूर्ण उपन्यास प्रकाशित हुए हैं, उनमें से किसी से भी यह टक्कर ले सकता है। यह हम सब के लिए गर्व का विषय है।' बालकृष्ण शर्मा नवीन ने कहा- "आपने निरीक्षण और स्मृति-चित्रण का अद्भुत सामर्थ्य है। भारतीय ग्राम जीवन में जो कुछ कुत्सित, द्वेषपूर्ण, संकुचित, कलहप्रिय, नीच-वृत्ति है, उसे आपने अत्यंत, अत्यंत सहानुभूतिपूर्वक व्यक्त किया है। इस निम्न वृत्ति में आप खो नहीं गए हैं। भारत के गाँवों में आपने मानवत्व को देखा है। आप निराश नहीं हैं। आप पराजयवादी नहीं हैं। आपने आशावादिता को पंक से कमलवत्, विकसित और पुष्पित किया है।... 'परती परिकथा' उपन्यास नहीं है, वह तो भारतीय जन की आत्मकथा है।' पटना में 'परती परिकथा' का प्रकाशनोत्सव 28 सितम्बर, 1957 को शाम छह बजे सिन्हा लाइब्रेरी के हॉल में मनाया गया। इसमें सैकड़ों लेखक, संपादक, प्रकाशक तथा नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति मौजूद थे। इनमें प्रमुख व्यक्तियों के नाम हैं- आचार्य शिवपूजन सहाय, रामधारी सिंह दिनकर, नलिनविलोचन शर्मा, छविनाथ पाण्डेय, नवलकिशोर गौड़, हरिमोहन झा, अनूपलाल मंडल, नर्मदेश्वर प्रसाद, बी.एन. माधव, प्रफुल्लचंद्र ओझा मुक्त, कामताप्रसाद सिंह 'काम', देवेंद्रप्रसाद सिंह, सुशीला कोइराला (बी. पी. कोइराला की पत्नी), रामदयाल पांडेय, हिमांशु श्रीवास्तव, शिवचंद्र शर्मा, सुमन वाजपेयी, रंजन सूरिदेव आदि। आचार्य शिवपूजन सहाय ने रेणु को आशीर्वाद दिया। नलिनविलोचन शर्मा ने रेणु के कृतित्व का संक्षिप्त परिचय देते हुए बधाई दी। दिनकरजी ने इस अवसर पर कहा कि- 'परती परिकथा' में लेखक ने जो ईमानदारी बरती है, उससे अधिक ईमानदारी की किसी लेखक से उम्मीद भी नहीं की जा सकती। उन्होंने बताया कि उपन्यास ने उन्हें इतना पकड़ा कि ज़रा भी फुर्सत पाने पर वे इसे पढ़ने बैठ जाते थे।
'परती परिकथा' के छपते ही संपूर्ण हिन्दी जगत में इसकी धूम मच गई। वरिष्ठ कथाकार यशपाल ने 'परती परिकथा' पढ़कर उन्हें एक लंबा पत्र लिखा-"(पुस्तक) आज दोपहर तक पूरी पढ़ डाली है। इस बीच दाँत-दर्द ने भी कुछ शिथिलता की और 'परती परिकथा' ने दाँत-दर्द सहने में सहायता दी। 'बीसियों लोगों ने प्रशंसा की होगी। जिसे नहीं रुची, उसकी समझ कुछ और ही ढंग की होगी। मुझे तो आरंभ से अंत तक इतना सुन्दर लगा कि प्रशंसा में अत्युक्ति का भय नहीं रहता। अभिव्यक्ति के लिए ध्वनियों का प्रयोग, मुहावरों के लटके और भाषा कि सरलता की क्या प्रशंसा करूँ। भाषा का चुनाव वस्तु वर्णन के बिना भी एक विशेष वातावरण और चेतना जगाए रखता है। सहज भाषा के लिए क्या कहूँ, वह आपकी अपनी भाषा और आपके रक्त और स्वभाव में रमी हुई है। जैसे भाव में से उद्धृत है! हम इस भाषा को लाख सीखें, परन्तु आपका सहज कौशल हमारी पहुँच में कैसे आयेगा? प्रयोजन को भी आपने ऐसे बैठाया है कि प्ले-बैक के जोड़ की अनुभूति या उखड़न कहीं नहीं हो पाती। शब्द और अर्थ दोनों ही ढंग का हास्य भी, पुलाव में काली मिर्च की तरह अंदाज से बिखरा हुआ है, आद्यंत चमक बनी रहती है।"
एक ओर इस कृति को हिन्दी के महानतम उपन्यास के रूप में स्वीकारा जा रहा था, तो दूसरी ओर इसकी प्रतीकूल समीक्षाएँ भी आईं। श्रीपत राय, जिन्होंने 'मैला आंचल' की बेहद प्रशंसा की थी, 'कल्पना' के फ़रवरी, 1958 के अंक में उपन्यास के मौलिक आग्रह तथा 'परती परिकथा' लेख लिखकर इसे उपन्यास तक मानने से इनकार किया। बालकृष्ण राव, शम्भुनाथ सिंह आदि ने भी श्रीपत राय की तरह ही इसकी प्रतिकूल समीक्षा की और इसे उपन्यास के शास्त्रीय निकष पर एक असफल कृति माना। यहाँ तक कि आचार्य नलिनविलोचन शर्मा ने 'साहित्य' के जनवरी, 1958 के अंक में 'परती परिकथा' को खारिज करते हुए लेख लिखा। इसी क्रम में डॉ. रामविलास शर्मा ने 1958 में ही रेणु के 'मैला आँचल' और 'परती परिकथा' पर तीखा आलोचनात्मक लेख लिखा, जो उनकी पुस्तक 'आस्था और सौंदर्य' में संकलित है। रेणु के प्रति इन आलोचकों के इस रवैये पर यशपालजी बेहद क्षुब्द हुए और उन्होंने 'नया पथ' के मार्च, 1958 के अंक में एक आक्रामक लेख लिखा- आलोचना का उल्कापात : 'परती परिकथा' की अद्भुत समीक्षाएँ।
रेणु की आन्तरिकता अंचल की भाषा में ही नहीं रुकती है वरन् वे इतिहास और भूगोल से निरंतर खेलते हैं। लेकिन गौरतलब है कि रेणु का न तो इतिहास ही आधुनिकता का इतिहास है और न ही उनका भूगोल सेक्यूलर जगहों की निर्मितियों पर आधरित है। रेणु के कथा साहित्य में इतिहास अतीत के चिन्हों के रूप में यत्र-तत्र बिखरा हुआ है, जो समकालीन से जुदा नहीं होकर उनको पहचान देता है। यह सांस्कृतिक-अतीत है अपने बहुवचन में। कोसी के साथ रेणु का सरोकार इसका एक उदहारण है। कोसी मैया भी, भगवती भी, एक उन्मुक्त किशोरी भी और सास-ननद से सताई अबला से डायन बनी सबला भी। ध्यान देने लायक यह भी रेणु का लोक जगत लेखक के लिए किसी सांस्कृतिक भण्डार के सामान नहीं है, जिसके लिए लेखक फोक लोरिस्ट के सामान शुद्धतावादी नजरिया अपनाए। रेणु के सोहर, फाग, बटगमनी, समदऊन आदि गाँधी-जवाहर से भी ताल्लुक रखते हैं। एक अजीब किस्म की रागधर्मिता है, समकालीन घटनाओं को समेटे हुए। रेणु का लेखन अनेक बहुवचनों से मिलकर बना है, जिसमें प्रांत की सांस्कृ्तिक स्मृति, सामुदायिक और सामाजिक ताने-बाने और नैतिकता सभी कुछ शामिल तो है, लेकिन इनका शामिल होना पहले से चले आ रहे साहित्यिक मान्यताओं और मानदण्डों को तोड़ता-मरोड़ता है, जैसे 'मैला-आंचल' के दूसरे ही अध्याय में हम पाते हैं– तीन आने की लबनी ताड़ी, रोक साला मोटरगाड़ी। इन बहुवचनों के बीच गाँव को स्थापित करने के लिये रेणु ने शिल्प से संबंधित बहुतेरे प्रयोग किये, जिससे अतीत की संश्लिष्टता के साथ बदलते ग्रामीण समाज की कहानी एक विशिष्ट एसथेटिक संवेदना के साथ सामने आयी और आँचलिक साहित्य की एक नयी विधा का सूत्रपात हुआ।
इसे एक ऐतिहासिक संयोग भी माना जा सकता है कि महबूब ख़ान की मशहूर सिनेमा 'मदर इंडिया' और फणीश्वरनाथ रेणु का दूसरा उपन्यास 'परती परिकथा' वर्ष 1957 में एक मास के भीतर ही प्रदर्शित हुए थे। 'मदर इंडिया' उस वर्ष सबसे पहले 25 अक्टूबर को बम्बई और कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में परदे पर आयी और 'परती परिकथा' के लिये इससे कुछ पहले 21 सितम्बर को 'राजकमल प्रकाशन' के दफ्तर दिल्ली में और 28 सितम्बर को पटना में बड़े धूम-धाम से 'प्रकाशनोत्सव' मनाया गया। देश के अख़बारों में इश्तेहार छापे गये, लेखक से मिलिये कार्यक्रम और जलपान का आयोजन भी साथ-साथ था। यह भी उल्लेखनीय है कि यह देश के स्वाधीनता की दसवीं सालगिरह भी थी। फ़िल्म 'मदर इंडिया' और 'परती परिकथा' दोनों ही भारत के ग्रामीण परिवेश के बदलाव की दास्तान हैं। 'मदर इंडिया' की कहानी फ्लैश-बैक में चलती है, जिसके घटना-क्रम में हम एक ऐसे धरातल से प्रवेश करते हैं, जो पचास के दशक के नवभारत के सपनों की धरती है। एक इच्छित भारत जहाँ आपकी आँखें ट्रैक्टरों की घरघराहट, बिजली के तारों और बाँध के पानी की आशा से चका-चौंध हैं।
'मैला आँचल' और 'परती परिकथा' स्वातंत्र्योत्तर कथा साहित्य की बहुत बड़ी उपलब्धि है। हिन्दी में अब तक इन दोनों उपन्यासों के समान विस्तृत परिदृश्य के बहुत कम उपन्यास लिखे गए। इन दोनों कथा कृतियों पर अनेक खारिज करने वाले तीखे लेख लिखे जा चुके हैं। फिर भी इनका महत्त्व आज तक बना हुआ है और अब भी ये उपन्यास प्रमुख कथा समीक्षकों के सामने नई दृष्टि से मूल्यांकन के लिए आकर्षित करते हैं। इन दोनों उपन्यासों ने हिन्दी साहित्य में 'आंचलिक उपन्यास' नामक एक नयी विधा को जन्म दिया और आंचलिकता पर उस समय से अब तक एक लंबी बहस जारी है। 'मैला आँचल' और 'परती परिकथा' धरती पुत्रों की सिर्फ़ व्यग्र कथा प्रस्तुत करने वाली कथा कृतियाँ ही नहीं हैं, न सिर्फ़ भूमि-संघर्षों को उजागर करने वाली कथा कृतियाँ। इनमें सिर्फ़ लोक-संस्कृति की रंगारंग अर्थ-छवियाँ ही नहीं हैं। इन उपन्यासों में भारत की राष्ट्रीय समस्याओं, बदलते हुए राजनीतिक, सामाजिक मूल्यों पर गहरी नजर है। ये उपन्यास आंचलिक होते हुए भी देश की वास्तविक छवि को प्रस्तुत करने वाले हैं। हिन्दी में ऐसी कथा कृतियाँ बहुत कम हैं, जो अपनी स्थानीयता या स्थानीय रंग के कारण याद तो की ही जाती हों, साथ ही जो अपनी संकेतात्मकता या मूल आशय में इतनी परिव्याप्ति भी लिए हुए हों।

पुस्तकों पर पुरस्कार


तकनीकी विकास के साथ आज कंप्यूटर युग में भी किताबों का न महत्व कम हुआ है, न सम्मान। बस फर्क है तो सिर्फ इतना नई पीढ़ी इससे अनजान और बेगानी-सी होती जा रही है। अन्य मंचों के साथ यह साहित्यकारों (और प्रकाशकों की उससे ज्यादा)  की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह इस पीढ़ी को किस तरह सृजन की दुनिया से पृथक न रह जाने दें। यह भी हकीकत है कि युवा पुस्तकों से अलग नहीं हैं बल्कि उनकी पूरी पढ़ाई-लिखाई पुस्तकों पर ही आधारित होती है, बस आभासी युग ने उन्हें साहित्य प्रवाह से प्रवाह से भटका सा दिया है। उन्हें समझाने की आवश्यकता है कि पुस्तके सबसे विश्वसनीय मित्र होती हैं। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को पुस्तकों से बड़ा प्रेम था। उनके घर में सभी प्रकार की पुस्तकें थीं। राजेंद्र बाबू रात को सोने से पहले पुस्तकें अवश्य पढ़ते थे। एक बार वे किसी कार्य से बाहर गए हुए थे। जब कई दिनों बाद घर वापस लौटे तो यह देखकर उन्हें बहुत दुख हुआ कि उनकी पुस्तकें उल्टी -सीधी पड़ी हुई हैं और कई पुस्तकों के पन्ने भी फटे हैं। वे समझ गए कि यह काम घर के बच्चों का है। उन्होंने सभी बच्चों को बुलाकर पूछा - किताबों की यह दशा किसने की है? बच्चे डांट के भय से कह गए कि उन्होंने तो किताबों को छुआ भी नहीं है और उन्हें पता नहीं कि किताबों को किसने अस्त-व्यस्त किया है। राजेंद्र बाबू बहुत बुद्धिमान थे और बच्चों के प्रति स्नेही भी। उन्होंने सच्चई का पता लगाने के लिए बच्चों से बड़े प्रेम से कहा - देखो सब लोग सच बताओ। जिसने किताबों को नुकसान पहुंचाया है उसे मैं टॉफियां खिलाऊंगा। तब सभी बच्चों ने बढ़-चढ़कर अपने द्वारा की गई शरारतें बता दीं। राजेंद्र बाबू ने उन्हें टॉफियां देते हुए समझाया कि किताबें फाड़ना अच्छा नहीं है, क्योंकि उनसे हमें ज्ञान मिलता है। वे हमारी गुरु हैं। किताबों को नुकसान पहुंचाना गुरु को अपमानित करने जैसा है। किताबों पर विभिन्न प्रकार के पुरस्कार दिये जाते हैं-


आत्माराम पुरस्कार
आत्माराम पुरस्कार 'केन्द्रीय हिन्दी संस्थान' द्वारा प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार वैज्ञानिक एवं तकनीकी साहित्य तथा उपकरण विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया जाता है। यह देश का एक प्रतिष्ठित सम्मान है। 'मानव संसाधन विकास मंत्रालय', भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान द्वारा 'आत्मराम पुरस्कार' के तहत एक लाख रुपये की राशि सम्मान स्वरूप प्रदान की जाती है।

पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार
पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार 'मानव संसाधन विकास मंत्रालय', भारत के 'केन्द्रीय हिन्दी संस्थान' द्वारा प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार एक साहित्यिक पुरस्कार है। पुरस्कार भारतीय मूल के उन हिन्दी विद्वानों को दिया जाता है, जो विदेश में हिन्दी भाषा अथवा साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान करते हैं। इस पुरस्कार की शुरुआत तमिलनाडु के हिन्दी सेवी एवं विद्वान 'मोटूरि सत्यनारायण' के नाम पर 1989 में किया गया था। यह पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति प्रदान करते हैं। प्रथम 'पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार' 2002 में कनाडा के 'हरिशंकर आदेश' को प्रदान किया गया था। पुरस्कार के तहत एक लाख रुपये की राशि नकद दी जाती है। इसके साथ ही एक स्मृतिचिह्न, प्रशस्ति-पत्र और शॉल भी दिया जाता है।

केदार सम्मान
केदार सम्मान प्रगतिशील हिंदी कविता के शीर्षस्थ कवि केदारनाथ अग्रवाल की स्मृति में केदार शोध पीठ की ओर से प्रति वर्ष दिया जाने वाला एक प्रमुख साहित्य सम्मान है। यह मुख्यत: हिन्दी कविता के लिए है, केदार शोध पीठ न्यास' बान्दा द्वारा सन् 1996 से प्रति वर्ष प्रतिष्ठित प्रगतिशील कवि केदारनाथ अग्रवाल की स्मृति में यह सम्मान ऐसी प्रतिभाओं को दिया जाता है जिन्होंने केदार की काव्यधारा को आगे बढ़ाने में अपनी रचनाशीलता द्वारा कोई अवदान दिया हो। पुरस्कार का निर्णय एक चयन तथा निर्णायक समिति द्वारा किया जाता है। प्रतिवर्ष अगस्त के महीने में आयोजित एक भव्य समारोह में यह सम्मान दिया जाता है।

शलाका सम्मान
शलाका सम्मान हिंदी अकादमी की ओर से दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है। हिन्दी जगत में सशक्त हस्ताक्षर के रूप में विख्यात तथा हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में समर्पित भाव से काम करने वाले मनीषी विद्वानों, हिन्दी के विकास तथा संवर्धन में सतत संलग्न क़लम के धनी, मानव मन के चितरों तथा मूर्धन्य साहित्यकारों के प्रति अपने आदर और सम्मान की भावना को व्यक्त करने के लिए हिन्दी अकादमी प्रतिवर्ष एक श्रेष्ठतम साहित्यकार को शलाका सम्मान से सम्मानित करती है। वर्ष 2007 तक सम्मान स्वरूप, 1,11,111/-रुपये की धनराशि, प्रशस्ति-पत्र एवं प्रतीक चिह्‌न आदि प्रदान किये जाते थे परन्तु अकादमी सम्मान व पुरस्कारों की नयी व्यवस्था के अंतरगत वर्ष 2007 सम्मान स्वरूप 2,00,000/- (दो लाख) रुपये की धनराशि, प्रशस्ति-पत्र एवं प्रतीक चिह्‌न आदि प्रदान किये जाते हैं।

गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार
गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार हिन्दी पत्रकारिता तथा रचनात्मक साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए दिया जाता है। यह पुरस्कार केंद्रीय हिन्दी संस्थान आगरा द्वारा दिया जाता है। इस पुरस्कार प्राप्त विद्वानों को राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया जाता है। विजेताओं को एक-एक लाख रुपए, एक शॉल और प्रशस्तिपत्र प्रदान किया जाता है। केंद्रीय हिन्दी संस्थान आगरा ने वर्ष 1989 में 'हिन्दी सेवी सम्मान योजना' की शुरुआत की थी।

सरस्वती सम्मान
सरस्वती सम्मान एक साहित्य पुरस्कार है। के.के बिड़ला फाउंडेशन द्वारा 1991 में सरस्वती सम्मान की शुरुआत की गई थी, जिसके तहत भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं के भारतीय लेखकों की पिछले 10 सालों में प्रकाशित साहित्यिक कृति को पुरस्कृत किया जाता है। इसके तहत सात लाख पचास हज़ार रुपये नकद, प्रशस्ति पत्र और पट्टिका प्रदान की जाती है। पहला सरस्वती सम्मान 1991 में हिन्दी के कालजयी कवि डॉ. हरिवंश राय बच्चन को उनकी चार भागों में प्रकाशित आत्मकथा को दिया गया।

राज्य स्तरीय शिखर सम्मान
राज्य स्तरीय शिखर सम्मान मध्य प्रदेश द्वारा प्रदान किया जाता है। मध्य प्रदेश में साहित्य और विभिन्न कलाओं के क्षेत्र में जो सृजन कार्य हो रहा है, उसके समुचित सम्मान की आवश्यकता असंदिग्ध है। राज्य शासन ने समग्र योगदान के आधार पर साहित्य, प्रदर्शनकारी कलाओं और रूपंकर कलाओं में एक-एक राज्यस्तरीय शिखर सम्मान स्थापित किया है। प्रत्येक सम्मान की राशि 31,000 रुपए है। शिखर सम्मान केवल मध्य प्रदेश के कलाकारों और साहित्यकारों को ही प्रदान किया जाता है। मध्य प्रदेश के साहित्यकार और कलाकार से अभिप्राय प्रदेश के स्थायी निवासी की वैधानिक अर्हताओं के अलावा उन व्यक्तियों से भी है, जिन्होंने प्रदेश में कला की सुदीर्घ साधना की है और जिन्होंने प्रदेश में ही अपना निवास बना लिया है और यहीं उनकी कर्मभूमि है।

साहित्यकार सम्मान
साहित्यकार सम्मान हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में समग्र योगदान तथा विशिष्ट सेवा और राष्ट्र भाषा प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रहे उत्कृष्ट साहित्यकारों, पत्रकारों आदि को प्रदान किया जाता है। हिन्दी अकादमी, दिल्ली का यह प्रयास रहा है कि वह ऐसे साहित्य कर्मियों की रचना धर्मिता, सृजनशीलता, मूल्य-चेतना और सामाजिक सांस्कृतिक एवं नैतिक दृष्टि से समृद्व साहित्य द्वारा की गई सेवाओं का सम्मान कर सके जिन्होंने आनन्द और ज्ञान के श्रोत को निरन्तरता प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चूंकि साहित्यकार, समाज और साहित्य को समर्पित जीवनयापन करते हैं। इसके लिए अकादमी का दायित्व बनता है कि उनकी सेवाओं का सही अर्थों में सम्मान करते हुए उन्हें समाज में सर्वोच्च स्थान प्रदान करे। इस सम्मान के लिए चुने हुए विद्वानों, साहित्यकारों, पत्रकारों को सम्मान स्वरूप 21,000/-रुपये की धनराशि, प्रशस्ति-पत्र एवं प्रतीक चिह्न आदि प्रदान किये जाते हैं।

साहित्यिक कृति सम्मान
साहित्यिक कृति सम्मान हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा दिया जाने वाला एक सम्मान है। इसके तहत लेखक अपनी लेखनी के माध्यम से साहित्य द्वारा समाज के लिए एक शाश्वत सामग्री जुटाता है। जिसके पठन-पाठन से मनुष्य अतीत की जानकारी के साथ-साथ अपने वर्तमान व भविष्य को सुखद, समृद्धशाली एवं प्रगतिशील बनाने की दिशा में अग्रसर होता है। समाज के उत्थान व राष्ट्र और विश्व की प्रगति के उद्‌देश्य से लिखी गयी ऐसी साहित्यिक कृतियों को अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया जाता है। समाज चेता सृजनधर्मी लेखकों और साहित्यकारों का सम्मान कर समाज में उनकी और उनके कृतित्व की पहचान कराना अकादमी अपना परम कर्त्तव्य समझती है। इसी आशय से प्रतिवर्ष रचनात्मक एवं उद्देश्यपूर्ण साहित्य सृजन के लिए विभिन्न विधाओं की पुस्तकों को पुरस्कृत करने के लिए चुना जाता है। विगत कुछ वर्षों से अकादमी ने साहित्यिक विधाओं के अतिरिक्त भारतीय वाङ्‌मय से राष्ट्र-चेतना एवं संस्कृति के पुनर्जागरण में सशक्त लेखन के साथ-साथ महत्त्वपूर्ण योगदान कर रहे लेखकों को भी सम्मानित करके इस दिशा में एक ठोस क़दम उठाया है। इस योजना के अन्तर्गत 'विशिष्ट कृति सम्मान एवं साहित्यिक कृति सम्मान' और 'बाल एवं किशोर साहित्य कृति सम्मान' दिया जाता है।

सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार
सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार भारत के प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है। यह एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक सम्मान है, जो हिन्दी साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिये 'केन्द्रीय हिन्दी संस्थान' द्वारा प्रदान किया जाता है। यह हिन्दी सेवी सम्मान है, जो कई हिन्दी विशेषज्ञों को उनके हिन्दी के प्रचार-प्रसार में विशिष्ट योगदान के लिये दिया जाता है। इस पुरस्कार के तहत एक लाख रुपये की राशि सम्मान स्वरूप प्रदान की जाती है।

राष्ट्रीय इक़बाल सम्मान
राष्टीय इक़बाल सम्मान साहित्य और कलाओं के क्षेत्र में उत्कृष्टता और सृजनात्मकता को सम्मानित करने की अपनी परम्परा के अनुसार मध्य प्रदेश शासन द्वारा प्रदान किया जाता है। मध्य प्रदेश शासन ने वर्ष 1986-87 में, उर्दू साहित्य में रचनात्मक लेखन के लिए 'इक़बाल सम्मान' स्थापित किया है। इस सम्मान में एक लाख रुपये की राशि और साथ ही प्रशस्ति पट्टिका भी प्रदान की जाती है। पुरस्कार उर्दू के सुप्रसिद्ध कवि अल्लामा इक़बाल के नाम पर दिया जाता है, जिन्होंने 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक चार दशकों में उर्दू कविता को नये आयाम पदान किये थे। देश के अधिकतम भागों के साथ-साथ विदेश में भी अल्लामा इक़बाल को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

राष्ट्रीय कबीर सम्मान
मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग ने साहित्य और सृजनात्मक कलाओं में उत्कृष्टता तथा श्रेष्ठता को सम्मानित करने, साहित्य और कलाओं में राष्ट्रीय मानदण्ड विकसित करने के लिए 'अखिल भारतीय सम्मानों' और राज्य स्तरीय सम्मानों की स्थापना की है। उत्कृष्टता और सृजन को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित करने के लिए मध्यप्रदेश शासन ने भारतीय कविता के लिए राष्ट्रीय कबीर सम्मान की स्थापना की है। महान संत कवि कबीर ने सदियों पहले रचनाएँ की और समाज को नयी निर्भीकता दी थ। भारत में वे आज भी सबसे लोकप्रिय कवि हैं।

राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान
मध्य प्रदेश शासन द्वारा साहित्य और कलाओं को प्रोत्साहन देने के लिए अनेक राष्ट्रीय और राज्य स्तर के सम्मानों की स्थापना की गयी है। हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में 'वार्षिक सम्मान' का नाम खड़ी बोली के शीर्ष कवि श्री मैथिलीशरण गुप्त की स्मृति में रखा गया है। यह सम्मान वर्ष 1987-88 से प्रारम्भ किया गया। इस सम्मान के अन्तर्गत एक लाख रुपये की राशि तथा प्रशस्ति पट्टिका भेंट की जाती है।

राष्ट्रीय शरद जोशी सम्मान
राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट सृजन को सम्मानित करने की अपनी परम्परा का अनुसरण करते हुए मध्य प्रदेश शासन ने हिन्दी भाषा के व्यंग्य, ललित निबन्ध, संस्मरण, रिपोर्ताज, डायरी, पत्र इत्यादि विधाओं में रचनात्मक लेखन के लिए राष्ट्रीय शरद जोशी सम्मान स्थापित किया है। शरद जोशी मध्यप्रदेश के निवासी थे। उन्हें उनकी सशक्त और विपुल व्यंग्य रचनाओं ने साहित्य के राष्ट्रीय परिदृश्य पर प्रतिष्ठित किया। शरद जोशी ने व्यंग्य को नया कलेवर और वैविध्य दिया और समय की विसंगति और विडम्बना को अपनी प्रखर लेखनी से उजागर करते हुए समाज को दृष्टि और दिशा प्रदान करने के लिए सामाजिक रूप से उपयोगी रचनाओं को सृजित किया। उनकी व्यंग्य रचनाओं ने हिन्दी साहित्य की समृद्धि में अपना सुनिश्चित योगदान दिया है।

नवोदित लेखक पुरस्कार
नवोदित लेखक पुरस्कार हिन्दी अकादमी द्वारा प्रदत्त एक पुरस्कार है जो सदैव युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने के लिए दिया जाता है और वास्तव में हिन्दी साहित्य को इनसे बड़ी आशाएं हैं जो स्थापित साहित्यकार हैं, प्रतिभा के धनी हैं और जिन्होंने हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। उनका सम्मान तो सर्वत्र होता ही है और होना भी चाहिए। परन्तु ऐसे साहित्यिक वट वृक्षों की छाया में पनप रही नयी पौध को भी प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। अकादमी प्रतिभाशाली युवा लेखकों और कवियों को उनके समुचित साहित्यिक विकास के लिए प्रोत्साहन देने के उद्धेच्च्य से 'नवोदित लेखक पुरस्कार प्रतियोगिता' के अन्तर्गत करती है। अकादमी द्वारा यह प्रतियोगिता दो आयु वर्गो में आयोजित की जाती है। प्रथम वर्ग 18 वर्ष से 24 वर्ष तक तथा द्वितीय वर्ग 25 वर्ष से 30 वर्ष तक के युवा लेखकों के कहानी, कविता, एकांकी व लेख आदि की चुनी हुई श्रेष्ठ रचनाओं के लिए यह पुरस्कार दिया जाता है। पुरस्कार राशि प्रथम 3,100/-, द्वितीय 2,500/-, तृतीय 2,000/- तथा प्रोत्साहन 1,100/- रुपये।

डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन पुरस्कार
डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन पुरस्कार प्रदान करने का शुभारम्भ 1994 से किया गया था। यह पुरस्कार 'केन्द्रीय हिन्दी संस्थान' द्वारा दिया जाता है। पुरस्कार प्राय: किसी जाने-माने विदेशी व्यक्ति को उसकी उल्लेखनीय हिन्दी सेवाओं के लिए प्रदान किया जाता है।

वो भला क्या जाने किताबों का दर्द


      जयप्रकाश त्रिपाठी

      यह कहानी फणीश्वरनाथ रेणु के लोकप्रिय उपन्यास 'परती परिकथा' की है। ठीक-ठीक याद नहीं आता है। उन दिनो 'रेणु' की रचनाएं पढ़ने का नशा-सा हो गया था। अग्निखोर, ऋणजल-धनजल, एक आदिम रात्रि की महक, ठुमरी, दीर्घतपा, नेपाली क्रांतिकथा, पंचलाइट, पलटू बाबू रोड, मारे गये गुलफाम, लाल पान की बेगम, वनतुलसी की गंध, संवदिया आदि। कुछ को पाठ्यक्रम की पुस्तकों से तो कुछ को इधर-उधर से जोड़-जुटाकर, खरीद-बीन कर।
     किताबें खरीदने के लिए मैं पहले हिंदी के प्रसिद्ध कम से कम आठ दस प्रकाशकों राजकमल, वाणी, किताब घर आदि से पुस्तक सूची मंगा लेता था। फिर उनमें से अपनी तलब की किताबों की सूची बनायी और पहुंच जाता वाराणसी के विश्वविद्यालय प्रकाशन संस्थान। उस दिन ढेर सारी किताबें खरीद लेने के बाद जेब में हाथ डाला तो एक किताब का भुगतान कम पड़ गया। उस समय परती परिकथा पेपर बैक में सिर्फ एक ही बची थी। पहले से पता था कि इस समय वह आउट आफ प्रिंट चल रही है। पता नहीं कब दोबारा छपे, इसलिए इस बार इस किताब को तो किसी कीमत पर छोड़ना नहीं था। मैंने पहले तो प्रकाशन संस्थान के मालिक से अनुनय-विनय किया कि प्रायः आता रहता हूं, इस पुस्तक की कीमत अगली बार चुका दूंगा। उसका टके से जवाब रहा- यह पान की दुकान नहीं है। मैं भी तैश खा गया। झट जेब में पड़ा रेल किराया निकाला, भुगतान किया और परती परिकथा को अन्य किताबों के साथ थैले में डाल कर पैदल रेलवे स्टेशन चल पड़ा। ट्रेन दो नंबर प्लेट फार्म पर खड़ी थी। अंदर सीट पर बैठने की बजाय सीधे बाथ रूम में घुसा और अंदर से कुंडी लगा ली। ट्रेन चल पड़ी। खुद पर कोफ्त हो रहा था और बेटिकट होने का डर भी। मन में जाने कैसे-कैसे खयाल आने-जाने लगे। डर बढ़ता गया, बढ़ता ही गया। कई यात्री भाई बाहर से दो चार बार दरवाजा पीटते, लौट जाते। मैं अंदर मन पर घना कुहासा बिछते ही कविताएं लिखने में डूब गया।

एक साल बाद

       एक अधमित्र वही परती परिकथा मुझसे पढ़ने के लिए ले गये। एक माह, दो माह, तीन माह...छह माह हो गये तो रहा नहीं गया। उस पुस्तक के साथ मेरे जीवन का वह दुखद-सुखद दिन जो जुड़ा हुआ था। मित्र के ड्राइंग रूम में   एक कोने पर नजर गयी। आधे कवर पेज पर अधखाया नमक-मिर्च चुपड़ा पड़ा था, जाने कब का। आधा गायब था। मुंह से बोल नहीं फूट पा रहे थे। रुआंसा-सा कुछ देर मित्र की थोथी गप्पें सुनता रहा और मन मसोस कर घर लौट गया। वह क्या जाने किताबों का दर्द।    


विश्व प्रसिद्ध पुस्तक गुलिवर्स ट्रेवल्स



गुलिवर्स ट्रेवल्स एक एंग्लो-आयरिश लेखक और पादरी जोनाथन स्विफ्ट के द्वारा लिखा गया एक उपन्यास है. यह मानव के स्वभाव पर तो व्यंग्य करता ही है, साथ ही अपने आप में "यात्रियों की कहानियों" की एक उप-साहित्यिक शैली की पैरोडी भी है. ये स्विफ्ट का जाना माना, काफी लंबा कार्य है, और अंग्रेजी साहित्य का एक क्लासिक उपन्यास है. यह किताब प्रकाशित किये जाने के तुरंत बाद काफी लोकप्रिय हो गयी, (जॉन गे ने 1726 में स्विफ्ट को लिखे एक पत्र में कहा कि "इसे सार्वभौमिक रूप से केबिनेट काउन्सिल से लेकर नर्सरी तक हर कोई पढ़ रहा है"; तब से, इसकी छपाई का काम कभी भी नहीं रुका. किताब अपने आप को एक अकुशल शीर्षक ट्रेवल्स इनटू सेवरल रिमोट नेशन्स ऑफ़ द वर्ल्ड के साथ, साधारण यात्री के विवरणात्मक वर्णन के रूप में प्रस्तुत करती है, इसकी लेखकारिता की पहचान केवल "लेम्यूल गुलिवर को दी गयी है, जो पहले एक सर्जन हैं और फिर कई जहाज़ों के कप्तान हैं." पाठ्य को काल्पनिक लेखक के द्वारा एक प्रथम-पुरुष के रूप में प्रस्तुत किया गया है, और नाम "गुलिवर" शीर्षक पृष्ठ के अलावा पूरी किताब में कहीं नहीं मिलता है. पाठ के तमाम प्रकाशन एक काल्पनिक पत्र से शुरू होते हैं. जिसका शीर्षक है "द पब्लिशर टू द रीडर" और "अ लेटर फ्रॉम केप्टन गुलिवर टू हिस कज़िन सिम्पसन" जो इस तथ्य को प्रस्तुत करता है कि मूल खाते में संपादन किया गया है और इसे लेम्यूल गुलिवर की अनुमति के बिना प्रकाशित किया गया है. तैयार पुस्तक को इसके बाद, चार भागों में विभाजित किया गया है.
अ वोयाज टू लिलिपुट
गुलिवर का वर्णन करने वाले भित्ति चित्र जो लिलिपुट के नागरिकों से घिरे हैं. 4 मई 1699 - 13 अप्रैल 1702 पुस्तक की शुरुआत एक बहुत ही छोटी प्रस्तावना के साथ होती है जिसमें गुलिवर, तत्कालीन पुस्तकों की शैली में, अपने जीवन की संक्षिप्त रुपरेखा देते हैं और अपनी यात्राओं से पहले के इतिहास को बताते हैं. उन्हें यात्रा में बहुत मजा आता है, हालांकि यात्राओं को पसंद करने के कारण ही उनका पतन होता है. अपनी पहली यात्रा में, गुलिवर एक जहाज के साथ डूब जाते हैं, और जब उन्हें होश आता है तो वे अपने आप को एक कैद में पाते हैं. जिन लोगों ने उन्हें बंधक बनाया है उनका आकार सामान्य मानव के आकार से बारह गुना कम है, उनकी उंचाई 6 इंच (15 सेंटीमीटर) से भी कम है, वे पडौसी और विरोधी देशों लिलिपुट और ब्लेफुस्कू के निवासी हैं. अच्छे व्यवहार का आश्वासन देने के बाद उन्हें लिलिपुट में रहने की जगह दे दी जाती है और वे दरबार के पसंदीदा बन जाते हैं. यहीं से, पुस्तक में गुलिवर के द्वारा लिलिपुट की दरबार का प्रेक्षण शुरू हो जाता है. गुलिवर लिलिपुट के लोगों की, उनके पडौसी ब्लेफुस्कू के बेड़े को चुराने में मदद करता है. जिससे लिलिपुट के लोग ब्लेफुस्कू के लोगों पर कब्जा कर लेते हैं. हालांकि, वह इस देश को लिलिपुट के प्रान्त में मिलाने से इनकार कर देता है, यह बात राजा और दरबार को पसंद नहीं आती. गुलिवर पर राजद्रोह का आरोप लगाया जाता है और उसे अंधा बना देने की सजा सुनाई जाती है. एक दयालु मित्र की मदद से, गुलिवर बच कर ब्लेफुस्कू चला जाता है, जहां उसे एक परित्यक्त नाव मिलती है, इस नाव पर सवार होकर किसी तरह वह एक गुजरते हुए जहाज तक पहुंच जाता है जो उसे सुरक्षित रूप से उसके घर पंहुचा देता है. लिलिपुट में रहने के लिए गुलिवर को जो इमारत दी गयी, वह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस खंड में वे इसका वर्णन एक मंदिर के रूप में करते हैं, जिसमें कुछ साल पहले एक हत्या हुई थी, और इसलिए इस इमारत को छोड़ दिया गया था.
अ वोयाज टू ब्रोब्डिंगनाग
जब आगे बढ़ता हुआ जहाज एडवेंचर तूफ़ान के कारण अपने रास्ते से भटक जाता है और ताज़े पानी की खोज में इसे मजबूरन भूमि की तरफ जाना पड़ता है. तभी गुलिवर के साथी गुलिवर को छोड़ देते हैं, अब वह एक किसान को मिलता है जो 72-फुट (22 मी.) लंबा है (लिलिपुट का पैमाना लगभग 1:12 है, ब्रोब्डिंगनाग का पैमाना 12:1 है, गुलिवर को लगता है कि यह मनुष्य की ही एक प्रजाति है 10-yard (9.1 मी.)) वह गुलिवर को अपने घर ले आता है और उसकी बेटी गुलिवर का ध्यान रखती है. किसान उसके साथ जिज्ञासापूर्ण व्यवहार करता है और उसे धन देता है. यह बात फ़ैल जाती है और ब्रोब्डिंगनाग की रानी उसे देखना चाहती है. गुलिवर को पसंद करने लगती है और उसे खरीद कर अपने दरबार में एक पसंदीदा दरबारी के रूप में रख लेती है. चूंकि गुलिवर का आकार बहुत छोटा है, उसके लिए कुर्सियां, बिस्तर, चाकू, कांटे आदि बहुत बड़े आकार के होते हैं, रानी गुलिवर के लिए एक छोटा घर बनाने का आदेश देती है ताकि वह उसमें रह सके. इस बॉक्स को उसके यात्रा बॉक्स के रूप में संदर्भित किया जाता है.इसी बीच वह छोटे छोटे रोमांचक कार्यों का प्रदर्शन करता है जैसे विशालकाय भिड़ से लड़ना और एक बन्दर के द्वारा छत पर पहुंचना. वह राजा के साथ यूरोप की स्थिति के बारे में चर्चा करता है. गुलिवर के द्वारा किये गए यूरोप के इस विवरण से राजा प्रभावित नहीं होता है, विशेष रूप से बंदूकों और तोपों के उपयोग की शिक्षा से. समुंदर की एक यात्रा में, उसका "यात्रा बॉक्स" एक विशाल चील के द्वारा पकड़ लिया जाता है. यह चील गुलिवर और उसके बॉक्स को समुन्दर के बीचों बीच छोड़ देती है, जहां उसे कुछ नाविक पकड़ लेते हैं और इंग्लैण्ड पहुंचा देते हैं.
अ वोयाज टू लापुटा, बाल्निबारबी, लग्नाग, ग्लबडब्डरिब, एंड जापान
जब गुलिवर के जहाज पर समुद्री डाकुओं के द्वारा हमला किया गया, वह भारत के पास, एक उजाड़ चट्टानी द्वीप के पास अकेला छूट गया. सौभाग्य से लापुटा के एक उड़ान द्वीप के द्वारा उसे बचा लिया गया, लापुटा एक ऐसा साम्राज्य था, जो गणित और संगीत की कलाओं के प्रति समर्पित था परन्तु व्यावहारिक रूप से इन कलाओं का उपयोग नहीं कर पाया. विद्रोही शहर पर चट्टानें फेंकने की लापुटा की विधि भी यहीं से शुरू हुई, इस हवाई बमबारी को युद्ध की एक विधि के रूप में अपनाया गया. हालांकि यहां पर, वह एक कम रैंकिंग के दरबारी के अतिथि के रूप में देश का दौरा करता है और पाता है कि व्यावहारिक परिणामों की परवाह किये बिना विज्ञान के अंधाधुंध प्रयोग किये जा रहें हैं जो बर्बादी का कारण बन रहें हैं और शाही समाज और इसके प्रयोगों पर व्यंग्य हैं. अब गुलिवर को एक डच व्यापारी का इंतज़ार करने के लिए बालनीबार्बी लाया जाता है, यह व्यापारी उसे जापान ले जा सकता है. इस इंतज़ार के दौरान, गुलिवर ग्लबडबरिब के द्वीप पर छोटी से यात्रा कर लेता है, यहां वह एक जादूगर के यहां जाता है और ऐतिहासिक लोगों के भूतों के बारे में चर्चा करता है, यह पुस्तक में "प्राचीन बनाम आधुनिक" का सबसे स्पष्ट विवरण है. लग्नाग में वह उसकी मुठभेड़ स्टरलडब्रग से होती है, जो दुर्भाग्यपूर्ण रूप से अमर हैं, लेकिन हमेशा जवान नहीं रहते. इसके बजाय वे हमेशा बूढ़े बने रहते हैं. उनमें बूढी आयु की सभी अक्षमताएं भी होती हैं, और क़ानूनी तौर पर उन्हें 80 वर्ष की उम्र में मृत मान लिया जाता है. जापान पहुंचने के बाद, गुलिवर सम्राट से अनुमति मांगता है कि "मेरे देशवासियों को सूली पर लटका कर ख़त्म कर दिए जाने और फिर समारोह मनाने की प्रक्रिया को रोक दिया जाये", सम्राट इस बात की अनुमति दे देता है. गुलिवर अपने घर लौट आता है और अब वह फैसला लेता है कि अपना बाकी जीवन यहीं पर बिताएगा.
अ वोयाज टू द कंट्री ऑफ़ द होऊइहन्म्स
अपने घर में रहने का इरादा कर लेने के बावजूद, गुलिवर एक व्यापारिक कप्तान के रूप में फिर से समुद्र में लौट आता है, क्योंकि कि वह सर्जन के रूप में काम करते करते ऊब गया है. इस यात्रा के दौरान उस पर अपने चालक दल में कुछ बदलाव करने का दबाव डाला जाता है, लेकिन उसे ऐसा लगता है कि इन बदलावों से चालक दल के बाकी लोग उसके खिलाफ हो जायेंगे. अब समुद्री डाकुओं का विद्रोह शुरू हो जाता है और ये डाकू कुछ समय के लिए उसे अपने साथ रखते हैं, और फिर उसे पहले शांत भूमि क्षेत्र में छोड़ देते हैं. खुद डाकू बने रहते हैं. उसे एक लैंडिंग नाव में छोड़ दिया जाता है और अब उसे कुछ विकृत प्राणी मिलते हैं (जाहिर तौर पर) जिनसे उसे घृणा सी हो जाती है.  इसके कुछ ही समय बाद उसे एक घोडा मिलता है और उसे समझ में आता है कि घोड़े (उनकी भाषा में होऊइहन्म्स या "प्रकृति का पूर्ण रूप) शासक हैं और विकृत प्राणी ("याहू") आधार रूप में मनुष्य हैं. गुलिवर घोड़े के घर का सदस्य बन जाता है, और होऊइहन्म्स की प्रशंसा करता है, उनकी जीवन शैली का अनुकरण करने लगता है, याहू के रूप में मनुष्यों को अस्वीकार करता है, क्योंकि उन सबमें कुछ ऐसी प्रवृति है जिसके कारण उनके स्वाभाविक दोषों को और बढ़ावा मिलता है. हालांकि, एक सभा में निर्णय लिया जाता है कि गुलिवर में याहू के जैसी कुछ झलक है, वह उनकी सभ्यता के लिए ख़तरा है और उसे निष्कासित कर दिया जाता है. अब उसकी इच्छा के विरुद्ध एक पुर्तगाली जहाज के द्वारा उसे बचाया जाता है, और उसे यह देख कर हैरानी होती है कि इस जहाज का कप्तान पेड्रो डे मेंडेज़ एक याहू है और वह एक बुद्धिमान, सभ्य और उदार व्यक्ति है. वह इंग्लैंड में अपने घर लौट आता है, लेकिन वह अपने आप को याहू के बीच रहने में असमर्थ पाता है और वैरागी बन जाता है, अपने घर में रहते हुए भी वह अपने परिवार और अपनी पत्नी से बचने लगता है और एक दिन के कई घंटे अपने अस्तबल में घोड़ों से बात कर बिताने लगता है. यह अनिश्चित है कि स्विफ्ट ने कब गुलिवर्स ट्रेवल्स को लिखना शुरू किया, लेकिन कुछ सूत्रों के अनुसार इसकी शुरुआत 1713 में हुई जब स्विफ्ट, गे, पोप, आरबुथनोट और कुछ अन्य लोगों ने, तत्कालीन लोकप्रिय साहित्यिक गठनों पर व्यंग्य करने के लिए स्क्रिबलेरस क्लब बनाया. स्विफ्ट का सिद्धांत क्लब के काल्पनिक लेखक, मार्टिनस स्क्रिबलेरस की यादों के लेखन से प्रेरित है. स्विफ्ट के पत्राचार से यह पता चलता है कि इसकी रचना ठीक तरह से 1720 में शुरू हुई, जिसके दर्पण-विषयक भाग I और II को सबसे पहले लिखा गया, इसके बाद 1723 में भाग IV और 1724 में भाग III लिखा गया, परन्तु इसमें उस समय भी संशोधन किये गये जब स्विफ्ट ड्रेपियर्स लेटर्स लिख रहे थे.अगस्त 1725 तक पुस्तक पूरी हो गयी थी, और चूंकि गुलिवर्स ट्रेवल्स पारदर्शी रूप से व्हिग-के प्रतिकूल व्यंग्य थी, इस बात की संभावना है कि स्विफ्ट ने पाण्डुलिपि का उपयोग किया, ताकि उनकी लेखनी को एक प्रमाण के रूप में काम में ना लिया जा सके यदि कोई उनके विरुद्ध क़ानूनी कार्रवाई करता है. (जैसा कि उनके कुछ आयरिश पर्चों के मामलों में हुआ था). मार्च 1726 में स्विफ्ट अपने काम के प्रकाशन के लिए लन्दन गए; उनकी पाण्डुलिपि को गुप्त रूप से प्रकाशक बेंजामिन मोट्टे को दिया गया, जिन्होंने तेजी से उत्पादन करने के लिए और पाइरेसी को रोकने के लिए पांच प्रिंटिंग हाउस काम में लिए.[2] मोट्टे को लगता था कि इसकी बिक्री सबसे ज्यादा होगी (बेस्ट सेलर), लेकिन उन्हें डर था कि इसके विरुद्ध क़ानूनी कार्रवाई की जा सकती है, इसलिए उन्होंने सबसे बुरे हमलावर तथ्यों को काट दिया (जैसे लिलिपुट में दरबार के प्रतियोगियों का विवरण और लिंडालीनो का विद्रोह), और पुस्तक II में रानी एने के पक्ष में कुछ सामग्री को जोड़ा, और किसी तरह से इसका प्रकाशन किया. पहले संस्करण को दो खण्डों में 26 अक्टूबर 1726 को रिलीज़ किया गया, जिसकी कीमत 8s. 6d. थी. इस पुस्तक ने सनसनी मचा दी और इसके पहले हिस्से को एक सप्ताह से भी कम समय में बेच दिया गया. मोट्टे ने गुमनाम रहते हुए गुलिवर्स ट्रेवल्स का प्रकाशन किया, इसके बाद अगले कुछ सालों में कई अनुवर्तियों (मेमोइर्स ऑफ़ द कोर्ट ऑफ़ लिलिपुट ), पेरोडियों, (टू लिलीपुटीयन ओडीज़, द फर्स्ट ओन द फेमस इंजन विथ विच केप्टिन गुलिवर एक्सटिंगविश्ड द पेलेस फायर ) और "कीस" (गुलिवर देसिफर'द और लेम्यूल गुलिवर्स ट्रेवल्स इनटू सेवरल रिमोट रीजन्स ऑफ़ द वर्ल्ड कम्पेंदीयसली मेथादिज़'द , दूसरी को एडमड कर्ल के द्वारा इसी तरह से 1705 में स्विफ्ट की टेल ऑफ़ अ टब के लिए एक "की" के रूप में लिखा गया) का उत्पादन किया गया. इनमें से अधिकांश को गुमनाम रूप में (कभी कभी गलत नाम के साथ) प्रकाशित किया गया था और जल्दी ही भुला दिया गया. स्विफ्ट ने इनमें से किसी को भी अपनी पुस्तक में शामिल नहीं किया, और उन्होंने विशेष रूप से 1735 के फाल्कनर के संस्करण में इन्हें शामिल करने से इनकार कर दिया. हालांकि, स्विफ्ट के मित्र अलेक्जेंडर पोप ने गुलिवर्स ट्रेवल्स पर पांच संस्करणों का एक समुच्चय लिखा, जिसे स्विफ्ट ने इतना पसंद किया कि उन्होंने इन्हें पुस्तक के दूसरे संस्करण में शामिल कर लिया, हालांकि उन्हें वर्तमान में आमतौर पर शामिल नहीं किया जाता है. 1735 में एक आयरिश प्रकाशक जॉर्ज फाल्कनर ने, अब तक किये गए स्विफ्ट के काम के पूरे सेट का मुद्रण किया, जिसका खंड III गुलिवर्स ट्रेवल्स था. जैसा कि फाल्कनर के "एडवरटाइसमेन्ट टू द रीडर" में प्रकट होता है, फाल्कनर को मोट्टे के काम की एक व्याख्यात्मक प्रतिलिपि "लेखक के एक मित्र" के माध्यम से उपलब्ध हो गयी थी (ऐसा मन जाता है कि वे स्विफ्ट के मित्र चार्ल्स फोर्ड थे) जिसने हस्तलिपि के अधिकांश हिस्से को मोट्टे के संशोधनों से मुक्त रखा, मूल हस्तलिपि को नष्ट कर दिया गया. ऐसा भी माना जाता है कि स्विफ्ट ने मुद्रण से पहले कम से कम फाल्कनर के संस्करण के प्रमाण की समीक्षा तो की ही थी, लेकिन यह प्रमाणित नहीं किया जा सकता. सामान्यतया, इसे गुलिवर्स ट्रेवल्स के एडिटियो प्रिन्सेप्स के रूप में जाना जाता है, जिसमें एक अपवाद है,
इस संस्करण में एक हिस्से को स्विफ्ट के द्वारा शामिल किया गया, अ लेटर फ्रॉम केप्टिन गुलिवर टू हिस कजिन सिम्पसन . इसमें मूल पाठ्य में मोट्टे के द्वारा परिवर्तन करने की शिकायत की गयी, इसमें कहा गया कि उन्होंने इसे इतना ज्यादा बदल दिया है कि "मुझे यह मेरा काम ही नहीं लग रहा है" और बीच के वर्षों में प्रस्तुत किये गए मोट्टे के सभी परिवर्तन, कीस, गलत कथन, पैरोडी, दूसरा हिस्सा और इसके आगे किये गए काम को नकार दिया गया. लापुटा के उड़ान द्वीप के खिलाफ लिंडालीनो के सतही शहर के विद्रोह को बताने वाला, भाग III का छोटा एपिसोड (पांच पैराग्राफ से युक्त), ड्रेपियर्स लेटर्स के लिए स्पष्ट रूप से अन्योक्तिपरक था, जिस पर स्विफ्ट को गर्व था. लिंडालीनो ने डबलिन का प्रतिनिधित्व किया और लापुटा के अध्यारोपण ने विलियम वुड की बुरी गुणवत्ता की ताम्बे की मुद्रा के ब्रिटिश अध्यारोपण का प्रतिनिधित्व किया. फाल्कनर ने इस पद्य को हटा दिया, ऐसा या तो इसलिए किया गया कि एक ब्रिटिश विरोधी व्यंग्य का एक आयरिश प्रकाशक के द्वारा मुद्रण किये जाने के कारण राजनैतिक संवेदनशीलता की स्थिति उत्पन्न हुई. या संभवतया इसका कारण यह था कि जिस पाठ्य से उन्होंने काम किया था, उसमें इस पद्य को शामिल नहीं किया गया था.1899 में इस पद्य को संग्रहित कार्यों के एक नए संस्करण में शामिल किया गया. (विकीपीडिया से साभार)

यशोधरा जीत गई


हिन्दी के प्रख्यात् साहित्यकार रांगेय राघव ने विशिष्ट कवियों, कलाकारों और महापुरूषों के जीवन पर आधारित उपन्यासों की एक माला लिखकर साहित्य की एक बड़ी आवश्यकता को पूर्ण किया है। प्रस्तुत उपन्यास 'यशोधरा जीत गई' में उन्होंने जननायक गौतम बुद्ध का चरित्र ऎतिहासिक दृषिट से प्रस्तुत किया है। 'यशोधरा जीत गई' उसी कड़ी की एक प्रमुख रचना है। 'यशोधरा जीत गई' में राष्ट्र की तात्कालिक स्थितियों में बुद्ध के जीवन का चित्रण हुआ है। वस्तुतः बुद्ध के समय में धर्म या राजनीति का विघटन शुरू हो गया था और देश में राजनीतिक और वैचारिक अराजकता छा रही थी। ऎसे समय में बुद्ध ने अपने तप-बल से करोड़ों भ्रमित और धार्मिक रूप से निस्सहाय मनुष्यों को मानसिक आश्रय और शान्ति प्रदान की। इस उपन्यास में बुद्ध के अजेय और सुदृढ़ व्यक्ति के निर्माण में संलग्न करूणा-कोमल यशोधरा का भी मार्मिक रूप प्रस्तुत किया गया है। जिसके समक्ष एक बार बुद्ध का तपोबल भी नत हो गया था।

'मां' पर 5 किताबें


जब भी मां पर किताबों की बात होती है तो मैक्सिम गोर्की की किताब ‘मदर’ का ही नाम आता है। कुछ और भी है...
माय हॉलीवुड (मोना सिम्पसन)
यह दो महिलाओं की कहानी है। क्लेयर अपने पति के कॉमेडी स्क्रिह्रश्वट लिखने के सपने को पूरा करने के लिए लॉस एंजिल्स पहुंचती हैं। वह नहीं जानती कि बेटे विलियम को कैसे पाल-पोसकर बड़ा किया जाए। वह नैनी लोला की मदद लेती है। जो फिलीपींस में रहने वाले अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए काम करती है। विलियम के प्रति दोनों मां के ह्रश्वयार को ही यह कहानी आगे बढ़ाती है।
लव यू फॉरएवर (रॉबर्ट मंश)
रॉबर्ट ने 1995 में बच्चों के लिए कहानी लिखी थी, तभी से यह हर मां की पसंदीदा बन गई। यह दिल को छूने वाली बुक है जो मां और बच्चे का अनंत ह्रश्वयार दिखाती है। यह किताब शुरुआत से आखिर तक बांधे रखती है। खास बात यह है कि फोटो स्टोरी के जरिए पूरी बात कही गई है।
मां (मुंशी प्रेमचंद)
देश के लिए समर्पित आदित्य तीन साल से जेल में था। पत्नी करुणा ने इस दौरान बेटे प्रकाश को जन्म दिया। जेल से छूटा तो उसे तपेदिक हो गया और उसकी मौत हो गई। करुणा ने प्रकाश को पढ़ाया-लिखाया। वह मजिस्ट्रेट बन गया। करुणा ने सपना देखा कि प्रकाश मजिस्ट्रेट की कुर्सी पर बैठा है। आदित्य को कोड़े मारकर वहां लाया गया। पति के फोटो को दिल से लगाकर ही वह दम तोड़ देती है। उस वक्त प्रकाश मजिस्ट्रेट बनने के लिए यूरोप जा रहा था।
चिकनसूप फॉर (एवरी मॉम्स सोल)
जेक, मार्क हीथर मां के दिल में झांकने के लिए यह एक बेहतरीन किताब है। इसमें जन्म देना, मातृत्व को परिभाषित करना जैसे अनुभवों को कहानियों में सहेजा गया है। मातृत्व के हर स्तर पर दादी मां की नसीहतों से भरी ये कहानियां प्रेरक भी हैं।
सीक्रेट डॉटर (शिल्पी सोमैया)
भारत के एक गांव में कविता बेटी को जन्म देती है। बेटे के पक्षधर समाज के दबाव में वह बेटी को छोड़ देती है। एनआरआई अमेरिकी डॉक्टर सोमेर
उस लड़की (आशा) को मुंबई के अनाथालय से गोद लेती है। एक दिन आशा अपनी मां और परिवार को ढूंढने का फैसला करती है।