Saturday, 15 February 2014

मदन कश्यप



बड़ी हो रही है बेटी
बड़ा हो रहा है उसका एकांत

वह चाहती है अब भी
चिड़ियों से बतियाना
फूलों से उलझना
पेड़ों से पीठ टिका कर सुस्ताना
पर सब कुछ बदल चुका है मानो।

कम होने लगी है
चिड़ियों के कलरव की मिठास
चुभने लगे हैं
फूलों के तेज़ रंग
डराने लगी हैं
दरख़्तों की काली छायाएँ।

बड़ी हो रही है बेटी
बड़े हो रहे हैं भेड़िए
बड़े हो रहे है सियार।

माँ की करुणा के भीतर
फूट रही है बेचैनी
पिता की चट्टानी छाती में
दिखने लगे हैं दरकने के निशान
बड़ी हो रही है बेटी!

बाबा बाबा
मुझे मकई के झौंरे की तरह
मरुए में लटका दो।
बाबा बाबा
मुझे लाल चावल की तरह
कोठी में लुका दो।
बाबा बाबा
मुझे माई के ढोलने की तरह
कठही संदूक में छुपा दो।
मकई के दानों को बचाता है छिलकोइया
चावल को कन और भूसी
ढोलने को बचाता है रेशम का तागा
तुझे कौन बचाएगा मेरी बेटी!




बेटियाँ रोकती होंगी पिता को

बहुत जरूरी है पहुँचना
सामान बाँधते बमुश्किल कहते पिता
बेटी जिद करती
एक दिन और रुक जाओ न पापा
एक दिन।

पिता के वजूद को
जैसे आसमान में चाटती
कोई सूखी खुरदुरी जुबान
बाहर हँसते हुए कहता - कितने दिन तो हुए
सोचता - कब तक चलेगा यह सब कुछ
सदियों से बेटियाँ रोकती होंगी पिता को एक दिन और
और एक दिन
डूब जाता होगा पिता का जहाज।

वापस लौटते में
बादल बेटी के कहे घुमड़ते
होती बारिश आँखों से टकराती नमी
भीतर कंठ रुँध जाता थके कबूतर-सा
सोचता पिता सर्दी और नम हवा से बचते
दुनिया में सबसे कठिन है शायद
बेटी के घर से लौटना।
- चंद्रकांत देवताले

हम तो बाबुल तोरे पिंजड़े की चिड़ियाँ (अमीर ख़ुसरो की वह अमर रचना)

काहे को ब्याही बिदेस
अरे लखिया बाबुल मोरे।
भइया को दीनो बाबुल
महला दुमहला
हमको दियो परदेस।
हम तो बाबुल तोरे बेले की कलियाँ
घर-घर माँगी में जाएँ।
हम तो बाबुल तोरे खूँटे की गइयाँ
जित बाँधो तित जाएँ।
हम तो बाबुल तोरे पिंजड़े की चिड़ियाँ
कुहुक-कुहुक रट जाएँ।
ताँतों भरी मैंने गुड़िया जो छोड़ी
छूटा सहेलन का साथ
निमिया तले मोरा डोला जो उतरा
आया बलम जी का गाँव।






ये कविता सुरत की युवा कवियत्री एषा दादा वाला ने लिखी है। इतनी कम उम्र में ऐषा ने कई गंभीर कविताएं लिखी है।

किसी प्रादेशिक भाषा से हिन्दी में अनुवाद इतना आसान नहीं होता। कई शब्द ऐसे होते हैं जिनको हम  समझ सकते हैं लेकिन उनका दूसरी भाषा उनके उचित शब्द खोजना मुश्किल होता है। मसलन गुजराती में एक शब्द  है “निसासो” यानि  एक हद तक हिन्दी में हम कह सकते हैं कि “ठंडी सी दु:खभरी साँस छोड़ना! लेकिन गुजराती में निसासो शब्द एक अलग भाव प्रस्तुत करता है।  जब कविता को अनुवाद करने की कोशिश की तो इस तरह के कई शब्दों पर आकर  अटका।

खैर मैने बहुत कोशिश की कि कविता का मूल भाव या अर्थ खोए बिना उसका सही अनुवाद कर सकूँ, अब कितना सफल हुआ यह आप पाठकों पर…

डेथ सर्टिफिकेट :
प्रिय बिटिया
तुम्हें याद होगा
जब तुम छोटी थी,
ताश खेलते समय
तुम  जीतती और मैं हमेशा हार जाता

कई बार जानबूझ कर भी!
जब तुम किसी प्रतियोगिता में जाती
अपने तमाम शील्ड्स और सर्टिफिकेट
मेरे हाथों में रख देती
तब मुझे तुम्हारे पिता होने का गर्व होता
मुझे लगता मानों मैं
दुनिया का सबसे सुखी पिता हूँ

तुम्हें अगर कोई दु:ख या तकलीफ थी
एक पिता होने के नाते ही सही,
मुझे कहना तो था
यों अचानक
अपने पिता को इतनी बुरी तरह से
हरा कर भी कोई खेल जीता जाता है कहीं?

तुम्हारे शील्ड्स और सर्टिफिकेट्स
मैने अब तक संभाल कर रखे हैं
अब क्या तुम्हारा “डेथ सर्टिफिकेट” भी
मुझे ही संभाल कर रखना होगा?

*****************

पगफेरा
बिटिया को अग्‍निदाह दिया,
और उससे पहले ईश्‍वर को,
दो हाथ जोड़ कर कहा,
सुसराल भेज रहा हौऊं,
इस तरह  बिटिया को,
विदा कर रहा हूँ,
ध्यान तो रखोगे  ना उसका?
और उसके बाद ही मुझमें,
अग्निदाह देने की  ताकत जन्मी
लगा कि ईश्‍वर ने भी मुझे अपना
समधी बनाना मंजूर कर लिया

और जब अग्निदाह देकर वापस घर आया
पत्‍नी ने आंगन में ही पानी रखा था
वहीं नहा कर भूल जाना होगा
बिटिया के नाम को

बिना बेटी के घर को दस दिन हुए
पत्नी की बार-बार छलकती  आँखें
बेटी के व्यवस्थित पड़े
ड्रेसिंग टेबल और वार्डरोब
पर घूमती है
मैं भी उन्हें देखता हूँ और
एक आह निकल जाती है

ईश्‍वर ! बेटी सौंपने से पहले
मुझे आपसे रिवाजों के बारे में
बात कर लेनी चाहिए थी
कन्या पक्ष के रिवाजों का
मान तो रखना चाहिए आपको
दस दिन हो गए
और हमारे यहाँ पगफेरे का  रिवाज है।

दोनों कविताएं *एषा दादावाला*
अनुवाद: सागर चन्द नाहर

जयप्रकाश त्रिपाठी


आग बटोरे चांदनी, नदी बटोरे धूप।
हवा फागुनी बांध कर रात बटोरे रूप।

पुड़िया बंधी अबीर की मौसम गया टटोल।
पोर-पोर पढ़ने लगे मन की पाती खोल।

नख-शिख उमर गुलाल की देख न थके अनंग
पीतपत्र रच-बस लिये चहुंदिश रंग-विरंग।

फागुन चढ़ा मुंडेर पर, प्राण चढ़े आकाश,
रितुरानी के चित चढ़ा रितु राजा मधुमास।

नागर मन गागर लिये, बैठा अपने घाट,
पछुवाही के वेग में जोहे सबकी बाट।

मंत्रमुग्ध अमराइयां, चहक-महक से गांव,
मंथर-मंथर फिर रहा मौसम ठांव-कुठांव।

खोज खबरिया लेत रहीं भोजपुरिया धुन में


एही कहल जाला आंख एक्को ना, कजरौटा बारह ठो। आ तनी आउर मुंहफटई से कहीं त झोरी में बाल नहीं (बाल ऊ वाला), औ चले जगन्नाथ जी। सरमायेदारन की सेवकाई में कटोरा लेइके दर-दर डोलत ई मुड़कटवन के का कहलि जाइ कि फुहरी गइल दाना भुजावै, फूटि गइल खपड़ी त लगलि गावै। त भइया चरनबंदन चहुंओंरी....एही चारन गान पर नीचे कुछ लाइना इहां सुनावति बानी रउवा सबन के..... समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी समाजवाद उनके धीरे-धीरे आयी। हाथी से आयी घोड़ा से आयी अंगरेजी बाजा बजाई...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। नोटवा से आयी वोटवा से आयी बिड़ला के घर में समायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। गांधी से आयी आंधी से आयी टुटही मड़इया उड़ायी,...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। कांगरेस से आयी जनता से आयी झंडा के बदली हो जायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। डालर से आयी रूबल से आयी देसवा के बान्हे धरायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। वादा से आयी लबादा से आयी जनता के कुरसी बनायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। लाठी से आयी गोली से आयी लेकिन अहिंसा कहायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। महंगी ले आयी गरीबी ले आयी केतनो मजूरा कमायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। छोटका के छोटहन बड़का के बड़हन बखरा बराबर लगायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। परसों ले आयी बरसों ले आयी हरदम अकासे तकायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। धीरे-धीरे आयी चुपे-चुपे आयी अंखियन पर परदा लगायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।
त भइया, गोरख पांड़े त ई कुल गावत-गावत मरि गइलैं। उनहूं के भला का मालूम रहल कि समजावाद का कमाई-धमाई खाए-खसौटे वाले दलाल टाटा की थैली में मुंह मारि-मारि के सिंदूरग्राम अउर नांदीग्राम में अपने मुंहे करिखा लगाइके थेथर की तरह घूमत बानै आजकल। आ ऊ जमाने के, पांड़े जी के जमाने के बड़े-बड़े करांतिकारी लोग दिल्ली में सहाराश्री-सहाराश्री जपत हउवैं। केहू पतरकार बनत डोलत बा, जोतीबसू का जीवनी लिखत बा त केहू एहर-ओहर पूंजी के दलालन के नाबदान में थूथुन चभोरत बा। आ जे लोग नक्सलबाड़ी में बान-धनुख तनले रहे, उनहू लोगन में केहू मीरघाट-केहू तीरघाट पर आपनि-आपनि मंडली लेके बड़ा जोरदार बहस में जुटल बा साठ साल से कि हमार असली दुसमन के हउवै। एतना साल में त आदमी चाहै त पताल खोदि नावै। धिक्कार बा उनहू लोगन के अइसन जनखा गोलइती प। सुनै में आवत ह कि ऊहो लोगन में केहू क सरदार लेबी के पइसा से अमरीकी शर्ट-बुश्शर्ट पहिनी के अरिमल-परिमल परकासन चलावत बा अपने मेहरी-लइका, साढ़ू-सढ़ुआइन के साथ त केहू तराई में टांगि भचकावत रागमल्हार में डूबलि बा। आज ले केहू से एक तिनको भर नाही उखरल। उनही लोगन में केहू अमेरिका से लौटि के बीबी के पल्लू में एनजीओगीरी करत बा त केहू बिहार अउर आन्हर परदेस के जंगलन में फालूत के धांय-धांय में आपनि ताकत झोंकले बा। अरे बेसरम, तू लोगन के चिल्लू भर पानी में डूबि मरै के चाही कि देखा नैपाल में बिना कौनो डरामा-नौटंकी कैसे बहादुरन की जमाति ने ऊ रजवा के खदेड़ि देहलस...आ तू लोगन अजादी क मशालै पढ़ावति रहि गइला। कहां गइल तोहार आइसा-फाइसा. आइपीएफ-साइपीएफ.... आखिर कब ले तोहन लोगन ढुकारि मारि के दिल्ली के कोने अतरे में फोकट का बुद्धी बघारत रहबा। तोहन लोगन त आपसै में कटि मरबा, जनता के खातिर का कइबा कट्टू? देखा कठपुतली नीयर मनमोहना कैसे चीन अमरीका धांगत हउवै, मर्द त ऊ हउवै, तोहन लोग सारी पहिनि के घूमा ससुरो। किसान मजूर क कलेजा जरी त ओकरे मुंह से ईहै कुल गारी-गुपुत निकली। मरला की हद कइ नउला तोहन लोग। खैर कौनो बात नइखैं। हमरे बस में आजि एतने हउवै कि एही तरहि से तोहन लोगन क खोज खबरिया लेत रहीं भोजपुरिया धुन में। तू लोग नगरी-नगरी द्वारे वैन प लादि के किताब कापी बेचा, क्रांति-स्रांती का नाटक-नौटकी करा, गीत-गाना का सीडी-वोडी बेचा-बिकना, आपन रोजी-रोटी चलावा, बस तोहरे लोगन से आउर कुछ उखरै-परिआए क भरोसै बेकार बा। अकारथ गइलि कुल कुरबानी। जाने केतनी सहीद लोग अपने-अपने कबर में से तोहन लोगन क ई रामलीला देखति होइहैं, जनता त देखती बाय। ई बाति तोहनो लोगन पर लागू हउवै कि... फुहरी गईल दाना भुजावै, फूटि गइल खपड़ी लगल गावै।

रउरे बुढि़या के गलवा में क्रीम लागेला, हमरी नइकी के जरि गइलें भाग भाई जी
आज महिला दिवस ह। ईहो एकठो चोचलेबाजी बा। कौनो मुंह बनउले क जरूरत नइखैं। दुनिया भर में दुनिया भर क दिवस मनावै क फैशन स चल गइलि बा। ओही में एक फैशन ईहो हउवै। सरऊ लोग तरह-तरह क तमाशा करत हउवैं। चिढ़ावै के खातिन। कबौं लइकन के चिढ़इहैं, त कबौं बुढ़वन के, कबौं मजदूरन के चिढ़इहैं त कबौं किसानन के... भोजपुरी में एकगो कहावत ह कि ओढ़ौ के दुका नहीं, दरी बिछनौना। दुनिया भर क के गिनावै. अपने आसैपास देखिला, आसैपास का- तनी अपने घरहि में देखिला कि कइसन हाल बा महिला लोगन का। केहू जनमते बेंचि देत ह, केहू गरभ में ही मरवाइ देत ह, त केहू जिनगी भर मारि-मारि के कचूमर निकालि लेत ह।
त भइया ई कुल झांसा-पट्टी क खेल ह। जौन करै के चाही, तौन त केहू कुछ करत-धरत ना ह, महिला दिवस जरूर मनइहैं। अमीरी-गरीबी का खोदि-खोदि के समुंदर बनावत जात हउवैं, पइसा वालन के मेम इसनो-पाउडर चेंपि के रोज-रोज हाट-बाट, माल, मारकेट क धौरहरि मचउले हईं, गरीबन क बिटिया-मेहरारू गिट्टी तोड़त हईं, घास करति हईं, हर जोतत हईं, पत्ता-पन्नी बीनति हईं, त पेट-परदा चलत ह।
केतना महिला संगठन हउवैं, हर पार्टी में महिला विंग अलग से, केतना पंच-परधान मेहरारू हईं, अउर-त-अउर सोनिया गान्ही, मायावती बहिन जइसन दुनिया भर क चौधरानी अपने देश-मुलुक में गद्दी पर बइठि के खूब मजा काटति बानी, आ औरतन क हाल जस क तस बा। वोट लेवै के बेला में ई कुल औरति बनि जालीं, एकरे बाद पांच साल तक के पूछत बा, केहू नइखैं। अब त भइया ई कुल चिरकुटाई सुनत-सुनत जी पकि गइल बा। ई कुल महोखाबाजी अब तनिको बरदास्त ना होत बा। ऊ कुल आपन-आपन चमकीला खतोना बनाइ-बनाइ के हम लोगन के खूब भरमावत हउवैं। छोड़ा जाएदा उनहन क महिला-सहिला दिवस का बात-कुबात...... आवा तनी एही बहाने गीत-गवनई होइ जाय गोरख पांड़े के मुंह-राग से, उनहीं के सबदन में.....

पहिले-पहिल जब वोट मांगे अइलें त बोले लगलें ना
तोहके खेतवा दिअइबों
तोहके फसलि उगइबो
दूसरे चुनउवा में जब उपरइलें त बोलें लगलें ना
तोहके कुइयां खनइबो
सब पियसिया मिटइबौ
तीसरे चुनउवा में चेहरा दिखइलें त बोले लगलें ना
तोहके महल उठइबों
ओमे बिजुरी लगइबों
अबकी टपकिहें त कहबों कि देख तू बहुत कइला ना
तोहके अब न थकइबो
आपन हथवा उठइबो
जब हम ईहवों के किलवा ढहइबो त एही हाथे ना
तोहरो मटिया मिलइबो
आपन रजवा बनइबों
......त एही हाथे ना।

ऐ कुतिया

तेरी पूंछ इत्ती-सी,
तेरी टांगें इतनी छपक-छरहरी,
तेरी भूंक मीठी-मीठी,
तेरी आंखें गुस्साई हिरनी जैसी
ऐ कुतिया!

तेरी चाल कैट वॉक की,
तेरी मस्तियां पूंजी से पुरजोर,
तेरी चौकदारी अमेरिका-जापान तक,
तेरे कान कितने चौकन्ने,
और तेरी खाल इतनी मोटी क्यों है
ऐ कुतिया!

तेरे आजू-बाजू इतनी धन-दौलत,
तेरे इतने घर-मकान,
तेरे इतने नौकर-चाकर, नाती-पनाती,
बारहो मास कोई राजधानी, कोई पहाड़ों की सैर पर,
तू शेयरों की रानी,
दलालों की दलाल और कुत्तों की कहारन
ऐ कुतिया!

तेरे नाम पर गालियों के मुहावरे हजार,
तेरे गुस्से में बर्बादियों के सात समंदरों की दहाड़,
तेरी नीद में तरह-तरह के किन्नर नरेश,
तेरी सुबहें लहलहाती हुईं,
तेरी रातें कहकहों और ठहाकों से सराबोर,
तेरी चमड़ी इत्ती सुघर-सलोनी
लेकिन तेरा मन
ऐ कुतिया!

कुतिया कहने पर गुस्सा क्यों आता है तुझे,
कुतिया का मतलब गाली क्यों होता है,
कुतिया का दूध पीने वाली औलादें
इतनी खूंख्वार क्यों होती हैं,
अब तुझसे क्या पूछें
और भी क्या-क्या कहें....
ऐ कुतिया!

(तू खुद में एक सवाल है)
(तू खुद में एक जाति है)
(तेरी जाति की हजारों-लाखों दुनिया भर में)
(ऐ कुतिया!)

(भौंकती रह, भौंकती रह)
(भौंकना ही तेरा सौंदर्यशास्त्र है)
(भौंकना तेरा पेशा है)
(भौंकने से परहेज करते ही तू मर जाएगी)
(ऐ कुतिया!)

कबीर सारा-रा-रा-रारा-रारा-रा-रारा....
डाल के ऊपर कउवा हौ, कउवा ऊपर कनकउवा
ओकरे उप्पर छउवा ठाकुर बइठल खायं ठोकउवा
कबीर सारा-रा-रा-रारा-रारा-रा-रारा....
दानापुर दरियाव किनारा, गोलघर निशानी
लाट साहेब ने किला बनाया, क्या गंगा जल पानी
जोगी जी सार रा रा.........
दिल्ली देखो ढाका देखो, शहर देखो कलकत्ता।
एक पेड़ तो ऐसा देखो, फर के ऊपर पत्ता,
जोगी जी सार रा रा............
कौन काठ के बनी खड़ौआ, कौन यार बनाया है,
कौन गुरु की सेवा कीन्हो, कौन खड़ौआ पाया,
चनन काठ के बनी खड़ौआ, बढ़यी यार बनाया हो,
हम गुरु की सेवा कीन्हा, हम खड़ौआ पाया है,
जोगी जी सारा रा रा............

सोमवार, 25 फ़रवरी 2008
फागुन में बाबा देवर लागै
आइ गइलि, आइ गइलि, लउकति ना हउवै त का होइ गइलि, मनवा में त रसमसाती हउवै......भीनति हउवै, गुनगुनाति हउवै...हंसति हउवै, मुसुकाति हउवै, थिरकति हउवै, लहालौट होति हउवै....रंगियाति हउवै, अंगियाति हउवै, अगियाति हउवै अब्बै से होरी .....हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा......
मौसमो मुरुकै लगलि बा, कुहुकै लगलि बा, हुहुकै लगलि बा, लुहुकै लगलि बा, महकै लगलि बा, सहकै लगलि बा, बहकै लगलि बा, रहि-रहि के चहकै लगलि बा, रहि-रहि के दहकै लगलि बा, टहकै लगलि बा, रसे-रसे डहकै लगलि बा, मन भितरें-भितर सहकै लगलि बा...हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा....
अब्बै से रंग चढ़ै लगलि बा, ढंग पढ़ै लगलि बा, पोर-पोर में बसंती कोपल कढ़ै लगलि बा, चिक्कन-चिक्कन रुप-रंग गढ़ै लगलि बा, फगुनौटी का हीरा-मोती जड़ै लगलि बा, चारों ओर फूल-पत्ती झरै लगलि बा, बुढ़उवो से नीक-नइकी डरै लगलि बा, मुनक्का नाईं मनहि-मन ढरै लगलि बा, का जानैं लोग एहि वैलेंटाइन का मरम....तनी-तनी तर-ऊपरि रोम-रोम बरै लगलि बा, नशाइ के आंखि कतहूं..पैर कतहूं परै लगलि बा, अंगूर अइसनि अंग-अंग फरै लगलि बा, जइसे हीया में अमरित भरै लगलि बा..हा-हा-हा-हा-हा-हा.....
पेड़-पौधा सुघराए लगल, हवा-पानी लहराए लगलि, सुरुज क रंग गहराए लगल, चनरमा अंग फहराए लगल, दिन क चलन अहराए लगल, रात चुप्पे-चुप्पे होरिहराए लगल, केहू उझकति बा, केहू चिहुंकत बा, केहू निहुकति बा, केहू टिहुकति बा, केहू अगवारे-पिछवारे रोज पिहुकति बा...हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा........
फागुन मा बाबा देवर लागै।
कबौं एहर, त कब्बौं ओहर लागै।
फागुन मा बुढ़िया जवान लागै।
कबौ बच्ची, त कब्बौ सयान लागै।
फागुन मा रार बेकार लागै।
सब दउरि-दउरि अंकवार लागै।
हा-हा-हा-हा-हा-हा...............

शनिवार, 23 फ़रवरी 2008
फागुन उड़त गुलाब
झूमर चौतार झमारी, तजो बनवारी
फागुन उड़त गुलाब अर्गला कुमकुम जारी


धनि-धनि ए सिया रउरी भाग, राम वर पायो।
लिखि लिखि चिठिया नारद मुनि भेजे, विश्वामित्र पिठायो।
साजि बरात चले राजा दशरथ,
जनकपुरी चलि आयो, राम वर पायो।
वनविरदा से बांस मंगायो, आनन माड़ो छवायो।
कंचन कलस धरतऽ बेदिअन परऽ,
जहाँ मानिक दीप जराए, राम वर पाए।
भए व्याह देव सब हरषत, सखि सब मंगल गाए,
राजा दशरथ द्रव्य लुटाए, राम वर पाए।
धनि -धनि ए सिया रउरी भाग, राम वर पायो।



शुभ कातिक सिर विचारी, तजो वनवारी।
जेठ मास तन तप्त अंग भावे नहीं सारी, तजो वनवारी।
बाढ़े विरह अषाढ़ देत अद्रा झंकारी, तजो वनवारी।
सावन सेज भयावन लागतऽ,
पिरतम बिनु बुन्द कटारी, तजो वनवारी।
भादो गगन गंभीर पीर अति हृदय मंझारी,
करि के क्वार करार सौत संग फंसे मुरारी, तजो वनवारी।
कातिव रास रचे मनमोहन,
द्विज पाव में पायल भारी, तजो वनवारी।
अगहन अपित अनेक विकल वृषभानु दुलारी,
पूस लगे तन जाड़ देत कुबजा को गारी।
आवत माघ बसंत जनावत, झूमर चौतार झमारी, तजो वनवारी।
फागुन उड़त गुलाब अर्गला कुमकुम जारी,
नहिं भावत बिनु कंत चैत विरहा जल जारी,
दिन छुटकन वैसाख जनावत, ऐसे काम न करहु विहारी, तजो वनवारी।

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2008
अंखिया क पुतरी

अंखिया क पुतरी
करेजवा में उतरी
विदेशिया क सुघरी
सगरवा में उतरी
उतरी हो रामा
पुतरी हो रामा
रामा हो रामा....

सूने-सूने डिहवा
मड़ैया सूनी-सूनी
कबौ देहरादूनी
त कबौ टेलीफूनी
मन भइलें खूनी-खूनी
याद आवै दूनादूनी
...अंखिया क पुतरी हो रामा

छुटि गइलैं गउवां
बिलाइ गइलैं नउवां
बालेपन क दिनवा
हो गइलैं महीनवां
नाही केहू आवै ला
ना जालै केहू उहवां
...अंखिया क पुतरी हो रामा


अरे...हाऊ देखा, का होत हउवै
देखबा...देखबा...तनी देखबा-देखबा, हाऊ का होत ह, अरे एतना लोग एक साथ काहें दौड़त हउवै....ऊ कइसन कइसन लोग हउवैं....ओनके का हो गइल ह....एक दमै सनक गयल हउवैं का....कुल क कुल एकै तरह क लउकत हउवैं.....नाही-नाही....ओहमै दू तरह क लोग लउकत हउवैं....आज हमहूं देखि लेहलीं ओनके....जब पढ़ली बेहया का चिट्ठा....आवा तनी मोका निकाल के दू घड़ी तुहूं पढ़ ले जा, त जानि जइबा कि असली बात का ह...ऊ लोग कउन लोग हउवैं....ओनकर कहानी भैया चिट्ठा से उधार लेइके हम इहां आप सबन के पढ़वावत हईं...जस क तस-


(यह ताजा वाकया अमीर घराने का है) सुबह-सुबह पहले तो कुछ-एक लोगों की निगाह उस पर पड़ी, फिर चारों तरफ शोर मच गया। जिसने भी उसे देखा, आंखें फटी-की-फटी रह गईं। सबकी आंखों में एक ही सवाल कि इतना सभ्य और सुदर्शऩ होते हुए भी उसने ऐसा क्यों किया? वह खुद नंगा हुआ या किन्ही बदमाशों ने उसके साथ ये हरकत की? ...और अपनी इस करतूत से अचानक वह अनगिनत महिलाओं-पुरुषों की भीड़ की आंखों में इस तरह धंस गया कि सब-के-सब बुड़बुड़ाने लगे....................यह वाकया है नये साल के दूसरे महीने की पहली तारीख यानी 1 फरवरी की सुबह का। उसे नंगा किया अमीरों की चटोरी करने वाले बुर्जुआ मीडिया ने। उसी मीडिया ने, जो कहता है देश बहुत तेजी से विकास कर रहा है। आए दिन जो देश के अमीरों की नंबरिंग की फेहरिस्त पढ़वाता रहता है। मुद्दत बाद उसने राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) की एक ताजा रिपोर्ट को पहले-दसरे पन्ने पर प्रमुख स्थान दिया। इस रिपोर्ट ने भारतीय लोकतंत्र को नंगा कर दिया। उन अमीर घरानों और उनके पालतू राजनेताओं के चेहरे से एक झटके में नकाब खींच थी। रिपोर्ट के आईने में सबके सब एक साथ नंगे दौड़ते दिखे। क्या है रिपोर्ट में, एक नजर आप भी जान लें-
-भारत में 17 करोड़ लोग सिर्फ 19 रुपये में रोजाना गुजारा करते हैं। उत्तर प्रदेश का पूरा ग्रामीण इलाका इसी तरह जी रहा है, जबकि बिहार में ग्रामीण सिर्फ 15रुपये में रोजाना गुजारा कर रहे हैं।
- भारत में लगभग 14करोड़ लोग सिर्फ 12रुपये या इससे भी कम रुपये से रोजाना गुजारा कर रहे हैं।
-पंजाब और हरियाणा सबसे खुशहाल माने जाते हैं, मीडिया भी इनकी खूब दुंदभी बजाता रहता है, लेकिन नंगी हकीकत ये है कि पंजाब में प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 33रुपये और हरियाणा में 25रुपये है।
-रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय ग्रामीण एक महीने में 251रुपये से अपने को जिंदा रखता है।
-ग्रामीणों की आधी आबादी कच्चे या अधपक्के घरों में जीवन बिता रही है। इनमें कच्चे घर वाले 19फीसदी हैं।
-विकास का इतना ढिंढोरा पीटा जा रहा है लेकिन आज भी शहरी आबादी के 45फीसदी लोग ही रसोई गैस पर भोजन पका रहे हैं, जबकि गांवों में 75फीसदी लोग लकड़ी के चूल्हे से काम चला रहे हैं।........इस नंगे लोकतंत्र को देखते हुए ऐसे में कुछ सवाल--कौन जिम्मेदार है इसके लिए?
-आए दिन देश के अमीरों की फेहरिस्त पढ़वा कर मीडिया आखिर क्या साबित करना चाहता है?
-एक भारतीय ढाई सौ रुपये में महीना काटता है और दूसरे (अंबानी) का व्यक्तिगत मासिक खर्च सवा दो करोड़ क्यों?
-नेता और अफसर तो हैं ही, क्या वे साहित्यकार, पत्रकार, चिंतक, वक्ता, खिलाड़ी, अभिनेता, रंगकर्मी गूंगे-बहरे या दिमागी अपाहिज नहीं हैं, जो ऐसी सच्चाइयां बयान होते ही चुप्पी साध जाते हैं?

....तो भैया
आओ भारतीय लोकतंत्र की हाट सजी है
यहां हर अंग बिकाऊ है
किडनी क्या, जो चाहो खरीद लो जाओ
पहले इनकी चुप्पियां खरीदो
फिर इनकी अक्ल खरीदो
फिर जो चाहो, सब कुछ
लोकतंत्र तो कब का नीलाम हो चुका है
तन-बदन तक नीलाम हो रहा है
अब कब जागोगे
कब तक एक दूसरे से भारतीय संस्कृति और सभ्यता का
सफेद झूठ बोलते रहोगे
यदि तुम ऐसा कर रहे हो
तो इसके सिवाय तुम्हारे पास
और चारा ही क्या है?
और चारा ही क्या है?
और चारा ही क्या है?
...क्योंकि तुम मर चुके हो
तुम्हारी आत्मा सड़ चुकी है!
शामिल हो जाओ नंगी दौड़ में,
शामिल तो हो ही,
फास्ट फूड खाओ
दारू पीयो, सिगरेट फूंककर काफी हाउसों में गप्प हांको,
दुनिया भर की बातें करो
और देखो कि तुम कितने नंगे हो चुके हो
....उफ्! अमीरों की खुरचन ने
तुम्हे कितना नंगा कर दिया है?
सुविधाओं ने तुम्हे कितना परजीवी बना दिया है
तो खोखले जी
तुम सिर्फ नंगे ही नहीं
इतने नकली हो गए हो तुम
कि तुम्हारी ही आंखें तुम्हे देखने से मना कर देती हैं
सोचो कि एक दिन में
कितनी बार ऐसा होता है तुम्हारे साथ,
सोचो कि तुम सब कौन हो?
आखिर क्या चाहते हो?
तुम्हे यह सब क्यों नहीं दिखाई देता?
तुम्हे यह सब क्यों नहीं सुनाई देता?
यदि तुम सब कुछ देख-सुन कर भी
अनजाने बने हुए हो
.....तो वाकई
तुम कितने नीच हो!!


बुधवार, 30 जनवरी 2008
आज गांन्हीबाबा का पुन्नतीथी न हउवै, त तनी ईहो सुनले जा
बड़ी-बड़ी कोठिया सजाए पूंजीपतिया
कि दुखिया के रोटिया चोराए-चोराए
अपने महलिया में करे उजियरवा
कि बिजरी के रडवा जराए-जराए

कत्तो बने भिटवा कतहूं बने गढ़ई
कत्तो बने महल कतहुं बने मड़ई
मटिया के दियना तूहीं त बुझवाया
कि सोनवा के बेनवा डोलाए-डोलाए

मिलया में खून जरे खेत में पसीनवा
तबहुं न मिलिहैं पेट भर दनवा
अपनी गोदमिया तूहीं त भरवाया
कि बड़े-बड़े बोरवा सियाए-सिआए

राम अउर रहीम के ताके पे धइके लाला
खोई के ईमनवा बटोरे धन काला
देसवा के हमरे तू लूट के खाया
कई गुना दमवा बढ़ाए-बढ़ाए

जे त करे काम, छोट कहलावे
ऊ बा बड़ मन जे जतन बतावे
दस के सासनवा नब्बे पे करवावे
इहे परिपाटी चलाए-चलाए

जुड़ होई छतिया तनिक दऊ बरसा
अब त महलिया में खुलिहैं मदरसा
दुखिया के लरिका पढ़े बदे जइहैं
छोट-बड़ टोलिया बनाए-बनाए

बिनु काटे भिंटवा, गड़हिया न पटिहैं
अपने खुसी से धन-धरती न बटिहैं
जनता केतलवा तिजोरिया पे लगिहैं
कि महल में बजना बजाए-बजाए

.....गांन्ही जी के चेलवा लूटत बांटैं सबके
चोरवन से हथवा मिलाए-मिलाए
देसवा अमेरिका के हथवा में बन्हक
रखि देहलें नेतवा ढुकाए-ढुकाए
अब रजघटवा पै गावै लैं भजनिया
गांन्ही नाई चेहरा झुकाए-झुकाए
...रघुपति राघव राजाराम
पतना न पावैं सीताराम..सित्ताराम...सित्ताराम


शुक्रवार, 25 जनवरी 2008
ए हमार छब्बीस जनवरी
आइ गइलू न, फिर अटकत-मटकत...

ए हमार छब्बीस जनवरी
अबहिन बाकी बा कुछ अउरी?

त आवा तनी गोरख बाबू के सुर में इहो कुल सुनले जा कि तोहके चूमे-चाटे वाले, सलूट मारै वाले का-का करत हउवैं....

रउरा सासना के बाटे ना जवाब भाई जी
रउरा कुरसी से झरेला गुलाब भाई जी

रउरा भोंभा लेके सगरो आवाज करीला
हमरा मुंहवा में लागल बाटे जाब भाई जी

रउरे बुढिया के गलवा में क्रीम लागेला
हमरी नइकी के जरि गइलें भाग भाई जी

रउरे लरिका त पढ़ेला बिलाइत जाइ के
हमरे लरिका के जुरे ना किताब भाई जी

हमरे लरिका के रोटिया पर नून नइखें
रउरा चापीं रोज मुरगा-कबाब भाई जी

रउरे अंगुरी पर पुलिस आउर थाना नाचे ला
हमरे मुअले के होखे न हिसाब भाई जी।



खोज खबरिया लेत रहीं भोजपुरिया धुन में
त ई हाल बा आजकल अपने मनमोहन का

दे दनादन दौरा। दे दनादन। अमरिकवा के चरनबंदना से पेट नइखे भरत हौ त कबौं अफरीका क दौरा, कबौं जापान का, कबौं बंगलादेस त कबौं चीन क। एह कुल दौरन क मतलब रउवा सबै जानत बानी की ना। एही कहल जाला आंख एक्को ना, कजरौटा बारह ठो। आ तनी आउर मुंहफटई से कहीं त झोरी में बाल नहीं (बाल ऊ वाला), औ चले जगन्नाथ जी। जहां जहां जात हउवैं, संग-साथ में भड़ैती की खातिर पतरकारन का झुंड पूंछ में लपेटे हुए.... कि आह मनमोहन, वाह मनमोहन......चक दे इंडिया, पक दे इंडिया, फक्क दे इंडिया। सरमायेदारन की सेवकाई में कटोरा लेइके दर-दर डोलत ई मुड़कटवन के का कहलि जाइ कि फुहरी गइल दाना भुजावै, फूटि गइल खपड़ी त लगलि गावै। त भइया चरनबंदन चहुंओंरी....एही चारन गान पर नीचे कुछ लाइना इहां सुनावति बानी रउवा सबन के.....

समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आयी।
हाथी से आयी
घोड़ा से आयी
अंगरेजी बाजा बजाई...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

नोटवा से आयी
वोटवा से आयी
बिड़ला के घर में समायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

गांधी से आयी
आंधी से आयी
टुटही मड़इया उड़ायी,...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

कांगरेस से आयी
जनता से आयी
झंडा के बदली हो जायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

डालर से आयी
रूबल से आयी
देसवा के बान्हे धरायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

वादा से आयी
लबादा से आयी
जनता के कुरसी बनायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

लाठी से आयी
गोली से आयी
लेकिन अहिंसा कहायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

महंगी ले आयी
गरीबी ले आयी
केतनो मजूरा कमायी...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

छोटका के छोटहन
बड़का के बड़हन
बखरा बराबर लगायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

परसों ले आयी
बरसों ले आयी
हरदम अकासे तकायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।

धीरे-धीरे आयी
चुपे-चुपे आयी
अंखियन पर परदा लगायी....समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी।



त भइया, गोरख पांड़े त ई कुल गावत-गावत मरि गइलैं। उनहूं के भला का मालूम रहल कि समजावाद का कमाई-धमाई खाए-खसौटे वाले दलाल टाटा की थैली में मुंह मारि-मारि के सिंदूरग्राम अउर नांदीग्राम में अपने मुंहे करिखा लगाइके थेथर की तरह घूमत बानै आजकल। आ ऊ जमाने के, पांड़े जी के जमाने के बड़े-बड़े करांतिकारी लोग दिल्ली में सहाराश्री-सहाराश्री जपत हउवैं। केहू पतरकार बनत डोलत बा, जोतीबसू का जीवनी लिखत बा त केहू एहर-ओहर पूंजी के दलालन के नाबदान में थूथुन चभोरत बा। आ जे लोग नक्सलबाड़ी में बान-धनुख तनले रहे, उनहू लोगन में केहू मीरघाट-केहू तीरघाट पर आपनि-आपनि मंडली लेके बड़ा जोरदार बहस में जुटल बा साठ साल से कि हमार असली दुसमन के हउवै। एतना साल में त आदमी चाहै त पताल खोदि नावै। धिक्कार बा उनहू लोगन के अइसन जनखा गोलइती प। सुनै में आवत ह कि ऊहो लोगन में केहू क सरदार लेबी के पइसा से अमरीकी शर्ट-बुश्शर्ट पहिनी के अरिमल-परिमल परकासन चलावत बा अपने मेहरी-लइका, साढ़ू-सढ़ुआइन के साथ त केहू तराई में टांगि भचकावत रागमल्हार में डूबलि बा। आज ले केहू से एक तिनको भर नाही उखरल। उनही लोगन में केहू अमेरिका से लौटि के बीबी के पल्लू में एनजीओगीरी करत बा त केहू बिहार अउर आन्हर परदेस के जंगलन में फालूत के धांय-धांय में आपनि ताकत झोंकले बा। अरे बेसरम, तू लोगन के चिल्लू भर पानी में डूबि मरै के चाही कि देखा नैपाल में बिना कौनो डरामा-नौटंकी कैसे बहादुरन की जमाति ने ऊ रजवा के खदेड़ि देहलस...आ तू लोगन अजादी क मशालै पढ़ावति रहि गइला। कहां गइल तोहार आइसा-फाइसा. आइपीएफ-साइपीएफ.... आखिर कब ले तोहन लोगन ढुकारि मारि के दिल्ली के कोने अतरे में फोकट का बुद्धी बघारत रहबा। तोहन लोगन त आपसै में कटि मरबा, जनता के खातिर का कइबा कट्टू?

देखा कठपुतली नीयर मनमोहना कैसे चीन अमरीका धांगत हउवै, मर्द त ऊ हउवै, तोहन लोग सारी पहिनि के घूमा ससुरो। किसान मजूर क कलेजा जरी त ओकरे मुंह से ईहै कुल गारी-गुपुत निकली। मरला की हद कइ नउला तोहन लोग। खैर कौनो बात नइखैं। हमरे बस में आजि एतने हउवै कि एही तरहि से तोहन लोगन क खोज खबरिया लेत रहीं भोजपुरिया धुन में। तू लोग नगरी-नगरी द्वारे वैन प लादि के किताब कापी बेचा, क्रांति-स्रांती का नाटक-नौटकी करा, गीत-गाना का सीडी-वोडी बेचा-बिकना, आपन रोजी-रोटी चलावा, बस तोहरे लोगन से आउर कुछ उखरै-परिआए क भरोसै बेकार बा। अकारथ गइलि कुल कुरबानी। जाने केतनी सहीद लोग अपने-अपने कबर में से तोहन लोगन क ई रामलीला देखति होइहैं, जनता त देखती बाय।
ई बाति तोहनो लोगन पर लागू हउवै कि...
फुहरी गईल दाना भुजावै,
फूटि गइल खपड़ी लगल गावै।
प्रस्तुतकर्ता भोजवानी पर 1:22 am 2 टिप्‍पणियां:
लेबल: क्रांति-सांति, गोरख पांडे, भोजपुर, भोजपुरिया, मनमोहन
शुक्रवार, 18 जनवरी 2008
अ़ँडु़आ बैल बंहेड़ु़आ...तान भोजपुरिया
अ़ँडु़आ बैल बंहेड़ु़आ पूत, खा ले बेटा कहीं सुत।
अइली ना गइली फलांने बो कहइलीं।
- अन्हरा सियार के पीपरै मेवा
अपना बिनु सपना, गोतिया के धन कलपना।
-अपना मने सजनी, के गाँव के लोग कहैं पदनी
-अपना हारल मेहरी के मारल।
- अब्बर क मेहरारू गाँव भर के भउजी
-अहीर बहीर बन बइर के लासा, अहीर पदलेस भइल तमासा।
-आँख के आन्हर गांठ के पुरा।
- आँख एक्को ना, कजरौटा बारह गो
-आँख ना दीदा मांगे मलीदा।
- आइल थोर दिन गइल ढेर दिन।
-आगे नाथ ना पा पगहा।
-आन्हर कुकुर बतासे भोंके ।
- आन्ही के आगे बेना के बतास! (बेनाउपंखा, बतासउहवा)
-आपन निकाल मोर नावे दे।
-आपन आंखि न देखै, दूसरे क ढेंढ़रा निहारै।
-बाबू गुड़ खाई, आपन कान छेदाई।
- इसर निकलस दरिदर पइसस।
-उखड़े बाल नहीं, नाम बरिआर सिंह।
-उपास भला कि मेहरी के जूठ भला !
-एक आन्हर एक कोढ़ी, भले राम मिलवले जोड़ी।
-एक ट्का के मुर्गी नव ट्का के मसाला।
- एक त गउरा अपने गोर, दूसर लहली कमरी ओढ़।
-एक त छ्उँड़ी नचनी, गोड़ में परल बजनी, अउरी हो गइल नचनी।
- एक क लकड़ी, नब्बे खर्च।
-एक हाथ के ककरी, नौ हाथ के बिआ।
-कमाय धोती वाला खाय टोपी वाला।
-कहले से धोबी गदहवा पर ना चढ़े।
- कहाँ राजा भोज कहाँ भोजवा तेली!
- काठ के हँडिया एके बेर चढ़ै ले।
-काम के ना काज के नौ सेर अनाज के।
-बकरा जान संग जाए खवइया के सवादै ना।
-खेत च गदहा मार खाए धोबी।
-गइल भइंस पानी में।
-गया मरद जो खाय खटाई, गई नारि जो खाय मिठाई।
-घर-घर देखा एके लेखा।
-घीव देत घोर नरिया।
-पर लैं राम कुकर के पालै ठेलठाल के कइलैं खाले।



गुरुवार, 17 जनवरी 2008
जय बाबा कैलाश
उर्फ कवि कैलाश गौतम क गीत-गौनई खरी-खरी
इधर भागती,उधर भागती, नाचा करती हैं,
बड़की भौजी, सबका चेहरा बांचा करती हैं।

बुधवार, 16 जनवरी 2008
ई बात चंडूखाने क हउवै का?
तीन-चार साल से भोजपुरी का नांव खूब उजियार होत ह। अइसर उजियार कि अन्हारो क सिर सरम से गड़ि जाय। त आपो सबन जानल चाहब कि ऊ कवन लोग हउवैं, जे भोजपुरी क नांव उजियार करै में जुटल हउवैं? त एही बात पर पहिले एक लाइन सुनि ला, फेर बताइब कि जोति जगावै वाले ऊ उजियारघाट वाले लोग कवन-कवन हउवैं?
ऊ लाइन ह....
नान्हे क उढ़री, जब्बै से सुढ़री, तब्बै से सुढ़री,
नइहरे का नांव उजियार कइलै उढ़री।

भोजपुरिया लोग त सगरे देश-दुनिया में छिंटाइल बाड़ैं। आपन घर-दुआर, देस-जवार, आपनि माटी छोड़ि के उनमें से तमाम लोग जहां तहां बसि-बसाइ भी गयल हउवैं, लेकिन उनही लोगन के बीच कुछ नामी-गिरामी नुमा भाई लोग आ कहीं कि दुबई के भाई जइसन भाई लोग ढुकारी मारि के भोजपुरी क मुफ्त में कमाई खात-अघात हउवैं और रहल-सहल डुबावत हउवैं।
अपराधिन की दुनिया में आजमगढ़, गोरखपुर का नांव त दुबई तक गूंजतै बा, झाल-ताशा लेइके कुछ लोग फिल्मी परदवा पर भी खूब इज्जत बोरत हउवैं। कौनो सीडी की दुकान पर जा अउर भोजपुरी के नाम पर कुछ मांगा तो देखावै में दुकानदार त शरम से गड़ी जाला, आसपास खड़ा गराहक भी ऐसे घूरै लगै लैं, जैसे कौनों आदमी के कोठा पर रंगे हाथ पकड़ि लेहले हों। तुलसी बाबा का कहावत बा कि कारन कवन नाथ मोहिं मारा। बात बालि-सुग्रीव की लड़ाई पर कहलि गइलि ह, लेकिन हमरे कलेजे में ई मुहावरा भोजपुरी की खातिर धंसि जाला कि भइया दुनिया भर में काहे के भोजपुरी का नांव बोरत हउवा। ई-टीवी पर भी एक परोगराम में भोजपुरी क खूब काली पताका फहरति रहलि ह। ऊंहा भी ऊहै कुल गाली-जोगिरा वालन क जमावड़ा।
त भइया
सब लाजि-सरम घोरि के पी गयल लोगन से हमार एक नान्ह-एकन मिनती ह कि अपने साहित्य अउर संसकिरिति से एतना अघाइल बोलबानी, इज्जतपानी वाली एहि भोजपुरी क अब अउर दुर्गती मत करा। इहां त एतना अथाह भंडार ह कि जहैं उड़ेला, उहैं जमाना हक्का-बक्का होइ जाई। फिर भोजपुरी के गटर साबित करै पर काहैं उतारू हउवा। वइसे भइया, ऊ लोग मनिहैं ना, काहें से कि ओही गटरबाजी से उनहन क धंधा-पानी चलत ह। उनहन के एतनो लाज-सरम ना ह कि उनहन क करनी उनहन का माई-बहिन भी त देखति होइहैं...ऐं... त भला बतावा कि उन माई-बहिनन के दिल पर का बीतति होई?
जेतनी फूहर-पातर गाना, सब भोजपुरी में।
जेतनी नंगा नाच, सब भोजपुरी में।
धत ससुरे, तोहन क त सकल न देखै लाकि हउवै।
तोहन के चिल्लू भर पानी में डूब मरै के चाही।


त अब आवा मन तनी हलुक करै के खातिन दुइ लाइन होइ जाय, एही बात पर....
जेकरे अंगुरिया पर दुनिया टिकलि बा।
बखरा में ओकरे नरक परलि बा।
जेकरे पसीनवा से अनधन सोनवा,
ओही के चूसि-चूसि बढ़ति बाय तोनवा।
जल्द से जल्द एहि बलाग पर आप लोगन के बढ़िया-बढ़िया भोजपुरी गानो सुनै के मिली खाटी भोजपुरिया में। तनी स अउर धीरज धरा। एहि बलाग के अपने त पढ़ा ही, आउर भाइन के भी पढ़ावा-सुनावा त के जानै भोजपुरी एही मदद से देर-सबेर उज्जर होइ जाय।
...त भइया राम-राम।


सरकसई का आलम आया
मरकट्ठों के ठम्म,
तइअक तासा
देख तमासा
झंइक-झंइक झम्म।

सोमवार, 14 जनवरी 2008
छछनी छछन्न करै, टाटी-बेड़ा बन्न करै
वैसे त हर लोकभाषा में, बोलचाल में मुहावरन क, कहावतन क भरमार होले लेकिन भोजपुरी क खजाना एहि माने सबसे ढेर धनी-मानी मानन जाला। आज आप लोगन के सामने हम कुछ एही तरह का बोली-बानी क खजाना परोसे जाति हईं........

छछनी छछन्न करै, टाटी-बेड़ा बन्न करै
एकर मतलब होला तिरिया चरित्तर

आंखि एक्को ना, कजरौटा बारह ठो
एहि के दूसरे तरह से भी समझल जा सकै ला.... आंख क आन्हर, नाम बा नयनसुख

ई-बात, ऊ-बात, पड़ाइन तनी सुर्ती दा
माने एहर-ओहर क आलतू फालतू बतकही कइले के बाद मतलब क बात
घर में भूंजल भांग नाही, चलैं जगन्नाथ जी
एहि के दूसरी तरह से भी समझल जा सकै ला........पैसा न कौड़ी, बीच बजार बीच दौड़ा-दौड़ी
मेहरी न लइका, चलैं दुअरिका
माने एकर कुछ-कुछ अइसे भी समझैं कि घर-परिवार का कौनों जर-जिम्मेदारी त हवै ना, कान्ही प गमछा डालि कै चल देहलैं सन्यासी हौवै।
मांस-मछली लइका खांय, हत्या लेहले पाहुन जायं
दूसरे का करनी दूसरे के मत्थे
....त अबहीं त आज ऐतनै....

रविवार, 13 जनवरी 2008
भैया ई नया ब्लॉग ह भोजपुरी क
सच-सच कहीं त हिंदुस्तान का मातृभाषा हिंदी ह अउर हिंदी का मातृभाषा भोजपुरी। उत्तर प्रदेश अउर बिहार के हिंदी पट्टी में भोजपुरी क साहित्यिक खजाना देश के कौनो भी क्षेत्रीय भाषा कोष से बहुत ही अधिक भरल-पुरल हउवै। एकरे इलाका से अइसन-अइसन लिक्खाड़ लोग हिंदी जगत के मिललैं, जिनकर नांव आजौ देश-दुनिया में बड़े आदर से लेहल जाला। भिखारी ठाकुर त फिल्मी पताका फहरौलही रहलैं आ आज तक ओनकर नाम लेत ही मन में माटी की धुन बजै लगैले, हिंदी साहित्य क अकाश आज भी जिनके नाम से जगमगात हउवै, उनही लोगन में हउवैं पंडित रामचंदर शुकुल, सूरजकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वरमा, जयशंकर प्रसाद, हजारी प्रसाद द्रिवेदी, पं.श्याम नरायन पांडे हल्दी घाटी वाले, रामधारी सिंह दिनकर, सुदामा तिवारी धूमिल, हरवंश राय बच्चन, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, अउर आज कल डा.नामवर सिंह, डा.काशीनाथ सिंह,........केतना गिनाईं। फिल्मी दुनिया में त मनोज तिवारी धूम मचउलही हउवैं। एक जमाने में रमई काका, कैलाश गौतम, हरीभैया यानी हरेराम द्विववेदी, चंद्रशेखर मिसिर, डा.श्याम तिवारी, चकाचक बनारसी, भैया जी बनारसी, श्रीकृष्ण तिवारी, भोलानाथ गहमरी, रूपनारायण तिवारी, क्षेम जी, तिरलोकी, और दूर-दूर तक गूंजै वाला नाम मोती बीए। अउर केतना-केतना गिनाईं। इहां नांव गिनावे का मकसद ना हउवै। बस एतना बताइ देईं कि भोजपुरी क खजाना केतना भरल-पूरल हउवै। भोजपुरी का झंडा आज भी हिंदुस्तान के हरकोने में ही नहीं , दुनिया भर में मारिशस से अमेरिका-ब्रिटेन तक लहरात हउवै। हजारों भाई बहन एही इलाके से निकलि के जाने कहां-कहां तक बिराजि गइलें। अपने देश में त बड़े-बड़े नेता-परेता एहि इलाके से भइलैं ही, भारत के बाहर भी राष्ट्रपति, परधानमंत्री इहा के लोग होइ चुकल बाटैं। मारिशस त भोजरी का भंडार ही कहल जाला।
त अबहिन बस ऐतने जान-पहचानि के लिए।
आगे एहि ब्लॉग पर आप लोगन क कृपा बनल रहलि त बहुत कुछ पढ़ै-सुनै के मिली। अपने सभी भोजपुरी भाइन से गुहार ह कि अगर ऊ कुछ लिखे-पढ़ै के लिए गावै-सुनावै के लिए एहि ब्लाग का जरूरत महसूस करिहैं त हम सीना खोलि के उनके सामने हाजिर मिलब। आखिर में आप सब ई जानि लेईं कि जहां तक भोज में पूरी चलैले, उहां तक भोजपुरी का राजपाट हउवै। शायद एही से एकर नाम भोजपुरी परल।
सिर झुकाइ कै सब भोजपुरी भाई-बहिन लोगन के राम-राम।

सपन एक देखलीं
सूतल रहलीं
सपन एक देखलीं
सपन मनभावन हो सखिया।
फूटलि किरनिया
पुरुब असमनवा
उजर घर-आंगन हो सखिया।
अखिया के नीरवा
भइल खेत सोनवा
त खेत भइलें आपन हो सखिया।
गोसयां के लठिया
मुरइया अस तोरलीं
भगवलीं महाजन हो सखिया।
केहू नाहीं ऊंच-नीच
केहू का ना भय
नाहीं केहू बा भयावन हो सखिया।
बइरी पइसवा के
रजवा मेटवलीं
मिलल मोर साजन हो सखिया।
(इ गोरख पांड़े क गीत हउवै)

शनिवार, 12 जनवरी 2008
रउआ सबके राम-राम
भोजपुरी की दुनिया अब बड़ी भारी होइ गइल बा। इहां से उहां तक। सगरे जगत में आज एकर तूती बोलति हउवै। का किताब, का फिलिम, चारों ओर भोजपुरिया का बहार आइल बा। हमरे भोजपुरी भाई-बहन सगरी दुनिया में बिछल हउवैं. त ओही लोगन की खातिर ई ब्लाग से हम रास रचाइ लेहलीं। अब ई ब्लॉग पर आप सबन के भोजपुरी के गीत-गाना खूब सुने के मिली। अब ही त बस एतनी। आप सबके राम-राम।


रउरे बुढि़या के गलवा में क्रीम लागेला, हमरी नइकी के जरि गइलें भाग भाई जी
आज महिला दिवस ह। ईहो एकठो चोचलेबाजी बा। कौनो मुंह बनउले क जरूरत नइखैं। दुनिया भर में दुनिया भर क दिवस मनावै क फैशन स चल गइलि बा। ओही में एक फैशन ईहो हउवै। सरऊ लोग तरह-तरह क तमाशा करत हउवैं। चिढ़ावै के खातिन। कबौं लइकन के चिढ़इहैं, त कबौं बुढ़वन के, कबौं मजदूरन के चिढ़इहैं त कबौं किसानन के... भोजपुरी में एकगो कहावत ह कि ओढ़ौ के दुका नहीं, दरी बिछनौना। दुनिया भर क के गिनावै. अपने आसैपास देखिला, आसैपास का- तनी अपने घरहि में देखिला कि कइसन हाल बा महिला लोगन का। केहू जनमते बेंचि देत ह, केहू गरभ में ही मरवाइ देत ह, त केहू जिनगी भर मारि-मारि के कचूमर निकालि लेत ह।
त भइया ई कुल झांसा-पट्टी क खेल ह। जौन करै के चाही, तौन त केहू कुछ करत-धरत ना ह, महिला दिवस जरूर मनइहैं। अमीरी-गरीबी का खोदि-खोदि के समुंदर बनावत जात हउवैं, पइसा वालन के मेम इसनो-पाउडर चेंपि के रोज-रोज हाट-बाट, माल, मारकेट क धौरहरि मचउले हईं, गरीबन क बिटिया-मेहरारू गिट्टी तोड़त हईं, घास करति हईं, हर जोतत हईं, पत्ता-पन्नी बीनति हईं, त पेट-परदा चलत ह।
केतना महिला संगठन हउवैं, हर पार्टी में महिला विंग अलग से, केतना पंच-परधान मेहरारू हईं, अउर-त-अउर सोनिया गान्ही, मायावती बहिन जइसन दुनिया भर क चौधरानी अपने देश-मुलुक में गद्दी पर बइठि के खूब मजा काटति बानी, आ औरतन क हाल जस क तस बा। वोट लेवै के बेला में ई कुल औरति बनि जालीं, एकरे बाद पांच साल तक के पूछत बा, केहू नइखैं। अब त भइया ई कुल चिरकुटाई सुनत-सुनत जी पकि गइल बा। ई कुल महोखाबाजी अब तनिको बरदास्त ना होत बा। ऊ कुल आपन-आपन चमकीला खतोना बनाइ-बनाइ के हम लोगन के खूब भरमावत हउवैं। छोड़ा जाएदा उनहन क महिला-सहिला दिवस का बात-कुबात...... आवा तनी एही बहाने गीत-गवनई होइ जाय गोरख पांड़े के मुंह-राग से, उनहीं के सबदन में.....

पहिले-पहिल जब वोट मांगे अइलें त बोले लगलें ना
तोहके खेतवा दिअइबों
तोहके फसलि उगइबो
दूसरे चुनउवा में जब उपरइलें त बोलें लगलें ना
तोहके कुइयां खनइबो
सब पियसिया मिटइबौ
तीसरे चुनउवा में चेहरा दिखइलें त बोले लगलें ना
तोहके महल उठइबों
ओमे बिजुरी लगइबों
अबकी टपकिहें त कहबों कि देख तू बहुत कइला ना
तोहके अब न थकइबो
आपन हथवा उठइबो
जब हम ईहवों के किलवा ढहइबो त एही हाथे ना
तोहरो मटिया मिलइबो
आपन रजवा बनइबों
......त एही हाथे ना।


सोमवार, 25 फ़रवरी 2008
फागुन में बाबा देवर लागै
आइ गइलि, आइ गइलि, लउकति ना हउवै त का होइ गइलि, मनवा में त रसमसाती हउवै......भीनति हउवै, गुनगुनाति हउवै...हंसति हउवै, मुसुकाति हउवै, थिरकति हउवै, लहालौट होति हउवै....रंगियाति हउवै, अंगियाति हउवै, अगियाति हउवै अब्बै से होरी .....हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा......
मौसमो मुरुकै लगलि बा, कुहुकै लगलि बा, हुहुकै लगलि बा, लुहुकै लगलि बा, महकै लगलि बा, सहकै लगलि बा, बहकै लगलि बा, रहि-रहि के चहकै लगलि बा, रहि-रहि के दहकै लगलि बा, टहकै लगलि बा, रसे-रसे डहकै लगलि बा, मन भितरें-भितर सहकै लगलि बा...हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा....
अब्बै से रंग चढ़ै लगलि बा, ढंग पढ़ै लगलि बा, पोर-पोर में बसंती कोपल कढ़ै लगलि बा, चिक्कन-चिक्कन रुप-रंग गढ़ै लगलि बा, फगुनौटी का हीरा-मोती जड़ै लगलि बा, चारों ओर फूल-पत्ती झरै लगलि बा, बुढ़उवो से नीक-नइकी डरै लगलि बा, मुनक्का नाईं मनहि-मन ढरै लगलि बा, का जानैं लोग एहि वैलेंटाइन का मरम....तनी-तनी तर-ऊपरि रोम-रोम बरै लगलि बा, नशाइ के आंखि कतहूं..पैर कतहूं परै लगलि बा, अंगूर अइसनि अंग-अंग फरै लगलि बा, जइसे हीया में अमरित भरै लगलि बा..हा-हा-हा-हा-हा-हा.....
पेड़-पौधा सुघराए लगल, हवा-पानी लहराए लगलि, सुरुज क रंग गहराए लगल, चनरमा अंग फहराए लगल, दिन क चलन अहराए लगल, रात चुप्पे-चुप्पे होरिहराए लगल, केहू उझकति बा, केहू चिहुंकत बा, केहू निहुकति बा, केहू टिहुकति बा, केहू अगवारे-पिछवारे रोज पिहुकति बा...हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा........
फागुन मा बाबा देवर लागै।
कबौं एहर, त कब्बौं ओहर लागै।
फागुन मा बुढ़िया जवान लागै।
कबौ बच्ची, त कब्बौ सयान लागै।
फागुन मा रार बेकार लागै।
सब दउरि-दउरि अंकवार लागै।
हा-हा-हा-हा-हा-हा...............


शनिवार, 23 फ़रवरी 2008
फागुन उड़त गुलाब
झूमर चौतार झमारी, तजो बनवारी
फागुन उड़त गुलाब अर्गला कुमकुम जारी


धनि-धनि ए सिया रउरी भाग, राम वर पायो।
लिखि लिखि चिठिया नारद मुनि भेजे, विश्वामित्र पिठायो।
साजि बरात चले राजा दशरथ,
जनकपुरी चलि आयो, राम वर पायो।
वनविरदा से बांस मंगायो, आनन माड़ो छवायो।
कंचन कलस धरतऽ बेदिअन परऽ,
जहाँ मानिक दीप जराए, राम वर पाए।
भए व्याह देव सब हरषत, सखि सब मंगल गाए,
राजा दशरथ द्रव्य लुटाए, राम वर पाए।
धनि -धनि ए सिया रउरी भाग, राम वर पायो।



शुभ कातिक सिर विचारी, तजो वनवारी।
जेठ मास तन तप्त अंग भावे नहीं सारी, तजो वनवारी।
बाढ़े विरह अषाढ़ देत अद्रा झंकारी, तजो वनवारी।
सावन सेज भयावन लागतऽ,
पिरतम बिनु बुन्द कटारी, तजो वनवारी।
भादो गगन गंभीर पीर अति हृदय मंझारी,
करि के क्वार करार सौत संग फंसे मुरारी, तजो वनवारी।
कातिव रास रचे मनमोहन,
द्विज पाव में पायल भारी, तजो वनवारी।
अगहन अपित अनेक विकल वृषभानु दुलारी,
पूस लगे तन जाड़ देत कुबजा को गारी।
आवत माघ बसंत जनावत, झूमर चौतार झमारी, तजो वनवारी।
फागुन उड़त गुलाब अर्गला कुमकुम जारी,
नहिं भावत बिनु कंत चैत विरहा जल जारी,
दिन छुटकन वैसाख जनावत, ऐसे काम न करहु विहारी, तजो वनवारी।


गुरुवार, 21 फ़रवरी 2008
अंखिया क पुतरी

अंखिया क पुतरी
करेजवा में उतरी
विदेशिया क सुघरी
सगरवा में उतरी
उतरी हो रामा
पुतरी हो रामा
रामा हो रामा....

सूने-सूने डिहवा
मड़ैया सूनी-सूनी
कबौ देहरादूनी
त कबौ टेलीफूनी
मन भइलें खूनी-खूनी
याद आवै दूनादूनी
...अंखिया क पुतरी हो रामा

छुटि गइलैं गउवां
बिलाइ गइलैं नउवां
बालेपन क दिनवा
हो गइलैं महीनवां
नाही केहू आवै ला
ना जालै केहू उहवां
...अंखिया क पुतरी हो रामा

हे बिलाग वाले बाबू काहे एतना नाराज हउवा


न एक्को टिप्पन्नी-सिप्पनी, न कौनो ताक-झांक
आखिर एतना नाराजी क कौनो तो वजह होई
हम त रउवा लोगन के साथ कौनो एइसन गलती-सलती भी ना कइले बानीं,
हम ना जानि पावत हईं
कि बिलाग चलावै वाले बड़े-बड़े
मगजमरुअन के बीच हमारि हालत
लतमरुअन अइसन काहे होइ गइल बा।

बड़ी मेहनति से एग्गो सुत्तर हाथ में आवति दिखत ह
कि जब केहू के बिलाग पर कौनो टिप्पन्नी-सिप्पन्नी ना करति हईं
त ऊ लोग की बिरादरी से बाहर होव ही के परी।
ऊ लोग आपस में आजकल खू मुंह में मुंह सटाइ के
पच्च-पच्च पुच्ची मारत हउवैं,
लबर-लबर लिबरावत हउवैं,
केहू तुलसीदास होत जात बा
त चार लाइन पोंकि के केहू मुकितबोध के ब्रहम राछस के नाई
अपने मनवे डांस-डांस थिरकउले में मगन बा।
...त भइया ई शंकर बाबा लोगन के बरात में आपुन त तीन-तेरह क दशा होई जाई
चला भइया
कौनो बात नाहीं,
कब्बौं तक रउवा लोगन के मति-बुद्धी में हमार ढूंढि मची।
तब तक के लिए ...राम-राम, जै भोजपुरी!

ई बात चंडूखाने क हउवै का?


तीन-चार साल से भोजपुरी का नांव खूब उजियार होत ह। अइसर उजियार कि अन्हारो क सिर सरम से गड़ि जाय। त आपो सबन जानल चाहब कि ऊ कवन लोग हउवैं, जे भोजपुरी क नांव उजियार करै में जुटल हउवैं? त एही बात पर पहिले एक लाइन सुनि ला, फेर बताइब कि जोति जगावै वाले ऊ उजियारघाट वाले लोग कवन-कवन हउवैं?
ऊ लाइन ह....
नान्हे क उढ़री, जब्बै से सुढ़री, तब्बै से सुढ़री,
नइहरे का नांव उजियार कइलै उढ़री।

भोजपुरिया लोग त सगरे देश-दुनिया में छिंटाइल बाड़ैं। आपन घर-दुआर, देस-जवार, आपनि माटी छोड़ि के उनमें से तमाम लोग जहां तहां बसि-बसाइ भी गयल हउवैं, लेकिन उनही लोगन के बीच कुछ नामी-गिरामी नुमा भाई लोग आ कहीं कि दुबई के भाई जइसन भाई लोग ढुकारी मारि के भोजपुरी क मुफ्त में कमाई खात-अघात हउवैं और रहल-सहल डुबावत हउवैं।
अपराधिन की दुनिया में आजमगढ़, गोरखपुर का नांव त दुबई तक गूंजतै बा, झाल-ताशा लेइके कुछ लोग फिल्मी परदवा पर भी खूब इज्जत बोरत हउवैं। कौनो सीडी की दुकान पर जा अउर भोजपुरी के नाम पर कुछ मांगा तो देखावै में दुकानदार त शरम से गड़ी जाला, आसपास खड़ा गराहक भी ऐसे घूरै लगै लैं, जैसे कौनों आदमी के कोठा पर रंगे हाथ पकड़ि लेहले हों। तुलसी बाबा का कहावत बा कि कारन कवन नाथ मोहिं मारा। बात बालि-सुग्रीव की लड़ाई पर कहलि गइलि ह, लेकिन हमरे कलेजे में ई मुहावरा भोजपुरी की खातिर धंसि जाला कि भइया दुनिया भर में काहे के भोजपुरी का नांव बोरत हउवा। ई-टीवी पर भी एक परोगराम में भोजपुरी क खूब काली पताका फहरति रहलि ह। ऊंहा भी ऊहै कुल गाली-जोगिरा वालन क जमावड़ा।
त भइया
सब लाजि-सरम घोरि के पी गयल लोगन से हमार एक नान्ह-एकन मिनती ह कि अपने साहित्य अउर संसकिरिति से एतना अघाइल बोलबानी, इज्जतपानी वाली एहि भोजपुरी क अब अउर दुर्गती मत करा। इहां त एतना अथाह भंडार ह कि जहैं उड़ेला, उहैं जमाना हक्का-बक्का होइ जाई। फिर भोजपुरी के गटर साबित करै पर काहैं उतारू हउवा। वइसे भइया, ऊ लोग मनिहैं ना, काहें से कि ओही गटरबाजी से उनहन क धंधा-पानी चलत ह। उनहन के एतनो लाज-सरम ना ह कि उनहन क करनी उनहन का माई-बहिन भी त देखति होइहैं...ऐं... त भला बतावा कि उन माई-बहिनन के दिल पर का बीतति होई?
जेतनी फूहर-पातर गाना, सब भोजपुरी में।
जेतनी नंगा नाच, सब भोजपुरी में।
धत ससुरे, तोहन क त सकल न देखै लाकि हउवै।
तोहन के चिल्लू भर पानी में डूब मरै के चाही।

सावधान संसद है बहस चल रही है

संसद में बहस चल रही है कि देश जल रहा है
सावधान
संसद है
बहस चल रही है
बहस चल रही है कि देश जल रहा है,
कश्मीर जल रहा है,
आसाम जल रहा है,
गुजरात जल रहा है,
पंजाब जल रहा है,
सावधान
संसद है
बहस चल रही है..............
बहस चल रही है कि टीआरपी खतरे में है
नेतागीरी बेआबरू हो रही है
दुश्मन घर में घुस के मार जा रहे हैं
और हम लाइव टेलीकास्ट में मगन है
सावधान
संसद है
बहस चल रही है
बहस चल रही है कि चुनाव आ रहा है,
कैसे कुर्सी बचाएं
कैसे एक बार फिर जनता को उल्लू बनाएं
कैसे महंगाई कुछ दिन के लिए घटाकर
वोटो की झपटमारी कर निकलें
फिर पांच साल लूटपाट की मस्तियां मनाएं
बहस चल रही है...........

एक फ़िलिस्तीनी घाव की डायरी / महमूद दरवेश



हमें याद दिलाने की ज़रूरत नहीं
कि माउन्ट कारमेल[2] हमारे भीतर है
और गैलिली[3] की घास हमारी पलकों पर ।
ये मत कहना : अगर हम दौड़ पड़ते उस तक एक नदी की तरह ।
मत कहना:
हम और हमारा देश एक ही माँस और अस्थियाँ हैं ।
...
जून से पहले हम नौसिखिये फ़ाख़्ते न थे
सो हमारा प्रेम बन्धन के बावजूद बिखरा नहीं
बहना, इन बीस बरसों में
हमारा काम कविता लिखना नहीं
लड़ना था ।
०००
वह छाया जो उतरती है तुम्हारी आँखों में
-ईश्वर का एक दैत्य
जो जून के महीने में बाहर आया
हमारे सिरों को सूरज से लपेट देने को-
शहादत है उसका रंग
प्रार्थना का उसका स्वाद
किस ख़ूबी से हत्या करता है वह, किस ख़ूबी से करता है उद्धार ।
०००
रात जो शुरू हुई थी तुम्हारी आँखों से -
मेरी आत्मा के भीतर वह एक लम्बी रात का अन्त था:
अकाल के युग से ही
यहाँ और अब तक वापसी की राह में
रहे हैं साथ-साथ
०००
और हमने जाना किस से बनती है कोयल की आवाज़
आक्रान्ताओं के चेहरे पर लटकता एक चाकू
हमने जाना कब्रिस्तान की शान्ति किस से बनती है
एक त्यौहार से ... जीवन के बग़ीचे से
०००
तुमने अपनी कविताएँ गाईं, मैंने छज्जों को छोड़ते हुए देखा
अपनी दीवारों को
शहर का चौक आधे पहाड़ तक फैल गया था:
वह संगीत न था जो हमने सुना
वह शब्दों का रंग न था जो हमने देखा
कमरे के भीतर दस लाख नायक थे ।
०००
धरती सोख लेती है शहीदों की त्वचाओं को ।
यह धरती गेहूं और सितारों का वादा करती है ।
आराधना करो इसकी!
हम इसके नमक और पानी हैं ।
हम इसके घाव हैं, लेकिन लड़ते रहने वाला घाव ।
०००
मेरी बहना, आंसू हैं मेरे गले में
और मेरी आंखों में आग:
मैं आज़ाद हूं
मैं सुल्तान के प्रवेशद्वार पर अब नहीं करूंगा विरोध ।
वे जो सारे मर चुके, और वे जो मरेंगे दिवस के द्वार पर
उन सब ने ले लिया है मुझे आग़ोश में, और बदल दिया है मुझे एक हथियार में ।
०००
उफ़, यह मेरा अड़ियल घाव!
कोई सूटकेस नहीं है मेरा देश
मैं कोई यात्री नहीं हूं
मैं एक प्रेमी हूं और प्रेमिका के वतन से आया हूँ ।
०००
भूगर्भवेत्ता व्यस्त है पत्थरों का विश्लेषण करने में
गाथाओं के मलबे में वह खुद अपनी आंखें तलाश रहा है
यह दिखाने को
कि मैं सड़क पर फिरता एक दृष्टिहीन आवारा हूँ
जिसके पास सभ्यता का एक अक्षर तक नहीं ।
जबकि अपने ख़ुद के समय में मैं अपने पेड़ रोपता हूँ
मैं गाता हूँ अपना प्रेम
०००
समय आया है कि मैं मृतकों के बदले शब्द लूँ
समय आया है कि मैं अपनी धरती और कोयल के वास्ते अपने प्रेम को साबित करूँ
क्योंकि ऐसा यह समय है कि हथियार गिटार को लील जाता है
और आईने में मैं लगातार लगातार धुंधलाता जा रहा हूँ
जब से मेरी पीठ पर उगना शुरू किया है एक पेड़ ने ।

दूसरों के बारे में सोचो / महमूद दरवेश

जब तुम तैयार कर रहे होते हो अपना नाश्ता
दूसरों के बारे में सोचो
(भूल मत जाना कबूतरों को दाने डालना)
जब तुम लड़ रहे होते हो अपने युद्ध
दूसरों के बारे में सोचो
(मत भूलो उनके बारे में जो चाहते हैं शान्ति)
जब तुम चुकता कर रहे होते हो पानी का बिल
दूसरों के बारे में सोचो
(उनके बारे में जो टकटकी लगाए ताक रहे हैं मेघों को)
जब तुम जा रहे होते हो अपने घर की तरफ़
दूसरों के बारे में सोचो
(उन्हें मत भूल जाओ जो तंबुओं-छोलदारियों में कर रहे हैं निवास)
जब तुम सोते समय गिन रहे होते हो ग्रह-नक्षत्र-तारकदल
दूसरों के बारे में सोचो
(यहाँ वे भी हैं जिनके पास नहीं है सिर छिपाने की जगह)
जब तुम रूपकों से स्वयं को कर रहे होते हो विमुक्त
दूसरों के बारे में सोचो
(उनके बारे में जिनसे छीन लिया गया है बोलने का अधिकार)
जब तुम सोच रहे हो दूरस्थ दूसरों के बारे में
अपने बारे में सोचो
(कहो : मेरी ख़्वाहिश है कि मैं हो जाता अँधेरे में एक कंदील)

लोगों के लिए गीत / महमूद दरवेश

आओ ! दुख और जंज़ीर के साथियों
हम चलें कुछ भी न हारने के लिए
कुछ भी न खोने के लिए
सिवा अर्थियों के
आकाश के लिए हम गाएंगे
भेजेंगे अपनी आशाएँ
कारखानों और खेतों और खदानों में
हम गाएंगे और छोड़ देंगे
अपने छिपने की जगह
हम सामना करेंगे सूरज का
हमारे दुश्मन गाते हैं -
"वे अरब हैं... क्रूर हैं..."
हाँ, हम अरब हैं
हम निर्माण करना जानते हैं
हम जानते हैं बनाना
कारखाने अस्पताल और मकान
विद्यालय, बम और मिसाईल
हम जानते हैं
कैसे लिखी जाती है सुन्दर कविता
और संगीत...
हम जानते हैं।

एक सर्द सुबह / निकोलस गियेन

सोचता हूँ उस सर्द सुबह के बारे में
जब मैं गया था तुमसे मिलने
वहाँ, जहाँ हवाना जाना चाहता है खेतों की खोज में,
वहाँ तुम्हारे रौशन उपांत में।
मैं अपनी रम की बोतल
और अपनी जर्मन कविताओं की किताब के साथ,
जो आख़िरकार तुम्हें दे आया था तोहफ़े में।
(या फिर रख लिया था तुमने ही उसे?)
माफ़ करो, लेकिन उस दिन
मुझे लगी थीं तुम एक छोटी अकेली बच्ची,
या शायद एक भीगी नन्ही गौरैया।
मैंने पूछना चाहा था तुमसे :
तुम्हारे घोसलें के बारे में
और तुम्हारी माँ और पिता के बारे में
लेकिन नहीं पूछ पाया था।
तुम्हारे कुर्ते के वितल से,
जैसे गिरीं थीं दो गिन्नियाँ एक कुंड में,
तुम्हारी छातियों ने बहरा कर दिया था मुझे अपने शोर से।

देख रही है माँ / यश मालवीय

जाती हुई धूप संध्या की
सेंक रही है माँ
अपना अप्रासंगिक होना
देख रही है माँ

भरा हुआ घर है
नाती पोतों से, बच्चों से
अन बोला बहुओं के बोले
बंद खिड़कियों से
दिन भर पकी उम्र के घुटने
टेक रही है माँ

फूली सरसों नही रही
अब खेतों में मन के
पिता नहीं हैं अब नस नस
क्या कंगन सी खनके
रस्ता थकी हुई यादों का
छेक रही है माँ

बुझी बुझी आँखों ने
पर्वत से दिन काटे हैं
कपड़े नहीं, अलगनी पर
फैले सन्नाटे हैं
इधर उधर उड़ती सी नजरें
फेक रही है माँ


बनाया था माँ ने वह चूल्हा / ऋषभ देव शर्मा

चिकनी पीली मिट्टी को
कुएँ के मीठे पानी में गूँथ कर
बनाया था माँ ने वह चूल्हा
और पूरे पंद्रह दिन तक
तपाया था जेठ की धूप में
दिन - दिन भर

उस दिन
आषाढ़ का पहला दौंगड़ा गिरा,
हमारे घर का बगड़
बूँदों में नहा कर महक उठा था,
रसोई भी महक उठी थी -
नए चूल्हे पर खाना जो बन रहा था।

गाय के गोबर में
गेहूँ का भुस गूँथ कर
उपले थापती थी माँ बड़े मनोयोग से
और आषाढ़ के पहले
बिटौड़े में सजाती थी उन्हें
बड़ी सावधानी से।

बूंदाबांदी के बीच बिटौड़े में से
बिना भिगोए उपले लाने में
जो सुख मिलता था ,
आज लॉकर से गहने लाने में भी नहीं मिलता।

सूखे उपले
भक्क से पकड़ लेते थे आग
और
उंगलियों को लपटों से बचाती माँ
गही में सेंकती थी हमारे लिए रोटी
-फूले-फूले फुलके।

गेहूँ की रोटी सिंकने की गंध
बैठक तक ही नहीं , गली तक जाती थी।
हम सब खिंचे चले आते थे
रसोई की ओर।

जब महकता था बारिश में बगड़
और महमहाती थी गेहूँ की गंध से रसोई -
माँ गुनगुना उठती थी
कोई लोकगीत - पीहर की याद का।

माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी।

बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं।
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न!
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को।

आग बढ़ती है
तो रोटी जलने लगती है।
तेरे बहनोई को जली रोटी पसंद नहीं रे!
रोटी को बचाती हूँ तो उँगली जल जाती है।

माँ की उँगलियाँ छालों से भर जाती थीं
पर पिताजी की रोटी पर एक भी काला निशान कभी नहीं दिखा!

माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी।

बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं।
मेरे बीरा! इन झोंकों को रोक दे न!
बड़े बदमाश हैं ये झोंके ,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को।

आग बुझती है
तो रोटी फूलती नहीं
तेरा भानजा अधफूली रोटी नहीं खाता रे!
बुझी आग जलाती हूँ तो आँखें धुएँ से भर जाती हैं।

माँ की आँखों में मोतियांबिंद उतर आया
पर मेरी थाली में कभी अधफूली रोटी नहीं आई!

माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी।

रोटी बनाना सीखती मेरी बेटी
जब तवे पर हाथ जला लेती है,
आँखें मसलती
रसोई से निकलती है।
तो लगता है
माँ आज भी गुनगुना रही है।

मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न!
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को।

माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी।

माँ / कुँअर बेचैन
माँ!
तुम्हारे सज़ल आँचल ने
धूप से हमको बचाया है।
चाँदनी का घर बनाया है।
तुम अमृत की धार प्यासों को
ज्योति-रेखा सूरदासों को
संधि को आशीष की कविता
अस्मिता, मन के समासों को
माँ!
तुम्हारे तरल दृगजल ने
तीर्थ-जल का मान पाया है
सो गए मन को जगाया है।
तुम थके मन को अथक लोरी
प्यार से मनुहार की चोरी
नित्य ढुलकाती रहीं हम पर
दूध की दो गागरें कोरी
माँ!
तुम्हारे प्रीति के पल ने
आँसुओं को भी हँसाया है
बोलना मन को सिखाया है।

माँ कहती है / राजेश जोशी

हम हर रात
पैर धोकर सोते है
करवट होकर।
छाती पर हाथ बाँधकर
चित्त
हम कभी नहीं सोते।
सोने से पहले
माँ
टुइयाँ के तकिये के नीचे
सरौता रख देती है
बिना नागा।
माँ कहती है
डरावने सपने इससे
डर जाते है।
दिन-भर
फिरकनी-सी खटती
माँ
हमारे सपनों के लिए
कितनी चिन्तित है!


माँ का नाच / बोधिसत्व

वहाँ कई स्त्रियाँ थीं
जो नाच रही थीं, गाते हुए
वे खेत में नाच रही थीं या
आंगन में यह उन्हें भी नहीं पता था
एक मटमैले वितान के नीचे था
चल रहा यह नाच ।
कोई पीली साड़ी पहने थी
कोई धानी
कोई गुलाबी, कोई जोगन-सी
सब नाचते हुए मदद कर रही थीं
एक-दूसरे की
थोड़ी देर नाच कर दूसरी के लिए
हट जाती थीं वे नाचने की जगह से ।
कुछ देर बाद बारी आई माँ के नाचने की
उसने बहुत सधे ढंग से
शुरू किया नाचना
गाना शुरू किया बहुत पुराने तरीके से
पुराना गीत
माँ के बाद नाचना था जिन्हें वे भी
जो नाच चुकी थीं वे भी अचम्भित
मन ही मन नाच रही थीं माँ के साथ ।
मटमैले वितान के नीचे
इस छोर से उस छोर तक नाच रही थी माँ
पैरों में बिवाइयाँ थीं गहरे तक फटी
टूट चुके थे घुटने कई बार
झुक चली थी कमर
पर जैसे भँवर घूमता है
जैसे बवंडर नाचता है वैसे
नाच रही थी माँ ।
आज बहुत दिनों बाद उसे
मिला था नाचने का मौका
और वह नाच रही थी बिना रुके
गा रही थी बहुत पुराना गीत
गहरे सुरों में ।
अचानक ही हुआ माँ का गाना बन्द
पर नाचना जारी रहा
वह इतनी गति में थी कि परबस
घूमती जा रही थी
फिर गाने की जगह उठा विलाप का स्वर
और फैलता चला गया उसका वितान ।
वह नाचती रही बिलखते हुए
धरती के इस छोर से उस छोर तक
समुद्र की लहरों से लेकर जुते हुए खेत तक
सब भरे से उसके नाच की धमक से
सब में समाया था उसका बिलखता हुआ गाना ।


माँ की आँखें / श्रीकांत वर्मा

मेरी माँ की डबडब आँखें
मुझे देखती हैं यों
जलती फ़सलें, कटती शाखें।
मेरी माँ की किसान आँखें!
मेरी माँ की खोई आँखें
मुझे देखती हैं यों
शाम गिरे नगरों को
फैलाकर पाँखें।
मेरी माँ की उदास आँखें।

माँ पर नहीं लिख सकता कविता / चन्द्रकान्त देवताले

माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविता
अमर चिऊँटियों का एक दस्ता मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है
माँ वहाँ हर रोज़ चुटकी-दो-चुटकी आटा डाल देती है
मैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ
यह किस तरह होता होगा
घट्टी पीसने की आवाज़ मुझे घेरने लगती है
और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनिया में ऊँघने लगता हूँ
जब कोई भी माँ छिलके उतार कर
चने, मूँगफली या मटर के दाने नन्हीं हथेलियों पर रख देती है
तब मेरे हाथ अपनी जगह पर थरथराने लगते हैं
माँ ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिए
देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया
मैंने धरती पर कविता लिखी है
चन्द्रमा को गिटार में बदला है
समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूँगा
माँ पर नहीं लिख सकता कविता!


पिता की तस्वीर / मंगलेश डबराल

पिता की छोटी छोटी बहुत सी तस्वीरें
पूरे घर में बिखरी हैं
उनकी आँखों में कोई पारदर्शी चीज़
साफ़ चमकती है
वह अच्छाई है या साहस
तस्वीर में पिता खाँसते नहीं
व्याकुल नहीं होते
उनके हाथ पैर में दर्द नहीं होता
वे झुकते नहीं समझौते नहीं करते
एक दिन पिता अपनी तस्वीर की बग़ल में
खड़े हो जाते हैं और समझाने लगते हैं
जैसे अध्यापक बच्चों को
एक नक्शे के बारे में बताता है
पिता कहते हैं मैं अपनी तस्वीर जैसा नहीं रहा
लेकिन मैंने जो नए कमरे जोड़े हैं
इस पुराने मकान में उन्हें तुम ले लो
मेरी अच्छाई ले लो उन बुराइयों से जूझने के लिए
जो तुम्हें रास्ते में मिलेंगी
मेरी नींद मत लो मेरे सपने लो
मैं हूँ कि चिन्ता करता हूँ व्याकुल होता हूँ
झुकता हूँ समझौते करता हूँ
हाथ पैर में दर्द से कराहता हूँ
पिता की तरह खाँसता हूँ
देर तक पिता की तस्वीर देखता हूँ ।

दुख पिता की तरह / अनूप अशेष

कुछ नहीं कहते
न रोते हैं
दुख
पिता की तरह
होते हैं
इस भरे तालाब से
बाँधे हुए
मन में
धुआँते से रहे ठहरे
जागते तन में
लिपट कर हम में
बहुत चुपचाप
सोते हैं।
सगे अपनी बाँह से
टूटे हुए
घर के
चिता तक जाते
उठा कर पाँव
कोहबर के
हम अजाने में जुड़ी
उम्मीद
बोते हैं।

पिता मर रहे थे / हेमन्त जोशी

इस दुनिया में मर रहे थे पिता
पिता के भीतर मर रही थी यह दुनिया।
मेरी दुनिया में मर रहे थे पिता
एक पूरी दुनिया मर रही थी मेरे पिता के साथ।
मृत्यु के बाद
मेरी स्मृति में जीवित रहेंगे मेरे पिता
पिता की स्मृति में नहीं रह पाऊंगा मैं?

प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता / चन्द्रकान्त देवताले

तुम्हारी निश्चल आंखें
तारों-सी चमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश में
प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता
ईथर की तरह होता है
ज़रूर दिखाई देती होंगी नसीहतें
नुकीले पत्थरों-सी
दुनिया-भर के पिताओं की लम्बी कतार में
पता नहीं कौन-सा कितना करोड़वाँ नम्बर है मेरा
पर बच्चों के फूलोंवाले बग़ीचे की दुनिया में
तुम अव्वल हो पहली कतार में मेरे लिए
मुझे माफ़ करना मैं अपनी मूर्खता और प्रेम में समझा था
मेरी छाया के तले ही सुरक्षित रंग-बिरंगी दुनिया होगी तुम्हारी
अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गई हो
मैं ख़ुश हूँ सोचकर
कि मेरी भाषा के अहाते से परे है तुम्हारी परछाई


बस में पिता / उदय प्रकाश

मैंने बिल्कुल साफ़-साफ़ देखा
उस बस पर बैठे
कहीं जा रहे थे पिता
उनके सफ़ेद गाल, तम्बाकू भरा उनका मुँह
किसी को न पहचानती उनकी आँखें
उस बस को रोको
जो अदृश्य हो जाएगी अभी
उस बस तक
क्या
पहुँच सकती है
मेरी आवाज़ ?
उस बस पर बैठ कर
इस तरह क्यों चले गए पिता ?


हार गए पिता / बोधिसत्व

पिता थोड़े दिन और जीना चाहते थे
वे हर मिलने वाले से कहते कि
बहुत नहीं दो साल तीन साल और मिल जाता बस।
वे ज़िंदगी को ऐसे माँगते थे जैसे मिल सकती है
किराने की दुकान पर।
उनकी यह इच्छा जान गए थे उनके डॉक्टर भी
सब ने पूरी कोशिश की पिता को बचाने की
पर कुछ भी काम नहीं आया।
माँ ने मनौतियाँ मानी कितनी
मैहर की देवी से लेकर काशी विश्वनाथ तक
सबसे रोती रही वह अपने सुहाग को
ध्रुव तारे की तरह
अटल करने के लिए
पर उसकी सुनवाई नहीं हुई कहीं...।
1997 में
जाड़ों के पहले पिता ने छोड़ी दुनिया
बहन ने बुना था उनके लिए लाल इमली का
पूरी बाँह का स्वेटर
उनके सिरहाने बैठ कर
डालती रही स्वेटर
में फंदा कि शायद
स्वेटर बुनता देख मौत को आए दया,
भाई ने खरीदा था कंबल
पर सब कुछ धरा रह गया
घर पर ......
बाद में ले गए महापात्र सब ढोकर।
पिता ज्यादा नहीं 2001 कर जीना चाहते थे
दो सदियों में जीने की उनकी साध पुजी नहीं
1936 में जन्में पिता जी तो सकते थे 2001 तक
पर देह ने नहीं दिया उनका साथ
दवाएँ उन्हें मरने से बचा न सकीं ।
इच्छाएँ कई और थीं पिता की
जो पूरी नहीं हुईं
कई और सपने थे ....अधूरे....
वे तमाम अधूरे सपनों के साथ भी जीने को तैयार थे
पर नहीं मिले उन्हें तीन-चार साल
हार गए पिता
जीत गया काल ।


? / गगन गिल
पहला-पहला प्रेम था
पहला-पहला दुख
बहुत सारी उनींद
और नींद की गोलियों के बीच
दोस्त पता नहीं कहाँ थे ?



तुमने मुझे / शमशेर बहादुर सिंह

तुमने मुझे और गूँगा बना दिया
एक ही सुनहरी आभा-सी
सब चीज़ों पर छा गई
मै और भी अकेला हो गया
तुम्हारे साथ गहरे उतरने के बाद
मैं एक ग़ार से निकला
अकेला, खोया हुआ और गूँगा
अपनी भाषा तो भूल ही गया जैसे
चारों तरफ़ की भाषा ऐसी हो गई
जैसे पेड़ पौधों की होती है
नदियों में लहरों की होती है
हज़रत आदम के यौवन का बचपना
हज़रत हौवा की युवा मासूमियत
कैसी भी! कैसी भी!
ऐसा लगता है जैसे
तुम चारों तरफ़ से मुझसे लिपटी हुई हो
मैं तुम्हारे व्यक्तित्व के मुख में
आनंद का स्थायी ग्रास... हूँ
मूक।


तुम्हारी पलकों का कँपना / अज्ञेय

तुम्हारी पलकों का कँपना।
तनिक-सा चमक खुलना, फिर झँपना ।
तुम्हारी पलकों का कँपना।
मानो दीखा तुम्हें किसी कली के
खिलने का सपना।
तुम्हारी पलकों का कँपना।
सपने की एक किरण मुझको दो ना,
है मेरा इष्ट तुम्हारे उस सपने का कण होना,
और सब समय पराया है
बस उतना क्षण अपना।
तुम्हारी
पलकों का कँपना।


बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु / सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!
पूछेगा सारा गाँव, बंधु!

यह घाट वही जिस पर हँसकर,
वह कभी नहाती थी धँसकर,
आँखें रह जाती थीं फँसकर,
कँपते थे दोनों पाँव बंधु!

वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी, सहती थी,
देती थी सबके दाँव, बंधु!


रचना / अशोक वाजपेयी

कुछ प्रेम
कुछ प्रतीक्षा
कुछ कामना से
रची गई है वह,
— हाड़माँस से तो
बनी थी बहुत पहले।