Saturday, 6 July 2013

कामयाब महिलाओं की दास्तान


फ़ज़ल इमाम मल्लिक

सुधा मेनन की नई किताब ‘लीडिंग लेडीज’ देश की चुनिंदा महिलाओं की कामयाबी, उनके संघर्ष और जीजीविषा का दस्तावेज़ है। पेशे से पत्रकार सुधा मेनन की क़रीब सवा चार सौ पन्नों में फैली यह पुस्तक अपनी तरह की शायद पहली किताब है जिसमें देश की चुनिंदा महिलाओं के जीवन को पाठकों के सामने रखा गया है। इस पुस्तक के रचने की एक बड़ी वजह यह हो सकती है कि सुधा मेनन ख़ुद महिला हैं लेकिन सिर्फ़ यह वजह ही काफ़ी नहीं है। उन्होंने कहा भी है कि इसके पीछे मक़सद उन महिलाओं के दर्द, उनके संघर्ष और उनके कर्म को लोगों के सामने रखना था क्योंकि हम जिस भारतीय परिवेश में रहते हैं वहां हम हर पल अपने वजूद के लिए संघर्ष करते रहते हैं, इस सच के बावजूद कि आधा आकाश हमारा है।

पुस्तक में देश की पंद्रह सफल महिलाओं की जीवनगाथा को सलीक़े से पेश किया गया है। अमृता पटेल, अनु आगा, कल्पना मोरपारिया, किरण मजूमदार शॉ, लीला पुनावाला, मल्लिका साराभाई, मेहर पद्मजी, नैनालाल किदवाई, प्रिया पाल, पी.टीय उषा, शाहीन मिस्त्री, शिखा शर्मा, शुभा मूद््गल और विनीता बाली के जीवन को आधार बना कर पुस्तक लिखी गई है। किताब में इन महिलाओं ने बहुत ही बेबाकी से कामयाबी पर पहुंचने में आई दिक्कतों को तो सामने रखा ही है, उन छोटी-छोटी घटनाओं का ज़़िक्र भी किया है जिसने उन्हें जीवन में बेहतर करने को प्रेरित किया है। इन महिलाओं ने माना है कि उनके जीवन को अनुशासित करने में आम लोगों की हिस्सेदारी भी रही है अमूमन जिन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। इन महिलाओं ने इस बात का उल्लेख भी किया है कि पश्चिम देशों की बनिस्बत घर और परिवार के साथ व्यस्तता के बावजूद सामंजस बनाने में उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं होती है। भारत में घर और परिवार उनके विकास में बाधा नहीं बनता है बल्कि एक संबल बन कर उन्हें जीवन में बार-बार बेहतर करने के लिए ऊर्जा से भर देता है।

किताब की लेखिका सुधा मेनन भूमिका में इस बात का उल्लेख भी करती हैं कि इन महिलाओं पर लिखते हुए उन्होंने जीवन के कई रंग देखे हैं और मेरे जीवन में भी कई बदलाव आए हैं खासतौर पर मुझमें ढेरों आत्मविश्वास पनपा है क्योंकि इन महिलाओं की ज़िंदगी से मैंने यह सीखा है कि अपने मन की हर बात सुनें और सम्मान, प्रेम, साहस और प्रतिबद्धता के साथ जीवन जिएं तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह किताब और लोगों को भी प्रेरित कर उन्हें बेहतर इंसान बनाने में मदद करेगी।



अपनी संतान को चांटा मारना सीखें


डॉ. सुनील वैद

प्रस्तुत पुस्तक अंग्रेजी के बेस्ट सेलर ‘लर्न टू स्लैप योर चाइल्ड’ का हिन्दी अनुवाद है। पेशे से डॉक्टर, लेखक डॉ. सुनील वैद ने पुस्तक का शीर्षक ही ऐसा रखा है कि ‘बाल-अधिकार’ के इस युग में यह शीर्षक प्रथमतया खटकने वाला लग सकता है। पर, लेखक ने आरंभ में ही यह स्पष्ट किया है कि उन्होंने यह पुस्तक निर्णायक महसूस होने का खतरा उठाते हुए लिखी है। ‘चांटा मारने’ से उनका अर्थ प्रतीकात्मक है। लेखक ने अपना उद्देश्य यह घोषित किया है कि वह पालन-पोषण का एक अनुशासित तरीका सिखाना चाहते हैं जिसके तहत अभिभावक व बच्चों के संबंध इतने मधुर हों कि कभी शारीरिक व मानसिक रूप से थप्पड़ मारने की आवश्यकता ही न रह जाए। उन्होंने अनुशासन को संदर्भानुसार पुरस्कार और सजा के तर्कसंगत चयन के रूप में परिभाषित किया है।
लेखक ने ‘सुनहरा मध्यम मार्ग’ अपनाने की राय दी है। उनके अनुसार पश्चिम जहां पूर्ण स्वतंत्रता की बात करता है, वह एक अति है और अति-अनुशासन एक दूसरी अति। लेखक के अनुसार कोई भी अति अधूरी-संपूर्णता है और मध्यम-मार्ग हमेशा बेहतर है। मेडिसिन और मनोविज्ञान के गहरे अध्येता डॉक्टर-लेखक का दृष्टिकोण आस्था-संवलित है। मध्यम मार्ग से पले-पढ़े बच्चे के लिए ईश्वर के पास अपने द्वारा निर्धारित दिशा में ले जाने की गुंजाईश बची रहती है। लेखक का मानना है कि मध्यम मार्ग से पले-बढ़े बच्चे थोड़ा परिपक्व होने पर ‘चयन के अधिकार’ का अधिक बेहतर उपयोग करता है।
लेखक ने बच्चे के व्यक्तित्व की विशिष्टता को पहचानने के उपाय बताये हैं। लेखक ने आरंभ में ही कुछ विशेष स्वभाव के बच्चों और उनके माता-पिता आदि की पात्रों के रूप में परिकल्पना की है। ये पात्र भारतीय मध्यवर्गीय सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था में पाये जाने वाले विभिन्न प्रवृत्तियों और परिस्थितियों वाले प्रतिनिधि पात्र हैं। ये पात्र डॉक्टर-लेखक के विजन में आते रहते हैं, और मरीज के रूप में उनके क्लिनिक भी आते हैं। अपनी व्याख्याओं के बीच-बीच उदाहरण के तौर पर वह इन पात्रों को लाते रहते हैं। इस शैली में उन्होंने पालन-पोषण की अलग-अलग चुनौतियों और पैरेंटिंग की अलग-अलग शैलियों को बखूबी समझाया है।
पुस्तक में विषय के बारे में लेखक के वैज्ञानिक ज्ञान और उनकी लेखकीय कल्पनाशीलता का संतुलन अच्छा है। लगभग 300 पृष्ठों की इस किताब में विजडम बिखरा पड़ा है। किसी भी प्रसंग में लेखक अपनी व्याख्या के रूप में जो प्रतिपादन कर रहे हैं उसके संबंध में जो अकादमिक वैज्ञानिक शोध व निष्कर्ष हैं वह उस स्थान पर ही बॉक्स में दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त लेखक की व्याख्याओं के सामयिक निष्कर्ष भी जगह-जगह सूत्र रूप में बॉक्स में दिए हैं। यह सब कुछ पुस्तक को अधिक उपयोगी बनाता है।
जहां आप लेखक से सहमत न भी हों वहां भी लेखक आपको स्वयं के साथ संवाद में बनाए रखते हैं। अनुवाद बुरा तो नहीं, पर जगह-जगह रुखड़ा है और याद दिला जाता है कि यह अनुवाद है।

हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान



जनार्दन मिश्र

"राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक 'संस्कृत के चार अध्याय' में लिखा है कि भारत में हिन्दू-मुस्लमान सदियों से साथ-साथ रहते आ रहे हैं, पर एक- दूसरे के बारे में उन्हें सही जानकारी नहीं के बराबर है। प्रतिष्ठित लेखक-कवि, संपादक डॉ। रंजन जैदी के संपादन में प्रकाशित पुस्तक हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान राष्ट्रकवि के इस कथन की पुष्टि करता है।" - समीक्षक: जनार्दन मिश्र ।

डॉ. जैदी की पुस्तक में उनकी भूमिका सय्याद मुझसे छीन मत मेरी ज़बान को लेकर स्वनाम-धन्य कुल १२ लेखकों के आलेख संकलित है। आश्चर्य की बात तो यह है कि अपने को हिंदी के अच्छे जानकार मानने वाले सरकारी एवं निजी संस्थानों में ऊंचे ओहदे पर कार्यरत अधिकाँश अधिकारीयों की जानकारियां इतनी अधूरी हैं कि उन्हें सही पता ही नहीं है कि हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का कितना बड़ा योगदान है। स्वनामधन्य हिन्दू आलोचकों ने भी इस तथ्य पर प्रकाश डालना उचित नहीं समझा। एक सच्चाई और भी है कि विभाजन की त्रासदी का प्रभाव हमारे तत्कालीन साहित्य पर भी पड़ा है। एक अरसे से हिदुओं द्वारा लिखे जा रहे साहित्य से मुस्लिम पात्र गायब होते जा रहे हैं, जबकि मुस्लिम साहित्यकारों के साहित्य से हिन्दू पात्र न तो आज़ादी से पहले गायब थे और न ही आज़ादी के बाद गायब हुए। उनके साहित्य, संस्कृत और समाज में पहले जैसा ही हिन्दुतान बना रहा। मुस्लिम परिवार में पैदा हुए सूफियों ने हुमायूँ पर फिकरे कसे तो वहीं मालिक मोहम्मद जायसी ने अलाउद्दीन खिलजी को भी नहीं बख्शा क्योंकि शासक वर्ग का एक ही धर्म होता है-शासन और सत्ता पर कब्ज़ा बनाय रखना। वो शासक चाहे मौर्या हो या अफगान, तुर्क हो या जाट, लोदी हो या गुर्जर, मुग़ल हो या राजपूत, ब्राह्मन हो या दलित। शासक अत्याचार करता है और शासित अत्याचार सहता है। जब कभी भी इन दोनों के बीच टकराव कि स्थिति जन्म लेती है तो क्रांति की परिस्थितियां तैयार हो जाती हैं। संकलन में एक आलेख बिलग्राम के मुस्लिम साहित्यकार में शेख शाह मुहम्मद फार्मली, मीर जलील सय्यद मुबारक, सय्यद निज़ामुद्दीन मघनायक, सय्यद बरकतुल्ला प्रेमी, मीर गुलाम नबी रसलीन तथा सय्यद मुहम्मद आरिफ जान बिलग्रामी के नामों की विशेष चर्चा की गई है। ये बिलग्राम की धरती के वे प्रतिभा-सम्पन्न मुस्लिम हिंदी भाषा के कवि थे जिन्होंने हिंदी साहित्य की निरंतर सेवा की। अब्दुल वाहिद और शाह मुहम्मद तो हुमायूँ एवं सम्राट अकबर के दरबार से सम्बद्ध थे। उनका अरबी, फारसी, तुर्की, संस्कृत तथा हिंदी भाषाओँ पर अच्छा अधिकार था। अब्दुर रहमान पंजाब के प्रथम हिंदी मुस्लिम कवि हैं। उनकी कृति सन्देश रासक को डॉ। हजारी प्रसाद द्वेदी ने अपभ्रंश का बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रन्थ माना है। बाबा फरीद ने फारसी मुल्तानी और कुछ समय हिन्दवी (हिंदी) मे रचना की। एटा के पटियाली गाँव में जन्मे हजरत निजामुद्दीन औलिया के शिष्य हजरत अमीर खुसरो ने पटियाली में अपनी कविता की रचना की। अमीर खुसरो के 99 ग्रंथों में से22 का ही पता चलता है। वे फारसी के चोटी के कवि थे। उनकी भाषा में जहाँ ब्रिज तथा संस्कृत के शब्दों का प्रयोग मिलता है, वहीं खड़ी बोली का शुद्ध रूप भी अच्छी तरह से देखने को मिलता है।अब्दुर रहीम खानखाना,तनसे, रसखान, सूज़न और ताज ,जसे सैकड़ों ऐसे नाम हैं जिनकी रचनाओं को हिंदी साहित्य से यदि निकल दिया जाये तो हिंदी का कलेवर ही नहीं, आत्मा भी सिकुड़ जाएगी। इस पुस्तक में कोई ऐसा लेख नहीं है जिसे संख्या-पूर्ति करने की दृष्टि से संकलित किया गया हो। डॉ. परमानन्द पंचाल,डॉ. शैलेश जैदी, डॉ. हर्मेंद्र सिंह बेदी, डॉ. माजदा असद, नूर नबी अब्बासी, डॉ. ओम प्रकाश सिंघल, डॉ. इक़बाल अहमद, डॉ.नफीस अफरीदी,डॉ. कौसर यजदानी, डॉ.रवींद्र भ्रमर एवं श्री दुर्गा प्रसाद गुप्ता के साथ-साथ डॉ. रंजन जैदी ने मुस्लिम साहित्यकारों का हिंदी साहित्य में योगदान विषय को रेखांकित करने वाले अपने अलग-अलग लेखो के माध्यम से विषय के साथ न्याय किया है। समग्रता में मूल्याकन किया जाये तो यह पुस्तक पाले हुए भ्रम का निवारण करती है आम पाठकों के साथ-साथ विद्वत-जनों एवं शोधार्थियों के लिए भी यह पुस्तक विशेष रूप से पठनीय है।


बेस्ट सेलर महाराजा, महारानी


दीवान जरमनी दास

पटियाला के महाराजा भूपेंदर सिंह अपनी अजब-गजब आदतों के लिए खासे मशहूर रहे हैं। उनके दीवान जरमनी दास ने भारतीय राजे-महाराजाओं के बारे में लिखते हुए उनकी एक विचित्र सनक का जिक्र किया है। इसमें वे अपने एक खास महल में तंत्र-मंत्र की गतिविधियां करते थे। उस अवसर पर आने वाले हर अतिथि को निर्वस्त्र ही रहना होता था। पूरा कर्मकांड उनके महल के स्वीमिंग पूल के आसपास होता था। इसमें उनके राज्य के अंग्रेज अधिकारी और उनकी पत्नियां और अन्य अंग्रेज औऱ देसी महिलाएं भी भाग लेती थीं। पूरी रात वे सुरापान और कर्मकांड चलता था। जरमनी दास का कहना है कि इस अवसर पर क्या-क्या होता था लिखा भी नहीं जा सकता है। दीवान जरमनी दास ने महाराजा, महारानी नामक बेस्ट सेलर बुक्स लिखी हैं। उन्होंने इस किताब में खुल कर लिखा है कि इस अवसर पर क्या-क्या होता था। इन घटनाओं को हम खुल कर यहां नहीं लिख सकते हैं। महाराजा भूपिंदर सिंह पटियाला का जन्म 12 अक्तूबर 1891 को मोती बाग पैलेस, पटियाला में हुआ था। पिता महाराजा राजिंदर सिंह की मौत के बाद राज्य के शासक बनें भूपिंदर सिंह ने 38 वर्षों तक राज किया। सिख परिवार परिवार में पैदा हुए इस शासक के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने 10 से अधिक बार शादी की थी। एक अनुमान के अनुसार 88 बच्चों के पिता थे। इनके पास विश्व प्रसिद्ध "पटियाला हार"था, जिसे प्रसिद्ध ब्रांड कार्टियर एसए द्वारा निर्मित किया गया था। इनकी पत्नी महारानी बख्तावर कौर इतनी सुंदर थीं कि उनको क्वीन मैरी की उपाधि प्राप्त थी।
किताबों की दुनिया चाहे डिजिटल हो रही हो, लेकिन छपी हुई किताबों का जुनून कम नहीं हो रहा। यही कारण है कि हिन्‍दी के प्रकाशकों ने बीते एक वर्ष में उन किताबों को पुन: प्रकाशित किया है, जो पिछले पचास से पच्चीस वर्षों में बाजार से बाहर थीं, मगर पाठकों को उनकी तलाश थी। इनमें कहानी, उपन्यास और कविता से लेकर इतिहास की किताबें शामिल हैं। हाल ही में हिन्‍दी के विख्यात लेखक रांगेय राघव का उपन्यास ‘कल्पना’ वाणी प्रकाशन से आया है। इसका पहला संस्करण पचास वर्ष पूर्व 1961 में आया था और उसके बाद अब यह स्वतंत्र पुस्तक के रूप में मौजूद है। इसी प्रकार भारतीय ज्ञानपीठ जल्द ही पचास साल पुरानी किताब ‘रूपांबरा’ प्रकाशित करने जा रहा है। 1960 में ‘रूपांबरा’ प्रकाशित हुई थी और उसके बाद से अनुपलब्ध है। पुरानी किताबों को नये कलेवर में पेश करने वालों में साहित्य अकादमी भी पीछे नहीं है। पिछले वर्ष उसने प्रेमचंद कहानी रचनावली का प्रकाशन किया है। खास बात यह कि यहाँ प्रत्येक कहानी के साथ यह दर्ज है कि वह किस साल किस पत्रिका में पहली बार हिन्‍दी या उर्दू में प्रकाशित हुई। प्रेमचंद साहित्य के विशेषज्ञ कमल किशोर गोयनका ने रचनावली का संपादन किया है।
राजकमल प्रकाशन समूह कन्नड़ भाषा के महत्वपूर्ण लेखक और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता यूआर अनंतमूर्ति के तीन उपन्यासों ‘संस्कार’, ‘अवस्था’ और ‘भारतीपुर’ को करीब बीस वर्ष बाद पुन: प्रकाशित कर रहा है। गम्‍भीर ही नहीं, पुराना लोकप्रिय कथा साहित्य भी नये रंग-रूप में लौट रहा है। अंतरराष्ट्रीय प्रकाशक हार्पर कॉलिंस, इंडिया ने उर्दू के सबसे लोकप्रिय जासूसी कथाकार इब्ने सफी की दो उपन्यास सीरीज हिंदी में प्रकाशित की है। इनमें एक है जासूसी की दुनिया और दूसरी इमरान सीरीज। 1928 में इलाहाबाद की सिराथु तहसील के नारा गाँव में पैदा हुए सफी का पहला उपन्यास 1952 में छपा था और उनके प्रशंसकों में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री तक शामिल थे। हिन्‍द पॉकेट बुक्स ने भी देश की आजादी के पूर्व के महाराजाओं और महारानियों की जिंदगियों में झांकती दो अनुपलब्ध किताबें ‘महाराजा’ और ‘महारानी’ प्रकाशित की हैं। इन किताबों को दीवान जरमनी दास ने लिखा है, जो कई राजघरानों के नजदीक रहे। इसी प्रकाशन गृह से रामकुमार भ्रमर के महाभारत और कृष्ण जीवन पर लिखे वृहद उपन्यास क्रमश: चार और पांच खंडों में करीब 25 वर्ष बाद पुन: प्रकाशित हुए हैं।
हिंदी की कुछ पुरानी किताबें हमेशा बेस्ट सेलर के रूप में मौजूद रही हैं। वे प्रकाशन के बाद से ही लगातार बाजार में बनी रहीं। टॉप 10 पर एक नजर* :
-गोदान (उपन्यास), प्रेमचंद, 70 संस्करण
-गुनाहों का देवता (उपन्यास), धर्मवीर भारती, 60 संस्करण
-सूरज का सातवां घोड़ा (उपन्यास), धर्मवीर भारती, 60 संस्करण
-रंगभूमि (उपन्यास), प्रेमचंद, 50 संस्करण
-मधुशाला (कविता), हरिवंश राय बच्चन, 50 संस्करण
-भारत भारती (खंडकाव्य), मैथिलीशरण गुप्त, 47 संस्करण
-साकेत (महाकाव्य), मैथिलीशरण गुप्त, 40 संस्करण
-त्यागपत्र (उपन्यास), जैनेंद्र, 40 संस्करण
-चित्रलेखा (उपन्यास), भगवती चरण वर्मा, 40 संस्करण
-सारा आकाश (उपन्यास), राजेंद्र यादव, 40 संस्करण

लोक साहित्य के रंग


फ़ज़ल इमाम मल्लिक

छत्तीसगढ़ अपनी सांस्कृतिक विशेषता के लिए भी जाना-पहचाना जाता रहा है। न सिर्फ़ यह की अपनी बोलचाल में बल्कि समृद्ध विरासत, साहित्य और परंपरा की वजह से भी छत्तीसगढ़ को कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण कह सकते हैं। कभी मध्यप्रदेश का हिस्सा रहे छत्तीसगढ़ को लेकर यह बात भी कही जाती है कि साहित्य, कला और संस्कृति को लेकर यह क्षेत्र बहुत सजग भी रहा है। दक्षिण कोशल के नाम से जाना जाने वाले इस क्षेत्र की साहित्यिक संपदा और विरासत की जितनी चर्चा होनी चाहिए थी नहीं हो पाई है। साहित्यिक परिदृश्य पर भी इस क्षेत्र की अपनी कोई बिलग पहचान नहीं बन पाई है तो इसकी वजह साहित्यिक ख़ेमेबंदी ही कही जा सकती है। साहित्यिक केंद्र नहीं बन पाने के कारण छत्तीसगढ़ साहित्य में हाशिए पर ही रहा था। यह बात दीगर है कि पिछले कुछ सालों से छत्तीसगढ़ साहित्य के नए केंद्र के तौर पर उभरा है और प्रमोद वर्मा संस्थान ने राष्ट्रीय स्तर के कई आयोजन कर इस क्षेत्र की अलग पहचान बनाई है। ज़ाहिर है कि इससे छत्तीसगढ़ के साहित्य और साहित्यकारों को एक विशाल और खुली-खुली दुनिया में सांस लेने का मौक़े मिलेंगे।

लेकिन इस दुनिया में विचरने के लिए ज़रूरी है कि हमें अपने क्षेत्र की संस्कृति, बोलचाल, कथा-कहानियां, मुहावरे-सूक्तियों को जानना-समझना भी ज़रूरी है। डॉ. दयानंद शुक्ल की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य का अध्ययन’ के ज़रिए इसे बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। इस पुस्तक का दूसरा संस्करण हाल ही में प्रकाशित हुआ है। उनकी यह किताब की ख़ूब चर्चा हुई थी और इसे छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य का सबसे प्रमाणिक ग्रंथ माना गया है। क़रीब साढ़े तीन सौ पन्नो में फैले इस पुस्तक में छत्तीसगढ़ के लोकसाहित्य पर विस्तार से तो चर्चा की ही गई है, लोक कहावतों और मुहावरों को लेकर भी जानकारी दी गई है।

पुस्तक को यह बात और प्रामाणिक बनाता है। इस पुस्तक में लोकसाहित्य की समीक्षा तो की ही गई है, छत्तीसगढ़ का इतिहास, छत्तीसगढ़ी भाषा, समाजिक और सांस्कृति हालात, खानपान, रहन-सहन, धार्मिक मान्यताएं और राष्ट्रीय जागृति की भी विस्तार से चर्चा की गई है। डॉ. दयानंद शुक्ल ने पुस्तक पर काफी मेहनत की है। वे जानते थे कि लोक साहित्य का जन्म कहां से होता है। उन्होंने इन बातों का खास ध्यान रखा है और यही वजह है कि किताब में लोक गाथाएं, खेल गीत, लोकगीत, पहेलियों का जिक्र बेहद सलीक़े से किया गया है और उनकी पड़ताल भी ढंग से की गई है।

पुस्तक में छत्तीसगढ़ के पुराने कवियों की प्रतिनिधि रचनाओं पर टिप्पणी भी की गई है। ज़ाहिर है कि युवा पीढ़ी को इनमें से बहुतों की जानकारी नहीं होगी। लाला जगदलपुरी, डॉ. विमल कुमार पाठक, वंशीधर पांडेय, श्यामलाल चतुर्वेदी, डॉ. देवीप्रसाद वर्मा, शिवशंकर शुक्ल और दानेश्वर वर्मा सरीखे कवियों की कविताओं पर उन्होंने बेहतर ढंग से चर्चा की है। इन कवियों को जानना-समझना दरअसल अपनी परंपरा और विरासत को भी जानना-समझना है। आज जब साहित्य का संसार झीजता जा रहा है और अपनी विरासत और परंपरा को जानने की ललक ख़त्म होती जा रही तो दयानंद शुक्ल की यह पुस्तक हमें अपने इतिहास से भी जोड़ती है और विरासत की याद भी दिलाती है। प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान ने इसे फिर से प्रकाशित कर बड़ा काम किया है। इसके लिए यक़ीनन विश्वरंजन और जयप्रकाश मानस को बधाई दी जानी चाहिए, क्योंकि साहित्य की ख़ेमेबंदियों के बीच इस तरह की किताबों को प्रकाशित करने का साहस न तो बड़ा प्रकाशक जुटा पाता है और न ही कोई संस्था।

अलेक्सान्दर पूश्किन की कविताएं





[मूल रूसी भाषा से अनुवाद : मदन लाल मधु]

येकातिरिना बाकूनिना के लिए

सुनी क्या तुमने जंगल से आती आवाज़ वो प्यारीगीत प्रेम के, गीत रंज के, गाता है वह न्यारेसुबह - सवेरे शान्त पड़े जब खेत और जंगल सारेपड़ी सुनाई आवाज़ दुखभरी कान में हमारेयह आवाज़ कभी सुनी क्या तुमने ?
मिले कभी क्या घुप्प अंधेरे जंगल में तुम उससेगाए सदा जो बड़े रंज से अपने प्रेम के किस्सेबहे कभी क्या आँसू तुम्हारे मुस्कान कभी देखी क्याभरी हुई हो जो वियोग में ऎसी दृष्टि लेखी क्यामिले कभी क्या तुम उससे ?
साँस भरी क्या दुख से कभी आँखों की वीरानी देखगीत वो गाए बड़े रंज से दे अपने दुख के संदेशघूम रहा इस किशोर वय में जंगल में प्रेमी उदासबुझी हुई आँखों में उसकी अब ख़त्म हो चुकी आससाँस भरी दुख से क्या कभी तुमने ?
 


प्रेमपत्र को विदाई
विदा, प्रिय प्रेमपत्र, विदा, यह उसका आदेश थातुम्हें जला दूँ मैं तुरन्त ही यह उसका संदेश था
कितना मैंने रोका ख़ुद को कितनी देर न चाहापर उसके अनुरोध ने, कोई शेष न छोड़ी राहहाथों ने मेरे झोंक दिया मेरी ख़ुशी को आग मेंप्रेमपत्र वह लील लिया सुर्ख़ लपटों के राग ने
अब समय आ गया जलने का, जल प्रेमपत्र जलहै समय यह हाथ मलने का, मन है बहुत विकलभूखी ज्वाला जीम रही है तेरे पन्ने एक-एक करमेरे दिल की घबराहट भी धीरे से रही है बिखर
क्षण भर को बिजली-सी चमकी, उठने लगा धुँआवह तैर रहा था हवा में, मैं कर रहा था दुआलिफ़ाफ़े पर मोहर लगी थी तुम्हारी अंगूठी कीलाख पिघल रही थी ऐसे मानो हो वह रूठी-सी
फिर ख़त्म हो गया सब कुछ, पन्ने पड़ गए कालेबदल गए थे हल्की राख में शब्द प्रेम के मतवालेपीड़ा तीखी उठी हृदय में औ' उदास हो गया मनजीवन भर अब बसा रहेगा मेरे भीतर यह क्षण ।।


सब ख़त्म हो गया
सब ख़त्म हो गया अब हममें कोई सम्बन्ध नहीं हैहम दोनों के बीच प्रेम का अब कोई बन्ध नहीं हैअन्तिम बार तुझे बाहों में लेकर मैंने गाए गीततेरी बातें सुनकर लगा ऎसा, ज्यों सुना उदास संगीत ।
अब ख़ुद को न दूंगा धोखा, यह तय कर लिया मैंनेडूब वियोग में न करूंगा पीछे तय कर लिया मैंनेगुज़र गया जो भूल जाऊंगा, तय कर लिया है मैंनेपर तुझे न भूल पाऊंगा, यह तय किया समय ने
शायद प्रेम अभी मेरा चुका नहीं है, ख़त्म नहीं हुआ हैसुन्दर है, आत्मीय है तू, प्रिया मेरी अभी बहुत युवा हैअभी इस जीवन में तुझ से न जाने कितने प्रेम करेंगेजाने कितने अभी मर मिटेंगे और तुझे देख आहें भरेंगे ।
मूल रूसी भाषा से अनुवाद : अनिल जनविजय


धीरे-धीरे लुप्त हो गया दिवस-उजाला
धीरे-धीरे लुप्त हो गया दिवस उजाला,
सांध्य कुहासा छाया है नीले सागर पर,
आए आए पवन झकोरा, लहर उछाला
मेरे नीचे लहराओ तुम विह्वल सागर।
दूर कहीं पर साहिल नज़र मुझे है आता,
मुझ पर जादू करने वाली दक्षिण धरती,मैं अनमन बेचैन उधर ही बढ़ता जाता,
स्मृतियों की सुख-लहर हृदय को व्याकुल करती।
अनुभव होता मुझे - भरी हैं आँखें फिर से
हृदय डूबता और हर्ष से कभी उछलता,
मधुर कल्पना चिर-परिचित फिर आई घिर केवह उन्मादी प्यार पुराना पुनः मचलता,आती याद व्यथाएँ, मैंने जो सुख पाला,इच्छा आशाओं की छलना, पीड़ित अन्तर ...आए आए पवन झकोरा, लहर उछाला,
मेरे नीचे लहराओ तुम विह्वल सागर।
उड़ते जाते पोत, दूर तुम मुझको ले जानाइन कपटी, सनकी लहरों को चीर भयंकर,किन्तु न केवल करुण तटों पर तुम पहुँचाना
मातृभूमि है जहाँ, जहाँ हैं धुंध निरन्तर,वहीं कभी तो धधक उठी थी मेरे मन मेंप्यार-प्रणय, भावावेशों की पहली ज्वाला,कला-देवियाँ छिप-छिप मुस्काईं आँगन में
था यौवन को मार गया तूफ़ानी पाला,
जहाँ ख़ुशी तो लुप्त हुई थी कुछ ही क्षण मेंहृदय-चोट ने दर्द सदा को ही दे डाला।
तभी-तभी तो मातृभूमि तुमसे भागा थानए-नए अनुभूति-जगत का मैं दीवाना,
भागा तुमसे दूर हर्ष-सुख का अनुगामीयौवन, मित्रों से था जिनको कुछ क्षण जाना,जिनकी ख़ुशियों, रंग-रलियों के चक्कर में पड़
अपना सब-कुछ, प्यार, हृदय का चैन लुटाया,खोई अपनी आज़ादी, यश, मान गँवायाछला गया जिन रूपसियों से उन्हें भुलाया,मेरे स्वर्णिम यौवन में जो लुक-छिप आईंउन सखियों की स्मृतियों का भी चिह्न मिटाया ...किन्तु हृदय तो अब भी पहले सा घायल हैमिला न कोई मुझको दर्द मिटाने वाला,मरहम नहीं किसी ने रखा इन घावों पर
आए आए पवन झकोरा, लहर उछाला
मेरे नीचे लहराओ तुम विह्वल सागर।
 
जाड़े की सुबह
पाला भी है, धूप खिली है, अद्भुत्त दिन है!पर तू मेरी रानी अब तक नींद मगन है -जागो, जागो, मधुरे अब तो जाग उठो तुमनिद्रा सुख में डूबे अपने नयन उघारो,स्वयं उत्तरी तारे-सी बन ज्योति अनूठीजाग, उत्तरी विभा-प्रभा की छटा निहारो!
याद तुम्हें, कल कैसा था तूफ़ान भयंकरघुप्प अन्धेरा-सा छाया था धुँधले नभ पर,पीला-पीला धब्बा-सा बन चाँद गगन मेंझाँक रहा था धूमिल-धूसर मेघ सघन से,तुम उदास-सी बैठी थीं, आकुल-व्याकुल होकिन्तु आज ... प्रिय झाँको तो तुम वातायन से :
कैसा निर्मल, कैसा नीला-नीला अम्बरउसके नीचे ज्यों क़ालीन बिछाकर सुन्दरसुख से लेटी बर्फ़ चमकती रवि-किरणों मेंकाली-सी छाया दिखती झलमले वनों में,ओढ़े पाले की चादर फ़र वृक्ष हरा हैऔर बर्फ़ के नीचे नाला चमक रहा है।
पीत-स्वर्ण कहरुबा चमक कमरे में छाईचट-चट जलती लकड़ी, अंगीठी सुखदायी,बैठ इसी के निकट और कुछ चिन्तन करनाभला लगेगा स्वप्न-जगत में मुक्त विचरना,किन्तु न क्या ये अच्छा, स्लेज इधर मँगवाएँभूरी घोड़ी उसमें हम अपनी जुतवाएँ?
और सुबह की इसी बर्फ़ पर स्लेज बढ़ाएँमेरी प्यारी, ख़ूब तेज़ घोड़ी दौड़ाएँजाएँ हम सूने खेतों में, मैदानों मेंकुछ पहले जो बहुत घने थे, उन्हीं वनों में,पहुँचें ऐसे वहाँ, जहाँ है नदी किनारामेरे मन की ललक, मुझे जो बेहद प्यारा।


मैंने प्यार किया था तुमको
मैंने प्यार किया था तुमको और बहुत सम्भव है अब भीमेरे दिल में उसी प्यार की सुलग रही हो चिंगारी,किन्तु प्यार यह मेरा तुमको और न अब बेचैन करेगानहीं चाहता इस कारण ही अब तुम पर गुज़रे भारी।
मैंने प्यार किया था तुमको, मूक-मौन रह, आस बिनाहिचक, झिझक तो कभी जलन भी मेरे मन को दहकाए,जैसे प्यार किया था मैंने सच्चे मन, कोमलता सेहे भगवान, दूसरा कोई, प्यार तुम्हें यों कर पाए!
 
आया के प्रति
मेरे बुरे दिनों कि साथी, मधुर संगिनी
बुढ़िया प्यारी, जीर्ण-जरा!
सूने चीड़ वनों में तुम्हीं राह देखतीं
कब से मेरी, नज़र टिका।
पास बैठकर खिड़की के भारी मन से
तुम पहरेदारी करतीं।
और सिलाइयाँ दुर्बल हाथों में तेरे,
कुछ क्षण को धीमी पड़तीं।
टूटे-फूटे फाटक से अँधियारे पर
दॄष्टि तुम्हारी जम जाती,
और किसी बेचैनी, चिन्ता, शंका से
हर पल धड़क उठे छाती,
कभी तुम्हें लगता है जैसे छाया-सी
सहसा है सम्मुख आती...
 
क्या रखता है अर्थ तुम्हारे लिए नाम मेरा
क्या रखता है अर्थ तुम्हारे लिए नाम मेरा?डूबा हुआ उदासी में लहरों का विह्वल स्वरकहीम दूर के तट पर जैसे जाता हहर, बिखर,सूने वन में रात्रि समय ध्वनि खो जाती जैसेमेरा नाम तुम्हारी स्मृति में मिटे कभी वैसे।लिखें गए हों स्मृति के पट पर कुछ अक्षरउस भाशःआ में जिसे समझना, पडः़अना हो दुष्कर,उसि तरह से मुड़े-मुड़ाए, जर्जर काग़ज़ परचिन्ह नाम छोड़ेगा मेरा धुँधला-सा नश्वर।
क्या रखा है उसमें? जिसको विस्मृति ने निगलानई भावना, नए प्यार का जब हो कुसुम खिला,ला न सकेगा तेरे मन में वह स्मृतियाँ प्यारीजल न सकेगी उससे कोमल, निर्मल चिंगारी।किन्तु उदासी और व्यथा जब मन को आ घेरेनाम याद कर लेना मेरा तुम धीरे-धीरे,कहना ख़ुद से- याद किसी को मैं अब भी आतीकिसी हृदय में मैं बसती हूँ, याद न मिट पाती।
 
...के नाम
मुझे याद है वह अद्भुत्त क्षणजब तुम मेरे सम्मुख आईं,निर्मल, निश्छल रूप छटा-सीजैसे उड़ती-सी परछाईं।
घोर उदासी, गहन निराशाजब जीवन में कुहरा छाया,मन्द, मृदुल तेरा स्वर गूँजामधुर रूप सपनों में आया।
बीते वर्ष, बवंडर आएहुए तिरोहित स्वप्न सुहाने,किसि परि-सा रुप तुम्हाराभूला वाणी, स्वर पहचाने।
सूनेपन, एकान्त-तिमिर मेंबीते, बोझिल, दिन निस्सारबिना आस्था, बिना प्रेरणारहे न आँसू, जीवन, प्यार।
पलक आत्मा ने फिर खोलीफिर तुम मेरे सम्मखु आईं,निर्मल, निश्छल रूप छटा-सीमानो उड़ती-सी परछाईं।
हृदय हर्ष से फिर स्पन्दित हैफिर से झंखृत अन्तर-तार,उसे आस्था, मिली प्रेरणाफिर से आँसू, जीवन, प्यार।

सच और साहस की पत्रकारिता


फ़ज़ल इमाम मल्लिक

हो सकता है कि यह महज़ इत्तफ़ाक़ हो लेकिन दिल और दिमाग़ दोनों ही इसे इत्तेफ़ाक़ मानने को तैयार नहीं हो रहे हैं। हो सकता है कि इसकी एक वजह लंबे समय तक प्रभाष जोशी के साथ बिताए क्षण भी हों। लेकिन यह सच है कि जिन दिनों प्रभाष जोशी की हाल ही में प्रकाशित पुस्तकें ‘21वीं सदी पहला दशक’ और ‘आगे अंधी गली है’ को पढ़ने के लिए समय निकाला, उन दिनों ही देश में दो बड़ी घटनाएं हुईं। यों तो इन घटनाओं और किताब का तालमेल नहीं बैठता है लेकिन पता नहीं क्यों दोनों घटनाओं का ताल्लुक प्रभाष जोशी की पत्रकारिता से कहीं न कहीं जा जुड़ता है। सामजिक सरोकारों और क्रिकेट से उनके जुड़ाव से हर कोई वाक़िफ़ है। इसलिए पहले भारत का विश्व कप क्रिकेट जीतना और फिर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अण्णा हज़ारे के हल्ला बोलने को उनकी पुस्तकों और उनसे अलग करके देखने की ज़रा भी कोशिश नहीं की है क्योंकि प्रभाष जोशी की सोच में कहीं न कहीं ये शामिल हैं और भारत को विश्व चैंपियन बनते देखना और भ्रष्टाचार मुक्त और बेहतर समाज का सपना तो उन्होंने भी अपनी आंखों में न जाने कब से बसा रखा था। इन सपनों को उनकी इन दोनों किताबों में भी देखा जा सकता है। इसलिए इन किताबों को पढ़ते हुए ये दोनों घटनाएं ज़ेहन में बार-बार कौंधती है।

घटनाएं तो और भी हैं जिन्हें लेकर प्रभाष जोशी बेतरह याद आते हैं लेकिन भारत का विश्व कप जीतना और अण्णा हजारे के अनशन को प्रभाष जोशी के लिखे शब्दों में तलाशने की कोशिश इन दोनों पुस्तक में लगातार करता रहा। पहली पुस्तक ‘21वीं सदी पहला दशक’ में ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित उनके नियमित कालम ‘कागद कारे’ के तहत छपे आलेखों को संकलित किया गया है तो दूसरी पुस्तक ‘आगे अंधी गली है’ में ‘प्रथम प्रवक्ता’ और ‘तहलका’ में प्रकाशित उनके कालम ‘लाग लपेट’ और ‘शून्य काल’ में लिखे आलेख शामिल हैं। हालांकि इस पुस्तक में ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित कुछ चुनिंदा आलेखों को भी शामिल किया गया है। इनमें उनके अंतिम दिनों में लिखे गए आलेख भी हैं। प्रभाष जोशी ने हिंदी में कालम लेखन को भी एक नई धार दी थी और ‘जनसत्ता’ में कागद कारे से पाठकों के एक बड़े वर्ग से सरोकार बनाया। बाद के दिनों में उन्होंने ‘प्रथम प्रवक्ता’ और ‘तहलका’ में कालम लिखना शुरू किया और सामाजिक राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बेबाक टिपण्णी से पाठकों के एक विशाल वर्ग से अपना रिश्ता जोड़ा।

प्रभाष जोशी के लेखने के केंद्र में वे राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मुद्दे थे जिनका सरोकार आम आदमी से था। इन पुस्तकों में इसे देखा जा सकता है। इक्कीसवीं सदी को लेकर जिस तरह के लंबे चौड़े दावे किए गए थे और देश की ग़रीब और मज़लूम अवाम की आंखों में जिस तरह के लुभावने और हसीन सपने बोए गए थे, हक़ीक़त इससे एकदम उलट है। सच तो यह है कि इस देश की अस्सी फीसद आबादी की आमदनी आज भी बीस रुपए रोजाना है। सरकारों ने सारी क़वायद देश के कुछ लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए किया। देश में उदारीकरण के नाम पर जो तमाशा हुआ और उसके जो नतीजे सामने आए, प्रभाष जोशी ने बड़ी मुखरता के साथ और बेलाग-लपेट इन पर लिखा और सरकारों का कठघरे में खड़ा किया। इस उदारीकरण ने आम आदमी की मुशिकलों को तो बढ़ाया ही, प्राकृतिक संसाधनों और देश की संपदा को भी कम नुकसान नहीं पहुंचाया। आर्थिक और सामाजिक स्तर पर जिस तरह की बाज़ीगरी सरकार दिखाई उससे इन मुश्किलों को और बढ़ाया ही, प्रबाष जोशी के लेखों में इसे देखा जा सकता है। उन्होंने सरकारों की मंशा को लोगों के सामने रखा और इस उदारीकरण के खतरों से भी आगाह किया। प्रभाष जोशी ने राजनीति के उस ग़लीज़ और बदसूरत चेहरे को सामने रखा जो आमतौर पर लोगों के सामने नहीं आता है और ऐसा करते हुए प्रभाष जोशी ने किसी तरह का समझौता नहीं किया। न तो अपने मित्रों को बख़्शा और न ही राजनीति के शिखर पर बैठे प्रधानमंत्रियों को। हाल के दिनों में कागद कारे या दूसरे कालमों में उनकी यह चिंता और भी मुखर होकर सामने आई है।

दरअसल प्रभाष जोशी की पत्रकारिता महज चिंतन और विशलेषण की पत्रकारिता नहीं थी। वे सामाजिक बदलाव के लिए प्रयासरत थे और उनके लेखन के केंद्र में देश का वह अस्सी फसद आबादी थी जिसे ठीक से रोटी मयस्सर नहीं होती। बीस रुपया रोज़ कमाने वाला आदमी प्रभाष जोशी के लेखन के केंद्र में हमेशा रहा। राजनीतिक स्तर पर जो सड़ांध हमारे आसपास फैली थी उसके ख़िलाफ़ वे हमेशा मुखर रहे और अपने लेखन से समय-समय पर ज़रूरी हस्तक्षेप भी किया और नेताओं व सियासतदानों से मुठभेड़ भी किया। हाल के कुछ सालों में तो वे जिस बेबाकी और मुखरता के साथ सत्ता की आंखों में आंखों डाल कर बातें करते थे वह आजकी पत्रकारिता में अब नहीं दिखाई देती है। दरअसल प्रभाष जोशी ने एक बेहतर समाज की चिंता भी की और शोषण व भ्रष्टाचार मुक्त समाज का सपना भी अपनी पलकों पर सजाया था। ज़ाहिर है कि इन सपनों की वजह से उन्हें कई बार कठघरे में भी खड़ा होना पड़ा। सियासतदानों ने कभी ढके-छुपे तौर पर उन पर हमले किए तो कभी पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए वारिद हुए छुटभयै पत्रकारों और ब्लागियों ने प्रभाष जोशी की निष्ठा पर निशाना साधा और उन्हें दलित, महिला व मुसलिम विरोधी साबित करने की कोशिशें की जाती रहीं। ब्राह्मणवाद को लेकर भी उन पर हमले हुए ज़ाहिर है कि ऐसा करने वाले प्रभाष जोशी का पासंग भी नहीं थे लेकिन ख़ुद को ख़बरों में बनाए रखने के लिए उन्होंने प्रभाष जोशी पर हमले किए। कई तरह के हमलों को झेलते हुए भी प्रभाष जोशी विचलित नहीं हुए और उन तमाम लोगों को अपने तरीक़े से जवाब दिया।

‘21वीं सदी पहला दशक’ और ‘आगे अंधी गली है’ में संकलित आलेख उस इक्कीसवीं सदी के आमद के बाद लिखे गए हैं, जिसे लेकर सरकारों ने लंबे चौड़े दावे किए थे और भारत को ग्लोबलाइजेशन और उदारीकरण के रथ पर बिठा कर विकास के पथ पर ख़ूब तेज़-तेज़ दौड़ाया था। लेकिन सच्चाई बस इतनी है कि इन तमाम दावों के बावजूद आदमी महंगाई, बेपोज़गारी, सांप्रदायिकता और सियासत की अंधी गली में खड़ा आज भी विकास से कोसों दूर है। विकास के दरवाज़े नेताओं, व्यापारिक घरानों और सेठों के लिए ज़रूर खुले। दलाल स्ट्रीट में सूचकांक के गिरने और उतरने और निवेश के ज़रिए सरकारी संपत्तियों को बेचना विकास का पैमाना माना गया। ज़ाहिर है कि प्रभाष जोशी ने विकास के इन पैमानों पर बार-बार सवाल खड़ा किया। ‘इंडिया’ और ‘भारत’ के बीच की विभाजन रेखा का ज़िक्र उनके लेखने के केंद्र में रहा है। दोनों पु्स्तकों में उनकी इस चिंता को देखा जा सकता है। क्रिकेट के बड़े रसिया होने के बावजूद बाज़ार में बदलते क्रिकेट को देख कर वे इस बात की जम कर आलोचना करते हैं। ‘क्रिकेट का विश्व कप कि बाज़ार का’ और ‘इक्कीसवीं सदी में क्या बीस-20 का खेल’ या ‘मुनाफ़े का बीसम-बीस’ में उनकी चिंता को देखा जा सकता है। सचिन तेंदुलकर के मुरीद प्रभाष जोशी ने ‘शतकों के शतक तक खेलो’ या फिर ‘सोलह वर्ष के एक और लड़के की खोज’ और ‘युवराज और धोनी ने जिता दिया’ लेख लिखे तो दूसरी तरफ़ क्रिकेट में की जारही घपलेबाज़ी पर भी ‘क्रिकेट की कमाई और’ लिखा। आज जब किसानों के नाम पर राजनीति की जा रही है तो बहुत पहले प्रभाष जोशी ने किसानों से ली जारही ज़मीनों पर चिंता जताई थी। नंदीग्राम को केंद्र में रख कर उन्होंने अपने कालमों में लगातार लिखा। ‘नंदीग्राम के बाद सजा लेना सेज’ ‘नंदीग्राम की गैयाएं’ ‘बुद्धदेव के राज में गुंडों का नंदीग्राम’ ‘नंदीग्राम सीखने के लिए नहीं, सिखाने के लिए है’ ‘नंदीग्राम में मानवाधिकार’ और ‘नंदीग्राम का सबक़ सीखें तब न!’ में किसानों की पीड़ा शासन-प्रशासन के वही क्रूर चेहरे दिखाई देते हैं जो जैतापुर और भट्टा-पारसौल में दिखाई देता है।

निजीकरण, सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता जैसे सवालों पर भी प्रभाष जोशी ने बिना लागलपेट के लिखा। पत्रकारिता और मित्रता से हमेशा अलग रखा। जीवन में उन्होंने मित्रता को तरजीह दी तो पत्रकारिता में सच्चाई को। इसलिए उन्होंने उन सियासी मित्रों पर क़लम चलाने में भी कंजूसी नहीं की जो उनके जीवन में उनके अंतरंग मित्र हुआ करते थे। संवेदना के स्तर पर समय को जहां परिभाषित किया तो दूसरी तरफ़ गांधीवादी विचारधारा और सोच को वर्तमान समय से जोड़ कर देखने की कोशिश की। उन्होंने समय, समाज और सत्ता की आंखों में आंखें डाल कर बातें की। नौ साल के अरसे में लिखे गए उनके क़ीरब दो सौ आलेखों में अमेरिका की दादागिरी पर भी उन्होंने जम कर कलम चलाई तो संघ परिवार और अटल-आडवाणी की चालाकियों को भी उजागर किया। हाल के दिनों में धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ उन्होंने जिस तरह से हल्ला बोला था इससे वे सांप्रदायिक ताक़तों के निशाने पर भी रहे। पत्रकारिता में पिछले दरवाज़े से काली कमाई का जो चलन बढ़ा है और चुनावों के वक्Þत पैसे लेकर ख़बरें छापने का जो नया धंधा शुरू हुआ है प्रभाष जोशी ने इन पर भी लिखा और अख़बार मालिकों की जम कर ख़बर ली। यह उनके लेखन का विस्तार ही है कि उन्होंने हर उस विषय पर लिखा जो आम पाठकों के सरोकारों से जुड़े है। खेल हो या सिनेमा या फिर संगीत, जिस विषय पर भी लिखा, दूसरों से कुछ अलग लिखा और शायद यही वजह है कि उनके लिखे को पढ़ने वालों की एक बड़ी जमात थी जिसे उनके कालमों का इंतज़ार रहता था।

‘आगे अंधी गली है’ की भूमिका में प्रभाष जोशी के अंतिम छह दिनों का ज़िक्र है। अंतमि दिनों में प्रभाष जोश्ी की सामाजिक सक्रियता काफ़ी बढ़ गई थी और लिखने के साथ-साथ सभा-समारोहों में भी वे लगातार शिरकत कर रहे। सामाजिक सरोकारों और विसंगतियों के ख़िलाफ़ व्याख्यान देने के लिए वे लगातार सफ़र पर रहे। इसका क्रमवार ज़िक्र पुस्तक में किया गया है। इससे उनकी सक्रियता का अंदाजा भी लगाया जा सकता है। इस भागमभाग में भी क्रिकेट से उनका लगाव नहीं छूटा था। सभा-समारोहों के बीच भी अगर कोई मैच हो रहा होता तो वे मौक़ा मिलते ही स्कोर ज़रूर पूछते। मौत से पहले तक क्रिकेट को लेकर उनका मोह नहीं छूटा था। भारत-आस्ट्रेलिया के बीच खेला जा रहा मैच वे देख रहे थे और सचिन तेंदुलकर के चमकदार प्रदर्शन के बावजूद भारत मैच हार गया था। बहुतों का यह मानना है कि इसी तनाव ने उनकी जान ली लेकिन वे लोग यह बात भूल जाते हैं कि जो क्रिकेट उन्हें सकून और जीवन देता था वह भला उनकी मौत की वजह कैसे बन सकता था।

‘21वीं सदी पहला दशक’ और ‘आगे अंधी गली है’ में प्रभाष जोशी की पत्रकारिता के कई शेड्स दिखाई देते हैं। खेल, समाज, जीवन, सियासत, निजीकरण जैसे सवालों से वे जूझते हैं और एक बेहतर समाज की चिंता उनमें दिखाई देती है। दोनों पुस्तकों का संपादन सुरेश शर्मा ने किया है।