Wednesday, 26 June 2013

भारतीय पाठकों की पसंदीदा 10 पुस्तकें



स्मृति आदित्य

चाहे दुनिया की तस्वीर कितनी ही बदल जाए लेकिन किताबों के लिए पाठकों की दीवानगी हमेशा से थी और हमेशा रहेगी। वर्ष 2012 में जो पुस्तकें छाईं रही उनसे यह आशा जागी है कि पाठकों की रूचि आज भी स्तरीय बनी हुई है। आइए, एक नजर डालते हैं भारत की दस ऐसी श्रेष्ठ श्रेष्ठ पुस्तकों पर। अमिश त्रिपाठी की भगवान शिव पर आधारित ट्रायोलॉजी सीरिज का पहला उपन्यास था 'मेलुहा के मृत्युंजय'। इस पुस्तक को खूबसूरत कल्पना के सहारे से देवों के देव महादेव को और वास्तविक रूप में दर्शाने का प्रयत्न कहा जा सकता है। कहानी एक प्राचीन देश मेलुहा की है, जो कई शताब्दी पहले भगवान राम द्वारा स्थापित किया गया था। अमीश त्रिपाठी के शिव-त्रयी का दूसरा उपन्यास है 'द सीक्रेट ऑफ द नागाज'। इस साल सबसे ज्यादा चर्चा में रहा यह उपन्यास। 'द सीक्रेट ऑफ द नागाज' एक ऐसे रहस्यमय साम्राज्य से परिचय कराता है, जहां हर चीज ने मुखौटे पहने हैं और हर जगह कोई गहरा राज छिपा है। 'मेलुहा के मृत्युंजय' के अंत से इस उपन्यास का आगाज होता है। नागाज सती पर हमला बोल देते हैं और मेलुहा के रक्षक शिव अपनी पत्नी को बचाने में कामयाब होते हैं। नागाज जाते-जाते एक सिक्का छोड़ जाता है और उस सिक्के के दम पर शिव नागाज का रहस्य पता करने के लिए निकल पड़ते हैं। सती कार्तिक को जन्म देती है। एक अनोखे युद्ध में सती की रक्षा करने के लिए नागाज के सैनिक आ जाते हैं और यहीं मुलाकात होती है सती की अपने पुत्र गणेश और बहन काली से। यह नागा की रानी काली इस रहस्य को सुलझाती है या और उलझनें खड़ी करती हैं? यह पुस्तक पढ़कर जाना जा सकता है। उपन्यास को कम शब्दों में कहा जाए तो यह एक रोमांचक यात्रा है।
द फाउंटेनहेड एक ऐसा उपन्यास है जिसमें एक आदमी की व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई का वर्णन है। फाउंटेनहेड अयान रेंड द्वारा लि‍खित (1943) उपन्यास है। यह पुस्तक रेंड की प्रमुख साहित्यिक सफलता मानी जाती है। इस पुस्तक की 6.5 लाख से अधिक प्रतियां दुनिया भर में बेची जा चुकी है। इसकी पांडुलिपि बारह प्रकाशकों द्वारा अस्वीकार कर दी गई थी। आर्चीबॉल्ड ने अपनी नौकरी को खतरे में डालकर इसे प्रकाशित किया। मात्र मौखिक प्रचार से ही यह बेस्टसेलर की श्रेणी में आ गई। सोशल मीडिया सर्वे के अनुसार भारत में यह दूसरी सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुस्तक है।
प्रीति शेनॉय की यह पुस्तक भारत में तीसरी सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुस्तक है। इसे उन लोगों को अवश्य पढ़ना चाहिए जो अक्सर आत्महत्या के बारे में सोचते हैं और जीवन के प्रति निराशा का अनुभव करते हैं। यह पुस्तक हमें सिखाती है कि हमारी जिंदगी कितनी महत्वपूर्ण है और इसे हल्के-फुल्के सरल अंदाज में कैसे जिया जा सकता है। जीवन बेहद खूबसूरत है, विपरीत परिस्थितियों में आप इसका सामना कैसे करते हैं यह आपके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है जिंदगी पर नहीं। जब अचानक कोई पहाड़ टूट भी पडे तो आप क्या करेंगे? पलायन करेंगे, सामना करेंगे या जो हुआ है उसे खुशी-खुशी स्वीकार कर लेंगे... पुस्तक की नायिका अंकिता शर्मा खूबसूरत है, स्मार्ट और युवा है अचानक 6 माह बाद वह अपने आपको मानसिक रोग से ग्रस्त पाती है। अंकिता ने अपनी हंसती-चहकती जिंदगी में दोबारा प्रवेश कैसे किया, पुस्तक में उसक‍ी यह लड़ाई बेहद प्रेरक, रोमांटिक और दिलचस्प अंदाज में पेश की गई है।
The Emperor Of All Maladies: A Biography Of Cancer: भारत में चौथी सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली यह यह किताब कैंसर पर लिखी गई है। मगर इसमें नया क्या है? कैंसर पर अब तक सैकड़ों किताबें लिखी जा चुकी है। खास बात यह है कि यह किताब कैंसर के लक्षणों और बचाव पर नहीं है। भारतीय मूल के अमेरिकन युवा डॉक्टर सिद्धार्थ मुखर्जी ने कैंसर पर इसे आम जनमानस की नाजुक भावनाओं और बेबुनियाद आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए अत्यंत रोचक अंदाज में बुना है। पुस्तक ना सिर्फ कैंसर पी‍ड़‍ितों बल्कि उनके परिजनों की चिंताओं को केन्द्र में रखकर लिखी गई है। इस पुस्तक में सिद्धार्थ ने कैंसर की जुबानी कैंसर का इतिहास बयान किया है। सिद्धार्थ ने स्पष्ट भी किया कि 'यह किताब डॉक्टरों के लिए नहीं है। भाषा, प्रस्तुति और विषयवस्तु हर दृष्टि से मैंने एक आम इसांन को ध्यान में रखकर लिखी है। सिद्धार्थ अपनी इस पुस्तक में लिखते हैं, अगर टीबी 19 वीं सदी का सबसे भयावह रोग था तो कैंसर 20 वीं सदी का महारोग है। इसीलिए इसे पुस्तक के नाम में ही सभी रोगों का बादशाह (emperor) बताया गया है। पुस्तक ने प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार जीता है। सिद्धार्थ मुखर्जी ने इस बीमारी को लेकर होने वाली राजनीति की पुस्तक में विस्तार से चर्चा की। सिद्धार्थ के अनुसार,' अमेरिका में 20वीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में सबसे ज्यादा लोग फेफड़े के कैंसर से मरे लेकिन वहाँ की टोबैको लॉबी इतनी तगड़ी थी कि उसने इस संबंध में लोगों तक पूरी और आवश्यक सूचनाएं पहुंचने ही नहीं दी ताकि लोग सिगरेट के फैशन को बरकरार रखें। सिगरेट कंपनियों का मुनाफा बढ़ता रहे। चाहे देश की जनता एक क्रूर रोग की चपेट में आकर मरे तो मरती रहे। इस जागरूकता के प्रसार में खासा समय लगा कि कैंसर से बचने के लिए धूम्रपान का त्याग कितना जरूरी है। पुस्तक का दिलचस्प पक्ष यह है कि कैंसर से निपटने के डॉक्टरी प्रयासों को भी इस आकर्षक अंदाज में रखा गया है कि पाठक बेहद हल्के-फुल्के मूड में एक खतरनाक बीमारी के गंभीर परिणामों को समझ लेता है। न्यूयार्क टाइम्स ने पहले सबसे ज्यादा बिक्री वाली किताबों की सूची में इसे शामिल किया। अगले ही हफ्ते न्यूयार्क टाइम्स ने 'द एम्परर ऑफ ऑल मेलेडीस: ए बायोग्राफी ऑफ कैंसर' को वर्ष 2010 की टॉप 10 बुक्स की लिस्ट में रखा। इसको पांच गैर कथात्मक किताबों की सूची में तीसरा स्थान प्राप्त हुआ। 2012 में भी पुस्तक ने टॉप टेन में अपना स्थान सुरक्षित रखा।
Mithya: A Handbook of Hindu Mythology : देवदत्त पट्टनायक की यह पुस्तक हिन्दू धर्म, दर्शन के सदियों से प्रचलित मिथकों और किंवदंतियों को देखने और समझने का नया नजरिया देती है। ‍भारतीय संस्कृति, हिन्दू धर्म, आध्यात्म और पुराणों के पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे मिथकों, प्रतीकों, और रिवाजों को जानने के लिए भारत में इस पुस्तक को बड़े चाव से पढ़ा जा रहा है। लेखक ने बिना किसी लंबे-चौड़े आख्यानों के इसे सीधे अंदाज में पेश किया है। देवदत्त की लेखन शैली सटीक और स्पष्ट है यही वजह है कि इसने तेजी से लोकप्रियता के पायदान चढ़े हैं। पुस्तक में उकेरे रेखाचित्र भी देवदत्त के ही हैं।
Steve Jobs: The Exclusive Biography : एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स यह जीवनी लिखने के लिए इस वजह से तैयार हुए थे कि उनके बच्चे यह जान सकें कि वह उन्हें ज्यादा क्वॉलिटी टाइम क्यों नहीं दे सके। ‘स्टीव जॉब्स’ के लेखक वाल्टर आईजैक्सन हैं। ‘आई स्टीव: दी बुक आफ जॉब्स’ शीर्षक से आने वाली इस पुस्तक का जॉब्स के निधन के कारण शीर्षक बदल दिया गया।
  जीवन के आखिरी सप्ताह में बेहद बीमार जॉब्स, आईजैक्सन से मिले थे। कैंसर के कारण जॉब्स की 56 वर्ष की अवस्था में मृत्यु हो गई। जीवनी में जॉब्स के विचारों और जुनूनी व्यक्तित्व के अलावा बताया गया है कि जॉब्स को हफ्तों पहले यह आभास हो गया था कि जल्दी ही उनकी मृत्यु होने वाली है। एप्पल के फैन्स के बीच यह पुस्तक खासी लोकप्रिय है।
Revolution 2020 : युवा लेखक चेतन भगत की युवाओं के लिए लिखी पुस्तक 'रिवोल्यूशन 2020' खासी चर्चा में रही। 2012 में यह टॉप टेन बुक्स में शामिल की गई है। क्रिकेटर युवराज सिंह ने पुस्तक का विमोचन किया था। चेतन के अनुसार उनकी यह किताब मुख्य रूप से लव स्टोरी है, जो आज के युवाओं को ध्यान में रखकर लिखी गई है। यह छोटे शहर में रहने वाले युवाओं के जीवन पर केंद्रित है। देश में आज भी कई पुस्तक प्रेमी हैं, जो पढ़ना चाहते हैं और मैं उनकी इच्छा को हमेशा जिंदा रखना चाहता हूं, इसीलिए लिखता हूं। अब तक चेतन भगत की दो किताबों पर फिल्में बन चुकी हैं। चेतन को उम्मीद है कि भारतीय शिक्षा में भ्रष्टाचार और प्रेम पर आधारित पुस्तक 'रिवॉल्यूशन 2020' पर भी फिल्म बनेगी। इस पुस्तक को रूपा एंड कंपनी ने प्रकाशित किया।
'रिवोल्यूशन 2020' - प्यार, भ्रष्टाचार और महत्वाकांक्षा के आसपास चलती है। बनारस में पले-बढ़े तीन दोस्त गोपाल और राघव की एक ही लड़की आरती से प्रेम की कहानी है। इसमें शैक्षणिक जगत के भ्रष्टाचार का दिलचस्प ढंग से वर्णन है। पुस्तक के जरिये चेतन ने छोटे शहरों के युवाओं के सपनों और उम्मीदों को उकेरा है। शिक्षा के क्षेत्र में उतरे निजी उद्यमियों के लालच और उनसे उत्पन्न विसंगितयों पर भी प्रकाश डाला है।
I Have A Dream : रश्मि बंसल की पुस्तक आई हेव ए ड्रीम का हिन्दी अनुवाद प्रभात प्रकाशन से 'सच हुए सपने' नाम से आया है। दोनों ही पुस्तक पाठकों द्वारा बेहद पसंद की जा रही है। स्टे हंगरी स्टे फुलिश और करेक्ट द डॉट जैसी बेस्टसेलर किताबें लिखने वाली रश्मि बंसल की यह किताब आशा की किरण बने 20 प्रेरक लोगों से रू-ब-रू कराती है। ये वे लोग हैं जिन्होंने सवा सौ करोड़ अन्य भारतीयों के विपरीत अलग हटकर कुछ करने की ठानी है। ये ऐसे 20 उद्यमी हैं जिनके अपने सामाजिक शुभ उद्देश्य भी हैं। रश्मि ने किताब को दिलचस्प बनाने के लिए तीन हिस्सों में बांटा है- मेघदूत, परिवर्तनकर्ता और दैवीय पूंजीपति। मेघदूत में शौचालय प्रसाधन क्रांति के जनक सुलभ इंटरनेशनल के बिंदेश्वर पाठक से शुरुआत की गई है। एक ब्राह्मण जिसने भारत में मैला ढोने वालों को उनके काम से मुक्ति दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
परिवर्तनकर्ता में सुपर-30 के आनंद कुमार पर लेखनी चलाई है तो अरविंद केजरीवाल, परिवार आश्रम के विनायक लोहानी, सेल्को के हरीश हांडे और रंगसूत्र की सुष्मिता घोष व देसी क्रू की सलोनी मल्होत्रा भी इनमें शामिल है। रश्मि के अनुसार, ये वे लोग हैं जो मैनेजमेंट के सिद्धांतों और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से विश्व को रहने योग्य बनाने की कोशिशों में लगे हैं।
Don’t Lose Your Mind Lose Your Weight : यह पुस्तक ऋजुता दिवेकर की शानदार प्रस्तुति कही जा सकती है। शीर्षक के अनुसार ही यह पुस्तक सिखाती है कि बिना मानसिक तनाव लिए शरीर का वजन कैसे कम किया जा सकता है।
Chanakya’s Chant : यह अश्विन सांघी का 500 पृष्ठ का उपन्यास है। नाम और कवर पेज से यह भ्रम हो सकता है कि यह चाणक्य की नीतियों और सूत्रों पर आधारित पुस्तक है लेकिन यह एकदम नए विचार और ताजगीपूर्ण अंदाज में लिखी ऐसी प्रस्तुति है जिसे युवा और राजनीति में रुचि रखने वालों के अतिरिक्त नए पाठक भी पसंद कर रहे हैं। यह उपन्यास दो समान स्तर पर साथ-साथ चलता है। एक कहानी सन 2300 से पूर्व चाणक्य नामक ब्राह्मण की है जो अपने पिता की हत्या का बदला लेने की शपथ उठाता है और दूसरी वर्तमान भारत के पंडित गंगासागर मिश्रा की है जो अपनी शिष्या को देश के 18वें प्रधानमंत्री के रूप में आसीन करने में सफल होता है। पुस्तक अच्छा प्रतिसाद पा रही है। टाने के कुछ आसान ट्रिक्स भी बताती है जो डेली डाइट से समझौता किए बिना भी आजमाए जा सकते हैं। (hindi.webdunia.com से साभार)

किताबों में किताबें


हर्षलसिंह राठौड़

23 अप्रैल 1564 को एक ऐसे लेखक ने दुनिया को अलविदा कहा था, जिनकी कृतियों का विश्व की समस्त भाषाओं में अनुवाद हुआ। यह लेखक था शेक्सपीयर। जिसने अपने जीवन काल में करीब 35 नाटक और 200 से अधिक कविताएँ लिखीं। साहित्य-जगत में शेक्सपीयर को जो स्थान प्राप्त है उसी को देखते हुए यूनेस्को ने 1995 से और भारत सरकार ने 2001 से इस दिन को विश्व पुस्तक दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की।
किसी व्यक्ति की किताबों का संकलन देखकर ही आप उसके व्यक्तित्व का अंदाजा लगा सकते हैं। कहते हैं कि किताबें ही आदमी की सच्ची दोस्त होती हैं और दोस्तों से ही आदमी की पहचान भी। किताबों में ही किताबों के बारे में जो लिखा है वह भी बहुत उल्लेखनीय और विचारोत्तेजक है। मसलन टोनी मोरिसन ने लिखा है- 'कोई ऐसी पुस्तक जो आप दिल से पढ़ना चाहते हैं, लेकिन जो लिखी न गई हो, तो आपको चाहिए कि आप ही इसे जरूर लिखें।'
किसी ने कहीं लिखा है कि अगर कोई यह मानता है कि यह जीवन उसे सिर्फ एक बार ही मिला है तो यह जानिए कि वह पढ़ना नहीं जानता। वास्तव में अगर किताबें न हों तो बहुत से कार्य तो हमारे अधूरे ही रह जाएँगे। ज्ञान, मनोरंजन और अनुभव की बात कहती ये किताबें यूँ ही नहीं पूजी जातीं। इनके पन्नों पर जीवन का हर अर्थपूर्ण अनुभव सहेज लिया जाए ताकि आने वाला कल और भी सुंदर बन सके। आज विश्व पुस्तक दिवस पर हम किताबों से संबंधित कुछ जानकारियाँ आप तक पहुँचा रहे हैं।
शा. श्री अहिल्या केंद्रीय पुस्तकालय के प्रभारी क्षेत्रीय ग्रंथपाल डॉ. जीडी अग्रवाल के अनुसार किताबों का अस्तित्व खत्म नहीं हो सकता। आधुनिकता की बात करें तो भी यह बात हर वक्त संभव नहीं कि किताबों के स्थान पर लैपटॉप आदि से पढ़ा जाए। किताबें हर वक्त साथ निभाती हैं फिर चाहे वह बाल साहित्य हो या धार्मिक ग्रंथ। किताबों की दोस्ती हमेशा साथ निभाती है।
वैसे तो डेली कॉलेज की लाइब्रेरी काफी समृद्ध है पर हजारों किताबों के बीच 120 पुस्तकें ऐसी हैं जो दुर्लभ और बेशकीमती हैं। हिस्ट्री ऑफ हिन्दुस्तान के 3 भाग, बर्ड्स ऑफ एशिया के 7 भाग, द किंग एंड क्वीन इन इंडिया 1911 टू 1912 जिसमें राजा और रानियों के चित्र व जानकारी वाली किताब यहाँ है। इसके अलावा लंदन से 1880 में प्रकाशित पुस्तक इंग्लिश स्कूल ऑफ पेंटिंग इन वॉटर कलर, केव टेंपल्स ऑफ इंडिया जैसी किताबें भी यहाँ हैं। यहाँ 4 भागों में महाभारत और दो भागों में रामायण भी है जिनके पन्नों को देख यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये कितनी पुरानी किताबें हैं। वैसे तो बाहरी व्यक्ति को इस पुस्तकालय की सदस्यता नहीं दी जाती पर संस्थान के अधिकारी की अनुमति के आधार पर बहुत से लोगों ने यहाँ अध्ययन कर शोध कार्य किया है।
संतुष्टि तो पुस्तकों से ही मिलती है डेली कॉलेज की ग्रंथपाल सायरा बानो कुरैशी बताती हैं कि किताबों का क्रेज कभी कम नहीं हो सकता। जिन्हें पुस्तकों में दिलचस्पी है वे किताब पढ़े बिना संतुष्ट नहीं होते भले ही किताब में लिखी बात अन्य मीडिया के माध्यम से वे जान चुके हों।
नेहरू पार्क में 1968 से संचालित होते आ रहे महात्मा गाँधी पुस्तकालय का नाम पहले सेंट्रल लाइब्रेरी गाँधी हॉल था। वर्तमान में इस पुस्तकालय में 28 हजार 545 पुस्तकें हैं। सुबह 8 से शाम 7 बजे तक खुले रहने वाले इस पुस्तकालय के 6 हजार 592 सदस्य हैं। वैसे तो यहाँ हर आयुवर्ग की पसंद और आवश्यकतानुसार किताबें हैं पर यहाँ की सबसे पुरानी किताबें हैं- जगतनारायण द्वारा लिखित रामजी-भरतजी, प्राणनाथ वानप्रस्थी की वीर हनुमान, आनंद द्वारा लिखी गई बापू की सीखें और ज्ञानदेव शास्त्री द्वारा लिखित मुद्रा राक्षस।

जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले


पाकिस्तान के अजीम और नफासत से भरे शायर अहमद फराज की एक गजल है। मुखड़ा यूं है कि ‘अब के बिछड़े हम शायद ख्वाबों में मिले, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले’, इस गजल को प्रसिद्ध गजल गायक मेहंदी हसन ने अपनी रेशमी, मखमली आवाज में गाकर दिल के जख्मों को आवाज दे दी है। कहते हैं कि कइयों को मेहंदी हसन की आवाज और उसमें भी अहमद फराज की गजलों को सुने बिना नींद ही नहीं आती थी। दरअसल यह गजल उस गुजिश्ता जमाने की यादगार गजल है, जब फूल खिलते थे और हाथों में किताबें होती थीं। किताबों के सफे पलटे जाते थे। यह किताबों और नोट्स बनाने का जमाना था। किताब का कोई पेज या हिस्सा अच्छा लगता तो उसमें एक फूल दबाकर रख दिया जाता था। ये सूखे फूल एक पूरी क्रमिक यादगारों का हिस्सा होते थे।
कभी नोट्स एक्सचेंज के बहाने या किताब के लेन-देन पर वह फूल वाला हिस्सा खुल जाता तो इसके मायने समझने में देर नहीं लगती थी। पर यह तब इतना आसान भी नहीं होता था। खुदा का कहर कि जब तक मोहब्बत का इजहार करना होता कि बिछुड़ने के कई बहाने बन जाते।
माशूका के निकाह की खबर मिलती या उनके अब्बू की बदली दूसरे शहर में हो जाती। रह जाते तो वे सूखे फूल, जो किताबों में एक यादगार बनकर बस जाते थे। मोहब्बत तो मोहब्बत होती है। जब तक रहती है बहुत शिद्दत से मन पर छाई रहती है फिर तो सूखे फूलों का ही सहारा होता।
उस जमाने में रंग-बिरंगे फूल बहुत होते थे। छोटा-सा घर हो या बड़ा, हरी घास का एक टुकड़ा घर के आगे होता ही था। उसके चारों ओर क्यारियों में फूल खिले होते थे। एक फूल तोड़ा और उसे सहेजकर किताब या नोट बुक में दबा दिया। जब कभी किताब या नोटबुक के नोट्स की अदला-बदली होती तो वे सूखे फूल उसी खास जगह दबे मिलते, जहां भावनाओं और अनुभूतियों का इजहार करना होता था। किताबों की या नोट्स की अदला-बदली में यह सूखे फूल मोहब्बत का पैगाम होते। इससे बढ़कर या इससे सुंदर कोई और प्यारा-सा पैगाम का माध्यम हो सकता था?
ज्यादातर मोहब्बतें नाकाम रहतीं। जब कभी मौका मिला या समय मिला तो किताबों की रैक को यूं ही खंगाला जाता। तब वह सूखे फूल एक ख्वाब की तरह नजरों से गुजर जाते। पता नहीं कितनी यादें लिए वह जमाना फिल्म की रील की तरह आंखों के सामने एक के बाद एक यादें लिए गुजरता जाता।
अब मोहब्बतें गुम हो गई हैं। एसएमएस और ईमेल का तथा इससे भी आगे बढ़कर फेसबुक का जमाना है। इन्हें जब भेजा जाता है तो इनमें दबे हुए सूखे फूलों की वह भीनी-सी महकती खुशबू नहीं होती। अब फूलों की क्यारियां भी तो नहीं दिखतीं। दूर-दूर तक रंगीनियत से भरे इठलाते-खिलते फूल कहीं दिखलाई नहीं पड़ते।
यहां तक कि वे किताबें भी कहां हैं, जिन्हें दोनों हाथों से थामकर दुपट्टे के नीचे दबाए क्लास रूम में दाखिल हुआ जाता था। आजकल नोटबुक्स के नोट्स की अदला-बदली नहीं होती कि सूखे फूल कोई पैगाम ले आएं या ले जाएं।
कोई जरूरी मसला कहना होता है तो ई-मेल से फॉरवर्ड कर दिया जाता है। अब! इस ई-मेल को कहां तक सेव करके इसमें सूखे फूलों की खुशबू सूंघेंगे?
ख्याल आ रहा है कि अहमद फराज होते तो आज किताबों की इस गैर-मौजूदगी पर क्या गजल कहते? कंप्यूटर पर ई-मेल से या मोबाइल पर भेजे एसएमएस से भेजे मुहब्बत के संदेशों में किन सूखे फूलों से उस अल्हड़ मोहब्बत की याद करते? वाकई हम बिछुड़ गए हैं। मुहब्बतें भी खो गई हैं। फूल भी तो कंप्यूटर या मोबाइल पर खिलकर सूखकर बेशुमार यादों का पिटारा खोल नहीं सकते। कहां हैं वे फूल, कहां हैं? वे किताबें कहां हैं? (myhindiforum.com से साभार)

इन किताबों से चीजों को देखने का नजरिया बदला



शिक्षा अकेली ऐसी चीज है, जो किसी की प्रकृति को बदल सकती है। चाहे फिर वो किताबों से मिले या किसी की निजी जिंदगी से। विचारों की उड़ान में इन किताबों ने खासा महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन किताबों से चीजों को देखने का नजरिया बदला है। अब तक कहा जाता था किताबें ही सब कुछ हैं। वे ही हमारी सच्ची मित्र होती हैं। पर हम ही उसे अब झ़ुठला रहे हैं। बदलते जीवन और बदलते मूल्यों के साथ यह किताबें हमसे दूर होती जा रही हैं। आज बड़े से बड़े महाकाव्य एक सीडी में समाने लगे हैं। सीडी की छोड़ो, अब तो उसे हम एक छोटी सी पेनड्राइव में भी कैद कर सकते हैं। फिर चाहे उसे हम पढ़ें या न पढ़ें। वे हमारी कैद में रहेंगी। पहले किताबों को दीमक से डर था, पर इसे अब वाइरस का डर है। पहले किताबों को कहीं ले जाना बहुत कठिन काम था, लेकिन अब तो यह काम बहुत ही आसान हो गया है। पहले किताबें प्राप्त करने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती थी। अपनी मनचाही किताबों के लिए लोग भटकते रहते थे। काफी मुश्किलों से प्राप्त किताबों को पढ़ने में भी आनंद आता था। आज सहजता से दुर्लभ किताबें भी मिल जाती हैं तो भी पढ़ने में आनंद नहीं आता। पहले किताबें जो कहती थीं, हमें आसानी से समझ में आता था, लेकिन अब नहीं आता। आसानी से उपलब्ध होकर, करीब आकर बहुत दूर होने लगी हैं, किताबें हमसे। बहुत ही करीब से वह हमें कुछ कहती हैं, पर हम उसे सुन नहीं पाते। पहले आलमारियों में सजकर गर्व का अनुभव करती थीं किताबें, अब सीडी में कैद होकर छटपटा रही हैं किताबें। खोने लगा है किताबों का अनूठा संसार। वे किताबें अब भी कुछ कहना तो चाहती हैं, पर उसकी भाषा समझने का साम*र्थ्य हममें नहीं है। नई पीढ़ी के लिए तो अजूबा ही हैं किताबें। बस्ते का बोझ अब किताबों से नहीं, बल्कि कॉपियों से बढ़ने लगा है। पहले लोग किताबें पढ़कर गर्वोन्मत्त होते थे, अब किताबें लिखकर गर्व का अनुभव करते हैं। हमारे आसपास बिखरी हैं किताबें। नई किताबें, पुरानी किताबें। अच्छी किताबें, बुरी किताबें। बड़ों की किताबें, बच्चों की किताबें। किताबों का साम्राज्य है और किताबों का शासन है। किताबें ही प्रजा हैं, किताबें ही राजा हैं, किताबों की सड़क है और किताबों की ही इमारत है। ओह कितना सुखद स्वप्न है यह, या फिर महज एक कोरी कल्पना। आज के नेट युग में किताबों का ऐसा संसार कहां? किताबें तो अब किताबों की बातें बन चुकी हैं। हमारे पास इतना समय ही कहां कि इस नेट की दुनिया से बाहर आएं और किताबों के पन्ने पलटें। हम तो रच-बस गए हैं नेट के मायाजाल में। फंस गए हैं जानकारियों के ऐसे चक्रव्यूह में जहां से बाहर निकलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। सबकी खबर है हमें केवल स्वयं को, अपने लोगों की छोड़कर। आओ किताबों की इस खत्म होती दुनिया में मन की किताब खोलें और उस किताब में एक नाम जोड़ें विश्वास का, आत्म अनुशासन का, आत्म सम्मान का और स्वाभिमान का।
आज की पीढ़ी का मानो किताबों से नाता ही टूट गाया। हर बात के लिए उनके पास गूगल बाबा हैं ना! एक यही बाबा हैं जो हमें हर जगह हमेशा ले जाने को तैयार हैं। इसके बिना तो आज किसी भी ज्ञान की परिकल्पना ही नहीं की जा सकती। यह है तो कमी क्या है! आज युवाओं के हाथों में किताबें तो हैं पर उसे वे ऐसे देखते हैं मानो कोई अजूबा हो। छोटे-छोटे नोट्स से ही उनका काम चल जाता है। अच्छा भी है शायद। अब किसी पोथी से उनका वास्ता ही नहीं पड़ता। पोथी देखकर वे बिदकने लगेंगे। हमारे पास ज्ञान के लिए गूगल बाबा हैं, यह सच है। पर इनके दिए ज्ञान को हम कब तक अपने दिमाग में रखते हैं? गूगल बाबा के ज्ञान से केवल परीक्षा ही दी जा सकती है। पर हमारे पूर्वजों ने जो ज्ञान दिया है, वह तो जीवन की परीक्षा में पास होने के लिए दिया है। जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए दिया है। आज उनके दिए ज्ञान का उपयोग कम से कम हो पा रहा है।
शोध बताते हैं कि गूगल बाबा की शरण में रहने वालों की स्मृति कमजोर होने लगी है। आखिर कहां जाएंगे कमजोर याददाश्त लेकर हम सभी? सब कुछ है गूगल बाबा के पास। पर शायद नहीं हैतो मां का ममत्व, पिता का दुलार, बहन का अपनापा या फिर प्रेमी या प्रेयसी का प्यार। हम जब मुसीबत में होते हैं, तब चाहकर भी गूगल बाबा हमारे सर पर हाथ नहीं फेर सकते। हमारे आंसू नहीं पोंछ सकते। हमें सांत्वना नहीं दे सकते। बाबा हमें ज्ञानी तो बना सकते हैं पर एक प्यारा सा बेटा, समझदार भाई, प्यारे से पापा, अच्छा पति नहीं बना सकते। इसलिए कहता हूं बाबा को घर के आंगन तक तो ले आओ, पर घर के अंदर घुसने न दो। अगर ये घर पर आ गए तो समझो, हम सब अपनों से दूर हो जाएंगे। हम गैरों से घिर जाएंगे। यहां सब कुछ तो होगा, पर कोई अपना न होगा। कैसे रहोगे फिर उस घर में? किताबों से दोस्ती करो, क्योंकि ये हमारी सबसे अच्छी दोस्त हैं। किसी भी तरह के सुख-दु:ख में यही हमारे काम आएंगी। जब ये हमसे बातें करेंगी तो हमें ऐसा लगेगा, जैसे मां हमें दुलार रही है। पिता प्यार से सर पर हाथ फेर रहे हैं। बहना और दीदी हमसे चुहल कर रहीं हैं। इससे अपनापे और प्यार का समुद्र लहराने लगेगा। किताबें हमसे कुछ कहने के लिए आतुर हंै। वह दिन बहुत ही यादगार होगा, जब यही किताबें आपसे ज्ञान प्राप्त करेंगी। हम सब गर्व से कह उठेंगे कि किताबों जैसा कोई नहीं। तो हो जाओ तैयार पढ़ने के लिए एक किताब प्यारी सी। (myhindiforum.com से साभार)

किताबों से प्यार कीजिए


स्मृति जोशी

अगर आप पुस्तकप्रेमी हैं तो जाहिर सी बात है उन्हें रखने के लिए एक अदद अलमारी भी होगी। अगर आपकी पुस्तकों की अलमारी अस्त-व्यस्त है, तब तो पुस्तकें खोजने में आपका समय खासा बर्बाद होता होगा। पेश है, विश्व पुस्तक दिवस पर पुस्तकों से रिश्ता मजबूत करने के उपयोगी टिप्स :
बुक शेल्फ के रखरखाव के टिप्स-
* सबसे पहले तो पुस्तकों की अलमारी ड्राइंग रूम में न रखकर शयनकक्ष के पास वाले बरामदे में रखिए।
* अगर यह सुविधा नहीं है तो अलमारी जहाँ है वहाँ एक स्टूल अवश्य रखें।
* अलमारी में पुस्तक रखने से पहले कीटनाशक छिड़कें।
* उसमें पतला कागज बिछाएँ।
* हो सके तो अमृत-वचन के वॉलपेपर्स लगाएँ।
* उसमें थोड़ा टेल्कम पावडर छिड़कें।
* अलमारी के भीतरी हिस्सों में अगरबत्ती के खाली पैकेट रखने से पुस्तकों से भीनी-भीनी खुशबू आएगी।
* पुस्तकों को कवर चढ़ाएँ। ये कवर ब्राउन पेपर्स से लेकर प्लास्टिक के चिकने कवर भी हो सकते हैं।
* पुस्तकों पर लेबल लगाएँ।
* लेबल पर पुराने कैलेंडर से अंक काटकर क्रमानुसार चिपकाएँ।
* इन पुस्तकों को आकार के अनुसार जमाएँ।
* पत्रिकाओं और पुस्तकों का स्थान अलग-अलग रखें।
* पुस्तकें या तो विषय के अनुसार विभाजित करें या लेखकों के अनुसार।
* एक रजिस्टर बनाएँ, इसमें पुस्तक पर अंकित नंबर लिखें, उसके सामने पुस्तक का नाम तथा लेखक का नाम लिखें। इससे आपकी पुस्तक कभी गुम नहीं होगी।
* अलमारी के दरवाजे अगर काँच के हैं तो उन पर खूबसूरत स्टीकर्स लगाए जा सकते हैं।
* अगर किसी व्यक्ति विशेष (लेखक) की पुस्तकें बहुतायत में हैं तो उनकी तस्वीर भी लगाई जा सकती है।
* जिन लेखकों की पुस्तकें आपके पास हैं उनकी तस्वीरों का कोलॉज भी बना सकते हैं।
* पुस्तकों की अलमारी में 'बुकमार्क' भी रखें।
* बाजार में अलग-अलग तरह के बुकमार्क आसानी से मिलेंगे।
* बुक शेल्फ के पास पुराने ग्रीटिंग कार्ड, जन्मदिन के कार्ड सजाकर लगाए जा सकते हैं।
* जहाँ बुक शेल्फ हो, वहाँ एक आरामकुर्सी भी हो तो सोने पे सुहागा होगा।
* बुक शेल्फ के नजदीक टेबल-कुर्सी पर नाइट-लैंप की व्यवस्था होनी चाहिए।
* बुक शेल्फ के पास ही सीडी और कैसेट्‍स कलेक्शन की सुविधा भी होना चाहिए।
* बुक शेल्फ के ऊपरी हिस्से में छोटे-छोटे गिफ्ट आर्टिकल्स सजाए जा सकते हैं।
* विशेषकर हैप्पी मैन, कैंडल्स, फ्लावर्स एवं अन्य फैंगशुई आइटम (दिशा का ध्यान रखें)।
* विंड चाइम बुकशेल्फ वाले कमरे में सुखद अहसास देगी।
* बुक शेल्फ के नजदीक अगरबत्ती कभी ना लगाएँ, अगरबत्ती लगाने के लिए एक सुरक्षित स्थान तय करें।
* कल्पना कीजिए, भीनी-भीनी चंदन की सुगंधित अगरबत्ती जल रही हो, शाम की सुहानी बयार में जगजीत सिंह की गज़लें चल रही हो और आरामकुर्सी पर आपके हाथों में हो एक शानदार उपन्यास या रोमांटिक शायरी की किताब। है न हसीन कल्पना? तो आज ही सजाएँ अपना बुक शेल्फ! संकल्प कीजिए विश्व पुस्तक दिवस पर कि पुस्तकों को सिर्फ पढ़ेंगे ही नहीं बल्कि प्यार भी करेंगे।

Tuesday, 25 June 2013

पैंतीस प्रतिशत बुक लवर्स लैपटॉप पर


गूगल ने इलेक्ट्रॉनिक बुक स्टोर की दुनिया में कदम रखते हुए अमेजन को जोरदार टक्कर दी है। गूगल पर पढ़ी जा सकने वाली मुफ्त किताबों के कारण भी विवाद हुआ। लेकिन गूगल का कहना है कि इससे ज्यादा लोग किताबें पढ़ सकेंगे। गूगल की प्रवक्ता जेनी होर्नुंग का कहना है, हमें विश्वास है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा ई-बुक पुस्तकालय होगा। मुफ्त पढ़ी जा सकने वाली किताबों को मिला कर इनकी कुल संख्या तीस लाख से ज्यादा है। मैकमिलन, रैन्डम हाउस, साइमन एंड शूस्टर जैसे मशहूर प्रकाशकों की हजारों डिजिटल किताबें ई-बुक स्टोर में बेची जाएँगी।
गूगल ई-बुक्स इंटरनेट क्लाउड पर ऑनलाइन रखी जाएँगी और वेब से जुड़े किसी भी कंप्यूटटर या फिर एप्पल के आईफोन, आईपैड, आई पॉड टच और ऐसे स्मार्ट फोन्स जिस पर गूगल के एन्ड्रॉइड सॉफ्टवेयर हो, उन पर पढ़ी जा सकेंगी। ई-बुक्स पर बेची गई किताबें सोनी रीडर, बार्नेस और नोबल के नूक सहित दूसरे ई-रीडर पर पढ़ी जा सकेंगी लेकिन अमेजन के किंडल पर नहीं। गूगल का मानना है कि अधिकतर लोग लॉग इन करके किताबें ऑनलाइन पढ़ना पसंद करेंगे और इसके लिए वे जो भी गेजेट आसानी से उपलब्ध होगा उसका इस्तेमाल करेंगे। ठीक उसी तरह से जैसे वह वेब पर जी-मेल अकाउंट चेक करते हैं।
हॉर्नुंग का कहना है, आप एक किसी भी किताब को क्लाउड की एक लायब्रेरी में जमा कर के रख सकेंगे और गूगल अकांउट के जरिए कहीं से भी उस किताब को पढ़ सकेंगे।
गूगल बुक्स के इंजीनियरिंग डायरेक्टर जेम्स क्रॉफर्ड का कहना है, मुझे विश्वास है कि आने वाले सालों में हम किसी भी बुक स्टोर से सिर्फ ई-बुक्स ही खरीदेंगे, उन्हें वर्चुअल रैक में रखेंगे और किसी भी डिवाइस पर उसे पढ़ेंगे। अभी उस सपने की शुरुआत है। स्वतंत्र बुक स्टोर पॉवेल, ऑनलाइन बुक शॉप एलिब्रिस और अमेरिकी पुस्तक विक्रेता संघ गूगल के लॉन्चिंग डे पार्टनर्स हैं जो गूगल की डिजिटल किताबें बेचेंगे। ई-बुक स्टोर न्यूयॉर्क टाइम्स के बेस्ट सेलर उपन्यासों से लेकर तकनीकी पुस्तकों तक सब कुछ उपलब्ध हो सकेगा और इसके वर्चुअल पन्नों पर ग्रॉफिक्स भी आसानी से देखे जा सकेंगे। जहाँ तक कीमतों का सवाल है, ई-बुक्स स्टोर की किताबें बाजार के हिसाब से होंगी जबकि कई फ्री किताबें पहले ही गूगल पर उपलब्ध हैं। गूगल पुस्तक प्रेमियों की सोशल वेबसाइट गुड रीड्स के साथ हाथ मिलाएगा ताकि ऐसा नेटवर्क बने जहाँ लोग आसानी से ऑनलाइन ई-बुक्स खरीद सकें। होर्नुंग ने बताया कि विचार कुछ ऐसा है कि आप अपनी पसंद के विक्रेता से पुस्तक खरीदें और आपके पास जो डिवाइस मौजूद है उस पर उसे जहाँ चाहे वहाँ पढ़ें। गूगल के साथ फिलहाल चार हजार प्रकाशक हैं।
2004 में गूगल बुक्स प्रजेक्ट शुरू होने के बाद से गूगल ने सौ देशों से, चार सौ भाषाओं में करीब डेढ़ करोड़ किताबें डिजिलाइस की हैं। हालाँकि इस पर विवाद भी हुआ। लेखकों और प्रकाशकों ने गूगल के किताबें डिजिटलाइज करने पर आपत्ति उठाई थी। जिन किताबों का कॉपीराइट है या फिर जिनके लेखकों का कोई अता पता नहीं है ऐसी किताबें ई-बुक स्टोर पर नहीं बेची जाएँगी। एक शोध के मुताबिक अमेरिका में ई-बुक डिवास का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या इस साल के आखिर तक एक करोड़ से ज्यादा हो जाएगी। और 2015 तक 2 करोड़ 94 लाख अनुमानित है। फॉरेस्टर सर्वे के मुताबिक ई-बुक पढ़ने वाले लोगों में 35 फीसदी लोग लैपटॉप पर किताब पढ़ते हैं, 32 फीसदी अमेजन के किंडल पर और 15 फीसदी लोग एप्पल के आई फोन पर पढ़ते हैं। (myhindiforum.com से साभार)

नई कल्पनाओं की मां होती हैं किताबें


पुस्तक प्रेमी अक्सर इस बात की चर्चा करते है कि किस प्रकार कोई किताब उनके जीवन में परिवर्तन लाने वाली सिद्ध हो जाती है। किताबें पाठकों के सामने एक नई दुनिया खोल देती है और इसी के साथ वे मस्तिष्क की सोचने-विचारने व कल्पनाशक्ति की वृद्धि में सहायक सिद्ध होती है। पत्रकार विजेता शंकर राव कहती है, ''पढ़ने से बुद्धिमत्ता में वृद्धि होती है। किताबें आपको अधिक ज्ञानी तथा आत्मविश्वास से परिपूर्ण बनाती हैं।'' उन्हीं की तरह एक दूसरी पुस्तक प्रेमी महिला नंदिनी श्रीनिवास की स्वीकारोक्ति है, ''मैं पढ़ना पसंद करती हूं और मैंने घर पर एक छोटा सा पुस्तकालय बना रखा है। मेरे लिए अध्ययन सांस लेने जितना महत्वपूर्ण है।'' यह सत्य है कि अध्ययन आपकी दुनियादारी का दायरा बढ़ाता है। यह जीवन को नई दृष्टि से देखने के अवसर प्रदान करता है और आपके मस्तिष्क को कल्पना के नये आयामों तक ले जाता है।
कैसे चुनें किताबें
अध्ययन का अर्थ यह नहीं है कि कुछ भी पढ़ डाला जाए। यह मस्तिष्क के लिए आहार के समान होता है, इसीलिए इसे भी शारीरिक आहार की तरह गुणवत्तापूर्ण होना चाहिए। ऐसी पुस्तकों का चयन करे, जो आपके जीवन को प्रभावित करने की क्षमता रखती हों अथवा कम से कम इनसे आपको कुछ सीखने को मिले। अगर आप पुराने साहित्य में रुचि रखती है, तो शुरुआत के लिए मुंशी प्रेमचंद अथवा इंग्लिश में जेन ऑस्टन श्रेष्ठ सिद्ध हो सकते है। यदि आपकी रुचि कविता में है, तो प्रेमपूर्ण कविताएं इस दिशा में अच्छी शुरुआत होंगी। यदि आपकी रुचि समकालीन साहित्य में है, तब तो आपके सामने बहुत सारे विकल्प है। नजदीकी पुस्तक विक्रेता के पास आप हिंदी साहित्य से जुड़ी पत्रिकाओं से लेकर समकालीन साहित्यकारों की रचनाओं का विशाल संग्रह प्राप्त कर सकती है।
यदि आप पुस्तकों के संदर्भ में कुछ सुझाव प्राप्त करना चाहती है, तो नजदीकी पुस्तकालय में जाइए। अधिसंख्य पुस्तकालयों में पाठकों की पसंद तथा पुस्तकालयाध्यक्ष द्वारा संस्तुत की गई बेहतरीन पुस्तकों की सूची प्रदर्शित की जाती है। पुस्तकालय कर्मचारियों को इस बात का बखूबी अंदाज होता है कि कौन सी पुस्तकें अधिक लोकप्रिय है और किस वजह से? पुरस्कृत पुस्तकें आपको स्वत: ही अपनी ओर आकर्षित करती है। इसी के साथ ही विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित पुस्तक चर्चा स्तंभ भी आपकी सहायता कर सकते है। इनमें प्रकाशित पुस्तक की संक्षिप्त झलक आपको इस बात का अंदाजा दे देती है कि पुस्तक का स्तर क्या है?
किताबों के संसार में हर एक व्यक्ति की रुचि के अनुसार सामग्री उपस्थित है। यदि आप गंभीर साहित्यिक लेखन पढ़ने में रुचि नहीं रखती है तो यात्रा, पोषण, आत्मविकास, प्रेमकथाएं अथवा आध्यात्मिकता से संबंधित पुस्तकों को चुन सकती है। कुल मिलाकर बात यह है कि ऐसी पुस्तकों को चुनें, जिनसे आपको संतुष्टि का आभास हो और वे आपकी अंतदर्ृष्टि को विकसित करने में सहायक सिद्ध हों। कई प्रतिष्ठित पुस्तक प्रकाशक अपनी पुस्तकों का सूची पत्र तैयार करते है। यदि आप किसी पुस्तक विक्रेता की दुकान पर अपना नाम दर्ज करवा दें, तो यह सूची पत्र डाक द्वारा आपके पते पर भेज दिये जाते है। इसकी सहायता से आप अपने मन की पुस्तकों का चयन कर सकती है।
अध्ययन के लाभ
यह सर्वसिद्ध तथ्य है कि अध्ययन आपकी भावनात्मक बुद्धिमत्ता में सुनिश्चित तौर पर वृद्धि करता है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक डैनियल गोलमैन के अनुसार भावनात्मक बुद्धिमत्ता पांच गुणों जागरूकता, भावनाओं पर नियंत्रण, आत्मप्रेरण, समानुभूति तथा लोकव्यवहार का सम्मिश्रण है। पुस्तकें हमें विभिन्न किस्म के लोगों, व्यवहारों तथा अनुभवों से परिचित कराती है, जो वास्तविक जीवन से उत्पन्न होते है। पुस्तकें इस बात में हमारी सहायता करती है कि दूसरे किस प्रकार सोचते है? किसी उपन्यास में पात्रों की मनोदशा का विश्लेषण करते हुए पाठक दूसरों की भावनाओं से परिचित होने लगता है और कभी-कभी तो इनमें उसे अपना प्रतिबिंब दिखाई देने लगता है। इस प्रक्रिया से भावनात्मक बुद्धिमत्ता में वृद्धि होती है।
एक युवा मां दीप्ति राजपुरिया का कहना है, ''प्रत्येक अभिभावक को पुस्तकें पढ़ने की आदत डालनी चाहिए। मेरे बच्चों ने छोटी उम्र से ही पुस्तकों को पलटना शुरू कर दिया था, क्योंकि वे ऐसा करके अपनी मां जैसा दिखना चाहते थे। लगभग प्रत्येक शाम को मैं टेलीविजन देखने की जगह कोई अच्छी पुस्तक पढ़ना पसंद करती हूं। मेरे बच्चों ने भी मुझसे यह आदत सीख ली है। मेरा मानना है कि अभिभावकों को बच्चों के सामने खुद को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करना होता है जिससे वे अच्छी आदतें सीख सकें।''
नई दिल्ली के एक स्कूल में हेड लाइब्रेरियन के रूप में कार्यरत मिताली बाजपेयी का कहना है, ''मेरा मानना है कि अध्ययन आपके सामने नए अवसर और विचारों को प्रस्तुत करता है। यह न केवल आपको दूसरों की भावनाओं को समझने का अवसर देता है, बल्कि कई बार आपकी उग्र अथवा उपेक्षित भावनात्मक स्थिति को भी शांत करता है। इस दुनिया में कई महान पुरुष और स्त्रियां हुए है और यह दुर्लभ सी बात है कि आप इन सभी से मिल सकें। हां, पुस्तकें इस बात का रास्ता खोलती है कि आप इन महान विचारकों से परिचित हो सकें और उनसे कुछ सीख सकें। यदि आप पुस्तकों से दूरी रखती है तो निश्चित मानिए ज्ञान आपसे दूरी बना लेगा।''
यह वास्तविकता है कि तकनीक के दौर में लोगों की पुस्तकों से दूरी बढ़ गई है। सेलफोन, केबल टी.वी. और इंटरनेट ने हमें कुंद बुद्धि और मशीनों पर निर्भर इंसान बना दिया है। हर समय चलती-फिरती तस्वीरों के कारण इंसान की कल्पनाशीलता समाप्त होती जा रही है। इसके विपरीत जब आप कोई पुस्तक पढ़ती है, तब आपका दिमाग तेजी से काम करने लगता है। नई-नई कल्पनाएं जन्म लेती है, तार्किक क्षमता बढ़ती है और आप तथ्यों को अपनी स्वतंत्र कसौटी पर कस पाती है। मनुष्य को दूसरे पशुओं से बेहतर इसीलिए माना गया था, क्योंकि वह मस्तिष्क का ऊपर बताए गए तरीकों से प्रयोग कर सकता था। क्या 21 वीं शताब्दी में मनुष्य का मस्तिष्क मशीनों का गुलाम हो जाएगा अथवा उसकी कल्पनाशीलता और बढ़ेगी, इस प्रश्न का उत्तर केवल इस बात में छिपा है कि इस आलेख को पढ़ने के बाद आपका हाथ रिमोट उठाने के लिए बढ़ता है अथवा किसी अच्छी किताब को उठाने के लिए (myhindiforum.com से साभार)