Monday, 8 December 2014

दूधनाथ सिंह को भारत-भारती, ममता कालिया, पुन्नी, दिविक, जनमेजय भी सम्मानित

हिंदी संस्थान, लखनऊ में आयोजित 69वें साहित्यकार सम्मान समारोह में दूधनाथ सिंह को भारत भारती पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके अलावा ममता कालिया, पुन्नी सिंह, डा. दिविक रमेश, विभूति नारायण राय, प्रेम जनमेजय, डा. कविता वाचक्नवी, राममोहन पाठक, डा. सुरेश गौतम, चंद्रकांता, डा. कन्हैया सिंह, लाखन सिंह भदौरिया ‘सौमित्र’, डा. क्षरिदा कुमार शइकिया, बैजनाथ प्रसाद शुक्ल ‘भव्य’, डा. राम सिंह यादव, डा. देवेन्द्र दीपक, डा. महावीर सरन जैन, डा. कुसुम खेमानी, डा. शंभु नाथ, नुसरत नाहिद, जमुना प्रसाद उपाध्याय, जगदीश पीयूष, सरोजनी श्रीवास्तव, प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी, डा. अशोक कुमार अग्रवाल, प्रह्लाद रामशरण प्रवासी, योगीन्द्र द्विवेदी, डा. गुरशरन कौर जग्गी, रमेश यादव, डा. अरिबम ब्रज कुमार शर्मा, डा. अजय कुमार पटनायक, डा. एम. गोविन्दराजन, डीएन श्रीनाथ, डा. बीना बुदकी, शकील सिद्दीकी, साधना सान्याल, मुनुकुट्ल पद्माराव, डा. एच परमेश्वरन, डा. देवशंकर नवीन, डा. भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी ‘वागीश शास्त्री’, डा. सुधा ओम ढींगरा, डा. महेश आलोक, डा. सूर्यकांत, डा. संगीता बलवंत, डा. राम बहादुर मिश्र, डा. ओंकारनाथ द्विवेदी, डा. भोला प्रसाद द्विवदी आग्नेय, दुर्गा प्रसाद त्रिपाठी ‘निर्भीक’, डा. सुशील कुमार पाण्डेय, मो. असलम खान, डा. राकेश रफीक, मीनाक्षी सिंह, अमरनाथ राय, माता प्रसाद त्रिपाठी, डा. कैलाश नाथ पाण्डेय, शीला रोहेकर, सत्यधर शुक्ल, डा. जितेन्द्र कुमार सिंह ‘संजय’, डा. राजेश कुमार तिवारी, भगवती प्रसाद द्विवेदी, धनंजय चोपड़ा, राज देव प्रसाद, सूर्यनाथ सिंह, ओमवीर तोमर, ऋत्विक राय, डा. पुष्पलता, डा. दामोदर दत्त दीक्षित, फौजदार माली को को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के अंत में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के निदेशक डा. सुधाकर अदीब ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

Sunday, 7 December 2014

भुखमरी और अपराध बढ़ने का एक कारण जलवायु परिवर्तन भी / डा. अरविन्द सिंह

भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश में जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणाम होंगे। जलवायु परिवर्तन के फलस्वरुप कृषि उत्पादन में गिरावट के कारण मुद्रास्फिति की दर बढ़ेगी परिणामस्वरुप गरीबी, भूखमरी तथा बेरोजगारी में वृद्धि के कारण अपराधिक घटनाओं में अभूतपूर्व वृद्धि होगी। फसलों की असफलता से किसान आत्महत्या को मजबूर होंगे। संक्रामक बिमारियों का प्रकोप बढ़ने से इन बिमारियों से होने वाली मृत्यु दर में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी होगी। जलवायु परिवर्तन का अप्रत्यक्ष प्रभाव देश की आंतरिक सुरक्षा तथा सामरिक क्षेत्र पर भी पड़ेगा।
  क्या है जलवायु परिवर्तन?
जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण वैश्विक तपन है जो हरित गृह प्रभाव (Green house effect) का परिणाम है। हरित गृह प्रभाव वह प्रक्रिया जिसमें पृथ्वी से टकराकर लौटने वाली सूर्य की किरणों को वातावरण में उपस्थित कुछ गैसें अवशोषित कर लेती हैं जिसके परिणामस्वरुप पृथ्वी के तापमान में वृद्धि होती है। वह गैसें जो हरित गृह प्रभाव के लिए उत्तरदायी हैं को हरितगृह गैस के नाम से जाना जाता है। कार्बन डाईऑक्साइड
(CO2), मीथेन (CH4), क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स (CFCs), नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) तथा क्षोभमण्डलीय ओजोन
(O3) मुख्य हरित गृह गैसें हैं जो हरित गृह प्रभाव के लिए उत्तरदायी हैं। विभिन्न कारणों से वातावरण में इनकी निरन्तर बढ़ती मात्रा से वैश्विक जलवायु परिवर्तन का खतरा दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है।
पृथ्वी के सतह का औसत तापमान लगभग 15 डिग्री सेल्सियस है। यह तापमान हरित गृह प्रभाव के न होने पर जो तापमान होता उससे तकरीबन 33डिग्री सेल्सियस अधिक है। हरित गृह गैसों के अभाव में पृथ्वी सतह का अधिकांश भाग -18डिग्री सेल्सियस के औसत वायु तापमान पर जमा हुआ होता। अतः हरित गृह गैसों का एक सीमा में पृथ्वी के वातावरण में उपस्थिति जीवन के उद्भव, विकास एवं निवास हेतु अनिवार्य है।
जलवायु परिवर्तन के कारण:
नगरीकरण, औद्योगीकरण, कोयले पर आधारित विद्युत तापगृह, तकनीकी तथा परिवहन क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन, कोयला खनन, मानव जीवन के रहन-सहन में परिवर्तन (विलासितापूर्ण जीवनशैली के कारण रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीश्नर तथा परफ्यूम का वृहद पैमाने पर उपयोग), धान की खेती के क्षेत्रफल में अभूतपूर्व विस्तार, शाकभक्षी पशुओं की जनसंख्या में वृद्धि, आधुनिक कृषि में रासायनिक खादों का अंधाधुंध प्रयोग आदि कुछ ऐसे प्रमुख कारण हैं जो हरित गृह गैसों के वातावरण में उत्सर्जन के लिए उत्तरदायी हैं।
हरित गृह गैसें
कार्बन डॉईऑक्साइड: हरित गृह गैसों में कार्बन डाईऑक्साइड सबसे प्रमुख गैस है जो आमतौर से जीवाश्म ईधनों के जलने से उत्सर्जित होती है। वातावरण में यह गैस 0.5 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ रही है तथा इसकी तपन क्षमता 1 है। जैव ईधनों के जलने से प्रति वर्ष 5 बिलियन टन से भी ज्यादा कार्बन डाईऑक्साइड का जुड़ाव वातावरण में होता है जिसमें उत्तरी तथा मध्य अमेरिका, एशिया, यूरोप तथा मध्य एशियन गणतंत्रों का योगदान 90 प्रतिशत से भी ज्यादा का होता है। पूर्व-औद्योगीकरण काल की तुलना में वायु में कार्बन डाईऑक्साइड का स्तर आज 31 प्रतिशत तक बढ़ गया है। चूँकि वन कार्बन डाईऑक्साइड के प्रमुख अवशोषक होते हैं अतः वन-विनाश भी इस गैस की वातावरण में निरन्तर वृद्धि का एक प्रमुख कारण है।
वातावरण में 20 प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड जुड़ाव के लिए वन:विनाश जिम्मेदार है। वन-विनाश के फलस्वरूप 1850 से 1950 के बीच लगभग 120 बिलियन टन कार्बन डाईऑक्साइड का वातावरण में जुड़ाव हुआ है। पिछले 100 वर्षों में कार्बन डाईऑक्साइड की वातावरण में 20 प्रतिशत बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। वर्ष 1880 से 1890 के बीच कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा लगभग 290 पीपीएम (Parts of per million), वर्ष 1980 में इसकी मात्रा 315 पीपीएम, वर्ष 1990 में 340 पीपीएम तथा वर्ष 2000 में 400 पीपीएम तक बढ़ गई है। ऐसी संभावना है कि वर्ष 2040 तक वातावरण में इस गैस की सान्द्रता 450 पीपीएम तक बढ़ जायेगी। कार्बन डाईऑक्साइड का वैश्विक तपन वृद्धि में 55 प्रतिशत का योगदान है। औद्योगीकृत विकसित देश वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड वृद्धि के लिए ज्यादा उत्तरदायी हैं।
मीथेन: मीथेन भी एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण हरितगृह गैस है जो 1 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से वातावरण में बढ़ रही है। मीथेन की तपन क्षमता 36 है। यह गैस कार्बन डाईऑक्साइड की तुलना में 20 गुना ज्यादा प्रभावी होती है। पिछले 100 वर्षों में वातावरण में मीथेन की दुगुनी वृद्धि हुई है। धान के खेत, दलदली भूमि तथा अन्य प्रकार की नमभूमियाँ मीथेन गैस के उत्सर्जन के प्रमुख स्रोत है।
एक अनुमान के अनुसार वातावरण में 20 प्रतिशत मीथेन की वृद्धि का कारण धान की खेती तथा 6 प्रतिशत कोयला खनन है। इसके अतिरिक्त, शाकभक्षी पशुओं तथा दीमकों में आंतरिक किण्वन (ईन्टरिक फरमेन्टेशन) भी मीथेन उत्सर्जन के स्रोत हैं। वर्ष 1750 की तुलना में मीथेन की मात्रा में 150 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2050 तक मीथेन एक प्रमुख हरितगृह गैस होगी। इस गैस का वैश्विक तपन में 20 प्रतिशत का योगदान है। विकासशील देश विकसित देशों की तुलना में मीथेन उत्सर्जन के लिए ज्यादा उत्तरदायी हैं।
क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स: क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स (Chlorofluorocarbons) रसायन भी हरितगृह प्रभाव के लिए उत्तरदायी होते हैं। क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स रसायनों का इस्तेमाल आमतौर से प्रशीतक, उत्प्रेरक तथा ठोस प्लास्टिक झाग के रुप में होता है। इस समूह के रसायन वातावरण में काफी स्थायी होते हैं और यह दो प्रकार के होते हैं- हाइड्रो फ्लोरो कार्बन तथा पर फ्लोरो कार्बन। हाइड्रो फ्लोरो कार्बन की वातावरण में वृद्धि दर 0.4 प्रतिशत प्रतिवर्ष है तथा इसकी तपन क्षमता 14600 है। पर फ्लोरो कार्बन की भी वार्षिक वृद्धि दर 0.4 प्रतिशत प्रतिवर्ष है जबकि इसकी तपन क्षमता 17000 है।
हाइड्रो फ्लोरो कार्बन का वैश्विक तपन में 6 प्रतिशत का योगदान है जबकि पर फ्लोरो कार्बन का वैश्विक तपन में 12 प्रतिशत का योगदान है। औद्योगीकरण के कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स की वातावरण में 25 प्रतिशत वृद्धि हुई है। अतः विकासशील देशों की तुलना में औद्योगीकृत विकसित देश क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स के उत्सर्जन के लिए ज्यादा उत्तरदायी हैं।
नाइट्रस ऑक्साइड: नाइट्रस ऑक्साइड गैस 0.3 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से वातावरण में बढ़ रही है तथा इसकी तपन क्षमता 140 है। जैव ईधन, जीवाश्म ईधन तथा रासायनिक खादों का कृषि में अंधाधुंध प्रयोग इसके उत्सर्जन के प्रमुख कारक हैं। मृदा में रासायनिक खादों पर सूक्ष्मजीवों की प्रतिक्रिया के फलस्वरुप नाइट्रस ऑक्साइड का निर्माण होता है तत्पश्चात् यह गैस वातावरण में उत्सर्जित होती है। वातावरण में इस गैस की वृद्धि के लिए 70 से 80 प्रतिशत तक रासायनिक खाद तथा 20 से 30 प्रतिशत तक जीवाश्म ईधन जिम्मेदार हैं। इस गैस का वैश्विक तपन में 5 प्रतिशत का योगदान है। नाइट्ªस ऑक्साइड समतापमण्डलीय ओजोन पट्टी के क्षरण के लिए भी उत्तरदायी है। ओजोन पट्टी क्षरण से भी वैश्विक तपन में वृद्धि होगी।
ओजोन: क्षोभमण्डलीय ओजोन भी एक महत्वपूर्ण हरित गृह गैस है जो वातावरण में 0.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है। इस गैस की तपन क्षमता 430 है। ओजोन का निर्माण आमतौर से सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में नाइट्रोजन डाईऑक्साइड तथा हाइड्रोकार्बन्स की प्रतिक्रिया स्वरूप होता है। ओजोन गैस का वैश्विक तपन में 2 प्रतिशत का योगदान है।
वैश्विक स्तर पर हरित गृह गैसौं का उत्सर्जन:
जहाँ तक हरित गृह गैसों के उत्सर्जन का सवाल है वैश्विक स्तर पर भारत मात्र 1.2 टन प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष :हरित गृह गैसों का उत्सर्जन करता है। वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका प्रति वर्ष 20 टन से भी अधिक प्रति व्यक्ति हरित गृह गैसों का उत्सर्जन करता है। रूस 11.71 टन, जापान 9.87, यूरोपीय संघ 9.4 तथा चीन 3.6 प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष हरित गृह गैसों का उत्सर्जन करते हैं।
अतः विकासशील देशों की तुलना में विकसित देश हरित गृह गैसों का ज्यादा उत्सर्जन करते हैं जिसका खामियाजा भारत सहित दुनिया के अन्य विकासशील देशों को भुगतना होगा।
जलवायु परिवर्तन का भारत के विभिन्न क्षेत्रों पर दुष्प्रभाव
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (United Nations Environment Programme (UNEP)) की 2009 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार पिछले 100 वर्षों में विश्व के तापमान में 0.74 सेल्सियस की बढ़ोत्तरी हुई है। इस शताब्दी का पहला दशक (2000-2009) अब तक का सबसे उष्ण दशक रहा है। वर्ष 2010 में भारत के विभिन्न राज्यों जैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों तथा राजधानी दिल्ली में मार्च के महीने में 40 डिग्री सेल्सियस तक तापमान रिकार्ड किया गया, जबकि महाराष्ट्र राज्य के अनेक जिलों (जलगांव, नासिक, शोलापुर आदि) में अप्रैल के प्रथम सप्ताह में 43 डिग्री सेल्सियस तक तापमान रिकार्ड किया गया। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में मार्च के महीने में औसत से 10 डिग्री सेल्सियस ज्यादा तापमान रिकार्ड किया गया जिससे पिछले 109 वर्ष पुराना रिकार्ड टूट गया।
उक्त आंकड़ों से यह साबित होता है कि हरित गृह प्रभाव के कारण जलवायु परिवर्तन का दौर आरम्भ हो चुका है। भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश में जलवायु परिवर्तन के निसंदेह गंभीर परिणाम होगें। देश में जलवायु परिवर्तन के विभिन्न क्षेत्रों पर संभावित दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं।
पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण क्षेत्र पर जलवायु परविर्तन का प्रभाव:
जलवायु परिवर्तन के कारण बंगाल की खाड़ी में जल स्तर में वृद्धि होगी जिसके परिणामस्वरुप जैव-विविधता सम्पन्न मैन्ग्रुव पारितन्त्र (Mangrove ecosystem) नष्ट हो जायेंगे। जलस्तर में वृद्धि के कारण अण्डमान तथा निकोबार द्वीप समूह भी जल में डूब जायेंगे परिणामस्वरुप जैव-विविधता की वृहद पैमाने पर क्षति होगी क्योंकि ये द्वीप समूह जैव-विविधता सम्पन्न हैं तथा बहुत से पौधों तथा जन्तुओं की प्रजातियाँ यहां के लिए स्थानिक (वह प्रजातियाँ जो देश के किसी अन्य हिस्से में नहीं पायी जाती हैं) हैं।
सागर जल की तपन के कारण मूंगे का द्वीप लक्षद्वीप मूंगा विरंजन (Coral bleaching) का शिकार होकर नष्ट हो जायेगा। बाद में समुद्री जलस्तर बढ़ने से यह द्वीप पूरी तरह से डूबकर समाप्त हो जायेगा। वैश्विक तपन से हिमालय की वनस्पतियाँ विशेष रुप से प्रभावित होगी जिससे जैव-विविधता क्षय का खतरा बढ़ेगा।
जलवायु परिवर्तन के कारण कीटों, खरपतवारों तथा रोगाणुओं की जनसंख्या बढ़ेगी जिनके नियन्त्रण के लिए वृहद पैमाने पर रासायनिक नाशिजीवनाशकों (Pesticides) के प्रयोग के कारण पर्यावरण प्रदूषित होगा। कीटनाशकों तथा शाकनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से गैर-लक्षित उपयोगी कीट, फसलों की जंगली प्रजातियाँ तथा पौधों की अन्य उपयोगी प्रजातियाँ भी प्रभावित होंगी, जिससे जैव-विविधता का क्षरण होगा।
रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता के कारण मृदा की सूक्ष्मजीवी जैव-विविधता पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से मृदा की संरचना नष्ट होगी जिससे मृदा क्षरण को बढ़ावा मिलेगा परिणामस्वरूप बंजर भूमि के क्षेत्रफल में इजाफा होगा। रासायनिक कीटनाशकों तथा उर्वरकों से जल प्रदूषित होगा। सतही तथा भूमिगत जल के प्रदूषण का गंभीर खतरा होगा। सुपोषण (Eutrophication) से प्रभावित नमभूमियाँ (जो जैव-विविधता की संवाहक होती हैं) स्थलीय पारितन्त्र में परिवर्तित हो जायेंगी जिससे जैव-विविधता का क्षय होगा।
जलवायु की तपन के परिणामस्वरुप वनों में आग लगने की घटनाओं में वृद्धि होगी फलस्वरूप वन क्षेत्रफल में गिरावट के कारण पारिस्थितिक असंतुलन का गंभीर खतरा पैदा होगा। वनों के क्षरण के परिणामस्वरुप जैव-विविधता क्षय की दर में भी अभूतपूर्व वृद्धि होगी।
स्वास्थ्य क्षेत्र पर जलवायु परविर्तन का प्रभाव:
भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश में तापमान वृद्धि के कारण मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। जलवायु की उष्णता के कारण ग्रीष्म ऋतु में लू तथा गर्मी से होनेवाली मौतों में अभूतपूर्व वृद्धि होगी। जलवायु परिवर्तन के कारण देश में श्वास तथा हृदय-संबंधी बिमारियों की दर में इजाफा होगा। जलवायु की तपन के कारण उच्च रक्तचाप, मिर्गी तथा माइग्रेन जैसी बिमारियों की बारम्बारता में वृद्धि होगी साथ ही मानसिक बिमारियों जैसे अवसाद (Depression) तथा साइजोफ्रेनिया (Schizophrenia) से पड़ने वाले दौरों के बारम्बारता में भी बढ़ोत्तरी होगी।
उष्णता तथा नमी के कारण घाव के उपचार हेतु ‘प्रतिजैविक’ (Antibiotics) पर निर्भरता में वृद्धि होगी। रोगाणुओं की नई प्रजातियों के उद्भव से पुराने ‘प्रतिजैविक’ असरहीन हो जायेंगे। स्वाइन फ्लू (Swine flu) के विषाणु में उत्परिवर्तन के कारण टेमीफ्लू नामक ‘प्रतिजैविक’ अब इस बिमारी के उपचार में असरहीन साबित हो रहा है जिससे बिमारी का प्रकोप घटने के बजाय दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। इसके अतिरिक्त संक्रामक बिमारियों जैसे दस्त, पेचिश, हैजा, क्षयरोग, आंत्रशोथ, पीलिया आदि की बारम्बारता में वृद्धि के फलस्वरुप इन बिमारियों से होने वाले मौतों में कई गुना की वृद्धि होगी। बच्चों में खसरे तथा निमोनिया के प्रकोप में वृद्धि के कारण इन बिमारियों से मृत्युदर में इजाफा होगा।
चूंकि तापमान तथा नमी बिमारी फैलाने वाले वाहकों के गुणन में सहायक होते हैं। अतः भारत में मच्छरों से फैलने वाली बिमारियों जैसे मलेरिया, फ्रील पॉव, डेंगू ज्वर, चिकनगुनिया, जापानी मस्तिष्क ज्वर तथा बेस्ट नाइल ज्वर के प्रकोप में वृद्धि होगी। पिछले कुछ वर्षों से डेंगू ज्वर, चिकनगुनिया तथा जापानी मस्तिष्क ज्वर के प्रकोप में वृद्धि दर्ज की गयी है। डेंगू ज्वर जहां उत्तर भारत के शहरी क्षेत्रों में आज प्रमुख स्वास्थ्य समस्या के रुप में उभरा है वही देश का पूर्वी उत्तर प्रदेश जापानी मस्तिष्क ज्वर का प्रमुख केन्द्र बन गया है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश के 35 जिले मस्तिष्क ज्वर से प्रभावित हैं। उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मस्तिष्क ज्वर बीमारी का प्रकोप देश के बिहार, झारखण्ड एवं असम राज्यों में भी है।
मच्छरों से फैलनेवाली बीमारियों के अतिरिक्त, अन्य वाहकों जैसे सी-सी मक्खी तथा बालू मक्खी से फैलनेवाली बिमारियाँ क्रमशः निद्रा रोग (Sleeping sickness) तथा काला-अजार (Black fever) के बारम्बारता में वृद्धि होगी। जहाँ काला-अजार असम, पश्चिम बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा, में प्रमुख स्वास्थ्य समस्या है वही निद्रा रोग मुख्यतः बिहार तथा पश्चिम बंगाल की स्वास्थ्य समस्या है। जलवायु परिवर्तन के फलस्वरुप न सिर्फ उक्त बिमारियों का प्रकोप बढ़ेगा अपितु इनका विस्तार देश के अन्य राज्यों में भी होगा।
जलवायु परिवर्तन के फलस्वरुप खाद्यान्न उत्पादन में कमी से भारत जैसे विकासशील देश में गरीबी में वृद्धि होगी। गरीबी के कारण वेश्यावृत्ति में वृद्धि होगी परिणामस्वरुप एड्स जैसी लाइलाज यौन संचारी संक्रामक बीमारी का प्रसार होगा जिससे इस घातक बिमारी के प्रकोप में बढ़ोत्तरी के कारण मृत्यु दर में कई गुना वृद्धि होगी। एक अनुमान के अनुसार देश में आज लगभग 50 लाख (5 मिलियन) से भी ज्यादा व्यक्ति इस विषाणु रोग से ग्रसित हैं। असुरक्षित यौन संबंध इस बिमारी के प्रसार का प्रमुख कारण है। एड्स के अतिरिक्त हेपेटाइटिस बी, सूजाक तथा सिफलिस जैसी यौन संचारी बिमारियों के संचार तथा प्रकोप में भी वृद्धि होगी।
जलवायु परिवर्तन के फलस्वरुप खाद्यान्न में कमी के कारण देश में कुपोषण की समस्या होगी परिणामस्वरुप, रक्तअल्पता (Anemia), रतौंधी, रिकेट्स, मेरेस्मस, क्वासिरकोर, पेलाग्रा, बांझपन आदि जैसी गैर-संक्रामक बिमारियों की दर में वृद्धि होगी। कुपोषण के कारण बच्चों की मृत्यु दर में अभूतपूर्व वृद्धि होगी। कुपोषण से प्रभावित जनसंख्या संक्रामक बिमारी क्षयरोग के प्रति संवेदनशील होगी परिणामस्वरुप क्षयरोग के प्रकोप मेें अभूतपूर्व वृद्धि होगी। वर्तमान में भारत में लगभग 1.5 करोड़ क्षयरोगी हैं जो दुनिया में क्षयरोगियों की संख्या के एक तिहाई से भी ज्यादा है। प्रत्येक वर्ष 20,000 से 25,000 भारतीय क्षयरोग से पीड़ित होते हैं और इस बिमारी से 1,500 से भी ज्यादा लोगों की मृत्यु होती है।
कृषि क्षेत्र पर जलवायु परविर्तन का प्रभाव:
जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप मुख्य फसलों जैसे गेहूँ (Triticum aestivum) तथा धान (Oryza sativa) के पैदावार में अभूतपूर्व कमी आयेगी। जलवायु की तपन के परिणामस्वरूप देश के वर्षा सिंचित क्षेत्रों (Rainfed areas) में मुख्य फसलों के उत्पादन में लगभग 125-130 मिलियन टन तक की कमी आयेगी।
जलवायु परिवर्तन के फलस्वरुप भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश में कीटों तथा रोगाणुओं की जनसंख्या में अभूतपूर्व वृद्धि होगी तथा साथ ही कीटों तथा रोगाणुओं की नई प्रजातियाँ भी विकसित होगी। इन कीटों तथा रोगाणुओं द्वारा फसलों पर आक्रमण के फलस्वरुप उत्पादन में गिरावट आयेगी। कीट संक्रमण के प्रति संवेदनशील कपास (Gossypium hirsutum, Gossypium arboreum तथा Gossypium barbadense) जैसी नकदी फसल पर इसका सर्वाधिक प्रभाव पड़ेगा। फसल उत्पादन में बढ़ोत्तरी हेतु कीटनाशकों पर निर्भरता बढ़ेगी।
जलवायु परिवर्तन तथा वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड की वृद्धि के कारण खरपतवारों की जनसंख्या में वृद्धि होगी जिससे फसल उत्पादकता प्रभावित होगी। पौधों के पुष्पीय कुलों विशेषकर पोयेसी, साइप्रेसी, फैबेसी, यूफोर्बिएसी, एपोसायनेसी, अमरेन्थेसी, क्रैसुलेसी तथा पार्टुलैकेसी से संबद्ध खरपतवारों का प्रकोप औरों की तुलना में ज्यादा होगा। फसलों की खरपतावारों से सुरक्षा के लिए खरपतवारनाशकों अथवा शाकनाशकों पर निर्भरता में अभूतपूर्व वृद्धि होगी।
भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश में वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड की वृद्धि के फलस्वरुप पौधों में कार्बन स्थिरीकरण की दर में भी वृद्धि होगी जिसके कारण मृदा से पोषक तत्वों के अवशोषण की दर में भी वृद्धि होगी परिणामस्वरुप मृदा की उर्वरा शक्ति में कमी आयेगी। मृदा की उर्वरा शक्ति को बनाये रखने के लिए रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता में अभूतपूर्व वृद्धि होगी।
जलवायु की तपन के कारण मृदा में जीवांश पदार्थो की विघटन की दर में भी वृद्धि होगी लेकिन वाष्पीकरण की दर में वृद्धि के फलस्वरुप मृदा में नमी की कमी के कारण परिणाम उल्टा भी हो सकता है। दोनों ही स्थितियों में पोषक चक्र की दर प्रभावित होगी जिससे मृदा की उर्वरा शक्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
जलवायु परिवर्तन का प्रत्यक्ष प्रभाव वर्षा के वितरण पर भी पड़ेगा। उत्तरी तथा मध्य भारत में कम वर्षा होगी जबकि इसके विपरीत देश के पूर्वोतर तथा दक्षिण-पश्चिमी राज्यों में अधिक वर्षा होगी परिणामस्वरुप वर्षा जल की कमी से उत्तरी तथा मध्य भारत में लगभग सूखे जैसी स्थिति होगी जबकि देश के पूर्वोत्तर तथा दक्षिण पश्चिमी राज्यों में अधिक वर्षा के कारण बाढ़ जैसी समस्या होगी। दोनों ही स्थितियों में फसल की पैदावार प्रभावित होगी। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जल-जमाव तथा मृदा की लवणता जैसी समस्यायें भी पैदा होगी।
जलवायु परिवर्तन के फलस्वरुप ध्रुवीय बर्फ तथा हिमनदियों (Glaciers) के पिघलने से समुद्री जलस्तर में वृद्धि होगी जिसके कारण उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात तथा पश्चिम बंगाल राज्यों के तटीय क्षेत्र प्रभावित होंगे परिणामस्वरुप जल-जमाव, मृदा की लवणता तथा क्षारीयता जैसी समस्यायें पैदा होगी जिससे तटीय क्षेत्र बंजर भूमि में तब्दील हो जायेंगे जिसका सीधा प्रभाव फसल उत्पादन पर पड़ेगा।
जलवायु परिवर्तन के कारण वाष्पीकरण तथा पौधों में वाष्पोत्सर्जन की दर में अभूतपूर्व वृद्धि होगी परिणामस्वरुप जलस्रोतों तथा मिट्टी में जल की कमी होगी। जल की कमी के कारण फसल उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। जल की कमी का धान जैसी मुख्य फसल पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ेगा। तालाबों में जल की कमी के कारण सिंघाड़ा (Trapa bispinosa) तथा मखाना (Euryale ferox) जैसी फसलों की खेती प्रभावित होगी। मीठे जल स्रोतों में जल की कमी के कारण मत्स्य पालन तथा उत्पादन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव देश की फसल पद्धति पर भी पड़ेगा। उत्तर तथा मध्य भारत का ज्यादातर क्षेत्रफल दलहनी फसलों तथा मिलेट्स (मोटे अनाज वाली फसलें जैसे- ज्वार, बाजरा तथा रागी) के अधीन होगा। उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में गेहूँ के क्षेत्रफल में अभूतपूर्व गिरावट आयेगी। धान उगाने वाले देश के पूर्वोत्तर तथा दक्षिणी-पश्चिमी राज्यों में इस फसल के क्षेत्रफल में वृद्धि होगी।
जलवायु की तपन के फलस्वरुप फसलों की कुछ चुनिन्दा तापरोधी, सूखारोधी, रोगरोधी तथा कीटरोधी किस्मों की वृहद पैमाने पर खेती के कारण फसल विविधता पर प्रभाव पड़ेगा जिससे पौष्टिक देसी किस्में विलुप्त हो जायेंगी परिणामस्वरुप आनुवांशिक क्षय की प्रक्रिया में वृद्धि होगी। खरपतवारों के वर्चस्व के कारण फसलों की जंगली प्रजातियां भी विस्थापित हो जायेंगी जिससे फसल सुधार कार्यक्रम पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
जलवायु परिवर्तन के फलस्वरुप हिमालय की हिमनदियों के पिघलने के कारण, गंगा, ब्रह्मपुत्र, सतलज, रावी, व्यास आदि नदियों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा परिणामस्वरुप जल की कमी होगी जिसके कारण फसल उत्पादन पर प्रभाव पड़ेगा।
जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाओं जैसे आंधी, समुद्री तूफान, अल निनों तथा सूखा के प्रकोप में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी के फलस्वरुप फसल उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पडेगा।
तपन के परिणामस्वरुप रोगाणुओं की जनसंख्या में वृद्धि के साथ-साथ नयी प्रजातियों के उद्भव के कारण देश के पशुधन आबादी पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। हरे तथा सूखे चारे की कमी के कारण भी पशुधन प्रभावित होगा। पशुधन किसानों की अतिरिक्त आय के स्रोत के साथ कृषि कार्यों जैसे जुताई, दवाई में भी उपयोगी होते हैं।
सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र पर जलवायु परविर्तन का प्रभाव:
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र पर भी पड़ेगा। कृषि में कीटनाशकों, शाकनाशकों तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता के कारण छोटे अथवा गरीब किसान और गरीब होगें जबकि सम्पन्न किसान भी गरीब होंगे। कृषि धंधों में हानि के परिणामस्वरुप ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर बड़े पैमाने पर पलायन होगा जिससे शहरी क्षेत्रों में भीड़-भाड़ वाली स्थिति होगी फलस्वरुप सामाजिक ताना-बाना नष्ट होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में संयुक्त परिवार बिखरकर एकल परिवार में परिवर्तित हो जायेंगे। एड्स जैसी बिमारी के प्रकोप के कारण भी समाज के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
अण्डमान तथा निकोबार द्वीप समूह में भारत की आदिम जनजातियाँ जैसे ग्रेट अण्डमानीस, सेण्टेनलीज, ओन्जे तथा जारवा (निग्रोटो समूह) निकोबारीज तथा शाम्पेन (मंगोलायड समूह) निवास करती हैं। यह आदिम जनजातियाँ यहाँ के घने वनों में रहती हैं तथा अपने भोजन की पूर्ती हेतु शिकार तथा मछली पकड़ने पर निर्भर होती हैं। समुद्र के जलस्तर में वृद्धि के कारण द्वीप समूह के डूबने से इन आदिम जनजातियों का अस्तित्व सदैव के लिए समाप्त हो जायेगा।
जलवायु परिवर्तन के फलस्वरुप समुद्री जलस्तर में बढ़ोत्तरी के कारण देश के तटीय क्षेत्रों से लगभग 10 करोड़ (100 मिलियन) लोग विस्थापित होंगे। इन विस्थापित लोगों का शहरी क्षेत्रों की तरफ पलायन होगा जिसके परिणामस्वरुप शहरी क्षेत्रों में झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि होगी। शहरी क्षेत्रों में झुग्गी-झोपड़ियों के विस्तार के कारण मूलभूत सुविधायें (बिजली, पानी आदि) प्रभावित होंगी। इसके अतिरिक्त गंदगी के साथ अपराधिक घटनाओं में भी वृद्धि होगी।
तपन के कारण वनों में आग लगने की घटनाओं में वृद्धि के परिणामस्वरूप वनों में रहने वाली जनजातियाँ विस्थापित होगीं। चूंकि जनजातियों की पहचान उनके संस्कृति, रहन-सहन तथा खान-पान से होती है अतः मुख्य जीवनधारा में आने के बाद उनमें बदलाव आयेगा जिससे उनकी पहचान स्वतः ही समाप्त हो जायेगी।
भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश में उष्णता में वृद्धि के फलस्वरुप मानव प्रजनन दर में बढ़ोत्तरी होगी जिसके कारण जनसंख्या की विकास दर में भी वृद्धि होगी। जनसंख्या की विकास दर में वृद्धि के कारण संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा जिससे संसाधनों का क्षय होगा। जनसंख्या वृद्धि के कारण गरीबी तथा बेरोजगारी जैसी समस्याओं में अभूतपूर्व वृद्धि होगी।
जलवायु परिवर्तन के फलस्वरुप कीटों तथा रोगाणुओं की जनसंख्या में बढ़ोत्तरी के कारण फसल उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा जिससे आर्थिक तंगी या ऋण बोझ के कारण किसान आत्महत्या को मजबूर होंगे। देश के महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं तेलंगाना जैसे राज्यों में किसानों की आत्महत्या की दर में कई गुना वृद्धि होगी।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव आर्थिक जगत पर पड़ेगा। फसल पैदावार में गिरावट के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा जिससे मुद्रास्फिति की दर बढ़ेगी। मुद्रास्फिति की दर बढ़ने के कारण गरीबी तथा भूखमरी के साथ-साथ बेरोजगारी भी बढ़ेगी। गरीबी के कारण बालश्रम तथा वेश्यावृत्ति सहित अन्य अपराधों में अभूतपूर्व वृद्धि होगी जो देश की कानून व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती होगी। गरीबी में वृद्धि के कारण माओवाद तथा नक्सलवाद जैसी समस्याओं में भारी वृद्धि होगी।
मुद्रास्फीति बढ़ने के कारण उद्योग जगत भी प्रभावित होगा। कृषि पर आधारित उद्योगों में उत्पादन की कमी के कारण उद्योग-धन्धे बंद हो जायेंगे परिणामस्वरुप बेरोजगारी की समस्या पैदा होगी। ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में भी आत्महत्या की घटनाओं में अभूतपूर्व इजाफा होगा।
संसाधन क्षेत्र पर जलवायु परविर्तन का प्रभाव:
जलवायु परिवर्तन का देश के संसाधनों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। वैश्विक तपन से वनों में आग लगने के कारण वन जैसे महत्वपूर्ण जैविक संसाधन नष्ट हो जायेगें। रासायनिक खादों पर निर्भरता के कारण मृदा अपरदन की दर में वृद्धि होगी जिसके फलस्वरूप मृदा जैसे महत्वपूर्ण संसाधन का क्षय होगा। जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप हिमनदियों के पिघलने के कारण हिमालय से निकलने वाली नदियों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा फलस्वरूप जल संसाधन में अभूतपूर्व कमी होगी। शीतलन हेतु अधिक उर्जा की मांग के कारण कोयले जैसा महत्वपूर्ण खनिज संसाधन समाप्त हो जायेगा।
ऊर्जा क्षेत्र पर जलवायु परविर्तन का प्रभाव:
जलवायु परिवर्तन का सर्वाधिक प्रभाव उर्जा क्षेत्र पर पड़ेगा। वातावरण में तपन के कारण शीतलन हेतु ज्यादा उर्जा की आवश्यकता होगी। ग्रीष्म ऋतु में गर्मी से बचने के लिए उर्जा खपत में अभूतपूर्व वृद्धि होगी जिससे उर्जा की समस्या पैदा होगी। तपन के परिणामस्वरुप जल स्रोतों में जल की कमी के कारण पनबिजली परियोजनाओं पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा जिससे उर्जा उत्पादन में गिरावट आयेगी। उर्जा की कमी के कारण देश के उद्योग-धंधे, परिवहन, शोध, चिकित्सा आदि पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
राजनैतिक क्षेत्र पर जलवायु परविर्तन का प्रभाव:
जलवायु परिवर्तन का अप्रत्यक्ष प्रभाव देश के राजनैतिक क्षेत्र पर भी पड़ेगा। खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट के कारण गरीबी तथा भूखमरी में अभूतपूर्व वृद्धि होगी जिससे गृह युद्ध जैसे हालात होंगे। ऐसे में राजनैतिक दलों के लिए राजनीति अथवा शासन को सुचारु रुप से चलाना दुष्कर कार्य होगा। गरीबी, भूखमरी, अकाल तथा बेरोजगारी के चलते आम जनता में आक्रोश के कारण देश में राजनैतिक अव्यवस्था तथा अस्थिरता का बोलबाला होगा।
आंतरिक सुरक्षा तथा सामरिक क्षेत्र पर जलवायु परविर्तन का प्रभाव:
जलवायु परिवर्तन का अप्रत्यक्ष प्रभाव देश की आंतरिक सुरक्षा तथा सामरिक क्षेत्र पर भी पड़ेगा। जलवायु परिवर्तन पर गठित अंतर्राष्ट्रीय अंतःसरकारी दल (IPCC) के अनुसार वर्ष 2050 तक बांग्लादेश की 17 प्रतिशत भूमि और 30 प्रतिशत खाद्यान्न उत्पादन समुद्र की भेट चढ़ जायेगें। ऐसे में खाद्यान्न उत्पादन घटने तथा समुद्र जलस्तर बढ़ने के कारण पड़ोसी देश बांग्लादेश से घुसपैठ की समस्या में कई गुना वृद्धि होगी जिससे देश के पूर्वोत्तर राज्यों जैसे असम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल आदि में बांग्लादेशी घुसपैठियों का प्रभुत्व होगा। घुसपैठ की समस्या के कारण देश की आंतरिक सुरक्षा प्रभावित होगी। घुसपैठियों के प्रभुत्व के कारण पूर्वी भारत का हिस्सा कटकर अलग देश में परिवर्तित हो सकता है।
पड़ोसी देश पाकिस्तान भी स्थितियों का फायदा उठाते हुए बांग्लादेश के माध्यम से आतंकवादियों की घुसपैठ कराकर देश के समक्ष गंभीर आंतरिक सुरक्षा का खतरा पैदा कर सकता है। इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन के फलस्वरुप कश्मीर घाटी के द्रास में बर्फ पिघलने से पाकिस्तान से बड़े पैमाने पर घुसपैठ होगी जिससे देश के कश्मीर राज्य के साथ-साथ अन्य राज्यों में आतंकवादी गतिविधियों में अभूतपूर्व इजाफा होगा। उक्त स्थितियों में भारत तथा पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ेगा जिससे दोनों देशों के बीच युद्ध की स्थिति होगी।
जलवायु परिवर्तन के फलस्वरुप सियाचिन हिमनदी के पिघलने के कारण पड़ोसी देश चीन से भी सैनिकों की घुसपैठ होगी जिसके कारण भारत के भूभाग पर चीनी कब्जे का और विस्तार होगा परिणामस्वरूप दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ेगा जो अंततः युद्ध का कारण साबित हो सकता है।
पर्यटन क्षेत्र पर जलवायु परविर्तन का प्रभाव:
जलवायु परिवर्तन का भारत के पर्यटन क्षेत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। गोवा जैसा महत्वपूर्ण पर्यटक राज्य समुद्र जलस्तर में वृद्धि के कारण डूबकर समाप्त हो जायेगा। इसके अतिरिक्त स्वच्छ जल की अनुपलब्धता, संक्रामक बिमारियों के प्रकोप, राजनीतिक अस्थिरता तथा आतंकवादी घटनाओं में वृद्धि के कारण भारत विदेशी पर्यटकों के भ्रमण के अनुकूल नहीं होगा। वैश्विक तपन के कारण भारत के मैदानी क्षेत्रों से पहाड़ो पर बड़े पैमाने पर पलायन होगा फलस्वरूप पहाड़ी राज्यों में भीड़-भाड़ वाली स्थिति होगी जिससे प्राकृतिक सुन्दरता पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। फलस्वरूप पहाड़ी राज्य देशी तथा विदेशी सैलानियों को आकर्षित करने में विफल होगें।
निष्कर्ष:
जलवायु परिवर्तन का प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष प्रभाव देश के कृषि, पर्यावरण, स्वास्थ्य, ऊर्जा, सामाजिक, आर्थिक, संसाधन पर्यटन, राजनैतिक तथा आंतरिक सुरक्षा एवं सामरिक क्षेत्रों पर पड़ेगा। जलवायु परिवर्तन के फलस्वरुप देश के कृषि उत्पादन में कमी आयेगी। खाद्यान्न उत्पादन में कमी के कारण मुद्रास्फिति बढ़ेगी परिणामस्वरुप गरीबी तथा बेरोजगारी में बढ़ोत्तरी होगी जो देश में अपराध वृद्धि का कारण बनेगी।
मुद्रास्फिति के कारण औद्योगिक उत्पादन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। जलवायु परिवर्तन के कारण जैव-विविधता का क्षरण होगा, सतही एवं भूमिगत जल प्रदूषित होंगे तथा बंजर भूमि क्षेत्रफल में विस्तार होगा। जलवायु परिवर्तन के फलस्वरुप क्षयरोग, एड्स, दस्त, पेचिश, हैजा, पीलिया, खसरा, निमोनिया, मलेरिया, डेंगू ज्वर, जापानी मस्तिष्क ज्वर, काला-अजार, निद्रा रोग जैसी संक्रामक बिमारियों के प्रसार तथा बारम्बारता में वृद्धि के कारण इन बिमारियों से होने वाली मौतों में कई गुना इजाफा होगा।
जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप पड़ोसी देशों से घुसपैठ के कारण देश की आंतरिक सुरक्षा प्रभावित होगी तथा सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ेगा। भारत का उसके पड़ोसी देशों पाकिस्तान तथा चीन से तनाव बढ़ेगा जिससे युद्ध की संभावना होगी।
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(डॉ. अरविंद सिंह वनस्पति विज्ञान विषय से एम.एस-सी और पी-एच.डी. हैं। इनकी विशेषज्ञता का क्षेत्र पारिस्थितिक विज्ञान है। यह एक सक्रिय शोधकर्ता हैं और राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की शोध पत्रिकाओं में अब तक इनके चार दर्जन शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। खनन गतिविधियों से प्रभावित भूमि का पुनरूत्थान इनके शोध का प्रमुख विषय है। इसके अतिरिक्त इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मुख्य परिसर की वनस्पतियों पर भी अनुसंधान किया है। इनसे ईमेल आईडी arvindsingh_bhu@hotmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
(scientificworld.in से साभार)

रंग / जयप्रकाश त्रिपाठी

सुंदर-सुंदर रंगों वाले रंगे-बड़े-दुरंगे
कहां कहां झूठे बसते हैं .....
मुंह से शहद, पीठ पीछे से
हंसी हलाहल की बरसाते
पल में मधुर प्रणाम और पल में डंसते हैं
कहां कहां झूठे बसते हैं .....


Saturday, 6 December 2014

चेहरे / जयप्रकाश त्रिपाठी

आज वे सब लोग जाने क्यों पराये लग रहे हैं
एक चेहरे पर कई चेहरे लगाये लग रहे हैं
बेबसी में क्या किसी से रोशनी की भीख मांगें
वे अंधेरी रात के बदनाम साये लग रहे हैं

कोई महापंडित हो या निपट गंवार, वामपंथी हो या दक्षिणपंथी, व्यक्ति के अंदर का ढकोसला और खोखलापन, उसे कहीं का नहीं रहने देता, मसखरा बनाकर रख देता है, उसकी विश्वास करने लायक बातें भी अविश्वसनीय लगती हैं, वह अपनी आंतरिक कुरूपताओं को व्यवहारजगत से जितना ढंकने-छिपाने के प्रयास करता है, स्वयं की जायी-सहेजी विद्रूपताएं उसका सुख-चैन तार-तार करती रहती हैं, और एक दिन जीवन बोझ-सा हो जाता है, उसे खुद समझ में नहीं आता कि ऐसा क्यों हो रहा है उसके साथ ? इसलिए मेरा मानना है कि दुनिया भर की दलीलें और विचार बांटने से पहले खुद बेहतर इंसान होना ज्यादा जरूरी है, बाकी सब बाद की दुनियादारी.....


क्या 16 मई के बाद मीडिया बदल गया? / पुण्यप्रसून बाजपेयी

16 मई 2014 की तारीख के बाद क्या भारतीय मीडिया पूंजी और खौफ तले दफ्न हो गया। यह सवाल सीधा है लेकिन इसका जवाब किश्तों में है। मसलन कांग्रेस की एकाकी सत्ता के तीस बरस बाद जैसे ही नरेन्द्र मोदी की एकाकी सत्ता जनादेश से निकली वैसे ही मीडिया हतप्रभ हो गया। क्योंकि तीस बरस के दौर में दिल्ली में सडा गला लोकतंत्र था। जो वोट पाने के बाद सत्ता में बने रहने के लिये बिना रीढ़ के होने और दिखने को ही सफल करार देता था। इस लोकतंत्र ने किसी को आरक्षण की सुविधा दिया। इस लोकतंत्र ने किसी में हिन्दुत्व का राग जगाया । इस लोकतंत्र में कोई तबका सत्ता का पसंदीदा हो गया तो किसी ने पसंदीदा तबके की आजादी पर ही सवालिया निशान लगाया। इसी लोकतंत्र ने कारपोरेट को लूट के हर हथियार दे दिये। इसी लोकतंत्र ने मीडिया को भी दलाल बना दिया। पूंजी और मुनाफा इसी लोकतंत्र की सबसे पसंदीदा तालिम हो गयी। इसी लोकतंत्र में पीने के पानी से लेकर पढ़ाई और इलाज से लेकर नौकरी तक से जनता द्वारा चुनी हुई सरकारों ने पल्ला झाड़ लिया। इसी लोकतंत्र ने नागरिकों को नागरिक से उपभोक्ता बने तबके के सामने गुलाम बना दिया।
इस लोकतंत्र पर पत्रकारों की कलम भी चली और कलम भी बिकी। पत्रकारिता मीडिया घरानों में बदली। मीडिया घराने ताकतवर हुये तो झटके में सत्ता साधने की राजनीति और कारपोरेट के मुनाफे के बीच पत्रकारिता झूली भी और हमला करने से भी नहीं चूकी। लगा मीडिया धारदार हो रही है क्योंकि संसदीय सत्ता अपने अंतर्रविरोध में इतनी खो गयी कि घोटाले और राजस्व की लूट देश का सिस्टम बन गया। सरकारी नीतिया लूटने के रास्ते खोलने के लिये बनने लगी। हर संस्थान ने लूटा। भागेदारी मीडिया में भी हुई। कामनवेल्थ गेम्स से लेकर 2 जी स्पेक्ट्रम और बेल्लारी से झारखंड तक में खनन संपदा की लूट से लेकर कोयला खानों के बंदरबाट का खुला खेल पॉलिसी के तहत खेला गया जिसमें मीडिया संस्थानों की भागेदारी भी सामने आयी। लेकिन पत्रकारिता ने इन मुद्दों को उठाया भी और भ्रष्ट होती सियासत को आईना भी दिखाया। और तो और कमजोर होती राजनीतिक सत्ता को कारपोरेट ने गवर्नेंस का पाठ भी पढ़ाने का खुला प्रयास 2011-12 के दौर में देश के पीएम मनमोहन सिंह को चार बार पत्र लिखकर किया । ऐसे मोड़ पर लोकसभा चुनाव के जनादेश ने उस मीडिया को सकते में ला दिया जिसके सामने बीते तीस बरस के संसदीय राजनीतिक सत्ता के अंतर्विरोध में काफी कुछ पाना था और काफी कुछ गंवाना भी था। क्योंकि इस दौर में कई पत्रकार मीडिया घरानो में हिस्सेदार बन गये और मीडिया घरानों के कई हिस्सेदार पत्रकार बन गये। ध्यान दें तो मीडिया का विकास जिस तेजी से तकनीकी माध्यमों को जरिये इस दौर में होता चला गया उसके सामने वह सियासी राजनीति भी छोटी पड़ने लगी जो आम लोगों के एक एक वोट से सत्ता पाती । क्योंकि झटके में वोट की ताकत को डिगाने के लिये मीडिया एक ऐसे दोधारी हथियार के तौर पर उभरा जिसमें सत्ता दिलाना और सत्ता से बेदखल कराने की भूमिका निभाना सौदेबाजी का सियासी खेल बना दिया गया। तो दाग दोनों जगह लगे। राजनेता दागदार दिखे। मीडिया घराने मुनाफा कमाने के धंधेबाज दिखे । नेता के लिये वोट डालने वाले वोटर हो या मीडिया के पाठक या व्यूवर। इस सच को जाना समझा सभी ने। लेकिन विकल्प की खोज की ताकत ना तो मीडिया या कहे पत्रकारों के पास रही ना ईमानदार नेताओ के पास। ऐसे में १६ मई के जनादेश से पहले चुनावी बिसात पर मीडिया वजीर से कैसे प्यादा बना यह प्रचार के चुनावी तंत्र में पैसे के खेल ने आसानी से बता दिया। लेकिन यह खेल तो चुनावी राजनीति में हमेशा खेला जाता रहा है। हर बार की तरह 2014 में भी यही खेल खेला जा रहा है माना यही गया।
लेकिन यह किसी को समझ नहीं आया कि जो पूंजी चुनावी राजनीति के जरीये लोकतंत्र के चौथे खम्भे को कुंद कर सकती है। जो पूंजी हर सत्ता या संस्थानों के सामने विकल्प बनाने के लिये बेहतरीन हथियार बन सकती है वही पूंजी लोकतंत्र जनादेश के साथ खड़े होकर लोकतंत्र को अपनी जरुरत के हिसाब से क्यों नहीं चला सकती। दरअसल 16 मई के जनादेश के बाद पहली बार मीडिया का वह अंतर्रविरोध खुल कर सामने आया जिसने राजनीति के अंतर्विरोध को छुपा दिया। यानी सियासी राजनीति के जिस खेल में देश की सत्ता बीते 30 बरस में भ्रष्ट होती चली गयी और मीडिया ने अपने अंतर्विरोध छुपा कर राजनीति के अंतर्विरोध को ही उभारा। वही राजनीति जब जनादेश के साथ सत्ता में आयी तो संकट मीडिया के सामने आया कि अब सत्ताधारियों की गुलामी कर अपनी साख बनाये या सत्ताधारियों पर निगरानी रख अपनी रिपोर्टों से जनता को समझाये कि राजनीतिक सत्ता ही सबकुछ नहीं होती है। लेकिन इसके लिये पत्रकारीय ताकत का होना जरुरी है और पत्रकारिता ही जब मीडिया घरानो की चौखट पर सत्ताधारियों के लिये पायदान में बदल जाये तो रास्ता जायेगा किधर। यानी पत्रकारीय पायदान की जरुर मीडिया घरानों को सत्ता के लिये पडी तो सत्ता को पत्रकारीय पायदान की जरुरत अपनी अंखड सत्ता को दिखाने-बताने या प्रचार के लिये पड़ी। इस पत्रकारीय पायदान की जरुरत ने इसकी कीमत भी बढ़ा दी। और सत्ता से निकट जाने के लिये पायदान पर कब्जा करने की मुहिम कारपोरेट कल्चर का हिस्सा बनने लगी। इसीलिये 16 मई के जनादेश ने हर उस परिभाषा को बदला जो बीते 30
बरस के दौर में गढ़ी गई। पत्राकरीय स्वतंत्रता का पैमाना बदला । मीडिया घराने चलाने के लिये पूंजी बनाने के तरीके बदले। सत्ता और मीडिया के बीच पाठक या व्यूवर की सोच को बदला। झटके में उस तबके का गुस्सा मीडिया का साथ छोड सत्ता के साथ जा खड़ा हुआ जो बीते ३० बरस से नैतिकता का पाठ मीडिया से पढ़ रहा ता लेकिन मीडिया को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के लिये उसके पास कोई हथियार नहीं था। ऐसे में जिस तरह 16 मई के जनादेश ने राजनीतिक सत्ता के उस दाग को छुपा दिया जो भ्रष्ट और आपराधिक होती राजनीति को लेकर देश का सच बन चुका है। उसी तरह गैर जिम्मेदाराना पत्रकारिता और सोशल मीडिया की जिम्मेदारी विहिन पत्रकारिता का दाग भी स्वतंत्र अभिव्यक्ति तले दब गया। तीन बड़े बदलाव खुकर सामने आये। पहला जनादेश के सामने कोई तर्क मायने नहीं रखता है। दूसरा राजनीतिक सत्ता की ताकत के आगे लोकतंत्र का हर पाया विकलांग है। और तीसरा विचारधारा से ज्यादा महत्वपूर्ण गवर्नेंस है। यानी जो पत्रकारिता लगातार विकल्प की तलाश में वैचारिक तौर पर देश को खड़ा करने के हालात पैदा करती है उसे खुद सियासी सत्ता की लड़ाई लडनी होगी बिना इसके कोई रास्ता देश में नहीं है।
यह हालात कितने खतरनाक हो सकते हैं, इसका अंदाजा 16 मई के बाद सत्ता में आयी बीजेपी के नये अध्यक्ष बने अमित शाह के इस अंदाज से समझा जा सकता है कि जब महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबंधन बचेगा या नहीं इसके कयास लगाये जा रहे थे तब आरएसएस के शिवसेना के साथ गठबंधन बनाये रखने की खबर से अपनी सियासी सौदेबाजी का दांव कमजोर पड़ने पर बीजेपी अध्यक्ष खबर देने वाले रिपोर्टर को फोन पर यह धमकी देने से नहीं चूकते हैं कि यह खबर वापस ले लो या फिर इसका अगले दिन इसके लिये भुगतने को तैयार हो जाओ। इतना ही नहीं खबर को राजनीति का हिस्सा बताकर राजनीति के मैदान में आकर हाथ आजमाने का सुझाव भी दिया जाता है। यानी धमकी तो पत्रकारों को मिलती रही है लेकिन कारपोरेट की छांव में मीडिया और पत्रकारिता को पायदान बनाने के बाद राजनीतिक सत्ता का पहला संदेश यही है कि चुनाव जीतकर सत्ता में आ जाओ तो ही आपकी बात सही है। तो क्या 16 मई के बाद देश की हवा में यहसे बड़ा परिवर्तन यह भी आ गया है कि ढहते हुये सस्थानों को खड़ा करने की जगह मरता हुआ बता कर उसे विकल्प करार दिया जा सकता है। यहां कोई भी यह सवाल खड़ा कर सकता है कि मीडिया को दबाकर सियासत कैसे हो सकती है। लेकिन समझना यह भी होगा कि पहली बार मीडिया को दबाने या ना दबाने से आगे की बहस हो रही है। सीबीआई, सीवीसी, कैग, चुनाव आयोग, जजों की नियुक्ति सरीखे दर्जेनों संस्थान है जिनके दामन पर दाग 16 मई से पहले चुनाव प्रचार के दौर में बार बार लगाया गया। मीडिया भी दागदार है यह आवाज भी मीडिया ट्रेडर के तौर उठायी गयी। यानी जिस राजनीति के भ्रष्ट और आपराधिक होने तक का जिक्र १९९२-९३ में वोहरा कमेटी की रिपोर्ट में किया गया और संसद के भीतर पहुंचने वाले दागदारों की कतार में कोई कमी १६ मई  २०१४ के जनादेश के बाद भी नहीं आयी उस राजनीतिक सत्ता की चौखट पर इस दौर में हर संस्था बेमानी करार दे दी गयी। तो सवाल कई हैं।
पहला लोकतंत्र का मतलब अब चुनाव जीत कर साबित करना हो चला है कि वह ठीक है। यानी पत्रकार, वकील, टीचर, समाजसेवी या कोई भी जो चुनाव लडना नहीं चाहता है और अपने नजरिये से अपनी बात कहता है, उसका कोई मतलब नहीं है क्योंकि सत्ता के पास बहुमत का जनादेश है । दूसरा, संवैधानिक सत्ता के लिये बहुमत का मतलब जब कइयों के संघर्ष में जीतना भर है तो बाकि विरोध करने वाले चाहे अलग अलग हो लेकिन वह संख्याबल में ज्यादा हो तो फिर उनका कोई हक नहीं बनता है। यह सवाल राजनीतिक सत्ता के संघर्ष को लेकर भी है जहा सत्ताधारी को इस बार 31 फीसदी वोट मिले है और यह सवाल पत्रकारों को लेकर भी है जो पत्रकारिता तो करते हैं और उनकी तादाद भी मीडिया हाउस में काम करने वालों से ज्यादा है लेकिन वह उनकी पत्राकरिता को कोई महत्व नहीं दिया जायेगा और उन्हें भी उसी कटघरे में खड़ा किया जायेगा, जहां पत्रकार पायदान बना दिया जा रहा है। और इसके सामानांतर तकनीकी विकास को ही विकल्प बनाने का प्रयास होगा चाहे देश की भौगोलिक, सामाजिक-आर्थिक स्थिति उसके अनुकुल ना हो। यानी मौसम बिगड़े । रोजगार ना मिले । चंद हथेलियो पर ही सारा मुनाफा सिमटे । समाज में खाई और ज्यादा बढ़े। विकास की तकनीकि धारा गांव को खत्म कर दे। विकास के नाम पर उपभोक्ताओं का समूह बनाये रखने या उसे बढ़ाने पर जोर हो। और यह सब होते हुये, देखते हुये पत्रकारिता सरकारो का गुणगान करें और इसे सकारात्मक पत्रकारिता मान लिया जाये। तो फिर 16 मई से पहले और 16 मई के बाद पत्रकारिता कैसे और कितनी बदली है इसका एहसास भी कहां होगा।
बरस भर पहले राष्ट्रपति की मौजूदगी में राष्ट्रपति भवन में ही एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल ने अपने पच्चीसवें जन्मदिन को मना लिया। वहीं हर तरह के कद्दावर तबके को आमंत्रित कर लिया। तब कहा गया कि मनमोहन सिंह का दौर है कुछ भी हो सकता है। एक बरस बाद एक न्यूज चैनल ने अपने एक कार्यक्रम के 21 बरस पूरे होने का जश्न मनाया तो उसमें राष्ट्रपति समेत प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट के अलावे नौकरशाहों, कारपोरेट, बालीवुड से लेकर हर तबके के सत्ताधारी पहुंचे। लगा यही कि मीडिया ताकतवर है। लेकिन यह मोदी का दौर है तो हर किसी को दशक भर पहले वाजपेयी का दौर भी याद आ गया । दशक भर पहले लखनऊ के सहारा शहर में कुछ इसी तरह हर क्षेत्र के सबसे कद्दावर लोग पहुंचे और तो और साथ ही तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी समेत पूरा मंत्रिमंडल ही नहीं बल्कि संसद के भीतर एक दूसरे के खिलाफ तलवारे भांजने वाला विपक्ष भी सहारा शहर पहुंचा था। और इसी तर्ज पर संसद के भीतर मोदी सरकार को घेरने वाले कांग्रेसी भी दिल्ली के मीडिया समारोह में पहुंचे।
सवाल हो सकता है कि मीडिया को ताकत सत्ता के साथ खडे होकर मिलती है या फिर सत्ता को ताकत मीडिया का साथ खड़ेहोने से मिलती है। या फिर एक दूसरे की साख बनाये रखने के लिये क्रोनी कैपिटलिज्म का यह अद्भूत नजारा समाज में ताकतवर होते मीडिया की अनकही कहानी को कहता है। हो जो भी लेकिन मीडिया को बार बार अपने तरीके से परिभाषित करने की जद्दोजहद सत्ता भी करती है और सत्ता बनने की चाहत में मीडिया भी सरोकार की भाषा को नये तरीके से परिभाषित करने में रम जाता है । इस मुकाम पर विचारधारा के आसरे राजनीति या आम -जन को लेकर पत्रकारिता या फिर न्यूनतम की लड़ाई लडते देश को चकाचौंध के दायरे में समेटने की चाहत ही मीडिया को कैसे बदलती है यह 16 मई के जनादेश के बाद खुलकर सामने आने भी लगा है। जाहिर है ऐसे में मीडिया की भूमिका बदलने से कही आगे नये तरीके से परिभाषित करने की दिशा में बढ़ेगी और ध्यान दें तो 16 मई के जनादेश के बाद कुछ ऐसे ही हालात हो चले हैं। 16 मई के जनादेश ने मीडिया के उस तबके को दरकिनार कर दिया जो राजनीति को विचारधारा तले परखते थे। पहली बार जनादेश के आइने में मीडिया की समूची रिपोर्टिंग ही पलटी और यह सीख भी देने लगी कि विचारधारा से आगे की जरुरत गवर्नेंस की है, जो मनमोहन सरकार के दौर में ठप थी और जनादेश ने उसी गवर्नेंस में रफ्तार देखने के लिये नरेन्द्र मोदी के पक्ष में जनादेश दिया। यह जनादेश बीजेपी को इसलिये नहीं मिला क्योंकि गवर्नेंस के कठघरे में बीजेपी का भी कांग्रेसीकरण हुआ। इसी लिये नरेन्द्र मोदी को पार्टी से बाहर का जनादेश मिला। यानी देश के भीतर सबकुछ ठप होने वाले हालात से निपटने के लिये जनादेश ने एक ऐसे नायक को खोजा जिसने अपनी ही पार्टी की धुरधंरों को पराजित किया । और पहली बार मीडिया बंटा भी। बिखरा भी। झुका भी। और अपनी ताकत से समझौता करते हुये दिखा भी। यह सब इसलिये क्योंकि राजनीति के नये नये आधारों ने मीडिया की उसी कमजोर नसों को पकड़ा जिसे साधने के लिये राजनीति के अंतर्विरोध का लाभ मीडिया ही हमेशा उठाता रहा। सरकारी सब्सिडी के दायरे से न्यूज प्रिंट निकल कर खुले बाजार आया तो हर बडे अखबारों के लिये हितकारी हो गया। छोटे-मझौले अखखबारो के सामने अखबार निकालने का संकट आया। समझौते शुरु हुये। न्यूज चैनल का लाइसेंस पाने के लिये 20 करोड़ कौन सा पत्रकार दिखा सकता है, यह सवाल कभी किसी मीडिया हाउस ने सरकार से नहीं पूछा। और पत्रकार सोच भी नहीं पाया कि न्यूज चैनल वह पत्रकारिता के लिये शुरु कर सकता है।
पैसे वालों के लिये मीडिया पर कब्जा  करना आसान हो गया या कहें जो पत्रकरिता कर लोकतंत्र के चौथे खम्मे को जीवित रख सकते थे वह हाशिये पर चले गये। इस दौर में सियासत साधने के लिये मीडिया ताकतवर हुआ। तो सत्ता के ताकतवर होते ही मीडिया बिकने और नतमस्तक होने के लिये तैयार हो गया। और जो मीडिया कल तक संसदीय राजनीति पर ठहाके लगाता था वही मीडिया सत्ता के ताकतवर होते ही अपनी ताकत भी सत्ता के साथ खड़े होने में ही देखने समझने लगा। और पहली बार मीडिया को नये तरीके से गढने का खेल देश में वैसे ही शुरु हुआ जैसे खुदरा दुकाने चकाचौंध भरे मॉल में तब्दील होने लगी। याद कीजिये तो मोदी के पीएम बनने से पहले यह सवाल अक्सर पूछा जाता था कि मीडिया से चुनाव जीते जाते तो राहुल कब के पीएम बन गये होते। यह धारदार वक्तव्य मीडिया और राजनीतिक प्रचार के बीच अक्सर जब भी बोला जाता है तब खबरों के असर पडने वाली पत्रकारिता हाशिये पर जाती हुई सी नजर आने लगती। लेकिन पत्रकारिता या मीडिया की मौजूदगी समाज में है ही क्यों अगर इस परिभाषा को ही बदल दिया जाये तो कैसे कैसे सवाल उठेंगे। मसलन कोई पूछे, अखबार निकाला क्यों जाये और न्यूज चैनल चलाये क्यों जाये।
यह एक ऐसा सवाल है जिससे भी आप पूछेंगे वह या तो आपको बेवकूफ समझेगा या फिर यही कहेगा कि यह भी कोई सवाल है । लेकिन 2014 के चुनाव के दौर में जिस तरह अखबार की इक्नामी और न्यूज चैनलों के सरल मुनाफे राजनीतिक सत्ता के लिये होने वाले चुनावी प्रचार से जा जुडे है उसने अब खबरों के बिकने या किसी राजनीतिक दल के लिये काम करने की सोच को ही पीछे छोड़ दिया है। सरलता से समझे लोकसभा चुनाव ने राह दिखायी और चुनाव प्रचार में कैसे कहा कितना कब खर्च हो रहा है यह सब हर कोई भूल गया । चुनाव आयोग भी चुनावी प्रचार को चकाचौंध में बदलते तिलिस्म की तरह देखने लगा। तो जनता का नजरिया क्या रहा होगा। खैर लोकसभा चुनाव खत्म हुये तो लोकसभा का मीडिया प्रयोग कैसे उफान पर आया और उसने झटके में कैसे अखबार निकलाने या न्यूज चैनल चलाने की मार्केटिंग के तौर तरीके ही बदल दिये यह वाकई चकाचौंध में बदलते भारत की पहली तस्वीर है। क्योंकि अब चुनाव का एलान होते ही राज्यों में अखबार और न्यूज चैनलों को पैसा पंप करने का अनूठा प्रयोग शुरु हो गया है। लोकसभा के बाद हरियाणा , महाराष्ट्र में चुनाव हुये और फिर झारखंड और जम्मू कश्मीर । महाराष्ट्र चुनाव के वक्त बुलढाणा के एक छोटे से अखबार मालिक का टेलीफोन मेरे पास आया उसका सवाल था कि अगर कोई पहले पन्ने को विज्ञापन के लिये  खरीद लेता है तो अखबार में मास्ट-हेड कहां लगेगा और अखबार में पहला पन्ना हम दूसरे पन्ने को माने या तीसरे पन्ने को जो खोलते ही दायी तरफ आयेगा। और अगर तीसरे पन्ने को पहला पन्ना मान कर मास्टहेड लगाते हैं तो फिर दूसरे पन्ने में कौन सी खबर छापे क्योकि अखबार में तो पहले पन्ने में सबसे बड़ी खबर होती है। मैंने पूछा हुआ क्या । तो उसने बताया कि चुनाव हो रहे हैं तो एक राजनीतिक दल ने नौ दिन तक पहला पन्ना विज्ञापन के लिये खरीद लिया है। खैर उन्हें दिल्ली से निकलने वाले अखबारों के बार में जानकारी दी कि कैसे यहां तो आये दिन पहले पन्ने पर पूरे पेज का विज्ञापन छपता है। और मास्ट-हेड हमेशा तीसरे पेज पर ही लगता है और वही फ्रंट पेज कहलाता है । यह बात भूलता तब तक झारखंड के डाल्टेनगंज से एक छोटे अखबार मालिक ने कुछ ऐसा ही सवाल किया और उसका संकट भी वही था। अखबार का फ्रंट पेज किसे बनायें। और वहां भी अखबार का पहला पेज सात दिन के लिये एक राजनीतिक दल ने बुक किया था। यानी पहली बार अखबारों को इतना बड़ा विज्ञापन थोक में मिल रहा है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन बात सिर्फ विज्ञापन तक नहीं रुकी।
अगला सवाल था कि इतने विज्ञापन से तो हमारा साल भर का खर्च निकल जायेगा। तो इस पार्टी के खिलाफ कुछ क्यों छापा जाये। बहुत ही मासूमियत भरा यह सवाल भी था और जबाव भी। और संयोग से कुछ ऐसा ही सवाल और जबाब कश्मीर से निकलते एक अखबार के पहले पन्ने पर उर्दू में पूरे पेज पर विज्ञापन छपा देखा। जिसमें प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर के साथ घाटी का चेहरा बदलने का सपना था। अजीबोगरीब लगा। उर्दू के शब्दों के बीच मोदी और पूरे पेज के विज्ञापन के लालच में संपादक का सवाल, क्या करें। इतना बड़ा विज्ञापन। इससे तो अखबार के सारे बुरे दिन दूर हो जायेंगे। और विज्ञापन छाप रहे हैं तो पार्टी के खिलाफ कुछ क्यों लिखें। वैसे भी चुनाव तो होते रहते हैं। नेता बदलते रहते हैं। घाटी में कभी तो कुछ बदला नहीं। तो हम किसी से कुछ मांग तो नहीं रहे सिर्फ विज्ञापन चुनाव तक है। पैसे एंडवास में दे दिये गये हैं। सरकारी विज्ञापनों के तो पैसे भी मांगते मांगते मिलते हैं तो हमने सोचा है कि घाटी में क्या होना चाहिये और जनता किन मुश्किलों में है और इसी पर रिपोर्ट फाइल करेंगे। यानी नेता भ्रष्ट हो या आपराधिक छवि का। पार्टी की धारा कुछ भी हो। पार्टी की धारा कुछ भी हो। आतंक के साये से चुनावी उम्मीदवार निकला हो या आतंक फैला कर चुनाव मैदान में उतरा हो। बहस कही नहीं सिवाय सपने जगाने वाले चुनाव के आइने में लोकतंत्र को जीने की। असर यही हुआ कि पूंजी कैसे किसकी परिभाषा इस दौर में बदल कर सकारात्मक छवि का अनूठा पाठ हर किसी को पढ़ा सकती है, यह कमोवेश देश के हर मीडिया हाउस में हुआ। इसका नायाब असर गवर्नेंस के दायरे में भ्रष्ट मीडिया हाउसों पर लगते तालो के बीच पत्रकार बनने के लिये आगे आने वाली पीढ़ियो के रोजगार पर पड़ा। मनमोहन सिंह के दौर की आवारा पूंजी ने चिटफंड और बिल्डरों से लेकर सत्ता के लिये दलाली करने वालों के हाथो में चैनलों के लाइसेंस दिये। मीडिया का बाजार फैलने लगा। और 16 मई के बाद पूंजी, मुनाफा चंद हथेलियों में सिमटने लगा तो मीडिया के नाम पर चलने वाली दुकाने बंद होने लगी। सिर्फ दिल्ली में ही तीन हजार पत्रकार या कहें मीडिया के कामगार बेरोजगार हो गये। छह कारपोरेट हाउस सीधे मीडिया हाउसो के शेयर खरीद कर सत्ता के सामने अपनी ताकत दिखाने लगे या फिर मीडिया के नतमस्तक होने का खुला जश्न मनाने लगे। जश्न के तरीके मीडिया के अर्द्ध सत्य को भी हडपने लगे और सत्ता की ताकत खुले तौर पर खुला नजारा करने से नहीं चूकी। यानी पहली बार लुटियन्स की दिल्ली सरीखे रेशमी नगर की तर्ज पर हर राज्य की राजनीति या तो ढलने लगी या फिर पारंपरिक लोकतंत्र के ढर्रे से उकता गयी जनता ही जनादेश के साये में राजनीति का विकल्प देने लगी । और मीडिया हक्का बक्का होकर किसी उत्पाद [ प्रोडक्ट ] की तर्ज पर मानने लगा कि अगर वह सत्ता के कोठे की जरुरत है तो फिर उसकी साख है । यानी जिन समारोहों को, जिन सामाजिक विसंगतियों और जिस लोकतंत्र के कुंद होने पर मीडिया की नजर होनी चाहये अगर वह खुद ही समारोह करने लगे। सामाजिक विसंगतियों को अनदेखा करने लगे और लोकतंत्र के चौथे पाये की जगह खुद को सत्ता की गोद में बैठाने लगे या खुद में सत्ता की ठसक पाल लें, तो सवाल सिर्फ पत्रकारिता का है या देश का। सोचना तो पड़ेगा।
(prasunbajpai.itzmyblog.com से साभार)

Friday, 5 December 2014

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देशभक्तों का महान संगठन? / प्रभाष जोशी

(अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है.)
….अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के लिए वंदेमातरम् का गाना अनिवार्य करने की मांग संघ परिवारियों की ही रही है. ये वही लोग हैं जिनने उस स्वतंत्रता संग्राम को ही स्वैच्छिक माना है जिसमें से वंदेमातरम् निकला है. अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है. लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि राष्ट्रभक्ति का कोई प्रतीक स्वैच्छिक हो. तो फिर आज़ादी की लड़ाई के निर्णायक ”भारत छोड़ो आंदोलन” के दौरान वे खुद क्या कर रहे थे? उनने खुद ही कहा है- ”मैं संघ में लगभग उन्हीं दिनों गया जब भारत छोड़ो आंदोलन छिड़ा था क्योंकि मैं मानता था कि कॉग्रेस के तौर-तरीक़ों से तो भारत आज़ाद नहीं होगा. और भी बहुत कुछ करने की ज़रूरत थी.” संघ का रवैया यह था कि जब तक हम पहले देश के लिए अपनी जान क़ुरबान कर देने वाले लोगों का मज़बूत संगठन नहीं बना लेते, भारत स्वतंत्र नहीं हो सकता. लालकृष्ण आडवाणी भारत छोड़ो आंदोलन को छोड़कर करांची में आरम-दक्ष करते देश पर क़ुरबान हो सकने वाले लोगों का संगठन बनाते रहे. पांच साल बाद देश आज़ाद हो गया. इस आज़ादी में उनके संगठन संघ- के कितने स्वयंसेवकों ने जान की क़ुरबानी दी? ज़रा बताएं.
एक और बड़े देशभक्त स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी हैं. वे भी भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बच्चे नहीं संघ कार्य करते स्वयंसेवक ही थे. एक बार बटेश्वर में आज़ादी के लिए लड़ते लोगों की संगत में पड़ गए. उधम हुआ. पुलिस ने पकड़ा तो उत्पात करने वाले सेनानियों के नाम बताकर छूट गए. आज़ादी आने तक उनने भी देश पर क़ुरबान होने वाले लोगों का संगठन बनाया जिन्हें क़ुरबान होने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि वे भी आज़ादी के आंदोलन को राष्ट्रभक्ति के लिए स्वैच्छिक समझते थे.
अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने को देशभक्तों का महान संगठन कहे और देश पर जान न्योछावर करने वालों की सूची बनाए तो यह बड़े मज़ाक का विषय है. सन् १९२५ में संघ की स्थापना करने वाले डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार को बड़ा क्रांतिकारी और देशभक्त बताया जाता है. वे डॉक्टरी की पढ़ाई करने १९१० में नागपुर से कोलकाता गए जो कि क्रांतिकारियों का गढ़ था. हेडगेवार वहां छह साल रहे. संघवालों का दावा है कि कोलकाता पहुंचते ही उन्हें अनुशीलन समिति की सबसे विश्वसनीय मंडली में ले लिया गया और मध्यप्रांत के क्रांतिकारियों को हथियार और गोला-बारूद पहुंचाने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की थी. लेकिन ना तो कोलकाता के क्रांतिकारियों की गतिविधियों के साहित्य में उनका नाम आता है न तब के पुलिस रेकॉर्ड में. (इतिहासकारों का छोड़े क्योंकि यहां इतिहासकारों का उल्लेख करने पर कुछ को उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करने का अवसर मिल सकता है) खैर, हेडगेवार ने वहां कोई महत्व का काम नहीं किया ना ही उन्हें वहां कोई अहमियत मिली. वे ना तो कोई क्रांतिकारी काम करते देखे गए और ना ही पुलिस ने उन्हें पकड़ा. १९१६ में वे वापस नागपुर आ गए.
लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद वे कॉग्रेस और हिन्दू महासभा दोनों में काम करते रहे. गांधीजी के अहिंसक असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में भाग लेकर ख़िलाफ़त आंदोलन के वे आलोचक हो गए. वे पकड़े भी गए और सन् १९२२ में जेल से छूटे. नागपुर में सन् १९२३ के दंगों में उनने डॉक्टर मुंजे के साथ सक्रिय सहयोग किया. अगले साल सावरकर का ”हिन्दुत्व” निकला जिसकी एक पांडुलिपी उनके पास भी थी. सावरकर के हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार करने के लिए ही हेडगेवार ने सन् १९२५ में दशहरे के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की. तब से वे निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन और राजनीति में रहे लेकिन संघ को इन सबसे अलग रखा. सारा देश जब नमक सत्याग्रह और सिविल नाफ़रमानी आंदोलन में कूद पड़ा तो हेडगेवार भी उसमें आए लेकिन राष्टीय स्वयंसेवक संघ की कमान परांजपे को सौंप गए. वे स्वयंसेवकों को उनकी निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने देते थे लेकिन संघ को उनने न सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों में लगाया न अहिंसक असहयोग आंदोलनों में लगने दिया. संघ ऐसे समर्पित लोगों के चरित्र निर्माण का कार्य कर रहा था जो देश के लिए क़ुरबान हो जाएंगे. सावरकर ने तब चिढ़कर बयान दिया था, ”संघ के स्वयंसेवक के समाधि लेख में लिखा होगा- वह जन्मा, संघ में गया और बिना कुछ किए धरे मर गया.”
हेडगेवार तो फिर भी क्रांतिकारियों और अहिंसक असहयोग आंदोलनकारियों में रहे दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर तो ऐसे हिन्दू राष्ट्रनिष्ठ थे कि राष्ट्रीय आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियों और ब्रिटिश विरोध से उनने संघ और स्वयंसेवकों को बिल्कुल अलग कर लिया. वाल्टर एंडरसन और श्रीधर दामले ने संघ पर जो पुस्तक द ब्रदरहुड इन सेफ़्रॉन- लिखी है उसमें कहा है, ”गोलवलकर मानते थे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी लगाने का कोई बहाना अंग्रेज़ों को न दिया जाए.” अंग्रेज़ों ने जब ग़ैरसरकारी संगठनों में वर्दी पहनने और सैनिक कवायद पर पाबंदी लगाई तो संघ ने इसे तत्काल स्वीकार किया. २९ अप्रैल १९४३ को गोलवलकर ने संघ के वरिष्ठ लोगों के एक दस्तीपत्र भेजा. इसमें संघ की सैनिक शाखा बंद करने का आदेश था. दस्तीपत्र की भाषा से पता चलता है कि संघ पर पाबंदी की उन्हें कितनी चिंता थी- ”हमने सैनिक कवायद और वर्दी पहनने पर पाबंदी जैसे सरकारी आदेश मानकर ऐसी सब गतिविधियां छोड़ दी हैं ताकि हमारा काम क़ानून के दायरे में रहे जैसा कि क़ानून को मानने वाले हर संगठन को करना चाहिए. ऐसा हमने इस उम्मीद में किया कि हालात सुधर जाएंगे और हम फिर ये प्रशिक्षण देने लगेंगे. लेकिन अब हम तय कर रहे हैं कि वक़्त के बदलने का इंतज़ार किए बिना ये गतिविधियां और ये विभाग समाप्त ही कर दें.” (ये वो दौर था जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे क्रांतिकारी अपने तरीक़े से संघर्ष कर रहे थे) पारंपरिक अर्थों में गोलवलकर क्रांतिकारी नहीं थे. अंग्रेज़ों ने इसे ठीक से समझ लिया था.
सन् १९४३ में संघ की गतिविधियों पर तैयार की गई एक सरकारी रपट में गृह विभाग ने निष्कर्ष निकाला था कि संघ से विधि और व्यवस्था को कोई आसन्न संकट नहीं है. १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन में हुई हिंसा पर टिप्पणी करते हुए मुंबई के गृह विभाग ने कहा था, ”संघ ने बड़ी सावधानी से अपने को क़ानूनी दायरे में रखा है. खासकर अगस्त १९४२ में जो हिंसक उपद्रव हुए हैं उनमें संघ ने बिल्कुल भाग नहीं लिया है.” हेडगेवार सन् १९२५ से १९४० तक सरसंघचालक रहे और उनके बाद आज़ादी मिलने तक गोलवलकर रहे. इन बाईस वर्षों में आज़ादी के आंदोलन में संघ ने कोई योगदान या सहयोग नहीं किया. संघ परिवारियों के लिए संघ कार्य ही राष्ट्र सेवा और राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा काम था. संघ का कार्य क्या है? हिन्दू राष्ट्र के लिए मर मिटने वाले स्वयंसेवकों का संगठन बनाना. इन स्वयंसेवकों का चरित्र निर्माण करना. उनमें ऱाष्ट्रभक्ति को ही जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा और शक्ति मानने की परम आस्था बैठाना. १९४७ में जब देश आज़ाद हुआ तो देश में कोई सात हज़ार शाखाओं में छह से सात लाख स्वयंसेवक भाग ले रहे थे. आप पूछ सकते हैं कि इन एकनिष्ठ देशभक्त स्वयंसेवकों ने आज़ादी के आंदोलन में क्या किया? अगर ये सशस्त्र क्रांति में विश्वास करते थे तो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ इनने कितने सशस्त्र उपद्रव किए, कितने अंग्रेज़ों को मारा और उनके कितने संस्थानों को नष्ट किया. कितने स्वयंसेवक अंग्रेज़ों की गोलियों से मरे और कितने वंदेमातरम् कहकर फांसी पर झूल गए? हिन्दुत्ववादियों के हाथ से एक निहत्था अहिंसक गांधी ही मारा गया.
संघ और इन स्वयंसेवकों के लिए आज़ादी के आंदोलन से ज़्यादा महत्वपूर्ण स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र के लिए संगठन बनाना और स्वयंसेवक तैयार करना था. संगठन को अंग्रेज़ों की पाबंदी से बचाना था. इनके लिए स्वतंत्र भारत राष्ट्र अंग्रेज़ों से आज़ाद कराया गया भारत नहीं था. इनका हिन्दू राष्ट्र तो कोई पांच हज़ार साल से ही बना हुआ है. उसे पहले मुसलमानों और फिर अंग्रेज़ों से मुक्त कराना है. मुसलमान हिन्दू राष्ट्र के दुश्मन नंबर एक और अंग्रेज़ नंबर दो थे. सिर्फ़ अंग्रेज़ों को बाहर करने से इनका हिन्दू राष्ट्र आज़ाद नहीं होता. मुसलमानों को भी या तो बाहर करना होगा या उन्हें हिन्दू संस्कृति को मानना होगा. इसलिए अब उनका नारा है- वंदे मातरम् गाना होगा, नहीं तो यहां से जाना होगा. सवाल यह है कि जब आज़ादी का आंदोलन- संघ परिवारियों के लिए स्वैच्छिक था तो स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत में वंदेमातरम् गाना स्वैच्छिक क्यों नहीं हो सकता? भारत ने हिन्दू राष्ट्र को स्वीकार नहीं किया है. यह भारत संघियों का हिन्दू राष्ट्र नहीं है. वंदेमातरम् राष्ट्रगीत है, राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं.  (प्रभाष जोशी का यह लेख 10 मार्च, 2008 को जनसत्ता में छपा था)

जादू जैसे शब्दों वाले हिन्दी नवगीत के आधार स्तम्भ देवेन्द्र कुमार बंगाली की वह लोकप्रिय कविता....

एक पेड़ चांदनी लगाया है आंगने ।
फूले तो आ जाना एक फूल मांगने ।

ढिबरी की लौ जैसे लीक चली आ रही,
बादल का रोना है, बिजली शरमा रही,
मेरा घर छाया है तेरे सुहाग ने।

तन कातिक, मन अगहन बार-बार हो रहा,
मुझमें तेरा कुवार जैसे कुछ बो रहा,
रहने दो यह हिसाब कर लेना बाद में।

नदी झील, सागर से रिश्ते मत जोड़ना,
लहरों को आता है यहां-वहां छोड़ना,
मुझको पहुंचाया है तुम तक अनुराग ने।