Thursday, 14 November 2013

मीडिया जांच-पड़ताल पर नई बेवसाइट चलाएंगे ग्लेन ग्रीनवाल्ड


विकिलीक्स, ओपनलीक्स, माफ़ियालीक्स और दूसरी इण्टरनेट वेबसाइटें। आख़िर यह ख़बर आ ही गई कि अमरीकी पत्रकार, चिट्ठाकार यानी ब्लॉगर और अमरीकी वकील ग्लेन ग्रीनवाल्ड कहाँ काम करने जा रहे हैं। ग्लेन ग्रीनवाल्ड ने ही सबसे पहले अमरीकी गुप्तचर संगठन राष्ट्रीय सुरक्षा एजेन्सी के एजेन्ट एडवर्ड स्नोडेन द्वारा दी गई जानकारी से दुनिया को परिचित कराया था। अब ग्लेन ग्रीनवाल्ड पत्रकारों द्वारा की जाने वाली जाँच-पड़ताल की एक नई वेबसाइट का संचालन करेंगे। अब उन सरकारों को, जो अपना काम-धाम गुप्त रूप से करती हैं, भ्रष्टाचार में डूबे व्यावसायिकों को और इतालवी माफ़िया को बहुत सम्भल कर रहना होगा। जूलियन असांज की विकिलीक्स जैसी पोल खोलने वाली वेबसाइटों की संख्या बढ़ती जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की वेबसाइटों की बढ़ती संख्या को रोकने के लिए अब सरकारी संस्थाओं
को और स॔रकारी निकायों को ज़्यादा खुलेपन के साथ काम करना होगा और इण्टरनेट में कथन की आज़ादी को ख़त्म करने की कोशिशों से तौबा करनी होगी। इससे इण्टरनेट उपयोगकर्ताओं के बीच ख़ुद पारस्परिक विरोध सामने आएगा। रेडियो रूस से बात करते हुए राजनीतिक विश्लेषक अलेक्सान्दर गुसेव ने कहा कि सरकार और खुले समाज के बीच रस्साकशी हमेशा ही होती रही है और आगे भी होती रहेगी। हर सरकार के पास कुछ सूचनाएँ सबको बताने के लिए होती हैं और कुछ सूचनाएँ गुप्त होती हैं, जिन्हें हर आदमी को नहीं बताया जा सकता है। लेकिन हर सरकार के काम करने का तरीका अलग होता है। कुछ सरकारें अपने समाज के साथ ज़्यादा खुला रवैया अपनाती हैं और कुछ सरकारें सब-कुछ गुप-चुप करती रहती हैं। आम तौर पर गुप-चुप काम करने वाली सरकारें अपने मामलों को गुप्त रखने के लिए ज़रूरत से ज़्यादा रहस्यात्मकता ओढ़ लेती हैं। अलेक्सान्दर गुसेव ने कहा : सरकारें हमेशा यह कोशिश करती हैं कि उनकी सूचनाएँ सुरक्षित रहें। इसके लिए वे क्या क़दम उठा सकती हैं? वे अपनी बन्द वेबसाइटें बना सकती हैं। वे उन लोगों पर पहरा बैठा सकती हैं, जो बेहद सक्रिय हैं। वे ऐसी बाड़ें और फ़िल्टर लगा सकती हैं कि कुछ निश्चित तरह की सूचनाओं तक लोगों की पहुँच ही नहीं हो। वे ज़रूरत से ज़्यादा हदबन्दी कर सकती हैं और गुप्त रह सकती हैं। और अपने रहस्यों को सुरक्षित रखने के लिए हर वह क़दम उठा सकती हैं, जो उन्हें ठीक लगता है। अपनी सूचनाओं की सुरक्षा करने के लिए सरकारें हमेशा सतर्क रहती हैं और वे हाथ पर हाथ धरे बैठी नहीं रह सकती हैं। इण्टरनेट में पिछले दिनों एक नई वेबसाइट, एक नया पोर्टल सामने आया है, जिसका नाम है -- माफ़ियालीक्स। विगत नवम्बर में सामने आई यह वेबसाइट अँग्रेज़ी और इतालवी भाषाओं में है। यह एक तरह से एक ऐसा इलैक्ट्रोनिक मेलबॉक्स है, जिसमें माफ़िया के शिकार हुए लोग माफ़िया की शिकायत कर सकते हैं तथा माफ़िया के बारे में कोई भी जानकारी रखने वाले लोग अपना नाम गुप्त रखकर उस जानकारी को साझा कर सकते हैं। इसके साथ-साथ पत्रकार भी इस वेबसाइट का इस्तेमाल अपने लेखों के लिए जानकारी इकट्ठी करने के लिए कर सकते हैं। यह मानना ही होगा कि जिन लोगों ने यह वेबसाइट बनाने और चलाने की ज़िम्मेदारी उठाई है, वे बेहद साहसी हैं क्योंकि सरकारों के विरुद्ध आवाज़ उठाना और उनकी गुप्त जानकारियों को सार्वजनिक करना एक बात है और माफ़िया की ऐसी जानकारियों को सार्वजनिक करना बिल्कुल दूसरी बात। माफ़िया जब किसी बात पर नाराज़ होता है तो वह उसका फ़ैसला अदालत में जाकर नहीं करता है। माफ़ियालीक्स नामक इस वेबसाइट से कुल दस व्यक्ति जुड़े हुए हैं और उन्होंने अपनी सुरक्षा का पूरा-पूरा इन्तज़ाम कर लिया है। पता लगा है कि इस वेबसाइट में प्रवेश करने के लिए जो कोड बनाए गए हैं, उन्हें खोलना और यह पता करना आसान नहीं है कि कौन इस वेबसाइट को नियन्त्रित कर रहा है। इस वेबसाइट पर पहुँचने वाले लोगों के पतों का भी पंजीकरण नहीं होता है। इसलिए वे भी अपना नाम-पता आसानी से छुपा सकते हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी वेबसाइट में सेन्ध लगाना सम्भव है। इसमें देर हो सकती है, लेकिन सेन्ध तो लगाई ही जा सकती है। जनवरी-2011 से ही विकिलीक्स की तरह की ही एक और वेबसाइट भी इण्टरनेट पर चल रही है। इस वेबसाइट क नाम है ओपनलीक्स। यह वेबसाइट विकिलीक्स से अलग हुए उन लोगों ने बनाई है, जो विकिलीक्स के संचालक जूलियन असांज के काम करने के तरीकों से असन्तुष्ट थे। ओपनलीक्स एक तरह से विकीलीक्स का ही सहज रूप है। लेकिन ओपनलीक्स वेबसाइट गुप्त दस्तावेज़ों को प्रकाशित करने की जगह इण्टरनेट उपयोगकर्ताओं को गुप्त रूप से और बिना अपने नाम-पते की जानकारी दिए सूचनाओं का आदान-प्रदान करने की सेवा उपलब्ध कराती है। जहाँ पर जाकर लोग अपनी सरकार, अपने स्थानीय नगर प्रशासन, व्यावसाय, नागरिक सुविधाएँ और जन सुविधाएँ उपलब्ध कराने वाली संस्थाओं की शिकायत कर सके, लोगों को ऐसा मंच उपलब्ध कराने की बात उसी समाज में सामने आती है, जिसमें सरकार गुप-चुप ढंग से काम करती हैं और अपनी गतिविधियों को गुप्त रखती हैं। इसके अलावा जहाँ सरकारी रहस्यों को खोलने वाले लोगों को न्यायिक सुरक्षा नहीं मिलती हैं। सिर्फ़ इसी साल भ्रष्टाचार, गबन, अपने पद के दुरुपयोग आदि के आरोप में विभिन्न देशों की सरकारों और संगठनों से तथा प्रशासनिक कार्यालयों से सैकड़ों लोगों को बर्खास्त किया गया है। कुछ रूसी विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी सूचनाओं को सार्वजनिक करते हुए बड़ी सतर्कता और सावधानी से काम लेना चाहिए। चूँकि सारी सूचनाओं को सार्वजनिक करना ठीक नहीं है, इसलिए कहीं न कहीं समझौता करना ही पड़ता है। रूसी राजनीतिक विश्लेषक सेर्गेय मिख़ियेव ने इस सिलसिले में रेडियो रूस से बात करते हुए कहा : एक भी सरकार ऐसी नहीं है जिसने कभी अपनी सूचनाओं को गुप्त रखने की कोशिश न की हो या जो कभी अपनी सूचनाओं को गुप्त नहीं रखेगी। हर बात खुलकर की जाएगी तो उसका नुक़सान ही होगा। सरकारी फ़ाइलों से निकली सूचनाओं का इस्तेमाल कोई भी कर सकता है। इस दुनिया में सिर्फ़ नेक लोग ही नहीं हैं, बल्कि बहुत से दुष्ट लोग भी हैं, जो अपने दुष्ट कामों को पूरा करने के लिए इन सूचनाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए सूचनाओं को सार्वजनिक करने के काम में एक सन्तुलन बनाकर रखना होगा, एक ऐसी समझ रखनी होगी कि किन सूचनाओं को सार्वजनिक किया जाए और किन्हें नहीं। ट्राँसपरेन्सी इण्टरनेशनल नामक संस्था ने हाल ही में अपनी एक रिपोर्ट में कुछ अचरजभरी बातें कही हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि यूरोसंघ में शामिल कुल 27 देशों में से बस, चार देश ही ऐसे हैं, जहाँ सूचनाओं को सार्वजनिक करने वालों को अधिकारियों से सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए कानून बने हुए हैं। टाँसपरेन्सी इण्टरनेशनल के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हर देश में ऐसे कानून बने होते और उनका प्रभावशाली ढंग से इस्तेमाल करना सम्भव होता तो भ्रष्टाचार और गबन के बहुत से हंगामे हुए ही न होते और न ही औद्योगिक या तकनीकी दुर्घटनाएँ सामने आतीं। इसका मतलब यह है कि तब अरबों रुपया भी बचा लिया गया होता और सैकड़ों लोगों का जीवन बचा पाना भी सम्भव होता।

दूसरी भाषाओं को निगल तो नहीं रही हिंदी


क्या भारत की 'क्षेत्रीय भाषाओं' में लिखा जाने वाला साहित्य केवल अनुवाद के सहारे ही जीवित रह पाएगा? क्या वजह है कि अवधी, भोजपुरी, पंजाबी या मराठी में लिखने वालों के अपने पाठक कम होते जा रहे हैं? क्या हिंदी इन भाषाओं को निगल रही है या फिर इसके लिए ज़िम्मेदार हैं ख़ुद पाठक। राजस्थानी लोक साहित्य में गहरी पैठ रखने वाले जानेमाने लेखक विजयदान देथा को लोग उनकी आंचलिक शैली और किस्सागोई के लिए याद करते हैं लेकिन उनके निधन पर हर तरफ एक बहस छिड़ी है कि हिंदी के अलावा दूसरी भारतीय भाषाओं के 'विजयदान देथा' क्यों और कैसे खो रहे हैं। हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक उदय प्रकाश ने किसी भाषा को क्षेत्रीय कहने पर ही सवाल उठाते हुए कहा, "सबसे पहले तो इस पर वस्तुपरक ढंग से सोचा जाए कि क्या ऐसी भी भाषा कोई होती है या हो सकती है, जिसका कोई 'क्षेत्र' ही न हो! क्या ऐसी भाषा जिसका भौगोलिक-सामाजिक आधार न हो, जो परिवारों, जनपदों, 'पिछड़े बना कर रखे गये' इलाकों में लोक-व्यवहार में न हो, बल्कि अन्य प्रक्रियाओं से विनिर्मित हो, क्या 'भाषा' सिर्फ़ वही हो सकती है?" हिन्दी के प्रमुख प्रकाशक राजकमल प्रकाशन समूह के संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरुपम इस बहस से जुड़े और उदय प्रकाश की बात को आगे ले जाते हुए कहा, ''हर भाषा की अपनी एक दुनिया होती है. 'क्षेत्र' और 'क्षेत्रीयता' के पैमाने पर हम अगर जाएंगे तो क्या हिंदी का भी एक क्षेत्र विशेष नहीं है? तब क्या दुनिया की सारी भाषाओं को वैश्विक, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय भाषा के खाके में बाँट कर देखा जाएगा?" वरिष्ठ पत्रकार और समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा ने हाल ही में केन्याई लेखक न्गुगी वा थ्योंगो की एक किताब का अनुवाद किया है। उन्होंने बताया कि किस तरह न्गुगी ने सामंती दमन और नव-औपनिवेशिक स्थितियों को झेला था और यही वजह है कि अंग्रेज़ी में बहुत ज़्यादा चर्चित होने के बावजूद उन्होंने अंग्रेज़ी को तिलांजलि दी और अपनी मूल भाषा गिकुयू और किस्वाहिली में लिखना शुरू कर दिया। बात केवल क्षेत्रीय भाषाओं की नहीं है। क्षेत्रीय भाषाओं को हिंदी के वर्चस्व से और हिंदी को अंग्रेज़ी के वर्चस्व से ख़तरा पैदा हो गया है। इन सबके पीछे हमारी वह मानसिकता है जिसे हम औपनिवेशिक मानसिकता कह सकते हैं। आदिवासियों की भाषा और संस्कृति के लिए काम करने वाले एके पंकज 'झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखाड़ा' से जुड़े हैं। पंकज ने आदिवासी भाषाओं की वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा, "भारत में जानबूझ कर आदिवासी भाषाओं को मारने की लगातार कोशिश हो रही हैं। भाषाओं की राजनीति पर कौन बात करेगा? भाषा में जो लोग मर रहे हैं और मारे जा रहे हैं, वे यहां हो रही बहस से पूरी तरह से गायब है? संस्कृतिकरण के ज़रिए आदिवासी भाषाओं और संस्कृति पर हमले हो रहे हैं। देश के आदिवासी इलाक़े अंग्रेज़ी, हिंदी, भोजपुरी, मैथिली, बांग्ला आदि समर्थ भाषाओं के उपनिवेश बने हुए हैं और इसे बनाने वाले इन भाषाओं के बुद्धिजीवी हैं, इनके जातीय, धार्मिक राजनीतिक दल हैं। सत्यानंद निरुपम का मानना है कि सभी भाषाओं को एक तराजू में रखकर देखने की ज़रूरत नहीं है। अवधी और भोजपुरी की जो स्थिति है, उससे बिलकुल अलग है पंजाबी या मराठी का हाल। इनको हमें अलग-अलग करके देखना होगा। मराठी और पंजाबी में जो कुछ लिखा जाता है, हिंदी उसको अनुवाद के ज़रिये विस्तार देती है लेकिन अवधी और भोजपुरी जैसी बोलियां हिंदी के उत्थान के साथ सिमटती चली गई हैं।  उर्दू अकादमी के उपाध्यक्ष प्रोफेसर अख़्तरुल वासे का मानना है कि भाषाएं सरकार के संरक्षण में नहीं, अपने बोलने वालों के दम पर भी ज़िंदा रहती हैं और आगे भी बढ़ती हैं। कोई भी भाषा साहित्य में वही कृति ज़िंदा रहती है जो सार्थक भी हों और जीवन से सच्चे तौर से जुड़ी हुई भी।  राजस्थानी लेखक हरीराम मीणा अनुवाद का समर्थन तो करते हैं लेकिन वो इसे आलोचनात्मक दृष्टि से देखने के हिमायती हैं। उनके अनुसार, अनुवाद अपनी जगह महत्व रखता है लेकिन अनुवाद आखिर किसका? कोई भाषा अपने आप में कमज़ोर नहीं होती। उसकी अपनी एक परंपरा होती है। उसका अपना मुहावरा होता है। उसे पकड़ते हुए यदि साहित्य लिखा जाता है तो विज्जी (विजयदान देथा) जैसा साहित्य सामने आएगा। दूसरा उदहारण रसूल हमजातोव का दिया जा सकता है। मेरा दागिस्तान वैश्विक स्तर पर कितना सराहा गया। क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य की मौखिक परंपरा को भी समझने की ज़रूरत है। सत्यानंद निरुपम का कहना है कि नागार्जुन हिंदी प्रकाशन जगत के प्रिय लेखक रहे। नागार्जुन ने खुद भी पुस्तिकाएं छाप कर रेलगाड़ियों में घूम-घूम कर अपने हाथों बेचा। उनके जीवित रहते ही उनके एक पुत्र ने एक प्रकाशन संस्थान भी खोला, जहाँ से नागार्जुन की कुछ किताबें छपीं। वहां से तो बहुत ईमानदारी से किताबें बेचीं गई होंगी लेकिन क्या फ़र्क़ पड़ा? क्या आप हिंदी समाज के भीतर की जटिलताओं और कमियों को देख नहीं पा रहे हैं या जान-बूझकर नजरअंदाज कर रहे हैं? (साभार बीबीसी से)

बाल दिवस पर नहीं रहे बाल साहित्यकार देवसरे


जाने माने बाल-साहित्यकार हरिकृष्ण देवसरे का गुरूवार को बाल दिवस के दिन ही लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 75 साल के थे। मध्य प्रदेश के नागोद में नौ मार्च 1938 को पैदा हुए देवसरे हिंदी साहित्य के अग्रणी लेखकों में थे। बच्चों के लिए रचा गया उनका साहित्य विशेष रूप से पसंद किया गया। बाल साहित्य में योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2011 में साहित्य अकादमी बाल साहित्य लाइफटाइम पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। तीन सौ से ज्यादा पुस्तकें लिख चुके देवसरे को बाल साहित्यकार सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के बाल साहित्य सम्मान, कीर्ति सम्मान (2001) और हिंदी अकादमी के साहित्यकार सम्मान (2004) सहित कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा गया।  बताया जाता है कि देवसरे भारतीय बाल साहित्य में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल करने वाले पहले व्यक्ति थे। लोकप्रिय पत्रिका ‘पराग’ के करीब 10 साल तक संपादक रहे देवसरे को पहला वात्सल्य पुरस्कार भी दिया गया था। उन्होंने भारतीय भाषाओं में रचित बाल-साहित्य में रचनात्मकता पर बल दिया और बच्चों के लिए मौजूद विज्ञान-कथाओं और एकांकी के ख़ालीपन को भरने की कोशिश की। वर्ष 2007 में उन्होंने न्यूयॉर्क में विश्व हिंदी सम्मेलन में भी भाग लिया था।

Tuesday, 12 November 2013

बुद्धिजीवी गए आटा पिसाने

जयप्रकाश त्रिपाठी

पांच हाथ के झिनड्ढे छप्पर की छांव में टूटी-फूटी जुलजुल कुर्सी पर फटे टायर की गद्दी, कुर्सी के तीन तरफ लटकती चीथड़ों की चादर, कुर्सी के सामने दीवार पर टंगा अंधे शीशे में अपना चेहरा ढूंढते हुए अटकता-भटकता मैं।

ये मेरे मोहल्ले के नाई महोदय का सड़किया सैलून है। यही बगल में नगर निगम का डलावघर है। आसपास के मोहल्लों का कूड़-करकट भी यहीं बरसा कर निगम की मशीन अंधेरे में फूट लेती है। करते रहें मोहल्ले वाले चांव-चांव अपनी बला से।

अचेत कर देने वाली तरह-तरह की बदबू से जूझता हुआ मैं चुपचाप इकोनॉमिक्स से एमए पास नाई महोदय की फिलास्फी सुनता जा रहा हूं, सुनता जा रहा हूं। मुद्दत बाद उन्हें कोई पूरी तसल्ली से सुनने वाला मिला है। कतरनी से तेज गति उनके जुबान की।

पहले वह अपने आसपास की दुकानों की हिस्ट्री बताते हैं। फिर अपना और उन दुकानदारों का अर्थशास्त्र.... कि कैसे फलां ने रातोरात वो सामने वाली दुकान पर कब्जा जमा लिया, बाएं सब्जीवाले झोपड़े के जन्म की तो कहानी और मजेदार है, सुनेंगे तो हंसते-हंसते लोट जाएंगे, और वो जो इस्त्री वाली दुकान की सीढ़ी पर बैठा लंबोदर सिर खुजा रहा है (जरा सिर घुमाकर देख लीजिए, कैंची पल भर थमी)...बड़ा औघड़ है। पूछ लीजिए इससे पूरे शहर, प्रदेश, देश-विदेश की पॉलिटिक्स। पक्कास कलक्टरगंज हैं, सबकी हिस्ट्री बांच देगा एक सांस में। बुलाऊं?

नहीं भाई, रहने दो, जल्दी से निपटाऊ, अभी सब्जीमंडी जाना है, उधर से चक्की पर आंटा भी उठाकर ले जाना है घर।

अच्छा!! तो आप आटा भी पिसाने जाते हैं?

क्यों? मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए?

नहीं-नहीं, मेरे कहने का मतलब वो नहीं। मैं थोड़ा बहुत सोशल साइटों पर भी टहलता रहता हूं। अखबार-सखबार पढ़ लेता हूं। कई राइटर्स की किताबें भी पढ़ी हैं। बुद्धिजीवी गए आटा पिसाने तो लिखेगा कौन?

मैं बुद्धिजीवी नहीं हूं। और उन लकड़बग्घों जैसा तो कत्तई नहीं जो मुफ्त की रोटियां तोड़ कर रामचरित मानस, सुमित्रानंदन पंत, फ्रायड, मार्क्स और बनारस के घाट-घाट की कहानियां लिखते-पढ़ते हैं। भारतीय मनीषा पर चोटी की तुकबंदियां करते रहते हैं।

तो?

तो क्या, तुम सोचो कि मैं तुम्हारे ही सैलून में क्यों आता हूं। तो अपने गांव कब जा रहे हो?

अभी दीपावली पर तो गया ही था। बड़ा झमेला है वहां। छोटा भाई परधान हो गया है। चाचा और उनके बच्चों को जेल में बंद करवा दिया है। अब पिताजी को कहता है कि ग्राम सभा की सहन में अपनी झोपड़ी डाल लो, मेरे बच्चों को दिक्कत हो रही है। मां पर कई बार थप्पड़ छोड़ चुका है। दीपावली पर मनरेगा के पैसे से ठेल भर पटाखे खरीद लाया था। मैंने समझाया तो झपट पड़ा। भाई होकर भी 'नाई की गाली' देने लगा। अब आज ही सुबह सूचना मिली है कि पुलिस ने उसे कल शाम गिरफ्तार कर लिया। अब क्या करूं, भाई है, जी नहीं मानता। कोई सोर्स-पैरवी हो तो बताओ, कैसे छूटेगा।

इतना पढ़ लिख कर एक तो सड़किया सैलून में जिंदगी खपा रहे हो, दूसरे दिमाग घर पर रख आए हो। मैं तो चला। इस तरह की बातें करोगे तो आइंदा नहीं आऊंगा।

मत आना। इहां कौन सी ग्राहकों की कमी है। पढ़ाई-लिखाई और देश-दुनिया की बातें तो अपने औघड़िया दोस्त से कर लूंगा।

नमस्ते भाई। चला। मेरा भी तुम्हारे यहां आए बिना जी कहां भरता है।

लैम्प


व्सेवोलोद इवानोव की आत्मकथात्मक कहानी

काफ़ी समय पहले की बात है – 1914 की लड़ाई तब शुरू भी नहीं हुई थी| साइबेरिया में इर्तिश नदी के किनारे बसे पाव्लोदार शहर में एक छापेखाने में मुझे टाइपसैटर का काम मिल गया था| ज़िंदगी में दूसरी बार मुझे पगार मिली थी| मैं समझ रहा था कि यह बहुत महत्वपूर्ण घटना है| खास तौर पर इसलिए कि पहली तनख्वाह की मुझे कुछ याद नहीं थी कि कहां, कैसे वह पैसे खर्च किए| मैं सोचने लग गया| इतना महान दिन है यह, अपने पांवों पर ज़िंदगी का पहला कदम भर रहा हूं – ऐसा दिन ज़रूर मनाना चाहिए| पर कैसे? मेहमानों को बुलाऊं? सारे शहर में कुछ गिने-चुने लोगों को ही मैं जानता था| ये नौ रूबल किसी महान काम में लगा दूं? कैसे? कहां है यह महान ध्येय? अपने लिए कोई कपड़ा-लत्ता खरीद लूं? सो, रविवार सुबह-सुबह मैं बाज़ार चल दिया|... पाव्लोदार में बाज़ार इतना बड़ा है कि लगता है कि अकेला यह कस्बा ही सारी दुनिया से व्यापार करने निकल पड़ा है| दुकानों के दरवाज़े खुले हैं, एक दुकान से दूसरी को बढ़ता जाता हूं मैं| कोई तो जाना-पहचाना चेहरा नज़र आ जाए, पर नहीं – कोई नहीं दिख रहा| दिन शुरू ही हुआ है| अचानक देखता हूं: चाय की दुकान के पास दीवार से टेक लगाए, ज़मीन पर पांव फैलाए एक आदमी बैठा है – बदन पर फटे-पुराने कपड़े, पांवों में जूता नहीं, कोई घुमंतू लफंगा लगता है| उसके बगल में रखा है एक लैम्प – पुराने तांबे के लाल से रंग का, न उसमें बत्ती है, न चिमनी, जाने कब से उसे किसी ने साफ़ भी नहीं किया है| वह इत्मीनान से सांस ले रहा है, लगता है उसकी आंख लग गई है| नहीं, देर करना ठीक नहीं – कोई लैम्प उठाकर चलता बनेगा| मैं उसका कंधा झकझोड़ता हूं: “ऐ, भैय्या!” वह आंखें खोलता है| लगता है, अभी झाड़ लगाएगा| पर वह बोलता है: “हं-हां दे दूंगा| कोई सौदा-वौदा नहीं करूंगा| ले लेना|” मैं हैरान-परेशान: क्या करूंगा इस पुराने लैम्प का? घर तो अपना है नहीं, आखिर सामान रखने के लिए घर चाहिए, और कुछ नहीं तो अपना एक नुक्कड़ ही हो, जिसे कुछ सजाकर इंसान वहां अपने घर का सा आराम महसूस करे| मेरे मन में उठते सवाल ज़बान पर आएं इससे पहले ही वह घुमंतू बोलता है: “अरे, मुन्ना! कोई मामूली लैम्प नहीं है, जादुई लैम्प है, जादुई| “जादुई?” “और नहीं तो क्या! किताबों में पढ़ा तो होगा?” किताबें तो मैंने बहुत पढ़ी हैं – पुराने ज़माने के किस्से भी, सफरनामे भी, पहेलियों भरे, रहस्यमय देश भारत की कहानियां भी| हां, कुछ याद तो आ रहा है... अरे हां, सिंदबाद के किस्सों में ही तो आता है जादुई लैम्प का – अलादीन के चिराग का किस्सा! मन में सोचो क्या चाहते हो, मन्नत मांगो और लैम्प को रगड़ो! “बेच रहे हो?” “लो, करो बात! देख तो ज़रा - ताम्बा ही कित्ता लगा है इसमें, ऊपर से जादू और! फिर कारीगरी भी कोई मामूली नहीं! गिन ज़रा, कित्ते का हिसाब बैठता है?... इत्ते तो पैसे भी न होंगे!” एक आंख मींचकर वह मेरी ओर देख रहा है कि करे मुझसे सौदा या कोई दूसरा गाहक खोजे| “थोड़ी देर के लिए दे सकता हूं| बस एक घंटे के लिए!” “कित्ते लगेंगे एक घंटे के?”मेरी आवाज़ कांप रही है| अब मुझे पक्का पता है कि मैं बेकार ही नहीं आया इस बाज़ार में, कि मैं सारी उम्र इस लैम्प का ही सपना देखता आया हूं| अरे, घंटे भर की क्या ज़रूरत है, भला?! मेरे लिए तो पांच मिनट ही बहुत हैं! पर अपने सपने की खातिर पैसे काफ़ी पड़ेंगे कि नहीं? जेब में रखी पगार को मैं टटोलता हूं| “कित्ते?” “जित्ते हैं! मुन्ना! जो तमाशे के लिए नहीं, सचमुच में यह लैम्प पाना चाहता है न, वह तो जो है सब दे देगा, भले ही हज़ार रूबल क्यों न हों!” मैं सारी पगार उसकी ओर बढ़ा देता हूं| वह घुमंतू फिर से मुझे घूरता है, खुशी से मुस्कराता है और ज़मीन से उठ खड़ा होता है| मेरी पगार वह अपनी जेब में डाल लेता है और बड़े ठाठ से पास के ढाबे को चल देता है| रास्ते में थम जाता है, सिर घुमाकर लैम्प की ओर इशारा करता है, जो अभी तक धूल में ही पड़ा हुआ है| “छोरे, लैम्प तो उठा ले| जल्दी कर| तेरा घंटा शुरू हो चुका है|” घुमंतू इत्मीनान से कदम भरता चला जाता है, मैं लपककर लैम्प उठाता हूं और कसकर छाती से लगा लेता हूं| दिमाग में ख्यालों के घोड़े दौड़ने लगते हैं| क्या मांगूं? क्या? अजीब बात है! इतनी सारी इच्छाएं हैं कि समझ में नहीं आता किससे शुरू करूं! कपड़ा-लत्ता या खाना मांगना तो बेवकूफी ही है – जादू की ताकत ऐसी बातों पर खर्च करने में तो कोई तुक ही नहीं! अपनी ज़रूरत की चीज़ें खरीदने के लिए तो मेरे पास पैसे थे ही| और भी कमा लूंगा| और फिर मुझे ज़्यादा कुछ चाहिए भी नहीं| सेहत मांगूं? पर मैं तो हट्टा-कट्टा हूं, जवान हूं, अभी अठारह साल का तो हुआ हूं| मांगूं तो क्या मांगूं? अचानक मेरी पीठ पीछे कदमों की आहट होती है| कोई मेरे कंधे पर हाथ रख देता है| मेरे नथुनों में शराब और तले आलुओं की गंध भर जाती है| डगमगाते पांवों पर घुमंतू मेरे बगल में आ खड़ा होता है| “बस, मुन्ना! निकल गया बख्त! फुर्ती से काम करना सीखो, मुन्ना!” अरे, सच में एक घंटा बीत गया? वह घुमंतू मेरे हाथों से लैम्प ले लेता है, बगल में समेटता है, पर जाता नहीं, वहीं खड़ा रहता है| मन में खास उम्मीद के बिना मैं दबी आवाज़ में उससे कहता हूं: “सोच लिया मैंने| बस एक मिनट को लैम्प दे दो, एक बार रगड़ लूं...” वह उलाहना भरे गंभीर स्वर में कहता है: “अरे, मुन्ना, ज़बान टूटी तो फिर कहां का जादू रहा? यह तो धोखा होगा, जादू नहीं...” मुझे ख्याल आया: जिन्न से यह मांगने के लिए कि वह मुझे एक युग से दूसरे में पहुंचा दे क्या थोड़ी तकलीफ नहीं उठाई जा सकती... माना मेरा कवि मन मुझे कल्पना में राजा भी बना सकता है और मज़दूर भी, दास भी, सिपाही भी और विद्वान भी| लेकिन क्या मैं खुद वह युग चुन सकता हूं जिस में से मानो दूरबीन की तरह मैं सभी युगों को देख और समझ पाऊं| यह कैसे मान लिया जाए कि जिस युग में मैं हूं वह वही युग है जिसकी मुझे आस थी| बुझे मन से सिर झुकाए मैं खड़ा हूं, सोच रहा हूं: सारी पगार बेकार गंवा दी| पैसों का अफ़सोस नहीं| पर कब मैं बड़ा होऊंगा, कुछ अक़ल सीखूंगा? उस घुमंतू ने मेरे मन की बात मानो सुन ली, बोला: “तू बेकार में दुखी हो रहा है कि लैम्प को रगड़ नहीं पाया| बात यह है कि जब मैं उस बस्ती से गुज़र रहा था जहां तू रहता था तो तेरी मां ने यह लैम्प देखा था| तब तू पैदा भी नहीं हुआ था| कौन जाने उसने तब यह लैम्प छू लिया हो और यह मन्नत मांगी हो कि तू उस युग में ही पैदा हो जिसकी तुझे तमन्ना है|” चूंकि उसने मेरे मन की बात भांप ली थी इसलिए मैं मान गया कि मेरे सामने जादुई लैम्प ही था, कि मेरी मां ने ही उसे छूकर जिन्न को बुलाया था| मेरी मां व्यवहारकुशल भले ही नहीं थी, पर फैसला करने में ज़रा नहीं हिचकिचाती थी| मैं इसलिए यह कह रहा हूं कि अगर वह व्यवहारकुशल होती, यानी उसे मेरी खुशहाली का ख्याल होता तो शायद मेरे लिए कोई दूसरा युग चुनती| पर वह जानती थी कि लोगों की सच्ची खुशी इस संसार की चीज़ों से, इस दुनिया में माली खुशहाली से नहीं मिलती| इसीलिए उसने मेरे लिए वह युग चुना जिसमें, मेरे पाठको, हम और आप रह रहे हैं| मुझे इससे कोई गिला नहीं है, हालांकि मैं जो लिखता हूं वह अक्सर छपता नहीं है| ये कहानियां भी शायद ही मेरे जीते-जी छपें| बात यह है कि छापेखाने बने ही अभी कोई बहुत समय नहीं हुआ, इसलिए यह उम्मीद करना कि जो कुछ तुम लिखोगे वह हर हालत में छपेगा और छपना चाहिए – नासमझी ही है| इंसान के लिए, आदमजात के लिए और चिंताएं कम नहीं हैं... 

Monday, 11 November 2013

'आज जैसे हालात में ही पैदा हुए थे हिटलर'



हमारे पास देश और अंधी सियासत को देखने समझने का चश्मा नहीं है तो बीबीसी हिंदी डॉट कॉम में प्रकाशित प्रोफ़ेसर असमर बेग की यह टिप्पणी अवश्य पढ़ लेनी चाहिए। सब साफ साफ समझ में आजाएगा....


भारत में प्रजातंत्र आए 50 वर्ष से अधिक हो गए हैं लेकिन अभी भारतीय जनता की सोच पूरी तरह से प्रजातांत्रिक नहीं हो पाई है. प्रजातंत्र में राजनीतिक दल ही सबसे महत्वपूर्ण होते हैं और उन्हीं के बीच में राजनीतिक शक्ति के लिए प्रतिस्पर्धा होती है. लेकिन हम अब भी किसी ऐसे व्यक्तित्व की तलाश में रहते हैं जो राजनीतिक क्षेत्र में मार्गदर्शन प्रदान कर सके. राजनीतिक दलों के लीडर भी धीरे-धीरे निरंकुश प्रजातंत्रवादी हो गए हैं और वे अपने दल में किसी भी लीडर का क़द ऊपर नहीं उठने देते ताकि वह कभी भी उनके लिए एक चुनौती बनकर न उभरे. राजनीतिक दलों के पास भी आम तौर पर कोई ठोस राजनीतिक एजेंडा नहीं होता है और उसके अभाव में उनके पास किसी करिश्माई राजनेता को बढ़ावा देने के अलावा कोई चारा नहीं होता है. कभी-कभी किसी नेता में कुछ करिश्माई तत्व होते हैं और कभी-कभी उनके अभाव में उसके व्यक्तित्व में ज़बरदस्ती वो तत्व पैदा करने या दिखाने की कोशिश की जाती है. मुद्दों के अभाव में राजनेता ख़ुद ब ख़ुद महत्वपूर्ण हो जाते हैं. कुछ नेताओं के आभामंडल में कई बार मुख्य मुद्दों से ध्यान भटक जाता है. इस प्रक्रिया में मीडिया की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है. इन नेताओं को जोर शोर से पेश कर मीडिया का काम आसान हो जाता है. उन्हें मुद्दों की तलाश नहीं करनी पड़ती, न ही उनकी समझ पैदा करनी पड़ती है बल्कि उनकी पूरी ख़बरें नेताओं के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द घूमती हैं. इस प्रकार की ख़बरें बनाना भी आसान है और जनता जो इन ख़बरों को देखती और पढ़ती है, उसके लिए भी यह काफ़ी रोचक होती हैं. जब मीडिया का हमारे जीवन पर इस कदर नियंत्रण नहीं था, उस समय भारतीय राजनीति में इतना व्यक्तित्व वाद नहीं था. परन्तु आज मीडिया के इस दौर में लगभग सभी राजनीतिक दल पर्सनेलिटी कल्ट यानी अवतारवाद के शिकार हैं. आजकल जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं उन पर जो भी चर्चाएं हो रही हैं वो सभी वहां के नेताओं के आस-पास घूम रहीं हैं. ऐसा नहीं है कि उन राज्यों में मुद्दे नहीं हैं लेकिन उनमें किसी को कोई दिलचस्पी नहीं है. जो विपक्षी दल हैं वे भी नहीं चाहते कि राजनीतिक क्षेत्र में वास्तविक मुद्दों की चर्चा हो बल्कि वे चाहते हैं कि राजनीतिक खेल छद्म मुद्दों के मैदान में हो. यह सभी राजनीतिक दलों के हित में है. इस अवतारवाद की शुरुआत भारत में जवाहर लाल नेहरू से होती है, बाद में इंदिरा गांधी ने इसको बहुत बढ़ावा दिया और इसे एक कला का रूप दे दिया. उनके चाटुकारों ने तो यहां तक कह दिया, “इंदिरा ही इंडिया है और इंडिया ही इंदिरा है.” इंदिरा गांधी के दौर में उनका व्यक्तित्व भी कांग्रेस पार्टी पर छाया हुआ था. आज के दौर में इसका उदाहरण राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी हैं. कांग्रेस में भले ही कितने बड़े और ऊंचे क़दम वाले राजनेता हों लेकिन राहुल गांधी के सामने किसी और का क़द ऊंचा नहीं होने दिया जा सकता. किसी चुनावी जीत में उनकी कोई भूमिका हो या न हो लेकिन पार्टी के सभी लोग उसका श्रेय कांग्रेस उपाध्यक्ष को देते हैं. आज कांग्रेस जो भी करती है उसका श्रेय राहुल गांधी को मिलता है और बीजेपी जो भी करती है उसका श्रेय नरेंद्र मोदी को दिया जाता है. साफ है कि आज राजनीतिक दलों के नेताओं का क़द अपने दल से ऊँचा हो गया है. इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने इतना अच्छा काम किया है कि परन्तु उन्होंने अपने दल की अपेक्षा अपने क़द को इस प्रकार प्रचारित किया है कि उनके दल को उनके व्यक्तित्व से पहचाना जाता है. उनकी पार्टी जो कुछ भी करती है वह हर कार्य का श्रेय खुद ही ले लेते हैं और इस प्रकार पार्टी को या उसके किसी सदस्य को किसी कार्य का श्रेय नहीं मिलता. अतः उनकी पहचान पार्टी या उसके किसी भी नेता से अधिक उजागर हो जाती है. इस प्रकार का अवतारवाद किसी भी प्रजातंत्र के लिए अच्छा नहीं है. आने वाले समय में यह क्या रूप ले सकता है, उसकी मिसाल क्लिक करें नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व की जिस प्रकार से बेचा गया है, उसमें मिलती है. कांग्रेस और भाजपा के अलावा कई क्षेत्रीय पार्टियों में भी नेताओं को मुद्दों से बड़ा बना दिया जाता है
मोदी ने जिस प्रकार मीडिया और सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने व्यक्तित्व को बेचने में किया है वह एक शोध का विषय है. अभी हाल में गुजरात के गठन के 50 वर्ष पूरे होने पर वहां की राजधानी में एक समारोह आयोजित किया गया. वहां अगर कोई व्यक्ति दूसरे ग्रह से पहुंच जाता तो उसे ऐसा प्रतीत होता कि भारत वर्ष के प्रजातांत्रिक इतिहास में सबसे बड़े नेता नरेन्द्र मोदी रहे हैं और महात्मा गांधी और सरदार पटेल उनकी अपेक्षा बहुत छोटे कद के नेता गुज़रे हैं. यह उसी प्रकार की राजनीति है जो प्रजातंत्र को फासीवाद की ओर ले जाती है. इसी प्रकार के अवतारवाद की स्थापना जर्मनी में हिटलर ने और इटली में मुसोलिनी ने की थी. हमें इस प्रकार के अवतारवाद से सावधान रहना चाहिए क्योंकि जब किसी व्यक्तित्व का जादू हमारे मस्तिष्क पर छा जाता है तो उस समय हमारी सोचने समझने की शक्ति शिथिल पड़ जाती है और हम उस व्यक्तित्व के दास बन जाते हैं और हमें वही दिखाई और सुनाई देता है जो वह व्यक्ति दिखाना चाहता है. जर्मनी और इटली का इतिहास बताता है कि इस प्रकार की सोच हमारे लिए कितनी हानिकारक हो सकती है. (बीबीसी हिंदी से साभार)

Thursday, 7 November 2013

'सुई-नश्तर' के पाठकों की तलाश


जयप्रकाश त्रिपाठी

डमरू ने किताब लिख तो ली, छपवा भी ली, अब लोग उसे पढ़ेंगे कैसे, और उसके महान विचारों का पूरे दिग-दिगंत में हाहाकार कैसे मचेगा, इसी फेर में दुबला होते-होते सूख कर कांटा हुआ जा रहा है।
डमरू प्रसिद्ध होना चाहता है। प्रसिद्धि की भूख ने उसके रोजमर्रा की इतनी ऐसी तैसी कर रखी है कि चिंता से चश्मे का नंबर भी दुबरा गया। जेब में पैसा नहीं कि दूसरा नंबर ले ले।
पिछले कई वर्षों से वह फरवरी की सूखी सर्दियों में दिल्ली के पुस्तक मेले जरूर हो आता है। पिता रेलवे में अधिकारी थे। तुकबंदी करते थे। बचपन में उसे कविता का शोौक लगा गए।
धूमिल के मोचीराम को पढ़ने के बाद डमरू ने पहली कविता लिखी- सुई। दूसरी कविता का शीर्षक रखा- पत्ती (ब्लेड)। नश्तर लिख ही रहा था कि रात भर के जगे-अलसाये पिता की नजर पड़ गई उस पर। अच्छा, तो पढ़ाई-लिखाई छोड़कर कविताई हो रही है!
उसके कुछ माह बाद डमरू गांव-जवार के ठेठे मुहावरे जुटाने लगा। अच्छा-खासा संग्रह हो गया तैयार। आखिरी के पन्नों पर सुई-नश्तर वाली कविताएं भी। एक कवि-कुल-गुरू का शरणागत हुआ। आशीर्वाद के साथ आज्ञा मिली कि बस चटपट इसे छपा ही डालो।
अब छपाई के पैसे कहां से आएंगे! मम्मी का शरणागत हुआ। वात्सल्य प्रलाप के बाद वह भी जुगाड़ हो गया। टीटी पापा सप्ताह भर में एक सैकड़ा यात्रियों को मूस लाए। छप गई किताब।
इन दिनो डमरू को 'मुहावरेदार सुई-नश्तर' के पाठकों की बड़ी बेसब्री से तलाश है!