Wednesday, 17 July 2013

बहुभाषाभाषी साहित्य शिल्पी राम प्रसाद 'बिस्मिल'


राम प्रसाद 'बिस्मिल' भारत के महान क्रान्तिकारी व अग्रणी स्वतन्त्रता सेनानी, उच्च कोटि के कवि, शायर, अनुवादक, बहुभाषाभाषी, इतिहासकार व साहित्यकार थे जिन्होंने भारत की आजादी के लिये अपने प्राणों की आहुति दे दी। 'बिस्मिल' उनका उर्दू तखल्लुस (उपनाम) था जिसका हिन्दी में अर्थ होता है आत्मिक रूप से आहत। बिस्मिल के अतिरिक्त वे राम और अज्ञात के नाम से भी लेख व कवितायें लिखते थे। उन्होंने सन् १९१६ में १९ वर्ष की आयु में क्रान्तिकारी मार्ग में कदम रखा और ३० वर्ष की आयु में फाँसी चढ़ गये। ग्यारह वर्ष के क्रान्तिकारी जीवन में उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं जिनमें से ग्यारह उनके जीवन काल में प्रकाशित भी हुईं। ब्रिटिश सरकार ने उन सभी पुस्तकों को ज़ब्त कर लिया।
राम प्रसाद बिस्मिल ने कई महीने यहाँ के निर्जन जंगलों में घूमते हुए गाँव के गुर्जर लोगों की गाय भैंस चराईं। इसका बड़ा रोचक वर्णन उन्होंने अपनी आत्मकथा के द्वितीय खण्ड : स्वदेश प्रेम में किया है। यहीं रहकर उन्होंने अपना क्रान्तिकारी उपन्यास बोल्शेविकों की करतूत लिखा। वस्तुतः यह उपन्यास मूलरूप से बांग्ला भाषा में लिखित पुस्तक निहिलिस्ट-रहस्य का हिन्दी - अनुवाद है जिसकी भाषा और शैली दोनों ही बड़ी रोचक हैं। अरविन्द घोष की एक अति उत्तम बांग्ला पुस्तक यौगिक साधन का हिन्दी - अनुवाद भी उन्होंने भूमिगत रहते हुए ही किया था। उन्होंने १९१८ में प्रकाशित अँग्रेजी पुस्तक दि ग्रेण्डमदर ऑफ रसियन रिवोल्यूशन का हिन्दी - अनुवाद इतना अच्छा किया कि उनके सभी साथियों को यह पुस्तक बहुत पसन्द आयी। इस पुस्तक का नाम उन्होंने कैथेराइन रखा था। इतना ही नहीं, बिस्मिल ने सुशीलमाला सीरीज से कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित कीं थीं जिनमें मन की लहर नामक कविताओं का संग्रह, कैथेराइन या स्वाधीनता की देवी - कैथेराइन ब्रश्कोवस्की की संक्षिप्त जीवनी, स्वदेशी रंग व उपरोक्त बोल्शेविकों की करतूत नामक उपन्यास प्रमुख थे। स्वदेशी रंग के अतिरिक्त अन्य तीनों पुस्तकें आम पाठकों के लिये आजकल पुस्तकालयों में उपलब्ध हैं।
 क्रान्तिकारी पार्टी की ओर से १ जनवरी १९२५ को किसी गुमनाम जगह से प्रकाशित एवं २८ से ३१ जनवरी १९२५ के बीच समूचे हिन्दुस्तान के सभी प्रमुख स्थानों पर वितरित ४ पृष्ठ के पैम्फलेट "दि रिवोल्यूशनरी" में राम प्रसाद बिस्मिल ने विजय कुमार के छद्म नाम से अपने दल की विचार-धारा का लिखित रूप में खुलासा करते हुए साफ शब्दों में घोषित कर दिया था कि क्रान्तिकारी इस देश की शासन व्यवस्था में किस प्रकार का बदलाव करना चाहते हैं और इसके लिए वे क्या-क्या कर सकते हैं? केवल इतना ही नहीं, उन्होंने गान्धी जी की नीतियों का मजाक बनाते हुए यह प्रश्न भी किया था कि जो व्यक्ति स्वयं को आध्यात्मिक कहता है वह अँग्रेजों से खुलकर बात करने में डरता क्यों है? मरने से पूर्व आत्मकथा के रूप में वे एक ऐसी धरोहर हमें अवश्य सौंप गये जिसे आत्मसात् करके हिन्दुस्तान ही नहीं, सारी दुनिया में लोकतन्त्र की जड़ें मजबूत की जा सकती हैं। यद्यपि उनकी यह अद्भुत आत्मकथा आज इण्टरनेट पर मूल रूप से हिन्दी भाषा में भी उपलब्ध है। प्रताप प्रेस कानपुर से काकोरी के शहीद नामक पुस्तक के अन्दर जो आत्मकथा प्रकाशित हुई थी उसे ब्रिटिश सरकार ने न केवल जब्त किया अपितु अँग्रेजी भाषा में अनुवाद करवाकर समूचे हिन्दुस्तान की खुफिया पुलिस व जिला कलेक्टर्स को सरकारी टिप्पणियों के साथ भेजा भी था कि इसमें जो कुछ राम प्रसाद बिस्मिल ने लिखा है वह एक दम सत्य नहीं है। उसने सरकार पर जो आरोप लगाये गये हैं वे निराधार हैं।
भारतवर्ष को ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्त कराने में यूँ तो असंख्य वीरों ने अपना अमूल्य बलिदान दिया परन्तु राम प्रसाद बिस्मिल एक ऐसे अद्भुत क्रान्तिकारी थे जिन्होंने अत्यन्त निर्धन परिवार में जन्म लेकर साधारण शिक्षा के बावजूद असाधारण प्रतिभा और अखण्ड पुरुषार्थ के बल पर हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ के नाम से देशव्यापी संगठन खड़ा किया जिसमें एक - से - बढकर एक तेजस्वी व मनस्वी नवयुवक शामिल थे जो उनके एक इशारे पर इस देश की व्यवस्था में आमूल परिवर्तन कर सकते थे किन्तु अहिंसा की दुहाई देकर उन्हें एक-एक करके मिटाने का क्रूरतम षड्यन्त्र जिन लोगों ने किया उनके नाम का सिक्का आज पूरे भारत में चलता है।
वर्ष १९८५ में विज्ञान भवन नई दिल्ली में आयोजित भारत और विश्व साहित्य पर अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में एक भारतीय प्रतिनिधि ने अपने लेख के साथ पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल की कुछ लोकप्रिय कविताओं का द्विभाषिक काव्य रूपान्तर (हिन्दी-अंग्रेजी) में प्रस्तुत किया था जिसे उनकी पुस्तकों से साभार उद्धृत करके यहाँ दिया जा रहा है ताकि हिन्दी के पाठक भी उन रचनाओं का आनन्द ले सकें।
सरफरोशी की तमन्ना
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है?
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आस्माँ!
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है?
रहबरे-राहे-मुहब्बत! रह न जाना राह में,
लज्जते-सेहरा-नवर्दी दूरि-ए-मंजिल में है।
खींच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है।
अब न अगले वल्वले हैं और न अरमानों की भीड़,
एक मिट जाने की हसरत अब दिले-'बिस्मिल' में है ।
बिस्मिल की उपरोक्त गज़ल क्रान्तिकारी जेल से पुलिस की लारी में अदालत में जाते हुए, अदालत में मजिस्ट्रेट को चिढ़ाते हुए व अदालत से लौटकर वापस जेल आते हुए कोरस के रूप में गाया करते थे। बिस्मिल के बलिदान के बाद तो यह रचना सभी क्रान्तिकारियों का मन्त्र बन गयी। जितनी रचना यहाँ दी जा रही है वे लोग उतनी ही गाते थे।
जज्वये-शहीद
हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर,
हमको भी पाला था माँ-बाप ने दुःख सह-सह कर ,
वक्ते-रुख्सत उन्हें इतना भी न आये कह कर,
गोद में अश्क जो टपकें कभी रुख से बह कर ,
तिफ्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को !
अपनी किस्मत में अजल ही से सितम रक्खा था,
रंज रक्खा था मेहन रक्खी थी गम रक्खा था ,
किसको परवाह थी और किसमें ये दम रक्खा था,
हमने जब वादी-ए-ग़ुरबत में क़दम रक्खा था ,
दूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को !
अपना कुछ गम नहीं लेकिन ए ख़याल आता है,
मादरे-हिन्द पे कब तक ये जवाल आता है ,
कौमी-आज़ादी का कब हिन्द पे साल आता है,
कौम अपनी पे तो रह-रह के मलाल आता है ,
मुन्तजिर रहते हैं हम खाक में मिल जाने को !
नौजवानों! जो तबीयत में तुम्हारी खटके,
याद कर लेना कभी हमको भी भूले भटके ,
आपके अज्वे-वदन होवें जुदा कट-कट के,
और सद-चाक हो माता का कलेजा फटके ,
पर न माथे पे शिकन आये कसम खाने को !
एक परवाने का बहता है लहू नस-नस में,
अब तो खा बैठे हैं चित्तौड़ के गढ़ की कसमें ,
सरफ़रोशी की अदा होती हैं यूँ ही रस्में,
भाई खंजर से गले मिलते हैं सब आपस में ,
बहने तैयार चिताओं से लिपट जाने को !
सर फ़िदा करते हैं कुरबान जिगर करते हैं,
पास जो कुछ है वो माता की नजर करते हैं ,
खाना वीरान कहाँ देखिये घर करते हैं!
खुश रहो अहले-वतन! हम तो सफ़र करते हैं ,
जा के आबाद करेंगे किसी वीराने को !
नौजवानो ! यही मौका है उठो खुल खेलो,
खिदमते-कौम में जो आये वला सब झेलो ,
देश के वास्ते सब अपनी जबानी दे दो ,
फिर मिलेंगी न ये माता की दुआएँ ले लो ,
देखें कौन आता है ये फ़र्ज़ बजा लाने को ?
मुखम्मस में प्रत्येक बन्द या चरण ५-५ पंक्ति का होता है पहले चरण में एक-सी लयबद्धता होती है और बाद के सभी बन्द अन्तिम पंक्ति में उसी लय में आबद्ध होते रहते हैं।
बिस्मिल का यह उपरोक्त उर्दू मुखम्मस भी उन दिनों सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ करता था यह उनकी अद्भुत रचना है यह इतनी अधिक भावपूर्ण है कि लाहौर कान्स्पिरेसी केस के समय जब प्रेमदत्त नाम के एक कैदी ने अदालत में गाकर सुनायी थी तो श्रोता रो पडे थे। जज अपना फैसला तत्काल बदलने को मजबूर हो गया और उसने प्रेमदत्त की सजा उसी समय कम कर दी थी। अदालत में घटित इस घटना का उदाहरण भी इतिहास में दर्ज हो गया।
जिन्दगी का राज
चर्चा अपने क़त्ल का अब दुश्मनों के दिल में है,
देखना है ये तमाशा कौन सी मंजिल में है ?
कौम पर कुर्बान होना सीख लो ऐ हिन्दियो !
ज़िन्दगी का राज़े-मुज्मिर खंजरे-क़ातिल में है !
साहिले-मक़सूद पर ले चल खुदारा नाखुदा !
आज हिन्दुस्तान की कश्ती बड़ी मुश्किल में है !
दूर हो अब हिन्द से तारीकि-ए-बुग्जो-हसद ,
अब यही हसरत यही अरमाँ हमारे दिल में है !
बामे-रफअत पर चढ़ा दो देश पर होकर फना ,
'बिस्मिल' अब इतनी हविश बाकी हमारे दिल में है !
बिस्मिल की उपरोक्त गजल में जीवन का वास्तविक दर्शन निहित है शायद इसीलिये उन्होंने इसका नाम राजे मुज्मिर या जिन्दगी का राज मुजमिर (कहीं-कहीं यह भी मिलता है) दिया था। वास्तव में अपने लिये जीने वाले मरने के बाद विस्मृत हो जाते हैं पर दूसरों के लिये जीने वाले हमेशा-हमेशा के लिये अमर हो जाते हैं।
बिस्मिल की तड़प
मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या !
दिल की बर्वादी के बाद उनका पयाम आया तो क्या !
मिट गईं जब सब उम्मीदें मिट गए जब सब ख़याल ,
उस घड़ी गर नामावर लेकर पयाम आया तो क्या !
ऐ दिले-नादान मिट जा तू भी कू-ए-यार में ,
फिर मेरी नाकामियों के बाद काम आया तो क्या !
काश! अपनी जिंदगी में हम वो मंजर देखते ,
यूँ सरे-तुर्बत कोई महशर-खिराम आया तो क्या !
आख़िरी शब दीद के काबिल थी 'बिस्मिल' की तड़प ,
सुब्ह-दम कोई अगर बाला-ए-बाम आया तो क्या !
गोरखपुर जेल से चोरी छुपे बाहर भिजवायी गयी इस गजल में प्रतीकों के माध्यम से अपने साथियों को यह सन्देशा भेजा था कि अगर कुछ कर सकते हो तो जल्द कर लो वरना सिर्फ पछतावे के कुछ भी हाथ न आयेगा लेकिन इस बात का उन्हें मलाल ही रह गया कि उनकी पार्टी का कोई एक भी नवयुवक उनके पास उनका रिवाल्वर तक न पहुँचा सका। उनके अपने वतन शाहजहाँपुर के लोग भी इसमें भाग दौड के अलावा कुछ न कर पाये। बाद में इतिहासकारों ने न जाने क्या-क्या मन गढन्त लिख दिया।
बिस्मिल के साहित्य का अनुसन्धान व प्रकाशन
उन्होंने १९ वर्ष की आयु में क्रान्ति के कण्टकाकीर्ण मार्ग में प्रवेश किया और ३० वर्ष की आयु में कीर्तिशेष होने तक अपने जीवन के मूल्यवान ११ वर्ष देश को स्वतन्त्र कराने में लगा दिये। आज तक राम प्रसाद बिस्मिल की जो भी प्रामाणिक पुस्तकें पुस्तकालयों में उपलब्ध हैं, उनका विवरण इस प्रकार है:
    सरफरोशी की तमन्ना (भाग एक): क्रान्तिकारी बिस्मिल के सम्पूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व का लेखक द्वारा २५ अध्यायों में सन्दर्भ सहित समग्र मूल्यांकन।
    सरफरोशी की तमन्ना (भाग दो): अमर शहीद राम प्रसाद 'बिस्मिल' की २०० से अधिक जब्तशुदा आग्नेय कवितायें सन्दर्भ सूत्र व छन्द संकेत सहित।
    सरफरोशी की तमन्ना (भाग तीन): अमर शहीद राम प्रसाद 'बिस्मिल' की मूल आत्मकथा-निज जीवन की एक छटा, १९१६ में जब्त अमेरिका की स्वतन्त्रता का इतिहास, बिस्मिल द्वारा बाँग्ला से हिन्दी में अनूदित यौगिक साधन (मूल रचनाकार: अरविन्द घोष), तथा बिस्मिल द्वारा मूल अँग्रेजी से हिन्दी में लिखित संक्षिप्त जीवनी कैथेराइन या स्वाधीनता की देवी ।
    सरफरोशी की तमन्ना (भाग चार): क्रान्तिकारी जीवन (बिस्मिल के स्वयं के लेख तथा उनके व्यक्तित्व पर अन्य क्रान्तिकारियों के लेख)।
    क्रान्तिकारी बिस्मिल और उनकी शायरी संकलन/अनुवाद: 'क्रान्त'(भूमिका: डा० रामशरण गौड सचिव हिन्दी अकादमी दिल्ली) बिस्मिल की उर्दू कवितायें (देवनागरी लिपि में) उनके हिन्दी काव्यानुवाद सहित।
    बोल्शेविकों की करतूत: स्वतन्त्र भारत में प्रथम बार सन् २००६ में प्रकाशित रामप्रसाद 'बिस्मिल' का क्रान्तिकारी उपन्यास।
    मन की लहर: स्वतन्त्र भारत में प्रथम बार सन् २००६ में प्रकाशित रामप्रसाद 'बिस्मिल' की कविताओं का संकलन।
    क्रान्ति गीतांजलि: स्वतन्त्र भारत में प्रथम बार सन् २००६ में प्रकाशित रामप्रसाद 'बिस्मिल' की कविताओं का संकलन।
इनके अतिरिक्त रामप्रसाद 'बिस्मिल' की जिन अन्य पुस्तकों का विवरण मिलता है, उनके नाम इस प्रकार हैं-
    मैनपुरी षड्यन्त्र,
    स्वदेशी रंग,
    चीनी-षड्यन्त्र (चीन की राजक्रान्ति),
    तपोनिष्ठ अरविन्द की कैद-कहानी,
    अशफाक की याद में,
    सोनाखान के अमर शहीद-'वीरनारायण सिंह',
    जनरल जार्ज वाशिंगटन
    अमरीका कैसे स्वाधीन हुआ?

आंच : सूर्यपाल सिंह


बजरंग बिहारी तिवारी

सन् 1857 इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों, राजनीतिशास्त्रियों के साथ साहित्यकारों का भी प्रिय विषय रहा है. कई उपन्यास व तमाम कहानियां प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं. वरिष्ठ कथाकार सूर्यपाल सिंह का उपन्यास आंच इसी कड़ी को आगे बढ़ाने का काम करता है. सृजन की एक परंपरा में होते हुए भी आंच के सरोकार नए हैं.
अवध में अंग्रेजी राज कायम होना, नवाब वाजिद अली शाह की बेदखली, दिल्ली में बहादुरशाह जफर को बंदी बना कर रंगून भिजवाना उपन्यास के पूर्वपरिचित कथा-पड़ाव हैं. उपन्यास में दोनों चरित्रों को ऐसे पेश कि या गया है कि उनकी हालत करुणा उपजाती है. स्थापित साक्ष्यों को बरकरार रखना ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की शर्तों में शामिल है. पहले से ज्ञात घटनाक्रम सृजनात्मक कल्पना के अवसर क्षीण कर देते हैं. ऐसे में साहित्य और इतिहास की रचनाधर्मी संगति बना पाना खासा कठिन होता है. सूर्यपाल ने इसके लिए पूरी कोशिश की है. तथ्यों से छेड़छाड़ किए बगैर. उपन्यास में बद्री, हम्जा, ईमान और मौलवी फखरुद्दीन जैसे पात्र सूर्यपाल की ही सृष्टि हैं.
पर उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष बेगम हजरत महल का जीवन है. नवाब वाजिद अली शाह के अंतःपुर की इस अज्ञातकुल औरत के साथ उपन्यासकार ने भरसक न्याय किया है. तवायफों के एक कोठे की मालकिन अमामन को कहीं से एक लड़की मिली. उन्होंने उसे नाम दिया आयशा. कोठे की रस्म के मुताबिक नाचना-गाना सिखाया. उसकी आवाज और घुंघरू की लय नवाब के कानों तक पहुंची. शाही महल पर बुलावा हुआ. वाजिद अली उसकी कलादक्षता और खूबसूरती पर रीझ गए और नाम दिया महकपरी. नवाब ने उससे निकाह भी कर लिया.
फिर नाम बदला इफ्तिखारुन्निसा बेगम. कोठे से छूटी आयशा परीखाने में कैद हो गई. उसने बेगमों की ‘घाघरा पलटन’ बनाई. इफ्तिखारुन्निसा ने मल्लिका-ए-आलिया से वचन ले लिया कि नवाब नई शादी नहीं करेंगे. नवाब का मन फिर एक बांदी पर आया. मलिका से उन्हें अनुमति न मिली. खैर, इफ्तिखारुन्निसा ने नवाब के बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम पड़ा बिर्जीस कद्र. मां बनने के बाद इफ्तिखारुन्निसा को नया नाम मिला-हजरत महल. पहले ही महल से निकाली जा चुकीं हजरत महल ने परीखाने में वापसी से इनकार कर दिया. लखनऊ में विद्रोहियों और अंग्रेजी फौज में युद्ध चल पड़ा. पंचायत बैठी और हजरत महल की हिम्मत ने उनके बेटे बिर्जीस कद्र को गद्दीनशीन किया. नाबालिग बिर्जीस की संरक्षिका हजरत महल को बनाया गया. उन्होंने शासन अपने हाथ में लिया. अवध के सभी राजाओं और बागियों को इकट्ठा कर अंग्रेजी सेना को भरपूर टक्कर दी.
इस उपन्यास में सूचनाएं और विवरण खूब हैं. कई बार लगता है कि यह कोई कथा-कृति नहीं है. लेकिन उपन्यासकार कथा-अन्विति को फिर-फिर जोड़ देता है. आजमगढ़ से लेकर कानपुर तक हजरत महल की सघन सक्रियता आंच का प्राणतत्व है. अवाम के बीच से राजमहल तक पहुंची इस स्त्री का रेखांकन भारतीय इतिहास में युगांतर की सूचना है. हजरत महल की यह कहानी क्षेपक की तरह जोड़े गए पहले अध्याय ‘अथ जिज्ञासा’ की अनु नामक पात्र की जबानी पेश की गई है. नाना की बेटी, महिला सेना की प्रमुख नैना, स्वतंत्रता सेनानियों की मदद करने वाली अजीजन बाई, ऊदा देवी, झलकारी बाई, लक्ष्मी बाई आदि चरित्रों को जोड़ दें तो यह उपन्यास 1857 को स्त्री-दृष्टि से, स्त्री-चरित्रों के माध्यम से रचता है. (आजतक से साभार)

सच हुए सपने : रश्मि बंसल


हर ओर जब भ्रष्टाचार और स्वार्थ का शोर सुनाई दे रहा हो और हर दूसरी खबर किसी काले कारनामे से जुड़ी हो. ऐसे माहौल में इस किताब का हाथ में आना वाकई किसी सुखद एहसास से कम नहीं है. इसे पढऩे के बाद कहा जा सकता है कि उम्मीद अभी बाकी है. स्टे हंगरी स्टे फुलिश और करेक्ट द डॉट जैसी बेस्टसेलर किताबें लिखने वाली रश्मि बंसल की यह किताब उम्मीदें जगाने वाले 20 लोगों से रू-ब-रू कराती है. ये वे लोग हैं जिन्होंने सवा सौ करोड़ अन्य भारतीयों के विपरीत अपने कंफर्ट जोन से आगे बढ़कर कुछ करने की ठानी है. ये ऐसे 20 सामाजिक उद्यमी हैं जो हम आप में से ही हैं लेकिन ये किसी की व्यथा को देखकर उस पर दुख जताकर अपना फर्ज निभाने वाले नहीं हैं. उन्होंने जो सोचा उसी राह पर बढ़े और फिर पलटकर नहीं देखा. फिर चाहे राह में कितनी भी परेशनियां क्यों न आएं.
हमेशा से कहा जाता रहा है कि क्रांति सबसे पहले खुद से ही शुरू होती है. कुछ ऐसा ही सपने सच हुए में रश्मि बंसल ने भी कहा है. इस किताब को पढ़ते हुए नेपोलियन की बात दिमाग में दौड़ जाती है, ‘‘अगर आप चाहते हैं कि कोई चीज उत्कृष्ट तरीके से हो तो आप उसे खुद कीजिए.’’ सभी कहानियां यही बात चरितार्थ करती लगती हैं.
रश्मि ने किताब को इंटरेस्टिंग बनाने के लिए इसे तीन हिस्सों में बांटा है: मेघदूत, परिवर्तनकर्ता और दैवीय पूंजीपति. मेघदूत में शौचालय प्रसाधन क्रांति के जनक सुलभ इंटरनेशनल के बिंदेश्वर पाठक से शुरुआत की गई है. एक ब्राह्मण जिसने भारत में मैला ढोने वालों को उनके कार्यों से मुक्ति दिलाने में अहम भूमिका निभाई. बिंदेश्वर किताब में कहते हैं, ‘‘हम महसूस करते हैं कि वैश्वीकरण का लाभ निर्धन तक पहुंचे. यह काम दिमाग से नहीं, केवल दिल से हो सकता है.’’ इसी दिल की बात को सुनकर ही उन्होंने सुलभ इंटरनेशनल के जरिए एक क्रांति को जन्म दिया.
परिवर्तनकर्ता में सुपर-30 के आनंद कुमार एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने हजारों गरीब बच्चों का जीवन बदल कर रख दिया है. वे भारत की अंधेरी गलियों से नगीनों को खोजने और उन्हें तराशने के काम में लगे हैं. उनका कैंब्रिज में पढऩे का ख्वाब तो सच नहीं हो सका था लेकिन वे दूसरे छात्रों का जीवन बदल रहे हैं. किताब में वे कहते हैं, ‘‘मैं भागलपुर, नालंदा व गया के विद्यार्थियों की कह्नाएं मोबाइल फोन पर लेता.’’ छात्रों को फायदा पहुंचाने के उनके जज्बे का खुलासा इस बात से बखूबी जाहिर हो जाता है. इसी खंड में एक और नाम अरविंद केजरीवाल का है. जिन्होंने इन दिनों आम आदमी के हक में अपनी आवाज बुलंद कर रखी है और आए दिन नए खुलासों से भ्रष्टों का जीवन हलकान किए हुए हैं. उनका ख्वाब एक ऐसे सच्चे लोकतंत्र का है जहां एक साधारण आदमी को अपने मनमाफिक जीने का अधिकार हासिल हो.
देश में सूचना का अधिकार लागू होने का श्रेय भी इसी पूर्व आइआरएस अधिकारी को जाता है. वे युवा उद्यमियों को सलाह देते हैं, ‘‘जिस तरह हम अपने-अपने परिवारों की भलाई की जिम्मेदारी लेते हैं, उसी तरह हमें देश की भलाई की भी जिम्मेदारी लेनी चाहिए...प्रजातंत्र हमारी सक्रिय सहभागिता के बिना नहीं चल सकता. हमें सोचना होगा, वरना यह ढह जाएगा, और यह ढह ही तो रहा है.’’
इनके अलावा, कंजर्व इंडिया की अनीता आîजा, आविष्कार सोशल वेंचर फंड के विनीत राय, रंगसूत्र की सुष्मिता घोष, देसी क्रू की सलोनी मल्होत्रा, स्पीति इकोस्फीयर की इशिता खन्ना, सेल्को के हरीश हांडे, पीपल ट्री के संतोष पारुलेकर और प्रोजेक्ट चिलिका के दीनबंधु साî, बेलूर मठ के श्रीश जाधव, परिवार आश्रम के विनायक लोहानी जैसे कई लोगों की प्रेरणादायक कहानियों को रश्मि ने बखूबी अपनी कलम से पिरोया है. सच हुए सपने रश्मि बंसल की अंग्रेजी किताब आइ हैव अ ड्रीम का हिंदी अनुवाद है. हमेशा की तरह रश्मि ने एकदम सिंपल भाषा का इस्तेमाल किया है. अनुवाद में भी काफी हद तक अंग्रेजी की इसी पंरपरा को निभाने की कोशिश की गई है. हालांकि कुछ शब्द ऐसे हैं, जो कहीं अटकते हैं और आम पाठक के लिहाज से थोड़े मुश्किल हो जाते हैं.
उद्यमी और लेखिका रश्मि की पहली दो किताबों स्टे हंगरी स्टे फुलिश और करेक्ट द डॉट की पांच लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं और उसके दस से ज्यादा भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी हो चुके हैं. आइआइएम-अहमदाबाद से एमबीए रश्मि के लेखन में मुख्य स्वर युवाओं को प्रेरित करने का रहता है. इसलिए उन्हें यूथ ओरिएंटेड सब्जेक्ट्स की स्पेशलिस्ट भी माना जाता है.
अगर इस किताब के लिखने के उद्देश्य की बात करें तो साफ तौर पर युवाओं को मैं से निकालकर हम की संकल्पना से रू-ब-रू कराते हुए कथनी से ज्यादा करनी के लिए प्रेरित करना लगता है. रश्मि कहती हैं, ‘‘ये परिवर्तनशील लोग उद्यमियों की तरह सोचते हैं. ये लोग मैं के मायाजाल से निकलकर हम की अवधारणा पर अमल करने वाले हैं.’’
ये ऐसे लोग हैं जो मैनेजमेंट के सिद्धांतों और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से विश्व को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाने की कोशिशों में लगे हैं. वसुधैव कुटुंबकम् और कमजोरों को सशक्त बनाने की अवधारणा से लैस यह किताब युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत का काम तो कर ही सकती है, इसके अलावा हमारे समय के सामाजिक क्रांतिकारियों की हकीकत को भी बखूबी हमारे सामने पेश करने का काम करती है. (आजतक से साभार)

चुनिंदा बाल साहित्य

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ज्ञान-विज्ञान साहित्य
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इस बगीची में बार-बार



जयप्रकाश त्रिपाठी

महान होने की पाठशाला तो हर मन में खुली होती है, प्रश्न ये घेरे रहता है कि वह मन किस किस्म की महानता का कायल है, खुद के लिए तथा बाकी सबके लिए। वह रचना का क्षेत्र हो, राजनीति का, समाज के किसी भी पक्ष-विपक्ष का। महान हिटलर भी होना चाहता था। कातिल के महान होने के अभिप्राय और कविता की गुनगुनी पंक्तियों के अर्थ का जो अंतर हमारे जीवन और विचारों की राह सुझाता है, वही से हम अलग-अलग चल पड़ते हैं। यहां फेस बुक पर रोजाना जितने किस्म की सामग्रियां परोसी जाती हैं, एक दिन उन्हीं पर निगाह गड़ा लें तो कई चीजें स्वयं साफ होती चली जाती हैं। एक कामना तो सामान्यतः सभी किस्म की रचनाओं में अंतरनिहित होती है कि उसका ही परोसा हर कोई   सरपोटे, जैसा कि संभव नहीं रहता हैं। हमे कविताएं भी ललचाती हैं, क्षणिकाएं और बहुरंगी चित्र भी, जिस प्रस्तुति में, जिसके हिस्से की चासनी जितनी सघन होती है, वह उतना उसमें लिप्त हो लेता है। अपने हिस्से की मिठास लूट ले जाता है, दूसरे के हिस्से का कसैलापन छोड़ जाता है।
हर तरह की विचार विथिकाओं में, हर तरह के मंचों पर, समूहों में जीवन इसी तरह के विविध रंग लेकर उतरता है, डोलता-थिरकता है और शब्दों-संवादों का आदान-प्रदान हमे आह्लादित-आंदोलित करता रहता है। ये बातें प्रसंगवश हैं, अनायास नहीं। जैसे हम कविताओं की रेलमपेल मचाये रहते हैं, नरेंद्र मोदी का जिक्र होते ही लिखने के लिए बेकाबू हो लेते हैं, एक-दूसरे की वाह-वाह करते, बाकी को हाशिये का कीड़ा-मकोड़ा जानते हुए आगे सरक लेते हैं, यह चाल बड़ी संदिग्ध-सी लगती है लेकिन जिजीविषा का क्रंदन ब़ड़ा बेहया होता है, उसका ताप किसी को भी अपनी लक्ष्मण रेखा से यूं सलामत नहीं निकल जाने देता है, क्योकि उसका एक लक्ष्य होता है। स्वांतः सुखाय हो तो कोई बात ही नहीं। आप क्यों अपने किस्म-किस्म के चेहरों, वस्त्रों, परिस्थियों के बेढंगेपन सामूहिक रूप से यहां साझा करना चाहते हैं, बेतुके बलगम परोसते हुए अपना समय जाया करते रहते हैं, और किंचित अन्यों का भी।
खैर, सबका अपना-अपना मन, अपनी-अपनी जीवन जीने की कला, अपनी-अपनी आदत, जैसा जी में आये करे, उन्हें और कोई रोकने वाला होता कौन है, लेकिन सच को उसके चेहरे की रंगिमा-भंगिमा में उतर आने देना, सार्वजनिक हो लेने देना भी कोई अन्यथा का उपक्रम नहीं। टालस्टॉय और गोर्की हर समय उपन्यास और कहानियां ही नहीं  लिखते थे, न ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर के दुनियादार चौबीसो घंटे यहीं पर मंडराते रहते हैं। मनजौक भी हो, लेकिन दाल में नमक जैसी। सब लार-पोटा यही बरसा देने का इरादा इस मंच को भी अभिशप्त सा करने लगता है, शायद!    

Tuesday, 16 July 2013

जब फूट-फूट कर रोये थे हरिवंश राय बच्चन


जयप्रकाश त्रिपाठी

मैंने एक बार महाकवि हरिवंश राय बच्चन को सिसकियां भरते हुए देखा-सुना है तो उनकी एक मधुर आपबीती आंसुओं से सराबोर सुनी है हल्दीघाटी के रचनाकार श्यामनारायण पांडेय से।

उन दिनो मंचों पर पांडेय और बच्चन बड़े लोकप्रिय हुआ करते थे। साथ-साथ जाते थे। कालांतर में यह सिलसिला तब टूट गया था जब दोनो महाकवियों ने उम्र के दबाव में अपने-अपने जीवन के रास्ते मंचों से दूर कर लिये थे। पांडेय फिर भी उम्र के अंतिम पड़ाव  तक मंचों के निकट रहे लेकिन बच्चन अपने अभिनेता पुत्र के साथ हो लिये थे।

पांडेय जी के साथ मैं भी अक्सर कविमंचों पर जाया करता था। उनसे घरेलू परस्परता का भी अवसर मिला था, इसलिए वह मुझे अक्सर राह चलते, अपने घर में बैठे हुए, खेतों की मेड़ों पर टहलते हुए या सुदूर के सफर में अपने अतीत के रोचक-रोमांचक प्रसंग सुनाया करते थे।

एक दिन उन्होंने बच्चनजी के साथ की वह रोचक आपबीती कुछ इस तरह साझा की थी...

देवरिया में कविसम्मेलन हो रहा था। दोनो (बच्चन और पांडेय) मंचासीन थे। पहले बच्चनजी को काव्यपाठ करने अवसर मिला। उन्होंने कविता पढ़ी- ' महुआ के नीचे फूल झरे, महुआ....'।

उऩके बाद पांडेयजी ने काव्यपाठ के लिए जैसे ही माइक संभाला, बच्चनजी के लिए अत्यंत अप्रिय टिप्पणी बोल गये- 'अभी तक आप लोग गौनहरियों के गीत सुन रहे थे, अब कविता सुनिए...'

इतना सुनते ही बच्चनजी अत्यंत रुआंसे मन से मंच से उठकर अतिथिगृह चले गये। अपनी कविता समाप्त करने के बाद जब पांडेयजी माइक से हटे तो सबसे पहले उनकी निगाहें बच्चनजी को खोजन लगीं। वह मंच पर थे नहीं। अन्य कवि से उन्हें जानकारी मिली कि बच्चन जी तो आपकी टिप्पणी से दुखी होकर उसी समय मंच छोड़ गये। उसी क्षण पांडेय जी भी मंच से चले गये बच्चनजी के पास अतिथिगृह। जाड़े का मौसम था। बच्चनजी रजाई ओढ़ कर जोर-जोर से रोते हुए मिले। पांडेय जी समझ गये कि यह व्यथा उन्हीं की दी हुई है। बमुश्किल उन्होंने बच्चन जी को सहज किया। खुद पानी लाकर उनकर मुंह धोये। रो-रोकर आंखें सूज-सी गयी थीं।
 
बच्चनजी बोले- पांडेय मेरे इतने अच्छे गीत पर कवियों और श्रोताओं के सामने इतनी घटिया टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थे।

पांडेयजी के मन से वह टीस जीवन भर नहीं गयी। लगभग तीन दशक बाद उस दिन संस्मरण सुनाते हुए वह भी गमछे से अपनी भरी-भरी आंखें पोछने लगे थे।


पांडेय-बच्चन का दूसरा संस्मरण उस समय का जब अमिताभ बच्चन कुली फिल्म की शूटिंग के दौरान घायल हो गये थे। दो दिन पहले अस्पताल से अपने मुंबई स्थित आवास पर स्वास्थ्य लाभ के लिए लौटे थे।

मुंबई में जुहू-चौपाटी पर अखिल भारतीय कविसम्मेलन आयोजित किया गया था। पांडेयजी के साथ मैं भी गया था। कविसम्मेलन के अगले दिन होटल में कवियत्री माया गोविंद पांडेय जिसे मिलने पहुंचीं। उनका आग्रह था कि वह अपने मंचों के साथी बच्चनजी से अवश्य मिल लें। इस समय उनका बेटा घायल है। पांडेयजी अपने बूढ़े शरीर से लाचार थे। किसी तरह तो बंबई पहुंच पाये थे। वह जाने के कत्तई मूड में  नहीं थे। उन्होंने निर्विकार भाव से जाने से इनकार कर दिया। जिस समय माया गोविंद आग्रह कर रही थीं, अंदर-ही-अंदर मेरा भी मन बच्चनजी को देखने के लिए मचल उठा था। सो, इसलिए भी कि पांडयेजी से उनके संबंध में मैंने अनेकशः कथाएं सुन रखी थीं। पांडेय जी से आग्रह के बाद माया गोविंद एक-दो मिनट के लिए वहां से कहीं इधर-उधर हो गयीं। उसी बीच मैंने उनसे बच्चनजी से मिल लेने का यह कहते हुए आग्रह किया कि दोबारा आप का बंबई आना नहीं हो सकेगा। मायाजी ने कार का भी इंतजाम कर दिया है। पांडेय जी पता नहीं क्या सोचकर तुरंत चलने के लिए तैयार हो गये। इस बीच माया गोविंद भी आ गयीं।

दरअसल, माया गोविंद का मुख्य उद्देश्य कृष्ण-सुदामा में मुलाकात करना नहीं, अपने प्रवासी दामाद (जैसाकि उन्होंने बाद में विचलित होकर भेद खोल दिया था) को अमिताभ बच्चन के दर्शन कराना चाहती थीं।

बच्चनजी से तुरंत फोन पर उन्होंने संपर्क किया। तुरंत के लिए मुलाकात तय हो गयी। चटपट कार से पांडेयजी के साथ मैं, माया गोविंद और उनके दामाद अमिताभ बच्चन के घर पहुंचे। बच्चनजी खाना खा रहे थे। गेट के अंदर कार से उतरते ही बच्चनजी दायी हथेली पर जूठन लपटे पांडेय जी से लिपट गये। जूठन की भरपूर छाप पांडेयजी के जैकेट पर। उन्हें क्या पता! सब लोग बच्चनजी के पीछे-पीछे उनके ड्राइंग रूम में पहुंचे।

उस दौरान भी माया गोविंद की आंखें अचकचा-अचकचा कर अमिताभ के दर्शन के लिए बेचैन हो रही थीं। मैने उनके दामाद की विकलता का एहसास नहीं किया था। तब तक मुझे पता भी नहीं था कि साथ आये सज्जन उनके दामाद हैं। खैर, उस समय अमिताभ बच्चन अपने लान में स्थित छोटे से मंदिर में टंगा घंटा बजा कर पूजा कर रहे थे। मैंने बड़े गौर से देख लिया था कि वह हम लोगो के ड्राइंग रूम की ओर बढ़ते समय आहिस्ते से अपने शीशे की दीवारों के पार सीढ़ियों तक पहुंच कर अंदर जा चुके थे।

चाय-नाश्ते के दौरान माया गोविंद ने कई बार स्वयं उतावलेपन में बच्चनजी से अमिताभ तक पहुंचने की इच्छा जतायी लेकिन दोनो बुजुर्ग कविमित्र उन्हें अंत तक अनसुना करते रहे और बात इतने पर खत्म हो गयी कि 'अमिताभ अब ठीक है..'। मायाजी मन मसोस कर रह गयीं। शायद मैं भी। अमिताभ को देखने की ललक तो थी ही, लेकिन मेरे लिए बच्चनजी और पांडेयजी की मुलाकात ज्यादा सुखद और अकल्पनीय सी लग रही थी।

बाहर निकलते समय कार में बैठने से पहले बच्चनजी एक बार फिर एक अविस्मरणीय बात कहते हुए लिपट गये कि 'अच्छा तो पांडेय, चलो अब ऊपर ही मुलाकात होगी।' दोनो फिर आंखें भर कर खूब उदास हो गये थे। उस समय अमिताभ शीशे की दीवार के पीछे दुबके हुए से ये देखने की कोशिश कर रहे थे कि बाबूजी इतनी आत्मीयता से जिससे लिपट रहे हैं, वह आखिर है कौन!

उस दिन बच्चनजी ने पांडेयजी से अमिताभ बच्चन और अपने परिवार के संबंध में कई बातें साझा की थीं।

उनके और भी संस्मरण फिर कभी.......

बच्चों के लिए किस्से-कहानियां


ब्यूटी ऐंड द बीस्ट : एलेन टाइटलबॉम : एक दयालु और खूबसूरत नौकरानी कैसे एक राजकुमार को उसके डरावने रूप से आजाद कराती है, इस सीधी-सी कहानी को बेहद खूबसूरती से बुना गया है। यह एक साधारण परिवार की असाधारण कहानी है, जिसके जरिए बताया गया है कि बाहरी नहीं, मन की खूबसूरती ज्यादा मायने रखती है।

सिंड्रेला : मर्सिया ब्राउन : परियों की कहानियां हमेशा से बच्चों को कल्पना की एक खूबसूरत दुनिया की सैर कराती रही हैं। एक गरीब लड़की सिंड्रेला को सौतेली मां और बहन तंग करती रहती हैं। बाद में उसे एक राजकुमार मिलता है, जो उसे हमेशा खुश रखता है। यह कहानी बताती है कि सहनशीलता किस तरह बुरे वक्त को भी अच्छे वक्त में तब्दील कर देती है।

रॉबिनहुड : जे. वॉल्कर मैक स्पैडन - अमीरों को लूटकर गरीबों की मदद करनेवाले रॉबिन हुड के बारे में हम बचपन से सुनते आए हैं कि किस तरह नियम तोड़ने के बावजूद उसे एक हीरो के रूप में जाना जाता है। यह कहानी हमें सीख देती है कि अच्छे काम के लिए नियमों से परे भी जाना पड़े तो हिचकना नहीं चाहिए।

हंसेल ऐंड ग्रेटेल : ब्रदर्स ग्रिम : हंसेल और ग्रेटेल नाम के भाई-बहन को उनकी सौतेली मां गरीबी के हालात में जंगल में छोड़ आती है। वहां वे एक सुंदर-से कैसल में चले जाते हैं, जो एक चुड़ैल का होता है। इसके बाद दोनों बच्चे किस तरह तमाम मुश्किलों का सामना करते हैं, इससे मुसीबतों में हार न मानने का सबक मिलता है।

द स्लीपिंग ब्यूटी  : जूडी बेअर : सोती हुई लड़की यानी स्लीपिंग ब्यूटी, इसी कहानी से यह मुहावरा बना है। यह कहानी है कि एक राजकुमारी की, जो शाप की वजह से सोती ही रहती है। एक राजकुमार उसे आकर जगाता है और वह अपनी खुशहाल जिंदगी जीने लगती है।

अली बाबा ऐंड फोर्टी थीव्स : मैथ्यू के. मानिंग, रिकार्डो ओस्नाया : एक जवान पर्शियन लड़का खुद को खजाने से भरी गुफा में पाता है। यह खजाना 40 खूंखार चोरों का है। चोर अली बाबा के पीछे पड़ जाते हैं। कैसे तमाम मुसीबतें झेलता हुआ अली बाबा चोरों को छकाता जाता है, यह पढ़ना काफी दिलचस्प है। किताब में भरपूर रोमांच है।

लिटिल रेड राइडिंग हुड : एली ओ. रियान : रेड राइडिंग हुड की कहानी हमारे बचपन की पहली कहानी होती है। एक छोटी-सी बच्ची अपनी नानी से मिलने जाती है, जहां उसका इंतजार एक चालाक भेडि़या कर रहा होता है। एक लकड़हारा बच्ची को आकर बचाता है। कहानी में अनोखापन न होने के बावजूद बच्चों को इसमें एक तरह का अपनापन महसूस होता है।

द स्लीव्स ऐंड द शूमेकर : जेन स्मॉलफील्ड, ग्रैम स्मॉलफील्ड : एक गरीब और ईमानदार मोची रात में अपने घर के बाहर जूते बनाने का सामान रखता है। सुबह वहां कई जोड़े जूते तैयार रखे मिलते हैं। वह रात को छुपकर देखता है तो पता चलता है कि कुछ चमत्कारी बौने इस काम को अंजाम देते हैं। एक दिन उसकी पत्नी बौनों के लिए नए कपड़े और जूते बनाती है। वे नए कपड़े पहनकर चले जाते हैं और कभी नहीं लौटते।

अलादीन ऐंड द वंडरफुल लैंप : एस. लेन पूल : जादू से भरपूर कारनामों की कहानी है यह। इसमें मैजिक, मस्ती और मजा है। कहानी में अलादीन अपना जादुई चिराग घिसकर जिन्न को बुलाता है और उसकी मदद से तमाम अनोखे कारनामों को अंजाम देता है। यह जानने के लिए कि आगे क्या होगा, बच्चे इसे फटाफट पढ़ डालते हैं।

द फ्रॉग प्रिंसेस : बच्चों की कहानियों में शायद कोई लॉजिक नहीं होता। होता है तो बस ऐसा कुछ, जो बच्चे को पसंद आए और उसे अपने साथ बांध ले। ऐसा सब कुछ है इस कहानी में, जिसमें एक मेढक राजकुमारी के छूने से राजकुमार बन जाता है।

द वॉयेजिस ऑफ सिंदबाद : एन. जे. दाऊद - अरेबियन लोककथा है यह। ज्यादातर सभी लोगों ने सिंदबाद के किस्से कभी-न-कभी पढ़े या सुने होते हैं। समुदी रहस्य और रोमांच से भरपूर तमाम कथाओं को कई हिस्सों में निकाला गया है। समुदी यात्रा के दौरान सिंदबाद को होनेवाले अनुभवों को पढ़ते-पढ़ते बच्चों को महसूस होता है कि मानो वे खुद सैर पर निकल पड़े हैं।

द थ्री बेयर्स : पॉल गैल्टन : तीन भालुओं की कहानी है यह - मम्मी भालू, पापा भालू और बच्चा भालू। एक दिन उनके घर में एक अनजान लड़की आ जाती है, जिसे वे अपनी सेवा से काफी अहम महसूस कराते हैं। इसे पढ़ने में बच्चों को मजा तो आता ही है, साथ ही घर आए मेहमानों का वेलकम करने की सीख भी मिलती है।

हैरी पॉटर सीरीज : जे. के. राउलिंग : ब्रिटिश लेखिका राउलिंग ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि अपने बेटे के लिए जो कहानियां उन्होंने रचीं, वे एक दिन उन्हें दुनिया की सबसे रईस लेखिका बना देंगी। हैरी पॉटर सीरीा की कुल सात किताबें आ चुकी हैं। हर किताब बच्चों को जादू की दुनिया में ले जाती है। हैरी पॉटर नामक इस प्यारे-से बच्चे की हर कहानी में आखिर में बुरे पर अच्छाई की जीत होती है।

द क्रॉनिकल्स ऑफ नार्निया : सी. एस. लेविस : यह चार बच्चों की कहानी है, जो एक वॉर्डरॉब के जरिए 'लैंड ऑफ नार्निया' में पहुंच जाते हैं। यह एक बिल्कुल अलग दुनिया है। यहां एक चुड़ैल होती है, जो सबके दुख का कारण होती है। फैंटेसी से भरपूर यह किताब आखिर तक दिलचस्पी जगाए रखती है।