Friday, 12 July 2013

लेखक : नैतिकता और स्वप्न


वैभव सिंह (आलोचना में सर्वाधिक आधुनिक हस्तक्षेप करने वाले नये लेखक)

क्या यह प्रश्न ही गलत है कि लेखक की नैतिकता क्या है? क्या यह लेखन-विरोधी और सृजन विरोधी सवाल है, क्योंकि लेखक के बारे में बात करते समय हमें उसके सृजन को केंद्र में रखना चाहिए, न कि उसकी नैतिकता या अनैतिकता को। मोल करो तलवार का, पढ़ी रहन दो म्यान... वाले अंदाज में। खराब प्रश्न उठाने वाले को सबसे अहमक माना जाता है। खुद उनके लिये भी यह सवाल बड़ा अहमकाना है जो मानते हैं कि उनका मुख्य कर्म कविता, कहानी, उपन्यास या अन्य विधाओं में लेखन करना है। इस तरह के नैतिकता, विचार या विचारधारा संबंधी सवालों से उनकी एकाग्रता भंग होती है। जब यह किसी रचनात्मक समय पर खामोश आसमान, बादलों के उजले टुकड़ों, भीगी धूप, बारिश की बूंदों, मां की पीड़ाओं या अपनी प्रेमिकाओं के कष्टों के बारे में रूपक या बिंब सोच रहे हों तब इतना नीरस सा दिखने वाला सवाल उछालकर क्यों उसका ध्यान भंग किया जाए। यह तो रसभंग का पाप करने जैसा है। हो सकता है कि इस विषय पर कुछ रचनाओं की प्रतिक्रिया ठीक वैसी ही है जैसा कि शायर अकबर कह गए हैं -
अल्ला-अल्ला के सिवा आखिर रहा कुछ भी न याद
जो किया था याद, सब था भूल जाने के लिए।
यानी विचार, नैतिकता और उसूल के जो पहाड़े महाख्यानों, महापुरुषों की जीवनियों या संतों की वाणियों के माध्यम से रटाए गए थे, वे रचनाधर्मिता में बाधक समझ भुला दिए जाने ही आवश्यक थे। पर मस्तिष्क और संवादना मूल्यनिरपेक्षता की ऐसी स्थिति की स्वीकार करने के लिए भी कहां तैयार हो सकते हैं। शून्य में मौन रह सकता है, पर जहां शब्द और अभिव्यक्ति है वहां दिक्काल जन्म लेता है और वहीं मूल्यों का शून्य असंभव होता है। चेतना इतिहास के भीतर है और इतिहास बनता है मान्यताओं से। चेतना में शाश्वत निरपेक्षता का आकर्षण हो सकता है पर वह शाश्वत निरपेक्षता स्वयं में एक मूल्य और स्वप्न ही है, ठीक वैसे ही जैसे समाज से आसक्तिपूर्ण जुड़ाव, उसके सुख-दु:ख के साथ जीना अपने में मूल्य-स्वप्न है।
लिखना वह कौशल है जिसमें कल्पनाओं का विस्तार होता है। एक कल्पनाशील प्राणी ही लेखक या ज्ञान की खोज में भटकने वाला दार्शनिक-वैज्ञानिक बन सकता है। बाज वक्त कुछ लेखक केवल विद्वतापूर्ण बातों और तर्कों के बीच रहना चाहते हैं और कल्पनाशीलता के जोखम से खुद को अलग कर लेते हैं। वे ज्ञान की बातें करते हैं जो जरूरी होती है पर वे सृजनशीलता की यातनाओं से बचते हैं। इसलिए भी क्योंकि कल्पनाओं की दुनिया नैतिकता और अनैतिकता के दायरों से बाहर जाकर ही संभव होती है। उसमें अक्सर ही एलओसी (नियंत्रण रेखा) का उल्लंघन होता है और लेखक नामक निरीह प्राणी की जान भी खतरे में पड़ जाती है। अनुशासन तोडऩे के कारण मौत के फतवे, देशद्रोह कानून, देश निकाला जैसे दंड हैं। एक समाज लेखक पर क्रोध उतारकर वस्तुत: अपने ही विकास के रास्तों पर रोकता है। पर इनसे पहले सृजन वह कार्रवाई है जिसमें व्यक्ति अंतिम रूप से केवल स्वयं के प्रति जवाबदेह होता है क्योंकि सृजन सबसे पहले अपने लेखक पर प्रभाव डालता है। उसके हृदय की कोमलता को चीथता-निचोड़ता है और समाज-परिवार से उसके संबंधों को बदलता है। लेखन और उससे जुड़ी संवेदनशीलता की इसी गहराई पर पहुंचकर कभी मायकोवस्की ने आत्महत्या की होगी जिस पर बोरिस पास्तरनाक ने लिखा था : 'मुझे लगता है कि मायकोवस्की ने एक दर्प के तहत खुद को गोली मार ली थी, क्योंकि वह अपने भीतर और अपने चारों ओर किसी ऐसी चीज की भत्र्सना करता था जिसे सहना उसके आत्माभिमान के लिए गंवारा न था।' ये किन चीजों से एक लेखक का थर्रा देने वाला टकराव था, अघोषित मुठभेड़ थी, जिसने उसके आत्माभिमान को आहत कर दिया? पास्तरनाक ने भी संभवत: भत्र्सना के उन कारणों को नहीं समझा और हो सकता है कि उस आत्महत्या को केवल रूसी क्रांति के विरोध में जोड़कर आत्महत्या का ही विद्रूपीकरण किया हो। मायकोवस्की पूरे विश्व के प्रति संवेदनशील थे और उस विराट संवेदनशीलता की तह में प्रवेश करने की आवश्यकता है जहां से हम उस आत्महत्या के सच को खोज सके। कोई लेखक सृजनशीलता के लिए ईमानदारी से प्रतिबद्घ है तो वह आसपास की चीजों की भत्र्सना करने के लिए बाध्य हो जाता है। उसका अपने समय की भीतरी तहों में प्रवेश करना, नंगे सत्य से साक्षात्कार करना या अभिव्यक्ति की निरंतरता के लिए बाध्य हो जाता है। उसका अपने समय की भीतरी तहों में प्रवेश करना, नंग सत्य से साक्षात्कार करना या अभिव्यक्ति की निरंतरता उसे एसे स्थलों पर पहुंचा देती है जहां पर उसका जीवन ही उसके लिए बोझ बनता चला जाता है। हर तरफ ब्लेड की ऐसी चमकती धारें दिखती हैं जिन्हें अभी-अभी कागजों के पैकेट से निकाला गया है। उसके बरक्स वह अपना बचाव भी ठीक उसी सृजनशीलता में ढूंढता है जिसने उसकी संवेदनशीलता को आत्मघाती अवस्था में पहुंचा दिया है। उसे जब समाज की सारी मर्यादाबद्घता के पीछे ही कुटिलताएं, संघर्ष और स्वार्थ दिखने लगते हैं और उसकी ओर गिद्घ की तरह झपटते हैं, तब वह मूल्यों की शरण ढूंढता है या अपनी ही कृतियों की शरण। वह यह समझने की कोशिश करता है कि उसका लेखन उसे किस सीमा तक सुरक्षा का अहसास दिला सकता है। शायद इसी कारण जर्मन कवि रिल्के ने बढ़ती उम्र के दौर में लिखा था - 'मेरी अब तक प्रकाशित पुस्तकें मुझे सुरक्षा का भाव नहीं दे पाई हैं। हो सकता है, आगे दे पाएं।'
सारे लेखकों के लिए कृतियों की शरण ही अंतिम शरण नहीं बनती क्योंकि उसे और कई तरह के सहारे चाहिए होते हैं, जहां पहुंचकर वह जीवन की सार्थकता को ही नहीं बल्कि उसकी निरर्थकता के विभिन्न रूपों को अपनी आंखों से देखता रह सके। एरिक फ्राम ने प्रेम की परिभाषा करते हुए लिखा - 'प्रेम की हमारी जरूरत विलगाव की भावना और एकात्मकता द्वारा उससे उबरने की तीव्र इच्छा से जुड़ी होती है।' लगभग यही बात लेखन और लेखक पर लागू होती है जो सृजन में अलगाव की भावना से मुक्ति का प्रयास करता है। अपने भीतर की दुनिया को स्पष्टता प्रदान करने की कोशिश करता है। इसीलिए वह कई बार बुरा, गैरजिम्मेदार या असामान्य प्राणी भी बनता है। समाज में कई जुमले हैं - अच्छा आदमी, समझदार लोग, सफल इंसान, खानदानी परिवार आदि आदि। इसमें से अच्छा, समझदार, सफल या खानदानी जैसे शब्द किसी सच्चे लेखक के लिए ठीक ऐसे होते हैं जैसे ततैयों का झुंड किसी नंगी पीठ वाले इंसान के पीछे छोड़ दिया गया हो। उसके लिए परंपराओं, अनुशासनों और नियंत्रणों से लडऩा भी ठीक वैसे ही अनिवार्य होता है जैसे किसी कैदी को जेल छोडऩे से पहले वहां के सारे कपड़े और बर्तन छोड़कर आने पड़ते हैं। यहीं से अच्छे नागरिक और अच्छे लेखक के बीच द्वंद्व का आरंभ भी होता है जिसमें लेखक के पास अक्सर चुनाव सीमित होता है और उसका अच्छी नागरिकता से बार-बार विचलन होता रहता है। प्राय: कम अच्छे लोग अच्छा लेखन करते हैं और अधिक अच्छे लोग खराब लेखन। मीरा हो या मंटो किसी के पास इसका प्रमाण नहीं था कि वे अपने समय के शरीफ और अच्छे नागरिक हैं। शराफत के बाड़ों को लांघकर, लोकलाज त्याग कर ही उन्होंने साहित्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी या सही निर्वाह भी किया है। कथित नागरिक समाज ने मीरा को भी त्याग दिया और अक्सर ही मंटो को भी। लेखक का शब्द के प्रति दायित्व उसे हर क्षण सचेत करता है। वह शब्द को अपने साहस और कला-चेतना के बल पर मरने से बचाना चाहता है। केदारनाथ सिंह ने एक कविता में लिखा था - 'ठंड से नहीं मरते शब्द/वे मर जाते हैं साहस की कमी से।' यहां साहस के साथ अपने विचार, शब्द और निर्णयों के साथ खड़ा लेखक प्राय: अपने लिए नैतिकता का निर्माण भी करता है और यहीं से शुरू होती है उसकी अधिक कठिन लड़ाई। सामाजिक नैतिकता को छोड़ देना, उसका विरोध करना एक चरण होता है पर मुश्किल वहां से आती है जब उसके लिए नई नैतिकता का चुनाव करना भी उतना ही आवश्यक हो जाता है। वह शून्य में तैरने वाला परिंदा नहीं बन सकता बल्कि उसे भी मूल्यों की शाख पर आकर बैठना ही होता है। ताल्सताय ने एक स्थान पर लिखा है - 'उस दर्दनाक झूठ की पहचान बहुत जरूरी है जिसमें हर इंसान जी रहा है।' ताल्सताय की कृतियों में जीवन से चिपटे इन्हीं दर्दनाक झूठों की कहानियां हैं जो युद्घ और शांति, अन्ना कैरेनिना या द डेथ आफ इवान इलीच जैसी कृतियों में सामने आता है और बताया जाता है कि 1860 में ताल्सताय ने टीबी से पीडि़त होकर अपने भाई को तड़पते देखा था और उनके मन पर इसका बड़ा मर्मातक प्रभाव पड़ा था। उसी भीतरी रुदन के कारण उन्होंने इन कृतियों की रचना की थी। एक सत्य यह भी है कि दर्दनाक झूठ लेखक के द्वारा पहचाना जाता है, तभी वह नैतिकता और मूल्य के अगर चरण तक अपनी संवेदना को पहुंचा पाता है और उसकी संवेदना में गतिशीलता का जन्म होता है। संवेदना की यह गति और उसकी स्वच्छंदता अपने अराजक रूपों में भी उससे नए मूल्यों व नैतिकता की मांग करती हैं, उसे नए स्वप्नों को गढऩे और उसमें शामिल होने के लिए उकसाती है। उसका पलायन उसे संसारमुक्त नहीं करता है बल्कि अपने संसार से संबंधों को अधिक सार्थक तथा विस्तृत बना लेने के दबाबों से भी उसे गुजारता है।
यह सच है कि लेखक की हर इतिहास या देशकाल में समान भूमिका नहीं रही है। पुराने लेखक प्राय: वे थे जो राजाश्रयी दरबारी थे, या फिर फकीर, संत, उपदेशक अथवा घुमंतू संन्यासी। वे ठीक से अपने को लेखक या कलाकार भी नहीं मानते थे, जैसे की आज भी गांव में कुम्हार या शिल्पकार अपने को महान कलाकर्मी नहीं मानते हैं। प्राचीन यूनान के होमर जैसे लेखक अपने नायकों को देवताओं-दैत्यों से संघर्ष करते दिखाते थे। ट्राय युद्घ के बाद घर वापसी के लिए संघर्ष कर रहा ओडिसी का नायक ओडियस बार-बार यही पूछता है - 'किस देवता ने मेरा मार्ग अवरुद्घ कर रखा है?' फिर वह देवताओं और राक्षसों के जाल को काटकर जीवन को बचाता है। लेखक को तब केवल अपने नायक की जय-पराजय दिखाने की चिंता थी, जिससे लोगों में वीर पुरुषों पर विश्वास बना रहे। पर आज के लेखक के पास केवल नायक के सुख-दु:ख का नहीं बल्कि पूरे समाज का बोझ है और उसने इस सत्य का साक्षात्कार आधुनिक स्थितियों में ही किया है कि नायक की नियति पूरे समाज की नियति नहीं हो सकती है। महाकाव्यों का लेखन विज्ञान और प्रबोधन से पहले का है, इसलिए वह इन दोनों प्रवृत्तियों के विरुद्घ भी जाता है। आज का लेखक धर्म या सामंत के इशारों या उसके आश्रय में जीने की बाध्यता से मुक्त है और उसने फ्रेंच क्रांति, औद्योगिक क्रांति, रूसी क्रांति तथा आधुनिक भारतीय समाज निर्माण की प्रक्रिया से उपजे परिवर्तनों की परंपरा को आत्मसात किया और अपनी बदली हुई भूमिका का अनुभव भी किया है। धर्म या मनोरंजन तक लेखन को सीमित रखने की विवशता उसके आगे नहीं है पर इसी ने उसके दायित्व को बढ़ा भी दिया। इसीलिए नैतिकता और अपने लेखन की सामाजिक भूमिका के बारे में सचेत होना ऐतिहासिक रूप से तर्कसंगत और जरूरी भी लगता है। लेकिन इसी आधुनिकता ने उसे पहले से अधिक अंतद्र्वंद्व, व्यक्तित्व-विभाजन और अवसाद भी दिए हैं। इसी दौर में उसने मानवता के पक्ष में किए सबसे गंभीर वादों को चरमराकर टूटते भी देखा है। सबसे सभ्य कहलाने वाले यूरोप को विश्वयुद्घों में जघन्य हिंसा करते और सबसे आधुनिक कहलाने वाले अमेरिका को प्राचीन बर्बर समाज को लज्जित करने वाले प्रतिशोध लेते देखा है। लेखक के लिए नैतिकता और मूल्य का चयन करना ज्यादा चुनौतीपूर्ण कार्य भी बन गया और इस हताशा ने लेखकों को मूल्यहीनता की तरफ भी धकेला जहां सबसे अधिक उसे अपनी ही आत्मा से लहू रिसता हुआ नजर आया। उसने खुद को ऐसे भटकते हुए प्राणी के रूप में पाया है जिसकी दुनिया में अस्थिरता का कोई ओर-छोर नहीं है। उसकी अवस्था उस मोमबत्ती की लौ की तरह रही है जिसे अंधकार से ही नहीं बल्कि अंधकार को बढ़ाने वाली रोशनियों से भी अकेले ही लडऩा है। यानी लेखक अगर अपना खास विचार और नैतिकता को चुन लें तो भी उसके साथ उसका अकेलापन बढ़ जाता है। भाषा के भीतर की रहस्यमय और अपेक्षाकृत जटिल दुनिया में उसके प्रवेश ने उसे अर्थों के नए विराट विश्व के आगे खड़ा कर दिया जहां उसकी इंद्रियां, बोध और भावनाएं किन्हीं तूफानों का सामना करने लगती हैं और उसकी आवेगमयता उसके स्नायविक तंत्र की परीक्षाएं लेने लगती है। कुंअरनारायण ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था - 'प्रखर रचनात्मक प्रतिभा केवल अपने ही नहीं दूसरों के अनुभवों को भी आत्मसात करने में समर्थ होती है।' लेखक के लिए भीतर के संसार से बाहर निकलना, फिर भीतर लौटना और फिर बाहर आना एक पीड़ादायक पर आनंदपूर्ण क्रिया होती है जिसमें उसके लिए कई बार नैतिकता या विचारधारा के बाहरी तंत्र की तुलना में आत्म-निर्देशित विवेक ही उसका सबसे अच्छा दोस्त भी होता है। उसने जब खुद को भटकता हुआ व्यक्ति मान लिया, तभी उसे राह में पड़े हुए सत्य भी मिले।
लेखक के लिए प्रतिबद्घता के नए आधार और रूप भी सामने आए जिसमें मार्क्सवादी जनप्रतिबद्घता का भी विकल्प था। एक समय विश्व के हजारों छोटे-बड़े लेखकों ने इसके बल पर अपने लेखन और संवेदना को सार्थक बनाने के प्रयास किए। जनपक्षधरता ने उसे नैतिकता-बोध और यथार्थबोध तक पहुंचने में सहायता की। यथार्थ से उसके रिश्ते बनाए रखने में मदद की, हालांकि इसी दौर में लेखक से हमने कुछ ज्यादा बड़ी अपेक्षाएं करनी भी शुरू कर दीं। हमने उसकी कहानियों और उपन्यासों के पात्रों को कृत्रिम से रूप से क्रांतिकारी बनाने की मांग की। कई बार तो ऐसा हुआ कि किसी कहानी में अगर लेखक समाज के आम जनों की दारुण व लाचार स्थितियों को दिखा रहा हो तो हमने पूछा कि क्यों नहीं वह लेखक उन पात्रों को प्रतिरोध करता दिखाता है। क्यों उन्हें केवल अन्याय के हाथों पिसते दिखाया है, उससे लड़ते हुए नहीं। कविता-बिंब के रूप में हाथों का काम केवल प्रार्थना करना नहीं बल्कि शस्त्र थामना भी बताया गया है। ये मांगे इसलिए भी की गई ताकि पाठक के मन को कुछ तो सुकून मिले। गांव में किसी दलित स्त्री से बलात्कार का कथानक रचने वाले रचनाकार से हमने जानना चाहा कि क्यों नहीं वह कहानी में ही उस बलात्कार के प्रतिशोध को पूरा होते दिखाया है। इस मासूमियत भरे प्रश्न में इस पर ध्यान नहीं दिया गया कि उसी उस रचना की सफलता है कि वह यथार्थ को दिखाने के बाद पाटक के मन को इस तरह झकझोर दे कि वह पलटकर यह सवाल पर बैठे - इन स्थितियों का प्रतिवाद क्यों नहीं होता? वह कुछ बदलने के लिए बेचैन हो उठे। किसी कृति में अगर पात्रों का दु:ख और अकेलापन चमकता हुआ दिके तो भी यह प्रश्न पाठक के मन में पैदा करना लेखक की सफलता है कि ये दु:खी पात्र अपने दु:ख से लड़ते क्यों नहीं! क्यों वे अपने अकेलेपन की परिधि में जी रहे हैं! रचना की सफलता अन्याय-दु:ख का प्रतिवाद दिखाने में नहीं है बल्कि सच्चाई को इस तरह पेश करने में है ताकि पाठक खुद ही प्रतिवाद की नैतिक-राजनैतिक जरूरत का अनुभव करने लग जाए। यही रचना के सफल संप्रेषण का प्रमाण भी है। लेखकों पर बाहर से थोपी गई वैचारिक मांगों को दूसरा विस्तार लेखकों से अत्यधिक उद्दंड हो जाने की अपेक्षाओं के रूप में आया। लेखक को यह इलहाम सा हुआ कि वह किसी बड़े हिंदी समाज की आकांक्षाओं का प्रतीक है और उसे अधिक गर्जना-तर्जना के साथ कुछ मुद्दे उठाने हैं। तब उसके हाथ से क्रांति-सृजन का परचम फिसलने लगा और गले में दूसरों की कटी मुंडियां पहनने का शौक परवान चढऩे लगा। निजी निर्लज्जताएं किसी बड़े आप्तवचन की शक्ल में पत्रिकाओं के पन्ने पर उतरने लगीं। लेखक का काम सज्जन दिखना नहीं है पर उद्दंडता भी उसकी एकमात्र पहचान नहीं है। एक हिंदी लेखक ने अपनी समकालीन लेखिकाओं को 'छिनाल' बताकर अपनी उद्दंड मौलिकता का परिचय देना चाहा तो दूसरे से बयान दिया - मैं उद्दंड इसलिए हूं क्योंकि अन्याय का विरोध करना चाहता हूं। बाद में छिनाल बताने वाले लेखक कड़े प्रतिरोध के आगे झुकने पर म•ाबूर हुआ और क्षमायाचना करता देखा गया तो दूसरा लेखक यह समझने से चूक गया कि उद्दंता अन्याय का विरोध करने की एक विशेष शैली है, एकमात्र शैली नहीं। अन्याय का सतत रूप से विरोध करने के लिए कई शैलियों और कई तरीकों का सहारा लेना पड़ता है। अन्याय के विरोध की इन्हीं बहुविध शैलियों का प्रयोग लेखक का अपनी रचना में करना पड़ता है और जीवन में भी।
लेकिन बाद में इतिहास ने उसके आगे फिर से मुश्किलें खड़ी कर दीं। राजनीति ने उसे इन जनपक्षधरता के मूल्यों के साथ जोडऩे में सहायता तो की, पर जब वह राजनीति विश्व भर में स्वयं संकटग्रस्त हो गई तो लेखक को अनाथ-सा छोड़ गई। जैसे किसी को सुरक्षित नाव से उतारकर फिर से लहरों के हवाले कर दिया गया हो। अब हाल यह है कि लेखक जिस राजनीति को अपने लिए मूल्य-स्रोत के रूप में देखता था, वह विश्व में हाशिए पर जाने लगी और लेखक ऐसी अंतर्विरोधी दशा में पहुंच गया जहां लगभग सौ साल पुराने प्रश्न उसके सामने थे कि - 'किधर जाए'। गनीमत है कि इस बीच नई लोकतांत्रिक निष्ठाएं विकसित हुईं जिन्होंने लेखक से भी इसकी मांग की है कि वे इन निष्ठाओं को दृढ़ करने में समाज का हाथ बटाएं। लेखक के लिए यह स्थिति त्रासद भी है और सुखद भी। त्रासदी वहां है जहां नैतिकता-मूल्य के नाम पर लेखन का काम केवल समाज के किसी उद्देश्य में 'हाथ बंटाना' भर रह जाए और सुखद इस रूप में कि लेखन को वह किसी अध्यात्मवादी या आदर्शवादी भ्रमों से मुक्त रखकर किन्हीं नए बनते उदात्त लक्ष्यों के लिए समर्पित कर सकता है। लेखक के लिए यहां उजाला भी है और अंधेरा भी। वह स्वाधीनता पाता भी है और खोता भी। कह सकते हैं कि इस वातावरण में भी लेखक एक 'ट्विलाइट जोन' में जीने के लिए अभिशप्त हो जाता है जहां उसे निरंतर आत्म-संदेह की चुभन के साथ जीना है। वह निरंतर समाज के लिए प्रतिबद्घ है, साथ ही निरंतर सामाजिक क्रूरताओं के बीच खुद को अकेला भी पाता है। वह इस सत्य को भी जानता है कि जीवन केवल दु:खवाद नहीं है जैसा कि अस्तित्ववाद या बौद्घ धर्म बताता है। न ही केवल सुखवाद जिसका प्रचार आज का पूंजी पर आधारित उपभोक्तावाद करता है। मनुष्य केवल दु:ख से नहीं बना, और न केवल सुख से। वह दु:ख और सुख का सम्मिश्रण है और यही उसकी नियति है। ऐसी नियति जिसको देवताओं या दानवों के संसार की तुलना में गौरवान्वित करना कठिन है पर स्वीकार करना जरूरी है। वह स्वतंत्र होकर दुनिया को देखना चाहता है, उसकी संरचनाओं समझना चाहता है। पूर्ण स्वतंत्रता को हासिल कर नीत्शे के सुपरमैन की तरह बन जाना भी कई लेखकों का काम्य रहा है। पर संभवत: पूर्ण स्वतंत्रता जैसी किसी चीज का अस्तित्व नहीं होता है पर उसी को लेकर सबसे अधिक आकर्षण मन में मौजूद रहता है। उसकी निरंतर खोज अपने को लेकर भी है और अपने जीवन-मूल्यों की भी। अज्ञेय ने यह सवाल स्वयं अपने से इस अंदाज में पूछा था जैसे किसी दूसरे लेखक से पूछ रहे हो - 'क्या मेरा जीवन समाज में पहले से ही स्थापित और गौरवान्वित मूल्यों को और ज्यादा स्थापित करने के लिए तो नहीं है? अगर ऐसा है तो मेरा जीवन और लेखन दोनों ही व्यर्थ है।' किसने इस प्रश्न का किस प्रकार से उत्तर प्राप्त किया, यह अलग मसला है। महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई लेखक यह महसूस करे कि जो जीवन मूल्य पहले से ही समाद्दत हैं और समाज में स्थापित हैं, उनका पक्ष लेने का क्या लाभ है और उस लेखन का क्या औचित्य है जो इस उपक्रम में शामिल है। विद्रोह स्वयं में किसी बड़े नैतिकता-बौध से संचालित भाव होता है, हालांकि वह कई प्रकार की नैतिकताओं के विरोध में होने के कारण आम जन समाज के बीच कोई अनैतिक कर्म के रूप में भी देखा जाता है। इसलिए सामाजिक मूल्यों से लड़ता, उन्हें ललकारता और बदले में खुद भी कई तरह के घाव लेता इंसान स्वयं में अगर लेखक है तो उसकी नैतिकता कहीं से असंदिग्ध नहीं है। बल्कि उसकी नैतिकता ही सबसे ज्यादा संदेहमुक्त भी है। लेखक अगर निरंतर विकासमान है और ईमानदार भी, तो वह ऐसा शख्स है जिसे सीधा रास्ता नहीं बल्कि मोड़, घुमाव और ऊबडख़ाबड़ पथ से भरी जिंदगी ही मिलती है। यह नियति उसके किसी निजी मानसिक विक्षेप नहीं बल्कि लेखन के प्रति ईमानदारी से पैदा होती है क्योंकि लेखन का संबंध स्थायी ठिकाने बनाने से नहीं बल्कि यायावरी के अनुभवों को जीने से भी होता है। लेखन भीतर की किसी हाहाकारी अशांति से जन्म लेता है और किसी भी निर्वाण या चरम शांति के लक्ष्य को निरर्थक सिद्घ करता है।
लेखक की नियति अलग-अलग समाज में अलग भी होती है। भारत जैसे समाज में जहां भूख, दमन और अराजकता एक सामान्य यथार्थ है, वहां लेखक अधिक विश्वसनीय तभी दिखता है जब वह स्वयं कलम के माध्यम से इनसे जूझ रहा हो। स्वनामधन्य समीक्षक लेखकों के इस 'पैशन' के खिलाफ होते हैं और अक्सर लेखकों को इसके लिए दंडित करने के पक्ष में होते हैं। वे घोषित करते हैं कि संवेदनशील-विद्रोही लेखक हर सफल इंसान को खलनायक बताने की ज्यादती कर रहे हैं। वे ऊंचे आदर्शों की चोटी पर खड़े होकर बाकी दुनिया को छोटा समझने का स्वंग कर रहे हैं। ऐसे लेखकों से इसलिए भी खतरा है क्योंकि वे कई लोगों का चरित्र-हनन कर रहे हैं और सफल लोगों को पीड़ा प्रदान करने का सुख प्राप्त करना चाहते हैं। अक्सर ये घटिया जुमला भी उछाला जाता है कि जो लेखक साहित्य में निजी प्रतिशोध लेते हैं, इतिहास उनसे प्रतिशोध लेता है। यह बात करने वाले इस सच्चाई को नहीं पहचानना चाहते कि लेखक के पास केवल कलम ही है जिससे वह इस समाज के सच को लिख सकता है, जिसे कुछ लोग प्रतिशोध, बदला या हिंसा की कार्रवाई सिद्घ करने पर आमादा होते हैं ताकि लेखक को खामोश किया जा सके। ठीक वैसे ही जैसे कोई मौलवी या पादरी किसी धर्मग्रंथ के अपमान पर चीख-पुकार मचाते हैं। वे लेखक को किसी फालतू बोझ, बौराए घोड़े या पागल दार्शनिक की तरह पेश करना चाहते हैं। उनके लिए व्यापक स्तर पर पढ़ा जा रहा है, सराहा जा रहा और आदर प्राप्त कर रहा लेखक खतरा है और इसीलिए वे उसे 'व्यवस्था पर खतरा' बनाने की मुहिम छेड़ देते हैं। अंग्रेजी की उस पुरानी कहावत की तरह - गिव ए बैड नेम टु डाग बिफोर किलिंग इट। पर समाज में यदि भूख, बेईमानी, अवसारवाद हर तरफ फैला है तो लेखन के विषय और अभिव्यक्तियों में इन विषयों की छायाएं मौजूद रहनी ही चाहिए और उसके भीतर की कथित आध्यात्मिक हलचलें भी इनसे उदासीनता का व्यवहार करके किसी ठोस और भरोसेमंद दिशा में सक्रिय नहीं हो सकती हैं। कह सकते हैं कि लेखक की नैतिकता अंतत: केवल लेखक के भीतरी संस्कारों पर नहीं बल्कि समाज की वर्तमान दशा और संघर्षों पर निर्भर होती है। नैतिकता की दृष्टि से भयंकर रूप से स्खलित हो रहा समाज लेखक की नैतिकता को सहन नहीं कर पाता पर ऐसे ही समाज में लेखक की नैतिकता एक सर्वाधिक आवश्यक सामाजिक यथार्थ के रूप में सामने आनी चाहिए। समाज के यथार्थ से जुड़ाव ही काफी नहीं है, वरन लेखक को युग की नैतिक चिंताओं के साथ जुड़कर लेखकों के यथार्थ का भी निर्माण करना पड़ता है। लेखन का अर्थ केवल साहित्यिक लेखन तक संकीर्ण नहीं करना चाहिए, अपितु उसके विस्तृत रूपों तथा उनके ज्ञानमीमांसीय हस्तक्षेपों को भी नोटिस में लेना उतना ही अनिवार्य है। बीसवीं सदी की ज्ञानमीमांसा अपने विराट मानवतावादी सरोकारों से अनभिज्ञ नहीं रही है और उसका प्रभाव उसने ग्रहण भी किया और स्वीकारा भी। एरिक हाब्सबाम जैसे प्रसिद्घ इतिहासकार ने इतिहास लेखन को केवल आंकड़ेबाजी या तथ्यपरकता नहीं बल्कि उसकी ऐतिहासिक भूमिका के संदर्भ में ही देखा। कौन भूल सकता है उनका यह प्रसिद्घ वाक्य - 'मानवता को केवल न्युक्लियर फिजिक्स की खोजों से ही खतरा नहीं है बल्कि भ्रष्ट तथा खराब इतिहास लेखन भी मानवता के लिए विराट खतरा है। ऐसा खराब इतिहास लेखन नरसंहारों के लिए उकसाता है, क्रूसेड की नृशंसता से लेकर नाजी यातना शिविरों (आउशवित्स) को जायज ठहराता है। इसलिए मनुष्यता को इतिहास लेखन के कार्य को भी गंभीरता से लेना चाहिए।' यानी लेखन का स्वप्न और उसकी चिंताएं साहित्य से बाहर भी हैं और उनका महत्व कहीं से भी साहित्य की तुलना में गौण नहीं है। लेखन के बुनियादी लक्ष्य और सामाजिक चिंताएं उनके लिए भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जो साहित्येतर विधाओं और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में रचनात्मकता का परिचय दे रहे हैं।
लेखन की मन:स्थिति एक घुमंतू, व्यथासिक्त और किंचित अव्यवहारिकता के आकर्षण से बंधे व्यक्ति जैसी होती है। सहानुभूति, प्रेम और वासना को हर लेखक खुलकर जीना चाहता है और वही उसकी सृजनशीलता को शक्ति प्रदान करते हैं। दुनिया से वासना और आसक्ति भरा जुड़ाव ही किसी लेखक को प्रेरणा देता है। हालांकि लेखकों के लोकव्यवहार में प्रवीण होने की शिक्षा हमारी परंपरा में बड़ी मात्रा में उपस्थित है। वाल्मीकि, व्यास, तुलसी, सूर या बाद के रीतिकालीन कवि बड़े लोकव्यवहार के कुशल ज्ञाता प्रतीत होते हैं। कवियों या रचनाकारों की लोकव्यवहार के प्रति अनभिज्ञता, अथवा उनमें फक्कड़पन-मतवालेपन के प्रति जो खिंचाव है, उसे हिंदी के आदि समीक्षक रामचंद्र शुक्ल अच्छा नहीं मानते थे। उनका मानना था कि भारतीय परंपरा में फक्कड़पन या मतवालेपन का कोई स्थान नहीं है। यह ऐसी चीज है जो फारस के देशों में प्रचलित मद और प्याले की रूढिय़ों और उन रूढिय़ों को सूफी परंपरा में आत्मसात करने के नतीजे में हम तक पहुंची। उन्होंने राजशेखर के प्रसिद्घ ग्रंथ काव्यमीमांसा उदाहरण दिया है जिसमें कवियों के लक्षण गिनाते समय कहीं फक्कड़पन का जिक्र नहीं किया गया है। योरोप के बारे में वह लिखते हैं - 'योरोप में गेटे और वड्र्सवर्थ के समय तक मतवालेपन और फक्कड़पन की इस भावना का कवि और काव्य के साथ कोई नित्य संबंध नहीं समझा जाता था। जर्मन कवि गेटे बहुत ही व्यवहारकुशल राजनीतिज्ञ था, इसी प्रकार वड्र्सवर्थ भी लोकव्यवहार से अलग एक रिंद भी नहीं माना जाता था।' योरोप के समानांतर ही वह भारतीय साहित्य परंपरा में भी फक्कड़पन के अभाव को देखा है और लिखा - 'वाल्मीकी से लेकर भवभूति और पंडितराज तथा चंद से लेकर ठाकुर और पद्माकर तक कोई मद से झूमनेवाला, लोकव्यवहार से अनभिज्ञ या फक्कड़ नहीं माना गया।' पर स्वयं शुक्ल जी इस बात को नहीं समझ सके कि लोक व्यवहार के भीतर रहकर भी आधुनिक लेखकों-कवियों ने उसकी अमानवीयता को पहचाना है, उसके दंशों को झेला है। लोक-व्यवहार के साथ सामंजस्य का अभाव केवल उसके बारे में अनभिज्ञता को नहीं बल्कि लोक-व्यवहार को संवेदनशीलता से भोगने और उसके द्वारा दी पीड़ाओं को अपने चेतना पर सहने का परिणाम भी होता है। अराजक हो जाने की कामना और फक्कड़पन उसी समाज में लेकक को उपलब्ध हो सकता है जिसमें व्यक्ति को स्वायतता और स्वतंत्रता के लाभ प्राप्त होने लगे हैं। लेखक समाज के भीतर और उसके बाहर, एक साथ ही रहना चाहता है और अपनी प्रतिभा और कष्ट उठाने की क्षमता के बल पर वह इस कौशल को भी साध लेता है। उसका फक्कड़पन और समाज के साथ तादात्म्य, दोनों एक ही साथ संभव हो सकते हैं। स्वतंत्रता की विद्रोही आकांक्षा और समझौते की विवशता को वह एक ही क्षण में अपने भीतर अनुभव करता है और इस भयंकर अंतर्विरोध को समझ आत्महत्या से बचने के लिए अपनी संवेदनाओं को एडजस्ट भी करता है। लेखक की मुश्किल यह भी होती है कि वह सच के बहुविध रूपों को पहचानने लगता है और उन सभी से उसमें सहानुभूति भी रहती है। जैसे कि वह धर्म की निरर्थकता से परिचित होता है पर धर्म के प्रति सहानुभूति भी रखता है। वह मनुष्य और समाज द्वारा निर्मित की गई क्रूरताओं से विचलित होता है पर उसी मनुष्य-समाज को संवेदनशीलता से अपने भीतर आत्मसात भी करता है। वह संसार का चरम वासनापूर्ण प्राणी होता है पर संतों का वैराग्य भी अपने भीतर पालता है। वह सौंदर्य का दीवाना होता है पर सौंदर्य के फरेब से चौकन्ना भी रहता है। यानी लेखक इस दुनिया के सारे अंतर्विरोध को न केवल पहचानता है बल्कि उन अंतर्विरोधों को अपने भीतर जीता भी है। वह चूंकि निरंतर सोचने और लिखने की मनोदशा में होता है, इसीलिए वह बहुत कुछ जान लेने के आत्मविश्वास को हासिल कर लेता है। पर बहुत कुछ जान लेना ही उसकी मुसीबत बन जाता है क्योंकि उसके अंदर सृजनशीलता का सबसे अनिवार्य पहलू यह अहसास भी होता है कि वह कुछ नहीं जानता। जैसा कि विस्लोवा शिंबोस्की ने नोबल पुरस्कार के भाषण में कहा था कि दुनिया के कट्टर तानाशाह और उत्पीड़क लोग ही यह कहते हैं कि सब जानते हैं, जबकि कवि का काम बार-बार यह दोहराना है कि 'मैं नहीं जानता'। उन्हीं के शब्दों में - 'यह वजह है कि इस छोटे से कथन मैं नहीं जानती को मैं इतना ऊंचा स्थान देती हूं। यह हमारे जीवन को विस्तार देता है ताकि उसमें हमारे भीतर की खाली जगहें और वह बाहरी विराटता भी शामिल हो सके जिसमें हमारी यह छोटी सी धरती जाने कब से तैर रही है।'
कुछ न जानने का ऐलान, कुछ नया सीखने का उत्साह और कुछ नया करने का जोश हर लेखक का बुनियादी 'थ्रस्ट' बनना ही चाहिए। पर इसकी बड़ी बाधा वह तंत्र भी है जो लेखक को उसकी ईमानदारी से दूर करता है, उके अंत:करण को प्रलोभनों की ओर धकेलता है। लेखक पुरस्कारों या संस्थाओं को हथियाने की होड़ में खुद को पालतू, संपर्कवादी और अतिरिक्त सज्जनता के रोग से ग्रस्त होने के लिए तैयार होता जाता है। वास्तविकता यह भी है कि अगर आप अधिक पुरस्कृत हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि सच नहीं लिख रहे हैं। पुरस्कार-तंत्र अगर आप पर मेहरबान हैं तो इसका मतलब है कि आप फिलहाल अपनी ढेर सारी ईमानदारी दांव पर लगा चुके हैं। जुएं के खेल में लगाई गई सबसे कीमती वस्तु की तरह। लेखक को समाज लेखन के लिए पुरस्कृत या सम्मानित करे, वहीं तक ठीक है। पर वह अगर सम्मान-पुरस्कार के तंत्र को इस प्रकार गढ़े कि लेखन-विरोधी हो जाए या लेखक की कल्पना को सीमित करे तो ऐसे तंत्र से लेखक का संघर्ष ठीक उसी प्रकार से अनिवार्य हो जाता है, जैसे वह शेष समाज में फैली रुग्ण कल्पनाहीनता और यथास्थिति को स्वीकारने की मजबूरी से लडऩे में लेखन की सार्थकता देखता है। वह केवल अपने नहीं बल्कि पूरे समाज के अवचेतन के साथ संवाद करता है। अवचेतन की दुनिया पर लज्जित होने और उसे पर्दे में ढंकने वाली व्यवस्था से जूझता है। लेखक दुनिया का वह प्राणी है जिसे खुद को अक्सर स्वतंत्र रखना पड़ता है ताकि वह दुनिया के मन-मस्तिष्क पर छाई परतंत्रता की बेडिय़ों को झकझोर सके। लेखक किसी रूढ़ नैतिकता का दुश्मन होता है पर लेखक मानव-आत्मा की अनंत गहराइयों में झांककर नैतिकता की ध्वनियों को भी सुन सकता है। वह अंतत: उस मानव के लिए प्रतिबद्घ है जिसे अपने अस्तित्व के लिए रोज लडऩा होता है और मनुष्य का यह रोजमर्रा का, निहायत साधारण प्रतीत होता, अक्सर ही ऊबाऊ और कम गरिमावन तथा भव्य प्रतीत होता अस्तित्व का संघर्ष ही लेखक को आकृष्ट करता है और लेखक इस अति साधारण जीवन से जुड़कर असाधारण साहित्य की रचना करता है। वह इस संसार का ऐसा प्राणी है जिसमे कान लगाकर हर आहट को सुनने की उत्सुकता है। समर्थ लेखन के लिए समर्थ और सच्ची आवाजों का इंतजार है। वह लिखते समय कुछ कहता है पर बहुत कुछ सुनना भी उसे होता है लिखने से पहले। सर्वेश्वर की उन पंक्तियों की तरह -
अब मैं कुछ कहना नहीं चाहता
सुनना चाहता हूं
एक समर्थ सच्ची आवाज
यदि कहीं हो।
(पहल से साभार)

एरिक हाब्सबाम की चार किताबें




  • ‘क्रांतियों का युग’, ‘पूंजी का युग’, ‘साम्राज्य का युग’ और ‘अतिरेकों का युग’


जाने-माने मार्क्सवादी इतिहासकार एरिक हाब्सबाम दुनिया भर में अपनी चार किताबों की उस श्रृखंला के कारण विशेष तौर पर जाने जाते रहे हैं जिनमें पिछली करीब दो शताब्दियों का इतिहास वर्णित है। 1789 की महान फ्रांसीसी क्रांति से शुरू होने वाली और 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ समाप्त होने वाली यह श्रृखंला न केवल पूंजीवाद के इस काल के विकास को समेटती है अपितु इसमें समाजवादी क्रांतियों की पहली श्रृंखला का काल भी समाहित हैं। ‘क्रांतियों का युग’, ‘पूंजी का युग’, ‘साम्राज्य का युग’ और ‘अतिरेकों का युग’ नाम से प्रकाशित ये किताबें अभी हाल के बीते इतिहास के विकास का सामान्यीकरण करने का प्रयास करती है और किसी हद तक इसमें सफल भी होती हैं।
एरिक हाब्सबाम अपनी युवावस्था के शुरूआती दौर में ही इस विचारधारा की ओर आकर्षित हुए और ताजिंदगी इससे जुडे़ रहे। एरिक हाब्सबाम का अपना जीवन ही जो ‘अतिरेकों के युग’ का जीवन है, इस पूरे काल के पश्चिमी जगत की एक खास प्रवृत्ति का प्रतिनिधिक उदाहरण है। यह प्रवृत्ति है समाज विकास की प्रक्रिया को समझ लेना पर वास्तविक परिवर्तन, खासकर क्रांतिकारी परिवर्तन की प्रक्रिया से भयभीत होकर यथास्थिति को स्वीकार करने को ढुलक पड़ना। जब समूची पार्टियों के संदर्भ में यह बात होती है तो क्रांतिकारी पार्टियां सुधारवादी हो जाती है और जब व्यक्तियों के संदर्भ में यह बात होती है तो व्यक्ति यथास्थितिवादी हो जाते हैं। या सुधारवादी पार्टियों के समर्थक। वे क्रांतिकारी विचारधारा के केवल उस हिस्से तक स्वयं को सीमित कर लेते हैं जो वर्तमान समाज का विश्लेषण करते हैं और समाज बदलने के सक्रिय प्रयास वाले हिस्से से स्वयं को अलग कर लेते हैं। लेकिन क्रांतिकारी विचारधारा तो प्रथमतः समाज बदलने की विचारधारा है। इसलिए यह किनाराकशी स्वयं विश्लेषण को एकांगी और विकृत बना देती है।
जैसा कि बहुत अच्छी तरह कहा गया है क्रांति कोई लेख लिखने, कविता करने या दावत आयोजित करने जैसी चीज नहीं है। क्रांति का निर्मम चरित्र ढेरों लोगों को असहज या यहां तक कि भयभीत कर देता है। महान फ्रांसीसी क्रांति को ही लें जिससे एरिक हाब्सबाम ने अपनी ‘युग’ श्रृंखला की किताबों की शुरूआत की थी। इस क्रांति के जैकोबिन काल से, 1793-74 के काल से ज्यादातर इतिहासकार आज भी संगति नहीं बैठा पाये हैं। ज्यादातर पूंजीवादी इतिहासकार इन सवालों का जवाब मैक्सिमिलियन राब्सेपियरे की व्यक्तिगत तानाशाही की इच्छा और उसके कार्यान्वयन में देखते हैं। पर एक समूची क्रांति, पूंजीवादी क्रांतियों में सबसे संपूर्ण महान क्रांति, के एक महत्वपूर्ण काल को महज एक व्यक्ति की इच्छा का परिणाम घोषित कर देना कुछ भी स्पष्ट नहीं करता। यह तो इस व्याख्या के दीवालियेपन को ही दिखाता है। इस व्याख्या से हिंसा के प्रति, ‘आतंक’ के प्रति, ‘आतंक राज’ के प्रति व्यक्तिगत वितृष्णा तो प्रकट की जा सकती है पर इससे कोई ऐतिहासिक व्याख्या नहीं प्रस्तुत की जा सकती।
वास्तव में ‘आतंक का राज’ राब्सेपियरे के नेतृत्व में जैकोबिन काल फ्रांसीसी क्रांति के अपने नारों को व्यवहार में सचमुच उतारने का प्रयास था। फ्रांसीसी क्रांति स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व के नारे के तहत सम्पंन हुयी थी। लेकिन क्रांति के तीन साल बाद भी क्रांति के वास्तविक लड़ाकों, फ्रांस के गरीब लोगों ने पाया कि उन्हें न तो स्वतंत्रता मिली और समानता, बंधुत्व तो और भी दूर की बात थी। तब उन्होंने इन्हें व्यवहार मंे हासिल करने की कोशिश की, खासकर समता को। इसमें उनको नेतृत्व पूंजीपति वर्ग के निचले हिस्से ने जो अपने ऐतिहासिक भोलेपन मंे इन नारों के वास्तव मंे विश्वास करता था और उन्हें समाज में फलीभूत होे, देखना चाहता था। राब्सपियरे इन्हीं लोगों का नेता था।
लेकिन समूचा समाज अभी वहां नहीं खड़ा था जहां इन नारों को वास्तव में समाज में लागू किया जा सके। अभी क्रांति के द्वारा जो समाज जन्म ले रहा था वह औपचारिक तौर पर इन नारों की घोषणा कर सकता था। कानूनन अब सभी (सीमित संख्या में नागरिक) स्वतंत्र और समान थे पर वास्तव में नहीं। वस्तुतः जन्म ले रहा पूंजीवादी समाज भीषण असमानता को आगे लाने वाला था।
ऐसे में असंभव को संभव करने के प्रयास में भीषण मार-काट होनी ही थी। केवल भीषण मार-काट के बाद ही इस सपने को तब हकीकत में बदलने की अव्यवहार्यता साबित होनी थी।
लेकिन ‘आतंक का राज’ केवल इतना भर नहीं था। इसका एक और मतलब था। जैसा कि पूंजीपति वर्ग के समूचे इतिहास ने दिखाया है, पूंजीपति वर्ग स्वभावतः गैर क्रांतिकारी रहा है। अपने सबसे क्रांतिकारी क्षणों में भी इसने भीरूता और समझौता परस्ती का जमकर प्रदर्शन किया है। महान फ्रांसीसी क्रांति में भी ऐसा ही था। इस क्रांति में न केवल पूंजीपति वर्ग का ऊपरी हिस्सा, बड़ा वित्तीय और व्यापारिक वर्ग सामंती अभिजातों से समझौता करने को उत्सुक था बल्कि मध्यम पूंजीपति वर्ग भी। मीरोबो और लाफायते पहले के नेता थे तो जिरांेदे दल वाले दूसरे के। लुई सोलहवें को जिरोंदे दल वालों की अनिच्छा के बावजूद गिलोटिन पर चढ़ाया गया।
यदि पूंजीपति वर्ग के इन हिस्सों का बस चलता तो पुरानी सामंती शक्तियों से कोई समझौता हो जाता और क्रांति बीच मे छूट जाती। लेकिन एक तो बचे-खुचे अभिजात अभी भी अडि़यल थे (साथ ही क्रांति को कुचलने को आतुर यूरोपीय सामंत भी), दूसरे मेहनतकश जनता क्रांति को आगे ले जाना चाहती थी। क्रांति से उसे अभी बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ था। इस तरह मेहनतकश जनता- किसान, दस्तकार और मजदूर क्रांति को आगे ले गई और उसे उसके मुकाम तक पहुंचा। सामंती कूडे़-कचडे़ का ज्यादातर सफाया कर दिया गया और पुरातन यूरोपीय शक्तियों के साथ युद्ध में फ्रांस नामक राष्ट्र का जन्म हुआ। इस तरह यह हुआ कि पूंजीपति वर्ग की सबसे मुकम्मल क्रांति में भी पूंजीवादी क्रांति को उसकी इच्छा के विपरीत ठेल कर अंजाम तक पहुंचाया गया। यह जिस तरह हुआ उससे पूंजीपति वर्ग इतना भयभीत हुआ कि वह आज भी उसे ‘आतंक का राज’ के नाम से ही याद करता है।
एक इतिहासकार के तौर पर एरिक हाब्सबाम इस सबसे परिचित थे और उन्होंने ‘क्रांति के युग’ मे इसका वर्णन भी किया है। पर बात जब उनके अपने जमाने की समाजवादी क्रांति की आती तो वे उतने ही असहज और किसी हद तक भयभीत साबित हुये।
‘युग’ श्रृंखला की उनकी चार किताबों में अंतिम किताब- ‘अतिरेकों का युग’- ही कमजोर साबित होती है। इसमें हाब्सबाम उतना आश्वस्त इतिहासकार नहीं दीखते जितना पहले की तीन किताबों में।
अपनी पुस्तक ‘एज ऑफ एक्सट्रीम्स’ में एरिक लिखते हैं कि ’फासीवाद चरम साम्राज्यवादियों के हित में काम करता है, लेकिन जनता के सामने खुद को एक दुर्व्यवहार के शिकार राष्ट्र के झंडाबरदार के आवरण में पेश करता है और विक्षुब्ध राष्ट्रीय भावनाओं का दोहन करता है। बड़ी पूंजी किसी भी निजाम से नाता कायम कर सकती है, बस वह उसे हड़प कर जाने वाला नहीं होना चाहिए और वह उसके साथ नाता कायम करने के लिए तैयार हो जाए। कारोबार की दुनिया के लिए, अन्य निजामों के मुकाबले फासीवाद में कुछ बड़ी अच्छाइयां होती हैं। वह कारोबार की नजर में फासीवाद की विभिन्न ‘अच्छाइयों’ को गिनाते हैं, जिनमें मजदूर यूनियनों का खात्मा और वामपंथ का कमजोर या पराजित होना शामिल है। इसके बल पर ही 1930 के दशक  की महामंदी से उबरने के लिए बड़ी पूंजी के लिए असामान्य रूप से अनुकूल हालात बनाए जा सके थे। फासीवाद, जनता को सबसे भ्रष्ट तथा सबसे घटिया तत्वों के रहमोकरम पर लाकर रख देता है, लेकिन उसके  सामने एक ईमानदार तथा भ्रष्ट न हो सकने वाली सरकार का नारा पेश करता है। अवाम के गहरे मोहभंग का अनुमान कर, फासीवाद हरेक (स्थिति) की विशिष्टताओं के अनुरूप अपनी लफ्फाजी को ढालता है।’

इतिहास और उपन्यास


डॉ.शरद पगारे

उपन्यास जीवन की अभिव्यक्ति है। इतिहास अतीत के मानवीय क्रिया-कलापों का विश्लेषणात्मक लेखा-जोखा है। वह एक ऐसा आईना है जिसमें बीती हुई गतिविधियाँ और मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों की छवि जस-की-तस प्रस्तुत होती है। दोनों केन्द्र में मनुष्य है। दोनों उसका अध्ययन करते हैं। उपन्यास का क्षेत्र साहित्यिक होने से कल्पना के यथार्थ का समन्वय उपन्यास में देखा जा सकता है। जबकि इतिहास को यह स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है। वह पूर्णरूपेण सत्यों पर आधारित है। कल्पना के यथार्थ के लिये इतिहास में कोई गुंजाइश नहीं है। वह सत्य और केवल सत्य पर ही आधारित है। इन सत्यों का विश्लेशणात्मक अध्ययन करना ज़रूरी हो जाता है।
प्रत्येक देश का इतिहास शासकों राजा का है। प्रत्येक देश का इतिहास शासकों राजा-महाराजाओं और इतिहास पुरूषों को सामने रख कर ही लिखा गया है। आम आदमी के लिये उसमें जगह नहीं है। जबकि उपन्यास किसी भी पात्र को नायक-नायिका बनाकर लिखा जा सकता है। उपन्यास लेखन के लिये इतिहास पुरूष या नारी की आवश्यकता नहीं है। वस्तुत-कभी-कभी उपन्यासकार इतिहास के प्रेरणादायी व्यक्तियों को लेकर उपन्यास की रचना करते हैं। उन्हें वे ऐतिहासिक सत्यों के साथ कल्पना के यथार्थ की मिश्रण कर उसे रोचक और जीवंत बना देते हैं। उपन्यासकार को एक और छूट मिली हुई है - वह अपने पात्रों का मनोविश्लेषण और अन्तरद्वंद्व भी प्रस्तुत करता है। जबकि यह सहूलियत इतिहासकार को प्राप्त नहीं है। वह तो परिस्थितियों से प्रेरित और प्रभावित इतिहास के नायक-नायिकाओं पर समाज के पड़ने वाले प्रभावों का आलोचनात्मक मूल्याँकन करता है।
इतिहास के पास प्रचुर सामग्री है, जिसका उपयोग समय-समय पर साहित्यकार करते रहते हैं। अन्य देशों की तुलना में भारत के पास अमूल्य और विस्तृत ऐतिहासिक सामग्री है। मानव की आदिम सम्यता के जन्म से लेकर बीसवीं सदी तक भारतीय मनुष्य ने जो यात्रा की है उसका एक बड़ा दस्तावेज विरासत के रूप में हमारे पास है। इसके साथ ही भारतीय इतिहास की एक और विशेषता है, जहाँ उसके पास अखिल भारतीय सामग्री है वह आँचलिक और क्षेत्रीय इतिहास में भी लेखा-जोखा प्रचुर मात्रा में मिलता है। इसका उपयोग समय-समय पर साहित्यकारों ने किया है।
न केवल भारतीय साहित्यकारों ने अपितु यूरोप के उपन्यासकारों ने भी ऐतिहासिक सामग्री का भरपूर दोहन किया है। यूरोपीय उपन्यासकारों ने सुदूर ही नहीं निकट अतीत की घटनाओं और पात्रों से प्रेरित होकर उपन्यास लिखे हैं । विश्व प्रसिद्ध उपन्यासकार चार्ल्सडिकिन्स ने फ्रांस की क्रांति से प्रभावित होकर दो शहरों की कहानी टेल ऑफ टू सिरिज नामक चर्चित उपन्यास लिखा। फ्रांसीसी उपन्यासकार एलिक्जेंडर डूरमा का नार्ट्रिडम का कुबड़ा और इस्टीफेन ज्वींग के मेरी क्वीन ऑफ स्कॉट एवं मेरी एन्टारनेट विश्व प्रसिद्ध उपन्यास हैं। रूस के महान उपन्यासकार टॉलस्टॉय ने फ्रेंच सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट को नायक बनाकर युद्ध और शांति नामक बहुप्रशंसित उपन्यास लिखा। यूरोप के ऐतिहासिक उपन्यासों के नाम तो और भी प्रस्तुत किये जा सकते हैं परन्तु हम मूल विषय भारतीय इतिहास तक ही सीमित रहेंगे।
भारतीय उपन्यासकारों ने भी भारतीय इतिहास के पात्रों पर उपन्यास लिखे हैं। जैसा कि पूर्व में सूचित किया है, इस देश के इतिहास के पार बहमूल्य अकूत सामग्री है जिसका दोहन पूरी तरह से नहीं किया जा सका है। रांगेय राघव ने मोहन जोदड़ो के ऊपर उपन्यास लिखा। ईसा से भी 4 हज़ार वर्ष पूर्व सिन्धु घाटी की मोहन जोदड़ो और हड़प्पा की सम्यता का विकास हुआ था। यहाँ प्राप्त सामग्री और काल्पनिक यथार्थ के मिश्रण से मुर्दों का टीला नामक उपन्यास लिखा गया।
इतिहास के पास वास्तविक नायक-नायिकाएँ हैं। इतिहास में रहस्य, रोमांच, रोमांस और रूमानियत की बहुलता है। उसमें राजसी वैभव, विलास तथा शानो-शौकत की कमी नहीं है। मैगास्थनीज ने नन्द और मौर्य सम्राटों की जीवन शैली तथा राजप्रासाद का जो विवरण दिया है, वह अद्भुत है। उसने लिखा है कि मौर्य सम्राटों का राजप्रसाद वैभव में सुना, एक बटना और ग्रीक रोमन शासकों के राजमहलों को भी मात करता है। उसने पाटलीपुत्र के जनजीवन का भी विस्तुत वर्णन किया है। गुप्त साम्राट हर्षवर्धन के समय पर भी विस्तृत समग्री मिलती है। मुगलकालीन बाबर नामा, हुमायू नामा, आइने अकबरी मिलती है। अकबर नाम से मुगलों की शानऔ-शौकत का पता चलता है। साथ ही ईसा पूर्व की 6 ठी-शताब्दी से लेकर मराठा काल तक प्रेम कथायें बिखरी हुई है जिनका उपयोग उपन्यास लेखन के लिये किया जा सकता है।
एक इतिहासकार का तो कहना है कि कथाओं की अपेक्षा ऐतिहासिक विवरण अधिक मनोहारी और रोमांचक होते हैं। क्योंकि वे मानवीय महत्वाकाक्षांओं प्रेम जैसी संवेदनाओं और विलासी प्रवृत्ति के परिचायक है।
इतिहास की इस सामग्री का प्रचुर उपयोग गुजराती के महान उपन्यासकार कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने किया। उन्होंने गुजरात से और भारतीय इतिहास से सामग्री लेकर कालजयी उपन्यासों की रचना की है। इनमें बहुचर्चित बहुप्रशंसित और अनेक भारतीय, भाषाओं में अनुदित गुजरात के नाथ, जय सोमनाथ भारत का प्रमुख तथा राजाधिराज विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मेरा तो यह मानना है कि इस देश के प्रत्येक प्रांत के इतिहास में ऐसी ऐतिहासिक सामग्री है जिसका उपयोग उपन्यास लिखने में किया जा सकता है। बंगाल के प्रसिद्ध उपन्यासकार विमल मित्र ने भी निकट अतीत के इतिहास पर बहुचर्चित उपन्यास दिये है जिनमें ब़िकी कौड़ियों के मोल, साहब बीबी और गुलाम तथा इकाई-दहाई सैकड़ा प्रमुख है।
अमृतलाल नागर ने भी दक्षिण के एक ऐतिहासिक कथानक पर सुहाग के नूपुर उपन्यास प्रस्तुत प्रमुख है। दक्षिण के कर्नाटक में एक ऐतिहासिक प्रणय कथा 9 वीं शताब्दी में घटित हुई जिसमें मालवा के धार नरेश महाराज मुंज और कर्नाटक राजा तैलब की बहन राकुमारी मृणालवती के बीच का प्रेम प्रकरण है। मुंज को युद्ध में हराने के बाद तैलब उसे कर्नाटक ले आया और बन्दीगृह में डाल दिया। मृणालवती ने उससे भेंट की और यह भेंट प्यार में बदल गयी । इसका पता चलने पर तैलब ने मुंज की हत्या करवा दी। इस प्रकरण पर बहुत ही सुन्दर रोमांटिक और रोमांचक उपन्यास लिखे जाने की पूरी संभावना है।
वैदिककालीन राजा विश्वामित्र कौशिक का चरित्र अद्भुत है। उनकी जीवन रेखा में कई मोड़ दिखायी देते हैं। वे गाधीराज के पुत्र होने से क्षत्रिय थे परन्तु महर्षि वरिष्ट की लोकप्रियता और श्रेष्टता तपस्या के दौरान मेनका से उनका सम्बन्ध हुआ, जिससे शकुन्तला पैदा हुई। उसने महाराज दुष्यन्त से प्रेम विवाह किया। विश्वामित्र ने विश्वप्रसिद्ध गायत्री मंत्र की रचना की सत्यवादी हरीशचन्द्र की कठोर परीक्षा की। ययाति पुत्री माधवी से भी उनका सम्बन्ध हुआ। अपने तप के बल पर महाराज त्रिशंकु को सदेह स्वर्ग भिजवा दिया। भगवान राम का विवाह उन्होंने करवाया। अतः इस अद्भुत चरित्र पर उपन्यास लिखे जाने की अपार संभावना है।
गुजरात के इतिहास में ऐसी पात्र की जानकारी मिलती है जिस पर उपन्यास लिखने की असीम संभावना है। 4 वीं शताब्दी में महाराज रामकरण सिंह वघेला गुजरात के शासक थे । उनकी महारानी कमल देवी अपूर्व सुन्दरी थी। राजकुमारी देवलदेवी अपनी माँ से भी ज़्यादा सुन्दरी थी। दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात पर हमला किया। युद्ध में रामकरण सिंह वघेला हार गये। अपनी बेटी देवल देवी के साथ उन्होंने देवगिरी नरेश शंकर देव के यहाँ शरण ली। उधर कमल देवी हमलावरों के हाथ पड़ गई। उसे दिल्ली भेज दिया गया। अलाउद्दीन ने उसे हरम में दाख़िल कर लिया। कमल देवी केउकसाने पर अलाउद्दीन खिलजी ने देवगिरी एक सेना भेजी। मुसलमानों को आता देख रामकरण ने अपनी बेटी की शादी राजकुमार सिंघन से कर दी। देवल देवी के सौन्दर्य से प्रभावित सिंघना भी उससे शादी करना चाहता था। रिवाज के मुताबिक देवल देवी जब देवी की पूजा करने मंदिर जाने लगी तब रास्ते में मुस्लिम सेना ने उसका अपहरण कर उसका डोला दिल्ली भेज दिया । सुलतान ने उसके विवाह अपने बेटे खिपर खान के साथ कर दिया। मलिक काफूर के दबाव में आकर सुल्तान ने खिपर खान और देवल रानी को ग्वालियर के किले में क़ैद कर लिया और अपने बेटे खेपर खान को अन्धा कर उसकी हत्या कर दी। देवल देवेी को दिल्ली लाया गया और उससे सुल्तान ने शादी कर ली। सुलतान के दूसरे बेटे ने मलिक काफूर की हत्या कर देवल रानी से निकाह किया। कुछ दिन बाद मुबारक शाह के गुलाम ने उसकी भी हत्या कर दी और देवल रानी से निकाह कर लिया। दिल्ली की इन हत्याओं और षड़यंत्रों से नाराज़ होकर लाहौर के सूबेदार गाजी दुगलक ने उस गुलाम को मार दिया और तुगलक राज्य की स्थापना की। देवल रानी इतिहास के अँधेरे में खो गयी। देवल रानी-खिजरखान की प्रणय कथा पर अमीर खुसरो ने एक ग्रन्थ लिखा । देवल रानी की सुन्दरता उसके लिये अभिशाप बन गयी। उसकी माँ कमल देवी ने जो त्रासदी सृजित की उस पर ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की बहुत संभावना है। भारतीय इतिहास में इस प्रकार के अनेक पात्र मिलते हैं। उन पर ऐतिहासिक उपन्यास लिखे जा सकते हैं।
ऐतिहासिक उपन्यास एक काल खंड या समय में विशेष अभिव्यक्ति करता है। कोई भी उपन्यास मात्र नायक-नायिका को लेकर ही नहीं बुना जा सकता। उनके साथ ही उनसे संबधित पात्रों, तथा लोक जीवन के कुछ पुरूषों का उनसे समन्वय करना चाहिये। मूल कथा के साथ अन्तरकथाओं का बुनना ज़रूरी है। साथ ही समकालीन प्रकृति से भी उनका समन्वय होना चाहिये। एक कुशल लेखक प्रकृति के उतार चढ़ाव के माध्यम से पात्रों के मनोभावों का उदघाटन करते हैं। इतिहास का रोमांच और रहस्य कथा में रस घोलता है, उसे अतिरिक्त सौन्दर्य प्रदान करता है। आचार्य चतुर सेन शास्त्री का वैशाली की नगर बधू और वृंदावन लाल वर्मा की झांसी की रानी, मृगनयनी इसी श्रेणी के उपन्यास है। दुर्भाग्य से भारतीय इतिहास का जितना उपयोग करना चाहिये नहीं किया गया । विश्वास है कि भावी साहित्यकार और उपन्यासकार भारतीय इतिहास का समुचित उपयोग कर हिन्दी साहित्य को कालजयी उपन्यास देंगे।

सावधान, किताब


जर्मनी में एक ओर किताबों का कारोबार उफान पर तो प्रकाशन गृह भारी दबाव में. लोगों में किताबों के लिए प्रेम जगाने के लिए अभियान। जर्मन पुस्तक विक्रेता संघ के महानिदेशक अलेक्जांडर स्कीपिस का कहना है कि पिछले साल लोगों ने 9.6 अरब यूरो की किताबें खरीदी थीं और इस साल के पहले महीनों में पिछले साल के मुकाबले बिक्री करीब पौने दो प्रतिशत बढ़ी है. पिछले नौ साल से किताबों का कारोबार अच्छा चल रहा है, फिर भी भावी चुनौती से निबटने पर ध्यान दिया जा रहा है.
जर्मनी में किताबों के कारोबार की अच्छी संरचना है और लोगों में पढ़ने की आदत न सिर्फ बनी हुई है बल्कि बढ़ भी रही है. इस साल खासकर पर्यटन, कहानियां और सलाह वाली किताबों की मांग ज्यादा है. पर्यटन संबंधी किताबों की बिक्री साढ़े छह प्रतिशत बढ़ी है तो सलाह संबंधी किताबों की बिक्री में चार प्रतिशत की तेजी आई है. इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक किताबों की बिक्री भी धीरे धीरे बढ़ रही है. 2011 में कुल बिक्री में उसका हिस्सा सिर्फ एक प्रतिशत था जो 2012 में बढ़कर दो प्रतिशत हो गया. आंकड़े चौंकाने वाले हैं. 2012 में 16 लाख लोगों के पास ई-बुक पढ़ने की मशीन थी. एक साल पहले उनकी संख्या सिर्फ चार लाख थी.
लेकिन किताब की दुकानों की हालत उतनी अच्छी नहीं है. छोटी दुकानों को तो मुश्किल हो ही रही है, बड़े चेन को भी अपनी शाखाएं बंद करनी पड़ रही है. लोग किताबें पढ़ तो रहे हैं लेकिन उसे इंटरनेट में खरीद रहे हैं. सिर्फ एक चौथाई दुकानदार अच्छे कारोबार की उम्मीद कर रहे हैं, आधे से ज्यादा को सिर्फ औसत कारोबार की उम्मीद है. लोग फिर से दुकानों में आएं और वहां किताबें खरीदें, इसके लिए देश भर में फैली किताब बेचने वाली 5000 रिटेल दुकानों, होलसेलरों और प्रकाशनगृहों से संबंधित पुस्तक विक्रेता संघ ने एक अभियान शुरू किया जिसका नाम "सावधान, किताब" रखा. लक्ष्य था लोगों को किताब की ओर आकर्षित करना और पढ़ने के लिए उनमें फिर से उत्साह जगाना. पुस्तक विक्रेता संघ का इरादा एक तरह का आंदोलन शुरू करने का रहा जिसके केंद्र में किताब की दुकानें हों.
जर्मन प्रकाशन भी परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं. लेखक होने के लिए अब प्रकाशकों की जरूरत नहीं रह गई है. इंटरनेट के आने के बाद खुद अपनी किताबें प्रकाशित करने वालों की तादाद बढ़ रही है. लाइपजिग में अपने किताबों की खुद मार्केटिंग करने वाले लेखकों के लिए पुरस्कार का गठन किया गया है. पुरस्कार विजेता इना कोएर्नर ने अमेजोन ऑनलाइन पोर्टल के जरिए 2.99 यूरो के हिसाब से 70,000 प्रतियां बेची. अमेरिका में अमेजोन लेखकों को प्रकाशन की पूरी सुविधा दे रहा है और मुनाफे में भागीदारी भी दे रहा है. यह प्रकाशनगृहों से मिलने वाले रॉयल्टी से कहीं ज्यादा है. इससे ग्राहकों को सस्ती किताबें मिल रही हैं और लेखकों को ज्यादा रॉयल्टी लेकिन एक स्थापित बिजनेस मॉडल खतरे में है, जिसने कई सौ सालों तक साहित्यिक परीक्षण को संभव बनाया है. ज्यादा बिकने वाली किताबों की कमाई से प्रकाशनगृहों ने अच्छे साहित्य को भी बढ़ावा दिया है. सस्ता किताब खरीदने की खुशी इस चिंता के साथ जुड़ी है कि आधुनिक गोएथे, काफ्का या शरदचंद्र के लिए किताबों की नई दुनिया में कोई जगह नहीं रहेगी. (डीपीए, रॉयटर्स)

जब उस ई-बुक्स ने अमेरिकी बाजार में धूम मचा दी



                क्या है उस किताब की कहानी



  • इस पूरे प्रसंग को लिखने का उद्देश्य यह बताना था कि ई-बुक्स की बढ़ती लोकप्रियता और उसके फायदों के मद्देनजर यूरोप और अमेरिका में लेखकों ने ज्यादा लिखना शुरू कर दिया है। 


ईएल जेम्स की फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी यानी तीन किताबें- फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे, फिफ्टी शेड्स डार्कर, फिफ्टी शेड्स फ्रीड अमेरिका में प्रिंट और ई एडीशन दोनों श्रेणी में बेस्ट सेलर हैं। जेम्स की इन किताबों ने अमेरिका और यूरोप में इतनी धूम मचा दी कि कोई इस पर फिल्म बनाने लगा तो कोई उसके टेलीविजन अधिकार खरीदने लगा। फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी लिखे जाने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। टीवी की नौकरी छोड़कर पारिवारिक जीवन और बच्चों की परवरिश के बीच एरिका ने शौकिया तौर पर फैनफिक्शन नाम के वेबसाइट पर मास्टर ऑफ यूनिवर्स के नाम से एक सिरीज लिखना शुरू किया। एरिका ने पहले तो स्टीफन मेयर की कहानियों की तर्ज पर प्रेम कहानियां लिखना शुरू किया जो काफी लोकप्रिय हुआ। लोकप्रियता के दबाव और ई-रीडर्स की मांग पर उसे बार-बार लिखने को मजबूर होना पड़ा। इस तरह शौकिया लेखन पेशेवर लेखन में तब्दील हो गया।
पाठकों के दबाव में एरिका ने अपनी कहानियों का पुनर्लेखन किया और उसे फिर से ई-रीडर्स के लिए पेश कर दिया। पात्रों के नाम और कहानी के प्लॉट में बदलाव करके उसकी पहली किश्त वेबसाइट पर प्रकाशित हुई तो वह पूरे अमेरिका में वायरल बुखार की तरह फैल गई। चंद हफ्तों में एरिका लियोनॉर्ड का भी नाम बदल गया और वह बन गई ईएल जेम्स। उसकी इस लोकप्रियता को भुनाते हुए उसने ये ट्रायोलॉजी प्रकाशित करवा ली। इसके प्रकाशन के पहले ही प्री लांच बुकिंग से प्रकाशकों ने लाखों डॉलर कमाए। यह सब हुआ सिर्फ साल भर के अंदर। इस पूरे प्रसंग को लिखने का उद्देश्य यह बताना था कि ई-बुक्स की बढ़ती लोकप्रियता और उसके फायदों के मद्देनजर यूरोप और अमेरिका में लेखकों ने ज्यादा लिखना शुरू कर दिया है। उनकी पहली कोशिश यह होने लगी है कि वह अधीर ऐसे पाठकों की क्षुधा को शांत करें जो कि अपने प्रिय लेखक की कृतियां एक टच से या एक क्लिक से डाउनलोड कर पढ़ना चाहता है। ई-रीडिंग और ई-राइटिंग के पहले के दौर में लेखक साल में एक कृति की रचना कर लेते थे तो उसे बेहद सक्रिय लेखक माना जाता था। जॉन ग्रीशम जैसा लोकप्रिय लेखक भी साल में एक ही किताब लिखता था।
पाठकों को भी साल भर अपने प्रिय लेखकों की कृति का इंतजार रहता था। पुस्तक छपने की प्रक्रिया में भी वक्त लगता था। पहले लेखकों के लिखे को टाइप किया जाता फिर उसकी दो-तीन बार प्रूफरीडिंग होती थी। कवर डिजायन होता था। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि लेखन से लेकर पाठकों तक पहुंचने की प्रक्रिया में काफी वक्त लग जाता था। यह वह दौर था जब पाठकों और किताबों के बीच एक भावनात्मक रिश्ता होता था। पाठक जब एकांत में हाथ में लेकर किताब पढ़ता था तो किताब के स्पर्श से वह उस किताब के लेखक और उसके पात्रों से एक तादात्म्य बना लेता था। कई बार तो लेखक और पाठक के बीच का भावनात्मक रिश्ता इतना मजबूत होता था कि पाठक वर्षो तक अपने प्रिय लेखक की कृति के इंतजार में बैठा रहता था और जब उसकी कोई किताब बाजार में आती थी तो उसे वह हाथों हाथ खरीद लेता था, लेकिन वक्त बदला, स्टाइल बदला, लेखन और प्रकाशन की प्रक्रिया बदली। अब तो ई-लेखन का दौर आ गया है। ई-लेखन और ई-पाठक के इस दौर में पाठकों की रुचि में आधारभूत बदलाव देखने को मिल रहा है। पश्चिम के देशों में पाठकों की रुचि में इस बदलाव को रेखांकित किया जा सकता है। अब तो इंटरनेट के दौर में पाठकों का लेखकों से भावनात्मक संबंध की बजाय सीधा संवाद संभव हो गया है। लेखक ऑनलाइन रहते हैं तो पाठकों के साथ बातें भी करते हैं। ट्विटर पर सवालों के जवाब देते हैं। फेसबुक पर अपना स्टेटस अपडेट करते हैं।
ईएल जेम्स की सुपरहिट ट्रायोलॉजी तो पाठकों के संवाद और सलाह का ही नतीजा है। दरअसल हमारे या विश्व के अन्य देशों के समाज में जो इंटरनेट पीढ़ी सामने आ रही है उनके पास धैर्य की कमी है। कह सकते हैं कि वह सब कुछ इंस्टैंट चाहते हैं। उनको लगता है कि इंतजार का विकल्प समय की बर्बादी है। अमेजोन या किंडल पर किताबें पढ़ने वाला यह पाठक समुदाय बस एक क्लिक या एक टच पर अपने पसंदीदा लेखक की नई कृति चाहता है। इससे लेखकों पर जो दबाव बना है उसका नतीजा यह है कि बड़े से बड़ा लेखक अब साल में कई कृतियों की रचना करने लगा है। कई बड़े लेखक तो साल में दर्जनभर से ज्यादा किताबें लिखने लगे है, जो कि ई-रीडिंग और ई-राइटिंग के दौर के पहले असंभव हुआ करता था। जेम्स पैटरसन जैसे बड़े लेखकों की रचनाओं में बढ़ोतरी साफ देखी की जा सकती है। पिछले साल पैटरसन ने बारह किताबें लिखी और एक सहलेखक के साथ यानी कुल तेरह किताबें। एक अनुमान के मुताबिक अगर पैटरसन के लेखन की रफ्तार कायम रही तो इस साल वह तेरह किताबें अकेले लिख ले जाएंगें। पैटरसन की साल भर में इतनी किताबें बाजार में आने के बावजूद ई-पाठकों और सामान्य पाठकों के बीच उनका आकर्षण कम नहीं हुआ है, बल्कि उनकी लोकप्रियता में और इजाफा ही हुआ है, लेकिन जेम्स पैटरसन की इस रफ्तार से कई साथी लेखक सदमे में हैं।
ई-रीडर्स की बढ़ती तादाद का फायदा प्रकाशक भी उठाना चाहते हैं, लिहाजा वह भी लेखकों पर ज्यादा से ज्यादा लिखने का दबाव बनाते हैं। प्रकाशकों को लगता है कि जो भी लेखक इंटरनेट की दुनिया में जितना ज्यादा चर्चित होगा वह उतना ही बड़ा स्टार होगा। जिसके नाम को किताबों की दुनिया में भुनाकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है। इसके मद्देनजर प्रकाशकों ने अपनी तरह एक अलग ही रणनीति भी बनाई हुई है। अगर किसी बड़े लेखक की कोई अहम कृति प्रकाशित होने वाली होती है तो प्रकाशक लेखकों से आग्रह कर पुस्तक प्रकाशन के पहले ई-रीडर्स के लिए छोटी छोटी कहानियां लिखवाते हैं। जो कि सिर्फ डिजिटल फॉर्मेट में ही उपलब्ध होता है। इसका फायदा यह होता है कि छोटी कहानियों की लोकप्रियता से लेखक के पक्ष में एक माहौल बनता है और उसकी आगामी कृति के लिए पाठकवर्ग में एक उत्सुकता पैदा होती है। जब वह उत्सुकता अपने चरम पर होती है तो प्रकाशक बाजार में उक्त लेखक की किताब पेश कर देता है। उत्सुकता के उस माहौल का फायदा परोक्ष रूप से प्रकाशकों को होता है और वह मालामाल हो जाता है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है, क्योंकि कारोबार करने वाले अपने फायदे की रणनीति बनाते ही रहते हैं। मशहूर और बेहद लोकप्रिय ब्रिटिश थ्रिलर लेखक ली चाइल्ड ने भी अपने उपन्यास के पहले कई छोटी-छोटी कहानियां सिर्फ डिजिटल फॉर्मेट में लिखी। उन्होंने साफ तौर पर माना कि ये कहानियां वह अपने आगामी उपन्यास के लिए पाठकों के बीच एक उत्सुकता का माहौल बनाने के लिए लिख रहे हैं। इससे साफ पता चलता है कि प्रकाशक के साथ-साथ अब लेखक भी ज्यादा से ज्यादा लिखकर खुद को कारोबारी रणनीति का हिस्सा बना रहे हैं। चाइल्ड ने माना है कि पश्चिम की दुनिया में सभी लेखक कमोबेश ऐसा ही कर रहे हैं और उनके मुताबिक दौड़ में बने रहने के लिए ऐसा करना बेहद जरूरी भी है। इन स्थितियों की तुलना में अगर हम हिंदी लेखकों की बात करें तो उनमें से कई वरिष्ठ लेखकों को अब भी सोशल नेटवर्किग साइट्स से परहेज है। उनकी अपनी कोई वेबसाइट नहीं है। दो-चार प्रकाशकों को छोड़ दें तो हिंदी के प्रकाशकों की भी कोई वेबसाइट अभी तक नहीं है। हिंदी के वरिष्ठ लेखक अब भी फेसबुक और ट्विटर से परहेज करते नजर आते हैं। नतीजा यह कि हिंदी में लेखकों पर अब भी पाठकों का कोई दबाव नहीं और वह अपनी धीमी रफ्तार से लेखन करते आ रहे हैं। हालांकि वह रोना यही रोते हैं कि पाठक नहीं हैं। वक्त के साथ अगर नहीं चलेंगे तो वक्त भी आपका इंतजार नहीं करेगा और आगे निकल जाएगा। हिंदी के लेखकों के लिए यह वक्त चेतने का है।

शब्दों पर किसका अधिकार, गूगल का?


टॉम चैटफील्ड

गूगल ने एक नई बहस छेड़ दी है स्वीडिश भाषा में आप किसी ऐसी चीज़ को क्या कहेंगे, जो किसी सर्च इंजन के इस्तेमाल के बावजूद इंटरनेट पर न मिले? इस सप्ताह तक आप ' क्लिक करें ओगूगलबार' कह सकते थे, जिसे क्लिक करें स्वीडन की भाषा परिषद ने भी मान्यता प्रदान की थी. ओगूगलबार को अंग्रेजी में मोटे तौर पर 'अनगूगलेबल' कहा जा सकता है. सामान्य ऑनलाइन सर्च के लिए गूगल को अपने नाम का इस्तेमाल किए जाने का विचार पसंद नहीं आया. कंपनी ने इसका अर्थ गूगल से विशेष तौर पर जोड़ने को सुझाव दिया. इसके बाद स्वीडन की क्लिक करें भाषा परिषद ने इस शब्द को आधिकारिक सूची से हटा दिया. वैसे तो यहां कई सारी बातें कही जा सकती हैं लेकिन साल का अधिकांश हिस्सा मैंने भाषा और तकनीक के बारे में किताब लिखते हुए गुज़ारा.‘अनगूगलेबल’ और इसके दूसरी भाषाओं में समानार्थकों ने हमारे समय के सबसे अहम भाषाई विकास को दिखाया है. वह है, बायनरी शब्दकोश का विकास.
उदाहरण के लिए, बस कुछ शब्दों और विचार को देखें. आप ‘लाइक’, या ‘अनलाइक’ कैसे करेंगे? ‘फेवरिट’, और ‘अनफेवरिट’ को भला कैसे व्यक्त करेंगे? आप ‘फॉलो’ या ‘अनफॉलो’ कैसे करेंगे, दूसरे लोगों को ‘फ्रेंड’ या ‘अनफ्रेंड’ कैसे करेंगे? या फिर, आप ऑनस्क्रीन बॉक्स को लगातार ‘क्लिक’ या ‘अनक्लिक’ कैसे करेंगे? शब्दों पर अधिकार को लेकर एक गंभीर लड़ाई हो रही है. लुई कैरोल के ‘एलिस थ्रू द लुकिंग ग्लास’ में एक पात्र भाषा को लेकर कुछ यूं कहता है, “जब मैं किसी शब्द का इस्तेमाल करता हूं, तो इसका मतलब बस वही होता है, जो मैं चाहता हूं. न कम, न ज्यादा.” कैरोल दरअसल एक अहम मुद्दा उठा रही थीं. भाषा वह चीज़ है, जो हम मिलकर बनाते हैं और हम ही अपने शब्दों के सही मायने भी चुन सकते हैं. गूगल, हालांकि इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता. गूगल इंटरनेट की दुनिया के उम्द सर्च इंजन में गिना जाता है. गूगल ने खेल बिगाड़ दिया है, जिससे एक अलग ही तरह के विवाद की शुरुआत हो गई है. उसका मानना है, “या तो आप गूगल का इस्तेमाल वैसे करो, जैसे हम चाहते हैं, या फिर आप उसका इस्तेमाल ही नहीं कर पाएंगे.” गूगल जैसी कंपनी को शब्दों की व्याख्या क्या उसी ढंग से नहीं करनी चाहिए, जैसा कि लोग उसे समझते हैं, या फिर कुछ मामलों में उसे नई परिभाषा का सुझाव देना चाहिए? आखिरकार, स्वीडन की भाषा-परिषद का भाषा को किसी भी तरह के प्रभाव से मुक्त रखने का बयान भी एकबारगी उतना प्रभावी नज़र नहीं आता. इंटरनेट की भाषा भले ही एक आम बायनरी बात लगती हो, लेकिन शब्दों के छिपे हुए अर्थ अधिक मायने रखते हैं, शायद.
किताबों के साथ-साथ पत्रिकाएं पढ़ने में भी दिलचस्पी है तो जिनियो आपके लिए ही बना है। डिजिटल मैगजींस पढ़ने के मामले में यह दुनिया के लोकप्रिय ई-बुक रीडिंग ऐप्स की सूची में शामिल है। पत्रिकाएं दोनों तरह की हैं- फ्री और पेड, जिन्हें विषय वार कैटिगरीज में बांटा गया है। इस ऐप पर डाउनलोड होने वाले कंटेन्ट को आप शायद अमेजन और एपल जैसे बड़े स्टोर्स पर न पाएं क्योंकि यहां सिर्फ गैर-पेशेवर लेखकों की ई-बुक्स ही मुहैया कराई जाती हैं। फिलहाल यहां दस हजार से ज्यादा ई-बुक्स मौजूद हैं। यह दोनों तरफ से फ्री ऐप्लिकेशन है, जहां न लेखकों से ई-बुक्स पोस्ट करने के लिए कोई चार्ज लिया जाता है और न ही पाठकों से ई-बुक्स डाउनलोड करने के लिए। (बीबीसी से साभार)

हार्ड कॉपी से ई-बुक तक


फिल कूम्स

डिजिटल पब्लिशिंग का बढ़ता प्रचलन फ़ोटोग्राफिक क्लिक करें किताबों के प्रकाशकों से लिए चुनौती बनकर उभरा है. कई फ़ोटोग्राफरों के लिए बुक फार्मेट अपने काम को पाठकों तक पहुंचाने का आदर्श तरीका है. इसमें पाठक को एक पूर्व निर्धारित क्रम में तस्वीरों को देखने का मौका मिलता है. एक शानदार किताब का स्पर्श ही अद्भुत एहसास देता है और इसे लंबे समय तक संजोकर रखा जा सकता है. लेकिन ई-बुक्स और बुक आधारित क्लिक करें ऐप्स के आने से इसमें कई आयाम जुड़ गए हैं. अमेजन के संस्थापक जैफ बेजोस के मुताबिक क्लिक करें ई-बुक्स का कारोबार अरबों डॉलर तक पहुंच गया है. हालांकि अभी तक बाज़ार में टेक्स्ट बुक्स का ही दबदबा है लेकिन इससे फ़ोटोग्राफिक प्रकाशकों के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है.
लंदन के प्रकाशक एमएपीपी के माइकल मैक ने कहा, “किताब की दुकानों को ऑनलाइन बिक्री के समक्ष अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है." उन्होंने कहा, "क्लिक करें ऑनलाइन बिक्री से आपको घर या दफ़्तर में ही किताब मिल जाती है, तो फिर क्यों कोई किसी दुकान में जाने की जहमत उठाएगा.” उनका कहा है कि कीमत की भी इसमें अहम भूमिका है. उन्होंने कहा कि फ़ोटोग्राफिक किताबों को प्रकाशित करना महंगा पड़ता है और उनकी बिक्री भी सीमित होती है. मैक ने कहा कि उनका काम समय से पहले ही पुराना पड़ गया है. एमएपीपी जैसे प्रकाशकों ने वक्त की नजाकत को देखते हुए अब ई-बुक्स पर जोर देना शुरू कर दिया है. मैक ने कहा कि एमएपीपी एक ऐसी योजना पर काम कर रहा है जो डिजिटल वर्क की एक लाइब्रेरी ऑफर करेगी. इसमें नई और संशोधित पांडुलिपियों और टेक्स्ट का सम्मिश्रण होगा. उन्होंने कहा कि डिजाइन के मामले में ऐप्स की क्षमताएं असीमित हैं. लेकिन साथ ही इसकी कुछ बाध्यताएं भी हैं. यही वजह है कि एमएपीपी ई-बुक्स पर जोर दे रही है जिसमें कोई बाध्यता नहीं है. मैक ने कहा, “हम ऐसे लोगों और संस्थाओं के साथ काम कर रहे हैं जिनके पास विषयवस्तु का बड़ा संग्रह है. इनमें जेम्स बांड के प्रोड्यूसर माइकल विल्सन और अन्य कई संग्रहालय और पुस्तकालय शामिल हैं.”
भारत में इंटरनेट यूज़र्स की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है और साथ ही बढ़ रहा है ई-कॉमर्स का बाज़ार भी. कंपनियां ट्रेन टिकट से लेकर कपड़े और इंश्योरेंस तक बेच रही हैं. इसी कड़ी में बुधवार को अमरीकी कंपनी अमेज़न भी शामिल हो गई. अमेज़न ने भारत के लिए अपनी नई सेवा शुरू की है जिसमें ऑनलाइन खरीददारों को किताब, फ़िल्मों की डीवीडी, गैजेट, मोबाइल फ़ोन और कैमरे सहित और भी कई सामग्रियां खरीदे जाने की सुविधा उपलब्ध होगी. भारत में ई-कॉमर्स का कारोबार तेज़ी से बढ़ रहा है लेकिन इसी के साथ ये ख़तरा भी बना हुआ है कि ये बस बुलबुला भर न साबित हो. अमेज़न से पहले ई-कॉमर्स बाज़ार में बड़े तौर पर जबॉन्ग दाखिल हुई थी. कंपनी का कहना है कि तब से अब तक उन्होंने 50,000 उत्पाद बेचें हैं जिसमें से 50 फ़ीसदी से अधिक बिक्री छोटे शहरों में हुई है. वो मानते हैं कि भारत में ई-कॉमर्स के लिए काफ़ी संभावनाएं हैं. एक अनुमान के मुताबिक करीब एक करोड़ लोग वर्तमान में ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं जबकि दस करोड़ से ज़्यादा लोग ई-शॉपिंग करने के लिए तैयार है. लेकिन इन खरीददारों तक पहुंच पाना आसान नहीं है.
भारत की सबसे पहली ई-कॉमर्स वेबसाइट इंडिया प्लाज़ा के मालिक के वैथीस्वरन कहते हैं, “अभी तक जिन कंपनियों ने ई-कॉमर्स पर निवेश किया है उन्होंने बिक्री बढ़ाने की बात की है, लेकिन मुनाफ़े पर ध्यान नहीं दिया. अब अचानक इन निवेशकों को लगता है कि उन्हें उनके निवेश पर उचित मुनाफ़ा नहीं मिल पाएगा. लिहाज़ा अब वो मुनाफ़े पर जोर दे रहीं है, पर दुर्भाग्यवश ज्यादातर कंपनियों ने सिर्फ गोदाम बनाकर लोगों को काम पर रखा है.” वैथीस्वरन के अनुसार उनकी कंपनी काफ़ी दिनों से सिर्फ इसीलिए चल रही है क्योंकि उन्होंने दाम कम रखे हैं. साल 1999 में जब उनकी कंपनी ने काम शुरू किया था तब 30 लाख से भी कम इंटरनेट यूजर्स थे. इसमें से भी केवल 20,000 लोग ऑनलाइन शॉपिंग करते थे. अब भारत दुनिया के तीन सबसे तेज़ी से बढ़ रहे इंटरनेट बाज़ारों में से एक है. पिछले साल इंटरनेट का प्रयोग यहां 41 फ़ीसदी बढ़ा. गूगल इंडिया के प्रबंध निदेशक राजन आनंदन ने कहा, “भारत में 14 करोड़ इंटरनेट यूज़र्स में से केवल ढ़ाई करोड़ ऑनलाइन व्यापार करते हैं. जबकि चीन में 18 करोड़ ऑनलाइन खरीददारी करते हैं.” भारत में नए खरीददारों को रिझाने के लिए कंपनियों को विज्ञापन और डिस्काउंट स्कीमों पर निवेश करना पड़ेगा. एक अनुमान के अनुसार कंपनियां विज्ञापन के ज़रिए हर ऑनलाइन ग्राहक पर 15 से 50 डॉलर खर्च कर रही है. इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के एक आंकड़े के अनुसार साल 2005 में शुरू की गई कंपनी ई-बे इंडिया हर मिनट में छह बिक्रियां करती हैं, जबकि फ्लिपकार्ट हर मिनट 20 बिक्रियां करती है. (बीबीसी से साभार)