Tuesday, 25 June 2013

बुक लवर्स

        रीडर और बुक्स के बीच दूरियां पनप रही हैं। रीडर बिजी और किताबें महंगी। न बुकशॉप जाने का वक्त, न इतनी महंगी किताबें खरीदने की इच्छा। दूरियां बढ़ती रहीं, जब तक कि इंटरनेट ने दस्तक न दे दी। अब लोग किताबों की तरफ लौट रहे हैं। ई-कॉमर्स पोर्टलों ने किताबें खरीदना बहुत आसान बना दिया है। कई पोर्टल आ गए हैं तो उनमें होड़ भी मची है - सस्ती दरों पर अच्छी किताबें मुहैया कराने की, और वह भी लॉन्च के फौरन बाद।
इंडियाटाइम्स uread.com के सहयोग से इंटरनेट पर किताबें बेचने की सर्विस चला रहा है। इसकी खासियत है, कई किताबों पर मिल रहे डिस्काउंट। कई किताबों पर 40 फीसदी तक डिस्काउंट मिल जाता है। इंडियाटाइम्स एक और स्कीम चलाता है, जिसके तहत लोग 500 रुपये सालाना जमा कराकर साल भर 25 फीसदी डिस्काउंट पर किताबें खरीद सकते हैं। ऊपर से 750 रुपये की किताबें उपहार में दी जाती हैं। यहां किताबों का चुनाव लगभग दो दर्जन कैटेगरी के बीच से या फिर ब्रैंड्स के आधार पर किया जा सकता है।
flipcart.com : फ्लिपकार्ट पर करीब दो दर्जन कैटिगरी में किताबें उपलब्ध हैं। इस पर कई अनूठी सुविधाएं हैं, जैसे कम्प्लीट कलेक्शन ऑर्डर करना (हैरी पॉटर जैसे मामलों में, जहां एक ही सीरीज में कई किताबें आती हैं), लॉन्च होने जा रही किताबों के लिए पहले से ऑर्डर करना, आधी कीमत पर मिलने वाली किताबें वगैरह। नई-नई लॉन्च हुई किताबों और बुकर प्राइज विनर्स के लिए अलग सेक्शन हैं। डिलिवरी फ्री है।
avbooksindia.com : यहां करीब 30 कैटिगरी में किताबें मौजूद हैं, जिन्हें अलग-अलग विषयों के हिसाब से ढूंढकर ऑर्डर किया जा सकता है। खरीदी गई किताबों को रजिस्टर्ड मेल या एयरमेल से फ्री भेजा जाता है। नई किताबें अलग-से दिखाई जाती हैं और पहले से मौजूद किताबों को सर्च करने की अच्छी सुविधा है। किताबों पर सीमित डिस्काउंट भी उपलब्ध हैं।
books.rediff.com : इंडियाटाइम्स की ही तरह भारत के इस एक और बड़े इंटरनेट पोर्टल पर किताबों का भारी-भरकम स्टोर मौजूद है, जिसमें करीब 35 लाख किताबें बताई जाती हैं। करीब 40 हजार लेखकों की किताबें 500 कैटिगरी में उपलब्ध हैं। इन्हें विषयों, किताबों के नामों और लेखकों के नामों से सर्च किया जा सकता है। जहां तक डिस्काउंट का सवाल है, वह यहां दिखाई नहीं दिया। अलबत्ता, किताबों को डाक से फ्री भेजा जाता है और डिलिवरी पर पेमेंट करने की भी सुविधा है।
simplybooks.in : यूं तो यह एक नया पोर्टल है लेकिन पूरी तरह किताबों से संबंधित होने के नाते इसने बुक लवर्स के बीच जगह बना ली है। यहां किताबों की सैकड़ों कैटिगरी मौजूद हैं, और बहुत-सी किताबों पर 25 फीसदी डिस्काउंट भी मिल जाता है। अलग-से मौजूद डिस्काउंट सेक्शन में यह थोड़ा ज्यादा भी हो सकता है। नई रिलीज और बेस्टसेलर्स पर भी अलग सेक्शन मौजूद हैं, ताकि ट्रेंडी किताबें ज्यादा ढूंढनी न पड़ें। कुरियर के जरिए देश भर में फ्री शिपिंग की सुविधा है। (myhindiforum.com से साभार)

किताबें ही प्रजा, किताबें ही राजा

         हमारे आसपास बिखरी हैं किताबें। नई किताबें..पुरानी किताबें..। अच्छी किताबें..बुरी किताबें..। बड़ों की किताबें..बच्चों की किताबें..। किताबों का साम्राज्य है..किताबों का शासन है..। किताबें ही प्रजा हैं..किताबें ही राजा हैं..। किताबों की सड़क है और किताबों की ही इमारत है.। वाह, कितना सुखद स्वप्न है यह, या फिर एक कोरी कल्पना..। आज के इंटरनेट युग में किताबों का ऐसा संसार कहां? किताबें तो अब किताबों की बातें बन चुकी हैं। हमारे पास इतना समय ही कहां कि इस इंटरनेट की दुनिया से बाहर आएं और किताबों के पन्ने पलटें। हम तो रच-बस गए हैं इंटरनेट के मायाजाल में। फंस गए हैं जानकारियों के ऐसे चक्रव्यूह में, जहां से बाहर निकलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन लगता है। सबकी खबर है हमें, केवल स्वयं को छोड़कर। आओ किताबों की इस खत्म होती दुनिया में मन की किताब खोलें और उस किताब में एक नाम जोड़ें विश्वास का..आत्म-अनुशासन का..आत्मसम्मान का..स्वाभिमान का..। आओ शुरुआत करें और प्रयास करें मन की एक नई किताब लिखने का। आज की पीढ़ी का मानो किताबों से नाता ही टूट गया। हर बात के लिए उनके पास ‘गूगल बाबा’ हैं ना! एक यही ‘बाबा’ हैं, जो हमें हर जगह हमेशा ले जाने को तैयार हैं। इसके बिना तो आज किसी भी ज्ञान की परिकल्पना ही नहीं की जा सकती।
युवाओं के हाथों में किताब तो है, पर उसे वे ऐसे देखते हैं मानो कोई अजूबा हो। छोटे-छोटे नोट्स से ही उनका काम चलता है। अच्छा भी है शायद, अब किसी पोथी से उनका वास्ता ही नहीं पड़ता। पोथी देखकर वे बिदकने लगेंगे। हमारे पास ज्ञान के लिए ‘गूगल बाबा’ हैं, यह सच है। पर इनके दिए ज्ञान को हम कब तक अपने दिमाग में रखते हैं? ‘गूगल बाबा’ के ज्ञान से केवल परीक्षा ही दी जा सकती है। पर हमारे पूर्वजों ने जो ज्ञान दिया है, वह तो जीवन की परीक्षा में पास होने के लिए दिया है, जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए दिया है। आज उनके दिए ज्ञान का उपयोग कम से कम हो पा रहा है।
शोध बताते हैं कि ‘गूगल बाबा’ की शरण में रहने वालों की स्मृति कमजोर होने लगी है। आखिर कहां जाएंगे कमजोर याददाश्त लेकर हम सभी? सब कुछ है ‘गूगल बाबा’ के पास। पर शायद नहीं है, तो मां का ममत्व, पिता का दुलार, बहन का अपनापा या फिर प्रेमी या प्रेयसी का प्यार। हम जब मुसीबत में होते हैं, तब चाहकर भी ‘गूगल बाबा’ हमारे सिर पर हाथ नहीं फेर सकते। हमारे आंसू नहीं पोंछ सकते। हमें सांत्वना नहीं दे सकते। ‘बाबा’ हमें ज्ञानी तो बना सकते हैं, पर एक प्यारा-सा बेटा, समझदार भाई, प्यारे-से पापा, अच्छा पति नहीं बना सकते। इसलिए कहता हूं ‘बाबा’ को घर के आंगन तक तो ले आओ, पर घर के अंदर घुसने न दो। अगर ये घर पर आ गए, तो समझो हम सब अपनों से दूर हो जाएंगे, हम गैरों से घिर जाएंगे। यहां सब कुछ तो होगा, पर कोई अपना न होगा। कैसे रहोगे फिर उस घर में?
किताबों से दोस्ती करो। ये हमारी सबसे अच्छी दोस्त हैं। हमारे सुख-दुख में यही काम आएंगी। जब ये हमसे बातें करेंगी, तो हमें ऐसा लगेगा, जैसे मां हमें दुलार रही हैं, पिता प्यार से सिर पर हाथ फेर रहे हैं, बहना और दीदी हमसे चुहल कर रही हैं। अपनापे और प्यार का समुद्र लहराने लगेगा। किताबें हमसे कुछ कहने के लिए आतुर हंै। वह दिन बहुत ही यादगार होगा, जब यही किताबें तुमसे ज्ञान प्राप्त करेंगी। हम सब गर्व से कह उठेंगे कि किताबों जैसा कोई नहीं। तो हो जाओ तैयार पढ़ने के लिए एक किताब प्यारी-सी। (myhindiforum.com से साभार)

साधारण - सा जीवन : असाधारण किताबें


सोपान जोशी

युद्ध की हिंसा से तो जोसेफ बच गए पर अपनी अंतरआत्मा से नहीं। उन्हें ये मंजूर नहीं था कि उनकी कमाई से वसूले कर का इस्तेमाल अमेरिकी सरकार युद्ध के लिए करे। उन्होंने गरीबी में रहने का प्रण लिया ताकि उन्हें सरकार को कर चुकाना ही न पड़े। सिर पर स्लेट पत्थर की छत और पांव के नीचे अपने ही मल-मूत्र से बनी जमीन! जोसेफ जेंकिन्स का बस ही तो है संक्षिप्त परिचय। श्री जोसेफ ने पन्द्रह साल पहले एक पुस्तक लिखी थी ‘द स्लेट रूफ बाइबल’। 17 साल पहले लिखी थी ‘द ह्यूमन्योर हैंडबुक’। दोनों किताबों ने हजारों लोगों को प्रभावित किया है, प्रेरणा दी है। वे दूसरों को बताते नहीं हैं कि उनकी नीति क्या होनी चाहिए, उन्हें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए। वे खुद ही वैसा जीवन जीते हैं और अपने जीवन की कथा सहज और सरल आवाज में बताते जाते हैं।
जोसेफ जेंकिन्स की अहिंसक यात्रा एक युद्ध से ही शुरू हुई थी। उनके पिता अमेरिकी सेना में काम करते थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद वे जर्मनी में तैनात थे। वहीं श्री जोसेफ का जन्म सन् 1952 में हुआ था। सेना की नौकरी। हर कभी पिताजी का तबादला हो जाता। बालक जोसेफ हर साल-दो-साल में खुद को एक नए शहर में पाता, नए लोगों के बीच, नए संस्कारों में। होश संभालने के साथ जोसेफ को अमेरिका के विएतनाम पर हमले और कई साल से चल रहे युद्ध का भास होने लगा था। अमेरिकी सरकार स्कूल की पढ़ाई पढ़कर निकले हजारों किशोरों को लोकतंत्र की लड़ाई लड़ने अनिवार्य या कहें जबरन सैनिक सेवा में विएतनाम भेज रही थी। जोसेफ कहते हैं वह युद्ध अमेरिकी सामूहिक पागलपन था। उस युद्ध की वजह से कई लाख लोग अपनी जान गंवा बैठे थे। कई लाख एकड़ जमीन ‘एजेंट ऑरेंज’ नाम के जहर से बर्बाद की गई और उस जहर की वजह से आज भी विएतनाम में कई बच्चे पैदाइशी अपंग और मंदबुद्धि हैं। वह युद्ध बहुत बड़ा झूठ और अन्याय था और अमेरिकी समाज ने आज तक उसके लिए जिम्मेदार लोगों को सजा नहीं दी है।
18 साल की उमर होने पर जोसेफ की भी नौबत आनी थी सेना में भर्ती होने की। वे पेंसिलवेनियां राज्य में डॉक्टरी की शुरुआती पढ़ाई कर रहे थे और साल था सन् 1972 । एक दिन कॉलेज की कैंटीन में उन्हें एक अनजान आदमी ने जोसेफ से बस एक फार्म भरवाया और युद्ध के लिए उसे जबरन भर्ती से बचा लिया। लेकिन अगले ही साल सरकार ने इस नियम को खारिज कर दिया। इस तरह जोसेफ बाल-बाल बचे थे विएतनाम युद्ध से। वे आज भी उस अंजान फरिश्ते का आभार मानते हैं।
युद्ध की हिंसा से तो जोसेफ बच गए पर अपनी अंतरआत्मा से नहीं। उन्हें ये मंजूर नहीं था कि उनकी कमाई से वसूले कर का इस्तेमाल अमेरिकी सरकार युद्ध के लिए करे। उन्होंने गरीबी में रहने का प्रण लिया ताकि उन्हें सरकार को कर चुकाना ही न पड़े। वे कहते हैं कि इस घटना के 40 साल बाद आज भी अमेरिकी सरकार अपने नागरिकों से वसूल किए गए कर से निर्दोष लोगों को मारने वाले युद्ध अफगानिस्तान और ईराक में लड़ रही है।
अपने ही देश अमेरिका से उखड़े, चिढ़े हुए वे यात्रा पर पड़ौसी देश मेक्सिको की ओर निकल पड़े, यह समझने कि वहां जीवन काट सकेंगे या नहीं। छह महीने बाद ही वे वापस अपने घर पेंसिलवेनियां के एक छोटे से कस्बे में लौट आए। पेशे की डॉक्टरी करने के लिए स्नातकोत्तर पढ़ाई नहीं करने का निर्णय तो वे पहले ही ले चुके थे। एक परिचित ने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि वे गांव में 212 एकड़ की उनकी जमीन संभाल लें। वीरान पड़ी जमीन पर रहने के लिए एक टूटा-फूटा घर तो था पर उसकी मरम्मत जरूरी थी। उस साल जोसेफ ने गर्मी में एक बड़ा बगीचा लगाया। इस जमीन से एक साल में ही उनका दाना-पानी उठ आया था।
इसी दौरान श्री जोसेफ के पास छतों की मरम्मत करने के प्रस्ताव आने लगे। यह काम उन्होंने 16 साल की उमर में ही सीख लिया था, स्कूल की एक छुट्टी के दौरान। साल था 1968 और उनके पड़ौस के एक घर में सीमेंट का बना पक्का आंगन तोड़ कर मलवा हटाने की जरूरत थी। युवक जोसेफ अपना जेब खर्च कमाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने हथौड़ा संभाला और देखते-देखते काम पूरा कर दिया। घर की मालकिन उनकी मेहनत से बहुत प्रभावित हुईं। उनके पिता थे पीट ओडरे, जिनका जमा-जमाया और प्रसिद्ध कारोबार था छत बनाने का। बेटी ने अपने पिता को बताया इस मेहनती युवक के बारे में।
उन्होंने जोसेफ को अपने साथ रख लिया और उन्हें काम सिखाने लगे। इस दौरान जोसेफ ने अमेरिकी घरों में लगने वाली तरह-तरह की छतें बहुत करीब से देखीं और उन पर काम भी किया। उन्होंने पाया कि छत बनाने में इस्तेमाल होने वाला ज्यादातर माल पर्यावरण को दूषित तो करता ही था, ज्यादा समय चलता भी नहीं था। जैसे डामर या एसबेस्टस। इनसे कई तरह के रोग होने का खतरा भी रहता है। इन चीजों से काम करना जोसेफ को कतई नहीं भाया।
फिर वे याद करते हैं वह दिन जब उन्होंने पहली बार स्लेट पत्थर से ढली एक छत देखी। जी हां, वही स्लेट का पत्थर, जिससे एक समय लिखने की पट्टी बनती थी। यूरोप और अमेरिका में बहुत पहले से कई जगह स्लेट पत्थर और कवेलू से छतें बनती रही हैं। हमारे देश के भी अनेक पहाड़ी हिस्सों में स्लेट पत्थर की खदानें हैं और उनसे निकली स्लेटों का यहां भी वैसा ही सुंदर उपयोग होता रहा है। स्लेट के टुकड़े सालों साल जमे रहते हैं और उनकी छत बहुत लंबी चलती हैं। एक छत से निकाल कर स्लेट पत्थरों को दूसरी छत पर लगाना भी सरल होता है। पीढ़ियां चली जाती हैं, स्लेट पत्थर वही रहता है, वहीं रहता है! शायद इसलिए विज्ञापन और नएपन की लकदक में चलने वाली हमारी खरीद-फेंक की नई दुनिया को ऐसा टिकाऊ पदार्थ पसंद नहीं आता।
स्लेट के कई गुण तो जोसेफ को बहुत बाद में समझ आए, पहले तो उन्हें यही दिखा कि इस पत्थर से बनी छतें दूसरी चीजों से बनी छत से कहीं ज्यादा सुंदर दिखती हैं। वे कहते हैं स्लेट के सौंदर्य का उन पर ऐसा जादू हुआ कि उसी दिन तय किया कि जब कभी अपना घर बनाएंगे उसमें छत स्लेट की ही ढालेंगे। ये मौका उन्हें 11 साल बाद सन् 1969 में मिला, कुछ पुराने घरों से निकाली हुई स्लेटों से। इस बीच बहुत कुछ और भी हुआ। उन्हें छत का काम सिखाने वाले पीट ओडरे चाहते थे इस मेहनती युवक को तैयार कर उसे अपना कारोबार सौंपना। पर दो साल छुट्टियों में उनका साथ देकर सन् 1970 में जोसेफ डॉक्टरी की पढ़ाई पढ़ने विश्वविद्यालय चले गए। वहां कॉलेज की फीस जुटाने के लिए उन्होंने घरों की मरम्मत करने का एक छोटा-सा कारोबार चलाया। फिर वे विएतनाम जाते-जाते बचे और कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद गरीबी में रहने का प्रण ले बैठे।
वापस सन् 1975 में घर आए तो उनके शहर के लोग उस मेहनती युवक को भूले नहीं थे जो कारीगर पीट ओडरे का शागिर्द था। उनके पास स्लेट की छतें ठीक करने का काम आने लगा। जल्दी ही उनके पैर जम गए और उनका कारोबार चल निकला। सन् 1979 में उन्होंने सात एकड़ जमीन खरीदी और उस पर अपना घर बनाया, स्लेट की छत वाला। लेकिन पूर्वोत्तर अमेरिका की बर्फीली ठंड में ये कारोबार रुक जाता है। तो उस दौरान श्री जोसेफ ने लिखना शुरू कर दिया। लिखा भी किस पर? स्लेट की छत पर।
इस किताब के छपने के बाद श्री जोसेफ के काम की खूब शोहरत फैली और उनके पास पुरानी तरह की स्लेटेट छत बनवाने और सुधरवाने का ढेर सारा काम आने लगा। उन्होंने सन् 2005 में छतों का काम करने वाले कारीगरों का एक सामाजिक संगठन भी बनाया। आज यह खूब फल-फूल रहा है।
पांच साल के शोध के बाद सन् 1997 में उन्होंने अपनी किताब ‘द स्लेट रूफ बाइबल’ खुद ही छापी। लिखने की दुनिया में वे नए थे इसलिए उसमें कमियां भी रह गईं थीं। अपने लिखे की मरम्मत करके उस किताब का दूसरा संस्करण सन् 2002 में छापा। तब से अब तक इसकी 20,000 प्रतियां बिक चुकीं हैं और इसका इंटरनेट संस्करण तो और भी चला है। इस किताब के छपने के बाद श्री जोसेफ के काम की खूब शोहरत फैली और उनके पास पुरानी तरह की स्लेट छत बनवाने और सुधरवाने का ढेर सारा काम आने लगा। उन्होंने सन् 2005 में छतों का काम करने वाले कारीगरों का एक सामाजिक संगठन भी बनाया। आज यह खूब फल-फूल रहा है। संगठन एक पत्रिका भी निकालता है पारंपरिक छत बनाने पर। यह परंपरा खत्म होती जा रही थी। जोसेफ के काम से इसे संबल मिला है, स्लेट का उपयोग बढ़ा है। गरीबी में रहने का प्रण और डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ने वाले इस सिरफिरे को आज, 60 साल की उमर में एक सफल व्यक्ति माना जाता है।
अपनी जीवन यात्रा की बात करते हुए जोसेफ डॉक्टरी की पढ़ाई की निर्थकता की बात करते हैं। कहते हैं- ”प्री-मेडिकल पढ़ाई में हमें खान-पान और स्वास्थ्य के संबंध पर कुछ भी नहीं पढ़ाया गया। मैं इतना अनाड़ी था कि मुझे तो पता भी नहीं था कि इन दोनों का कोई संबंध है।“ कॉलेज से पास होने के बाद उन्होंने खुद से इस विषय पर पढ़ाई की और इससे आकर्षित होते चले गए। अपना भोजन उन्होंने खुद उगाना और पकाना शुरु किया। यह काम आज भी रोज होता है। हर रोज उन्हें कुछ नई और उपयोगी बातें समझ आती हैं। वे कहते हैं कि कॉलेज की पढ़ाई में उन्हें यह सब कभी समझ नहीं आया। तरह-तरह की जड़ी बूटियों के प्रयोग से उनके उपयोग भी समझ में आने लगे।
एक और यात्रा रही है जोसेफ की। उसकी शुरूआत हुई थी सन् 1975 में, जब वे डॉक्टरी शिक्षा छोड़ 212 एकड़ के खेत पर एक साल रहे। टूटे-फूटे घर को तो उन्होंने रहने लायक बना लिया था पर यह पहली दफा था कि वे ऐसे घर में रह रहे थे जिसके शौचालय में पाइप से आता पानी नहीं था। वे शौच जाते बाहर बने झोपड़ीनुमा शौचालय में, जिसमें एक गड्ढा भर था। चाहे कोई भी समय हो, मौसम कितना भी खराब हो, बारिश हो, बर्फबारी हो। गड्ढे में उनका रोज मुकाबला होता कई तरह के कीड़ों से। ततैया, मकड़ी, मक्खी और ढेर-सी दुर्गंध से। इसका समाधान उन्होंने निकाला एक ढक्कनयुक्त चीनी मिट्टी के एक कमोड से। इसे खराब मौसम में घर के भीतर रखा जा सकता था। जब कमोड भर जाता तब उसे बाहर ले जाकर खाली कर देते लेकिन घर के भीतर बदबू आती थी। उसका उपाय भी पास ही मिला। खेत पर लकड़ी चीरने से निकला ढेर सारा बुरादा पड़ा था। जोसेफ ने पाया कि लकड़ी के बुरादे को ऊपर डालने से दुर्गंध चली जाती थी। इस तरह से ग्रामवास का उनका पहला साल बीत गया।
उनके अगले घर में भी पानी और बिजली की कोई व्यवस्था नहीं थी। कोई नल नहीं, पाइप नहीं। वहां उन्होंने एक प्लास्टिक के डिब्बे को शौचालय बना दिया और वही लकड़ी के बुरादे का इस्तेमाल करने लगे। लेकिन समय-समय पर डब्बा खाली करने के लिए उस घर के बाहर कोई गड्ढे वाला शौचालय भी नहीं था। गर्मी के मौसम में जोसेफ ने पास की जमीन पर बगीचा लगाया था और तीन और बगीचे लगाने का सोच रहे थे। इसके लिए पत्ते वगैरह सड़ा कर खाद बनाने के लिए उन्होंने एक ढेर लगा रखा था। कोई और समाधान था नहीं तो डब्बे की टट्टी और पेशाब को भी वे इसी ढेर में डालने लगे। वे कहते हैं उन्हें कुछ ठीक से पता नहीं था। केवल सामने जो मुश्किल आई, उसका व्यवहारिक हल खोज रहे थे।
यह बात सन् 1977 की है। तब से आज तक श्री जोसेफ हर साल बगीचा भी लगाते हैं और उसमें जो खाद डालते हैं, वह उनके मल से तैयार होती है।
उनके बगीचे में कई तरह की फसलें लगती हैं, कई तरह का खानपान उनसे बनता है। खाद शब्द का खाद्य से संबंध उन्हें इन 35 सालों के प्रयोगों से बखूबी समझ में आ गया है। वे आज विशेषज्ञ माने जाते हैं खाद के। उस खाद के जिसने कई सदियों से हमारे खेत उपजाऊ रखे हैं, लेकिन जिसे हमारे दूषित शब्दकोश में ‘जैविक खाद’ जैसी अटपटी संज्ञा दी जाती है।
इस जानकारी को जोसेफ ने और बढ़ाना चाहा विश्वविद्यालय में जाकर। उन्हें विज्ञान की बुनियादी समझ तो थी ही। दुनिया भर के वैज्ञानिक शोध को वे कॉलेज की लाइब्रेरी के जरिए पढ़ सकते थे। इस जानकारी का उपयोग उन्होंने अपने प्रयोगों में किया ही था। सन् 1990 के दशक की शुरुआत तक उनका स्लेट छत का कारोबार अच्छा चल चुका था। तब वे ‘द स्लेट रूफ बाइबल’ लिखने की तैयारी में थे।
फिर वैज्ञानिक शोध ठीक हो भी तो उस पर ध्यान कौन देता है? वे बताते हैं कि 1950 और 1980 के दशक में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने टट्टी पेशाब से खाद बनाने पर बहुत बढ़िया शोध करवाया था। पर किताबी ज्ञान का कोई मतलब नहीं होता जब तक उसे व्यवहार में न लाया जाए। इस सब शोध को बारीकी से समझ कर उसे सरल शैली में वे लिखते गए। शुचिता, स्वास्थ्य, शरीर, पानी, जीवाणु और रोगाणु, भूजल, प्रदूषण, जमीन की उर्वरता, हर जटिल से जटिल विषय को सरल अंदाज में समझाते गए। लेकिन ऐसी किताब को कोई प्रकाशक छापना नहीं चाहता था। श्री जोसेफ ने अपनी किताब की 600 प्रतियां खुद ही छापीं 1995 में। उन्हें उम्मीद नहीं कि इतनी प्रतियां भी बिक सकेंगी।
नतीजा था ‘द ह्यूमन्योर हैंडबुक’ जिसके तीन संस्करणों की 60,000 प्रतियां आज तक बिक चुकी हैं। दुनिया की 15 भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है।
दुनिया भर के पुरस्कार, प्रशंसा और प्रेम साथ में। कई सौ पाठकों ने धन्यवाद की चिट्ठियां लिखी हैं। किताब खुद लेखक के जीवन से निकली है इसलिए बोझिल प्रवचन से वह मुक्त है। कई विद्वानों ने कहा है कि भगवद्गीता भी हमारे यहां इतनी लोकप्रिय इसलिए है क्योंकि वह कर्मक्षेत्रा के बीच से निकली बात है, और ऐसी बात का प्रभाव स्थूल पोथियों से ज्यादा होता है। जोसेफ कहते हैं कि लोग पीने योग्य पानी में शौच निपटते हैं, जबकि पानी की कमी के बारे में सब जानते हैं। किताब व्यावहारिक तरीके बताती है सूखे शौचालय बनाने के, जिनसे हमारा मल-मूत्र बजाए पानी को दूषित करने के जमीन को उपजाऊ बनाता है।
अपनी बात को वे कभी किसी सरकारी और अकादमिक तामझाम में नहीं फंसने देते हैं। उनकी कतई ऐसी रुचि नहीं है कि सरकारें उनके लिखे अनुसार अपनी नीति बदलें या उनके विचारों पर रातों-रात क्रांति हो जाए। उनका आग्रह हमेशा व्यावहारिक रहता है। कोई भी एक विचार में सारे समाधान नहीं मिल सकते और उनके बनाए सूखे शौचालय हर किसी के काम के नहीं हैं, ऐसा वे कहते हैं। लेकिन साथ ही यह भी कहते हैं कि पीने के पानी से चलने वाले फ्लश के शौचालय दुनिया के हर हिस्से में काम नहीं कर सकते हैं। इसे चलाने जितना पानी और बिजली हमारे पास है ही नहीं। किन मलमूत्र तो सब जगह मिलता है। और उससे खाद बनाने, उससे खाद्य बनाने के लिए न पानी चाहिए, न बिजली।(Hindi.indiawaterportal.org से साभार)

इसी महीने की चर्चित किताबें


किताबों के शौकीनों को जून के महीने में अगर किसी खास किताब को पढ़ने का मन है तो ये पांच किताबें पढ़ें, जो हाल ही में पब्लिश हुई हैं, हर किताब एक अलग फील्‍ड से है, हां इस महीने रोमेंटिक नॉवेल की कमी सी है मार्केट में…लेकिन सच मानिए इन किताबों का भी एक क्‍लास है, इनकी खास शैली ही इन्‍हे आपको राइटर का फैन होने पर मजबूर कर देती है। तो आइए जानते है उन पांच किताबों के बारे में -
ए गारलैंड ऑफ मैमोरीज : यह किताब प्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉण्‍ड ने लिखी है। इस किताब में उन्‍होने दून में बिताए अपने बचपन के दिनों का वर्णन किया है। किताब को रस्किन जी के 79 वें जन्‍मदिन के अवसर पर यानि 19 मई 2013 को प्रदर्शित किया गया था। किताब में दून की सुंदर यादें वाकई में अपना बना देती है।
ट्रोजन हॉर्स : इस किताब को बेहद दिमाग लगाकर, परखकर मार्क रसिनोविच ने लिखा है। पूरी किताब में साइबर वर्ल्‍ड के बारे में बात हुई है। लेखक ने दुनिया को साइबर क्राइम के बारे में किताब के माध्‍यम से आगाह किया है। साइबर दुनिया के विस्‍तार के साथ इसे एक खतरनाक हथियार के रूप में अपनाने की सम्‍भावनाएं भी बढ़ गई है जिसे इस बुक में बखूबी स्‍पष्‍ट कर दिया गया है।
गुड नाइट एंड गुड लक : कुसुमांजली रविन्‍द्रनाथ ने वाकई बेहद बखूबी से संग जेनेरशन की बच्‍चे पालने की जद्दोजहद को समझा है और इस किताब में लिखा है। 299 रूझ की इस किताब में एक मां और उसके बच्‍चे की कहानी है। दिल को छू लेने वाली इस किताब में आधुनिक पीढी द्वारा बच्‍चों को पालने के पहले साल की मिथ और सच के बारे में बताया गया है।
  हॉफ ए रूपिज स्‍टोरी : इस किताब के लेखक गुलजार है और शायद इतना बता देना ही काफी होगा। मई के आखिर सप्‍ताह में पब्लिश हुई इस किताब की मार्केट में धूम है। इस बुक में गुलजार ने एक सुसाइड बॉम्‍बर की कहानी सामने रखी है जो प्रधान मिनिस्‍टर को उडाने की साजिश करता है। किताब का अनुवाद सुन्‍जॉय शेखर ने किया है।
द टेस्‍ट ऑफ माई लाइफ : युवराज सिंह ने अपनी जिन्‍दगी के सबसे संघर्ष भरे समय को इस किताब में लिखा है। किताब में कैंसर के दौर के बाद उभरने और फिर से सामान्‍य जीवन होने की अवधि को बताया गया है। प्रेरणा के लिए इसे पढ़ना वाकई में अच्‍छा रहेगा, खाकर उन लोगों के लिए जो इस दौर से या उनके परिवार को कोई इस दौर से गुजर रहा है।

बच्चों के लिए बड़ों की किताबें



विजय मिश्र

समय-समय पर बहुत से प्रसिद्ध और महान लोगों ने बच्चों के लिए किताबें लिखी हैं, जो कि न सिर्फ बहुत ही ज्यादा चर्चित हुईं, बल्कि लोकप्रिय भी रहीं। इसी क्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा उनके बच्चों के लिए लिखी किताब प्रकाशित हुई। इस किताब को बच्चों ने हाथों-हाथ लिया। इसी तरह से अनेक अन्य प्रसिद्ध लोगों ने भी बच्चों को अपने अनुभव और जिंदगी को कैसे जीया जाए, ये बातें बताने के लिए अनेक किताबें, लैटर और कविताएं लिखी हैं।
दोस्तो, अगर आप कोई नयी चीज सीखते हैं तो इसमें सबसे बड़ा हाथ बड़ों के गाइडेंस का ही होता है। ये बात अलग है कि वो कभी डांट के साथ मिलता है तो कभी पुचकार के साथ। देश-दुनिया के अनेक महान और प्रसिद्ध लोग बड़े होने के बावजूद अपने बचपन से जुड़ी मीठी यादें भुला नहीं पाते। अपने बचपन को याद करने और आगे आने वाली पीढ़ी को अपने जिंदगी भर मिले खट्टे-मीठे अनुभवों से वाकिफ करवाने के लिए अनुभवी लोग जिस चीज का सबसे ज्यादा सहारा लेते हैं वो हैं किताबें, लैटर और कविताएं। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू अपने अति व्यस्त कार्यक्रम से थोड़ी सी फुर्सत पाते थे तो अपनी लाडली बेटी इंदिरा को पत्र लिखा करते थे। पंडित नेहरू के ये पत्र ही थे, जिन्होंने इंदिरा को इतना सशक्त बना दिया कि बड़ी से बड़ी दिक्कतों का सामना करने में उनको तनिक भी मुश्किल नहीं आयी।
इसी तरह से रवीन्द्र नाथ ठाकुर की किताबें भी पढ़ने में आप सबको बहुत ही मजा आएगा और जोश भी। रवीन्द्र नाथ की किताबें बच्चों का मनोरंजन करने के साथ ही उनका मार्गदर्शन भी करती हैं। इनकी सबसे प्रसिद्ध कहानी ‘काबुलीवाला’ है, जिसमें कि एक काबुलीवाला ‘रहमत’ नाम का चरित्र है और दूसरी छोटी बच्ची ‘मनी’ है। इस कहानी को पढ़ते-पढ़ते आप अपनी भावुकता को रोक नहीं पाएंगे। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम बच्चों से विशेष लगाव रखते हैं। कलाम इस बात के लिए हमेशा तैयार रहते हैं कि बच्चे उनसे सवाल पूछें और वो उनको जवाब देकर संतुष्ट कर सकें। यहां तक कि जब वो राष्ट्रपति पद पर थे तो भी जगह-जगह जाकर बच्चों से मिला करते थे। आज भी उनसे सवाल पूछने और बात करने के लिए बच्चों के पत्रों का ढेर उनके घर पर लगा रहता है।
एक पत्र के जरिए ही सोनीपत के एक बच्चे ने उनसे सवाल किया था कि आप इतना व्यस्त रहते हुए भी हम लोगों के लिए टाइम कैसे निकाल लेते हैं तो इसके जवाब में पूर्व राष्ट्रपति कलाम ने उत्तर लिखा, ‘मेरे अंदर हमेशा कुछ नया जानने की इच्छा रहती है, जिससे मैं अपने काम को ठीक तरीके से कर पाता हूं और मैं कोशिश करता हूं कि अगर कोई और भी खासकर वो जो देश का भविष्य हैं, किसी प्रश्न का सही उत्तर मुझसे पा सकें तो शायद मैं इस देश को अपना कुछ योगदान दे सकूं।’ ऐसी कलाम न जाने कितनी चिठ्ठियां आप लोगों के लिए लिखते रहते हैं, कभी जवाब के रूप में तो कभी सार्वजनिक पत्र के रूप में।
प्रसिद्ध गीतकार गुलजार ने भी बच्चों के लिए बोस्की के कप्तान चाचा नाम से एक किताब लिखी है। गुलजार अपनी बेटी मेघना को प्यार से बोस्की कहते हैं। इस किताब के जरिए गुलजार बच्चों को एक ऐसे किरदार ‘कप्तान चाचा’ से रू-ब-रू करवाते हैं, जो कि ऊपर से जितना सख्त तो अंदर से उतना ही नम्र है। कार्टून देखने में मजा तो आता है, लेकिन कभी टाइम मिले तो इन किताबों को अपनी आस-पड़ोस की लाइब्रेरी में तलाश कर जरूर पढ़ना। यकीनन कार्टून देखने से ज्यादा मजा इन किताबों व कहानियों को पढ़ने में आएगा।
बुक्स  फॉर यू
कुत्ते की कहानी : प्रेमचंद
अब्बू खां की बकरी : डॉ. जाकिर हुसैन (पूर्व राष्ट्रपति)
बजरंगी-नौरंगी : अमृतलाल नागर
पहाड़ चढ़े गजनंदनलाल : विष्णु प्रभाकर
बोस्की के कप्तान चाचा : गुलजार
बिना हाड़-मांस के आदमी : मोहन राकेश
वापसी : भीष्म साहनी
बड़ा कौन है : हजारी प्रसाद द्विवेदी
कमलेश्वर के बाल नाटक : कमलेश्वर
कोहकाफ का बंदी : लेव तोलस्तोय
लाखी : अंतोन चेखव
बहादुर टॉम : मार्क ट्वेन
कब्बू रानी : विजयदान देथा

69 सालों के बाद लाइब्रेरी में वापस लौटी एक किताब


एस्टोनिया की राजधानी टाल्लिन की सेट्रल लाइब्रेरी में एक पाठक ने 69 सालों के बाद एक किताब वापस लौटाई। लाइब्रेरी ने कभी उम्मीद भी नहीं कि थी कि कोई पाठक 69 साल पहले ली गई किताब वापस लौटाने आएगा। फ्रांस के प्रसिद्ध लेखक एमिली जोला के समकक्ष माने जाने वाले एस्टोनिया के प्रसिद्ध लेखक एडवर्ड विल्डे की 1896 मे प्रकाशित हुई किताब ‘कुलमाले माल्ले’ को वह पाठक सात मार्च 1944 को लाइब्रेरी से लिया था।

.... और नाजियों ने फूंक दी बीस हजार किताबें



           जर्मनी में नाजियों ने 10 मई 1933 को उन लेखकों की किताबें जलाईं थीं, जिन्हें वे नापसंद करते थे. और उनकी मदद की थी छात्रों ने. जो किताबें जला रहे थे, कुछ साल बाद वे इंसानों को जला रहे थे. 80 साल पहले की वह शाम. बर्लिन में ओपेरा स्क्वायर पर 70,000 लोगों की भीड़ जमा थी. छात्र वहां ट्रकों में भर कर 20,000 से ज्यादा किताबें लाए थे. ये किताबें जर्मनी के प्रसिद्ध लेखकों हाइनरिष मान, एरिष मारिया रिमार्क या योआखिम रिंगेलनात्स की थी. हिटलर की नाजी पार्टी के छात्र नेता हर्बर्ट गुटयार ने नफरत से भरा भाषण दिया, "हमने अपनी कार्रवाई जर्मनहीन भावना के खिलाफ शुरू की है. मैं सारी जर्मनहीन चीजें आग को भेंट करता हूं." 23 वर्षीय गुटयार के सामने आग जल रही थी, जिसमें हजारों किताबें डाल दी गईं. वह पहला था जिसने किताबें आग में डालनी शुरू की.
           कई शहरों में इस तरह के दृश्य 10 मई 1933 को जर्मनी के दूसरे शहरों में भी दिखाई दिए. सभी जर्मन शहरों में जहां विश्वविद्यालय थे, छात्रों ने उन लेखकों की किताबें जलाईं जो उनके विचारों के अनुरूप नहीं थी. इस दिन के हफ्तों पहले से वे नापसंद लेखकों और पत्रकारों की किताबें सरकारी और दूसरी लाइब्रेरियों से ले जा रहे थे. उनके विचार में इन किताबों में जर्मन भावना नहीं थी या उनके लेखक नाजियों के दुश्मन थे. उनमें खासकर समाजवादी, शांतिवादी और यहूदी लेखक शामिल थे. नाजी छात्रों को किसी विरोध का डर नहीं था. लाइब्रेरी के कर्मचारी और बहुत से प्रोफेसर इस खुली चोरी को बर्दाश्त कर रहे थे, भले ही उन्होंने उसका समर्थन न किया हो.
जर्मन छात्रों ने किताबें जलाईं
जनवरी 1933 में नाजियों के सत्ता में आने के बाद आडोल्फ हिटलर को तानाशाही अधिकार दे दिए गए थे. अब जर्मनों के विचारों के लिए लड़ाई शुरू हुई. जर्मन छात्र संघ ने अप्रैल 1933 में नारा दिया, "राज्य पर कब्जा हुआ, कॉलेजों पर अभी नहीं. वैचारिक एसए आया, झंडा बुलंद करो." छात्रों के प्रतिनिधियों के इस संगठन ने उसके बाद जर्मनहीन भावना के खिलाफ अभियान छेड़ा, जिसकी समाप्ति 10 मई को किताबों को जलाने के रूप में हुई. इस अभियान में नाजी पार्टी के नेता शामिल नहीं थे. छात्रों ने खुद इसकी योजना बनाई और उसे अंजाम दिया.
जलती देखी अपनी किताब
बर्लिन के केंद्र में ओपेरा स्क्वायर पर किताबों को जलाना छात्र संघ के अभियान का केंद्रीय आयोजन था. इसका सीधा प्रसारण रेडियो पर किया गया और उसकी खबर इस तरह जर्मन ड्रॉइंगरूमों तक पहुंची. बहुत से छात्र नाजी संगठन एसए और एसएस के वर्दियों में आए. अपनी बर्बरता के कारण ये संगठन बाद में काफी कुख्यात हुए. नियमित अंतराल पर नारा लगाया जाता और चुनिंदा छात्र कुछ कुछ समय बाद किताबों को आग की बलि चढ़ाते. दूसरा नारा था, "नैतिक पतन और गिरावट के खिलाफ. परिवार में अनुशासन और नैतिकता के लिए. मैं हाइनरिष मान, ऐर्न्स्ट ग्लेजर और एरिष केस्टनर की किताबें आग की भेंट करता हूं." और यही एरिष केस्टनर, एमिल और कुछ जासूस जैसी बच्चों की किताबों के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लेखक हैं, उस दिन बर्लिन में ओपेरा स्क्वायर पर मौजूद थे और दर्दनाक घटना के गवाह बने.
बाद में उन्होंने लिखा, "मैं यूनिवर्सिटी के सामने खड़ा था, एसए की यूनिफॉर्म पहने छात्रों के बीच, देखा कि हमारी किताबों को आग में फेंका जा रहा है." उन्होंने इस घटना पर टिप्पणी की, "यह घृणित था." किताबें जलाने के समय यूनिवर्सिटी के बहुत से प्रोफेसर भी मौजूद थे.
विदेशों में नाराजगी
किताबें जलती रहीं. मध्य रात्रि में वहां पर योसेफ गोएबेल्स पहुंचा, नाजी सरकार का प्रोपेगैंडा मंत्री और जर्मन विद्या का पीएचडी. उसने वहां इकट्ठी भीड़ और रेडियो के जरिए घर में बैठे लोगों को संबोधित किया, "जर्मनी के पुरुषों और स्त्रियों, अतिरंजित यहूदी बौद्धिकता का काल बीत चुका. और जर्मन क्रांति की सफलता ने जर्मन रास्ते को साफ कर दिया है." गोएबेल्स ने इस बात का अहसास नहीं होने दिया कि वह छात्रों द्वारा खुद आयोजित मुहिम पर कितना संदेह करता था. उसे और हिटलर को नाजी आंदोलन पर नियंत्रण खोने का डर सता रहा था.
लेकिन सिर्फ यही कारण नहीं था कि हिटलर ने इसके बाद अपने समर्थनों को शांत करने की कोशिश की. विदेशों में किताबों को जलाने की भारी निंदा हुई थी. अमेरिकी पत्रिका न्यूजवीक ने इसे "किताबों का होलोकॉस्ट"  कहा. जिन लेखकों की किताबों जलाईं गईं उनमें शामिल कवि हाइनरिष हाइने ने 1821 में लिखा था, "जहां लोग किताबें जलाते हैं, अंत मे वहां इंसानों को भी जलाते हैं." हाइने के शब्द भयानक तरीके से भविष्वाणी से साबित हुए. कुछ ही साल बाद जर्मनी में यहूदियों का नरसंहार शुरू हुआ, जिसे आज होलोकॉस्ट के रूप में जाना जाता है.
जर्मनी में 1933 के बाद बुद्धिजीवियों और कलाकारों का पलायन शुरू हो गया. विदेशों में कवियों और विचारकों का देश कहे जाने वाले जर्मनी ने अपनी बड़ी प्रतिभाओं को देश छोड़कर भागने को मजबूर कर दिया. लेखक थोमास मान, एरिष मारिया रिमार्क और लियोन फॉएष्टवांगर और उनके जैसे बहुत से बड़े बुद्धिजीवी एक के बाद एक नाजी जर्मनी छोड़कर चले गए. उनमें से कुछ नाजियों के खिलाफ सक्रिय रहे. नोबेल पुरस्कार जीतने वाले थोमास मान ने दूसरे विश्व युद्ध में बीबीसी के जरिए जर्मन जनता को संबोधित किया, "यह एक चेतावनी वाली आवाज है, आपको चेतावनी देना एकमात्र सेवा है जो एक जर्मन आज आपके लिए कर सकता है."
जो देश छोड़कर नहीं गया, उस पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जैसे एरिष कैस्टनर. 1934 तक 3000 से ज्यादा किताबों को सेंसर कर दिया गया था. जर्मनों के बहुमत ने, जिनमें बहुत से बुद्धिजीवी और प्रोफेसर भी शामिल थे, किताबों को जलाने और सेंसरशिप पर चुप्पी साधे रखी, उसका विरोध नहीं किया. कुछ ने तो उसका स्वागत भी किया. मई 1933 का एक और कड़वा सबक यह है कि सबसे ज्यादा छात्र ही जर्मन वैचारिक दुनिया को चुप कराने का कारण बने। ( फॉन लुप्के/एमजे/ आभा मोंढे)