Friday, 23 January 2015

सर्वे 'आजतक' : दिल्ली की पहली पसंद केजरीवाल

आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी, लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि पॉपुलैरिटी के मामले में 'आम आदमी' केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी आगे निकल गए हैं. इंडिया टुडे-सिसरो के सर्वे में ये सब बातें सामने आयी हैं.
पिछले साल 49 दिन तक दिल्ली की सत्ता संभालने वाले पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पॉपुलैरिटी के मामले में किरण बेदी से आगे हैं. गौरतलब है कि बीजेपी ने किरण बेदी को दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है. मुख्यमंत्री के तौर पर दिल्ली के लोगों की पहली पसंद केजरीवाल हैं और दूसरे नंबर पर किरण बेदी ही हैं. एक और चौंकाने वाली बात ये है कि इस मामले में किरण बेदी ने बीजेपी के सभी पुराने धुरंधरों को पछाड़ दिया है.
इसी हफ्ते के शुरू में हुए इंडिया टुडे-सिसरो पोल में दिल्ली के 41 फीसदी लोग आम आदमी पार्टी के संयोजक को मुख्यमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं, जबकि किरण बेदी को 38 फीसदी लोग पसंद करते हैं. लेकिन इस रेस में कांग्रेस बहुत पीछे है और दिल्ली चुनाव में उनके चेहरे अजय माकन को सिर्फ 12 फीसदी लोग ही मुख्यमंत्री के तौर पर देखते हैं.
बीजेपी में किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने पर लोगों की मिलीजुली राय देखने को मिली. जहां 43 फीसदी लोगों को यह फैसला सही लगा वहीं 44 फीसदी लोगों का मानना है कि किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना गलत है. इस सर्वे में भाग लेने वाले आधे से ज्यादा लोगों का मानना है कि चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार वोट खींचने में अहम भूमिका निभाता है, जबकि पार्टी के नाम पर सिर्फ 23 फीसदी वोट मिलते हैं.
केजरीवाल पर दिल्ली का दिल
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के बारे में भी दिल्ली की जनता से कई सवाल किए गए. हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने केजरीवाल को भगोड़ा कहा था, लेकिन दिल्ली की जनता ऐसा नहीं मानती है. दिल्ली के सिर्फ 30 फीसदी लोग उन्हें भगोड़ा और मात्र 14 प्रतिशत लोग उन्हें अराजक समझते हैं. जब लोगों से पूछा गया कि मोदी के कहने के अनुसार क्या केजरीवाल को जंगल में जाकर नक्सलियों के साथ रहना चाहिए तो आश्चर्यजनक रूप से 44 फीसदी लोगों ने हां में जवाब दिया, जबकि 34 फीसदी लोगों को लगता है कि प्रधानमंत्री को ऐसा बयान नहीं देना चाहिए था.
हालांकि पिछले साल 49 दिन में ही सरकार से इस्तीफा देने के कारण केजरीवाल की हमेशा आलोचना होती है. और केजरीवाल खुद भी इसे अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी गलती मानते हैं, लेकिन उनके लिए राहत की बात ये है कि दिल्ली के करीब 50 फीसदी वोटर उन्हें पसंद करते हैं. 25 फीसदी लोग उन्हें करिश्माई नेता मानते हैं, जबकि 22 फीसदी लोग राजनीतिक नेता.
किरण बेदी पर दिल्ली की राय
आनन-फानन में किरण बेदी को बीजेपी में शामिल किए जाने पर दिल्ली के 37 फीसदी वोटरों का मानना है कि उन्हें केजरीवाल की काट के तौर पर पार्टी में शामिल किया गया है. हर चुनाव में मोदी के चेहरे को सामने रखकर वोट मांगने और दिल्ली में किरण बेदी को सीएम उम्मीदवार घोषित करने को भी दिल्ली के वोटर बीजेपी की रणनीति में बदलाव के तौर पर देखते हैं. कम से कम 12 फीसदी लोगों का मानना है कि इस बार बीजेपी को भी मोदी लहर पर भरोसा नहीं है.
जब लोगों से पूछा गया कि क्या बीजेपी के लिए किरण बेदी स्वभाविक चुनाव हैं तो 28 फीसदी लोगों ने हां में जवाब दिया. 13 फीसदी लोगों को लगता है कि दिल्ली में बीजेपी के पास कोई चेहरा ही नहीं था. दिल्ली के 65 फीसदी वोटरों का मानना है कि किरण बेदी ने बीजेपी में शामिल होकर सही किया.
(आजतक से साभार)

Thursday, 22 January 2015

एक टीवी एंकर पर लघु शोध प्रबंध/शुभम श्री

(मसलन रवीश कुमार के साहित्य में मीडिया चेतना अथवा रवीश कुमार: भाषा एवं सृजन कर्म)
पटना में भी अलबत्त लोग मिलेंगे । सीधे पूछिए, टेढ़ा बताएंगे । टेढ़ा पूछिए, माथा पर चढ़ के नाचने लगेंगे, मने ननिहाल को दें कि ददिहाल को, सात पुश्त को गरियाएंगे जरूर । जैसे कि आप पूछिए “बेली रोड कहां है ?”  “हम्मर कपार पर ।” “चिड़ैयांखाना केन्ने है हो ?” “हम आमदी बुझाते है कि जेनावर”, “अरे पहिले चिड़ैयांखाना न बताइए”, “नहीं पहिले आप किलियर किजिए आमदी कि जेनावर ।” मतलब अकच्च कर देगे एकदम से । अपने मन से किसी के लिए दो शब्द बढ़िया भले नहीं निकले, दूसरा कोई उरेब बोल दे, फिर देखिए । “अरे बिहार में कहां कोई हीरो हुआ है जी ।“ “हुआ नहीं है आंय । सतरूघ्घन सीन्हा, मनोज बाजपेई का है ।“ “भक्क मनोज बाजपेई हीरो थोड़े हुआ, उ तो सिनेमा में एक्टींग करता है । हीरे मने अमिताबच्चन, सारुक्खान, सन्नी दिओल ।“ “का बात करते है मर्दे । साला सतरूघ्घन सीन्हा बोलता है तो हिला देता है । ब्बात करते हैं ।“ आप नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर लीजिए, कदमकुंआ में आपके पड़ोसी कहेंगे, आही रे दादा, उ चसमुलवा के नोबेल भेट गेलई । एहिजे खेलत रहल हलई । जिसको ठीक से बुझाया नहीं कि आप किए क्या हैं, का जनी कौची करत हलई दिल्ली में, अच्छा पइसा कमाब हई । ऐसे सीन में कुछ लोग गर्दा करने वाले भी होते हैं । जनले कि न, उ नटुलिया के भइबा एसएससी कर गेलऊ । इनकम टेक्स भेतटई सीधे । रेलवे, एसएससी, बेंक पीओ माने गर्दा । बीपीएससी चाहे यूपीएससी तहलका । आइआइटी मने उ सब एभरेज माइंड नहीं न है जी ।
इ सब भूमिका है थोड़ा । छोटू मामा के अनुसार तूम कमीसन में गायरेंटीड फेलियर । टू द पवांइट बोलो, एन्ने ओन्ने मत लसको । लेकिन लसकना परता है । पिछले साल पटना गए तो गप चला कौन क्या, कहां । गुड्डू मामा बताने लगे कि पटना केतना एडभांस हो गया है, फलाई ओभर बन रहा है, उसी में चर्चा चला । अरे इ रबीस कुमार तो गजब नाम कमाया । हां उनका रिपोर्ट बहुत अच्छा होता है । उसको पराइम टाइम न दे दिया जी । तुम समझे नहीं, उ सब रिपोटर रैंक से बहूत उप्पर चल गया की । हम त कहलिक मारले हई जमा कर के । अ जानित हें, अइसेंही बोल हई । हां मामाजी । फिर मामाजी को फील हो गया कि अब रिवर्स गियर में जाना चाहिए । अरे इ लोग तो हम लोग के सामने आया है । उ तो एहिजे साइकिल चलाते रहता था । बंगाली से न सादी किया है ।
कौन जात हई, केकरा से बियाह करले हई, ये कांसटेट वेरियेबल है हर किसी के लिए । ऐसा नहीं था कि पहले बिहार में कम पत्रकार हुए थे लेकिन रवीश कुमार के फेनोमेनन को, फेनोमेनन कहना ज्यादा सही होगा, अलग तरह से देखने की जरूरत है । बिहार में लंबे समय से चल रहे पलायन के इतिहास को देखें तो भोजपुर क्षेत्र से दूर दराज नौकरी की तलाश में गए लोगों की दास्तान मौजूद है । कलकत्ता से लेकर आसाम तक बिहार के मजदूर फैले हुए थे । फिर यह चलन पंजाब, हरयाणा की ओर हुआ । लेकिन नब्बे के बाद पहली बार बड़ी संख्या में बिहार से विद्यार्थियों ने पलायन करना शुरू किया । इसकी एक वजह में बिहार में शिक्षा व्यवस्था का अपंग हो जाना था, दूसरी वजह नौकरी की जरूरत थी । जिनके पास जमीनें थीं, उन पर कब्जा हो रहा था, फसल कटाई के लिए पुलिस बुलानी पड़ रही थी । ले देकर गांव देहात के विद्यार्थियों के लिए एक ठिकाना था पटना लेकिन पटना में महेन्द्रू घाट या बहादुरपुर के लॉज में रहकर एक के बाद एक अटेंप्ट देते छात्रों के लिए दो रास्ते थे, परीक्षा में सेटिंग कराना, पैरवी चलवाना और कुछ ले देकर नौकरी पा लेना वरना प्राइवेट । प्राइवेट की मजबूरी में बड़ी संख्या ने दिल्ली का रुख किया । इसमें एक वर्ग उन छात्रों का था जो तैयारी के लिए पटना के बजाय दिल्ली जाने लगे । ये वो लोग थे जो सो कॉल्ड कमीसन मेटेरियल माने जाते थे ।
अच्छे विद्यार्थी की एक ही निशानी थी- मैथ ठोस । इंग्लिस ठोस का मतलब था ट्रांसलेसन बनाना । जिसने नवोदय निकाला वो अच्छा, सैनिक निकाला वो साइनिंग और जो नेतरहाट कर गया वो क्रीम । इस पैमाने पर चक्रवर्ती ब्याज गणित, रेपीडेक्स, रिजनिंग तीनों घोल कर पी जाने वाले आते थे । लेकिन नेतरहाट क्रैक करने वाले क्रीम तक के लिए इंग्लिस ठोस मतलब ट्रांसलेसन ही था । फर्राटा इंग्लिस वो दुखती रग थी जिसकी कमी पहली बार दिल्ली जाने वालों ने महसूस की । प्राइवेट नौकरियों के लिए बाहर निकले लोगों ने अपने घरों में इस जरूरत को महसूस कराया कि इंग्लिस मीडियम फोकस और फूस फास नहीं है । मैथ में भुसगोल चलेगा, अंग्रेजी कमजोर नहीं चलेगा । हिन्दी माध्यम से पढ़े छात्रों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही थी । चुनोती तो खैर शुद्ध हिंदी बोलना भी थी । शुद्ध मतलब बिना दरभंगा, आरा, छपरा, बेगूसराय के टोन के । हम औयेंगे नै तब तुम जांनां । उ लरका गिड़ गया । वैं उठने नय सका । हम नय जाएंगे । बहुत कोशिश के बाद, नियम कानून बनाने के बाद भी मुंह से रिक्सा निकल जाता था, नय नहीं बंद हो पाता, र ड़ की उलझन तो खैर थी ही । इसलिए पुण्य प्रसून वाजपेयी की नकल का जब क्रेज चला तो नई उमर के लड़के कॉपी मोडडकर कोशिश करते- नमस्कार मैं हूं पुन्य परसून बाजपेई । पुण्य प्रसून मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था । ये नब्बे का आखिरी दौर रहा होगा । जब दिल्ली से लौट कर आने वाले मजदूर फर्राटेदार मैं, मेरे को झाड़ने लगे । यह मध्यवर्गीय घरों के लिए शॉक था । पटना के ऊपरी आमदनी युक्त घरों में मार काट मचा कर माइकल, जोसेफ, नेटरोडम के लिए हात पांव मारे जाने लगे । इसी दौर में घरों में नियम बनाए जाने लगे कि पढ़ने के समय इंग्लिस में बात करना है, फ्लो बनेगा । पापा से इंग्लिस में बात करना है, कोई आया तो इंग्लिस बोलना है । इंग्लिस वर्ड यूज करन है । इस नाजी शासन की मार में आंय और काहे बोलने से तौबा नहीं कर पाने वालों की भारी कुटाई हुई ।
पटना का वो तबका जो एलीट था, जिनकी पहुंच थी यानी जिनके यहां सेंट माइकेल और सेंट जोसेफ के बाद वीमेंस कॉलेज या साइंस कॉलेज जाने का रिवाज था उसके नीचे पटना के मध्यवर्ग और बाबू समुदाय ही नहीं बिहार भर में बाहर निकलने की लहर चल चुकी थी । बी.एड कॉलेज लालू यादव ने बंद करा दिए थे, बीपीएससी में खुल कर धांधली चल रही थी, उपाय नहीं था । बाहर निकलने का रास्ता था इंग्लिस और टोन से निजात पाना । दोनों ही मुश्किल था ।
रवीश कुमार बिहार के उन ब्यूरोक्रेट या जमींदार परिवारों से नहीं है जिनके लिए आम लोग कहें कि उनका छोडिए ना । रवीश कुमार का प्राइम टाइम में आना उस आहत बिहारी के लिए इगो बूस्टर है जो आंय और काहे से निजात नहीं पा सका । कोई हमारे जैसा, रलवे, बैंक, कमीसन बिरादरी का, जो टीवी में आ गया । यह आपसी रिश्ता है जिसके कारण पूर्णिया, कटिहार, मधेपुरा का कोई भी चौड़ाई लेकर आपको नोएडा फिल्म सिटी में डॉयलॉग मारता मिल जाएगा । अरे उ तो अपना आदमी है । रबीस कुमार को नही जानते हैं, अरे उ जो अएंकर है ।
इस पहचना को बनाने में टीवी ने बड़ी भऊमिका निभाई । बेरोजगारी के जिस दौर में क्रीम स्टूडेंट बाहर निकल रहे थे, उसी दौर में लंबी बेरोजगारी से त्रस्त होकर कई लोग केबल के धंधे में उतर रहे थे । जिनके घरों में कभी अखबार नहीं आया, उनके यहां केबल आया । जिनकी रंगीन टीवी खरीदने की औकात नहीं थी, उनके यहां भी टीवी आया क्योंकि उस दौर में लगभग हर दहेज में हीरो होंडा मोटरसाइकिल और रंगीन टीवी दिए गए । इतिहास में दर्ज होना चाहिए कि भारतीय औरतों ने रंगीन टीवी के लिए सबसे ज्यादा कुर्बानी दी । कितनी बहुओं की हत्याएं रंगीन टीवी के कारण हुईं, यह आंकड़ों में दर्ज है । यही दौर था जब रोहतास में बीडीओ देवरानी को स्टार प्लस देखने वाली क्लर्क जेठानी डाउन मार्केट समझने लगी । बीडीओ और क्लर्क जाहिर है उऩके पति थे लेकिन उस नाते वह खुद को उसी रेंक का मानती थीं । टीवी मध्यवर्गीय घरों में एक एलीट सदस्य था । वह दूसरी भाषा बोलता था, वह दूरदर्शन के कृषि दर्शन से आगे बढ़ कर चमकदार हो गया था । संजीव कपूर के कुकरी शो से कद्दूकस को ग्रेट करना, छीलने को पील करना और मेरिनेट करना सीख कर बी.एन मंडल से फर्स्ट डिवीडन दीदियां अपनी धाक जमाने लगीं और खुद को वीमेस कॉलेज की ग्रेजुएट बताने लगीं । टीवी अपने साथ आत्म विश्वास लाया । अब सरस सलिल की क्लीवेज दिखाती कवर पेज वाली लड़की, सेक्सोलॉजी दर्पण या ब्लू फिल्म का घिर घिर करने वाला वीसीआर नहीं था । अब फैशन टीवी था जहां बिकनी पहन कर मॉडल चलती थीं । नंगी औरतों का तूफान आ गया था, दुनिया बदल गई थी ।
ये दुनिया दिन रात आंखों के सामने थी, यह लालसा थी, मध्यवर्ग टीवी की गिऱफ्त में था । टीवी नीचे पहुंच रहा था । वह मिट्टी के घरों का रुख कर रहा था । चार पांच साल पहले की बात होगी । बासुकीनाथ-देवघर रोड पर आदिवासी घर था । दादी लगातार गाली देती जा रही थी और अपनी पोती को बुलाती जा रही थी । सात फेरे शुरू होने वाला था और पोती गायब । अंत में उस औरत ने अपनी चाय की दुकान में बैठी बोल बम औरतों से सात फेरे देखने की पेशकश की ताकि वे उसे नाहर और सलोनी के डॉयलॉग ठीक ठीक समझा सकें । टीवी ने उन युवाओं को सुविधा दी कि वे रेपीडेक्स और ट्रांसलेसन के चक्कर में पीछे रह गए फ्लो को आगे बढ़ाएं । उनके पास हर्षा भोगले था जो समझ में आता था ।
उस टीवी पर अपनी बिरादरी से निकल कर किसी को देखना, जिसने न टोन ठीक किया, न अंग्रेजी, हीनभावना से ग्रस्त, असफलता से आक्रांत बिहारी के लिए खुद को देखना था, यह उसकी जीत थी । जैसे सचिन का शतक भारतीय अहम के लिए आत्मविश्वास का सबब था । सचिन जैसे तैसे होना नहीं, बेस्ट होना था, और वह भारतीयों के लिए खुद को बेस्ट समझने का सबब था । रवीश कुमार और उन जैसे कई लोगों ने अपनी पहचान कुछ इस तरह बनाई कि अंग्रेजीदां तबकों में कुछ ऐसे परिचय दिया जाने लगा कि अंग्रेजी उनकी कमजोर है पर हिन्दी में बेहतरीन लिखते हैं । यह हिन्दी माध्यम का धारा के विपरीत तैरना था । धारा को बदलने का काम टीवी ने किया । जैसे धारा को बदलने का काम इंटरनेट कर रहा है । भदेस होना स्टाइल हो गया, वह हम्बल और रूटेड होना हो गया । कुछ तो सबआल्टर्न की इज्जत बचाने में बुद्धिजीवी इंपोरियम का गमछा टांग कर घूमने लगे, देसी भाषा बोलने लगे, कुछ उन लोगों ने भदेस को स्टेटमेंट बनाया जिन्होंने सत्ता में समीकरण बदला और अंग्रेजीदां, एलीट वर्चस्व को तोड़ कर खुद को खड़ा किया ।
रवीश कुमार ने पत्रकारिता में वैसा ही स्टेटमेंट खड़ा किया । आप किसी भी आम आदमी से पूछिए, वो रवीश कुमार को जानता है, पी. साईनाथ को नहीं जानता । यह अंतर इसलिए है क्योंकि नीचे के पांच प्रतिशत की बात आप ऊपर के पांच प्रतिशत की भाषा में कहते हैं । इसलिए वही आपको नहीं जानते जिनकी आप बात करते हैं । दुर्भाग्य से भारतीय बुद्धिजीवियों का यही अभिशाप है कि जीवन भर जिनके लिए लिखा, सोचा वही उन्हें नहीं जानते । खैर उन महीन मुद्दों पर बात करने की अपन की औकात नहीं फिलहाल । तो रवीश की रिपोर्ट ने पहली बार टीवी पर उस भाषा को गंभीर रिपोर्ट के लिए इस्तेमाल किया जो बॉलीवुड या छोटे पर्दे पर सिर्फ कॉमेडी के लिए इस्तेमाल होती थी । यह शुद्ध हिंदी नहीं थी, यह टोनरहित भाषा नहीं थी । एलीट एंकर की काया में, न्यूजरूम में पहली बार एक मध्यवर्गीय आत्मविश्वास ने प्रवेश किया था । यह वो क्रीम बच्चा नहीं था जो टप से पनरह पचे पछोतर से बोलना चाहे पर फिफ्टीन फाइव जा सेवेंटी फाइव की हिचक में चुप रह जाए, दब जाए ।
भारतीय न्यूज चैनल पर अफसोस कि ऐसे उदाहरण अपवाद रह गए । अलग अलग जगहों से, अलग अलग भाषाओं की टोन लिए, अलग अलग जातियों के लोग स्क्रीन का समीकरण पूरी तरह बदलने नहीं आ सके । उसकी जगह महंगे मीडिया स्कूलों के अधकचरे ट्रेनी और इंटर्न ने ले ली । जो डिफरेंट है वो एक समय तक ही डिफरेंट रहता है, फिर वो मेनस्ट्रीम हो जाता है, सत्ता खुद में उसे जज्ब कर लेती है । जैसे रवीश कुमार सेलिब्रेटी बनते गए, वे लिखें शुक्रिया या वाह तो उस पर भी पचास लाइक । लेकिन रवीश की रिपोर्ट बंद हो गई । क्रांति करने के लिए आपके हाथ पैर बंधे हुए हैं । यह हिन्दी पब्लिक स्फीयर का अनिवार्य गुण है । वह आपको देवता बनाकर पूजेगा भी और मां-बहन की गाली भी देगा लेकिन वह आपको स्पेस नहीं देगा, वह आपको विकसित होने का मौका नहीं देगा । यह ब्रांड वैल्यू और ग्लैमर का दौर है । एनडीटीवी आपको पहचान देगी, काम को नहीं । जैसे रवीश की रिपोर्ट बंद होने के बाद दिल्ली मेट्रो में बड़े बड़े होर्डिंग लगे, भारत का नं 1 एंकर, प्राइम टाइम । प्राइम टाइम की बहस, उसका कंटेट सीन से बाहर । व्यक्ति को प्रोजेक्ट करना मार्केटिंग की पहली स्ट्रैटेडी होती है क्योंकि विचारधारा उसके पीछे छुप जाती है । जैसे मोदी के पीछे भाजपा और संघ छुप गए, केजरीवाल के पीछे आप की विचारधारा छुप गई । विचारधारा पर बात करना, उसे समझना मुश्किल होता है, कोई दिमाग नहीं लगाना चाहता । इंसान को आगे कीजिए, सब आसान हो जाएगा । उसकी निजी जिंदगी, उसका रहन सहन, बोल चाल, चीजें आसान हो जाती हैं । मीडिया पत्रकार को खत्म कर के सेलिब्रेटी की स्थापना करता है । यही सबसे बड़ी ट्रैजिडी है ।
हम कस्बा पर लिखने के लिए लिखना सुरु किए थे और भयानक डेविएट हो गए हैं । इसलिए अब पकाऊ हो जाएगा लेकिन हम बाज नहीं आएंगे ।
('हाशिया' से साभार)

Wednesday, 21 January 2015

पढ़ते-सुनते-देखते हुए

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को पढ़ते-सुनते-देखते हुए कई सवाल जेहन में कौंध रहे हैं। मसलन कि इस कथित साहित्य महोत्सव में कितना साहित्य, कितनी सियासत, कितना मनोरंजन, किसका साहित्य, कैसा साहित्य आदि-आदि!
उत्सव में पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज की बेटी सलीमा हाशमी भी शिरकत कर रही हैं और अभिनेता गिरीश कर्नाड, वहीदा रहमान आदि भी। फेस्टिवल के पहले दिन उद्‌घाटन के दौरान साहित्य के सियासी रंग भी, सीएम वसुंधरा राजे, जावेद अख्तर और शबाना आजमी ।
जावेद-शबाना के हाथ में राजे का हाथ। इस दौरान ऎड गुरू और गीतकार प्रसून जोशी ने बताया कि वह पीएम नरेंद्र मोदी को वह क्यों पसंद करते हैं और उनके कुछ अभियानों से वह क्यों जुडे हैं। उन्होंने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी राजनीति सही दिशा में जा रही है इसलिए वे उनके कुछ अभियानों से जुडे हैं और उनके प्रचार अभियान में काम किया है। जोशी का कहना था कि `गंदी बात` जैसे शब्दों के इस्तेमाल से बनने वाले गानों के पीछे लोगो की पसंद नहीं बल्कि लेखको की गलती है। जावेद अख्तर का कहना था कि "गंदी बात` जैसे शब्दों का प्रयोग इसलिए किया जाने लगा है क्योंकि आज लोग वही सुनना चाहते हैं। भले ही ऎसे गाने ज्यादा दिनों तक लोगों की जुबां पर नहीं रहते, लेकिन फिर भी लेखक उन्हें लिखने के लिए मजबूर हैं।
"सेवन डेडली सिन्स इन अवर टाइम" सेशन में इमिर मैकब्राइड का कहना था कि वर्तमान में धर्म से जुड़े इंस्टीट्यूशंस ज्यादा हिंसक हो गए हैं। 

Tuesday, 20 January 2015

क्रांति-क्रांति कुर्सी

क्या कहें, क्रांति-क्रांति कुदराते सियासी मैराथन में कूद पड़े बूढ़े अन्ना के दोनो पट्ट शिष्य...
तो सीएम बने उनमें जो भी,
क्या मानें कि हजार हाथो वाले हजारे के दोनो हाथ खाली या दोनो हाथ लड्डू!
और तब से आज तक छली जा रही जनता के हाथ बाबा जी का ठुल्लू....



Monday, 19 January 2015

मुरुगन पुनरुज्जीवित होंगे/प्रणय कृष्ण


तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन ने 14 जनवरी को फेसबुक पर लिखा, "लेखक पेरूमल मुरुगन मर गया. वह भगवान नहीं है, लिहाजा वह खुद को पुनरुज्जीवित नहीं कर सकता. वह पुनर्जन्म में भी विश्वास नहीं करता. आगे से, पेरूमल मुरुगन सिर्फ एक अध्यापक के बतौर ज़िंदा रहेगा, जो वह हरदम रहा है." अब तक मुरुगन के खिलाफ धर्म और जाति के स्वयंभू ठेकेदारों से लेकर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हक़ में आवाज़ उठाने वाले लोगों ने लाखों शब्द व्यय किए होंगे, लेकिन लेखक की पीड़ित अंतरात्मा की यह तीन पंक्तियां सब पर भारी हैं. लेखक मर गया, लेकिन 2015 के हिन्दुस्तान के राज और समाज की हिंसक दयनीयता जी रही है. मुरुगन का वक्तव्य ऐसे वक्त पर टिप्पणी है जिसमें जनता की वंचनाओं और हाहाकार को एक सामूहिक पागलपन की ओर मोड़ देने की पुरजोर कोशिशें हो रही हैं. अतीत की रमणीय कपोल-कल्पनाओं और भविष्य के मादक सपनों की गरज के बीच आज के भारत की कराह सुनाई देनी बंद होती जा रही है. वे सारे परदे जिनपर चित्र और चलचित्र दिखाई देते हैं और वे सारे यंत्र-तंत्र जिनसे आवाजें सुनी जाती है, झपट लिए गए हैं. मानव विकास सूचकांक में दुनिया के 135वें पायदान पर खड़े भारत की वर्तमान वास्तविकता, वास्तविक अतीत तथा यथार्थपरक भविष्य के चित्र और स्वर अदृश्य और गूंगे बनाए जा रहे हैं.
आस्था में चार साल की देरी से आए उबाल के तहत मुरुगन के जिस उपन्यास को पिछले दिसंबर महीने से निशाना बनाया गया है, वह 2010 में प्रकाशित हुआ था जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद 'वन पार्ट वुमन' के नाम से 2013 में पेंग्विन से छप कर आया. रोचक यह है कि इस उपन्यास में न तो ईशनिंदा है और न ही किसी धर्म या उसकी प्रथाओं का विरोध. उपन्यासकार ने उनपर व्यंग्य भी नहीं किया है, न कोई भंडाफोड़ किया है. उपन्यास का संवेदनात्मक उद्देश्य ही अलग है. मुरुगन की इतिहास-दृष्टि और सामाजिक चेतना मिथकों और आस्थाओं में लिपटे जीवन की वास्तविक धड़कनों और मर्म को इस उपन्यास में प्रत्यक्ष कर देती है, उनके दुश्मनों की निगाह में यही उनका अपराध है. उन्हें मुरुगन की कथा-सृष्टि भी सच की तरह डराती है. सच से ऐसा डर ही उन्हें सामाजिक सच्चाइयों के हर अनुसंधान या साहित्यिक पुनर्रचना को आस्था की तोपों से मार गिराने का अभ्यस्त बनाता है. सत्य से सत्ता का युद्ध बड़ा पुराना है, लेकिन हम जिस 2015 के भारत में रह रहे हैं, वहां सच के आखेटक पहले से अधिक मूर्ख, किन्तु प्रशिक्षित हैं.
घटनाएं        :  27 दिसंबर, 2014 के 'द हिन्दू' अखबार के अनुसार तिरुचेंगोडे नगर की आर.एस.एस. इकाई के अध्यक्ष महालिंगम ने 26 दिसंबर के दिन 50 से अधिक लोगों का जुलूस निकाला और मुरुगन के इस उपन्यास की प्रतियां जलाई. भाजपा, आर.एस.एस. तथा कुछ अन्य हिंदूवादी संगठनों ने लेखक की गिरफ्तारी की मांग भी की (हालांकि अब जबकि लेखक के समर्थन में भी आवाजें तेज़ हो रही हैं, ये संगठन समूचे घटनाक्रम में अपनी भूमिका नकार रहे हैं). इसी रिपोर्ट के मुताबिक़ बीस दिन पहले से मुरुगन को धमकियां मिल रही थीं. बाद में उपन्यास के विरोधस्वरूप शहर बंद भी कराया गया. 12 जनवरी को नमक्कल के जिला प्रशासन ने लेखक को उनके विरोधियों के साथ शान्ति वार्ता के लिए बुलाया. यहाँ प्रशासन ने मुरुगन को 'बिनाशर्त माफी' माँगने, अगले संस्करण में उपन्यास में वर्णित स्थानों का नाम बदलने और उसके 'आपत्तिजनक अंशों' को हटाने, वर्तमान संस्करण की अनबिकी प्रतियों को बाज़ार से वापस लेने और भविष्य में ऐसी कोई हरकत न करने का वचन देने संबंधी हलफनामे पर दबाव देकर दस्तखत कराया. इस प्रकार सरकारी देख-रेख में संविधान की धारा 19(1) (ए) की धज्जियां उड़ाई गयीं. ध्यान रहे मुरुगन जिस अंचल के लेखक हैं, उसी अंचल के एक सपूत थे 'पेरियार'. जातिप्रथा-विरोधी, अंधश्रद्धा-विरोधी, सेक्युलर और नास्तिक 'पेरियार' की कर्मभूमि पर एक लेखक के साथ यह सब कुछ होना भारी विडम्बना है. द्रविड़ आन्दोलन के साथ पेरियार की विरासत जुडी हुई है, लेकिन उसी आन्दोलन से निकली एक पार्टी तमिलनाडू की सत्ताधारी पार्टी है और दूसरी मुख्य विपक्षी पार्टी. सत्ताधारी पार्टी की भूमिका नमक्कल प्रशासन की हरकतों से ज़ाहिर है और विपक्षी पार्टी की भूमिका इस प्रकरण पर उसकी चुप्पी से. ( मामला तूल पकड़ने पर इस पार्टी ने लेखक के पक्ष में एक-दो बयान जारी करके छुट्टी पा ली है) अनेक लेखकों ने ठीक ही लक्ष्य किया है यह प्रकरण द्रविड़ पार्टियों की पस्ती के दौर में हिंदुत्व की ताकतों द्वारा तमिलनाडू में पाँव पसारने की कवायद का सूचक है. एक जागरूक नागरिक के रूप में मुरुगन अपने इलाके में शिक्षा की दुकानदारी के खिलाफ लिखते रहे हैं और पर्यावरण की धज्जियां उड़ानेवालों के खिलाफ भी. यह सारे निहित स्वार्थ भी उनके खिलाफ परदे के पीछे सक्रिय हैं. 48 वर्षीय मुरुगन नमक्कल में शासकीय कला विद्यालय में तमिल पढ़ाते हैं. उन्होंने अबतक 35 पुस्तकें लिखीं है जिनमें 07 उपन्यास और तमिलनाडु के कोंगू (पश्चिम) क्षेत्र की बोलियों का शब्दकोष भी शामिल है.
उपन्यास का कथानक  : यह उपन्यास कोंगू अंचल के जन-जीवन का अत्यंत संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करता है. इस अंचल के जंगल, पहाड़, वनस्पति, पशु-पक्षी, मेले, नृत्य, संगीत, खेल-तमाशे, हाट-बाज़ार, खान-पान, पहनावा, देवस्थान और उनसे जुडी आस्थाएं, लोकविश्वास और किसान जीवन को कथा में जीवंत इसीलिए किया जा पाया है कि उपन्यासकार उस अंचल का मार्मिक जानकार ही नहीं, गंभीर अध्येता भी है. उपन्यास के इसी आंचलिक परिवेश में निस्संतान किसान दंपत्ति पोन्ना(पत्नी) और काली(पति) की कोमल कथा प्रवाहित है. दोनों एक दूसरे को बेहद प्यार करते हैं. लेकिन उनके paraparpapअकुंठ प्यार पर निस्संतान होने का ग्रहण लग जाता है. रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों के ताने पोन्ना को ज़्यादा सुनने पड़ते है. तीज-त्यौहार और मांगलिक अवसरों पर कर्मकांडों के वक्त 'बाँझ स्त्री' के प्रति अपमानजनक व्यवहार के चलते वह धीरे-धीरे अपने घर की चहारदीवारी में सिमटती चली जाती है. काली को भी समय समय पर किसी न किसे प्रकरण में लज्जित होना पड़ता है. उसका भी सामाजिक जीवन सीमित होता जाता है. उसकी नपुंसकता की चर्चाएँ भी होती हैं. निस्संतान दंपत्ति की संपत्ति पर रिश्ते-नातेदारों ही नहीं, पड़ोसियों की भी निगाह है. काली को उसकी मां और दादी दूसरा विवाह करने की सलाह देती हैं. इस प्रस्ताव पर पोन्ना के मां- बाप को भी कोई ऐतराज़ नहीं है, वे इतने में ही संतुष्ट हैं कि दूसरी स्त्री के साथ उनकी बेटी भी उसी घर में रहे, निकाली न जाए. पोन्ना और काली भी कभी कभी एक दूसरे का मन टोहने या चिढाने के लिए आपस में दूसरे विवाह की बात करते हैं. पोन्ना सदैव ही भारी मन से ही सही, यह कहती है कि काली की खुशी के लिए वह इसके लिए भी तैयार है. वास्तव में दोनो ही एक दूसरे से इतना प्यार करते हैं कि मन बांटने के लिए इस प्रस्ताव पर चाहे जो चर्चा करते हों, उसकी वास्तविक संभावना को कभी मन में स्वीकार नहीं करते. काली की मां और दादी उनके परिवार पर देवी -देवताओं का श्राप मानती हैं. निर्वंश होने के श्राप से मुक्ति के लिए काली और पोन्ना वर्षानुवर्ष न जाने कितने देवी-देवताओं, मंदिरों-मठों का चक्कर लगाकर, न जाने कितनी पूजा-पाठ, व्रत-अनुष्ठान करके थक चुके हैं. काली की मां और दादी के पास परिवार पर श्राप के अलग अलग किस्से हैं. वे हर किस्से के अनुरूप श्रापमुक्ति के उपाय करते हैं. पाठक इन किस्सों में उस अंचल के तमाम सामाजिक संबंधों की भी झांकी पाता है. ये किस्से अलग-अलग जातियों के बीच, अलग अलग तबकों के बीच, आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच, स्त्री और पुरुष के बीच, औपनिवेशिक समय में अंग्रेजों और देशियों के बीच, मनुष्य और देवता के बीच संबंधों की झलक दिखलाते है. ये किस्से उस अंचल के ऐतिहासिक-सामाजिक जीवन की मिथकीय अभिव्यक्तियाँ हैं. ऐसे किस्सों और लोकविश्वासों को पिरोने और अंचल के जीवंत नृवंशीय चलचित्र प्रस्तुत करने का हुनर मुरुगन अपने अनेक उपन्यासों में पहले भी दिखला चुके हैं. अपने अंचल के प्रति गंभीर ऐतिहासिक दायित्व का निर्वाह करते हुए उन्होंने अतीत के लेखकों द्वारा उस अंचल पर लिखी गई चीज़ों की खोज की और उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित किया. उन्होंने टी.ए. मुथूसामी कोनार द्वारा इस अंचल पर लिखे इतिहास-ग्रन्थ जिसे लुप्त मान लिया गया था, उसे खोजकर पुनर्प्रकाशित कराया. (देखें ए.आर. वेंकट चेलापति का लेख, 'द हिंदू', 12 जनवरी)
एक भरा-पूरा, सुन्दर और संतुष्ट वैवाहिक जीवन सामाजिक मान्यताओं के चलते किस तरह अवसादग्रस्त होता है, लेकिन अवसाद के आगे पराजय नहीं मानता, इसे मुरुगन ने बहुत कोमल और संवेदनशील रंग-रेखाओं में अंकित किया है. काली और पोन्ना का निश्छल और उन्मुक्त प्यार समाज की मान्यताओं के टकराकर कैसे कैसे अंतर्द्वंद्वों से गुज़रता है, उसके सूक्ष्म से सूक्ष्म कंपन को उपन्यासकार की लेखनी पकड़ लेती है. वे तत्व जो इन पात्रों के मन की सुन्दर गहराइयों में लेखक की उंगली पकड़ कर उतरने की जगह उन सुन्दर उँगलियों को ही तोड़ देने को पुरुषार्थ समझे बैठे हैं, उनका कलेजा सचमुच काठ का बना है. उपन्यास का अंत ट्रैजिक है. काली के दूसरे विवाह के प्रस्ताव और श्रापमुक्ति के सभी उपाय विफल होने पर पोन्ना और काली दोनों की मांएं एक अलग योजना बनाती हैं. अर्द्धनारीश्वर के स्थानीय मंदिर में हर साल तमिल वैकासी महीने ( मई-जून) में १४ दिन का मेला लगता है. चौथे दिन पहाड़ों से देवता उतरते हैं और उनकी रथ की सवारी अगले दस दिन निकलती रहती है, अंतिम दिन वे वापस चले जाते हैं. अंतिम दिन मेले में भारी भीड़ होती है और माना जाता है कि इस दिन मेले में उपस्थित सभी पुरुष देवता होते हैं. निस्संतान स्त्रियों के लिए यह दिन भाग्यशाली होता है, जहां वे किसी देवता से समागम कर संतान-प्राप्ति कर सकती हैं. ऐसी संतानें देवता का प्रसाद या देव-संतानें मानी जाती हैं. काली की मां इस दिन पोन्ना को मेले में भेजे जाने के लिए काली को सहमत नहीं कर पाती. एक साल बीत जाता है. अगले साल मेला शुरू होने के समय काली का साला मुथु (जो उसका बाल-सखा भी है) बहन-बहनोई को इसके लिए राजी करने उनके घर आता है. मंदिर पोन्ना के घर से नज़दीक है. हर साल मेले के समय काली पोन्ना को लेकर अपने ससुराल जाया करता था और वहीं से वे मेला घूमने जाते थे. ऐसे में मुथु के आग्रह पर काली पोन्ना को तत्काल उसके साथ भेजने को राजी हो जाता है और खुद मेले के १४वे दिन आने का वादा करता है. लेकिन पोन्ना को देव-समागम के लिए भेजे जाने से वह इनकार कर देता है. मुथु बहन से झूठ बोलता है कि बहनोई काली ने इस बात की अनुमति दे दी है. पोन्ना को इसकी तस्दीक खुद काली से करने का वक्त नहीं मिलता, फिर भाई की बात पर अविश्वास का कोई कारण नहीं था क्योंकि काली और मुथु साले-बहनोई ही नहीं बाल-सखा भी थे. एक नाटकीय घटनाक्रम में चौदहवें दिन काली के ससुराल पहुँचाने के बाद मुथु सदा की तरह काली को लेकर खाने-पीने, मौज-मस्ती करने घर से खूब दूर ले जाता है, ताकि अगली सुबह तक दोनों लौट न पाएं. उधर पोन्ना के मां-बाप उसे लेकर बैलगाड़ी में मेले की ओर चल देते है. काली और मुथु दूरस्थ स्थान पर खाने-पीने के बाद सो जाते हैं. लेकिन काली की नींद आधी रात के बाद खुल जाती है. वह वापस ससुराल की ओर चल पड़ता है. भोर में वहां पहुँच कर जब उसे ताला जडा मिलता है, तो उस पर वज्रपात सा होता है. उसकी भावनाएं पछाड़ खाकर गिरती हैं. उसे लगता है कि पोन्ना ने उसके साथ धोखा किया है. यहीं उपन्यास ख़त्म होता है.
ट्रेजेडी का भाव सघन इसलिए होता है कि दरअसल किसी ने किसी को धोखा नहीं दिया. मुथु, काली की माँ, उसके सास-ससुर- सभी काली और पोन्ना का दुःख दूर करना चाहते हैं. मुथु ने इसी खातिर बहन से झूठ बोला. पोन्ना मेले में जाने को खुद तत्पर नहीं है. वह काली को खुश देखना चाहती है, उसके किए बड़ा से बड़ा त्याग करने को तैयार है, ऐसे में उसकी रजामंदी जानकार वह मेले में जाने को तैयार होती है. यह निश्छल भावनाओं की ऐसी दुनिया है जहां हरेक व्यक्ति जो कर रहा है वह दूसरे की खुशी के लिए कर रहा है, लेकिन परिणाम वह निकलता है जो किसी ने न चाहा था. मेले की भीड़ में 'देवता' से उसकी भेंट सुगम हो सके, इसके लिए पोन्ना को अकेला छोड़ जब उसकी माँ गायब हो जाती है, तब के बाद का वर्णन उपन्यासकार की सामर्थ्य का सबसे ताकतवर साक्ष्य है. पोन्ना की मार्फ़त पाठक तमाम स्थानीय सांस्कृतिक कला-रूपों, नाटकों और रिवाजों की दृश्यावली से गुज़रता है, लेकिन सबसे बड़ा नाटक तो पोन्ना के मानसपटल पर अभिनीत हो रहा है. भारी भीड़ में अकेले होने के भय से शुरू करके अपरिचितों के बीच अनाम होने की खुशी तक उसके मन में अनेक भाव आते और जाते हैं. परिचय की दुनिया की हर नज़र उसे छेदती थी, क्योंकि वह निस्संतान थी. मेले में भीड़ का हिस्सा होकर वह ऐसी हर नज़र से आज़ाद थी, जहां न वह किसी को जानती थी और न कोई उसे. लेकिन अवचेतन के सह-सम्बन्ध और संस्कार उसकी निगहबानी बदस्तूर कर रहे थे. जब भी कोई 'देवता' उसकी ओर रुख करता, उसके और अपरिचित देवता के बीच काली का चेहरा परिचिति या स्मृति की छाया सा झिलमिला उठाता, क्योंकि पति से भी ज़्यादा काली वह व्यक्ति है जिससे वह सबसे ज़्यादा प्यार करती है. एक छोटे से स्वप्न-दृश्य में बचपन के प्यार का एक चेहरा भी कौंधता है. यह कोई नैतिक द्वंद्व नहीं है. काली के विपरीत पोन्ना के मन में इस प्रथा पर आस्था का कोई संकट नहीं है. काली की खुशी के लिए और अपने जानते में उसकी 'अनुमति' से ही वह 'देवता' की खोज में आई है, लेकिन क्या एक क्षण को भी काली को भूले बगैर 'देवता' से मिलन संभव हो पाएगा? इस द्वंद्व को उपन्यासकार ने चेतन और अचेतन के बीच, परिचित और अनजाने के बीच, सम्बन्ध-भावना और स्वातंत्र्य-कामना के बीच, मानवीय भाव-यंत्र और देवत्व के तसव्वुर के बीच - एक साथ अनेक स्तरों पर अभूतपूर्व संवेदनशीलता से अंकित किया है. अंततः पोन्ना इस द्वंद्व से पार जाती है, इसका संकेत करके उपन्यासकार आगे बढ़ जाता है. समागम का दृश्य उपस्थित करने और पाठक को गुदगुदाने की उसकी कोई इच्छा ही नहीं है.
कहानी का अंत नहीं हुआ, लौटेगा कहनेवाला   : उपन्यास के अंतिम दृश्य में काली को तड़पता देख पाठक की उत्कंठा बढ़नी स्वाभाविक है, लेकिन उपन्यास ख़त्म हो जाता है. पाठक के ज़ेहन में ढेरों सवाल हैं? क्या पोन्ना और काली का सम्बन्ध-विच्छेद हो जाएगा? क्या काली यह जान कर कि पोन्ना को उसकी 'अनुमति' की झूठी जानकारी थी, उसे अपना लेगा? क्या पोन्ना यह जानकार कि उससे झूठ बोला गया था, अपराधबोध या आत्महंता भाव से ग्रस्त हो जाएगी? ऐसे में अपने माँ-बाप और भाई के प्रति उसका क्या रुख होगा? यदि वह अपने माँ-बाप और भाई को क्षोभ में त्याग दे और काली उसे फिर से न अपनाए, तो वह कहाँ जाएगी? यदि उसे देव-संतान होती है, तो उस संतान का भविष्य क्या है? श्री चेलापति ने अपने लेख में लिखा है कि ढेरों पाठकों ने लेखक को पोन्ना और काली की आगे की कहानी बताने के लिए अनेक पत्र लिखे. जवाब में लेखक ने उपन्यास को आगे के दो खण्डों में जारी रखने का वादा किया है, दोनों खण्डों के शीर्षक भी बताए हैं. मुरुगन को यह वादा निभाना ही पडेगा. लेखक की मृत्यु की घोषणा के बावजूद उसे खुद को पुनरुज्जीवित करना होगा. पाठक ज़रूर उन ताकतों से लड़ेंगे और जीतेंगे जो कि लेखक के पुनरुज्जीवन में बाधा हैं.
मुरुगन के लेखक को मार देनेवाली ताकतों को इस उपन्यास की मूल संवेदना से कुछ लेना लादना नहीं है. उनके लिए निस्संतान स्त्रियों द्वारा एक स्थानविशेष के मंदिर के मेले में आपसी सहमति से विवाह-बाह्य, धर्मानुमोदित और सामाजिक स्वीकृति प्राप्त यौन-सम्बन्ध बनाने की प्रथा का उपन्यास में कथात्मक विनियोग 'आपत्तिजनक' है. इसे वे धर्मविरुद्ध, स्त्रियों की मर्यादा के विरुद्ध और उस इलाके के लिए अपमानजनक मानते हैं. क्या उपन्यासकार ने इस प्रथा की वकालत की है या उसका अनुमोदन किया है? ज़ाहिर है 'नहीं'. कहानी की तर्क-योजना और संवेदनात्मक उद्देश्य में उक्त प्रथा की हिमायत या आलोचना का कोई काम ही नहीं है. लेकिन ज़रा प्राचीन ग्रंथों पर नज़र डालें और देखें कि 'नियोग' की प्रथा को कितने धर्मशास्त्रों की सम्मति प्राप्त थी. भारतरत्न पंडित पांडुरंग वामन काणे ने गौतम, वसिष्ठ, बौधायन, याज्ञवल्क्य, नारद, कौटिल्य आदि धर्मसूत्रकारों की सम्मतियों उद्धृत की है तथा महाभारत के आदिपर्व, अनुशासनपर्व और शांतिपर्व में नियोग के उदाहरणों और संकेतों की चर्चा की है. (धर्मशास्त्र का इतिहास-प्रथम भाग) मुरुगन की पुस्तक जलानेवाले तत्व इन धर्मसूत्रों और महाभारत के बारे में क्या ख्याल रखते हैं? शास्त्र और लोक की बात छोड़ भी दें, तो क्या मानवशास्त्र का अध्ययन यह नहीं बताता कि ऐसी प्रथाएं लगभग सभी प्राक-आधुनिक समाजों में रही आई हैं? यह भी कि आधुनिक समय में भी तमाम प्राक-आधुनिक प्रथाएं रूप बदलकर क्या अपनी निरंतरता नहीं बनाए रखतीं? मुरुगन ने किसी प्रथा पर कोई मूल्य निर्णय नहीं दिया है, अच्छा या बुरा नहीं कहा है, उन्होंने सिर्फ एक कोमल कहानी कही है जो एक समाज में जन्मी है. उस समाज की कुछ प्रथाएं और मान्यताएं हैं जो उस समाज में जी रहे लोगों के जीवन से लिपटी हैं, उन्हें कोई कथाकार, इतिहास-लेखक या नृतत्वशास्त्री कृत्रिम ढंग से काट कर अलग नहीं कर सकता. ऐसा करना खुद को झूठा साबित करना है, कला और समाज दोनों से गद्दारी है. मुरुगन ने ऐसा करने से इनकार किया है, लेखक की मृत्यु की कीमत चुका कर भी. लेकिन पाठकों और जागरूक नागरिकों का प्यार उन्हें वापस लौटा लाएगा. ज़रूर ही लौटा लाएगा. (समकालीन जनमत से साभार)

Sunday, 18 January 2015

हमेशा रहेगी किताबों की जरूरत/प्रेमचंद गांधी

उस दुनिया की कल्‍पना करना कितना भयावह है, जिसे किताबों के बिना जीना पडता है। लेकिन सच्‍चाई यही है, आज भी विश्‍व की करीब पचास फीसद जनता पुस्‍तकविहीन अंधकारमय जीवन जीने के लिए विवश है। लेकिन यह भी इतना ही बडा सच है कि ऐसे अज्ञान और अंधकार भरे समाज के लिए किताब पहुंचाने की कोशिशें भी वैश्विक स्‍तर पर जारी हैं। देश में चल रहे ‘सर्वशिक्षा अभियान’ जैसे प्रयास दुनिया के तमाम निर्धन देशों में चल रहे हैं। हालांकि ऐसा मानने वाले लोगों की भी कमी नहीं है कि बिना किताबों के भी ज्ञान प्राप्‍त किया जा सकता है और यह एक हद तक सच भी है। हमारे पुरखों ने ज्ञान के नाम पर अपने समय में जो कुछ प्राप्‍त किया वह जीवनानुभवों का ही सार है, जिसके बिना किताब भी संभव नहीं होती, क्‍योंकि किताब भी आखिरकार एक व्‍यक्ति के अनुभूत ज्ञान और संचित जीवनानुभवों का ही तो समुच्‍चय है।
इस दुनिया को आज हम जिस रूप में देख रहे हैं, उसके पीछे किताबों की बहुत बडी भूमिका है। दुनिया के तमाम धर्मों में एक या अधिक किताबों की जरूरत हमेशा से रही है, जिनसे उनके अनुयायियों को धर्म की राह पर चलने के लिए एक रास्‍ता मिलता है। आज भी लोगों के लिए किताब अगर एक पवित्र किस्‍म की चीज है तो वह इसीलिए कि प्रारंभ में किताब का अर्थ धार्मिक किताब ही होता था, जिसके पैर से छू जाने या गिर जाने से अनर्थ की आशंका होती थी और धर्म का अपमान लगता था। मजहबी किताबें दुनिया में सबसे ज्‍यादा बिकने वाली किताबें हैं और शायद हमेशा रहेंगी। वजह यह कि पढना आये या ना आये अपने धर्म की किताब हर व्‍यक्ति घर में जरूर रखना चाहता है। सुख-दुख के अवसरों पर इनकी महत्‍ता रहती है, घर को ये एक किस्‍म की पवित्रता प्रदान करती हैं। व्‍यक्ति को ऐसी किताबों के अध्‍ययन और श्रवण से आत्मिक संतोष मिलता है। इसीलिए सभी धर्मों में आप देखेंगे कि धार्मिक किताबों के समय-समय पर पाठ आयोजित करने की परंपरा है, फिर वह चाहे गुरूग्रंथ साहिब का पाठ हो या रामायण का, कुरानख्‍वानी हो या बाइबिल का पाठ।
धार्मिक किताबों का महत्‍व इस मायने में स्‍वीकार किया जाना चाहिए कि इन्‍हीं की वजह से शिक्षा का प्रसार भी हुआ। आज भी बहुत से लोग अगर लडकियों को पढने स्‍कूल भेजते हैं तो यही समझकर कि चलो कम से कम वह कुरान, रामायण या गुरूग्रंथ साहिब का पाठ तो कर लेगी और अपने बच्‍चों को ठीक-ठाक संस्‍कार दे सकेगी। लेकिन किताबों की दुनिया का यह एक बहुत बडा सच है कि यह एक प्रकार से मनुष्‍य में संक्रामक रोग भी पैदा करती है, अर्थात जिसे पढना आ गया वह एक के बाद दूसरी किताब पढने की ओर आगे बढता है। और पढने की इस चाहत ने ही किताबों की दुनिया को परवान चढाया है। जिन लडकियों को धार्मिक किताबें पढने के लिए पाठशाला भेजा गया, वे आगे चलकर दूसरी किताबें पढकर खुद लेखिकाएं बन गईं, ऐसे हमारे समाज में सैंकडों उदाहरण हैं।
आज के तेजी से बदलते संचार क्रांति के युग में बहुत से लोग कहते हैं कि अब किताबें अप्रासंगिक हो जाएंगी, वजह यह कि किताबों की जगह लेने के लिए बाजार में बहुत सी चीजें आ गई हैं और किताबों का स्‍वरूप भी बदल गया है। सीडी, डीवीडी, ई-बुक, और इसी किस्‍म की बहुत सी ईजादों ने किताब का स्‍थान लेने की कोशि की है, लेकिन पश्चिम के अघाये हुए समाज की मानें तो आज भी पन्‍ने पलटकर, कहीं भी बैठकर, लेटकर, यात्रा करते हुए यानी किसी भी तरह किताब पढने से बेहतर कुछ नहीं है। आधुनिक संसाधनों ने जो सबसे बडा काम किया वो यह कि किताबों की उम्र और पढने का दायरा बढा दिया। आज दुनिया के लाखों पुस्‍तकालय डिजिटलाइज्‍ड हो रहे हैं, आनलाइन हो रहे हैं, हजारों की तादाद में ऐसी वेबसाइटें मौजूद हैं जिन पर दुनिया भर की असंख्‍य किताबों के बारे में जानकारी ही हासिल नहीं की जा सकती, बल्कि डाउनलोड कर किताबें पढी भी जा सकती हैं। अभी तक अप्राप्‍य और दुर्लभ समझी जाने वाली असंख्‍य किताबें आज इंटरनेट की दुनिया में या तो उपलब्‍ध हैं या ऐसा करने के प्रयास वैश्विक स्‍तर पर चल रहे हैं। इस तरह संचार क्रांति किताबों की दुनिया के लिए वरदान सिद्ध हो रही है।
दुनिया बदल रही है और इस बदलती हुई दुनिया की यह एक बहुत बडी सच्‍चाई है कि दुनिया में आज मौजूद अनेक समस्‍याएं अज्ञान और अशिक्षा के कारण हैं। फिर वो चाहे आतंकवाद हो या मजहबी कटटरता के कारण पनपने वाला सांप्रदायिक विद्वेष, इन सबकी जड में अशिक्षा और अज्ञान ही है। किताबों की दुनिया ही हमारे समाज को बताती है कि सब धर्म एक परमात्‍मा तक पहुंचने के अलग-अलग रास्‍तों के सिवा कुछ नहीं हैं, मनुष्‍य का एकमात्र धर्म है मानवता की सेवा और सब धर्मों का मूल मकसद है इस धरती को सुंदर बनाना, मानव मात्र को सुखी बनाना। प्रत्‍येक धर्म की किताब यही सिखाती है, लेकिन कुछ लोग हैं जो उनका अलग अर्थ निकालकर लोगों को एक दूसरे खिलाफ भडकाते हैं और व्‍यर्थ में खून बहाते हैं। इस प्रक्रिया में ना जाने कितनी सभ्‍यताएं नष्‍ट हो चुकी हैं और नष्‍ट होंगी, फिर किताबें ही बताएंगी कि क्‍यों वे सभ्‍यताएं नष्‍ट हुईं।
एक फ्रांसिसी दार्शनिक ने म्रत्‍यु शैया पर कहा था, ‘जो कुछ हम जानते हैं वह बहुत थोडा है, जो नहीं जानते वह बहुत अधिक है।‘ किताबों की दुनिया हमारे लिए उस अजाने संसार के दरवाजे खोलती है, जिसे हम एक जीवन में प्राप्‍त नहीं कर सकते। प्रत्‍येक विद्धान, मनीषी यही कहता है कि मैं तो एक विद्यार्थी मात्र हूं। किताबें ही यह विनम्रता का बोध पैदा करती हैं और मनुष्‍य को महामानव बनाती हैं। मनुष्‍य जीवन में किताबों का महत्‍व सदा से किसी ना किसी रूप में मौजूद रहा है और धरती के नष्‍ट होने तक रहेगा। इस दुनिया में किताब की ताकत का अंदाज आप इसी से लगा सकते हैं कि बहुत से आततायी और हिंसक लोगों ने सिर्फ डर की वजह से न केवल किताबें, बल्कि पूरी की पूरी लाइब्रेरियां जला डालीं।

Thursday, 15 January 2015

जंगल-मंगल/जयप्रकाश त्रिपाठी

                                ()
जो कुछ है, इतना बस है, लगता है, ये भी बरबस है
सब झूठे-झूठे शब्दों-सा अब भी वो क्यों जस-का-तस है
जैसे हर कोई घिरा हुआ, जो बचा हुआ, क्यों गिरा हुआ
जंगल-जंगल जन दुखियारे, बस मंगल-मंगल सर्कस है
                            ()