Monday, 10 November 2014
पटकथा / धूमिल
जब मैं बाहर आया
मेरे हाथों में
एक कविता थी
और दिमाग में
आँतों का एक्स-रे।
वह काला धब्बा
कल तक एक शब्द था;
खून के अँधेर में
दवा का ट्रेडमार्क
बन गया था।
औरतों के लिये गै़र-ज़रूरी होने के बाद
अपनी ऊब का
दूसरा समाधान ढूँढना ज़रूरी है।
मैंने सोचा !
क्योंकि शब्द और स्वाद के बीच
अपनी भूख को ज़िन्दा रखना
जीभ और जाँघ के स्थानिक भूगोल की
वाजिब मजबूरी है।
मैंने सोचा और संस्कार के
वर्जित इलाकों में
अपनी आदतों का शिकार
होने के पहले ही बाहर चला आया।
बाहर हवा थी
धूप थी
घास थी
मैंने कहा आजादी…
मुझे अच्छी तरह याद है-
मैंने यही कहा था
मेरी नस-नस में बिजली
दौड़ रही थी
उत्साह में
खुद मेरा स्वर
मुझे अजनबी लग रहा था
मैंने कहा-आ-जा-दी
और दौड़ता हुआ खेतों की ओर
गया। वहाँ कतार के कतार
अनाज के अँकुए फूट रहे थे
मैंने कहा- जैसे कसरत करते हुये
बच्चे। तारों पर
चिडि़याँ चहचहा रही थीं
मैंने कहा-काँसे की बजती हुई घण्टियाँ…
खेत की मेड़ पार करते हुये
मैंने एक बैल की पीठ थपथपायी
सड़क पर जाते हुये आदमी से
उसका नाम पूछा
और कहा- बधाई…
घर लौटकर
मैंने सारी बत्तियाँ जला दीं
पुरानी तस्वीरों को दीवार से
उतारकर
उन्हें साफ किया
और फिर उन्हें दीवार पर (उसी जगह)
पोंछकर टाँग दिया।
मैंने दरवाजे के बाहर
एक पौधा लगाया और कहा–
वन महोत्सव…
और देर तक
हवा में गरदन उचका-उचकाकर
लम्बी-लम्बी साँस खींचता रहा
देर तक महसूस करता रहा–
कि मेरे भीतर
वक्त का सामना करने के लिये
औसतन ,जवान खून है
मगर ,मुझे शान्ति चाहिये
इसलिये एक जोड़ा कबूतर लाकर डाल दिया
‘गूँ..गुटरगूँ…गूँ…गुटरगूँ…’
और चहकते हुये कहा
यही मेरी आस्था है
यही मेरा कानून है।
इस तरह जो था उसे मैंने
जी भरकर प्यार किया
और जो नहीं था
उसका इंतज़ार किया।
मैंने इंतज़ार किया–
अब कोई बच्चा
भूखा रहकर स्कूल नहीं जायेगा
अब कोई छत बारिश में
नहीं टपकेगी।
अब कोई आदमी कपड़ों की लाचारी में
अपना नंगा चेहरा नहीं पहनेगा
अब कोई दवा के अभाव में
घुट-घुटकर नहीं मरेगा
अब कोई किसी की रोटी नहीं छीनेगा
कोई किसी को नंगा नहीं करेगा
अब यह ज़मीन अपनी है
आसमान अपना है
जैसा पहले हुआ करता था…
सूर्य,हमारा सपना है
मैं इन्तजा़र करता रहा..
इन्तजा़र करता रहा…
इन्तजा़र करता रहा…
जनतन्त्र,त्याग,स्वतन्त्रता…
संस्कृति,शान्ति,मनुष्यता…
ये सारे शब्द थे
सुनहरे वादे थे
खुशफ़हम इरादे थे
सुन्दर थे
मौलिक थे
मुखर थे
मैं सुनता रहा…
सुनता रहा…
सुनता रहा…
मतदान होते रहे
मैं अपनी सम्मोहित बुद्धि के नीचे
उसी लोकनायक को
बार-बार चुनता रहा
जिसके पास हर शंका और
हर सवाल का
एक ही जवाब था
यानी कि कोट के बटन-होल में
महकता हुआ एक फूल
गुलाब का।
वह हमें विश्वशान्ति के और पंचशील के सूत्र
समझाता रहा। मैं खुद को
समझाता रहा-’जो मैं चाहता हूँ-
वही होगा। होगा-आज नहीं तो कल
मगर सब कुछ सही होगा।
मैं अपनी सम्मोहित बुद्धि के नीचे
उसी लोकनायक को
बार-बार चुनता रहा
जिसके पास हर शंका और
हर सवाल का
एक ही जवाब था
यानी कि कोट के बटन-होल में
महकता हुआ एक फूल
गुलाब की भीड़ बढ़ती रही।
चौराहे चौड़े होते रहे।
लोग अपने-अपने हिस्से का अनाज
खाकर-निरापद भाव से
बच्चे जनते रहे।
योजनायेँ चलती रहीं
बन्दूकों के कारखानों में
जूते बनते रहे।
और जब कभी मौसम
उतार पर होता था।
हमारा संशय
हमें कोंचता था।
हम उत्तेजित होकर
पूछते थे
यह क्या है?
ऐसा क्यों है?
फिर बहसें होतीं थीं
शब्दों के जंगल में
हम एक-दूसरे को काटते थे
भाषा की खाई को
जुबान से कम जूतों से
ज्यादा पाटते थे
कभी वह हारता रहा…
कभी हम जीतते रहे…
इसी तरह नोक-झोंक चलती रही
दिन बीतते रहे…
मगर एक दिन मैं स्तब्ध रह गया।
मेरा सारा धीरज
युद्ध की आग से पिघलती हुयी बर्फ में
बह गया।
मैंने देखा कि मैदानों में
नदियों की जगह
मरे हुये साँपों की केंचुलें बिछी हैं
पेड़-टूटे हुये रडार की तरह खड़े हैं
दूर-दूर तक
कोई मौसम नहीं है
लोग-
घरों के भीतर नंगे हो गये हैं
और बाहर मुर्दे पड़े हैं
विधवायें तमगा लूट रहीं हैं
सधवायें मंगल गा रहीं हैं
वन-महोत्सव से लौटी हुई कार्यप्रणालियाँ
अकाल का लंगर चला रही हैं
जगह-जगह तख्तियाँ लटक रहीं हैं-
‘यह श्मशान है,यहाँ की तश्वीर लेना
सख्त मना है।’
क्योंकि शब्द और स्वाद के बीच
अपनी भूख को ज़िन्दा रखना
जीभ और जाँघ के स्थानिक भूगोल की
वाजिब मजबूरी है।
फिर भी उस उजाड़ में
कहीं-कहीं घास का हरा कोना
कितना डरावना है
मैंने अचरज से देखा कि दुनिया का
सबसे बड़ा बौद्ध- मठ
बारूद का सबसे बड़ा गोदाम है
अखबार के मटमैले हासिये पर
लेटे हुये ,एक तटस्थ और कोढ़ी देवता का
शांतिवाद ,नाम है
यह मेरा देश है…
यह मेरा देश है…
हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक
फैला हुआ
जली हुई मिट्टी का ढेर है
जहाँ हर तीसरी जुबान का मतलब-
नफ़रत है।
साज़िश है।
अन्धेर है।
यह मेरा देश है
और यह मेरे देश की जनता है
जनता क्या है?
एक शब्द…सिर्फ एक शब्द है:
कुहरा,कीचड़ और कांच से
बना हुआ…
एक भेड़ है
जो दूसरों की ठण्ड के लिये
अपनी पीठ पर
ऊन की फसल ढो रही है।
जनता क्या है?
एक शब्द…
सिर्फ एक शब्द है
कुहरा,कीचड़ और कांच से
बना हुआ…
एक भेड़ है
जो दूसरों की ठण्ड के लिये
अपनी पीठ पर
ऊन की फसल ढो रही है
एक पेड़ है
जो ढलान पर
हर आती-जाती हवा की जुबान में
हाँऽऽ..हाँऽऽ करता है
क्योंकि अपनी हरियाली से
डरता है।
गाँवों में गन्दे पनालों से लेकर
शहर के शिवालों तक फैली हुई
‘कथाकलि’ की अंमूर्त मुद्रा है
यह जनता…
उसकी श्रद्धा अटूट है
उसको समझा दिया गया है कि यहाँ
ऐसा जनतन्त्र है जिसमें
घोड़े और घास को
एक-जैसी छूट है
कैसी विडम्बना है
कैसा झूठ है
दरअसल, अपने यहाँ जनतन्त्र
एक ऐसा तमाशा है
जिसकी जान
मदारी की भाषा है।
दरअसल,
अपने यहाँ जनतन्त्र
एक ऐसा तमाशा है
जिसकी जान
मदारी की भाषा है।
हर तरफ धुआँ है
हर तरफ कुहासा है
जो दाँतों और दलदलों का दलाल है
वही देशभक्त है
अन्धकार में सुरक्षित होने का
नाम है- तटस्थता। ...
यहाँ कायरता के चेहरे पर
सबसे ज्यादा रक्त हैं।
जिसके पास थाली है
हर भूखा आदमी
उसके लिये,सबसे भद्दी गाली है...
हर तरफ कुआँ है
हर तरफ खाई है
यहाँ,सिर्फ ,वह आदमी,देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है
या फिर गरीब है...
मैं सोचता रहा
और घूमता रहा-
टूटे हुये पुलों के नीचे
वीरान सड़कों पर आँखों के
अंधे रेगिस्तानों में
फटे हुये पालों की
अधूरी जल-यात्राओं में
टूटी हुई चीज़ों के ढेर में
मैं खोयी हुई आजादी का अर्थ
ढूँढता रहा।
अपनी पसलियों के नीचे /अस्पतालों के
बिस्तरों में/ नुमाइशों में
बाजारों में /गाँवों में
जंगलों में /पहाडों पर
देश के इस छोर से उस छोर तक
उसी लोक-चेतना को
बार-बार टेरता रहा
जो मुझे दोबारा जी सके
जो मुझे शान्ति दे और
मेरे भीतर-बाहर का ज़हर
खुद पी सके।
–और तभी सुलग उठा पश्चिमी सीमान्त
…ध्वस्त…ध्वस्त…ध्वान्त…ध्वान्त…
मैं दोबार चौंककर खड़ा हो गया
जो चेहरा आत्महीनता की स्वीकृति में
कन्धों पर लुढ़क रहा था,
किसी झनझनाते चाकू की तरह
खुलकर,कड़ा हो गया…
अचानक अपने-आपमें जिन्दा होने की
यह घटना
इस देश की परम्परा की -
एक बेमिशाल कड़ी थी
लेकिन इसे साहस मत कहो
दरअस्ल,यह पुट्ठों तक चोट खायी हुई
गाय की घृणा थी...
मगर उसके तुरन्त बाद
मुझे झेलनी पड़ी थी-सबसे बड़ी ट्रैजेडी
अपने इतिहास की
जब दुनिया के स्याह और सफेद चेहरों ने
विस्मय से देखा कि ताशकन्द में
समझौते की सफेद चादर के नीचे
एक शान्तियात्री की लाश थी
और अब यह किसी पौराणिक कथा के
उपसंहार की तरह है कि इसे देश में
रोशनी उन पहाड़ों से आई थी
जहाँ मेरे पडो़सी ने
मात खायी थी।
मगर मैं फिर वहीं चला गया
अपने जुनून के अँधेरे में
फूहड़ इरादों के हाथों
छला गया।
वहाँ बंजर मैदान
कंकालों की नुमाइश कर रहे थे
गोदाम अनाजों से भरे थे और लोग
भूखों मर रहे थे
मैंने महसूस किया कि मैं वक्त के
एक शर्मनाक दौर से गुजर रहा हूँ
अब ऐसा वक्त आ गया है जब कोई
किसी का झुलसा हुआ चेहरा नहीं देखता है
अब न तो कोई किसी का खाली पेट
देखता है, न थरथराती हुई टाँगें
और न ढला हुआ ‘सूर्यहीन कन्धा’ देखता है
हर आदमी,सिर्फ, अपना धन्धा देखता है
सबने भाईचारा भुला दिया है
आत्मा की सरलता को भुलाकर
मतलब के अँधेरे में
सुला दिया है।
सहानुभूति और प्यार
अब ऐसा छलावा है जिसके ज़रिये
एक आदमी दूसरे को,अकेले –
अँधेरे में ले जाता है और
उसकी पीठ में छुरा भोंक देता है
ठीक उस मोची की तरह जो चौक से
गुजरते हुये देहाती को
प्यार से बुलाता है और मरम्मत के नाम पर
रबर के तल्ले में
लोहे के तीन दर्जन फुल्लियाँ
ठोंक देता है और उसके नहीं -नहीं के बावजूद
डपटकर पैसा वसूलता है
गरज़ यह है कि अपराध
अपने यहाँ एक ऐसा सदाबहार फूल है
जो आत्मीयता की खाद पर
लाल-भड़क फूलता है
अपराध
अपने यहाँ एक ऐसा सदाबहार फूल है
जो आत्मीयता की खाद पर
लाल-भड़क फूलता है
मैंने देखा कि
इस जनतांत्रिक जंगल में
हर तरफ हत्याओं के नीचे से निकलते है
हरे-हरे हाथ
और पेड़ों पर
पत्तों की जुबान बनकर
लटक जाते हैं
वे ऐसी भाषा बोलते हैं
जिसे सुनकर
नागरिकता की गोधूलि में
घर लौटते मुसाफिर
अपना रास्ता भटक जाते हैं।
उन्होंने किसी चीज को
सही जगह नहीं रहने दिया
न संज्ञा
न विशेषण
न सर्वनाम
एक समूचा और सही वाक्य
टूटकर
‘बि ख र’ गया है
उनका व्याकरण इस देश की
शिराओं में छिपे हुये कारकों का
हत्यारा है
उनकी सख्त पकड़ के नीचे
भूख से मरा हुआ आदमी
इस मौसम का
सबसे दिलचस्प विज्ञापन है और गाय
सबसे सटीक नारा है
वे खेतों मेंभूख और शहरों में
अफवाहों के पुलिंदे फेंकते हैं
भूख से मरा हुआ आदमी/
इस मौसम का
सबसे दिलचस्प विज्ञापन है
और गाय
सबसे सटीक नारा है
देश और धर्म और नैतिकता की
दुहाई देकर
कुछ लोगों की सुविधा
दूसरों की ‘हाय’पर सेंकते हैं
वे जिसकी पीठ ठोंकते हैं
उसकी रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है
वे मुस्कराते हैं और
दूसरे की आँख में झपटती हुई प्रतिहिंसा
करवट बदलकर सो जाती है
मैं देखता रहा…
देखता रहा…
हर तरफ ऊब थी
संशय था
नफरत थी
मगर हर आदमी अपनी ज़रूरतों के आगे
असहाय था। उसमें
सारी चीज़ों को नये सिरे से बदलने की
बेचैनी थी ,रोष था
लेकिन उसका गुस्सा
एक तथ्यहीन मिश्रण था:
आग और आँसू और हाय का।
इस तरह एक दिन-
जब मैं घूमते-घूमते थक चुका था
मेरे खून में एक काली आँधी-
दौड़ लगा रही थी
मेरी असफलताओं में सोये हुये
वहसी इरादों को
झकझोरकर जगा रही थी
अचानक ,नींद की असंख्य पर्तों में
डूबते हुये मैंने देखा
मेरी उलझनों के अँधेरे में
एक हमशक्ल खड़ा है
मैंने उससे पूछा-’तुम कौन हो?
यहाँ क्यों आये हो?
तुम्हें क्या हुआ है?’
‘तुमने पहचाना नहीं-मैं हिंदुस्तान हूँ
हाँ -मैं हिंदुस्तान हूँ’,
वह हँसता है-ऐसी हँसी कि दिल
दहल जाता है
कलेजा मुँह को आता है
और मैं हैरान हूँ
‘यहाँ आओ
मेरे पास आओ
मुझे छुओ।
मुझे जियो। मेरे साथ चलो
मेरा यकीन करो। इस दलदल से
बाहर निकलो!
सुनो!
तुम चाहे जिसे चुनो
मगर इसे नहीं। इसे बदलो।
मुझे लगा-आवाज़
जैसे किसी जलते हुये कुएँ से
आ रही है।
एक अजीब-सी प्यार भरी गुर्राहट
जैसे कोई मादा भेड़िया
अपने छौने को दूध पिला रही है
साथ ही किसी छौने का सिर चबा रही है...
मेरा सारा जिस्म थरथरा रहा था
उसकी आवाज में
असंख्य नरकों की घृणा भरी थी
वह एक-एक शब्द चबा-चबाकर
बोल रहा था। मगर उसकी आँख
गुस्से में भी हरी थी
वह कह रहा था-
‘तुम्हारी आँखों के चकनाचूर आईनों में
वक्त की बदरंग छायाएँ उलटी कर रही हैं
और तुम पेड़ों की छाल गिनकर
भविष्य का कार्यक्रम तैयार कर रहे हो
तुम एक ऐसी जिन्दगी से गुज़र रहे हो
जिसमें न कोई तुक है
न सुख है
तुम अपनी शापित परछाई से टकराकर
रास्ते में रुक गये हो
तुम जो हर चीज़
अपने दाँतों के नीचे
खाने के आदी हो
चाहे वह सपना अथवा आज़ादी हो
अचानक ,इस तरह,क्यों चुक गये हो
वह क्या है जिसने तुम्हें
बर्बरों के सामने अदब से
रहना सिखलाया है?
क्या यह विश्वास की कमी है
जो तुम्हारी भलमनसाहत बन गयी है
या कि शर्म
अब तुम्हारी सहूलियत बन गयी है
नहीं-सरलता की तरह इस तरह
मत दौड़ो
उसमें भूख और मन्दिर की रोशनी का
रिश्ता है। वह बनिये की पूँजी का
आधार है
मैं बार-बार कहता हूँ कि इस उलझी हुई
दुनिया में
आसानी से समझ में आने वाली चीज़
सिर्फ दीवार है।
और यह दीवार अब तुम्हारी आदत का
हिस्सा बन गयी है
इसे झटककर अलग करो
अपनी आदतों में
फूलों की जगह पत्थर भरो
मासूमियत के हर तकाज़े को
ठोकर मार दो
अब वक्त आ गया है तुम उठो
और अपनी ऊब को आकार दो।
आज मैं तुम्हें वह सत्य बतलाता हूँ
जिसके आगे हर सचाई
छोटी है। इस दुनिया में
भूखे आदमी का सबसे बड़ा तर्क
रोटी है।
मगर तुम्हारी भूख और भाषा में
यदि सही दूरी नहीं है
तो तुम अपने-आपको आदमी मत कहो
क्योंकि पशुता -
सिर्फ पूँछ होने की मज़बूरी नहीं है
वह आदमी को वहीं ले जाती है
जहाँ भूख
सबसे पहले भाषा को खाती है
वक्त सिर्फ उसका चेहरा बिगाड़ता है
जो अपने चेहरे की राख
दूसरों की रूमाल से झाड़ता है
जो अपना हाथ
मैला होने से डरता है
वह एक नहीं ग्यारह कायरों की
मौत मरता है
और सुनो! नफ़रत और रोशनी
सिर्फ़ उनके हिस्से की चीज़ हैं
जिसे जंगल के हाशिये पर
जीने की तमीज है
इसलिये उठो और अपने भीतर
सोये हुए जंगल को
आवाज़ दो
उसे जगाओ और देखो-
कि तुम अकेले नहीं हो
और न किसी के मुहताज हो
लाखों हैं जो तुम्हारे इन्तज़ार में खडे़ हैं
वहाँ चलो।उनका साथ दो
और इस तिलस्म का जादू उतारने में
उनकी मदद करो और साबित करो
कि वे सारी चीज़ें अन्धी हो गयीं हैं
जिनमें तुम शरीक नहीं हो…’
मैं पूरी तत्परता से
उसे सुन रहा था
एक के बाद दूसरा
दूसरे के बाद तीसरा
तीसरे के बाद चौथा
चौथे के बाद पाँचवाँ…
यानी कि एक के बाद दूसरा विकल्प
चुन रहा था
मगर मैं हिचक रहा था
क्योंकि मेरे पास
कुल जमा थोड़ी सुविधायें थीं
जो मेरी सीमाएँ थीं
यद्यपि यह सही है कि मैं
कोई ठण्डा आदमी नहीं है
मुझमें भी आग है-
मगर वह
भभककर बाहर नहीं आती
क्योंकि उसके चारों तरफ चक्कर काटता हुआ
एक ‘पूँजीवादी’दिमाग है
जो परिवर्तन तो चाहता है
मगर आहिस्ता-आहिस्ता
कुछ इस तरह कि चीज़ों की शालीनता
बनी रहे।
कुछ इस तरह कि काँख भी ढकी रहे
और विरोध में उठे हुये हाथ की
मुट्ठी भी तनी रहे…और यही है कि बात
फैलने की हद तक
आते-आते रुक जाती है
क्योंकि हर बार
चन्द सुविधाओं के लालच के सामने
अभियोग की भाषा चुक जाती है।
मैं खुद को कुरेद रहा था
अपने बहाने
उन तमाम लोगों की
असफलताओं को
सोच रहा था
जो मेरे नजदीक थे।
इस तरह साबुत और सीधे विचारों पर
जमी हुई काई और उगी हुई घास को
खरोंच रहा था,नोंच रहा था
पूरे समाज की सीवन उधेड़ते हुये
मैंने आदमी के भीतर की मैल
देख ली थी। मेरा सिर
भिन्ना रहा था
मेरा हृदय भारी था
मेरा शरीर इस बुरी तरह थका था कि मैं
अपनी तरफ़ घूरते उस चेहरे से
थोड़ी देर के लिये
बचना चाह रहा था
जो अपनी पैनी आँखों से
मेरी बेबसी और मेरा उथलापन
थाह रहा था
प्रस्तावित भीड़ में
शरीक होने के लिये
अभी मैंने कोई निर्णय नहीं लिया था
अचानक ,उसने मेरा हाथ पकड़कर
खींच लिया और मैं
जेब में जूतों का टोकन और दिमाग में
ताजे़ अखबार की कतरन लिये हुये
धड़ाम से-
चौथे आम चुनाव की सीढ़ियों से फिसलकर
मत-पेटियों के
गड़गच्च अँधेरे में गिर पड़ा
नींद के भीतर यह दूसरी नींद है
और मुझे कुछ नहीं सूझ रहा है
सिर्फ एक शोर है
जिसमें कानों के पर्दे फटे जा रहे हैं
शासन सुरक्षा रोज़गार शिक्षा …
राष्ट्रधर्म देशहित हिंसा अहिंसा…
सैन्यशक्ति देशभक्ति आजा़दी वीसा…
वाद बिरादरी भूख भीख भाषा…
शान्ति क्रान्ति शीतयुद्ध एटमबम सीमा…
एकता सीढ़ियाँ साहित्यिक पीढ़ियाँ निराशा…
झाँय-झाँय,खाँय-खाँय,हाय-हाय,साँय-साँय…
मैंने कानों में ठूँस ली हैं अँगुलियाँ
और अँधेरे में गाड़ दी है
आंखों की रोशनी।
सब-कुछ अब धीरे-धीरे खुलने लगा है
मत-वर्षा के इस दादुर-शोर में
मैंने देखा हर तरफ
रंग-बिरंगे झण्डे फहरा रहे हैं
गिरगिट की तरह रंग बदलते हुये
गुट से गुट टकरा रहे हैं
वे एक- दूसरे से दाँता-किलकिल कर रहे हैं
एक दूसरे को दुर-दुर,बिल-बिल कर रहे हैं
हर तरफ तरह -तरह के जन्तु हैं
श्रीमान् किन्तु हैं
मिस्टर परन्तु हैं
कुछ रोगी हैं
कुछ भोगी हैं
कुछ हिंजड़े हैं
कुछ रोगी हैं
तिजोरियों के प्रशिक्षित दलाल हैं
आँखों के अन्धे हैं
घर के कंगाल हैं
गूँगे हैं
बहरे हैं
उथले हैं,गहरे हैं।
गिरते हुये लोग हैं
अकड़ते हुये लोग हैं
भागते हुये लोग हैं
पकड़ते हुये लोग हैं
गरज़ यह कि हर तरह के लोग हैं
एक दूसरे से नफ़रत करते हुये वे
इस बात पर सहमत हैं कि इस देश में
असंख्य रोग हैं
और उनका एकमात्र इलाज-
चुनाव है।
लेकिन मुझे लगा कि
एक विशाल दलदल के किनारे
बहुत बड़ा अधमरा पशु पड़ा हुआ है
उसकी नाभि में एक सड़ा हुआ घाव है
जिससे लगातार-भयानक बदबूदार मवाद
बह रहा है
उसमें जाति और धर्म और सम्प्रदाय और
पेशा और पूँजी के असंख्य कीड़े
किलबिला रहे हैं और अन्धकार में
डूबी हुई पृथ्वी
(पता नहीं किस अनहोनी की प्रतीक्षा में)
इस भीषण सड़ाँव को चुपचाप सह रही है
मगर आपस में नफरत करते हुये वे लोग
इस बात पर सहमत हैं कि
‘चुनाव’ ही सही इलाज है
क्योंकि बुरे और बुरे के बीच से
किसी हद तक ‘कम से कम बुरे को’ चुनते हुये
न उन्हें मलाल है,न भय है
न लाज है
दरअस्ल उन्हें एक मौका मिला है
और इसी बहाने
वे अपने पडो़सी को पराजित कर रहे हैं
मैंने देखा कि हर तरफ
मूढ़ता की हरी-हरी घास लहरा रही है
जिसे कुछ जंगली पशु
खूँद रहे हैं
लीद रहे हैं
चर रहे है
मैंने ऊब और गुस्से को
गलत मुहरों के नीचे से गुज़रते हुये देखा
मैंने अहिंसा को
एक सत्तारूढ़ शब्द का गला काटते हुये देखा
मैंने ईमानदारी को अपनी चोरजेबें
भरते हुये देखा
मैंने विवेक को
चापलूसों के तलवे चाटते हुये देखा…
मैं यह सब देख ही रहा था
कि एक नया रेला आया
उन्मत्त लोगों का बर्बर जुलूस।
वे किसी आदमी को
हाथों पर गठरी की तरह उछाल रहे थे
उसे एक दूसरे से छीन रहे थे।उसे घसीट रहे थे।
चूम रहे थे।पीट रहे थे। गालियाँ दे रहे थे।
गले से लगा रहे थे। उसकी प्रशंसा के गीत
गा रहे थे। उस पर अनगिनत झण्डे फहरा रहे थे।
उसकी जीभ बाहर लटक रही थी। उसकी आँखें बन्द
थीं। उसका चेहरा खून और आँसू से तर था।’मूर्खों!
यह क्या कर रहे हो?’ मैं चिल्लाया। और तभी किसी ने
उसे मेरी ओर उछाल दिया। अरे यह कैसे हुआ?
मैं हतप्रभ सा खड़ा था
और मेरा हमशक्ल
मेरे पैरों के पास
मूर्च्छित- सा
पड़ा था-
दुख और भय से झुरझुरी लेकर
मैं उस पर झुक गया
किन्तु बीच में ही रुक गया
उसका हाथ ऊपर उठा था
खून और आँसू से तर चेहरा
मुस्कराया था। उसकी आँखों का हरापन
उसकी आवाज में उतर आया था-
‘दुखी मत हो। यह मेरी नियति है।
मैं हिन्दुस्तान हूँ। जब भी मैंने
उन्हें उजाले से जोड़ा है
उन्होंने मुझे इसी तरह अपमानित किया है
इसी तरह तोड़ा है
मगर समय गवाह है
कि मेरी बेचैनी के आगे भी राह है।’
सुना। वह आहिस्ता-आहिस्ता कह रहा है
जैसे किसी जले हुये जंगल में
पानी का एक ठण्डा सोता बह रहा है
घास की की ताजगी- भरी
ऐसी आवाज़ है
जो न किसी से खुश है,न नाराज़ है।
‘भूख ने उन्हें जानवर कर दिया है
संशय ने उन्हें आग्रहों से भर दिया है
फिर भी वे अपने हैं…
अपने हैं…
अपने हैं…
जीवित भविष्य के सुन्दरतम सपने हैं
नहीं-यह मेरे लिये दुखी होने का समय
नहीं है।अपने लोगों की घृणा के
इस महोत्सव में
मैं शापित निश्चय हूँ
किसी का भय नहीं है।
‘तुम मेरी चिंता न करो। उनके साथ
चलो। इससे पहले कि वे
गलत हाथों के हथियार हों
इससे पहले कि वे नारों और इस्तहारों से
काले बाजा़र हों
उनसे मिलो।उन्हें बदलो।
नहीं-भीड़ के खिलाफ रुकना
एक खूनी विचार है
क्योंकि हर ठहरा हुआ आदमी
इस हिंसक भीड़ का
अन्धा शिकार है।
तुम मेरी चिन्ता मत करो।
मैं हर वक्त सिर्फ एक चेहरा नहीं हूँ
जहाँ वर्तमान
अपने शिकारी कुत्ते उतारता है
अक्सर में मिट्टी की हरक़त करता हुआ
वह टुकड़ा हूँ
जो आदमी की शिराओं में
बहते हुये खू़न को
उसके सही नाम से पुकारता हूँ
इसलिये मैं कहता हूँ,जाओ ,और
देखो कि लोग…
मैं कुछ कहना चाहता था कि एक धक्के ने
मुझे दूर फेंक दिया। इससे पहले कि मैं गिरता
किन्हीं मजबूत हाथों ने मुझे टेक लिया।
अचानक भीड़ में से निकलकर एक प्रशिक्षित दलाल
मेरी देह में समा गया। दूसरा मेरे हाथों में
एक पर्ची थमा गया। तीसरे ने एक मुहर देकर
पर्दे के पीछे ढकेल दिया।
भय और अनिश्चय के दुहरे दबाव में
पता नहीं कब और कैसे और कहाँ–
कितने नामों से और चिन्हों और शब्दों को
काटते हुये मैं चीख पड़ा-
‘हत्यारा!हत्यारा!!हत्यारा!!!’
मुझे ठीक ठीक याद नहीं है।मैंने यह
किसको कहा था। शायद अपने-आपको
शायद उस हमशक्ल को(जिसने खुद को
हिन्दुस्तान कहा था) शायद उस दलाल को
मगर मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है
मेरी नींद टूट चुकी थी
मेरा पूरा जिस्म पसीने में
सराबोर था। मेरे आसपास से
तरह-तरह के लोग गुजर रहे थे।
हर तरफ हलचल थी,शोर था।
और मैं चुपचाप सुनता हूँ
हाँ शायद -
मैंने भी अपने भीतर
(कहीं बहुत गहरे)
‘कुछ जलता हुआ सा ‘ छुआ है
लेकिन मैं जानता हूँ कि जो कुछ हुआ है
नींद में हुआ है
और तब से आजतक
नींद और नींद के बीच का जंगल काटते हुये
मैंने कई रातें जागकर गुजा़र दीं हैं
हफ्तों पर हफ्ते तह किये हैं
अपनी परेशानी के
निर्मम अकेले और बेहद अनमने क्षण
जिये हैं।
और हर बार मुझे लगा है कि कहीं
कोई खास फ़र्क़ नहीं है
ज़िन्दगी उसी पुराने ढर्रे पर चल रही है
जिसके पीछे कोई तर्क नहीं है
हाँ ,यह सही है कि इन दिनों
कुछ अर्जियाँ मँजूर हुई हैं
कुछ तबादले हुये हैं
कल तक जो थे नहले
आज
दहले हुये हैं
हाँ यह सही है कि
मन्त्री जब प्रजा के सामने आता है
तो पहले से ज्यादा मुस्कराता है
नये-नये वादे करता है
और यह सिर्फ़ घास के
सामने होने की मजबूरी है
वर्ना उस भले मानुस को
यह भी पता नहीं कि विधानसभा भवन
और अपने निजी बिस्तर के बीच
कितने जूतों की दूरी है।
हाँ यह सही है कि इन दिनों -चीजों के
भाव कुछ चढ़ गये हैं।अखबारों के
शीर्षक दिलचस्प हैं,नये हैं।
मन्दी की मार से
पट पड़ी हुई चीज़ें ,बाज़ार में
सहसा उछल गयीं हैं
हाँ यह सही है कि कुर्सियाँ वही हैं
सिर्फ टोपियाँ बदल गयी हैं और-
सच्चे मतभेद के अभाव में
लोग उछल-उछलकर
अपनी जगहें बदल रहे हैं
चढ़ी हुई नदी में
भरी हुई नाव में
हर तरफ ,विरोधी विचारों का
दलदल है
सतहों पर हलचल है
नये-नये नारे हैं
भाषण में जोश है
पानी ही पानी है
पर
की
च
ड़
खामोश है
मैं रोज देखता हूँ कि व्यवस्था की मशीन का
एक पुर्जा़ गरम होकर
अलग छिटक गया है और
ठण्डा होते ही
फिर कुर्सी से चिपक गया है
उसमें न हया है
न दया है
नहीं-अपना कोई हमदर्द
यहाँ नहीं है। मैंने एक-एक को
परख लिया है।
मैंने हरेक को आवाज़ दी है
हरेक का दरवाजा खटखटाया है
मगर बेकार…मैंने जिसकी पूँछ
उठायी है उसको मादा
पाया है।...
वे सब के सब तिजोरियों के
दुभाषिये हैं।
वे वकील हैं। वैज्ञानिक हैं।
अध्यापक हैं। नेता हैं। दार्शनिक
हैं । लेखक हैं। कवि हैं। कलाकार हैं।
यानी कि-
कानून की भाषा बोलता हुआ
अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।
भूख और भूख की आड़ में
चबायी गयी चीजों का अक्स
उनके दाँतों पर ढूँढना
बेकार है। समाजवाद
उनकी जुबान पर अपनी सुरक्षा का
एक आधुनिक मुहावरा है।
मगर मैं जानता हूँ कि मेरे देश का समाजवाद
मालगोदाम में लटकती हुई
उन बाल्टियों की तरह है जिस पर ‘आग’ लिखा है
और उनमें बालू और पानी भरा है।
मेरे देश का समाजवाद
मालगोदाम में लटकती हुई
उन बाल्टियों की तरह है
जिस पर ‘आग’ लिखा है
और उनमें बालू और पानी भरा है...
यहाँ जनता एक गाड़ी है
एक ही संविधान के नीचे
भूख से रिरियाती हुई फैली हथेली का नाम
‘दया’ है
और भूख में
तनी हुई मुट्ठी का नाम नक्सलबाड़ी है।...
मुझसे कहा गया कि संसद
देश की धड़कन को
प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है
जनता को
जनता के विचारों का
नैतिक समर्पण है
लेकिन क्या यह सच है?
या यह सच है कि
अपने यहां संसद -
तेली की वह घानी है
जिसमें आधा तेल है
और आधा पानी है
और यदि यह सच नहीं है
तो यहाँ एक ईमानदार आदमी को
अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है?
जिसने सत्य कह दिया है
उसका बुरा हाल क्यों है?
मैं अक्सर अपने-आपसे सवाल
करता हूँ जिसका मेरे पास
कोई उत्तर नहीं है
और आज तक –
नींद और नींद के बीच का जंगल काटते हुये
मैंने कई रातें जागकर गुजार दी हैं
हफ्ते पर हफ्ते तह किये हैं। ऊब के
निर्मम अकेले और बेहद अनमने क्षण
जिये हैं।
मेरे सामने वही चिरपरिचित अन्धकार है
संशय की अनिश्चयग्रस्त ठण्डी मुद्रायें हैं
हर तरफ शब्दभेदी सन्नाटा है।
दरिद्र की व्यथा की तरह
उचाट और कूँथता हुआ। घृणा में
डूबा हुआ सारा का सारा देश
पहले की तरह आज भी
मेरा कारागार है।
मेरे हाथों में
एक कविता थी
और दिमाग में
आँतों का एक्स-रे।
वह काला धब्बा
कल तक एक शब्द था;
खून के अँधेर में
दवा का ट्रेडमार्क
बन गया था।
औरतों के लिये गै़र-ज़रूरी होने के बाद
अपनी ऊब का
दूसरा समाधान ढूँढना ज़रूरी है।
मैंने सोचा !
क्योंकि शब्द और स्वाद के बीच
अपनी भूख को ज़िन्दा रखना
जीभ और जाँघ के स्थानिक भूगोल की
वाजिब मजबूरी है।
मैंने सोचा और संस्कार के
वर्जित इलाकों में
अपनी आदतों का शिकार
होने के पहले ही बाहर चला आया।
बाहर हवा थी
धूप थी
घास थी
मैंने कहा आजादी…
मुझे अच्छी तरह याद है-
मैंने यही कहा था
मेरी नस-नस में बिजली
दौड़ रही थी
उत्साह में
खुद मेरा स्वर
मुझे अजनबी लग रहा था
मैंने कहा-आ-जा-दी
और दौड़ता हुआ खेतों की ओर
गया। वहाँ कतार के कतार
अनाज के अँकुए फूट रहे थे
मैंने कहा- जैसे कसरत करते हुये
बच्चे। तारों पर
चिडि़याँ चहचहा रही थीं
मैंने कहा-काँसे की बजती हुई घण्टियाँ…
खेत की मेड़ पार करते हुये
मैंने एक बैल की पीठ थपथपायी
सड़क पर जाते हुये आदमी से
उसका नाम पूछा
और कहा- बधाई…
घर लौटकर
मैंने सारी बत्तियाँ जला दीं
पुरानी तस्वीरों को दीवार से
उतारकर
उन्हें साफ किया
और फिर उन्हें दीवार पर (उसी जगह)
पोंछकर टाँग दिया।
मैंने दरवाजे के बाहर
एक पौधा लगाया और कहा–
वन महोत्सव…
और देर तक
हवा में गरदन उचका-उचकाकर
लम्बी-लम्बी साँस खींचता रहा
देर तक महसूस करता रहा–
कि मेरे भीतर
वक्त का सामना करने के लिये
औसतन ,जवान खून है
मगर ,मुझे शान्ति चाहिये
इसलिये एक जोड़ा कबूतर लाकर डाल दिया
‘गूँ..गुटरगूँ…गूँ…गुटरगूँ…’
और चहकते हुये कहा
यही मेरी आस्था है
यही मेरा कानून है।
इस तरह जो था उसे मैंने
जी भरकर प्यार किया
और जो नहीं था
उसका इंतज़ार किया।
मैंने इंतज़ार किया–
अब कोई बच्चा
भूखा रहकर स्कूल नहीं जायेगा
अब कोई छत बारिश में
नहीं टपकेगी।
अब कोई आदमी कपड़ों की लाचारी में
अपना नंगा चेहरा नहीं पहनेगा
अब कोई दवा के अभाव में
घुट-घुटकर नहीं मरेगा
अब कोई किसी की रोटी नहीं छीनेगा
कोई किसी को नंगा नहीं करेगा
अब यह ज़मीन अपनी है
आसमान अपना है
जैसा पहले हुआ करता था…
सूर्य,हमारा सपना है
मैं इन्तजा़र करता रहा..
इन्तजा़र करता रहा…
इन्तजा़र करता रहा…
जनतन्त्र,त्याग,स्वतन्त्रता…
संस्कृति,शान्ति,मनुष्यता…
ये सारे शब्द थे
सुनहरे वादे थे
खुशफ़हम इरादे थे
सुन्दर थे
मौलिक थे
मुखर थे
मैं सुनता रहा…
सुनता रहा…
सुनता रहा…
मतदान होते रहे
मैं अपनी सम्मोहित बुद्धि के नीचे
उसी लोकनायक को
बार-बार चुनता रहा
जिसके पास हर शंका और
हर सवाल का
एक ही जवाब था
यानी कि कोट के बटन-होल में
महकता हुआ एक फूल
गुलाब का।
वह हमें विश्वशान्ति के और पंचशील के सूत्र
समझाता रहा। मैं खुद को
समझाता रहा-’जो मैं चाहता हूँ-
वही होगा। होगा-आज नहीं तो कल
मगर सब कुछ सही होगा।
मैं अपनी सम्मोहित बुद्धि के नीचे
उसी लोकनायक को
बार-बार चुनता रहा
जिसके पास हर शंका और
हर सवाल का
एक ही जवाब था
यानी कि कोट के बटन-होल में
महकता हुआ एक फूल
गुलाब की भीड़ बढ़ती रही।
चौराहे चौड़े होते रहे।
लोग अपने-अपने हिस्से का अनाज
खाकर-निरापद भाव से
बच्चे जनते रहे।
योजनायेँ चलती रहीं
बन्दूकों के कारखानों में
जूते बनते रहे।
और जब कभी मौसम
उतार पर होता था।
हमारा संशय
हमें कोंचता था।
हम उत्तेजित होकर
पूछते थे
यह क्या है?
ऐसा क्यों है?
फिर बहसें होतीं थीं
शब्दों के जंगल में
हम एक-दूसरे को काटते थे
भाषा की खाई को
जुबान से कम जूतों से
ज्यादा पाटते थे
कभी वह हारता रहा…
कभी हम जीतते रहे…
इसी तरह नोक-झोंक चलती रही
दिन बीतते रहे…
मगर एक दिन मैं स्तब्ध रह गया।
मेरा सारा धीरज
युद्ध की आग से पिघलती हुयी बर्फ में
बह गया।
मैंने देखा कि मैदानों में
नदियों की जगह
मरे हुये साँपों की केंचुलें बिछी हैं
पेड़-टूटे हुये रडार की तरह खड़े हैं
दूर-दूर तक
कोई मौसम नहीं है
लोग-
घरों के भीतर नंगे हो गये हैं
और बाहर मुर्दे पड़े हैं
विधवायें तमगा लूट रहीं हैं
सधवायें मंगल गा रहीं हैं
वन-महोत्सव से लौटी हुई कार्यप्रणालियाँ
अकाल का लंगर चला रही हैं
जगह-जगह तख्तियाँ लटक रहीं हैं-
‘यह श्मशान है,यहाँ की तश्वीर लेना
सख्त मना है।’
क्योंकि शब्द और स्वाद के बीच
अपनी भूख को ज़िन्दा रखना
जीभ और जाँघ के स्थानिक भूगोल की
वाजिब मजबूरी है।
फिर भी उस उजाड़ में
कहीं-कहीं घास का हरा कोना
कितना डरावना है
मैंने अचरज से देखा कि दुनिया का
सबसे बड़ा बौद्ध- मठ
बारूद का सबसे बड़ा गोदाम है
अखबार के मटमैले हासिये पर
लेटे हुये ,एक तटस्थ और कोढ़ी देवता का
शांतिवाद ,नाम है
यह मेरा देश है…
यह मेरा देश है…
हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक
फैला हुआ
जली हुई मिट्टी का ढेर है
जहाँ हर तीसरी जुबान का मतलब-
नफ़रत है।
साज़िश है।
अन्धेर है।
यह मेरा देश है
और यह मेरे देश की जनता है
जनता क्या है?
एक शब्द…सिर्फ एक शब्द है:
कुहरा,कीचड़ और कांच से
बना हुआ…
एक भेड़ है
जो दूसरों की ठण्ड के लिये
अपनी पीठ पर
ऊन की फसल ढो रही है।
जनता क्या है?
एक शब्द…
सिर्फ एक शब्द है
कुहरा,कीचड़ और कांच से
बना हुआ…
एक भेड़ है
जो दूसरों की ठण्ड के लिये
अपनी पीठ पर
ऊन की फसल ढो रही है
एक पेड़ है
जो ढलान पर
हर आती-जाती हवा की जुबान में
हाँऽऽ..हाँऽऽ करता है
क्योंकि अपनी हरियाली से
डरता है।
गाँवों में गन्दे पनालों से लेकर
शहर के शिवालों तक फैली हुई
‘कथाकलि’ की अंमूर्त मुद्रा है
यह जनता…
उसकी श्रद्धा अटूट है
उसको समझा दिया गया है कि यहाँ
ऐसा जनतन्त्र है जिसमें
घोड़े और घास को
एक-जैसी छूट है
कैसी विडम्बना है
कैसा झूठ है
दरअसल, अपने यहाँ जनतन्त्र
एक ऐसा तमाशा है
जिसकी जान
मदारी की भाषा है।
दरअसल,
अपने यहाँ जनतन्त्र
एक ऐसा तमाशा है
जिसकी जान
मदारी की भाषा है।
हर तरफ धुआँ है
हर तरफ कुहासा है
जो दाँतों और दलदलों का दलाल है
वही देशभक्त है
अन्धकार में सुरक्षित होने का
नाम है- तटस्थता। ...
यहाँ कायरता के चेहरे पर
सबसे ज्यादा रक्त हैं।
जिसके पास थाली है
हर भूखा आदमी
उसके लिये,सबसे भद्दी गाली है...
हर तरफ कुआँ है
हर तरफ खाई है
यहाँ,सिर्फ ,वह आदमी,देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है
या फिर गरीब है...
मैं सोचता रहा
और घूमता रहा-
टूटे हुये पुलों के नीचे
वीरान सड़कों पर आँखों के
अंधे रेगिस्तानों में
फटे हुये पालों की
अधूरी जल-यात्राओं में
टूटी हुई चीज़ों के ढेर में
मैं खोयी हुई आजादी का अर्थ
ढूँढता रहा।
अपनी पसलियों के नीचे /अस्पतालों के
बिस्तरों में/ नुमाइशों में
बाजारों में /गाँवों में
जंगलों में /पहाडों पर
देश के इस छोर से उस छोर तक
उसी लोक-चेतना को
बार-बार टेरता रहा
जो मुझे दोबारा जी सके
जो मुझे शान्ति दे और
मेरे भीतर-बाहर का ज़हर
खुद पी सके।
–और तभी सुलग उठा पश्चिमी सीमान्त
…ध्वस्त…ध्वस्त…ध्वान्त…ध्वान्त…
मैं दोबार चौंककर खड़ा हो गया
जो चेहरा आत्महीनता की स्वीकृति में
कन्धों पर लुढ़क रहा था,
किसी झनझनाते चाकू की तरह
खुलकर,कड़ा हो गया…
अचानक अपने-आपमें जिन्दा होने की
यह घटना
इस देश की परम्परा की -
एक बेमिशाल कड़ी थी
लेकिन इसे साहस मत कहो
दरअस्ल,यह पुट्ठों तक चोट खायी हुई
गाय की घृणा थी...
मगर उसके तुरन्त बाद
मुझे झेलनी पड़ी थी-सबसे बड़ी ट्रैजेडी
अपने इतिहास की
जब दुनिया के स्याह और सफेद चेहरों ने
विस्मय से देखा कि ताशकन्द में
समझौते की सफेद चादर के नीचे
एक शान्तियात्री की लाश थी
और अब यह किसी पौराणिक कथा के
उपसंहार की तरह है कि इसे देश में
रोशनी उन पहाड़ों से आई थी
जहाँ मेरे पडो़सी ने
मात खायी थी।
मगर मैं फिर वहीं चला गया
अपने जुनून के अँधेरे में
फूहड़ इरादों के हाथों
छला गया।
वहाँ बंजर मैदान
कंकालों की नुमाइश कर रहे थे
गोदाम अनाजों से भरे थे और लोग
भूखों मर रहे थे
मैंने महसूस किया कि मैं वक्त के
एक शर्मनाक दौर से गुजर रहा हूँ
अब ऐसा वक्त आ गया है जब कोई
किसी का झुलसा हुआ चेहरा नहीं देखता है
अब न तो कोई किसी का खाली पेट
देखता है, न थरथराती हुई टाँगें
और न ढला हुआ ‘सूर्यहीन कन्धा’ देखता है
हर आदमी,सिर्फ, अपना धन्धा देखता है
सबने भाईचारा भुला दिया है
आत्मा की सरलता को भुलाकर
मतलब के अँधेरे में
सुला दिया है।
सहानुभूति और प्यार
अब ऐसा छलावा है जिसके ज़रिये
एक आदमी दूसरे को,अकेले –
अँधेरे में ले जाता है और
उसकी पीठ में छुरा भोंक देता है
ठीक उस मोची की तरह जो चौक से
गुजरते हुये देहाती को
प्यार से बुलाता है और मरम्मत के नाम पर
रबर के तल्ले में
लोहे के तीन दर्जन फुल्लियाँ
ठोंक देता है और उसके नहीं -नहीं के बावजूद
डपटकर पैसा वसूलता है
गरज़ यह है कि अपराध
अपने यहाँ एक ऐसा सदाबहार फूल है
जो आत्मीयता की खाद पर
लाल-भड़क फूलता है
अपराध
अपने यहाँ एक ऐसा सदाबहार फूल है
जो आत्मीयता की खाद पर
लाल-भड़क फूलता है
मैंने देखा कि
इस जनतांत्रिक जंगल में
हर तरफ हत्याओं के नीचे से निकलते है
हरे-हरे हाथ
और पेड़ों पर
पत्तों की जुबान बनकर
लटक जाते हैं
वे ऐसी भाषा बोलते हैं
जिसे सुनकर
नागरिकता की गोधूलि में
घर लौटते मुसाफिर
अपना रास्ता भटक जाते हैं।
उन्होंने किसी चीज को
सही जगह नहीं रहने दिया
न संज्ञा
न विशेषण
न सर्वनाम
एक समूचा और सही वाक्य
टूटकर
‘बि ख र’ गया है
उनका व्याकरण इस देश की
शिराओं में छिपे हुये कारकों का
हत्यारा है
उनकी सख्त पकड़ के नीचे
भूख से मरा हुआ आदमी
इस मौसम का
सबसे दिलचस्प विज्ञापन है और गाय
सबसे सटीक नारा है
वे खेतों मेंभूख और शहरों में
अफवाहों के पुलिंदे फेंकते हैं
भूख से मरा हुआ आदमी/
इस मौसम का
सबसे दिलचस्प विज्ञापन है
और गाय
सबसे सटीक नारा है
देश और धर्म और नैतिकता की
दुहाई देकर
कुछ लोगों की सुविधा
दूसरों की ‘हाय’पर सेंकते हैं
वे जिसकी पीठ ठोंकते हैं
उसकी रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है
वे मुस्कराते हैं और
दूसरे की आँख में झपटती हुई प्रतिहिंसा
करवट बदलकर सो जाती है
मैं देखता रहा…
देखता रहा…
हर तरफ ऊब थी
संशय था
नफरत थी
मगर हर आदमी अपनी ज़रूरतों के आगे
असहाय था। उसमें
सारी चीज़ों को नये सिरे से बदलने की
बेचैनी थी ,रोष था
लेकिन उसका गुस्सा
एक तथ्यहीन मिश्रण था:
आग और आँसू और हाय का।
इस तरह एक दिन-
जब मैं घूमते-घूमते थक चुका था
मेरे खून में एक काली आँधी-
दौड़ लगा रही थी
मेरी असफलताओं में सोये हुये
वहसी इरादों को
झकझोरकर जगा रही थी
अचानक ,नींद की असंख्य पर्तों में
डूबते हुये मैंने देखा
मेरी उलझनों के अँधेरे में
एक हमशक्ल खड़ा है
मैंने उससे पूछा-’तुम कौन हो?
यहाँ क्यों आये हो?
तुम्हें क्या हुआ है?’
‘तुमने पहचाना नहीं-मैं हिंदुस्तान हूँ
हाँ -मैं हिंदुस्तान हूँ’,
वह हँसता है-ऐसी हँसी कि दिल
दहल जाता है
कलेजा मुँह को आता है
और मैं हैरान हूँ
‘यहाँ आओ
मेरे पास आओ
मुझे छुओ।
मुझे जियो। मेरे साथ चलो
मेरा यकीन करो। इस दलदल से
बाहर निकलो!
सुनो!
तुम चाहे जिसे चुनो
मगर इसे नहीं। इसे बदलो।
मुझे लगा-आवाज़
जैसे किसी जलते हुये कुएँ से
आ रही है।
एक अजीब-सी प्यार भरी गुर्राहट
जैसे कोई मादा भेड़िया
अपने छौने को दूध पिला रही है
साथ ही किसी छौने का सिर चबा रही है...
मेरा सारा जिस्म थरथरा रहा था
उसकी आवाज में
असंख्य नरकों की घृणा भरी थी
वह एक-एक शब्द चबा-चबाकर
बोल रहा था। मगर उसकी आँख
गुस्से में भी हरी थी
वह कह रहा था-
‘तुम्हारी आँखों के चकनाचूर आईनों में
वक्त की बदरंग छायाएँ उलटी कर रही हैं
और तुम पेड़ों की छाल गिनकर
भविष्य का कार्यक्रम तैयार कर रहे हो
तुम एक ऐसी जिन्दगी से गुज़र रहे हो
जिसमें न कोई तुक है
न सुख है
तुम अपनी शापित परछाई से टकराकर
रास्ते में रुक गये हो
तुम जो हर चीज़
अपने दाँतों के नीचे
खाने के आदी हो
चाहे वह सपना अथवा आज़ादी हो
अचानक ,इस तरह,क्यों चुक गये हो
वह क्या है जिसने तुम्हें
बर्बरों के सामने अदब से
रहना सिखलाया है?
क्या यह विश्वास की कमी है
जो तुम्हारी भलमनसाहत बन गयी है
या कि शर्म
अब तुम्हारी सहूलियत बन गयी है
नहीं-सरलता की तरह इस तरह
मत दौड़ो
उसमें भूख और मन्दिर की रोशनी का
रिश्ता है। वह बनिये की पूँजी का
आधार है
मैं बार-बार कहता हूँ कि इस उलझी हुई
दुनिया में
आसानी से समझ में आने वाली चीज़
सिर्फ दीवार है।
और यह दीवार अब तुम्हारी आदत का
हिस्सा बन गयी है
इसे झटककर अलग करो
अपनी आदतों में
फूलों की जगह पत्थर भरो
मासूमियत के हर तकाज़े को
ठोकर मार दो
अब वक्त आ गया है तुम उठो
और अपनी ऊब को आकार दो।
आज मैं तुम्हें वह सत्य बतलाता हूँ
जिसके आगे हर सचाई
छोटी है। इस दुनिया में
भूखे आदमी का सबसे बड़ा तर्क
रोटी है।
मगर तुम्हारी भूख और भाषा में
यदि सही दूरी नहीं है
तो तुम अपने-आपको आदमी मत कहो
क्योंकि पशुता -
सिर्फ पूँछ होने की मज़बूरी नहीं है
वह आदमी को वहीं ले जाती है
जहाँ भूख
सबसे पहले भाषा को खाती है
वक्त सिर्फ उसका चेहरा बिगाड़ता है
जो अपने चेहरे की राख
दूसरों की रूमाल से झाड़ता है
जो अपना हाथ
मैला होने से डरता है
वह एक नहीं ग्यारह कायरों की
मौत मरता है
और सुनो! नफ़रत और रोशनी
सिर्फ़ उनके हिस्से की चीज़ हैं
जिसे जंगल के हाशिये पर
जीने की तमीज है
इसलिये उठो और अपने भीतर
सोये हुए जंगल को
आवाज़ दो
उसे जगाओ और देखो-
कि तुम अकेले नहीं हो
और न किसी के मुहताज हो
लाखों हैं जो तुम्हारे इन्तज़ार में खडे़ हैं
वहाँ चलो।उनका साथ दो
और इस तिलस्म का जादू उतारने में
उनकी मदद करो और साबित करो
कि वे सारी चीज़ें अन्धी हो गयीं हैं
जिनमें तुम शरीक नहीं हो…’
मैं पूरी तत्परता से
उसे सुन रहा था
एक के बाद दूसरा
दूसरे के बाद तीसरा
तीसरे के बाद चौथा
चौथे के बाद पाँचवाँ…
यानी कि एक के बाद दूसरा विकल्प
चुन रहा था
मगर मैं हिचक रहा था
क्योंकि मेरे पास
कुल जमा थोड़ी सुविधायें थीं
जो मेरी सीमाएँ थीं
यद्यपि यह सही है कि मैं
कोई ठण्डा आदमी नहीं है
मुझमें भी आग है-
मगर वह
भभककर बाहर नहीं आती
क्योंकि उसके चारों तरफ चक्कर काटता हुआ
एक ‘पूँजीवादी’दिमाग है
जो परिवर्तन तो चाहता है
मगर आहिस्ता-आहिस्ता
कुछ इस तरह कि चीज़ों की शालीनता
बनी रहे।
कुछ इस तरह कि काँख भी ढकी रहे
और विरोध में उठे हुये हाथ की
मुट्ठी भी तनी रहे…और यही है कि बात
फैलने की हद तक
आते-आते रुक जाती है
क्योंकि हर बार
चन्द सुविधाओं के लालच के सामने
अभियोग की भाषा चुक जाती है।
मैं खुद को कुरेद रहा था
अपने बहाने
उन तमाम लोगों की
असफलताओं को
सोच रहा था
जो मेरे नजदीक थे।
इस तरह साबुत और सीधे विचारों पर
जमी हुई काई और उगी हुई घास को
खरोंच रहा था,नोंच रहा था
पूरे समाज की सीवन उधेड़ते हुये
मैंने आदमी के भीतर की मैल
देख ली थी। मेरा सिर
भिन्ना रहा था
मेरा हृदय भारी था
मेरा शरीर इस बुरी तरह थका था कि मैं
अपनी तरफ़ घूरते उस चेहरे से
थोड़ी देर के लिये
बचना चाह रहा था
जो अपनी पैनी आँखों से
मेरी बेबसी और मेरा उथलापन
थाह रहा था
प्रस्तावित भीड़ में
शरीक होने के लिये
अभी मैंने कोई निर्णय नहीं लिया था
अचानक ,उसने मेरा हाथ पकड़कर
खींच लिया और मैं
जेब में जूतों का टोकन और दिमाग में
ताजे़ अखबार की कतरन लिये हुये
धड़ाम से-
चौथे आम चुनाव की सीढ़ियों से फिसलकर
मत-पेटियों के
गड़गच्च अँधेरे में गिर पड़ा
नींद के भीतर यह दूसरी नींद है
और मुझे कुछ नहीं सूझ रहा है
सिर्फ एक शोर है
जिसमें कानों के पर्दे फटे जा रहे हैं
शासन सुरक्षा रोज़गार शिक्षा …
राष्ट्रधर्म देशहित हिंसा अहिंसा…
सैन्यशक्ति देशभक्ति आजा़दी वीसा…
वाद बिरादरी भूख भीख भाषा…
शान्ति क्रान्ति शीतयुद्ध एटमबम सीमा…
एकता सीढ़ियाँ साहित्यिक पीढ़ियाँ निराशा…
झाँय-झाँय,खाँय-खाँय,हाय-हाय,साँय-साँय…
मैंने कानों में ठूँस ली हैं अँगुलियाँ
और अँधेरे में गाड़ दी है
आंखों की रोशनी।
सब-कुछ अब धीरे-धीरे खुलने लगा है
मत-वर्षा के इस दादुर-शोर में
मैंने देखा हर तरफ
रंग-बिरंगे झण्डे फहरा रहे हैं
गिरगिट की तरह रंग बदलते हुये
गुट से गुट टकरा रहे हैं
वे एक- दूसरे से दाँता-किलकिल कर रहे हैं
एक दूसरे को दुर-दुर,बिल-बिल कर रहे हैं
हर तरफ तरह -तरह के जन्तु हैं
श्रीमान् किन्तु हैं
मिस्टर परन्तु हैं
कुछ रोगी हैं
कुछ भोगी हैं
कुछ हिंजड़े हैं
कुछ रोगी हैं
तिजोरियों के प्रशिक्षित दलाल हैं
आँखों के अन्धे हैं
घर के कंगाल हैं
गूँगे हैं
बहरे हैं
उथले हैं,गहरे हैं।
गिरते हुये लोग हैं
अकड़ते हुये लोग हैं
भागते हुये लोग हैं
पकड़ते हुये लोग हैं
गरज़ यह कि हर तरह के लोग हैं
एक दूसरे से नफ़रत करते हुये वे
इस बात पर सहमत हैं कि इस देश में
असंख्य रोग हैं
और उनका एकमात्र इलाज-
चुनाव है।
लेकिन मुझे लगा कि
एक विशाल दलदल के किनारे
बहुत बड़ा अधमरा पशु पड़ा हुआ है
उसकी नाभि में एक सड़ा हुआ घाव है
जिससे लगातार-भयानक बदबूदार मवाद
बह रहा है
उसमें जाति और धर्म और सम्प्रदाय और
पेशा और पूँजी के असंख्य कीड़े
किलबिला रहे हैं और अन्धकार में
डूबी हुई पृथ्वी
(पता नहीं किस अनहोनी की प्रतीक्षा में)
इस भीषण सड़ाँव को चुपचाप सह रही है
मगर आपस में नफरत करते हुये वे लोग
इस बात पर सहमत हैं कि
‘चुनाव’ ही सही इलाज है
क्योंकि बुरे और बुरे के बीच से
किसी हद तक ‘कम से कम बुरे को’ चुनते हुये
न उन्हें मलाल है,न भय है
न लाज है
दरअस्ल उन्हें एक मौका मिला है
और इसी बहाने
वे अपने पडो़सी को पराजित कर रहे हैं
मैंने देखा कि हर तरफ
मूढ़ता की हरी-हरी घास लहरा रही है
जिसे कुछ जंगली पशु
खूँद रहे हैं
लीद रहे हैं
चर रहे है
मैंने ऊब और गुस्से को
गलत मुहरों के नीचे से गुज़रते हुये देखा
मैंने अहिंसा को
एक सत्तारूढ़ शब्द का गला काटते हुये देखा
मैंने ईमानदारी को अपनी चोरजेबें
भरते हुये देखा
मैंने विवेक को
चापलूसों के तलवे चाटते हुये देखा…
मैं यह सब देख ही रहा था
कि एक नया रेला आया
उन्मत्त लोगों का बर्बर जुलूस।
वे किसी आदमी को
हाथों पर गठरी की तरह उछाल रहे थे
उसे एक दूसरे से छीन रहे थे।उसे घसीट रहे थे।
चूम रहे थे।पीट रहे थे। गालियाँ दे रहे थे।
गले से लगा रहे थे। उसकी प्रशंसा के गीत
गा रहे थे। उस पर अनगिनत झण्डे फहरा रहे थे।
उसकी जीभ बाहर लटक रही थी। उसकी आँखें बन्द
थीं। उसका चेहरा खून और आँसू से तर था।’मूर्खों!
यह क्या कर रहे हो?’ मैं चिल्लाया। और तभी किसी ने
उसे मेरी ओर उछाल दिया। अरे यह कैसे हुआ?
मैं हतप्रभ सा खड़ा था
और मेरा हमशक्ल
मेरे पैरों के पास
मूर्च्छित- सा
पड़ा था-
दुख और भय से झुरझुरी लेकर
मैं उस पर झुक गया
किन्तु बीच में ही रुक गया
उसका हाथ ऊपर उठा था
खून और आँसू से तर चेहरा
मुस्कराया था। उसकी आँखों का हरापन
उसकी आवाज में उतर आया था-
‘दुखी मत हो। यह मेरी नियति है।
मैं हिन्दुस्तान हूँ। जब भी मैंने
उन्हें उजाले से जोड़ा है
उन्होंने मुझे इसी तरह अपमानित किया है
इसी तरह तोड़ा है
मगर समय गवाह है
कि मेरी बेचैनी के आगे भी राह है।’
सुना। वह आहिस्ता-आहिस्ता कह रहा है
जैसे किसी जले हुये जंगल में
पानी का एक ठण्डा सोता बह रहा है
घास की की ताजगी- भरी
ऐसी आवाज़ है
जो न किसी से खुश है,न नाराज़ है।
‘भूख ने उन्हें जानवर कर दिया है
संशय ने उन्हें आग्रहों से भर दिया है
फिर भी वे अपने हैं…
अपने हैं…
अपने हैं…
जीवित भविष्य के सुन्दरतम सपने हैं
नहीं-यह मेरे लिये दुखी होने का समय
नहीं है।अपने लोगों की घृणा के
इस महोत्सव में
मैं शापित निश्चय हूँ
किसी का भय नहीं है।
‘तुम मेरी चिंता न करो। उनके साथ
चलो। इससे पहले कि वे
गलत हाथों के हथियार हों
इससे पहले कि वे नारों और इस्तहारों से
काले बाजा़र हों
उनसे मिलो।उन्हें बदलो।
नहीं-भीड़ के खिलाफ रुकना
एक खूनी विचार है
क्योंकि हर ठहरा हुआ आदमी
इस हिंसक भीड़ का
अन्धा शिकार है।
तुम मेरी चिन्ता मत करो।
मैं हर वक्त सिर्फ एक चेहरा नहीं हूँ
जहाँ वर्तमान
अपने शिकारी कुत्ते उतारता है
अक्सर में मिट्टी की हरक़त करता हुआ
वह टुकड़ा हूँ
जो आदमी की शिराओं में
बहते हुये खू़न को
उसके सही नाम से पुकारता हूँ
इसलिये मैं कहता हूँ,जाओ ,और
देखो कि लोग…
मैं कुछ कहना चाहता था कि एक धक्के ने
मुझे दूर फेंक दिया। इससे पहले कि मैं गिरता
किन्हीं मजबूत हाथों ने मुझे टेक लिया।
अचानक भीड़ में से निकलकर एक प्रशिक्षित दलाल
मेरी देह में समा गया। दूसरा मेरे हाथों में
एक पर्ची थमा गया। तीसरे ने एक मुहर देकर
पर्दे के पीछे ढकेल दिया।
भय और अनिश्चय के दुहरे दबाव में
पता नहीं कब और कैसे और कहाँ–
कितने नामों से और चिन्हों और शब्दों को
काटते हुये मैं चीख पड़ा-
‘हत्यारा!हत्यारा!!हत्यारा!!!’
मुझे ठीक ठीक याद नहीं है।मैंने यह
किसको कहा था। शायद अपने-आपको
शायद उस हमशक्ल को(जिसने खुद को
हिन्दुस्तान कहा था) शायद उस दलाल को
मगर मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है
मेरी नींद टूट चुकी थी
मेरा पूरा जिस्म पसीने में
सराबोर था। मेरे आसपास से
तरह-तरह के लोग गुजर रहे थे।
हर तरफ हलचल थी,शोर था।
और मैं चुपचाप सुनता हूँ
हाँ शायद -
मैंने भी अपने भीतर
(कहीं बहुत गहरे)
‘कुछ जलता हुआ सा ‘ छुआ है
लेकिन मैं जानता हूँ कि जो कुछ हुआ है
नींद में हुआ है
और तब से आजतक
नींद और नींद के बीच का जंगल काटते हुये
मैंने कई रातें जागकर गुजा़र दीं हैं
हफ्तों पर हफ्ते तह किये हैं
अपनी परेशानी के
निर्मम अकेले और बेहद अनमने क्षण
जिये हैं।
और हर बार मुझे लगा है कि कहीं
कोई खास फ़र्क़ नहीं है
ज़िन्दगी उसी पुराने ढर्रे पर चल रही है
जिसके पीछे कोई तर्क नहीं है
हाँ ,यह सही है कि इन दिनों
कुछ अर्जियाँ मँजूर हुई हैं
कुछ तबादले हुये हैं
कल तक जो थे नहले
आज
दहले हुये हैं
हाँ यह सही है कि
मन्त्री जब प्रजा के सामने आता है
तो पहले से ज्यादा मुस्कराता है
नये-नये वादे करता है
और यह सिर्फ़ घास के
सामने होने की मजबूरी है
वर्ना उस भले मानुस को
यह भी पता नहीं कि विधानसभा भवन
और अपने निजी बिस्तर के बीच
कितने जूतों की दूरी है।
हाँ यह सही है कि इन दिनों -चीजों के
भाव कुछ चढ़ गये हैं।अखबारों के
शीर्षक दिलचस्प हैं,नये हैं।
मन्दी की मार से
पट पड़ी हुई चीज़ें ,बाज़ार में
सहसा उछल गयीं हैं
हाँ यह सही है कि कुर्सियाँ वही हैं
सिर्फ टोपियाँ बदल गयी हैं और-
सच्चे मतभेद के अभाव में
लोग उछल-उछलकर
अपनी जगहें बदल रहे हैं
चढ़ी हुई नदी में
भरी हुई नाव में
हर तरफ ,विरोधी विचारों का
दलदल है
सतहों पर हलचल है
नये-नये नारे हैं
भाषण में जोश है
पानी ही पानी है
पर
की
च
ड़
खामोश है
मैं रोज देखता हूँ कि व्यवस्था की मशीन का
एक पुर्जा़ गरम होकर
अलग छिटक गया है और
ठण्डा होते ही
फिर कुर्सी से चिपक गया है
उसमें न हया है
न दया है
नहीं-अपना कोई हमदर्द
यहाँ नहीं है। मैंने एक-एक को
परख लिया है।
मैंने हरेक को आवाज़ दी है
हरेक का दरवाजा खटखटाया है
मगर बेकार…मैंने जिसकी पूँछ
उठायी है उसको मादा
पाया है।...
वे सब के सब तिजोरियों के
दुभाषिये हैं।
वे वकील हैं। वैज्ञानिक हैं।
अध्यापक हैं। नेता हैं। दार्शनिक
हैं । लेखक हैं। कवि हैं। कलाकार हैं।
यानी कि-
कानून की भाषा बोलता हुआ
अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।
भूख और भूख की आड़ में
चबायी गयी चीजों का अक्स
उनके दाँतों पर ढूँढना
बेकार है। समाजवाद
उनकी जुबान पर अपनी सुरक्षा का
एक आधुनिक मुहावरा है।
मगर मैं जानता हूँ कि मेरे देश का समाजवाद
मालगोदाम में लटकती हुई
उन बाल्टियों की तरह है जिस पर ‘आग’ लिखा है
और उनमें बालू और पानी भरा है।
मेरे देश का समाजवाद
मालगोदाम में लटकती हुई
उन बाल्टियों की तरह है
जिस पर ‘आग’ लिखा है
और उनमें बालू और पानी भरा है...
यहाँ जनता एक गाड़ी है
एक ही संविधान के नीचे
भूख से रिरियाती हुई फैली हथेली का नाम
‘दया’ है
और भूख में
तनी हुई मुट्ठी का नाम नक्सलबाड़ी है।...
मुझसे कहा गया कि संसद
देश की धड़कन को
प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है
जनता को
जनता के विचारों का
नैतिक समर्पण है
लेकिन क्या यह सच है?
या यह सच है कि
अपने यहां संसद -
तेली की वह घानी है
जिसमें आधा तेल है
और आधा पानी है
और यदि यह सच नहीं है
तो यहाँ एक ईमानदार आदमी को
अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है?
जिसने सत्य कह दिया है
उसका बुरा हाल क्यों है?
मैं अक्सर अपने-आपसे सवाल
करता हूँ जिसका मेरे पास
कोई उत्तर नहीं है
और आज तक –
नींद और नींद के बीच का जंगल काटते हुये
मैंने कई रातें जागकर गुजार दी हैं
हफ्ते पर हफ्ते तह किये हैं। ऊब के
निर्मम अकेले और बेहद अनमने क्षण
जिये हैं।
मेरे सामने वही चिरपरिचित अन्धकार है
संशय की अनिश्चयग्रस्त ठण्डी मुद्रायें हैं
हर तरफ शब्दभेदी सन्नाटा है।
दरिद्र की व्यथा की तरह
उचाट और कूँथता हुआ। घृणा में
डूबा हुआ सारा का सारा देश
पहले की तरह आज भी
मेरा कारागार है।
कर्ज उतर जाता है एहसान नहीं उतरता /राही मासूम रजा
यहाँ (बंबई में) कई दोस्त मिले जिनके साथ अच्छी-बुरी गुजरी। कृष्ण चंदर, भारती, कमलेश्वर, जो शुरू ही में ये न मिल गए होते तो बंबई में मेरा रहना असंभव हो जाता। शुरू में मेरे पास कोई काम नहीं था और बंबई में मैं अजनबी था। उन दिनों इन दोस्तों ने बड़ी मदद की। इन्होंने मुझे जिंदा रखने के लिए चंदा देकर मेरी तौहीन नहीं की। इन्होंने मुझे उलटे-सीधे काम दिए और उस काम की मजदूरी दी। पर इसका मतलब यह नहीं कि मैं इन लोगों के एहसान से कभी बरी हो सकता हूँ।
मुझे वह दिन आज भी अच्छी तरह याद है जब नैयर होली फैमिली अस्पताल में थीं। चार दिन के बाद अस्पताल का बिल अदा करके मुझे नैयर और मरियम को वहाँ से लाना था। सात-साढ़े सात सौ का बिल था और मेरे पास सौ-सवा सौ रुपए थे। तब कमलेश्वर ने 'सारिका' से, भारती ने 'धर्मयुग' से मुझे पैसे एडवांस दिलवाए और कृष्ण जी ने अपनी एक फिल्म के कुछ संवाद लिखवा के पैसे दिये और मरियम घर आ गईं। आज सोचता हूँ कि जो यह तीनों न रहे होते तो मैंने क्या किया होता? क्या मरियम को अस्पताल में छोड़ देता? वह बहुत बुरे दिन थे। कुछ दोस्तों से उधार भी लिया। कलकत्ते से ओ.पी. टाँटिया और राजस्थान से मेरी एक मुँहबोली बहन लनिला और अलीगढ़ से मेरे भाई मेहँदी रजा और दोस्त कुँवरपाल सिंह ने मदद की। कर्ज उतर जाता है एहसान नहीं उतरता। और कुछ बातें ऐसी हैं जो एहसान में नहीं आतीं पर उन्हें याद करो तो आँखें नम हो जाती हैं।
जब मैं अलीगढ़ से बंबई आया तो अपने छोटे भाई अहमद रजा के साथ ठहरा। छोटे भाई तो बहुतों के होते हैं, पर अहमद रजा यानी हद्दन जैसा छोटा भाई मुश्किल से होगा किसी की तकदीर में। उसने मेरा स्वागत यूँ किया कि मैं यह भूल गया कि फिलहाल मैं बेरोजगार हूँ। हम हद्दन के साथ ठहरे हुए थे, पर लगता था कि वह अपने परिवार के साथ हमारे साथ ठहरे हुए हैं। घर में होता वह था जो मैं चाहता था या मेरी पत्नी नैयर चाहती थी। वह घर बहुत सस्ता था। जिस फ्लैट में अब हूँ उससे बड़ा था। इसका किराया 600 दे रहा हूँ। उसका किराया केवल 150 रुपए माहवार था। तो हद्दन ने सोचा कि वह घर उन्हें मेरे लिए खाली कर देना चाहिए। रिजर्व बैंक से उन्हें फ्लैट मिल सकता था, मिल गया। जब वह जाने लगे तो उन्होंने अपनी पत्नी के साथ साजिश की कि घर का सारा सामान मेरे लिए छोड़ जाएँ क्योंकि मेरे पास तो कुछ था नहीं। जाहिर है कि मैं इस पर राजी नहीं हुआ। उन दोनों को बड़ी जबरदस्त डाँट पिलाई मैंने।
चुनांचे वह घर का सारा सामान लेकर चले गए और घर नंगा रह गया। मेरे पास दो कुर्सियाँ भी नहीं थीं। हम ने कमरे में दो गद्दे डाल दिए और वही दो गद्दोंवाला वीरान कमरा बंबई में हमारा पहला ड्राइंग रूम बना... उन दिनों मैं नैयर से शर्माने लगा था। मैं सोचता कि यह क्या मुहब्बत हुई, कैसी जिंदगी से निकाल कर कैसी जिंदगी में ले आया मैं उस औरत को जिसे मैंने अपना प्यार दे रक्खा है... अपना तमाम प्यार। मगर नैयर ने मुझे यह कभी महसूस नहीं होने दिया कि वह निम्नमध्यवर्गीय जिंदगी को झेल नहीं पा रही है। हम दोनों उस उजाड़ घर में बहुत खुश थे। उन दिनों कृष्ण चंदर, सलमा आपा, भारती और कमलेश्वर के सिवा कोई लेखक हमसे जी खोल के मिलता नहीं था। हम मजरूह साहब के घर उन से मिलने जाते तो वह अपने बेडरूम में बैठे शतरंज खेलते रहते और हम लोगों से मिलने के लिए बाहर न निकलते। फिरदौस भाभी बेचारी लीपापोती करती रहतीं... कई और लेखक इस डर से कतरा जाते थे कि मैं कहीं मदद न माँग बैठूँ।...
आप खुद सोच सकते हैं कि हमारे चारों ओर कैसा बेदर्द और बेमुरव्वत अँधेरा रहा होगा उन दिनों। नैयर लोगों से मिलते भी घबराती थीं, इसलिए मिलना-जुलना भी कम लोगों से था और बहुत कम था... कि एक दिन सलमा आपा आ गईं। इन्हें आप सलमा सिद्दीकी के नाम से जानते हैं। उस वक्त हम दोनों उन्हीं गद्दों पर बैठे रमी खेल रहे थे। सलमा आपा बैठीं। इधर-उधर की बातें होती रहीं। फिर वह चली गईं और थोड़ी देर के बाद उनका एक नौकर एक ठेले पर एक सोफा लदवाए हुए आया। हमने उस तोहफे को स्वीकार कर लिया, कि जो न करते तो सलमा आपा और कृष्ण जी को तकलीफ होती और हम उन्हें तकलीफ देना नहीं चाहते थे।
मुझे वह दिन आज भी अच्छी तरह याद है जब नैयर होली फैमिली अस्पताल में थीं। चार दिन के बाद अस्पताल का बिल अदा करके मुझे नैयर और मरियम को वहाँ से लाना था। सात-साढ़े सात सौ का बिल था और मेरे पास सौ-सवा सौ रुपए थे। तब कमलेश्वर ने 'सारिका' से, भारती ने 'धर्मयुग' से मुझे पैसे एडवांस दिलवाए और कृष्ण जी ने अपनी एक फिल्म के कुछ संवाद लिखवा के पैसे दिये और मरियम घर आ गईं। आज सोचता हूँ कि जो यह तीनों न रहे होते तो मैंने क्या किया होता? क्या मरियम को अस्पताल में छोड़ देता? वह बहुत बुरे दिन थे। कुछ दोस्तों से उधार भी लिया। कलकत्ते से ओ.पी. टाँटिया और राजस्थान से मेरी एक मुँहबोली बहन लनिला और अलीगढ़ से मेरे भाई मेहँदी रजा और दोस्त कुँवरपाल सिंह ने मदद की। कर्ज उतर जाता है एहसान नहीं उतरता। और कुछ बातें ऐसी हैं जो एहसान में नहीं आतीं पर उन्हें याद करो तो आँखें नम हो जाती हैं।
जब मैं अलीगढ़ से बंबई आया तो अपने छोटे भाई अहमद रजा के साथ ठहरा। छोटे भाई तो बहुतों के होते हैं, पर अहमद रजा यानी हद्दन जैसा छोटा भाई मुश्किल से होगा किसी की तकदीर में। उसने मेरा स्वागत यूँ किया कि मैं यह भूल गया कि फिलहाल मैं बेरोजगार हूँ। हम हद्दन के साथ ठहरे हुए थे, पर लगता था कि वह अपने परिवार के साथ हमारे साथ ठहरे हुए हैं। घर में होता वह था जो मैं चाहता था या मेरी पत्नी नैयर चाहती थी। वह घर बहुत सस्ता था। जिस फ्लैट में अब हूँ उससे बड़ा था। इसका किराया 600 दे रहा हूँ। उसका किराया केवल 150 रुपए माहवार था। तो हद्दन ने सोचा कि वह घर उन्हें मेरे लिए खाली कर देना चाहिए। रिजर्व बैंक से उन्हें फ्लैट मिल सकता था, मिल गया। जब वह जाने लगे तो उन्होंने अपनी पत्नी के साथ साजिश की कि घर का सारा सामान मेरे लिए छोड़ जाएँ क्योंकि मेरे पास तो कुछ था नहीं। जाहिर है कि मैं इस पर राजी नहीं हुआ। उन दोनों को बड़ी जबरदस्त डाँट पिलाई मैंने।
चुनांचे वह घर का सारा सामान लेकर चले गए और घर नंगा रह गया। मेरे पास दो कुर्सियाँ भी नहीं थीं। हम ने कमरे में दो गद्दे डाल दिए और वही दो गद्दोंवाला वीरान कमरा बंबई में हमारा पहला ड्राइंग रूम बना... उन दिनों मैं नैयर से शर्माने लगा था। मैं सोचता कि यह क्या मुहब्बत हुई, कैसी जिंदगी से निकाल कर कैसी जिंदगी में ले आया मैं उस औरत को जिसे मैंने अपना प्यार दे रक्खा है... अपना तमाम प्यार। मगर नैयर ने मुझे यह कभी महसूस नहीं होने दिया कि वह निम्नमध्यवर्गीय जिंदगी को झेल नहीं पा रही है। हम दोनों उस उजाड़ घर में बहुत खुश थे। उन दिनों कृष्ण चंदर, सलमा आपा, भारती और कमलेश्वर के सिवा कोई लेखक हमसे जी खोल के मिलता नहीं था। हम मजरूह साहब के घर उन से मिलने जाते तो वह अपने बेडरूम में बैठे शतरंज खेलते रहते और हम लोगों से मिलने के लिए बाहर न निकलते। फिरदौस भाभी बेचारी लीपापोती करती रहतीं... कई और लेखक इस डर से कतरा जाते थे कि मैं कहीं मदद न माँग बैठूँ।...
आप खुद सोच सकते हैं कि हमारे चारों ओर कैसा बेदर्द और बेमुरव्वत अँधेरा रहा होगा उन दिनों। नैयर लोगों से मिलते भी घबराती थीं, इसलिए मिलना-जुलना भी कम लोगों से था और बहुत कम था... कि एक दिन सलमा आपा आ गईं। इन्हें आप सलमा सिद्दीकी के नाम से जानते हैं। उस वक्त हम दोनों उन्हीं गद्दों पर बैठे रमी खेल रहे थे। सलमा आपा बैठीं। इधर-उधर की बातें होती रहीं। फिर वह चली गईं और थोड़ी देर के बाद उनका एक नौकर एक ठेले पर एक सोफा लदवाए हुए आया। हमने उस तोहफे को स्वीकार कर लिया, कि जो न करते तो सलमा आपा और कृष्ण जी को तकलीफ होती और हम उन्हें तकलीफ देना नहीं चाहते थे।
मंडल ने सरदेसाई के जातिवादी ‘ट्वीट’ पर उठाया सवाल
वरिष्ठ टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई की उत्साह से भरी एक ट्वीट उनके गले की फांस बनती जा रही है। मोदी सरकार के कैबिनेट एक्सपेंशन के बाद उन्होंने जो ट्वीट किया, उसको लेकर तमाम तरह की प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर सामने आई हैं, इतना ही नहीं उनके साथ के सीनियर जर्नलिस्ट ने उन पर सवाल उठाए हैं। कभी सीएनएन-आईबीएन के सहयोगी चैनल सीएनबीसी आवाज में सीनियर पोजीशन पर काम कर चुके और इंडिया टुडे के पूर्व मैनेजिंग एडिटर दिलीप मंडल ने भी दिलीप सरदेसाई की इस ट्वीट पर सवाल उठा दिए हैं।
आखिर क्या था राजदीप सरदेसाई की इस ट्वीट में? उससे पहले आपको जानना होगा कि राजदीप सरदेसाई देश के एक महान क्रिकेटर दिलीप सरदेसाई के बेटे हैं और जाति से सारस्वत ब्राह्मण हैं। विकीपीडिया पर जो सारस्वत ब्राह्मण की लिस्ट दी गई है, उसमें जाति के प्रख्यात लोगों की लिस्ट भी दी गई है। उसमें इलेक्ट्रोनिक मीडिया के दिग्गज के तौर पर राजदीप सरदेसाई का नाम लिखा हुआ है। ये जाति का जिक्र क्यों? यही सवाल तो दिलीप मंडल ने अपने फेसबुक पेज पर उठाया है, काफी हद तक आपको वाजिब भी लगेगा। अगर ना भी लगे तो बहस का इश्यू तो है ही।
दरअसल हुआ यूं कि जब मोदी कैबिनेट का एक्सपेंशन हुआ और मनोहर पर्रिकर और सुरेश प्रभु समेत सारे मंत्रियों ने शपथ ले ली तो राजदीप सरदेसाई ने एक ट्वीट किया, आप भी पढ़िए, “Big day for my goa. Two GSBs, both talented politicians become full cabinet ministers. Saraswat pride!! @manoharparrikar and Suresh Prabhu.”। साफ था जितना वो गोवा के लिए खुश हैं, उससे ज्यादा उनको इस बात का गौरव है कि सारस्वतों का सम्मान बढ़ा है क्योंकि दो-दो सारस्वत ब्राह्मण मोदी की केबिनेट में मंत्री बने हैं। उनके जीएसबी का मतलब है गौड़ सारस्वत ब्राह्मण। इसके बाद ही उनके ट्वीट्स पर लोगों के रिएक्शन आने शुरू हो गए, जिसके उन्हें आदत सी पड़ गई है,मोदी ब्रिगेड के वो निशाने पर पहले से रहे हैं। लेकिन अक्सर जातिवाद पर सवाल उठाने वाले वरिष्ठ पत्रकार और राजदीप से पहले इंडिया टुडे ग्रुप से जुड़े रहे दिलीप मंडल ने सवाल उठाया तो बात ट्विटर से फेसबुक पर आ गई।
दिलीप मंडल ने लिखा है, “ सारस्वत ब्राह्मण कुल गौरव राजदीप हैप्पी क्यों हैं? ऐसा नहीं करके भी आप जातिवादी क्यों हैं? अभी एक कुशवाहा जी, या यादव जी,या जाटव जी, या कुर्मी जी, या जायसवाल जी राजदीप की तरह ऐसा मैसेज लिख दें तो.....हो जाएंगे कि नहीं जातिवादी? जातिवादी होना कुछ लोगों के लिए सुविधाजनक है और बाकियों के लिए आफत. राजदीप अपनी कास्ट के दो मंत्री बनने से खुश हैं. उन्हें गर्व का एहसास हो रहा है. GSBs = गौड़ सारस्वत ब्राह्मण.राजदीप सरदेसाई का आज का ट्वी ट देखिए”।
वे यहीं नहीं रुके उन्होंने आगे कहा, 'सेकुलर को कम्युनल पर प्यार आ गया, प्राइड आ गया, प्यार शाश्वत है, प्यार सारस्वत है'
जाहिर है तमाम लोग हैं, जो दिलीप मंडल की बात को उनके पेज पर सपोर्ट और लाइक कर रहे हैं। अब गेंद बाकी पब्लिक के पाले में हैं, राजदीप के उत्साह का समर्थन करे या दिलीप मंडल जी ने जो सवाल उठाए हैं उनके ट्वीट को लेकर उसको सपोर्ट करे। लेकिन इतना तय है कि मामला आगे जाकर और भी दिलचस्प हो सकता है। वैसे भी सारस्वत गोत्र ब्राह्मणों में आम गोत्र नहीं है, बल्कि रावण भी उसी गोत्र का था, इसलिए ब्रज क्षेत्र के सारस्वत सालों से रावण का पुतला दहन करने तक का विरोध करते आए हैं।
आखिर क्या था राजदीप सरदेसाई की इस ट्वीट में? उससे पहले आपको जानना होगा कि राजदीप सरदेसाई देश के एक महान क्रिकेटर दिलीप सरदेसाई के बेटे हैं और जाति से सारस्वत ब्राह्मण हैं। विकीपीडिया पर जो सारस्वत ब्राह्मण की लिस्ट दी गई है, उसमें जाति के प्रख्यात लोगों की लिस्ट भी दी गई है। उसमें इलेक्ट्रोनिक मीडिया के दिग्गज के तौर पर राजदीप सरदेसाई का नाम लिखा हुआ है। ये जाति का जिक्र क्यों? यही सवाल तो दिलीप मंडल ने अपने फेसबुक पेज पर उठाया है, काफी हद तक आपको वाजिब भी लगेगा। अगर ना भी लगे तो बहस का इश्यू तो है ही।
दरअसल हुआ यूं कि जब मोदी कैबिनेट का एक्सपेंशन हुआ और मनोहर पर्रिकर और सुरेश प्रभु समेत सारे मंत्रियों ने शपथ ले ली तो राजदीप सरदेसाई ने एक ट्वीट किया, आप भी पढ़िए, “Big day for my goa. Two GSBs, both talented politicians become full cabinet ministers. Saraswat pride!! @manoharparrikar and Suresh Prabhu.”। साफ था जितना वो गोवा के लिए खुश हैं, उससे ज्यादा उनको इस बात का गौरव है कि सारस्वतों का सम्मान बढ़ा है क्योंकि दो-दो सारस्वत ब्राह्मण मोदी की केबिनेट में मंत्री बने हैं। उनके जीएसबी का मतलब है गौड़ सारस्वत ब्राह्मण। इसके बाद ही उनके ट्वीट्स पर लोगों के रिएक्शन आने शुरू हो गए, जिसके उन्हें आदत सी पड़ गई है,मोदी ब्रिगेड के वो निशाने पर पहले से रहे हैं। लेकिन अक्सर जातिवाद पर सवाल उठाने वाले वरिष्ठ पत्रकार और राजदीप से पहले इंडिया टुडे ग्रुप से जुड़े रहे दिलीप मंडल ने सवाल उठाया तो बात ट्विटर से फेसबुक पर आ गई।
दिलीप मंडल ने लिखा है, “ सारस्वत ब्राह्मण कुल गौरव राजदीप हैप्पी क्यों हैं? ऐसा नहीं करके भी आप जातिवादी क्यों हैं? अभी एक कुशवाहा जी, या यादव जी,या जाटव जी, या कुर्मी जी, या जायसवाल जी राजदीप की तरह ऐसा मैसेज लिख दें तो.....हो जाएंगे कि नहीं जातिवादी? जातिवादी होना कुछ लोगों के लिए सुविधाजनक है और बाकियों के लिए आफत. राजदीप अपनी कास्ट के दो मंत्री बनने से खुश हैं. उन्हें गर्व का एहसास हो रहा है. GSBs = गौड़ सारस्वत ब्राह्मण.राजदीप सरदेसाई का आज का ट्वी ट देखिए”।
वे यहीं नहीं रुके उन्होंने आगे कहा, 'सेकुलर को कम्युनल पर प्यार आ गया, प्राइड आ गया, प्यार शाश्वत है, प्यार सारस्वत है'
जाहिर है तमाम लोग हैं, जो दिलीप मंडल की बात को उनके पेज पर सपोर्ट और लाइक कर रहे हैं। अब गेंद बाकी पब्लिक के पाले में हैं, राजदीप के उत्साह का समर्थन करे या दिलीप मंडल जी ने जो सवाल उठाए हैं उनके ट्वीट को लेकर उसको सपोर्ट करे। लेकिन इतना तय है कि मामला आगे जाकर और भी दिलचस्प हो सकता है। वैसे भी सारस्वत गोत्र ब्राह्मणों में आम गोत्र नहीं है, बल्कि रावण भी उसी गोत्र का था, इसलिए ब्रज क्षेत्र के सारस्वत सालों से रावण का पुतला दहन करने तक का विरोध करते आए हैं।
Sunday, 9 November 2014
हमारी बात कौन लिखेगा / डॉ.आशीष वशिष्ठ
बच्चे देश का भविष्य हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि देश का भविष्य सुरक्षित नहीं है। आजादी के साढे छह दशकों के बाद भी देश के करोड़ों बच्चे मौलिक अधिकारों और बुनियादी सुविधाएं से वंचित हैं। लेकिन इस अहम् मुद्दे पर सरकारी मषीनरी, सिविल सोसायटी और मीडिया की चुप्पी हैरान करने वाली है। यदा-कदा ही मीडिया की नजर बाल अधिकारों से जुड़े मसलों पर पड़ती है। पिछले एक दशक में इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया में प्रसारित और प्रकाषित खबरों का आकलन किया जाए तो बाल अधिकारों के हनन और संरक्षण से जुड़ी खबरें उंगुलियों पर गिनी जा सकती हैं। गैर सरकारी संगठनों और एनजीओ के प्रयासों से यदा-कदा बाल अधिकारों के हनन और ष्षो षण से जुड़ी खबरें छनकर बाहर आती हैं और ंअखबारों की सुर्खियां बनती हैं। लेकिन अपराध, राजनीति और सेक्स की खबरों और टीआरपी के फेर में दिन-रात खबरें सूंघने वाला मीडिया बाल अधिकारों के हनन और षोषण से जुड़ी खबरों से दूरी बनाये रहता है। बोरवेल में गिरे बच्चे के खबर से टीआरपी बटोरने और लाइव रिर्पोटिंग करने वाले न्यूज चैनलों को गली चौराहे के होटलों, ढाबों और दूसरे कार्यों में दिन-रात जुटे बाल मजदूर जब दिखाई नहीं देते हैं तो हैरानी होती है। असल में बाल अधिकार से जुड़े मुद्दों और मसलों की कार्मिषियल वैल्यु और टीआरपी नहीं है इसलिए मीडिया इस संवेदनषील और महत्वपूर्ण मुद्दे के प्रति अक्सर उदासीन ही दिखाई देता है।
बच्चे हमारा भविष्य हैं ऐसे में बच्चों के अधिकारों के संरक्षण से जुड़े मुद्दों और उनसे जुड़ी परेषानियों और समस्याओं को कौन लिखेगा, प्रकाषित और प्रसारित करेगा यह यक्ष प्रष्न है। बच्चों की आवाज को देष और दुनिया तक पहुंचाने की बड़ी जिम्मेदारी किसकी है और कौन इस जिम्मेदारी का निर्वहन करेगा। बाल अधिकारों के संरक्षण से जुड़े अहम् मसले को प्रदेष में बुलंद करने, उसके प्रति जागरूकता बढ़ाने और प्रदेष में बाल अधिकारों के संरक्षण की दिषा में चल रहे कार्यों और योजनाओं को मजबूत करने की दिषा में एक साझा मंच तैयार करने का बीड़ा उठाया है। बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए बने इस मंच का नाम है उत्तर प्रदेष सिविल सोसायटी एलायंस फॉर चाइल्ड प्रोटेक्षन (यूपी-सीएसए)। पीजीवीएस के सचिव एवं यूपी-सीएसए के संयोजक डॉ. भानू के अनुसार, ‘प्रदेष में बाल अधिकारों के संरक्षण की दिषा में कई संगठन कार्य कर रहे हैं, बावजूद इसके समन्वित प्रयासों की जरूरत है।’ भारत सरकार की इंटीग्रेटिड चाइल्ड प्रोटेक्षन स्कीम (आईसीपीसी) में बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए सिविल सोसायटी की भूमिका का उल्लेख है। इसी के मद्देनजर यूपी-सीएसए के बैनर तले एक कार्यषाला का अयोजन पिछले वर्ष सितंबर में बनारस में हुआ था। वाराणसी में तैयार रोड मैप को आगे बढ़ाते हुए आगामी 22 फरवरी को लखनऊ में राज्य स्तरीय एक दिवसीय वर्कषाप का आयोजन हो रहा है। जिसमें सरकारी मषीनरी के साथ बाल अधिकारों की दिषा में कार्यरत युनिसेफ, पीजीवीएस, सेव द चिल्ड्रन, क्राई, प्लान इण्डिया, आंगन, डीजीवीएस, एसआरएफ, एमएसके, एआईएम जैसी नामी संस्थाएं व सिविल सोसायटी के विभिन्न क्षेत्रांे के विषेषज्ञ हिस्सा ले रही हैं।
यूपी-सीएसए से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार रजनीकांत वषिष्ठ के अनुसार, बाल अधिकारों से जुड़े मुद्दों को देष-दुनिया तक पहुंचाने के लिए इन मुद्दों के प्रकाषन और प्रसारण की कापफी जरूरत है। लेकिन दुर्भाग्यवष इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया की रूटीन रिपोर्टिंग मेें ऐसी खबरों को स्थान नहीं मिल पाता है। वहीं गांवों व दूर-दराज के क्षेत्रों मंे मीडिया प्रतिनिधियों की पहुंच न होना भी एक बड़ा मुद्दा है ऐसे में यह विचार किया कि क्यों न बच्चों से ही बच्चों की बात लिखवाई जाए। इसी विचार से षुरू हुआ यंग जनरेषन मीडिया रिपोर्टर (वाईएमजीआर) का सफर।
डॉ. भानू के अनुसार, यंग जेनरेषन मीडिया रिपोर्टर एक संकल्पना है जिसमें पत्रकारिता के माध्यम से बच्चों को हमें उनके अधिकारों के प्रति सचेत करना होगा ताकि न सिर्फ वे अपनी नयी भूमिका को समझ सकें बल्कि उसे आत्मसात भी करें। डॉ. भानू बताते हैं कि, यंग जेनरेषन मीडिया रिपोर्टर जिन्हें हम आने वाले वक्त का जिम्मेदार पत्रकार मान सकते हैं, ऐसे बालकों को न सिर्फ पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों को बताने की जरूरत है बल्कि सिविल सोसाइटी एलायंस (सीएसओ), संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अधिवेषन, इंटीग्रेटेड चाइल्ड प्रोटेक्षन स्कीम (आईसीपीएस), किषोर न्यायालय (जुवेनाइल जस्टिस), चाइल्ड लाइन के बारे में बताया जाना चाहिए। सैद्धांतिक रूप से भी हमें यह बात समझनी होगी कि एक बच्चा ही अपनी जरूरतों और अधिकारों के बारे में सबसे बेहतर तरीके से समझ सकता है।
रजनीकांत कहते हैं, इससे बेहतर और क्या होगा जब बच्चे खुद को बाल पत्रकार के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत करते हुए अपनी तकलीफों का ही बयान नहीं करेगा बल्कि अपने सपनों की दुनिया से भी हमें परिचित भी करायेगा। उसके इस बदले हुए रूप को न सिर्फ उसके अभिभावक, समाज में बैठे लोग, सरकार के जिम्मेदार अधिकारी कौतूहल और जिज्ञासा के साथ देखेंगे बल्कि इस बदलाव के लिए उसकी पीठ भी थपथपायेंगे। इसे मीडिया, सरकारें, डेवलपमेंटल गतिविधियों से जुड़े लोग गंभीरता के साथ लेंगे और बाल अधिकारों के संरक्षण का अनुकूल एवं उत्साहवर्धक वातावरण बन सकेगा।
वाईएमजीआर की प्रथम दो दिवसीय मीडिया वर्कषाप का आयोजन पूर्वी उत्तर प्रदेष के जौनपुर जिले के बख्शा ब्लाक के औका गांव में पिछले साल 29 व 30 अगस्त को हुआ। इसमें जौनपुर जिले के तीन ब्लाक बख्शा, करंजीकला और बदलापुर के विभिन्न गांवों के लगभग 30 बच्चें व युवाओं ने इसमें हिस्सा लिया। जौनपुर की वाईएमजीआर वर्कषाप के बाद प्रदेष के सिद्वार्थनगर, महाराजगंज, देवरिया, गोरखपुर और बहराइच जिलों में वर्कषाप का आयोजन हो चुका है। वाईएमजीआर की मीडिया टीम से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप उपाध्याय कहते हैं, ग्रामीण बच्चों की समझ कमाल की है भले ही वो पत्रकारिता की बारीकियों से बावस्ता नहीं है लेकिन मुद्दों और मसलों को समझने की शक्ति और संवेदनशीलता उनमें है। प्रदीप कहते हैं, आने वाले समय में बाल अधिकार से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर युवा पत्रकार अपनी कलम चलाएंगे और बच्चों द्वार लिखित रिपोर्ट और विभिन्न समस्याओं को यूपी-सीएसए ‘युवा संदेश’ शीर्षक पत्र अथवा न्यूज लैटर के माध्यम से देश-दुनिया के सामने लाएगा।
पीजीवीएस के वरिष्ठ अधिकारी जीएन यादव कहते हैं, बच्चों के अधिकार महत्वपूर्ण हैं। हमें इन्हें गंभीरता से लेना होगा। यंग जेनरेषन मीडिया रिपोर्टर के जरिये हम इस दिषा में बेहतर पहल कर सकते हैं। हमें बच्चों को उनके कर्तव्यों, दायित्व बोध तथा अधिकारों के प्रति सजग करते हुए सतत प्रषिक्षण देना होगा। उनका षिक्षा, भोजन तथा आश्रय का अधिकार उन्हें हासिल हो सके इसके लिए अनुकूल माहौल बनाने के साथ बाल श्रम, मानव तस्करी, बाल विवाह, कुपोषण तथा षिक्षा प्राप्त करने के बेहद कम अवसर सरीखी जो चुनौतियां हैं उनसे भी निपटना होगा।
पीजीवीएस के चाइल्ड राइटस प्रोजेक्ट से जुड़े संदीप पाठक के अनुसार, वाईएमजीआर की वर्कषाप में बच्चों को बाल अधिकारों के बारे में बताया जाता है। इनमें जीने का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार, विकास का अधिकार तथा सहभागिता का अधिकार षामिल है। वर्कषाप में बच्चों को इन अधिकारों के बारे में विस्तार से बताया जाता है। यह अपने आप में नया प्रयोग है जिसके उत्साहजनक नतीजे देखने को मिल रहे हैं। बाल अधिकारांे की जानकारी के बाद बच्चों को रिर्पोटिंग एवं मीडिया राइटिंग की बेसिक जानकारी दी जाती है।
वाईएमजीआर से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप उपाध्याय के अनुसार, ‘बच्चे बाल अधिकारों के संरक्षण के बारे में तभी लिख पाएंगे जब उन्हें बाल अधिकारों के बारे में पता होगा।’ जौनपुर जिले के विकास खण्ड बख्शा के पिछड़े गांव नेवादा काजी की इंटर की छात्रा अन्तिमा भारती (15 वर्ष) गर्व से ख्ुाद को यंग जनरेषन मीडिया रिपोर्टर बताती है। बकौल अंतिमा, गांवों में बच्चों के अधिकारों का हनन आम बात है। मीडिया वर्कषाप के बाद मेरा आत्मविष्वास बढ़ा है। मुझे लगता है अब हमारी आवाज देष और दुनिया तक जरूर पहुंचेगी। जौनपुर जिले के गांव मुरादपुर कोटिला के षषिकांत कहते हैं, वाईएमजीआर बच्चों और युवाओं की आवाज बनकर उभरेगा, अब हमारी बात कोई दबा नहीं पाएगा। डॉ. भानू बताते हैं कि, बच्चों में इस बात का उत्साह है कि उनका लिखेगा छपेगा और दुनिया उसे पढ़ेगी। हमारे व बच्चों दोनों के लिए ये नया व अनूठा प्रयोग है।
जिला बाराबंकी के गांव उदवतपुर, के सातवीं कक्षा के छात्र आषीष कुमार वर्मा के अनुसार, बच्चों की बातें कोई लिखना नहीं चाहता है। अब हमारे लिए वाईएमजीआर को मंच है। हम अपनी और अपने आस-पास के बच्चों के अधिकारों के हनन से जुड़ी बातों को लिखेंगे जिसे दुनिया पढ़ेगी। सेंट जोसेफ स्कूल, उसका बाजार, सिद्वार्थनगर की आठवीं कक्षा की छात्रा प्रिया पाण्डेय कहती है, बच्चों की बात बच्चों से बेहतर कौन समझ और लिख सकता है, अब हम लिखेंगे और उम्मीद है कि बच्चों की दुनिया बदलेगी। महाराजगंज के जीएसवीएस इंटर कालेज की ग्यारहवी की छात्रा प्रतिभा प्रजापति कहती है कि, अखबारों और न्यूज चैनलों में बच्चों से जुड़ी खबरें छापी और दिखाई जाती है उनमें अपराध की घटनाएं ज्यादा होती है लेकिन बाल अधिकारों की बात नहीं होती है। वाईएमजीआर के माध्यम से जब बच्चे अपनी बात खुद लिखेंगे तो मीडिया भी इन मुद्दों की संवेदनषीलता को समझेगा।
डॉ. भानू के अनुसार, यूपी-सीएसए के दिषा-निर्देषन में होने वाली इन मीडिया वर्कषाप में कई स्थानीय संस्थाएं नवोन्मेष, महिला प्रषिक्षण सेवा संस्थान, सम्मान विकास समिति, मानवोदय विद्यालय, जीवनधारा मार्गदर्षन सोसायटी सहभागी हैं। फिलहाल जौनपुर, सिद्वार्थनगर, महाराजगंज, देवरिया, गोरखपुर और बहराइच छह जिलों में वाईएमजीआर वर्कषाप का आयोजन किया गया है। भविष्य में प्रदेष भर में ऐसी मीडिया वर्कषाप के आयोजन की तैयारी की जा रही है। प्रदेष में अपने तरह का यह प्रथम अनूठा प्रयोग है, उम्मीद की जानी चाहिए कि इस प्रयोग के सकारात्मक परिणाम भविष्य में देखने को मिलेंगे।
बच्चे हमारा भविष्य हैं ऐसे में बच्चों के अधिकारों के संरक्षण से जुड़े मुद्दों और उनसे जुड़ी परेषानियों और समस्याओं को कौन लिखेगा, प्रकाषित और प्रसारित करेगा यह यक्ष प्रष्न है। बच्चों की आवाज को देष और दुनिया तक पहुंचाने की बड़ी जिम्मेदारी किसकी है और कौन इस जिम्मेदारी का निर्वहन करेगा। बाल अधिकारों के संरक्षण से जुड़े अहम् मसले को प्रदेष में बुलंद करने, उसके प्रति जागरूकता बढ़ाने और प्रदेष में बाल अधिकारों के संरक्षण की दिषा में चल रहे कार्यों और योजनाओं को मजबूत करने की दिषा में एक साझा मंच तैयार करने का बीड़ा उठाया है। बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए बने इस मंच का नाम है उत्तर प्रदेष सिविल सोसायटी एलायंस फॉर चाइल्ड प्रोटेक्षन (यूपी-सीएसए)। पीजीवीएस के सचिव एवं यूपी-सीएसए के संयोजक डॉ. भानू के अनुसार, ‘प्रदेष में बाल अधिकारों के संरक्षण की दिषा में कई संगठन कार्य कर रहे हैं, बावजूद इसके समन्वित प्रयासों की जरूरत है।’ भारत सरकार की इंटीग्रेटिड चाइल्ड प्रोटेक्षन स्कीम (आईसीपीसी) में बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए सिविल सोसायटी की भूमिका का उल्लेख है। इसी के मद्देनजर यूपी-सीएसए के बैनर तले एक कार्यषाला का अयोजन पिछले वर्ष सितंबर में बनारस में हुआ था। वाराणसी में तैयार रोड मैप को आगे बढ़ाते हुए आगामी 22 फरवरी को लखनऊ में राज्य स्तरीय एक दिवसीय वर्कषाप का आयोजन हो रहा है। जिसमें सरकारी मषीनरी के साथ बाल अधिकारों की दिषा में कार्यरत युनिसेफ, पीजीवीएस, सेव द चिल्ड्रन, क्राई, प्लान इण्डिया, आंगन, डीजीवीएस, एसआरएफ, एमएसके, एआईएम जैसी नामी संस्थाएं व सिविल सोसायटी के विभिन्न क्षेत्रांे के विषेषज्ञ हिस्सा ले रही हैं।
यूपी-सीएसए से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार रजनीकांत वषिष्ठ के अनुसार, बाल अधिकारों से जुड़े मुद्दों को देष-दुनिया तक पहुंचाने के लिए इन मुद्दों के प्रकाषन और प्रसारण की कापफी जरूरत है। लेकिन दुर्भाग्यवष इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया की रूटीन रिपोर्टिंग मेें ऐसी खबरों को स्थान नहीं मिल पाता है। वहीं गांवों व दूर-दराज के क्षेत्रों मंे मीडिया प्रतिनिधियों की पहुंच न होना भी एक बड़ा मुद्दा है ऐसे में यह विचार किया कि क्यों न बच्चों से ही बच्चों की बात लिखवाई जाए। इसी विचार से षुरू हुआ यंग जनरेषन मीडिया रिपोर्टर (वाईएमजीआर) का सफर।
डॉ. भानू के अनुसार, यंग जेनरेषन मीडिया रिपोर्टर एक संकल्पना है जिसमें पत्रकारिता के माध्यम से बच्चों को हमें उनके अधिकारों के प्रति सचेत करना होगा ताकि न सिर्फ वे अपनी नयी भूमिका को समझ सकें बल्कि उसे आत्मसात भी करें। डॉ. भानू बताते हैं कि, यंग जेनरेषन मीडिया रिपोर्टर जिन्हें हम आने वाले वक्त का जिम्मेदार पत्रकार मान सकते हैं, ऐसे बालकों को न सिर्फ पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों को बताने की जरूरत है बल्कि सिविल सोसाइटी एलायंस (सीएसओ), संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अधिवेषन, इंटीग्रेटेड चाइल्ड प्रोटेक्षन स्कीम (आईसीपीएस), किषोर न्यायालय (जुवेनाइल जस्टिस), चाइल्ड लाइन के बारे में बताया जाना चाहिए। सैद्धांतिक रूप से भी हमें यह बात समझनी होगी कि एक बच्चा ही अपनी जरूरतों और अधिकारों के बारे में सबसे बेहतर तरीके से समझ सकता है।
रजनीकांत कहते हैं, इससे बेहतर और क्या होगा जब बच्चे खुद को बाल पत्रकार के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत करते हुए अपनी तकलीफों का ही बयान नहीं करेगा बल्कि अपने सपनों की दुनिया से भी हमें परिचित भी करायेगा। उसके इस बदले हुए रूप को न सिर्फ उसके अभिभावक, समाज में बैठे लोग, सरकार के जिम्मेदार अधिकारी कौतूहल और जिज्ञासा के साथ देखेंगे बल्कि इस बदलाव के लिए उसकी पीठ भी थपथपायेंगे। इसे मीडिया, सरकारें, डेवलपमेंटल गतिविधियों से जुड़े लोग गंभीरता के साथ लेंगे और बाल अधिकारों के संरक्षण का अनुकूल एवं उत्साहवर्धक वातावरण बन सकेगा।
वाईएमजीआर की प्रथम दो दिवसीय मीडिया वर्कषाप का आयोजन पूर्वी उत्तर प्रदेष के जौनपुर जिले के बख्शा ब्लाक के औका गांव में पिछले साल 29 व 30 अगस्त को हुआ। इसमें जौनपुर जिले के तीन ब्लाक बख्शा, करंजीकला और बदलापुर के विभिन्न गांवों के लगभग 30 बच्चें व युवाओं ने इसमें हिस्सा लिया। जौनपुर की वाईएमजीआर वर्कषाप के बाद प्रदेष के सिद्वार्थनगर, महाराजगंज, देवरिया, गोरखपुर और बहराइच जिलों में वर्कषाप का आयोजन हो चुका है। वाईएमजीआर की मीडिया टीम से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप उपाध्याय कहते हैं, ग्रामीण बच्चों की समझ कमाल की है भले ही वो पत्रकारिता की बारीकियों से बावस्ता नहीं है लेकिन मुद्दों और मसलों को समझने की शक्ति और संवेदनशीलता उनमें है। प्रदीप कहते हैं, आने वाले समय में बाल अधिकार से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर युवा पत्रकार अपनी कलम चलाएंगे और बच्चों द्वार लिखित रिपोर्ट और विभिन्न समस्याओं को यूपी-सीएसए ‘युवा संदेश’ शीर्षक पत्र अथवा न्यूज लैटर के माध्यम से देश-दुनिया के सामने लाएगा।
पीजीवीएस के वरिष्ठ अधिकारी जीएन यादव कहते हैं, बच्चों के अधिकार महत्वपूर्ण हैं। हमें इन्हें गंभीरता से लेना होगा। यंग जेनरेषन मीडिया रिपोर्टर के जरिये हम इस दिषा में बेहतर पहल कर सकते हैं। हमें बच्चों को उनके कर्तव्यों, दायित्व बोध तथा अधिकारों के प्रति सजग करते हुए सतत प्रषिक्षण देना होगा। उनका षिक्षा, भोजन तथा आश्रय का अधिकार उन्हें हासिल हो सके इसके लिए अनुकूल माहौल बनाने के साथ बाल श्रम, मानव तस्करी, बाल विवाह, कुपोषण तथा षिक्षा प्राप्त करने के बेहद कम अवसर सरीखी जो चुनौतियां हैं उनसे भी निपटना होगा।
पीजीवीएस के चाइल्ड राइटस प्रोजेक्ट से जुड़े संदीप पाठक के अनुसार, वाईएमजीआर की वर्कषाप में बच्चों को बाल अधिकारों के बारे में बताया जाता है। इनमें जीने का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार, विकास का अधिकार तथा सहभागिता का अधिकार षामिल है। वर्कषाप में बच्चों को इन अधिकारों के बारे में विस्तार से बताया जाता है। यह अपने आप में नया प्रयोग है जिसके उत्साहजनक नतीजे देखने को मिल रहे हैं। बाल अधिकारांे की जानकारी के बाद बच्चों को रिर्पोटिंग एवं मीडिया राइटिंग की बेसिक जानकारी दी जाती है।
वाईएमजीआर से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप उपाध्याय के अनुसार, ‘बच्चे बाल अधिकारों के संरक्षण के बारे में तभी लिख पाएंगे जब उन्हें बाल अधिकारों के बारे में पता होगा।’ जौनपुर जिले के विकास खण्ड बख्शा के पिछड़े गांव नेवादा काजी की इंटर की छात्रा अन्तिमा भारती (15 वर्ष) गर्व से ख्ुाद को यंग जनरेषन मीडिया रिपोर्टर बताती है। बकौल अंतिमा, गांवों में बच्चों के अधिकारों का हनन आम बात है। मीडिया वर्कषाप के बाद मेरा आत्मविष्वास बढ़ा है। मुझे लगता है अब हमारी आवाज देष और दुनिया तक जरूर पहुंचेगी। जौनपुर जिले के गांव मुरादपुर कोटिला के षषिकांत कहते हैं, वाईएमजीआर बच्चों और युवाओं की आवाज बनकर उभरेगा, अब हमारी बात कोई दबा नहीं पाएगा। डॉ. भानू बताते हैं कि, बच्चों में इस बात का उत्साह है कि उनका लिखेगा छपेगा और दुनिया उसे पढ़ेगी। हमारे व बच्चों दोनों के लिए ये नया व अनूठा प्रयोग है।
जिला बाराबंकी के गांव उदवतपुर, के सातवीं कक्षा के छात्र आषीष कुमार वर्मा के अनुसार, बच्चों की बातें कोई लिखना नहीं चाहता है। अब हमारे लिए वाईएमजीआर को मंच है। हम अपनी और अपने आस-पास के बच्चों के अधिकारों के हनन से जुड़ी बातों को लिखेंगे जिसे दुनिया पढ़ेगी। सेंट जोसेफ स्कूल, उसका बाजार, सिद्वार्थनगर की आठवीं कक्षा की छात्रा प्रिया पाण्डेय कहती है, बच्चों की बात बच्चों से बेहतर कौन समझ और लिख सकता है, अब हम लिखेंगे और उम्मीद है कि बच्चों की दुनिया बदलेगी। महाराजगंज के जीएसवीएस इंटर कालेज की ग्यारहवी की छात्रा प्रतिभा प्रजापति कहती है कि, अखबारों और न्यूज चैनलों में बच्चों से जुड़ी खबरें छापी और दिखाई जाती है उनमें अपराध की घटनाएं ज्यादा होती है लेकिन बाल अधिकारों की बात नहीं होती है। वाईएमजीआर के माध्यम से जब बच्चे अपनी बात खुद लिखेंगे तो मीडिया भी इन मुद्दों की संवेदनषीलता को समझेगा।
डॉ. भानू के अनुसार, यूपी-सीएसए के दिषा-निर्देषन में होने वाली इन मीडिया वर्कषाप में कई स्थानीय संस्थाएं नवोन्मेष, महिला प्रषिक्षण सेवा संस्थान, सम्मान विकास समिति, मानवोदय विद्यालय, जीवनधारा मार्गदर्षन सोसायटी सहभागी हैं। फिलहाल जौनपुर, सिद्वार्थनगर, महाराजगंज, देवरिया, गोरखपुर और बहराइच छह जिलों में वाईएमजीआर वर्कषाप का आयोजन किया गया है। भविष्य में प्रदेष भर में ऐसी मीडिया वर्कषाप के आयोजन की तैयारी की जा रही है। प्रदेष में अपने तरह का यह प्रथम अनूठा प्रयोग है, उम्मीद की जानी चाहिए कि इस प्रयोग के सकारात्मक परिणाम भविष्य में देखने को मिलेंगे।
मेरे रिमार्क 'हबीब ने थिएटर में वो काम किया जो रामायण में हनुमान ने किया था' को सर्वेश्वर ने दिनमान में छापा तो वो नाराज हो गए
इप्टा के अध्यक्ष रणबीर सिंह से दिनेश चौधरी की बातचीत
थियेटर में आपकी भूमिका प्रमुखतः क्या है? अपने लिखे नाटकों और उनके निर्देशकों के बारे में कुछ बतायें।-मेरी थिएटर में भूमिका प्रमुखतः क्या है, यह कहना मुश्किल है क्यों की जब मैंने थिएटर में काम करने की सोची तो मेरे सामने सवाल था थिएटर से रोटी-रोज़ी जुटाने का। उस वक्त शायद यह फैसला बेवकूफी भरा था या कोई कहे की हिम्मत भरा, मगर मेरे लिए यह दोनों ही नहीं। बस मेरी मज़बूरी थी। पहली नौकरी जो मिली वो भारतीय नाट्य संघ के कार्यवाहक मंत्री (एग्जीक्यूटिव सेक्रेटरी) की मिली। भारतीय नाट्य संघ यूनेस्को का इंडियन सेंटर था। मेरी क़िस्मत की वहां मुझे श्रीमती कमलादेवी चट्टोपाध्याय के नेतृत्व में काम करने का मौक़ा मिला। वहीँ मेरी मुलाक़ात कपिला वात्स्यायन, मृणालिनी साराभाई, प्रोफेसर एन. सी. मेहता, अल्काजी, हबीब तनवीर, इन्दर राज़दान, तरुण रॉय, नेमीचंद जैन, विश्णु प्रभाकर, जसवंत ठक्कर, शांता गांधी, अनिल बिस्वास , चार्ल्स फेब्री, शीला वत्स, कैलाश पाण्डेय जैसे महान लोगों से हुई और उनसे थिएटर के बारे में जानने-समझने का मौक़ा मिला। सारे भारत के थिएटर की जानकारी हासिल हुईय अच्छाइयाँ, बुराइयाँ, मुश्किलात, सरकार की नीयत और नीतियां, कामकाज का तरीकाय ये सब बहुत नज़दीक से देखने का मौक़ा मिला। उस वक्त मेरी भूमिका सिर्फ एक एडमिनिस्ट्रेटर की थी, जो आज मेरे काम आ रही है।
भारतीय नाट्य संघ में बड़ी-बड़ी हस्तियों के साथ थिएटर के बारे में सीखा। वहीँ इस की भी जानकारी हासिल हुई कि किस कदर ओछेपन, बदनीयती और डर्टी पॉलिटिक्स से कोई संस्था कैसे बर्बाद की जाती है। आज भारतीय नाट्य संघ का नाम तो है मगर निशान नहीं है। जयपुर में रवीन्द्र मंच पर राजस्थान संगीत अकादमी की तरफ से ‘स्पेशल ऑफिसर ऑफ़ प्रोग्राम’ की नौकरी की। यहाँ वर्कशॉप (मोहन महर्शि के साथ जयपुर में पहला वर्कशॉप) का आयोजन, जयपुर इंटरनेशनल फेस्टिवल, मिस प्रभु के साथ शेक्सपियर के नाटकों का डायरेक्शन, प्रोफेसर भल्ला के साथ ‘मर्डर इन कैथेड्रल’ में डायरेक्शन और लाइटिंग का अनुभव हासिल हुआ। इस दौर में, डायरेक्शन किया, एक्टिंग की और ऑर्गनाइजिंग का काम किया।
यात्रिक थिएटर में रिपर्टरी कैसे चलायी जाये उस का एक्सपीरियंस हुआ। यात्रिक एक इंग्लिश प्ले करने का एमेच्योर थिएटर ग्रुप था। बाद में मार्क्स मिर्च, बैरी जॉन, कुलभूषण और मुझे अपनी तनख्वाह का इंतज़ाम थिएटर से ही करना था। हमने यह तय किया कि हम अपनी तनख्वाह नाटक कर के ही लेंगे। यात्रिक के जो एमेच्योर थिएटर थे उन्होंने हाथ खड़े कर दिए थे, यह कह कर कि हम तो अपने मन बहलाने की खातिर थिएटर में हैं। इंग्लिश के नाटक मार्क्स और बैरी डायरेक्ट करते थे और मोहन महर्षि , एम. के. रैना व चमन बग्गा वगैरह हिंदी के नाटक। हमने पाँच साल तक बग़ैर कोई ग्रांट लिए नाटक किये, डायरेक्टर्स, एक्टर्स को फीस दी और अपनी सैलरी ली। यहाँ मुझे रिपर्टरी चलने की तालीम मिली। यह कि पेशेवर थिएटर कैसे चलाया जाता है।
यात्रिक छोड़ने के बाद फ्रीलांसिंग शुरू की। मैं पहला नाटक लिख चुका था। उसका पहला परफॉरमेंस जयपुर में हुआ और बाद में दिल्ली में लिटिल थिएटर ग्रुप ने किया। नाटक का नाम था- ‘अफ़सोस हम न होंगे।’ यह नाटक बॉम्बे में 1977 में दिनेश ठाकुर ने अंक की तरफ से किया, नाम बदल कर। बदला हुआ नाम था, ‘हाय मेरा दिल।’ अभी तक इस के एक हज़ार से ज्यादा शो हो चुके है। दिल्ली में एक लोकल ग्रुप के वास्ते मैंने ‘सराय की मालकिन’ लिखा, जिसे बी.एम. शाह ने डायरेक्ट किया। यहीं से शुरू होता है मेरा सफर नाटक लिखने का। एम. के. रैना के लिए मैंने ‘ब्लड राइट्स’ का और ‘वी बॉम्बड न्यू हैवन’ का तर्जुमा किया। एम. के. रैना के कहने पर ब्रेख्त के नाटक ‘गुड वुमन ऑफ़ सेटजुआन’ का एडाप्टेशन किया, जिसे रैना ने एन.एस.डी. के लिए डायरेक्ट किया। अभी तक मैंने 25 के क़रीब नाटक लिखे हैं: हाय मेरा दिल, सराय की मालकिन, गुलफाम, पाश, अमृतजल, हैसियत, जिन को मुख देखे दुःख उपजत, सुल्तान की परेशानी, हंगामा -ए -लॉकेट, मुखौटों की ज़िन्दगी, परछाइयाँ भी न रहेंगी, मिर्ज़ा साहिब, संध्या काले प्रभात फेरी। इब्सन के प्ले ‘जॉन गेब्रेइल’ का ट्रांसलेशन भी किया। मुझे अभी भी इप्टा के लिये नाटक लिखने पड़ते हैं पर में ज्यादा डायरेक्ट नहीं करता। जयपुर इप्टा के संजय विद्रोही, केशव गुप्ता डायरेक्ट करते हैं। मैं उनकी मदद करता हूँ।
इसके अलावा मैं थिएटर में रिसर्च भी करता हूँ। मेरे लेखों का संग्रह पब्लिश होने की बात चल रही है। अभी तक जो किताबें मैंने लिखी हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं: ‘वाजिद अली शाह: द ट्रैजिक किंग’, ‘ रणथम्भोर: द इम्प्रेग्नबल फोर्ट’, ‘हिस्ट्री ऑफ़ शेखावत्स’, ‘इंद्रा सभा: अमानत्स प्ले अ क्रिटिकल असेसमेंट’, ‘थिएटर कोट्स’, ‘हिस्ट्रिओसिटी इन द संस्कृत ड्रामा’ (प्रकाशनाधीन), ‘पारसी थिएटर’ (हिस्ट्री ऑफ़ पारसी थिएटर), मोलायर, इब्सन, पिरांदेला और ओेनिएल की जीवनी व उनके काम (हिंदी में यह प्रकाशित होना है), राजस्थानी के ‘बाँकीदास री ख्यात’ का अंग्रेजी अनुवाद, आदि-आदि। इतिहास व थियेटर पर लेखन आज भी सतत् जारी है इसलिये यह कहना मुश्किल है कि थियेटर में मेरी भूमिका क्या है।
आपका ताल्लुक राज परिवार से है, फिर जनवादी रुझान किस तरह से उत्पन्न हुआ? इस प्रश्न को इस तरह से भी लें कि रंगकर्म के क्षेत्र में आपका आगमन महज एक संयोग था या यह आपका चुनाव था।
-आप सही फरमाते हैं। मेरे पिताजी जयपुर रियासत के ठिकाना डूंण्डलोद के ठाकुर थे। मेरी माँ, महाराज प्रताप सिंह, जो जोधपुर रियासत के रीजेंट और इदर रियासत के महाराज थे, क्वीन विक्टोरिया के क़रीबी भरोसेमंद थे, उनकी दोहिती थीं। मेरा बचपन गाँवों और जोधपुर के राज महलों में ही गुजरा। बाद में मुझे मेयो कॉलेज शिक्षा के लिए भेजा गया। मेयो कॉलेज में सिर्फ राजघरानों के बच्चो को ही पढ़ाया जाता था। पूरी तरह से कोलोनियल शिक्षा दी जाती थी, पूरी तरह से अँगरेज़ बनाते थे। सपने भी अंग्रेजी में आते थे। वहां मेरी दोस्ती कई राजकुमारों के साथ हुई। रहना उन्ही के साथ था। पढाई खत्म करने के बाद अंग्रेजी कंपनी थॉमस कुक, जो उस वक्त की सबसे बड़़ी टूरिस्ट कंपनी थी, उसमे नौकरी की मगर कुछ ही महीनो के बाद रिसेशन की वजह से छोड़नी पड़ी।1950 में मैंने बॉम्बे में फिल्मो में काम करने की सोची। परिवार में सिवाय मेरी माँ के सब नाराज़ थे। मज़ाक में ही सही मगर मुझे ‘ढोली’ कह कर बुलाते थे। थिएटर का शौक़ मेयो कॉलेज में ही लग गया था। वहाँ मैंने हर अंग्रेजी और हिंदी के नाटकों में काम किया था। बॉम्बे में उस वक्त वामपंथी विचारधारा का बोलबाला था। जहाँ भी काम की तलाश में मैं जाता वहाँ वामपंथी विचार के लेखकों और शायरों की बातें सुनने को मिलती। हालांकि वे सामंती ख्यालों के बिल्कुल खिलाफ थीं मगर मुझे मालूम हुआ कि यह भी एक जीने का तरीका है। मुझे यह रास आने लगा। किताबें पढ़ने लगा। ज़िन्दगी में एक अजीबो -ग़रीब जद्दोजहद थी। चारों तरफ सामंती माहौल और में अकेला। शादी भी राजघराने में ही हुई। एक दो जगह नौकरी भी की मगर माहौल से समझौता नहीं कर पाया। 1959 में मैंने यह तय किया कि अगर काम करना है तो थिएटर में ही करना है। नौकरी की तलाश में में दिल्ली गया और वहां मुझे कमलादेवी चट्टोपाध्याय के भारतीय नाट्य संघ में काम मिल गया। इस दौरान मेरी मुलाक़ात कई प्रगतिशील कलाकारों से हुई। भारतीय नाट्य संघ में काम करने के बाद मैंने अपनी सारी ज़िन्दगी थिएटर में ही लगा दी और अब आखिरी साँस तक थिएटर में ही काम करना है। थिएटर ही मेरा बिछौना है और वही ओढ़ना है।
मुंबई में वे कौन शख्स थे, जिन्होंने आपकी सोच को सबसे ज्यादा प्रभावित किया?
- जैसे मैं पहले कह चुका हूँ कि फिल्मों में सारा माहौल ही लाल था। सब से पहले मेरी मुलाक़ात रामानंद सागर से हुई। उस वक्त उनकी लिखी फिल्म ‘बरसात’ जो राजकपूर साहब ने बनाई थी वो मशहूर हुई और उसके साथ सागरसाहब को भी शौहरत हासिल हुई। मुझे जयपुर से महाराज हीरासिंह जी ने, जो बरिया रियासत के थे, बुलाया था क्योंकि उन्होंने ‘हीरा फिल्म्स्’ के नाम से एक फिल्म कंपनी बनाई थी और वो चाहते थे कि मैं उनके साथ काम करूँ। कहानी रामानंद सागर साहब ने लिखी थी और कास्ट वही होनी थी जो ‘बरसात’ की थी। उस में एक केरेक्टर मुझे देने की बात हुई। सागर साहब के साथ रहने से, उन से बातें करने से वामपंथी विचारधारा की कुछ बात मालूम हुई। मगर वो फिल्म नहीं बन सकी। उनकी जगह पर बी. आर. चोपड़ा साहब आए और उन्होने दो फिल्म बनाई एक थी ‘शोले’ और दूसरी थी ‘चांदनी चौक’। इस दौरान बहुत कुछ सोशलिज्म की जानकारी मिली।
यही वक्त था मेरी मुलाक़ात जनाब अख्तर-उल -इमाम से हुई। उनकी मुझ पर मेहरबानी हुई। हम दोनों की काफी बनी। यूँ कहूँ तो ग़लत नहीं होगा कि वामपंथी विचारधारा का पहला सबक अख्तर साहब ने ही पढ़ाया। उन्होंने अपनी किताब ‘यादें’ अपने दस्तखत के साथ मुझे इनायत की जो आज तलक मेरी लाइब्रेरी को इज्ज़त फर्मा रही है। इन्हीं के साथ साहिर लुधियानवी से भी मुलाक़ात हुई। इसके बाद मेरी मुलाक़ात दीवान शरर साहब से सीसीआई क्लब में हुई। वे शांताराम साहब के लिए कहानियाँ लिखते थे। उनका असर मुझ पर काफी गहरा रहा। दीवान साहब ने ही मुझे बताया था कि रिटन वर्ड में और स्पोकन वर्ड में क्या फर्क है। यह आज नाटक लिखने में मेरी बहुत मदद करता है। मार्क्स और लेनिन के बारे में बताया करते थे। काम की खातिर में जनाब शाइद लतीफ़ साहब के पास गया। उस वक्त फिल्म आरज़ू की शूटिंग चल रही थी। न जाने क्यों मुझे वहां बहुत अपनापन और प्यार मिला। मैं बाद में बराबर जाता रहा इस उम्मीद से कि काम मिल जाये, मगर वो मक़सद बाद में नहीं रहा, अपनापन ही मुझे वहाँ ले जाता था। वहीँ मेरी मुलाक़ात इसमत आपा से हुई। वह जो हुक्म देती में बजा लाता। ‘आरज़ू’ के बनाने में कौन ऐसा था जो वामपंथी नहीं था। देर रात तक उस माहौल में रहता। उनके सामने जुबां खोलना बेअदबी थी। खामोश बैठा-बैठा उनकी बातें सुनता रहता।
अनिल बिस्वास से मेरी मुलाक़ात इसी वक्त हुई थी। वे इप्टा के मेंबर थे। इप्टा के बारे में वही बताया करते थे। जब मैं भारतीय नाट्य संघ में काम करता था तब अनिल दा दिल्ली में आये थे और वहाँ उनसे मुलाक़ात होती रहती थी। उनसे मुझे बहुत प्यार मिला। धीरे- धीरे परत-दर -परत विचार बढ़ते गए। दोस्ताना तो नहीं कह सकता मगर उनकी मुझ पर इनायत ज़रूर थी। ज़िक्र मोतीलाल साहब का भी है। मेरी नज़रों में रीयलिस्टिक एक्टिंग के वो सरताज थे। उनकी जिन्दगी शाही अंदाज से गुज़री मगर दिल उनका गरीबों का हिमायती था। उन के साथ वक्त बिता कर मैंने ज़िन्दगी के कई दस्तूर सीखे। किशोर साहू साहब से भी मिलना हुआ। अच्छी जान पहचान हुई और कई शामें उनके साथ गुजरी। अंग्रेजी और हिंदी साहित्य, थिएटर पर काफी चर्चा होती थी। उनकी मुलाक़ात भी मेरी ज़िन्दगी में काफी अहमियत रखती है।
जयराज और डेविड से मेरी मुलाक़ात सीसीआई क्लब में हुई। यह बात सही निकली कि खूब गुजरेगी जब मिल बैठेंगे दीवाने दो ! उनके सोहबत में मॉडर्न थिंकिंग और सोशलिस्टिक सोसाइटी के बारे में बहुत कुछ समझा और थिएटर के बारे में भी। उस वक्त शेक्सपियर का ड्रामा ऑथेलो स्टेज करने की बात हुई। जयराज डायरेक्ट करने वाले थे। जयराज-ऑथेलो, बेगम पारा-डेस्मोना, डेविड-इयागो और मुझे दिया गया था रोल रोड्रिएगो का। रिहर्सल काफी हुए मगर नाटक खेला नहीं जा सका, क्योँकि वे लोग फिल्मों में व्यस्त थे। डेविड को पढ़ने का बहुत शौक था और उन्होंने मुझे कई किताबों के नाम बताये और पढ़ने को कहा। इन्ही हजरात के जेरेे-साया मेरी जिन्दगी में नया मोड़ आया।
जिस दौर का आप जिक्र कर रहे हैं उसमें सरोकार ही ज्यादा महत्वपूर्ण था, माध्यम चाहे सिनेमा हो, या नाटक या साहित्य। पर आज के थियेटर-और सिनेमा को भी- आप किस नजरिये से देखते हैं?
-जिस दौर की आप बात कर रहे हैं या मैंने जिसका ज़िक्र किया वो आज़ादी के ऐन बाद का दौर है और इतिहास की नजर से देखें तो यह दौर शुरू हुआ था 1905 में। 1905 में लार्ड कर्ज़न ने बंगाल का विभाजन किया। विभाजन हमारे सियासी, सामाजिक, धार्मिक नेताओं की समझ में यह आया कि यह हिंदुस्तान के टुकड़े करने की साज़िश है। इस सोच ने ब्रिटिश हुकूमत की खिलाफत, जो चिंगारी की शक्ल में थी, उसे आग की शक्ल में बदल दिया। तमाम लेखक और खासकर के नाटककारों ने खुलकर लिखना शुरू किया। ‘कीचक-वध’ मराठी का सब से पहला नाटक था जिसने थिएटर के ज़रिये खिलाफत करना सिखाया। हिंदुस्तान की हर भाशा के थिएटर ने अपनी-अपनी तरह से समाज के सामने, अवाम के सामने, ब्रिटिश हुकूमत की नीयत की तस्वीर रखी। आजादी के बाद बदलाव आना जरूरी था। उस वक्त तक थिएटर कमोबेश ख़त्म हो चुका था। इप्टा पर भी बंदिश लागू थी। जितने भी कलाकार, शायर, लेखक थे वो सब सिनेमा में आ गये। दुश्मन गायब हो गया। उस वक्त सवाल था मुल्क को नयी दिशा देना। यही सब का मक़सद था। वह ज़माना था सोशलिज्म का। जवाहरलाल नेहरू की लीडरशिप में सोशलिज्म का ज़ोर था। सिनेमा ने भी यही दिखने की कोशिश की। पुरानी फिल्मो को देखें तो हिन्दू -मुस्लिम की दोस्ती, अमीर और गरीब में फ़र्क़, सामाजिक संस्कार, जातियों में भेद -भाव के तत्वों के साथ तमाम कलाकार, लेखक, शायर वही थे जो अपनी भाशा के थिएटर में काम किया करते थे या इप्टा के साथी थे। कहानी का अंदाज वही था, डायलाग वही तीखे और गीतों का इस्तेमाल वही था जो पारसी थिएटर और बाक़ी भाशा के थिएटर में था। चारो तरफ मक़सद यही था कि अपने मुल्क को ताक़तवर बनाएँ। सारे समाज की तमाम कुरीतियों को उसके सामने रखें ताकि वो बदल सके। लिहाज़ा उस वक्त का सिनेमा मनोरंजक होते हुए सोशिअली एंड पॉलिटिकली रिलेवेंट था।
दिनेश भाई, कभी आपने इस बात पर गौर किया है कि अंग्रेज़ों की हुकूमत के ज़माने में आज़ादी के पहले हिंदुस्तान का बहुत ही महत्वपूर्ण साहित्य जेल में लिखा गया था। तिलक ने गीता रहस्य लिखा, तो गांधीजी ने अपनी आत्मकथा लिखी। जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’, ‘लेटर्स टू डॉटर’ और मौलाना आज़ाद ने ‘ग़ुबार-ए-खातिर’ जैसी किताबें लिखी। आर.एस. पंडित ने जेल में ‘कल्हण’ संस्कृत में लिखी। राजतरंगिणी और शूद्रक के नाटक मुद्राराक्षस जेल में लिखे गये। मेरे कहने का मतलब यह है कि उस वक्त सब के दिमाग में यही बात थी कि अपने मुल्क की तरक्की हो। जहाँ कहीं भी लोग थे उनका मक़सद यही था।
यह सिलसिला क़रीब 70 के दशक तक चला। उस के बाद से फिल्मो, साहित्य में बहुत गिरावट आई।सांस्कृतिक पत्रिकाएं बंद हो गयी। थिएटर में अनुदान, ग्रांट लेने की फ़िराक़ में अजीबो-गरीब एक्सपेरिमेंट होने लगे। खासकर लोक-संस्कृति को मॉडर्न थिएटर में मिलाने लगे। न रहा मॉडर्न थिएटर और न रहा लोक। प्लेराइट की थिएटर में ज़रूरत ही नहीं रही। आज दुःख के साथ कहना पड़ता है कि हिंदी बेल्ट में कोई प्लेराइट ही नहीं है। कारपोरेट जगत के हमले ने सब को पैसे बनाने में लगा दिया। मुल्क की फिक्र किसी को नहीं -न अवाम को है, न हमारे मुल्क के नेताओं को है। जो हो रहा है वो फूहड़ मनोरंजन के लिए हो रहा है। सब कुछ बिकाऊ है। नोम चोम्स्की ने कहा है की आज के दौर का सबसे बड़ा दुश्मन कैपिटलिज्म है। कारपोरेट ने सब कुछ खरीद लिया। मीडिया को, सरकार को, हथियार बनाने की मशीनों को और मुल्कों को। उन्होंने हिदायत की कि तुम अपने आप को न बिकने दोे। अफ़सोस कि यह बात अभी तक समझ में आई नहीं है। सिनेमा, थिएटर और साहित्य इस मौजूदा दौर में अपने मक़सद से बहुत दूर हो चुके हैं। जो अपने-आप को प्रगतिशील कहते हैं वो भी तरक़ीपसन्द ख्यालों से दूर हैं। मगर एक बार फिर उम्मीद बनती नज़र आती है। कुछ फिल्में, कुछ नाटक ऐसे लिखे गए हैं जो मुल्क, समाज की बेहतरी के लिए हैं। मगर उनकी तादाद बहुत कम है ओर अवाम तक पहुंचते भी नहीं। बर्नार्ड शॉ का कहना था कि थिएटर समंदर की लहरों की तरह है। उठतीं हैं, किनारे से टक्कर देती हैं फिर शांत हो कर पीछे हट जाती हैं। चलो कामरेड, इस उम्मीद में जीते रहें कि कभी तो थिएटर की लहरें सर उठा कर समाज से टक्कर लेंगी।
हर क्षेत्र में जिस गिरावट की बात आप कह रहे हैं और कारपोरेट से लड़ने का जो सवाल है, उसमें इप्टा की क्या भूमिका बनती है?
-जी हाँ ज़रूर बनती है। इप्टा कोशिश करती है मगर कर नहीं सकती। इप्टा थिएटर के ज़रिये ही अपनी ज़िम्मेदारी निभा सकती है मगर यह सही तौर पर तब ही होगा जब इप्टा की ज्यादा से ज्यादा यूनिट के पास अपनी रिपर्टरी हो जो बराबर नाटको का प्रदर्शन कर सके। गौर से देखें तो आज ज्यादा काम इप्टा ही कर रही है। फेस्टिवल भी हो रहे हैं, वर्कशॉप भी हो रहे हैं, नाटक भी हो रहे हैं। इस सवाल का जवाब हमें देना ही होगा कि ऐसी क्या वजह है कि इप्टा अपनी पहचान बनाने में खास कामयाब नहीं हुई।
इप्टा शुरुआत में एक आंदोलन था। शायर, कलाकार, लेखक जुड़े हुए थे। वो किसी के मोहताज नहीं थे। दिल में वतन परस्ती थी, सर पर कफ़न बंधा था। नुकसान तब हुआ जब इप्टा पर हुकूमत ने पाबन्दी लगायी। पर्दा गिरा, एक बहुत लम्बा वक्फ़ा रहा। जब पर्दा उठा तो बहुत देर हो चुकी थी। मुल्क में चारों तरफ शौकिया थिएटर का बोलबाला छाया हुआ था। इप्टा भी इसी रंग में रंग गया। कलाफ़रोशों ने थिएटर को धंधा बना लिया था। अकादमियाँ अनुदान के नाम पर अफीम बाँट रही थी। थिएटर का मक़सद कम, अनुदान पाना ज्यादा। कोई भी थिएटर कारपोरेट और समाज के दुश्मनों का मुकाबला नहीं कर सकता जब तक वो सरे आम समाज में अपनी बात को बराबर न पहुँचा सके। यह काम सिर्फ एक ज़िम्मेदार रिपर्टरी कर सकती है। कभी-कभी का थिएटर नहीं। थिएटर को पेशेवर बनाना होगा।
पुरानी इप्टा के सामने दुश्मन साफ़ दिखाई देता था। आज दुश्मन को पहचानना बहुत मुश्किल है। क्या मालूम कोई हमारे ही बीच बैठा हो। पुराने लोग जो इप्टा में हैं उन्हें नयी पीढ़ी को बराबर बताना होगा की थिएटर क्या है, उसका मक़सद क्या है, इप्टा क्या है, कारपोरेट जगत क्या है, किस तरह से वो काम करता है। इस खुले दौर में विचारधारा गायब की जाती है। ज्यादातर लोग जो इप्टा को छोड़कर गए वो इप्टा के विचार से, उसके डिसिप्लिन में बँध कर नहीं रहना चाहते थे। उनके छोड़ने की वजह खासकर पैसे कमाने की थी। यंग बॉयज एंड गर्ल इप्टा को छोड़ते हैं रोज़गार की तलाश में, पब्लिसिटी की तलाश में। इप्टा को अपनी ज़िम्मेदारी और समाज में भूमिका निभाने के लिए सिंसियर और डिवोटेड मेंबर्स की तलाश करनी होगी, जो इप्टा को अपना समझें।
इप्टा को अपनी तरह के नाटक लिखने और लिखवाने होंगे। दूसरी भाशा में अगर नाटक हैं तो उनका अनुवाद करके खेलना होगा, ताकि इप्टा की विचारधारा का चारों तरफ फैलाव हो सके। इप्टा के फेस्टिवल होते हैं मगर उन में दूसरी इप्टा के यूनिट के ड्रामे होते हैं क्या? कुछ शहरों में इप्टा की रिपर्टरीज़ बनाना बहुत ज़रूरी है। मुद्दों को समझना होगा, नए नाटक लिखने होंगे। बराबर उनके प्रदर्शन करने होंगे। औरों को शायद 30.40 साल पुराने नाटकों की ज़रुरत हो, मगर इप्टा को नहीं है। इप्टा को वो नाटक चाहिए जो आज के समाज की बात करें, कारपोरेट जगत के जाल के खतरे से समाज को आगाह करे। इप्टा तभी अपनी सही ज़िम्मेदारी निभा सकती है। और इप्टा के लिए कोई मुश्किल नहीं है। इप्टा के पास विचारधारा है, डायरेक्टर्स हैं, कलाकार हैं, प्ले राइट्स हैं, म्यूजिक डायरेक्टर्स हैं -अगर नहीं है तो एक ज़िम्मेदार रिपर्टरी नहीं है। इप्टा को फिर से आंदोलन बनाना होगा।
इप्टा से जो नयी पीढ़ी जुड़ी है, क्या उनके लिये बतायेंगे कि वे कौन से हालात थे जिनकी वजह से इप्टा पर सरकारी प्रतिबंध लगा।
-सीपीआई और आज़ाद हिन्द की पहली सरकार के बीच आज़ादी को लेकर ही आपसी विचारों में खिलाफत पैदा हो गयी थी। में मानता हूँ कि मेरे लिए तफ्सील से कुछ कहना मुश्किल है क्योंकि मैं उस वक्त सीपीआई से या जो सियासती बदलाव आ रहे थे, उन से जुड़ा हुआ नहीं था और उतनी जानकारी अब भी नहीं है। यह रिसर्च का विशय है और मालूमात करना निहायत ज़रूरी है की भला ऐसी क्या बात हो गयी थी की पार्टी पर पाबन्दी लगानी पड़ी जब कि जवाहरलाल नेहरू खुद बड़े सोशलिस्ट थे। इतना ज़रूर कह सकता हूँ की पाबन्दी लगी थी। इप्टा उस वक्त पार्टी का एक अहम हिस्सा थी, इसलिए इप्टा पर भी पाबन्दी लगी। जब इप्टा पर पाबन्दी लगी तो सोशलिस्ट पार्टी के कुछ मेंबर्स जो जेल में थे, उस वक्त कमलादेवी चट्टोपाध्याय, अच्युत पटवर्धन और बाकि साथियों ने तय किया कि थिएटर का काम बंद नहीं होना चाहिए। उन्होंने भारतीय नाट्य संघ की स्थापना की। रूप वही था, मक़सद वही था जो इप्टा का था। हर स्टेट में एक यूनिट हो, हर स्टेट की एक समिति हो, हर तीसरे साल राश्ट्रीय चुनाव हों...वगैरह। मगर एक बहुत गहरा फ़र्क़ था। इप्टा के उस वक्त जो मेंबर थे, तकरीबन सभी पार्टी से जुड़े विचारों से कमिटेड थे और सब क्रिएटिव आर्टिस्ट थे। भारतीय नाट्य संघ ज्यादातर शौकिया था। मगर कमलादेवीजी के लीडरशिप में सारे हिंदुस्तान पर छाया हुआ था। इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट ;प्ज्प्द्ध यूनेस्को का मेंबर था। भारतीय नाट्य संघ ने एशियन थिएटर इंस्टीट्यूट शुरू किया जो आगे चलकर नेशनल ड्रामा स्कूल बन गया।
इप्टा काफी दिनों तक बंद रही। कहीं-कहीं पर थोड़ा बहुत काम होता था। 1984.85 में आगरा में एक कांफ्रेंस बुलाई गयी और वहां इस बात का ज़िक्र हुआ की जो कुछ भी थिएटर के नाम पर हो रहा है उसके मुक़ाबिले में एक संस्था होनी चाहिए। क्यों न इप्टा को, जो चिंगारी की शक्ल में मौजूद थी, उसे हवा दे कर पूरे हिंदुस्तान में आग की तरह फैलाई जाये। मैं पुपल जयकार और उनके तमाम साथियों का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा कि अगर उन्होंने भारत-महोत्सव जैसा फेस्टिवल न करवाया होता तो शायद इप्टा की फिर से शुरुआत नहीं होती। आज इप्टा फिर अपने पुराने मिजाज़ में मौजूद है। सिवाय गुजरात के हर स्टेट में इस की यूनिट हैं। हज़ारों की तादाद में कलाकार जुड़े हुए हैं। इप्टा आईटीआई यूनेस्को की एसोसिएट मेंबर भी है।
आपने कारपोरेट द्वारा सबको खरीदे जाने की बात कही। इस संदर्भ में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल जैसे आयोजनों को आप किस निगाह से देखते हैं?
-जब जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल शुरू हुआ था तो उसकी सूरत दूसरी थी। छोटी-छोटी सभाएं होती। वहां सुननेवाले आते। विद्वान अपनी बात कहते और सवालों का जवाब देते। बाद में इस जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को एक इवेंट मैनेजर को दे दिया गया, जिसे किसी भी भाशा के साहित्य से कोई लेना देना नहीं है। यह एक भीड़ जुटाने का तमाशा है। आज सुननेवाले कोई नहीं अपने को सजधज के दिखानेवाले हैं। एक भीड़ है जिसे दर्शक कहा जाता है। इस भीड़ को सब्जेक्ट की कोई जानकारी नहीं। लेखक को पहचानते नहीं, उसका लिखा पढ़ा नहीं। स्टेज पर कुछ लोग होते हैं, जो आपस में बेतुके सवाल-जवाब करते हैं, जिसे आज टॉक शो कहा जाता है। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल इज़ स्पॉन्सर्ड बाई फॉरेन कम्पनीज व्हिच आर ब्लैक लिस्टेड इन मेनी कन्ट्रीज। मेरी नज़रों में यह महज एक तमाशा है, साहित्य और समाज की तौहीन है। ग़ालिब के लफ़्ज़ों में -
बक रहा हूँ जुनूँ में क्या-क्या कुछ
कुछ न समझे खुद करे कोई।
जयपुर में और पूरे राजस्थान में -खासतौर पर संगीत के मामले में लोक और शास्त्रीय, दोनों परंपराओं की शानदार विरासत रही है। इन दोनों कलारूपों के बीच अंतरसंबंधों पर आप कुछ कहना चाहेंगे?
-आप सही फरमा रहे हैं। लोक और शास्त्रीय संगीत की शानदार परम्परा यहाँ रही है। हर स्टेट में, चाहे छोटी या बड़ी, राजस्थान में ही नहीं सारे हिंदुस्तान में, राज दरबार में बड़े-बड़े उस्ताद और पंडित मुलाजिम रहे हैं। इन्हीं उस्तादों, संगीतकारों, नृत्यकारो से ही हर स्टेट के राज दरबार की हैसियत का अनुमान लगाया जाता था। राजस्थान के हर स्टेट और ठिकानो में संगीतकार होते थे। जयपुर में तो बहुत बड़ा गुणीजनखाना था। इसी गुणीजन खाने के साथ एक रामप्रकाश थिएटर 1876 में बना जो उस वक्त की थिएटर कंपनी थी। हर कलाकार सरकार का मुलाज़िम था। अच्छी बड़ी तनख्वाह मिलती, बुढ़ापे में पेंशन मिलती और उनका स्वर्गवास होने के बाद उनके लड़के को नौकरी मिलती ताकि परम्परा आगे चलती रहे।
पहला हमला इस परम्परा पर तब हुआ जब अंग्रेजों की हुकूमत ने इन राजाओं को अंग्रेजी पढ़ा कर अंग्रेज बनाया। इस कदर अंग्रेजी तहजीब हावी हुई की शास्त्रीय संगीत इनके कानो को बुरा लगने लगा। शास्त्रीय संगीत के बोल और राग इनके समझ में नहीं आते थे। शास्त्रीय वादन की जगह पर हर पेलेस में पियानो ने जगह ली। बॉलरूम की धुनें और गॉड सेव द किंग बजने लगे। रही-सही परंपरा जो बची थी वो आज़ादी के बाद खत्म हो गयी। राजाओं के हाल बेहाल हुए और नए राजाओं को संगीत का शौक नहीं था। यह एक फ़िज़ूल खर्च का काम बन गया। डॉलर कमाने के लिए, विदेशी पर्यटनों को रिझाने का साधन बन गया। जितनी तबाही पर्यटन विभाग ने मचायी और किसी ने नहीं। आर्ट और कल्चर को हर तरह से बर्बाद किया। बड़े-बड़े संगीतकार राजस्थान छोड़ कर मुंबई, कोलकत्ता और दिल्ली जा बसे। अब बुलाये जाते हैं तो वो महज़ एक दिखावा है। न संगीत की जानकारी है, न महफ़िल में बैठने की तहज़ीब। दाद कहाँ दी जाये, कैसे दी जाये यह तक नहीं मालूम।
पुराने जमाने में लोक संगीत, जो आदिवासी जंगल में गाते या अलग-अलग समाजों में शादी और त्यौहार में गाते-बजाते-नाचते उस में किसी भी तरह की कोई दखलअंदाजी नहीं थी। सब साथ मिलकर भाग लेते। मगर आज पर्यटन विभाग और कुछ कलाफ़रोशों ने इन आदिवासी लोक कलाकारों को खुल कर एक्सप्लॉइट किया और आज भी कर रहे हैं। अपनी तरह से उसे टूरिस्ट ओरिएंटेड बनाने में काफी कुछ बदलाव किये जाते हैं। राजस्थान में शायद सब से ज्यादा लांगौर मंगनियारों के संगीत में हुआ और हो रहा है। लांगा कबीर और मीरा के भजन गाते हैं मगर वो इस वजह से नहीं गवाए जाते की विदेशी मेहमानो की समझ में नहीं आएगा। कोई ताज्जुब नहीं की यह परम्परा बिलकुल बर्बाद हो जाये, क्यों की नयी पीढ़ी को यह भजन गाना नहीं आएगा। यही डांस के साथ हो रहा है। आज कालबेलिया डांस बहुत मशहूर है, मगर यह कालबेलिया डांस है ही नहीं। इसी तरह से घूमर, तेरताली, चारी डांस में भी काफी कुछ बदला जा रहा है। शास्त्रीय और लोक-कला और कल्चर कलाफ़रोशों के हाथों बिक चुका है। समाज के मुहाफ़िज़ों को इस बात की कोई फिक्र नहीं ,सरकार को महज़ दिखावा करना है जो बराबर करती है।
इप्टा में जो बिखराव आया क्या उसकी एक वजह बड़े कलाकारों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षायें थी? यह सवाल इस तरह से भी किया जा सकता है कि जो काम हबीब तनवीर ने नया थियेटर बनाकर किया क्या वही काम इप्टा के जरिये संभव नहीं था।
-इप्टा में जो भी बिखराव आया था उस की वजह न तो पाबन्दी थी और न ही व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं। इप्टा कम्युनिस्ट पार्टी का एक अहम हिस्सा थी। इसी वजह से पार्टी इप्टा पर बरगद की तरह छायी हुई थी, यह क्रिएटिव आर्टिस्ट को कभी मंज़ूर नहीं होता। क्रिएटिव आर्टिस्ट को अपनी बात कहने की आजादी चाहिए, जैसा वो कहना चाहे वैसा वो कह सके। उसे हुकुम नहीं चाहिए की इस तरह से कहो। खास करके यही वजह थी कि बड़े-बड़े कलाकार, दुनिया की बड़ी- बड़ी हस्तियां इप्टा को छोड़ कर अपने अलग-अलग ग्रुप बना कर काम करने लगे। उदय शंकर, शम्भू मित्र, उत्पल दत्त, भूपेन हज़ारिका, जसवंत ठक्कर, शांता गांधी, हबीब तनवीर वगैरह ने अपने अपने थिएटर ग्रुप्स बनाये और आज़ादी से काम करने लगे। मगर उन तमाम लोगों की विचारधारा वही रही। हाँ, एक बात हो सकती है कि आज़ादी के साथ-साथ वामपंथी होने का दाग़ दिखाई ना दे ! इनकी संस्थाओं का नाम बहुत मशहूर हुआ। इन सब की विचारधारा और मक़सद वही रहा जो इप्टा का था। मगर अफ़सोस इस बात का है कि असल तरह से पेशेवर भी नहीं हो सके। कभी भी इस बात की फिक्र नहीं की कि उनके बाद आगे क्या होगा।
जिस व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की बात कर रहे हैं, वो आज के मौजूदा शौकिया थिएटर में है। इप्टा लेफ्टिस्ट मानी जाती है। भला वो राइटिस्ट सरकार से या फोर्ड फाउंडेशन जैसी और संस्थाओं से अनुदान कैसे ले सकती है? इप्टा में अनुशासन है, कुछ बंदिशें हैं उन से वो निजात चाहते हैं। आपने हबीब भाई के नया थिएटर की बात की। नहीं, उस वक्त पुराने कलाकारों में से कोई नहीं कर सकता था- उस की ज़रुरत ही नहीं थी। उस वक्त हबीब भाई ने भी कभी नहीं सोचा था। उस ज़माने में लोक का इतना बोलबाला भी नहीं था। थिएटर पर साफ़ तौर से वेस्टर्न थिएटर की छाप थी। हबीब भाई पर भी शुरुआती दौर में वेस्टर्न थिएटर का ही इन्फ्लुएंस था। दिल्ली में जब हिंदुस्तानी थिएटर बना तो हबीब उस के साथ जुड़े और कई नाटकों का निर्देशन किया। जब उस पर पर्दा गिरा तो हबीब भाई को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा। मैं उस दौर में उनके साथ क़रीब से जुड़ा हुआ था। उन्होंने सोवियत लैंड अखबार में नौकरी की। सिनेमा और थिएटर की समीक्षा लिखते थे। भारतीय नाट्य संघ की पत्रिका नाट्य के लिए दिल्ली के थिएटर पर लिखते थे। दिन भर दफ्तर में काम करने के बाद फिल्म देखना, फिर नाटक देखना, उसी वक्त उन पर लिखना और देर से घर जाना यह रोज़ का काम था। उन्होंने थिएटर में कई एक्सपेरिमेंट किये। एक पेशेवर थिएटर कंपनी खोलने की भी कोशिश की मगर साथियों ने साथ नहीं दिया। रुस्तम सोहराब नाटक के रिहर्सल हुए मगर शो नहीं हो सका। दूरदर्शन की नौकरी की मगर एक दिन वहां से भी छोड़ना पड़ा क्योंकि वो लेफ्टिस्ट थे। एक वक्त ऐसा आया था कि वो टूटने लगे थे। नाचा के कलाकारों को ले कर आये। एक नाटक किया जिस में आफताब और कुसुम हैदर जैसे कलाकारों और नाचा के कलाकारों का मिलान था। कमानी थिएटर में उसका शो हुआ। एक तरफ आफताब और कुसुम हैदर जैसे उच्च घराने के सोफिस्टिकेटेड लोग और दूसरी तरफ ठेठ जंगल के-गाँवों के कलाकार। वे एक-दूसरे से दूर रहते थे। जब नाचा का कलाकार कुसुम के पास जाता तो ऐसा लगता था कि उसके पसीने की बू कुसुम को सता रही है। जब हबीब भाई ने मुझ से पूछा की नाटक कैसा लगा तो मैंने उन्हें यही बताया था। पेशेवर कलाकारों और एमेच्योर कलाकारों का साथ नहीं हो सकता, यह हबीब को मालूम हो गया था।
हबीब जब पूरी तरह से तंग आ चुके थे तो वो अपने घर छत्तीसगढ़ गए। वहां घूम-घूम करके तीजन बाई और बाकी तरह तरह के अजीबो-ग़रीब कलाकारों को लेकर आए। दिल्ली में उन सबको स्टेज पर पेश किया। एक दिन हबीब भाई की मेरी मुलाकात बैंक में हुयी। उन्होंने मुझ से पूछा ‘‘मेरा शो तुम्हें कैसा लगा?’’ मैंने जवाब दिया ”हबीब भाई, यह तुम्हारा काम नहीं, यह सुरेश अवस्थी का काम है। इस शो में हबीब कहीं भी दिखाई नहीं देता।’’ हबीब को मेरी बात नागवार गुज़री।
एक दिन लक्ष्मीनारायणलाल, कमलेश्वर, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना और हम कुछ और दोस्त त्रिवेणी में कॉफ़ी हाउस में बैठे थे। हबीब के शो की ही बातें हो रही थी। मैंने मज़ाक में कह दिया कि 'हबीब ने थिएटर में वो काम किया जो रामायण में हनुमान ने किया था।' सर्वेश्वर ने मेरे रिमार्क को दिनमान में छाप दिया। मुझे कई महीनो तक हबीब की नाराज़गी झेलनी पड़ी। मगर हमारी दोस्ती की नींव इतनी गहरी थी कि एक दिन मैं और ओ.पी. कोहली उनसे मिले तो उन्होंने मुझे अपने गले से लगा लिया।
जब फोर्ड फाउंडेशन ने स्कीम की कि लोक रंगमंच को मॉडर्न थिएटर में मिलाने से भारतीय रंगमंच शक्तिशाली हो जायेगा तो मैं उस वक्त राजस्थान संगीत नाटक अकादमी का वर्किंग प्रेसीडेंट था (ऐसा लगता है कि मेरी क़िस्मत में वर्किंग प्रेसीडेंट होना ही लिखा है!)। मैं इस स्कीम के सख्त खिलाफ था। कई आर्टिकल्स भी लिखे। मगर हबीब भाई ने फोर्ड फाउंडेशन से रिपर्टरी चलाने के लिए ग्रांट ले ली। हम दोनों में शिकवा -शिकायत भी हुयी। कई औरों ने भी ली। कुछ ने लोक से उस की ताम-झाम ली, संगीत लिया और बिलावजह उसे अपने नाटकों में इस्तेमाल किया। कुछ ने उन्हीं के पास जाकर काम किया। यूँ कहूँ तो ठीक होगा की उन्हें एक्सप्लॉइट ही किया। हबीब भाई ही एक ऐसे शख्स थे, जिन्होंने अपने अनुभव, अपने टैलेंट को काम में लिया और नाचा के कलाकारों से ही अपनी रिपर्टरी बनायी और उन्हीं के साथ काम किया। हबीब ने ऐसे कलाकारों को साथ लिया जिन्हें टीवी और फिल्मों में जाने की कोई तमन्ना नहीं थी। वो ईमानदारी और वफादारी से थिएटर के थे और हबीब ने भी उनके साथ अपनापन, ईमानदारी और वफादारी निभायी। ऐसा करना औरों के बस की बात नहीं थी। सारी दुनिया में नाम कमाया। यह दूसरे नहीं कर सके। कई लोगों ने फोर्ड फाउंडेशन की ग्रांट ली थी। कइयों का ईमान गया, कइयों की विचारधारा। क्या बात थी कि सिर्फ हबीब भाई ने अपना थिएटर बनाया, विचारधारा को भी नहीं छोड़ा। यह काम और क्यों नहीं कर सके। हबीब ने किसी और नाटककार का नाटक नहीं खेला, उसने कहानी का भी नाटक नहीं किया। हबीब मुक़म्मिल तौर पर थिएटर आर्टिस्ट थे। वो नाटककार थे, वो डायरेक्टर थे, वो एक्टर थे, वो शायर थे, वो ग़रीबों के मसीहा थे, वो एक सच्चे इंसान थे। हबीब भाई में अगर कोई कमज़ोरी थी तो वो हिसाब -किताब, एकाउंट्स करने की। मगर बाद में जब सर पर आन पड़ी तो वो भी सीख लिया था। जो काम हबीब भाई ने किया वो मुश्किल काम था मगर वही कर सकते थे और कोई नहीं। हो भी सकता है कि ज़माने में कभी कोई आए जो कर सके मगर अभी कोई नहीं है। इप्टा न पहले कर सकती थी और न आज कर सकती है। जो वो कर सकती है अगर उसे खूबसूरती से कर ले तो बहुत है।
(भड़ास4मीडिया से साभार)
भेड़िया, भेड़िया / सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
एक चरवाहा लड़का गाँव के जरा दूर पहाड़ी पर भेड़ें ले जाया करता था। उसने मजाक करने और गाँववालों पर चड्ढी गाँठने की सोची। दौड़ता हुआ गाँव के अंदर आया और चिल्लाया, ''भेड़िया, भेड़िया! मेरी भेड़ों से भेड़िया लगा है।''
गाँव की जनता टूट पड़ी। भेड़िया खेदने के हथियार ले लिए। लेकिन उनके दौड़ने और व्यर्थ हाथ-पैर मारने की चुटकी लेता हुआ चरवाहा लड़का आँखों में मुसकराता रहा। समय-समय पर कई बार उसने यह हरकत की। लोग धोखा खाकर उतरे चेहरे से लौट आते थे।
एक रोज सही-सही उसकी भेड़ों में भेड़िया लगा और एक के बाद दूसरी भेड़ तोड़ने लगा। डरा हुआ चरवाहा गाँव आया और 'भेड़िया-भेड़िया' चिल्लाया।
गाँव के लोगों ने कहा, ''अबकी बार चकमा नहीं चलने का। चिल्लाता रह।''
लड़के की चिल्लाहट की ओर उन लोगों ने ध्यान नहीं दिया। भेड़िये ने उसके दल की कुल भेड़ें मार डालीं, एक को भी जीता नहीं छोड़ा।
इस कहानी से यह नसीहत मिलती है कि जो झूठ बोलने का आदी है, उसके सच बालने पर भी लोग कभी विश्वास नहीं करते।
गाँव की जनता टूट पड़ी। भेड़िया खेदने के हथियार ले लिए। लेकिन उनके दौड़ने और व्यर्थ हाथ-पैर मारने की चुटकी लेता हुआ चरवाहा लड़का आँखों में मुसकराता रहा। समय-समय पर कई बार उसने यह हरकत की। लोग धोखा खाकर उतरे चेहरे से लौट आते थे।
एक रोज सही-सही उसकी भेड़ों में भेड़िया लगा और एक के बाद दूसरी भेड़ तोड़ने लगा। डरा हुआ चरवाहा गाँव आया और 'भेड़िया-भेड़िया' चिल्लाया।
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