Friday, 17 January 2014

मार्क्स के संस्मरण-2


पॉल लाफार्ज, विलहेम लीबनेख्ट

इन क्रांतियों के बाद का समय बहुत ही कठिन था। पस्‍तहिम्‍मती ने लोगों के दिल तोड़ दिये थे। विजयोल्‍लास के समय साहस और दृढ़ता बनाये रखना कठिन नहीं होता। पर असली क्रांतिकारी की परीक्षा होती है पराजय के समय, पराजय के बाद आने वाली मूर्छना और निराशा के समय। इस समय मार्क्‍स के सामने सबसे बड़ा प्रश्‍न था क्रांतिकारियों के मनोबल को बनाये रखना, पार्टी (कम्‍युनिस्‍ट संघ) को फिर से संगठित करना, और मजदूर वर्ग और पार्टी को इन क्रान्तियों की असफलता से निकलने वाले निष्‍कर्षों से शिक्षित करना।
मार्क्‍स विचलित नहीं हुए। क्रांतियों की शिक्षाओं का विश्‍लेषण करते हुए उन्‍होंने कई पुस्तिकाएँ लिखीं जो आज भी हमें रास्‍ता दिखाती हैं। ''फ्रांस में श्रेणी संघर्ष'' (1848-1850), ''लुइ बोनापार्ट का अठारहवां ब्रूमेयर'' (1852), ''जर्मनी में क्रांति और क्रांति-विरोध'' (1851-1853), ''कोलोन का कम्‍युनिस्‍ट'' (1853), आदि उनकी इसी काल की रचनाएँ हैं। 1851 से 1862 तक वह अमरीकन पत्र ''न्‍यूयार्क ट्रिब्यून'' में अन्‍तरराष्‍ट्रीय विषयों पर लेख लिखकर दुनिया में क्रांतिकारी विचारों का प्रचार करते रहे। भारत के ऊपर उनकी प्रसिद्ध लेख-माला इसी पत्र में प्रकाशित हुई थी।
इसी समय उन्‍होंने अपने ग्रंथ ''पूंजी'' के प्रथम भाग को पूरा किया जो 1867 में प्रकाशित हुआ।
1860 के लगभग फिर मजदूर आंदोलन उठा। मार्क्‍स इसके लिए तैयार थे। 1864 में उन्‍होंने तमाम संगठनों को एक करके अंतरराष्‍ट्रीय मजदूर संघ की स्‍थापना की। इस संघ को अब प्रथम इंटरनेशनल (अन्तरराष्‍ट्रीय) कहा जाता है। मार्क्‍स के नेतृत्‍व में इस संघ ने मुख्‍य पूंजीवादी देशों के मजदूरों को फिर एक मोर्चे में संगठित कर दिया। 1848 की विफलता से मार्क्‍स ने बहुत कड़वी शिक्षा पायी थी। इसलिए पहली इंटरनेशनल का प्रथम सिद्धान्‍त था : मजदूर वर्ग का उद्धार स्वयं मजदूर ही कर सकते हैं।
1871 में फ्रांस में पैरिस कम्‍यून हुआ। मजदूरों ने गद्दार पूंजीपतियों को खदेड़कर, जो मजदूरों के डर से अपना देश जर्मनी की गुलामी में दे देना चाहते थे, अपना कम्‍यून (मजदूर शासन) कायम किया। मार्क्‍स ने उसकी सहायता के लिए तमाम दुनिया के मजदूरों में जबरदस्‍त आंदोलन किया। जब पैरिस कम्‍यून भी दबा दिया गया तब मार्क्‍स ने एक दूसरी पुस्‍तक लिखी ''फ्रांस में गृहयुद्ध'' जिसमें उन्‍होंने कम्‍यून के संपूर्ण अनुभवों की व्‍याख्‍या की और कहा, पेरिस के मजदूरों के कम्‍यून की याद हमेशा नये समाज के गौरवशाली अग्रदूत के रूप में की जयगी।... उसके दुश्‍मनों को कोई नहीं बचा सकेगा... इतिहास ने अपना फैसला कर दिया है...
इस प्रकार कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी योरप के तरंगित सागर में अपने हाथ में दीप-शिखा लिये मार्क्‍स एक चट्टान की तरह अविजित खड़े रहे। दुनिया के संपूर्ण दर्शन, इतिहास और अनुभवों को मथ कर उन्होंने भविष्‍य के निर्माता मजदूर-वर्ग और श्रमजीवी जनता को मार्क्‍सवाद के रूप में एक अमोघ अस्‍त्र दिया। पद-पद पर उन्‍होंने क्रांतियों और क्रांतिकारियों का नेतृत्‍व किया। जब क्रांतियों का ज्‍वार उठा तो उन्‍होंने अपनी कलम को छोड़कर तलवार ली और रणक्षेत्र में पहुँच गये। ब्रिटेन के प्रसिद्ध नाटककार शॉ के शब्‍दों में, उन्‍होंने अपना सर हमेशा खुदा की तरह ऊँचा रखा।
लगभग आधी शताब्‍दी बाद मार्क्‍स की भविष्‍यवाणी रूस में चरितार्थ हुई। सोवियत रूस का जन्‍म हुआ। आज सोवियत संघ मार्क्‍स के बतलाये रास्‍ते पर चल रहा है। और सोवियत संघ ही क्‍यों-आज तो तमाम दुनिया उसी रास्‍ते पर चल रही है। हमारे देश के सामने भी दूसरा कोई रास्‍ता नहीं। अगर हम आज दुनिया को समझना चाहते हैं, अगर आज हम शोषण और गुलामी को खदेड़कर अपनी मातृभूमि को आजाद करना चाहते हैं, अगर हम जीना और उन्‍नति करना चाहते हैं, तो हमें भी उसी अमर ज्‍योति का सहारा लेना पड़ेगा जो मार्क्‍स ने जलायी थी और जो आज देश में वहाँ की कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों के रूप में प्रज्‍वलित हैं।
इसीलिए इस पुस्तिका का प्रकाशन आवश्‍यक समझा गया। इसमें मार्क्‍स की जीवनी नहीं बल्कि उनसे बहुत निकट रूप से संबंधित दो व्‍यक्तियों के संस्‍मरण हैं। इनसे हमें मार्क्‍स के व्‍यक्तित्‍व का परिचय मिलता है। उनकी पूरी जीवनी आगे कभी प्रकाशित की जाएगी।
मार्क्स की मृत्‍यु 1883 में हुई थी। पर वह मरे कहाँ-उनकी तो बूंद-बूंद से आज मार्क्‍सवादियों की सेनाएँ तैयार हो गयी हैं जो उनके बतलाये हुए मार्ग पर मानवी स्‍वतत्रंता और सुख की खोज में आगे बढ़ रही हैं।
17 मार्च सन 1883 को जब कार्ल मार्क्स लंदन के हाईगेट कब्रिस्‍तान में दफनाये गये तो उनको श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिये केवल थोड़े से मित्रगण जमा थे। मार्क्‍स का नाम लंदन के मजदूर-वर्ग को अज्ञात था। उनका स्‍थापित किया हुआ 'विश्‍व-मजदूर-संघ' ग्‍यारह साल पहले खत्‍म हो चुका था और जिन ब्रिटिश ट्रेड यूनियनों ने एक समय उसका साथ दिया था वे भी उसे भूल चुकी थीं। केवल एक अंग्रेजी दल ऐसा था जिस पर किसी हद तक उनकी शिक्षा का असर था और वह भी अभी तक अपने को समाजवादी नहीं कहता था। एक साल और बीतने के बाद ही उसने अपना नाम 'समाजिक-जनवादी संघ' रखा। मार्क्‍स की सर्वोत्‍कृष्‍ट रचना ''कैपिटल'' का पहला भाग खत्‍म हुआ था और उनकी मृत्‍यु से सोलह बरस पहले छप चुका था परंतु उसका अंग्रेजी में अभी अनुवाद नहीं हुआ था।
परंतु कब्र के पास फ्रेडरिक एंगेल्‍स को ये शब्‍द कहने में लेश मात्र भी संकोच नहीं था कि ''14 मार्च को दोपहर के पौने तीन बजे दुनिया के सबसे बड़े विचारक ने सोचना बंद कर दिया।'' ''उनका नाम सदियों बाद भी जीवित रहेगा, और उसका कार्य भी''।
एंगेल्‍स ने चालीस बरस की गाढ़ी मित्रता और बौद्धिक घनिष्ठता द्वारा उत्‍पन्‍न होने वाले विश्‍वास के साथ ये शब्‍द कहे थे, क्‍योंकि उस समय अन्‍य आदमियों से कहीं ज्‍यादा अच्‍छी तरह से उन्‍होंने मार्क्‍स की शिक्षा का पूरा महत्‍व समझ लिया था। उन्‍होंने एक साथी वैज्ञानिक और एक साथ लड़ने वाले क्रांतिकारी योद्धा के नाते ही मार्क्‍स की शिक्षा के महत्‍व को आँका था। और इतिहास ने यह दिखा दिया है कि उनका कहना सच था।
आज मार्क्‍स का आदर करने वाले केवल मुट्ठीभर आदमी नहीं हैं। मजदूर वर्ग के गद्दारों और मध्‍य वर्ग के बुद्धिजीवियों के बिगाड़ने और बुराई करने की हर एक कोशिश के बावजूद प्रत्‍येक देश में ऐसे लोगों की संख्‍या बढ़ती जा रही है जो मार्क्‍सवाद को वर्तमान और भविष्‍य का विज्ञान मानते हैं। यह स्‍वीकृति आसानी से प्राप्‍त नहीं हुई। प्रत्‍येक पग पर इसके लिए मजदूर-आन्‍दोलन के सबसे योग्‍य और साहसी पुरुष और स्त्रियाँ लड़े हैं किन्‍तु प्रत्‍येक देश के इतिहास में ऐसा समय आ चुका है जब मार्क्‍स की शिक्षा के क्रांतिकारी रूप का दीपक बुझनेवाला ही था।
आज वह दीप उज्ज्‍वल और अजेय रूप से जल रहा है। सोवियत संघ का विशाल ज्‍योति पुंज सारी दुनिया का ध्‍यान आकर्षित करता है और प्रत्‍येक दिन, हाथ या दिमाग से काम करने वाले इस बात को समझते जा रहे हैं कि सोवियत जनता की वीरता केवल जाति के अथवा ऐतिहासिक संयोग का फल नहीं है, बल्कि मार्क्‍स की क्रांतिकारी शिक्षा की सच्‍चाई और शक्ति का परिणाम है। क्‍योंकि वह रूसी जनता ही नहीं थी जिसने लेनिन और उनकी बनाई हुई बोल्‍शेविक पार्टी के नेतृत्‍व में मार्क्‍स के क्रांतिकारी सिद्धान्‍त को सफलतापूर्वक कार्य रूप में परिणत किया। लगभग 25 बरस से, यानी 7 नवम्‍बर सन 1917 से 22 जून 1941 तक वे इतिहास के सबसे बड़े रचनात्‍मक कार्य में लगे रहे हैं। लेनिन के सबसे बड़े शिष्‍य स्‍तालिन ने साम्‍यवाद तक पहुँचने में रूसी मजदूर और किसानों का नेतृत्‍व किया। यह कम्‍युनिज्‍म की पहली मंजिल है और कम्‍युनिज्‍म भविष्‍य का वह विश्‍वव्‍यापी समाज है जिसके बारे में मार्क्‍स ने एक वैज्ञानिक के विश्‍वास से भविष्‍यवाणी की थी और जिसके लिए वह एक महान क्रांतिकारी की भाँति अथक उत्‍साह से कोशिश करते रहे। आज जब कि पूरी दुनिया की साधारण जनता के साथ-साथ सोवियत जनता के सामने भी फासिज्‍म का खतरा है, तो स्‍तालिन और समाजवादी राज्‍य की फौज ही मानवता के भविष्‍य की इस लड़ाई में स्‍वतंत्रता की सेना का नेतृत्‍व कर रही है।

मार्क्स के संस्मरण-1

पॉल लाफार्ज, विलहेम लीबनेख्ट

दुनिया में बिरले ही ऐसे व्‍यक्ति हुए हैं जिन्‍होंने मानव-समाज के इतिहास की धारा को इतना प्रभावित किया है जितना कार्ल मार्क्‍स ने।
कार्ल मार्क्‍स का जन्‍म 1818 में जर्मनी के राइन जिले के एक खाते-पीते यहूदी परिवार में हुआ था। बाद में मार्क्‍स के घर वाले ईसाई हो गये। जर्मनी के बॉन और बर्लिन विश्‍वविद्यालय में उनकी शिक्षा हुई। पहले उन्‍होंने वकालत पढ़ी। फिर वकालत छोड़कर इतिहास और दर्शन के अध्‍ययन में लग लये। युनीवर्सिटी (विश्‍व-विद्यालय) में उनका विषय 'सामाजिक न्‍याय के सिद्धान्‍त' थे। परन्‍तु उन्‍हीं के शब्‍दों में सामाजिक न्‍याय के सिद्धान्‍तों का विषय उन्‍होंने ''दर्शन और इतिहास का प्रारम्भिक ज्ञान प्राप्‍त करने के उद्देश्‍य से चुना था।'' इस प्रकार आरम्‍भ से ही उनकी रुचि गंभीर विषयों की ओर थी। 1941 में उन्‍हें जेन विश्वविद्यालय से डॉक्‍टर की उपाधि मिली। उनकी थीसिस (लेख) का विषय यूनानी दर्शन था। मार्क्‍स इस समय तक भौतिकवादी नहीं थे। वह हीगेल के शिष्‍य और उसके आदर्शवादी दर्शन के अनन्‍य उपासक थे। पर इसी समय से हीगेलवादी दर्शन के साथ उनका मतभेद आरम्‍भ हुआ।
मार्क्‍स के ऊपर हीगेल का बहुत प्रभाव था। हीगेल ने जर्मनी की दार्शनिक विचार धारा में क्रान्ति ला दी थी। वह पहला दर्शनिक है जिसने जर्मनी की पुरानी आत्‍मवादी दार्शनिक परम्‍परा से नाता तोड़कर विकास की पद्धति का अनुसरण किया और द्वंद्वात्‍मक गतिशीलता का सिद्धान्‍त स्थिर किया। मार्क्‍स ने हीगेल की द्वंद्वात्‍मक तर्क-प‍द्धति को अपनाते हुए उसी आधार पर बहुत क्रान्तिकारी परिणाम निकाले। और बाद में जब उन्‍होंने द्वंद्वात्‍मक भौतिकवाद की दार्शनिक प्रणाली की स्‍थापना की तब हीगेल के दर्शन को जो अब तक ''सिर'' के बल खड़ा हुआ था, उन्‍होंने सीधा करके ''पैरों पर'' खड़ा कर दिया। हीगेल कहता था कि भौतिक विकास का स्रोत विचार है। मार्क्‍स ने बताया कि वास्‍तविकता इसके विपरीत है। विचार भौतिक विकास के ऊपर आधारित है। वे भौतिक विकास के साथ बनते-बिगड़ते हैं। मूल वस्‍तु भौतिक विकास है। इस प्रकार हीगेल के आदर्शवाद के स्‍थान पर मार्क्‍सवादी भौतिकवाद की स्‍थापना हुई। मनुष्‍य के मानसिक विकास में यह बहुत बड़ी मंजिल थी। मंजिल क्‍यों-एक मोड़ थी, जहाँ पहुँचकर मानवी प्रगति का अतीत और भविष्‍य पथ एक साथ अलोकित हो उठा।
मार्क्‍स ने अपने विद्यार्थी जीवन से राजनीति में हिस्‍सा लेना शुरू कर दिया था। बॉन विश्वविद्यालय के विद्यार्थी संघ के वह प्रमुख कार्यकर्ता थे। शिक्षा समाप्‍त करने के बाद राजनीतिक जीवन ही उनका प्रमुख जीवन हो गया। 1841 में वह बॉन विश्‍वविद्यालय में दर्शन के प्रोफेसर होने जा रहे थे। उन्‍हें पता चला कि वहाँ जाने के माने अपने स्‍वतंत्र विचारों को तिलांजलि देना होगा। बॉन विश्‍वविद्यालय में उनके गुरु-भाई ब्रूनो बेयर को अपने उग्र विचारों के कारण भाषण देने से रोक दिया था। मार्क्‍स ने उसी समय प्रोफेसरी के जीवन को नमस्‍कार किया और जी जान से राजनीतिक आंदोलन में लग गये।
अपने विद्यार्थी जीवन में मार्क्‍स ''राइन गजट'' नाम के एक पत्र के सम्‍पादक बना दिये गये। यह पत्र राइन जिले के उग्रवादी पूंजीपतियों का था जो जर्मनी के प्रशियन बादशाह विल्‍हेल्‍म की (तृतीय और बाद में चतुर्थ की भी) सामन्‍तशाही के कट्टर विरोधी थे।
योरप में यह युग पूंजीवाद के उभार का था। इंग्‍लैण्‍ड की औद्योगिक क्रान्ति पिछली शताब्‍दी में पूरी हो चुकी थी और 1789 की फ्रांसीसी राज्‍य-क्रान्ति ने योरप में सामंतशाही श्रृंखलाओं को तोड़कर पूंजीवादी विकास का मार्ग खोल दिया था। उद्योग-धन्‍धों के विकास के साथ मजदूर वर्ग मैदान में आया और मजदूरों और पूंजीपतियों के तीव्र संघर्ष का सूत्रपात हुआ। जगह-जगह मजदूर संघ बनने लगे। 1831 और 1834 में फ्रांस में विद्रोह हुए। 1833 में इंगलैण्‍ड में मजदूर सभाओं का एक अखिल इंगलैण्‍ड मजदूर संघ बना। 1836 में वहीं एक प्रसिद्ध चार्टिस्‍ट पार्टी की नींव पड़ी जो इंगलैण्‍ड की पहली क्रान्तिकारी मजदूर-पार्टी थी। इसी वर्ष जर्मनी में मजदूरों का एक गुप्‍त संगठन बना जिसका नाम था ''ईमानदारों का संघ''। इसके प्रमुख नेताओं में एक मोची, एक कम्‍पोजीटर और एक दर्जी था।
ये संघ बन रहे थे। मजदूरों में वर्ग-चेतना आ रही थी। अब वह युग बीत चुका था जब शोषण का विरोध करने के लिए मजदूर मशीनों को तोड़ डालते थे। लेकिन इन संघों के सामने कोई पूरा प्रोग्राम नहीं था, उनका पथ प्रदर्शित करने के लिए कोई विचारधारा नहीं थी। पिछली (अर्थात अठारहवीं) शताब्‍दी में भी कई सोशलिस्‍ट नेता हुए थे। फूरिये (1772-1837), सेंट साइमन (1771-1858) और ओवेन (1771-1830) इनमें प्रमुख थे। किन्‍तु ये कल्‍पनावादी सुधारक थे। उन्‍होंने पूंजीवादी व्‍यवस्‍था और शोषण की कटुतम आलोचना की और पूंजीपतियों को आड़े हाथों लिया। पर शोषण का अन्‍त करने का मार्ग वे हृदय-परिवर्तन बतलाते थे। इसलिए बिचारे अपनी ही असफलताओं के गर्त में विलीन हो गये। मजदूर आन्‍दोलन अन्‍धकूप से बाहर न निकल सका। तभी मार्क्‍स आये। उन्‍होंने सामाजिक विश्‍लेषण के आधार पर सामाजिक विकास के नियमों की व्‍याख्‍या की और मजदूर वर्ग को एक विचारधारा और एक कार्यक्रम दिया।
मार्क्‍स का ध्‍यान इस ओर राइन गजट का सम्‍पादक करते समय गया था। योरप में इस समय मुख्‍य कार्य मजदूर-क्रान्ति नहीं, बल्कि सामंतशाही की बची-खुची रुकावटों को दूर करके पूंजीवादी जनवादी क्रान्ति करना था जिससे कि पूंजीवाद के (और उसके साथ-साथ मजदूर वर्ग के भी) पूर्ण विकास रास्‍ता खुल जाय। जर्मनी का राइन जिला औद्योगिक और क्रांतिकारी दोनों दृष्टियों से सबसे आगे था। वहाँ के पूंजीपति अपने वर्ग के अगुआ थे। इसीलिए मार्क्‍स ने उनके पत्र ''राइन गजट'' का सम्‍पादन-कार्य स्‍वीकार किया था। मार्क्‍स के लेखों ने प्रशियन सरकार के कोटरों में तहलका मचा दिया।  मार्क्‍स के लेखों पर डबल सेन्‍सर लगाया गया। फिर भी मार्क्‍स के वीरों को न रोका जा सका तो 1843 में सरकार ने पत्र को ही जब्‍त कर लिया।
जून 1843 में मार्क्‍स अपनी प्रेयसी जेनी से मिले और प्रणय-सूत्र में बंध गये। जेनी फॉन वेस्‍टफालेन शाही खानदान की सुन्‍दर लड़की थी। मार्क्‍स से उसका परिचय कुछ वर्ष पहले हुआ था जब वे पड़ोस में रहते थे। विवाह के बाद जेनी सदा अपने पति के साथ रही। मार्ग की कठिनाइयाँ, गरीबी, देशनिकाला, प्रियजनों की मृत्‍यु, कोई भी चीज फिर उस पति-परायणा वीरांगना को विचलित न कर सकी।
विवाह के बाद मार्क्‍स जर्मनी से पैरिस चले गये। पैरिस से उन्‍होंने एक दूसरी पत्रिका, ''फ्रेंको-जर्मन एनुअल'' निकाली। वहीं पर उन‍की मुलाकात एंगेल्‍स से हुई। श्रमजीवी वर्ग के ये महान नेता दो वर्ष पहले भी जर्मनी में मिल चुके थे। किन्‍तु इस बार मिलने पर वे सदा के लिए एक-दूसरे के हो गये। एक प्राण दो शरीरों की तरह अन्तिम समय तक वे साथ रहे। ऐसी मित्रता का विश्‍व-इतिहास में दूसरा उदाहरण नहीं मिलता।
पैरिस में आकर भी मार्क्‍स ने प्रशियन सरकारी टीका-टिप्‍पणी बंद नहीं की। और अब केवल प्रशियन सरकार का सवाल नहीं र‍ह गया था। अब योरोप की दूसरी सरकारें भी मार्क्‍स के नाम से डरने लगीं। उनका व्‍यक्तित्‍व इतना बड़ा हो गया था कि कोई भी सरकार उन्हें अपने यहाँ रहने देने से डरती थी। 1845 में मार्क्‍स को पैरिस से देश-निकाला कर दिया गया। फ्रांस से निकाले जाने पर वह बेल्जियम (ब्रूसेल्‍स) गये। वहाँ भी उनका रहना कठिन हो गया। बेल्जियम सरकार ने भी उन्‍हें देश छोड़ने की आज्ञा दी। इसलिए बेल्जियम छोड़कर वह लंदन चले गये।

Sunday, 12 January 2014

सुबह का सपना

जयप्रकाश त्रिपाठी

सोमवार की सुबह सो रही थी वह
 अभी गहरी नींद में
पढ़ रहा था मैं उसके चुटकीभर चेहरे पर
पौधौं-पत्तियों, तितलियों, फूलों और खिलौनो की बातें,
देखते-देखते कितनी जल्दी से
 हो गई तीन साल पांच महीने की, तो भी
अथाह ज्ञान से लदे फदे आ ही रहे होंगे
इसके भी स्कूलों वाले दिन,
किताबों और कहानियों और कविताओं और वेरा-वेरा बोलते
बड़े-बड़े सपनों वाली रातें।
और बाहर घने अंधेरे में अपनी अपनी खोह से
घूरतीं लाल लाल भेड़िया आंखें उन सबकी
जिन्हें,  अजनबी बना दिया है समय ने,
बाकी सब कुछ दिख जाता है समय से पहले,
सिर्फ बेटियों में बेटियां
नजर नहीं आतीं हैं!

Saturday, 11 January 2014

एक कविता खलील जिब्रान के लिए

मंजरी श्रीवास्तव 

खलील
ओ मेरे प्यारे खलील
सुन रहे हो मेरी आवाज तुम
या नहीं...
मैं सलमा हूँ
तुम्हारी सलमा
सलमा करामी
तुम्हारे प्यार ने दुबारा धरती पर आने को मजबूर कर दिया मुझे
उस बिशप ने मुझे तुम्हारी पत्नी न बनने दिया
यह एक तरह से अच्छा ही हुआ
नहीं तो तुम सिर्फ मेरे खलील ही रह जाते
खलील जिब्रान न बन पाते
मैं उस बिशप के भतीजे की पत्नी बनी जरूर
पर मेरे दिल में हमेशा तुम्हारी तस्वीर रही
जिब्रान बनकर तुमने कहा था -
"प्रेम जब भी तुम्हे पुकारे, उसके पीछे चल पड़ो,
यद्यपि उसके रास्ते बीहड़ और दुर्गम हैं।"
और तुम्हारी इस अनंत पुकार पर
चल पड़ी मैं
प्रेम के बीहड़ और दुर्गम रास्ते पर
और आ पहुँची यहाँ तक
तुमने कहा था -
"यह कभी मत सोचो कि तुम प्रेम का मार्गदर्शन कर सकते हो,
यदि तुम सुपात्र हो तो प्रेम स्वयं ही तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा..."
और आज भी
मेरा मार्गदर्शन कर रही हैं तुम्हारी प्रेम सम्बन्धी बातें
तुमने उसी जमाने में फिर कहा -
"प्रेम किसी पर आधिपत्य नहीं जमाता
और न ही किसी के आधिपत्य को स्वीकार करता है
प्रेम के लिए प्रेम ही पर्याप्त है..."
और मैंने तोड़ डाले सारे बंधन आधिपत्यों के
और इतने युगों के बाद वापस आयी हूँ धरती पर
तुम्हारे और
सिर्फ तुम्हारे लिए.
अपने हिसाब से तुमने कभी अपने प्रेम को मेरे पैरों में
बेड़ियों की तरह नहीं पहनाया
तुमने मेरे मन का प्याला प्रेम से इतना भर डाला कि
आज भी तुम्हारे प्रेम के बीज जीवित हैं
मेरे मन में
मेरे शरीर में
मेरे हृदय में आज भी चटक रही हैं तुम्हारे प्रेम की कलियाँ
और इन कलियों की खुशबू से महक रही हैं मेरी साँसें .
आज भी मैं मना रही हूँ खुशियाँ
और
मौसम की अलमस्त बहारों से गुजरते वक्त

हमेशा मेरे साथ होते हो तुम
और जब शरद में चुनते हो अंगूर
मदिरा बनाने के लिए
मदिरा बनकर मैं ही भर जाती हूँ अनंत के पात्रों में संचित होकर
सर्दियों में जब भी निकालते हो उस मदिरा को पीने के लिए
तो हर प्याले के लिए तुम्हारे हृदय में होता है एक गीत
जिसमें विद्यमान होती है
शरद की
अंगूर की
अंगूर के बगीचे की
निचुड़ते हुए रस की और
मेरी मधुर स्मृतियाँ...

आज भी मेरी नजरों से जब ओझल होते हो तुम
घर से निकल कर काम पर जाने के लिए
तो बन जाते हो वह बाँसुरी
जिसके हृदय से गुजरती है समय की साँस
हर पल
और बदल जाती है
एक अनहद संगीत में .
जिन्दगी को तुम समझते हो प्यार से
और प्यार को श्रम के माध्यम से
जिन्दगी को श्रम के माध्यम से प्यार करते हुए ही
जान लेते हो तुम बारीकी से
उसके अन्तरंग रहस्यों को
और
बतला देते हो मुझे भी
प्रेम से प्रेरित कर्म का रहस्य
जहाँ
जब इनसान खुद से खुद को बाँधता है और
एक-दूसरे से बाँधता है तो
वह स्वयं को ईश्वर से बाँधता है.

तुम बतलाते हो प्रेम से प्रेरित कर्म की परिभाषा :
"यह अपने हृदय से खींचकर काते गए सूत से कपड़ा बुनना है,
मानो तुम्हारी प्रेयसी ही पहननेवाली हो उसे..."
"यह इतने प्यार से भवन का निर्माण करना है,
मानो तुम्हारी प्रेयसी ही रहनेवाली हो वहाँ... "
"यह इतनी कोमलता से बीज बोना
और इतने आनंदित होकर फलों का संचय करना है
मानो तुम्हारी प्रेयसी ही खानेवाली हो वे फल... "
"यह अपने हाथों किये गए प्रत्येक कर्म को
अपनी दिव्यता की ऊर्जा से भर देना है..."
"और ऐसा महसूस करना है, मानो समस्त निर्जीव सत्ताएँ
तुम्हारे आस-पास खड़ी तुम्हारे कर्मों को निहार रही हैं... "

तुमने बुने मेरे लिए अपने प्रेम के सूत से
पारंपरिक और आधुनिक झीने परिधान
तुमने बनाये मजदूर बनकर मेरे लिए
खूबसूरत डुप्लेक्स फ्लैट
तुमने तब लगायी थी जो बोनसाई आमों की
वे दे रही है तब से अब तक फल सिर्फ मेरे लिए
और तुमने सचमुच भर दी इतनी दिव्य ऊर्जा मेरी रूह में
कि मैं रोक ही नहीं पायी अपने आप को
वापस धरती पर आने से
और सचमुच सभी आधिपत्यों का विरोध कर
मेरा यहाँ आना
निहारती रह गयीं सारी सजीव और निर्जीव सत्ताएँ


अब जब मैं वापस आयी हूँ तुम्हारे लिए
तुमने बदल डाला है पवन के स्वरों को एक गीत में
और
प्रगाढ़ कर डाला है अपने प्रेम से उस गीत की मिठास को
तुमने प्रेम को कर्म के रूप में दृष्टिगोचर बनाकर
वर्षों पहले कही अपनी ही बात की
कर डाली है पुनर्व्याख्या
एक नये तरीके से
तुमने मुझे कर डाला है इस बार
स्थिर, संतुलित और अडिग
क्योंकि इस बार मैं होकर आयी हूँ खाली
तुमने मुझे कर डाला है
नग्न और निर्बाध
मेरे ही अंगों से
कर डाला है मुक्त
मेरे ही दोहरे व्यक्तित्व से
कर डाला है मौन अपनी ही तरह
जो मेरे दिनों और रातों के रहस्य का ज्ञाता है
तुम छू रहे हो अब भी
मेरे स्वप्नों की नग्न काया
अपनी काँपती, थरथराती उँगलियों से
और आज भी पैदा कर रहे हो मुझमें वही सिहरन
प्रेम का वही रोमांच
जो कभी सदियों पहले पैदा किया था
तुमने जगा दिए हैं मेरी आत्मा के अदृश्य जलस्रोत
जो कल-कल ध्वनि के साथ सदियों से अब तक
मिल रहे हैं तुम्हारे प्यार के समंदर में
तुम अब भी, अनायास ही शामिल हो जाते हो
मेरे हृदय की छोटी-छोटी खुशियों के ओस-कणों में,
मेरी खिलखिलाहटों में
मेरे आँसुओं में
मेरी वेदना, मेरी पीड़ा में भी
महसूस करती हूँ मैं कि
तुम दुबारा से जी उठे हो मेरे होंठों में
मेरे वर्तमान में
स्मृति-विभोर होकर मैं कर रही हूँ आलिंगन अतीत का
और
प्रेमातुर होकर भविष्य का
एकाकार हो रही हूँ तुम्हारी आत्मा के साथ
तुम्हारी आकांक्षाओं, तुम्हारी अनुभूतियों और
तुम्हारी अनंत सत्ता के साथ
हम अभिन्न हैं
आज भी
सरिता और सागर की तरह
है न खलील...
बोलो...?

ईश्वर


बसंत त्रिपाठी

ईश्वर है तो देर सबेर
कर्मकांड भी है

कर्मकांड है तो
फिर उसे पूरा कराने वाले
परजीवी भी

अब परजीवी तो
मेहनत करने से रहे
वे तो किसी का
खून चूस कर ही पलेंगे

परजीवी फिर शासन को
नए ढंग से परिभाषित करेंगे

प्रियवर, अब ठीक से सोचो और कहो
ईश्वर के बारे में
तुम्हारा क्या विचार है?

चिड़ियाँ रे


बद्रीनारायण


चिड़ियाँ रे!
चिड़ियाँ होने का अर्थ फाड़ दो
मछली रे मछली होने का अर्थ काट दो
लड़की चिंदी चिंदी कर दो
लड़की होने के अर्थ को

बकुल के फूल, बकुल के फूल होने के अर्थ को
अपने से थोड़ा अलग करो,
और कमल के फूल की रूप छवियों में
नाभियों अपने लिए जगह माँगो,

पृथ्वी के नीचे फैली जड़ों,
पेड़ों के बिंब में अपने प्रति होने वाले
अन्याय के खिलाफ रख दो माँग पत्र
पत्तियों! उठो और कहो
कि फूल के बनाने में तुम भी शामिल हो

सभ्यताओं के तत्वों सब मिलकर
सभ्यताओं का अर्थ ही बदल डालो,
रागों में पूरबी राग,
अपने लिए शास्त्रीय संगीत में जगह माँगो
और फूट नोटो, तुमसे मैं कहते कहते थक गया,
कि उठो और धीरे धीरे पहुँच जाओ
लेखों के बीच मे।

अपराध और अपराधी


फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की

'पूरी तरह यही मेरे कहने का मतलब नहीं था,' रस्कोलनिकोव ने सीधे ढंग से और विनम्रता के साथ कहना शुरू किया। 'मैं फिर भी मानता हूँ कि मेरी बात को आपने लगभग पूरी तरह सही-सही बयान किया है, बल्कि मैं तो यहाँ तक कहने को तैयार हूँ कि शायद उसमें कुछ भी गड़बड़ नहीं है। फर्क बस एक है। मैं इस पर जोर नहीं देता कि असाधारण लोगों के लिए हमेशा उनके, जैसा कि आप कहते हैं, नैतिकता के नियमों के, खिलाफ काम करना लाजमी नहीं होता। दरअसल, मुझे तो इसमें भी शक है कि 'असाधारण' आदमी को इस बात का अधिकार होता है कि वह अपनी अंतरात्मा में इस बात का निश्चय कर सके कि वह कुछ बाधाओं को... पार करके आगे जा सकता है, और वह भी उस हालात में जब ऐसा करना उसके विचारों को व्यवहार का रूप देने के लिए जरूरी हो। (शायद कभी-कभी यही पूरी मानवता के हित में हो।) आपका कहना है कि मेरे लेख में यह बात स्पष्ट ढंग से नहीं कही गई है; मैं अपनी बात, जहाँ तक मेरे लिए मुमकिन है, साफ-साफ कहने को तैयार हूँ। मेरा कहना यह है कि अगर एक, एक दर्जन, एक सौ या उससे भी ज्यादा लोगों की जान की कुरबानी दिए बिना केप्लर और न्यूटन की खोजों को सामने लाना मुमकिन न होता, तो न्यूटन को इस बात का अधिकार होता, बल्कि सच पूछें तो उसका कर्तव्य होता कि वह पूरी मानवता तक अपनी खोजों की जानकारी पहुँचाने के लिए... उन एक दर्जन या एक सौ आदमियों का सफाया कर दे। लेकिन इससे यह नतीजा नहीं निकलता कि न्यूटन को इस बात का अधिकार था कि वह अंधाधुंध लोगों की हत्या करता चले और रोज बाजार में जा कर चीजें चुराए। फिर मुझे याद है, मैंने अपने लेख में यह भी दावा किया था कि सभी... मेरा मतलब है कि सुदूर अतीत से ले कर अभी तक कानून बनानेवाले और जनता के नेता, जैसे लाइकर्गस, सोलन, मुहम्मद, नेपोलियन, वगैरह-वगैरह सारे के सारे एक तरह से अपराधी थे, सिर्फ इस बात के सबब कि उन्होंने एक नया कानून बना कर उस पुराने कानून का उल्लंघन किया जो उनके पुरखों से उन्हें मिला था और जिसे आम लोग अटल मानते थे। अरे, ये लोग तो खून-खराबे से भी नहीं झिझके क्योंकि उस खून-खराबे से, जिसमें अकसर पुराने कानून को बचाने के लिए बहादुरी से लड़नेवाले मासूमों का खून बहाया जाता था, उन्हें अपने लक्ष्य पाने में मदद मिलती थी। जी हाँ, कमाल की बात तो यह है कि मानवता का उद्धार करनेवाले इन लोगों में से, मानवता के इन नेताओं में से ज्यादातर नेता भयानक खून-खराबे के दोषी थे। इससे मैंने यह नतीजा निकाला है कि सभी महापुरुषों को, बड़े लोगों को, और उन लोगों को भी जो आम लोगों से थोड़े भिन्न होते हैं, उन्हें कमोबेश अपराधी ही बनना पड़ता है। नहीं तो उनके लिए घिसी-घिसाई लीक से बाहर निकलना मुश्किल हो जाए और वे कभी घिसी-घिसाई लीक पर चलते रहना बरदाश्त नहीं कर सकते। ...मैं तो बस अपने इस मुख्य विचार में विश्वास रखता हूँ कि प्रकृति का एक नियम लोगों को आमतौर पर दो खानों में बाँट देता है : एक तो निम्नतर (यानी साधारण), मतलब यह कि वह माल जो सिर्फ अपनी ही किस्म का माल बार-बार पैदा करते रहने के लिए होता है, और दूसरे वे लोग जिनमें कोई नई बात कहने की प्रतिभा होती है। ...आम तौर पर, पहली किस्म में ऐसे लोग होते हैं जो स्वभाव से ही दकियानूस और कानून को माननेवाले होते हैं, आज्ञाकारी होते हैं और आज्ञाकारी रहना पसंद करते हैं। उन्हें मेरी राय में आज्ञाकारी ही होना चाहिए। क्योंकि यही उनका काम है, और इसमें उनकी कोई हेठी नहीं होती। दूसरे किस्म के लोग कानून की सीमाओं को तोड़ते हैं; अपनी-अपनी क्षमता के हिसाब से वे या तो चीजों को नष्ट करते हैं या उनका झुकाव चीजों को नष्ट करने की ओर होता है। जाहिर है इन लोगों के अपराध दूसरी ही तरह के होते हैं और किसी दूसरी बात से तुलना करके ही उन्हें अपराध कहा जा सकता है। ज्यादातर तो यही होता है कि वे बहुत ही भिन्न-भिन्न संदर्भों में जो कुछ मौजूद है, उसे कुछ बेहतर की खातिर नष्ट करने की माँग करते हैं। लेकिन इस तरह का एक आदमी अगर अपने विचारों की खातिर किसी लाश को रौंदने या खून की नदी से भी पार उतरने पर मजबूर हो जाए तो वह, मेरा दावा है कि अपनी अंतरात्मा में खून की इस नदी से पार उतरने को उचित ठहराने के लिए भी कोई कारण ढूँढ़ निकालेगा। ...लेकिन कुछ ज्यादा चिंता करने की बात नहीं है : आम लोग इस अधिकार को शायद कभी मानेंगे ही नहीं। वे ऐसे लोगों को (कमोबेश) या तो मौत की सजा देते हैं या फाँसी पर लटका देते हैं, और ऐसा करके वे अपने दकियानूसी के फर्ज को पूरा करते हैं, जो ठीक ही है। लेकिन अगली पीढ़ी में पहुँच कर आम लोग ही (कमोबेश) इन अपराधियों की ऊँची-ऊँची मूर्तियाँ खड़ी करते हैं और उनकी पूजा करते हैं। पहली किस्म के लोगों का हमेशा केवल वर्तमान पर ही अधिकार रहता है और दूसरी किस्म के लोग हमेशा भविष्य के मालिक होते हैं।  (अपराध और दंड से)