Tuesday, 10 December 2013

ढोड़वा के घर में ढिंढोड़

कोई गद्दी गया छोड़ है,
भीतर-भीतर लगी होड़ है,
जोड़-तोड़ भइ जोड़-तोड़ है।

चित्तू चित्त पड़े पयताने,
हांफ रहे बेवजह फलाने,
दाद-खाज में नया कोढ़ है,
जोड़-तोड़ भइ जोड़-तोड़ है।

कैसे गद्दी पर चढ़ जाऊं
पाऊं, फिर जीभर के खाऊं
बस इतना भर का निचोड़ है,
जोड़-तोड़ भइ जोड़-तोड़ है।

दन्नूजी चढ़ गए अटारी,
सन्नूजी गा रहे लचारी,
मन्नू चाहे तोड़फोड़ है,
जोड़-तोड़ भइ जोड़-तोड़ है।

खुत्थड़ को थुत्थड़ थुथकारे,
बात-बात पर ताने मारे,
आने वाला नया मोड़ है,
जोड़-तोड़ भइ जोड़-तोड़ है।

झाड़ू ने झड़झड़ा दिया है,
ऐसा पिल्लर खड़ा किया है
आगे मकड़ी का जाला है,
सन 14 आने वाला है,
ढोड़वा के घर में ढिंढोड़ है,
जोड़-तोड़ भइ जोड़-तोड़ है।

Sunday, 8 December 2013

आम आदमी की पार्टी का ताजा चैलेंज.......


यह दिल्ली में सिर्फ पारंपरिक सरकार बना लेने भर का नहीं, देश की जनता के लिए नई राजनीतिक संभावनाओं का द्वार खुलने का समय है।

जेपी मूवमेंट के बाद देश की जनता की जो दुर्दशा ये सरकारें करती आ रही हैं, तरह तरह के खोल ओढ़ कर लोकतंत्र के नाम पर नितांत अलोकतांत्रिक तरीके से जनता के राजस्व की बेखौफ व्यक्तिगत हित में, ऐशोआराम के साथ ठिकाने लगाते जा रही हैं, महंगाई, कानून व्यवस्था, विकास के मोरचो पर जिस दंभ और गुरूर के साथ, सांप्रदायिकता और जात-पांत के सहारे, राजनीति में नितांत अयोग्य होने के बावजूद पारिवारिक विरासत और महंतई के बूते देशवासियों की जैसी दुर्दशा करती जा रही हैं, ऐसे में जनहित की दृष्टि से दिल्ली में सरकार बनना उतना जरूरी नहीं, जितना कि 'आम आदमी पार्टी' का उम्मीदों और आशाओं पर खरा उतरना आवश्यक है।

बड़ी मेहनत से कश्ती तूफान से निकाल कर आप टीम ले आई है

समय के इस मोड़ पर अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों पर पहले से ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ी है।

पूरे देश की निगाहें उन पर हैं।

देखना होगा कि वह दलदल में शामिल हो जाते हैं या अन्ना हजारे के लक्ष्य को अंजाम तक पहुंचाने का बीड़ा उठा लेते हैं।  

बीड़ा उठाएं भी तो सिर्फ जेपी मूवमेंट जितना ही नहीं, आज की चुनौतियों और जनता की आकांक्षाओं तथा कहरे विश्वास को ध्यान में रखते हुए। क्योंकि जनता पार्टी का अंतिम अंजाम क्या रहा था, देश अभी भूला नहीं है।

Saturday, 7 December 2013

गीत-फरोश

भवानीप्रसाद मिश्र

जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ !

जी, माल देखिए, दाम बताऊँगा,
बेकाम नहीं है, काम बताऊँगा,
कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने,
कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने,
यह गीत, सख्त सरदर्द भुलाएगा,
यह गीत पिया को पास बुलाएगा !

जी, पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझको;
पर बाद-बाद में अक्ल जगी मुझको,
जी, लोगों ने तो बेच दिये ईमान,
जी, आप न हों सुन कर ज्यादा हैरान -
मैं सोच-समझकर आखिर
अपने गीत बेचता हूँ,
जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ !

यह गीत सुबह का है, गाकर देखें,
यह गीत गजब का है, ढाकर देखे,
यह गीत जरा सूने में लिक्खा था,
यह गीत वहाँ पूने में लिक्खा था,
यह गीत पहाड़ी पर चढ़ जाता है,
यह गीत बढ़ाए से बढ़ जाता है !

यह गीत भूख और प्यास भगाता है,
जी, यह मसान में भूख जगाता है,
यह गीत भुवाली की है हवा हुजूर,
यह गीत तपेदिक की है दवा हुजूर,
जी, और गीत भी हैं, दिखलाता हूँ,
जी, सुनना चाहें आप तो गाता हूँ !

जी, छंद और बे-छंद पसंद करें,
जी, अमर गीत और ये जो तुरत मरें !
ना, बुरा मानने की इसमें क्या बात,
मैं पास रखे हूँ कलम और दावात
इनमें से भाएँ नहीं, नए लिख दूँ,
मैं नए पुराने सभी तरह के
गीत बेचता हूँ,
जी हाँ, हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ !
जी गीत जनम का लिखूँ, मरण का लिखूँ,
जी, गीत जीत का लिखूँ, शरण का लिखूँ,
यह गीत रेशमी है, यह खादी का,
यह गीत पित्त का है, यह बादी का !
कुछ और डिजायन भी हैं, यह इल्मी,
यह लीजे चलती चीज नई, फिल्मी,
यह सोच-सोच कर मर जाने का गीत !
यह दुकान से घर जाने का गीत !
जी नहीं दिल्लगी की इस में क्या बात,
मैं लिखता ही तो रहता हूँ दिन-रात,
तो तरह-तरह के बन जाते हैं गीत,
जी रूठ-रुठ कर मन जाते है गीत,
जी बहुत ढेर लग गया हटाता हूँ,
गाहक की मर्जी, अच्छा, जाता हूँ,
मैं बिलकुल अंतिम और दिखाता हूँ,
या भीतर जा कर पूछ आइए, आप,
है गीत बेचना वैसे बिलकुल पाप
क्या करूँ मगर लाचार हार कर
गीत बेचता हूँ।
जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ !

Friday, 6 December 2013

मैं स्त्री हूं, मुझे संभाल कर रखिए : किरण सिंह

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की लेखिका किरण सिंह की कई रचनाएं पुरस्कृत हो चुकी हैं. कविता संग्रह 'सूर्यांगी' के लिए उनको महादेवी वर्मा पुरस्कार दिया गया था. उनकी इस टिप्पणी से समूची आधी दुनिया का दर्द और स्वाभिमान सार्थक-सशक्त हस्तक्षेप की तरह सामने आता है कि मै स्त्री हूं और हिन्दी में लिखती हूँ. मैं एक लुप्त होती प्रजाति हूँ. मुझे संभाल कर रखिए. इन शब्दों के साथ उन्होंने ताजा-ताजा अपना यह प्रेरक बयान साझा किया है, सविस्तार, कुछ इस तरह.... 'मैंने कहानियाँ लिखना क्यों शुरु किया? इसलिए क्योंकि मैं आत्मकथा नहीं लिखना चाहती थी. आत्मकथा की शर्त है-सत्य और मेरे जीवन के सत्य दुधारी तलवार जैसी है. कहानियाँ लिखने की एक वजह यह भी थी कि मेरी ससुराल में सभी को थोड़ी बहुत कविता लिखनी आती थी. शिवमंगल सिंह सुमन और अदम गोंडवी मेरे ससुर के अच्छे परिचितों में से थे. मैं जो कविताएँ लिखती उसे बारी-बारी से, मेरे ससुराल में सभी सुधारते थे.
' छन्द-लय के अलावा यह भी देखा जाता कि तथाकथित आपत्तिजनक शब्द या भाव तो नहीं है जिससे उनकी बहू को समाज में गलत समझ लिया जाए. जैसे मैने यह दोहा लिखा, "बरसे रस की चाँदनी/भीगे उन्मन अंग/श्याम पिया मैं श्वेत हूँ/रैन दिवस एक संग. दोहा पढ़ने के बाद सासू-माँ दो दिन तक अनमनी रहीं. तीसरे दिन रहा न गया. पूछती हैं, लेकिन मेरा बचवा (उनका बचवा यानी मेरा आदमी)... मेरा बचवा तो झक गोरा है... फिर ये पिया...साँवले? मेरा पहले से तैयार जवाब था, अरे अम्माजी आप भी न! कृष्ण, भगवान कृष्ण! अच्छा आँ...हाँ ! वो अक्सर इत्मीनान की साँस लेती हैं. अम्मा-पिताजी यानी मेरे सास-ससुर मुझे कवि सम्मेलनों ले जाते. सबसे परिचय करवाते, सबसे कहते कि वे अपनी बहू को आगे बढ़ाना चाहते हैं.
'मैं अम्मा-पिताजी से क्षमा माँगते हुए कहना चाहती हूँ. एक बार कुछ बच्चों ने देखा कि एक चिड़िया अपने अंडे से बाहर निकलने के लिए छटपटा रही है. उन्होंने अंडे को तोड़ा. चिड़िया को निकाला. उसके चिपचिपे पंखों को पोंछा और उसके नीचे एक मुलायम कपड़ा बिछा कर पानी-दाना रख दिया. अगले दिन बच्चे दौड़ते हुए चिड़िया के पास गए तो वह चिड़िया मर चुकी थी. अंडे से बाहर निकलती हुई चिड़िया को जो संघर्ष करना पड़ता, उसमें उसके पंख मजबूत होते और वह बाहरी दुनिया के थपेड़ों का सामना कर पाती. रक्षा में हत्या हो गई. मेरी वे जड़ किस्म के भावबोध की कविताएँ कहीं नहीं छपती थीं. कविताएँ घर में पढ़ी जाएँगी यह सोचकर मैं अपने को सेंसर करते हुए डर-डर कर लिखती थी. मैं कोई संतुलित राह निकालने में असफल रही और मेरे भीतर की कवयित्री की अकाल मृत्यु हो गई. मैंने कुछ भी लिखना इसलिए शुरु किया क्योंकि मेरी एक खिड़की थी. जो मुझसे छिन गई. उसके बाद मेरा रहना एक ऐसे कमरे में हुआ जिसमें अँधेरा रहता था. घोर सामंती परिवार में मेरा जन्म हुआ. मेरा नाम पड़ा इतवारी और मुझसे पाँच दिन पहले पैदा हुई बुआ का नाम पड़ा सोमवारी.
'जब पाठशाला में नाम लिखाने की बारी आई तो मास्साब के कहने पर शहराती नाम रखा गया. मेरा नाम हुआ किरन क्योंकि मै इतवार की सुबह की किरन के साथ जन्मी थी और बुआ का तीजा क्योंकि वो तीसरी संतान थीं. साहित्यिक समाज से रिश्ता जुड़ा तो मेरा नाम छपने लगा किरण सिंह. उधर बुआ की शादी ऐसे परिवार में हुई जिनके परिवार के एकाध लोग शौकिया डकैत थे तो बुआ का ससुराल में नामकरण हुआ तिजा सिंह की जगह तेजा सिंह. मेरे पिता पढ़ने के लिए और नौकरी के लिए गाँव से बाहर निकले जरुर लेकिन परिवार से इस वादे के साथ कि वे शहर जाकर बिगड़ेंगे नहीं. इसलिए उन्होंने सांमती संस्कारों को और दृढ़ता से निभाया. पिता की वकालत जमने लगी तो हम गाँव से कस्बे में आए. मेरे कस्बे के उस मकान में मुकदमा लड़ने वालों, जच्चा-बच्चा, पढ़ने और परीक्षा देने वालों की भीड़ लगी रहती. माँ मेरे कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर के अपना काम करती रहती थीं. मेरे कमरे में एक खिड़की थी जिसके बाहर पोखर था. मैं खिड़की के पास बैठी अपनी कोर्स की किताबें पढ़ती और बाहर देखती रहती.
'उस खिड़की पर वह जाली लगी थी जिससे भीतर से बाहर तो देख सकते थे लेकिन बाहर से भीतर नहीं दिखाई देता था. संझा कहानी में यह खिड़की है. मेरे कस्बे का एकमात्र कॉलेज कई दिनों तक छात्रों फिर कर्मचारियो के हड़ताल में या हड़ताल के दौरान तोड़े गए फर्नीचर की मरम्मत में या फिर छात्रसंघ के चुनाव में बन्द ही रहता था. कॉलेज खुलता तो कई दफा चाचा लोग आकर कह देते फलां गुरुजी नहीं आए हैं जाने का कोई काम नहीं है. बारहवीं के बाद कॉलेज जाना कभी-कभी हुआ. वह खिड़की मेरा सहारा थी. एक दिन उस खिडकी की जाली में छेद करके एक प्रेम पत्र खोंस दिया गया था. उस चिट्ठी में लिखा था 'हँसी तो फँसी'. दरअसल एक लड़का हरे रंग की पैंट और लाल बुशर्ट पहनता था. वह अपनी दबंगई के किस्से ऊँची आवाज में लड़कियों के कॅामन रूम के आगे सुनाया करता था. एक दिन मैंने उसकी ओर देख कर सहेलियों कहा, "तोता!" और हँस पड़ी. मेरी माँ जो मेरी सबसे अच्छी सहेली थी, अपनी उस गलती के लिए बहुत दिनों तक पछताती रही. दो-चार और चिट्ठियाँ हुईं तो माँ ने उस लडके के डर से चिट्ठियाँ पिताजी को दे दीं. मेरी कोठरी बदल दी गई.
'अब मुझे बीच वाली कोठरी में रहना था जिसमें अँधेरा और सीलन रहता था जिसकी खिड़की रसोई में खुलती थी. रसोई का धुआँ कमरे में भर जाता था. एकांत और अँधेरे के उन कई सालों में मेरा व्यक्तित्व सामान्य नहीं रह गया. माँ मुझे काम नहीं करने देती और कहती कि तुम बस पढ़ो और निकलो इस जगह से. मेरे पास बहुत सारा खाली समय होता था जिसमें मैं देखे-सुने को सोचती रहती और एक काल्पनिक दुनिया की रचना करती. इस तरह मुझमें विचार की शक्ति आई और मेरी कल्पना शक्ति बहुत बढ़ गई. नुकसान यह हुआ कि उजाला मुझे चुभता है, समायोजन में कठिनाई होती है, सभा-सम्मेलनों मैं अनायास किनारे चली जाती हूँ और लोगों को ऐसे देखती हूँ जैसे वे. बस इतना जान लीजिए कि मेरे लिए कहानी वह आग है जो जंगल की आग को बुझाने के लिए लगा दी जाती है. मैं अपने को और दूसरों को नष्ट करने वाला मानव बम नहीं बनना चाहती. मैंने अपने क्रोध को रचनात्मकता में तब्दील किया है. मेरी कहानियाँ सामंती सोच वाले समाज से मेरा रचनात्मक प्रतिशोध हैं. मेरा व्यक्तिगत मत है कि स्त्री की अधिकांश क्रिया प्रितिक्रिया होती है.
' स्त्री या तो रक्षात्मक रहती है या आक्रामक. वह सहज मनुष्य नहीं रहती. मेरे लिए कहानी, विकटतम स्थितियों में भी जिन्दगी जीने का लालच है. मैं अपनी कहानियों की शुरुआत नहीं जानती लेकिन अंत जानती हूँ. विकटतम स्थितियों में भी मेरी नायिकाएँ न हारेंगी न मरेगी. वह डरेगी लेकिन वह लड़ेगी. न दैन्यं न पलायनम्. मनुष्य से इतर किसी भी शक्ति में मेरा विश्वास नहीं.'

अपने खिलाफ फतवे पर तसलीमा हैरान

बांग्लादेशी मूल की विवादित लेखिका तसलीमा नसरीन ने अपने ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज किए जाने पर हैरानी जताते हुए कहा है कि मैं नहीं जानती, मेरे ख़िलाफ़ एफ़आईआर क्यों दर्ज की गई है. मैंने तो सिर्फ़ सच बोला था. असल में 2007 में उलेमा ने फ़़तवा जारी कर मेरे सिर पर ईनाम रखा था. मैंने इसी बारे में ट्वीट किया था. अब उन उलेमा का कहना है कि मेरी ट्वीट से उनकी भावनाएं आहत हुई हैं. मैं चकित हूँ क्योंकि मैंने कुछ भी ग़लत नहीं कहा है? क्या भारत इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति कठोर हो रहा है. तसलीमा कहती हैं कि मुझे नहीं लगता कि भारत एक कठोर या असहिष्णु देश है, लेकिन कुछ लोग अभी भी असहिष्णु हैं, ख़ास कर धार्मिक कट्टरपंथी. वे लोगों का उत्पीड़न करने की कोशिश करते हैं. ये लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में यक़ीन नहीं रखते हैं. मैं भारत को प्यार करती हूँ और उन लोगों का सम्मान करती हूँ जो मानवाधिकारों में यक़ीन रखते हैं. यहाँ के क़ानून बहुत अच्छे हैं. मैं जो भी लिखती हूँ मानवाधिकारों के लिए लिखती हूँ. मैं सिर्फ़ इस दुनिया को बेहतर बनाना चाहती हूँ. लोगों को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करने के लिए मैंने अपने जीवन का त्याग किया है.
वह कहती हैं कि यह अच्छी बात है कि अब हमारे पास इंटरनेट है. हम खुलकर अपनी बात रख सकते हैं और कोई हमारे लेखन, राय या विचारों को सेंसर नहीं कर सकता. यह एक खुले समाज के लिए बहुत अच्छा है. सभी लोग अपनी राय रख सकते हैं. एक सभ्य समाज में अपनी राय रखने के लिए किसी को सज़ा नहीं दी जानी चाहिए, भले ही उसकी राय कुछ भी हो.
तसलीमा नसरीन के ख़िलाफ़ उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िले में सूचना प्रौद्योगिकी क़ानून के तहत एफ़आईआर दर्ज की गई है. यह एफ़आईआर बरेली के एक प्रमुख मुस्लिम धर्मगुरु की शिकायत पर दर्ज की गई है. आरोप है कि तसलीमा नसरीन की ट्वीट से मुसलमानों की भावनाएं आहत हुई हैं. उत्तर प्रदेश पुलिस के मुताबिक एफ़आईआर दरग़ाह आला हज़रत के मौलाना सुब्हानी मियाँ के बेटे हसन रज़ा ख़ाँ नूरी की ओर से दर्ज कराई गई है. शिकायत में कहा गया है कि तसलीमा ने हाल ही में अपनी ट्वीट में मुस्लिम उलेमाओं को अपराधी कहा जिससे मुसलमानों की भावनाएं आहत हुईं.
फ़ेसबुक पर भड़काऊ टिप्पणियाँ करने के आरोप में सामाजिक कार्यकर्ता शीबा असलम फ़हमी के ख़िलाफ़ हाल ही में एफ़आईआर दर्ज़ की गई.
तसलीमा नसरीन के ख़िलाफ़ सूचना प्रौद्योगिकी क़ानून की धारा 66ए के तहत मामला दर्ज किया गया है. इससे पूर्व अक्टूबर 2012 में तमिलनाडु के एक व्यापारी को वित्त मंत्री पी चिदंबरम के बेटे पर टिप्पणी करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया. नवंबर 2012 में शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे की मौत से जुड़ी टिप्पणी करने पर पालघर की दो लड़कियों को गिरफ़्तार किया गया. हालांकि व्यापक विरोध के बाद में मामले हटा लिए गए. अगस्त 2013 में उत्तर प्रदेश के दलित लेखक कँवल भारती को समाजवादी पार्टी सरकार पर टिप्पणी करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया. दिल्ली की एक अदालत के आदेश पर अक्टूबर 2013 में फ़ेसबुक पर भड़काऊ टिप्पणियों के आरोप में सामाजिक कार्यकर्ता शीबा फ़हमी के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई. तसलीमा पर इससे पहले भी मामले दर्ज हुए हैं. उन्हें जान से मारने तक की धमकियाँ मिली हैं. तो क्या इस एफ़आईआर के बाद तसलीमा के लेखन में बदलाव आएगा.
तसलीमा कहती हैं कि मुझे जो सही लगता है, मैं उसे पूरी स्वतंत्रता से लिखती रहूंगी. मैं एक प्रजातंत्र में रहती हूँ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बराबरी में यक़ीन रखती हूँ. मैं कभी भी अपने आप को वो लिखने से नहीं रोकूंगी जिसे मैं सही मानती हूँ. मैं हमेशा से खुलकर लिखती रहूं हूँ. मुझे मेरे देश से बाहर भेज दिया गया. मैं निर्वासित होकर रह रही हूँ, फिर भी मैंने सच लिखने से कभी भी ख़ुद को नहीं रोका. (बीबीसी से साभार दिलनवाज़ पाशा की रिपोर्ट)

लड़कियां बोझ नहीं

रोमा राजपाल
बाल विवाह के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र की मुहिम को दक्षिण एशियाई देशों ने पीठ दिखा दी है. इस प्रस्ताव में 2015 तक बाल विवाह के मामले खत्म करने की बात है. दक्षिण एशिया में आज भी कम उम्र में ही लड़कियों की शादी हो जाना बड़ी समस्या है. यह कई बार पारंपरिक कारणों से तो कई बार शादी की उम्र को लेकर चले आ रहे रूढ़िवादी विचारों की वजह से होता आ रहा है. संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार समिति (यूएनएचसीआर) के अनुसार अगले दस सालों में 14 करोड़ से ज्यादा लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में हो जाएगी. इनमें से आधी दक्षिण एशियाई देशों में होंगी.
भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों में बाल विवाह गैर कानूनी है, लेकिन फिर भी इन्हें रोका नहीं जा सका है. यूनाइटेट नेशंस पॉपुलेशन फंड (यूएनएफपीए) की रिपोर्ट के अनुसार 2000 से 2010 के बीच करीब ढाई करोड़ लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में कर दी गई.
इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च के रिप्रोडक्टिव हेल्थ एंड इकोनॉमिक डेवलपमेंट विभाग की निदेशक प्रिया नंदा ने बताया, "दक्षिण एशिया में यह काफी आम है. जैसे ही लड़कियों का मासिक धर्म शुरू हो जाता है उन्हें शादी के लायक मान लिया जाता है." उनका मानना है कि इस तरह की सोच का सीधा सा मतलब यही है कि लड़की बड़ी हो गई तो उसे संरक्षण चाहिए. यह परिवार के मान सम्मान की बात होती है. यौन हमलों या शादी से पहले किसी के साथ स्वेच्छा से शारीरिक संबंध बना लेने का डर भी परिवारों पर हावी होता है. इसी दबाव में अक्सर माता पिता उनकी जल्दी शादी करना सही कदम मानते हैं.
बाल विवाह बंद करने के लिए यूएनएचसीआर ने एक प्रस्ताव रखा. इसमें दुनिया भर के देशों से इस संकल्प में सहयोग की मांग की गई. इथियोपिया, दक्षिण सूडान और यमन में बाल विवाह के मामले काफी ज्यादा हैं. इन देशों समेत कुल 107 देशों ने बाल विवाह के खिलाफ संकल्प लिया. भारत, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान अपने यहां बाल विवाह की उच्च दर के बावजूद भी इस संकल्प में शामिल नहीं हुए.
भारत में सामाजिक कार्यकर्ता कृति भारती ने कहा, "कई बार परंपराएं कानून पर भारी पड़ती हैं." वह कहती हैं भारत में गावों के बड़े बूढ़े ऐसे मामलों में कानून को ज्यादा मान्यता नहीं देते और क्षेत्रीय अधिकारी भी इन मामलों में आंखें मूंद लेते हैं. भारती को ऐसी लड़कियों के परिवार, आस पास के लोगों और कई बार राजनेताओं से भी आए दिन धमकियां मिलती हैं.
उनकी गैर सरकारी संस्था 'सारथी ट्रस्ट' बाल वधुओं को बचाने के लिए काम करती है. इस तरह के 150 मामलों में उनकी संस्था ने लड़कियों के बाल विवाह को कानूनी तौर पर रद्द करने में मदद की है. भारती ने डॉयचे वेले को बताया, "राजस्थान में यह प्रथा ज्यादा है और ऐसे में लोगों की मानसिकता बदलना बहुत मुश्किल है. इसी तरह से जबरदस्ती शादी कराने की एक परंपरा है 'मौसार'. परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु हो जाने की स्थिति में घर का माहौल बदलने के लिए लड़की की शादी 13 दिनों के अंदर कर देनी होती है. फिर चाहे उम्र शादी के लायक हो या ना हो."
दक्षिण एशिया में आमतौर पर शादी ब्याह बड़े पैमाने पर खर्चीले अंदाज में होते हैं. ऐसे में परिवार पर भारी आर्थिक बोझ आ पड़ता है. अकसर लोग इसके लिए कर्ज ले लेते हैं. शोध के अनुसार बाल विवाह के ज्यादातर मामले ग्रामीण इलाकों में ज्यादा हैं. नंदा ने डॉयचे वेले को बताया, इन इलाकों में दहेज के लेन देन का भी खूब चलन है. जैसे जैसे लड़की बड़ी होती जाती है उसके साथ दहेज की मांग भी बढ़ती जाती है. ऐसे में परिवार ज्यादा पैसे खर्च करने के बजाय लड़की की जल्दी शादी कर देना बेहतर समझते हैं.
इसके अलावा उन्होंने बताया लड़की की कीमत इस बात से भी आंकी जाती है कि उससे कितना काम लिया जा सकता है. समाज में यह सोच बरकरार है कि उसका ज्यादा फायदा लड़के के परिवार वालों को मिलना चाहिए. वे मानते हैं लड़की का बहुत दिन तक अपने माता पिता के घर पर रहने का क्या औचित्य है जब वह उन्हें फायदा नहीं पहुंचाने वाली? इस तरह की शादियां कई बार व्यापार की तरह होती हैं. मानव अधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच के हीथर बार ने कहा, "अफगानिस्तान में कम उम्र की लड़कियां किसान पिता पर चढ़े कर्ज की भेंट चढ़ जाती हैं. जब किसान अपना कर्ज नहीं चुका पाते हैं तो पैसे के बदले उन परिवारों में लड़कियों की शादियां करके कर्ज चुका देते हैं."
शिक्षा की कमी में ये लड़कियां गरीबी में जीवन गुजारती हैं और आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर हो जाती हैं. इसके अलावा उनके स्वास्थ्य पर बेहद खराब असर पड़ता है. इन लोगों को यह भी नहीं पता कि शरीर के पूरी तरह से तैयार हो जाने से पहले गर्भधारण उनके शरीर पर बुरा असर डालता है. कम उम्र में शादी हो जाने पर उनके साथ घरेलू हिंसा के भी काफी मामले होते हैं. यूएनएफपीए की रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया में कम उम्र में गर्भधारण और मां बनने की प्रक्रिया में होने वाली मौतें सबसे ज्यादा हैं.
हीथर बार इस बात पर जोर देते हैं कि इस समस्या से निपटने के लिए सबसे जरूरी है कि लोगों में इससे संबंधित कानून के प्रति जागरुकता पैदा की जाए. उन्होंने कहा, "सरकार को बहुत काम करने की जरूरत है. अफगानिस्तान में शादी कराने वाले मुल्ला ही ये नहीं जानते कि वहां लड़कों के लिए शादी की कानूनी उम्र 18 साल और लड़कियों के लिए 16 साल है."
जानकारों का मानना है कि इन सभी दक्षिण एशियाई देशों में कानून हैं लेकिन वे पूरी तरह से लागू नहीं हो पा रहे हैं. नंदा ने कहा, "समस्या बहुत गंभीर है और इसकी शुरुआत वहां से होती है जब लड़कियों को लड़कों से कम आंका जाता है. यह बहुत आम सोच है और इसे बदलने की जरूरत है." उनका मानना है सरकार को कुछ ऐसे रास्ते निकालने पड़ेंगे जिनसे हमारा समाज लड़कियों को बोझ की तरह देखना बंद करे.

बुद्ध का स्त्री विमर्श

शेषनारायण सिंह
बुद्ध ने नर्तकी अंबपाली का आतिथ्य स्वीकार किया. कुछ लोग इस तथ्य के आधार पर साबित करना चाहते हैं कि बुद्ध तत्कालीन पितृसत्तात्मक मूल्यों के विरुद्ध स्त्रियों के पक्षधर थे. बात ऐसी नहीं है. अंबपाली का स्वीकार उसी पितृसत्तात्मक मूल्यों के अधीन वेश्यावृत्ति को मान्यता प्रदान करना था. कहना न होगा कि बुद्ध ने जब संघ स्थापित किया तो शुरू में उन्होंने दासों की तरह महिलाओं को उसमें आने नहीं दिया, उन्हें संघ में आने से बार-बार मना किया, उन्हें उसमें जगह नहीं लेने दी. जहां एक ओर बुद्ध और अन्य दूसरे लोग स्त्रियों का संघ में आने और जीवन का दूसरा रास्ता अपनाने का विरोध कर रहे थे, वहीं आनंद, जो बुद्ध के चचेरे भाई थे, जैसे लोग भी थे जो स्त्रियों के संघ में आने दिए जाने का समर्थन और उसके लिए तर्क कर रहे थे. कहना होगा कि बुद्ध को रास्ता दिखाया आनंद ने. संघ में स्त्रियों के आने के लिए जिसने बार-बार प्रश्न उठाया वह आनंद की मां थीं, प्रजापति गौतमी. जहां-जहां बुद्ध जाते थे, वहां-वहां वे बुद्ध के पीछे-पीछे जाती थीं. आनंद ने बुद्ध से पूछा कि ‘अगर औरतें कोशिश करें तो क्या वे निर्वाण प्राप्त कर सकती हैं?’ जवाब में बुद्ध ने कहा-‘हां’, इस पर आनंद ने कहा कि ‘तब फिर आप उन्हें संघ में क्यों नहीं आने देते?’ क्योंकि निर्वाण प्राप्त करने के लिए संघ में आना जरूरी था।
सच तो यह है कि आनंद उस संपूर्ण प्रकरण में स्त्रियों का एकमात्र सुभेच्छु था जो इस सिद्धांत में विश्वास रखता था कि स्त्री और पुरुष समान रूप से निर्वाण के हकदार हो सकते हैं. बुद्ध की मृत्यु के बाद अनेक अवसरों पर इस बात के लिए आनंद की निन्दा की गई थी. प्रथमतः, महाप्रजापति गौतमी के मामले में संघ में प्रवेश के सवाल पर और द्वितीयतः रोती हुई माता के बुद्ध के अंतिम दर्शन के अवसर पर (चुल्लवग , पृष्ठ 411). संपूर्ण बौद्ध साहित्य में आनंद के अलावे किसी दूसरे व्यक्ति का उल्लेख तक नहीं मिलता जो स्त्रियों का पक्षधर हो. यह आनंद के व्यक्तित्त्व का मानवीय पहलू हो सकता है, लेकिन इस तरह का कोई उल्लेख शायद ही मिलता है, जिसके आधार पर कहा जा सके कि बुद्ध या बौद्ध धर्म स्त्रियों के प्रति उदार था. यहां अंगुत्तरनिकाय (खंड-२, पृष्ठ ७६) का वह प्रसंग उल्लेखनीय है जब आनंद स्त्रियों के दरबार में नहीं बैठने एवं शील-चर्चा के क्रम में उपस्थित नहीं रहने के प्रश्न पर बुद्ध से चर्चा करता है।
उस समय और उनके कायदे के अनुसार, इस प्रश्नोत्तर के क्रम में बुद्ध ने अंततः उन्हें संघ में आने दिया, लेकिन कायदे ऐसे बनाए कि संघ में भिक्षुणियों को भिक्षुओं के नीचे दबे रहना था। संघ को भिक्षु एवं भिक्षुणि इन दो संघों में बांटकर भिक्षु संघ को ऊपर का दर्जा दिया गया और भिक्षुणि संघ को उसके नीचे का। उन्होंने भिक्षुणियों के लिए दस शर्तें, नियम या कायदे बताए जिनके पालन के पश्चात ही औरतें संघ में आ सकती थीं। उनमें से एक बहुत ही चोट पहुंचानेवाला कायदा था कि चाहे जितनी भी वरिष्ठ भिक्षुणि हो उसके सामने चाहे जितना भी कनिष्ठ भिक्षु आ जाए, उसे उसको सलामी देनी पड़ेगी। भिक्षुणियों पर और भी कई सख्त प्रतिबंध थे। इसके साथ ही समान गलती के लिए भिक्षुओं की अपेक्षा भिक्षुणियों को अधिक सख्त दंड का भागी बनना पड़ता था। ऐसा आप कह ले सकते हैं कि यह औरत और मर्द के बीच स्थापित उच्च एवं निम्न के भेद को कायम रखने के लिए किया गया। इसका सीधा सा अर्थ था- औरतों को संघ के अंदर भी पुरुषों के दबाव में रखना।
स्त्रियों के प्रति बुद्ध के विचार को बौद्ध साहित्य में वर्णित गाथाओं के माध्यम से भी समझा जा सकता है। एक गाथा (कोलिय जातक,१३०) इस प्रकार शुरू होती है- ‘वह एक श्रद्धालु उपासक ब्राह्मण की ब्राह्मणी थी; बहुत दुश्चरित्र, पापिन। रात को दुराचार करती थी. ... ब्राह्मण घर आता तो (रोग का) बहाना बनाकर लेट जाती। उसके बाहर जाने पर ‘‘जारों’’ के साथ गुजारती। वह ब्राह्मण बुद्धदेव का भक्त था-‘‘उपासक’’. (गृहस्थ बौद्ध को उपासक कहा जाता है)। वह ब्राह्मण तक्षशिला का स्नातक था और वाराणसी का प्रसिद्ध आचार्य भी था। सौ राजधानियों के क्षत्रिय राजकुमार उनके पास पढ़ा करते थे (देखें, मोहनलाल महतो वियोगी, जातककालीन भारतीय संस्कृति , पृष्ठ १४८).
एक दूसरे ब्राह्मण की स्त्री भी घोर दुश्चरित्रा थी। ब्राह्मण भी अपनी पत्नी के अनाचार को जानता था। जब ब्राह्मण व्यापार के लिए जाने लगा तो अपने दो पालित पुत्रों को सचेत करता गया- ‘यदि माता ब्राह्मणी अनाचार करें, तो रोकना।’ पालित पुत्रों ने जवाब दिया- ‘रोक सकेंगे तो रोकेंगे, नहीं तो चुप रहेंगे।’ जातक कथा में यह वाक्य है- ‘उसके जाने के दिन से ब्राह्मणी ने अनाचार करना आरंभ किया। घर में प्रवेश करनेवालों और निकलनेवालों की गिनती नहीं रही। ब्राह्मण का वह घर क्या था, पूरा वेश्यालय! उसके धर्मपुत्र भी उदासीन रहकर सब कुछ देखते रहे’ (राधजातक , १४५).
राधजातक (१७९) के अनुसार, ‘एक ब्राह्मण ने दो तोते पाले। ब्राह्मणी व्यभिचारिणी थी। ब्राह्मण तोतों को निगाह रखने का आदेश देकर व्यापार के उद्येश्य से कहीं चला गया। मौका मिलते ही ब्राह्मणी ने खुलकर अनाचार करना शुरू कर दिया।’
पुनश्च, ‘किसी ब्राह्मण की पत्नी दुश्चरित्रा थी। एक नट को उसने घर में बुला लिया। ब्राह्मण घर से बाहर गया हुआ था। ब्राह्मणी ने नट को भात-दाल पकाकर खिलाया। वह जैसे ही खाने बैठा कि ब्राह्मण आ गया। नट को ब्राह्मणी ने छिपा दिया। ब्राह्मण ने भोजन मांगा तो नट की जूठी थाली में थोड़ा-सा भात डालकर ब्राह्मण के आगे घर दिया। ब्राह्मण खाने लगा। एक नट भिखमंगा, जो दरवाजे पर बैठा सब कुछ देख रहा था, ने ब्राह्मण से सारी कथा कह दी’ (उच्छिट्ठभत्त जातक , २१२).
एक गाथा ऐसी है जिसमें बतलाया गया है कि एक ब्राह्मणी युवती ने अपने तुरंत के ब्याहे महापराक्रमी पति का खून डकैत सरदार के हाथ में तलवार पकड़ाकर करा दिया। उन्चास तीरों से उन्चास डकैतों को उस पराक्रमी ने ब्राह्मण ने मार गिराया। पचासवां व्यक्ति था डाकू-सरदार। अब ब्राह्मण के पास तीर न था। उसने डाकू सरदार को पटक दिया और अपनी स्त्री से तलवार मांगी। स्त्री उस डाकू-सरदार पर पहले ही मुग्ध हो चुकी थी। उसने तलवार डाकू-सरदार को पकड़ा दी और उस डाकू ने ब्राह्मण पर वार कर दिया। डाकू-सरदार के पूछने पर ब्राह्मणी ने कहा, ‘मैंने तुम पर आसक्त हो अपने कुल-स्वामी को मरवा दिया।’ वह डकैत भी ब्राह्मण ही था; क्योंकि उस ब्राह्मणी ने उसे ‘बाह्मण’ कह पुकारा था-‘सब्बं भण्डं समादाय पारं तिण्णोसि ब्राह्मण।’ (चुल्लधनुग्गह जातक , ३७४).
एक ब्राह्मणी ऐसी थी जिसने अपने पति को भीख मांगकर धन जमा करने के लिए बाहर भेज दिया और खुद अनाचार में लिप्त हो गई। धन कमाकर ब्राह्मण जब लौटा, तब ब्राह्मणी ने उस धन को अपने उपपति को दे दिया (सत्तुभस्त जातक , ४०२).
जातकों में उल्लिखित तथ्य एवं निष्कर्ष से भी स्त्रियों की सामाजिक हैसियत एवं उसके प्रति बुद्ध के विचार पर प्रकाश पड़ता है. बुद्ध, बोधिसत्व के रूप में एक बार भी मादा योनि में जन्म नहीं लेते हैं. पशु या मनुष्य दोनों ही कोटि के जीवों में वे नर रूप ही धारण करते हैं. बुद्ध सदैव स्त्रियों को घृणित, दुर्गंधयुक्त एवं व्यभिचारी बताते पाये जाते हैं. ( डॉक्टर अशोक कुमार, बौद्ध परंपरा में स्त्रियों का स्थान , पोस्ट डॉक्टोरल थीसिस,आई .सी एच .आर .हेतु शोधरत). बुद्ध की स्पष्ट घोषणा है कि वह देश रहने योग्य नहीं है जहां स्त्री शासक है (कंडिन जातक ) . स्त्रियां आम तौर पर असंगत और पापिणी प्रकृति की होती हैं (असात्मंत्र जातक ). स्त्रियों की प्रकृति एवं चरित्र संदिग्ध है (अंडभूत जातक). बोधिसत्व लोक-प्रसिद्ध आचार्य के रूप में अपने शिष्यों को उपदेश देते हैं कि आमतौर पर स्त्रियां व्यभिचारिणी होती हैं. अतएव बुद्धिमान पुरुष के लिए यही उचित है कि उसकी प्रकृति को समझें, घृणा न करें। स्त्रियां उस धर्म-स्थल की नदी के समान होती हैं जहां साधु और चांडाल दोनों स्नान करते हैं (अनभिरत् जातक )।
जातकों के अलावे भी बौद्ध साहित्य में ऐसे अनेक प्रसंग आये हैं जो स्त्रियों के प्रति बुद्ध एवं बौद्ध धर्म के नजरिये को स्पष्ट करने में सहायक हो सकते हैं। कहना होगा कि सर्वत्र स्त्रियों को काला नाग, दुर्गंध, व्यभिचारिणी और पुरुषों को फांसनेवाली कहा गया है (अंगुत्तरनिकाय , खंड-1, पृष्ठ २६३). स्त्रियों को रहस्यमयी कहा गया है. स्त्रियां अपने दुर्गुणों एवं दुराचारी प्रवृत्ति के कारण सामाजिक कर्मों में हिस्सेदार नहीं हो सकती थीं। महत्त्वपूर्ण है कि स्त्रियों के संबंध में ये विचार किसी एक स्त्री को ध्यान में रखकर नहीं व्यक्त किये गये थे, बल्कि स्त्रियों की प्रकृति पर विचार करते हुए सामने आये हैं।
इस तरह, हम पाते हैं कि बौद्ध साहित्य में स्त्रियों के इर्द-गिर्द जिस तरह की घेराबंदी कर दी गई थी, उससे पूर्ववर्ती एवं परवर्ती ब्राह्मण साहित्य की मान्यताओं का अनायास स्मरण हो आता है, जहां स्त्रियां अपने पति और पुत्र की निगरानी में ही सुरक्षित रह सकती थीं। बौद्ध साहित्य भी इस बोध से परे नहीं है (अंगुत्तरनिकाय , खंड-२, पृष्ठ ७६). स्त्रियों की मूल भूमिका पति की विश्वासी सेविका की थी (वही, खंड-३, पृष्ठ २४४,३६१-६७). स्त्रियों के स्वतंत्र अस्तित्त्व एवं स्वतंत्र दायित्त्व के अस्तित्त्व की कल्पना का घोर अभाव उसे घर और पितृसत्तात्मक मूल्यों से ही बंधे रहने को प्रेरित करता था। स्वयं बुद्ध की नजरों में भी यह कल्पना से परे था कि कोई स्त्री तथागत या चक्रवर्ती भी हो सकती है (अंगुत्तरनिकाय , खंड-१, पृष्ठ २९).
अतएव विचारणीय प्रश्न है कि सामाजिक-धार्मिक जीवन में हिस्सेदारी से स्त्रियों को अलग/वंचित रखकर किस प्रकार बौद्ध धर्म स्त्रियों के प्रति उदार हो सकता था ?