Tuesday, 30 July 2013

यूडित और ऐस्तैर


 जिग़मोन्द मोरित्स

हम लोग निर्धन थे।
भिखारियों से भी बढक़र गरीब।
खानदानी लोगो का गरीब हो जाना, इससे बढक़र बोझ है कोई?
एक छोटे से गांव में जाकर समेट लिया था अपने आपको, जहां एक टुकडा भी जमीन का हमारा न था और भीनी सुगंध देने वाले पेड भी दु:ख का ही आभास दिलाते थे। सिर्फ हमारी यादों में बसे थे, हमारे पेड-पौधे, मवेशी, अस्तबल, और बडे-बडे ख़ंभों वाला महल जैसा घर, तीसा नदी के किनारे। जगत के दूसरे कोने में जाकर बस गये थे अपनी गरीबी को छुपाने के ख्याल से। फिर भी ऐसी जगह आ पहुँचे, जहां रिश्तेदार निकल आये। पिताजी ने सोचा, रिश्तेदार होना तो अच्छा ही है, जरूरत पडने पर कभी काम आ सकते है। लोग भी अच्छे है। परन्तु श्राप था रिश्तेदारों का होना।

यह संबंधी गांव की सीमा पर रहते थे सबसे बडे मकान में, जो काफी फ़ैला हुआ था और अपनी संकीर्ण खिडक़ियों से बाहर की दुनिया को देखता था। हमारे विशालकाय पुराने महल के मुकाबले में कहां था यह मकान! पर कैसी कडवी, दिल को दुखाने वालीर् ईष्या जगाता था हमारे मन में। विन्सै चाचा, दोहरी ठोडी, सख्त हाथों और बडी घनी भौंहो वाले हमारे रिश्तेदार थे और हमें नौकरों की तरह रखने की व्यर्थ कोशिश कर चुके थे। नाराज थे कि पिताजी ने उनके साथ किसी तरह के गैरकानूनी काम करने से इंकार कर दिया था। जलते भी थे, क्योंकि उनके दादा के समय से ही उनका संबंध हमारे पुराने नवाबी खानदान से अलग हो गया था, जबकि हमारे खानदानी हिस्से में नवाबियत देर तक चलती रही थी। यह बात और है कि अब हम एक पकी नाशपाती की तरह जमीन पर गिर पडे थे और धूल में मिल गए थे।

और अब औरतों के बारे में बताता हूं। मेरी मां का नाम यूडित था शिमोनकौय यूडित । उनकी नानी बडी ज़मींदार घराने की लडक़ी थी,जिनका संबंध संसार के मशहूर खानदानों तक जाकर जुडता था। और विन्सै चाचा (जो एक तरह से माली ही थे) की पत्नी चितकै ऐस्तैर थी,जिनके पिता औलफल्द (हंगरी का वह भाग जहां के घोडे मशहूर है) में किसी सईस के यहां मुनीम का काम करते थे और ऐसा भी कहा जाता था कि वह काम कम, दोनों हाथों से लूटते ज्यादा थे।

दोनों औरतें ऐसी थी, मानो तेज छुरियां। मेरी मां कभी शिकायत नहीं करती थी। एकदम जड सी हो गई थी और बिना आह भरे अपनी जिंदगी का बोझ ढो रही थै। लेिकन गांव में इसकी चर्चा थी कि मां के लकीरों वाले मखमली बक्से के अंदर पुराने छोटे-छोटे फूलों की कढाई वाले स्कर्ट, कीमती सिल्क और इसी तरह की पुरानी बेशकीमती चीजें अब भी उनके बीते हुए दिनों की याद बनाए रखने के लिए रखी गई है।शायद इसमें कुछ सच भी होगा, पर थोडा सा। मेरे पिता घर आते थे, कभी गालियां बकते हुए, कभी हंसते हुए, कभी उम्मीद लगाए हुए। हर व्यक्ति पर भरोसा कर लेते थे और हए एक से धोखा खाते थे। कई बार मां और पिताजी में काफी झगडा होता था।

मां ने अपने आप को अपने मे ही समेट लिया था, इसलिए शायद मैं एक शर्मीला डरपोक बालक बन गया था, जिसे मां और संसार के बीच बिचौलिया बनन पडता था। लोगों से डरता था, किसी के सामने आते ही यूं बाहर निकलता था जैसे कोई घोंघा, जो ज़रा सी हरकत होते ही वापस अपने खोल में सिमट आने को तैयार हो। फिर भी मुझे बाहर जाना ही पडता था लोगो के बीच। मैं अपने परिवार का प्रतिनिधि जो था गांव के सामने। मेरे पिता तो अधिकतर घर पर होते नहीं थे और मां! वो तो घर के आंगन तक पैर नहीं रखती थी, जब तक बिल्कुल ही जरूरी नहीं हो जाता था। केवल मैं घर से बाहर निकलता था - स्कूल के लिए, दुकान की ओर और दूध के लिए।

दूध, हमारी छोटी सी जिंदगी की सबसे बडी क़मी। और कई मुसीबतों के बीच जिन पर हमें उलझन होती थी, यह मेरे लिए सबसे अधिक दु:ख का कारण था। मुझे दूध बहुत पसंद था और हमारे पास गाय नहीं थी। गांव में दूध मिलता नहीं था, कभी-कभी पैसे से भी नहीं, क्योंकि दूध तो बडे बाजारों में शहरों में बेचने वाली चीज थी। और पूरे गांव वालों के बीच लाइन में खडा होकर दूध खरीदने का विचार यूं भी दिल दहलाने के लिए काफी था। हां अगर मां अधिक बोलने वाली होती और पडोस की औरतों की चटपटी, बेबुनियाद बातों को सुन सकती थी तो दूध के लिए मुझे नहीं जाना पडता। दूधवालियां घर पर ही पहुंचा जाती। पर ऐसा संभव नहीं था। और इसके लिए मुझे अहंकार भी था मां पर,क्योंकि वे चाहे गरीब थीं ; पर सुंदर और अभिमानी थी।

क्रि्रसमस की एक शाम इस दूध के कारण हमारे साथ एक बडा हादसा हुआ। मैं पूरे गांव का चक्कर लगा आया था, अपने हाथों में सफेद भूरे पैसे पकडे ड़रते हुए। हे भगवान् कहीं से एक गिलास दूध मिल जाये। पर हर तरफ लोग त्योहार के कारण खुले दिल से खर्च कर रहे थे। मेरे सामने बडे-बडे पतीलों में, तीन पैरों वाले मिट्टी के बर्तनों में दूध की खरीद-फरोख्त हो रही थी, पर मेरे मांगने पर तेज आंखो वाली पैसे की लालची गांव की औरतें अपना हाथ झाड देती और अपनी कमर पर कोहनियां जमाकर खडी हो जाती थी और दुखडा रोने लगती थी, '' बेटा है नहीं। दे नहीं सकते। दूध जमा करना है। त्योहार आने वाला है। पकवान बनाने है, बडे बाजार में बेचने जाना है, वहां दूध के अच्छे पैसे मिल जायेंगे।

थका हुआ बुडबुडाता हुआ घर पहुंचा, ''नहीं मिला, कोई नहीं देता।'' मां की बर्डीबडी क़ाली आंखे और बडी हो गई, बस यूं चमकी। वे न बोली,न उन्होने आह भरी, न उनके आंसू निकले। मगर मैं दुबक कर ऐसे बैठ गया, मानो एक छोटा चूहा, ऐसा महसूस कर रहा हो, मानो अभी बिजली गिरेगी। मां भी पकवान बनाना चाहती थी, मैदा दूध से गूंधना था, पर बोली कुछ नहीं। पानी का बर्तन लाई और पानी से ही गूंधने लगी। मैं पलक झपकाये बगैर देखता रहा। बाहर अंधेरा तेजी से बढ रहा था। जैसे ही मां ने मैदा सानना शुरू किया, मेरे दिमाग में एक बहुत साहसी विचार पनपा,

'' मां!'' मां ने मेरी तरफ आंख उठाई, मैने अपना विचार उनके सामने रखा,'' मैं ऐस्तैर चाची के यहां जाऊं।''

मां ने पलक भी न झपकाई, हालांकि मैने बहुत बडी बात कह दी थी। अगर इस वक्त अलमारी पर चमकती हुई पीतल से मढी बाइबल अपने-आप अचानक उडक़र मेरे सर से टकरा जाती तो भी मैं इतना हैरान नहीं होताऐस्तैर चाची से हमने कभी कुछ नहीं मांगा था, चाहे भूख से हम मर ही क्यूं न रहे हो। उनके पास छ: गायें थी और हमारे घर में तीन-तीन दिन तक एक चम्मच दूध भी नहीं होता था। रोज आलू का सूप बनाकर पी लेते थे। अब तक मेरा दिल थोडे से दूध के लिए टूट ही चुका था। खिडक़ियों पर बर्फ चमकने लगी थी, सूर्य की किरणें भूरे रंग की हो चुकी थी। मां गूंधती रही, गूंधती रही, फिर अचानक बोली, ''जा।'' मैने सोचा शायद मैने ठीक से नहीं सुना हैं। एक क्षण को रुका,फिर मेज पर से पैसे उठाये और पकड क़र तेजी से भागा। फिर एक बार दरवाजे पर ठिठका, रुका, मां की ओर फिर से मुडक़र देखा,''जाऊं?''
'' जा।''

पूरे रास्ते मेरा दिल धडक़ता रहा, कहीं कुत्ते न पकड लें। कितना घबराता था मैं उनसे। मगर रास्ते-भर इतने खूंखार कुत्तों से सामना नहीं हुआ, जितना रिश्तेदारों के अहाते में। एक नौकरानी सामने से आई और उसने मुझे कुत्तों से बचाया।

'' ऐस्तैर चाची कहां है?''

भडक़ीले कपडे पहने वो नौकरानी शायद कुछ उदास सी थी और कुछ गुस्सा भी, ''उधर हैं पशुओं के बाडे क़ी ओर,'' गुर्राकर बोली, मानो अपने कुत्तों की तरह अपने पैने दांत मुझमें गडाना चाहती हो। मैं सहमा सा, धीरे-धीरे, आधा ध्यान कुत्तों की ओर लगाए बाडे क़ी तरफ बढा। पैरों को यूं दबाकर रखता हुआ कि पत्ते तक के खडक़ने की आवाज न सुनाई दे पैरों तले। बाडे क़े दरवाजे पर गहरा कोहरा छाया हुआ था। अचानक मैं रुक गया, मानो बर्फ क़ा छोटा का पुतला बनकर रह गया हूं। बाडे में से अजीब सी आवाजें आ रही थी।

'' छोडो मुझे।'' ऐस्तैर चाची की आवाज सुनाई दी,पर ऐसे जैसे चिल्लाना चाह रही हों।कुछ झगडा सा सुनाई दिया। फिर कोई तख्त या कोई चारा रखने के लकडी क़े बक्से की चिरमिराने की आवाज सुनाई दी।
'' बदमाश!'' ऐस्तैर चाची हांफते हुए बोली,'' सुअर, बदमाश!''

कोई मर्दानी हंसी सुनाई दी, हलके से हिनहिनाते हुए। मैं पहचानता था यह आवाज। उनके ड्राइवर की थी, फैरी पाल की, जिनके बारे में मैंने सुना था कि वो चाची की नौकरानी की वजह से यहां काम करने लगा था।

'' क्या चाहते हो?'' फुर्सफुसाकर चाची बोली।
'' आओ ना!'' पाल बोला। फिर शांति हो गई।

मैं ऐसे खडा रहा, मानो एक प्रतिमा। एक जडी हुई, अजीब सी, एक छोटी सी बाल प्रतिमा, पर मुझे इस बातचीत का एक शब्द भी समझ में न आया।

'' जाने दो।'' फुसफुसाकर फिर से चाची बोली।
'' आओ, अगर नहीं आई तो मैं बाडा जला दूंगा। मुझे पागल न बनाओ....जब प्यास जगायी है तो बुझाओ भी तो।''

बाडे में हलचल हुई और चाची तेजी से बाहर दौडी। ज़ब उन्होने डरते हुए, फटी-फटी आंखे लिए दरवाजे पर कदम रखा तो फौरन उनकी निगाह मुझ पर पडी। समझीं कि मैने सब कुछ देख, सुन और समझ लिया। इससे वे बेहद डर गई।

'' क्या चाहिए?'' मेरी ओर कातिलाना नजर डालती हुई बोली।
'' मेरी मममां ने।'' मै हकलाते हुए बोला,'' आपको सलाम भेजा है और एक जग दूध आपसे लाने को कहा है।''
'' नहीं है।'' वो चिल्लायी।

लगा जैसे मैं लडख़डा गिर जाऊंगा। इसके साथ ही वो घर की तरफ बढ ग़ई। मेरे दिमाग में एक अक्ल की बात कौंधी, ''पैसे से ले लेना चाहता हूं।'' मै चिल्लाया, जिससे मैं खुद भी अचंभित हो गया।
वे फिर मुडी, ज़ैसे एक दांत गडाने वाले कुत्ते से अपने आप को बचाने की कोशिश में आदमी।'' जब कह दिया न, नहीं है।'' और कहकर आगे बढ ग़ई। उसके बाद फिर से मेरी ओर देखा, ''मुझे तीन तंदूर भरकर दूध की रोटियां बनानी है।''

मुझे अपनी पीठ के पास किसी के जोर से ठट्ठा लगाने की आवाज सुनाई दी। फैरी पाल मेरे पीछे खडा था और मुझे अब ऐस्तैर चाची पर इतना क्रोध नहीं आ रहा था जितना उस जानवर पर। मैं उबलता हुआ घर लौटा। दरवाजे पर देर तक खडा रहा, जब तक दरवाजा खोलने की हिम्मत मुझमें नहीं आ गई। मां ने तेल की लालटेन जला ली थी। इस गांव में शीशे की लालटेन इस्तेमाल करते थे घरों में भी, जैसी अस्तबलों में की जाती है। मै अच्छी तरह जानता था कि लालटेन में तेल नहीं है और न अब शीशी में बचा है। मैने पैसे मेज पर रख दिए और बडबडाया,'' वे नहीं दे सकती, उनके पास है नहीं।''

मां सीधी खडी हो गई, सख्त बन गई। मैं प्रतीक्षा में था कि अब चिल्लायेगी, फटकारेंगी, पर कुछ न बोली, कुछ भी न बोली। माथे पर पसीना अच्छे से पोछा और बस कहा,'' ठीक है।''

उदास बोझिल शाम थी। हम दोनो में से कोई कुछ नहीं बोला। मैं एकटक लालटेन की बत्ती को ताकता जा रहा था, लंबे धुएं की लकीर को,बुझती हुए लौ को और सोच रहा था कितना तेल खाती है यह लालटेन, कि फिर से एक बूंद भी तेल नहीं बचा है बोतल में। यह भी सोच रहा था कि क्रिसमस पर तो कम-से-कम पिताजी घर आ जाते, त्योहार के लिए। पर उनके लिए अच्छा ही है कि न आयें, क्योंकि उनको हमारी यह भारी गरीबी देखनी अच्छी नहीं लगेगी। वे तो जब जाते है तो बडे आदमियों के साथ ही बैठते है, क्योंकि व्यापार का जुगाड ऐसे ही लोगो के साथ बन सकता है, पर ऐसा दिखता है कि उनके साथ भी अब नहीं होगे। बिना पैसे खर्च किये पैदल घर के लिए चल दिए होंगे।

जल्दी ही मैं लेट गया। उस वक्त भी कुछ दिमाग में नहीं आया, सिवाय इस तरह के गंभीर बडे लोगो वाले विचारों के। रात गहरी हो चुकी थी,जब किसी ने खिडक़ी जोर से खटखटायी।

'' यूडित, यूडित!'' हमें सुनाई दिया।
'' ऐस्तैर!'' मां चिल्लाई,'' तुम हो क्या?''
'' मै हूं। भगवान के लिए अंदर आने दो।''

मां ने उसको अंदर आने दिया। मैं पलंग पर सहमा सा लेटा रहा। ठंड खाता रहा। एक माचिस के जलने की आवाज सी आई पर वो जली नहीं। चाची डरी हुई आवाज में फुसफुसाने लगी,'' अरे मत जलाओ, अगर मेरी मौत नहीं चाहती। मेरे लिए पलंग ले आओ। मेरा वक्त आ गया है।''

मां ने पिताजी का पलंग बिछा दिया, चाची उसपर लेट गई। उन्ही कपडों में। केवल एक दफा अचानक चिल्ला पडी, ''हाय मुझे छुओ मत, दर्द होता है। मैं बुरी तरह से घायल हूं।'' रोते-रोते उछलकर बैठ गई,'' मुझे पीटा, बुरी तरह से पीटा। तुम्हारे अलावा और किसी के पास जाती तो इस बात का पूरे गांव में ढिंढ़ोरा पिट जाता।''

मैने आंख फाडक़र देखना चाहा, पर कुछ भी नहीं दिखा। लगा मां वहां है ही नहीं। कोई आवाज नहीं हो रही रही थी।
धीमे-धीमे सिसकती रही चाची,'' मैं, मैं पगली बेवकूफ! रंगे हाथों पकडी ग़ई।'' दांत पीसकर बोली,'' ऐसा मारा मुझे कि बाहर आंगन में गिरी।एक घंटे तक वहीं ठंड में पडी रही। जाती भी कहां। दरवाजा तो उसने बंद कर लिया था। केवल तुम्हारे पास आ सकती थी। अगर कहीं और जाती तो मेरा अंत हो जाता। तुम्हारे अलावा कोई भी मेरा हाल सब जगह सुना देता।'' कराहती रही, सिसकती रही, और रोती रही,'' मैं जानती थी तुम्हारे पति घर पर नहीं है और इसके अलावा तुम तो वैसे भी जानती ही हो।''
'' मैं?'' मां बोली।
'' बताया नहीं बच्चे ने?''

मै शायद चक्कर खाकर पलंग से गिर ही जाता।

मां बोली, उस रौबीली शांत आवाज में, जिससे मैं भी कांपता था और पिताजी भी घबरा जाते थे, '' मेरा बच्चा ऐसी बातें नहीं करता।''

ऐस्तैर चाची एकदम शांत हो गई। उसके आगे एक शब्द नहीं बोली, न रोयी न सिसकी। मां लेट गई और मैं जो उसके पैरों पर लेटा था ऐसा महसूस कर रहा था, मानो वह बर्फ सी ठंडी थी।

सुबह जब मैं सोकर उठा सब कुछ तरतीब से लगा था। तंदूर गर्म हो चुका था। मां काम में लगी थी। मैने कपडे पहने और नाश्ते का इंतजार करने लगा। इसी समय ऐस्तैर चाची की नौकरानी अंदर आई। बडी चहक रही थी। वैसी गुस्सैल और खूंखार नहीं थी जैसे पिछली शाम को।मुस्कराते हुए बोली,'' मेरी मालकिन ने एक मटका दूध भेजा है। शाम को जितना दूध दुआ गया सब यही है। केवल ऊपर की क्रीम निकाली है जो पेस्ट्री बनाने में इस्तेमाल करनी है हमें।''
'' ठीक है सूजन, अपनी मालकिन से मेरा धन्यवाद कहना....और रुको, उनके लिए यह कान के बुंदे लेती जाओ, यादगार के लिए पहन ले।''

मां ने मखमली बक्सा खोला और उसमें से सबसे खूबसूरत बुंदे निकालकर दे दिये। मैं दूध को शायद सबसे कीमती समझता था। क्योंकि जिस प्रकार सूजन बुंदो को देखकर विभोर हो रही थी, उसी दिलीखुशी के साथ मैं उस शक्तिशाली मटके को देख रहा था। इंतजार में था कि फिर से एक बार नाश्ते में दूध पीऊंगा। पर मां ने वो मटका उठाया और शांति से, आराम से, उसे बर्तन धोने वाली जगह पर उडेलना शुरू कर दिया।हमारे पास जो इकलौता भालू था शायद उसके लिए। मेरा रंग फीका पड ग़या और भयानक डर से मेरा खून सुखा दिया मानो। मां ने मेरी तरफ देखा। चौंक गई और हाथ एक क्षण को ढीला पड ग़या। दूध को उंडेलने की गति मध्दम पड ग़ई। अंत में लम्बी सी आह भरी। जैसे उनके हृदय को चोट सी लगी। दु:ख भरे खूबसूरत चेहरे पर एक आंसू ढुलक आया।

बोली, ''ला बेटे अपना कप मुझे दे दे।''

गँजहों के गाँव का लोकतंत्र


श्रीलाल शुक्ल

तहसील का मुख्यालय होने के बावजूद शिवपालगंज इतना बड़ा गाँव न था कि उसे टाउन एरिया होने का हक मिलता। शिवपालगंज में एक गाँव-सभा थी और गाँववाले उसे गाँव-सभा ही बनाए रखना चाहते थे ताकि उन्हें टाउन एरियावाली दर से ज्यादा टैक्स न देना पड़े। इस गाँव-सभा के प्रधान रामाधीन भीखमखेड़वी के भाई थे जिनकी सबसे बड़ी सुंदरता यह थी कि वे इतने साल प्रधान रह चुकने के बावजूद न तो पागलखाने गए थे, न जेलखाने। गँजहों में वे अपनी मूर्खता के लिए प्रसिद्ध थे और उसी कारण, प्रधान बनने के पहले तक, वे सर्वप्रिय थे। बाहर से अफसरों के आने पर गाँववाले उनको एक प्रकार से तश्तरी रख कर उनके सामने पेश करते थे। और कभी-कभी कह भी देते थे कि साहेब, शहर में जो लोग चुन कर जाते हैं उन्हें तो तुमने हजार बार देखा होगा, अब एक बार यहाँ का भी माल देखते जाओ।

गाँव-सभा के चुनाव जनवरी के महीने में होने थे और नवंबर लग चुका था। सवाल यह था कि इस बार किस को प्रधान बनाया जाए? पिछले चुनावों में वैद्य जी ने कोई दिलचस्पी नहीं ली क्योंकि गाँव-सभा के काम को वे निहायत जलील काम मानते थे। और वह एक तरह से जलील था भी, क्योंकि गाँव-सभाओं के अफसर बड़े टुटपुँजिया क़िस्म के अफसर थे। न उनके पास पुलिस का डंडा था, न तहसीलदार का रुतबा, और उनसे रोज-रोज अपने काम का मुआयना करने में आदमी की इज्जत गिर जाती थी। प्रधान को गाँव-सभा की जमीन-जायदाद के लिए मुकदमे करने पड़ते थे और शहर के इजलास में वकीलों और हाकिमों का उनके साथ वैसा भी सलूक न था जो एक चोर का दूसरे चोर के साथ होता है। मुकदमेबाजी में दुनिया-भर की दुश्मनी लेनी पड़ती थी और मुसीबत के वक़्त पुलिसवाले सिर्फ मुस्करा देते थे उन्हें मोटे अक्षरों में 'परधान जी' कह कर थाने के बाहर का भूगोल समझाने लगते थे।

पर इधर कुछ दिनों से वैद्य जी की रुचि गाँव-सभा में भी दिखने लगी थी, क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री का एक भाषण किसी अखबार में पढ़ लिया था। उस भाषण में बताया गया था कि गाँवों का उद्धार स्कूल, सहकारी समिति और गाँव-पंचायत के आधार पर ही हो सकता है और अचानक वैद्य जी को लगा कि वे अभी तक गाँव का उद्धार सिर्फ कोऑपरेटिव यूनियन और कॉलिज के सहारे करते आ रहे थे और उनके हाथ में गाँव-पंचायत तो है ही नहीं। 'आह!' उन्होंने सोचा होगा, 'तभी शिवपालगंज का ठीक से उद्धार नहीं हो रहा है। यही तो मैं कहूँ कि क्या बात है?'

रुचि लेते ही कई बातें सामने आईं। यह कि रामाधीन के भाई ने गाँव-सभा को चौपट कर दिया है। गाँव की बंजर जमीन पर लोगों ने मनमाने कब्जे कर लिए हैं और निश्चय ही प्रधान ने रिश्वत ली है। गाँव-पंचायत के पास रुपया नहीं है और निश्चय ही प्रधान ने गबन किया है। गाँव के भीतर बहुत गंदगी जमा हो गई है और प्रधान निश्चय ही सुअर का बच्चा है। थानेवालों ने प्रधान की शिकायत पर कई लोगों का चालान किया है जिससे सिर्फ यही नतीजा निकलता है कि वह अब पुलिस का दलाल हो गया है। प्रधान को बंदूक का लाइसेंस मिल गया है जो निश्चय ही डकैतियों के लिए उधार जाती है और पिछले साल गाँव में बजरंगी का कत्ल हुआ था, तो बूझो कि क्यों हुआ था?

भंग पीनेवालों में भंग पीसना एक कला है, कविता है, कार्रवाई है, करतब है, रस्म है। वैसे टके की पत्ती को चबा कर ऊपर से पानी पी लिया जाए तो अच्छा-खासा नशा आ जाएगा, पर यहाँ नशेबाजी सस्ती है। आदर्श यह है कि पत्ती के साथ बादाम, पिस्ता, गुलकंद दूध-मलाई आदि का प्रयोग किया जाए। भंग को इतना पीसा जाए कि लोढ़ा और सिल चिपक कर एक हो जाएँ, पीने के पहले शंकर भगवान की तारीफ में छंद सुनाए जाएँ और पूरी कार्रवाई को व्यक्तिगत न बना कर उसे सामूहिक रूप दिया जाए।

सनीचर का काम वैद्य जी की बैठक में भंग के इसी सामाजिक पहलू को उभारना था। इस समय भी वह रोज की तरह भंग पीस रहा था। उसे किसी ने पुकारा, 'सनीचर!' सनीचर ने फुँफकार कर फन-जैसा सिर ऊपर उठाया। वैद्य जी ने कहा, 'भंग का काम किसी और को दे दो और यहाँ अंदर आ जाओ।'

जैसे कोई उसे मिनिस्टरी से इस्तीफा देने को कह रहा हो। वह भुनभुनाने लगा, 'किसे दे दें? कोई है इस काम को करनेवाला? आजकल के लौंडे क्या जानें इन बातों को। हल्दी-मिर्च-जैसा पीस कर रख देंगे।' पर उसने किया यही कि सिल-लोढ़े का चार्ज एक नौजवान को दे दिया, हाथ धो कर अपने अंडरवियर के पीछे पोंछ लिए और वैद्य जी के पास आ कर खड़ा हो गया।

तख्त पर वैद्य जी, रंगनाथ, बद्री पहलवान और प्रिंसिपल साहब बैठे थे। प्रिंसिपल एक कोने में खिसक कर बोले, 'बैठ जाइए सनीचरजी!'

इस बात ने सनीचर को चौकन्ना कर दिया। परिणाम यहाँ हुआ कि उसने टूटे हुए दाँत बाहर निकाल कर छाती के बाल खुजलाने शुरू कर दिए। वह बेवकूफ-सा दिखने लगा, क्योंकि वह जानता था चालाकी के हमले का मुकाबला किस तरह किया जाता है। बोला, 'अरे प्रिंसिपल साहेब, अब अपने बराबर बैठाल कर मुझे नरक में न डालिए।'

बद्री पहलवान हँसे। बोले, 'स्साले! गँजहापन झाड़ते हो! प्रिंसिपल साहब के साथ बैठने से नरक में चले जाओगे?' फिर आवाज बदल कर बोले, 'बैठ जाओ उधर।'

वैद्य जी ने शाश्वत सत्य कहनेवाली शैली में कहा, 'इस तरह से न बोलो बद्री। मंगलदास जी क्या होने जा रहे हैं, इसका तुम्हें कुछ पता भी है?'

सनीचर ने बरसों बाद अपना सही नाम सुना था। वह बैठ गया और बड़प्पन के साथ बोला, 'अब पहलवान को ज्यादा जलील न करो महाराज। अभी इनकी उमर ही क्या है? वक़्त पर सब समझ जाएँगे।'

वैद्य जी ने कहा, 'तो प्रिंसिपल साहब, कह डालो जो कहना है।'

उन्होंने अवधी में कहना शुरू किया, 'कहै का कौनि बात है? आप लोग सब जनतै ही।' फिर अपने को खड़ीबोली की सूली पर चढ़ा कर बोले, 'गाँव-सभा का चुनाव हो रहा है, यहाँ का प्रधान बड़ा आदमी होता है। वह कॉलिज-कमेटी का मेंबर भी होता है - एक तरह से मेरा भी अफ़सर।'

वैद्य जी ने अकस्मात कहा, 'सुनो मंगलदास, इस बार हम लोग गाँव-सभा का प्रधान तुम्हें बनाएँगे।'

सनीचर का चेहरा टेढ़ा-मेढ़ा होने लगा। उसने हाथ जोड़ दिए - पुलक गात लोचन सलिल। किसी गुप्त रोग से पीड़ित, उपेक्षित कार्यकर्ता के पास किसी मेडिकल असोसिएशन का चेयरमैन बनने का परवाना आ जाए तो उसकी क्या हालत होगी? वही सनीचर की हुई। फिर अपने को क़बू में करके उसने कहा, 'अरे नहीं महाराज, मुझ-जैसे नालायक को आपने इस लायक समझा, इतना बहुत है। पर मैं इस इज्जत के काबिल नहीं हूँ।'

सनीचर को अचंभा हुआ कि अचानक वह कितनी बढ़िया उर्दू छाँट गया है। पर बद्री पहलवान ने कहा, 'अबे, अभी से मत बहक। ऐसी बातें तो लोग प्रधान बनने के बाद कहते हैं। इन्हें तब तक के लिए बाँधे रख।'

इतनी देर बाद रंगनाथ बातचीत में बैठा। सनीचर का कंधा थपथपा कर उसने कहा, 'लायक-नालायक की बात नहीं है सनीचर! हम मानते हैं कि तुम नालायक हो पर उससे क्या? प्रधान तुम खुद थोड़े ही बन रहे हो। वह तो तुम्हें जनता बना रही है। जनता जो चाहेगी, करेगी। तुम कौन हो बोलनेवाले?'

पहलवान ने कहा, 'लौंडे तुम्हें दिन-रात बेवकूफ बनाते रहते हैं। तब तुम क्या करते हो? यही न कि चुपचाप बेवकूफ बन जाते हो?'

प्रिंसिपल साहब ने पढ़े-लिखे आदमी की तरह समझाते हुए कहा, 'हाँ भाई, प्रजातंत्र है। इसमें तो सब जगह इसी तरह होता है।' सनीचर को जोश दिलाते हुए वे बोले, 'शाबाश, सनीचर, हो जाओ तैयार!' यह कह कर उन्होंने 'चढ़ जा बेटा सूली पर' वाले अंदाज से सनीचर की ओर देखा। उसका सिर हिलना बंद हो गया था।

प्रिंसिपल ने आखिरी धक्का दिया, 'प्रधान कोई गबड़ू-घुसड़ू ही हो सकता है। भारी ओहदा है। पूरे गाँव की जायदाद का मालिक! चाहे तो सारे गाँव को 107 में चालान करके बंद कर दे। बड़े-बड़े अफ़सर आ कर उसके दरवाजे बैठते हैं! जिसकी चुगली खा दे, उसका बैठना मुश्किल। कागज पर जरा-सी मोहर मार दी और जब चाहा, मनमाना तेल-शक्कर निकाल लिया। गाँव में उसके हुकुम के बिना कोई अपने घूरे पर कूड़ा तक नहीं डाल सकता। सब उससे सलाह ले कर चलते हैं। सब की कुंजी उसके पास है। हर लावारिस का वही वारिस है। क्या समझे?'

रंगनाथ को ये बातें आदर्शवाद से कुछ गिरी हुई जान पड़ रही थीं। उसने कहा, 'तुम तो मास्टर साहब, प्रधान को पूरा डाकू बनाए दे रहे हो।'

'हें-हें-हें' कह कर प्रिंसिपल ने ऐसा प्रकट किया जैसे वे जान-बूझ कर ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें कर रहे हों। यह उनका ढंग था, जिसके द्वारा बेवकूफी करते-करते वे अपने श्रोताओं को यह भी जता देते थे कि मैं अपनी बेवकूफी से परिचित हूँ और इसलिए बेवकूफ नहीं हूँ।

'हें-हें-हें, रंगनाथ बाबू! आपने भी क्या सोच लिया? मैं तो मौजूदा प्रधान की बातें बता रहा था।'

रंगनाथ ने प्रिंसिपल को गौर से देखा। यह आदमी अपनी बेवकूफी को भी अपने दुश्मन के ऊपर ठोंक कर उसे बदनाम कर रहा है। समझदारी के हथियार से तो अपने विरोधियों को सभी मारते हैं, पर यहाँ बेवकूफी के हथियार से विरोधी को उखाड़ा जा रहा है। थोड़ी देर के लिए खन्ना मास्टर और उनके साथियों के बारे में वह निराश हो गया। उसने समझ लिया कि प्रिंसिपल का मुक़ाबला करने के लिए कुछ और मँजे हुए खिलाड़ी की जरूरत है। सनिचर कह रहा था, 'पर बद्री भैया, इतने बड़े-बड़े हाकिम प्रधान के दरवाज़े पर आते हैं ... अपना तो कोई दरवाजा ही नहीं है; देख तो रहे हो वह टुटहा छप्पर!'

बद्री पहलवान हमेशा से सनीचर से अधिक बातें करने में अपनी तौहीन समझते थे। उन्हें संदेह हुआ कि आज मौका पा कर यहाँ मुँह लगा जा रहा है। इसलिए वे उठ कर खड़े हो गए। कमर से गिरती हुई लुंगी को चारों ओर से लपेटते हुए बोले, 'घबराओ नहीं। एक दियासलाई तुम्हारे टुटहे छप्पर में भी लगाए देता हूँ। यह चिंता अभी दूर हुई जाती है।'

कह कर वे घर के अंदर चले गए। यह मजाक था, ऐसा समझ कर पहले प्रिंसिपल साहब हँसे, फिर सनीचर भी हँसा। रंगनाथ की समझ में आते-आते बात दूसरी ओर चली गई थी। वैद्य जी ने कहा, 'क्यों? मेरा स्थान तो है ही। आनंद से यहाँ बैठे रहना। सभी अधिकारियों का यहीं से स्वागत करना। कुछ दिन बाद पक्का पंचायतघर बन जायेगा तो उसी में जा कर रहना। वहीं से गाँव-सभा की सेवा करना।'

सनीचर ने फिर विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़े। सिर्फ़ यही कहा, 'मुझे क्या करना है? सारी दुनिया यही कहेगी कि आप लोगों के होते हुए शिवपालगंज में एक निठल्ले को ...'

प्रिंसिपल ने अपनी चिर-परिचित 'हें-हें-हें' और अवधी का प्रयोग करते हुए कहा, 'फिर बहकने लगे आप सनीचर जी! हमारे इधर राजापर की गाँव-सभा में वहाँ के बाबू साहब ने अपने हलवाहे को प्रधान बनाया है। कोई बड़ा आदमी इस धकापेल में खुद कहाँ पड़ता है।'

प्रिंसिपल साहब बिना किसी कुंठा के कहते रहे, 'और मैनेजर साहब, उसी हलवाहे ने सभापति बन कर रंग बाँध दिया। किस्सा मशहूर है कि एक बार तहसील में जलसा हुआ। डिप्टी साहब आए थे। सभी प्रधान बैठे थे। उन्हें फर्श पर दरी बिछा कर बैठाया गया था। डिप्टी साहब कुर्सी पर बैठे थे। तभी हलवाहेराम ने कहा कि यह कहाँ का न्याय है कि हमें बुला कर फर्श पर बैठाया जाए और डिप्टी साहब कुर्सी पर बैठें। डिप्टी साहब भी नए लौंडे थे। ऐंठ गए। फिर तो दोनों तरफ़ इज्जत का मामला पड़ गया। प्रधान लोग हलवाहेराम के साथ हो ग। 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लगने लगे। डिप्टी साहब वहीं कुर्सी दबाए 'शांति-शांति' चिल्लाते रहे। पर कहाँ की शांति और कहाँ की शकुंतला? प्रधानों ने सभा में बैठने से इनकार कर दिया और राजापुर का हलवाहा तहसीली क्षेत्र का नेता बन बैठा। दूसरे ही दिन तीन पार्टियों ने अर्जी भेजी कि हमारे मेंबर बन जाओ पर बाबू साहब ने मना कर दिया कि खबरदार, अभी कुछ नहीं। हम जब जिस पार्टी को बताएँ, उसी के मेंबर बन जाना।'

सनीचर के कानों में 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लग रहे थे। उसकी कल्पना में एक नग-धड़ंग अंडरवियरधारी आदमी के पीछे सौ-दो सौ आदमी बाँह उठा-उठा कर चीख रहे थे। वैद्य जी बोले, 'यह अशिष्टता थी। मैं प्रधान होता तो उठ कर चला आता। फिर दो मास बाद अपनी गाँव-सभा में उत्सव करता। डिप्टी साहब को भी आमंत्रित करता। उन्हें फर्श पर बैठाल देता। उसके बाद स्वयं कुर्सी पर बैठ कर व्याख्य़ान देते हुए कहता कि 'बंधुओ! मुझे कुर्सी पर बैठने में स्वाभाविक कष्ट है, पर अतिथि-सत्कार का यह नियम डिप्टी साहब ने अमुक तिथि को हमें तहसील में बुला कर सिखाया था। अत: उनकी शिक्षा के आधार पर मुझे इस असुविधा को स्वीकार करना पड़ा है।' कह कर वैद्य जी आत्मतोष के साथ ठठा कर हँसे। रंगनाथ का समर्थन पाने के लिए बोले, 'क्यों बेटा, यही उचित होता न?'

रंगनाथ ने कहा, 'ठीक है। मुझे भी यह तरकीब लोमड़ी और सारस की कथा में समझाई गई थी।'

वैद्य जी ने सनीचर से कहा, 'तो ठीक है। जाओ देखो, कहीं सचमुच ही तो उस मूर्ख ने भंग को हल्दी-जैसा नहीं पीस दिया है। जाओ, तुम्हारा हाथ लगे बिना रंग नहीं आता।'

बद्री पहलवान मुस्करा कर दरवाजे पर से बोला, 'जाओ साले, फिर वही भंग घोंटो!'

अर्द्धांगिनी एक महात्मा की




वह थी 18 वर्ष की मासूम युवती और वह था 34 वर्ष का जवान मर्द, न जाने कितने नारी ह्रदयों को अब तक वशीभूत कर चुका था| युवती थी सोफिया बेर्स और पुरुष लेव तोल्स्तोय| इस दंपति के निजी जीवन की समाज में जितनी चर्चा रही उतनी रूस के सारे इतिहास में शायद और किसी दंपति की नहीं रही| इतनी अटकलें लगाई गईं, इतनी अफवाहें उड़ाई गईं उनके बारे में| उनके संबंधों के हर पहलू को, हर छोटी से छोटी बात को पूरी बारीकी से देखा, कुरेदा और उघाडा गया|

काउंट लेव तोल्स्तोय का जन्म उनकी पुश्तैनी जागीर ‘यास्नया पोल्याना’ {धौला मैदान} में 28 अगस्त 1828 को हुआ| उनके पूर्वज रूस के कई उच्च संभ्रांत वंशों के थे| उनके माता-पिता का विवाह प्रेम-विवाह नहीं था, लेकिन उनके दाम्पत्य संबंध बड़े सौहार्दपूर्ण और सुकोमल थे| इस पारिवारिक सुख की छाया में ही शिशु लेव का बचपन बीता, हालांकि मातृ-सुख से वह अल्पायु में ही वंचित हो गए थे| डेढ़ वर्ष के ही थे जब माता का देहांत हो गया| बुआओं ने उन्हें पाला-पोसा, उन्हींने बालक को पारिवारिक सुख की बातें सुनाईं| तभी लेव के मन में एक आदर्श अर्द्धांगिनी का बिम्ब बन गया था| वह अगर किसी से प्रेम करेंगे तो केवल ऐसी आदर्श नारी से, विवाह करेंगे तो ऐसी आदर्श नारी से| लेकिन जीवन में आदर्श खोज पाना कोई आसान काम नहीं, इसीलिए जवानी में कितने ही प्रेम के रिश्ते बने-टूटे|

सोफिया बेर्स का जन्म एक कुलीन परिवार में हुआ, जहां आठ संतानें थीं| बेर्स परिवार सादगी की, बल्कि यह कहना चाहिए कि गरीबी की ज़िंदगी जी रहा था| तोल्स्तोय उनके कुलपिता को जानते थे| एक बार मास्को जाने का अवसर बना तो बेर्स परिवार से भी मिलने गए| अपनी डायरी में उन्होंने इस परिवार के सादे रहन-सहन के अलावा इस बात का भी ज़िक्र किया कि उनकी बच्ची “बड़ी प्यारी है”| साल भर बाद बेर्स परिवार ‘यास्नया पोल्याना’ में ठहरा| अब चौंतीस वर्षीय लेव तोलस्तोय ने देखा कि सोफिया “प्यारी बच्ची” नहीं, अनुपम युवती है, जिसे देखकर दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है|.. दिन ढले दोनों छज्जे पर खड़े बातें करते रहे| सोफिया तो संकोच के मारे कुछ बोल ही नहीं पा रही थी, पर लेव ने धीरे-धीरे उसका यह संकोच दूर कर दिया और फिर देर तक उसकी बातें सुनते रहे| विदा होते समय कहा: “कितनी सरल हैं आप, कितना उजला मन है आपका!”

बेर्स परिवार मास्को के पास अपनी कोठी में लौट गया| तोल्स्तोय सोफिया से विछोह अधिक दिन नहीं सह पाए| वह उनके घर चले गए| यहां संध्या समय बाल-नृत्य का आयोजन हुआ| कितनी गरिमा थी सोफिया के नृत्य में, कितनी कमनीय लग रही थी वह! तोल्स्तोय बार-बार अपने से कह रहे थे, “नहीं, यह तो अभी बच्ची ही है!” लेकिन उसकी कमनीयता मन को हरती जा रही थी, उसका नशा प्रतिपल सिर को चढता जा रहा था| कालांतर में उन्होंने ‘युद्ध और शांति’ उपन्यास में अपनी इन भावनाओं का वर्णन किया –

उस प्रसंग में, जब प्रिंस आंद्रेई बोल्कोंसकी नताशा रोस्तोवा के साथ बाल-नृत्य करता है और उस पर मोहित हो जाता है|

शीघ्र ही वह दिन भी आ गया जब तोल्स्तोय ने निश्चय किया कि जिसने उनका मन हरा है उसे अपने मन की सारी बात बता देनी चाहिए| सोफिया के नाम एक लंबा पत्र उन्होंने लिखा, जिसमें उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा और साथ ही बारम्बार यह अनुरोध किया कि अगर उनके मन में ज़रा सा भी संदेह है, असमंजस है तो साफ़ इनकार कर दें| सोफिया पत्र लेकर अपने कमरे में चली गईं| भयानक मानसिक तनाव में बीते ये पल – लगता था यह प्रतीक्षा कभी खत्म ही नहीं होगी| आखिर सोफिया नीचे आईं, तोल्स्तोय के पास गईं और मौन हामी भर दी| तोल्स्तोय के जीवन में यह परम सुख का क्षण था| “इससे पहले कभी भी मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ था कि मैं पत्नी के साथ अपने भावी जीवन की कल्पना करूं और मन इतना शांत हो, सब कुछ इतना स्पष्ट लगे और इतना सुखद भी,” उन्होंने अपनी डायरी में लिखा| अब बस एक बात और बची थी: तोल्स्तोय का यह मानना था कि विवाह की वेदी पर पाँव धरने से पहले वर-वधू के बीच एक दूसरे से कोई भेद नहीं रहना चाहिए| मासूम सोनिया का मन तो कोरा कागज था, उसका सारा जीवन एक खुली किताब था, किंतु तोल्स्तोय के चौंतीस वर्ष न जाने कितने भेद समेटे हुए थे|

तोल्स्तोय ने अपनी सारी डायरियां, जिनमें वह सदा अपने सारे भावावेग उतारते आए थे, अपनी मंगेतर को पढ़ने को दे दीं| सोनिया (सोफिया को ही रूस में घर पर सोनिया कहते हैं) इन्हें पढकर सकते में आ गईं| मां से लंबी बातचीत के बाद वह इस सदमे से उबर पाईं| भावी दामाद की इस कारस्तानी से उन्हें भी ठेस पहुंची थी, परंतु बेटी को उन्होंने समझाया कि इस उम्र का जो भी पुरुष होगा उसका अपना अतीत तो रहा ही होगा| फर्क बस इतना है कि ज़्यादातर पुरुष अपनी भावी पत्नियों को ये सारी बातें नहीं बताते| सोनिया को अपने पर, अपने प्रेम पर पूरा विश्वास था, सो उन्होंने निश्चय किया कि वह अपने भावी पति को क्षमा कर सकती हैं| अब उधर तोल्स्तोय के मन में फिर से यह सवाल उठने लगा कि क्या उन दोनों का निर्णय सही है| ऐन विवाह वाले दिन सुबह-सुबह सोनिया से बोले: “सोच लीजिए, कहीं ऐसा तो नहीं कि आपका मन इस विवाह को न मानता हो?” बेचारी सोनिया फूट-फूटकर रो पड़ी| आंसू भरी आँखे लिए ही वह विवाह की वेदी पर पहुंची| उसी दिन शाम को नव-दम्पति ‘यास्नया पोल्याना’ चले गए| इस प्रकार उनका विवाहित जीवन आरंभ हुआ|

उन दिनों तोल्स्तोय ने अपनी डायरी में लिखा: “पारिवारिक जीवन के इस नए सुखद वातावरण में ऐसा डूबा हूं कि जीवन का अर्थ क्या है इस शाश्वत प्रश्न की ओर अब ध्यान ही नहीं जाता”| अंततः, नव-दम्पति की पहली संतान हुई – बेटा सेर्गेई| इसके साल भर बाद युवा काउंटेस ने बेटी तत्याना को जन्म दिया और उसके डेढ़ साल बाद बेटे इल्या को| फिर तो उनके दस और संतानें हुईं| तेरह बच्चों में से पांच छोटी उम्र में ही गुज़र गए| इनमें से तीन तो एक के बाद एक गुज़रे| उनके इस दुख में पति ने उनका पूरा साथ दिया, इसी की बदौलत इतना भारी सदमा भी सोनिया ने सह लिया| दाम्पत्य जीवन के पहले बीस वर्षों में लेव और सोनिया का एक दूसरे से प्रेम इतना गहरा था कि “दो जिस्म एक जान” की बात उन पर पूरी तरह लागू होती थी| वे मानो एक-दूसरे में खो गए थे| सोनिया के लिए पति का साथ क्या मायने रखता था, इसका अनुमान हम उनके पत्र की इन पंक्तियों से लगा सकते हैं: “तुम्हारे बिना मुझे बस वही अच्छा लगता है जो तुम्हें अच्छा लगता है| अक्सर मैं भ्रम में पड़ जाती हूं कि यह मुझे खुद को अच्छा लगता है या सिर्फ इसलिए पसंद है कि तुम्हें अच्छा लगता है”|

अपने बच्चों के लालन-पालन का सारा काम सोफिया खुद ही करती थीं – कोई आया कभी उनके घर में नहीं थी| खुद ही वह बच्चों के लिए कपडे सीती थीं, खुद ही उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाती थीं, संगीत की शिक्षा देती थीं| यही नहीं, पति के लेखन-कार्य में भी पूरी मदद करती थीं| तोल्स्तोय की लिखावट को अकेली वही समझ पाती थीं – सारी पांडुलिपियों की साफ नक़ल तैयार करती थीं|

दाम्पत्य जीवन के अठारह वर्ष पूरे हो चके थे; तोल्स्तोय ने ‘आन्ना करेनिना’ उपन्यास पूरा कर लिया था – इन्हीं दिनों उनके मन पर एक आध्यात्मिक संकट घिर आया| उनका जीवन भरा-पूरा था, लेकिन मन में संतोष नहीं था; एक लेखक के नाते उनके नाम की तूती बज रही थी पर मन में इससे कहीं कोई खुशी नहीं थी| उधर सोफिया ने दाम्पत्य जीवन के ये सारे वर्ष ‘यास्नया पोल्याना’ में ही बिता दिए थे – घर-गृहस्थी और बाल-बच्चों को समेटते हुए| एक बार भी विदेश नहीं गईं, भद्र-समाज के मनोरंजन, बाल-नृत्य संध्याओं में जाना और थियेटर देखना क्या होता है – यह सब वह भूल ही गई थीं; सुंदर-सजीले परिधान, नए-नए वस्त्र और पोशाकें – इन सब का तो उन्हें कभी ख्याल तक नहीं आया| देहाती जीवन के लिए जो सुविधाजनक और आरामदेह हों – वही सीधे-सादे वस्त्र वह पहनती आई थीं| तोल्स्तोय का यह मानना था कि एक अच्छी पत्नी को “भद्र-समाज” की इस तड़क-भड़क की कतई कोई आवश्यकता नहीं है|

सोफिया ने कभी पति को निराश नहीं होने दिया, हालांकि शहर में जन्मी और पली स्त्री के लिए गांव का जीवन बेगाना और नीरस था| इस पर जब तोल्स्तोय जीवन में कोई दूसरे मूल्य ढूँढने लगे, यह खोजने लगे कि जीवन की सार्थकता किस बात में है, तो उनकी पत्नी के लिए इससे बड़ी ठेस की बात कोई नहीं हो सकती थी, क्योंकि इसका अर्थ यह था कि उन्होंने जो कुर्बानियां कीं उन सब की कद्र करना तो दूर, उन्हें अब निरर्थक और अनावश्यक मानकर त्यागा जा रहा था, मानो वह सब कोई भूल थी, भ्रम था|..

उधर तोल्स्तोय के मन को चैन नहीं था| उन्हें यही लगता था कि उनका जीवन एकदम निरर्थक है| इस अहसास से प्रायः मन की व्यथा असहनीय हो उठती थी, यहाँ तक कि लगता बस यह जीवन त्यागकर ही सदा-सदा के लिए इस व्यथा से छुटकारा मिलेगा| बड़ी मुश्किल से वह ऐसे क्षणों में अपने को संभालते| जीवन के अर्थ की खोज में वह धर्म की शरण में भी गए परंतु वहाँ भी उत्तर नहीं पा सके| तब वह स्वयं अपने दार्शनिक विचारों की रूप-रेखा बनाने लगे : “इस संसार में हर मनुष्य ईश्वर की इच्छा से जन्म लेता है| ईश्वर ने मनुष्य को ऐसे रचा है कि वह चाहे तो अपनी आत्मा को अधोगर्त में पहुंचा सकता है और चाहे तो उसे उबार सकता है| इस जीवन में मनुष्य का कर्तव्य यही है कि वह अपनी आत्मा को उबारे: आत्मा को उबारने के लिए यह ज़रूरी है कि मनुष्य ईश्वर की इच्छा के अनुसार जिए और ईश्वर की इच्छा के अनुसार जीने का अर्थ है यह है कि मनुष्य लौकिक सुखों का त्याग करे. परिश्रमी, विनम्र, सहनशील, और दयालु बने”|

घर-गृहस्थी के बोझ ने अर्द्धांगिनी के लिए एक पल ऐसा नहीं छोड़ा था जिसमें वह पति के मन में हो रहे मंथन को अनुभव कर पाती, उनके इन नए विचारों को सुन और समझ पाती| बच्चों की बात अलग थी| उनके लिए तो पिता देव-तुल्य थे| वही उनकी नई शिक्षा के पहले अनुयायी बने|

अपनी रौ में बहना तोल्स्तोय का स्वभाव ही था| बस इसी रौ में कई बार वह सहज बुद्धि की हद पार कर जाते थे| कभी कहते कि सादे जन-जीवन के लिए जिन बातों की कोई ज़रूरत नहीं है, जैसे कि संगीत और विदेशी भाषाएं, वे सब बच्चों को सिखाने की कोई ज़रूरत नहीं| कभी यह ठान लेते कि वह अपनी सारी जायदाद से इनकार कर देंगे, या फिर अपनी रचनाओं की रायल्टी पाने से इनकार की बातें करने लगते| इस पर उनकी अर्द्धांगिनी को, एक गृहिणी को ही अपनी गृहस्थी की, अपनी संतानों के रहन-सहन की रक्षा के लिए आगे आना पड़ता| पहले तो इन सवालों पर बहसें होती रहीं, फिर नौबत झगड़ों की आने लगी| पति-पत्नी एक-दूसरे से दूर होते जा रहे थे, इस बात से बेखबर कि यह दूरी उन्हें कितना कष्ट देगी|

सोफिया के अगली संतान होने ही वाली थी, जब पति-पत्नी में फिर से झगडा हो गया| तोल्स्तोय पत्नी को यह समझाने की कोशिश कर रहे थे कि वह क्यों अपने को मानवजाति के प्रति दोषी मानते हैं| पत्नी के लिए इससे बड़ी चोट और क्या हो सकती थी – मानवजाति के सामने तो अपने दोष को महसूस करते हैं, लेकिन पत्नी के प्रति दोष को कभी भी नहीं| लगता था, तोल्स्तोय परिवार में पहले जैसा अमन-चैन कभी नहीं लौटेगा| तभी उनके चार साल के बेटे अलेक्सेई की मृत्यु हो गई| पति-पत्नी पूरी तरह एक दूसरे का सहारा बने, इतने समीप आ गए कि तोल्स्तोय ने इस मृत्यु को ईश्वर का “वरदान” ही माना| “इस मृत्यु ने हम सब को प्रेम के बंधन में पहले से भी अधिक कसकर बाँध दिया है,” उन्होंने अपनी डायरी में लिखा|

सोफिया 44 वर्ष की थीं जब उन्होंने अपनी आखिरी संतान को जन्म दिया| सभी घर-परिवार वालों ने अपने संस्मरणों में लिखा कि बालक इवान बहुत ही प्यारा था, सब का मन मोह लेता था, नन्ही उम्र में ही दूसरों के मनोभावों को अच्छी तरह समझता था, बड़ा ही कोमलहृदय था| सात साल का भी नहीं हुआ था कि स्कारलेट ज्वर ने उसकी जान ले ली| मां पर तो दुख का पहाड़ टूट पड़ा| घरवालों को डर लगने लगा कि वह पागल हो जाएंगी| इस दुख से पति-पत्नी उबर नहीं पाए| ऊपर से सोफिया के मन में यह वहम बैठ गया कि उनके पति अब उन्हें नहीं चाहते| बेटे इवान की मृत्यु के बाद सोफिया ने बगावत कर दी|

उन्होंने अपने लिए नए-नए फैशन के वस्त्र खरीद लिए| अक्सर मास्को जाने लगीं – कभी कोई कंसर्ट सुनने, तो कभी थियेटर में नाटक देखने| तोल्स्तोय परिवार के मित्र, संगीतकार और पियानोवादक अलेक्सांद्र तनेयेव से संगीत के पाठ लेने लगीं| तनेयेव की संगत और उनके संगीत से उन्हें सांत्वना मिलती थी| परंतु फिर धीरे-धीरे सबको यह दिखने लगा कि वह तनेयेव पर फ़िदा हो गई हैं| वह बावन वर्ष की थीं, उनके बच्चों को यह देखकर शर्म आती थी कि मां इस तरह नौजवान औरतों के जैसे वस्त्र पहनती है और पराये मर्द की संगत में इतना समय बिताती है| तोल्स्तोय भी ईर्ष्या की आग में तड़प रहे थे, कई बार उनके मन में पत्नी से पूर्ण संबंध-विच्छेद का विचार आया और कभी तो आत्म-हत्या तक का|

एक तनेयेव ही थे, जिन्हें इस बात का कोई अहसास ही नहीं था कि उनके इर्द-गिर्द क्या हो रहा है, और यही शायद सोफिया के लिए सबसे बड़ी त्रासदी थी| तनेयेव तो यही सोचते थे कि वह दुख की घड़ी में अपनी परिचिता को कुछ आसरा दे रहे हैं|.. बरसों बाद सोफिया जब मृत्यु-शय्या पर थीं तो उन्होंने अपनी बेटी तत्याना से कहा था: “अठारह वर्ष की थी जब मेरा विवाह हुआ, और जीवन भर अकेले अपने पति से ही मैंने प्यार किया”|

परंतुतोल्स्तोय पर क्या गुज़र रही थी? वह सत्य की खोज के रास्ते पर अपने विचारों में, चिंतन-मनन में गहरे ही गहरे उतरते जा रहे थे| इस रास्ते पर वह अकेले ही थे, पत्नी से बातचीत अब बहुत कम ही होती थी| जीवन के बंधे-बंधाए ढर्रे को त्याग कर वह किसी नए रास्ते पर, जीवन के सत्य-पथ पर निकल पड़ना चाहते थे| संन्यासी जीवन उन्हें आकर्षित करने लगा था, उन्हें लगता था कि यही सच्चे आस्थावान का जीवन-पथ है| उम्र अपना असर दिखा रही थी – शरीर दुर्बल हो रहा था, बीमारियां घेरने लगी थीं| पत्नी के मन में एक और भय घर कर गया था – कहीं उन्हें ऐसी नारी के रूप में न याद किया जाए जिसने पति का साथ नहीं निभाया, लोग उनकी तुलना सुकरात की बदमिजाज बीवी से न करने लगें| हर वक्त उन्हें यही भय सताता रहता था, दूसरों से बातचीत में और अपनी डायरी में बार-बार इसी का ज़िक्र करती थीं| साथ ही सिर पर एक और अजीब धुन सवार हो गई – तोल्स्तोय अब अपनी डायरियां उनसे छिपाने लगे थे, सो सोफिया इसी कोशिश में लगी रहती थीं कि किसी तरह पति की डायरी उनके हाथ लग जाए और पति ने उनके बारे में जो कुछ भी “गलत” बातें लिखी हैं उन सब को काट दें|

अगर वह डायरी न ढूँढ पातीं, तोपति के आगे हाथ जोड़तीं, आंसू बहाते हुए अनुरोध करतीं कि उन्होंने गुस्से में आकर जो कुछ उल्टा-सीधा लिखा है वह सब काट दें|

तोल्स्तोय भली-भांति समझते थे कि भले ही अब वे दोनों एक दूसरे को बिलकुल नहीं समझ पाते तो भी उनकी पत्नी सोफिया ने उनके लिए बहुत कुछ किया है और अब भी कर रही हैं, किंतु उनके लिए यह “बहुत कुछ” अब पर्याप्त नहीं था| आखिर वह घड़ी भी आ गई जब तोल्स्तोय ने फैसला किया कि वह अब यास्नया पोल्याना में एक दिन भी और नहीं रह सकते| 27-28 अक्टूबर 1910 की रात को पति-पत्नी में आखिरी बार झगड़ा हुआ| आधी रात को सोफिया उठकर पति के कमरे में गईं – उनकी नब्ज़ देखने| पत्नी की इस “चौकीदारी” पर तोल्स्तोय गुस्से से आग बबूला हो उठे: “न दिन को, न रात को चैन है – मैं ज़रा सा हिलूं-डुलूं तो, मेरे मुंह से कोई आवाज़ निकले तो - हर गति की, हर शब्द की इसे खबर चाहिए, उस पर नियंत्रण चाहिए| फिर से कदमों की आहट आई...हौले से दरवाज़ा खुला... नहीं, मुझसे और नहीं लेटा जाता, बस आखिरी फैसला कर लिया मैंने|”

यास्नया पोल्याना छोड़कर जाते समय 82-वर्षीय तोल्स्तोय ने अपनी पत्नी के नाम पत्र छोड़ा: “यह मत सोचना कि मैं इसलिए जा रहा हूं कि तुमसे प्यार नहीं करता| मैं तुमसे प्रेम करता हूं और रोम-रोम से तुमसे सहानुभूति रखता हूं, किंतु जो मैं कर रहा हूं उसके अलावा और कुछ नहीं कर सकता|” निकटतम स्टेशन तक पहुंचकर तोल्स्तोय वहाँ से गुज़र रही पहली पैसंजर ट्रेन में बैठ गए| रास्ते में ठंड लग गई जो निमोनिये में बदल गई| अस्तापोवो नाम के एक छोटे से स्टेशन पर वह ट्रेन से उतरे| बस इसी के प्रतीक्षा कक्ष में महान लेखक ने अपने आखिरी दिन काटे| बच्चों से वह मिलना नहीं चाहते थे, पत्नी की तो बात ही दूर रही| अस्तापोवो स्टेशन से महान तोल्स्तोय के स्वास्थ्य के बारे में बुलेटिन के तार सारे रूस को जाने लगे| यास्नया पोल्याना में पत्नी सोफिया दुख के मारे बुत बनकर रह गईं – उनके पति उन्हें त्याग कर चले गए, उनका प्रेम, उनकी देख-रेख ठुकरा डाली, उनके सारे जीवन को रौंद डाला...

7 नवंबर 1910 को तोल्स्तोय इस संसार में नहीं रहे| सारा रूस उन्हें दफनाने उमड़ पड़ा था| उनकी मृत्यु के बाद सोफिया को जगत-भर्त्सना का शिकार होना पड़ा| तोल्स्तोय घर छोड़कर चले गए, ऐसे बुरे हालात में उन्होंने अंतिम दिन बिताए – इस सब के लिए उन्हें ही दोषी ठहराया जाने लगा| आज भी ऐसा करने वाले कम नहीं हैं| किंतु वे यह नहीं समझते कि कितना भारी बोझ था उनके कंधों पर – एक महात्मा की अर्द्धांगिनी होने का बोझ, तेरह बच्चों की मां का बोझ, जागीर की मालकिन का बोझ| और इस नारी ने कभी स्वयं अपनी सफाई में एक शब्द नहीं कहा|

अपने दिवंगत पति के कागज़ात समेटते हुए उन्हें एक बंद लिफाफा मिला| यह उन्हीं के नाम पति का पत्र था जो उन्होंने 1897 की गर्मियों में लिखा था| तब तोल्स्तोय ने पहली बार घर छोड़ने की बात सोची थी| उस समय उन्होंने अपना यह इरादा पूरा नहीं किया, किंतु पत्र भी नहीं फाड़ा| अब मानो परलोक से उनकी आवाज़ आ रही थी: “...हमारे जीवन के इन लंबे 35 वर्षों को मैं बड़े प्रेम से और साभार याद करता हूं, खास तौर पर पहले के दस-बीस वर्षों को, जब तुमने इतने उत्साह से और इतनी दृढता से वह सब किया जिसे तुम अपना कर्तव्य मानती थीं और वह सब करते हुए मां का परम-त्यागी स्वभाव दर्शाया| तुमने मुझे और संसार को वह सब दिया है जो तुम दे सकती थीं – अपार ममता दी है और परम आत्मत्याग किया है| इसके लिए तुम्हारी कद्र किए बिना नहीं रहा जा सकता| जो कुछ तुमने मुझे दिया है – उस सब के लिए मैं तुम्हारा आभारी हूं, सदा गदगद होकर वह सब याद करता हूं और करता रहूँगा”|

तोल्स्तोय के प्रस्थान के नौ वर्ष बाद उनकी पत्नी सोफिया भी चली गईं| उनकी बेटी तात्याना ने अपने संस्मरणों में लिखा: “अपने अंतिम क्षणों में मां बच्चों से, नाती-पोतों से घिरी थीं| उन्हें इस बात का पूरा अहसास था कि उनका अंतिम समय आ गया है| शांत मन से और दीन भाव से उन्होंने इस अंत को स्वीकार किया”|
(योगेन्द्र नागपाल)

Monday, 29 July 2013

विदेशिया फिल्म और मूत्रालय में खर्राटे


जयप्रकाश त्रिपाठी

मुद्दत बात आज मैंने पहली बार इस तरह आईना देखा। आईने में खुद को इतना अजनबी देखा। इतना अजनबी कि मन खुद को पहचानने से इनकार करने लगा। चेहरे पर टंगे सवालों के कैलेंडर तारीख-दर-तारीख उघड़ने लगे। एक-एक तारीख जाने-पहचाने चेहरों की भीड़ में कई-कई इतिहासों की डुबकियां लगाती हुई।
रिश्ते-नाते, सगे-संबंधी, मित्र-अमित्र, बड़े-छोटे और अनेकश समवयस्क.....। और उनमें अनहद एक अदद मित्रता निभाती हुई कदम-कदम चल कर जो यहां तक साथ आती जा रही हैं, मेरी प्रिय पुस्तकें। जो तब भी साथ थीं, जब कोई साथ नहीं था, जब ढेर सारे साथ आ गये थे और आज जबकि गिने-चुने साथ हैं। कई मंगन टाइप कुशल पाठक इनमें से मेरी किताबें खिसका ले गये, जो आज मेरे साथ नहीं हैं। जाने कहां होंगी, किस हाल में।
कैलेंडर की एक तारीख पर अचानक कोई चेहरा फड़फड़ाया, जैसे अंधेरे से भटक आये चमगादड़। मित्र था। छोटे से कद का। हमेशा दोहरी मुस्कान से सामने वाले को थकाते हुए। ऐसो को अनजाने लोग नटवरलाल भी कहते हैं। वह घर में बिना बताये घुस आता था। एक थाली दाल-भात और आलू का भुर्ता भकोसने के लिए। पेट भर जाने के बाद लंबी डकार लेता था और इत्मीनान से बातें बनाता हुआ खिसक जाता था। उस जमाने में एक माफिया से उसकी खूब पटती थी। माफिया का भाई कई कत्ल कर चुका था। मेरा मित्र उसकी खूनी करतूतों पर धूल डालता फिरता था। वह मेरा मित्र आज भी शराफत की रुमाल चेहरे पर टांगे हुए मीडिया के कोने-अंतरे में दिन काट रहा है। पल भर में किसी का भी सगा बन जाने में माहिर और मिट्ठू......
एक और तारीख फड़की कैलेंडर के दूसरे कोने पर। जैसे रतौंधी के पार से झांकता हुआ। उसे नेता बनने का शौक था। बचपन से ही लंबा कुर्ता, झोलदार पायजामा और सिल्क का गमछा गले में लटकाये अपनो के बीच लंबी-लंबी तानने लगा था। एक बार उसने मुझे भी ढंग से तान लिया। उन दिनो मऊनाथ भंजन में मैं अन्य साथियों के साथ बुनकरों के लिए एक आंदोलन के मोरचे पर था। कुर्ता-गमछा वाले दोस्त ने उसमें भी अपनी जगह तान ली। चटपट जाने कैसे उसने संगठन का रजिस्ट्रेशन करा लिया। और स्वयंभू अध्यक्ष हो लेने के बाद अपनी मौसी के लड़के को भी अपनी राह लपेट लिया। मौसी का लड़का उसके पीछे-पीछे आलतू-फालतू कागजों की फाइल लेकर चलता रहता था, जैसे एसडीएम का अर्दली। आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया। दलाली पर आमादा एक बड़ा नेता बीच में कूद पड़ा। मेरे मित्र को जाने क्या सूझी, मुझे साथ लेकर दस कोस दूर स्थित अपने गांव ले गया। उसका खेत में ट्यूबवैल था। बोला- चल रात में वही दलाल के बारे में कोई जुगाड़ बनाते हैं। रात के आठ बजते ही वह कहीं से झोले में सुतली, शीशे का चूरा और बारूद उठा ले आया।
ये क्या है?
बम बनाएंगे।
क्यों
दलाल को निपटाने के लिए।
अब मुझे किसी तरह निकल भागने की पड़ी। मैंने कहा- अभी रख दे। सुबह देखेंगे। वह जब सो गया, मैं वहां से पैदल सात किलो मीटर दूर रात में भागते-पराते मुहम्मदाबाद पहुंचा। उस कस्बे मऊनाथ भंजन जाने के लिए बसें रात भर मिलती थीँ। एक बस पर सवार हुआ और मऊ पहुंच गया। उस दलाल को निपटाने के खयालों के पीछे उस मित्र की बचपने भरी राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा थी। वह चाहता था कि उसे रास्ते से हटाने के बाद वह इलाके का बहुत बड़ा नेता बन जाएगा। आज मुझे कैलेंडर पर उस रतौंधी के पीछे से झांकते अब कथित हो चुके मित्र का चेहरा देख कर खूब हंसी आ रही है......
कैलेंडर पर उससे पीछे की एक अन्य तारीख चमक उठती है। तब मैं हाईस्कूल में पढ़ता था। गांव के दो ऐसे विकट होनहार और सयाने किशोर भी उसी स्कूल में पढ़ते थे, जो मेरे सहपाठी नहीं थे। बारहवीं में पढ़ते थे। दोनो की मित्रता की एक बड़ी दयनीय और अजीब-सी वजह थी। दोनों को अपने घर में भरपेट खाने को नहीं मिलता था। कई बहनें और भाई थे दोनो के। दोनो के परिवार बहुत गरीब थे। दोनो ने पेट भरने की तरकीब निकाली। धारदार छोटा-सा एक चाकू कहीं से जुगाह लिया। उन दोनो में से किसी न किसी की जेब में वह चाकू हरदम पड़ा रहता था। स्कूल से वे बहुत पहले भाग आते थे और गांव के बाहर मेवा दुबे के गन्ने के खेत में घुस जाते थे। सांझ का घना अंधेरा घिर आने के बाद बाहर निकलते थे रसदार डकार लेते हुए। उसके बाद की बस एक घटना याद आ रही है। गन्ने की पेराई शुरू होने वाली थी। मेवा दुबे शाम को अचानक अपने खेत पर यह देखने पहुंच गये कि सुबह गन्ने की कटाई किधर से शुरू करानी होगी। खेत पर पहुंचते ही उन्हें लगा कि गन्ने की फसल के बीच कहीं कोई हलचल सी हो रही है। उन्होंने मिट्टी का ढेला फेंका तो उस तरफ से सियार बोलने लगे। वे सियार नहीं, वही दोनो थे। सियार की बोली बोलना भी उन्होंने सीख लिया था। सुबह जब गन्ना काटा जाने लगा तो फसल के मध्य हिस्से में लगभग तीन बिसवा गन्ना सफाचट मिला। वहां गन्ने के छिलके के बड़े-बड़े ढेर पड़े थे। सोच कर हंसी आ रही है। स्कूल छोड़ने के बाद दोनो मिलिट्री में भरती हो गये थे भर पेट भोजन के लिए.....
अभी और कई चेहरे उभर रहे हैं....चीखुर वाले बाबा, मौनी चाचा, अडंगा के महंत की कुटी और सगड़ा के सरपत, जिनमें वनमुर्गियां नाचती रहती थीं। और दुक्खन मियां की करताल, अवधू का हनुमान चालीसा, मथुरा यादव की चिकारी, बंसी दुबे का दही-बड़ा कांड......चंतारा की भैंस, लंघू का चिलम.... विदेशिया फिल्म देखने की रात मूत्रालय में खर्राटे भर रहे मरकहवा मास्टर की लुकाछिपी......


  

वे मीठी हवाओं के झोके और आंसुओं के सैलाब


जयप्रकाश त्रिपाठी

पहले की पीढ़ियां भी कई तरह से जीवन जीती रही हैं। जीवन जीने के तरीके बदलती रही हैं। तरह-तरह का जीवन जीने के नये-नये रास्ते और उपाय ढूंढती  रही हैं। हम भी आज वही सब किये जा रहे हैं।
अंतर है तो इतना भर कि हमारे तरीके, रास्ते और उपाय उनकी तुलना में ज्यादा क्षणभंगुर और सतही किस्म के लगते हैं।
कई पीढ़ियों का अनुभव न मेरे पास है, न किसी के पास कभी रहा है। अपने जीवन के दो सचेत चरणों पर नजर डालता हूं, स्वयं के और आसपास के यानी अंदर बाहर के कल के और आज के अनुभव खोलता-खंगालता हूं तो लगता है कि कल के कहां से आज के कहां तक आ पहुंचा हूं।
अपने नामचीन बुजुर्गों को मैंने बहुत करीब से पल-छिन देखते हुए पाया था कि उनमें आत्मप्रशंसा और आत्मप्रचार की आज जैसी बेचैनी नहीं होती थी। वे बिना कुछ किये-धरे 'बड़ा' होने के सपने नहीं देखते थे।
वे अपने बुजुर्गों से संस्कार में नैतिकता की इतनी नमी सोखे हुए होते थे कि उनका व्यक्तित्व हमे चौबीसो घड़ी संगत में रहने के लिए ललचाता रहता था। वे बात-बात पर झूठ का सहारा नहीं लेते थे। अपने आत्मीय जनो को वह मन से आत्मीय लगते थे। आत्मीय होने का न तो प्रवचन देते थे, न अभिनय करते थे।
उनमें विचारों की आज जैसी उच्छृंखलता भी नहीं होती थी। वे सतही और क्षणभंगुर सपनों से बहुत ज्यादा परहेज करते थे।
उनमें से एक थे मेरे पड़ोस के गांव के बुजुर्ग। मऊनाथ भंजन से चिरैयाकोट जाते समय बस अदभुत संयोग से उसी बस में सवार मिले, जिससे मैं अपने घर लौट रहा था। संयोग इसलिए कि वह अपने बेटी-दामाद के साथ अमेरिका में बस चुके थे और मन का उचाटपन खाली करने के लिए कुछ दिन रहने अपने गांव आये थे। उनके बारे में पिताजी ने इतनी तरह की प्रेरणादायक बातें बतायी थीं कि उन्हें देख लेने को मन ललचाता रहता था।.....और वे आज मेरी बगल की सीट पर बैठे मिले।
टिकट लेने, बैठने-खिसने से बातें शुरू हुईं और पिता की बतायी बातों तक पहुंच गयीं। मेरा परिचय जानकर उन्हें भी सुख मिला। मुझसे नहीं, मेरे पिता की यादों से। वह और मेरे पिता बचपन में साथ-साथ खेला-कूदा करते थे। और मेरे दो चाचा भी।
वह बताने लगे कि किस तरह वे लोग गांव से चौदह किलो मीटर दूर के मिडिल स्कूल में पैदल पढ़ने जाते थे। आते समय दोपहर को धूप से थक कर रास्ते में एक बूढ़े बरगद के बड़े से कोटरे में ठहर जाते थे। बरगद के नीचे कुआं था। झोले से सत्तू निकाल कर बरगद के पत्ते पर 'तुरंता' भोजन तैयार करने के बाद गमछे में पत्ते का दोना बनाकर कुएं से पानी निकालते थे। सत्तू-पानी के बाद आधा घंटा विश्राम करते थे और आंखें खुलने के बाद किताबें खोल लेते थे और जम कर तीन घंटे पढ़ाई करते थे। वह, पिता, दोनो चाचा एक-दूसरे का पूरा ध्यान रखते थे। वह आगरा में नौकरी का लंबा समय काटने के बाद अमेरिका चले गये। उनमें सबसे प्रतिभाशाली एक चाचा जो अच्छे गायक थे, विक्षिप्तावस्था में बाढ़ के समय नदी में डूब कर मर गये। दूसरे चाचा रामनारायण त्रिपाठी राजनीति में चले गये। उत्तर प्रदेश सरकार में लंबे समय तक डिप्ट स्पीकर रहे और फैजाबाद से लखनऊ जाकर वहीं बस गये।
पिताजी बताते थे कि डिप्टी स्पीकर हो जाने के बाद एक बार रामनारायण त्रिपाठी गांव आये। गांव के बाहर पोखरा पर वह पूरे सरकारी अमले के साथ पहुंचे। बड़ी संख्या में उन्हें देखने के लिए गांव वाले भी उमड़ आये थे। रामनारायण त्रिपाठी अचानक फूट-फूट कर रोने लगे। बाद में उन्होंने पिताजी को बताया कि उतना जोरजोर से क्यों रोने लगे थे। और उनके साथ वह उपस्थित सभी अधिकारियों, नेताओं, ग्रामीणों की आंखें भर आयी थीं।
रामनारायण त्रिपाठी की पढ़ाई बड़ी गरीबी में हुई थी। वह मेरे गांव के सबसे गरीब परिवार के छात्र रहे थे। उनकी मां बड़ी स्वाभिमानी थीं। हमारे सगे बाबा के चचेरे भाई ने उनके पिता की सारी जमीन-जायदाद हड़प ली थी। उनकी मां उसी पोखरा पर झोपड़ी डाल कर अपने दोनो पुत्रों रामनारायण और श्याम नारायण के साथ पड़ी रहती थीं। गांव में वह केवल मेरे घर से वास्ता रखती थीं। बारहो महीने कंधे पर लोटा-डोर लटका कर गांव-गांव भीख मांगती थीं रामनारायण की पढ़ाई की फीस जुटाने के लिए। रामनारायण पढ़ने में काफी प्रतिभाशाली थे। मिडिल क्लास में वह पूरे जिले में प्रथम आये थे।
उस दिन जब वह पोखरा पर पहुंचे तो यह कह कर फफक पड़े थे कि जब मैं कुछ लायक नहीं था तो मां ने मेरे लिये कितने कष्ट उठाये थे। आज जब मैं मां के लिये कुछ करने लायक हुआ हूं तो वह मेरे साथ नहीं हैं। मुझे लेकर उन्होंने यहां मेरे लिये जाने कैसे-कैसे दिन काटे थे.......
जीवन के लिए ऐसे अनेक प्रेरक प्रसंग सुनने के मिलते थे। बस से उतरते समय वह अपने गांव चले गये। मैंने पिताजी को मऊनाथ भंजन यात्रा की बात बतायी तो तुरंत उठ कर वह बगल के गांव उनसे मिलने चले गये। तब मोबाइल फोन नहीं था कि सारी फर्जी खैरियत हवाहवाई में सपन्न कर लेते।
ऐसे प्रसंगों की आज भी भूख लगी रहती है। साझा किससे किया जाये। सबके रास्ते समय ने छीन लिये हैं। वे चौराहे कहीं नजर नहीं आते। फेस बुक पर भी अक्सर लगता है, हम खामख्वाह छींकते-तापते रहते हैं। संचार संसाधनों पर कब्जा जमाते हुए बाजार के बहेलियों ने सचमुच कितने तरीके से हमे अपने चंगुल में फांस लिया है। अब यही माध्यम रह गया है तो यही सही, यहीं कुछ सुख-दुख बांट लेते हैं..... बांटते रहेंगे।

गदल : रांगेय राघव



बाहर शोरगुल मचा। डोडी ने पुकारा - ''कौन है?''
कोई उत्तर नहीं मिला। आवाज आई - ''हत्यारिन! तुझे कतल कर दँूगा!''
स्त्री का स्वर आया - ''करके तो देख! तेरे कुनबे को डायन बनके न खा गई, निपूते!''
डोडी बैठा न रह सका। बाहर आया।
''क्या करता है, क्या करता है, निहाल?'' - डोडी बढक़र चिल्लाया - ''आखिर तेरी मैया है।''
''मैया है!'' - कहकर निहाल हट गया।
''और तू हाथ उठाके तो देख!'' स्त्री ने फुफकारा - ''कढीख़ाए! तेरी सींक पर बिल्लियाँ चलवा दँू! समझ रखियो! मत जान रखियो! हाँ! तेरी आसरतू नहीं हँू।''
''भाभी!'' - डोडी ने कहा - ''क्या बकती है? होश में आ!''
वह आगे बढा। उसने मुडक़र कहा - ''जाओ सब। तुम सब लोग जाओ!''
निहाल हट गया। उसके साथ ही सब लोग इधर-उधर हो गए।
डोडी निस्तब्ध, छप्पर के नीचे लगा बरैंडा पकडे ख़डा रहा। स्त्री वहीं बिफरी हुई-सी बैठी रही। उसकी आँखों में आग-सी जल रही थी।
उसने कहा - ''मैं जानती हँू, निहाल में इतनी हिम्मत नहीं। यह सब तैने किया है, देवर!''
''हाँ गदल!'' - डोडी ने धीरे से कहा - ''मैंने ही किया है।''
गदल सिमट गई। कहा - ''क्यों, तुझे क्या जरूरत थी?''

डोडी क़ह नहीं सका। वह ऊपर से नीचे तक झनझना उठा। पचास साल का वह लंबा खारी गूजर, जिसकी मँूछें खिचडी हो चुकी थीं, छप्पर तक पहँुचा-सा लगता था। ़

उसके कंधे की चौडी हड्डियों पर अब दिए का हल्का प्रकाश पड रहा था, उसके शरीर पर मोटी फतुही थी और उसकी धोती घुटनों के नीचे उतरने के पहले ही झूल देकर चुस्त-सी ऊपर की ओर लौट जाती थी। उसका हाथ कर्रा था और वह इस समय निस्तब्ध खडा रहा।

स्त्री उठी। वह लगभग 45 वर्षीया थी, और उसका रंग गोरा होने पर भी आयु के धँुधलके में अब मैला-सा दिखने लगा था। उसको देखकर लगता था कि वह
फुर्तीली थी। जीवन-भर कठोर मेहनत करने से, उसकी गठन के ढीले पडने पर भी उसकी फूर्ती अभी तक मौजूद थी।
''तुझे शरम नहीं आती, गदल?'' - डोडी ने पूछा।
''क्यों, शरम क्यों आएगी?'' - गदल ने पूछा।
डोडी क्षणभर सकते में पड ग़या। भीतर के चौबारे से आवाज आई - ''शरम क्यों आएगी इसे? शरम तो उसे आए, जिसकी आँखों में हया बची हो।''
''निहाल!'' - डोडी चिल्लाया - ''तू चुप रह!''
फिर आवाज बंद हो गई।
गदल ने कहा - ''मुझे क्यों बुलाया है तूने?''
डोडी ने इस बात का उत्तर नहीं दिया। पूछा - ''रोटी खाई है?''
''नहीं, '' गदल ने कहा - ''खाती भी कब? कमबखत रास्ते में मिले। खेत होकर लौट रही थी। रास्ते में अरने-कंडे बीनकर संझा के लिए ले जा रही थी।''

डोडी ने पुकारा - ''निहाल! बहू से कह, अपनी सास को रोटी दे जाय!''
भीतर से किसी स्त्री की ढीठ आवाज सुनाई दी - ''अरे, अब लौहरों की बैयर आई हैं; उन्हें क्यों गरीब खारियों की रोटी भाएगी?''
कुछ स्त्रियों ने ठहाका लगाया।
निहाल चिल्लाया - ''सुन ले, परमेसुरी, जगहँसाई हो रही है। खारियों की तो तूने नाक कटाकर छोडी।''

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गुन्ना मरा, तो पचपन बरस का था। गदल विधवा हो गई। गदल का बडा बेटा निहाल तीस वर्ष के पास पहँुच रहा था। उसकी बहू दुल्ला का बडा बेटा सात का, दूसरा चार का और तीसरी छोरी थी जो उसकी गोद में थी।

निहाल से छोटी तरा-ऊपर की दो बहिनों थी चम्पा और चमेली, जिसका क्रमशः झाज और विश्वारा गाँवों में ब्याह हुआ था। आज उनकी गोदियों से उनके लाल उतरकर धूल में घुटरूवन चलने लगे थे। अंतिम पुत्र नारायन अब बाईस का था, जिसकी बहू दूसरे बच्चे की माँ बननेवाली थी। ऐसी गदल, इतना बडा परिवार छोडक़र चली गई थी और बत्तीस साल के एक लौहरे गूजर के यहाँ जा बैठी थी।

डोडी ग़ुन्ना का सगा भाई था। बहू थी, बच्चे भी हुए। सब मर गए। अपनी जगह अकेला रह गया। गुन्ना ने बडी-बडी क़ही, पर वह फिर अकेला ही रहा, उसने ब्याह नहीं किया, गदल ही के चूल्हे पर खाता रहा। कमाकर लाता, वो उसी को दे देता, उसी के बच्चों को अपना मानता, कभी उसने अलगाव नहीं किया। निहाल अपने चाचा पर जान देता था। और फिर खारी गूजर अपने को लौहरों से ऊँच समझते थे।

गदल जिसके घर बैठी थी, उसका पूरा कुनबा था। उसने गदल की उम्र नहीं देखी, यह देखा कि खारी औरत है, पडी रहेगी। चूल्हे पर दम फँूकनेवाली की जरूरत भी थी।

आज ही गदल सवेरे गई थी और शाम को उसके बेटे उसे फिर बाँध लाए थे। उसके नए पति मौनी को अभी पता भी नहीं हुआ होगा। मौनी रँडुआ था। उसकी भाभी जो पाँव फैलाकर मटक-मटककर छाछ बिलोती थी - दुल्लो सुनेगी तो क्या कहेगी?
गदल का मन विक्षोभ से भर उठा।
आधी रात हो चली थी। गदल वहीं पडी थी। डोडी वहीं बैठा चिलम फँूक रहा था।
उस सन्नाटे में डोडी ने धीरे से कहा - ''गदल!''
''क्या है?'' - गदल ने हौले से कहा।
''तू चली गई न?''
गदल बोली नहीं। डोडी ने फिर कहा - ''सब चले जाते हैं। एक दिन तेरी देवरानी चली गई, फिर एक-एक करके तेरे भतीजे भी चले गए। भैया भी चला गया।पर तू जैसी गई; वैसे तो कोई भी नहीं गया। जग हँसता है, जानती है?''

गदल बुरबुराई - ''जग हँसाई से मैं नहीं डरती देवर! जब चौदह की थी, तब तेरा भैया मुझे गाँव में देख गया था। तू उसके साथ तेल पिया लट्ठ लेकर मुझे लेने आया था न, तब? मैं आई थी कि नहीं? तू सोचता होगा कि गदल की उमर गई, अब उसे खसम की क्या जरूरत है? पर जानता है, मैं क्यों गई?''
''नहीं।''
''तु तो बस यही सोच करता होगा कि गदल गई, अब पहले-सा रोटियों का आराम नहीं रहा। बहुएँ नहीं करेंगी तेरी चाकरी देवर! तूने भाई से और मुझसे निभाई, तो मैंने भी तुझे अपना ही समझा! बोल झूठ कहती हँू?''
''नहीं, गदल, मैंने कब कहा!''
''बस यही बात है देवर! अब मेरा यहाँ कौन है! मेरा मरद तो मर गया। जीते-जी मैंने उसकी चाकरी की, उसके नाते उसके सब अपनों की चाकरी बजाई। पर जब मालिक ही न रहा, तो काहे को हडक़ंप उठाऊँ? यह लडक़े, यह बहुएँ! मैं इनकी गुलामी नहीं करूँगी!''
''पर क्या यह सब तेरी औलाद नहीं बावरी। बिल्ली तक अपने जायों के लिए सात घर उलट-फेर करती है, फिर तू तो मानुष है। तेरी माया-ममता कहाँ चली गई?''
''देवर, तेरी कहाँ चली गई थी, तूने फिर ब्याह न किया।''
''मुझे तेरा सहारा था गदल!''
''कायर! भैया तेरा मरा, कारज किया बेटे ने और फिर जब सब हो गया तब तू मुझे रखकर घर नहीं बसा सकता था। तूने मुझे पेट के लिए पराई डयौढी लँघवाई।
चूल्हा मैं तब फँूकँू, जब मेरा कोई अपना हो। ऐसी बाँदी नहीं हँू कि मेरी कुहनी बजे, औरों के बिछिए छनके। मैं तो पेट तब भरूँगी, जब पेट का मोल कर लँूगी।
समझा देवर! तूने तो नहीं कहा तब। अब कुनबे की नाक पर चोट पडी, तब सोचा। तब न सोचा, जब तेरी गदल को बहुओं ने आँखें तरेरकर देखा। अरे, कौन किसकी परवा करता है!''
''गदल!'' - डोडी ने भर्राए स्वर में कहा - ''मैं डरता था।''
''भला क्यों तो?''
''गदल, मैं बुढ्ढा हँू। डरता था, जग हँसेगा। बेटे सोचेंगे, शायद चाचा का अम्माँ से पहले से नाता था, तभी चाचा ने दूसरा ब्याह नहीं किया। गदल,भैया की भी बदनामी होती न?''
''अरे चल रहने दे!'' गदल ने उत्तर दिया - ''भैया का बडा ख्याल रहा तुझे? तू नहीं था कारज में उनके क्या? मेरे सुसर मरे थे, तब तेरे भैया ने बिरादरी को जिमाकर होठों से पानी छुलाया था अपने। और तुम सबने कितने बुलाए? तू भैया दो बेटे। यही भैया हैं, यहीं बेटे हैं? पच्चीस आदमी बुलाए कुल। क्यों आखिर? कह दिया लडाई में कानून है। पुलिस पच्चीस से ज्यादा होते ही पकड ले जाएगी! डरपोक कहीं के! मैं नहीं रहती ऐसों के।''
हठात् डोडी क़ा स्वर बदला। कहा - ''मेरे रहते तू पराए मरद के जा बैठेगी?''
''हाँ।''
''अबके तो कह!'' - वह उठकर बढा।
''सौ बार कहँू लाला!'' गदल पडी-पडी बोली।
डोडी बढा।
''बढ!'' - गदल ने फुफकारा।

डोडी रूक़ गया। गदल देखती रही। डोडी ज़ाकर बैठ गया। गदल देखती रही। फिर हँसी। कहा - ''तू मुझे करेगा! तुझमें हिम्मत कहाँ है देवर! मेरा नया मरद है न? मरद है। इतनी सुन तो ले भला। मुझे लगता है तेरा भइया ही फिर मिल गया है मुझे। तू?'' - वह रूकी- ''मरद है! अरे कोई बैयर से घिघियाता है? बढक़र जो तू मुझे मारता, तो मैं समझती, तू अपनापा मानता हैं। मैं इस घर में रहँूगी?''
डोडी देखता ही रह गया। रात गहरी हो गई। गदल ने लहँगे की पर्त फैलाकर तन ढक लिया। डोडी ऊँघने लगा।

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ओसारे में दुल्ले ने अँगडाई लेकर कहा - ''आ गई देवरानी जी! रात कहाँ रही?''
सूका डूब गया था। आकाश में पौ फट रही थी। बैल अब उठकर खडे हो गए थे। हवा में एक ठंडक थी।
गदल ने तडाक से जवाब दिया - ''सो, जेठानी मेरी! हुकुम नहीं चला मुझ पर। तेरी जैसी बेटियाँ है मेरी। देवर के नाते देवरानी हँू, तेरी जूती नहीं।''
दुल्लो सकपका गई। मौनी उठा ही था। भन्नाया हुआ आया। बोला- ''कहाँ गई थी?''
गदल ने घँूघट खींच लिया, पर आवाज नहीं बदली। कहा - ''वही ले गए मुझे घेरकर! मौका पाके निकल आई।''

मौनी दब गया। मौनी का बाप बाहर से ही ढोर हाँक ले गया। मौनी बढा।
''कहाँ जाता है?'' - गदल ने पूछा।
''खेत-हार।''
''पहले मेरा फैसला कर जा।'' गदल ने कहा।

दुल्लो उस अधेड स्त्री क़े नक्शे देखकर अचरज में खडी रही।
''कैसा फैसला? - मौना ने पूछा। वह उस बडी स्त्री से दब गया।
''अब क्या तेरे घर का पीसना पीसँूगी मैं?'' - गदल ने कहा - ''हम तो दो जने हैं। अलग करेंगे खाएँगे।'' - उसके उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही यह कहती रही - ''कमाई शामिल करो, मैं नहीं रोकती, पर भीतर तो अलग-अलग भले।''

मौनी क्षण-भर सन्नाटे में खडा रहा। दुल्लो तिनककर निकली। बोली - ''अब चुप क्यों हो गया, देवर? बोलता क्यों नहीं? देवरानी लाया है कि सास! तेरी बोलती क्यों नहीं कढती? ऐसी न समझियो तू मुझे! रोटी तवे पर पलटते मुझे भी आँच नहीं लगती, जो मैं इसकी खरी-खोटी सुन लँूगी,समझा? मेरी अम्माँ ने भी मुझे चूल्हे की मट्टी खाके ही जना था। हाँ!''

''अरी तो सौत!'' - गदल ने पुकारा - ''मट्टी न खा के आई, सारे कुनबे को चबा जाएगी डायन। ऐसी नहीं तेरी गुड क़ी भेली है, जो न खाएंगे हम, तो रोटी गले में फंदा मार जाएगी।''

मौनी उत्तर नहीं दे सका। वह बाहर चला गया। दुपहर हो गई। दुल्लो बैठी चरखा कात रही थी। नरायन ने आकर आवाज दी - ''कोई है?''
दुल्लो ने घँूघट काढ लिया। पूछ - ''कौन हो?''
नरायन ने खून का घँूट पीकर कहा - ''गदल का बेटा हँू।''
दुल्लो घँूघट में हँसी। पूछा - ''छोटे हो कि बडे?''
''छोटा।''
''और कितने है!''
''कित्ते भी हों। तुझे क्या?'' - गदल ने निकालकर कहा।
''अरे आ गई!'' कहकर दुल्लो भीतर भागी।
''आने दे आज उसे। तुझे बता दँूगी जिठानी!'' - गदल ने सिर हिलाकर कहा।
''अम्माँ!'' - नरायन ने कहा - ''यह तेरी जिठानी!''
''क्यों आया है तू? यह बता!'' - गदल झल्लाई।
''दंड धरवाने आया हँू, अम्माँ! - कहकर नरायन आगे बैठने को बढा।
''वहीं रह!'' - गदल ने कहा।

उसी समय लोटा-डोर लिए मौनी लौटा। उसने देखा कि गदल ने अपने कडे अौर हँसली उतारकर फेक दी और कहा - ''भर गया दंड तेरा! अब मरद का सब माल दबाकर बहुओं के कहने से बेटों ने मुझे निकाल दिया है।''
नरायन का मँुह स्याह पड ग़या। वह गहने उठाकर चला गया। मौनी मन-ही-मन शंकित-सा भीतर आया।

दुल्लो ने शिकायत की - ''सुना तूने देवर! देवरानी ने गहने दे दिए। घुटना आखिर पेट को ही मुडा। चार जगह बैठेगी, तो बेटों के खेत की डौर पर डंडा-धूआ तक लग जाएँगे, पक्का चबूतरा घर के आगे बन जाएगा, समझा देती हँू। तुम भोले-भाले ठहरे। तिरिया-चरित्तर तुम क्या जानो। धंधा है यह भी। अब कहेगी, फिर बनवा मुझे।''

गदल हँसी, कहा- ''वाह जिठानी, पुराने मरद का मोल नए मरद से तेरे घर की बैयर चुकवाती होंगी। गदल तो मालकिन बनकर रहती है, समझी! बाँदी बनकर नहीं। चाकरी करूँगी तो अपने मरद की, नहीं तो बिधना मेरे ठेंगे पर। समझी! तू बीच में बोलनेवाली कौन?''
दुल्लो ने रोष से देखा और पाँव पटकती चली गई।
मौनी ने देखा और कहा - ''बहुत बढ-बढक़र बातें मत हाँक, समझ ले घर में बहू बनकर रह!''
''अरे तू तो तब पैदा भी नहीं हुआ था, बालम!'' - गदल ने मुस्कराकर कहा - ''तब से मैं सब जानती हँू। मुझे क्या सिखाता है तू? ऐसा कोई मैंने काम नहीं किया है, जो बिरादरी के नेम के बाहर हो। जब तू देखे, मैंने ऐसी कोई बात की हो, तो हजार बार रोक, पर सौत की ठसक नहीं सहँूगी।''
''तो बताऊँ तुझे!'' - वह सिर हिलाकर बोला।
गदल हँसकर ओबरी में चली गई और काम में लग गई।

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ठंडी हवा तेज हो गई। डोडी चुपचाप बाहर छप्पर में बैठा हुक्का पी रहा था। पीते-पीते ऊब गया और उसने चिलम उलट दी और फिर बैठा रहा।

खेत से लौटकर निहाल ने बैल बाँधे, न्यार डाला और कहा - ''काका!'' डोडी क़ुछ सोच रहा था। उसने सुना नहीं।
''काका!'' - निहाल ने स्वर उठाकर कहा।
''हे!'' डोडी चौक उठा - ''क्या है? मुझसे कहा कुछ?''
''तुमसे न कहँूगा, तो कहँूगा किससे? दिन-भर तो तुम मिले नहीं। चिम्मन कढेरा कहता था, तुमने दिन-भर मनमौजी बाबा की धूनी के पास बिताया, यह सच है?''
''हाँ, बेटा, चला तो गया था।''
''क्यों गए थे भला?''
''ऐसे ही जी किया था, बेटा!''
''और कस्बे से घी कटऊ क्या कराया कि बनिए का आदमी आया था। मैंने कहा - ''नहीं है, वह बोला - लेके जाऊँगा। झगडा होते-होते बचा।''
''ऐसा नहीं करते, बेटा!'' - डोडी ने कहा - ''बौहरे से कोई झगडा मोल लेता है?''

निहाल ने चिलम उठाई, कंडों में से आँच बीनकर धरी और फँूक लगाता हुआ आया। कहा - ''मैं तो गया नहीं। सिर फूट जाते। नरायन को भेजा था।''
''कहाँ?'' डोडी चौंका।
''उसी कुलच्छनी कुलबोरनी के पास।''
''अपनी माँ के पास?''
''न जाने तुम्हें उससे क्या है, अब भी तुम्हें उस पर गुस्सा नहीं आता। उसे माँ कहँूगा मैं?''
''पर बेटा, तू न कह, जग तो उसे तेरी माँ ही कहेगा। जब तक मरद जीता है, लोग बैयर को मरद की बहू कहकर पुकारते हैं, जब मरद मर जाता है, तो लोग उसे
बेटे की अम्माँ कहकर पुकारते हैं। कोई नया नेम थोडी ही है।''
निहाल भुनभुनाया। कहा- ''ठिक है, काका ठीक है, पर तुमने अभी तक ये तो पूछा ही नहीं कि क्यों भेजा था उसे?''
''हाँ बेटा!'' - डोडी ने चौंककर कहा - ''यहा तो तूने बताया ही नहीं! बता न?''
''दंड भरवाने भेजा था। सो पंचायत जुडवाने के पहले ही उसने तो गहने उतार फेंके।''

डोडी मुस्कुराया। कहा - ''तो वह यह बता रही है कि घरवालों ने पंचायत भी नहीं जुडवाई? यानी हम उसे भगाना ही चाहते थे। नरायन ले आया?''
''हाँ।''
डोडी सोचने लगा।
''मैं फेर आऊँ?'' - निहाल ने पूछा।
''नहीं बेटा!'' डोडी ने कहा - ''वह सचमुच रूठकर ही गई है। और कोई बात नहीं है। तूने रोटी खा ली?''
''नहीं।''
''तो जा पहले खा ले।''
निहाल उठ गया, पर डोडी बैठा रहा। रात का अँधेरा साँझ के पीछे ऐसे आ गया, जैसे कोई पर्त उलट गई हो।
दूर ढोला गाने की आवाज आने लगी। डोडी उठा और चल पडा।
निहाल ने बहू से पूछा - ''काका ने खा ली?''
''नहीं तो।''
निहाल बाहर आया। काका नहीं थे।
''काका।'' उसने पुकारा।
राह पर चिरंजी पुजारी गढवाले हनुमानजी के पट बंद करके आ रहा था। उसने पुछा -''क्या है रे?''
''पाँय लागूँ, पंडितजी।'' निहाल ने कहा - ''काका अभी तो बैठे थे।''
चिरंजी ने कहा- ''अरे, वह वहाँ ढोल सुन रहा है। मैं अभी देखकर आया हँू।''
चिरंजी चला गया, निहाल ठिठक खडा रहा। बहू ने झाँककर पूछा- ''क्या हुआ?''
''काका ढोला सुनने गए हैं।'' - निहाल ने अविश्वास से कहा - ''वे तो नहीं जाते थे।''
''जाकर बुला ले आओ। रात बढ रही है।'' - बहू ने कहा और रोते बच्चे को दूध पिलाने लगी।
निहाल जब काका को लेकर लौटा, तो काका की देही तप रही थी।
''हवा लग गई है और कुछ नहीं।'' - डोडी ने छोटी खटिया पर अपनी निकाली टाँगे समेटकर लेटते हुए कहा - ''रोटी रहने दे, आज जी नहीं चाहता।''
निहाल खडा रहा। डोडी ने कहा - ''अरे, सोच तो, बेटा! मैंने ढोला कितने दिन बाद सुना है।

उस दिन भैया की सुहागरात को सुना था, या फिर आज ...।''
निहाल ने सुना और देखा, डोडी अाँख मीचकर कुछ गुनगुनाने लगा था ...़

शाम हो गई थी। मौनी बाहर बैठा था। गदल ने गरम-गरम रोटी और आम की चटनी ले जाकर खाने को धर दी।
''बहुत अच्छी बनी है।'' - मौनी ने खाते हुए कहा - ''बहुत अच्छी है।''
गदल बैठ गई। कहा - ''तुम एक ब्याह और क्यों नहीं कर लेते अपनी उमिर लायक?''
मौनी चौंका। कहा - ''एक की रोटी भी नहीं बनती?''
''नहीं'', गदल ने कहा - ''सोचते होंगे सौत बुलाती हँू , पर मरद का क्या? मेरी भी तो ढलती उमिर है। जीते जी देख जाऊँगी तो ठीक है। न हो ते हुकूमत करने को तो एक मिल जाएगी।''
मौना हँसा। बोला - ''यों कह। हौंस है तुझे, लडने को चाहिए।''
खाना खाकर उठा, तो गदल हुक्का भरकर दे गई और आप दीवार की ओट में बैठकर खाने लगी। इतने में सुनाई दिया - ''अरे, इस बखत कहाँ चला?''
''जरूरी काम है, मौनी!'' - उत्तर मिला - ''पेसकार साब ने बुलवाया है।''
गदल ने पहचाना। उसी के गाँव का तो था, घोटया मैना का चंदा गिर्राज ग्वारिया। जरूर पेसकार की गाय की चराने की बात होगी।
''अरे तो रात को जा रहा है?'' - मौनी ने कहा - ''ले चिलम तो पीता जा।''
आकर्षण ने रोका। गिर्राज बैठ गया। गदल ने दूसरी रोटी उठाई। कौर मँुह में रखा।
''तुमने सुना?'' गिर्राज ने कहा और दम खींचा।
''क्या?'' मौनी ने पूछा।
''गदल का देवर डोडी मर गया।''
गदल का मँुह रूक गया। जल्दी से लोटे के पानी के संग कौर निगला और सुनने लगी। कलेजा मँुह को आने लगा।
''कैसे मर गया?'' - मौनी ने कहा - ''वह तो भला-चंगा था!''
''ठंड लग गई, रात उघाडा रह गया।''
गदल द्वार पर दिखाई दी। कहा - ''गिर्राज!''
''काकी!'' - गिर्राज ने कहा - ''सच। मरते बखत उसके मँुह से तुम्हारा नाम कढा था, काकी। बिचारा बडा भला मानस था।''
गदल स्तब्ध खडी रही।
गिर्राज चला गया।
गदल ने कहा - ''सुनते हो!''
''क्या है री?''
''मैं जरा जाऊँगी।''
''कहाँ? - वह आतंकित हुआ।
''वहीं।''
''क्यों?''
''देवर मर गया है न?''
''देवर! अब तो वह तेरा देवर नहीं।''
गदल झनझनाती हुई हँसी हँसी - ''देवर तो मेरा अगले जनम में भी रहेगा। वही न मुझे रूखाई दिखाता, तो क्या यह पाँव कटे बिना उस देहरी से बाहर निकल सकते थे? उसने मुझसे मन फेरा, मैने उससे। मैंने ऐसा बदला लिया उससे!''
कहते कहते वह कठोर हो गई।
''तू नहीं जा सकती।'' - मौनी ने कहा।
''क्यों?'' - गदल ने कहा - ''तू रोकेगा? अरे, मेरे खास पेट के जाए मुझे रोक न पाए। अब क्या है? जिसे नीचा दिखाना चाहती थी, वही न रहा और तू मुझे रोकनेवाला है कौन? अपने मन से आई थी, रहँूगी, नहीं रहँूगी, कौन तूने मेरा मोल दिया है। इतना बोल तो भी लिया - तू जो होता मेरे उस घर में तो, तो जीभ कढवा लेती तेरी।''
''अरी चल-चल।''
मौनी ने हाथ पकडकर उसे भीतर धकेल दिया और द्वार पर खाट डालकर लेटकर हुक्का पीने लगा।
गदल भीतर रोने लगी, परंतु इतने धीरे कि उसकी सिसकी तक मौनी नहीं सुन सका। आज गदल का मन बहा जा रहा था। रात का तीसरा पहर बीत रहा था। मौनी की नाक बज रही थी। गदल ने पूरी शक्ति लगाकर छप्पर का कोना उठाया और साँपिन की तरह उसके नीचे से रेंगकर दूसरी ओर कूद गई।

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मौनी रह-रहकर तडपता था। हिम्मत नहीं होती थी कि जाकर सीधे गाँव में हल्ला करे और लट्ठ के बल पर गदल को उठा लाए। मन करता सुसरी की टाँगे तोड दे। दुल्लो ने व्यंग्य भी किया कि उसकी लुगाई भागकर नाक कटा गई है, खून का-सा घँूट पीकर रह गया। गूजरों ने जब सुना, तो कहा - ''अरे बुढिया के लिए खून-खराबा कराएगा! और अभी तेरा उसने खरच ही क्या कराया है? दो जून रोटी खा गई है, तुझे भी तो टिक्कड ख़िलाकर ही गई!''
मौनी का क्रोध भडक़ गया।
घोटया का गिर्राज सुना गया था।

जिस वक्त गदल पहँुची, पटेल बैठा था। निहाल ने कहा था - ''खबरदार! भीतर पाँव न धरियो!''
''क्यों लौट आई है, बहू?'' पटेल चौंका था। बोला- ''अब क्या लेने आई है?''
गदल बैठ गई। कहा - ''जब छोटी थी, तभी मेरा देवर लट्ठ बाँध मेरे खसम के साथ आया था। इसी के हाथ देखती रह गई थी मैं तो। सोचा था मरद है, इसकी छत्तर-छाया में जी लँूगी। बताओ, पटेल, वह ही जब मेरे आदमी के मरने के बाद मुझे न रख सका, तो क्या करती? अरे, मैं न रही, तो इनसे क्या हुआ? दो दिन में काका उठ गया न? इनके सहारे मैं रहती तो क्या होता?''
पटेल ने कहा- ''पर तूने बेटा-बेटी की उमर न देखी बहू।''
''ठीक है'', गदल ने कहा - ''उमर देखती कि इज्जत, यह कहो। मेरी देवर से रार थी, खतम हो गई। ये बेटा है, मैने कोई बिरादरी के नेम के बाहर की बात की हो तो रोककर मुझ पर दावा करो। पंचायत में जवाब दँूगी। लेकिन बेटों ने बिरादरी के मँुह पर थूका, तब तुम सब कहाँ थे?''
''सो कब?'' - पटेल ने आश्चर्य से पूछा।
''पटेल न कहेंगे तो कौन कहेगा? पच्चीस आदमी खिलाकर लुटा दिया मेरे मरद के कारज में!''
''पर पगली, यह तो सरकार का कानून था।''
''कानून था!'' - गदल हँसी - ''सारे जग में कानून चल रहा है, पटेल?

दिन दहाडे भैंस खोलकर लाई जाती हैं। मेरे ही मरद पर कानून था? यों न कहोगे, बेटों ने सोचा, दूसरा अब क्या धरा है, क्यों पैसा बिगाडते हो?कायर कहीं के?''
निहाल गरजा - ''कायर! हम कायर? तू सिंधनी?''
''हाँ मैं सिंधनी!'' ...ग़दल तडपी - ''बोल तुझमें है हिम्मत?''
''बोल!'' - ''वह भी चिल्लाया।
''जा, बिरादरी कारज में न्योता दे काका के।'' - गदल ने कहा।
निहाल सकपका गया। बोला - ''ेपुलस ...''
ग़दल ने सीना ठोंककर कहा - ''बस?''
''लुगाई बकती है!'' - पटेल ने कहा - ''गोली चलेगी, तो?''
गदल ने कहा - ''धरम-धुरंधरों ने तो डूबो ही दी। सारी गुजरात की डूब गई, माधो। अब किसी का आसरा नहीं। कायर-ही-कायर बसे हैं।''
फिर अचानक कहा - ''मैं करूँ परबंध?''
''तू?'' - निहाल ने कहा।
''हाँ, मैं!'' ...़ अौर उसकी आँखों में पानी भर आया। कहा - ''वह मरते बखत मेरा नाम लेता गया है न, तो उसका परबंध मैं ही करूँगी।''

मौनी आश्चर्य में था। गिर्राज ने बताया था कि कारज का जोरदार इंतजाम है। गदल ने दरोगा को रिश्वत दी है। वह इधर आएगा ही नहीं। गदल बडा इंतजाम कर रही है। लोग कहते है, उसे अपने मरद का इतना गम नहीं हुआ था, जितना अब लगता है।

गिरर््राज तो चला गया था, पर मौनी में विष भर गया था। उसने उठते हुए कहा - ''तो गदल! तेरी भी मन की होने दँू, सो गोला का मौनी नहीं। दरोगा का मँुह बंद कर दे, पर उससे भी ऊपर एक दरबार है। मैं कस्बे में बडे दरोगा से शिकायत करूँगा।''

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कारज हो रहा था। पाँते बैठतीं, जीमतीं, उठ जातीं और कढाव से पुए उतरते। बाहर मरद इंतजाम कर रहे थे, खिला रहे थे। निहाल और नरायन ने लडाई में महँगा नाज बेचकर जो घडाें में नोटों की चाँदी बनाकर डाली थी, वह निकली और बौहरे का कर्ज चढा। पर डाँग में लोगों ने कहा -''गदल का ही बूता था। बेटे तो हार बैठे थे। कानून क्या बिरादरी से ऊपर है?''

गदल थक गई थी। औरतों में बैठी थी। अचानक द्वार में से सिपाही-सा दीखा। बाहर आ गई। निहाल सिर झुकाए खडा था।
''क्या बात है, दीवानजी?'' - गदल ने बढक़र पूछा।
स्त्री का बढक़र पूछना देख दीवान सकपका गया।
निहाल ने कहा - ''कहते हैं कारज रोक दो।''
''सो, कैसे?'' - गदल चौंकी।
''दरोगाजी ने कहा है।'' दीवानजी ने नम्र उत्तर दिया।
''क्यों? उनसे पूछकर ही तो किया जा रहा है।'' उसका स्पष्ट संकेत था कि रिश्वत दी जा चुकी है।
दीवान ने कहा - ''जानता हँू, दरोगाजी तो मेल-मुलाकात मानते हैं, पर किसी ने बडे दरोगाजी के पास शिकायत पहँुचाई है, दरोगाजी को आना ही पडेग़ा। इसी से
उन्होंने कहला भेजा है कि भीड छाँट दो। वर्ना कानूनी कार्रवाई करनी पडेग़ी।''

क्षणभर गदल ने सोचा। कौन होगा वह? समझ नहीं सकी। बोली - ''दरोगाजी ने पहले नहीं सोचा यह सब? अब बिरादरी को उठा दें? दीवानजी, तुम भी बैठकर पत्तल परोसवा लो। होगी सो देखी जाएगी। हम खबर भेज देंगे, दरोगा आते ही क्यों हैं? वे तो राजा है।''
दीवानजी ने कहा -''सरकारी नौकरी है। चली जाएगी? आना ही होगा उन्हें।''
''तो आने दो!'' - गदल ने चुभते स्वर से कहा - ''सब गिरफ्तार कर लिए जाएँगे। समझी! राज से टक्कर लेने की कोशिश न करो।''
अरे तो क्या राज बिरादरी से ऊपर है?'' - गदल ने तमककर कहा - ''राज के पीसे तो आज तक पिसे हैं, पर राज के लिए धर्म नहीं छोड देंगे, तुम सुन लो! तुम धरम छीन लो, तो हमें जीना हराम है।''
गदल के पाँव के धमाके से धरती चल गई।
तीन पाँते और उठ गई, अंतिम पाँत थी। निहाल ने अँधेरे में देखकर कहा - ''नरायन, जल्दी कर। एक पाँत बची है न?''
गदल ने छप्पर की छाया में से कहा - ''निहाल!''
निहाल गया।
''डरता है?'' - गदल ने पूछा।
सूखे होठों पर जीभ फेरकर उसने कहा - ''नहीं!''
''मेरी कोख की लाज करनी होगी तुझे।'' - गदल ने कहा - ''तेरे काका ने तुझको बेटा समझकर अपना दूसरा ब्याह नामंजूर कर दिया था। याद रखना,उसके और कोई नहीं।''
निहाल ने सिर झुका लिया।
भागा हुआ एक लडक़ा आया।
''दादी!'' वह चिल्लाया।
''क्या है रे?'' - गदल ने सशंक होकर देखा।
''पुलिस हथियारबंद होकर आ रही है।''
निहाल ने गदल की ओर रहस्यभरी दृष्टि से देखा।
गदल ने कहा - ''पाँत उठने में ज्यादा देर नहीं है।''
''लेकिन वे कब मानेंगे?''
''उन्हें रोकना होगा।''
''उनके पास बंदूकें हैं।''
''बंदूकें हमारे पास भी हैं, निहाल!'' - गदल ने कहा - ''डाँग में बंदूकों की क्या कमी?''
''पर हम फिर खाएँगे क्या!''
''जो भगवान देगा।''
बाहर पुलिस की गाडी क़ा भोंपू बजा। निहाल आगे बढा। दरोगा ने उतरकर कहा - ''यहाँ दावत हो रही है?''
निहाल भौंचक रह गया। जिस आदमी ने रिश्वत ली थी, अब वह पहचान भी नहीं रहा था।
''हाँ। हो रही है?'' - उसने क्रुद्ध स्वर में कहा।
''पच्चीस आदमी से ऊपर है?''
''गिनकर हम नहीं खिलाते, दरोगाजी!''

''मगर तुम कानून तो नहीं तोड सकते।
''राज का कानून कल का है, मगर बिरादरी का कानून सदा का है, हमें राज नहीं लेना है, बिरादरी से काम है।''
''तो मैं गिरफ्तार करूँगा!''
गदल ने पुकारा - ''निहाल।''
निहाल भीतर गया।
गदल ने कहा - ''पंगत होने तक इन्हें रोकना ही होगा!''
''फिर!''
''फिर सबको पीछे से निकाल देंगे। अगर कोई पकडा गया, तो बिरादरी क्या कहेगी?''
''पर ये वैसे न रूकेंगे। गोली चलाएँगे।''
''तू न डर। छत पर नरायन चार आदमियों के साथ बंदूकें लिए बैठा है।''
निहाल काँप उठा। उसने घबराए हुए स्वर से समझने की कोशिश की - ''हमारी टोपीदार हैं, उनकी रैफल हैं।''
''कुछ भी हो, पंगत उतर जाएगी।''
''और फिर!''
''तुम सब भागना।''
हठात् लालटेन बुझ गई। धाँय-धाँय की आवाज आई।
गोलियाँ अंधकार में चलने लगीं।
गदल ने चिल्लाकर कहा - ''सौगंध है, खाकर उठना।''
पर सबको जल्दी की फिकर थी।
बाहर धाँय-धाँय हो रही थी। कोई चिल्लाकर गिरा।
पाँत पीछे से निकलने लगी।
जब सब चले गए, गदल ऊपर चढी। निहाल से कहा - ''बेटा!''
उसके स्वर की अखंड ममता सुनकर निहाल के रोंगटे उस हलचल में भी खडे हो गए। इससे पहले कि वह उत्तर दे, गदल ने कहा - ''तुझे मेरी कोख की सौगंध है। नरायन को और बहू-बच्चों को लेकर निकल जो पीछे से।''
''और तू?''
''मेरी फिकर छोड! मैं देख रही हँू, तेरा काका मुझे बुला रहा है।''
निहाल ने बहस नहीं की। गदल ने एक बंदूकवाले से भरी बंदूक लेकर कहा - ''चले जाओ सब, निकल जाओ।''
संतान के मोह से जकडे हुए युवकों को विपत्ति ने अंधकार में विलीन कर दिया।
गदल ने घोडा दबाया। क़ोई चिल्लाकर गिरा। वह हँसी। विकराल हास्य उस अंधकार में गँूज उठा।
दरोगा ने सुना तो चौंका ः औरत! मरद कहाँ गए! उसके कुछ सिपाहियों ने पीछे से घेराव डाला और ऊपर चढ ग़ए। गोली चलाई। गदल के पेट में लगी।

युद्ध समाप्त हो गया था। गदल रक्त से भीगी हुई पडी थी। पुलिस के जवान इकट्ठे हो गए।
दरोगा ने पूछा - ''यहाँ तो कोई नहीं?''
''हुजूर! - एक सिपाही ने कहा - ''यह औरत है।''
दरोगा आगे बढ अाया। उसने देखा और पूछा - ''तू कौन है?''
गदल मुस्कराई और धीरे से कहा - ''कारज हो गया, दरोगाजी! आतमा को सांति मिल गई।''
दरोगा ने झल्लाकर कहा - ''पर तू है कौन?
गदल ने और भी क्षीण स्वर से कहा - ''जो एक दिन अकेला न रह सका, उसी की ... ।''
अौर सिर लुढक़ गया। उसके होठों पर मुस्कराहट ऐसी दिखाई दे रही थी, जैसे अब पुराने अंधकार में जलाकर लाई हुई ...पहले की बुझी लालटेन।

Sunday, 28 July 2013

मजनूँ का टीला / भैरव प्रसाद गुप्त



शरद-पूर्णिमा की रात भीग चुकी थी। चाँद जोबन पर था। चाँदनी की उज्ज्वल मुस्कान की आभा में नयी दिल्ली रुपहली हो स्वप्न-नगरी की तरह मोहक हो उठी थी। सुफेद-सुफेद इमारतें चाँदनी की सुफेदी में एक रूप हो गयी थीं। काली-काली, चमकीली सिमेण्ट की सडक़ें ऐसी लगती थीं, जैसे ज्योत्सना रानी ने अपनी रूपहली अलकों में काले-काले रेशमी फीते बाँध रखे हो।

चारों ओर छाये हुए रहस्यमय सन्नाटे को तीर की नोक की तरह चीरती एक किश्तीनुमा, सुफेद कार की धीमी भरभराहट की आवाज मिन्टो रोड पर बही जा रही थी। लगता था कि कार बिलकुल नयी है, और उसका चालक भरसक इस प्रयत्न में है कि कार चलने में और भी कम आवाज हो। काली मिन्टो रोड पर धीमी चाल से दौड़ती हुई सुफेद किश्तीनुमा कार ऐसी लगती थी, जैसे जमुना के श्यामल जल की मन्द-मन्द धार में चाँदी की एक नाव आप ही बही जा रही हो।

मोड़ पर कार दाहिनी ओर मुड़ी, और चालक ने आहिस्ते से ब्रेक लगाया। जरा-सी घर्र की आवाज हुई। कार एक घने वृक्ष के साये में खड़ी हो गयी। दो चमकती हुई आँखें, जिनमें किसी अपने प्यारे को देखने की उत्सुकता मचल रही थी, बायें दरवाजे पर झाँकने लगीं। कोई नजर न आया। पलकें और भी ऊपर उठीं। आँखें इधर-उधर हिली-डुलीं। फिर भी कोई नजर नहीं आया। तब दरवाजे के बाहर एक सुफेद हाथ निकला। कलाई पर रेडियम घड़ी भूत की आँख की तरह चमक उठी। उन आँखों ने देखा, छोटी सूई बारह पर थी और बड़ी सूई ग्यारह पर। 'अभी पाँच मिनट हैं,' साँस में ही मिली हुई एक आवाज आयी। आँखें अब भी घड़ी पर ही टिकी हुई थीं। छोटी सूई बारह पर थी और बड़ी ग्यारह पर। छोटी सूई और बड़ी सूई! 'ऊहूँ! गलत हैं। बड़ी सूई को बारह पर होना चाहिए और छोटी सूई को ग्यारह पर, क्योंकि बड़ी सूई संकेत स्थान पर पहुँच गयी है, पर छोटी सूई अभी पाँच मिनट बाद पहुँचेगी,' है मिसमिसाहट-भरी, अपने सें ही घुटी-सी आवाज आती गयी। फिर लगा, जैसे उन आँखों के सामने घड़ी की छोटी सूई ग्यारह पर आ गयी और बड़ी सूई बारह पर। आँखों के सामने हवा में एक धीमी कँपकँपाहट हुई। 'उफ, अगर ऐसा होता, तो मुझे पाँच मिनट के बदले पूरे एक घण्टे तक प्रतीक्षा करनी पड़ती! कम्बख्त घड़ी के आविष्कारक ने बड़ी सूई को घण्टे की और छोटी सूई को मिनट की सूई क्यों नहीं बनायी! उसे क्या पता नहीं था कि बड़ी सूई संकेत-स्थान पर सदा पहिले पहुँचती है, और छोटी सूई बाद में। शायद उसे पता न हो, शायद उसने अपनी जिन्दगी में कभी किसी लडक़ी को प्यार न किया हो।' फुसफुसाहट की आवाज अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि दरवाजे पर दाँतों की दो पंक्तियाँ चमक उठीं, जैसे किसी की बाँछें खिल गयी हों।

अब छोटी सूई बारह पर थी, और बड़ी सूई छोटी सूई पर। आँखें घड़ी से उडक़र सामने बिछ गयीं। सामने थोड़ी ही दूर पर चाँदनी-भरी हवा में एक सुफेद धब्बा हिलता-डुलता नजर आया। दरवाजे की चेन धीरे से दबी। एक हल्का-सा खटका हुआ, और दरवाजा खुल गया। कार से उतरकर एक सुफेद पोश युवक की आकृति पेड़ के साये में खड़ी हो गयी। हाथों ने उठकर गले की टाई की गाँठ ठीक की। पैण्ट की जेब से एक सुफेद हल्का-सा रूमाल निकला और चेहरे पर घूम फिरकर वापस जेब में चला गया। फिर नजरें सामने हुई। पुतलियों की धीमी कँपकँपाहट से ज्ञात होता था कि युवक के शरीर में एक हल्की सनसनाहट दौड़ रही है। अब सामने चाँदनी में एक सफेद पोश युवती के शरीर की वाह्य रेखाएँ उभरीं जैसे सुफेद आर्ट पेपर पर किसी युवती के कलापूर्णशरीर की वाह्र रेखाओं की छाप उठी हुई हो। उसका दाहिना हाथ हवा में उठा हुआ था, और उस हाथ की उँगलियों में एक काला रूमाल हिल रहा था। युवक ने मुँह से सीटी बजायी। लगा की शाख पर बुलबुल चहक उठी हो। युवती के शरीर की बाह्य रेखाओं में कम्पन हुआ। कानों ने आवाज की दिशा का संकेत किया। होठों पर 'मुस्कान थिरक उठी। सामने की चाँदनी जैसे और उज्ज्वल हो उठी। वह उस पेड़ की ओर बढ़ा। युवक की मुस्कराती आँखों के सामने युवती की तस्वीर सिनेमा की तस्वीर की तरह दूर से समीप आती गयी और स्पष्ट होती गयी। फिर साड़ी की हल्की सरसराहट और नरम कदमों की रबर के सैण्डिलों से निकलती हुई धीमी आवाज! युवक के हृदय की धडक़न कुछ तेज हो गयी। उसके पैर आप ही आगे को उठ गये। और दूसरे ही क्षण पेड़ की घनी छाया की पृष्ठ-भूमि पर श्वेत रेखाओं में नारी और पुरुष का घुला-मिला अजन्ता शैली का एक चित्र खिंच गया। फिर साँसों ही साँसों में उच्छ्वासों की भाषा में ही कुछ नन्हें-मुन्ने, प्यारे-प्यारे, अस्पष्ट शब्द!

युवक ने सहारा दे युवती को कार में बैठाया। फिर आप अन्दर हो, दरवाजा बन्दकर स्टार्ट की चाभी घुमायी। भर्र की एक आवाज हुई। कार एक हचकोला ले आगे सरकी। चाँदनी रात, मुस्कराती हुई फिजा, जिसमें जैसे मस्ती की बारिश हो रही हो, सुखमय निर्जनता और अकेली खुशनुमा कार धीमी हवा की रफ्तार से हमवार सडक़ पर चलती। प्रेमियों के जोड़े को लग रहा था, जैसे वे उडऩ खटोले में बैठे चाँद और तारों के देश की सैर कर रहे हैं।

कार चली जा रही थी। और भरभराहट में लिपटी हुई ये बारीक ध्वनियाँ धीमे पवन की लहरियों में अंकित होती जा रही थीं।

''तुम्हें बहुत देर तक इन्तजार तो नहीं करना पड़ा न?''

''नहीं। तुम बिल्कुल ठीक वक्त पर आ गयीं। मुझे डर तो था कि कहीं तुम्हें नींद न आ जाय।''

''नींद! इस खिलखिलाती चाँदनी में तो नींद का दिल भी मचल रहा होगा कि वह भी अपनी आँखें खोले इस मुस्कराते चाँद को एकटक रात भर देखा करे। पर बेचारी नींद!''

''क्यों, सपने की रानी नींद पर इतनी करूणा क्यों बिखेरी जा रही है?''

''नींद सपने की रानी है, यही तो उसके दुख का विषय है। जब तक बेचारी आँखें बन्द न करे, उसके सपने महाराज आने की कृपा ही नहीं करते।''

''तब तो , प्रीति हमी खुशकिस्मत हैं, जो हमें एक दूसरे से मिलने के लिए अपनी आँखें बन्द नहीं करनी पड़ती।''

''हाँ, बल्कि इसके विपरीत हमें एक दूसरे के पास आने के लिए उस समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ी है, जब तक कि दूसरों की आँखें बन्द नहीं हो जातीं।''

'' एक हलकी हँसी की ध्वनि।''

''क्यों, इतनी रात गये तक भी तुम्हारे यहाँ कोई जग रहा था क्या?''

''मत पूछो, प्रेम! आज तो मैं बेहद परेशान हो गयी थी। न जाने कहाँ से मेरे पिताजी का एक मित्र शाम को ही आ धमका। चाय पी, फिर खाना खाया। मैंने सोचा, अब चला जायगा। पर वह मरदूद जो पिताजी से गप्प लड़ाने लगा, तो लगा, जैसे सुबह करके ही उठेगा। जब ग्यारह बज गया, तो मारे घबराहट के मेरा दम फूलने लगा। लगा, जैसे पूर्णिमा के चाँद पर एक ऐसा काला बादल आ छाया है, जो सुबह तक हटने का नहीं। दिल की उमंगे, तुमसे मिलने की सारी खुशियाँ जैसे हवा हो गयीं। रह-रहकर निराशा से उदास तुम्हारा चेहरा आँखों के सामने फिरने लगा। हृदय मारे व्यथा के कसक उठा। आँखों में आँसू भर आये। आखिर तकिये में मुँह गड़ाये, कलेजे को हाथों से दबाये कुछ देर तक यों ही पड़ी रही। फिर अपने को भुलाने की कोशिश की। मगर दिल था कि उसे किसी पहलू भी चैन ही नहीं मिलता था। क्या करती, सोचा क्यों न कोई उपन्यास ही पढ़ तबीयत बहलाऊँ। उठकर टेबुल-लैम्प का बटन दबाने ही वाली थी कि एक ख्याल दिल में आ चमका। चुटकी बजा मैं उठ खड़ी हुई। धीरे से कमरें की सिटकनी नीचे सरकायी। फिर चाकू ले कमरे के बाहर दीवार पर लगे स्विच-बोर्ड के सामने जा खड़ी हुई। एक बार इधर-उधर आँखें उठा भाँपा। माताजी के कमरें से खर्राटें की आवाज आ रही थी। अनीता के कमरे से नींद में डूबी हुई गहरी साँसें साफ सुनाई दे रही थीं। सिर्फ बाहर के कमरे से पिताजी और उनके मित्र की बातें सुनाई पड़ रही थीं। तार की ओर चाकू उठाते समय एक बार मेरा हाथ काँपा, पर इस चाँदनी रात में तुमसे मिलने की उत्कण्ठा इतनी तीव्र थी मैं दूसरे ही क्षण अपने काँपते हाथ पर काबू पा गयी। तार का कटना था कि पिताजी के कमरे में एक शोर बरपा हो गया। कुर्सियों के इधर-उधर हटने की खडख़ड़ाहट हुई कि मैं अपने कमरे में आ दरवाजों को उठँगाकर चारपायी पर ऐसे पड़ गयी, जैसे आठ ही बजे की सोयी हूँ। नौकरों के नाम बारी-बारी से ले थोड़ी देर तक पिताजी चीखते चिल्लाते रहे। पर उस समय वहाँ था ही कौन? सब के सब खा-पीकर अपने कार्टर में चले गये थे। एक नौकरानी जरूर थी, पर मैंने शाम को ही उसे साँट लिया था। आखिर उनके मित्र के दिमाग में अब जाकर अक्ल आयी। मैंने अपने कमरे से ही सुना, वह पिताजी से कह रहे थे-'ज्यादा जहमत न उठाएँ। काफी रात गुजर चुकी है। अब आप आराम करें।' पिताजी ने जैसे झुँझलाकर कहा-इन कम्बख्त नौकरों से तो तबीयत परेशान है। लाख चीखें चिल्लाएँ, मगर उनके कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती। थोड़ी देर बाद जब सब ओर सन्नाटा छा गया, तब जाकर मेंरी जान में जान आयी।

''तुम कितनी चतुर हो, प्रीति! तुम्हारी इस अनोखी सूझ की जितनी भी तारीफ की जाय, कम है।''

''प्रेम सब कुछ सिखा देता है। दिल में चाह होनी चाहिए, फिर तो राह आप ही निकल आती हैं। हाँ, कभी-कभी इन पाबन्दियों से तबीयत झुँझला जरूर जाती है।''

''लेकिन इस लुक-छिपकर चोरी-चोरी मिलने में जो मजा आता है, वह भला क्या ...''

''सो तो ठीक है। पर एक दिन यही पाबन्दियाँ अगर बेड़ियाँ बन पैरों को जगड़ दें, तो शुरू जवानी के आँख-मिचौली के इन खेलों का हश्र क्या होगा?''

''हमारे प्रेम का खेल हमारी जिन्दगी का खेल है, प्रीति! हम अपने को किसी हालत में भी पाबन्दियों के हवाले नहीं करेंगे? और ये पाबन्दियाँ भी तो तभी तक हैं, जब तक हम अपने पैरों पर खड़े नहीं हो जाते।''

''और यदि वह समय आने के पहले ही ...''

''ओह, प्रीति, आज तुम यों बूढ़ियों-सी क्यों बातें कर रही हो? क्या आज कोई ऐसी बात हो गयी, जिससे तुम्हारे दिल में ऐसी शंकाएँ उठ रही हैं?''

''नहीं-नहीं, प्रेम? अभी तो कुछ ऐसा नहीं हुआ। पर आज जो मुझे एक कड़वा अनुभव हुआ है, उससे मेरा दिल घबरा उठा है। ग्यारह बजे तक जब पिताजी का मित्र न हटा, तो यह सोचकर कि आज मैं तुमसे न मिल सकूँगी, मुझे जो पीड़ा हुई, वह अपनी तरह का मेरा पहला अनुभव था। इसके पहले मुझे ऐसे अनुभव का अवसर ही कहाँ मिला था। इसीलिए बार-बार यह बात मेरे दिमाग में उठ रही है कि काश, कहीं ऐसा हो गया कि मैं तुमसे मिलने से मजबूर कर दी गयी, तो मेरी क्या हालत होगी?''

''बस, इतनी-सी बात से तुम घबरा गयी हो? नहीं, प्रीति तुम्हारे प्रेम के जीवित रहते ऐसा कभी नहीं हो सकेगा। तुम्हारा प्रेम अपना सर्वस्व न्यौछावर करके भी तुम्हें अपना बनाएगा तुम अपने प्रेम पर विश्वास रखो! किसकी हिम्मत है, जो तुम्हें तुम्हारे प्रेम से अलग कर सके?''

''हाँ, प्रेम, तुम्हारे बिना अब मुझसे न रहा जायगा। मेरे रोम-रोम में तुम बस गये हो।''

''प्रीति!''

''प्रेम!''

कार की चाल एक मिनट के लिए और भी धीमी हो गयी। फिर मिली हुई प्रेम की सन्तोषभरी लम्बी साँसों की सिहरती हुई आवाज। कार फिर अपनी रफ्तार से चल पड़ी। फिर वही भरभराहट और उसमें लिपटी हुई बारीक ध्वनियाँ-

''तो आज कहाँ चलने का इरादा है''

''मैंने चिट में लिख तो दिया था।''

''ओह, मैं तो भूल ही रही थी। प्रेम, तुम्हारे पास जब मैं होती हूँ, तो न जाने मेरे दिल-दिमाग की क्या हालत हो जाती है। हाँ, वह मजनूँ का टीला है कहाँ?''

''थोड़ी दूर और है, बड़ा ही सुरम्य स्थान है। देखकर तुम खुश हो जाओगी। हाँ, उस चिट को तुमने फाड़ दिया था न?''

''फाड़ती क्यों? उसे कलेजे से लगा मैंने अपने चित्राधार में रख छोड़ा है।''

सडक़ से मुड़, थोड़ी दूर कच्ची सडक़ पर चल, कार रुक गयी। दोनों उतर हाथ में हाथ झुलाते चल पड़े।

''उई!'' प्रीति का बायाँ पैर गड्ढे में पड़ जाने से घुटने में लचक आ गयी। वह झुककर पैर थाम, चीखकर बैठने को हुई कि प्रेम उसे हाथों में सँभालते परेशान-सा हो बोल पड़ा-

''क्या हुआ?''

''कहाँ?'' और परेशानी जाहिर करता वह बोला।

''यहाँ !'' घुटने पर हाथ रखते उसने कहा।

''यहाँ?'' घुटने पर हाथ रख, प्रीति की ओर आँखें उठाये वह बोला।

''हाँ''

''रास्ता जरा खराब है। बहुत कम लोग यहाँ आते हैं।''- धीरे-धीरे उसके घुटने को सहलाता वह बोला।

''बस करो! अब ठीक हो गया।''- उसका हाथ अपने हाथ में ले वह बोली।

प्रेम के कन्धे पर हाथ रखे वह कुछ बायें पैर से भचकती हुई चली। फिर धीरे-धीरे ठीक से पैर रखने लगी।

''वह जो मीनार दिखाई देती है न, वही है मजनूँ का टीला।'' सामने हाथ से इशारा करते प्रेम बोला।

सामने चाँदनी के प्रकाश में जैसे अन्धकार का एक ऊँचा स्तम्भ धरतीपर खड़ा था। उसी की ओर आँखें उठाये प्रीति बोली-''बहुत पुरानी मालूम पड़ती है।''

''हाँ, बहुत पुरानी है। लोगों का कहना है कि मजनूँ अपनी लैला की खोज में जब पहाड़ों, वीरानों और जंगलों की खाक छान रहा था, तो यहाँ भी उसके पद-चिन्ह पड़े थे। किसी दीवाने ने उन्ही पद-चिन्हों की स्मृति-स्वरूप यह मीनार खड़ी की थी।''

''ओह! तब तो प्रेमियों के लिए यह एक तीर्थ-स्थान है!'' होंठों पर मुस्कान और आँखों में चमक लिये प्रीति बोली।

''आओ, जरा नजदीक से देखें!'' मीनार की ओर मुड़ती आँखों में असीम श्रद्धा लिये प्रीति बोली।

''देखो, काँटों में तुम्हारी साड़ी न उलझ जाय!'' सामने की जंगली बेर की झाड़ी की ओर से प्रीति का बाजू पकड़ अपनी ओर खींचते प्रेम बोला-''पहले चलो, जमुना का आनन्द लूट लें। फिर लौटते इधर से होकर चलेंगे।''

''यहाँ जमुना कहाँ?'' आँखों को ऊपर उठा पुतलियाँ नचाती प्रीति बोली।

''आओ भी तो! हाँ, जरा अपनी साड़ी को कब्जे में कर लो वरना, इन झाड़ियों के काँटों के प्रेम-प्रदर्शन से तुम तो परेशान होओगी ही, मेरी भी अँगुलियाँ उनसे तुम्हारे दामन को बार-बार छुड़ाने में खून-खून हो जाएँगी।'' परिहास भी एक मधुर हँसी हँसता प्रेम प्रीति के आँचल को उसकी कमर में लपेटता बोला।

आगे-आगे प्रेम झाड़ियों की टहनियों को हाँथों से हटाता और उसके पीछे-पीछे प्रीति काँटों से बदन चुराती बढ़ती गयी।

अब वे जमुना के ऊँचे कगार पर थे। सामने रेत के सपाट मैदान में चमकीली चाँदनी की चादर बिछी हुई थी। उसके आगे जमुना की सुनील जल की झलमलाती हुई धार ऐसी लग रही थी, जैसे चाँदी के मैदान से पिघले हुए नीलम की धार बही जा रही हो। कगार पर सटकर खड़े प्रेम और प्रीति खिलखिलाती हुई उत्फुल्ल आँखों से जैसे सामने बिखरे हुए असीम, उजले सौन्दर्य को पी जाना चाहते हों। एक टक सामने देखती ही प्रीति खोयी-सी बोली-''प्रेम, अगर दूर से हमें इसके तरह कोई देखे, तो क्या समझेगा?''

''समझेगा कि आकाश का चाँद पृथ्वी पर उतर चाँदनी के गले में बाहें डाले जमुना की शोभा निहार रहा है।''

कहकर आँखों में जैसे एक नशा-सा भर उसने प्रीति की ओर देखा। प्रीति ने अपनी सीप-सी लम्बी-लम्बी, बोझिल पलकें प्रेम की ओर उठायीं। प्रेम ने देखा, उन पलकों की आड़ में जैसे शराब का समन्दर लहरा रहा था। उसने आवेश में प्रीति का हाथ अपने हाथ में ले जोर से दबा दिया। हृदय का उमड़ता आनन्द साँस की राह निकल प्रीति के कपोल को सहराता निकल गया। ठगे-ठगे-से ही वे सँभलकर एक-दूसरे का सहारा बने नीचे उतरे।

खिली हुई चाँदनी हँसती हुई रूमानी फिज़ा, गुलाबी, शीतल हवा में बसी हुई रह-रहकर सिहरती हुई हवा और चारों ओर दृष्टि की सीमा तक छायी हुई खुशगवार, रहस्यमय खामोश, नीचे मिट्टी मिली हुई कोमल रेत, ऊपर अमृत की बारिश करता चाँद, पीछे लैला-मजनूँ की प्रेम-कहानी का मूर्त रूप मजनूँ का टीला, सामने गोपियों के रस-भर गीतों को गुनगुनाती बहती जा रही जमुना! इन सब के बीच प्रेम और प्रीति! लग रहा था उन्हें, जैसे वे ख्वाबों की दुनियाँ से हवा में पग रखते गुजर रहे हों सौन्दर्य और यौवन के सुगन्धित नशे में झूमते हुए।

तन्मयता में ही प्रेम का हाथ मचलकर प्रीति की ओर बढ़ा कि उसकी कमर में एक आकर्षक झुकाव हुआ, और दूसरे ही क्षण वह खिलखिलाती हुई स्प्रिंग की तरह उछल क्रीड़ातुर-सी भाग खड़ी हुई। शान्त वातावरण में उसकी मधुर खिलखिलाहट से जैसे सैकड़ों चाँदी की नन्हीं-नन्हीं घण्टियाँ टुनटुना उठीं। प्रेम के कान जैसे अमृत से भर उठे, हृदय के तारों में जैसे मधुर-मधुर गीतों की रागिनी बज उठी, आँखों से जैसे प्रेमासव छलक उठा। वह मुस्कराता लपका।

आगे-आगे हर दूसरे-तीसरे कदम पर मुड़-मुडक़र खिलखिलाती, कौतुक-भरी बड़ी-बड़ी आँखों से देखती भागती हुई प्रीति और पीछे-पीछे आँखों में लबालब प्यार भरे प्रेम जैसे उसका मन चाहता हो कि यों ही छिटकी रहे चाँदनी की मोहिनी मुस्कान, यों ही भीगती रहे प्रीति, यों ही गूँजती रहे उसकी खिलखिलाहट और यों ही पीछे-पीछे दौड़ता रहे वह क्षितिज के छोर तक।

क्षितिज के छोर तक तो नहीं, हाँ, जमुना के छोर तक इस शोख सुन्दरता और अल्हड़ यौवन की क्रीड़ामय भाग-दौड़ चलती रही। कछार के अधभीगे रेत पर थकी हुई प्रीति स्वतन्त्रता से दोनों पैर आगे को फैला, दोनों हाथों को पीछे की ओर रेत पर टेक, सिर पीछे को जरा लटका जोर से हाँफती हुई बैठ गयी। आँचल बाँयें कन्धे से बाजू तक फैल लहरा रहा था, और लम्बी बेणी दाँयी बाँह पर नागिन-सी कई बल खा लिपटी हुई-सी थी।

पास आ प्रेम उस सुन्दरता के अस्त-व्यस्त, पर मुक्त विलास को अतृप्त-सी आँखों से मन्त्र-मुग्ध सा देखता रह गया।

''बैठो भी! तुमने तो आज दौड़ाकर मुझे परेशान कर दिया!'' प्रीति ने आँखों को उसकी ओर मोड़ तनिक शिकायत के लहजे में कहा।

उसके दाहिने बैठ, उसकी बेणी को उँगली से छेड़ता, पलकें झुकाये प्रेम बोला-''शान्त सुन्दरता को देखते-देखते जब आँखें ऊब उठीं, तो उसे जरा छेड़ परेशान सुन्दरता का रूप देखने के लिए मन ललक उठा।''

''हूँ,'' आँखें मटका, बनती हुई प्रीति बोली-''तो अब कौन सा रूप देखने का इरादा है?''

''नारी का सब से मनमोहक रूप!'' प्रेम झट से बोल उठा, जैसे इस प्रश्न के उत्तर को पहले ही उसने सोच रखा था। और आँखों में एक मुस्कराता हुआ प्रश्न लिये वह प्रीति की आँखों में देखने लगा।

''वह कौन-सा है?'' आँखों में मचलती उत्सुकता को मुस्कराहट में छिपाती वह बोली।

''नारी का रूठना!'' प्रीति के कान के पास मुँह ले जाकर फुसफुसाया प्रेम।

''अच्छा! तो लो मैं रूठी!'' कहकर आँचल का घँूघट आँख तक खींच, बायें हाथ से प्रेम की छाती को एक हल्का धक्का दे, घूमकर, सिर जरा झुका, आँखों में हास्य-मिश्रित लज्जा लिये मुँह फेर लिया उसने।

उछलकर प्रेम उसके मुँह की ओर जा बैठा, और गर्दन नीचे कर, आँखें उठा उसे देखते बोला-

'सुन्दर नार रूठे तो कौन न मनाये! मान जाओ, मोरी रानी!' आँखों में जैसे कलेजा निकालकर प्रेम बोला।

''हटो भी! यों कोई देखले, तो?'' हाथ से उसका मुँह हटाते शर्माई-सी बनी प्रीति बोली।

''यों कोई देखेगा, तो सोचेगा कि मानसरोवर के तट पर एक हंसों का जोड़ा एक दूसरे की गर्दन में चोंच लिपटाये बैठा है।''

''अच्छा जी!'' और कुछ कहना ही चाहती थी कि हँसी रोके न रुकी और वह खिलखिला कर हँस पड़ी।

प्रेम को लगा, जैसे जमुना के तट पर एक श्वेत कमल खिल उठा हो। सिर उठा उल्लसित आँखों से उसने एक बार आकाश के चाँद को देखा, फिर प्रीति को देख, जमुना पर आँखें टिका मुग्ध-सा बोला-''प्रीति, यह आईना-सी बहती हुई जमुना की धार,ऊपर जा-बजा छिटके हुए तारों के बीच मुस्कराता हुआ चाँद, नीचे नन्हीं-नन्हीं लहरियों पर झूला-झूलता चाँद और तारों का मोहक देश। और इन दो चाँद और तारों की सुन्दर दुनिया के बीच बैठे हम और तुम। लगता है, जैसे आज सृष्टि का सारा सौन्दर्य, सारी सुषमा सिमटकर हमारे हृदयों में आ बसी है। प्रीति, आज के ये मधुर क्षण क्या जीवन में कभी भुलाये जा सकेंगे?'' कहते-कहते प्रेम का कण्ठ जैसे हृदय की आनन्दानुभूति की असीमता के आवेश में रुँध-सा गया। आत्म-विभोर-सी प्रीति ने उसकी छाती पर सिर टेक दिया। दोनों की आँखें आप ही धीरे-धीरे मुँद गयीं जैसे दोनों अपनी आत्मा के लहराते हुए आन्नद-सागर में डुबकी लगा गये। ...

उसी समय मजनूँ के टीले के पास, बेर की झाड़ियों में पत्तों की खडख़ड़ाहट हुई। फिर दो छायाएँ लम्बे-लम्बे कदम रखती कगार पर आ खड़ी हो, इधर-उधर चौकन्नी नजरों से देखने लगीं। दूर जमुना तट की ओर हाथ उठा एक ने फुसफुसाहट के स्वर में दूसरे से कहा-''वह देखो! वही होंगे। तुम जाओ। मैं उस मीनार में छिप जाता हूँ। होशियारी से काम लेना!''

कहने वाली छायामीनार की ओर बढ़ गयी और दूसरी छाया जमुना की ओर।

प्रेम और प्रीति के पीछे कुछ दूर पर खड़ी हो छाया ने उन्हें गौर से देखा। फिर होंठों में ही बुदबुदाया-''वही तो हैं!'' और हल्के कदम रखती वह ठीक उनके पीछे जा खड़ी हुई, और उन्हें फिर एक बार ध्यान से देख धीरे से बोली-''कौन, प्रेम और प्रीति?''

प्रेम और प्रीति की तन्मयता टूटी। अचकचाकर आँखें पीछे की ओर मुड़ीं, तो देखा, एक लम्बा व्यक्ति होंठों पर सुस्मित हास लिये उन्हीं की ओर निहार रहा था। उसके सिर के लम्बे-लम्बे सुफेद बाल गर्दन तक लटके हुए थे, सुफेद दाढ़ी छाती पर लहरा रही थी, सुफेद कुरता घुटनों के नीचे तक और उसके नीचे सुफेद ही तहमद पाँवों तक को ढँके हुए था। प्रेम और प्रीति की आँखों में भय काँप उठा। प्रीति चीखती हुई सी बोल पड़ी-''भूत!'' और उसे ऐसा लगा, जैसे वह बेहोश सी हो रही है। नन्हीं-सी जान!

प्रेम की काँपती आँखों के सामने बचपन की सुनी हुई भूतों की कितनी ही डरावनी कहानियों की घटनाएँ क्षण भर में घूम गयीं। उसका रोम-रोम काँप उठा।

''बेटा! यों घबराओ नहीं।'' छाया ने निहायत ही नरम स्वर में कहा-''मैं भूत नहीं हूँ। और तुम तो सच्चे प्रेमी हो। तुम्हें भूत और भविष्य का डर क्यों? प्रेमी का वत्र्तमान तो इतना सरस, इतना सुखद होता है कि उसे न तो कभी भूत का ख्याल आता है और न उसे भविष्य की चिन्ता ही सताती है!''

प्रेम की सहमी हुई नजर छाया के सौम्य चेहरे पर धीरे-धीरे उठी। गले के नीचे कई बार कुछ उतारकर उसनें किसी तरह टूटे स्वर में कहा-''तो ... तो ... तुम...तुम कौन हो? हम... हमारा नाम तुम्हें कैसे मालूम?''

सहमी हुई प्रीति को प्रेम के पीछे खिसकती देख छाया मुस्करायी। फिर बोली-''मैं मुहब्बत का फरिश्ता हूँ। दुनिया का कोई प्रेमी मुझसे अनजान नहीं। मैं दुनिया में घूम-घूम कर सच्चे प्रेमियों को आशीष देता हूँ। मैं तरसों रोमियों और जुलियट की कब्र पर गया था, परसों यूसूफ और जुलैखा के मदफन पर था, कल, शीरीं अैर फरहाद के मजार की जयारत की थी और आज मजनूँ के टीले की सैर को निकला हूँ। मुझे खुशी है कि यहाँ तुम-जैसे सुन्दर प्रेमियों का जोड़ा मुझे देखने को मिला। प्रेम और प्रीति! वाह क्या नाम हैं तुम्हारे! जैसे भगवान ने दुनिया में तुम्हें इसीलिए भेजा है कि तुम एक-दूसरे को प्यार करो,एक दूसरे के गले में बाहें डाले मुहब्बत की मीठी जिन्दगी गुजारो!''

डरे हुए प्रेम और प्रीति को लगा, जैसे किसी ने जादू के बल से उन्हें अभय प्रदान कर दिया हो। उन्होंने एक-दूसरे को मुहब्बत-भरी नजरों से देखा, और उठ खड़े हुए। और आँखों में अपार श्रद्धा और भक्ति भर, उन्होंने मुहब्बत से फरिश्ते की ओर देखा, जैसे कोई पुजारी अपने इष्ट देवता की मूर्ति की ओर देखता है।

''क्यों, बेटे, टीले की सैर कर चुके?'' एक रहस्य-भरी दृष्टि उन पर फेंकत हुए उसने कहा।

''अभी तो नहीं,'' आज्ञाकारिता के भार से सिर झुकाये आदरसूचक स्वर में प्रेम ने कहा।

''तो आओ, मैं भी उधर ही चल रहा हूँ,'' टीले की ओर मुड़ते हुए उसने कहा।

प्रेम और प्रीति ने एक-दूसरे की आँखों में देखा, जैसे वह पूछना चाहते हों, 'क्यों चला जाय?'

''सच्चे प्रेमी यों नहीं डरते, बेटे!'' उनको यों खड़े देख उसने मुडक़र कहा-'सच्चा प्रेमी यों फूँक-फूँककर पग नहीं उठाता, जरूरत पडऩे पर वह दार को भी अपनी प्रेयसी की बाहें समझ गले में लिपटा लेता है! आओ, आओ मेरे साथ!''

चलते-चलते उसने पूछा-''तो तुम एक-दूसरे को बहुत प्रेम करते हो न?''

''जी, हम एक दूसरे पर जान देते हैं,'' प्रेम ने कहा।

''तुम लोगों के माँ-बाप को मालूम है कि तुम एक-दूसरे को इतना प्रेम करते हो?''

''जी, नहीं, हम दो के सिवाय यह बात किसी को मालूम नहीं।''

''मान लो, तुम्हारे माँ-बाप को यह बात मालूम हो गयी, तो?''

''तब तो ग़जब हो जायगा! हम एक-दूसरे से मिल भी न सकेंगे?''

''फिर?''

''फिर न पूछिए, हम पर क्या गुजरेगी?''

''सुनूँ भी तो''

''उस वक्त हम एक बार साफ-साफ उनसे कह देंगे कि हम एक-दूसरे को बहुत प्यार करते हैं। हमारी शादी कर दो, वरना ...''

''हाँ-हाँ, कहो, वरना?''

''वरना हमारी जिन्दगी तबाह हो जाएगी! हमारी आशाएँ कुँठित हो जाएगी! हम लुट जायँगे! हम पागल हो जायँगे! हम आत्म-हत्या कर लेंगे!''

''आत्म-हत्या कर लेंगे?''

''जी,'' प्रेम ने गले की टाई ढीली कर कहा। लग रहा था, जैसे कोई उसका गला घोंट रहा हो।

''और तुम, प्रीति?''

''मैं ... मैं भी आत्म-हत्या कर लूँगी,?'' गले से कुछ उतारकर प्रीति बोली, जैसे उसका दम घुट रहा हो।

''आत्म-हत्या?'' कहकर एक बार मुहब्बत का फरिश्ता जोर से हँसा। उसकी हँसी की गूँज से जैसे शान्त वातावरण चिहुँक-सा गया।

उसकी ओर मलकती आँखों में कुछ छिपाये-से देखते प्रेम बोला-''क्यों, आप इस तरह हँसे क्यों?''

''हँसा तुम लोगों की आत्म-हत्या की बात पर, बेटा-कितने भोले प्रेमी हो तुम लोग!'' ''तुम लोगों की शादी नहीं हुई, तो आत्म-हत्या कर लोगे। जैसे शादी ही तुम्हारे प्रेम की मंजिल है। क्यों?''

''जी! प्रेम में तड़पते हुए दो दिलों का हमेशा के लिए एक हो जाना ही तो प्रेम की मंजिल है। '' प्रेम ने बहुत सोचकर कहा।

''नहीं, वह प्रेम की मंजिल नहीं है। वह तो एक दूसरे पर अपना एकाधिपत्य प्राप्त करने की चाह कि मंजिल है। वहाँ दो-दो ही रहते हैं। एक कहाँ हो पाते हैं? जहाँ दो हैं जहाँ दुई है, वहाँ प्रेम नहीं हैं। प्रेम अपनी मंजिल स्वयं हैं। वह स्वयं ही हुई या अनेकता का अन्त है। उसके लिए कोई दूसरा नहीं। सब वह स्वयं ही है, स्वयं ही वह सब! मजनूँ का प्रेम प्रेम था। उस प्रेम ने सारी सृष्टि को, मय मजनूँ के, एक कर दिया था! वह एक लैला का रूप था! चाँद-सूरज, फूल-काँटे, ईट-पत्थर, यहाँ तक कि सृष्टि का जर्रा-जर्रा उसके लिए लैलामय हो गया था!''

''उँह!'' मुँह में जैसे कड़वाहट भर प्रेम बोला-''आप तो फरिश्तों की भाषा में बातें करने लगे। मेरी समझ में खाक नहीं आ रहा है। मैं तो जानूँ, मजनूँ लैला से प्रेम करता था। जब उसका प्रेम सफल न हुआ, तो उसने आत्महत्या कर ली। उसी तरह मैं और प्रीति एक-दूसरे को प्रेम करते है। जब हमारा प्रेम सफल न होगा, तो हम भी आत्महत्या कर लेंगे। क्यों, प्रीति?''

प्रीति ने यों ही सिर हिला दिया।

''नहीं, बेटा, मजनूँ ने आत्महत्या नही की। मजनूँ स्वयं की कोई हस्ती तो रह नहीं गयी थी, जिसका अन्त वह आत्महत्या से करता। उसके लिए सारी सृष्टि लैला थी, लैला सारी सृष्टि थी। उसके लिए उसकी लैला क्या मिट गयी, उसकी सारी सृष्टि मिट गयी, वह स्वयं मिट गया। प्रेम के रहस्य से अनभिज्ञ दुनिया ने समझा, मजनूँ ने आत्महत्या कर ली। ह: हा: !''

प्रेम हकबका-सा गया। उसके कण्ठ से कोई बोल न फूटा।

''क्यों, बेटा, चुप क्यों हो गये?''

''जी, मेरी समझ में कुछ आ नहीं रहा है। होगा कुछ।'' प्रेम ने ऐसे कहा, जैसे उसे उस बात से कोई दिलचस्पी न हो।

''खैर!'' प्रीति की ओर एक रहस्य-भरी दृष्टि डाल प्रेम से उसने कहा-''एक बात में तो तुम मजनूँ से अधिकर सौभाग्यशाली हो!''

''वह क्या?'' प्रेम उत्सुक हो बोला।

''वह यह है कि मजनूँ की लैला रात-सी काली थी, तुम्हारी प्रीति चाँद की तरह गोरी है!''

''जी!'' कुछ शरमाया-सा कह प्रेम ने प्रीति की ओर आँखें उठायीं, तो उनमें एक हर्षमिश्रित गर्व की चमक थी।

''अगर कहीं लैला-सी काली लडक़ी से तुम्हें प्रेम हो गया होता, तो?''

''उँह, मैं क्यों वैसी लडक़ी से प्रेम करता?'' कहकर उसने एक प्रश्न-सूचक दृष्टि से प्रीति को देखा।

''जैसे तुमने प्रीति से किया।''

''आप मुहब्बत के फरिश्ता होकर भी ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं? कहीं प्रेम भी किया जाता है? अरे, वह तो स्वयं ही हो जाता है। मेरा और प्रीति का संयोग था, सो हो गया।'' ''कहकर प्रेम ने मुहब्बत के फरिश्ते की ओर ऐसे देखा, जैसे गुरू की कोई गलती पकडऩे के बाद विद्यार्थी उसकी ओर देखता है।

''जब संयोग ही की बात है, तो मान लो कि तुम्हारा और लता का, या माधुरी का संयोग सम्भव हो जाय। तब?''

''एक दिल से एक ही को प्यार किया जा सकता है।''

''सो तो तुम ठीक ही कह रहे हो। अच्छा, मान लो, तुम्हारे जैसा किसी और का दिल तुम्हारी प्रीति को प्यार करने लगे। तब?''

''मेरे रहते किसका साहस है, जो प्रीति की ओर आँख भी उठा सके?'' आवेश में बोला प्रेम।

''शाबाश!'' आँखों में कुछ छिपाते हुए उसने कहा-

''अच्छा, आओ, मजनूँ के पद्-चिन्ह के तो दर्शन कर लो!''

सब मीनार की ओर बढ़े।

''तुम लोगों ने आगरे का ताज देखा है?''

''जी, हाँ! वह मुमताज और शाहजहाँ के शाही प्रेम का दुनिया के प्रेमियों के लिए एक नायाब तोहफा है। जैसे शाही उनका प्रेम था, वैसा ही शाही उसका अमर स्मृति-चिन्ह! जैसे चाँद के टुकड़ों से उसकी रचना हुई हो, जैसे संसार का सारा सौन्दर्य कला के सांचे में ढल यमुना के तटपर आ बैठा हो!''

''और यह मजनूँ के टीले की मीनार?''

''उँह! यह तो वही हुआ कि कहाँ राजा भोज और कहाँ भोजवा तेली! उस शाही ताज का इस घूरे के ढेर से मुकाबिला ही क्या? मालूम होता है, आपने अभी तक ताज को देखा नहीं है।''

''पास से तो नहीं, हाँ, दूर से देखा जरूर है। मुझे तो लगा कि वह एक कागज का खुशनुमा फूल है। और यह मजनूँ के टीले की मीनार इन बेर की जंगली झाड़ियों के बीच खिला हुआ एक जंगली गुलाब का फूल है। इस फूल में जो मुहब्बत की खुशबू है, उसमें कहाँ?''

प्रेम कुछ बोले कि ''लैला! लैला! ...'' की कराह-भरी पुकारें जैसे कहीं दूर से आयी।

अचकचाकर आवाज की ओर कान करते प्रेम बोला-

''यह आवाज कहाँ से आ रही है?''

''यह दीवाने मजनूँ की लैला-लैला की पुकार है बेटा! यहाँ के जर्रे-जर्रे में उसकी पुकार बसी हुई है। कयामत की आखिरी घड़ी तक उसकी पुकार की यह आवाज गूँजती रहेगी! क्या ताज के पास भी तुमने शाहजहाँ के प्रेम की कोई पुकार सुनी है, बेटा?''

प्रेम सहसा कुछ उत्तर न दे सका।

क्रमश: पास आती हुई फिर वही कराह-भरी लैला-लैला की पुकार!

''है! यह पुकार तो बढ़ती ही जा रही है। यह गूँज नहीं मालूम होती। यह तो जैसे सचमुच कोई लैला-लैला पुकारता हमारी ओर बढ़ा आ रहा है। यह मजनूँ का भूत तो नहीं?'' कहते-कहते प्रेम के रोंगटे खड़े हो गये। काँपते हुए हाथ से ही उसने प्रीति की बाँह पकड़ उसे अपनी ओर खींच लिया। प्रीति के दिल की धडक़न बढ़ गयी।

''हो सकता है, बेटा! कदाचित मजनूँ की रूह आज फिर अपनी लैला के फिराक में निकली हो। पर तुम इस कदर घबरा क्यों रहे हो! सच्चे प्रेमी यों नहीं घबराते, बेटा!''

''वह, वह देखो! कोई पागल लैला-लैला पुकारता हमारी ही ओर आ रहा है। प्रीति प्रीति, चलो, चलो। हमें कोई खतरा मालूम होता है!'' काँपती हुई आवाज में कहता प्रेम मुड़ा।

पास ही मीनार की बगल से एक डरावनी छाया हाथ में झल-झल करती कटार लिये, खून सी लाल-लाल आँखों से गुरेरती 'लैला-लैला' चीखती बढ़ी।

मुहब्बत के फरिश्ते ने जोर से एक अट्टहास किया।

थर-थर काँपते पैरों से प्रेम और प्रीति भागें-भागें कि उस डरावनी छाया ने जोर की एक थर्राती हुई चीख की,और लपककर प्रेम की छाती की ओर कटार बढ़ा प्रीति का हाथ पकड़ खुशी में चीख उठी-''मेरी लैला! मेरी लैला''

प्रेम के मुँह से एक चीख निकल गयी। वह हड़बड़ाकर प्रीति का बाजू छोड़ भाग खड़ा हुआ। हाथ छुड़ाने की कोशिश में छटपटाती प्रीति 'प्रेम-प्रेम' पुकारती बेहोश हो उस छाया की बाहों में आ रही।

मुहब्बत के फरिश्ता ने थोड़ी दूर तक प्रेम का पीछा करने का नाट्य कर जोर से हँसता हुआ पुन: मीनार के पास लौट आया।

सडक़ से जब कार की भरभराहट की आवाज आयी, तो छाया मुहब्बत के फरिश्ते से बोली-

''लो, सम्भालो प्रीति को! देख लिया न इनके प्रेम का नाटक!''

''हाँ! 'बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का, जो चीरा, तो एक कतरए खून निकला।'' कहकर वह प्रीति को सम्भालने बढ़ गया।

न जाने कहाँ से बादल का एक सुफेद टुकड़ा उड़ता-उड़ात आ चाँद पर छा गया। उस धँुधली चाँदनी में प्रीति को उठाये वे दोनों सडक़ की ओर जा रहे थे।

दूसरे दिन सुबह चाय के समय प्रीति के पिता, उनके रात वाले वह मित्र, अनीता और उसकी माँ चाय पर प्रीति के इन्तजार में बैठे हुए थे।

देखते-देखते जब पन्द्रह मिनट बीत गये, तो पिता ने कहा-''अनिता, जरा देख तो, बेटी, प्रीति कहाँ रह गयी। चाय ठण्डी हो रही है।''

अनीता उठ प्रीति के कमरे में गयी तो देखा, प्रीति अस्त-व्यस्त सी तकिये में मुँह गड़ाये सिसक रही थी। उसके सिर के बाल बेढंगे तौर पर इधर-उधर बिखरे हुए थे। सिल्क की सुफेद साड़ी में कितनी ही शिकनें पड़ी हुई थीं।

''जीजी, जीजी!'' घबरायी हुई अनीता प्रीति के पलंग की ओर चिल्लाती हुई लपकी। प्रीति अचकचाकर, सिर उठा आँखों को पोंछ उठकर बैठ गयी।

अनीता उसके गले में बाहें डालकर उतावली-सी बोली-''क्यों, जीजी, तुम रो क्यों रही थीं।''

''नहीं तो,'' भीगे गले से कह प्रीति अपने बालों को अँगुलियों से ठीक करने लगी-खोई-खोई हँसी।

''वाह, अभी तो तुम सिसक रही थीं। मैं कहूँ ...''

''कुछ नहीं, अनीता, मैं ठीक हूँ।'' कहकर उसने आँचल सिरपर ठीक से रखा और उठकर खड़ी हो गयी।

''तो चलो चाय पर! पिताजी कब से इन्तजार कर रहे है!'' उसके गले में बाहें डाल फिर झूलती-सी अनीता बोली।

''तुम चलो मैं आ रही हूँ। जरा कपड़े बदल लूँ।''

अनीता चली गयी। प्रीति-तौलिया उठा नल की ओर बढ़ गयी।

प्रीति जब कपड़े बदल, सज-सँवर, अपने कमरे से निकली, तो उसने बहुत कोशिश की कि रोज की तरह उसके होंठों पर स्वाभाविक मुस्कान आ जाय। पर जैसे वह स्वयं को ही कुछ बदली-बदली-सी लग रही थी। मन में तो आया कि आज वह चाय पर न जाय। पर ऐसा करने से पता नहीं वह लोग क्या सोचने लगें। फिर अनीता ने उसे, रोते भी तो देख लिया है। कहीं वही न कुछ कह बैठे। निदान किसी तरह अपने को वश में कर वह चाय पर जा बैठी। उसके बैठते ही पिता बोल पड़े-''क्यों, बेटी, तबीयत तो ठीक है न? बड़ी देर कर दी!''

''जी, जरा कपड़े बदल रही थी'' आँखें नीचे किये ही कह दिया प्रीति ने और अपने को व्यस्त करने के लिए उसने चाय की प्याली उठा ली।

''क्यों? कुछ खाओगी नहीं?'' पिता ने फिर पूछा।

''नहीं, आज कुछ खाने को जी नहीं चाहता है,'' कहकर उसने प्याली होंठों से लगा ली।

''अच्छा, अच्छा! चाय ही पी लो!'' कहकर पिता ने अपने मित्र की ओर कनखियों से देखा। उनके मित्र ने होंठों में ही मुस्करा दिया।

चाय की कुछ चुस्कियाँ ले पिता फिर बोले-''प्रीति की माँ, रात मैंने एक अजीब सपना देखा।''

''क्या देखा?'' कुछ उत्सुक-सी प्रीति की माँ मुँह से प्याला हटाते बोलीं।

''देखा कि,'' प्रीति की ओर एक दबी नजर फेंक वह बोले ''रात के बारह बजे एक चोर मेरे घर में घुस आया है। सबको सोया देख वह प्रीति के कमरे में घुसा और उसे गोद में उठा कमरे से बाहर हुआ कि मैंने उठकर उसकी कलाई पकड़ ली।''

''सच, पिताजी? आपने उसकीं कलाई पकड़ ली?'' भोली अनीता मुस्कराती आँखों को नचाती बोल पड़ी।

''हाँ, बेटी! फिर तो वह प्रीति को छोड़ भाग खड़ा हुआ। मैं चोर-चोर चिल्ला पड़ा कि मेरी नींद खुल गयी।''

प्रीति का मन न जाने कैसा होने लगा। वह उठने को हुई, तो पिता फिर बोल पड़े-''क्यों, बेटी, चाय पी चुकी''

''जी, जरा आज मुझे कालेज का अधिक काम करना है,'' कह वह सिर झुकाये ही उठ खड़ी हुई।

''अरे, थोड़ी देर तो और बैठो, बेटी!''

प्रीति बैठ तो गयी, पर उसके दिल में जैसे हौल-सा हो रहा था।

''क्यों, प्रीति की माँ, तुम चुप कैसे हो गयी!'' पिता ने उनकी ओर देखते कहा।

''तुम्हारा सपना सुन मुझे तो चिन्ता हो गयी। कहीं मेरी बेटी पर कोई आफत आने वाली न हो।''

''अरे, तुम भी क्या बूढ़ियों-सी बातें करने लगीं! जानती हो, वह चोर कौन था?''

''कौन था वह?'' आँखें फैला सहमी-सी वह बोलीं।

''वह, वह'' प्रीति की ओर आँखें कर, मुस्करा कर बोले वह-''वह प्रेम था!''

''पिता जी!'' प्रीति सिर उठा चीख-सी उठी।

''बेटी, तुम यों घबरा क्यों रही हो? और सुनती हो, प्र्रीति की माँ, मैंने सोचा है कि प्रीति की शादी प्रेम से कर दी जाय। यह उसे बहुत चाहती है।''

''नहीं-नहीं, मैं उससे नफरत करती हूँ! मैं उसका मुँह तक देखना नहीं चाहती! वह ... वह ...'' अत्यधिक आवेश के कारण उसके होंठ काँप कर रह गये।

''ऐसा क्यों, बेटी!'' धीरे से पिता ने पूछा।

''वह ...वह ... रात मुझे भूतों के बीच छोडक़र भाग गया!'' अनजान में ही प्रीति के मुँह से ये शब्द निकल पड़े, जैसे वह ख्याल ही उसके दिमाग में चक्कर लगा रहा था, और उसे मतिभ्रम-सा हो गया था।

''भूतों के बीच छोड़ गया था! तो फिर यहाँ कैसे आयी?'' कृत्रिम आश्चर्य प्रकट करते वह बोले।

''हाँ, मैं यहाँ कैसे आ गयी?'' चकराई-सी प्रीति ने जैसे स्वयं से पूछा।

''यह तुम लोग क्या पागलों-सी बातें कर रहे हो?'' प्रीति की माँ जैसे कुछ न समझ प्रीति को पागल-सी आँखों से देखती हुई बोलीं।

मित्र ने अपनी उँगली से पिता की बगल में खोदकर आँखों से कुछ इशारा किया।

पिता जेब से एक चिट निकाल प्रीति की ओर बढ़ाते बोले-''इसें तुम पहचानती हो?''

''यह आपके हाथ कैसे लग गया? ओफ!'' प्रीति की आँखों के सामने की सारी चीजें जैसे चक्कर में आ गयीं।

''कल शाम को एक जगह भेजने के लिए तुम्हारे एक चित्र की जरूरत थी। तुम्हारा चित्राधार अनीता से मँगवाया, तो उसमें यह चिट पड़ा मिला। पढ़ा, तो चित्र भेजने की बात भूल गया। उसी वक्त अपने इस जिगरी दोस्त को बुला भेजा। इससे राय ली, तो तय हुआ कि तुम लोगों के प्रेम-नाटक में हम भी अपना एक दृश्य जोड़ देखें कि क्या होता है। जो हुआ, सो तुम्हें मालूम है। यह मेरे वही मित्र हैं, जिन्होंने मुहब्बत के फरिश्ते का अभिनय किया और पागल मजनूँ स्वयं मैं था।''

''पिताजी!'' चीख मार मेज पर सिर पटक प्रीति बिलख-बिलखकर रो पड़ी।

पिता उठकर, उसके पास जा, उसके बालों में हाथ फेरते स्नेह-सने स्वर में बोले-''बेटी, मुझे खुशी होती, अगर प्रेम मेरी कसौटी पर सच्चा उतरता! मगर वह तो झूठा था। वक्त पर उसकी कलई खुल गयी। नहीं तो, न जाने उसका वनावटी प्रेम तुम्हें क्या-क्या रंग दिखाता। बेटी, खुश होओ कि शुरू जवानी में ही तुम्हें एक ऐसा सबक मिल गया! इस सुन्दरता और शुरू की जवानी के दिलफरेब खेलों ने न जाने कितनी मासूम कलियों को खिलने के पहले ही मसलकर फेंक दिया है। मैं नहीं चाहता कि मेरी बेटी भी यों जवानी के हाथों एक खिलौना बन हमेशा के लिए टूट जाय।

''प्रीति की माँ, अब तुम इसे सँभालों! मैं अपने मित्र को विदा कर दूँ। उन्हें देर हो रही है।''

माँ और अनीता प्रीति की ओर मुस्कराती हुई बढ़ीं। पिता और उनके मित्र-मुस्कराते हुए बाहर निकल गये।