Tuesday, 23 July 2013

शोषित के साथ लेखक की सिम्पैथी जरूरी है-शिवमूर्ति

कथाकार शिवमूर्ति से प्रभात रंजन की बातचीत

प्रभात : नया ज्ञानोदय में आपका उपन्यास आखिरी छलांग प्रकाशित हुआ. उसको पढ़ते हुए लगता है जैसे गांव का जो स्वप्न है वह टूट गया है. पूंजीवादी यथार्थ के सामने उसने सरेंडर कर दिया है. आज गांव का एक खाता-पीता किसान भी खेती के बूते अपने बच्चों को चाहे भी तो बेहतर शिक्षा नहीं दिलवा सकता क्योंकि खेती के बल पर पर बेहतर शिक्षा संस्थानों की फीस के पैसे नहीं जुटाए जा सकते. यानी बेहतर शिक्षा के विकल्प उसके लिए नहीं बचा?
शिवमूर्ति : कैसे? मान लिजिए किसी किसान के पास बीस बीघे जमीन है लेकिन वह उससे अपने लड़के को नहीं पढ़ा सकता. इसी उपन्यास में पहलवान का चरित्र है. इसका मतलब क्या हुआ कि जो अस्सी प्रतिशत आबादी है उसको डिबार कर दिया गया. चाहे वह जिस बिरादरी का हो. खेती उसके पास उतनी ही है, उतनी ही उसकी उपज है, उतना ही पैसा उसको मंडी में मिलेगा. पूंजी के इस युग में पैदावार अगर उसकी उतनी ही है तो वह पचास हजार-एक लाख की फीस कैसे देगा? एकदम से फीस १७ हजार से बढ़कर ५० हजार हो गया था उस साल जिस साल की आखिरी छलांग में कहानी है. इसका सीधा सा मतलब हुआ कि जो गांव में रह रहे हैं, चाहे कोई भी हों, अगर उनकी बाहरी आमदनी नहीं है, अगर वे नौकरीपेशा नहीं हैं तो उनके बच्चों को एक तरह से इस नए चमकते बनते देश से डिबार कर दिया गया है… तुम घुस ही नहीं सकते इस देश के अंदर. यह कोई छोटी बात नहीं है लेकिन लोग अभी महसूस नहीं कर रहे हैं.
प्रभात : आपकी लगभग सारी कहानियां, तीनों उपन्यासों का परिवेश ग्रामीण है. हिन्दी में कौन लेखक आपको दिखाई देते हैं जिनके लेखन में गांव का यह परिवेश विश्वसनीय तरीके से आया है? किनको आप अपना पूर्वज मानते हों?
शिवमूर्ति : उस रूप में तो प्रेमचंद और रेणु ही दिखाई देते हैं. रेणु का कहने का तरीका बहुत आकर्षित करता है. मैला आंचल को अगर आप देखें तो उसके सारे अध्याय चार-साढ़े चार पेज के हैं और अपने आपमें पूर्ण हैं. ऐसा नहीं है कि कोई अध्याय ५ पेज का है और कोई दस पेज का. उसीमें जो कहना है पूरा कह देते हैं. एक डायलॉग में बहुत सारी चीजें कह देते थे. अब आप समझते रहिए. उनमें जो कौशल है जो लाघव है वह एक लेखक के तौर पर उनसे सीखा जा सकता है.
प्रभात : रेणु के बारे में कहा जाता रहा है कि उनमें राजनीतिक चेतना का अभाव था. गांव का जीवन तो उनकी रचनाओं में है लेकिन उसका तनाव उनकी रचनाओं में दिखाई नहीं देता. एक प्रकार का भोलापन दिखाई देता है…
शिवमूर्ति : देखिए, रेणु ने जीवन उस तरह से नहीं जिया. जाति के हिसाब से वे बड़े परिवार से न आते रहे हों लेकिन जमीन-वमीन के हिसाब से वे जमीनवाले परिवार से आते थे. ऑटोमेटिक रूप से आप जहां पैदा हुए हैं वह आपके सोच को प्रभावित तो करता ही है. समाज की संरचना भी जटिल होती है. शोषक और शोषित की परिभाषा भी बदलती रहती है. जो जाति जहां प्रमुख हो जाएगी वही शोषक बन जाएगी. शोषक और शोषित के लिए अलग-अलग जातियों का होना भी जरूरी नहीं है. दुनिया के सारे हरिजन शोषक हों ऐसा तो नहीं है न. इसी नजरिए से देखना चाहिए. जो लोग वर्गीकरण कर देते हैं और उसी नजरिए से देखते हैं चीजों को तो मेरे खयाल से वे हकीकत से दूर हो जाते हैं.
रेणु शौकीन आदमी थे और बिना किसी चश्मे के दुनिया जैसी दिखाई देती थी वैसे देखते थे. उनके उस देखे जाने में मुझे तो कोई दिक्कत नहीं नजर आती है. थोड़ा सा जो दबाया जा रहा है, शोषित है उसके प्रति लेखक की सिम्पैथी जैसी होनी चाहिए वैसी होती तो बेहतर होता. लेकिन रेणु के यहां ऐसा नहीं है कि वे किसी शोषक का समर्थन कर रहे हों या मजा ले रहे हों किसी के शोषण में. यह भी ध्यान देने की बात है. ऐसा होता तब आप उनके ऊपर उंगली उठा सकते थे. मेरे हिसाब से. जैसे परती परिकथा में जितेन्द्र-ताजमणि का रिश्ता है. कहीं से वे यह नहीं दिखाते कि ताजमणि नटि्‌टन समाज से होने के कारण हेय है. जियन के मन में कभी आता हो कि यह तो छोटी जाति की है. यह अलग बात है कि दूसरों को लगता हो कि ताजमणि नटि्‌टन परिवार की थी और उसको उसने अपनी रखैल बनाकर रखा था. न ताजमणि में नटि्‌टन होने को लेकर कोई हीनभावना है न ही जियन में इस बात का गर्व है कि हम बड़े खानदान के हैं. यह तो अच्छी बात है.
प्रभात : गांव के जीवन का यथार्थ…
शिवमूर्ति : देखिए, गांव का असली परिवेश, पार्टीबंदी परती परिकथा में ही उभरकर आया है. मैला आंचल में तो एक आवरण-सा है. मुझे लगता है कि परती परिकथा को ठीक से देखा नहीं गया है, उसे सही संदर्भ में पढ़ा नहीं गया है. रेणु प्रेमचंद के आगे की परंपरा के लेखक हैं. प्रेमचंद बड़े व्यावहारिक थे. उनको कहीं रंग नहीं दिखाई देता था, राग नहीं दिखाई देता था. जीवन में उनके था. लेकिन वे मर्यादा के हिसाब से रहना चाहते थे जैसे बड़े-बुजुर्ग रहते हैं. उस जमाने में जैसा प्रचलन था. लेकिन रेणु तो रसिक हैं, जिन्दादिल भी हैं, जो देखते हैं उसको वैसा लिखते हैं. रेणु के बाद वैसा कलम का धनी मुझको दिखाई नहीं देता. दृष्टि को लेकर उनको जो अतिवाद है वह भी धीरे-धीरे घट जाएगा.
प्रभात : आपने मैं और मेरा समय में लिखा है कि आपको आरंभ में प्रेम वाजपेयी, कुशवाहा कांत, प्यारेलाल आवारा जैसे लोकप्रिय लेखकों के उपन्यास पढ़ा करते थे और वे आपको पसंद भी आती थीं. क्या-क्या पढ़ा उस दौर में… कुछ याद आता है?
शिवमूर्ति : एक तो प्रेम वाजपेयी का उपन्यास था. नाम तो याद नहीं. हां, उसका एक कैरेक्टर था मंगला डाकू. मुझे आज तक याद है वह रात के अंधेरे में निकलता था. उनके उपन्यासों में भी गरीबी-अमीरी की खाई उसी तरह होती थी जैसे हम लोग लिखते हैं. उनमें हल्कापन होता था, औदात्य नहीं होता था, उनकी कथाओं में किसी तरह की गहराई नहीं होती थी. लेकिन उनका उस उम्र में आकर्षण तो था ही. मैं तो इतना प्रभावित था कि प्रेम वाजपेयी से मिलने दिल्ली आ गया. पटपड़गंज तब नया-नया बस रहा था. वे वहीं रहते थे. उनके घर के सामने कच्ची सड़क थी. मुझे आज तक याद है कि उनकी पत्नी कद्‌दू काट रही थीं. उनसे जब प्रेम वाजपेयी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया ऑफिस गए हैं. हाईस्कूल में पढ़ता था तब. बेटिकट दिल्ली आ गया था. रहने का कोई ठिकाना तो था नहीं. मैं शाम की गाड़ी से वापस लौट गया. प्रेम वाजपेयी से भेंट नहीं हो पाई थी.
प्रभात : इस तरह के उपन्यास गांव में आपको कैसे मिलते थे?
शिवमूर्ति : पांडेजी का हमने उल्लेख किया है पहले भी. उनके यहां तो साहित्यिक किताबें मिला करती थीं. उनके घर के बगल में हमारे एक मित्र रहा करते थे सूर्यनारायण दुबे. थे तो हमसे दो साल सीनियर. फेल होते-होते हमारे साथ आ गए थे. सामने वाले गांव में रहते थे. उनके यहां मैं रात में पढ़ने जाया करता था. उनके एक बड़े भाई थे जो विदेश में रहा करते थे. जब आते थे तो खूब सारे उपन्यास लेकर आया करते थे… इब्ने सफी, प्रेम वाजपेयी, कुशवाहा कांत आदि…
प्रभात : संजीवजी ने लिखा है कि जिन दिनों आप रेलवे में नौकरी किया करते थे तब आपने भी कुछ इस तरह का उपन्यास लिखा था?
शिवमूर्ति : हां, इस नौकरी में आने से पहले मैं पंजाब में रेलवे में नौकरी किया करता था. वहीं मेरा एक उपन्यास आया था पतंगा. पंजाब केसरी में धारावाहिक छपा था- बीस-बाइस किस्तों में. उस पर मेरे पास एक बोरा चिट्‌ठी आई थी. कहीं घर में रखी हुई है.
प्रभात : उसको पुस्तक के रूप में आपने नहीं छपवाया?
शिवमूर्ति : नहीं. वह वैसा ही था जैसा प्रेम वाजपेयी लिखा करते थे. लेकिन बड़ा अपीलिंग था. पंजाब केसरी के पाठकों को खूब पसंद आई थी. दो प्रेमियों की कहानी थी. उनकी शादी नहीं हो पाती है तो वे जान दे देते हैं. जहां वे मरते हैं वहां दो पेड़ पैदा होते हैं- एक पीपल का, एक पाकड़ का. दोनों नदी के किनारे एक दूसरे से लिपटे हुए रहते हैं. ऐसी ही कहानी थी.
प्रभात : साहित्यिक उपन्यासों की ओर आपका रुझान कब हुआ?
शिवमूर्ति : साहित्य पढ़ने का यह है कि समझिए प्रेमचंद से हमारा परिचय दर्जा आठ के आसपास हो गया था. पांडे बाबा का मैंने जिक्र किया था. हम जानवर चराने जाया करते थे तब वे पढ़ते रहते थे. उनके पास दो आल्मारियां थीं जो किताबों से भरी हुई थीं. अद्‌भुत आदमी थे. उनके यहां मैंने पहले पहल मानसरोवर पढ़ी. फिर रंगभूमि पढ़ा. वृंदावनलाल वर्मा के उपन्यास पढ़े- विराट की पदि्‌मनी, मृगनयनी. फिर स्कूल में पत्रिकाएं आती थीं. नवनीत आती थी, धर्मयुग आती थी… मैं जब दर्जा सात में था उसमें हिरोशिमा और नागासाकी पर जिसने बम गिराया था उसके अनुभवों पर लेख छपा था दो किस्तों में. उसका प्रभाव बहुत दिनों तक रहा.
प्रभात : आपको साहित्य पढ़ना अच्छा लगता था? पहले आप लोकप्रिय उपन्यास पढ़ा करते थे. उसके दीवाने थे…
शिवमूर्ति : स्वतः अच्छे लगने लगे. जब मैं दर्जा तीन में गया तो हमारी किताब में एक चैप्टर था काठ का घोड़ा जो ट्रॉय के युद्ध पर था. जब लकड़ी के घोड़े के अंदर छिपकर सैनिक बैठ गए थे. मुझे अभी तक याद है कि मैं अक्सर सोचता था कि आखिर उस लकड़ी के घोड़े में सैनिक इतनी देर तक बंद रहे तो पेशाब-वेशाब कहां किए किए होंगे. मेरा यह अनुभव है कि किसी का संगीत के प्रति, किसी का किसी और आर्ट के प्रति स्वाभाविक रुझान होता है, मैं भी जब पढ़ता था तो कुछ ऐसा ही रुझान हो जाता था. डेविएशन हर आदमी में कला के प्रति होता है. अगर मौका मिल गया तो आप एक्सेल कर जाते हैं. दब गया तो दब गया.
प्रभात : पहली कहानी कब लिखी?
शिवमूर्ति : पहली कहानी जब छपी मेरी तो मैं ग्यारहवीं में पढ़ता था. आगरा से निकलनेवाली पत्रिका युवक में छपी थी- मुझे जीना है. उसी साल एक और कहानी छपी पान-फूल, जो बीकानेर से निकलनेवाली एक पत्रिका में छपी जो हरीश भादानी जी निकाला करते थे. हाल में ही उनका निधन हुआ है. उसके बाद लखनऊ से निकलनेवाली पत्रिका कात्यायनी में मेरी कहानी उड़ जा पंछी को फर्स्ट प्राईज मिला. बाद में इन कहानियों में मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा इसलिए मैंने उनको अपने संग्रहों में शामिल नहीं किया.
प्रभात : आप जिन साहित्यिक पत्रिकाओं को पढ़ते थे उनमें आपने कहानियां छपने के लिए नहीं भेजीं?
शिवमूर्ति : कात्यायनी साहित्यिक पत्रिका थी. पंजाब में रहते हुए दिनमान में मैंने एक लेख भी लिखा था. दिनमान ने अपढ़ संवाद प्रतियोगिता की थी. यानी न पढ़ने-लिखने से कितनी मुश्किलें होती हैं, हो सकती हैं उस पर एक राइटअप बनाइए. जो एक पेज से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. उसमें मैंने भेजा. मुझे फर्स्ट प्राइज मिला. काफी लोगों ने उसमें हिस्सा लिया था. पांच सौ रुपए का ईनाम भी मिला.
प्रभात : वह पहली कहानी जिससे आप अपनी साहित्यिक यात्रा का आरंभ मानते हों?
शिवमूर्ति : कसाईबाड़ा. १९८० के जनवरी में धर्मयुग में छपी थी. लिखी तो मैंने सबसे पहले थी भरतनाट्‌यम. १९७५ में लिखी थी. कसाईबाड़ा १९७६ में लिखी. लिख तो लिया लेकिन भूल गए. दोनों कहानियों को छपने के लिए कहीं नहीं भेजा. तब मैं पंजाब में रहता था. बाद में जब मैं इस नौकरी में आया तो ट्रेनिंग के लिए कानपुर आया. कानपुर में बलराम मिल गए. उस समय कानपुर में संतोष तिवारी थे, कामतानाथ थे, राजेन्द्र राव थे. सब लोग कानपुर के मोतीझील में शाम को बैठते थे. उसमें मैंने अपनी वह कहानी दिखाई. बहुत लंबी थी इसलिए उस दिन उसको पढ़ा नहीं. मैंने बलराम को दे दिया. बलराम ने कहा कि मुझे एक छोटी कहानी दीजिए. मैं खुद एक पत्रिका निकाल रहा हूं. तो मैंने तीन पेज की एक कहानी आकलदंड लिखी और उसको दे दी. ७७ में उसने उसको छापा. कसाईबाड़ा और भरतनाट्‌यम उसको दे दी और फिर मैं ट्रेनिंग के लिए नैनीताल चला गया.
कसाईबाड़ा के बारे में उसने कहा कि यह बहुत लंबी है इसको रीराइट करो तो मैंने ७७ में ही उसको रीराइट किया. छोटी करके उसको दे दी. बलराम तब सारिका में आ गया था. कहानी फिर भी बड़ी थी. तो उसको १९७८ में धर्मयुग में भेज दी. वहां पड़ी रही. जनवरी १९८० में धर्मयुग का ग्राम विशेषांक निकला. उसमें वह कहानी आई. उन्होंने उसको संपूर्ण लघु उपन्यास कहकर छापा था.
प्रभात : आपकी वह एक तरह से पहली ही कहानी गांव के बारे में एक नया सच सामने रखती है जो भयानक खबर की तरह है. कहानी में पंक्ति आती है- यह पूरा गांव ही कसाईबाड़ा है. पाठकों-लेखकों की कैसी प्रतिक्रिया रही?
शिवमूर्ति : एक साल तक धर्मयुग में चिटि्‌ठयां छपती रहीं. भारती जी ने संपादकीय में उस कहानी का उल्लेख किया था. फिर सारिका में छपा कि मनहर चौहान कसाईबाड़ा का मंचन कर रहे हैं. उन्होंने ७५ लोगों की एक टीम बनाई और डेढ़ सौ जगहों पर देशभर में उसका मंचन किया. आज तक कसाईबाड़ा का नाटक के रूप में मंचल होता रहता है. इसी को एक तरह से मैं अपनी पहली कहानी मानता हूं. इसके पहले का लेखन तो प्रैक्टिस था. उसके बाद बलराम ने सारिका में भरतनाट्‌यम छापी.
प्रभात : गांव का बदलता हुआ यथार्थ आपकी कहानियों-उपन्यासों के केन्द्र में रहा है. कसाईबाड़ा में दिखता है कि सारा गांव शोषण तंत्र में शामिल हो गया है, त्रिशूल में गांव का खराब होता धार्मिक माहौल है, तर्पण में एक दूसरे तरह का जातीय उभार है. आखिरी छलांग तक आते-आते लगता है कि शहरी संस्कृति के सामने गांव ने सरेंडर कर दिया है?
शिवमूर्ति : अब जब हम रीराइट कर रहे हैं आखिरी छलांग को तो इसमें बहुत कुछ आ रहा है. एक तरफ समस्याएं बढ़ रही हैं तो चेतना भी आ रही है गांव में, भ्रष्टाचार भी आ रहा है. पढ़नेवाले भी पैदा हो रहे हैं. एक लड़का था ठाकुर का मेरे गांव से चार-पांच किलोमीटर दूर. दीपक नाम है उसका. सेवेंथ में मैं उसको पढ़ा रहा था. मेरे प्रभाव से उसने कहा कोई नौकरी नहीं करेंगे. बड़े घर का लड़का है. अखबार निकालने लगा. पहले साप्ताहिक निकालता था अब दैनिक कर दिया है. बड़ा जुझारु है. गरीबों के लिए, दलितों के लिए कितनी बार मार खाया है, मर्डर होते-होते बचा. ठाकुर है लेकिन ठाकुर कहते हैं कि वह जातिद्रोही है. अपनी ही जाति की मुखालफत करता है. तो ऐसे भी लोग हैं इक्का-दुक्का जो संधर्ष कर रहे हैं. आप उनके संघर्ष को होलटाइम नक्सलवाद के संघर्ष से कम करके नहीं आंक सकते. उसी में सर्वाइव करके लड़ रहे हैं सबके साथ और जो केवल कागज पर लड़ते हैं उनसे तो सौ गुना अच्छे हैं.
प्रभात : कोई विदेशी लेखक भी है जिसने आपको प्रभावित किया हो?
शिवमूर्ति : जैक लंडन. उाकी वर्णन क्षमता का कोई जवाब नहीं है. उसका जीवन भी विचित्र था. वह समुद्री डाकू था. तेरह साल की उम्र में उसने अपने प्रतिद्वन्द्वी समुद्री डाकू को हराया और उसकी बेटी से शादी कर लिया. तेरह साल की उम्र में. अद्‌भुत है. ३९ की उम्र में मर भी गया. जेल में जब बंद हुआ तो उसने पढ़ना शुरु किया. उसके बाद जब उसने लिखा तो सबने उसका लोहा माना. द कॉल ऑफ ए वाइल्ड पढ़िए. भेड़िए की कहानी है. भुवनेश्वर की जो कहानी है भेड़िए. उसको पढ़िए तो लगता है जैसे इसी उपन्यास की नकल है. उसकी कलम में बड़ा दम था. उसने आत्महत्या कर ली. बाद में उसको लगा अब मैं कुछ नहीं लिख सकता. जब उसने खूब पैसा कमा लिया तो एक घर बनाया एक टापू पर. वहां पर एक टेढ़ा पत्थर रखा था उसने उसको फिंकवा दिया था अपना घर बनवाने के लिए. जिस दिन उसके घर का गृहप्रवेश था उसी दिन उसके किसी दुश्मन ने उसमें आग लगवा दिया. तब वह उस टेढ़े पत्थर को उठा लाया और कहा कि यही मेरा घर है. यही मेरे कब्र पर लगेगा. उसने अपने कब्र पर लिखवाया- यहां सोया है वह आदमी जिसका घर जलाया गया न कि जिसने घर जलाया.
प्रभात : आपने मैं और मेरा समय में जंगू के बारे में लिखा है. उसके बारे में बताइए. उसके संघर्ष को आप किस तरह से देखते हैं?
शिवमूर्ति : जंगू का एनकाउंटर हो गया हम कुछ नहीं कर पाए. १९९५ में मैंने जनमत में लिखा था कि एक दिन आप लोग सुनेंगे कि इसका एनकाउंटर हो गया. और हो गया… उसका काम यह था कि जो भी आसपास के लोग ज्यादती करते या किसी का हड़प लेते तो वह उनको रात में पकड़ता और टांग तोड़ देता था. कितने लोग उसके डर से एरिया छोड़कर भाग गए. एक बार ९५ में पकड़ा गया. उसका एनकाउंटर होने वाला था. हमारे एक समधी उस समय यू.पी. में बसपा के अध्यक्ष थे तो उनसे कहकर मैंने बचवा दिया था. दो साल पहले उसका एनकाउंटर कर दिया गया. बाद में उसने यह सब छोड़ दिया था. तब उन लोगों ने उसको फंसाया जिनकी उसने टांगें तोड़ी थीं. गलत केस में फंसाकर उसका फर्जी एनकाउंटर हो गया. हम लोग जंगू के यहां गए थे उसके एनकाउंटर के बाद. एक छोटी सी बछिया बंधी थी, अलाव जल रहा था, खाली धुआं निकल रहा था. सारे दरवाजे खुले हुए थे. पुलिस आई थी वहां सब तोड़ताड़ कर गई थी. हमने पाया कि जंगू के घर की सारी प्रॉपर्टी हजार पांच सौ से अधिक की नहीं रही होगी. उसने इलाके करीब दो दर्जन लोगों की टांगें इसलिए तोड़ दीं क्योंकि उन लोगों ने दूसरों के साथ ज्यादती की थी. उसने कोई लूटपाट करके अपना घर नहीं भरा था. एक डाकू था नरेश. मेरा बड़ा नजदीकी मित्र था. उसका भी एनकाउंटर हो गया था…
प्रभात : इस तरह के चरित्रों को लेकर कभी आपने कुछ लिखने की योजना नहीं बनाई?
शिवमूर्ति : आखिरी छलांग रीराइट करने के बाद नरेश डाकू को लेकर ही लिखने की योजना बना रहा हूं. उसी के बहाने उस समय के हालात पर- कुछ अपने जीवन से लेकर कुछ उसके जीवन से लेकर लिखने की योजना है कि किस तरह गांव में इस दौरान परिवर्तन हुए. कभी-कभी सोचता हूं कि इस पर लिखूं कि ऐसे लोगों का किस तरह मानसिक रूप से डेविएशन हुआ? कैसे उनकी तैयारी हुई? इस स्तर तक वे कैसे पहुंचे आखिर? जरा सोचिए, आखिर वह कैसा पवित्र दिमाग रहा होगा, कितना निद्गकलंक रहा होगा जो दूसरों के लिए अपनी जान जोखिम में डालता होगा, जिससे उसका कोई लेना-देना नहीं. उसने सोच लिया कि एरिया में किसी को ज्यादती नहीं करने देंगे और उसके बाद जो कोई भी ज्यादती करता उसकी टांगें तोड़ देना. आप सोचिए कि क्या मामूली विचार हैं ये? किसके होते हैं ऐसे विचार? सब डेविएट हो जाते हैं, सब बदल जाते हैं. सब अपना स्वार्थ देखने लगते हैं, सब खतरे से डरने लगते हैं.
हम यह कह रहे हैं कि कुछ और उनके अंदर होता है जो हम लोगों के अंदर नहीं होता है. वह जो और होता है उसको महसूस कीजिए और फिर उनको द्राब्द भी दीजिए. इस तरह से कि उनके साथ अन्याय भी नहीं हो और लोगों को कन्वे भी हो जाए. देखिए किस तरह से ऐसा कर पाता हूं. देखिए, इस तरह के लोगों को समाज का ओपन समर्थन नहीं मिलता है. क्योंकि जंगू ही है तो वह जिस तरह के लोगों से लड़ रहा था, जिनकी टांगें तोड़ रहा था वे तो ज्यादा मजबूत थे न. जो मजबूत होगा, आतातायी होगा वही दूसरों को सताएगा न. तो ऐसे लोगों के खिलाफ कोई सामने नहीं आता है. ऐसे लोग अक्सर अपनी लड़ाई में अकेले पड़ जाते हैं. तो ऐसे लोगों के बारे में लिखा जाना चाहिए. संयोग से ऐसे कई लोगों को मैंने करीब से देखा था. तो मुझे लगता है कि लिखना चाहिए.
प्रभात : राजनीति आपके लेखन में प्रबल रहा है. बदलती हुई राजनीति से ग्रामीण समाज किस तरह प्रभावित हो रहा है, उसमें क्या बदलाव आ रहे हैं?
शिवमूर्ति : देखिए बहुत कुछ बदल रहा है. बहुत कुछ अच्छाई के लिए बदल रहा है. आप इससे इंकार नहीं कर सकते. लेकिन कुछ चीजें हैं जो अलार्मिंग हैं. यद्यपि हमारे लेखन का वे सीधे-सीधे विद्गाय नहीं बन सकतीं. जैसे कि यह जो माओवादियों का उभार है इसे केवल राजनीतिक उभार मत मानिए. जिस तरह की ज्यादतियां हो रही हैं छतीससगढ़ या झारखंड के आदिवासियों के साथ. यह गृहयुद्ध के नजदीक जानेवाली बात है. अभी तक तो केवल असम, मणिपुर, कच्च्मीर जैसे सीमांत के इलाकों में हो रहा था. लेकिन देश के अंदरुनी इलाकों में भी अगर इस तरह का विभाजन हो जाएगा तो बाकी हिन्दुस्तान का कौन सा सेंटर बचेगा? लगता है कि यह बढ़ता जाएगा क्योंकि लोग ध्यान नहीं दे रहे हैं कि ऐसी व्यवस्था बने जिसमें ऐसे सारे लोग गायब न हों जाएं, विलुप्त न हो जाएं. वे किसान, मजदूर, आदिवासी जिनकी रोजी-रोटी कुछ नहीं है वे तो विलुप्त हो ही जाएंगे.
प्रभात : ऐसे में लेखकों की जिम्मेदारी को आप किस तरह से देखते हैं?
शिवमूर्ति : लेखकों की जिम्मेदारी खाली… अगर आप लिखने तक ही अपने आपको सीमित रखेंगे तो मुझे नहीं लगता कि यह उचित है. अगर आप सरोकार से जुड़े हैं तो आपको इसमें इन्वॉल्व होना ही पड़ेगा. मेरा यह मानना है. कुछ सक्रियता होनी चाहिए. मुझे लगता है कि जो इन्वॉल्व हैं वे सौ गुना बेहतर काम कर रहे हैं. लेखक उनके मुकाबले कुछ नहीं कर रहे हैं. देखिए यह मेरी एक पुरानी डायरी है जिसमें लिखा है- मेरी नजर में सामाजिक कार्यकर्ता या एक्टिविस्ट की भूमिका समाज में बहुत सारे मायनों में लेखकों की भूमिका से बड़ी है. प्रचारक-विचारक ओझल हो जाते हैं, दिखाई नहीं देते हैं, नींव के पत्थर की तरह. जब इमारत खड़ी हो जाती है तो उनके बारे में लोग नहीं जानते हैं. जब आंख के सामने शोषण-दमन जारी हो तो उसके प्रतिकार के लिए लोगों को जगाने, खड़ा करने का काम एक किनारे निष्क्रिय बैठकर उस शोषण या अन्याय का चित्रण करने या उसमें प्रतिरोध का स्वर फूंकने का प्रयास करने से ज्यादा जरूरी हो जाता है. अगर सामने-सामने हो रहा हो तो उसमें इन्वॉल्व होकर उसका प्रतिरोध करने की बजाय आप कहें कि घर चलकर उसके ऊपर कहानी लिखेंगे तो मुझे लगता है कि यह उचित नहीं है.
तात्कालिक प्रतिरोध करने और उसके लिए राजनैतिक शक्ति प्राप्त करने के लिए बहुत ईंधन चाहिए. इतना ईंधन जो प्रज्ज्वलित होकर प्रकाश दे सके या रास्ता दिखा सके. लेकिन जब तक ऐसा ईंधन आपके पास नहीं है तब भूसी ही आपके आग को लंबे समय तक बुझने से बचा सकती है. भूसी की आग जानते हैं? धान की भूसी जो होती है वह बहुत धीरे-धीरे सुलगती है. अगर भूसी डाल दीजिए आग पर तो वह बहुत धीरे-धीरे सुलगेगी. गांव में जब पहले माचिस वगैरह नहीं होती थी या उसकी कमी होती थी तो इसी तरह से आग को जलाए और बचाए रखते थे. तो इसी भूसी की आग की तरह अपने अंदर प्रतिरोध को बचाए रखने के लिए लेखन काम आता है. आप उस आग से लोगों को अवगत करा दीजिए ताकि वह विचार को सुरक्षित रख सके. लांग रन में साहित्य की भूमिका, उसके महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता है.

शिवमूर्ति का वशीकरण और 'लमही'


हिंदी के सुपरिचित कवि, नवगीतकार डॉ.ओम निश्चल

''प्रेमचंद की कहानियॉं किस्सागोई का जो मानक सामने रखती हैं, शिवमूर्ति अपनी कहानियों में वही लीक अपनाते हैं''-डॉ.ओम निश्चल


मूलत: कथा साहित्य में प्रेमचंद के उच्चादर्शों को लेकर स्थापित लमही ने अपने अब तक की साहित्यकारिता में अनेक विशेषांक और साधारणांक संजोए हैं, किन्तु हाल ही में ग्रामीण पृष्ठ भूमि के अनूठे कथाकार शिवमूर्ति पर केंद्रित लमही के विशेषांक ने अप्रतिम लोकप्रियता अर्जित की है। लमही ने शिवमूर्ति को लमही सम्मान देते हुए यह अंक उन पर केंद्रित किया है जो अपने आपमें एक लेखक के लिए पुरस्कार है। कवि-संपादक विजय राय और अतिथि संपादक सुशील सिद्धार्थ ने शिवमूर्ति की कहानियों पर विभिन्न कोणों से और आज के कथा संसार में उनकी फलश्रुतियों को लेकर इतना ग्राह्य विशेषांक तैयार किया है कि पोथन्ना लिखने वाले और साहित्य के सत्ता केंद्रों में काबिज उनके समानधर्मा लेखकों को रश्क हो जाए।
केवल सात आठ कहानियों और तीन स्लिमकाय उपन्यासों के बलबूते शिवमूर्ति ने कहानी संसार में वह प्रतिष्ठा पाई है जो बड़े बड़े लेखकों कथाकारों को सुलभ नही है। उनकी लोकप्रियता का आलम यह कि लमही के लोकार्पण और सम्मा न के अवसर पर उनके गॉंव समाज से आए और उनकी कहानियों के अनेक जीवित पात्रों का जो संगम लहराता हुआ दिखता था, वह लमही सम्मान के आस्वाद और कीर्ति को द्विगुणित करता जान पड़ता था। बोलने में अवधी के धुर मुहावरों से न्यस्त शिवमूर्ति की बातें बातनि की झोंक में लगेई चले जात हैं का वशीकरण फूँकती जान पड़ती थीं।
सारांशत: यह कि अवध के जीवन और रहन सहन के सीमित भूगोल की परिक्रमा करते हुए शिवमूर्ति ने जैसे गॉंव देस पर पड़ते ग्लोरबल प्रभावों, राजनीतिक असर, लंपटई, पंचैती, जहरीले वातावरण और सामंती कवच कुंडल की बखिया उधेड़ कर रख दी है। शिवमूर्ति के कथासंसार ने जताया है कि बड़ा कथाकार होने के लिए पोथियॉं लिखने की जरूरत नहीं है, उसके लिए जनमानस की संवेदना में संतरण करना जरूरी है। इन दिनों कहानियों का जो कुक्‍ड वातावरण चल रहा है, यथार्थ को कांस्ट्रक्ट करने की जो प्रविधि अपनाई गयी है, शिवमूर्ति की कहानियॉं अपनी संरचना में ऐसे बनावटीपन से दूर रहती आई हैं। प्रेमचंद की कहानियॉं किस्सागोई का जो मानक सामने रखती हैं, शिवमूर्ति अपनी कहानियों में वही लीक अपनाते हैं---केवल समय और मिजाज का अंतराल उन्हें अलग खड़ा करता है। उनकी कहानियॉं यथार्थ के थिगड़े नहीं टॉकतीं, वे अपने चरित्रों के भीतर और बाह्य को उरेहती हुई पूरे समाज को चित्रित करती हैं।
लमही का पहला पृष्ठ उन्हें संवेदनाओं का किस्सागो करार देता है। अपने वक्तव्य में शिवमूर्ति ने लिखा है, मन का असाढ़ कभी सूखता नहीं। यही जज्बा उन्हें कहानी दर कहानी में अपने गांव के कथ्य को कथा के बड़े फलक पर उतारने में मदद करता है। पात्रों से समरस होकर वे जो कुछ लिखते हैं वह नास्टेरल्जियाग्रस्त कथाकारों-कवियों की आह उूह से ऊपर उठ कर चरित्रों, स्थि तियों का वाचन करता हुआ एक एक मन की गहरी थाह लेता है। यही थाह उन्हें संवेदना की गहराइयों में ले जाती है और कुछ ही कहानियों में अपने कुशल कथा-कारीगर की सारी भाव भंगिमाऍं और अंत:प्रक्रियाऍं उड़ेल देते हैं।
शिवमूर्ति की सादगी और उनकी पठनीयता का यह अद्वितीय साक्ष्य है कि इस अंक में बड़े लेखकों से लेकर युवा लेखकों की एक बड़ी टोली ने सहकारिता की है। ओमप्रकाश वाल्मीकि, संजीव, उर्मिला शिरीष, वीरेन्द्रेकुमार बरनवाल, सृंजय, शैलेन्द्र सागर, अरुण आदित्य , राजेन्द्र राव, मैत्रेयी पुष्पा, विश्वनाथ त्रिपाठी, मुद्राराक्षस,राजेन्द्र यादव, शेखर जोशी, कामता नाथ, गिरिराज किशोर, दूधनाथ सिंह, नरेश सक्सेँना, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल, रवीन्द्र वर्मा और विभूतिनारायण राय जैसे लेखकों के साथ इस अंक को राहुल सिंह, संतोष कुमार चतुर्वेदी, वैभव सिंह, उमेश चौहान, धनंजय चौबे, विवेक मिश्र, राकेश बिहारी, शरद सिंह, पंकज पराशर, पंकज सुबीर, श्रीप्रकाश शुक्ल , भरत प्रसाद, विपिन तिवारी, अमिताभ राय, पल्लव, राजेश राव, विजय शर्मा, प्रियम अंकित, प्रवीण शेखर, दिलीप मंडल, अनवर जमाल, लता शर्मा, शशिभूषण द्विवेदी जैसे अस्सी फीसदी युवतर लेखकों ने अपनी तेजस्विता और दोटूक विमर्शों से सबल और बहसतलब बनाया है।
विशेषांक में युवा लेखकों आलोचकों ने शिवमूर्ति की कहानियों के यथार्थ, ग्रामीण जीवन, स्त्री जीवन, वंचित अस्मिाताओं, यथास्थितिवाद, गांव के बदलाव, कहानियों की अंतर्ध्वनियों, प्रतिरोधी तेवर, जातीय द्वंद्व, दलित जीवन, अवध की मिट्टी से लेकर यथार्थ और गल्प् के रसायन से किस्सा गोई का एक अलग डेल्टा सृजित करने वाले कहानीकार की एक अलग ही मूर्ति गढी है। ऐसा कम होता है कि कथाकारों पर किसी के निजी जीवन को अतिक्रमित करने का आरोप न हो, यथार्थ से आगे के अतियथार्थ को रचने बुनने में आख्यान को निहायत कृत्रिम न बना दिया जाए, पर ऐसा शिवमूर्ति के यहां बहुत कम हुआ है। कहानियों के भीतर प्रवेश करने पर शिवमूर्ति के भीतर के लेखक का अपना ओवरव्यू कहीं कहीं कौंधता है।
वे पिछड़ी जातियों की बौद्धिकता के एक सजग प्रतीक के तौर पर कहानियों के जरिए गांव समाज और जन के बदलते चरित्र और मिजाज की पड़ताल भी करते हैं। हालांकि से ऐसा कर रहे हैं यह आभास भी बहुधा नहीं होता। पर वे कहानी लिखते हुए अपने वर्गचरित्र को नेपथ्यै में रखते हैं इसीलिए उनकी कहानियॉं एक विश्वसनीय आख्यान होने का गौरव पाती हैं। दलित और पिछड़े वर्ग के लेखकों का अपना वर्गचरित्र इतना हावी रहता है कि वे कहानियों एक ब्रांड में बदल देता है। उसे लिखने पढ़ने की दृष्टि जैसे निर्धारित सी होती है। शिवमूर्ति जिस समाज के वाशिंदा रहे हैं और अभी भी हैं, उसे अपने बहुत पड़ोस से अनेक सूक्ष्म् और स्थूल बदलावों से गुजरते हुए देखा है। खुद की वंचनाओं के सहभागी रहे हैं। अनेक संगी साथियों का प्यार भी पाया है। साइकिल की हैंडल पर बैठ कर परीक्षा दिलवाने वाले मित्र भी उन्हें सुलभ रहे हैं। अपनी कहानियों में प्रतिरोध के नकली तेवर से बचते हुए उन्हों ने यथास्थिेतिवाद को रचने बुनने में जो महारत पाई है वह कम लेखकों को हासिल है। सुशील सिद्धार्थ कहते हैं, शिवमूर्ति बड़े रचनाकार की तरह आपबीती और जगबीती का अंतर समाप्त कर देते हैं और अपने जीवन संघर्ष के अनुभवों से दृष्टि, पाकर वे जाने कितनों के दुखों का कारण तलाश करते हैं।
विशेषांक का पहला और बड़ा आकर्षण है शिवमूर्ति से ओमा शर्मा से बातचीत। यह आद्यंत पठनीय है। एक जुझारू कथाकार का कन्फेशन समझें इसे। बचपन मे ही जिसके पिता साधू होकर घर छोड़ चुके हों, पूरी गिरस्ती का भार उन पर आ गया हो, जल्दीं ही बेटी हो गयी हो, कायदे का कामधाम न हो, दो जून की रोटी का जुगाड़ जीवन की सबसे बड़ी समस्या, हो, अवर्णो सवर्णो के बीच जिमि दसनन मह जीभि बिचारी की तरह रहना हो, उसके लेखक का यह साक्षात्का्र है। वे कोई सात्विक आदतों के उदात्त मनुष्यी हों ऐसा नही है, उनमें भी झूठ बोलने, बिना टिकट यात्राऍं करने, किसी की मुहब्बत में गिरफ्तार होने से लेकर तमाम मानवीय ऐब रहे हैं और इन ऐबों को उन्होंने अपने इंटरव्यू में छिपाया नही है। यानी वे ही हैं जो मंच पर अपने बचपन के संगी साथियों द्वारा पहाड़े के रूप में 'कय नवा मुँह चुम्मी कै चुम्मा।' पूछे जाने का हाल फख्र से बयान करते हैं। दूसरा बड़ा आकर्षण है: उनका व्यबक्तिगत कथ्य: मन का असाढ़ कभी नही सूखता। नई पुरानी डायरी के अंश यहॉं उन्होंने सँजोए हैं जो उनके लेखक के जीवन और उसके आब्जर्वेशन्स को साफगोई से विन्यस्त करते हैं। शिवमूर्ति के मन को सींचने वाली अंत:सलिला शिवकुमारी, गांव के लोगों, शिवनारायण दुबू, रामनरेशपाल, मथुराप्रसाद यादव, प्रतिभासिंह, राम खेलावन शर्मा, माताफेर सिंह दीपक, राम सुख सिंह के वक्ताव्यों में आत्मीयता का रस टपकता है। नरेन ने डूब कर लिखा है।
राजेंद्र राव जैसे कथाकार ने उनके गॉंव जाकर जो रिपोर्ताज रचा है: बांधो तो नाव इस ठांव बंधु---उसका तो कहना ही क्या। अनेक चिट्ठी पत्रियों से संपन्नं इस विशेषांक में शिवमूर्ति को समझने के वे सारे प्रसंग समाहित हैं जिससे होकर एक लेखक एक कथाकार को समझा जा सकता है। प्रधान संपादक विजय राय ने विशेषांक को बहुत ही मोहक तरीके से प्रस्तुत किया है कि उसका पहला पन्ने से आखिर तक एक लय बनी रहती है। कहानी कला के उस्ताद लेखकों से लेकर युवा लेखकों तक से शिवमूर्ति पर इतना कुछ लिखवा लेना अतिथि संपादक सुशील सिद्धार्थ की खूबी है पर यह उस आत्मी यता के कारण भी संभव हुआ है जो लेखकों में शिवमूर्ति जैसे सहज कथाकार और एक सच्चे मनुष्य के प्रति है और रहेगी।

साहित्य आम आदमी का रोजनामचा


कथाकार शिवमूर्ति को लमही सम्मान


लखनऊ में मुंशी प्रेमचंद की पुण्यतिथि पर कथाकार व उपन्यासकार शिवमूर्ति को लमही सम्मान से सम्मानित किया गया था। इस अवसर पर प्रसिद्ध कवि व आलोचक अशोक वाजपेयी ने कहा था कि आज हर पुरस्कार संदेह पैदा करता है। पुरस्कार इतने अधिक हो गए हैं कि कोई लेखक ऐसा नहीं होगा जिसे कोई पुरस्कार न मिला हो। ऐसे में पुरस्कारों की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता को लेकर सवाल भी उठते हैं। वास्तव में पुरस्कार और सम्मान की विश्वसनीयता इसी में है कि वह किसे दिया जा रहा है। पुरस्कार मिलने से मित्रों की संख्या कम होने लगती है और शत्रु बढ़ने लगते हैं। समारोह में साहित्य में यथार्थ के चित्रण को लेकर वक्तव्यों में विरोध भी उभरा। ग्रामीण यथार्थ के चित्रण के लिए प्रशंसित साहित्यकार शिवमूर्ति ने कहा कि साहित्य आम आदमी का रोजनामचा है। इसके माध्यम से आम आदमी के जीवन और समाज को जाना जा सकता है। वहीं वाजपेयी का कहना था कि सिर्फ यथार्थ का चित्रण करना ही साहित्य का काम नहीं है। यथार्थ इतिहास रचता है। साहित्य का यथार्थ से संबंध संवाद का भी हो सकता है और द्वंद्व का भी। उन्होंने कहा कि साहित्य में प्रतियथार्थ रचना अधिक यथार्थवादी कार्य हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि साहित्य ही एकमात्र राजनीतिक प्रतिपक्ष है। बाकी प्रतिपक्ष तो दिखावे का है। राजनेता एवं राजनीतिक दल केवल अपनी बारी की प्रतीक्षा में रहते हैं।
समारोह में शिवमूर्ति के जिला सुल्तानपुर के गांव कुरंग, नरवहनपुर, ओरझा से रामकरन यादव, भीष्मप्रताप सिंह, जमुना प्रसाद, राम पियारे, राम खेलावन, जोखू पाल समारोह में शामिल हुए थे। शिवमूर्ति ने उनका नाम लेकर सबसे परिचय कराया और उनसे जुड़े किस्से भी सुनाए। शिवमूर्ति ने बताया कि किस प्रकार वे अपने साथियों के साथ साइकिल पर बैठकर कई किलोमीटर चले जाते थे। एक बार वे अपने गांव के साथी के साथ उपेंद्रनाथ अश्क से मिलने गए थे और उन्हें एक पराठे से काम चलाना पड़ा।
अशोक वाजपेयी का कहना था कि शिवमूर्ति से हमें इस बात की भी प्रेरणा मिलती है कि महत्वपूर्ण होने के लिए ज्यादा लिखना जरूरी नहीं है। उन्होंने खुद का उपहास उड़ाते हुए कहा कि हम तो बेकार ही हजार कविताएं लिख बैठे हैं। समारोह में शिवमूर्ति को लमही परिवार की ओर से लमही सम्मान के अंतर्गत स्मृति चिह्न, मानपत्र, 15 हजार रुपये की सम्मान राशि प्रदान की गई। इस मौके पर सुशील सिद्धार्थ के अतिथि संपादन में निकले लमही के शिवमूर्ति विशेषांक का लोकार्पण भी हुआ। समारोह में मानपत्र का वाचन कथाकार किरण सिंह ने किया। आरंभ में संयोजक विजय राय ने स्वागत किया। समारोह में वैभव सिंह ने शिवमूर्ति पर आधारित वक्तव्य दिया। संचालन ओम निश्चल ने किया।
शिवमूर्ति कहते हैं कि गांव के दुख-दर्द, अन्याय, असमानता, शोषण ने उन्हें कलम उठाने के लिए प्रेरित किया। इस बात पर तो विवाद हो सकता है कि साहित्य से क्रांति होती है या नहीं लेकिन यह जरूर है कि इससे क्रांति की जमीन तैयार होती है। साहित्य सबको प्रिय लगे यह जरूरी नहीं लेकिन इसमें सबके हित की भावना जरूर होनी चाहिए। प्रधानमंत्री के भोज में एक थाली की कीमत सात हजार रुपये से अधिक होती है जबकि एक ऐसे आदमी जिसकी रोज की आमदनी 28 रुपये है, उसे गरीबी रेखा से ऊपर माना जाता है। एक वक्त की थाली के लिए सात रुपये ही आते हैं। आज समाज में गरीब और अमीर के बीच का अंतर हजार गुना, लाख गुना होता जा रहा है। वह कहते हैं कि साहित्य में विचारधारा उसी प्रकार होनी चाहिए जिस प्रकार चीनी पानी में पूरी तरह घुलकर शर्बत बन जाता है। हर गलत का प्रतिरोध ही लेखक की राजनीति होनी चाहिए।

शिवमूर्ति: हमें नयी पीढ़ी के लेखन पर विश्वास रखना होगा


वरिष्ठ कथाकार-उपन्यासकार शिवमूर्ति से बातचीत

प्रभात- आपकी लगभग सारी कहानियॉ, तीनों उपन्यासों का परिवेश ग्रामीण है। हिन्दी में कौन लेखक आपको दिखाई देते हैं जिनके लेखन में गांव का यह परिवेश विश्वसनीय तरीके से आया है? किनको आप अपना पूर्वज मानते हो?
शिवमूर्ति- उस रूप में तो प्रेमचन्द और रेणु ही प्रमुख दिखाई देते हैं। बाद की पीढ़ी में कई हैं। रेणु का कहने का तरीका बहुत आकर्षित करता है। मैला आंचल को अगर आप देखें तो उसके सारे अध्याय चार-साढ़े चार पेज के हैं और अपने-आपमें पूर्ण हैं। ऐसा नहीं है कि कोई अध्याय 5 पेज का है और कोई दस पेज का। उसी में जो कहना है पूरा कह देते हैं। एक डायलॉग में बहुत सारी चीजें कह देते हैं। उनमें जो कौशल है, जो लाघव है उसे एक लेखक के तौर पर उनसे सीखा जा सकता है।
प्रभात- रेणु के बारे में कहा जाता रहा है कि उनमें राजनीतिक चेतना का अभाव था। गांव का जीवन तो उनकी रचनाओं में है लेकिन उसका तनाव उनकी रचनाओं में दिखाई नहीं देता। एक प्रकार का भोलापन दिखाई देता है।
शिवमूर्ति- ऐसा नहीं है। रेणु के साहित्य में राजनैतिक चेतना पर्याप्त है। चाहे मैला आंचल में देखिए चाहे परती परिकथा में, जुलूस में या कहानी आत्मसाक्षी में। केवल जातीय संघर्ष या जातिवाद ही नहीं है गांव में। बहुत कुछ सकारात्मक भी है जिस पर रेणु की नजर गयी है। उनके साहित्य में जीवन के बहुरंगी पक्ष को अभिव्यक्ति मिली है। वे विचारधारा की संकीर्णता से भी थोड़ा ऊपर थे। रचना विचारधारा का स्थूल विज्ञापन नहीं होना चाहिए। विचारधारा की उपस्थिति रचना में उसी प्रकार होना चाहिए जैसे शरबत में चीनी। अदृश्य फिर भी मिठास से अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हुई। शोषक और शोषित की परिभाषा भी बदलती रहती है। जो जाति जहाँ बलवान हो जाएगी वहीं शोषक बन जाएगी। शोषक और शोषित के लिए अलग-अलग जातियों का होना भी जरूरी नहीं है। इसी नजरिए से देखना चाहिए। जो लोग यांत्रिक वर्गीकरण कर देते हैं वे हकीकत से दूर हो जाते हैं। रेणु के यहां ऐसा नहीं है कि वे किसी शोषक का समर्थन कर रहे हैं या किसी के शोषण में मजा ले रहे हैं।
प्रभात- कहा जाता है कि गांव के जीवन का यथार्थ चित्रण रेणु के साहित्य में नहीं है।
शिवमूर्ति – गांव का असली परिवेश, पार्टीबन्दी, जातिवादी सोच परती परिकथा में उभर कर आया है। जित्तन, ताजमणि, और लुत्तो सम्बन्धी विवरणों में आप उसे देख सकते हैं। मैला आंचल में भी है। उस जमाने में हिन्दी में जाति-पांति के जहर पर सीधे-सीधे लिखने वाला कोई नहीं था। रेणु ने एक अलग ढंग से इसकी शुरूआत किया। मेरी नजर में रेणु प्रेमचंद के आगे की परम्परा के लेखक हैं। प्रेमचंद सामाजिक मर्यादा में जीने वाले लेखक थे। मर्यादित ढंग से साहित्य भी लिखते थे। जीवन में दिखाई देने वाले राग-रंग के चटक और खुले चित्रण से बचते थे। लेकिन रेणु रसिक हैं, जिन्दादिल हैं, कवि भी हैं। इसलिए जीवन में जैसा राग-रंग दिखाई देता है वैसा ही लिखते हैं। रेणु के बाद उस तरह का कलम का धनी मुझे नहीं दिखाई देता। विचारधारा के अतिरेक पर जोर देने वालों में रेणु को लेकर जो असंतोष है वह धीरे धीरे कम हो जायेगा। रेणु का महत्व समय के साथ बढ़ेगा।
प्रभात- आपने मैं और मेरा समय में लिखा है कि आप आरम्भ में प्रेम वाजपेयी, कुशवाहा कांत, गुलशन नन्दा जैसे लोकप्रिय लेखकों के उपन्यास पढ़ा करते थे और वे आपको पसंद भी आते थे। क्या-क्या पढ़ा उस दौर में... कुछ याद आता है?
शिवमूर्ति- एक तो प्रेम वाजपेयी के उपन्यास की याद है। उपन्यास का नाम तो याद नहीं। हां, उसका एक कैरेक्टर था मंगली डाकू। आज तक याद है। वह रात के अंधेरे में निकलता था और अत्याचारियों का सफाया करता था। उनके उपन्यासों में भी गरीबी-अमीरी की खाई उसी तरह होती थी। बस उनमें औदात्य नहीं होता था, गहराई नहीं होती थी। लेकिन उनका उस उम्र में आकर्षण तो था ही। मैं तो इतना प्रभावित था कि प्रेम वाजपेयी से कि मिलने दिल्ली चला गया।
प्रभात- संजीवजी ने लिखा है कि जब आप रेलवे में था तब आपने भी इस तरह का उपन्यास लिखा था?
शिवमूर्ति- हाँ, इस नौकरी में आने से पहले मैं पंजाब में रेलवे में नौकरी करता था। वहीं मेरा एक उपन्यास आया था पतंगा। पंजाब केसरी में धारावाहिक छपा था-बीस बाईस किस्तों में। उस पर मेरे पास एक बोरा चिट्ठियां आई थी। कहीं घर में होंगी।
प्रभात- उसको पुस्तक के रूप में आपने नहीं छपवाया?
शिवमूर्ति- नहीं। वह वैसा ही था जैसा प्रेम वाजपेयी लिखा करते थे। उसके छपने तक मेरी साहित्यिक यात्रा आगे बढ़ गयी। लेकिन बड़ा अपीलिंग था। दो प्रेमियों की कहानी थी। उनकी शादी नहीं हो पाती है तो वे जान दे देते हैं। जहां नदी में डूबकर मरते हैं वहां दो पेड़ उगते हैं- एक पीपल का, एक पाकड़ का। दोनों एक दूसरे से लिपटे हुए रहते हैं। ऐसी ही कहानी थी।
प्रभात- आप किस कहानी से अपनी साहित्यिक यात्रा का आरम्भ मानते हैं?
शिवमूर्ति- छपने के लिहाज से कसाईबाड़ा से, जो जनवरी 1980 के धर्मयुग के ग्राम-कथा विषेषांक में छपी थी। यद्यपि पंजाब में रहते हुए कसाईबाड़ा से भी पहले मैने भरतनाट्यम लिखी थी 1975 में। कसाईबाड़ा 1976 में लिखी थी। लिख तो लिया लेकिन कहीं भेजी नहीं। जब इस नौकरी में कानपुर में पोस्टिंग हुई तो वहां बलराम मिल गये। वहीं मैंने बलराम को दोनों कहानियां दी। बलराम ने बाद में कसाईबाड़ा को धर्मयुग में भेज दिया और जब सारिका में उप सम्पादक हुए तो भरत नाट्यम को 1981 में सारिका में छापा।
प्रभात- आपकी पहली ही कहानी कसाईबाड़ा गांव के बारे में एक नया सच सामने रखती है जो भयानक खबर की तरह है। कहानी में पंक्ति आती है- यह पूरा गांव कसाईबाड़ा है। पाठकों-लेखकों की कैसी प्रतिक्रिया रही?
शिवमूर्ति- बहुत ही उत्साहवर्धक। एक साल तक धर्मयुग में इसके बारे में चिठ्ठियां छपती रहीं. फिर सारिका में रिपोर्ट आयी कि मनहर चौहान 75 लोगों की एक टीम बनाकर कसाईबाड़ा का मंचन कर रहे हैं और देश भर की 150 जगहों पर इसका मंचन करने की योजना है। इस पर फिल्म बनने के अलावा न केवल हिन्दी में बल्कि अनूदित भाषाओं में भी इसके मंचन की खबरे आती रहती हैं। शायद ही कोई महीना ऐसा जाता हो जिस महीने इसके मंचन की खबर न आये। इसको मैं अपनी सफल कहानी मानता हूँ। यद्यपि ज्यादातर लोग, जैसे संजीव आदि भरत नाट्यम को इससे अच्छी कहानी मानते हैं।
प्रभात- गांव का बदलता हुआ यथार्थ आपकी कहानियों-उपन्यासों के केन्द्र में रहा है। कसाईबाड़ा में दिखता है कि सारा गांव शोषण तंत्र में शामिल हो गया है, त्रिशूल में गांव का खराब होता धार्मिक माहौल है, तर्पण में एक दूसरी तरह का जातीय उभार है। आखिरी छलांग तक आते-आते लगता है कि शहरी संस्कृति के सामने गांव ने सरेन्डर कर दिया है?
शिवमूर्ति- गांव का यथार्थ इतना बहुविध, बहुस्तरीय है कि एक ही रचना में सारा कुछ नहीं आ सकता। इसीलिए त्रिशूल में जातिवाद और साम्प्रदायिकता को, तर्पण में दलित अस्मिता को, और आखिरी छलांग में पूरे ग्रामीण समाज पर समग्रता में छा रहे संकट को विषय बनाया है। गॉव में बहुविधि परिवर्तन हो रहा है। अच्छी और बुरी दोनों दिशाओं में। भ्रष्टाचार और जातीय युद्ध बढ़ रहे हैं और इनसे लड़ने वाले भी पैदा हो रहे हैं। गांव में लिखने के लिए इतना कुछ है कि सैकड़ों लोग लिखे जायेंगे फिर भी बहुत कुछ छूट जायेगा।
प्रभात- कोई विदेशी लेखक जिसने आपको प्रभावित किया हो?
शिवमूर्ति- कई हैं। लेकिन यदि केवल एक नाम लेना हो तो मैं जैक लंडन का नाम लूंगा। उनकी वर्णन क्षमता का कोई जवाब नहीं। उनका जीवन भी विचित्र था। वे जारज संतान थे। बचपन में समुद्री डाकू बन गये। १५ साल की उम्र में अपने प्रतिद्वन्दी समुद्री डाकू को हराया और उसकी बेटी से, जो उससे १ साल बड़ी थी, विवाह किया। डकैती के दौरान पकड़े जाने पर जेल में बन्द हुए तो पढ़ना शुरू किया। उनका उपन्यास द काल आफ दि वाइल्ड पढ़िए तो रोंगटे खेड़े हो जायें। कुत्ते की कहानी है। भुवनेश्वर की जो कहानी है भेडिए उसको पढ़िए तो आश्चर्यजनक साम्य मिलता है। जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी जैक लंडन ने 41 साल की उम्र में। लेखन और जीवन दोनों में अदभुत। जब उपन्यासों की रायल्टी से खूब पैसा कमा लिया तो अपनी नौका खरीद कर दूर दूर तक यात्रा किया फिर एक टापू पर अपना महल बनाया नाम रखा- वोल्फ हाऊस।
प्रभात- आपने मैं और मेरा समय में जंगू के बारे में लिखा है। उसके बारे में बताइए। उसके संघर्ष को आप किस तरह से देखते हैं?
शिवमूर्ति- मैं और मेरा समय कथा देश में 2003 में छपा था लेकिन उससे भी पहले 1995 में मैंने जनमत में जंगू के बारे में लिखते हुए बताया था कि कैसे वह इलाके के सताए गये लोगों के लिए राबिनहुड की भूमिका निभा रहा है। अन्यायियों, अत्याचारियों की टांग पेड़ की जड़ में फॅंसाकर तोड़ रहा है। यह भी लिखा था कि एक दिन आप सुनेंगें कि ऐसे न्यायप्रिय और शोषण के विरोधी नायक का इन्काउन्टर हो गया। वह निश्चित रूप से फर्जी इनकाउन्टर होगा। डेढ़ साल पहले जंगू का इनकाउन्टर हो गया, हम कुछ नहीं कर पाये। कितने लोग उसके डर से एरिया छोड़कर भाग गये। एक बार 95 में पकड़ा गया। उसका इनकाउन्टर होने वाला था। हमारे एक समधी उस समय उत्तर प्रदेश में बसपा के अध्यक्ष थे। तो उनके हस्तक्षेप से बच गया। इस बार उन लोगों ने उसको फर्जी मामले में फंसाया जिनकी उसने टांगें तोड़ी थी। पुलिस से मिलकर फर्जी मारपीट की एफ.आई.आर. लिखवाई, उसको घर से गिरफ्तार करवाया और चालान के लिए ले जाते समय रास्ते में गोली मार दी। प्रचारित यह किया कि रास्ते में जंगू के साथियों ने पुलिस पर हमला किया, जवाब में पुलिस ने गोली चलाई जिसमें जंगू मारा गया। हम लोग जंगू के यहां गये थे उसके इनकाउन्टर के बाद। एक छोटी बछिया बंधी थी। अंधेरा उतर रहा था। सन्नाटा था। सारे दरवाजे खुले थे। अलाव में धुआं सुलग रहा था। पुलिस आकर तोड़-फोड़ कर गयी थी। बताया गया कि पुलिस आतंक का वातावरण इसलिए बना रही है जिससे इनकाउन्टर के सम्बन्ध में होने वाली मजिस्ट्रेटी जॉच में पुलिस के खिलाफ बयान देने की कोई हिम्मत न करे। हमने पाया कि जंगू के घर की सारी प्रापर्टी- बर्तन भांड़े, अनाज, खटिया, मचिया आदि का कुल मूल्य 2-4 हजार रूपये से अधिक का नहीं रहा होगा। उसने इलाके के लोगों की टांगे इसलिए तोड़ दी क्योंकि उन लोगों ने कमजोरों, गरीबों के साथ ज्यादती किया था। उसने लूटपाट करके कोई अपना घर नहीं भरा था। एक और चरित्र था नाम था नरेश गड़रिया। मेरा नजदीकी मित्र था। उसका भी 35-36 साल पहले फर्जी इनकाउन्टर हुआ था।
प्रभात- इस तरह के चरित्रों को लेकर कुछ लिखने की योजना बनाई?
शिवमूर्ति- आखिरी छलांग में परिवर्तन-परिवर्धन करने के बाद जंगू और नरेश को मिलाकर कुछ लिखने की योजना बना रहा हूँ। जंगू जैसे लोगों की मानसिक रूप से किस तरह कंडीशनिंग होती है। ऐसे लोग इस स्तर तक कैसे पहुंचते हैं? इस पर कुछ काम करना चाहता हूँ। जरा सोचिए आखिर वह कैसा निष्कलुष-निःस्वार्थ और पवित्र मन रहा होगा जो उन अपरिचित गरीबों के लिए अपनी जान जोखिम में डालता रहा होगा जिनसे उसका कोई लेना देना नहीं था। उसने अकेले दम पर यह तय किया कि इलाके में किसी को ज्यादती नहीं करने देंगे। और जिसने किया उसकी टांग टूट गयी। आप सोचिए कि क्या यह मामूली मन-मस्तिष्क का काम है? किसके होते हैं ऐसे विचार? जिनके होते भी हैं वे भी वक्त के साथ डेबियेट कर जाते हैं। अपना स्वार्थ देखने लगते हैं। खतरे से डरने लगते हैं। निश्चित रूप से उनके अन्दर ऐसा कुछ होता है जो हम लोगों के अन्दर नहीं होता। समय और परिस्थितियॉ उनके अन्दर ऐसे रसायन पैदा करती हैं जिससे वे वैसे हो जाते हैं। परिवर्तन, की निर्माण की यह प्रक्रिया किस प्रकार अस्तित्व में आती है, इसे महसूस कीजिए और शब्द दीजिए। इस तरह से कि उनके साथ अन्याय भी न हो और लोगों को कन्वे भी हो जाये।
प्रभात- राजनीति आपके लेखन में प्रबल रही है। बदलती हुई राजनीति से ग्रामीण समाज किस तरह प्रभावित हो रहा है उसमें क्या बदलाव आ रहे हैं?
शिवमूर्ति- देखित बहुत कुछ बदल रहा है। कुछ खराब हो रहा है तो बहुत कुछ अच्छा हो रहा है। लेकिन बहुत कुछ चीजें हैं जो अलार्मिंग हैं। गांव को सबसे ज्यादा खोखला कर रहा है जातिवाद और भ्रष्टाचार। लेकिन इनकी समाप्ति की कोई उम्मीद नहीं दिखती। प्राइमरी शिक्षा गॉव से जड़-मूल से समाप्त हो चली है। उसी जगह के रहने वाले अध्यापक बिना पढ़ाए वेतन लेने में किसी प्रकार का अपराधबोध नहीं महसूस करते। पांच कक्षाओं को पढ़ाने के लिए मात्र एक या दो अध्यापक नियुक्त हैं उनमें से भी उनकी ड्यूटी कभी मतगणना, कभी जनगणना, कभी गरीबी रेखा के नीचे आने वाले लोगों की सूची बनाने में लग जाती है। दोपहर का भोजन देने का एक नया काम भी बढ़ा हुआ है। इस प्रकार अगर किसी काम के लिए समय नहीं है तो वह है पढ़ाई। शिक्षा का भठ्ठा बैठने का परिणाम यह है कि कल का ग्रामीण भारत पूरी तरह अंगूठा टेक होने वाला है। अंगूठा टेक कहना अगर आपको अतिशयोक्ति लग रही है तो अपढ़ और कुपढ़ कह लीजिए। अक्षर ज्ञान तक ही सीमित रह जाने वाली है अगली पीढ़ी। यह दारूण स्थिति है। अन्य संकट भी हैं। जैसे यह जो माओवादियों का उभार है इसे केवल प्रशासनिक समस्या मात्र माना जा रहा है। जबकि जिस तरह वहां के आदिवासियों के हिस्से का विकास हड़पा गया है, जिस तरह जानवर मानते हुए उनका शोषण होता रहा है, उसके खिलाफ खड़े होने की उनकी भावना देश को गृह युद्ध की ओर ले जा रही है। उनका भविष्य विलुप्त होने के अलावा और क्या है। अगर उन्हें विलुप्त होने से नहीं बचाया गया तो क्या हम अखंडित और अकंटक रह सकते हैं? मुझे लगता है कि इन सब समस्याओं पर अपनी अपनी व्याप्ति और जानकारी के अनुसार लिखा जाना चाहिए। मैने अपने उपन्यासों और कहानियों को इसी गरीब, शोषित, प्रताड़ित जन पर फोकस किया है और आगे भी मेरा यही रहेगा।
प्रभात- ऐसे में लेखकों की जिम्मेदारी को आप किस तरह से देखते हैं?
शिवमूर्ति- लेखकों की जिम्मेदारी केवल कागज काले करना भर नहीं है। अगर आप आम आदमी के सरोकार से खुद को जोड़ते हैं तो आपको सक्रिय रूप से उनकी समस्याओं में इनवाल्व होना पड़ेगा। मुझे लगता है कि जो इन्वाल्व हैं उनके मुकाबले लेखक का काम बहुत छोटा है। मेरी नजर में सामाजिक कार्यकर्ता या एक्टिविस्ट की भूमिका लेखकों की भूमिका से कई मायनों में बड़ी है। जब आँख के सामने शोषण-दमन जारी हो तो उसका प्रतिकार करने वाले लोगों मे शामिल होने के बजाय यदि लेखक यह कहता है कि वह घर चलकर इस अन्याय व शोषण पर एक कहानी लिखेगा तो इसे पलायन ही कहा जायेगा। इस रूप में एक्टिविष्ट की भूमिका सिर्फ लेखन करने वालों से निःसन्देह बड़ी है।
लेकिन अन्याय का प्रतिकार करने का साहस और इसको अपना दायित्व मानने का जज्बा युवा पीढ़ी में साहित्य पैदा करता है। वह प्रतिरोध की जमीन तैयार करता है। ऐसी स्थिति में जब आमने सामने प्रतिरोध करने की शक्ति जनता में नहीं होती तो इस शक्ति को प्राप्त करने के लिए जिस आत्मबल की जरूरत होती है उसे लेखक पैदा करता है। इस प्रतिरोध के लिए बहुत ईंधन चाहिए। जब तक इतना ईंधन आप के पास नहीं है कि आप आमने-सामने का संघर्ष शुरू कर सकें तब तक भूसी ही आपके अन्दर की आग को लम्बे समय तक बुझने से बचाए रख सकती है। भूसी की आग जानते हैं? धान की भूसी बहुत धीरे धीरे सुलगती है। पहले जब माचिस नहीं होती थी गांव में या उसको खरीदने के लिए पैसा नहीं होता था तब भूसी ही आग को बचाकर रखती थी। इस भूसी की आग की तरह ही सही वक्त तक अपने अन्दर के प्रतिरोध की शक्ति को बचाने और बढ़ाने का काम करता है साहित्य।
प्रभात- बस एक सवाल और, जो इस समय बहस का मुद्दा है। कुछ वरिष्ठ व युवा कथाकारों के बीच समकालीन कथालेखन में फार्म, प्रचार व सरोकार जैसे मुद्दों पर गरमा-गरम बयानबाजी चल रही है, इस पर कुछ कहेंगे?
शिवमूर्ति- सरोकार और फार्म को लेकर जो बहस चल रही है उस पर डा. काशीनाथ सिंह, संजीवजी, चन्दन पाण्डेय तथा कुछ अन्य वरिष्ठ व युवा कथाकारों के विचार ब्लॉग और प्रिन्ट माध्यम से जानने का अवसर मिला। कथा-विधा उत्तरोत्तर विकासमान विधा है। नये फार्म आयेंगे ही। उसका स्वागत होना चाहिए। डा. काशीनाथ सिंह ने युवा पीढ़ी में प्रचार की प्यास तीव्र होने की बात कहीं है। साहित्य का उद्देश्य ही तभी सफल माना जायेगा जब वह प्रचारित हो। इसलिए इसमें मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती। नई उम्र में प्रचार की प्यास कुछ अधिक होना स्वाभाविक है। जबकि कभी-कभी पुरानों में भी यह प्यास अस्वाभाविक रूप से अधिक दिखाई देती है। संजीवजी नई पीढ़ी में सरोकार या प्रतिबद्धता के अभाव को लेकर चिन्तित हैं। सरोकार वाला या प्रतिबद्ध तो लेखक होगा ही। यह और बात है कि उसका सरोकार जनहित है या केवल मनोरंजन। और अगर लेखकों का एक वर्ग इनमें से केवल कोई एक सरोकार चुन लेता है जो दूसरे वर्ग को पसन्द नहीं है तो क्या पहले वर्ग को लिखना बन्द करने की सलाह दी जा सकती है? आगे जो कुछ लिखा जाना है उसका अधिकांश नई पीढ़ी द्वारा ही लिखा जाना है। उनमें जनहित वाले भी होंगे, खिलवाड़ वाले भी। आगे की मंजिल उन्हीं को तय करनी है। तो उन पर विश्वास करना होगा। उन्हीं पर विश्वास कीजिए। वे रहेंगे तभी हम भी आगे रहेंगे।

लेखक की भूमिका


 शिवमूर्ति से बातचीत

एक लेखक के रूप में हमारी चिंता क्या होनी चाहिए? उससे भी पहले एक नागरिक के रूप में हमारी चिंता क्या होनी चहिए?
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         जहाँ राजा की चाटुकारिता करनेवाले दस दरबारी कवि रहे होंगे, वहाँ दो-चार जनकवि भी रहे होंगे। उनकी रचनाएँ कहाँ गईं? राजा, चाटुकार, दरबारियों आदि का उपहास करनेवाले रहे भी होंगे तो राजा के कोप से बचने के लिए वे छद्‌म नाम का सहारा लेते रहे होंगे। कया शूद्रक किसी विद्वान कवि का वास्तविक नाम हो सकता है? प्रभुवर्ग की प्रशंसा करनेवाली, उनका मनोरंजन करनेवाली रचनाओं को सहारा गया, सुरक्षा दी गई और प्रश्न खड़ा करनेवाली, विद्रोह जगानेवाली रचनाओं को दबाया गया।
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          इस लिहाज से लेखक की स्थिति पहले की अपेक्षा आज निश्चय ही बहुत अच्छी है। उसके सामने नष्ट कर दिए जाने, कूड़े में डाल दिए जाने का फतवा झेलने-जलाने या प्रतिबंधित कर दिए जाने के खतरे नगण्य हो गए हैं। एक तरह से देखा जाए, तो प्रचार-प्रसार के साधनों की दृष्टि से, सुरक्षा व सम्मान की दृष्टि से या लेखकों की अस्मिता के अक्षुण्ण रह पाने की दृष्टि से यह अत्यंत सुरक्षित समय है। बाहय परिस्थितियाँ भी इतनी प्रतिकूल नहीं रह गई हैं कि राजाश्रय या सेवाश्रय के बिना वह भूखों मर जाएगा। आज के लेखक का संकट बाहय की अपेक्षा आंतरिक अधिक है। उसे पहले अपने से ही लड़ना है। अपना पक्ष निश्चित करना है।
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         क्या होनी चाहिए आज के लेखक की चिंता? क्या उसकी सीमा बंद कमरे में बैठकर केवल कागज काले करने तक ही सीमित होनी चाहिए या आज के समाज के सामने जो चुनौतियाँ हैं उनसे जुझते संघर्षशील लोगों के साथ बाहर निकलकर भी शामिल होना चाहिए? क्या हैं आज की चुनौतियाँ और कौन हैं उनसे जूझने वाले लोग?
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         जब किसी व्यवस्था के विकास के दिन होते हैं, तो उसके नागरिकों में निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर सामूहिक हित के लिए कार्य करने की भावना प्रमुख होती है। व्यक्तिगत नैतिकता का हास होने तथा निजी स्वार्थ की भावना प्रबल होने पर इन संस्थाओं में क्षरण शुरू हो जाता है। सामाजिक न्याय पर आधारित समतामूलक समाज बनाने के उदेश्य से गठित प्रजातंत्र के चारों पाये आज निरंतर क्षरण की ओर अग्रसर हैं। इनमें भ्रष्टाचार की, भाई भतीजावाद की दीमक लग चुकी है। कल्याकारी राज्य जनता के लिए अकल्याकारी सिद्ध होने लगी हैं। विधायिका में ऐसे लोग चुनकर आने लगे हैं जिनकी जगह सीखचों के पीछे है। नौकरशाही रीढ़हीन साबित हो रही हे। वह अपने को सहर्ष राजनीतिकों और मल्टीनेशनल के पैरों की जूती बनने के लिए प्रस्तुत करने लगी है। न्यायपालिका बहुत दिनों तक आम आदमी की आशा, आदर और आस्था का केंद्र रही है, लेकिन पिछले कुछ समय से आस्था के इस स्तंभ में दरारें दिखने लगी हैं। न्याय की शक्ति से रहित कानून कितने दिन तक प्रभावी बना रह सकेगा? दृश्य मीडिया जितना प्रभवशाली हुआ, उससे कई  गुना गैर-जिम्मेदार और पतनशील हो गया।
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       इस प्रकार लोकतंत्र के चारों पाये आज प्रश्न-चिन्ह के घेरे में हैं। यही कारण है कि जिस ग्रामीण किसान, भूमिहीन और मजदूर की बेहतरी का सपना जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के साथ देखा गया था, उसमें सेंध लग गई। स्वप्न दिखाया गया था कि धन और धरती बँटेगी। हर भूमिहीन को जमीन का टुकड़ा मिलेगा। इसके लिए सीलिंग कानून लाया गया। लेकिन इसकी हद में वही लोग आ रहे थे जो राजनैतिक रूप से तब प्रबल थे। इसलिए इस एक्ट में इतने छेद किए गए कि इसकी सारी हवा निकल गई। इतनी सरकारें आईं  और गईं, किंतु भूमिहीन का भूमि पाने का सपना सपना ही रह गया। जो थोडे़ बहुत पट्‌टे दिए भी गए, उन पर बीसों-तीसों बरस बीत जाने के बाद भी कब्जा नहीं दिलाया गया। यह जमीन आज भी दबंगों के चक का हिस्सा बनी हुई है। इस पर कब्जे के लिए संघर्ष करनेवालों के घर जलाए जाते हैं, हाथ-पैर तोडे़ जाते हैं। पुलिस ऐसे संघर्ष में सदैव भू-स्वामियों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है। संघर्ष करने, आंदोलन करने वालों को नक्सलाइट, अराजक, आतंकवादी तक का ठप्पा लगाकर जेलों में ठूँसा जाता है। फर्जी इनकाउंटर में मारा जाता है। ऐसे में एक लेखक की क्या भूमिका बनती है?
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          स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जो योजनाएँ ग्रामीण जनता के कल्याण के लिए बनाईं गईं वही उनके गले की फाँस साबित हुईं। ट्रैक्टर का लोन लेने वाले बडे़ किसान तो उस कर्ज के अर्थशास्त्र को न समझ पाने के कारण सत्यानाश को प्राप्त हो रहे हैं। उनके खेत नीलाम हो रहे हैं। वे आत्महत्या कर रहे हैं, बडे़-बडे़ योजनाकार इसे क्यों नही समझ पाए? बुद्धू से बुद्धू आदमी भी समझ सकता है कि जिस बाजार में फसल तैयार होन पर आलू, प्याज और टमाटर का भाव गिरकर तीन, दो और एक रूपए किलो हो जाता हो और किसान के घर से निकलते ही तीन-चार महीने के अंदर इनका भाव बढ़कर दस-बारह या सोलह रूपए हो जाए उस अर्थव्यवस्था में किसान फाँसी लगाने पर मजबूर नहीं होगा, तो क्या करेगा? जहाँ गेहूँ और धान की उत्पादन लागत-15-16 रूपए किलो आती हो ओर बेचना 6-7 रूपए किलो में पड़ता हो, उस दुनिया में वह कितने दिन जिएगा? किसानों की प्रजाति के दुनिया से उछिन्न होने में इतनी देर क्यों लग रही है?
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         कर्ज और सब्सिडी की योजनाओं ने किसानों के दु:ख को उसी तरह बढ़ाया  जैसे कोढ़ में खाज बढ़ाती है। गाँव का गाँव फर्जी लोनिंग के चक्रव्यूह में फँसा हुआ है। चार-छ:-दस साल पहले कभी कोई सरकारी अमला आया। अनुदान देने का लालच देकर फोटो ओर अँगूठा-हस्ताक्षर ले गया। अब वसूली आई है। अमीन कहता है- तुमने भैंस के लिए कर्ज लिया। ट्‌यूब बेल के लिए कर्ज लिया। अदा क्यों नहीं करते?
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            -मैंने कोई कर्ज नहीं लिया सरकार।
            -यह फोटो किसकी है? यह अँगूठा निशान?
            -मेरे हैं सरकार।
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        -तब कैसे इंकार करते हो? 'रिसीविंग' पर अँगूठा लगाए बैठे हो और कहते हो....। ले चलो इन्हें हवालात की हवा खिलाने।
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           त्राही-त्राही मची हुई है। पता नहीं कब कौन आए और पकड़कर ले जाए... इस फर्जीवाडे़ के खिलाफ कोऔ शिकायत सुनने वाला नहीं। जो समाजसेवी इनकी मदद के लिए आगे आते हैं, उन्हें देखकर सरकारी अमला आँख निकालता है, कहाँ से चले आए खैरख्वाह बनकर?
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          इस दुर्दशा  के लिए जिम्मेदार लोगों को पहचानने और पहचान कराने पर इनके विरूद्ध लामबंद होने के प्रति वे उदासीन हैं। इसके बजाय वे अपनी मुक्ति भगवती जागरण, अखंड पाठ और तिलक-त्रिशूल में खोजते हैं।
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       कहते हैं, प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जनता की उदासीनता सैनिक तानाशाह की स्वैच्छाचारिता से ज्यादा नुकसानकारी होती है। ऐसे सोते हुए समाज को जगाने से ज्यादा बड़ी चुनौती एक लेखक के सामने दूसरी क्या हो सकती है?
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          हमारी चिंता का विषय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पैर पसारती अमेरिका की दादागिरी भी है और तेजी से फैलता आतंकवाद भी। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सर्वग्रासी नीतियाँ भी परमाणु बम के खतरे भी। किन्तु भौगोलिक दूरी और राजनीतिक सीमाओं के चलते इनके विरूद्ध हम केवल वैचारिक और नैतिक विरोध ही दर्ज कर सकते हैं। किन्तु देश के विभिन्न हिस्सों में सरकारों द्वारा जबरदस्ती कराया जा रहा विस्थापन, मानवाधिकारों का हनन, मूलभूत जरूरतों से आमजन को महरूम किया जाना आदि ऐसे सैंकड़ो मुददे हैं जो हमसे सक्रिय भागीदारी की अपेक्षा करते हैं।
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         बहुत सारे लोग, बहुत सारे संगठन देश के अलग-अलग हिस्सों में अपने-अपने ढंग से इन ज्यादतियों और अन्याय के विरूद्ध संघर्ष कर रहे हैं। पर जिनकी बेहतरी के लिए वे जूझ रहे हें उनकी उदासीनता और विरोधी शक्तियां तथा राजसत्ता का दबाव इनके संघर्ष की धार को निरंतर कुंद करने का प्रयास कर रहे हैं। शांतिपूर्ण तरीके से चलाये जा रहे इनके आंदोलनों को लाठी-गोली की ताकत से कुचला जा रहा है। बेहतरी के लिए परिवर्तन की कामना से चलाये जा रहे इन जनांदोलनों में जूझनेवाले लोगों के अंदर जलने वाली प्रतिरोध की यह आग बहुत मूल्यवान है। इसको प्रज्वलित रखने, तेज करने का उपाय ढूँढ़ना ही आज का हमारा सबसे महत्वपूर्ण उदे्‌श्य होना चाहिए। दूर खड़े होकर ऐसे संघर्षशील लोगों के प्रति सहानुभूति प्रकट कर देना या कागजी सहयोग दिखाना मात्र ही आज के लेखक का दायित्व नहीं हो सकता। उसके सामने बहुत बड़ी चुनौती खड़ी ललकार रही है। जागकरण और प्रतिरोध के इस अभियान में उसे सशरीर शामिल होना होगा ताकि झेलते-भोगते जन की पीड़ा उसके लेखन में जीवंतता के साथ अभिव्यक्त हो सके और इसमे लगे लोगों को अपना अभियान जारी रखने के लिए ऊर्जा प्राप्त हो सके।

जैक लंडन के देश में


शिवमूर्ति का यात्रा वृतांत 



भ्रमण का नशा और वह भी दुर्गम स्थलों का, मेरे साथ बचपन से रहा है। जब बच्चा था और गाँव की सीमा ही मेरे लिए दुनिया की सीमा थी तो अपने घर से पश्चिम सड़क पार करके जंगल में चला जाता था। वहाँ एक विशाल और गहरा तालाब था। नाम था वीरनतारा। वीरनतारा के तीन तरफ झाड़ियों, लताओं और विशाल वृक्षों का घटाटोप था। उनके बीच रास्ता खोज पाना मुश्किल। अंदर घुसकर झाड़ी और पानी के संधि स्थल पर बैठ जाइये और दुनिया जहान की आँखों से ओझल हो जाने का आनंद लीजिये।
और बड़ा हुआ तो जिस-तिस के साथ बाजार, मेला, रिश्तेदारी, भोज-भात, जहाँ जाने का मौका मिला, जाता रहा। जिस साल दर्जा पांच पास किया, उस साल पड़ोस के साधू सुग्रीम दास के साथ पैदल मांगते-खाते अस्सी किलोमीटर दूर संगम नहाने चला गया। और बड़ा हुआ, रेलवे से परिचित हुआ तो कितने ही वर्ष उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम ट्रेन से बिना टिकट भ्रमण करता रहा। बच्चे हुए, नौकरी मिली तो उनको घुमाया, हिमालय और नेपाल के पहाड़, पूर्वोत्तर राज्य, दक्षिण, पश्चिम।
अंडमान निकोबार के बिंदु की तरह दूर तक फैले टापू, जैसे तालाब में छिछली मारने पर उसके गंतव्य बनते हैं और लद्दाख के बारे में पढ़ी गयी जानकारी बहुत सम्मोहित करते थे। वह भी देख आये। तब विदेश जाने का नंबर आया।
विदेश के दो लेखक मुझे सबसे ज्यादा सम्मोहित करते हैं। शेक्सपियर और जैक लंडन। पिछले वर्ष शेक्सपियर की धरती पर पहुंचने का अवसर मिला था। इस वर्ष अमेरिका के पर्यटन की शुरुआत जैक लंडन की कर्मस्थली सान फ्रांसिस्को से करने की योजना बनी।
बाप रे, दुबई से सान फ्रांसिस्को की साढ़े पन्द्रह घंटे की हवाई यात्रा। खाओ पिओ, सो जाओ। फिर खाओ पिओ सो जाओ। मेरे जैसा आदमी जिसको जीवन में बहुत कम हवाई यात्रा का संयोग मिला हो, निश्चय ही सोने को समय व्यर्थ गंवाना मानेगा।  इस समय में आस-पास के दृश्य देखा जाय। लेकिन दृश्य भी क्या। तीस-पैंतीस हजार फीट की ऊंचाई पर रूई के सफेद गोले जैसे बादलों के अलावा। वह थोड़ी देर बाद रात के अंधेरे में डूब गये। बस और ट्रेन में तो चलते समय शरीर थोड़ा -बहुत हिलता भी है लेकिन प्लेन में। लगता है जैसे कमरे में बैठे हों कुर्सी पर। इकोनामी क्लास की सीट। जेट लागिंग क्या चीज है यह पहली बार समझ में आया।
 इसकी तुलना में दिल्ली से दुबई तक सबेरे-सबेरे की गयी पांच घंटे की यात्रा तो जैसे पलक झपकते हो गयी थी।
दो दिसंबर 12 का सारा दिन संजीव जी के घर पर मित्रों से मिलने-जुलने, फोना-फोनी में बीत गया। शाम को 9 बजे विवेक मिश्र जी के साथ सुशील सिद्धार्थ जी आ गये। फिर पंकज शर्मा जी पाखी का नया अंक लेकर आ गये। खाते-पीते ग्यारह बज गये।
पंकज शर्मा हम लोगों के साथ हवाई अड्डे तक आ गये, यह बड़ा अच्छा हुआ। चेक इन शुरू होने और हम लोगों के भीतर प्रवेश करने तक हम लोग हिंदी से लेकर दुनिया जहान तक के साहित्य पर बात करते रहे। पंकज अच्छे आदमी हैं। सुसंस्कृत, मिट्ठभाषी और व्यावहारिक। पढ़ाई-लिखाई में तो अव्वल हैं ही।
इमिरेट्स एयरलाइन की एयरहोस्टेस के सिर पर घड़ा रखने की गेंड़ुली जैसी लाल पगड़ी ने मरजीना की याद दिला दी। चोरों के सरदार को चाकू मारने के पहले नृत्य के दौरान पहनी गयी पगड़ी। पर सुंदरता में तो भाई जार्डन एयरवेज की होस्टेसेज का कोई मुकाबला नहीं। पिछले बरस देखी गयीं उनकी सूरतें आँखों में बसी हुई हैं।
कस्टम क्लियरेंस पर लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे जैसी ही भीड़। हम हिंदुस्तानी इधर से उधर लाइन तोड़ने और आगे निकल जाने के जुगाड़ में लगे रहे। इतनी पुरानी और प्रिय आदत इतनी जल्दी परायी धरती पर उतरते ही कैसे छोड़ दें? अपेक्षाकृत जल्दी ही उन लोगों ने सबको निपटा दिया।
एयरपोर्ट के लाउंज में बैठकर साथी यात्रियों के निपटने का इंतजार करने के बाद बाहर आकर बस में बैठे तो पता चला कि पत्नी तो अपना पर्स लाउंज में ही भूल आयी हंैं। बाप रे। काटो तो खून नहीं। पासपोर्ट वगैरह कई जरूरी कागजात उसी में थे। आधे घंटे के करीब हो गये थे। अब कहाँ मिलेगा। लेकिन मैं गया। पर्स बेचारा कुर्सी पर अकेला बैठा हमारा इंतजार कर रहा था। आस-पास की भीड़ ने उसकी तरफ आँख उठाकर देखना भी गंवारा नहीं किया था। इंडियन्स तो बहुत दिख रहे थे। क्या हो गया इन लोगों को इस धरती पर उतरते ही? अपनी मूल प्रवृति ही भूल गये? जान में जान आयी।
होटल बेस्ट-वेस्टर्न का रूम काफी बड़ा और सजा-बजा था। बेडशीट और रजाई-तकिया की सफेदी के क्या कहने। बस, काफी कोशिश करने के बाद भी हम पति-पत्नी को उस मशीन से काफी बनाना नहीं आया। उसकी कमी देर तक गरम पानी से नहाकर पूरी की गयी। फिर छोटे से फ्रिज में धरी खाने-पीने की चीजों को यथासंभव बारी-बारी से निपटाया गया।
जो सिम तीन हजार रुपये सिक्यूरिटी के जमा करके लखनऊ से लेकर चले थे, वह एक्टिवेट ही नहीं हो पाया। यहाँ के दोनों सर्विस कनेक्शन उसे स्वीकार ही नहीं कर रहे हैं। टूर मैनेजर के फोन से अपनी कुशल-क्षेम का एसएमएस घर पर दिया। टूर मैनेजर का नाम है शावक। 60 के हुए, अभी शावक ही हैं। दो दिन में ही महसूस हुआ कि फोन साथ न रहने का भी अपना आनंद है। मजबूरी में ही सही इस आनंद का आनंद लेते रहे। अच्छा शहर है। ज्यादातर मकान बस दोमंजिले। सड़कें चौड़ी और साफ। आबादी बहुत कम और हरियाली बहुत ज्यादा। रात में खाना खाने के बाद देर तक घूमते रहे। सान फ्रांसिस्को और भारत के समय में साढ़े ग्यारह घंटे का अंतर है। जब भारत में लोग आफिस जाने के लिए निकलने को हुए तो हम सो गये।
नाश्ता दिव्य था। इतनी चीजें, क्या खायें, क्या छोड़ें? नाश्ते के बाद निकले खाड़ी देखने। सान फ्रांसिस्को की खाड़ी मशहूर है। जैक लंडन ने 13 साल की उम्र में एक छोटी सी जहाज छीनकर डकैती (पाइरेसी) करना शुरू कर दिया था। वाह, जैक लंडन का घर भी देखना है। ओकलैंड यहीं कहीं होना चाहिए।
पानी रात भर बरसा था, तेज हवा चल रही थी। सर्दी बढ़ गयी थी। बाप रे। इतनी ठंड के बारे में तो चेताया नहीं गया था। आसमान में काले-भूरे बादल दौड़ रहे थे। कभी-कभी हल्की झीसी भी पड़ने लगती थी। सबसे पहले भागकर स्वेटर, पुल ओवर वगैरह खरीदा गया। टोपी खरीदी गयी।
रेस्टोरेंट में बड़े-बड़े केकड़े भुन रहे थे। सेल्समैन उनकी बाहें फैलाकर ग्राहकों को आकृष्ट कर रहे थे। एक-एक बाह सवा-सवा फीट की। वजन होगा 4-5 किलो तक। देखकर ही डर लग रहा था।
टिकट लेकर क्रूज में बैठे। यह क्रूज गोल्डेन गेट ब्रिज तक घुमाने ले जाता है। सिंगल स्पान सस्पेंशन पर बना यह ब्रिज सान फ्रांसिस्को की पहचान है। पास में ही एक अन्य ब्रिज है-बे ब्रिज। एक तीसरा बन रहा है। 2030 तक बनकर तैयार होगा और दो द्वीपों को मिलायेगा। रास्ते में एक छोटा सा आईलैंड ध्यान आकर्षित करता है। इसके ऊपर जेल बनी हुई है, जिसमें पहले स्पेन के कैदी रहा करते थे। इनमें मूल अमेरिकन, जिन्हें रेड इंडियन कहते हैं, ज्यादा थे। क्या जमकर शिकार किया गया यहाँ रेड इंडियन्स का। अब नाम मात्र को ही बचे हैं। इस जेल को अब म्यूजियम बना दिया गया है।
लंच के बाद हम शहर देखने निकले। हमारी गाइड थी तीस बत्तीस वर्ष की दुबली-पतली लंबी हंसमुख लड़की एनी-डा। उसने बताया कि इंडियन्स के लिए मैं अनीता हूं, अंग्रेजी-दाँ के लिए एनी-डा। स्पेनिश लोगों के लिए कुछ और बताया। बताया कि उसका भाई भी गाइड है। नाम है सैम, भारतीयों के लिए श्याम, बंसी बजाने वाला। उसने हिंदी, पंजाबी, कन्नड़, अंग्रेजी और स्पेनिश में कई गाने सुनाकर सबको मोह लिया। बताया कि मेरे पिता बंगलूर से थे और माँ कैलीफोर्निया की। उसका पति अल्जीरियन है। कई धुनें सुनाकर बताया कि किन-किन हिंदी फिल्मों में स्पेनिश और अन्य यूरोपीय भाषाओं की धुनें चुरायी गयी हैं। बंगलूर से आयी दो कन्नड़ बहनों को उसने कन्नड़ का एक गीत सुनाकर प्रसन्न कर दिया। एक पेड़ दिखाते हुए उसने बताया कि इसका नाम है रेड वुड ट्री। लंबाई होती है 112 मीटर तक और उम्र होती है दो हजार साल। मकानों को दिखाते हुए बताया कि यहाँ 20 फीट चौड़ाई और 40 फीट लंबाई में बने एक मकान की कीमत है तीन से चार मिलियन डालर। और ऐसा नहीं कि आप ने खरीद लिया तो लगे मंजिल पर मंजिल बनाने। एकदम नहीं। जो बना है बस वही रहेगा। परिवर्तन नहीं कर सकते। मिलिटरी एरिया में ले जाकर उसने इन्सपिरेशन प्वाइंट या लव प्वाइंट दिखाया। साइकिल चालकों की ओर ध्यान आकर्षित होने पर उसने बताया कि इस शहर में 50 हजार बाइकर्स अर्थात साइकिल चलाने वाले हैं। हर फ्राईडे को बाइकर्स की मीटिंग होती है। सेहत बचाकर रखना है तो साइकिल चलाना ही होगा। साइकिल का नाम आते ही चाइना का नाम आ गया। उसने बताया कि यहाँ की आबादी के 30 प्रतिशत चाइनीज हैं। 15 फीसदी स्पेनिश, 15 फीसदी इटैलियन, पांच फीसदी अन्य एशियाई। बताया कि पास के आईलैंड की मेयर जीन क्वाल चाइनीज लड़की है। यहाँ की प्रथम भाषा अंग्रेजी और द्वितीय भाषा चाइनीज है।
जैक लंडन के बारे में पूछने पर उसे आश्चर्य और खुशी दोनों हुई। बताया कि वह सामने जो बस्ती है, वही है ओकलैंड। वही है जैक लंडन का घर और स्मारक। उसने बताया कि मैं भी ओकलैंड में ही रहती हूं। कहा कि जबसे मैं गाइड का काम  कर रही हूं, आप पहले एशियाई और पांचवें विश्व पर्यटक हैं, जिन्होंने जैक लंडन के बारे में पूछा है। ड्यूटी के बाद मैं आप को वहाँ ले जा सकती हूं।
जैक लंडन स्क्वेयर जाकर मन तृप्त हो गया। करीब एक दशक पहले इस स्क्वेयर पर चीमा मानुमेंट की स्थापना हुई है। काँसे की 18 फीट ऊंची आड़े उड़ते ईगल के धुले हुए पंख की पृष्ठभूमि में नारी मूर्ति। अद्भुत, अद्भुत। कितना संभालकर, संजोकर रखा है इस देश के लोगों ने अपने प्रिय लेखक की यादगार को। मन करता था इस मनोरम स्थल पर बैठे ही रहें।

चाहती हूं ये कोई यादगार उपन्यास लिखें

 प्रसिद्ध कथाकार शिवमूर्ति की पत्नी सरिता जी से दिनेश कुशवाह की बातचीत

डॉ. दिनेश कुशवाह :- भाभी जी, कुछ अपने बचपन के बारे में बताइए। अपनी पैदाइश, परिवार भाई-बहन आदि।
सरिता जी :- मेरा मायका भी इनके जिले सुल्तानपुर में ही है। ससुराल से 4 कोस दूर। हम तीन बहनें हैं केवल। भाई एक था लेकिन पागल सियार के काट लेने से 12-13 वर्ष की उम्र में उसकी मृत्यु हो गई।
डॉ. दिनेश :- अरे कैसे?
सरिता जी :-  स्कूल से पढ़कर आए और गांव के बच्चों के साथ मैदान की ओर खेलने चला गया। वहीं एक जाते हुए सियार को देखकर लड़के उसके पीछे भागे। मेरा भाई सबसे पीछे था पर दौड़ तेज होने के कारण सबसे आगे पहुंच गया। तभी अचानक मुड़कर सियार ने मेरे भाई के गाल पर काट लिया। एक महीने बाद उसकी तबियत खराब हो गई। जो भी लोग मिलने आते उनसे वह कहता कि अस्पताल ले चलकर मेरे सुई लगवा दीजिए। मेरी जान बचा लीजिए। लेकिन तब इतनी जागरूकता नहीं थी। सुई लगवाने नहीं ले गए। झाड़-फूंक करते रह गए और मेरा भाई जान बचाने की चिरौरी करते-करते चला गया। सारा गांव सन्न था। लोग कहते कि जब इनका बेटा मरा, बहू मरी तो यह कहकर समझाते थे कि एक पोता है। उसी को देखकर धीरज रखिए। अब तो एकमात्र पोता भी चला गया तो अब क्या कहकर समझाएं?
डॉ. दिनेश :- तो माता-पिता का वियोग आपको बचपन में ही सहना पड़ा?
सरिता जी :-  जी हां, मैं आठ वर्ष की थी तब पिताजी मरे और उनकी मृत्यु के एक वर्ष बाद मां चल बसी।
डॉ. दिनेश :- आपको अपने विवाह की याद है?
सरिता जी :-  नहीं। मैं 5-6 साल की रही होऊंगी।
डॉ. दिनेश :- ससुराल की पहली याद?
सरिता जी :-  जब विवाह के 11 वर्ष बाद गौना हुआ तब की याद है।
डॉ. दिनेश :- डोली में आई थीं?
सरिता जी :-  नहीं इक्के पर।
डॉ. दिनेश :- रोते-रोते?
सरिता जी :-   हां, रास्ते-भर।
डॉ. दिनेश :- तो गौने में पहली बार इनको देखा तो कैसे लगे?
सरिता जी :-  कहां देखा? दो रात रहे। तीसरे दिन विदा हो गए।
डॉ. दिनेश :- तो भेंट तो हुई होगी, दिन या रात में।
सरिता जी :-  भेंट तो हुई लेकिन मैं देख नहीं पाई । दिन में तो आमना-सामना ही नहीं हुआ। रात में थोड़ी देर के लिए साथ हुआ। लेकिन आंख ही नहीं उठी। नहीं देख पाए। वापस जाकर अपनी एक सहेली से पूछा कि कैसे थे तेरे जीजा? उसने बताया कि अरे जीजी, उनके चेहरे पर तो बहुत सोरे दाग, बहुत सारे फोड़े।
सुनकर मैं सोच में पड़ गई। इस उमर में इतने दाग? कैसे?
डॉ. दिनेश :-  तो बचपन से दागी थे शिवमूर्ति?
सरिता जी :-   दरअसल उनके बहुत मुंहासे हुए थे।
डॉ. दिनेश :- क्या मन में आता था, कैसी होगी ससुराल? कैसे होंगे वे?
सरिता जी :-  हां, कुछ पता नहीं। सब कुछ अनजाना-अनजाना?  डर लगता था।
डॉ. दिनेश :- तो दुबारा कब आईं?
सरिता जी :- पांच-छह महिने बाद।
डॉ. दिनेश :- तब देखा इनको। सचमुच?
सरिता जी :-   (हंसती हैं।) हां, तभी देखा। कसम से।
डॉ. दिनेश :- साल-भर लग गया पति का मुंह देखने में?
सरिता जी :-  नहीं, छह महीने। (हंसती हैं।)
डॉ. दिनेश :- तब ये किस क्लास में पढ़ते थे।
सरिता जी :-   इंटर में।
डॉ. दिनेश :- तो कैसी लगी ससुराल? सास? ससुर?
सरिता जी :- बहुत अच्छे। ननद भी बहुत अच्छी। कई बेटियां होने पर अक्सर ताना मिलता है लेकिन न कभी इन लोगों के चेहरे लटके न हमें कुछ कहा। मेरी सास कहती थी। कि आंधी आ रही है तो कभी पानी भी आएगा।
डॉ. दिनेश :- लेकिन आंधी बहुत ज्यादा आई। छह-छह बेटियां।
सरिता जी :-  हां (हंसती है), लेकिन मेरे ससुर तो इंतजार करते रहते थे कि सौर घर से नवें दिन बाहर निकले तो वे नातिन को गोद में लेकर खिलाएं। जब अपने गुरू महाराज की कुटी से चार-छह दिन के लिए आते थे तो खेलाते थे। मालिस करते थे।
डॉ. दिनेश :- तो पहली बेटी कब हुई ?
सरिता जी :- जिस साल इन्होंने बी.ए. किया।
डॉ. दिनेश :- तो उस समय मन लगाकर पढ़ते थे?
सरिता जी :-  हां, जब पढ़ने का समय होता था तो पढ़ते थे।
(अरे, साफ-साफ पूछिए कि भरतनाट्‌यम क्या इन्हीं की कहानी है?- संजीव जी जोर से कहते हैं । )
डॉ. दिनेश :- शिवमूर्ति जी की एक कहानी है भरतनाट्‌यम। उसकी नायिका के भी लगातार लड़कियां ही लड़कियां होती हैं। बाप भी बहुत गुस्सैल है। जबकि वह चाहती है कि लड़का हो जाए। अरे, जिसमें वह खलील दर्जी के साथ भाग जाती है। पढ़ी है?
सरिता जी :-  हां।
डॉ. दिनेश :- सब लोग समझते थे कि शिवमूर्ति अपनी ही कहानी लिखे हैं।
सरिता जी :-  (जोर से हंसती हैं) नहीं-नहीं। अरे इनकी एक कहानी है, 'सिरी उपमा जोग', जिसे पढ़कर हमारी बड़ी बेटी की सहेलियां पूछती थीं। कि जो मां तुम्हारे साथ रहती हैं वे तुम्हारी पहली मां हैं कि दूसरी वाली? (सामूहिक हंसी।)
डॉ. दिनेश :- अच्छा, यह बताए कि आप लोगों में कुछ नोंक-झोंक, कुछ तनातनी, कुछ टुन्न-पुन्न होता है?
सरिता जी :-  हां, क्यों नहीं? जब कोई मेरी बात ए नहीं मानते या उनकी कोई बात मैं नहीं मानती।
डॉ. दिनेश :-  एकदम शुरूआत से?
सरिता जी :-  हां, एक बार ए मुझे विदा कराने के लिए मेरे मायके आए। मैं जाना नहीं चाहती थी। दादी ने कहा इंकार कर दो। लेकिन उन्होंने लिवाकर ही जाने की जिद्‌द की तो दादी ने मुझे समझा-बुझाकर विदा कर दिया। मेरे इंकार के चलते ए गुस्सा हो गए। गांव से निकलकर थोड़ी दूर पगडंडी पर आगे बढ़ने के बाद साइकिल पर बैठाने का चलन था। लेकिन उस दिन कोस-भर पैदल चलाने के बाद इन्होने मुझे साइकिल पर बैठाया।
डॉ. दिनेश :-  अच्छा, आपको कब पता चला कि आपके पति लेखक हैं?
सरिता जी :-  बहुत बाद में। जब मैं इनके साथ बलिया आ गई। सेल्स टैक्स अफसर वाली नौकरी में। जब 'कसाईबाड़ा' छपी 'धर्मयुग' में।
डॉ. दिनेश :-  बातचीत तो शुरू से होती होगी?
सरिता जी :-  हां, पहले सिर्फ रात मे होती थी। दिन में नहीं। खाना भी मुझसे नहीं मांगते थे। अपनी मां से ही मांगते थे। बेटी हो गई लेकिन उसे खेलाते नहीं थे। कभी-कभी जब वह चारपाई  पर सो रही होती, उसे झुककर देखते और कहते कि लगता है यह मरेगी नहीं। मेरी जान का कंटक बनेगी। कहां से इसकी शादी-ब्याह करूंगा।
डॉ. दिनेश :-  बड़ी वाली, रेखा? जो डाक्टर है?
सरिता जी :-  हां। बहुत स्वस्थ थी। जब नीम के पेड़ पर कौआ बैठकर कां-कां बोलता तो वह भी लेटे-लेटे उसकी बोली दोहराती। उस समय ए वहीं बगल में बैठकर पढ़ रहे होते और मैं खेत पर काम कर रही होती। तब ए उदास होते उसकी किलकारी सुन-सुनकर। जितना ही लड़कियों की पैदाइश से डरते थे उतना ही लड़कियों की  भरमार  हो गई।
डॉ. दिनेश :- कभी अपने बच्चों को खेलाते थे शिवमूर्ति जी?
सरिता जी :-  कभी नहीं। गांव में अपने बच्चों को शायद ही कोई खेलाता हो। सब शरमाते हैं।
डॉ. दिनेश :-  पैसे की तो बहुत तंगी रहती होगी उस समय?
सरिता जी :-बहुत ज्यादा। पांच-पांच रूपए महीने का ट्‌यूशन पढ़ाते थे।
डॉ. दिनेश :-  सुनते हैं, मजमा लगाकर मेले में दवा भी बेचते थे?
सरिता जी :-  हां, बहुत काम किए हम लोग उस समय। ए मजमा लगाते थे। उसके लिए मैं शीशियों में दवा भरती थी। लेबल चिपकाती थी। तंबाकू और तेंदू का पत्ता लाते थे। हम लोग बीड़ी बनाते थे। मैं, मेरे ससुर, सास, ननद और एक भगौती यादव थे, पिताजी के गंजेड़ी दोस्त-सब मिलकर।
डॉ. दिनेश :-  गंजेड़ी? गांजा पीने वाले?
सरिता जी :-  हां, उसके चलते भी बहुत दिक्कत होती थी। गांजे की पुड़िया भी इनको रोज लाना पड़ता था। चार आने की एक पुड़िया मिलती थी। न लाने पर खेत-बारी बेच डालने की धमकी देने लगते थे।
डॉ. दिनेश :- तो बीड़ी बनाकर बेचते थे?
सरिता जी :- बहुत सारी तो ए दोनों लोग पीकर खत्म कर देते थे। जो बचती थीं, गांव के एक जयराम भूज थे, उन्हीं को बेचने को दे दिया जाता था।
डॉ. दिनेश :- और क्या-क्या किए उस समय आप लोग?
सरिता जी :-  और इन्होंने कैलेंडर बेचने की एजेंसी लिया था। उसका आर्डर बुक करने जाते थे। साड़ियों का आर्डर लेने जाते थे। नजदीक के मेलों मे दवाई का मजमा नहीं लगाते थे। वहां साइकिल स्टैंड लगाते थे दो-तीन लोग मिलकर।
डॉ. दिनेश :-  तो इन सब से कितनी आमदनी करते थे?
सरिता जी :-  पता नहीं।
डॉ. दिनेश :-  आमदनी की कोई चर्चा नहीं करते थे आपसे?
सरिता जी :- नहीं। आखिर घर उन्हीं को चलाना था। खर्चा-वर्चा उन्हीं के जिम्मे रहता था इसलिए न हम कुछ पूछते थे न वे कुछ बताते थे। यह जरूर था कि एक किलो दाल बाजार से लाते थे तो कह देते थे कि इसी से हफ्ते-भर का काम चलाना है। मैं वैसा ही करती थी। उस दाल के सात भाग कर देते थे। एक टाइम शाम को पकाते थे। नमक खत्म हो जाता था, तो कभी-कभी दो-चार दिन पड़ौस से उधार मांगकर काम चलाते थे। आने पर वापस कर देते थे।
डॉ. दिनेश :-  कभी उपवास की नौबत तो नहीं आई?
सरिता जी :-  नहीं। बस दो बार एक जून उपवास की नौबत आई थी। दरअसल दादा अपने गुरू जी को भंडारे के लिए बुला लाए थे। वे अपने सारे चेलों के साथ आ गए। घर में जितना राशन था सब उन्हें खिलाने में खत्म हो गया। तो सबेरे उन लोगों की बिदाई के बाद दोपहर में पकाने के लिए कुछ नहीं था। शाम को हमारी सास कहीं से अनाज उधार लाईं। उसमें से एक-डेढ़ किलो मैंने जल्दी-जल्दी जांत में पीसा। तब रोटी बनी।
डॉ. दिनेश :-  और दूसरी बार कब?
सरिता जी :- हमारे एक बडे़ ससुर जी थे। अहमदाबाद में मिल में काम करते थे। उनका देहांत हो गया। उनके क्रियाकर्म के भोज में घर का सारा राशन खत्म हो गया। सबेरे मेहमानों की बिदाई के समय उन्हें नाश्ते में देने के लिए कुछ नहीं था। तब एक पल्था (क्यारी) आलू खोदी गई। अभी आलू पूरी तैयार नहीं थी। नन्ही-नन्ही आलू निकली। उन्हें उबालकर सबको थोड़ा-थोड़ा दिया गया। अंत में मेरे लिए एक भी आलू नहीं बचा। किसी ने देखा नहीं, सोचा नहीं कि मेरे लिए भी कुछ बचना चाहिए। मैंने जूठे बर्तन समेटे और उन्हें धोने लगी। घूंघट होने के कारण कोई मेरे आंसू नहीं देख सका जो देर तक बहते रहे थे।
डॉ. दिनेश :-  तो जो दवा वगैरह बेचते थे उनसे आमदनी?
सरिता जी :-  दवा बेचना उसी के बाद शुरू किया।
डॉ. दिनेश :-  और मास्टरी भी तो करते थे?
सरिता जी :-  एक-डेढ़ साल दवा वगैरह बेचे, तब मास्टरी शुरू किया। मास्टरी शुरू की तो दवा बेचना बंद कर दिए। मास्टरी में भी 70-75 रूपए महीने मिलते थे। स्कूल से आकर जो भी खाने के लिए रहता दो-चार आलू, चबेना, या गंजी (शकरकंदी), तब तो यही दोपहर का भोजन होता था, उसे खाकर टयूशन पढ़ाने चले जाते थे। वहां से रात दस-साढे़ दस बजे तक लौटते थे। फिर बड़े सबेरे चार बजे उठकर ढाई-तीन घंटा पढ़ते थे।
डॉ. दिनेश :-  जब अधिकारी हो गए तो कैसा लगा?
(संजीव जी की आवाज: पूरा बताइए। लजाइए मत)।
सरिता जी :- लजा नहीं रहे हैं। अच्छा लगा। पता लगा तो पूरे गांव के लोग कई दिन तक शाबासी देने और पूछने आते रहे कि कैसे हुआ? क्या करने से नौकरी मिली? दरअसल मैंने सपने में देखा था कि इनका नौकरी वाला कागज निकल आया है लेकिन किसी ने छिपा दिया है। ऐसा पहले हुआ भी था। इनके इंटरव्यू की चिट्‌ठी आई थी। तो डाकिए ने गांव के किसी आदमी को दे दिया था। उसने समय से नहीं दिया। इंटरव्यू की तारीख बीत जाने के बाद कोई हमारे घर के सामने उसे फेंक गया था। लेकिन ए इलाहाबाद से ही हर बात का पता लगाए रहते थे और समय से इंटरव्यू देने पहुंच गए थे।
डॉ. दिनेश :-  तो बहुत सावधान रहते थे शिवमूर्ति जी?
सरिता जी :-  हां, रहते थे। क्योंकि गांव में हमारे परिवार को एक पीढ़ी पहले से लड़ाई-भिड़ाई करना पड़ रहा था। खेत के एक विवाद में हमारे ससुर को गांव के एक ठाकुर परिवार के साथ लंबी मुकदमेबाजी करनी पड़ी जिसमें फौजदारी और घर से बाहर निकलकर छिपकर रहने तक के लिए मजबूर होना पड़ा थां जैसाकि हर गांव का चलन है, किसको आपसे अंदरूनी जलन है और कौन कब दगा कर देगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता है। इसलिए सावधान रहना पड़ता था। और बचकर चलना पड़ता था।
डॉ. दिनेश :-  पहली बार कब ले गए आपको अपने साथ?
सरिता जी :- रेलवे की दो-ढाई साल की नौकरी में तो अकेले ही रहते थे लुधियाना में। हम सब गांव में ही रहते थे। फिर सन 77 से इस नौकरी में आए। ट्रेनिंग के बाद अगस्त में बलिया में ज्वाइन किया। उसके पांच - छह महीने बाद ले गए।
डॉ. दिनेश :- तो परिवार के लागों ने एतराज नहीं  किया आपको शहर ले जाने का?
सरिता जी :- नहीं। बहुत पहले जब वे मास्टरी कर रहे थे तभी पिता जी ने गांव आना छोड़ दिया था। साधू लेकर अपने गुरू जी कुटिया पर रहने लगे थे। जब हम लोगों को बाहर ले जाने की बात आई तो ए गए, ससुर जी के पास गए। उन्हें समझाया कि अब घर पर केवल मां ही अकेली रह जाएंगी क्योंकि ननद भी ससुराल चली गई थीं। इसलिए आप घर चलिए। वहीं कुटी बनवा देंगे। वहीं रहिए ताकि मां अकेली न पड़ जाएं। कुछ काम-धाम मत करिए। सिर्फ भजन करिए।
(संजीव जी :- अच्छा साफ-साफ बताइए, कैसा लगा पहली बार जब शहर गई तो?)
सरिता जी :-  बहुत अच्छा लगा। सब कुछ नया-नया था। अच्छी सड़क। बिजली की रोशनी। साफ सुंदर लोग। अच्छा लगा।
डॉ. दिनेश :-  कोई खास याद उस समय की?
सरिता जी :- एक चपरासी आते थे घर खाना बनाने। तो मैंने कहा कि खाना ए बानाएंगे तो मैं क्या करूंगी? इन्होंने कहा-जैसा होता है होने  दीजिए।
डॉ. दिनेश :-  और?
सरिता जी :-एक दिन विश्वनाथ जी, जो खाना बनाते थे, बोले-बहूजी, एक कूकर ले आइए। मैं समझी नहीं। सोचा शहर में कूकर (कुत्ता) का क्या काम? विश्वनाथ जी मुझे 'बहूजी' कहते थे लेकिन इतनी जल्दी में भोजपुरी लहजे में बोलते थे कि मुझे 'भउजी' सुनाई पड़ता था। तो हमेशा की तरह शाम को मैंने इनसे कहा कि ए उम्र में मुझसे बडे़ हैं, तब मुझे भउजी क्यों कहते हैं? तो इन्होंने समझाया कि  भउजी नहीं, बहूजी कहते हैं।
(सबकी समवेत हंसी)
डॉ. दिनेश :-  और?
सरिता जी :- बस और जाने दीजिए। (हंसती हैं)
(कब सोचा कि आपको पढ़ना चाहिए?-संजीव जी पूछते हैं।)
सरिता जी :-  जब ये रेलवे की नौकरी में लुधियाना गए तभी मेरे पढ़ने के लिए गांव में टयूशन लगवा दिए थे। गांव का एक ठाकुर का लड़का शाम को पांच-छह बजे पढ़ाने आता था और मैं गाय-बैलों की सानी-पानी रसोई का काम निपटाने, सबको खिलाने-पिलाने के बाद दिए की रोशनी में उसका बताया हुआ लिखती थी।
डॉ. दिनेश :-  सबेरे भी उठकर पढ़ती थीं?
सरिता जी :-  नहीं, सबेरे नहीं। सबेरे तो चार बजे उठकर रोज अनाज पीसने या धान कूटने का काम रहता था। वह सबसे जरूरी था। नहीं तो चूल्हा कैसे जलता?
डॉ. दिनेश :- खुद आटा पीसती थीं? घर के जांते में?
सरिता जी :-  हां। तब आटा-चक्की का चलन उतना नहीं था। घर-घर में औरतें बाम्हणों, ठाकुरो, बनिया को छोड़कर खुद ही अपनी जरूरत की कुटाई-पिसाई करती  थीं। अब तो शायद ही किसी के घर में जांत मिले।
डॉ. दिनेश :-  अच्छा, तो आप अपनी पढ़ाई के बारे में बता रही थीं?
सरिता जी :-  गांव से बलिया गए पहली-पहली बार तो वहां भी ट्‌यूशन लगवा दिया। जो लड़का बच्चों को पढ़ाने आता था वही मुझे भी पढ़ाता था। इस तरह थोड़ा-थोड़ा पढ़ना-लिखना आया।
डॉ. दिनेश :-  पहली बड़ी किताब कौन-सी पढ़ी?
सरिता जी :-  बिना पैसे पैदल दुनिया का सफर।
डॉ. दिनेश :-  क्या था इसमें?
सरिता जी :-  दो लोग बिना जेब में एक पैसा रखे दो-पौने दो साल तक पैदल सारी दुनिया घूमे और कई प्रकार की मुसीबतें झेले। एक का नाम सतीश था। शायद राजस्थान के रहने वाले, दूसरे दक्षिण भारतीय । ए बाता रहे थे कि सतीश अब शायद लंदन में रहते हैं। जब वे घूमने के लिए निकले तो उनकी पत्नी को बच्चा होने वाला था।
डॉ. दिनेश :-  शिवमूर्ति जी की पहली कहानी कौन-सी पढ़ी?
सरिता जी :- सिरी उपमा जोग। पढ़कर बहुत रोई।
डॉ. दिनेश :-  और कौन-कौन सी किताबें पढ़ी हैं आपने?
सरिता जी :-  कई पढ़ी हैं। बर्नियर की भारत यात्रा,इब्नबतूता की यात्रा का हाल। मेरा दागिस्तान, सूबेदार सीताराम पांडे, ठग, ढोढाई चरित मानस, गोदान, मैला आंचल, गोर्की का उपन्यास वे तीन, जैक लंडन की भेड़िए वाली कहानी, आंखों देखा गदर, आधा गांव, क्या भूलूं क्या याद करूं, नंगा तलाई का गांव, हावर्ड फास्ट का मुक्ति मार्ग वगैरह।
डॉ. दिनेश :-  दोस्तों की आवाजाही बढ़ने से खिलाने-पिलाने का झंझट बढ़ा तो बुरा लगा?
सरिता जी :-  कभी नहीं। अच्छा लगता था। घर चार-छह आदमी आएं तो खुशी होती है। इनके दोस्त-मित्र बहुत हैं गांव में भी हैं। अभी कितने साल से बाहर रह रहे हैं पर अब भी गांव जाते हैं ऐसा कभी नहीं हुआ कि आने की खबर पाकर चार-छह लोग मिलने न आ आएं।
डॉ. दिनेश :-  अच्छा, कभी इन पर ऐसा गुस्सा आया जब सोचा हो कि अब इनसे नहीं बोलेंगे?
सरिता जी :- आ जाता है कभी-कभी। तब एकाध घंटे या एकाध दिन बोलचाल बंद हो जाती है।
डॉ. दिनेश :-  इनकी कौन-सी आदत आपको सबसे ज्यादा अच्छी लगती है?
सरिता जी :-  इस तरह तो कभी सोचा नहीं।
डॉ. दिनेश :- अच्छा, पति के अलावा हर स्त्री का एक प्रेमी भी होता है। दोनों में आप क्या अंतर करती हैं?
सरिता जी :-  पति तो पति है। उसका स्थान प्रेमी नहीं ले सकता। लेकिन जैसे आजकल के लड़कों की गर्ल फ्रैंड होती हैं, लड़कियों के ब्वाय फ्रैंड होते हैं। शादी होने पर अगर पति ब्वाय फ्रैंड से कमतर रहा किसी रूप में तो ब्वाय फ्रैंड की याद आती रहेगी। अब दुनिया ज्यादा खुल रही है। लड़कियों के लिए यह अच्छी बात है लेकिन आज की कितनी लड़कियों के पास प्रेमी होते हैं? बहुत कम। दिल्लगी और बात है। मतलब निकालना और बात है। हमारे समय में तो पति ही सब कुछ होता था। ब्याय फ्रैंड बनाने की छूट ही नहीं थी, तो वह बात दिमाग में कभी आती ही नहीं।
डॉ. दिनेश :-  अच्छा, शिवमूर्ति भाई के साथ कहां-कहां घूमी हैं?
सरिता जी :-  पहली बार नेपाल गए थे पंद्रह दिन के लिए पोखरा काठमांडु वगैरह। फिर पुरी कोणार्क गए थे। फिर कलकत्ता सुंदरवन डायमंड हार्बर दीघा वगैरह। फिर दार्जिलिंग,सिक्किम वगैरह। फिर आसाम, मणिपुर, मेघालय, चैरापूंजी, वर्मा बार्डर की मोरे बाजार तक। फिर हरिद्वार, ऋषिकेष, फूलों की घाटी, मणिकर्ण हेमकुंड साहेब वगैरह। अंडमान-निकोबार, हैबलक, आइलैंड, जारवा आदिवासियों के जंगलों में। फिर लेह, लद्‌दाख, कारगिल का इलाका, चीन-सीमा की विशाल झील जिसका नाम भूल गया, एक छोटा रेगिस्तान जिसमें दो कूबड़ वाले ऊंट की सवारी करते हैं। और वहां का पूरा इलाका एक हफ्ते तक। खजुराहो, नैनीताल, रानीखेत,  शिमला, कुल्लू मनाली, धर्मशाला, चंबा, खजियार, डलहौजी वगैरह और भी कई जगहें, याद नहीं आ रही हैं।
डॉ. दिनेश :-  अच्छा, इतनी ज्यादा लड़कियां पैदा हुई तो उनकी शादी-ब्याह की चिंता करते थे शिवमूर्ति जी?
सरिता जी :-  करते होंगे लेकिन कभी मुझसे नहीं कहा। इस तरह की बातें ज्यादातर मन में ही रखते हैं वे।
डॉ. दिनेश :-  कभी आपको रोना आया हो इनके व्यवहार से?
सरिता जी :-  हां, एक बार जब रेलवे में नौकरी में थे तो बच्चों के लिए ऊन भेजा। अपने एक दोस्त नंदलाल जो कसाईबाड़ा कहानी के अधरंगी हैं, उनके लिए एक स्वेटर भेजा। उस पैकेट से सबके लिए कुछ-न-कुछ निकला। मैं सोचती थी मेरे लिए भी कुछ निकलेगा लेकिन मेरे लिए कुछ नहीं निकला। उस रात में बहुत रोई अकेले में कि क्या मुझे जाड़ा नहीं लगता?
डॉ. दिनेश :-  क्यों नहीं भेजा?
सरिता जी :-  अरे शुरू-शुरू में ऐसे ही बकलोल थे ए इन मामलों में। अपने-पराए की समझ नहीं थी। अब भी बहुत फर्क थोडे़ पड़ा है।
डॉ. दिनेश :- और कभी रोने का मौका दिए?
सरिता जी :-  एक बार जब गांव में थे तो मेरे लिए काली किनारी वाली साड़ी लाए थे। मैंने एतराज किया तो बोले कि तुम भी तो काली हो। इतनी समझ नहीं थी कि नई दुल्हन को काली किनारी नहीं पहनाना चाहिए।। उस रात भी मैं बहुत रोई।
डॉ. दिनेश :-  और कभी इनकी वजह से रोना पड़ा?
सरिता जी :-  और भी रोना पड़ा है लेकिन अभी बहुत कुछ बताने का समय नहीं आया है (हंसती हैं)।
(सबकी सामूहिक हंसी।)
डॉ. दिनेश :-  शिवमूर्ति जी बहुत जल्दी रो पड़ते हैं? एक बार मिर्जापुर में मैंने इन्हें एक गीत सुनाया। सुनते-सुनते रोने लगे। उसी के बाद केशर-कस्तूरी कहानी लिखी थी। इतना ज्यादा रोना क्यो?
सरिता जी :- रोना और गाना दोनों बहुत हैं इनके पास। अक्सर अकेले रहते हैं तो कुछ-न-कुछ गुनगुनाते रहते हैं। फिर गाते-गाते आंसू गिरने लगते हैं। कभी-कभी तो बेख्याली में गाते हैं। पचीसों साल पुराना गीत। और टोक न दीजिए तो बाद में इन्हें याद ही नहीं रहेगा कि क्या गा रहे थे।
डॉ. दिनेश :- तो आप टोकती हैं?
सरिता जी :-  रहती हूं तो कहती हूं जरा खुलकर सुनाइए। तब पकड़ लेते हैं उस लाइन को। नोट करने लगते हैं।
डॉ. दिनेश :-- इधर कोई गीत पकड़ा है आपने?
सरिता जी :- हां, तीन-चार दिन पहले बाथरूम जाते हुए चाय पीते हुए गुनगुना रहे थे। आवाज उदासी में डूबी जा रही थी। मैंने कहा-जोर से सुनाइए। सुनाया-'जिंदगानी में लाखों का मेला जुड़ा। हंस जब-जब उड़ा तब अकेला उड़ा।'
डॉ. दिनेश :-और?
सरिता जी :- हमारे घर के पास के एक फरवाह (लोक नृत्यक) थे कन्हई यादव। उनका एक गीत गाते हैं- 'पियरी भइउं मैं गुंइया पिया-पिया रटि के।
बावरी भइउं मैं बरसनवा मा बसि के।'
डॉ. दिनेश :- क्या मतलब?
सरिता जी :- मतलब गोपियां कहती हैं। कि बरसाने में बसने से मैं बावरी हो गई। पिया-पिया रटते-रटते मैं पीली पड़ गई।
डॉ. दिनेश :- वाह! और?
सरिता जी :- हमारे पड़ोस के एक कवि हैं जुमई खां आजाद। उनका गीत गुनगुनाते हैं- 'बड़ी-बड़ी कोठिया उठाया पूंजीपतिया कि दुखिया कै रोटिया चोराइ-चोराइ। अपनी महलिया मा केहा तू अंजोरया कि झोपड़ी के दियना बुझाइ-बुझाइ।'
डॉ. दिनेश :- उदासी के गीत ही गाते हैं?
सरिता जी :- राग-रंग वाले गीत भी गाते हैं। ऐसे गीत भी जिन्हें औरतें ही गाती हैं शादी-ब्याह में। फूहड़ गालियां भी। पता नहीं कहां-कहां से इकट्ठा किए हैं। तिरिया चरित्तर, सिरी उपमा जोग, केशर-कस्तूरी आदि कहानियां लिखते समय निरंतर गाते या रोते रहते थे।
डॉ. दिनेश :- आजकल क्या लिखते हैं?
सरिता जी :- आजकल लिख कम रहे हैं। ज्यादातर अपनी गर्ल फ्रैंड के साथ बिताते हैं।
डॉ. दिनेश :- क्या?
सरिता जी :- हां, वही जिसके भौंकने की आवाज बीच-बीच में आ रही है। उसका नाम है लारा। उसको खिलाने-पिलाने, नहलाने-टहलाने में इतने मगन हैं इन दिनों कि बेटियां कहती हैं कि यह पापा की गर्ल फ्रैंड है।
डॉ. दिनेश :- संजीव भाई ने भी अपने एक संस्मरण में लिखा है कि शिवमूर्ति जी कुत्तों के प्रेमी हैं।
सरिता जी :- बहुत ज्यादा। बचपन में कुत्ते पालने के चलते बाप की मार खाए हैं। जब गांव में थे तो पूरे टोले के कुत्ते इनके प्रेमी थे। रेलवे की नौकरी में बाहर जाने के बाद चार-छह महीने में आते तो कुत्तों को गांव के बाहर ही पता चल जाता। एक देखता तो आवाज देकर दूसरों को बताता, फिर पूरा झुंड इनके साथ चलते हुए कूद-कूदकर इनके कपडे़ खराब करते हुए घर तक आता। बाहर नौकरी करते हुए भी कहीं-न कहीं से कोई पिल्ला-पिल्ली उठा लाते। पाल लेते। इलाहाबाद में एक थी उर्वसी। उसके पहले एक थी टीना। उसके भी पहले जाने कितने-कितनी। गांव में हमारे घर पर अभी भी चार-पांच कुत्ते हैं पहुंचते ही घेर लेते हैं।
डॉ. दिनेश :- किस्से भी बहुत सुनाते हैं छोटे-छोटे। कहां पाते हैं इतने किस्से?
सरिता जी :- पता नहीं। पहले से ही हैं इनके पास।
डॉ. दिनेश :- अच्छा यह बताइए, भाई साहेब को जब साहबी वाली नौकरी मिली, आप शहर आईं, तो कभी गहने वगैरह की फरमाइश किया इनसे?
सरिता जी :- फरमाइस तो बहुत पहले ही कर दिया था। रेलवे की नौकरी से लंबी छुट्‌टी लेकर चले आए थे। बहुत सारी किताबें लेकर सबेरे से शाम तक महुए के पेड़ के नीचे खटोला बिछाकर पढ़ते रहते थे। कहते थे कि बड़ी नौकरी के लिए पढ़ रहे हैं। बताए कि पांच-छह महीने बाद इम्तहान होगा। उसको देने के बाद ही रेलवे की नौकरी पर वापस जाएंगे। मैंने कहा कि दादा साधू होकर अपने गुरू महाराज के घर चले गए हैं। मैं ही खेती-बारी का आपका सारा काम निपटा रही हूं। जब भारी तनखाह वाली नौकरी मिल जाएगी तो मेरे लिए बहुत सारे गहने गढ़वाना होगा। तभी बचन ले लिए था।
डॉ. दिनेश :- तो गढ़वाया इन्होंने?
सरिता जी :- ए तो जब से मुझे शहर में लाए अपने पास कभी पैसा रखा ही नहीं। जो कुछ लाए मेरे हाथ पर रख दिया और कभी पूछा नहीं कहां खर्च किया? गहने भी मैंने खुद ही गढ़ाए। ए तो साथ भी नहीं जाते दुकान तक।
डॉ. दिनेश :- काली किनारी वाली साड़ी के बाद फिर कब साड़ी दिए?
सरिता जी :- बस दो बार आज तक साड़ी लाए हैं मेरे लिए। एक काली किनारी वाली गांव में और एक नीले रंग की जब गांव से शहर आना था उस समय।
डॉ. दिनेश :- भरतनाट्‌यम कहानी में तो बेटा पाने के लिए वह औरत खलील दर्जी के साथ भाग जाती है। आपने बेटा पाने के लिए क्या-क्या किया?
सरिता जी :- मैंने कुछ नहीं किया। मऊ में पोस्टिंग हुईं तब तक मेरे छह बेटियां हो चुकी थीं। मऊ में एक मिसराइन जी से हेल-मेल हो गया। उन्होंने कहा कि मार्कण्डे पुराण सुन लीजिए तो बेटा हो जाएगा। मैंने कहा ठीक है। बाद में उन्होंने कहा कि बनारस, के जो विद्धान पुराण सुनाएंगे वे सीधे आपको नहीं सुनाएंगे क्योंकि शूद्र लोग यह पुराण नहीं सुन सकते। हमारी जाति को शूद्र कहा जाता है। उन्होंने इसका उपाय बताया कि पुराण सुनाने का खर्च दे दीजिए। वे खुद यह पुराण सुनकर उसका पुण्य मुझे संकल्प कर देंगी, तो पुराण सुनने का फल मुझे मिल जाएगा। मैंने कहा कि जो पुराण मैं सुन नहीं सकती उसका पुण्य भी मुझे नहीं चाहिए।
डॉ. दिनेश :- सच? ऐसा कहा आपने? क्यों?
सरिता जी : आदमी-आदमी के बीच इतनी नीच-ऊंच की बात मुझे अच्छी नहीं लगी।
डॉ. दिनेश :- कि शिवमूर्ति जी ने इंकार करवा दिया था?
सरिता जी :- इनसे तो मैंने उस समय कुछ कहा ही नहीं। उसी बार बेटा हो गया। जब बेटा हो गया, उसके पांच-छह महीने बाद बताया कि ऐसा-ऐसा हुआ।
डॉ. दिनेश :- तो कैसे हुआ बेटा? आपने किसी देवी-देवता की मन्नत मानी थी?
सरिता जी :- मैं किसी देवी-देवता को नहीं मानती।
डॉ. दिनेश :- पूजा-पाठ, ब्रत-उपवास?
सरिता जी :- कोई पुजा-पाठ, ब्रत-उपवास आज तक मैंने नहीं किया। न किसी मंदिर में हाथ जोड़ने गई।
डॉ. दिनेश :- अरे आप तो पक्की कम्युनिस्ट हैं?
सरिता जी :- (हंसती हैं) हमारी सास भी ऐसी ही थीं। कभी ब्रत-उपवास, पुजा-पाठ नहीं किया। कहीं गंगा-जमुना स्नान करने नहीं गईं।
डॉ. दिनेश :- हद है। लेकिन आपके ससुर तो साधू थे?
सरिता जी :- हां, वे साधू थे। शाकाहारी थे। दिन-भर पूजा-पाठ करते थे लेकिन सास मांस-मछली खाती थीं। ए मां-बाप दोनों के लिए अलग-अलग इंतजाम करते थे। सास के लिए मछली-गोस और ससुर के लिए गांजा-भांग।
डॉ. दिनेश :- अच्छा, एक खास बात पूछना चाहते हैं। शिवमूर्ति जी ने कई जगह अपनी एक महिला मित्र शिवकुमारी का जिक्र किया है। जानती हैं?
सरिता जी :- हां-हां, वे तो हमारे ही गांव की हैं।
डॉ. दिनेश :-तो किस तरह की दोस्ती है इन लोगों की? सुनते हैं कि वे देह का पेशा करने वाली बिरादरी की हैं। कब से इनकी दोस्ती है?
सरिता जी :- बचपन से है। मेरे आने के पहले से।
डॉ. दिनेश :- आप आईं , आपको पता लगा तो कैसा लगा आपको?
सरिता जी :- इन लोगों की दोस्ती ऐसी नहीं है जिसमें कुछ बुरा लगे। मैं आई  तो शिवकुमारी मेरी भी दोस्त हो गईं। इनकी तो पक्की दोस्त हैं। बहुत मदद किया है उन्होंने इनकी बचपन से। इनसे तीन-चार साल बड़ी हैं। जैसा कि उनके खानदान के बारे जानकर सब सोचते होंगे, इनकी दोस्ती का आधार देह नहीं है। यह बात मेरी समझ में भी धीरे-धीरे आई। गांव का जो मेरा कच्चा घर है, उसके बनने के दौरान शिवकुमारी ने भी महीने-भर मिट्‌टी ढोया है। दोस्ती में, बिना कोई  पैसा-मजदूरी लिए। पैसे की उन्हें जरूरत भी नहीं थी। नाच-गाकर बहुत कमाती थीं। लेकिन सब कुछ छोड़कर जेठ की धूप में मिट्‌टी ढोने जैसा कठिन काम करने आईं तो जरूर बहुत पक्की दोस्ती रही होगी दोनों के बीच।
डॉ. दिनेश :- तो कैसे हुई  इतनी पक्की दोस्ती?
सरिता जी :- आप तो गांव में हमारे घर गए हैं। शिवकुमारी के घर भी गए हैं। दोनों घरों के बीच काफी दूरी है लेकिन बचपन मे पिता के साधू हो जाने के चलते इनको कोई टोकने वाला नहीं था कि यहां जाओ, वहां न जाओ। न शिवकुमारी के घर में कोई रोकने वाला था कि कोई क्यों मिलने आया है। ए थोड़ा घूमते-घामने, संबंध बनाने में आगे हैं ही। तो आने-जाने लगे होंगे। धीरे-धीरे दोस्ती हो गई होगी। मेरी बड़ी बेटी का मुंडन कराने गंगा जी वही लेकर गईं थीं मुझे। जब ए रेल की नौकरी में गए तो उन्हीं का कंबल-अटैची लेकर गए।
डॉ. दिनेश :- तो अभी गांव में रहती हैं शिवकुमारी?
सरिता जी :- नहीं। इनके गांव छोड़ने के बाद वे भी बाहर चली गईं। पहले कलकत्ता रहती थीं। आजकल बंबई में रहती हैं। कभी-कभार आती हैं।
डॉ. दिनेश :- आपसे आखिरी बार भेंट कब हुई उनसे?
सरिता जी :- तीन महीने पहले गांव गए तो पता चला आई हैं मिलने के लिए गए तो पता चला कि आई थीं लेकिन हफ्ते-भर पहले फिर बंबई चली गईं। तो मिलना नहीं हो सका। इसके पहले जब बहुत बीमार होने के बाद ए ठीक हुए और गांव गए तो वे मिलने आईं  थी। छह साल पहले।
डॉ. दिनेश :- इस तरह की दोस्ती या प्रेम को आप कैसा मानती हैं?
सरिता जी :- अच्छा मानती हूं। मेरे दिमाग में कभी नहीं आया कि एक नाचने-गाने वाली के साथ दोस्ती क्यों है। औरत-औरत बराबर होती है। जो जिस देश-समाज-जाति मे पैदा हो गई उसी के अनुसार उसे रहना है। बहुत लोग इस नजर से देखते हैं कि यह तो नाचने वाली हैं। पेशा करने वाली हैं। मैं नहीं देखती हूं। न ए देखते हैं। असल में आदमी और औरत के बीच की दोस्ती को लोग ऐसी ही नजर से देखते हैं, देह की लालच के नजर से। इसलिए ऐसी दोस्ती पर लोगों की नजर लग जाती है। ज्यादा चल नहीं पाती है। मुझे लगता है कि आगे के जमाने में ऐसी दोस्तियां ज्यादा होंगी। इनकी तो इस तरह की और भी दोस्तियां हैं। गांव जाते हैं तो मिलने जाते हैं। ए नहीं जा पाते तो वे लोग आ जाती हैं। एक यादव परिवार की भाभी हैं। इस समय 75 साल की होंगी। ए 40-42 साल से कहते हैं कि मेरी नजर में दुनिया की सबसे सुंदर महिला यही हैं। उनसे भी कहते हैं, उनके पति और उनके बेटों से भी कहते हैं। उनके बड़े बेटे को इन्होंने ट्‌यूशन पढ़ाया था। तब से कहते हैं। अभी पंचायत चुनाव के समय (अक्टूबर 2010) वे लाठी टेकते हुए मिलने के लिए मेरे घर आईं थीं। घंटों हम लोग बात करते रहे। इनको बहुत कुछ याद करती हैं। हमेशा पूछती हैं। और भी हैं। एक तो अब साधू हो गई हैं। गांव के पश्चिमी सिरे पर उनका घर है। आती-जाती हाल-चाल लेती रहती हैं।
    एक और थीं। मनतोरा नाम था उनका। उनसे भी इनकी बहुत पटती थी। बहुत बोल्ड महिला थीं। किसी से डरती नहीं थीं। घर-बार अच्छी तरह संभालती थीं। ए उनकी हर जगह तारीफ करते थे। बीस-बाइस साल पहले सांप काटने से उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन  ए अभी तक अक्सर उनको याद करते हैं। और भी कई हैं दूसरे गांव में। पहले शादी-ब्याह में जाते थे तो वहां भी इनके दोस्त-दोस्तिन बन जाते थे। ए हैं ही ऐसे। सबसे धाय के मिलते हैं तो उसी में नजदीकी हो जाती है।
डॉ. दिनेश :- शिवमूर्ति जी ने कहीं लिखा है कि इनकी दोस्ती किसी डाकू से भी थी। यह तो अच्छी बात नहीं है।
सरिता जी :- हां, उनका नाम नरेश था। लेकिन वे मजबूरी में डाकू बने थे। अपनी बहन की बेइज्जती का बदला लेने। इस तरह के लोग जो अन्याय के खिलाफ लड़ते  हैं, इनको बहुत अच्छे लगते हैं। उस समय गांव में हमारी दुश्मनी भी बहुत थी। नरेश के कारण बहुत हिम्मत रहती थी।
डॉ. दिनेश :- आप मिली हैं उससे?
सरिता जी :- हां, एक-दो बार। फिर इमरजेंसी में उनका इंकाउंटर हो गया।
डॉ. दिनेश :- आप शाकाहारी हैं कि मांसाहारी?
सरिता जी :- शाकाहारी थी। दस-पंद्रह साल पहले तंदुरूस्ती के लिए अंडे खाने लगी। बच्चों ने दबाव बनाया तो इधर दो-तीन साल से मछली खाने लगी। इसके आगे नहीं। बच्चे अब और जोर दे रहे हैं कि चिकन भी खाओ लेकिन हम चिकन कभी नहीं खाएंगे। इसी को चाहे शाकाहारी, कहिए चाहे मांसाहारी।
डॉ. दिनेश :- आपके बच्चे, बेटे-बेटियां शिवमूर्ति जी के लेखन को किस रूप में लेते हैं?
सरिता जी :- सभी चाहते हैं कि पापा लिखें। सबको अच्छा लगता है लेकिन लिखने के लिए मैं उन पर ज्यादा जोर देती हूं तो बच्चे मेरा विरोध करते हैं। कहते हैं पापा 60 साल के हो चुके हैं, उन्हें अपने आप तय करने दीजिए कि कितना कब लिखना है, कितना कब घूमना है।
डॉ. दिनेश :- फिर घूमने की कोई योजना है?
सरिता जी :- ए तो नहीं जा रहे हैं। मैं बच्चों के साथ दस दिन के लिए जनवरी मे गोवा जा रही हूं।
डॉ. दिनेश :- ए क्यों नहीं जा रहे है?
सरिता जी :- बहुत भीड़ में इन्हें मजा नहीं आता। हमारा बड़ा परिवार है। कई बेटियां। उनके बच्चे। बीसों लोग। इसलिए ए नहीं जा रहे हैं।
डॉ. दिनेश :- अकेले में कहीं जाने की योजना है क्या?
सरिता जी :- अकेले नहीं। दोनों लोग जाएंगे यूरोप, मई में। उसके पहले शायद सिंगापुर , बैंकाक बगैरह।
डॉ. दिनेश :- शिवमूर्ति जी को अपने बहुत कुछ दिया। इन्होने आपको बहुत कुछ दिया। अब आप इनसे क्या चाहती हैं?
सरिता जी :- हमें सब कुछ मिला। अब सचमुच कुछ नहीं चाहिए। बस यही चाहती हूं कि ए अपनी सारी ताकत सारा समय लिखने में लगाएं। कोई यादगार उपन्यास लिखें।
डॉ. दिनेश :- जैसे?
सरिता जी :- (सोच में पड़ जाती हैं। थोड़ी देर बाद) अब जैसे क्या बताएं ।हम तो ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं।
डॉ. दिनेश :- जो पढ़ा है, उसी में से बताएं कि किस तरह की कहानी लिखें तो आपको अच्छा लगेगा?
सरिता जी :- गरीब दुखिया की, किसानी की, गांव-देश की कहानी लिखें तो अच्छा लगेगा। जैसे ढोढाय चरित मानस।
डॉ. दिनेश :-कोई  कहानी जो पढ़ी हो और याद रह गई हो?
सरिता जी :- हां, एक कहानी थी-सतमी के बच्चे। आजमगढ़ के पंडित जी थे। कचेहरी के पास रहते थे। बुढ़ापे में अपना नाम-पता भूल गए थे। जिनकी एक पत्नी रूसी थीं, एक दार्जिलिंग में थीं। उनका नाम...... देखिए......
डॉ. दिनेश :- वो, राहुल सांस्कृत्यायन?
सरिता जी :- हां-हां, उन्हीं की कहानी थी। रूला देती है वह कहानी। कितनी भयानक गरीबी का जमाना था। एक और कहानी शायद प्रेमचंद की है- ठाकुर का कुंआ। कितनी छुआछूत थी। कितना अत्याचार किया है हिंदू धरम में लोगों ने अपने ही भाई-बंदों  पर। इसीलिए मैं धरम-करम नहीं मानती।
डॉ. दिनेश :- आपके घर में भीड़भाड़ कुछ ज्यादा ही है। हम तो कहेंगे कि अगर चाहती हैं कि शिवमूर्ति जी सिर्फ लिखें तो इनको कहीं एकांत में भेज दीजिए, जहां डिस्टर्व न हो।
सरिता जी :- एकदम एकांत में रहेंगे तो रोते रहेंगे। लिखेंगे कम, रोएंगे ज्यादा। इसलिए एकदम अकेले नहीं छोड़ सकते। साठ पार करने के बावजूद मन से अभी बच्चे ही हैं। (आवाज को धीमी करके) मुझे तो डर लगता है कि ए भी अपने दादा की तरह साधू न हो जाएं। (मुस्कराती हैं)।