Sunday, 7 July 2013

जर्मन लेखक फ्रैंज काफ्का



फ्रैंज काफ्का बीसवीं सदी के एक सांस्कृतिक रूप से प्रभावशाली, लघु कहानियां और उपन्यास के जर्मन लेखक थे। उनकी रचनाऍं आधुनिक समाज के व्यग्र अलगाव को चित्रित करतीं हैं। समकालीन आलोचकों और शिक्षाविदों, व्लादिमिर नबोकोव सहित, का मानना है कि काफ्का 20 वीं सदी के सर्वश्रेष्ठ लेखकों में से एक है। "Kafkaesque" अंग्रेजी भाषा का हिस्सा बन गया है जिसका उपयोग 'बहकानेवाला','खतरनाक जटिलता' आदि के संदर्भ में किया जाता है। नई यॉर्कर के लिए एक लेख में, जॉन अपडाइक ने समझाया: "जब काफ्का का जन्म हुआ तब उस सदी मे आधुनिकता के विचारों का पनपना आरम्भ हुआ - जैसे कि सदियों के बीच में एक नइ आत्म-चेतना, नएपन की चेतना का जन्म हुआ हो।
अपनी मृत्यु के इतने साल बाद भी, काफ्का आधुनिक विचारधारा के एक पहलू के प्रतीक है - चिंता और शर्म की उस अनुभूति के जिसे स्थित नहीं किया जा सकता है इसलिए शांत नहीं किया जा सकता है; चीजों के भीतर एक अनंत कठिनाई की भावना के, जो हर कदम बाधा दालती है; उपयोगिता से परे तीव्र संवेदनशीलता के, जैसे कि सामाजिक उपयोग और धार्मिक विश्वास की अपनी पुरानी त्वचा के छिन जाने पर उस शरीर के समान जिसे हर स्पर्श से पीड़ा हो। काफ्का के इस अजीब और उच्च मूल मामले को देखें तो उनका यह भयानक गुण विशाल कोमलता , विचित्र व अच्छा हास्य, कुछ गंभीर और आश्वस्त औपचारिकता से भरपूर था। यह संयोजन उन्हे एक कलाकार बनाता है, पर उन्होने अपनी कला की कीमत के रूप में अधिक से अधिक भीतर प्रतिरोध और अधिक गंभीर संशय के खिलाफ संघर्ष किया है। काफ्का की बहु-प्रचलित रचनाओं में से कुछ हैं - (कायापलट), जांच, एक भूख-कलाकार, (महल) आदि।
काफ्का का जन्म प्राग,बोहेमिया में, एक मध्यम वर्ग के, जर्मन भाषी यहूदी परिवार में हुआ। काफ्का के पिता, हरमन्न काफ्का यहूदी बस्ती में एक सूखी माल की दुकान चलाते थे और काफ्का की मां,जूली उनका (हरमन्न) हाथ बटाती थी। उनके पिता को विशाल, स्वार्थी, दबंग व्यापारी कहा जाता था। काफ्का खुद कहा था कि उनके पिता "शक्ति ,स्वास्थ्य, भूख, आवाज की ऊंचाई, वाग्मिता, आत्म - संतुष्टि, सांसारिक प्रभुत्व, धीरज, मन की उपस्थिति और मानव प्रकृति के ज्ञान में एक सच्चे काफ्का थे"।

एक पत्र
काफ्का को उम्र भर हल्का-हल्का बुखार रहा. उन्होंने समग्र साहित्य उसी बुखार की तपिश में लिखा. और यह बुखार मिलेना के प्यार का बुखार था. प्रिये,
आज सुबह के पत्र में मैंने जितना कुछ कहा, उससे अधिक यदि इस पत्र में नहीं कहा तो मैं झूठा ही कहलाऊंगा. कहना भी तुमसे, जिससे मैं इतनी आजादी से कुछ भी कह सुन सकता हूं. कभी कुछ भी सेाचना नहीं पड़ता कि तुम्हें कैसा लगेगा. कोई भय नहीं. अभिव्यक्ति का ऐसा सुख भला और कहां है तुम्हारे सिवा मेरी मिलेना. किसी ने भी मुझे उस तरह नहीं समझा जिस तरह तुमने. न ही किसी ने जानते-बूझते और इतने मन से कभी, कहीं मेरा पक्ष लिया, जितना कि तुमने.तुम्हारे सबसे सुंदर पत्र वे हैं जिनमें तुम मेरे भय से सहमत हो और साथ ही यह समझाने का प्रयास करती हो कि मेरे लिए भय का कोई कारण नहीं है(मेरे लिए यह बहुत कुछ है क्योंकि कुल मिलाकर तुम्हारे पत्र और उनकी प्रत्येक पंक्ति मेरे जीवन का सबसे सुंदर हासिल है.) शायद तुम्हें कभी-कभी लगता हो जैसे मैं अपने भय का पोषण कर रहा हूं पर तुम भी सहमत होगी कि यह भय मुझमें बहुत गहरा रम चुका है और शायद यही मेरा सर्वोत्तम अंश है. इसलिए शायद यही मेरा वह एकमात्र रूप है जिसे तुम प्यार करती हो क्योंकि मुझमें प्यार के काबिल और क्या मिलेगा? लेकिन यह भय निश्चित ही प्यार के काबिल है. सच है इंसान को किसी को प्यार करना है तो उसकी कमजोरियों को भी खूब प्यार करना चाहिए. तुम यह बात भली भांति जानती हो. इसीलिए मैं तुम्हारी हर बात का कायल हूं. तुम्हारा होना मेरी जिंदगी में क्या मायने रखता है यह बता पाना मेरे लिए संभव नहीं है.
तुम्हारा काफ्का (काफ्का यहूदी थे और मिलेना ईसाई. धर्म के पहरेदारों ने इन दोनों को कभी एक न होने दिया. लेकिन मन से वे हमेशा एक-दूसरे के साथ ही रहे. मिलेना ने काफ्का के लिए काफी दु:ख सहे.)

काफ्का की अमर कहानी: भाई का कत्ल
बीसवीं शताब्दी को जिन चंद लेखकों ने उसके स्याह-सफेद रंगतों में दर्ज किया है उनमें जर्मन भाषा के महान कथाकार फ्रांज काफ्का का भी नाम आता है। काफ्का की कहानियों और उपन्यासों के चरित्र और घटनाओं को अक्सर एक फिनॉमिना के तौर पर भी देखा जाता है, क्योंकि उसमें मानव स्वभाव की महिमा और मैल एक साथ जमा है। साक्ष्य के अनुसार हत्या इस प्रकार से की गई थी:
हत्यारा, श्मार, एक उजली चांदनी रात में करीब 9 बजे एक कोने में घात लगाए खड़ा था, उसी जगह उसका शिकार वेज, अपने दफ्तर वाली गली से घर वाली गली की ओर मुड़ता था। रात की हवा ठंडी कंपकंपाती थी, तब भी श्मार महीन नीली कमीज ही पहने हुए था, जैकिट के बटन भी खुले थे। उसे जरा भी सर्दी नहीं लग रही थी और वह पूरे समय इधर-उधर टहल रहा था। अपना हथियार-आधा छुरा आधा घरेलू चाकू-उसने मजबूती से अपनी हथेली में कस रखा था और उसकी धार नंगी थी। उसने चांद की रोशनी में चाकू को देखा, ब्लेड चमचमा रही थी, श्मार को तसल्ली नहीं हुई, उसने फुटपाथ के पत्थर पर उसे रगड़ा और चिनगारियां उछल पड़ी, अरे कहीं खराब न हो गया हो, शायद और इसीलिए उसने किसी कट फट को सुधारने के लिए उसे अपने जूते के सोल के ऊपर वाइलिन -बो की तरह फिराया, वह एक पैर पर आगे झुक गया और ध्यान से दोनों आवाजों को: अपने बूट पर सान चढ़ते चाकू की और अगल से आती अभागी गली में से उठती किसी खटखटाहट की आवाजों को सुनता रहा।
घरेलू कामकाजी कोई नागरिक, पलास, समीप ही के घर की खिड़की से यह सब देख रहा था, मगर वह क्यों चुप रहा? जरा मानवीय स्वभाव के रहस्य को तो देखो। अपने स्थूल बदन पर ड्रेसिंग गाउन के फंदे कसे हुए और कॉलरों को ऊंचा चढ़ाए वह बस सिर डुलाते हुए नीचे देखता खड़ा रहा।
और पांच घर आगे, गली की उलटी तरफ, अपने नाइट गाउन से ऊपर फर कोट पहने मिसेज वेज अपने पति की बाट जोहती बार-बार झांक रही थी, जो आज रात घर लौटने में अप्रत्याशित देरी कर रहा था।
आखिर वेज के दफ्तर की घंटी बजी और बहुत जोर से बजी, सारे शहर में गूंजती हुई और आकाश फाड़ती हुई, और रात पाली का मेहनतकश मजदूर, वेज इमारत से बाहर निकल कर गली में ओझल हो गया, सिर्फ घंटी की ध्वनि ही उसके आगमन की सूचक थी। एकाएक फुटपाथ पर उसके पदचापों की हल्की हल्की थपथपाहट उभरी।
पलास और ज्यादा आगे झुक गया। वह आंखें गड़ा कर सब कुछ देखना चाहता था। मिसेज वेज ने घंटी से आश्वस्त होकर, फटाफट अपनी खिड़की बंद कर दी, लेकिन श्मार दुबका ही रहा और चूंकि उसके शरीर का कोई अन्य भाग खुला नहीं था उसने अपने चेहरे और हाथों को भी फुटपाथ पर जोरों से दबा दिया, जहां सब कुछ ठंड से जमा हुआ था, मगर श्मार लाल दमक रहा था।
ठीक उसी कोने में जहां गलियां मिलती थीं वेज एक पल सुस्ताया, सिर्फ उसकी हाथ छड़ी घूम कर दूसरी गली में टिकी। एकाएक एक झक, मानो रात के आकाश ने उसे पुकारा, अपना नील, अपना सुवर्ण दिखाकर। अनजाने ही वह ऊपर उसकी ओर देखने लगा, अनजाने ही उसने अपना हैट उतारा और बालों पर हाथ फेरा, वहां ऊपर जो कुछ था वह कुल मिलाकर ऐसे किसी पैटर्न में ढलता नहीं था जो उसे आसन्न संकट का पूर्वाभास दे दे, सब कुछ उनके अर्थहीन, अभेद्य स्थानों में अटल था। अपने आप में यह अत्यंत चैतन्यशील काम था कि वेज चलता ही चला जाए, मगर वह तो श्मार के चाकू की ओर ही चला।
'' वेज'' श्मार चीखा। वह अपने पंजों के बल खड़ा था, उसका हाथ आगे खिंचा हुआ था, चाकू तीखी दिशा में नीचे झुका हुआ था, ''वेज'' तू अब जूलिआ से कभी नहीं मिल पाएगा।'' और सीधा गले में और उलटा गले में और तीसरी बार पेट में श्मार का चाकू जा घुसा। पानी के फव्वारे की जैसे टोंटी खोल दी गई हो वैसी ही आवाज वेज के बदन में से निकली।
'' खत्म'', श्मार बोला और उसने खून से लबालब सने चाकू को नजदीकी घर के सामने की मिट्टी में गाड़ दिया। हत्या का परम आनंद, एक राहत अनुपम आह्लाद, दूसरे का खून गिराने में। वेज पुराना निशाचर साथी, गहरा दोस्त, मदिरालय का हमप्याला, तू प्यारे इस गली की अंधेरी धरती के नीचे गल-गल के रिस रहा है। तू सिर्फ खून का एक गुब्बारा भर क्यों नहीं है, ताकि मैं भड़ाक-से तुझे पीटता और तू शून्य में लुप्त हो जाता पर जैसा हम चाहते हैं वैसा ही तो नहीं हो जाता, सारे सपने जो खिलते हैं सभी में तो फूल नहीं लगते, तेरा लौंदा अब यहीं पड़ा है, हर ठोकर से बेअसर, लेकिन इन गूंगे सवालों को उठाने से क्या फायदा?
पलास अपने बदन में भर गए भय और आतंक की उथल पुथल से घुटता हुआ अपने घर के दो पट वाले दरवाजे के भीतर खड़ा ही था कि एकाएक वह फटाक से खुल पड़ा। ''श्मार ! श्मार ! मैंने सब कुछ देखा, सब कुछ।'' पलास और श्मार ने एक दूसरे को गौर से भांपा जांचा। जांच से पलास को संतोष हुआ, श्मार किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाया।
मिसेज वेज अपने दोनों ओर लोगों की भीड़ के बीच दौड़ती-दौड़ती-सी आई। उसका चेहरा सदमे से एकदम मुरझा गया था। उसका फर कोट खुला था और लटक गया था। वह वेज के ऊपर जा गिरी, नाइट गाउन में लिपटा वह बदन वेज का ही तो था युगल के ऊपर फैला हुआ फर कोट जैसे किसी कब्र की दूब हो जहां लोग आए थे।
श्मार बड़ी ताकत लगाकर अपनी मिचलाहट से उभरने का कशमकश कर रहा था। उसने पुलिसमैन के कंधे पर अपना सिर टिका दिया जो धीरे धीरे कदम बढ़ाता हुआ उसे आगे खींचता ले गया।

बारिश में बिल्‍ली - अर्नेस्‍ट हेमिंग्‍वे



रूपांतर - ब्रजेश कृष्ण

अमरीका कथाकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे (1899-1961) अंतरराष्ट्रीय महत्त्व के कथाकार थे। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में एक सैनिक के रूप में और द्वितीय विश्वयुद्ध में एक युद्ध संवाददाता के रूप में भी कार्य किया। 1954 में उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला। सन् 1919। वह इटली में रेल से सफर कर रहा था। पार्टी हेडक्वार्टर से वह मोमजामे का एक चौकोर टुकड़ा लाया था, जिस पर पक्के रंग से लिखा हुआ था कि बुदापेस्त में इस साथी ने ‘गोरों’ के बहुत अत्याचार सहे हैं। साथियों से अपील है कि वे हर तरह से इसकी मदद करें। टिकट की जगह वह इसे ही इस्तेमाल कर रहा था। वह युवक बहुत शर्मीला और चुप्पा था। टिकट बाबू उतरते, तो अगले को बता जाते। उसके पास पैसा नहीं था। वे उसे चोरी-छिपे खाना भी खिला देते। वह इटली देखकर बहुत प्रसन्न था। बड़ा सुन्दर देश है, वह कहता। लोग बड़े भले हैं। वह कई शहर और बहुत-से चित्रों को देख चुका था। गियोट्टो, मसाचियो और पियरो डेला फ्रांसेस्का की प्रतिलिपियाँ भी उसने खरीदी थीं, जिन्हें वह ‘अवन्ती’ के अंक में लपेटे घूम रहा था। मांतेगना उसे पसन्द नहीं आया।

बारिश में बिल्‍ली

उस इतालवी होटल में केवल दो अमेरिकी ठहरे हुए थे।  कमरे में आते-जाते समय सीढ़ियों पर जो भी मिलता था, उनमें से वे किसी को नहीं जानते थे। उनका कमरा दूसरी मंज़िल पर था और समुद्र की ओर खुलता था। यहाँ से एक बगीचा और युद्ध का एक स्‍मारक भी दिखाई पड़ता था। बगीचे में बड़े-बड़े ताड़ के वृक्ष और हरी बेंचें थीं। अच्‍छे मौसम में वहाँ हमेशा एक कलाकार अपने ईज़ल के साथ आता था। कलाकार ताड़ के उगने की शैली और बगीचे एवं समुद्र के समक्ष होटलों के तीव्र रंगों को पसंद करते थे। दूर-दूर से इतालवी नागरिक युद्ध के उस स्‍मारक को देखने आते थे। यह कांसे का बना हुआ था और बारिश में चमकता था। इस समय बारिश हो रही थी। ताड़ के वृक्षों से बारिश की बूँदें झर रहीं थीं। बजरी के बने हुए रास्‍ते पर गड्‌ढों में पानी भर गया था। बारिश में समुद्र भी उफान पर था। वह तट की रेखा को तोड़ते हुए आगे बढ़ता, पीछे जाता और तट-रेखा को तोड़ने फिर आगे आता। युद्ध-स्‍मारक से होकर चौराहे की सभी कारें जा चुकीं थीं। चौराहे के दूसरी तरफ कैफ़े के दरवाज़े पर खड़ा हुआ एक वेटर सूने चौराहे को देख रहा था।

अमेरिकी पत्‍नी उठी और खिड़की से बाहर झाँकने लगी। उनकी खिड़की के ठीक नीचे एक बिल्‍ली बारिश में टपकती हुई हरी टेबिल के नीचे दुबकी हुई थी। बिल्‍ली खुद को लगातार सिकोड़ने की कोशिश कर रही थी ताकि वह टपकती हुई बूँदों से खुद को बचा सके।

“मैं नीचे जा रही हूँ और वह बिल्‍ली लेकर आऊँगी,” अमेरिकी पत्‍नी ने कहा।

“यह मैं कर देता हूँ,” उसके पति ने बिस्‍तर में से प्रस्‍ताव रखा।

“नहीं, मैं ले आऊँगी। बेचारी बिल्‍ली बाहर बारिश में टेबिल के नीचे खुद को बचाने की कोशिश कर रही है।”

दो तकियों पर पैरों को टिका कर लेटे हुए पति ने अपनी किताब पढ़ना ज़ारी रखा।

“तुम भीगना नहीं,” उसने कहा।

पत्‍नी सीढ़ियों से नीचे उतरी और जब वह ऑफ़िस के सामने से गुज़री, तब होटल-मालिक उठ कर खड़ा हो गया और उसने उसे झुक कर नमस्‍कार किया। उसकी टेबिल ऑफ़िस के एक किनारे पर थी। वह एक वृद्ध और लम्‍बा व्‍यक्‍ति था।

“इल पिओवे, ;बारिश हो रही हैद्ध” पत्‍नी ने इतालवी में कहा। उसे होटल मालिक पसंद था।

“सि, सि, सिग्‍नोरा, ब्रुत्तो तेम्‍पो। (हाँ, हाँ मैडम, बहुत खराब मौसम है।)”

वह कमरे की मिद्धम रोशनी में काफी दूर अपनी टेबल के पीछे खड़ा था। पत्‍नी को अच्‍छा लगा। उसका किसी भी शिकायत को पूरी गम्‍भीरता से लेना वह पसंद करती थी। वह उसकी गरिमा को पसंद करती थी। वह उसकी सेवा प्रदान करने की आतुरता को पसंद करती थी। उसके अपने होटल-मालिक होने के एहसास को भी वह पसंद करती थी। उसका भारी, वृद्ध चेहरा और लम्‍बे हाथ उसे अच्‍छे लगते थे।

उसे पसंद करते हुए उसने दरवाज़ा खोला और बाहर देखने लगी। बारिश पहले से तेज़ हो गई थी। एक आदमी रबड़ का एक लबादा ओढ़े कैफ़े की ओर बढ़ते हुए सुनसान चौराहे को पार कर रहा था। बिल्‍ली दाहिनी ओर कहीं पर होगी। शायद वह दीवार के बाहर निकले छज्‍जे के साथ-साथ कहीं खिसक गई हो। जैसे ही वह दरवाज़े पर खड़ी हुई, उसके पीछे एक छाता खुला। यह नौकरानी थी, जो उनके कमरे की देखभाल करती थी।

“आपको भीगना नहीं चाहिए,” इतालवी में कहते हुए वह मुस्‍कराई। निश्‍चय ही, होटल मालिक ने उसे भेजा था। नौकरानी ने छाता अपने हाथ में पकड़े हुए उसके सिर पर कर लिया। वह नौकरानी के साथ छाते में बजरी की सड़क पर अपनी खिड़की के नीचे तक गई। टेबल वहाँ थी। बारिश में धुली हुई, गहरी हरी। लेकिन बिल्‍ली जा चुकी थी। वह सहसा निराश हो गई। नौकरानी ने उसकी ओर देखा।

“ह पेर्दूतो क़्‍वाल्‍क्‍यू कोसा, सिग्‍नोरा? ;क्‍या कुछ खो गया है, मैडम?द्ध”

“यहाँ एक बिल्‍ली थी,” अमेरिकी लड़की ने कहा।

“बिल्‍ली?”

“सि, इल गत्तो। (हाँ, एक बिल्‍ली)”

“बिल्‍ली?” नौकरानी हँस पड़ी। “बारिश में एक बिल्‍ली?”

“हाँ,” उसने कहा, “उस टेबिल के नीचे। तब वह मुझे बहुत अच्‍छी लगी थी। मैं उसे बहुत चाहती थी। मैं एक किटी चाहती हूँ।”

जब वह अँग्रेज़ी में बोलती थी तो नौकरानी का चेहरा कुछ तन जाता था।

“कम, सिग्‍नोरा, (आइए मैडम)” उसने इतालवी में कहा। “हमें अब अन्‍दर वापस चलना चाहिए। आप भीग जाएँगी।”

“मैं भी यही सोचती हूँ,” अमेरिकी लड़की ने कहा।

वे बजरी की सड़क पर चलते हुए वापस मुड़े और दरवाज़े में घुसे। नौकरानी छाता बन्‍द करने के लिए बाहर ही रुक गई। जैसे ही अमेरिकी लड़की ऑफ़िस के सामने से गुज़री, होटल मालिक ने अपनी टेबल से नमस्‍कार किया। लड़की ने अपने भीतर कुछ संक्षिप्‍त और मधुर, मगर कसा हुआ-सा कुछ महसूस किया। होटल मालिक ने उस क्षण उसे बहुत महत्‍वपूर्ण महसूस करा दिया था। उसे स्‍वयं के अति महत्‍वपूर्ण होने की सुखद अनुभूति हुई। वह सीढ़ियों से ऊपर गई और उसने अपने कमरे का दरवाज़ा खोला। जॉर्ज़ अपने बिस्‍तर पर था और पढ़ रहा था।

“क्‍या तुम्‍हें बिल्‍ली मिल गई?” उसने किताब नीचे रखते हुए कहा।

“वह जा चुकी थी।”

“अचरज है, वह कहाँ चली गई,” उसने पढ़ना रोकते हुए कहा।

वह बिस्‍तर पर बैठ गई।

“मैं उसे बहुत चाहती थी,” उसने कहा। “मैं नहीं जानती कि मैं उसे इतना क्‍यों चाहने लगी थी। मैं उस बेचारी किटी को वाक़ई चाहती थी। बाहर बारिश में बिल्‍ली होना कोई हँसी-खेल नहीं है। बेचारी।”

जॉर्ज़ ने दुबारा पढ़ना शुरू कर दिया था।

वह उठी और ड्रेसिंग टेबिल के आइने के सामने बैठ कर हाथ में एक छोटा आइना लेकर खुद को निहारने लगी। उसने अपने शरीर की संरचना को पहले एक ओर से फिर दूसरी ओर से गौर से देखा। इसके बाद उसने अपने सिर का पृष्‍ठ भाग और ग्रीवा को ध्‍यान से देखा।

“अगर मैं अपने बाल बढ़ा लूँ तो क्‍या अच्‍छा नहीं रहेगा? तुम क्‍या सोचते हो?” उसने फिर से खुद की ओर निहारते हुए जॉर्ज़ से पूछा।

जॉर्ज़ ने अपनी नज़रें उठाईं और उसकी गर्दन को देखा। उसके बाल लड़कों जैसे छोटे और बँधे हुए थे।

“ये जैसे हैं, मुझे वैसे ही अच्‍छे लगते हैं।”

“मैं तो इनसे थक गई हूँ,” उसने कहा। “मैं लड़कों की तरह दिखते हुए बोर हो गई हूँ।”

जॉर्ज़ ने बिस्‍तर पर करवट बदली। जबसे पत्‍नी ने बोलना शुरू किया था, वह उसी की ओर देख रहा था।

“तुम बहुत अच्‍छी दिखती हो,” उसने कहा।

उसने हाथ का शीशा ड्रेसिंग टेबिल पर रखा और खिड़की पर जाकर बाहर देखने लगी। अँधेरा घिरने लगा था।

“मैं अपने बाल पीछे की ओर बाँध कर एक बड़ा-सा जूड़ा बनाना चाहती हूँ जिसे मैं महसूस कर सकूँ,” उसने कहा। “मैं एक बिल्‍ली रखना चाहती हूँ जो मेरी गोद में बैठे और जब मैं उसे प्‍यार से सहलाऊ“” तो धीरे-धीरे म्‍याऊँ-म्‍याऊँ करे।”

“अच्‍छा?” जॉर्ज़ ने बिस्‍तर से कहा।
“और मैं टेबिल पर अपने चाँदी के बर्तनों में खाना चाहती हूँ और मैं मोमबत्तियाँ चाहती हूँ। और मैं एक झरना होना चाहती हूँ और मैं आइने के सामने बैठ कर अपने खुले बालों में कंघी करना चाहती हूँ और मैं एक बिल्‍ली पालना चाहती हूँ और मैं कुछ नए कपड़े चाहती हूँ।”
“ओह, चुप रहो और कुछ पढ़ने के लिए उठा लो,” जॉर्ज़ ने कहा और फिर से पढ़ने लगा।
उसकी पत्‍नी खिड़की के बाहर देख रही थी। इस समय अँधेरा घना हो गया था। और ताड़ के वृक्षों पर अब भी बारिश हो रही थी।
“जो भी हो, मुझे एक बिल्‍ली चाहिए,” उसने कहा, “मैं एक बिल्‍ली चाहती हूँ। मुझे अभी एक बिल्‍ली चाहिए। अगर मैं अपने बाल लम्‍बे नहीं कर सकती या कोई आनन्‍द नहीं पा सकती, तो एक बिल्‍ली तो पा सकती हूँ।”
जॉर्ज़ कुछ नहीं सुन रहा था। वह अपनी किताब पढ़ रहा था। उसकी पत्‍नी ने खिड़की के बाहर देखा। चौराहे पर बत्तियाँ जल गईं थीं।
किसी ने दरवाज़े पर दस्‍तक दी।
“अवान्‍ती, (अन्‍दर आइए)” जॉर्ज़ ने कहा। उसने किताब से नज़रें हटा कर ऊपर देखा।
दरवाज़े पर नौकरानी खड़ी थी। वह एक सुन्‍दर और बड़ी बिल्‍ली कस कर हाथ में पकड़े हुए थी और इस वज़ह से उसका शरीर नीचे की तरफ़ झुका हुआ था।
“माफ़ कीजिए,” उसने कहा, “होटल-मालिक ने मुझे यह बिल्‍ली मैडम को देने के लिए कहा है।”

(rachanakar.org से साभार)

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आंडाल प्रियदर्शिनी
चंद्रकांत देवताले
प्रियंकर पालीवाल
रवींद्र अग्निहोत्री
श्रीकांत दुबे
आनंद नारायण मुल्‍ला
चंद्रगुप्त विद्यालंकार
प्रियंवद
रवींद्र कालिया
श्रीकांत वर्मा
आर. चेतनक्रांति
चंद्रधर शर्मा गुलेरी
प्रियदर्शन
रवींद्रनाथ टैगोर
श्रीनारायण चतुर्वेदी
आलमशाह खान
चतुरसेन शास्त्री
प्रीति सागर
रवीन्द्र कुमार पाठक
श्रीप्रकाश मिश्र
आलोकधन्वा
चन्द्रकान्त मेहता
प्रेमचंद
रवीन्द्रनाथ त्यागी
श्रीप्रकाश शुक्ल
इंतिज़ार हुसेन
चन्द्रशेखर कंबार
प्रेमचंद सहजवाला
रशीद अमज़द
श्रीलाल शुक्ल
इंदिरा गोस्वामी
चार्ली चैप्लिन
प्रेम जनमेजय
रशीद जहाँ
संजय कृष्ण
इकबाल अभिमन्यु
चार्ल्स डार्विन
प्रेम रंजन अनिमेष
रसूल हमजातोव
संजय खाती
इक़बाल
जगदंबा प्रसाद दीक्षित
प्रेमनाथ दर
रांगेय राघव
संजीव
इन्दु मजलदान
जगदंबा प्रसाद मिश्र हितैषी
फणीश्वरनाथ रेणु
राकेश बिहारी
संजीव कुमार
इब्ने इंशा
जगन्नाथ आज़ाद
फरनांडो सेरेंटीनो
राकेश मिश्र
संतोष डे
इब्राहीम शरीफ
जगमोहन फुटेला
फ़हीम आज़मी
राकेश श्रीमाल
संतोष भदौरिया
इरफान इंजीनियर
जनार्दन प्रसाद झा
फ़िराक़ गोरखपुरी
राघव शरण शर्मा
सआदत हसन मंटो
इलाचंद्र जोशी
जफ़र-उर्रहमान अब्बासी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
राजकमल चौधरी
सच्चिदानंद राउतराय
इला कुमार
जमीला हाशमी
फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की
राजकिशोर
सच्चिदानंद सिन्हा
इला प्रसाद
जयनंदन
बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय
राज गिल
सज्जाद ज़हीर
इवान तुर्गनेव
जयन्ती दलाल
बंगमहिला
राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह
सत्यजित राय
इस्मत चुग़ताई
जयशंकर
बदीउज़्ज़माँ
राजा शिवप्रसाद सितारे-हिंद
सदल मिश्र
ईश्वरदत्त मेधार्थी, देवीदत्त आर्य सिद्धगोपाल
जयशंकर प्रसाद
बद्री नारायण
राजिन्दर सिंह बेदी
सन्त सिंह सेंखों
उदय प्रकाश
जयश्री दत्त
बर्टोल्ट ब्रेख्त
राजी सेठ
सन्तोखसिंह धीर
उदयन वाजपेयी
जयश्री राय
बलराम अग्रवाल
राजीव कुमार
समरेश बसु
उपेंद्र कुमार
जया जादवानी
बसंत त्रिपाठी
राजू शर्मा
सरदार जाफ़री
उपेंद्रनाथ अश्क
जवाहर चौधरी
बहादुर शाह ज़फ़र
राजेंद्र दानी
सरदार पूर्ण सिंह
उमाशंकर चौधरी
जवाहरलाल नेहरू
बालकृष्ण भट्ट
राजेंद्र यादव
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
उमेश चौहान
जसवीर त्यागी
बालमुकुंद गुप्त
राधाकृष्ण
सविन्दरसिंह उप्पल
उषा प्रियंवदा
ज़फ़र अली ख़ाँ
बिशन टंडन
राधावल्लभ त्रिपाठी
सहजानन्द सरस्वती
उषा राजे सक्‍सेना
जाँनिसार अख्‍तर
बूटा सिंह
रामकीर्ति शुक्ल
सादिक
ऋतुराज
जिग़मोन्द मोरित्स
बृज नारायण चकबस्त
रामकुमार
सान्त्वना निगम
ऋषभदेव शर्मा
जिज्ञासु
बेढब बनारसी
रामकुमार वर्मा
साहिर लुधियानवी
एपिक्टेटस
जी.पी. श्रीवास्तव
बोधिसत्व
रामचंद्र शुक्ल
सिद्धेश्वर सिंह
ए.के. रामानुजन
जैनेंद्र कुमार
भगत सिंह
राम प्रकाश सक्सेना
सिमोन द बोउवार
ए. अरविंदाक्षन
जॉर्ज ऑर्वेल
भगवत रावत
रामदरश मिश्र
सियारामशरण गुप्त
ए. हमीद
जोगिन्दर पाल
भगवतीचरण वर्मा
रामधारी सिंह दिनकर
सुजान सिंह
एरिक हॉब्सबाम
जोतीराव गोविंदराव फुले
भगवतीप्रसाद वाजपेयी
रामप्रसाद बिस्मिल
सुदर्शन
एस.आर. हरनोट
जोश मलीहाबादी
भवानी प्रसाद मिश्र
राममनोहर लोहिया
सुधाकर अदीब
ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग
ज्ञान चतुर्वेदी
भारतेंदु हरिश्चंद्र
रामलाल
सुधा अरोड़ा
ओम थानवी
ज्ञान रंजन
भीमराव आम्बेडकर
रामवृक्ष बेनीपुरी
सुधीर चंद्र
ओमप्रकाश कश्यप
ठाकुर जगन्मोहन सिंह
भीष्म साहनी
रामानंद सागर
सुनील गंगोपाध्याय
ओमप्रकाश तिवारी
ठाकुर प्रसाद सिंह
भुवनेश्वर
राहत इन्दौरी
सुबोध शुक्ल
ओमप्रकाश सिंह
तरुण कुमार
भूपेन्द्र राय चौधरी
राही मासूम रजा
सुभद्रा कुमारी चौहान
ओमा शर्मा
तरुण भटनागर
भैरव प्रसाद गुप्त
राहुल सांकृत्यायन
सुभाष नीरव
कन्सतान्तिन पाउस्तोव्स्की
तलविंदर सिंह
मंगलेश डबराल
राहुल सिंह
सुषम बेदी
कन्हैयालाल नंदन
तुलसीदास
मंजरी श्रीवास्तव
रिफ़अत
सुषमा मुनीन्द्र
कबीर
तेजेंद्र शर्मा
मंजूर एहतेशाम
रूपसिंह चंदेल
सुहेल अज़ीमाबादी
कबीर संजय
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मख़दूम मोहिउद्दीन
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सूरदास
कमला विश्वनाथन
तोल्सतोय
मदन कश्यप
रेनर मरिया रिल्के
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
कमलेश्वर
त्रिलोकचन्‍द महरूम
मधुकर सिंह
लक्ष्मीनंदन बोरा
सूर्यबाला
करतारसिंह दुग्गल
त्रिलोचन
मधु कांकरिया
ललिताप्रसाद सुकुल
से.रा. यात्री
कविता
दयानंद सरस्वती
मधुसूदन साहा
लहब आसिफ अल-जुंडी
सैयद इंशा अल्ला खां
कविता वाचक्नवी
दाग़ देहलवी
मनमोहन भाटिया
लात्सलो ताबी
सैयद वलीउल्लाह
क़ैफ़ी आज़मी
दिनकर बेडेकर
मनीषा कुलश्रेष्ठ
लाला श्रीनिवास दास
सोफिया तोल्सतोया
कामता प्रसाद गुरु
दिनेश कुमार शुक्ल
मनीषा पांडे
लाल्टू
सोमदेव
कामता प्रसाद सिंह‍ काम
दिनेश द्विवेदी
मनोज कुमार झा
लीला गायतोंडे
स्वदेश दीपक
कामतानाथ
दिविक रमेश
मनोज कुमार पांडेय
लीलाधर जगूड़ी
स्वयं प्रकाश
कालिदास
दिव्या माथुर
मनोज बसु
लीलाधर मंडलोई
हंसराज रहबर
काशीनाथ सिंह
दीपक शर्मा
मनोज रूपड़ा
लुइगी पिरांडेलो
हजारी प्रसाद द्विवेदी
किरण अग्रवाल
दीपक श्रीवास्तव
मनोज श्रीवास्तव
लू शुन
हफ़ीज़ जालंधरी
किशन पटनायक
दुःखिनीबाला
मनोहर श्याम जोशी
लोचन बख्शी
हबीब जालिब
किशोरीलाल गोस्वामी
दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
मन्नू भंडारी
वरलोट्टि रंगसामी
हयात-उल्लाह अंसारी
कीर्ति केसर
दुष्यंत कुमार
ममता कालिया
वर्जिनिया वूल्फ
हयातुल्ला अंसारी
कुंवरपाल सिंह
दूधनाथ सिंह
मलाला युसूफजई
वर्तिका नंदा
हरप्रीत कौर
कुणाल सिंह
देवकीनंदन खत्री
मलिक मुहम्मद जायसी
वली दक्कनी
हरि जोशी
कुदरतुल्ला शहाब
देवेंद्र
महादेवी वर्मा
वसीम बरेलवी
हरि भटनागर
कुबेरनाथ राय
देवेंद्रनाथ शर्मा
महीप सिंह
वसुधा माने
हरिनारायण व्यास
कुमार अंबुज
देवेन्द्र इस्सर
महेश कटारे
विजय अहलूवालिया
हरिवंश राय बच्चन
कुमार अनुपम
देवेन्द्र सत्यार्थी
महेश चंद्र द्विवेदी
विजय कुमार झा
हरिशंकर परसाई
कुमार रवींद्र
द्रोणवीर कोहली
महेश वर्मा
विजय शर्मा
हसरत मोहानी
कुर्रतुल-एन-हैदर
धर्मवीर भारती
माधवप्रसाद मिश्र
विजयदेव नारायण साही
हीरा डोम
कुलदीप कुमार
धर्मेन्द्र मोहन पंत
माधवराव सप्रे
विजयमोहन सिंह
हुस्न तबस्सुम निहाँ
कुलवन्तसिंह विर्क
धीरेंद्र अस्थाना
मानिक वन्द्योपाध्याय
विजया सती
हृदयेश
कृशन चंदर
नंदकिशोर आचार्य
मार्कंडेय
विजेंद्र
हेनरिक हाइने
कृष्ण किशोर
नज़ीर अक़बराबादी
मार्क स्ट्रैंड
विद्यानिवास मिश्र
हेमंत शेष
कृष्ण कुमार
नज़ीर बनारसी
मालती जोशी
विद्यासागर नौटियाल
होमेन बरगोहात्रि
कृष्ण पाल
नन्द किशोर विक्रम
मास्टर भगवानदास
विनोद कुमार शुक्ल
होर्हे लुईस बोर्हेस
कृष्ण बलदेव वैद
नमिता सिंह
मिथिलेश प्रियदर्शी

एक अंक 'हरिगंधा' का



संपादक डा. मुक्ता

'हरिगंधा' साहित्य की महत्त्वपूर्ण पत्रिका है। इसका एक लघुकथा विशेषांक है। अतिथि संपादक अशोक भाटिया ने अपने अपने सम्पादकीय के द्वारा लघुकथा के प्रति जो वैचारिक भूमिका बाँधी है उसी को आगे बढ़ाते हुए जिन आलेखोंका चयन किया ,उसे को दो खण्डों में बाँटा गया है ---पहला ‘अभिमत’ और दूसरा ‘आलेख’ खंड है । डा शशि भूषण सिंघल ने अपने अभिमत में लघुकथा के सन्दर्भ में कथा के भीतर भाव की अनुगूँज को महत्त्वपूर्ण बताया तो राजकुमार कुम्भज ने कसे हुए अनुशासन के बिना लघुकथा को कच्ची माटी का घड़ा कहा है । कुल मिलाकर लघुकथा के मार्मिक पक्ष की बकालत है । आलेख खंड के सोलह आलेखों के माध्यम से लघुकथा के सन्दर्भ में बहुत सारे महत्वपूर्ण प्रश्न उठाये गए और उनके समाधान भी प्रस्तुत किये गए हैं ; जो समकालीन लघुकथा के अस्तित्व निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते दिखाई दे रहे हैं ।
सूर्यकान्त नागर ने सांकेतिकता को लघुकथा के प्राण के रूप में महत्त्व दिया है और किसी भी स्तर पर लघुकथा के अनर्गल संख्या बल को पैमाना न मानकर गुणवत्ता पर जोर दिया है । माधव नागदा ने भी कुकुरमुत्तों की तरह उग आये लघुकथाकारों पर प्रहार करते हुए पहचान के रूप में लघुकथा को 'जीवन के किसी सूक्ष्म कालखंड की कथात्मक अभिव्यक्ति’ माना है । बलराम अग्रवाल ने मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के दायरे को फ्राम ,फ्रायड और रॉक आदि मनोवैज्ञानिकों के सिद्धांतों की ज़मीन पर फैलाकर समकालीन लघुकथा को जाँचने परखने का ऐसा आधार दिया है जहाँ न केवल दमित इच्छाओं और काम आदि पुराने कारकों के दबाव में पड़ने वाले प्रभावों को परखा गया है बल्कि आज के समाज की विद्रूपताओं ,विसंगतियो ,प्रतिरोधों के बीच आम आदमी की सहज प्रतिक्रियाओं और इच्छाओं -आकांक्षाओं की लघुकथा में व्याप्ति को सटीक उदाहरणों से स्पस्ट किया है । अशोक भाटिया ने अपने आलेख 'बीच बहस 'में जनता के बीच लघुकथा अथवा लघुकथा के बीच जनता की आवश्यकता को उसकी स्वीकार्यता से जोड़ कर ऐसा प्रश्न खड़ा किया है ;जो लघुकथा के अस्तित्वसे जुडा है साथ ही आकार को लघुकथा की पहचान के रूप में स्वीकार नहीं किया है । डा पुरुषोत्तम दुबे ने शिल्प के विविध रूपों की व्यापक धरातल पर सोदाहरण व्याख्या की है,जो लघुकथा की शिल्पगत पड़ताल को महत्त्वपूर्ण मुकाम देती है । डा शमीम शर्मा ने कहानी से लघुकथा को अलग दिखने के चक्कर में सारांश प्रस्तुत करने की कृत्रिम प्रवृत्ति को कटघरे में खड़ा किया है और जटिलता के प्रति भी आगाह किया है । इसी क्रम में डा बाबूराम ने लघुकथा को किसी घटना का संक्षिप्त और मर्मस्पर्शी विवरण कहा है जिसमें ‘संक्षिप्त और विवरण’ स्वीकार करने में हिचक हो सकती है; क्योंकि विवरण के लिए लघुकथा में ज़्यादा गुंजाइश नहीं होती ।इन्होंने हरियाणा के लघुकथाकारों तथा उनकी प्रकाशित पुस्तकों का ऐतिहासिक विवरण दिया है जो कि 1966 में सुगन चंद मुक्तेश की ‘स्वातिगूंज’ से लेकर 1910 में अशोक भाटिया की महत्त्वपूर्ण लघुकथा कृति ‘अंधेरे में आँख’ तक प्रस्तुत करते हुए हरियाणा के लघुकथाकारों के के द्वारा उठाए गए नवीनतम विषयों तथा प्रस्तुत करने के अलग–अलग तेवरों की कलात्मक विशेषताओं सहित व्याख्या की है तथा इसी क्रम में भूगोल की विस्तार देते हुए डॉ रामकुमार घोटड़ ने पाठकों और समीक्षकों को महत्त्वपूर्ण जानकारी दी है। डॉ। सत्यवीर मानव ने गभीरतापूर्व लघुकथा लेखन का विवेचन विशेषण करते हुए हरियाणा के लघुकथा रचनाकार पर शोध के सन्दर्भ में डॉ रामनिवास मानव का विशेष उल्लेख किया है।
आज के समय में प्रिंट मीडिया से अलग अंतर्जाल पर साहित्य खूब फल–फूल रहा है। लघुकथा को पूरे महत्त्व के साथ प्रस्तुत करने में श्री सुकेश साहनी तथा रामेश्वर काम्बोज’हिमांशु’ का कार्य लघुकथा डॉट कॉम के माध्यम से सामने आया है और यहॉं अपने आलेख में ’हिमांशु’ जी ने तमाम महत्त्वपूर्ण वेवसाइटों का परिचय दिया है; जिन्होंने भारत समेत दुनिया के बहुत सारे देशों में लघुकथा की पहचान को रेखांकित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस अंक में संपादकों ने लघुकथाओं को विभिन्न स्तम्भों के अंतर्गत प्रकाशित करके के लघुकथाओं तथा हरिगंधा पत्रिका को गरिमा प्रदान की है। लघुकथा के आलोक स्तम्भ के अंतर्गत विश्व और भारत की आठ भाषाओं के सशक्त रचनाकारों की लघुकथाओं को प्रस्तुत किया गया है जिनमें खलील जिब्रान (अरबी), शेख सादी (फारसी), तयाड़ च्येनहवा (चीनी), वाङ मङ (चीनी), लियो तोलस्तोय (रूसी), इवान तुर्गनेव (रूसी), बर्तोल्त ब्रेख्त (जर्मन), फ़्रांस (जर्मन), समरसेट मॉम (अंग्रेजी), ओ हेनरी (अंग्रेजी), कार्ल सेंडवर्ग (अंग्रेजी),सआदत हसन मंटों (उर्दू), रतन सिंह (उर्दू), वरयाम सिंह (पंजाबी), की विश्व प्रसिद्ध लघुकथाएँ समाहित है।
‘हिन्दी की विरासत’ के अंतर्गत महान रचनाकारों की प्रसिद्ध लघुकथाओं को समाहित किया गया है जिसमें माधव राव सप्रे की लघुकथा ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ समाहित हैं। लघुकथाएँ एक, लघुकथाएँ दो तथा लघुकथाएँ तीन अलग–अलग स्तम्भों में रचनाकार की गरिमा, लघुकथा के प्रति लेखक का समर्पण और पाठकों में लोकप्रियता को ध्यान में रखकर चयनित की गई प्रतीत होती है। इस एक में तमिल एवं पंजाबी से अनूदित लघुकथाएँ है और उनका चयन बुद्धिमतापूर्ण है ।
15 पुस्तकों की समीक्षा की गई है जो कि सभी पुस्तकें लघुकथा की है। ये समीक्षा समीक्षकों के द्वारा की गई यद्यपि वे बहुत जाने माने है और सभी समीक्षाएँ गंभीरता लिये हुए हैं परन्तु एक–एक समीक्षक को कई कई पुस्तकों की समीक्षा करनी पड़ी है तो इस बात को भी प्रमाणित करता हैं कि अभी साहित्य जगत ने लघुकथा के लिए बहुत अधिक समीक्षक नहीं दिये हैं । निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि हरिगंधा का यह लघुकथा विशेषांक, लघुकथाओं को उनकी साहित्यिक पहचान दिलाने में महत्त्वपूर्ण कदम साबित होगा। इस अंक के माध्यम से लघुकथा को जानने -समझने के लिए पाठकों को और रचनाकारों को भी व्यापक फलक प्राप्त होगा। लेखों एवं लघुकथाओं का चयन यद्यपि बहुत मेहनत से किया गया है; फिर भी कुछ कमजोर लघुकथाएँ न होती तो मानक लघुकथाएँ के संकलन के रूप में इस अंक को स्वीकार किया जाता। वर्तनी- संबंधित अशुद्धियाँ कम नही है ; परंतु उन्हें अनदेखा करना इसलिए उचित है ;क्योंकि हरिगंधा का यह अंक जिस सजे -सँवरे रूप में पाठकों के सामने आया है ,वह आकर्षक है, संग्रहणीय ,पठनीय है और सच कहा जाए तो अदभुत भी है।

आनेवाली पीढ़ी के नाम – बर्तोल्त ब्रेख्त



1.
सचमुच मैं अँधिआरे दौर में जी रहा हूँ!
सीधी-सच्ची बात करना बेवकूफी है.
बेशिकन माथा निशानी है
पत्थर दिल होने की. वह जो हँस रहा है
उसने अभी तक सुनी नहीं
खौफनाक ख़बरें.
उफ़, कैसा दौर है ये
जब पेड़ों के बारे में बतियाना अमूमन जुर्म है
क्योंकि यह नाइंसाफी के मुद्दे पर एक तरह से ख़ामोशी है!
और वह जो चुपके से सड़क पार कर रहा है,
क्या अपने उन दोस्तों की पहुँच से बाहर नहीं
जो मुसीबत से घिरे हैं?
ये सही है कि मैं चला ले रहा हूँ अपनी रोजी-रोटी
मगर, यकीन करें, यह महज एक इत्तफाक है.
जो कुछ भी मैं करता हूँ, वह नहीं बनाता मुझे
पेट भर खाने का हकदार.
इत्तफाकन बच गया मैं. (किस्मत ने साथ छोड़ा नहीं
कि मैं गया काम से.)
वे मुझ से कहते हैं कि खाओ-पियो.
खुश रहो कि ये सब मयस्सर है तुम्हें.
मगर मैं कैसे खा-पी सकता हूँ
जबकि मेरा निवाला छीना हुआ है किसी भूखे से
और मेरे गिलास का पानी है किसी प्यासे आदमी का हिस्सा?
और फिर भी मैं खा-पी रहा हूँ.
मैं समझदार हो सकता हूँ खुशी-खुशी.
पुरानी किताबें बताती हैं कि समझदारी क्या है-
नजरअंदाज करो दुनिया की खींचातानी
अपनी छोटी सी उम्र गुजार दो
बिना किसी से डरे
बिना झगड़ा-लड़ाई किए
बुराई के बदले भलाई करते हुए—
इच्छाओं की पूर्ति नहीं बल्कि उन्हें भुलाते हुए
इसी में समझदारी है.
मैं तो इनमें से कुछ भी नहीं कर पाता-
सचमुच मैं अँधिआरे दौर में जी रहा हूँ!

2.
उथल-पुथल के दौरान मैं शहरों में आया
जब हर जगह भूख का राज था.
बगावत के समय आया मैं लोगों के बीच
और उनके साथ मिलकर बगावत की.
इस तरह गुजरा मेरा वक्त
जो मिला था मुझे इस धरती पर.
कत्लेआमों के दरमियान मैंने खाना खाया.
मेरी नींद में उभरती रहीं क़त्ल की परछाइयाँ.
और जब प्यार किया, तो लापरवाही से प्यार किया मैंने.
कुदरत को निहारा किया बेसब्री से.
इस तरह गुजरा मेरा वक्त
जो मिला था मुझे इस धरती पर.
हमारे दौर के रास्ते हमें ले जाते थे बलुई दलदल की ओर.
हमारी जुबान ने धोखा दिया कातिल के आगे.
मैं कुछ नहीं कर सकता था. लेकिन मेरे बगैर
हुक्मरान कहीं ज्यादा महफूज रह सकते थे. यही मेरी उम्मीद थी.
इस तरह गुजरा मेरा वक्त
जो मिला था मुझे इस धरती पर.

3.
तुम, जो इस सैलाब से बच निकलोगे
जिसमें डूब रहे हैं हम ,
जब भी बोलना हमारी कमजोरियों के बारे में,
तो ख्याल रखना
इस अंधियारे दौर का भी
जिसने बढ़ावा दिया उन कमजोरियों को.
जूतों से भी ज्यादा मर्तबा बदले हमने देश.
वर्ग युद्ध में, निराश-हताश
जब सिर्फ नाइंसाफी थी और कोई मजम्मत नहीं.
और हमें अच्छी तरह पता है
कि नफरत, कमीनगी के खिलाफ भी
चेहरे को सख्त कर देती है.
गुस्सा, नाइंसाफी के खिलाफ भी
आवाज़ को तल्ख़ कर देता है.
उफ़, हम जो इस दुनिया में
हमदर्दी की बुनियाद रखना चाहते थे
खुद ही नहीं हो पाये हमदर्द.
लेकिन तुम, जब आखिरकार ऐसा दौर आये
कि आदमी अपने संगी-साथी का मददगार हो जाए,
तो हमारे बारे में फैसला करते वक्त
बेमरौवत मत होना.

(विकल्प से साभार)

जब किताबों की होली जली

बर्तोल्त ब्रेख्त

जब सरकार ने आदेश दिया
कि हानिकारक ज्ञान वाली किताबें
जलाई जाएँगी सार्वजानिक रूप से
और हर तरफ़ हाँका गया बैलों को
खींच लाने को किताबों से लदी गाड़ियाँ
अग्नि कुंड तक,
एक निर्वासित लेखक
सर्वोतम लेखकों में से एक,
जांचते हुए जली हुई किताबों कि फेहरिस्त
भौंचक्का रह गया यह जान कर कि
उसमें शामिल नहीं थीं उसकी किताबें
वह दौड़ा अपनी मेज की ओर
आग बबूला क्रोध से,
और लिखा एक पत्र सत्ताधारिओं के नाम
जला दो मुझे !
क्या मेरी किताबों ने
हमेशा सच्चाई का इजहार नहीं किया?
और तुम मेरे साथ व्यवहार करते हो
किसी झूठे कि तरह!
मैं तुम्हे आदेश देता हूँ –
जला दो मुझे!

मरीना स्विताएवा की कविताएं




रूसी कवि ब्लोक के लिए

तुम्हारा नाम जैसे हाथ पर बैठी चिड़िया,
तुम्हारा नाम जैसे जीभ पर बर्फ़ की डली
होठों का हल्का-सा कम्पन।
तीन अक्षरों का तुम्हारा नाम
जैसे उड़ती हुई गेंद आ गई हो हाथ में
जैसे चाँदी की घण्टी की टनटनाहट।
तुम्हारे नाम का उच्चारण
जैसे शान्त तालाब में पत्थर की छपाक्
रात की धीमी-सी आहट के बीच
गूँजता है तुम्हारा नाम
कनपटियों के पास
जैसे बन्दूक के घोड़े का स्पर्श ।
तुम्हारा नाम...उफ़्फ़ ! क्या कहूँ मैं
जैसे चुम्बन कोमल कुहरे का
सहमी आँखों और पलकों पर
तुम्हारा नाम
जैसे बर्फ़ पर चुम्बन
नीले शीतल झरने के पानी का घूँट।
गहरी नींद
सुलाता है
तुम्हारा नाम !
(1916)

शनि और रविवार के बीच*

शनि और रविवार के बीच
लटकी हूँ मैं—
बैंत के झाड़ में रहने वाली चिड़िया।
चाँदी है मेरे एक पँख पर
और दूसरे पर—
सोना ।
सुख-दुख के बीच
बँटी हुई हूँ मैं आधी-आधी
शनिवार है रजत मेरा
और स्वर्ण मेरा—
रविवार ।
उदासी बहती है मेरी धमनियों में
स्वभाव से मैं कोई चट्टान नहीं,
अपने दाहिने पँख से मैंने
गिरा दिया है एक पर ।
यदि नींद से फिर जाग गया ख़ून
और छा गया है गालों पर
तो इसका मतलब है यह कि
मैंने मोड़ दी सोने की पीठ
इस संसार की तरफ़ ।
मन भरकर देख लो—
जल्द ही दूर देशों की तरफ़
चल देगी रंग-बिरंगे पँखों वाली
बैंत के झाड़ में रहने वाली चिड़िया ।
* मरीना स्विताएवा का जन्म शनि और रवि की आधी रात को हुआ था।
(1919)

साइके

(एक)
मैं घर लौट आई हूँ
मैं छद्मवेशी नहीं हूँ ।
रोटी नहीं चाहिए मुझे
मैं नौकरानी नहीं हूँ ।
मैं हूँ तुम्हारी वासना का आवेग
आराम हूँ तुम्हारा रविवार का ।
दिन हूँ तुम्हारा सातवाँ और
हूँ तुम्हारा सातवाँ आकाश ।
एक पैसा क्या मिला भीख में
चक्की के बाँध दिए पाट मेरे गले में ।
ओ प्रिय, पहचान नहीं पा रहे हो क्या
मैं अबाबील हूँ—
तुम्हारी आत्मा।
(दो)
अभी तक जो रहा कोमल शरीर
आज ढका है चीथड़ों से,
टुकड़े-टुकड़े हो गया सब कुछ
साबुत बचे है सिर्फ़ दो पँख ।
बचाओ, तरस खाओ मुझ पर—
पहनाओ मुझे अपनी गरिमा
और ले जाओ मेरे फटे चीथड़े
अपने परिधानों के पवित्र भण्डार में ।
(1918)

 मैं लिखती रही

मैं लिखती रही स्लेट पर
लिखती रही पँखों पर
समुद्र और नदी की रेत पर
बर्फ़ पर, काँच पर ।
लिखती रही सौ-सौ बरस पुराने डण्ठलों पर
सारी दुनिया को बताने के लिए
कि तू मुझे प्रिय है, प्रिय है, प्रिय है
लिख डाला यह मैंने
इन्द्रधनुष से पूरे आकाश पर
कि इच्छा थी मेरी कि हर कोई
सदियों तक खिलता रहे मेरे साथ,
कि मेज़ पर सिर टिकाए
एक के बाद एक
काटती रही
सबके सब नाम ।
पर तू जो बँध गया है बिके हुए क्लर्क के हाथ
क्यों डंक मारता है मेरे हृदय में
जिसे मैंने बेचा नहीं वह अँगूठी
आज भी रखी है मेज़ पर
(1920)

 ज़माने ने सोचा नहीं

ज़माने ने कुछ सोचा नहीं कवि के बारे में
और मुझे भी ज़माने से क्या मतलब !
भाड़ में जाए यह गड़गड़ाहट, यह शोर
जो आ नहीं रहा है
मेरे अपने वक़्त के बीच से ।
यदि इस युग को कोई मतलब नहीं
अपने पुरखों से
तो मुझे भी कोई मतलब नहीं
पोतों-पड़पोतों की भीड़ से ।
मेरा युग— ज़हर है मेरा, बुख़ार है मेरा,
मेरा युग— दुश्मन है मेरा, नरक है मेरा ।
(1934)

न सोच कोई, न शिकायत

न सोच कोई, न शिकायत,
न विवाद कोई, न नींद
न सूर्य की इच्छा, न चन्द्रमा की
न समुद्र की, न जहाज़ की ।
महसूस नहीं होती गरमी
इन दीवारों के भीतर की,
दिखती नहीं हरियाली
बाहर के उद्यानों की ।
इन्तज़ार नहीं रहता अब
उन उपहारों का
जिन्हें पाने की पहले
रहती थी बहुत इच्छा ।
न सुबह की ख़ामोशी भाती है
न शाम को ट्रामों की सुरीली आवाज़,
जी रही हूँ बिना देखे
कैसा है यह दिन ।
भूल जाती हूँ
कौन-सी तारीख़ है आज
और कौन-सी यह सदी ।
लगता है जैसे फटे तम्बू के भीतर
मैं एक नर्तकी हूँ छोटी-सी
छाया हूँ किसी दूसरे की
पागल हूँ दो अँधियारे चन्द्रमाओं से घिरी।

माथा चूमने पर

माथा चूमने पर
मिट जाती हैं सब चिन्ताएँ-
मैं माथा चूमती हूँ ।
आँखें चूमने पर
दूर हो जाता है निद्रा-रोग-
मैं आँखें चूमती हूँ ।
होंठ चूमने पर
बुझ जाती है प्यास-
मैं होंठ चूमती हूँ ।
माथा चूमने पर
मिट जाती हैं आहें-
मैं माथा चूमती हूँ ।
(रचनाकाल : 5 जून 1917)

कोरा पन्ना

मैं कोरा पन्ना हूँ तुम्हारी क़लम के लिए
सब-कुछ स्वीकार है मुझे । सफ़ेद पन्ना हूँ मैं एक ।
मैं रक्षक हूँ तुम्हारी अच्छाइयों की ।
लेती रहूँगी सौ-सौ जन्म तुम्हारे लिए ।
गाँव हूँ मैं, काली ज़मीन हूँ
और तुम- धूप और वर्षा,
ईश्वर हो तुम
और मैं काली ज़मीन और सफ़ेद पन्ना ।
(रचनाकाल : 10 जुलाई 1918)

 अब

अब ईश्वर नहीं पहले की तरह उदार
न ही वे नदियाँ उन तटों पर।
साँझ के विशाल द्वारों पर
चली आओ, ओ ख़ूबसूरत फ़ाख़्ताओ !
और मैं ठण्डी रेत पर लेटी
चल दूँगी बिना गिनती, बिना नाम के उस दिन...
जिस तरह पुरानी छोड़ देता है साँप केंचुल
छोड़ आई हूँ पीछे अपना यौवन।
(रचनाकाल : 17 अक्तूबर 1921)

मायकोव्स्की के लिए

जो ऊँचा है चिमनियों और सलीब से,
बप्तिस्मा हुआ है जिसका आग और धुएँ में,
आदि देवदूत भारी-भरकम
सदियों में एक होता है व्लादीमिर।
घोड़ा और घुड़सवार-- दोनों है वह
सनक है वह और विवेक भी।
साँस लेता, थूक से मलता है हथेलियाँ।
सम्भल जाओ, ओ भार ढोती महानता !
चौराहों के आश्चर्यों का गायक
स्वस्थ, स्वाभिमानी, मलिनमुख,
हीरे भी न कर पाए आकर्षित
चट्टान की तरह भारी उसे।
चट्टानों से चट्टान का शोर।
उबासी लेता, अभिवादन करता और पुन:
लकड़ी के हत्थे-जैसे पंखों पर
सवार होता भारी-भरकम देवदूत।
(रचनाकाल : 18 सितम्बर 1921)

नियति

निर्धन हूँ मैं और नश्वर-
अच्छी तरह मालूम है तुम्हें यह ।
प्रशंसा का तुम बोलते नहीं हो एक भी शब्द ।
पत्थर हो तुम और मैं एक गीत
स्मारक हो तुम और मैं एक चिड़िया ।
अर्थहीन होता है मई का महीना
काल की विराट आँखों के सामने ।
दोष न दो मुझे
मैं तो बस चिड़िया हूँ
मुझे मिली है नियति भारहीन ।
(रचनाकाल : 16 मई 1920)

पहला सूरज

ओ, पहले माथे के ऊपर के पहले सूरज।
सूरज की ओर धुआँ छोड़ती
बंदूक की दो नालियों-सी
ये विशाल आँखें आदम की।
ओ पहली ख़ुशी
ओ बाँये पक्ष के पहले सर्पदंश।
ओ, ऊँचे आकाश पर नज़र गड़ाए
हौवे की झलक पाते आदम।
उच्च आत्माओं के जन्मजात घाव-
ओ मेरी ईर्ष्या, मेरी जलन।
ओ मेरे सब आदमों से अधिक जीवन्त पति
ओ प्राचीनों के निरंकुश सूरज।
(रचनाकाल : 10 मई 1921)

मालूम है मुझे

मालूम है मुझे
कैसी होती हैं दुनिया की सुन्दरताएँ,
कि यह सुन्दर नक्काशी किया प्याला
इस हवा
इन तारों
इन घोसलों से अधिक है नहीं हमारा।
मालूम है मुझे
जानती हूँ कौन है मालिक इस प्याले का।
हल्के पाँवों से आगे बढ़ता
मीनार की तरह ऊँचा
ईश्वर के डरावने और गुलाबी होंठों से
पंखों की तरह अलग हो गया है प्याला !
(रचनाकाल : 30 जून 1921)

चाँद बोला पागल से

यहीं रहेंगे
जो गुँथे हुए हैं इस जगह से ।
आगे ऊँचाईयाँ हैं
यदि खो जाए आख़िरी बार स्मरणशक्ति
तुम पुन: होश में आना नहीं।
मित्र नहीं होते
प्रतिभाओं और पागलों के।
अन्तिम ज्ञान-प्राप्ति के अवसर पर
ज्ञान तुम प्राप्त करना नहीं।
मैं- आँखें हूँ तुम्हारी
छतों की उल्लू-दृष्टि।
पुकारेगा जब कोई तुम्हारा नाम-
तुम सुनना नहीं।
मैं आत्मा हूँ तुम्हारी : यूरेनस
देवत्व का द्वार।
मिलन के अन्तिम अवसर पर
तुम परखना नहीं ।
(यूरेनस= यहाँ यूरेनस का उल्लेख सम्भवत: एफ़्राडायटी के लिए है। रचनाकाल : 20 जून 1923)

 प्रेम

खंजर? आग?
धीरे से।
इतनी ज़ोर से बोलने की क्या ज़रूरत!
चिर-परिचित यह दर्द
जैसे आँखों के लिए हथेली,
जैसे होंठों के लिए
अपने बच्चे का नाम।
(रचनाकाल : 1 दिसम्बर 1924)

हथेली

हथेलियाँ ! (युवक और युवतियों
के सन्दर्भ-स्रोत)
चूमी जाती है दाईं हथेली
बाँची जाती है बाईं।
आधी रात के षड्यन्त्र के भागीदार-
मालूम करो :
क्या दिखा रही है दाईं हथेली
और क्या छिपा रही है बाईं।
बाईं हथेली- सिब्बिल-
बहुत दूर रहती है ख्याति से।
इतना ही पर्याप्त है दाईं हथेली के लिए
कि स्त्सेवोला की हथेली बनना लिखा है उसकी नियति में।
पर नफ़रत की इन लम्बी घड़ियों में भी
हम दुनिया के हाथों
सौंपते हैं पूरे दिल से
अपनी बाईं हथेली।
और ईश्वर के आक्रोश के सम्मुख
हमने कभी नहीं हिम्मत हारी
दाएँ हाथ के बल पर
हम जीते रहे बाईं हथेली की नियति।
(शब्दार्थ :सिब्बिल=पौरोणिक कथाओं में भविष्यवाणी करने वाली स्त्री, जिसे अपोलो से दीर्घायु का वरदान मिला था। स्त्सेवोला=रोम की एक दन्तकथा का नायक, जिसने अपने साहस व निडरता का परिचय देने के लिए अपना दायाँ हाथ जलती आग पर रख दिया था। रचनाकाल : 27 अप्रैल 1923)

घर

जिन लोगों ने
घर नहीं बनाए
वे अयोग्य हैं
इस धरती के
जिन लोगों ने
घर नहीं बनाए
इस धरती पर
लौट कर
नहीं आ सकते वे
भूसे या भस्मी हित शायद
कभी न धरती पर आ सकते
मैंने भी घर नहीं बनाए
ज़िन्दगी से
नदियों के उफ़ान की तरह मेरे
गालों की छिन नहीं सकोगी लाली ।
तुम-- शिकारी, पर हार नहीं मानूँगी मैं
तुम दौड़ हो तो मैं रफ़्तार ।
तुम ज़िन्दा नहीं पकड़ सकोगी मेरी आत्मा-
अपनी दौड़ की पूरी तेज़ी में
अपनी नसें चबाता हुआ
यह लचीला अरबी घोड़ा ।
(रचनाकाल : 25 दिसम्बर 1924)

जीवन जिया मैंने

जीवन जिया मैंने
कहूँगी नहीं ये मरते हुए ।
अफ़सोस नहीं, न ही किसी पर आरोप लगाने की ज़रूरत ।
उन्माद के तूफ़ानों और प्यार के कारनामों से अधिक
और भी हैं ज़रूरी चीज़ें इस दुनिया में ।
तुम जो पँखों से
दस्तक देते थे मेरी छाती पर
अपराधी हो मेरी युवा प्रेरणा के ।
तुम मान लो ज़िन्दा रहने का मेरा आदेश,
मैं भी मानती रहूँगी तुम्हारी हर बात ।
(रचनाकाल : 30 जून 1918)

 इस महानगर में

रात छाई है मेरे इस विराट महानगर में,
और मैं... दूर जा रही हूँ सोए पड़े इस घर से।
लोग सोचते हैं... होगी कोई लड़की, कोई औरत,
पर यह मैं ही जानती हूँ
क्या हूँ मैं और क्या है यह रात।
मेरा रास्ता साफ़ कर रही है जुलाई की हवा
संगीत गूँज रहा है धीमा-सा एक खिड़की में।
आज रात सुबह तक बहते रहना है हवा को
एक छाती की पतली दीवारों से दूसरी छाती में।
खड़ा है काला चिनार
खिड़की में रोशनी
घंटाघर में घण्टियों की आवाज़
हाथों में फूल।
किसी का पीछा न करता यह पाँव, यह छाया...
सब-कुछ है यहाँ
बस एक मैं नहीं।
रोशनियाँ जैसे सुनहरे मनकों के धागे,
मुँह में रात की पत्तियों का स्वाद।
मुझे मुक्त करो दिन के बंधनों से,
दोस्तो, विश्वास करो, मैं दिखती हूँ तुम्हें सिर्फ़ सपनों में।
(रचनाकाल : 17 जुलाई 1916)

आएँगे दिन कविताओं के

आएँगे दिन उन कविताओं के
जिन्हें लिखा मैंने छोटी उम्र में
मैं कवि हूँ-
जब स्वयं को भी नहीं था मालूम यह ।
आएँगे दिन राकेट के अँगारों के
और फव्वारों से छूटते छींटों-सी कविताओं के ।
धूप और आलस के नशे में झूमते
मन्दिर में घुस आए शिशु-देवदूतों-सी
यौवन और मृत्यु की
जो पढ़ी नहीं गईं
आएँगे दिन उन कविताओं के ।
दूकानों की धूल में बिखरी हुई
ख़रीदारों की उपेक्षा की शिकार
महँगी शराब की तरह
मेरी कविताओं के भी दिन आएँगे ।

(सभी कविताओं का मूल रूसी भाषा से अनुवाद : वरयाम सिंह)