Monday, 4 November 2013

उन्हे नहीं सुहाते 'पछताते, पथ पर आते लोग'

जयप्रकाश त्रिपाठी


ये जो है न फेसबुक....जो रोज यहां आते हैं प्रायः, टिके रह जाते हैं घंटों। दिन-दिन भर। अपने आसपास से मुक्त। विचरते हुए-से। कई एक रचते हैं। खेलने वाले भी। अनेकशः सिर्फ अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हुए पल-दो-पल की। अथवा उनमें से कई-एक किसी-न-किसी व्यावसायिक मकसद से भी। कई एक उपस्थितियां छिपे एजेंडे वाली। कई छिछोरेबाजी के लिए। शोहदे भी।

लेकिन वे सबसे ज्यादा, जो अपने दर्द साझा करते हैं यहां। अपने आसपास, अपने रोजमर्रा के चित्र खींचते हुए। कविताएं, कहानियां, वक्तव्य, अनुभवों की सौगात उलीचते हुए। यहां आने का उद्देश्य उलझा हुआ नहीं होता है उनका। कुछ-एक पंक्तियों पर नजर पड़ते ही वे खींच लेते हैं हमे अपने निकट। बहुत पास तक।

जैसे सुबह कभी शहर की सड़कों से गुजरते हुए खाली ठेले लिए सब्जी मंडी की ओर तेज रफ्तार से जाते हुए लोग दिख जाते हैं। कई-एक दूध के लिए हाथ में खाली डिब्बे लटकाए। बच्चे को स्कूल ले जाने वाली बस का इंतजार करते। दुकान खोलते हुए। और बगल की सड़क पर झाड़ुओं से धूल के बवंडर बरसाते हुए भी।

और वे भी तो! सुन्नर-मुन्नर कुत्तों की चेन थामे आम आदमियों पर हिकारत से नजर डाल कर स्वयं की महानता से खामख्वाह अभिभूत-आह्लादित होते हुए। उनके जैसों के पास महानता की सीढ़ियां, कई-कई तरह के पायदान ऊपर तक जाने के लिए। उनके घरों से अक्सर हार्ट अटैक की खबरें आती हैं। मौत भी उन्हें ज्यादा परेशान नहीं करती है।

नाली-कचरे की गुड़-मुड़र में अधजगी कुतिया की तरह पसरी हुईं सुबह की सड़कों से कई एक जन अपनी बोल-भाषा में बतियाते हुए दिख जाते हैं। जैसे कि क्यों आ गये हों वे यहां। क्योकि इधर के कचरे के ढेरों में भी मामूली हाथ-पैर चलाकर ज्यादा-कुछ मिल जाता होगा। उनमें कई एक के पास अपनी लकड़ी की गड़ारियों वाली ठेल होती हैं। एक ठेल पर उसकी अपाहिज स्त्री भी उठंगी हुई, कचरे के ढेर पर पॉलीथिन की एक-एक थैली खंगालते सिर्फ अपने पति को बड़े गौर से देखती हुई। एकटक, टुकर-टुकर।

जिनके हाथ में झबरीले कुत्ते की चेन हो। लगता है, उनके मन में शायद इस तरह के प्रश्न भी सुबह-सुबह जरूर कौंधते होंगे कि ऐसे कचरे वाले लोग इस सुंदर दुनिया में क्यों रहना चाहते हैं। इनके नहीं होने पर दुनिया और खूबसूरत हो जाएगी।इन्हें नहीं होना चाहिए। हों-न-हों, क्या फर्क पड़ता है। जीयें या मरें। छीईईईई...

ऐसा सोचने वालों के बारे में शायद उनके ऊपरी पायदान पर बैठे लोग भी इसी तरह के प्रश्न टीपते-टकटोरते रहते होंगे। वे लोग, जिनके नौकर कुत्ते की चेन थामे दिख जाते हैं । वे खुद नहीं।

वे बेचारे से।

नहीं पता कि हर किसी की चेन किसी-न-किसी की अंगुलियों में भिंची हुई। किसी न किसी की अक्ल तक फंसी-घुसी हुई रहती है।

जिन्हें कि ' दो टूक कलेजे को करते, पछताते, पथ पर आते' लोग रत्ती भर नहीं सुहाते हैं।

सचमुच दुनिया को जानवरों के बाड़े में तब्दील कर देने के लिए उनकी भी बेहूदा मशक्कत उनसे ऊपर के लोगों के लिए कितने काम की रहती होगी!

नहीं?

नबीला एक दो दिनों में गांव लौट जाएगी


ब्रजेश उपाध्याय

इस हफ़्ते अमरीका ने दो नए चेहरे देखे. एक वो चेहरा जो अपने दफ़्तर में बैठ कर हज़ारों मील दूर छिपे चरमपंथियों पर निशाना लगाता है और दूसरा वो चेहरा जो अनजाने में उसका शिकार बनता है. एक था मानसिक रूप से टूट चुके ब्रैंडन ब्रायंट का चेहरा जो ड्रोन ऑपरेटर के तौर पर काम करते थे, दूसरा ज़िंदगी और उम्मीद से भरपूर नबीला का चेहरा. नौ साल की नबीला. मासूम, ख़ूबसूरत, नीली आंखें, सर पर रखे दुपट्टे के छोर को उंगलियों में लपेटती, कभी मुस्कराती, कभी बोर होकर उबासी लेती, कभी टेबल पर रखे कागज़ पर लकीरें खींचतीं नबीला. उत्तरी वज़ीरिस्तान से आई इस बच्ची ने एक साल पहले ड्रोन हमलों में अपनी दादी को खो दिया, ख़ुद भी घायल हुई लेकिन ज़िंदा बच गई. जब अमरीकी कांग्रेस के कुल पांच मेंबर और दुनियाभर की मीडिया के सामने नबीला अपनी कहानी पश्तो भाषा में सुना रही थी तो अंग्रेज़ी में उसका अनुवाद कर रही महिला का गला भर आया, आंखें नम हो गईं. वहां बैठी कुछ और महिलाओं की भी आंखें नम थीं. एक ने कहा, "मैं भगवान से मनाती हूं कि तुम्हें फिर कभी ड्रोन की आवाज़ न सुनाई दे." वहां बैठा मैं एकटक नबीला को देख रहा था. अचानक से उनकी नज़र मुझ पर गई और जिस तरह से छोटे बच्चे कभी-कभी किसी अनजाने चेहरे को देखकर मुस्करा देते हैं, वैसे ही मुस्करा दीं. कांग्रेस में काम करने वाली एक महिला ने उसके सामने आईसक्रीम के दो कप लाकर रखे. पहले वो झिझकी, फिर एक चम्मच से चखा और फिर से वही मुस्कान. मैं तबतक उसके बिल्कुल पास खड़ा था, पूछा... "अच्छी हैं आईसक्रीम? उसने कुछ नहीं कहा. सर झुकाकर खाती रही." ये पहली बार था जब वो अपने गांव से निकली थी और सीधा वाशिंगटन पहुंची. मैने उसके भाई ज़ुबैर से पूछा, "नबीला को यहां कैसा लगा? जवाब था, 'ये बेहद खुश है. कहती है सड़कें कितनी चौड़ी हैं, लोग कितने प्यार से मिलते हैं." यही सड़कें उन दफ़्तरों तक भी जाती हैं जहां बैठकर कुछ लोग नबीला की दुनिया मे छिपे चरमपंथियों पर निशाना लगाते हैं. ब्रैंडन ब्रायंट ड्रोन ऑपरेटर का काम करते थे. ख़तरनाक चरमपंथी हों या बेगुनाह लोग, अपने कंप्यूटर पर दिख रही जीती-जागती तस्वीरों को मांस के लोथड़ों में बदलता देखना उन्हें अंदर से कहीं तोड़ चुका है. वो मानसिक तनाव से ग्रस्त हैं. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, "मैं जब अफ़गानिस्तान में एक मकान पर निशाना लगा रहा था तो कोई भागता हुआ नज़र आया. मुझे लगा कि कोई छोटा बच्चा है. एक और विशेषज्ञ की सलाह ली तो उसने कहा कि बच्चा नहीं कुत्ता है. हमला हुआ... मलबे की रिपोर्ट में न तो बच्चे का ज़िक्र था, न कुत्ते का." ब्रायंट ने नौकरी छोड़ दी है. उनके साथियों ने उनका मज़ाक भी उड़ाया. दूर से ही सही, किसी की जान लेना आसान काम नहीं होता. बल्कि कांग्रेस के एक सदस्य के शब्दों में "कौन जिएगा, कौन मरेगा, इसका फ़ैसला हम कर रहे होते हैं... जबकि ये फ़ैसला भगवान का होना चाहिए." इन दोनों चेहरों ने अमरीका की उलझन बढ़ा दी है. अबतक यहां एक ही सोच हावी रही है कि ये वो इलाका है जहां से तालिबान और अल क़ायदा दुनिया पर हमला करने की तैयारी करते हैं और ड्रोन से बेहतर कोई हथियार नहीं है इन्हें काबू में लाने के लिए. नबीला और ब्रैंडन ब्रायंट के चेहरों ने उस सोच पर सवाल उठाए हैं. अब यहां ये बहस भी हो रही है कि जो ख़तरनाक चरमपंथी कहे जाते हैं उन्हें बिना किसी सुनवाई के मौत की सज़ा देना क्या सही है? दूसरी तरफ़ ये सवाल ये भी उठते हैं कि अगर चरमपंथी बेगुनाहों को मारने में नहीं हिचकते तो उन्हें सभ्य समाज की सहूलियतें क्यों मिलें? नबीला एक दो दिनों में वापस अपने गांव पहुंच जाएगी. ब्रैंडन ब्रायंट अभी कुछ दिन डॉक्टरों के चक्कर लगाएंगे. इसी हफ़्ते फिर से एक ड्रोन हमला हुआ है. पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियां कह रही है कि कुछ बड़े चरमपंथी मारे गए हैं. पाकिस्तान ने अपनी सीमा के अंदर हुए हमले के लिए अमरीका की एक बार फिर से आलोचना की है. (बीबीसी से साभार)

अमरीकी जासूसों के निशाने पर पूरी दुनिया


रूसी संसद के निचले सदन, राजकीय दूमा की अंतर्राष्ट्रीय संबंध समिती के अध्यक्ष अलेक्सेय पुश्कोव ने अपने ट्विटर माइक्रोब्लॉग में लिखा है कि अमरीका ने पूरी दुनिया में जासूसी करने के लिए एक अभूतपूर्व संजाल स्थापित किया हुआ है। पुश्कोव के शब्दों में, अमरीकी खुफिया सेवा के उप-प्रमुख जेम्स क्लेप्पर ने खुद माना है कि अमरीकी ख़ुफिया संजाल पूरी दुनिया में जासूसी का सबसे बड़ा संजाल है। अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी में 35 हज़ार लोग काम करते हैं और इसका वार्षिक बजट 11 अरब डॉलर है। इस बीच जर्मन गृह मंत्रालय की राय में, जासूसी कांड के सिलसिले में एक गवाह के रूप में एडवर्ड स्नोडेन से मास्को में पूछताछ की जा सकती है। यह बात जर्मन गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कही है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सरकार इस पूर्व अमरीकी जासूस को जर्मनी में शरण देने के पक्ष में नहीं है। जर्मन नेताओं के बीच इस मुद्दे पर ज़ोरदार बहस जारी है। उदाहरण के लिए, जर्मनी की वामपंथी पार्टी के एक नेता बर्न्ड रिक्सिंगर ने कहा है कि जर्मन सरकार को चाहिए कि वह एडवर्ड स्नोडेन को अपने वहाँ बुलाकर उससे पूछताछ करे। एक अन्य जानकारी के मुताबिक गूगल कम्पनी के प्रबन्धकों ने अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से राष्ट्रीय सुरक्षा एजेन्सी की हरकतों की शिकायत की है। कम्पनी की प्रबन्ध परिषद के अध्यक्ष एरिक श्मिट ने समाचार-पत्र वॉल स्ट्रीट जरनल को यह जानकारी दी।  विगत अक्तूबर के अन्त में अमरीकी गुप्तचर संगठनों के पूर्व एजेन्ट एडवर्ड स्नोडेन द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेज़ों से यह जानकारी मिली थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा एजेन्सी 'मसकुलर' के कोडनाम से एक प्रोग्राम चला रही है और इण्टरनेट कम्पनियों गूगल और याहू के सर्वरों से सूचनाओं को रिकार्ड कर रही है। 'मसकुलर' नामक यह प्रोग्राम राष्ट्रीय सुरक्षा एजेन्सी को लाखों-करोड़ों ई०मेल सन्देशों को रिकार्ड करने की सम्भावना देता है। गूगल और याहू ने कहा है कि उन्होंने अमरीकी गुप्तचर कम्पनियों को ई०मेल सन्देश रिकार्ड करने की इजाज़त नहीं दी थी। एनएसए की जासूसी गतिविधियों की जानकारी देने वाले एडवर्ड स्नोडेन को अमेरिका ने माफ करने से इनकार किया है. व्हाइट हाउस के सलाहकार डैन फीफर ने कहा स्नोडेन ने कानून का उल्लंघन किया है और उनके प्रति कोई नरमी नहीं बरती जाएगी. पिछले हफ्ते जर्मनी की ग्रीन पार्टी के नेता हंस क्रिस्टियान श्ट्रोएबेले की स्नोडेन से मुलाकात के बाद अमेरिकी संसद के प्रमुख सदस्यों, खुफिया मामलों की समिति के सदस्यों और व्हाइट हाउस सलाहकार डैन फीफर ने इस बारे में बातचीत की. अमेरिकी न्यूज चैनल से बात करते हुए फीफर ने कहा, "स्नोडेन को अमेरिका वापस आना होगा और कानूनी कार्रवाई का सामना करना होगा." अमेरिकी सांसद डायेन फींस्टीन ने भी कहा है कि स्नोडेन ने नरमी का वह मौका गंवा दिया. उन्होंने कहा, "अगर वह फोन उठाकर व्हाइट हाउस की खुफिया मामलों की समिति से कहते कि मेरे पास कुछ ऐसी जानकारी है जो आपके लिए महत्वपूर्ण है, तो उनके पास मौका हो सकता था." फींस्टीन ने आगे कहा, "ऐसे में हम उनसे मिलते और इस जानकारी पर गौर करते. लेकिन वैसा हुआ नहीं और उन्होंने राष्ट्र को भारी नुकसान पहुंचाया है." वह मानती हैं कि स्नोडेन पर मुकदमा चलना ही चाहिए. अमेरिका में सरकार के खिलाफ जासूसी के आरोप झेल रहे एडवर्ड स्नोडेन को अगस्त में रूस में शरण मिली. अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी के नेता माइक रॉजर्स ने भी कहा कि स्नोडेन को आरोपों से मुक्ति देने की कोई वजह नहीं दिखती. रॉजर ने कहा, "अगर वह वापस आकर इस बात की जिम्मेदारी लेने को तैयार हों कि उन्होंने सरकारी जानकारी की चोरी की और उसका दुरुपयोग किया, तो मैं उनसे बातचीत के लिए तैयार हूं." साथ ही उन्होंने कहा स्नोडेन ने जो किया है उसकी उन्हें जिम्मेदारी लेनी होगी. इस बातचीत में वह बता सकते हैं कि उन्होंने जो किया वह क्यों किया.  एडवर्ड स्नोडेन से पिछले हफ्ते जर्मनी के ग्रीन पार्टी के नेता हंस क्रिस्टियान श्ट्रोएबेले ने मुलाकात की. जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल के फोन पर एनएसए की जासूसी की खबरों के बाद से यूरोप में अमेरिका के खिलाफ नाराजगी और बढ़ गई. एनएसए की जासूसी गतिविधियों की जानकारी देने वाले एडवर्ड स्नोडेन से पिछले हफ्ते जर्मनी के ग्रीन पार्टी के नेता हंस क्रिस्टियान श्ट्रोएबेले ने मुलाकात की और बर्लिन आकर एनएसए के खिलाफ गवाही देने का न्यौता दिया था. फींस्टीन ने उनकी इस मुलाकात पर भी सवाल उठाए और कहा कि जहां तक सहयोगी राष्ट्रों की आपसी बात है, उनके निजी फोन की जासूसी करना, खासकर नेताओं की, यह एक जासूसी हरकत से ज्यादा राजनीतिक जिम्मेदारी है. उन्होंने यह भी कहा, "हमें इस मामले को ध्यान से देखने की जरूरत है, और कुछ अपवाद को छोड़ राष्ट्रपति वह कर रहे हैं." एक दूसरे इंटरव्यू में अमेरिकी केंद्रीय खुफिया समिति और एनएसए के पूर्व प्रमुख माइकल हेडेन ने कहा कि जासूसी के पूरे मामले में जर्मनी के लिए ज्यादा खराब स्थिति है. उन्होंने कहा, "मैं चांसलर के लिए शर्मिंदगी का अनुमान लगा सकता हूं. इस मामले ने उनके लिए खराब राजनीतिक स्थिति पैदा की है." जर्मन ग्रीन पार्टी के श्ट्रोएबेले ने स्नोडेन से मिलकर उन्हें आश्वासन दिया कि उनके हकों का सम्मान किया जाएगा. मुलाकात के बाद उन्होंने कहा था कि अगर स्नोडेन बर्लिन ना भी आ सके तो उस हाल में जर्मनी से वकीलों को बयान दर्ज करने के लिए रूस भेजा जा सकता है. अमेरिका पहले ही स्नोडेन के पासपोर्ट को अमान्य कर चुका है और जर्मनी समेत कई अन्य देशों से स्नोडेन को अमेरिका वापस भेजने के लिए भी कहा गया है. स्नोडेन ने कहा था कि वह जर्मन संसद में अमेरिकी जासूसी के बारे में गवाही देने के लिए भी तैयार है, बशर्ते उनकी सुरक्षा की गारंटी दी जाए. अमेरिका को लिखे अपने खत में स्नोडेन ने उन पर लगे आरोपों से उन्हें मुक्त करने की मांग की थी. साथ ही स्नोडेन ने यह भी लिखा था, "जो लोग सच बोल रहे हैं वह अपराध नहीं कर रहे."

Friday, 1 November 2013

काशीनाथ सिंह की तीन 'काल' कथाएं



अकाल


यह वाकया दुद्धी तहसील के एक परिवार का है। पिछले रोज चार दिनों से गायब मर्द पिनपिनाया हुआ घर आता है और दरवाजे से आवाज देता है। अन्दर से पैर घसीटती हुई उसकी औरत निकलती है। मर्द अपनी धोती की मुरींसे दस रुपये का एक मुड़ा-तुड़ा नोट निकालता है और औरत के हाथ पर रखकर बोलता है कि जब वह शाम को लौटे तो उसे खाना मिलना चाहिए। औरत चिन्तित होकर पूछती है, ‘अनाज कहां है?’ ‘जुहन्नुम में।’ मर्द डपटकर कहता है और बाहर निकल जाता है। औरत नोट को गौर से देखती है और जतन से ताख पर रख देती हैं। वह अपने चार साल के लड़के को-जो खेलते-खेलते सो गया है- जगाती है और कहती है, ‘तुम घर देखो, मैं अभी आ रही हूं।’ लड़का आंख मलता है और वह उसे लौटकर अपने साथ बाजार ले चलने का लालच देता है! लड़का चुपचाप अपनी मां को देखता रहता है। औरत कटकटाए बर्तनों को उठाती है और मलने के लिए बाहर चली आती है। वह चटपट बर्तन मलकर घर आती है और चैखट पर पहुंचकर दंग रह जाती है। नीचे जमीन पर नोट के टुकड़े पड़े हैं। वह बर्तन फेंककर ताख के पास जाती है - नोट नदारद। लड़का खटिया पर जसका तस लेटा है। वह गुस्से में है और मुंह फुलाये है। वह लड़के को खींचकर मारना शुरू करती है और थक जाती है और रोने लगती है। शाम को मर्द आता है और चैक में पीढ़े पर बैठ जाता है। वह औरत को आवाज देता है कि तुरन्त खाना दो। औरत आंगन में बैठे बैठे बताती है कि जब वह बर्तन मलने गयी थी, लड़के ने नोट को फाड़ दिया था। मर्द अपनी सूखी जांघ पर एक मुक्का मारता है और उठ खड़ा होता है। वह लपककर चूल्हे के पास से हंसुआ उठाता है और आंगन में खड़ा होकर चिल्लाता है, ‘अगर कोई मेरे पास आया तो उसे कच्चा खा जाऊंगा। उसका मुंह अपनी औरत की ओर है। औरत बिना उसे देखे-सुने बैठी रहती है। मर्द झपट्टा मारकर लड़के को उठाता है और उस पर चढ़ बैठता है। फिर हंसुआ को झण्डे की तरह तानकर औरत को ललकारता है, ‘कच्चा खा जाऊंगा।’ औरत उसकी ओर कतई नहीं देखती। मर्द लड़के के गले पर हंसुआ दबाता है और गुस्से में कांखता है, ‘साले, तुझे हलाल करके छोडूंगा।’ और अपने ओठ भींच लेता है। लड़का - जो बिना चीखे, चिल्लाये, रोय उसके घुटनों के बीच दबा है- किसी तरह सांस लेता है, ‘ओह, ऐसे नही, धीरे-धीरे...। और पुलिस दूसरी सुबह नियमानुसार मर्द के साथ अपना फर्ज पूरा करती है।

पानी


पुलिस को खबर दी जाती है कि सात दिनों से भूख निठोहर कुएं में कूद गया है और वह बाहर नहीं आ रहा है। ‘इसमें परेशानी क्या है?’ पुलिस पूछती है। ‘हुजूर, वह मरना चाहता है।’ ‘अगर वह यही चाहता है तो हम क्या कर सकते हैं?’ पुलिस फिर कहती है और समझाती है कि वे उसके लिए मर जाने के बाद ही कुछ कर सकते हैं, इसके पहले नहीं। उन्हें इसके लिए ‘फायर-ब्रिगेड’ दफ्तर को खबर करनी चाहिए। खबर करनेवाले चिन्तित होते हैं और खड़े रहते हैं। ‘साहेब, वह कुएं में मर गया तो हम पानी कहां पियेंगे?’ उनमें से एक आदमी हिम्मत के साथ कहता है। ‘क्यों?’ ‘एक ही कुआं है।’ वह संकोच के साथ धीरे-से कहता है। दूसरा आदमी बात और साफ करता है। ‘उस कुएं को छोड़े पानी के लिए हमें तीन कोस दूर दूसरे गांव जाना पड़ेगा।’ काफी सोच विचार के बाद दो सिपाही कुएं पर आते हैं। वे झांक कर देखते हैं-पानी बहुत नीचे चला गया है और वहां अंधेरा दिखायी पड़ रहा है। पानी की सतह के ऊपर एक किनारे बरोह पकड़े हुए निठोहर बैठा है-नंगा और काला। सिपाही होली का मजा किरकिरा करने के लिए उन्हें गालियां देते हैं और डोर लाने के लिए कहते हैं। डोर लायी जाती है और कुएं में ढील दी जाती है। सिपाही अलग-अलग और एक साथ चिल्लाकर निठोहर से रस्सी पकड़ने के लिए कहते हैं। रस्सी निठोहर के सामने हिलती रहती है और वह चुपचाप बैठा रहता है। सिपाही उसे डांटते हैं, ‘बाहर आना हो तो डोर पकड़ो।’ काफी हो-हल्ला के बाद निठोहर अपनी आंखे डोर के सहारे ऊपर करता है, फिर सिर झुका लेता है। ‘वह डोर क्यों नहीं पकड़ रहा है?’ एक सिपाही बस्ती वालों से पूछता है। बस्ती वाले बताते हैं कि वह डोर पकड़ने के नहीं, मरने के इरादे से अन्दर गया है। वह भूख से तंग आ चुका है। सिपाही मसखरी करते हैं कि क्या वे उनके निठोहर के लिए रोटी हो जायें। सिपाहियों में से एक फिर चिल्लाता है कि अगर वह मरने पर ही आ गया हो तो उसे कोई रोक नहीं सकता लेकिन वह कम-से-कम आज नहीं मर सकता। आज होली है और यह गलत है। ‘हां, वह किसी दूसरे दिन मर सकता है, जब हम न रहें।’ दूसरा सिपाही बोलता है। जवाब में निठोहर के होंठ हिलते हुए मालूम होते हैं, लेकिन आवाज नहीं सुन पड़ती। ‘क्या बोलता है?’ एक सिपाही पूछता है। ‘मुंह चिढ़ा रहा है।’ दूसरा कहता है। ‘नहीं, वह गालियां दे रहा होगा, बड़ा गुस्सैल है।’ दूसरी तरफ से अन्दर झांकता हुआ एक आदमी कहता है। ‘गालियां? खींच लो। तुम सब खींच लो डोरे और साले को मर जाने दो!’ बाहर डोर पकड़े हुए बस्तीवालों पर एक सिपाही चीखता है। बस्तीवालों पर उसकी चीख का कोई असर नहीं पड़ता। ‘जाने दो। गाली ही दे रहा है, गा तो नहीं रहा है।’ उसका साथी फिर मसखरी करता है और ही-ही करके हंसता है। ‘अच्छा, ठीक है, बाहर आने दो।’ सिपाही खुद को शान्त करता है। डोर ऊपर खींच ली जाती है और उसे बाहर निकालने के लिए तरह-तरह के सुझाव आने लगते हैं। तय पाया जाता है कि वह भूखा है और रोटियां देखकर ऊपर आ जायेगा। लेकिन सवाल पैदा होता है कि रोटियां कहां से आयें? अगर रोटियां होती तो वह कुएं में क्यों बैठता? फिर बात इस पर भी आती है कि उसे यहीं से चारा दिखाया जाये। मुलायम और नरम पत्तियां। ‘क्यों, तुम सब उसे पाड़ा समझते हो?’ नाराज सिपाही पूछता है और अपना थल-थल शरीर हंसी से दलकाने लगता है। अंत में तय होता है कि कोई आदमी निकट के बाजार में चला जाये और वहां से कुछ भी ले आये। घंटे बाद पावभर सत्तू आता है। सिपाही पूरी बुद्धि के साथ एक गगरे में सत्तू घोलकर निठोहर के आगे ढील देते हैं। वह गगरे को हाथों में लेकर हिलाता है, उसमें झांकता है, सूंघता है। फिर एक सांस में पी जाता है। खाली गगरा फिर झूलने लगता है और ऊपर हंसी होती है। ‘अच्छा बनाया उसने,’ एक सिपाही कहता है। ‘अब तो वह और भी बाहर नहीं आयेगा।’ बस्ती का एक आदमी उदास होकर कहता है। ‘हां-हां, रुको। घबड़ाओ नहीं।’ थलथल सिपाही अंदर झांकता हुआ हाथ उठाकर चिल्लाता है। दूसरे भी झांकते हैं। निठोहर ने गगरा छिटाकर पानी पर फेंक दिया है और फंदा अपने गले में डाल लिया है। ‘उसने फंदा पकड़ लिया है।’ पहला सिपाही चिल्लाता है। ‘खींचों, मैं कहता हूं, खींचो साले को।’ दूसरा चीखता है और निठोहर खींच लिया जाता है। उसकी उंगलियां फन्दे पर कस गयी हैं। जीभ और आंखे बाहर निकल आयी हैं और टांगे किसी मरे मेंढक-सी तन गयी हैं। सिपाहियों को करतब दिखाने का जरिया मिलता है और बस्ती वालों को पानी।

प्रदर्शनी


खबर फैली है कि इस इलाके में अकाल देखने प्रधानमंत्री आ रही हैं। सरगर्मी बढ़ती है। जंगल के बीच से नमूने के तौर पर 50 कंगाल जुटाये जाते हैं और पन्द्रह दिन तक कैंप में रखकर उन्हें इस मौके के लिए तैयार किया जाता है। स्वागत की तैयारियां शुरू होती हैं। फाटक बनाये जाते हैं। तोरण और बन्दनवार सजाये जाते हैं। ‘स्वागतम्’ और ‘शुभागमनम्’ लटकाये जाते हैं। ‘जयहिन्द’ के लिए दो नेताओं में मतभेद हो जाता है इसलिए यह नहीं लटकाया जाता। गाड़ियां इधर से उधर दौड़ती हैं और उधर से इधर। पुलिस आती है, पत्रकार आते हैं, नेता और अफसर आते हैं। सी.आई.डी की सतर्कता बढ़ती है। अपने क्षेत्रों के विजेता नेता लोगों को समझाते हैं कि यह उनकी आवाज है जो प्रधानमंत्री को यहां घसीट लायी है। इस तरह अगले चुनाव में उनके विजय की भूमिका बनती है। दूसरे क्षेत्रों से आये नेताओं को कोफ्त होती है कि उनका क्षेत्र अकाल से क्यों वंचित रह गया। इस बीच अकाल भी जोर पकड़ लेता है। पेड़ों से बेल, महुवे, करौंदे, कुनरू, के बौर साफ हो चुकते हैं। अब पेड़ नंगे होने लगे हैं। उनकी पत्तियां –भरसक नरम और मुलायम-उठाली जा रही हैं और खायी जा रही हैं। यह सब तब तक चल रहा है, जब तक आगे है। ऐन वक्त पर प्रधानमंत्री आती हैं। वे दस रुपये की साड़ी में सौ वर्ग मील की यात्रा करती हैं। कुछ ही घंटों में इतनी लंबी यात्रा लोगों को सकते में डाल देती है। प्रधानमंत्री खुश रहती हैं क्योंकि लोग भूखे हैं फिर भी उन्हें देखने के लिए सड़कों पर धूप में खड़े हैं। जनता प्रधानमंत्री के प्रति अपने पूरे विश्वास और विनय के साथ अकाल में मर रही है। अंत में, प्रधानमंत्री का दस मिनट तक कार्यक्रम होता है। रामलीला मैदान में कहीं कोई तैयारी नहीं है। क्योंकि बाहर से लाये जाने वाले फल, गजरे, केले के गाछ कंगालों के बीच सुरक्षित नहीं रह सकते। और ऐसे भी यह कार्यक्रम जश्न मनाने के लिए नहीं है।कार्यक्रम से पहले प्रदर्शनी के लिए तैयार किये गये सैंतालीस कंगाल लाये जाते है। पचास में से तीन मर चुके हैं। कैम्प में आने के तरहवें दिन जब उन्हें खाने के लिए रोटियां दी गयीं तो वे पूरी की पूरी निगल गए। और हुआ यह कि रोटी सूखे गले में फंस गयी और वे दिवंगत हो गये। प्रधानमंत्री उनके और सारी भीड़ के आगे अपना कार्यक्रम पेश करती हैं। वे धूप में एक चबूतरे पर आ खड़ी होती हैं। बोलने की कोशिश में ओंठों को कंपाती हैं। आंखों को रूमाल से पोंछती हैं और सिर दूसरी ओर घुमा लेती हैं। रूमाल के एक कोने पर सुर्ख गुलाब कढ़ा है। भीड़ गदगद होती है। इस मौन कार्यक्रम के बाद प्रसन्न चेहरे के साथ प्रधानमंत्री विदा लेती है। नारे लगते हैं। जै-जैकार होता है। और दूसरे शहर के सबसे बड़े होटल में प्रधानमंत्री पत्रकारों के बीच वक्तव्य देती हैं कि ‘हम दृढ़ता, निश्चय और अपने बलबूते पर ही इसका मुकाबला कर सकते हैं। अफसर खुश होते हैं कि दौरा बिना किसी दुर्घटना के सम्पन्न हुआ है। भीड़ पहली बार अपने जीवन में प्रधानमंत्री का दर्शन पाकर छंट जाती है और वे सैंतालीस कंगाल घास और माथों की आंड़ी खाने के लिए जंगल की ओर हांक दिये जाते हैं।

भावी प्रधानमंत्रियों का पोंगा-विलाप

जयप्रकाश त्रिपाठी

प्रधानमंत्री पद के भाजपाई उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी अपनी-अपनी चुनाव सभाओं में मतदाताओं का मन भरमाने के लिए पोंगा विलाप करते डोल रहे हैं। एक जनाब कह रहे हैं, दादी-पिता की तरह उन्हें भी निशाने पर लिया जा सकता है। दूसरे सज्जन अलापते हैं, आशीर्वाद है कि मैं जिंदा हूं। प्रश्न उठता है कि भारतीय कानून व्यवस्था में जब देश के भावी प्रधानमंत्रियों के डर-भय का ये हाल है तो जनता का क्या होगा। लोकतांत्रिक देश है। कहने के लिए सबको समान अधिकार है। पूरी सुरक्षा व्यवस्था कुछ लोगों की रखवाली में है। उस पर अरबों रुपये सालाना खर्च हो रहा है जनता का। जनता के टैक्स पर अधिकारी और नेता मौज उड़ा रहे हैं।
प्रधानमंत्री के लिए ढोंग की भाषा बोलने की बजाय जनता की उन वास्तविक समस्याओं पर बोलने से ये नेता कतरा रहे हैं। इतनी चौकसी लपेटने के बावजूद उन्हें अपनी-अपनी जान का डर है। हैरत है। तो जनता क्या करे। वे क्यों बार-बार रैलियों में अपनी जान की दुहाई दे रहे हैं। जनता की जान क्या खैरियत में हैं। वे महंगाई पर महंगाई लादते हुए जनता की जान लेने पर आमादा हैं। अपराधियों को राजनेता बना कर जनता की बहू-बेटियों की इज्जत-आबरू खतरे में डाले हुए हैं। कानून व्यवस्था हर प्रदेश में हाशिये पर है। दिनदहाड़े लोग मारे जा रहे हैं, लूटे जा रहे हैं। श्रम कानूनों का अपहरण कर करोड़ों मेहनतकशों को मरने के लिए छोड़ दिया है। देश कर्जखोरी में डूबता जा रहा है और स्विस बैंक में वे देसी चोरी का माल तहियाते जा रहे हैं। क्या उन्हें देसी-विदेशी कंपनियों की चाटुकारिता करने के लिए प्यार किया जाए। महंगाई के कोड़े खाने के लिए चुना जाए!
वह किसके लोकतंत्र की हिफाजत के लिए राजधानियों में कुंडली मारना चाहते हैं। लोकपाल विधेयक पर क्यों बाएं-दाएं झांकते हैं! पटेल की गगन चुंबी प्रतिमा किसके पैसे से बनवा रहे हैं। किसके पैसे से दिनरात हवाई यात्राएं कर रहे हैं। आखिर कैसे उनके और अफसरों के लग्गू-भग्गू तक सियासी बाना ओढ़ते ही साल-छह महीने में लखपति-करोड़पति हो जा रहे हैं। दो रुपये में प्याज खरीद कर सौ रुपये में बेचने वाले जमाखोरों को संरक्षण कौन दे रहा है! जनता को सब पता है। हकीकत तो ये है, उसके सामने कोई तीसरा विकल्प नजर नहीं आ रहा है।
इसलिए वे अपनी रैलियों में चाहे जितने सयाने बन लें, जितने तरह के फर्जी विलाप कर लें, चैनल चाहे जितनी बेशर्मी से खलनायक को नायक बनाने का खेल खेल लें, जनता सब देख रही है। सब जान रही है। सच तो ये है कि अपनी अशिक्षा और नादानी के चलते वह इन खद्दरधारी दुरंगों, सरमायेदारों के चौकीदार-जोकरों, लुटेरों-मवालियों के सफेदपोश संरक्षकों, प्याज के जमाखोरों से चुनावी थैलियां खसोटने वाले जेबकतरों, किसी भी समय डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ा देने वाले वणिक-गायकों से तंग आ चुकी है। दीपावली ब्रांडेड हुंकार से नहीं, रोजी से मनेगी। चिथड़ा लपेट कर कैसे मनेगी, उन्हें भी अच्छी तरह पता है।

Thursday, 31 October 2013

एनडीटीवी में भी काफी पक्षपात : राजेंद्र यादव


राजेंद्र यादव के साथ मेरी यह बातचीत वैसे तो वर्ष  2009 में भड़ास4मीडिया में प्रकाशित हुई थी लेकिन आज भी वह बेमुद्दे की नहीं।

-पूंजीवादी मीडिया के खिलाफ आज के दौर में जनता का पक्ष किस तरह सामने आना चाहिए? जैसा कि चुनाव के दिनों में काफी हल्ला रहा, लाखों-करोड़ों रुपये लेकर विज्ञापन को खबरों के रूप में छापने वाला क्या यह 'दलाल' मीडिया है? क्या उसके खिलाफ व्यापक जनाधार वाली मोरचेबंदी जरूरी नहीं होती जा रही है?
-देखिए, एक चीज है, ये सही है कि इस समय मीडिया का वर्चस्व है, खास तौर से दृश्य-मीडिया का। टीवी चैनल्स बिल्कुल छाए हुए हैं। सैकड़ों चैनल हैं और सैकड़ों आ भी रहे हैं। चैनलों की भीड़ में लोगों को समझ में नहीं आएगा कि कौन-सा देखें, कौन-सा नहीं देखें। इस समय सही बात ये है, जैसाकि अखबारों में निकला, हमारे यहां ('हंस' में) भी छपा, टीवी पर दिखा कि जब पैसा लेकर खबर बनाएंगे, दिखाएंगे तो बात बिल्कुल उल्टी हो जाएगी। जिससे जितना पैसा लिया, उसको उतना कवरेज दिया। प्रिंट मीडिया में भी, दृश्य में भी। लोगों ने अपने विरोधियों की खबर दबाने के लिए पैसे दिए। एक तरह से वो चुनाव का दंगल हो गया। सवाल ये है कि ये जो अंधेरगर्दी चल रही है, ये जो धुंआधार हो रहा है, तो अब इसके खिलाफ होना क्या चाहिए? एक तो ये जानिए कि दृश्य मीडिया मुख्य रूप से मध्यम वर्ग का है। वही इसका दर्शक और श्रोता है। तो उनका मीडिया है। यदि कोई अनहोनी हो जाए, तो ये राजेंद्र यादवमध्यवर्गीय लोग कभी भी भीड़ बनाकर टीवी चैनलों के दफ्तरों पर नहीं जाएंगे। ये घरों में रहेंगे, गाली देते रहेंगे और सोते रहेंगे। लेकिन कहते हैं न कि बाजार मजबूर कर देता है। आप अभिशप्त हैं, चीजें खरीदने के लिए। और वो निर्लिप्त हैं बेंचने के लिए।
देखिए कि मीडिया सिर्फ खबरें नहीं बेच रहा है, ये मीडिया सिर्फ मीडिया नहीं है, ये विज्ञापनों के माध्यम से कंज्यूमर्स को हजारों चीजें बेच रहा है। जो हम चाहते नहीं, जिसकी हमे जरूरत नहीं, वह भी हमे खरीदने के लिए ललचाता रहता है। ऐसे में या तो आपके पास एक समानांतर या पैरलल किस्म का मीडिया हो,  जो इसलिए संभव नहीं है कि ऐसे एक-एक मीडिया संस्थान स्थापित करने में सैकड़ो-सैकड़ो करोड़ की पूंजी लग रही है। वह संस्थान, चाहे प्रिंट का हो या दृश्य का। इतना कॉस्टली हो गया है कि जब तक आपके पास दो-तीन सौ करोड़ न हों, आप चैनल चलाने की बात ही नहीं सोच सकते हैं। अखबार तो भी सौ-पचास लाख में चला सकते हैं, लेकिन चैनल नहीं। इतनी पूंजी लगाने के बावजूद आप में क्षमता होनी चाहिए कि दो-तीन साल घाटा भी बर्दाश्त करें।
ऐसी स्थिति में दो ही विकल्प बचते हैं। क्योंकि पैरलल हम चला नहीं सकते। आज मैं जो चैनल देखता हूं, जो मुझे सबसे विश्वसनीय चैनल लगता है, एनडीटीवी है। वहां भी काफी पक्षपात दिखाई देता है। हो सकता है, वह विज्ञापन के रूप में प्रायोजित खबरों का पैसा न लेते हों। आपको शायद याद होगा। दो-तीन साल पहले हमने 'हंस' का एक विशेषांक खबरिया चैनलों पर प्रकाशित किया था। उसके बाद चैनल में काम करने वाले लेखकों की कहानियों पर एक किताब निकाली थी। उन कहानियों से जो सच सामने आया, पहली बार जान पड़ा कि चैनलों के भीतर अद्भुत कहानियां है। चैनलों के भीतर हालात भयानक हैं। कि कैसे एक घटना को बनाया जाता है, और उसको कवर करके उस पर हंगामा क्रिएट किया जाता है। जैसे चैनल्स के रिपोर्टर्स ने एक दूध वाले से कहा कि पहले हम तुम्हारे कपड़ों में आग लगा देंगे। इसके बाद फोटो खींचकर आग बुझा देंगे। आग लगा दी, बुझाया नहीं, उस पर फिल्म बनाने लगे और वह देखते ही देखते जिंदा जल गया। मर गया।
ऐसा पहले अमेरिकी मीडिया कर चुका है। पंद्रह-बीस साल पहले वहां का एक अखबार व्यवसायी था। बाद में उसका बेटा उसके साथ काम करने लगा। अखबार निकालने लगा। उसने नए धंधे का नया तोड़ निकाला। सत्य कथाओं का प्रकाशन। उसका बचपन का एक दोस्त था। उसने दोस्त से कांटेक्ट किया कि वह उसे सच्ची-ताजी अपराध कथाएं बताए, वह उन्हें ही छापेगा। सच्ची घटनाएं छपने लगीं। अखबार की मांग आसमान छूने लगी। फिर उससे कहा कि एक्सक्लूसिव खबरों के लिए तुम अपराध आयोजित करो। हम उनकी फोटो लेंगे, अब सचित्र छापा करेंगे। अब हुआ ये कि वे घटनाएं सबसे पहले उसके अखबार में छपने लगीं। धीरे-धीरे वह इतना पॉवरफुल हो गया कि उसकी तूती बोलने लगी। घटनाएं भी खूब होने लगीं। जो भी घटना होती, सबसे पहले उसके ही अखबार में छप जाती। उसी दौरान वहां किसी राष्ट्राध्यक्ष का प्रोग्राम बना। उसकी एक्सक्लूलिव खबर बनाने के लिए उन्होंने उसकी हत्या की साजिश रची। होता यह था कि उधर घटना होती, इधर पहले से खबर बना ली जाती। राष्ट्राध्यक्ष की हत्या की साजिश सफल नहीं हो सकी लेकिन मर्डर की पहले से तैयार खबर अखबार में छप गई। उसके बाद वह अखबार ऐसा ध्वस्त हुआ कि फिर कभी न उठ सका। जो अपने को सर्वशक्तिमान मान लेता है, किसी समय वह भी इसी तरह ध्वस्त होता है। यही हाल आज भारतीय मीडिया का होता जा रहा है। इनकी आपसी प्रतिद्वंद्विता से सूचनाओं को लेकर जिस तरह की मनमानी बढ़ती जा रही है, यही उनके विनाश का कारण भी बनेगी। ये पूंजीवादी मीडिया बाहरी नहीं, अपने आंतरिक कारणों से कभी बेमौत मरेगा। क्योंकि यह इतना बलवान हो चुका है कि किसी बाहरी मार से नहीं मरेगा। ये अपने ही अंतरविरोधों, आपसी 'युद्ध-प्रतिद्वंद्विता' या अपने बोझ से मरेगा। जैसाकि मार्क्स ने भी कहा है, पूंजीवाद अपनी मौत मरेगा, तो इस वैभवशाली मीडिया पर भी वही बात लागू होती है। तो इस खबरफरोश मीडिया के खिलाफ जनता की ओर से बस यही उम्मीद की जा सकती है। जहां तक इस मीडिया के जनता के साथ खड़े होने की बात है, यह किसी आंदोलन को खड़ा कर सकता है, लेकिन उसके साथ खड़ा नहीं हो सकता। यही इसके बाजार और अस्तित्व का तकाजा है।

-उदय प्रकाश सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करने लगे हैं। उनके खिलाफ लेखकों ने बहिष्कार का ऐलान किया। वह हर तरह की राजनीतिक विचारधारा से अपने को मुक्त घोषित कर रहे हैं? इस पर आपका क्या सोचना है?
जब उदय प्रकाश के खिलाफ लेखकों की सूची जारी की गई थी, मुझसे भी समर्थन मांगा गया था। मैं उस समय तक कुछ जानता नहीं था। मैंने उनसे पूछा था और कहा था कि जब तक कोई बात मैं पूरी तरह न जान लूं, उस पर कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं। मैं पहले पता करूंगा कि आखिर सही बात क्या है?  जो लोग उस सूची में मेरा नाम भी शामिल करना चाहते थे, बाद में उनकी बातों की पुष्टि हो गई।
देखिए, उदय प्रकाश बहुत बेजोड़ साहित्यकार हैं। यदि इस समय हिंदी कथाकारों में कोई एक नाम लेना हो, तो वह हैं उदय प्रकाश। लेकिन जरूरी नहीं है कि व्यक्तिगत रूप से भी वह वैसे ही बेजोड़ हों। वह इस समय 'आत्म-प्रताड़ना' जैसी बीमारी के शिकार हैं। उन्हें लगता है कि उनके खिलाफ सब लोग षड्यंत्र करते हैं, उन्हें सब लोग सताते हैं, उन्हें पुरस्कार नहीं देते, उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार नहीं मिला, उन्हें कोई नौकरी नहीं दे रहा, आदि-आदि। बराबर, चौबीसो घंटे उनकी यही शिकायतें रहती राजेंद्र यादवहैं। ये जो चीजें हैं, हमेशा आत्म-दया, आत्म-करुणा, कुंठा कि सारी दुनिया उनके खिलाफ है, उसका कारण वो ये मानते हैं कि बाकी जो हिंदी वाले लोग हैं, बहुत टुच्चे हैं, अनपढ़ लोग हैं, बेवकूफ हैं और सिर्फ वे (उदय प्रकाश) ही एक महान लेखक हैं। सिर्फ उन्होंने ही अच्छी किताबें लिखी हैं, बाकी सब उल्लू के पट्ठे हैं, उनसे जलते और उनके रास्ते की बाधा हैं। जब वह इस तरह सोचेंगे, इस तरह की बातें करेंगे तो क्या कहा जाए!
गोरखपुर वाले प्रकरण पर एक बार मेरे पास भी उनका फोन आया। छूटते ही उन्होंने मुझसे सवाल किया कि ये सब क्या हो रहा है? मैंने कहा, हो क्या रहा है, जैसा कर रहे हो, वैसा हो रहा है। वे कहने लगे, मेरा वह पारिवारिक मामला था, मेरे भाई की स्मृति में वह कार्यक्रम हुआ था। उनकी बरसी का आयोजन था। मैं उसमें गया था। तो, मैंने उनसे पूछा कि जब वह निजी कार्यक्रम था तो सार्वजनिक तरीके से क्यों आयोजित किया गया। यदि सार्वजनिक तरीके से हुआ तो पर्सनल कैसे रहा? क्या आप जानते नहीं थे कि वह योगी आदित्यनाथ 'वहां का भयंकर हत्यारा, गुंडा, बीजेपी का बदमाश' भी वहां मंच पर बैठा था? और आपने उसके हाथ से पुरस्कार ले लिया, क्यों? क्या यह सब अनजाने में हो गया?  इतने मासूम, इतने दयनीय मत बनो। मैंने उस दिन उदय प्रकाश को बहुत डांटा था। तुम्हारे भीतर एक ऐसी कुंठा है, जो लगता है कि हर आदमी तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करता है। मेरा खयाल है कि तुम खुद अपना कोई रास्ता तलाश लो। मुझे लगता भी है कि वह कोई नया रास्ता तलाश रहे हैं।
वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते हैं। सवाल उठता है कि उदय प्रकाश जैसा प्रबुद्ध लेखक क्या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मतलब नहीं जानता? वह उसका समर्थन कर रहा है तो उसका क्या मतलब है? या तो उसे अवसरवादी कहेंगे या कुछ और। मैं कहना नहीं चाहता, लेकिन गांव का एक बड़ा वैसा मुहावरा है कि 'सबसे सयाना कौवा, सबसे ज्यादा गू खाता है'। पक्षियों में सबसे सयाना। गंदी चीजों पर सबसे ज्यादा चोंच मारता फिरता है, हर जगह।
सुना है कि अब वह अपने समस्त राजनीतिक सरोकार खत्म कर लेने की बातें भी करने लगे हैं....कि किसी राजनीतिक विचारधारा के लिए प्रतिबद्ध नहीं, कि किसी भी तरह की राजनीतिक तानाशाही के खिलाफ हैं, आदि-आदि। तो राजनीतिक विचारधारा और राजनीतिक तानाशाही, दोनों अलग-अलग दो बाते हैं। एक बाहर से है, दूसरी खुद की। लेखक के साथ कोई राजनीतिक तानाशाही न हो, यह एक ठीक बात है, लेकिन लेखक कहे कि मेरी कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है, ये अलग बात हो गई। और ये दोनों परस्पर विरोधी बातें हैं। जब वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते हैं तो क्या वह उनके राजनीतिक विचारों का संकेत नहीं? क्या वह नहीं जानते कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद राजनीतिक बात है, और किस तरह के लोगों की राजनीतिक विचारधारा की बात है?  अगर मैं उदय प्रकाश के बारे में इन बातों को सही मानूं तो मैं उनसे एक बात कहना चाहूंगा कि 'कोई भी नया कपड़ा पहनने से पहले अपने सारे कपड़े उतार कर नंगा होना पड़ेगा'!

-विचारधारा को लेकर एक सवाल आप पर भी बनता है। आपने कहीं कहा है कि विचारधारा नृशंस बनाती है। कैसे?
देखिए, उस बातचीत के दौरान मुझे ऐसा लगा था। अभी भी लगता है। लड़ने के लिए, युद्ध के लिए, और उसके बाद उन विचारों के हिसाब से जो शासन प्रणाली बनती है, तो वह उस राज्य के माध्यम से अपने विचारों को लोगों पर लागू करने की अवांछित कोशिशें ज्यादा करती है। जिन विचारों की दृढ़ता के साथ आप कोई संघर्ष करते हैं, लड़ते हैं, युद्ध करते हैं, युद्ध जीत जाने के बाद जब आप शासन में आएंगे, तो उसी एक-पक्षीय वैचारिक नृशंसता के साथ अपनी शासन प्रणाली चलाना चाहेंगे। जैसे आज माओवादी, जिस साहस, एकता और हिम्मत से लड़ रहे हैं, शासन में आ जाने के बाद वह उसी मजबूती से अपने विचारों को लागू करना चाहेंगे। जहां-जहां इस्लामी शासन प्रणाली आई, वहां भी ऐसा हुआ। उनकी नजर में, उनके विचारों के हिसाब से जो काफिर थे, दमन का शिकार हुए। लेकिन हमारे यहां बात दूसरी है। जब संग्राम होता है तो उसके नायक दूसरे होते हैं, सत्ता में आ जाने के बाद दूसरे। जैसे महात्मा गांधी। जब स्वतंत्रता सेनानी गांधीवादी तरीके से संग्राम जीत कर राजसत्ता में आगे तो गांधी चले गए। हमने जो प्रजातंत्र की शासन प्रणाली अपनाई, वो शब्दशः वैसी नहीं थी, जैसा गांधी जी चाहते, कहते थे। गांधी जी व्यक्ति-केंद्रित थे। वह उस समय की पैदाइश थे, जब सारी चीजें व्यक्ति-केंद्रित होती थीं। अहिंसा तो सिर्फ कहने को उनका राजनीतिक अस्त्र था।

-गांव के प्रश्न 'हंस' से नदारद क्यों रहते हैं? वहां के प्लेटफॉर्म से स्त्री-प्रश्न, दलित-प्रश्न, अश्लीलता के प्रश्न ज्यादा हावी दिखते हैं, जबकि प्रेमचंद की स्मृति-धरोहर होने के नाते भी, 'हंस' को आज के गांवों की दशा पर सबसे ज्यादा तल्ख और मुखर होना चाहिए। यह तटस्थता, गांवों के प्रति यह उदासीनता क्यों?
बात सही है। चूंकि मैं गांव का सिर्फ रहा भर हूं, लेकिन सचेत जीवन शहरी रहा है। सीधे संपर्क नहीं रहा। मेरे संपादक होने के नाते हंस के साथ एक बात यह भी हो सकती है। हालांकि ऐसी कोई बात नहीं कि अपने समय के गांव को रचनाकार के रूप में मैंने महसूस नहीं किया है। पैंतालीस सालों शहर में रह रहा हूं। हंस के साथ सबसे बड़ा कंट्रीब्यूशन भी शहरी मध्यवर्ग का है। अब सवाल उठता है कि हम गांव के बारे में लिखें या गांव के लोग लिखें। यदि गांव से कोई गांव के बारे में लिखे तो बहुत ही अच्छा, लेकिन ऐसा हो कहां रहा है? ऐसा संभव भी नहीं लगता है। प्रेमचंद ने होरी के बारे में लिखा। किसी होरी को पता ही नहीं कि उसके बारे में भी किसी ने कुछ लिखा है। ये तो शहरों में बैठकर हम लोग न उसकी करुणा और दुर्दशा की फिलॉस्पी गढ़ रहे हैं। आज गांवों से कुछ लोग लिख रहे हैं। वे कौन-से लोग हैं? वे, वह लोग हैं, जो गांव में फंसे हैं, किसी मजबूरी या अन्य कारणों से। या कहिए कि जिन्हें शहरों में टिकने की सुविधा नहीं मिल पाई, गांव लौट गए और वहीं रह गए हैं। मजबूरी में वही गांव में रह राजेंद्र यादवकर गांव के बारे में लिख रहे हैं। और ये वे लोग नहीं हैं, जो गांवों में रम गए हैं।
फिर भी, हमारे यहां हंस में आज भी सत्तर फीसदी कहानियां गांव पर होती हैं। मैं अपने को प्रेमचंद, टॉलस्टॉय और गोर्की की परंपरा में मानता हूं। तो मुझे तो रूसी समाज पर लिखना चाहिए। क्यों? या मेरे समय में प्रेमचंद का गांव तो नहीं? मेरे लिए अपने समय के मानवीय संकट ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, वह गांव के हों या शहर के। प्रेमचंद ने गांव पर लिखा। यहां प्रेमचंद के गांव से ज्यादा बड़ी और महत्वपूर्ण होती है 'प्रेमचंद की चिंता' गांव के बारे में। यशपाल ने गांव पर नहीं लिखा, लेकिन मैं उन्हें प्रेमचंद की परंपरा का मानता हूं, क्योंकि उनकी रचना में जो मानवीय संघर्ष, मानवीय स्थितियां परिलक्षित होती हैं, हमे सीधे उसी गांव के सरोकारों तक ले जाती हैं। तो हंस के साथ गांव की बात जोड़कर एक लेखक के विषय को लेकर हम कंफ्यूज कर रहे हैं। आज मेरा समाज वो नहीं है, जो प्रेमचंद का था। मैंने 'प्रेमचंद की विरासत' के नाम से एक किताब भी लिखी है। आज आवागमन दोनों तरफ से है। गांव शहर में बढ़ता जा रहा है, शहर गांव में घुसता जा रहा है।

-'हंस' के संपादक के रूप में आपको वेब मीडिया, ब्लॉगिंग, न्यूज पोर्टल का कैसा भविष्य दिखता है? क्या पूंजीवादी मीडिया के दायरे पर एक बड़ा हस्तक्षेप नहीं है?
नहीं। कोई हस्तक्षेप नहीं। इसका भविष्य तभी मजबूत होगा, जब ये एकजुट हो जाएंगे। तभी हस्तक्षेप संभव हो सकता है। अलग-अलग रहकर नहीं। पैरलल तभी बनेंगे, जब एकजुट होंगे। हजारों-लाखों ब्लॉग, पोर्टल देखना किसी एक के लिए संभव नहीं। न किसी के पास इतना समय है। लेकिन हां, पैरलल हस्तक्षेप बहुत जरूरी है, इसको कामयाब और एकजुट होना ही चाहिए। इस दिशा में कोशिश करनी चाहिए।

Friday, 25 October 2013

पत्रकारिता कल, आज और कल


अंचल ओझा

किसी ने शायद ठीक ही कहा है “जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो” हमने व हमारे अतीत ने इस बात को सच होते भी देखा है। याद किजिए वो दिन जब देष गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब अंग्रेजी हुकूमत के पांव उखाड़ने देष के अलग-अलग क्षेत्रों में जनता को जागरूक करने के लिये एवं ब्रिटिष हुकूमत की असलियत जनता तक पहुंचाने के लिये कई पत्र-पत्रिकाओं व अखबारों ने लोगों को आजादी के समर में कूद पड़ने एवं भारत माता को आजाद कराने के लिए कई तरह से जोष भरे व समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का बाखूबी से निर्वहन भी किया। तब देष के अलग-अलग क्षेत्रों से स्वराज्य, केसरी, काल, पयामे आजादी, युगान्तर, वंदेमातरम, संध्या, प्रताप, भारतमाता, कर्मयोगी, भविष्य, अभ्युदय, चांद जैसे कई ऐसी पत्र-पत्रिकाओं ने सामाजिक सरोकारों के बीच देषभक्ति का पाठ लोगों को पढ़ाया और आजादी की लड़ाई में योगदान देने हेतु हमें जागरूक किया। आज यदि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया की भूमिका पर बात की जाये, तो समाज में मीडिया की भूमिका पर कई तरह के सवाल वर्तमान में उठाये जा सकते हैं, अतीत में इसी मीडिया के पीठ थपथपा सकते हैं, तो भविष्य के लिये एक नई सोच जागृत करने का प्रयत्न कर सकते हैं। जब भी मीडिया और समाज की बात की जाती है तो मीडिया को समाज में जागरूकता पैदा करने वाले एक साधन के रूप में देखा जाता है, जो की लोगों को सही व गलत करने की दिषा में एक प्रेरक का कार्य करता नज़र आता है। वर्तमान परिपेक्ष्य में भय, भूख, भ्रष्टाचार व महंगाई से त्रस्त जनता का “अन्ना हजारे” के आंदोलन को देषभर में व्यापक जन समर्थन मिलना मीडिया के कारण ही संभव हो सका है अर्थात् यह भी कह सकते हैं कि ”जनलोकपाल“ पर लोगों को एकजुट करने में मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है, लेकिन दूसरी ओर इसी का दूसरा पक्ष यह भी है कि भ्रष्टाचार के कई मुद्दों पर मीडिया घरानों की कई प्रमुख हस्तियों के नाम आने के बाद मीडिया की किरकिरी को भी इस जन आंदोलन में मीडिया ने जनता का साथ देकर दबाने का प्रयास किया है। कुल मिलाकर देखा जाये, तो आज के परिपेक्ष्य में मीडिया की स्थिति एक बिचौलिये से कम नहीं है, आज मीडिया केवल और केवल बिचौलिये का कार्य करने में लिप्त है।  जैसे-जैसे विकास एवं आधुनिकता के नये-नये आयाम स्थापित होते जा रहे है, ठीक उसी प्रकार मीडिया की निष्पक्षता तथा समाचार को जनता के बीच प्रसारित करने की तकनीक में भी कई तरह के परिवर्तन एवं उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजमी है। वर्तमान में मीडिया जगत में युवाओं की चमक-दमक काफी बढ़ी है, अब इसे युवक-युवतियां अपने उज्जवल कैरियर के रूप में देखने लगे हैं। चमकता-दमकता कैरियर, नेम-फेम की चाह ने युवाओं को काफी हद तक इस ओर खीचा है, जिससे हजारों युवा पत्रकार बनने की चाह लेकर मीडिया जगत में आ रहे हैं और नित्य नये-नये पत्र-पत्रिकाएँ व न्यूज चैनल भी सामने आ रहे हैं। लेकिन समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर पाने में आज ये काफी पीछे रह गये हैं। आज ये पत्रकार उद्योगपतियों व राजनीतिज्ञांे के आगे घुटने टेके नज़र आते हैं। सामाजिक सरोकारों से इतिश्री करने के साथ ही पैसा कमाने की होड़ में आम जनता का दर्द व उनकी परेषानियां उद्योग घरानों व राजनीतिज्ञों के रूपये के आगे दबकर रह गये हैं। यहीं कारण है कि पत्रकारिता की निष्पक्षता को लेकर पत्रकार खुद जनता के कटघरे में खड़ा है। जिस पेज व समय पर संपादकीय की जरूरत होती है, वहां आज नेताओं, उद्योगपतियों व अन्य रूपये-पैसे वालों के कसीदे पढ़ी जाती हैं। ज्वलंत मुद्दों पर त्वरित टिप्पणी पढ़ने व देखने वाली जनता को अब पेज-3 व नेताओं, उद्योगपतियों के विज्ञापन व साक्षात्कार पढ़कर व देखकर काम चलाना पड़ता है। जिस पेज पर कल तक खोजी पत्रकारों के द्वारा ग्रामीण पृष्ठभूमि की समस्या, ग्रामीणों की राय व गांव की चौपाल प्रमुखता से छापी जाती थी, वहीं आज फिल्मी तरानों की अर्द्धनग्न तस्वीरें नज़र आती हैं। क्योंकि आधुनिकता व वैष्वीकरण के इस दौर में इन पत्र-पत्रिकाओं व नामी-गिरामी न्यूज चैनलों को ग्रामीण परिवेष से लाभ नहीं हो पाता और सरोकार भी नहीं है। इसलिए वे धीरे-धीरे इससे दूर भाग रहे हैं और औद्योगीकरण के इस दौर में पत्रकारिता ने भी सामाजिक सरोकारों को भुलाते हुए उद्योग का रूप ले लिया है। यही कारण है कि देष में बड़े-बड़े भ्रष्टाचार हो जाते हैं और मीडिया कुछ भी कहने से बचती नज़र आती है, क्योंकि भ्रष्टाचार में भी 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में नीरा राडिया, प्रभू चावला व संसद नोट कांड में राज सर देसाई सहित कई अन्य मामलों में उच्च मीडिया घरानों के बरखा दत्त जैसे सक्सियतों के नाम प्रमुखता से आ रहे हैं, जिसके कारण मीडिया ने मौन रूख अपनाते हुए राजनीतिज्ञों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना शुरू कर दिया है और सामाजिक सरोकार व जनजागरूकता नामक जानवर को एक कोने पर रख कर अपनी भलाई समझने की भूल कर रहा है। अपनी शुरूआत के दिनों में पत्रकारिता हमारे देष में एक मिषन के रूप में जन्मी थी। जिसका उद्ेष्य सामाजिक चेतना को और अधिक जागरूक करने का था, तब देष में गणेष शंकर विद्यार्थी जैसे युवाओं की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक आजादी के लिये संघर्षमयी पत्रकारिता को देखा गया, कल के पत्रकारों को न यातनाएं विचलित कर पाती थीं, न धमकियां। आर्थिक कष्टों में भी उनकी कलम कांपती नहीं थी, बल्कि दुगुनी जोष के साथ अंग्रेजों के खिलाफ आग उगलती थी, स्वाधीनता की पृष्ठ भूमि पर संघर्ष करने वाले और देष की आजादी के लिये लोगों मंे अहिंसा का अलख जगाने वाले महात्मा गांधी स्वयं एक अच्छे लेखक व कलमकार थे। महामना मालवीय जी ने भी अपनी कलम से जनता को जगाने का कार्य किया। तब पत्रकारिता के मायने थे देष की आजादी और फिर आजादी के बाद देष की समस्याओं के निराकरण को लेकर अंतिम दम तक संघर्ष करना और कलम की धार को अंतिम दम तक तेज रखना। इसका अंदाजा आज केवल एक उदाहरण सा लगता है:- बात सन् 1907 की है, तब देष भर में “स्वदेषी आंदोलन” चल रहा था, उसी दरम्यान इलाहाबाद से श्री शांति नारायण भटनागर ने अपनी जमीन-जायदाद बेच कर “स्वराज्य” नामक अखबार निकाला और अंग्रेजों के खिलाफ कलम की धार को उग्र किया, उन्हें 3 वर्ष के लिये कैद की सजा तथा जुर्माना ना पटाने पर 6 माह अतिरिक्त सजा मिली। इसके बाद “स्वराज्य” के सम्पादक हुए श्री रामदास (प्रकाषानंद सरस्वती), इनके बाद बाबू रामहरि। इसके बाद तो यह सिलसिला चलता ही रहा एक सम्पादक गिरफ्तार होता तो दूसरा उसकी जगह ले लेता, इसी क्रम में बाबू रामहरि को 21 वर्ष की कैद, मुंषी रामसेवक को अण्डमान में कैद, नन्द गोपाल चोपड़ा को 30वर्ष देष से निर्वासन की सजा, लद्धा राम कपूर ने तीन अंक ही निकाला था कि उन्हें भी 30 वर्ष की कालेपानी की सजा हुई। इसके बाद अमीर चन्द बम्बवाल ने स्वराज्य का प्रकाषन शुरू किया। अमीर चन्द बम्बवाल ने अखबार में विज्ञापन दिया कि “सम्पादक चाहिए, वेतन त्र दो सूखी रोटियां, गिलास भर पानी और हर सम्पादकीय लिखने पर दस वर्ष के कालेपानी की सजा।” इसके बाद भी एक-एक कर आठ सम्पादक और हुए जिन्हें कुल 125 वर्ष कालेपानी की सजा दी गई, लेकिन इसके बावजूद स्वराज्य का प्रकाषन निरंतर जारी रहा और आमजनों में आजादी के जिये जागरूकता का संचार लगातार होता रहा। लेकिन आज के इस दौर में पत्रकारिता कहां पर है और आमजनों को उनकी समस्या का हल कौन देगा यह बताने वाली पत्रकारिता अपने आप से आज यह सवाल पूछ रही है कि मैं कौन हूँ? आज देष आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, लेकिन इससे निपटने के लिये आमजनों को क्या करना चाहिए, सरकार की क्या भूमिका हो सकती है, सहित कई मुद्दों पर मीडिया आज मौन रूख अख्तियार किये हुये है। लेकिन वहीं दूसरी ओर आतंकी गतिविधियों से लेकर नक्सली क्रूरता को लाइव दिखाने में भी यह मीडिया पीछे नहीं है, यहां तक की आज सर्वप्रथम किसी खबर को दिखाने की होड़ में मीडिया के समक्ष आतंकी व नक्सली हमला के तुरंत बाद ही हमला करने वाले कमाण्डर व अन्य आरोपियों के फोन व ई-मेल तक आ जाते हैं। न्यूज चैनलों से लेकर अखबारों में आतंकियों व नक्सलियों के इण्टरब्यू छप जाते हैं। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि बार-बार व प्रतिदिन इस समाचार को दिखाने व छापने से फायदा किसका होता है, आमजनता का, पुलिस का, नक्सली व आतंकी का या फिर मीडिया घरानों का। निष्चित रूप से इसका फायदा मीडिया व इन देषद्रोही तत्वों (आतंकी व नक्सली) को होता है, जिन्हें बिना किसी कारण से बढ़ावा मिलता है, क्यांेकि बार-बार इनको प्रदर्षित करने से आमजनों व बच्चों में संबंधित लोगों के खिलाफ खौफ उत्पन्न हो जाता है और ये असामाजिक तत्व चाहते भी यही हैं। इसलिये आज जरूरी है कि मीडिया और इसको चलाने वाले ठेकेदारों को यह तय करना होगा, कि मीडिया ने सामाजिक सरोकारों को दूर करने में कितनी कामयाबी हासिल की है, यह उन्हें खुद ही देखना व समझना होगा। ऐसा भी नहीं है कि मीडिया ने सामाजिक सरोकारों को एकदम से अलग कर दिया है लेकिन लगातार मीडिया की भूमिका कई मामलों में संदिग्ध सी लगती है। कई विषयों जहां पर उन्हें न्याय दिलाने की जरूरत होती है एवं लोगों को मीडिया से यह अपेक्षा होती है, कि मीडिया के द्वारा उनकी मांगों व समस्याओं पर विषेष ध्यान देते हुए समस्या का समाधान किया जायेगा, ऐसे कई मौकों पर मीडिया की भूमिका से लोगों को काफी असहज सा महसूस होता है। कभी-कभी तो ऐसा भी महसूस किया जाता है कि कुछ मीडिया घराना मात्र किसी एक व्यक्ति, पार्टी व संस्था के लिये ही कार्य कर रही है, अतः मीडिया को एक बार फिर से ठीक उसी तरह निष्पक्ष होना पड़ेगा, जिस तरह की आजादी के पहले व अभी कुछ आंदोलनों में जनता के साथ देखा गया।