Tuesday, 3 February 2015

मेरी पाठशाला-सात : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

कवि एवं पत्रकार मंगलेश डबराल की ये पंक्तियां बार बार पढ़ने का मन करता है -
'' मुझे अपनी कविताओं से भय होता है, जैसे मुझे घर जाते हुए भय होता है।
''अच्छे आदमी बनो - रोज मैं सोचता हूँ। क्या सोच कर अच्छा आदमी हुआ जा सकता है? अच्छा आदमी क्या होता है? कैसा होता है? किसकी तरह?
''यथार्थ! यह संसार का सबसे कठिन शब्द है। करोड़ों जीवन यथार्थ को समझते-समझाते बीत गए। यह तब भी सबसे विकट, गूढ़ और रहस्यमय शब्द है। अतियथार्थ और अयथार्थ भी दरअसल यथार्थ हैं। मानसिक यथार्थ भी भौतिक यथार्थ है। भाषा इसके सामने अपर्याप्त है। क्या 'पेड़' शब्द लिख कर हम पेड़ को पूरी तरह, उसके समूचेपन में व्यक्त कर सकते हैं? इसलिए हर अभिव्यक्ति, हर वर्णन, हर कविता हद से हद यथार्थ को कहने का एक तरीका, एक प्रयत्न है। एक संभव प्रयत्न। इसलिए मेरी कविता अपरिवर्तनशील, अकाट्य, अनश्वर और अंतिम-नहीं है।
''पहले मैं हर चीज की, हर व्यक्ति की प्रशंसा करता था। सोचता था शमशेर की तरह मैं भी चीजों का उजला पहलू ही पहले देखूँगा। पर अब मैं ज्यादातर चीजों की आलोचना और भर्त्सना करने लगा हूँ। मुझे उनका खोट ही सबसे पहले दिखता है।
''यह सभी की समस्या रहती होगी कि हम मनुष्य के रूप में कैसे हैं। मेरा व्यक्तित्व कैसा है? मुझे कैसा होना चाहिए? क्या मुझे खामोश रहना चाहिए या वाचाल? खामोश होता हूँ तो वैसी कविता नहीं लिख सकता जैसी लिखना चाहता हूँ और बातूनी होने पर खराब आदमी होने का भय है। क्या मुझे मुस्कराते रहना चाहिए या उदास बने रहना चाहिए? इसी द्वंद्व में मैं खुश होता हूँ तो उदास दिखता हूँ और उदास होता हूँ तो हास्यास्पद लगता हूँ।
''आप अचानक किसी संकट में फँस गए हैं। आपकी चोट साफ दिखाई दे रही है। काफी खून बहा होगा। कुछ खून अब भी बह रहा है। पीड़ा भी हम समझ सकते हैं। यह चोट इस बात का प्रमाण है कि आदमी अगर समझदार न हो तो उसके साथ इस समाज में क्या होता है। लेकिन चोट आपको लगी क्यों? इसकी कोई वजह साफ नहीं दिखाई देती। बस चोट ही दिखाई देती है। क्या कोई गलती आप से हुई है? आपके जीवन में कोई गड़बड़ है? विचारों में कोई दोष है? कृपया हमें बताएँ? अरे, आप तो चोट ही दिखलाए चले जा रहे हैं। क्या आप उसकी वजह नहीं जानना चाहते? बार-बार चोट दिखाते हैं पर नहीं बताते कारण; अब इस संकट का हम कैसे करें निवारण!
''मैं ऐसे छोटे-छोटे झूठ बोलता हूँ जिनसे दूसरों को कोई नुकसान नहीं होता। लेकिन उनसे मेरा नुकसान जरूर होता है। मसलन, झूठ बोलना ही एक अपने आप में बड़ा नुकसान है।
''जाने क्या है कि धोखा खाने, ठगे जाने में मुझे एक अजब-सा संतोष मिलता है। शायद थोड़ी खुशी भी होती है। कोई चीज खो जाए तो कुछ देर को अच्छा लगता है। बाजार से कोई चीज खरीदता हूँ - मसलन कमीज, जूता, बैग या माचिस - और वह खराब या नकली निकलती है तो एक राहत महसूस होती है। अमेरिका में मैंने एक बड़ा-सा महँगा-सा बैग लिया था जिसका कंधे पर लटकनेवाला फीता घर लौटते-लौटते टूट गया तो मुझे प्रसन्नता हुई कि अमेरिका की चीजें हमारी निगाह में बहुत टिकाऊ मानी जाती हैं पर वे भी जल्दी टूटती हैं। कहीं रास्ता भटक जाता हूँ तो घबराहट जरूर होती है लेकिन यह भी लगता है कि अच्छा है इस रास्ते ने मुझे ठग लिया। यानी यह एहसास कि यह वह नहीं है या था जो वह सचमुच होता या होना चाहिए था। यह 'वह' भी नहीं हैं जो 'वह' की शक्ल में प्राप्त हुआ। वह कुछ और है और उसे पाने की कोशिश में ठगा जाता हूँ। यह ठीक भी है। कोई उधार लिए पैसा लौटाता है तो अचानक लगता है कि मैंने कुछ ठगी कर ली है।''

'पहाड़ पर लालटेन', 'घर का रास्ता', 'हम जो देखते हैं', 'आवाज़ भी एक जगह है', 'रेतघड़ी', 'कवि ने कहा' आदि मंगलेशजी के चर्चित कविता संग्रह हैं। 'लेखक की रोटी', 'कवि का अकेलापन', 'एक बार आयोवा' उनके प्रमुख गद्य संग्रह हैं। उन्हें ओमप्रकाश स्मृति सम्मान, श्रीकान्त वर्मा पुरस्कार, शमशेर सम्मान, पहल सम्मान, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार सम्मान, कुमार विकल स्मृति सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। छठे-छमाही फेसबुक पर भी।

वह कहते हैं - '' इस तरह जोड़कर रख पाता हूं कि सोचता रहता हूं अक्सर पहाड़ के बारे में। मैं खुद को इस तरह देखता हूं कि जैसे पहाड़ से एक पत्थर फिसलता है और जहां तक बहाव होता है वह वहां तक पहुंच जाता है। मैं भी पहाड़ से फिसल कर इसी तरह आ गया मैदान में। मैं भी वही पत्थर हूं जो कि निकला है पहाड़ से और आज भी पहाड़ का ही है। जहां से मैं निकला हूं जरूर आज भी वहां पहाड़ में एक खाली जगह होगी...। मेरे जीवन में काफी संघर्ष रहा है खासकर आजीविका के लिए। मेरी शिक्षा भी अधूरी ही छूट गई थी। यह जो विचारधाराओं के फ्रेम टूटने की बात है, तो हां बाजार के बढ़ते प्रभाव के कारण ऐसा हुआ है और पिछले कई वर्षों से कुछ अमेरिकी चिंतक ये ‘एंड ऑफ आइडियोलॉजी’ वाली बात रट रहे हैं। दरअसल वे लोग सिर्फ आइडियोलॉजी ही नहीं इसे ‘एंड ऑफ हिस्ट्री’ और ‘एंड ऑफ सिविलाइजेशन’ भी कह रहे हैं। उनका कहना है कि आने वाले समय में सिर्फ एक ही सभ्यता बची रहेगी। खासकर सोवियत संघ के पतन के बाद से यह बात और जोर-शोर से कही जाने लगी कि अमेरिका ही सब कुछ है और वही बचा रहेगा। लेकिन अमेरिकी विचारधारा क्या है यह सब जानते हैं कि वह बाजार है।''

मन पर छायी रहने वाली उस कविता 'बची हुई जगहें' की पंक्तियां.......

रोज़ कुछ भूलता कुछ खोता रहता हूँ
चश्मा कहाँ रख दिया है क़लम कहाँ खो गया है
अभी-अभी कहीं पर नीला रंग देखा था वह पता नहीं कहाँ चला गया
चिट्ठियों के जवाब देना क़र्ज़ की किस्तें चुकाना भूल जाता हूँ
दोस्तों को सलाम और विदा कहना याद नहीं रहता
अफ़सोस प्रकट करता हूँ कि मेरे हाथ ऐसे कामों में उलझे रहे
जिनका मेरे दिमाग़ से कोई मेल नहीं था
कभी ऐसा भी हुआ जो कुछ भूला था उसका याद न रहना भूल गया ।

माँ कहती थी उस जगह जाओ
जहाँ आख़िरी बार तुमने उन्हें देखा उतारा या रखा था
अमूमन मुझे वे चीज़ें फिर से मिल जाती थीं और मैं खुश हो उठता
माँ कहती थी चीज़ें जहाँ होती हैं
अपनी एक जगह बना लेती हैं और वह आसानी से मिटती नहीं
माँ अब नही है सिर्फ़ उसकी जगह बची हुई है ।

चीज़ें खो जाती हैं लेकिन जगहें बनी रहती हैं
जीवन भर साथ चलती रहती हैं
हम कहीं और चले जाते हैं अपने घरों लोगों अपने पानी और पेड़ों से दूर
मैं जहाँ से एक पत्थर की तरह खिसक कर चला आया
उस पहाड़ में भी एक छोटी सी जगह बची होगी
इस बीच मेरा शहर एक विशालकाय बांध के पानी में डूब गया
उसके बदले वैसा ही एक और शहर उठा दिया गया
लेकिन मैंने कहा यह वह नहीं है मेरा शहर एक खालीपन है ।

घटनाएँ विलीन हो जाती हैं
लेकिन जहां वे जगहें बनी रहती हैं जहां वे घटित हुई थीं
वे जमा होती जाती हैं साथ-साथ चलतीं हैं
याद दिलाती हुईं कि हम क्या भूल गया हैं और हमने क्या खो दिया है।

Monday, 2 February 2015

मेरी पाठशाला-छह : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं


बोधिसत्व को पढ़ना, जैसे पंक्ति-पंक्ति पर जीवन-जगत की वास्तविक्ताओं और अपने-जैसे अनुभवों से बार-बार गुजरना। उनकी विधा है कविता। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं - दुःख-तन्त्र, सिर्फ कवि नहीं, हम जो नदियों के संगम हैं, खत्‍म नहीं होती बात आदि। वह भारत भूषण अग्रवाल सम्मान, संस्कृति सम्मान, हेमन्त स्मृति सम्मान, गिरिजा कुमार माथुर स्मृति से अभिनंदित हो चुके हैं। वह फेसबुक-मित्र परिवार में भी सक्रिय रहते हैं, जहां अक्सर उनकी कुछ अलग-सी रचनाएं पढ़ने को मिलती रहती हैं। उनकी चर्चित कविताएं हैं - कोई चिह्न नहीं है, ऐसा तो नहीं था, कल की बात, चोर, टैगोर और अंधी औरतें, तिरंगा प्यारा ले लो, बिटिया का कहना, भारत-भारती, मैं खो गया हूं, लालच, हार गए पिता...आदि।

बोधिसत्व की एक सुपठनीय-अविस्मरणीय रचना.... 'हार गए पिता'
-----------------------------------------------------------------
पिता बस कुछ दिन और जीना चाहते थे
वे हर मिलने वाले से कहते कि
बहुत नहीं दो साल तीन साल और मिल जाता बस ।

वे सब से जिंदगी को ऐसे माँगते थे जैसे मिल सकती हो
किराने की दुकान पर बाजार में ।
उनकी यह इच्छा जान गए थे उनके डॉक्टर भी
सब ने पूरी कोशिश की पिता को बचाने की
पर कुछ भी काम नहीं आया ।

माँ ने मनौतियाँ मानी कितनी
मैहर की देवी से लेकर काशी विश्वनाथ तक
सबसे रोती रही वह अपने सुहाग को
ध्रुव तारे की तरह
अटल करने के लिए
पर कहीं उसकी सुनवाई नहीं हुई ।

1997 में
जाड़ों के पहले पिता ने छोड़ी दुनिया
बहन ने बुना था उनके लिए लाल इमली का
पूरी बाँह का स्वेटर
उनके सिरहाने बैठ कर
डालती रही स्वेटर
में फंदा कि शायद
स्वेटर बुनता देख मौत को आए दया,
भाई ने खरीदा था कंबल
पर सब कुछ धरा रह गया
घर पर ......
बाद में ले गए महापात्र सब ढोकर।
पिता ज्यादा नहीं 2001 तक जीना चाहते थे
दो सदियों में जीने की उनकी साध पुजी नहीं
1936 में जन्में पिता जी तो सकते थे 2001 तक
पर देह ने नहीं दिया उनका साथ
डॉक्टर और दवाएँ उन्हें मरने से बचा न सकीं ।

इच्छाएँ कई कई और थीं पिता की
जो पूरी नहीं हुईं
कई कई और सपने थे ....अधूरे....
वे तमाम अधूरे सपनों के साथ भी जीने को तैयार थे
पर नहीं मिले उन्हें दो-तीन साल
हार गए पिता जीत गया काल ।

Sunday, 1 February 2015

मेरी पाठशाला पांच : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

हिंदी अकादमी, दिल्ली और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से सम्मानित, स्वभाव से अत्यंत सहज रूपसिंह चंदेल मेरे जनपद के गांव नौगवाँ से हैं। दिल्ली में मुद्दत पार कर गये। फेसबुक पर भी सक्रिय रहते हैं। rachanasamay.blogspot.in (रचना समय) उनका सुपठनीय हींदी ब्लॉग-संग्रहालय है। अनवरत लेखन-पठन-पाठन में व्यस्त रहते हैं। कहानी, उपन्यास, आलोचना, यात्रा वृत्तांत, संस्मरण, जीवनी, बाल साहित्य उनकी प्रमुख रचना-विधाएं हैं।
उनकी औपन्यासिक कृतिया हैं - पाथरटीला, रमला बहू, नटसार, शहर गवाह, गुलाम बादशाह, रुकेगा नहीं सवेरा, खुदीराम बोस। कहानी संग्रह हैं- पेरिस की दो कब्रें, अजगर तथा अन्य कहानियाँ, आदमखोर तथा अन्य कहानियाँ, हारा हुआ आदमी, चौपालें चुप हैं, एक मसीहा की मौत, आखिरी खत, इक्कीस कहानियाँ, जीनियस, तेरह कहानियाँ, साठ कहानियाँ, भीड़ में, बिठूर के क्रांतिकारी। क्रांतिकारी, खंडित स्वप्न, खतरा, दरिंदे, बैल, वह चुप हैं, वह चेहरा, सड़क की ओर खुलता मकान, सब बकवास, हादसा आदि उनकी चर्चित कहानियाँ हैं।
बाल साहित्य में उन्होंने ऐसे थे शिवाजी, अमर बलिदान, क्रांतिदूत अजीमुल्ला खां, राजा नहीं बनूँगा, होनहार बालक, नन्हा वीर, क्रांतिदूत, जादुई छड़ी, चतुर रबीला, अपना घर, एक था गोलू, देश-विदेश की कहानियाँ, राजा का न्याय आदि की रचना की है।  साहित्य, संवाद और संस्मरण उनका आलोचनात्मक ग्रंथ है। इसके अलावा दक्षिण भारत के पर्यटन स्थल, यादों की लकीरें, दोस्तोएव्स्की के प्रेम, अपराध : समस्या और समाधान आदि उनकी अन्य कृतियां हैं। उन्होंने हाजी मुराद  (उपन्यास : लियो तोलस्तोय), लियो तोलस्तोय का अंतरंग संसार (लियो तोलस्तोय पर उनके रिश्तेदारों, मित्रों, लेखकों, रंगकर्मियों आदि के 30 संस्मरण) आदि का अनुवाद भी किया है।

मेरी पाठशाला चार : जिनको अक्सर पढ़ता रहता हूं

आज-दिन जबकि रात-रात भर नींद नहीं आती, आंखें खुली-खुली, जाने अंधे कमरे के आरपार क्या ढूंढती रहती हैं, तब.....''अच्छे बच्चे, आधा चाँद माँगता है पूरी रात, ईंटें, उसे ले गए, कौवे 1-2, गुजरात 1-2, छह दिसंबर, जूते, तुम वही मन हो कि कोई दूसरे हो, देखता हूँ अँधेरे में अँधेरा, दिमाग खाली पेट में, पानी क्या कर रहा है, पीछे छूटी हुई चीजें, मढ़ी प्राइमरी स्कूल के बच्चे, लालटेनें 1-2, समुद्र पर हो रही है बारिश, साँकल खनकाएगा कौन'', जैसी कविताओं के रचनाकार नरेश सक्सेना को बांचते हुए मन कुछ पल के लिए हल्का हो लेता है कभी-कभार। नागार्जुन, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, दुष्यंत, धूमिल, गोरख पांडेय, मुक्तिबोध, उदय प्रकाश, अदम गोंडवी आदि की तरह नरेश सक्सेना भी मेरे अत्यंत प्रिय कवि हैं।
उनके कविता संग्रह - समुद्र पर हो रही है बारिश, सुनो चारुशीला, नाटक - आदमी का आ के अलावा हर क्षण विदा है, दसवीं दौड़, जौनसार बावर, रसखान, एक हती मनू आदि से साहित्य जगत सुपरिचित है। उन्होंने संबंध, जल से ज्योति, समाधान, नन्हें कदम आदि लघु फिल्मों का निर्देशन भी किया है।
आज से लगभग पांच साल पहले ज्योत्स्ना पाण्डेय के प्रश्न - 'आजकल आप क्या कर रहे हैं?', पर उनका यह उत्तर बार-बार पढ़ लिया करता हूं- 'एक लम्बी कविता है  लड़कियों और नदियों के नामों को लेकर उसे पूरी करने बैठता हूँ तो वह और लम्बी हो जाती है. वैसे मैं छोटी कविताएँ ही लिखता हूँ. अब इसे पूरा करना है बस. इस कविता के साथ ही मेरा नया  कविता  संग्रह भी पूरा हो जाएगा. मेरा एक बहुत पुराना नाटक है प्रेत नवम्बर में उसका शो मुंबई में National Council Of Performing Arts में प्रस्तावित है. उसमें कुछ अतिरिक्त संवाद लिखने मैं मुंबई जा रहा हूँ. इसके अलावा मुक्तिबोध पर एक पुस्तक भी अधूरी है, उसका काम भी पूरा करना है. अपने समय की श्रेष्ठ रचनाओं का चयन करना चाहता हूँ . पिछले वर्ष कथा क्रम  पत्रिका में कविता का स्तम्भ लेखन करता था, जिसमें हर प्रकाशित रचना पर (काव्य चयन ) के साथ मैं अपनी टिप्पणी  भी देता था  उसे भी पुस्तक रूप में छपवाना है. और भी बहुत काम हैं. इच्छाएँ बहुत हैं और साथी कम. फिर भी जितना काम हो सकेगा, करूँगा.' नरेश सक्सेना की कुछ सुपठनीय पंक्तियां, जो हमारे समय को कुछ इस तरह बांचती समझाती हैं -
'' चीजों के गिरने के नियम होते हैं मनुष्यों के गिरने के
कोई नियम नहीं होते
लेकिन चीजें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं
अपने गिरने के बारे में
मनुष्य कर सकते हैं

बचपन से ऐसी नसीहतें मिलती रहीं
कि गिरना हो तो घर में गिरो
बाहर मत गिरो
यानी चिट्ठी में गिरो
लिफाफे में बचे रहो, यानी
आँखों में गिरो
चश्मे में बचे रहो, यानी
शब्दों में बचे रहो
अर्थों में गिरो

यही सोच कर गिरा भीतर
कि औसत कद का मैं
साढ़े पाँच फीट से ज्यादा क्या गिरूँगा
लेकिन कितनी ऊँचाई थी वह
कि गिरना मेरा खत्म ही नहीं हो रहा

चीजों के गिरने की असलियत का पर्दाफाश हुआ
सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के मध्य,
जहाँ, पीसा की टेढ़ी मीनार की आखिरी सीढ़ी
चढ़ता है गैलीलियो, और चिल्ला कर कहता है -
'इटली के लोगो,
अरस्तू का कथन है कि, भारी चीजें तेजी से गिरती हैं
और हल्की चीजें धीरे धीरे
लेकिन अभी आप अरस्तू के इस सिद्धांत को
गिरता हुआ देखेंगे
गिरते हुए देखेंगे, लोहे के भारी गोलों
और चिड़ियों के हल्के पंखों, और कागजों और
कपड़ों की कतरनों को
एक साथ, एक गति से, एक दिशा में
गिरते हुए देखेंगे
लेकिन सावधान
हमें इन्हें हवा के हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा,'
और फिर ऐसा उसने कर दिखाया

चार सौ बरस बाद
किसी को कुतुबमीनार से चिल्ला कर कहने की जरूरत नहीं है
कि कैसी है आज की हवा और कैसा इसका हस्तक्षेप
कि चीजों के गिरने के नियम
मनुष्यों के गिरने पर लागू हो गए है

और लोग
हर कद और हर वजन के लोग
खाये पिये और अघाये लोग
हम लोग और तुम लोग
एक साथ
एक गति से
एक ही दिशा में गिरते नजर आ रहे हैं

इसीलिए कहता हूँ कि गौर से देखो, अपने चारों तरफ
चीजों का गिरना
और गिरो

गिरो जैसे गिरती है बर्फ
ऊँची चोटियों पर
जहाँ से फूटती हैं मीठे पानी की नदियाँ

गिरो प्यासे हलक में एक घूँट जल की तरह
रीते पात्र में पानी की तरह गिरो
उसे भरे जाने के संगीत से भरते हुए

गिरो आँसू की एक बूँद की तरह
किसी के दुख में
गेंद की तरह गिरो
खेलते बच्चों के बीच

गिरो पतझर की पहली पत्ती की तरह
एक कोंपल के लिए जगह खाली करते हुए
गाते हुए ऋतुओं का गीत
'कि जहाँ पत्तियाँ नहीं झरतीं
वहाँ वसंत नहीं आता'

गिरो पहली ईंट की तरह नींव में
किसी का घर बनाते हुए
गिरो जलप्रपात की तरह
टरबाइन के पंखे घुमाते हुए
अँधेरे पर रोशनी की तरह गिरो

गिरो गीली हवाओं पर धूप की तरह
इंद्रधनुष रचते हुए

लेकिन रुको
आज तक सिर्फ इंद्रधनुष ही रचे गए हैं
उसका कोई तीर नहीं रचा गया
तो गिरो, उससे छूटे तीर की तरह
बंजर जमीन को
वनस्पतियों और फूलों से रंगीन बनाते हुए
बारिश की तरह गिरो, सूखी धरती पर
पके हुए फल की तरह
धरती को अपने बीज सौंपते हुए
गिरो
गिर गए बाल
दाँत गिर गए
गिर गई नजर और
स्मृतियों के खोखल से गिरते चले जा रहे हैं
नाम, तारीखें, और शहर और चेहरे...
और रक्तचाप गिर रहा है
तापमान गिर रहा है
गिर रही है खून में निकदार होमो ग्लोबीन की

खड़े क्या हो बिजूके से नरेश
इससे पहले कि गिर जाए समूचा वजूद
एकबारगी
तय करो अपना गिरना
अपने गिरने की सही वजह और वक्त
और गिरो किसी दुश्मन पर

गाज की तरह गिरो
उल्कापात की तरह गिरो
वज्रपात की तरह गिरो
मैं कहता हूँ
गिरो  । ''

मेरी पाठशाला तीन : जिनको अक्सर पढ़ता रहता हूं

''रोज़ सुबह, मुँह-अंधेरे दूध बिलोने से पहले,
मां चक्की पीसती, और मैं घुमेड़े में आराम से सोता...''
रमेश शर्मा उर्फ दिविक रमेश, हिंदी साहित्य जगत का खूब जाना-पहचाना नाम। कवि, बाल-साहित्यकार, आलोचक, नाटककार, संपादक।
उनकी कृतियाँ अनेक, जैसेकि कविता संग्रह : गेहूँ घर आया है, खुली आँखों में आकाश, रास्ते के बीच, छोटा-सा हस्तक्षेप, हल्दी-चावल और अन्य कविताएँ, बाँचो लिखी इबारत, वह भी आदमी तो होता है, फूल तब भी खिला होता, काव्य नाटक : खण्ड-खण्ड अग्नि, बाल साहित्य : 101 बाल कविताएँ, समझदार हाथी : समझदार चींटी (136  कविताएँ), हँसे जानवर हो हो हो, कबूतरों की रेल, बोलती डिबिया, देशभक्त डाकू, बादलों के दरवाजे, शेर की पीठ पर, ओह पापा, गोपाल भांड के किस्से, त से तेनालीराम, ब से बीरबल, बल्लूहाथी का बालघर (बाल-नाटक), आलोचना : नए कवियों के काव्य-शिल्प सिद्धांत, संवाद भी विवाद भी, कविता के बीच से, साक्षात त्रिलोचन और संपादन : निषेध के बाद, हिन्दी कहानी का समकालीन परिवेश, बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, आंसांबल, दिशाबोध, दूसरा दिविक।
फेसबुक पर भी कभी-कभार। अति संक्षिप्त। हिंदी साहित्य संस्थान उत्तर प्रदेश से हाल ही में सम्मानित। उससे पूर्व; गिरिजाकुमार माथुर स्मृति पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, दिल्ली हिंदी अकादमी का साहित्यिक कृति पुरस्कार, साहित्यकार सम्मान बाल तथा साहित्य पुरस्कार,  एन.सी.ई.आर.टी. का राष्ट्रीय बाल साहित्य पुरस्कार, बालकनजी बारी इंटरनेशनल का राष्ट्रीय नेहरू बाल साहित्य अवार्ड, इंडो-रशियन लिटरेरी क्लब, नई दिल्ली का सम्मान, अनुवाद के लिए भारतीय अनुवाद परिषद, दिल्ली का द्विवागीश पुरस्कार, श्रीमती रतन शर्मा बाल-साहित्य पुरस्कार।
दिविक जी की कुछ यादगार पंक्तियां 'मां' को याद करते हुए.........
चाहता था आ बसे माँ भी यहाँ, इस शहर में।
पर माँ चाहती थी आए गाँव भी थोड़ा साथ में
जो न शहर को मंजूर था न मुझे ही।
न आ सका गाँव, न आ सकी माँ ही शहर में।
और गाँव मैं क्या करता जाकर!
पर देखता हूँ कुछ गाँव तो आज भी जरूर है
देह के किसी भीतरी भाग में
इधर उधर छिटका, थोड़ा थोड़ा चिपका।
माँ आती बिना किए घोषणा तो थोड़ा बहुत ही सही
गाँव तो आता ही न शहर में।
पर कैसे आता वह खुला खुला दालान, आँगन
जहाँ बैठ चारपाई पर माँ बतियाती है
भीत के उस ओर खड़ी चाची से, बहुओं से।
करवाती है मालिश पड़ोस की रामवती से।
सुस्ता लेती हैं जहाँ धूप का सबसे खूबसूरत रूप ओढ़कर
किसी लोक गीत की ओट में।
आने को तो कहाँ आ पाती हैं
वे चर्चाएँ भी जिनमें आज भी मौजूद हैं
खेत, पैर, कुएँ और धान्ने।
बावजूद कट जाने के कॉलोनियाँ खड़ी हैं
जो कतार में अगले चुनाव की नियमित होने को।
और वे तमाम पेड़ भी जिनके पास आज भी इतिहास है
अपनी छायाओं के।

Saturday, 31 January 2015

मेरी पाठशाला दो : जिनको अक्सर पढ़ता रहता हूं


 
मँजी हुई शर्म का जनतंत्र, आलोचना : साहित्य, समाज और जनतंत्र, बाजारवाद और जनतंत्र, आजादी और राष्ट्रीयता का मतलब, छूटे हुए क्षण, बुधराम, नवोन्मेष की चुनौती के सामने हिंदी समाज और साहित्य आदि के सुपरिचित कवि-आलोचक प्रफुल्ल कोलख्यान के शब्दों में हाशिये का वंचित जनजीवन धड़कता है। वह तो इसे पूरी साफगोई और बेबाकी से स्वीकारते भी हैं कि 'जी हाँ, मैं लिखता हूँ... दुख पर काबू पाने के लिए। मेरा जन्म न तो महानता की किसी चोटी पर हुआ और न विकास ही किसी महर्षि के अशीर्वाद के कोमल, सुरक्षित, हितकारी प्रकाशवलय की दिव्य परिधि में हुआ। दुख यह नहीं है कि आज भी जिधर अन्याय है, उधर ही शक्ति है; बल्कि यह है कि जहाँ शक्ति है वहीं अन्याय है। दुख है कि जीवन शक्ति के बिना चल नहीं सकता और अन्याय को झेल नहीं पाता। दुख है कि आज भी अंधेरे में ब्रह्मराक्षस दनदनाता हुआ अपने विकास की सीढ़ियाँ चढ़ रहा है।' प्रफुल्ल कोलख्यान फेसबुक पर भी सक्रिय रहते हैं। उनका हिंदी ब्लॉग भी है - prafullakolkhyan.blogspot.in. तरह तरह की सुपठनीय टिप्पणियों और साहित्यिकी से भरा-पूरा। उनकी कुछ पंक्तियां-
सूरज चाँद तारे हैं बुझा-बुझा-सा आसमान क्यों है?
फसलें लहराई बहुत फिर! उदास खलिहान क्यों है?
भूख, अ-भाव से इतनी गहरी हमारी पहचान क्यों है?
आदमी का मन, मन का कोना अब सुसान क्यों है?
कहा, सुना तो बहुत पर बेमानी हर बयान क्यों है!
देवता मुस्कुरा रहे, पूजा का फूल लहुलुहान क्यों है?
यह कौन-सी हवा, आदमी से सभी परेशान क्यों है!

मेरी पाठशाला एक : जिनको पढ़ता रहता हूं

एक है दुनिया रंग-विरंगी, द्वारिका प्रसाद अग्रवाल की। जैसा लिखते हैं, बोल-चाल में भी उतने ही स्वादिष्ट। फेसबुक पर तो प्रतिदिन रहते ही हैं, उनका एक सुपठनीय ब्लॉग भी है - atmkatha3.blogspot.in, जिसे अक्सर पढ़ता रहता हूं, भले अपनी कोई टिप्पणी करूं-न-करूं। इन दिनो वह 'प्यारी दुल्हनियाँ चली' की कड़ियां बुन रहे हैं। उससे पहले चार कड़ियों वाली श्रृंखला ('ये क्या हुआ') 'स्वस्थ होने की कीमत बीमार होने पर ही समझ में आती है' वाक्य से प्रारंभ कर, 'सब जानते हैं कि यदि जेब भरी हो तो 'सब सम्भव हो जाता..' पर पूरी पठनीयता के साथ सम्पन्न कर चुके हैं। उससे पूर्व वर्ष 2014 से प्रारंभ 'ये जीवन है' की पांच कड़ियां वर्ष 2015 में पांचवें सोपान तक आ गयीं। ... लेकिन 'समझो इशारे' के वे चोखे-चौपदे पढ़ने की बात ही कुछ और थी। उनकी रचनाओं के प्रिय पाठक अमित कुमार नेमा लिखते हैं- आपको पढ़ना हमेशा ही रोचक होता है, इसलिए मैं भी उनको अक्सर पढ़ता रहता हूं। फोटो : बनारस में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ  के ज्येष्ठ पुत्र नय्यर हुसैन खां के साथ उनका एक चित्र, और दूसरे चित्र में अपनी धर्मपत्नी माधुरीजी के साथ।
(क्रमशः)