Saturday, 6 December 2014

क्या 16 मई के बाद मीडिया बदल गया? / पुण्यप्रसून बाजपेयी

16 मई 2014 की तारीख के बाद क्या भारतीय मीडिया पूंजी और खौफ तले दफ्न हो गया। यह सवाल सीधा है लेकिन इसका जवाब किश्तों में है। मसलन कांग्रेस की एकाकी सत्ता के तीस बरस बाद जैसे ही नरेन्द्र मोदी की एकाकी सत्ता जनादेश से निकली वैसे ही मीडिया हतप्रभ हो गया। क्योंकि तीस बरस के दौर में दिल्ली में सडा गला लोकतंत्र था। जो वोट पाने के बाद सत्ता में बने रहने के लिये बिना रीढ़ के होने और दिखने को ही सफल करार देता था। इस लोकतंत्र ने किसी को आरक्षण की सुविधा दिया। इस लोकतंत्र ने किसी में हिन्दुत्व का राग जगाया । इस लोकतंत्र में कोई तबका सत्ता का पसंदीदा हो गया तो किसी ने पसंदीदा तबके की आजादी पर ही सवालिया निशान लगाया। इसी लोकतंत्र ने कारपोरेट को लूट के हर हथियार दे दिये। इसी लोकतंत्र ने मीडिया को भी दलाल बना दिया। पूंजी और मुनाफा इसी लोकतंत्र की सबसे पसंदीदा तालिम हो गयी। इसी लोकतंत्र में पीने के पानी से लेकर पढ़ाई और इलाज से लेकर नौकरी तक से जनता द्वारा चुनी हुई सरकारों ने पल्ला झाड़ लिया। इसी लोकतंत्र ने नागरिकों को नागरिक से उपभोक्ता बने तबके के सामने गुलाम बना दिया।
इस लोकतंत्र पर पत्रकारों की कलम भी चली और कलम भी बिकी। पत्रकारिता मीडिया घरानों में बदली। मीडिया घराने ताकतवर हुये तो झटके में सत्ता साधने की राजनीति और कारपोरेट के मुनाफे के बीच पत्रकारिता झूली भी और हमला करने से भी नहीं चूकी। लगा मीडिया धारदार हो रही है क्योंकि संसदीय सत्ता अपने अंतर्रविरोध में इतनी खो गयी कि घोटाले और राजस्व की लूट देश का सिस्टम बन गया। सरकारी नीतिया लूटने के रास्ते खोलने के लिये बनने लगी। हर संस्थान ने लूटा। भागेदारी मीडिया में भी हुई। कामनवेल्थ गेम्स से लेकर 2 जी स्पेक्ट्रम और बेल्लारी से झारखंड तक में खनन संपदा की लूट से लेकर कोयला खानों के बंदरबाट का खुला खेल पॉलिसी के तहत खेला गया जिसमें मीडिया संस्थानों की भागेदारी भी सामने आयी। लेकिन पत्रकारिता ने इन मुद्दों को उठाया भी और भ्रष्ट होती सियासत को आईना भी दिखाया। और तो और कमजोर होती राजनीतिक सत्ता को कारपोरेट ने गवर्नेंस का पाठ भी पढ़ाने का खुला प्रयास 2011-12 के दौर में देश के पीएम मनमोहन सिंह को चार बार पत्र लिखकर किया । ऐसे मोड़ पर लोकसभा चुनाव के जनादेश ने उस मीडिया को सकते में ला दिया जिसके सामने बीते तीस बरस के संसदीय राजनीतिक सत्ता के अंतर्विरोध में काफी कुछ पाना था और काफी कुछ गंवाना भी था। क्योंकि इस दौर में कई पत्रकार मीडिया घरानो में हिस्सेदार बन गये और मीडिया घरानों के कई हिस्सेदार पत्रकार बन गये। ध्यान दें तो मीडिया का विकास जिस तेजी से तकनीकी माध्यमों को जरिये इस दौर में होता चला गया उसके सामने वह सियासी राजनीति भी छोटी पड़ने लगी जो आम लोगों के एक एक वोट से सत्ता पाती । क्योंकि झटके में वोट की ताकत को डिगाने के लिये मीडिया एक ऐसे दोधारी हथियार के तौर पर उभरा जिसमें सत्ता दिलाना और सत्ता से बेदखल कराने की भूमिका निभाना सौदेबाजी का सियासी खेल बना दिया गया। तो दाग दोनों जगह लगे। राजनेता दागदार दिखे। मीडिया घराने मुनाफा कमाने के धंधेबाज दिखे । नेता के लिये वोट डालने वाले वोटर हो या मीडिया के पाठक या व्यूवर। इस सच को जाना समझा सभी ने। लेकिन विकल्प की खोज की ताकत ना तो मीडिया या कहे पत्रकारों के पास रही ना ईमानदार नेताओ के पास। ऐसे में १६ मई के जनादेश से पहले चुनावी बिसात पर मीडिया वजीर से कैसे प्यादा बना यह प्रचार के चुनावी तंत्र में पैसे के खेल ने आसानी से बता दिया। लेकिन यह खेल तो चुनावी राजनीति में हमेशा खेला जाता रहा है। हर बार की तरह 2014 में भी यही खेल खेला जा रहा है माना यही गया।
लेकिन यह किसी को समझ नहीं आया कि जो पूंजी चुनावी राजनीति के जरीये लोकतंत्र के चौथे खम्भे को कुंद कर सकती है। जो पूंजी हर सत्ता या संस्थानों के सामने विकल्प बनाने के लिये बेहतरीन हथियार बन सकती है वही पूंजी लोकतंत्र जनादेश के साथ खड़े होकर लोकतंत्र को अपनी जरुरत के हिसाब से क्यों नहीं चला सकती। दरअसल 16 मई के जनादेश के बाद पहली बार मीडिया का वह अंतर्रविरोध खुल कर सामने आया जिसने राजनीति के अंतर्विरोध को छुपा दिया। यानी सियासी राजनीति के जिस खेल में देश की सत्ता बीते 30 बरस में भ्रष्ट होती चली गयी और मीडिया ने अपने अंतर्विरोध छुपा कर राजनीति के अंतर्विरोध को ही उभारा। वही राजनीति जब जनादेश के साथ सत्ता में आयी तो संकट मीडिया के सामने आया कि अब सत्ताधारियों की गुलामी कर अपनी साख बनाये या सत्ताधारियों पर निगरानी रख अपनी रिपोर्टों से जनता को समझाये कि राजनीतिक सत्ता ही सबकुछ नहीं होती है। लेकिन इसके लिये पत्रकारीय ताकत का होना जरुरी है और पत्रकारिता ही जब मीडिया घरानो की चौखट पर सत्ताधारियों के लिये पायदान में बदल जाये तो रास्ता जायेगा किधर। यानी पत्रकारीय पायदान की जरुर मीडिया घरानों को सत्ता के लिये पडी तो सत्ता को पत्रकारीय पायदान की जरुरत अपनी अंखड सत्ता को दिखाने-बताने या प्रचार के लिये पड़ी। इस पत्रकारीय पायदान की जरुरत ने इसकी कीमत भी बढ़ा दी। और सत्ता से निकट जाने के लिये पायदान पर कब्जा करने की मुहिम कारपोरेट कल्चर का हिस्सा बनने लगी। इसीलिये 16 मई के जनादेश ने हर उस परिभाषा को बदला जो बीते 30
बरस के दौर में गढ़ी गई। पत्राकरीय स्वतंत्रता का पैमाना बदला । मीडिया घराने चलाने के लिये पूंजी बनाने के तरीके बदले। सत्ता और मीडिया के बीच पाठक या व्यूवर की सोच को बदला। झटके में उस तबके का गुस्सा मीडिया का साथ छोड सत्ता के साथ जा खड़ा हुआ जो बीते ३० बरस से नैतिकता का पाठ मीडिया से पढ़ रहा ता लेकिन मीडिया को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के लिये उसके पास कोई हथियार नहीं था। ऐसे में जिस तरह 16 मई के जनादेश ने राजनीतिक सत्ता के उस दाग को छुपा दिया जो भ्रष्ट और आपराधिक होती राजनीति को लेकर देश का सच बन चुका है। उसी तरह गैर जिम्मेदाराना पत्रकारिता और सोशल मीडिया की जिम्मेदारी विहिन पत्रकारिता का दाग भी स्वतंत्र अभिव्यक्ति तले दब गया। तीन बड़े बदलाव खुकर सामने आये। पहला जनादेश के सामने कोई तर्क मायने नहीं रखता है। दूसरा राजनीतिक सत्ता की ताकत के आगे लोकतंत्र का हर पाया विकलांग है। और तीसरा विचारधारा से ज्यादा महत्वपूर्ण गवर्नेंस है। यानी जो पत्रकारिता लगातार विकल्प की तलाश में वैचारिक तौर पर देश को खड़ा करने के हालात पैदा करती है उसे खुद सियासी सत्ता की लड़ाई लडनी होगी बिना इसके कोई रास्ता देश में नहीं है।
यह हालात कितने खतरनाक हो सकते हैं, इसका अंदाजा 16 मई के बाद सत्ता में आयी बीजेपी के नये अध्यक्ष बने अमित शाह के इस अंदाज से समझा जा सकता है कि जब महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबंधन बचेगा या नहीं इसके कयास लगाये जा रहे थे तब आरएसएस के शिवसेना के साथ गठबंधन बनाये रखने की खबर से अपनी सियासी सौदेबाजी का दांव कमजोर पड़ने पर बीजेपी अध्यक्ष खबर देने वाले रिपोर्टर को फोन पर यह धमकी देने से नहीं चूकते हैं कि यह खबर वापस ले लो या फिर इसका अगले दिन इसके लिये भुगतने को तैयार हो जाओ। इतना ही नहीं खबर को राजनीति का हिस्सा बताकर राजनीति के मैदान में आकर हाथ आजमाने का सुझाव भी दिया जाता है। यानी धमकी तो पत्रकारों को मिलती रही है लेकिन कारपोरेट की छांव में मीडिया और पत्रकारिता को पायदान बनाने के बाद राजनीतिक सत्ता का पहला संदेश यही है कि चुनाव जीतकर सत्ता में आ जाओ तो ही आपकी बात सही है। तो क्या 16 मई के बाद देश की हवा में यहसे बड़ा परिवर्तन यह भी आ गया है कि ढहते हुये सस्थानों को खड़ा करने की जगह मरता हुआ बता कर उसे विकल्प करार दिया जा सकता है। यहां कोई भी यह सवाल खड़ा कर सकता है कि मीडिया को दबाकर सियासत कैसे हो सकती है। लेकिन समझना यह भी होगा कि पहली बार मीडिया को दबाने या ना दबाने से आगे की बहस हो रही है। सीबीआई, सीवीसी, कैग, चुनाव आयोग, जजों की नियुक्ति सरीखे दर्जेनों संस्थान है जिनके दामन पर दाग 16 मई से पहले चुनाव प्रचार के दौर में बार बार लगाया गया। मीडिया भी दागदार है यह आवाज भी मीडिया ट्रेडर के तौर उठायी गयी। यानी जिस राजनीति के भ्रष्ट और आपराधिक होने तक का जिक्र १९९२-९३ में वोहरा कमेटी की रिपोर्ट में किया गया और संसद के भीतर पहुंचने वाले दागदारों की कतार में कोई कमी १६ मई  २०१४ के जनादेश के बाद भी नहीं आयी उस राजनीतिक सत्ता की चौखट पर इस दौर में हर संस्था बेमानी करार दे दी गयी। तो सवाल कई हैं।
पहला लोकतंत्र का मतलब अब चुनाव जीत कर साबित करना हो चला है कि वह ठीक है। यानी पत्रकार, वकील, टीचर, समाजसेवी या कोई भी जो चुनाव लडना नहीं चाहता है और अपने नजरिये से अपनी बात कहता है, उसका कोई मतलब नहीं है क्योंकि सत्ता के पास बहुमत का जनादेश है । दूसरा, संवैधानिक सत्ता के लिये बहुमत का मतलब जब कइयों के संघर्ष में जीतना भर है तो बाकि विरोध करने वाले चाहे अलग अलग हो लेकिन वह संख्याबल में ज्यादा हो तो फिर उनका कोई हक नहीं बनता है। यह सवाल राजनीतिक सत्ता के संघर्ष को लेकर भी है जहा सत्ताधारी को इस बार 31 फीसदी वोट मिले है और यह सवाल पत्रकारों को लेकर भी है जो पत्रकारिता तो करते हैं और उनकी तादाद भी मीडिया हाउस में काम करने वालों से ज्यादा है लेकिन वह उनकी पत्राकरिता को कोई महत्व नहीं दिया जायेगा और उन्हें भी उसी कटघरे में खड़ा किया जायेगा, जहां पत्रकार पायदान बना दिया जा रहा है। और इसके सामानांतर तकनीकी विकास को ही विकल्प बनाने का प्रयास होगा चाहे देश की भौगोलिक, सामाजिक-आर्थिक स्थिति उसके अनुकुल ना हो। यानी मौसम बिगड़े । रोजगार ना मिले । चंद हथेलियो पर ही सारा मुनाफा सिमटे । समाज में खाई और ज्यादा बढ़े। विकास की तकनीकि धारा गांव को खत्म कर दे। विकास के नाम पर उपभोक्ताओं का समूह बनाये रखने या उसे बढ़ाने पर जोर हो। और यह सब होते हुये, देखते हुये पत्रकारिता सरकारो का गुणगान करें और इसे सकारात्मक पत्रकारिता मान लिया जाये। तो फिर 16 मई से पहले और 16 मई के बाद पत्रकारिता कैसे और कितनी बदली है इसका एहसास भी कहां होगा।
बरस भर पहले राष्ट्रपति की मौजूदगी में राष्ट्रपति भवन में ही एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल ने अपने पच्चीसवें जन्मदिन को मना लिया। वहीं हर तरह के कद्दावर तबके को आमंत्रित कर लिया। तब कहा गया कि मनमोहन सिंह का दौर है कुछ भी हो सकता है। एक बरस बाद एक न्यूज चैनल ने अपने एक कार्यक्रम के 21 बरस पूरे होने का जश्न मनाया तो उसमें राष्ट्रपति समेत प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट के अलावे नौकरशाहों, कारपोरेट, बालीवुड से लेकर हर तबके के सत्ताधारी पहुंचे। लगा यही कि मीडिया ताकतवर है। लेकिन यह मोदी का दौर है तो हर किसी को दशक भर पहले वाजपेयी का दौर भी याद आ गया । दशक भर पहले लखनऊ के सहारा शहर में कुछ इसी तरह हर क्षेत्र के सबसे कद्दावर लोग पहुंचे और तो और साथ ही तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी समेत पूरा मंत्रिमंडल ही नहीं बल्कि संसद के भीतर एक दूसरे के खिलाफ तलवारे भांजने वाला विपक्ष भी सहारा शहर पहुंचा था। और इसी तर्ज पर संसद के भीतर मोदी सरकार को घेरने वाले कांग्रेसी भी दिल्ली के मीडिया समारोह में पहुंचे।
सवाल हो सकता है कि मीडिया को ताकत सत्ता के साथ खडे होकर मिलती है या फिर सत्ता को ताकत मीडिया का साथ खड़ेहोने से मिलती है। या फिर एक दूसरे की साख बनाये रखने के लिये क्रोनी कैपिटलिज्म का यह अद्भूत नजारा समाज में ताकतवर होते मीडिया की अनकही कहानी को कहता है। हो जो भी लेकिन मीडिया को बार बार अपने तरीके से परिभाषित करने की जद्दोजहद सत्ता भी करती है और सत्ता बनने की चाहत में मीडिया भी सरोकार की भाषा को नये तरीके से परिभाषित करने में रम जाता है । इस मुकाम पर विचारधारा के आसरे राजनीति या आम -जन को लेकर पत्रकारिता या फिर न्यूनतम की लड़ाई लडते देश को चकाचौंध के दायरे में समेटने की चाहत ही मीडिया को कैसे बदलती है यह 16 मई के जनादेश के बाद खुलकर सामने आने भी लगा है। जाहिर है ऐसे में मीडिया की भूमिका बदलने से कही आगे नये तरीके से परिभाषित करने की दिशा में बढ़ेगी और ध्यान दें तो 16 मई के जनादेश के बाद कुछ ऐसे ही हालात हो चले हैं। 16 मई के जनादेश ने मीडिया के उस तबके को दरकिनार कर दिया जो राजनीति को विचारधारा तले परखते थे। पहली बार जनादेश के आइने में मीडिया की समूची रिपोर्टिंग ही पलटी और यह सीख भी देने लगी कि विचारधारा से आगे की जरुरत गवर्नेंस की है, जो मनमोहन सरकार के दौर में ठप थी और जनादेश ने उसी गवर्नेंस में रफ्तार देखने के लिये नरेन्द्र मोदी के पक्ष में जनादेश दिया। यह जनादेश बीजेपी को इसलिये नहीं मिला क्योंकि गवर्नेंस के कठघरे में बीजेपी का भी कांग्रेसीकरण हुआ। इसी लिये नरेन्द्र मोदी को पार्टी से बाहर का जनादेश मिला। यानी देश के भीतर सबकुछ ठप होने वाले हालात से निपटने के लिये जनादेश ने एक ऐसे नायक को खोजा जिसने अपनी ही पार्टी की धुरधंरों को पराजित किया । और पहली बार मीडिया बंटा भी। बिखरा भी। झुका भी। और अपनी ताकत से समझौता करते हुये दिखा भी। यह सब इसलिये क्योंकि राजनीति के नये नये आधारों ने मीडिया की उसी कमजोर नसों को पकड़ा जिसे साधने के लिये राजनीति के अंतर्विरोध का लाभ मीडिया ही हमेशा उठाता रहा। सरकारी सब्सिडी के दायरे से न्यूज प्रिंट निकल कर खुले बाजार आया तो हर बडे अखबारों के लिये हितकारी हो गया। छोटे-मझौले अखखबारो के सामने अखबार निकालने का संकट आया। समझौते शुरु हुये। न्यूज चैनल का लाइसेंस पाने के लिये 20 करोड़ कौन सा पत्रकार दिखा सकता है, यह सवाल कभी किसी मीडिया हाउस ने सरकार से नहीं पूछा। और पत्रकार सोच भी नहीं पाया कि न्यूज चैनल वह पत्रकारिता के लिये शुरु कर सकता है।
पैसे वालों के लिये मीडिया पर कब्जा  करना आसान हो गया या कहें जो पत्रकरिता कर लोकतंत्र के चौथे खम्मे को जीवित रख सकते थे वह हाशिये पर चले गये। इस दौर में सियासत साधने के लिये मीडिया ताकतवर हुआ। तो सत्ता के ताकतवर होते ही मीडिया बिकने और नतमस्तक होने के लिये तैयार हो गया। और जो मीडिया कल तक संसदीय राजनीति पर ठहाके लगाता था वही मीडिया सत्ता के ताकतवर होते ही अपनी ताकत भी सत्ता के साथ खड़े होने में ही देखने समझने लगा। और पहली बार मीडिया को नये तरीके से गढने का खेल देश में वैसे ही शुरु हुआ जैसे खुदरा दुकाने चकाचौंध भरे मॉल में तब्दील होने लगी। याद कीजिये तो मोदी के पीएम बनने से पहले यह सवाल अक्सर पूछा जाता था कि मीडिया से चुनाव जीते जाते तो राहुल कब के पीएम बन गये होते। यह धारदार वक्तव्य मीडिया और राजनीतिक प्रचार के बीच अक्सर जब भी बोला जाता है तब खबरों के असर पडने वाली पत्रकारिता हाशिये पर जाती हुई सी नजर आने लगती। लेकिन पत्रकारिता या मीडिया की मौजूदगी समाज में है ही क्यों अगर इस परिभाषा को ही बदल दिया जाये तो कैसे कैसे सवाल उठेंगे। मसलन कोई पूछे, अखबार निकाला क्यों जाये और न्यूज चैनल चलाये क्यों जाये।
यह एक ऐसा सवाल है जिससे भी आप पूछेंगे वह या तो आपको बेवकूफ समझेगा या फिर यही कहेगा कि यह भी कोई सवाल है । लेकिन 2014 के चुनाव के दौर में जिस तरह अखबार की इक्नामी और न्यूज चैनलों के सरल मुनाफे राजनीतिक सत्ता के लिये होने वाले चुनावी प्रचार से जा जुडे है उसने अब खबरों के बिकने या किसी राजनीतिक दल के लिये काम करने की सोच को ही पीछे छोड़ दिया है। सरलता से समझे लोकसभा चुनाव ने राह दिखायी और चुनाव प्रचार में कैसे कहा कितना कब खर्च हो रहा है यह सब हर कोई भूल गया । चुनाव आयोग भी चुनावी प्रचार को चकाचौंध में बदलते तिलिस्म की तरह देखने लगा। तो जनता का नजरिया क्या रहा होगा। खैर लोकसभा चुनाव खत्म हुये तो लोकसभा का मीडिया प्रयोग कैसे उफान पर आया और उसने झटके में कैसे अखबार निकलाने या न्यूज चैनल चलाने की मार्केटिंग के तौर तरीके ही बदल दिये यह वाकई चकाचौंध में बदलते भारत की पहली तस्वीर है। क्योंकि अब चुनाव का एलान होते ही राज्यों में अखबार और न्यूज चैनलों को पैसा पंप करने का अनूठा प्रयोग शुरु हो गया है। लोकसभा के बाद हरियाणा , महाराष्ट्र में चुनाव हुये और फिर झारखंड और जम्मू कश्मीर । महाराष्ट्र चुनाव के वक्त बुलढाणा के एक छोटे से अखबार मालिक का टेलीफोन मेरे पास आया उसका सवाल था कि अगर कोई पहले पन्ने को विज्ञापन के लिये  खरीद लेता है तो अखबार में मास्ट-हेड कहां लगेगा और अखबार में पहला पन्ना हम दूसरे पन्ने को माने या तीसरे पन्ने को जो खोलते ही दायी तरफ आयेगा। और अगर तीसरे पन्ने को पहला पन्ना मान कर मास्टहेड लगाते हैं तो फिर दूसरे पन्ने में कौन सी खबर छापे क्योकि अखबार में तो पहले पन्ने में सबसे बड़ी खबर होती है। मैंने पूछा हुआ क्या । तो उसने बताया कि चुनाव हो रहे हैं तो एक राजनीतिक दल ने नौ दिन तक पहला पन्ना विज्ञापन के लिये खरीद लिया है। खैर उन्हें दिल्ली से निकलने वाले अखबारों के बार में जानकारी दी कि कैसे यहां तो आये दिन पहले पन्ने पर पूरे पेज का विज्ञापन छपता है। और मास्ट-हेड हमेशा तीसरे पेज पर ही लगता है और वही फ्रंट पेज कहलाता है । यह बात भूलता तब तक झारखंड के डाल्टेनगंज से एक छोटे अखबार मालिक ने कुछ ऐसा ही सवाल किया और उसका संकट भी वही था। अखबार का फ्रंट पेज किसे बनायें। और वहां भी अखबार का पहला पेज सात दिन के लिये एक राजनीतिक दल ने बुक किया था। यानी पहली बार अखबारों को इतना बड़ा विज्ञापन थोक में मिल रहा है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन बात सिर्फ विज्ञापन तक नहीं रुकी।
अगला सवाल था कि इतने विज्ञापन से तो हमारा साल भर का खर्च निकल जायेगा। तो इस पार्टी के खिलाफ कुछ क्यों छापा जाये। बहुत ही मासूमियत भरा यह सवाल भी था और जबाव भी। और संयोग से कुछ ऐसा ही सवाल और जबाब कश्मीर से निकलते एक अखबार के पहले पन्ने पर उर्दू में पूरे पेज पर विज्ञापन छपा देखा। जिसमें प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर के साथ घाटी का चेहरा बदलने का सपना था। अजीबोगरीब लगा। उर्दू के शब्दों के बीच मोदी और पूरे पेज के विज्ञापन के लालच में संपादक का सवाल, क्या करें। इतना बड़ा विज्ञापन। इससे तो अखबार के सारे बुरे दिन दूर हो जायेंगे। और विज्ञापन छाप रहे हैं तो पार्टी के खिलाफ कुछ क्यों लिखें। वैसे भी चुनाव तो होते रहते हैं। नेता बदलते रहते हैं। घाटी में कभी तो कुछ बदला नहीं। तो हम किसी से कुछ मांग तो नहीं रहे सिर्फ विज्ञापन चुनाव तक है। पैसे एंडवास में दे दिये गये हैं। सरकारी विज्ञापनों के तो पैसे भी मांगते मांगते मिलते हैं तो हमने सोचा है कि घाटी में क्या होना चाहिये और जनता किन मुश्किलों में है और इसी पर रिपोर्ट फाइल करेंगे। यानी नेता भ्रष्ट हो या आपराधिक छवि का। पार्टी की धारा कुछ भी हो। पार्टी की धारा कुछ भी हो। आतंक के साये से चुनावी उम्मीदवार निकला हो या आतंक फैला कर चुनाव मैदान में उतरा हो। बहस कही नहीं सिवाय सपने जगाने वाले चुनाव के आइने में लोकतंत्र को जीने की। असर यही हुआ कि पूंजी कैसे किसकी परिभाषा इस दौर में बदल कर सकारात्मक छवि का अनूठा पाठ हर किसी को पढ़ा सकती है, यह कमोवेश देश के हर मीडिया हाउस में हुआ। इसका नायाब असर गवर्नेंस के दायरे में भ्रष्ट मीडिया हाउसों पर लगते तालो के बीच पत्रकार बनने के लिये आगे आने वाली पीढ़ियो के रोजगार पर पड़ा। मनमोहन सिंह के दौर की आवारा पूंजी ने चिटफंड और बिल्डरों से लेकर सत्ता के लिये दलाली करने वालों के हाथो में चैनलों के लाइसेंस दिये। मीडिया का बाजार फैलने लगा। और 16 मई के बाद पूंजी, मुनाफा चंद हथेलियों में सिमटने लगा तो मीडिया के नाम पर चलने वाली दुकाने बंद होने लगी। सिर्फ दिल्ली में ही तीन हजार पत्रकार या कहें मीडिया के कामगार बेरोजगार हो गये। छह कारपोरेट हाउस सीधे मीडिया हाउसो के शेयर खरीद कर सत्ता के सामने अपनी ताकत दिखाने लगे या फिर मीडिया के नतमस्तक होने का खुला जश्न मनाने लगे। जश्न के तरीके मीडिया के अर्द्ध सत्य को भी हडपने लगे और सत्ता की ताकत खुले तौर पर खुला नजारा करने से नहीं चूकी। यानी पहली बार लुटियन्स की दिल्ली सरीखे रेशमी नगर की तर्ज पर हर राज्य की राजनीति या तो ढलने लगी या फिर पारंपरिक लोकतंत्र के ढर्रे से उकता गयी जनता ही जनादेश के साये में राजनीति का विकल्प देने लगी । और मीडिया हक्का बक्का होकर किसी उत्पाद [ प्रोडक्ट ] की तर्ज पर मानने लगा कि अगर वह सत्ता के कोठे की जरुरत है तो फिर उसकी साख है । यानी जिन समारोहों को, जिन सामाजिक विसंगतियों और जिस लोकतंत्र के कुंद होने पर मीडिया की नजर होनी चाहये अगर वह खुद ही समारोह करने लगे। सामाजिक विसंगतियों को अनदेखा करने लगे और लोकतंत्र के चौथे पाये की जगह खुद को सत्ता की गोद में बैठाने लगे या खुद में सत्ता की ठसक पाल लें, तो सवाल सिर्फ पत्रकारिता का है या देश का। सोचना तो पड़ेगा।
(prasunbajpai.itzmyblog.com से साभार)

Friday, 5 December 2014

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देशभक्तों का महान संगठन? / प्रभाष जोशी

(अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है.)
….अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के लिए वंदेमातरम् का गाना अनिवार्य करने की मांग संघ परिवारियों की ही रही है. ये वही लोग हैं जिनने उस स्वतंत्रता संग्राम को ही स्वैच्छिक माना है जिसमें से वंदेमातरम् निकला है. अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है. लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि राष्ट्रभक्ति का कोई प्रतीक स्वैच्छिक हो. तो फिर आज़ादी की लड़ाई के निर्णायक ”भारत छोड़ो आंदोलन” के दौरान वे खुद क्या कर रहे थे? उनने खुद ही कहा है- ”मैं संघ में लगभग उन्हीं दिनों गया जब भारत छोड़ो आंदोलन छिड़ा था क्योंकि मैं मानता था कि कॉग्रेस के तौर-तरीक़ों से तो भारत आज़ाद नहीं होगा. और भी बहुत कुछ करने की ज़रूरत थी.” संघ का रवैया यह था कि जब तक हम पहले देश के लिए अपनी जान क़ुरबान कर देने वाले लोगों का मज़बूत संगठन नहीं बना लेते, भारत स्वतंत्र नहीं हो सकता. लालकृष्ण आडवाणी भारत छोड़ो आंदोलन को छोड़कर करांची में आरम-दक्ष करते देश पर क़ुरबान हो सकने वाले लोगों का संगठन बनाते रहे. पांच साल बाद देश आज़ाद हो गया. इस आज़ादी में उनके संगठन संघ- के कितने स्वयंसेवकों ने जान की क़ुरबानी दी? ज़रा बताएं.
एक और बड़े देशभक्त स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी हैं. वे भी भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बच्चे नहीं संघ कार्य करते स्वयंसेवक ही थे. एक बार बटेश्वर में आज़ादी के लिए लड़ते लोगों की संगत में पड़ गए. उधम हुआ. पुलिस ने पकड़ा तो उत्पात करने वाले सेनानियों के नाम बताकर छूट गए. आज़ादी आने तक उनने भी देश पर क़ुरबान होने वाले लोगों का संगठन बनाया जिन्हें क़ुरबान होने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि वे भी आज़ादी के आंदोलन को राष्ट्रभक्ति के लिए स्वैच्छिक समझते थे.
अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने को देशभक्तों का महान संगठन कहे और देश पर जान न्योछावर करने वालों की सूची बनाए तो यह बड़े मज़ाक का विषय है. सन् १९२५ में संघ की स्थापना करने वाले डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार को बड़ा क्रांतिकारी और देशभक्त बताया जाता है. वे डॉक्टरी की पढ़ाई करने १९१० में नागपुर से कोलकाता गए जो कि क्रांतिकारियों का गढ़ था. हेडगेवार वहां छह साल रहे. संघवालों का दावा है कि कोलकाता पहुंचते ही उन्हें अनुशीलन समिति की सबसे विश्वसनीय मंडली में ले लिया गया और मध्यप्रांत के क्रांतिकारियों को हथियार और गोला-बारूद पहुंचाने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की थी. लेकिन ना तो कोलकाता के क्रांतिकारियों की गतिविधियों के साहित्य में उनका नाम आता है न तब के पुलिस रेकॉर्ड में. (इतिहासकारों का छोड़े क्योंकि यहां इतिहासकारों का उल्लेख करने पर कुछ को उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करने का अवसर मिल सकता है) खैर, हेडगेवार ने वहां कोई महत्व का काम नहीं किया ना ही उन्हें वहां कोई अहमियत मिली. वे ना तो कोई क्रांतिकारी काम करते देखे गए और ना ही पुलिस ने उन्हें पकड़ा. १९१६ में वे वापस नागपुर आ गए.
लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद वे कॉग्रेस और हिन्दू महासभा दोनों में काम करते रहे. गांधीजी के अहिंसक असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में भाग लेकर ख़िलाफ़त आंदोलन के वे आलोचक हो गए. वे पकड़े भी गए और सन् १९२२ में जेल से छूटे. नागपुर में सन् १९२३ के दंगों में उनने डॉक्टर मुंजे के साथ सक्रिय सहयोग किया. अगले साल सावरकर का ”हिन्दुत्व” निकला जिसकी एक पांडुलिपी उनके पास भी थी. सावरकर के हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार करने के लिए ही हेडगेवार ने सन् १९२५ में दशहरे के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की. तब से वे निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन और राजनीति में रहे लेकिन संघ को इन सबसे अलग रखा. सारा देश जब नमक सत्याग्रह और सिविल नाफ़रमानी आंदोलन में कूद पड़ा तो हेडगेवार भी उसमें आए लेकिन राष्टीय स्वयंसेवक संघ की कमान परांजपे को सौंप गए. वे स्वयंसेवकों को उनकी निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने देते थे लेकिन संघ को उनने न सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों में लगाया न अहिंसक असहयोग आंदोलनों में लगने दिया. संघ ऐसे समर्पित लोगों के चरित्र निर्माण का कार्य कर रहा था जो देश के लिए क़ुरबान हो जाएंगे. सावरकर ने तब चिढ़कर बयान दिया था, ”संघ के स्वयंसेवक के समाधि लेख में लिखा होगा- वह जन्मा, संघ में गया और बिना कुछ किए धरे मर गया.”
हेडगेवार तो फिर भी क्रांतिकारियों और अहिंसक असहयोग आंदोलनकारियों में रहे दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर तो ऐसे हिन्दू राष्ट्रनिष्ठ थे कि राष्ट्रीय आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियों और ब्रिटिश विरोध से उनने संघ और स्वयंसेवकों को बिल्कुल अलग कर लिया. वाल्टर एंडरसन और श्रीधर दामले ने संघ पर जो पुस्तक द ब्रदरहुड इन सेफ़्रॉन- लिखी है उसमें कहा है, ”गोलवलकर मानते थे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी लगाने का कोई बहाना अंग्रेज़ों को न दिया जाए.” अंग्रेज़ों ने जब ग़ैरसरकारी संगठनों में वर्दी पहनने और सैनिक कवायद पर पाबंदी लगाई तो संघ ने इसे तत्काल स्वीकार किया. २९ अप्रैल १९४३ को गोलवलकर ने संघ के वरिष्ठ लोगों के एक दस्तीपत्र भेजा. इसमें संघ की सैनिक शाखा बंद करने का आदेश था. दस्तीपत्र की भाषा से पता चलता है कि संघ पर पाबंदी की उन्हें कितनी चिंता थी- ”हमने सैनिक कवायद और वर्दी पहनने पर पाबंदी जैसे सरकारी आदेश मानकर ऐसी सब गतिविधियां छोड़ दी हैं ताकि हमारा काम क़ानून के दायरे में रहे जैसा कि क़ानून को मानने वाले हर संगठन को करना चाहिए. ऐसा हमने इस उम्मीद में किया कि हालात सुधर जाएंगे और हम फिर ये प्रशिक्षण देने लगेंगे. लेकिन अब हम तय कर रहे हैं कि वक़्त के बदलने का इंतज़ार किए बिना ये गतिविधियां और ये विभाग समाप्त ही कर दें.” (ये वो दौर था जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे क्रांतिकारी अपने तरीक़े से संघर्ष कर रहे थे) पारंपरिक अर्थों में गोलवलकर क्रांतिकारी नहीं थे. अंग्रेज़ों ने इसे ठीक से समझ लिया था.
सन् १९४३ में संघ की गतिविधियों पर तैयार की गई एक सरकारी रपट में गृह विभाग ने निष्कर्ष निकाला था कि संघ से विधि और व्यवस्था को कोई आसन्न संकट नहीं है. १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन में हुई हिंसा पर टिप्पणी करते हुए मुंबई के गृह विभाग ने कहा था, ”संघ ने बड़ी सावधानी से अपने को क़ानूनी दायरे में रखा है. खासकर अगस्त १९४२ में जो हिंसक उपद्रव हुए हैं उनमें संघ ने बिल्कुल भाग नहीं लिया है.” हेडगेवार सन् १९२५ से १९४० तक सरसंघचालक रहे और उनके बाद आज़ादी मिलने तक गोलवलकर रहे. इन बाईस वर्षों में आज़ादी के आंदोलन में संघ ने कोई योगदान या सहयोग नहीं किया. संघ परिवारियों के लिए संघ कार्य ही राष्ट्र सेवा और राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा काम था. संघ का कार्य क्या है? हिन्दू राष्ट्र के लिए मर मिटने वाले स्वयंसेवकों का संगठन बनाना. इन स्वयंसेवकों का चरित्र निर्माण करना. उनमें ऱाष्ट्रभक्ति को ही जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा और शक्ति मानने की परम आस्था बैठाना. १९४७ में जब देश आज़ाद हुआ तो देश में कोई सात हज़ार शाखाओं में छह से सात लाख स्वयंसेवक भाग ले रहे थे. आप पूछ सकते हैं कि इन एकनिष्ठ देशभक्त स्वयंसेवकों ने आज़ादी के आंदोलन में क्या किया? अगर ये सशस्त्र क्रांति में विश्वास करते थे तो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ इनने कितने सशस्त्र उपद्रव किए, कितने अंग्रेज़ों को मारा और उनके कितने संस्थानों को नष्ट किया. कितने स्वयंसेवक अंग्रेज़ों की गोलियों से मरे और कितने वंदेमातरम् कहकर फांसी पर झूल गए? हिन्दुत्ववादियों के हाथ से एक निहत्था अहिंसक गांधी ही मारा गया.
संघ और इन स्वयंसेवकों के लिए आज़ादी के आंदोलन से ज़्यादा महत्वपूर्ण स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र के लिए संगठन बनाना और स्वयंसेवक तैयार करना था. संगठन को अंग्रेज़ों की पाबंदी से बचाना था. इनके लिए स्वतंत्र भारत राष्ट्र अंग्रेज़ों से आज़ाद कराया गया भारत नहीं था. इनका हिन्दू राष्ट्र तो कोई पांच हज़ार साल से ही बना हुआ है. उसे पहले मुसलमानों और फिर अंग्रेज़ों से मुक्त कराना है. मुसलमान हिन्दू राष्ट्र के दुश्मन नंबर एक और अंग्रेज़ नंबर दो थे. सिर्फ़ अंग्रेज़ों को बाहर करने से इनका हिन्दू राष्ट्र आज़ाद नहीं होता. मुसलमानों को भी या तो बाहर करना होगा या उन्हें हिन्दू संस्कृति को मानना होगा. इसलिए अब उनका नारा है- वंदे मातरम् गाना होगा, नहीं तो यहां से जाना होगा. सवाल यह है कि जब आज़ादी का आंदोलन- संघ परिवारियों के लिए स्वैच्छिक था तो स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत में वंदेमातरम् गाना स्वैच्छिक क्यों नहीं हो सकता? भारत ने हिन्दू राष्ट्र को स्वीकार नहीं किया है. यह भारत संघियों का हिन्दू राष्ट्र नहीं है. वंदेमातरम् राष्ट्रगीत है, राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं.  (प्रभाष जोशी का यह लेख 10 मार्च, 2008 को जनसत्ता में छपा था)

जादू जैसे शब्दों वाले हिन्दी नवगीत के आधार स्तम्भ देवेन्द्र कुमार बंगाली की वह लोकप्रिय कविता....

एक पेड़ चांदनी लगाया है आंगने ।
फूले तो आ जाना एक फूल मांगने ।

ढिबरी की लौ जैसे लीक चली आ रही,
बादल का रोना है, बिजली शरमा रही,
मेरा घर छाया है तेरे सुहाग ने।

तन कातिक, मन अगहन बार-बार हो रहा,
मुझमें तेरा कुवार जैसे कुछ बो रहा,
रहने दो यह हिसाब कर लेना बाद में।

नदी झील, सागर से रिश्ते मत जोड़ना,
लहरों को आता है यहां-वहां छोड़ना,
मुझको पहुंचाया है तुम तक अनुराग ने।

Thursday, 4 December 2014

जो जितना गलत है, वो उतना सही है / जयप्रकाश त्रिपाठी

इधर खालीपन है, उधर खालीपन है,
कहीं कुछ नहीं है तो क्यों कुछ नहीं है!

अकेले-अकेले मुसीबत के मेले
करोड़ो के किस्से, हजारो झमेले
चलन-बदचलन जो भी थीं वो अधन्नी,
इकन्नी, दुअन्नी, चवन्नी, अठन्नी
टका भी नहीं है मचा रोना-धोना
जमूरों के लॉकर में सोना-ही-सोना
न पूछा, न ताछी, न खाता-बही है,
कहीं कुछ नहीं है तो क्यों कुछ नहीं है!....

नहीं गांठ में कुछ, फिरें मारे-मारे
ठिकाने सड़क के किनारे-किनारे
न दाना, न पानी, न मेहनत-मजूरी
सुबह-शाम रोटी न आधी, न पूरी
इधर सबका गीला गरीबी में आटा
उधर वो गिनाते हैं चोरी में घाटा
जो जितना गलत है, वो उतना सही है,
कहीं कुछ नहीं है तो क्यों कुछ नहीं है!....

हवा भी हवा है, न आंधी, न पानी
न ओलों की बारिश, न रिमझिम रवानी
घटाओं के घर भी उदासी, उदासी
ये क्यों हर फसल है रुआंसी, रुआंसी
न धनिया के मन से, न होरी के धन से,
उधारी में गोबर वहीं-का-वहीं है,
कहीं कुछ नहीं है तो क्यों कुछ नहीं है!....

लुटे-से, पिटे-से, तड़प है न गुस्सा,
न मोटू का किस्सा, न छोटू का हिस्सा
भरे हैं, भरे हैं मगर खाली-खाली
कहीं पर दुनाली, कहीं हाथ-ताली
जरा-सी भी हरकत से जग जा रहे हैं
सुबकते-सुबकते सुलग जा रहे हैं
बताओ-बताओ कि क्या वाकया है
कि रातें कहीं और सपने कहीं है,
कहीं कुछ नहीं है तो क्यों कुछ नहीं है!....

संजीव भट्ट

उर्दू है मेरा नाम मैं खुसरो कि पहेली...
उर्दू है मेरा नाम मैं खुसरो की पहेली
मैं मीर की हमराज हूँ ,ग़ालिब की सहेली
दक्कन की वली ने मुझे गोदी में खिलाया
सौदा के क़सीदो ने मेरा हुस्न बढ़ाया
है मीर की अज़मत कि मुझे चलना सिखाया
मैं दाग़ के आंगन में खिली बन के चमेली
उर्दू है मेरा नाम मैं खुसरो कि पहेली
ग़ालिब ने बुलंदी का सफर मुझको सिखाया
हाली ने मुरव्वत का सबक़ याद दिलाया
इक़बाल ने आइना-ए-हक़ मुझको दिखाया
मोमिन ने सजाई मेरी ख्वाबो की हवेली॥
उर्दू है मेरा नाम मैं खुसरो कि पहेली॥॥
है ज़ौक़ की अजमत कि दिए मुझको सहारे
चकबस्त की उल्फत ने मेरे ख़्वाब संवारे
फानी ने सजाये मेरी पलकों पे सितारे
अकबर ने रचाई मेरी बेरंग हथेली
उर्दू है मेरा नाम ..
क्यों मुझको बनाते हो तास्सुब का निशाना
मैंने तो कभी खुद को मुसलमाँ नही माना
देखा था कभी मैंने खुशियों का ज़माना
अपने ही वतन में हूँ आज अकेली
उर्दू है मेरा नाम मैं खुसरो कि पहेली...

नरेश सक्सेना

कोई-कोई वृक्ष बिल्कुल मनुष्यों की तरह होते हैं
वे न फल देते हैं, न छाया, एक हरे सम्मोहन से खींचते हैं
और पहुँच में आते ही दबोच कर सारा ख़ून चूस लेते हैं
उस वक़्त बिल्कुल मनुष्यों की तरह हो जाता है सारा जंगल



समाज और सत्ता के दो रंग

जर्मनी में हज़ारों लोगों ने बहादुर लड़की टूची को अंतिम विदाई दी, जिन्होंने दो किशोर लड़कियों को छेड़खानी से बचाने में अपनी जान गंवा दी.

हरियाणा सरकार ने 'रोहतक छेड़छाड़' वीडियो से चर्चा में आई दो बहनों को नगद पुरस्कार देने के अपने फ़ैसले को स्थगित कर दिया है.