Sunday, 9 November 2014

मातृभाषा/रसूल हमजातोव


सपनों में तो सदा अनोखी और अटपटी बातें होतीं
आज अचानक मैंने अपने को सपने में मरते देखा
दागिस्‍तानी घाटी थी, मैं था, औ' धूप झुलसती थी
सीना गोली से छलनी था, मिटती थी जीवन की रेखा।
कलछल कलछल नदिया बहती, वह अबाध ही दौड़ी जाती
नहीं जरूरत जिसकी जग को, और सभी ने जिसे भुलाया,
मेरे नीचे थी मेरी ही, अपनी मिट्टी, अपनी धरती
उसका हिस्‍सा बनने की थी, कुछ क्षण में मेरी भी काया।
गिनता हूँ मैं अपनी साँसें, मगर न कोई इतना जाने
पास न कोई मेरे आए, सहलाए न प्‍यारी बाँहें,
सिर्फ उकाब कहीं दूरी पर, ऊँची-ऊँची भरे उड़ानें
और कहीं पर एक तरफ को, हिरन भर रहे ठंडी आहें।
अपनी भरी जवानी में मैं छोड़ रहा हूँ इस दुनिया को
फिर भी मेरी इस मिट्टी पर, मेरे शव पर और कब्र पर,
माँ भी नहीं, नहीं प्‍यारी भी, नहीं दोस्‍त कोई रोने को
अरे, न क्‍यों वे भी आती हैं, जो रोती हैं पैसे लेकर।
बेबस पड़ा-पड़ा ऐसे ही, तोड़ रहा था मैं दम अपना
तभी अचानक, कहीं निकट ही कुछ आवाजें पड़ीं सुनाई,
चले जा रहे थे दो साथी, वे कुछ कहते, कुछ बतियाते
भाषा उनकी भी अवार थी, मेरे कानों को सुखदाई
आग उगलती दोपहर में उस दागिस्‍तानी घाटी में
मैं मरता था, मगर लोग तो, हँसते, बतियाते जाते थे,
किसी हसन की मक्‍कारी की, किसी अली की सूझ-बूझ की
मजे-मजे चर्चा करते वे किस्‍से कह मन बहलाते थे।
अपनी ही भाषा में सुनकर कुछ धीमी-धीमी आवाजें
मुझे लगा कुछ ऐसे, जैसे जान जिस्‍म में फिर से आए,
समझ गया मैं वैद्य, डॉक्‍टर, मुझे न कोई बचा सकेगा
केवल मेरी अपनी भाषा, मुझे प्राण दे सके, बचाए।
शायद और किसी को दे दे, सेहत कहीं अजनबी भाषा
पर मेरे सम्‍मुख वह दुर्बल, नहीं मुझे तो उसमें गाना,
और अगर मेरी भाषा के, बदा भाग्‍य में कल मिट जाना
तो मैं केवल यह चाहूँगा, आज, इसी क्षण ही मर जाना।
मैंने तो अपनी भाषा को, सदा हृदय से प्‍यार किया है
बेशक लोग कहें, कहने दो, मेरी यह भाषा दुर्बल है,
बड़े समारोहों में इसका, हम उपयोग नहीं सुनते हैं
मगर मुझे तो मिली दूध में, माँ के, वह तो बड़ी सबल है।
आनेवाली नई पीढ़ियाँ, क्‍या अनुवादों के जरिए ही
समझेंगी महमूद और उसकी कविता का रंग निराला?
क्‍या मैं ही वह अंतिम कवि हूँ, जो अपनी प्‍यारी भाषा में
जो अवार भाषा में लिखता, उसमें छंद बनानेवाला।
प्‍यार मुझे बेहद जीवन से, प्‍यार मुझे सारी पृथ्‍वी से
उसका कोना-कोना प्‍यारा, प्‍यारा उसका साया, छाया,
फिर भी सोवियत देश अनूठा मुझको सबसे ज्‍यादा प्‍यारा
अपनी भाषा में उसका ही, मैंने जी भर गौरव गाया।
बाल्टिक से ले, सखालीन तक, इस स्‍वतंत्र, खिलती धरती का
हर कोना मुझको प्‍यारा है, हर कोना ही मन भरमाए,
इसके हित हँसते-हँसते ही, दे दूँगा मैं प्राण कहीं भी
पर मेरे ही जन्‍म-गाँव में, बस मुझको दफनाया जाए।
ताकि गाँव के लोग कभी आ, करें कब्र पर चर्चा मेरी
कहें हमारी भाषा में यह, यहाँ रसूल अपना सोता है,
अपनी भाषा में ही जिसने, अपने मन-भावों को गाया
त्‍सादा के हमजात सुकवि का, अरे वही बेटा होता है।

हम सब चोर हैं / यशपाल जैन

पुराने जमाने की बात है। एक आदमी को अपराध में पकड़ा गया। उसे राजा के सामने पेश किया गया। उन दिनों चोरो को फाँसी की सजा दी जाती थी। अपराध सिद्ध हो जाने पर इस आदमी को भी फाँसी की सजा मिली। राजा ने कहा, 'फाँसी पर चढ़ने से पहले तुम्हारी कोई इच्छा हो तो बताओ।' आदमी ने कहा, 'राजन! मैं मोती तैयार करना जानता हूँ। मेरी इच्छा है कि मरने से पहले कुछ मोती तैयार कर जाऊँ।' राजा ने उसकी बात मान ली और उसे कुछ दिन के लिए छोड़ दिया। आदमी ने महल के पास एक खेत की जमीन को अच्छी तरह खोदा और समतल किया। राजा और उसके अधिकारी वहाँ मौजूद थे। खेत ठीक होने पर उसने राजा से कहा, 'महाराज, मोती बोने के लिए जमीन तैयार है, लेकिन इसमें बीज वही डाल सकेगा, जिसने तन से या मन से कभी चोरी न की हो। मैं तो चोर हूँ, इसलिए बीज नहीं डाल सकता।' राजा ने अपने अधिकारियों की ओर देखा। कोई भी उठकर नहीं आया। तब राजा ने कहा, 'मैं तुम्हारी सजा माफ करता हूँ। हम सब चोर हैं। चोर चोर को क्या दंड देगा!'

Saturday, 8 November 2014

'द हिंदू' के खिलाफ हिंदूवादियों ने खोला मोर्चा

'The Hindu' अंग्रेजी अखबार इन दिनो हिंदूवादियों के निशाने पर है। इसकी वजह बताई गई है चार नबंबर को द हिंदू में छपी एक स्पेशल रिपोर्ट। उस खबर में बताया गया है कि 13 बड़े राज्यों में मुस्लिम मंत्रियों की संख्या केवल 16 परसेंट है और बीजेपी वाले राज्यों में तो हालत बहुत खराब है। बताया गया है कि कैसे महाराष्ट्र में अब 11 मुस्लिम विधायको में से 9 ही रह गए हैं। बीजेपी ने केवल एक मुस्लिम को टिकट दिया था, वो भी हार गया। पहले तीन मुस्लिम मंत्री थे, इस बार एक के होने के भी चांस नहीं हैं। हरियाणा में जहां पहले पांच मुस्लिम एमएलए और 1 मंत्री था, अब तीन ही मुस्लिम एमएलए हैं और मंत्री तो एक भी नहीं होगा क्योंकि बीजेपी ने दो मुस्लिमों को टिकट दिया था और दोनों ही हार गए। उसी तरह इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे छत्तीसगढ़,गोवा में कोई मुस्लिम एमएलए नहीं है, जबकि एमपी, पंजाब, राजस्थान और गुजरात में केवल एक एक मुस्लिम एमएलए ही है। एक लाइन इस रिपोर्ट के ऊपर ही लिखी हुई है कि, ‘अगर ये ट्रेंड जारी रहता है, तो मुस्लिमों खास तौर पर यंगस्टर्स का भरोसा देश के इलेक्टोरल सिस्टम से उठ जाएगा’ ।
'The Hindu' की ये रिपोर्ट इस लिंक पर पढ़ी जा सकती हैं -
http://www.thehindu.com/news/national/muslims-fill-16-per-cent-of-ministerial-berths-in-13-big-states/article6564574.ece ।
एनडीटीवी की पत्रकार बरखा दत्त ने भी ट्वीट किया है कि बीजेपी शासित राज्यों में 151 विधायक हैं और केवल एक मुस्लिम मंत्री है। बरखा ने एनडीटीवी पर भी इस मुद्दे को उठाया।
अब जवाही हमला शुरू हो गया है। 'The Hindu' पर आरोप लगाया गया है कि इस अखबार के 136 सालों के इतिहास में एक भी मुस्लिम एडिटर क्यों नहीं हुआ? जी सुब्रह्ममण्यम से लेकर मालिनी पार्थसारथी तक, 1878 से 2014 तक आज तक‘द हिंदू’ ने कोई भी एडिटर मुस्लिम नहीं नियुक्त किया है। इतना ही नहीं द हिंदू के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में भी कोई मुस्लिम नहीं है। द हिंदू के पब्लिशर एन राम सीपीआई (एम) की स्टूडेट विंग एसएफआई के वाइस प्रेसिडेंट रह चुके हैं,इसलिए वो वामपंथी हैं और हमेशा से बीजेपी के खिलाफ रहे हैं, इसलिए ऐसी बातें फैला रहे हैं। विकीपीडिया से द हिंदू के अब तक के एडिटर्स की पूरी लिस्ट का प्रिट स्क्रीन निकालकर ट्वीट पर शेयर किया जा रहा है। (समाचार4मीडिया से साभार)

Friday, 7 November 2014

भिखारी/तुर्गनेव

मैं एक सड़क के किनारे जा रहा था। एक बूढ़े जर्जर भिखारी ने मुझे रोका। लाल सुर्ख और आँसुओं में तैरती–सी आँखें, नीले होंठ,गंदे और गले हुए चिथड़े सड़ते हुए घाव... ओह,गरीबी ने कितने भयानक रूप से इस जीव को खा डाला है। उसने अपना सड़ा हुआ, लाल, गंदा हाथ मेरे सामने फैला दिया और मदद के लिए गिड़गिड़ाया।
मैं एक–एक करके अपनी जेब टटोलने लगा। न बटुआ मिला, न घड़ी हाथ लगी, यहाँ तक कि रूमाल भी नदारद था... मैं अपने साथ कुछ भी नहीं लाया था और भिखारी अब भी इंतजार कर रहा था। उसका फैला हुआ हाथ बुरी तरह काँप रहा था, हिल रहा था।
घबराकर, लज्जित हो मैंने वह गंदा, काँपता हुआ हाथ उमगकर पकड़ लिया, ‘‘नाराज मत होना, मेरे दोस्त! मेरे पास भी कुछ नहीं हैं,भाई!’’
भिखारी अपनी सुर्ख आँखों से एकटक मेरी ओर देखता रह गया। उसके नीले होंठ मुस्करा उठे और बदले में उसने मेरी ठंडी उँगुलियाँ थाम लीं, ‘‘तो क्या हुआ, भाई!’’ वह धीरे से बोला, ‘‘इसके लिए भी शुक्रिया, यह भी तो मुझे कुछ मिला, मेरे भाई!’’ और मुझे ज्ञात हुआ कि मैंने भी अपने उस भाई से कुछ पा लिया था।

फिल्ममेकर को जिंदा निगलेगा एनाकॉन्‍डा

अमेरिका के न्‍यूजर्सी शहर के रहने वाले 26 वर्षीय फिल्‍ममेकर पॉल रासोलियो टीवी पर एक ऐसा हैरतअंगेज कारनामा करने वाले हैं जिसे देखकर आपकी रूह कांप जाएगी। दरअसल रासोलियो दुनिया के सबसे बड़े सांप एनाकॉन्‍डा के पेट में जाएंगे। बता दें कि दिल दहला देने वाले इस नजारे को फिल्माया तक जा चुका है।
रासोलियो फिल्म मेकर होने के साथ-साथ प्रकृति-प्रेमी भी हैं। उन्होंने डिस्‍कवरी चैनल के स्‍पेशल शो के लिए डॉक्‍यूमेंट्री तैयार की है, जिसका प्रसारण सात दिसंबर को किया जाएगा। इस डॉक्यूमेंट्री में दिखाया जाएगा कि यदि कोई सांप किसी इंसान को निगले तो कैसा लगता है। इसके लिए पॉल ने खुद एक स्‍नेक प्रूफ सूट बनाया है। ऐसा सूट, जिसे पहनने के बाद जब सांप उन्‍हें निगलेगा, तो उन्‍हें कोई नुकसान नहीं होगा।
 ‘ईटेन अलाइव’ नाम के इस शो में फिल्‍म निर्माता पॉल अमाजॉन के विशाल 30 फीट लंबे एनाकॉन्‍डा के सामने खुद को भोजन के रूप में पेश करेंगे।
हालांकि, इस कार्यक्रम को लेकर पशु प्रेमियों ने नाराजगी जाहिर की है। उनका कहना है कि यह जानवरों के साथ किए जाने वाले दुर्व्‍यवहार की चरम सीमा है। हालांकि, 26 वर्षीय पॉल इस बात से इनकार करते हैं।
उन्‍होंने ट्वीट कर कहा कि यदि आप मुझे जानते हैं, तो मैं कभी किसी भी जीव को नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा। रासोलियो को अमाजॉन का इंडियाना जोन्‍स भी कहा जाता है। वह अमाजॉन के विशेषज्ञ हैं और उनकी वेबसाइट बायो में बताया गया है कि उन्‍होंने भारत, इंडो‍नेशिया, ब्राजील और पेरू में कई जगहों पर काम किया है।
प्रदर्शनकारियों ने डिस्कवरी चैनल से इस एपिसोड को प्रदर्शित नहीं करने की भी मांग की है। इसी मकसद से वेबसाइट चेंज डॉट ओआरजी ने इस एपिसोड के खिलाफ एक ऑनलाइन अभियान चला रखा है जिसे अब तक 500 सिग्नेचर सपोर्ट मिल चुका है। इस अभियान के जरिए बताया जा रहा है कि यह जानवरों के साथ किए जाने वाले दुर्व्‍यवहार की चरम सीमा है और बेहद बकवास है। इसमें कहा गया है कि इससे सांप की जान भी जा सकती है। एक वयस्‍क एनाकॉन्‍डा वयस्‍क पुरुष के कंधों को नहीं निगल सकता है। वह आमतौर पर वन्‍य सुअर, हिरन आदि को खाता है। एनाकॉन्‍डा या अजगर जैसे जीव अपने भोजन को निगलने से पहले उन्‍हें दबाकर मार डालते हैं।
न्‍यूजर्सी के रहने वाले पॉल ने 18 वर्ष की आयु में पहली बार पेरू के अमाजॉन जंगल में काम किया था।
(समाचार4मीडिया से साभार)

राम की एक बहन थी शान्‍ता / बोधिसत्‍व

दशरथ की एक बेटी थी शान्‍ता
लोग बताते हैं, जब वह पैदा हुई
अयोध्‍या में अकाल पड़ा बारह वर्षों तक...
धरती धूल हो गयी...!
चिन्तित राजा को सलाह दी गयी कि
उनकी पुत्री शान्‍ता ही अकाल का कारण है!
राजा दशरथ ने अकाल दूर करने के लिए शृंगी ऋषि को पुत्री दान दे दी...
उसके बाद शान्‍ता कभी नहीं आयी अयोध्‍या...
लोग बताते हैं दशरथ उसे बुलाने से डरते थे...
बहुत दिनों तक सूना रहा अवध का आंगन
फिर उसी शान्‍ता के पति शृंगी ऋषि ने दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ कराया...
दशरथ चार पुत्रों के पिता बन गये, सं‍तति का अकाल मिट गया
शान्‍ता राह देखती रही अपने भाइयों की...
पर कोई नहीं गया उसे आनने हाल जानने कभी
मर्यादा पुरुषोत्तम भी नहीं,
शायद वे भी रामराज्‍य में अकाल पड़ने से डरते थे
जबकि वन जाते समय राम शान्‍ता के आश्रम से होकर गुज़रे थे...
पर मिलने नहीं गये...
शान्‍ता जब तक रही राह देखती रही भाइयों की
आएंगे राम-लखन, आएंगे भरत शत्रुघ्‍न
बिना बुलाये आने को राजी नहीं थी शान्‍ता...
सती की कथा सुन चुकी थी बचपन में, दशरथ से...!


हिंदी पत्रकारिता अपनी जिम्मेदारी समझे / संतोष भारतीय

पत्रकारिता के एक विद्यार्थी ने मुझसे पूछा कि क्या अंग्रेजी और हिंदी पत्रकारिता अलग-अलग हैं. मैंने पहले उससे प्रश्न किया कि आप यह सवाल क्यों पूछ रहे हैं. उसने मुझसे कहा कि यह सवाल मैं इसलिए पूछ रहा हूं कि अकसर मैं देखता हूं कि अंग्रेजी पत्रकारिता में लोग लगभग एक ही ट्यून पर काम करते हैं. बहुत कम लोग हैं, जो शुरू किए हुए ढर्रे के खिला़फ स्टोरी करते हैं, जबकि हिंदी में इस तरह की एकता नहीं दिखाई देती. अंग्रेजी पत्रकारिता में स्टोरी को डेवलप करने में रूचि नज़र आती है, लेकिन हिंदी पत्रकारिता में रिपोर्ट को मारने की मारामारी दिखाई देती है. पत्रकारिता के क्षेत्र में आने का सपना पाले हुए इस नौजवान ने मुझे यह सोचने पर विवश कर दिया. विवश इसलिए कर दिया, क्योंकि पत्रकारिता का भविष्य ऐसे ही लोग संभालने वाले हैं. इस विद्यार्थी का उत्साह मुझे इसलिए चिंतित कर गया, क्योंकि इसका सपना हिंदी पत्रकारिता में आने का है. हिंदी पत्रकार क्यों एक-दूसरे के खिला़फ खड़े हो जाते हैं, यह सवाल तो है. हिंदी पत्रकार क्यों एक-दूसरे की रिपोर्ट को डेवलप नहीं करते हैं, यह सवाल तो है. और सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्यों हिंदी पत्रकार बढ़-चढ़कर ज़बरदस्ती के तर्कों को गढ़कर अपने साथी पत्रकार की रिपोर्ट को किल करने में अपनी सारी ताक़त लगा देते हैं. इन सवालों का जवाब तो हिंदी के पत्रकारों को ही तलाशना है. लेकिन मैंने इसकी तलाश में कुछ लोगों से बातचीत की. आउट लुक के संपादक नीलाभ मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार सुरेश वाफना जैसे बहुत सारे लोगों से मेरी बातचीत हुई. इन सभी ने सहमति व्यक्त की कि हिंदी पत्रकारिता कुछ ज़्यादा ही लड़खड़ा रही है. उन्होंने छात्र की इस बात पर भी सहमति व्यक्त की कि हिंदी पत्रकारिता में एक-दूसरे को बिलो द बेल्ट हिट करने की प्रवृति कुछ ज़्यादा बढ़ गई है, जबकि सच्चाई का एक पहलू यह भी है कि हिंदी पत्रकारिता ही इस देश की ज़मीनी पत्रकारिता को परिभाषा देती है.
मैं एक उदाहरण दे सकता हूं, बीती 23, 24 और 25 मार्च को मैंने जनरल वीके सिंह का हिंदी में इंटरव्यू लिया और वह इंटरव्यू ईटीवी पर चला. उस इंटरव्यू का नोटिस देश में किसी ने नहीं लिया. लेकिन जब 26 तारीख़ की सुबह द हिंदू ने उन्हीं विषयों पर जनरल वीके सिंह की रिपोर्ट छापी, तो देश में तू़फान आ गया और तब अचानक कुछ लोगों को याद आया कि ये सारी बातें जनरल वीके सिंह तीन दिन पहले कह चुके हैं, मेरे ही इंटरव्यू में. और टाइम्स नाऊ ने जैसे ही उस इंटरव्यू को चलाना शुरू किया, अचानक सारे अंग्रेज़ी और हिंदी चैनल मेरे उस इंटरव्यू को अपने-अपने यहां दिखाने लगे या कौन पूरा पहले दिखाता है, उसकी होड़ में लग गए. हमने हिंदी में सबसे पहले इंटरव्यू किया, लेकिन उस इंटरव्यू का कोई नोटिस किसी हिंदी अख़बार ने नहीं लिया, जबकि अंग्रेज़ी चैनल टाइम्स नाऊ ने उसका नोटिस लिया तो सारे हिंदी चैनल और अख़बार उस इंटरव्यू का नोटिस लेने लगे.
जब मैं हिंदी पत्रकारिता की बात कहता हूं तो उसमें सारी भाषाई पत्रकारिता शामिल हो जाती है. जिस तरह की रिपोर्ट, जिस तरह के विषय हिंदी सहित दूसरी भाषाओं के लोग छापते हैं, वैसे विषय अंग्रेजी पत्रकारिता में नज़र नहीं आते. इसके बावजूद हिंदी पत्रकार और भाषाई पत्रकार एक गंभीर हीनभावना से ग्रसित रहते हैं. अंग्रेजी ने बड़े-बड़े पत्रकार दिए हैं. जब हम बड़े पत्रकारों की सूची बनाते हैं तो उसमें अंग्रेजी से जुड़े पत्रकारों की संख्या बहुत ज़्यादा होती है. जब पत्रकारिता का विद्यार्थी जाने माने और बड़े पत्रकारों के बारे में बोलता है, तो उसमें वह नब्बे प्रतिशत नाम अंग्रेजी पत्रकारों के लेता है. वह शायद इसलिए इनका नाम लेता है, क्योंकि हम अपने काम, अपने काम का महत्व और अपने काम का असर न तो खुद देखते हैं और न ही दूसरे को दिखाना चाहते हैं. हिंदी के वे पत्रकार जो न किसी से प्रभावित होते हैं, न किसी के दबाव में आते हैं और जिनका दिमाग़ बिलकुल सा़फ है, उनके साथ सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वे अपने जैसे दूसरे पत्रकारों से बात करना अपनी हेठी मानते हैं. ये शायद कहीं व्यक्तित्व में शामिल ईगो या अहंकार का तत्व है, जो पूरे व्यक्तित्व को प्रभावित कर जाता है. हिंदी के पत्रकार और खासकर वैसे पत्रकार जिनका मैंने ज़िक्र किया, सभा-समारोहों में तो मिल लेते हैं, लेकिन आपस में बैठकर व़क्त नहीं बिताते, ताकि उनके तनाव कम हो सकें या उनके पत्रकारिता के तनाव में दूसरे लोग शामिल होकर उनके उस तनाव को कम करने में मददगार साबित हो सकें. शायद एक संस्कृति का भी फर्क़ है. दिमाग़ी तौर पर हम अंग्रेजी पत्रकारिता को या अंग्रेजी पत्रकारों को ज़्यादा चुस्त-दुरुस्त और असरकारक मानते हैं. शायद हैं भी, क्योंकि देश का शासन, देश का प्रशासन, देश के नेता चाहे वह सोनिया गांधी हों या आडवाणी हों, उन्हें अंग्रेजी अ़खबार प़ढकर विषय की विश्वसनीयता ज़्यादा समझ आती है, जबकि हिंदी अ़खबारों में छपी हुई जानदार और तथ्यपरक, प्रासंगिक रिपोर्ट समझ नहीं आती. पर क्या इससे भाषाई पत्रकारिता खासकर हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे की हो जाती है या हम उन विषयों को चुनना बंद कर दें, जिनकी वजह से हमारा महत्व अकसर स्थापित होता है.
मुझे याद है, 70 के दशक में या 80 के दशक के पहले हिस्से में आनंद बाज़ार पत्रिका ने संडे और रविवार नाम की दो पत्रिकाएं निकाली थीं. हम लोग रविवार के संवाददाता थे. सुरेंद्र प्रताप सिंह संपादक थे और अकसर संडे और रविवार में खबरों को लेकर प्रतिस्पर्धा होती रहती थी. मैं यह नहीं कहता कि हमेशा, लेकिन अकसर रविवार की रिपोर्ट संडे से पहले आ जाती थी और शायद दोनों पत्रिकाओं ने मिलकर उस समय की राजनीति पर और सरकार पर बहुत असर डाला था. एमजे अकबर संडे के संपादक थे और उन्होंने इसका एक तोड़ निकाल लिया. वह अगले हफ्ते रविवार में छपी रिपोर्ट को उसी रिपोर्टर के नाम से अंग्रेजी में छाप देते थे. और जो आज मानसिकता है, उस समय भी यही मानसिकता होती थी कि अंग्रेजी में छपी हुई बहुत सारी रिपोर्ट जो एक हफ्ते पहले हिंदी में छप चुकी होती थीं, देश में धूम मचा देती थीं. आज भी हालात कुछ उससे अलग नहीं हैं. मैं एक उदाहरण दे सकता हूं, बीती 23, 24 और 25 मार्च को मैंने जनरल वीके सिंह का हिंदी में इंटरव्यू लिया और वह इंटरव्यू ईटीवी पर चला. उस इंटरव्यू का नोटिस देश में किसी ने नहीं लिया. लेकिन जब 26 तारीख़ की सुबह द हिंदू ने उन्हीं विषयों पर जनरल वीके सिंह की रिपोर्ट छापी, तो देश में तू़फान आ गया और तब अचानक कुछ लोगों को याद आया कि ये सारी बातें जनरल वीके सिंह तीन दिन पहले कह चुके हैं, मेरे ही इंटरव्यू में. और टाइम्स नाऊ ने जैसे ही उस इंटरव्यू को चलाना शुरू किया, अचानक सारे अंग्रेज़ी और हिंदी चैनल मेरे उस इंटरव्यू को अपने-अपने यहां दिखाने लगे या कौन पूरा पहले दिखाता है, उसकी होड़ में लग गए. हमने हिंदी में सबसे पहले इंटरव्यू किया, लेकिन उस इंटरव्यू का कोई नोटिस किसी हिंदी अख़बार ने नहीं लिया, जबकि अंग्रेज़ी चैनल टाइम्स नाऊ ने उसका नोटिस लिया तो सारे हिंदी चैनल और अख़बार उस इंटरव्यू का नोटिस लेने लगे. इस स्थिति को जब हम देखते हैं, तब उस छात्र का दर्द जिसने मुझसे यह सवाल पूछा ज़्यादा समझ में आता है.
मैं अपने साथी पत्रकारों और संपादकों से अनुरोध करना चाहता हूं कि आप पर बहुत ज़िम्मेदारियां हैं. अगर आपस में संवाद शुरू हो सके और जिस स्टोरी में किसी एक संवाददाता को संभावना नज़र आए, वह इस स्टोरी का फॉलोअप करे तो शायद पत्रकारिता के उस सुनहरे दौर की वापसी संभव हो सकती है, जिस दौर को हम पत्रकारिता का सुनहरा काल कहते हैं. उन दिनों भी जलन थी, उन दिनों भी प्रतिस्पर्धा थी, लेकिन नकारात्मक प्रतिस्पर्धा कम थी और सकारात्मक प्रतिस्पर्धा ज़्यादा थी. इसलिए मेरा यह अनुरोध, अगर मेरे साथियों की समझ में आ जाए, तो वे मुझ पर कम लेकिन हिंदी पत्रकारिता पर ज़्यादा उपकार करेंगे. हिंदी में शशि शेखर, अजय उपाध्याय, नीलाभ मिश्र जैसे संपादक हैं. इनमें कई और नाम जोड़े जा सकते हैं, चाहे वह श्रवण गर्ग हों, चाहे गुलाब कोठारी हों या फिर चाहे आलोक मेहता हों. अगर ये लोग सकारात्मक पहल नहीं करेंगे तो आने वाले पत्रकारों के विश्वास को अर्जन करना इनके लिए मुश्किल होगा. आख़िर में स़िर्फ इतना अनुरोध, ज़रूरी नहीं कि इसलिए मिलें कि फॉलोअप स्टोरी करनी है, या इसलिए मिलें कि मिलजुल कर कोई स्टोरी करनी है. लेकिन इसलिए मिलना चाहिए कि एक-दूसरे से विचार-विमर्श हो तो उस विचार-विमर्श में इस देश में किस तरह के ट्रेंड्‌स शुरू हो रहे हैं, किस तरह के ट्रेंड्‌स का साथ देना है और किस तरह के ट्रेंड्‌स का साथ नहीं देना है, कम से कम यह तो सा़फ हो सके. आशा करनी चाहिए कि हिंदी पत्रकारिता, जो इस देश को समझने वाली पत्रकारिता है, अपनी ज़िम्मेदारी समझेगी और हिंदी पत्रकारिता के नेता भी अपनी ज़िम्मेदारी को समझेंगे.